ये हेयरस्टाइल जो चेहरे का दिखाएंगे पतला, लगेंगे खूबसूरत

क्या आप अपने गोल और मोटे चेहरे को पतला दिखने के तरीके तलाश रहे हैं? हम सभी कभी न कभी इस दौर से गुजरते हैं जब हमें ऐसी हेयर स्टाइल की तलाश होती है जो हमारे फेसकट को सूट करे. ये बिल्कुल सही बात है कि ये हेयर स्टाइल आपके चेहरे का एक्स्ट्रा वजन कम करने वाली नहीं हैं लेकिन ये बिल्कुल सच है कि कुछ हेयर स्टाइल आपके फेसकट और लुक को पहले से कहीं ज्यादा शार्प बल्कि पतला दिखाने में भी मदद करती हैं.

1. पोंपाडोर

साल 2014 तक ज्यादातर पुरुष पोंपाडोर हेयर स्टाइल मेंटेन करने में यकीन रखते थे, लेकिन बाद में ये हेयर स्टाइल इतनी ज्यादा मशहूर होने लगी कि लोगों ने इससे किनारा करना शुरू कर दिया. लेकिन ऐसे लोग जिनके चेहरे भरे हुए थे, उन्होंने कभी भी पोंपाडोर हेयरकट से मुंह नहीं फेरा. इसकी वजह ये थी कि ये हेयर स्टाइल चेहरे को पतला दिखाने में मदद करती है. पोंपाडोर हेयर स्टाइल की सबसे बड़ी खूबी यही है कि ये चेहरे की जॉ लाइन और ठोड़ी को शार्प दिखाने में मदद करती है.

2. क्रू/बज़ कट

ये बात ​एकदम सही है कि सर्दियों और क्रू या बज़ कट का नाता बहुत पुराना है. ऐसी मिसाल मिलना भी मुश्किल है. इसकी तीन वजहें हैं. पहली वजह ये है कि, इसकी स्टाइलिंग में बिल्कुल भी मेहनत नहीं करनी पड़ती है.

दूसरी वजह ये है कि ये हेयर स्टाइल आपकी उम्र को कम से कम 10 साल पीछे कर देती है. और तीसरी ये है कि ये सर्दियों के मौसम में आपकी साइडबर्न्स को ही आपकी कार्डियो में बदल देती है जिससे आपका ब्लड फ्लो भी बढ़ जाता है. लेकिन ध्यान रखने वाली बात ये भी है कि इन्हें लेंथ में मध्यम और न ही बहुत मोटा और न ही बहुत पतला रखना चाहिए.

3. फॉक्स हॉक

सबसे पहले तो, ये हेयरकट मोहॉक स्टाइल में नहीं है. मोहॉक स्टाइल के बारे में जो दो बातें कही जाती हैं वो यही हैं कि इसमें एंग्युलर स्टाइल में बालों को कट किया जाता है. दूसरी, इसमें बालों के वॉल्यूम को बेस बनाकर चेहरे के हिसाब से इसे मोडिफॉई किया जाता है.

4. हाई वॉल्यूम अंडरकट

फ्लैट टॉप हेयरकट इन दिनों खास चलन में नहीं है. लेकिन फिर भी ये आपके चेहरे को पतला दिखाने में काफी मदद करता है. इस लुक के पीछे का मकसद यही है कि सिर पर मौजूद बालों को वॉल्यूम दिया जाए, इससे आपका सिर गोल न दिखकर ओवल/अंडाकार दिखने लगता है. ये और कुछ नहीं बल्कि चेहरे को स्टाइल देने का एक और तरीका भर है.

एक मां को टीनएजर बेटी से करनी चाहिए ये सारी बातें

ऐसी कई सारी बाते है जो हम पैरेंट्स से करना चाहते है खासतौर से मां से, क्योकि मां ही हमारी सबसे पहली गुरु होती है जो जीवन भर हर मोड़ पर आपका साथ देती है.तो ऐसे में जरुरी है कि हर पैरेंट्स को कुछ बातो पर अपने बच्चो से खुलकर बात करनी चाहिए. खासतौर पर जब घर पर जब बेटी हो. तो मां को उससे टीनएजर के पढ़ाव पर कुछ विषयों पर खुलकर बात करनी चाहिए. ताकि आपकी बच्ची ऐसी उम्र में हर मुश्किल से बच सकें.तो हर मां को अपनी टीनएजर बेटी से इन चीज़ों पर जरूर करनी चाहिए बात.

शारीरिक बदलावों पर

प्यूबर्टी हिट करते ही लड़कियों के शरीर की कई तरह के बदलाव देखने को मिलते हैं। उनके ब्रेस्ट डेवलप होने लगते हैं. जिसे लेकर वो कई बार परेशान हो सकती हैं. इस सिचुएशन में आपकी यह रिपॉन्सिबिलिटी बनती है कि आप उन्हें समझाएं कि ये सब नॉर्मल है.पीरियड्स से जुड़ी समस्याएं और जरूरी बातें बताएं. शरीर के बदलावों के हिसाब से उन्हें कपड़े पहनने का तरीका बताएं.

न्यूट्रिशियन

टीनएजर लड़कियों को सही न्यूट्रिशन की बहुत ज्यादा जरूरत होती है, तो उन्हें इसके बारे में भी बताएं. बेशक जंक और फास्ट फूड खाने में मजेदार होते हैं, लेकिन शरीर के लिए क्या जरूरी है ये समझाएं. टीनएज में माइक्रो और मैक्रो दोनों तरह के न्यूट्रिशन से भरपूर डाइट लेना चाहिए. कैलोरी, प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम, जिंक और फोलेट इनकी इस एज में सबसे ज्यादा जरूरत होती है.

मेंटल हेल्थ

उम्र के इस पड़ाव पर शारीरिक बदलाव के साथ मानसिक समस्याएं भी परेशान कर सकती हैं. इसलिए बेटियों से हर एक जरूरी टॉपिक पर खुलकर बात करें.इस एज में बहुत सारी लड़कियां पीरियड्स, ब्रेस्ट में आ रहे बदलावों से परेशान हो जाती हैं और जब कोई उन्हें नहीं मिलता है इस पर बात करने को, तो वो डिप्रेशन, तनाव का शिकार होने लगती हैं। उनकी इस समस्या को इग्नोर न करें.

Hindi Story: चाहत

Hindi Story: जमीन के लालच में चाहत के पति और पिता को उस के अपनों ने ही मार डाला. गोद में रह गया बेटा उदय, पर चाहत ने हिम्मत नहीं हारी और उदय को प्रौफेसर बना दिया. फिर वह अपने मायके लौटी. आगे क्या हुआ?

खे से लौट कर प्रेम शंकर ने अपने गले से गमछा हटाया और चबूतरे पर बैठ गए. बीड़ी सुलगा कर फूंक से धुआं हवा में उछाला. माथे के पसीने की बूंदों को पोंछते हुए और थकी आवाज में पुकार लगाई, ‘‘चाहत की अम्मांअभी तक मेहमान गांव से नहीं लौटे हैं क्या?’’ सवाल पूछ कर वे बेचैनी से चारों तरफ टहलने लगे. चाहत की मां राजौरी हड़बड़ाती हुई बाहर निकल आई. चाहत भी पीछे से अपने बेटे उदय को गोद में ले कर गई. ‘‘इतनी जल्दी आप गए? कुछ हुआ है क्या? कभी सोहन के बारे में नहीं पूछतेआज?’’ राजौरी की सांसें फूलने लगीं. प्रेम शंकर उस का हाथ पकड़ कर बोले, ‘‘अरे, शांत हो जा राजौरी. मैं ने बस इतना पूछ लिया कि शाम हो गई और अभी तक नहीं लौटे.’’ राजौरी की घबराहट कुछ कम हुई, फिर अपने पति के लिए पानी लाने चली गई.

राजौरी पानी का लोटा और कटोरी में थोड़ा सा गुड़ ले कर आई और प्रेम शंकर को पकड़ाया. वे उठ कर आंगन में नली के पास जा कर कुल्ला करने लगे, फिर चबूतरे पर बैठ गए. गुड़ खा कर पानी पिया. थोड़ी तरावट महसूस हुई. आज मौसम में खुश्की थी. नीम और पकड़ी के पेड़ की पत्तियां भी हिलने से मना कर रही थीं. ‘‘चाहत की मां, हम आते हैं दालान से घूम कर,’’ प्रेम शंकर की आवाज में सुस्ती थी.
‘‘कोई बात है क्या चाहत के बापू? कुछ तो है जो हम सब से छिपा रहे हैं?’’
प्रेम शंकर ने अपनी गरदन को एक ?ाटका दिया और हौले से मुसकरा कर बोले, ‘‘कुछ नहीं है. उमस के मारे दम निकल रहा है और धान रोपनी का समय हो रहा है. बहुत काम है, इसी मारे चिंता लगी हुई है.’’
प्रेम शंकर असल बात राजौरी को बता नहीं पाए. दरअसल, जब वे रास्ते में सुरेश से मिल कर रहे थे, तो एक बात पता चली थी उन्हें. मारे घबराहट के उन को पसीना आने लगा था.

इस गांव की रीत है कि जायदाद अपने बेटे को ही देनी होती है. अगर बेटा नहीं है तो भतीजे को. बेटियों को जायदाद का एक हिस्सा भी नहीं दिया जा सकता है. प्रेम शंकर को एक ही बेटी है चाहत. वह छोटी थी तब प्रेम शंकर सोचते थे कि खेतखलिहान भतीजे को दे देंगे, पर बाद के दिनों में भाईभतीजे के रंगढंग ठीक नहीं लगने से उन का मन बदल गया था. चाहत की शादी राजौरी की बहन की ननद के बेटे रोहन से हुई थी, जिस के सिर से मांबाप का साया उठ गया था. हालांकि, गांव में अफवाह है कि चाहत और सोहन के बीच प्रेम था. बातों को दबाने के लिए उन दोनों की शादी करा दी गई. प्रेम शंकर ने सोहन और चाहत के नाम सारी जायदाद लिख दी. पूरे कुनबे में यह बात आग की तरह फैल गई. सब तिलमिलाहट से भर गए. सब के सब प्रेम शंकर और उन के परिवार से कट कर रहने लगे, पर प्रेम शंकर और उन के दामाद सोहन को गांव के लोग बहुत प्यार और इज्जत देते थे.

आज जो बात सुरेश ने बताई, उस के लिए प्रेम शंकर कभी सोच भी नहीं सकते थे. इतनी नीचता पर कैसे उतर सकते थे मथुरा भैया और भतीजे. ‘‘प्रेम शंकर, जरा बच कर रहना अपने भाईभतीजे से. उन लोगों ने प्लानिंग की है कि सोहन को जान से मार देंगे और उदय को भी.’’इतना सुनते ही प्रेम शंकर अचानक खांसने लगे थे. उन की छाती में कुछ अटका हुआ महसूस हो रहा था. उन की बेचैनी बढ़ गई थी. आखिर वे करें तो क्या करें? क्या प्रेम शंकर को पुलिस के पास जाना चाहिए? क्या यह बात सच हो सकती है? उन्होंने तय किया कि कल सुबह वे थाने में जा कर शिकायत दर्ज करा आएंगे. अपनी खुशियों को इस तरह दूसरों की हथेलियों में बंद नहीं होने देंगे. अजीब सा खालीपन चारों तरफ पसर गया था. परिंदे भी अपने अपने घोंसलों की ओर जा रहे थे, पर प्रेम शंकर को वापस घर जाने का मन नहीं हुआ.

हलका अंधेरा गहरा आया था. प्रेम शंकर धीमे कदमों से घर की ओर कर खेत की ओर चले गए. जिंदगी किस करवट लेगी, इस सोच ने उन का मन उथलपुथल से भर दिया. एक ऐसा समय भी था, जब प्रेम शंकर सिंह और उन के परिवार की जिंदगी आराम से कट रही थी. एक तरह का आनंद था उन के घर के चारों ओर. चाहत की नौकरी शिक्षामित्र में लग गई थी और सोहन भी पास के गांव में सरकारी टीचर हो गया था. उदय के पैदा होने के बाद तो प्रेम शंकर के घर में हर दिन उत्सव जैसा माहौल रहता था. फिलहाल प्रेम शंकर टहलतेटहलते कुछ दूर आगे अपने खेत के आसपास निकल आए. अचानक उन्हें कुछ आवाज सुनाई दी. पीछे मुड़ कर देखा. उन की आंखों के आगे अंधेरा छा गया. दुश्मन के रूप में उन के भाईभतीजे हाथ में गंडासा लिए खड़े थे. अभी प्रेम शंकर संभल पाते कि उन पर हमला शुरू हो गया. उन के मुंह को अपने हाथों से दबाए उन का एक भतीजा कह रहा था, ‘‘बहुत मर्दानगी छाई है . अब सब भुला जाओगे. हमारे रहते तू सोहन को मालिक बना देगा, ले अब भुगत.’’

