Hindi Story: प्यार ऐसे तो नहीं हासिल होता

Hindi Story: 18 अक्तूबर, 2016 की सुबह साढ़े 5 बजे के करीब पुणे शहर की केतन हाइट्स सोसायटी की इमारत के नीचे एक्टिवा सवार एक महिला और एक आदमी के बीच कहासुनी होते देख उधर से गुजर रहे लोग ठिठक गए थे. औरत से कहासुनी करने वाले आदमी की आवाज धीरेधीरे तेज होती जा रही थी. लोग माजरा समझ पाते अचानक उस आदमी ने जेब से चाकू निकाला और एक्टिवा सवार औरत पर हमला कर दिया. औरत जमीन पर गिर पड़ी और बचाव के लिए चिल्लाने लगी. हमलावर के पास चाकू था, जबकि वहां खड़े लोग निहत्थे थे. फिर भी वहां खड़े लोग उस की ओर बढ़े, लेकिन वे सब उस तक पहुंच पाते, उस के पहले ही वह आदमी महिला पर ताबड़तोड़ चाकू से वार कर के उसी की स्कूटी से भाग निकला था. महिला जमीन पर पड़ी तड़प रही थी. उस की हालत देख कर किसी ने कंट्रोल रूम को फोन कर के घटना की सूचना दे दी थी. चूंकि घटनास्थल थाना अलंकार के अंतर्गत आता था, इसलिए कंट्रोल रूम ने घटना की जानकारी थाना अलंकार पुलिस को दे दी थी. सूचना पाते ही थानाप्रभारी इंसपेक्टर बी.जी. मिसाल ने घटना की सूचना अपने अधिकारियों को दी और खुद एआई विजय कुमार शिंदे एवं कुछ सिपाहियों को साथ ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

लाश और घटनास्थल के निरीक्षण में पुलिस वालों ने देखा कि घायल महिला सलवारसूट पहने थी. उस की उम्र 30-31 साल रही होगी. उस के शरीर पर तमाम गहरे घाव थे, जिन से खून बह रहा था. पुलिस को लगा कि अभी वह जीवित है, इसलिए उसे तत्काल पुलिस वैन में डाल कर इलाज के लिए सेसून अस्पताल ले जाया गया. लेकिन अस्पताल पहुंच कर पता चला कि उस की मौत हो चुकी है. इंसपेक्टर बी.जी. मिसाल अपने सहायकों के साथ घटनास्थल और लाश का निरीक्षण कर रहे थे कि डीएसपी सुधीर हिरेमठ और एएसपी भी फोरैंसिक टीम के साथ घटनास्थल पर आ पहुंचे. फोरैंसिक टीम ने जरूरी साक्ष्य जुटा लिए तो अधिकारियों ने भी घटनास्थल और लाश का निरीक्षण किया. उस के बाद बी.जी. मिसाल को जरूरी दिशानिर्देश दे कर चले गए. बी.जी. मिसाल ने सहयोगियों की मदद से घटनास्थल की सारी औपचारिकताएं पूरी कीं और उस के बाद अस्पताल जा पहुंचे. डाक्टरों से पता चला कि महिला के शरीर पर कुल 21 घाव थे. अधिक खून बहने की वजह से ही उस की मौत हुई थी. उन्होंने काररवाई कर के लाश को पोस्टमार्टम के लिए रखवा दिया और थाने आ कर अज्ञात के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर इस मामले की जांच इंसपेक्टर (क्राइम) विजय कुमार शिंदे को सौंप दी.

विजय कुमार शिंदे ने मामले की जांच के लिए अपनी एक टीम बनाई और हत्या के इस मामले की जांच शुरू कर दी. घटनास्थल पर पुलिस को मृतका का पर्स और मोबाइल फोन मिला था. मोबाइल फोन के दोनों सिम गायब थे, इसलिए मृतका की शिनाख्त में उस से कोई मदद नहीं मिल सकी. लेकिन पर्स से उस का ड्राइविंग लाइसैंस मिल गया, जिस से उस की शिनाख्त हो गई. मृतका का नाम शुभांगी खटावकर था और वह कर्वेनगर के श्रमिक परिसर की गली नंबर-5 में रहती थी. उस के पति का नाम प्रकाश खटावकर था. इस के बाद विजय कुमार शिंदे ने लाइसैंस में लिखे पते पर एक सिपाही को भेजा तो वहां मृतका का पति प्रकाश खटावकर मिल गया. सिपाही ने उसे पूरी बात बताई तो वह सिपाही के साथ थाने आ गया.

विजय कुमार शिंदे ने अस्पताल ले जा कर उसे लाश दिखाई तो लाश देख कर वह खुद को संभाल नहीं सका और जोरजोर से रोने लगा. विजय कुमार शिंदे ने किसी तरह उसे चुप कराया तो उस ने एकदम से कहा, ‘‘शुभांगी की हत्या किसी और ने नहीं, मेरे ही परिसर में रहने वाले विश्वास कलेकर ने की है. वह उसे एकतरफा प्रेम करता था. वह उसे राह चलते परेशान किया करता था.’  प्रकाश खटावकर के इसी बयान के आधार पर विजय कुमार शिंदे ने विश्वास कलेकर को नामजद कर के उस की तलाश शुरू कर दी. उस के घर में ताला बंद था. आसपड़ोस वालों से पूछताछ में पता चला कि घटना के बाद से ही वह दिखाई नहीं दिया था. पुलिस को प्रकाश खटावकर से उस का नागपुर का जो पता मिला था, जांच करने पर वह फरजी पाया गया था. इस के बाद उस की तलाश के लिए पुलिस की 2 टीमें बनाई गईं. एक टीम नागपुर भेजी गई तो दूसरी टीम वहां जहां वह रहता और काम करता था. पुलिस ने वहां के लोगों से उस के बारे में पूछताछ की.