गंडासे से प्रेम शंकर का सिर काट कर उन्हीं के सगे भाई नेजय भवानीके नारे से जीत का जश्न मनाया.
अचानक राजौरी का दिल जोर से धड़का. कुछ अपशकुन होने का सोच कर उस की आंखों में आंसू गए. दिल रहरह कर धड़क रहा था. पैर भी लड़खड़ा रहे थे. अपने अंदर कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ. मन बेचैन हुआ तो उदय को ले कर पड़ोस में चली गई. चाहत स्कूल की कौपियां जांचने बैठ गई. उस के चेहरे पर संतोष की चमक थी. तभी सोहन की आवाज सुनाई दी, ‘‘चाहत, एक लोटा पानी देना.’’ पानी और गुड़ लिए जब चाहत बाहर आई तो सोहन के हाथों को पकड़े हुए चाचा और भैया लोग को देखा. एक अनजाने डर से उस का मन कांप गया. उन के हाथों में कुल्हाड़ी और गंडासा था. चाहत दौड़ कर चाचा के पैरों से लिपट गई, ‘‘सोहन को कुछ मत करिए मथुरा चाचाजी.’’ ‘‘यहां से हट चाहत. आज प्रेम के खानदान को खत्म कर देंगे. बहुते गरमी चढ़ी है शरीर में.’’


‘‘चाचाजी, हम आप की गोद में खेले हैं. हमारा सुहाग मत उजाडि़ए. रजनीश भैया, धीरज भैया, छोड़ दीजिए सोहन को. हम सब जायदाद आप के नाम कर देंगे. इस गांव से हम सब बाहर चले जाएंगे. सोहन को कुछ मत करिए चाचाजी.’’ चाहत की दर्दभरी आवाज को अनदेखा कर धीरज ने कहा, ‘‘चल हट, ज्यादा अंगरेजी मत ?ाड़. आज हमारी आंखों में खून उतर आया है.’’ ‘‘अरी अम्मां, कहां गई रेजल्दी आओ अम्मां, वरना सोहन को ये लोग मार देंगे. अरे गांव के लोग, आओ बचाओ इन को. सब कहां चले गए हो? कोई तो इन कसाइयों सब को रोको,’’ चाहत की कातर आवाज चारों तरफ गूंजने लगी.
तभी कुल्हाड़ी और गंडासे से सोहन के पूरे शरीर पर वार होने लगे. चाहत की आंखों के सामने सोहन मर रहा था. उस की दर्दभरी आवाज से पूरा गांव रो रहा था, पर दुश्मन की आंखों पर जायदाद की पट्टी बंधी थी. राजौरी उदय को लिए घर की ओर रही थी कि तभी मुसहर टोले के परदेसी ने उदय को उन की गोद से ले लिया और रोते हुए बोला, ‘‘जल्दी घर जाओ मालकिन. प्रेम मालिक और सोहन बबुआ की जान…’’

राजौरी वहीं से चिल्लाते हुए घर की तरफ भागी आई, ‘‘चाहत के बाबू, जल्दी आओहमारा घर उजड़ गया है…’’ घर के पास कर राजौरी की आंखें फटी की फटी रह गईं. सोहन का शरीर कई टुकड़ों में इधरउधर फैला हुआ था. पास ही चाहत बेहोश पड़ी हुई थी. दुश्मन वहां से खूनी खेल खेल कर चले गए थे.
राजौरी प्रेम शंकर की खोज में खेत की तरफ गई. देखा गांव के लोग प्रेम शंकर की लाश लिए चले रहे
थे. इस सदमे से राजौरी का वहीं दम निकल गया. चाहत को गांव की औरतें पानी का छींटा दे कर होश में लाने की कोशिश कर रही थीं. होश आते ही वहसोहनसोहनचिल्लाने लगती थी और फिर बेहोश हो जाती थी. रात को पुलिस की गाडि़यां आईं. गांव के लोगों आंखों देखा सब बयान कर दिए. चाहत का भी बयान लिया गया. 3 लाशों का एकसाथ दाह संस्कार किया गया. श्मशान घाट पर धूंधूं कर चिताएं जल रही थीं. तेज हवा से लपटें कांप उठती थीं. पूरे गांव में मातमी सन्नाटा पसरा हुआ था. सब एकदूसरे से आंखें चुरा रहे थे. पुलिस मथुरा और उस के बेटों को खोजने में लगी हुई थी.

उस रात खौफ से पूरा गांव थर्रा गया था. चाहत को जब होश आया तब उदय का खयाल आया. मुसहर टोले के विशंभर ने बताया कि परदेसी बाबा उस को गांव से बाहर ले गए हैं. सुनने में आया है कि उदय बाबू को भी मारने की प्लानिंग है. ‘‘मु? ले चलो उदय के पास. पता नहीं वह कैसे रात में रहा होगा. एक दिन भी वह मेरे बगैर नहीं रहा है,’’ रोते हुए चाहत ने कहा. ‘‘उदय बाबू ठीक हैं बहन. परदेसी बाबा से बात हुई है. कल सुबह हम उदय को ले कर आएंगे.’चाहत के पास अब उदय बचा था. हिम्मत से काम लेना होगा उसे. उस ने सोचा कि गांव में रह कर इंसाफ की गुहार नहीं लगा सकती है और उदय को भी खतरे में नहीं डाल सकती है. रात के 10 बजे जब गांव के सारे लोग सो रहे थे, तब चाहत विशंभर के साथ अपनी मौसी के गांव चली आई. सुबह विशंभर उदय को परदेसी से ले कर चाहत के पास आया. आंसुओं पर बंधा हुआ बांध अचानक से टूट गया. उदय को गोद में ले कर चाहत फूटफूट कर रोने लगी.

उस का मन किया कि उदय को अपने सीने में छिपा ले. जिसे कोई देख पाए, जिसे कोई छू पाए.
मथुरा और उस के बेटे को पुलिस खोज नहीं पा रही थी. तब कोर्ट के आदेश पर उस के घर का कुर्की जब्ती का वारंट आया. एक दिन के बाद मथुरा और उस के बेटों ने पुलिस के हवाले कर दिया. ताउम्र कैद की सजा हुई. चाहत गांव लौट कर नहीं आई. उस ने अपना घर परदेसी बाबा के नाम कर दिया. खेतखलिहान उन लोगों को बेच दिया, जिन्होंने पुलिस के सामने मथुरा और उस के बेटों के खिलाफ गवाही
दी थी. दिन गुजरने लगे, महीने बीतने लगे. दुखों का मौसम बहुत लंबा होता है. इन बीते सालों में चाहत ज्यादातर चुप ही रहती थी. आंखें सूनी रहती थीं. वह कहीं भी आनाजाना छोड़ चुकी थी. उस का सपना बेटे को ऊंचाई पर देखना था. उदय 7 साल का हो गया था. उस पर वक्त के पहले ही गंभीरता गई थी. उस का सारा समय मां के साथ और पढ़ाई में गुजरता था.


एक दिन उदय ने पूछा, ‘‘मां, मेरे पिताजी कहां हैं? सभी के पिता उन के साथ रहते हैं, मेरे पिता तो कभी मु? देखने भी नहीं आते हैं.’’ चाहत बेबसी से मुसकराई. कुरसी से उठ कर उदय को सीने से लगा कर बोली, ‘‘तुम्हारे पिता अब इस दुनिया में नहीं हैं बेटा. उन की मौत हो गई है.’’ ‘‘कैसे मौत हो गई मां?’’ उदय ने हैरान हो कर पूछा. ‘‘इस बारे में मैं कभी बाद में बताऊंगी, तब जब तुम बड़े और सम?ाने लायक हो जाओगे,’’ कहते हुए चाहत ने अपनी मुट्ठियों को कस कर बांध लिया. चाहत भरसक कोशिश करती कि उदय को कोई तकलीफ हो. वह मां और पिता दोनों की भूमिका निभा रही थी. कभी भी उदय के सामने उदास नहीं रहती और कभी गुस्सा होती. एक दिन स्कूल की जल्दी छुट्टी हो गई. उदय घर आया तो मां को एक साड़ी को हाथों से सहलाते हुए देखा. उस को देख कर मां बक्से में उस साड़ी को रखने लगी.
‘‘मां, यह क्या रख रही हो? मु? दिखाओ,’’ उदय जिज्ञासा से पूछा.

‘‘कुछ नहीं रख रही. जाओ हाथमुंह धो लो. खाना साथ खाएंगे,’’ कहते हुए चाहत ने जल्दी से उस साड़ी को बक्से में रख दिया. ‘‘बताओ मां, क्या छिपा रही हो?’’ उदय ने जिद पकड़ ली. ‘‘अभी नहीं बेटा, अभी तुम सम?ाने लायक नहीं हो. बाद में इस बारे में बताऊंगी,’’ चाहत अपने सूखे होंठों पर जीभ फेर कर रसोईघर में चली गई. दिन बीतते रहे. उदय ने 10वीं के बोर्ड इम्तिहान में जिले में टौप किया था. पूरे गांव में उत्सव का माहौल था. चाहत सुबह से ही मिलनेमिलाने में बिजी थी. सभी की जबान पर एक ही बात थी कि बिना बाप का बेटा है, इस को हर क्षेत्र में कामयाबी मिले. रात के 10 बज रहे थे. उदय की नींद खुली. मां को अपने पलंग पर देख कर वह उसे खोजने लगा. स्टोररूम का दरवाजा खुला हुआ था. अंदर गया तो देखा कि मां साड़ी को गोद में ले कर बैठी हुई है. आहट सुन कर चाहत ने ?ाट से वह साड़ी बक्से में रख दी. ‘‘मां , इस साड़ी में ऐसी क्या बात हैआप जबतब इस को ले कर चूमती रहती हैं…’’


‘‘अभी नहीं बता सकती. बाद में बताऊंगी. जब मु? लगेगा कि तुम को बताना चाहिए,’’ चाहत की बातों में
इतनी मजबूती थी कि उदय कुछ नहीं पूछ सका. इस के बाद भी उदय ने कई बार अपनी मां को उस साड़ी के साथ तड़पते देखा, लेकिन फिर कुछ पूछने की हिम्मत नहीं कर सका. उदय को ऊंची तालीम हासिल करने के लिए चाहत ने उस को दिल्ली के एक होस्टल में भेज दिया. समय पंख लगा कर उड़ रहा था. उदय हरेक इम्तिहान में टौप करता गया. हर बार चाहत का सिर गर्व से ऊपर उठ जाता था. अब वह फिर से मुसकराने लगी थी. गांव के गरीब बच्चों और अनपढ़ औरतों को पढ़ाना उस का मकसद हो गया था.
आखिरकार ख्वाबों को मंजिल मिल गई. चाहत की इच्छा और उदय की मेहनत रंग लाई. उदय बनारस
हिंदू यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर बन गया. एक चमकीली उम्मीद चाहत के आंचल में समा गई. वह सुनहरे भविष्य घोंसला बनाने के लिए फिर से उम्मीदों के तिनके जुटाने लगी.

उस के पैरों में पंख लग गए. अब तक का रोका हुआ बांध ढहने लगा. चाहत उदय के कंधे पर सिर रख कर फूट पड़ी, ‘‘आज मेरा जीवन सफल हो गया उदय. तुम्हारे नानानानी और पिता जहां भी होंगे, खुशी का जश्न मना रहे होंगे.’’ रात में वह साड़ी निकाल कर चाहत उदय के पास बैठ गई, ‘‘जो जिज्ञासा तुम्हारे अंदर बचपन से है, अब उस साड़ी और तुम्हारे पिता के बारे में बताने का समय गया है उदय.’’ चाहत ने गहरी सांस ली, ‘‘तुम्हारे पिता, नाना और नानी को उन के अपनों ने ही मारा, जायदाद के लिए. आज भी मैं उस जायदाद को कोसती हूं, जिस के चलते हमारा पूरा परिवार बेमौत मारा गया.’’ बीते हुए दिनों को बताते हुए चाहत उसी दुख से गुजर रही थी, जिसे याद कर के वह सालों से रोती रही है. कहा जाता है कि दुख बांटने से दुख कम होता हैपता नहीं कितना कम हुआ. पर चाहत के चेहरे पर शांति छा गई थी.
उदय सन्नाटे में था. अचानक वह चौंक कर उठा और बोला, ‘‘मां, चलो नाना के गांव. मैं देखना चाहता हूं उस गांव को मेरे मेरे पिता की मौत हुई थी.’’


दूसरे दिन चाहत उदय को ले कर उस गांव में गई, जहां उस का सारा संसार उजड़ गया था. चाहत और उदय के साथ गाड़ी में उदय का मामा विशंभर भी बैठा था. उस की आंखें बारबार नम हो जा रही थीं.
चाहत गाड़ी से उतरी. परदेसी का बेटा उस को देखते ही खुशी से चिल्ला उठा, ‘‘हम सब की चाहत बहन गई.’’ आवाज सुन कर गांव के लोग इकट्ठा होने लगे. विशंभर के साथ उदय भी गाड़ी से उतरा.
उदय ने सब को प्रणाम किया. विशंभर ने सब को बताया कि यह चाहत का बेटा उदय है और बनारस के कालेज में पढ़ाता है. सब की जबान पर एक ही बात थी, ‘हम सब के उदय बबुआ गए हमारे गांव…’
चाहत के घाव पर जैसे कोई मरहम लग रहा था. उसी पल महसूस हुआ, जैसे हवा में एक खुशबू बिखर रही हैसोहन के देह की खुशबू. ‘‘कुरसी लाओ जरा, उदय बबुआ के बैठने के खातिर,’’ विशंभर उल्लास से बोला.


तभी परदेसी की पत्नी बनवारी हांफते हुए आई. उस के हाथों में गुड़ और पानी का लोटा देख कर चाहत को अपना वही दिन याद गया, जब सोहन को पानी देने गई थी और अपनी आंखों से दर्दनाक मौत देखी थी. धुंधली नजर से उस ने बनवारी काकी को देखा और उन के गले लग कर रोने लगी. ‘‘काकी का पैर छुओ उदय. परदेसी काका अगर नहीं होते तो आज तुम जिंदा नहीं रहते,’’ चाहत ने कहा. उदय पैर छूने के लिए ?ाका, तभी बनवारी काकी ने कांपते हाथों से उसे गले लगा लिया. ‘‘बबुआ, तेरी माई के साथ बहुत बुरा हुआ. हम ने अपनी आंखों से सब देखा, पर कुछ कर नहीं पाई. आज भी वही हालात हैं. कुछ नहीं बदला बीते सालों में. बेटियों का हिस्सा आज भी भाईभतीजा के पास जा रहा है,’’ बनवारी काकी ने कहा. उदय कुछ देर के लिए वहीं चबूतरे पर बैठ गया और हाथ जोड़ कर बोला, ‘‘मु? कुरसी नहीं चाहिए और किसी तरह का स्वागतसत्कार. यह मेरे नाना का गांव है. आप सब मेरे अपने हैं.

मेरी एक छोटी सी चाहत है. आप चाहें तो इसे आशीर्वाद के रूप में मु? दे सकते हैंक्या आप लोग दीजिएगा?’’ उदय के बोलते ही पूरा गांव चिल्ला उठा, ‘मांगो बच्चा, हम सब से जो बन पड़ेगा, दे देंगे.’‘‘आज के बाद इस गांव की बेटियों को भी उन के हिस्से का हक देना होगा. जो मेरी मां के साथ हुआ, वह अब किसी बेटी के साथ हो. ‘‘आज बरसों बाद मेरी मां उसी साड़ी को पहन कर आई है, जिस साड़ी को पहने हुए अपने पति की लाश को गले लगाया था, चूमा था. देखिए, खून के छींटे अभी भी साड़ी पर लगे हुए हैं. क्या आप सब फिर ऐसी जिंदगी अपनी बेटियों के नाम लिखना चाहते हैं?’’ कहते हुए उदय की आंखों में आंसुओं का मानो समंदर उतर आया. इस माफी को किसी में ठुकराने की हिम्मत नहीं हुई. चाहत को लगा कोई अनजाना उस के पीछे खड़ा मुसकरा रहा है.                                 

कात्यायनी सिंह

  

Hindi Story: पहली मुलाकात

Hindi Story:  मैं ने उसे बचपन में देखा था. तभी से उस की तसवीर मेरे जेहन में छप गई थी. फिर लगा कि इस खूबसूरत लड़की से दोबारा मुलाकात होगी भी या नहीं. इस बीच मेरी शादी पक्की हो गई, पर मैं उसे भूल नहीं पाया था

कु मुलाकातें ऐसी होती हैं, जो जिंदगी को एक कसक दे जाती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी को एक मिठास, जिंदगी को एक खूबसूरत, सुखद, सुनहरे रंग से रंग देती हैं. कुछ मुलाकातें जिंदगी के लिए एक सुखद अहसास बन कर रह जाती हैं. कुछ मुलाकातें कभी नहीं भूलने के लिए होती हैं, जैसे उस की और मेरी मुलाकात जिंदगी में एक अजीब सी हलचल, एक चमक तो लाई थी, जिसे हम चाह कर भी यादों से नहीं दूर कर सके, फिर भी किसी से कह नहीं सकते थे, ऐसे भी हालात बन कर रह गए थे. अचानक हमारी मुलाकात फिर से दोबारा होगी, यह सोचा भी नहीं था हम ने. हो सकता है, उस केमन में मिलन दोबारा हो’, ऐसा कुछ रहा हो.

चिलचिलाती, आग उगलती जेठ महीने की दोपहरी हमारे किशोरावस्था से ले कर जवानी की ओर जाते रास्ते के समय हुआ करती थी. गांव में तब बिजली नहीं हुआ करती थी. तब बूढ़े बरगद की छाया में ठंडापन रहा करता था. बड़ेबुजुर्ग कोई चौपड़, कोई ताश खेलते हुए दोपहर वहीं बिताया करते थे.
उस बूढ़े बरगद के बगल में ही हमारा आम का बगीचा था, जो अभी भी है. जेठ महीने की तपिश आग उगलती है यह तो आप सभी जानते हैं. जवानी बड़ी अलबेली होती है, आप यह भी जानते हैं, क्योंकि इस मंजर से सभी गुजरते हैं. किशोरावस्था से जवानी की ओर बढ़ते कदम कब लड़खड़ा जाएं, कोई नहीं जानता. इस उम्र में जो संभल गया, वह पूरे जीवन संभल कर सुखमय जीवन बिताता है और जो लड़खड़ा गया, गिर गया, वह फिर संभल नहीं पाता, अपनी पूरी जिंदगी नरक जैसी बना डालता है.

हमारे ऊपर उन बुजुर्गों का साया था, जिसे मातापिता, दादीदादा कहते हैं. गांव के बड़ेबुजुर्गों का उपदेश भी हम उस बूढ़े बरगद के नीचे ध्यान से सुना करते थे. हम हमेशा पिता से डर कर कभी रास्ते से भटके नहीं थे. तब साइकिल या पैदल चल कर नातेरिश्तेदारों के यहां लोग आयाजाया करते थे. आम, जो आगे पकना शुरू करते थे, वे आधे जेठ से अपने रंग बदलने शुरू कर दिया करते थे. हम अपने हमजोली के साथ सुबहशाम बगीचे में, दोपहर बुजुर्गों के संरक्षण में बूढ़े बरगद के नीचे ही रहते थे. हम एक अनुशासन में रहते थे. वैसे भी स्कूल में जेठ के महीने में एक महीने की छुट्टी रहती थी. स्कूल में मास्टर पिता से भी ज्यादा खयाल रखते थे, खासकर पढ़ने वाले बालकबालिकाओं को, जो उन को सम्मान देते थे, उन का तो वे बहुत ही ध्यान रखते थे.

एक दिन एक अधेड़ महिला, एक पुरुष के साथ आईं, साथ में उन के साथ एक किशोरी थी, जो जवानी की दहलीज पर पांव रखने ही वाली थी, ठीक हमारी ही तरह. वह हम से वही सालछह महीने छोटी रही होगी.
हमारे बगीचे में कर वे लोग सुस्ताने लगे थे. आकर्षण स्वाभाविक था, खासकर उस ओर जिस ओर एक सुंदरता का खजाना लिए, सुंदरता की मूर्ति सी, अल्हड़ रूपवती कन्या सामने हो. मैं भी कुछ कम नहीं था. गबरू जवान, किशोरावस्था से जवानी की दहलीज की ओर बस दो कदम में ही पहुंचने वाला था. शायद कनखियों से निहार रही होती वह बाला भी आकर्षित थी. मानमर्यादा में बंधी, बालिका शर्मीली लगी, जिस के ?ाले बड़े दांतों से थोड़ी सी मुसकराहट से बिजली सी कौंध जाती थी.

उस के दांत मोती की तरह सफेद ऐसे लगते थे जैसे किसी कुशल कारीगर ने उसे उस के मुंह में तराश कर फिट कर दिए हों. उस के होंठों की लालिमा पके हुए कुंदरू की तरह लाल थी. वह शर्मीले स्वभाव की लगती थी. जब वह किसी बात पर शरमाती, तो उस के लाललाल गाल इतने लाल, सुरमई हो जाते थे, जैसे रति के गालों में उस के प्रेमी पति कामदेव ने केसर मल दिया हो. उस के गालों की सुंदरता ऐसी थी, जैसे फगुआ खेलते समय लाल गुलाब उस के गालों में मल दिया गया हो. उस की उठी हुई नाक से मेरी आंखें हटने का नाम नहीं ले रही थीं. मैं भी मर्यादा में रह कर ही उसे देख कर हैरान था कि क्यों उसे देख कर मन ही नहीं भरता है. सहसा उस ने तिरछी नजरों से मु? देखा, हालांकि वह बड़ी चतुराई से सब की नजरें बचा कर मेरी ओर देख रही थी, फिर भी मेरी और उस की आंखें चार हो गई थीं.

अरे वाह, क्या गजब की आंखों में सागर सी गहराई थी. मेरे गोलखा आम की सी फांकें थीं उस की आंखें, गजब का आकर्षण. ऐसा तीर उस की कजरारी, बड़ीबड़ी आंखों से निकला, जो सीधे मेरे दिल के अंदर एक अमिट घाव करता चला गया था. उस के बालों में बंधी चोटी उस के उठे हुए कूल्हों को बारबार सहलाती सी लग रही थी. कोई साज, कोई सिंगार फिर भी गजब का आकर्षण, कुदरती खूबसूरती जो सीधे मेरे दिल में उतरती चली गई थी. उस के अभी हाल के ही उठे लगते कठोर उभार किसी को भी भटका सकते थे. मेरा मन उस से बात करने का होता था. उस के पिता मेरे पिताजी से बात कर रहे थे, पर मैं उस बातचीत को सुनने की कोशिश में नहीं था. मैं तो किसी बहाने, किसी तरह से उस से बात करने के लिए उतावला था.

तभी उस की मां ने मु? से कहा, ‘‘दादू, आम तो तुम्हारे फले हैं, पकते तो अभी नहीं होंगे.’’ मैं ने ?ाटपट कहा, ‘‘आइए, जरा देखते हैं. हमारे दारानगर में शायद पके मीठेमीठे आम मिल जाएं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते जाइएगा आप, अचार रखने के लिए.’’ उस की मां ने कहा, ‘‘नहीं बेटा, हम लोग रामपुर से निमंत्रण कर के आए हैं, थके हुए हैं कौन लाद कर ले जाएगा. हम वैसे भी 3 दिन से ढंग से सो तक नहीं पाए हैं.’’ मैं ने ?ाट से कहा, ‘‘मांजी, आप चलिए . आज हमारे घर में रह कर फिर कल चले जाना. अभी वैसे भी 10 किलोमीटर बाद सड़क मिलेगी आप को.’’ उस की मां ने ?ाटपट मेरे गालों पर प्यार से हाथ फेरा, जैसे मेरी अम्मां फेरा करती थीं. मु? बहुत अच्छा लगा, अपनेपन सा महसूस हुआ.

उस की मां ने बड़े प्यार से कहा, ‘‘फिर कभी आऊंगी तो जरूर चलूंगी, सालों से तुम्हारी अम्मां से नहीं मिली हूं, जब तुम छोटे से थे, तब से. बहुत दिन हुए घर से निकले हुए, इस के दादादादी परेशान होंगे.
4 दिन बाद फिर मेरे मायके में शादी है, वहां भी जाना जरूरी है. गरमी में ही शादीब्याह में घूम लेते हैं वरना सालभर घर से कहां निकलना होता है.’’ मु? आभास हो रहा था कि ये लोग मेरे अम्माबापू के करीबी हैं. मैं सोच ही रहा था कि उस के पिता ने कहा, ‘‘चली जाओ, बिटिया को भी दिखा दो. इसे तो पके आम बहुत पसंद हैं. कुछ कच्चे बढि़या आम लेते चलेंगे. देखो बेटा, अपने बाप की तरह से नहीं बांध देना, अब बो? लादने का माद्दा नहीं रहा.’’ मैं सोच रहा था शायद उस का नाम लेंगे जिस से नाम जानने का मौका मिलेगा, जो नहीं मिला था. तो क्या हुआ, मेरे मन की मुराद पूरी हो गई थी.


मैं उन को लिवा कर अपने दारानगर नाम वाले आम के पेड़ के पास गया. वहां कुछ अधपके, तोता के काटने से गिरे आम पड़े थे. उसे उस की मां ने आम उठा कर दिया था. उस ने हंसते हुए पूछा था, ‘‘मम्मी, इस आम को दारानगर क्यों कहते हैं?’’ मैं ने हंसते हुए उस को बताया था, क्योंकि उस के बोलते हुए ऐसा लग रहा था जैसे शब्दों में शहद घुला हो. कितनी मीठी, प्यारी जबान है इस की. काश, इस का साथ जीवनभर के लिए हो सकता. यह सोचते हुए मैं ने कहा, ‘‘असल में मेरे दादाजी दारानगर नाम की जगह पर गए थे, जहां से इस आम का फल ले कर आए थे. यहां लगा कर, इस का नाम याद के लिए दारानगर रख दिया था, इसलिए इस का नाम दारानगर पूरा गांव जानता है.’’ वह आम खाते समय बहुत ही अच्छी, सुंदर लग रही थी. मेरा मन करता था कि उस से दोस्ती करूं. कुछ बोलूं, बतियाऊं. मैं अपने संकोची स्वभाव, संस्कारवश कुछ भी नहीं कह पाया था.

मैं ने उन के लिए अच्छेअच्छे आम तोड़ दिए थे. दिल तो कहता था कि समय यहीं ठहर जाए, बस यों ही वह मेरे करीब रहे. समय से मैं क्या सभी हारे हैं, समय ही हमारे बचपन को छीन कर भाग लिया था, अब हम क्याक्या सोचने वाली उम्र में कर, कितनी ऊंचाई पर उड़ने की सोच रहे हैं. अगर अम्मांबापू, दादादादी, गांव के बड़ेबुजुर्ग नहीं होते, तो हम किस दिशा में होते, पता नहीं. तभी उस की अम्मां कर मेरे सिर पर हाथ रख कर बालों को सहलाने लगी थीं. मैं चुपचाप खड़ा था. कहना तो बहुत चाहता था, पर कह नहीं पा रहा था. तभी उस की अम्मां ने प्यार से कहा, ‘‘बेटा, अच्छे से पढ़ाईलिखाई करना, अब हम चलेंगे, नहीं तो घर पहुंचने में रात हो जाएगी.’’ बिना कुछ कहे किसी मशीन सा मैं उन के पीछेपीछे चल दिया था. मैं ने देखा, मेरे बापू उस के बापू के साथ घुलमिल कर बातें कर रहे थे.

उन के पास पहुंच कर उस चंचल, चंद्रमुखी ने अपने बापू से कहा था, ‘‘बापू, अम्मां कहती हैं अब चलेंदेर करेंगे तो रात हो जाएगी.’’ कितनी प्यारी, कोयल सी मीठी बातें जो मेरे दिल में सीधे उतरती चली गई थीं. मैं चुपचाप खड़ा रहा. ऐसा लगता था, काश वह कुछ देर रुक जाती. mवे लोग मेरे बापू के पैर छू कर फिर चल दिए थे. मैं ने बिना पिता की आज्ञा के उन के पैर नहीं छुए थे, जबकि मन श्रद्धा से भरा हुआ था. वे तीनों जा रहे थे. मैं एक अचल मूर्ति बन कर खड़ा उन को जाते देख रहा था. बापू थोड़ी देर में वहां से घर की ओर चले गए थे, यह कहते हुए, ‘‘कुछ देर रुक कर चले आना, रात नहीं करना.’’ मैं उन को देखते हुए वहीं खड़ा था. बहुत दूर जाने के बाद उस लड़की ने मुड़ कर देखा था. उस के चेहरे के भाव क्या थे, दूर हो जाने की वजह से सम? पाना मुश्किल था. हां, उस का मुड़ कर देखना यह तो कह ही रहा था कि उसे भी कुछकुछ हुआ था.

उन के जाने के बाद ऐसा कोई दिन, ऐसी कोई रात नहीं होती थी, जो वह याद नहीं आती थी.
3 साल में मेरी पढ़ाई पूरी हो गई थी. सरकारी नौकरी बापू ने मु? नहीं करने दी. उन का कहना था कि एक लड़का है, हम महीने में मजदूरों को बहुत मजदूरी देते हैं. कहीं नहीं जाना यहीं हमारे पास, हमारे साथ रहना है. मेरी शादी बापू ने पक्की कर दी थी. अम्मांबापू आपस में बतियाते थे. मेरी हिम्मत कहां कि पूछ सकता. हां, खुशी मु? भी थी, फिर भी एक कांटा, एक टीस दिल में चुभ रही थी कि काश, वह मेरी पत्नी होती. समय आया, शादी हुई, फेरे हुए. मैं ने उसे देखा उस ने मु? देखा. हां, कन्यादान देने वाले अंकल ऐसे लग रहे थे, जैसे इन को कहीं देखा था. सुहागरात थी, सेज सजी थी, पर अब की तरह नहीं, वही साधारण नए गद्दारजाई में. वह वहां पहले से मौजूद थी. मैं अंदर गया, कच्चे मकान में लकड़ी के दरवाजे थे, लकड़ी का हटका बंद कर दिया था मैं ने.

दिल धकधक कर रहा था. मैं ने हिम्मत जुटाई, उस के विरोध के बावजूद मैं ने घूंघट हटाया.
मैं अपने सामने उसे देखते ही बल्लियों उछलने लगा था. यह तो शायद वही थी. उस ने धीरे से मुसकरा
कर धीमी, मीठी सी आवाज में कहा, ‘‘क्या हुआ?’’ मैं जैसे सोते से जाग गया, मन की मुराद पा गया था. मैं ने कहा, ‘‘तुम…’’ उस ने कहा, ‘‘हां, मैंआप नहीं चाहते थे क्या? मेरे अम्मांबापू ने शायद आप को उसी दिन पसंद कर लिया था. उन की बात भी हो गई थी. मैं ने भी तो शादी के समय चुपके से देखा, तो…’’
‘‘तो क्या, जरा बताओमैं तो उसी दिन से सोचता था कि तुम ही मेरी पत्नी बनो,’’ मैं ने अपनी बांहों में उसे समेटते हुए कहा था. वह शरमा गई थी. उस ने एक अटल विश्वास के साथ अपनेआप को मेरे हवाले कर दिया था. हम ठीक उसी समय से दो जिस्म एक जान हो गए थे.

हमारे सम? में गया था कि अम्मांबापू जो भी करते हैं, बहुत अच्छा करते हैं. मातापिता सदा अपने बच्चों की खुशी, बच्चों की भलाई करते हैं. अपने बच्चों के लिए ही पूरी जिंदगी लगा देते हैं. वह पहली मुलाकात, जिंदगीभर का साथ बन जाएगी मु? तो उम्मीद नहीं थी. अम्मांबापू ने जो सौगात दी थी, वह शब्दों में नहीं लिखी जा सकती, शब्दों में नहीं कही जा सकती. वह पहली मुलाकात हमारे जीतेजागते, चलतेफिरते, बोलतेडांटते जैसे कोई वरदान थी.             

Hindi Story: अपनी-अपनी हदें

Hindi Story:राकेश खाकी वरदी को बड़े ध्यान से पहन रहा था. यही वह समय है, जब उसे वरदी में एक भी सिलवट पसंद नहीं. ड्यूटी खत्म होतेहोते जाने कितनी सिलवटें और गर्द इस में जम जाती हैं, पर तब उसे इस की परवाह नहीं होती. जब वरदी बदन से उतरती है, तब शरीर अखरोट की गिरी सा बाहर निकल आता हैनरम और कागजी सा.

दूसरा धुला जोड़ा अलमारी में हैंगर से लटका था, अगली सुबह के लिए. पहनते वक्त साफधुली और प्रैस की हुई वरदी से जो लगाव होता है, उसे दिन ढलने तक कायम रखने में बड़ी मुश्किल होती है.
पुलिस इंस्पैक्टर होने के नाते दिनभर ?ागड़ेफसाद सुनना, चोरगिरहकटों के पीछे लगना, हत्या, बलात्कार और लूटपाट की तहकीकात करना और थक कर घर लौटनारोज यही होता है.
राकेश चमचमाती लाल बैल्ट पैंट की लुप्पी में खोंसने लगा था, तभी उस की बेटी विभा की आवाज कानों में पड़ी, ‘‘पापा, आज हमारे कालेज का सालाना जलसा है. मु? शाम 7 बजे तक कालेज पहुंचना है.

मम्मी को साथ ले जाऊं?’’ ‘‘मम्मीक्यों?’’ उस ने पूछा.
‘‘7 बजे अंधेरा हो जाता है पापा, मु? डर लगता है,’’ विभा बोली.
‘‘हां, आजकल देश में कई घटनाएं घट चुकी हैं. अकेले निकलना ठीक नहीं,’’ राकेश ने गरदन हिला कर सहमति जताई. उस का चेहरा गंभीर हो गया, जिस में घबराहट के भाव थे. अमूमन ऐसा नहीं होता था. जब वह थाने में होता, उस वक्त घबराहट और चिंता उस के रोब और रुतबे के नीचे
पड़ी रहती. ‘‘क्यों टैंशन करते हो पापा, मम्मी साथ जाएंगी ,’’ विभा फिर बोली.
‘‘मम्मी बौडीगार्ड हैं क्या? एक कौकरोच देख कर उन की चीख निकल जाती है,’’ कह कर राकेश मुसकराया, फिर बोला, ‘‘थाने से किसी को भेज दूंगामम्मी के साथ ही जाना.’’
यहां दूसरे की बेटी का सवाल होता, तो राकेश कहता, ‘डरती हो, इतनी भी हिम्मत नहीं, क्या करोगी जिंदगी में.’ एक अपराधबोध कर राकेश के मन को बींध गया. एक पुलिस अफसर हो कर भी वह आम आदमी से अलग तो नहीं है.

वरदी ही उस के स्वभाव को बदलती है. वरदी और सर्विस रिवाल्वर जब घर की अलमारी के भीतर दाखिल हो जाते हैं, तब वह एक आम आदमी होता है. राकेश 2 बेटियों का पिता है. उस के भीतर भी कहीं कहीं असुरक्षा और अपनेपन का भाव है. वह हर जगह बच्चों के आगेपीछे साए की तरह नहीं घूम सकता. बड़ा आदमी भी अपने बच्चे के लिए सिक्योरिटी रखता है, फिर भी कहता फिरता है, ‘जमाना खराब है, मु? भी लड़कियों की फिक्र रहती है.’ खाल चाहे कितनी भी मोटी क्यों हो, अंदर से नरम ही होती है. विचारों ने साथ छोड़ा कि राकेश का दाहिना हाथ अनचाहे ही सर्विस रिवाल्वर की ओर चला गया, फिर उस ने पिछली जेब को टटोला. कंधे के बैज को दुरुस्त किया.

एक रुतबे का एहसास होते ही पुलिसिया रोब राकेश के चेहरे पर टिक गया. थोड़ी ही देर बाद बूटों की आवाज भी उस के साथ कहीं गुम हो गई. राकेश थाने पहुंच चुका था. फिर वही रोजनामचा. किसी की कार चोरी हो गई, तो किसी की सोने की चेन. सुलहसफाई, मारपीट और फिर एफआईआर. दोपहर हो गई थी, दिमाग थक रहा था. तभी एक औरत आई. कोई 30-32 साल की उम्र रही होगी. राकेश ने सिर उठाया. होंठों पर ताजा लिपस्टिक, आंखों में काजल की तीखी धार, बालों में खोंसा लाल गुलाब और साधारण
सा चेहरा. राकेश की पारखी नजर में वह एक दोयम दर्जे की औरत लगी. उस का काम ही कुछ ऐसा है, शक को पुख्ता करने की कोशिश करनावह करता भी रहा.

उस औरत ने करीब आते ही अपना परिचय दिया, ‘‘मैं दया बस्ती में रहती हूं साहबमेरा नाम गुलाबी है.’’
‘‘आगे बोल,’’ राकेश ने कड़क आवाज में कहा और फिर मेज पर खुली फाइल को देखने लगा.
‘‘साहब, मेरी मौसी का घर पास
में ही है. मैं तकरीबन हर रोज वहां आतीजाती हूं, इधर से…’’
‘‘अच्छा तो…’’
‘‘आतेजाते सामने नुक्कड़ की दुकान वाला मु? देख कर गंदी जबान बोलता है साहब,’’ गुलाबी ने ?ि?ाक भरी आवाज में कहा.
राकेश ने नजर उठाई, फिर गुलाबी को घूर कर देखा, ‘‘नाम क्या है उस आदमी का?’’
‘‘राम सिंह…’’
‘‘कब बोला वह?’’
‘‘वह तो रोज बोलता है साहब.’’
‘‘तो अब शिकायत करने आई है, क्यों…? वैसे, तू करती क्या है?’’ उस ने लहजा सख्त किया.
गुलाबी सकपका गई. वह अब अच्छी तरह सम? गई कि उस ने अपने ही पैर पर कुल्हाड़ी दे मारी है.
इस के बावजूद गुलाबी ने हिम्मत जुटाई और फिर मोटेमोटे आंसू गिराते हुए धीमी आवाज में बोली, ‘‘मैं गलत काम नहीं करती साहब, पर आज उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला कि मेरे साथ चल.’’
राकेश ने थोड़ी नरमी से कहा, ‘‘मैं ने कब बोला कि तू गलत काम करती है. तू कहती है, तो उसे भी देख लेते हैंक्या नाम बताया था उस का?’’
‘‘राम सिंह,’’ गुलाबी
ने कहा.
‘‘तु? कैसे पता कि उस का नाम राम सिंह है?’’
गुलाबी को बताते बना. राकेश गुलाबी को
ताड़ गया कि कहीं दाल
में कुछ काला है, फिर भी उस ने सिपाहियों को भेज कर राम सिंह को थाने में बुलवा लिया.
राम सिंह बेहद घबराया हुआ था. राकेश अपनी कुरसी को छोड़ कर उठ खड़ा हुआ. सामने कोई
बड़ा अफसर नहीं, बल्कि मुलजिम मुखातिब था.
उस ने डंडा मेज पर फटकारा और गुलाबी से घूर कर पूछा, ‘‘यही है वह राम सिंह, जो तु? छेड़ता है?’’
‘‘जी हां..’’
‘‘क्यों बेयह सही कह रही है?’’ राकेश ने डंडे से राम सिंह की ठोड़ी
ऊपर उठाई.
‘‘नहीं साहबयह ?ाठ बोलती
है, मैं ने कुछ नहीं किया,’’ राम सिंह गिड़गिड़ाया.
‘‘यह तो बोलती है कि तू इसे छेड़ता है? देख, अब कानून इतना सख्त है
कि इस की शिकायत पर तू एक बार अंदर गया, तो तेरी जमानत भी नहीं होगी, सम??’’
राम सिंह का डर के मारे गले का थूक सूख गया. उस ने मुड़ कर एक नफरत भरी नजर से उस औरत को
देखा. जी किया कि अभी इस का जिस्म चिंदीचिंदी कर दे, लेकिन उसे अपने ही जिस्म की सलामती पर विश्वास नहीं रहा.
राम सिंह घबराया, फिर हिम्मत जुटाने लगा. कुछ देर बाद राम सिंह राकेश के करीब कर फुसफुसाया, ‘‘साहब, यह चालू लगती हैमु? फंसाना चाहती है.’’
राकेश के चेहरे की सख्ती पलभर में हट गई, वह ठठा कर हंस दिया, ‘‘सलमान खान सम?ाता है अपनेआप को, चेहरा देखा है कभी आईने में.’’
‘‘सच कह रहा हूं साहबमेरा यकीन मानिए. इसी ने मु? पर डोरे डाले थे. मैं ही बेवकूफ था, जो इस के ?ांसे में गया. यह पहले ही मेरे 5 हजार रुपए हजम कर चुकी है, अब देने में तकरार करती है,’’ राम सिंह थोड़ा घबरा कर बोला.
राकेश वापस कर अपनी कुरसी पर बैठ गया और गुलाबी की तरफ डंडा हिलाते हुए पूछा, ‘‘तू ने इस से पैसे लिए थे? सच बता, वरना मैं सख्ती कर के उगलवाना भी जानता हूं.’’
गुलाबी की आंखों में खौफ के बादल तैरते जा रहे थे. ठीक सामने जेल का लौकअप आंखों में घूमने लगा था. वह जल्दी ही टूट गई.
‘‘हां, लिए थे साहब, लेकिन इस ने कीमत वसूल कर ली. अब मेरा इस से कोई लेनदेन नहीं है.’’
‘‘फिर किस बात की शिकायत ले कर आई हैअंदर कर दूं दोनों को,’’ राकेश ने दोनों की ओर तीखी नजर डालते हुए कहा.
इस बार माफ कर दो साहब, आइंदा गलती नहीं होगी,’ दोनों के मुंह से एकसाथ निकला.
राकेश सोचने लगा था. एक औरत जात इज्जतआबरू के लिए समाज के वहशी दरिंदों से डर खाती है. अंधेरे में बेखौफ नहीं निकल सकती. दूसरी वे हैं, जो अपने जिस्मानी संबंधों को सामाजिक लैवल पर उजागर कर देती हैं. एक अपनी हद पहचानती है, तो दूसरी हद के बाहर बेखौफ जीती है. उस के लिए दिनरात का फर्क नहीं रहता.    

सोने के लालच में कर दी हत्या

पश्चिमी दिल्ली के द्वारका इलाके में एक शख्स ने सोने की अंगूठियों, ब्रेसलेट और पैसों के लालच में अपनी लिवइन पार्टनर और साथियों के साथ मिल कर एक दोस्त की ही हत्या कर दी. मृतक की पहचान राधिका अपार्टमैंट्स, सैक्टर-14, द्वारका के रहने वाले 48 साल के अनुरूप गुप्ता के रूप में हुई, जो छत्तीसगढ़ सदन, सैक्टर-13, द्वारका में कैंटीन चलाता था और सोना पहनने का शौकीन था. पुलिस ने इस सिलसिले में आरोपी हैप्पी को हिरासत में ले कर पूछताछ की, तो पता चला कि हैप्पी ने सोने के लालच में अनुरूप से दोस्ती बढ़ाई और उसे आएदिन अपने यहां पार्टी पर बुलाने लगा. इसी दौरान 18 फरवरी को हैप्पी ने अनुरूप को पार्टी के बहाने अपने किराए के फ्लैट पर बुलाया, जहां पहले से भूपेंद्र, बलराम और नीरज मौजूद थे. अनुरूप ने उस समय गहने नहीं पहन रखे थे.

इस बात से बौखलाए उन लोगों ने अनुरूप को पकड़ लिया और गहने कहां रखे हैं जानने के लिए बांध कर उस की पिटाई की. पता चला कि गहने अनुरूप ने कार में ही छोड़ दिए थे. इस के बाद वे लोग उस की कार की चाबियां ले कर छत्तीसगढ़ सदन गए और गहने निकाल लिए. इस के बाद आरोपितों ने चाकू मार कर अनुरूप की हत्या कर दी. हत्या के बाद सुबूत मिटाने के लिए हैप्पी ने बाजार से एक बड़ा चाकू खरीदा. अनुरूप की लाश को कई टुकड़ों में काट कर प्लास्टिक के 3 बैगों में भर दिया और अनुरूप की ही कार वृंदावन, उत्तर प्रदेश ले जा कर यमुना नदी में फेंक दिया.

Hindi Story: पहलवान भैया

Hindi Story: बजरंग बिहारी यादव, जिन्हें इलाके के लोग प्यार सेपहलवान भैयाकहते थे, लगातार 10 साल नवादा जिले की नारंगपुर सीट से विधायक रहे. वे भले ही 62 साल के थे, लेकिन उन की आवाज में एक खास किस्म की कड़क थी.

पूरी विधानसभा में जितने भी गांव थे, सब का नाम उन्हें उंगलियों पर याद था. याद्दाश्त इतनी तेज कि जिस से एक बार भी मिल लेते उसे भूलते नहीं थे. पहलवान भैया का एक बेटा पटना में डेयरी चलाता था और दूसरा बेटा सड़क महकमे में ठेकेदार था. पहलवान भैया ने अपने पुश्तैनी घर के आलावा पटना में बोरिंग रोड पर अपना मकान बनवाया था. अपनी सेहत को ले कर वे काफी ज्यादा सचेत रहते थे और रोज सुबह
3 किलोमीटर पैदल जरूर चलते थे. पहलवान भैया का बचपन बहुत गरीबी में बीता था. उन के गांव दुल्फा में 3 घर क्षत्रियों के थे, जो कभी इस इलाके के जमींदार रहे थे. हालांकि, उन की ज्यादातर जमीनें मूंछों में इंपोर्टेड खिजाब लगाने, अरबी इत्र छिड़कने, महंगी शराब पीने और तवायफों का मुजरा देखने में ही खत्म गई थीं, लेकिन फिर भी इलाके में उन की हनक कायम थी.

पड़ोस के गांव इंदौर में भूमिहारों और ब्राह्मणों का दबदबा था, जिन के साथ मिल कर इन लोगों ने इलाके में ऐसी तिकड़ी बना रखी थी कि इन से उल?ाने के बारे में पूरे इलाके में कोई सोच ही नहीं सकता था.
इन सब ने दुसाधों की एक लठैत टीम भी बना रखी थी, जिस का इस्तेमाल इलाके के छोटी जाति के लोगों को धमकाने, खौफ कायम करने या सूदखोरी के धंधे में ब्याज और सूद वसूली के लिए होता था.
पहलवान भैया का घर जिस महल्ले में था, उसे दुल्फा गांव का अहिरान महल्ला बोलते थे. वह तकरीबन 50 घरों का महल्ला था. मजदूरी, पशुपालन और दूध बेचने का पुश्तैनी धंधा करने वाले इन परिवारों के पास कोई खास खेती नहीं थी.

हालांकि, इस पीढ़ी के लड़के अब स्कूलों का रुख भी करने लगे थे, लेकिन बजरंग बिहारी कुछ खास नहीं पढ़ पाए. बिहार में 80 के दशक के सामाजिक न्याय आंदोलन का असर अब इन गांवमहल्लों तक भी पहुंचने लगा था. पहलवान भैया को उन के बाबा कुश्ती सिखाना चाहते थे, इसलिए वे बचपन से ही अखाड़े में वर्जिश करने जाते थे. गांव में सामाजिक तानेबाने में इतनी दूरी थी कि ऊंची जाति के बच्चे निचलों को देख कर नाक दबा लेते थे, जो एक तरह से उन से नफरत करने का संदेश देता था. वहीं, यादवों के दरवाजे से निचली जाति के लोग निकल नहीं सकते थे. जातपांत के सामाजिक ढांचे का सभी समुदाय कड़ाई से पालन करते थे.

एक बार पहलवान भैया की एक बिगड़ैल भैंस अपनी रस्सी तोड़ कर जमींदार हुकुम सिंह के धान के खेत में चली गई और फसल का कुछ नुकसान कर दिया. हुकुम सिंह बहुत दबंग थे, जमींदार थे. नाराज हुकुम सिंह ने पहलवान भैया के घर पर हमला कर दिया और उन के बुजुर्ग बाबा राम दुलारे को पीट कर अधमरा कर डाला. बारबार गलती मानने के बावजूद हुकुम सिंह ने पूरे गांव के सामने उन्हें बेइज्जत किया. उन की हनक के आगे गांव के किसी आदमी ने कोई विरोध नहीं किया और मुंह भी नहीं खोला. पुलिस में शिकायत के बाद भी कोई खास कार्रवाई नहीं हुई, क्योंकि थानेदार भी हुकुम सिंह की हवेली में दोपहर गश्त के बाद आराम करते थे.

उसी मार के बाद, अगले 6 महीने में पहलवान भैया के बाबा की मौत हो गई. हुकुम सिंह ने उन के बाबा पर 400 रुपए जुर्माना ठोंका, जो फसल नुकसान के एवज में पहलवान भैया के पिता को चुकाना था.
पहलवान भैया अपने बाबा की मौत को भुला नहीं पाए. घटना के तीसरे ही दिन हुकुम सिंह के लड़के से इस बाबत उन की कहासुनी के बाद हाथापाई हो गई. इस के बाद तो गांव में हंगामा ही मच गया. एक अहीर के बच्चे ने क्षत्रिय को कैसे छू लिया? इसे क्षत्रियों ने अपने दबदबे पर हमला माना और अहिरान बस्ती पर अचानक हमला कर दिया. जो जहां मिला उसे वहीं पीटा.

यादवों के दरवाजे पर बंधी भैंसों के पैर भी पीटपीट कर तोड़ डाले गए. कुछ मवेशी इस हमले में मारे भी गए. अचानक हुए इस हमले में अहिरान बस्ती के किसी भी आदमी को संभलने का मौका नहीं मिला.
यही नहीं, पहलवान भैया पर भी हुकुम सिंह ने पुलिस केस करवा दिया और पुलिस ने उन्हें जेल भेज दिया. उस समय उन की उम्र केवल 18 साल थी. गठीले बदन का यह नौजवान बजरंग बिहारी पहलवानी के गुर अभी सीख ही रहा था, लेकिन जेल जाने के बाद यह सफर खत्म हो गया. पहलवान भैया 7 महीने नवादा जिला जेल में बंद रहे. घर वाले 1-2 बार ही उन से मिल सके, क्योंकि पैसे की तंगी के चलते उन के पास जेल में मिलने का किराया भी नहीं हो पाता था.

जेल में पहलवान भैया की मुलाकात कई पेशेवर अपराधियों के साथ, लाल ?ांडा के आंदोलनकारियों से भी हुई. लाल ?ांडा वालों ने जमींदारों के खिलाफ अपने संघर्ष की कहानी भी बताई और यह भी बताया कि क्षत्रियों की सारी अकड़ की वजह उन की जमीन है. उन्हें और भी बहुतकुछ तरीकों से सम?ाने की कोशिश हुई, लेकिन पहलवान भैया को वह कम सम?में आया. हालांकि, जेल में बातचीत के एक अलग किस्म के दबदबे और जोश ने बजरंग बिहारी का सिक्का जेल में कुछ ही दिनों में जमा दिया.
खैर, किसी तरह बजरंग बिहारी जेल से बाहर आए, लेकिन घर वालों ने उन्हें एक रिश्तेदार के यहां भेज दिया, ताकि गांव के क्षत्रियों से आगे कोई और टकराव नहीं हो.

लेकिन बजरंग बिहारी अब रुकने वाले नहीं थे. उन्होंने जेल में बंद अपराधियों की मदद से बंदूक और कट्टा चलाना सीखा. इस के लिए वे कुछ दिन गिरिडीह के जंगलों में भी रहे. तकरीबन एक साल बाद पहलवान भैया अपने गांव कुछ दिन के लिए वापस आए. अब वे 20 साल के हो चुके थे. घर वालों ने उन्हें सम?ाया और सबकुछ भूल कर नए सिरे से जिंदगी शुरू करने को कहा. उन की राय थी कि वे लोग इन जमींदारों से नहीं लड़ पाएंगे, क्योंकि पुलिस, जेल, अफसर, कचहरी सबकुछ उन की ही जेब में बैठा है. जल्द ही यह खबर फैल गई कि पहलवान गांव में आया है. इस के अगले ही दिन हुकुम सिंह 4 लठैत ले कर पहलवान के घर पहुंच गए.

हालांकि उस समय वे घर पर नहीं थे, लेकिन हुकुम सिंह ने उन की एक भैंस यह कह कर खूंटे से खुलवा लिया कि फसल नुकसान का हिसाब ले कर जा रहे हैं. जब पैसा हो तो ले जाना. जब पहलवान भैया वापस आए, तो उन्हें इस घटना का पता चला. महल्ले के लोगों ने उन्हें सम?ाया कि हुकुम सिंह की हवेली पर अभी जाना ठीक नहीं है. भैंस खोल ले गए तो क्या हुआउन से उल?ाना ठीक नहीं है.5 दिन बीत गए, लेकिन पहलवान भैया को किसी ने नहीं देखा. फिर अचानक एक दिन सुबह 3 लड़कों ने हुकुम सिंह के घर पर धावा बोल दिया. गोलियां चलने लगीं. 2 लोग दरवाजे पर ही ढेर हो गए. तीसरे ने अस्पताल में दम तोड़ दिया. अचानक हुए इस हमले में हुकुम सिंह भी गंभीर रूप से घायल हुए और अस्पताल में महीनों पड़े रहे, विकलांग हो कर ही घर लौट पाए.

मामला
पुलिस में गया जरूर, क्षत्रियों के दावे के आलावा, किसी भी लैवल पर यह साबित नहीं हो पाया कि इस हमले में पहलवान भैया का कोई रोल था. पुलिस की निगाह में यह इलाके में लाल ?ांडे के गुंडों की दस्तक थीहालांकि, गांव के ही ?ालन मुराई ने पहलवान को घटना की पहले की शाम को स्थानीय बाजार में देखा था, लेकिन हुकुम सिंह के बेटों ने उस की जवान बेटी का हाल ही में रेप किया था, इसलिए उस ने जानबू? कर इस बाबत किसी से कुछ नहीं कहा, बल्कि वह बहुत ही खुश हुआ और तालाब वाले भैरव बाबा को एक कबूतर चढ़ाया. इस घटना के रिएक्शन में गांव के कुछ क्षत्रियों ने पहलवान को घेरा जरूर लेकिन, पहलवान ने 5 घंटे तक उन का मुकाबला किया.

इस घटना ने इलाके में पहलवान का सिक्का जमा दिया और लोगों के दिल दिमाग से क्षत्रियों की दहशत घटने लगी. अब क्षत्रियों में भी डर पैदा हो गया. उन्हें यह लगने लगा कि उन्हें भी चैलेंज किया जा सकता है.
इधर, पटना की सड़कें पहले ही सामाजिक न्याय और हिस्सेदारी मांगने के नारों से गूंज रही थीं. बिहार का समाज और राजनीति बदल रही थी. बदलाव की ये आवाजें गांवगिरांव तक सुनाई पड़ने लगी थीं. दुल्फा गांव में नए सियासी और सामाजिक समीकरण बनने शुरू हुए और क्षत्रियों का दखल गांव में कमजोर हुआ. इसी बीच बजरंग बिहारी ने गांव के मुखिया का चुनाव लड़ा और क्षत्रियों के उम्मीदवार एक कुर्मी को चुनाव हरा दिया. यह क्षत्रियों की एक बड़ी हार थी. यह नतीजा दुल्फा गांव का एक ऐतिहासिक बदलाव था, जिसे मुख्यधारा की राजनीति ने भी नोट किया. 26 साल का लड़का नई इबारत लिख रहा था.

धीरेधीरे पहलवान भैया ने अपनी जातबिरादरी के नेताओं से पटना में मेलजोल कायम किया और अगले
5 साल में वे अपने क्षेत्र में यादव बिरादरी का एक प्रमुख चेहरा बन गएपहलवान भैया लगातार 3 बार गांव के मुखिया बने. इस से उन का समाज और मुखर हुआ. यही नहीं, बजरंग बिहारी ने दलितों और पिछड़ों को अपने साथ जोड़ा और जिला पंचायत के सदस्य भी बने. उन्होंने नारा दियाहम सब भाई हैं, अपनी जिंदगी का फैसला खुद करेंगे’. इस के बाद पहलवान भैया ने निर्दलीय ही विधानसभा का चुनाव लड़ा. उन्हें भले ही केवल 8,000 वोट मिले, लेकिन पूरी विधानसभा में वे यादव समाज का चेहरा बन गए. लोगों ने उन के लिए चंदे और पैसे का इंतजाम किया और मुख्यधारा के नेताओं से उन का मेलजोल हुआ.

अगले विधानसभा चुनाव में पहलवान भैया ने निवर्तमान विधायक राम भरोसे तिवारी को दलितपिछड़ा विरोधी घोषित कर के विधानसभा में गर्दा मचा दिया. सीधी टक्कर दिखने लगी. उन्होंने कहा कि राम भरोसे
ने किसी दलितपिछड़ों के महल्ले में सड़क तक नहीं बनवाई, क्योंकि उन्हें दलितपिछड़ों से घिन आती है. उन्होंने आगे कहा कि वे विकास की यह कलम दलितपिछड़ों के महल्ले की तरफ घुमाने आए हैं. इस तरह पहलवान भैया ने विधानसभा के 12,000 भूमिहारों, ब्राह्मणों और क्षत्रियों को अपराधी घोषित कर के दलितपिछड़ों को एकजुट किया. इस रणनीति ने उन्हें फायदा दिया और वे सदन में घुस गए.

इसके बाद पहलवान भैया ने कभी पीछे मुड़ कर नहीं देखा. उन की कहानी ने जिले की कई पंचायतों को मुखर और तेजतर्रार नेतृत्व दिया. आसपास के जिलों में दलितों और पिछड़ों का सियासत में हिस्सा लेना शुरू हुआ. वे कई नौजवानों के प्रेरणास्तंभ बने. हालांकि, पहलवान भैया को आंत में कैंसर का पता ही तब चला जब कैंसर लाइलाज हो चुका था. तकरीबन 2 साल के इलाज के बाद उन की मौत हो गई, लेकिन उन के संघर्ष ने कइयों को नया रास्ता दिखा दिया था.           

हरे राम मिश्रा

Film: परदे की दुनिया क्या ‘लाहौर 1947’ का बदला नाम

Film: राजकुमार संतोषी पहले एक फिल्म बना रहे थेलाहौर 1947’, पर बाद में उन्हें लगा किलाहौरशब्द से फिल्म को ले कर विवाद खड़ा हो सकता है, लिहाजा अफवाह है कि उन्होंने इस फिल्म का नाम अब बदल करबंटवारा 1947’ रख दिया है, जिस के लीड हीरो सनी देओल हैं. इस फिल्म को आमिर खान प्रोड्यूस कर रहे हैं.
यह फिल्म भारत के 1947 के बंटवारे पर बनी है, जिस की कहानी माई नाम की एक बुजुर्ग हिंदू औरत के इर्दगिर्द घूमती है, जो बंटवारे के बाद लाहौर, पाकिस्तान में ही रह जाती है. इस फिल्म में सनी देओल के साथ आमिर खान, प्रीति जिंटा, शबाना आजमी, करण देओल, अली फजल और अभिमन्यु सिंह जैसे कलाकार भी दिखाई देंगे.

मनोज तिवारी और रवि किशन का छत्तीस का आंकड़ा
एक्टर मनोज तिवारी और रवि किशन दोनों ने भोजपुरी सिनेमा में खूब हिट फिल्में दी हैं और आज दोनों भारतीय जनता पार्टी के बलबूते राजनीति में जमे हुए हैं, पर इन दोनों का छत्तीस का आंकड़ा भी किसी से छिपा नहीं है. हाल ही में जब रवि किशन कपिल शर्मा के कौमेडी शो में आए, तो शो में उन्हें मनोज तिवारी का एक पुराना वीडियो दिखाया गया, जिस में मनोज तिवारी बोल रहे थे कि वे रवि किशन को राजनीति में लाए थे.
इस पर रवि किशन ने मनोज तिवारी पर पलटवार करते हुए कहा, ‘‘मैं वही आदमी हूं, जिस ने तुम को मुंबई घुमाया, संसद में बोलना सिखाया वरना आप के पैर कांपने लगते. इतना सब होने के बाद भी आप मेरी पीठ पीछे ऐसी बातें करते हैं.’’ मालूम हो कि रवि किशन और मनोज तिवारी के बीच 13 साल तक दुश्मनी रही थी.

प्रियंका चोपड़ा ने खोला दिलचस्प राज
प्रियंका चोपड़ा बहुत बिंदास फिल्म कलाकार हैं और निजी जिंदगी में भी वे बहुत बोल्ड मानी जाती हैं. हाल ही में एक इंटरव्यू में प्रियंका चोपड़ा ने एक दिलचस्प राज खोला. प्रियंका चोपड़ा ने अपने शुरुआती सालों को याद करते हुए बताया कि उस दौर में वे फैशन की दीवानी नहीं थीं, लेकिन उन्हें अपनी नाभि में पियर्सिंग करवाना बहुत पसंद था. यहां तक कि एक बार उन्होंने टैक्सी में ही पियर्सिंग करवा ली थी.
इतना ही नहीं, प्रियंका चोपड़ा ने आगे कहा, ‘‘मैं एक ?ाटपट फोटो खिंचवाने के लिए शर्ट को चिपकाए रखने के लिए च्युइंग गम का इस्तेमाल करती हूं. एक बार जब मैं कार से उतर कर अंदर जा रही थी, तो मेरी शर्ट खुल रही थी, तो मैं ने उस पर च्युइंग गम लगा दी और वह चिपक गई.’’

जंग में फंसी हसीनाजब से इजराइल, ईरान और अमेरिका में जंग छिड़ी है, तब से पूरी दुनिया में अफरातफरी सी मची हुई है. मिडिल ईस्ट में फंसे लोग अपनेअपने देश जाने की जद्दोजेहद कर रहे हैं.
हाल ही में एक्ट्रेस ईशा गुप्ता अबू धाबी में फंसी थीं और घर वापस लौटने की कोशिश कर रही थीं. वे बड़ी मुश्किल से भारत लौटी हैं. उन्होंने इंस्टाग्राम स्टोरी पर वहां के हालात के बारे में जानकारी देते हुए लिखा था कि बहुत ही डरावना वक्त था.
फिर अचानक मिसाइल हमले की खबरें आने लगीं और किसी को नहीं पता था कि अगले ही पल हमारे लिए क्या होने वाला है. अजनबी एकदूसरे को हौसला दे रहे थे. सभी अपनेअपने परिवारों को घर पर फोन कर रहे थे. याद रहे कि दुबई में और जो सैलेब्रिटी फंसे थे, उन में ईशा गुप्ता के अलावा सोनल चौहान, विष्णु मांचू, एरिका फर्नांडिस, एक्टर अजीत कुमार, बैडमिंटन खिलाड़ी पीवी सिंधु और बंगाली फिल्म एक्ट्रेस शुभाश्री गांगुली का नाम शामिल था.              

Hindi Story: हरे राम मिश्रा राम सजीवन

Hindi Story: राम सजीवन यादव की अपने गांव में ज्यादा इज्जत नहीं थी. वह अवारागर्दी के चलते बदनाम हो रहा था, तो पढ़ाई करने बाहर चला गया. पर वहां भी वह सुधरा नहीं. कालेज में एक दिन ऐसा हुआ कि राम सजीवन की जिंदगी बदल गई. क्या हुआ था उस के साथ?

सियासी परिवार में जनमे 20 साल के नौजवान राम सजीवन यादव ने जब आजमगढ़ से इलाहबाद का रुख किया तो उस के जेहन में केवल 2 बातें थीं. पहला घर के बाहर वह मौजमस्ती करना जो यहां मुमकिन नहीं होता और दूसरा अपनी जातबिरादरी के लिए लिए काम करना. चूंकि उस के बाबा उलटफेर सिंह ने खपसी ग्राम पंचायत का मुखिया रहते सामाजिक और सियासी जमीन बना दी थी, इसलिए उस का प्लान बी यह था कि अगर इस ट्रैक पर नाकाम रहा तो भी, बाबा वाली जगह तो मिल ही जाएगी.

राम सजीवन यादव के पिता राम बक्स सिंह यादव इलाके के दूध के बड़े सप्लायर थे, इसलिए उन्हें पैसे की कमी नहीं हुई. हवेली जैसा घर, 2 बहनों के बीच एकलौता भाई और 5 बीघे की पुश्तैनी जोत का भावी मालिक बहुत ही बनठन कर रहता था और महंगी सिगरेट पीने का शौकीन था. राम सजीवन यादव को उस के बाबा गांव से इसलिए भी हटाना चाहते थे क्योंकि बगल की दलित बस्ती की 3 लड़कियों के साथ इस के गहरे रिश्ते थे. गांव में यह बात चर्चा आम हो गई थी, जिस का गांव के विरोधी लोग पंचायत चुनाव में इस्तेमाल कर सकते थे.

हालांकि, इलाके में उन के असर, उन की जातबिरादरी की दबंगई और मजबूत सामाजिक एकता के चलते गांव का कोई दलित, डोम, ब्राह्मण और राजपूत इस बाबत मुंह नहीं खोल सकता था, क्योंकि इस बिरादरी के लोग आएदिन किसी किसी निचली जाति वाले को पीटते और सताते रहते थे. खुद अपनी जवानी में उलटफेर सिंह इस के बड़े शौकीन थे. वे इसे मर्दानगी जिंदा रखने की कला से जोड़ते थे. वे कहते थे कि यह सब क्षत्रिय वंशियों के लिए आम बात है, जिस की चर्चा का कोई मतलब नहीं है. खपसी गांव में कुल 3 जातियां ही मुख्य थीं.

यादव 70 फीसदी से ज्यादा थे, फिर एससी और फिर ब्रह्माण थे. 4 घर राजपूतों के थे, लेकिन ज्यादातर की माली हैसियत गांव के एससी तबके से भी बुरी थी, इसलिए उन का कोई मतलब नहीं था. ब्राह्मण भी यादवों के यहां से मट्ठा ला कर भात खाते थे, इसलिए उन की और यादवों की कोई तुलना नहीं थी. यादवों का खेत बंटाई पर निचली जातियों के लोग जोतते थे. इस का डर भी इन समुदायों में बना रहता था. खैर, राम सजीवन यादव अपना बोरियाबिस्तर बांध कर इलाहबाद पहुंचा और कटरा महल्ले में किराए का कमरा एक हफ्ते में ही खोज कर शिफ्ट हो गया.

इस में उस के ही इलाके के एक क्रिमिनल ने मदद की थी, जिस के केंद्र में यह था कि जरूरत पड़ने पर इस कमरे को एक छिपने की जगह के तौर पर कभीकभार इस्तेमाल किया जाएगा. राम सजीवन यादव का मन कभी पढ़नेलिखने में नहीं लगा. वह यूनिवर्सिटी में जाता जरूर था, लेकिन घूमना और बकैती ही मुख्य काम था. इस तरह जल्द ही वह खलिहर मठाधीशों की मंडली का प्रिय बन गया. दिनभर राजनीति की बातें करता और शाम को बीयर का केन खाली कर के सो जाता. बाकी मन करने पर अपने गांव के कुछ हमउम्र लंपट टाइप लड़कों से फोन पर एससी तबके और ब्राह्मणों की बस्ती की कुछ लड़कियों और औरतों के नाजुक अंगों के साइज की चर्चा करता था और सिगरेट के कश लेता था.

मठाधीशों के बीच पिछले 3 महीने की जातिगत और सामाजिक सियासी चर्चा से राम सजीवन यादव इस नतीजे पर पहुंचा था कि आंदोलनवांदोलन कर के सियासत में कुछ नहीं कर सकता. नेता से पहचान और पूंजी ही टिकट की रेस में एंट्री देती है और बिना सदन में घुसे खुद का कोई विकास होगा और ही समाज का बदलाव होगा. पौलिटिक्स में प्रौफिटलौस स्टेटमैंट ही असली बात है. बाकी सब है, टाइमपास है. एक दिन यूनिवर्सिटी में लड़कों ने फीस बढ़ने के खिलाफ अचानक आंदोलन कर दिया. इस आंदोलन में राम सजीवन यादव को भी पुलिस ने इसलिए पकड़ लिया, क्योंकि वह वहां खड़े हो कर आंदोलन कर रहे लड़कों का भाषण सुन रहा था.

हालांकि, उस के लाख कहने के बावजूद पुलिस ने उन्हें नहीं छोड़ा और उन छात्रों के साथ राम सजीवन यादव का भी चालान कर जेल भेज दिया. इस तरह राम सजीवन यादव भी 7 दिन जेल में बंद रहा. इस के बाद, विपक्षी जनशक्ति पार्टी से जुड़े वकीलों ने इन सभी की जमानत कराई. जेल से लौटने के बाद उन सब को जनशक्ति पार्टी के अध्यक्ष की तरफ से मुलाकात के लिए बुलाया गया, जो उन की जातबिरादरी के ही थे. उन सब ने वहां पहुंचते ही अध्यक्ष के पैर छुए. चीफ ने उन सभी लड़कों के साथ राम सजीवन यादव की भी हौसला अफजाई की और माला पहनाई. विपक्ष के नेता से मिले इस सम्मान के चलते राम सजीवन को हाथोंहाथ लिया गया.

अब उस के लिए पार्टी अध्यक्ष का दरवाजा हमेशा के लिए खुल गया था और बिना रोकटोक वह उन से कभी भी मिल सकता था. राम सजीवन यादव जनशक्ति पार्टी के लिए यूनिवर्सिटी में छात्रों के बीच काम करने लगा. राम सजीवन यादव को यह सब करते हुए एक साल से ज्यादा का समय बीत गया. अब वह जनशक्ति पार्टी की छात्र विंग में पदाधिकारी हो गया था और बड़ा चंदाखोर भी. वहां चारों तरफ उस की जातबिरादरी और उस के जैसी दिलचस्पी वाले कई लोग थे. अपने पुराने मिजाज के चलते कुछ हमजाति लड़कियों का भी शिकार राम सजीवन यादव ने किया. यह राज है कि इस के पीछे उन की रजामंदी थी या फिर कोई लालच. बात आज तक खुल नहीं पाई.

खैर, अब विधानसभा के चुनाव गए थे. राम सजीवन यादव ने अपनी टीम लगा कर जनशक्ति पार्टी के लिए चुनाव प्रचार किया. पार्टी सत्ता में गई. अब राम सजीवन का कद बढ़ चुका था. ट्रांसफरपोस्टिंग के कारोबार से ले कर ठेकापट्टा दिलवाने में उस का दखल रोज बढ़ रहा था. इस तरह उस की जेब में खूब पैसा घुसने लगा. अब वह लखनऊ राजधानी में फ्लैट ले कर शिफ्ट हो गया, जो कभीकभी इलाहाबाद के खलिहर मठाधीशों की आरामगाह भी बनता था. वहां पहुंच कर राम सजीवन यादव ने अपने एक सिक्योरिटी कंपनी भी बनाई और सरकारी संस्थानों में सिक्योरिटी गार्ड का ठेका भी लेने लगा. इस तरह से उस की चौतरफा कमाई होने लगी.

पार्टी अध्यक्ष या सीधे मुख्यमंत्री का नजदीकी होने की जो हनक थी उस का एक अलग ही नशा था, जो राम सजीवन जैसे घोर जातिवादी और कम पढ़ेलिखे नौजवान के बरताव में हर समय दिखाई पड़ जाता था.
दौलत और सत्ता का नशा थामे नहीं थमता. अब राम सजीवन यादव भी मसाज के लिए बैंकाक जाता था, विदेशी शराब पीता था. इस तरह से 5 साल बीत गए. सड़क पर संघर्ष भी बीते दौर की बात हो गई थी. सब बदल चुका था. अब राम सजीवन यादव अपने गांव की औरतों के फिगर की चर्चा की जगह इस पर चर्चा करता कि कौन सा नौकरशाह किस काम से कहां जाता है और क्या करता है. कितनी पूंजी उठाता है और पार्टी को कितना देता है. इस दौरान पावर और लक्ष्मी दोनों ने उस पर खूब कृपा बरसाई. गांव में उस की जो ठसक थी, उस का बखान ही नहीं किया जा सकता.

सरकार के 5 साल बीत गए. फिर से चुनाव का मौसम गया था. इस चुनाव में राम सजीवन यादव ने पार्टी के लिए चुनाव प्रचार के साथ अपनी कमाई पूंजी से भी पार्टी फंड में मदद की. उस की सोच थी कि सरकार बनने पर यह सब घाटा पूरा हो जाएगा. हालांकि, जनशक्ति पार्टी यह चुनाव बुरी तरह हार गई. यह राम सजीवन यादव के लिए ?ाटका था, क्योंकि इस ?ाटके का कोई अनुभव उसे नहीं था. अब सरकार बदल चुकी थी. नौकरशाही नए निजाम के मुताबिक ढलने लगी. इस निजाम में अब राम सजीवन यादव को अपना कारोबार सुरक्षित रखने में भी समस्याएं आने लगीं. कुछ कारोबार तो एक साल के भीतर ही बंद करने पड़े और कई ठेकों में जांच शुरू हो गई, जिसे सैटल करने में मोटी रकम खर्च हुई.

अब इन ठेकों में तगड़ा कमीशन सत्ता के लोगों को देना मजबूरी बन गया. खुद की आदतों पर भी उस का मोटा पैसा खर्च हो रहा था. खैर, इस तरह 5 सालों में राम सजीवन यादव की जमा पूंजी का आधा से ज्यादा खर्च हो गया. हालांकि, उसे इस बात का पूरा यकीन था कि अगली सरकार में यह सब खर्च निकाल लेगा. टैंशन की कोई बात नहीं है. वह 5 साल जनशक्ति पार्टी के साथ पूरी तरह लगा रहा. एक बार फिर से चुनाव गए. इस बार पार्टी अध्यक्ष ने उन सब को याद किया जिन्होंने पार्टी के सत्ता में रहते मुनाफा कमाया था, क्योंकि पार्टी की माली जड़ें बहुत सिमट गई थीं और चुनाव के लिए पैसा चाहिए था.

राम सजीवन यादव ने इस चुनाव में पार्टी के लिए 10 गाडि़यां दीं और जीजान लगा कर खुद भी काम किया. जनशक्ति पार्टी फिर चुनाव हार गई. यह राम सजीवन यादव के लिए दूसरा बड़ा टका था. केवल जमा पूंजी के सहारे अब वह कितने दिन सियासत में चल सकता था. जातबिरादरी की चेतना के आगे उसे कुछ आता भी नहीं था. अब उस की जेब का बड़ा हिस्सा खाली था. जो धंधापानी था वह भी तकरीबन सिमट गया था. साथ में चलने वाले सिक्योरिटी गार्डों को 5 महीने से तनख्वाह नहीं मिलने के चलते वह सब भाग गए थे. दिनोंदिन उस का भौकाल कमजोर हो रहा था और उसे कोई रास्ता नजर नहीं रहा था.

बहुत हताशा में, एक दिन राम सजीवन यादव अपने कुलगुरु का दर्शन करने गया. कुलगुरु ने समस्या सुनी. फिर उसे सम?ाया कि पार्टी को छोड़ कर अपना देखो नहीं तबाह हो जाओगे. उन के मुताबिक गतिशीलता समाज का नियम है. जड़ मत बनो नहीं तो सड़गल जाओगे. उन्होंने सूखे पेड़ का उदाहरण दे कर बातें सम?ाई और जल्द ही उन्हें कुछ मदद का भरोसा दिया2 महीने के अज्ञातवास के बाद, एक दिन एक अनजान फोन राम सजीवन यादव को आया. अचानक उस ने सत्ताधारी प्रजा पार्टी की सदस्यता ले ली और मुख्यमंत्री आवास के इर्दगिर्द दिखाई देने लगा. उसे लगा कि जातबिरादरी के चक्कर में अपना फालूदा बनवाने का कोई फायदा नहीं है. जिस दल में रहो वहीं अपना कद मजबूत करो.

पौलिटिक्स में जो प्रैक्टिकल होते हैं वही आगे बढ़ते हैं. दलबदल पर भ्रष्ट जनता क्या बोलेगी? उसे चमत्कार चाहिए बस. किसी भी तरह से चमकने वाला ही उस का हीरो हो सकता है. फिर, एक दिन राम सजीवन यादव ने राष्ट्रवादी यादव मंच का गठन किया और अपनी बिरादरी को राष्ट्रवाद का फायदा सम?ाने वाली प्रदेशव्यापी यात्रा शुरू की. इस के लिए उसे 40 लाख की फंडिंग समाज से हुई. इस तरह से उस ने केवल खुद को बदला, बल्कि अपने समाज के लिए भी इस सत्ता में घुसने के नए रास्ते खोले. आजकल राम सजीवन यादव राज्य सरकार में बीज विकास विभाग में आमंत्रित सदस्य है और बिरादरी को राष्ट्रवाद की ट्रेनिंग देते हुए दारू के 4 अड्डे और खनन के 3 ठेके चला कर अपना विकास कर रहा है.         

Crime Story: संभल में शर्मनाक हत्याकांड

Crime Story: उत्तर प्रदेश के संभल जिले के गांव मतावली पट्टी जग्गू में नाक की खातिर अपनों की जान लेने का शर्मनाक मामला सामने आया, जहां 19 फरवरी, 2026 को एक भाई ने अपनी ही सगी बहन रूपजहां का गला घोंट कर उस कत्ल कर दिया, क्योंकि वह गांव के ही एक लड़के शिवम सैनी से प्यार करती थी.

जब इस हत्याकांड की खबर पुलिस को लगी और वह मौका वारदात पर पहुंची, तो मंजर दिल दहला देने वाला था. घर के आंगन में बिछी एक चारपाई पर रूपजहां का बेजान शरीर पड़ा था. उसी घर के एक कोने में उस का भाई जाने आलम और पिता नौशे आलम मौजूद थे. जाने आलम ने खुद पुलिस को फोन कर के कहा था, ‘साहब, मैं ने अपनी बहन को मार डाला है, कर मु? ले जाओ.’ पिता का कुबूलनामा
रूपजहां के पिता नौशे आलम ने इस औनर किलिंग पर दो टूक शब्दों में कहा, ‘‘मेरी बेटी शिवम सैनी नाम के लड़के से प्यार करती थी.

वह उस से शादी करना चाहती थी और वह उस के साथ भाग गई थी. ‘‘गांव वाले मेरा मजाक उड़ा रहे थे, गलियों से गुजरना मुश्किल हो गया था. मैं परेशान था. 2 दिन पहले वह शिवम के साथ भाग गई थी. हम ने उसे सम?ाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं मानी. ‘‘हम मुसलमान हैं. बेटी का प्रेमी सैनी (हिंदू) है. हम ऐसी शादी कैसे कर देते? अगर हमारी बिरादरी में शादी की बात होती, तो हम करा देते.’’ क्या प्रधान ने मांगी घूस इस पूरी साजिश में रूपजहां के चाचा दुलारे हुसैन ने मीडिया को बताया कि इस पूरी वारदात के पीछे गांव के प्रधान और पुलिस भी शक के घेरे में है.

दुलारे के मुताबिक, जब रूपजहां और शिवम थाने पहुंचे थे, तो वहां पंचायत हुई. थाने के एसओ साहब दोनों के फेरे कराने को तैयार थे. उन्होंने कहा था कि लड़की बालिग है. उन्होंने हम से अंगूठा लगवाने को कहा, तो हम वहां से भाग आए. इस के बाद प्रधान लेखराज ने बीचबचाव किया और बेटी को वापस लाने के बदले 3 लाख रुपए मांगे. प्रधान ने कहा कि पुलिस और मामले को रफादफा करने के लिए पैसे लगेंगे. हम ने किसी तरह डेढ़ लाख रुपए दिए.


परिवार वालों का आरोप है कि पैसे देने के बाद वे बेटी को घर तो ले आए, लेकिन उस कीआजादीछीनने के लिए. जब घर के भीतर बंद रूपजहां ने फिर से शिवम का नाम लिया, तो भाई जाने आलम का खून खौल उठा और उस ने यह कांड कर डाला. एक साल का इश्क रूपजहां और शिवम सैनी के घर एकदूसरे से महज 400 मीटर की दूरी पर हैं. पिछले एक साल से दोनों के बीच इश्क का मामला चल रहा था. शिवम के परिवार को इस रिश्ते से एतराज नहीं था, लेकिन रूपजहां का परिवार इसे हिंदूमुसलिम के एंगल से देख रहा था.


शिवम की मां का बयान शिवम सैनी की मां हरप्यारी ने बताया, ‘‘मेरे बेटे और रूपजहां ने 2 महीने पहले ही चोरीछिपे शादी कर ली थी. वे एकदूसरे के हो चुके थे. रूपजहां हमारी बहू थी. जब वे घर से भागे थे, तो अपनी सुरक्षा की गुहार लगाने थाने गए थे.’’ साजिश के तहत बुलाया गया इस कांड से पहले जब रूपजहां और शिवम थाने पहुंचे, तो पुलिस ने उन्हें बालिग होने के नाते साथ रहने की इजाजत दे दी थी.

शिवम सुरक्षा के लिहाज से रूपजहां को ले कर अमरोहा में अपनी एक रिश्तेदारी में चला गया था. रूपजहां को लगा था कि वे दोनों अब महफूज हैं. लेकिन घर पर पिता और भाई ने उसे वापस लाने का जाल बुना. रूपजहां को गांव के प्रधान की मदद सेसब ठीक हो जाएगाका ?ांसा दे कर घर बुलाया गया. पर जब रूपजहां अपने घर लौटी तो खबरों के मुताबिक घर में सिर्फ जाने आलम और रूपजहां ही थे. इसी दौरान उन दोनों में ?ागड़ा हुआ और जाने आलम ने दुपट्टे का फंदा बना कर अपनी बहन को मार डाला. इस हत्याकांड में ग्राम प्रधान, लड़की के पिता और भाई समेत 5 और लोगों को भी आरोपी बनाया गया.       

Hindi Story: ‘शेयर’ का इस्तेमाल

Hindi Story: संदीप को पुलिस महकमे में सबइंस्पैक्टर बने अभी एक महीना भी पूरा नहीं हुआ था. नए जोश, नए सपने और एक सच्चा पुलिस वाला बनने के वादे के साथ वह काम में जुटा हुआ था.
एक सुबह पुलिस हैडक्वार्टर से एक कांस्टेबल संदीप के दफ्तर में आया. वह सलाम ठोंकते हुए जोर से बोला, ‘‘जय हिंद सर,’’ और फिर जेब से एक सफेद लिफाफा निकाल कर संदीप की ओर बढ़ाते हुए बोला, ‘‘बड़े साहब ने आप के लिए भेजा है.’’

संदीप ने कौतूहल से लिफाफा खोला. भीतर ?ांक कर देखा कि 500 रुपए के 20 नोट सलीके से रखे थे. एक पल को वह कुछ सम? ही नहीं पाया. उस ने कांस्टेबल से पूछा, ‘‘यह क्या है?’’ कांस्टेबल ने कंधे उचकाए, जैसे उसे खुद कुछ पता हो और चुपचाप जाने की इजाजत मांगने लगा. शक बढ़ चुका था. संदीप ने उसे रोकते हुए बड़े साहब को फोन लगाया.

‘‘जय हिंद सर,’’  कहते हुए ने संदीप सारी बात बताई और पूछा, ‘‘सर, ये पैसे?’’
साहब की आवाज आई, ‘‘हां
हांरख लो. यह तुम्हारा शेयर है इस महीने का.’’
अब सारी तसवीर साफ हो चुकी थी. यहशेयरदरअसलघूसके जमा होने वाले पैसे का हिस्सा था, जो महकमे में बड़ी नियमितता से बंटा करता था.
संदीप स्वाभिमानी नौजवान था. उसे रिश्वत, घूस, दहेजसब से चिढ़ थी. उस ने पुलिस की नौकरी इसीलिए चुनी थी, ताकि समाज और देश के लिए कुछ कर सके. फोन पर उस ने कहा, ‘‘सर, मु? इस की जरूरत नहीं है. मैं इसे वापस भेज रहा हूं.’’
उधर से जवाब आया, ‘‘अरे, क्यों ड्रामा कर रहे हो? सब लेते हैं. तुम्हारा हक है यह.’’
संदीप ने हिम्मत जुटा कर कहा, ‘‘सर, मेरे आत्मसम्मान के खिलाफ
है यह.’’

अब आवाज का लहजा सख्त हो चुका था, ‘‘मतलब हम सब बेईमान हैं? ठीक है, भेज दो वापस.’’
कुछ पल की चुप्पी के बाद संदीप सम? गया कि अगर वह सिस्टम में बना रहना चाहता है, तो विरोध करना आसान नहीं होगा. कुछ सोच कर उस ने धीरे से कहा, ‘‘सौरी, सर. ठीक है, मैं रख लेता हूं.’’
‘‘गुड,’’ इतना कह कर फोन कट गया.
हाथ में लिफाफा थामे बैठे संदीप के भीतर मानो तूफान उठ रहा था. नई नौकरी, बढ़ती जिम्मेदारियां और स्वाभिमान, तीनों एकदूसरे से लड़ रहे थे. वह सम? चुका था कि यह लिफाफा अब हर महीने आया करेगा. सवाल यह था, इस का क्या करे?

उसी शाम संदीप ने बाहर ?ांक कर देखा, सामने के सरकारी स्कूल से कुछ बच्चे फटे हुए बस्तों और घिसी हुई चप्पलों के साथ घर लौट रहे थे. उन की आंखों में पढ़ाई का जोश तो था, पर साधन कम थे. बस, यहीं उसे जवाब मिल गया. अगले ही दिन संदीप ने उन्हीं पैसों से कौपी, किताबें, पैनपैंसिल और कुछ स्कूल बैग खरीदे. फिर स्कूल के प्रिंसिपल से मिल कर बताया कि वह इन सामग्री को जरूरतमंद बच्चों में बांटना चाहता है. प्रिंसिपल ने मुसकरा कर सहमति दे दी.

कार्यक्रम रविवार को रखा गया.
संदीप ने जानबू? कर बड़े साहब को मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया. साहब बड़े गर्व के साथ आए, यह सोच कर कि शायद महकमे की इमेज सुधारने का यह अच्छा मौका है. जब बच्चों में सामग्री बांटी जाने लगी, तो छोटेछोटे हाथ मुसकान के साथ आगे बढ़ते गए. बड़े साहब के चेहरे पर भी संतोष की ?ालक थी. बच्चे उन्हें धन्यवाद दे रहे थे, फोटो खिंच रहे थे और बड़े साहब गर्व से सीना फुलाए खड़े थे. उन्हें यह नहीं पता था कि सामग्री उन्हीं के भेजेशेयरसे खरीदी गई है.


संदीप एक तरफ खड़ा यह सब देख रहा था. उसे ग्लानि थी, पछतावा. बस मन में यह संतोष था कि कम से कम गलत पैसे का इस्तेमाल सही जगह हो रहा है. कार्यक्रम खत्म हुआ. लौटते समय बड़े साहब ने संदीप के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘अच्छा काम किया है. संदीप. समाजसेवा ऐसे ही होती है.’’संदीप मुसकराया, ‘‘थैंक यू, सर,’’ पर उस के मन में एक विचार धीरे से उभरा, ‘अगर सारी रिश्वतें इसी तरह समाज में लौट जाएं, तो शायद देश का आधा दर्द कम हो जाए.’


लेकिन हकीकत यह थी कि यह अपवाद था, नियम नहीं. उस रात संदीप देर तक सोचता रहा कि, क्या उस ने सही किया? शायद हां, क्योंकि उस ने स्वाभिमान और सिस्टम के बीच एक सेतु बना लिया था. रिश्वत स्वीकार नहीं की, पर उसे समाज के लिए समर्पित कर दिया. उसे लगा, ‘अगर मैं इसे ठुकरा दूंगा तो कोई कोई दूसरा लेगा ही और साहब दूसरे पदाधिकारियों की नाराजगी भी ?ोलनी पड़ेगी, सो अलग.
कम से कम इस से किसी जरूरतमंद का भला तो हो रहा है, क्योंकि ईमानदारी सिर्फ घूस लेने में नहीं, सही जगह देने में भी होती है.’


यह समाधान पूरी तरह सही नहीं था, पर गलत भी नहीं था. समय बीतने लगा. हर महीने वही लिफाफा आता रहा. संदीप भी हर बार उस से कुछ कुछ सामाजिक काम करता. कभी बच्चों के जूते, कभी दीवाली पर मिठाइयां, कभी गरीब मरीजों की दवाएं. धीरेधीरे लोग उसेसमाजसेवी अफसरकहने लगे, पर असल वजह कोई नहीं जानता था.


एक दिन वही बड़े साहब निरीक्षण पर आए. उन्होंने देखा कि थाने में व्यवस्था अच्छी है, जनता का सम्मान हो रहा है, शिकायतें सुनी जा रही हैं. जाते समय हलकी मुसकान के साथ वे बोले, ‘‘तुम्हारे अंदर ईमानदारी भी है और संवेदनशीलता भी. सिस्टम में रह कर ऐसे लोग बहुत कम मिलते हैं.’’ संदीप ने शांत भाव से कहा, ‘‘सर, सिस्टम में रहते हुए भी इनसान रहना जरूरी है.’’ संदीप की बातें सुन कर साहब गंभीरता से मुसकराने लगे. शायद वे सम? चुके थे कि संदीप ने स्वाभिमान के साथ सिस्टम और समाज में बने रहने का रास्ता निकाल लिया है.       

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