दूसरी टीम द्वारा पूछताछ में पता चला कि विश्वास नागपुर का नहीं, बल्कि कोल्हापुर का रहने वाला था. वहां के थाना राजारामपुरी में उस के खिलाफ हत्या का एक मुकदमा दर्ज हुआ था, जिस में वह साल भर पहले बरी हो चुका था. बरी होने के बाद ही वह पुणे आ गया था. इंसपेक्टर विजय कुमार शिंदे के लिए यह जानकारी काफी महत्त्वपूर्ण थी. कोल्हापुर जा कर वह थाना राजारामपुरी पुलिस की मदद से विश्वास को गिरफ्तार कर पुणे ले आए और उसे अदालत में पेश कर के पूछताछ के लिए पुलिस रिमांड पर ले लिया. थाने में अधिकारियों की उपस्थिति में विश्वास कलेकर से शुभांगी की हत्या के बारे में पूछताछ शुरू ही हुई थी कि वह फर्श पर गिर कर छटपटाने लगा. उस के मुंह से झाग भी निकल रहा था. अचानक उस का शरीर अकड़ सा गया. पूछताछ कर रहे सारे पुलिस वाले घबरा गए. उन्हें लगा कि पूछताछ से बचने के लिए विश्वास ने जहर खा लिया है. उसे तुरंत अस्पताल पहुंचाया गया.

डाक्टरों ने उसे चैक कर के बताया कि इस ने जहर नहीं खाया है, बल्कि इसे मिर्गी का दौरा पड़ा है. यह जान कर पुलिस अधिकारियों की जान में जान आई. इलाज के बाद विश्वास को थाने ला कर पूछताछ की जाने लगी तो उस से सख्ती के बजाय मनोवैज्ञानिक ढंग से पूछताछ की गई. इस पूछताछ में एकतरफा प्रेम में शुभांगी की हत्या करने की उस ने जो कहानी बताई, वह कुछ इस प्रकार से थी—

शुभांगी महाराष्ट्र के नागपुर के रहने वाले प्रकाश मधुकर खटावकर की पत्नी थी. जिस समय शुभांगी की शादी प्रकाश से हुई थी, उस समय वह बीकौम कर रहा था. शुभांगी जैसी सुंदर, संस्कारी और समझदार पत्नी पा कर वह बहुत खुश था. पढ़ाई पूरी करने के बाद कुछ दिनों तक वह गांव में पिता मधुकर खटावकर के साथ खेती के कामों में उन की मदद करता रहा. खेती की कमाई से किसी तरह परिवार का खर्च तो चल जाता था, पर भविष्य के लिए कुछ नहीं बच पाता था. ऐसे में जब प्रकाश और शुभांगी को एक बच्चा हो गया तो उस के भविष्य को ले कर उन्हें चिंता हुई. दोनों ने इस बारे में गहराई से विचार किया तो उन्हें लगा कि बच्चे के बेहतर भविष्य के लिए उन्हें गांव छोड़ कर शहर जाना चाहिए.

इस के बाद प्रकाश और शुभांगी घर वालों से इजाजत ले कर पहले मुंबई, उस के बाद पुणे जा कर स्थाई रूप से बस गए थे. पुणे के जेल रोड पर किराए का मकान ले कर उन्होंने रोजीरोटी की शुरुआत की. प्रकाश को एक प्राइवेट कोऔपरेटिव बैंक में नौकरी मिल गई थी तो पति की मदद के लिए शुभांगी कुछ घरों में खाना बनाने का काम करने लगी थी. इस काम से शुभांगी को अच्छे पैसे मिल जाते थे. इस के अलावा वह घर से भी टिफिन तैयार कर के सप्लाई करती थी. इस तरह कुछ ही दिनों में उन की आर्थिक स्थिति काफी मजबूत हो गई. शुभांगी के पास पैसा आया तो इस का असर उस के रहनसहन पर तो पड़ा ही, उस के शरीर और बातव्यवहार पर भी पड़ा. अब वह पहले से ज्यादा खूबसूरत लगने लगी थी.

जल्दी ही शुभांगी और प्रकाश ने कर्वेनगर के श्रमिक परिसर की गली नंबर-5 में अपना खुद का मकान खरीद लिया था. बच्चे का भी उन्होंने एक बढि़या अंगरेजी स्कूल में दाखिला करा दिया था. शुभांगी को मेहनत ज्यादा करनी पड़ती थी और उस के पास समय कम होता था. उस की भागदौड़ को देखते हुए प्रकाश ने इस के लिए स्कूटी खरीद दी थी. शुभांगी घर और बाहर के सारे काम कुशलता से निपटा रही थी. इस के अलावा वह अपने शरीर का भी पूरा खयाल रखती थी. बनसंवर कर वह स्कूटी से निकलती तो देखने वाले देखते ही रह जाते थे. उस का शरीर सांचे में ढला ऐसा लगता था कि वह कहीं से भी 13 साल के बच्चे की मां नहीं लगती थी. उस की यही खूबसूरती उस के लिए खतरा बन गई.

शुभांगी जिस परिसर में रहती थी, उसी परिसर में 40 साल का विश्वास कलेकर भी एक साल पहले कोल्हापुर से आ कर रहने लगा था. रोजीरोटी के लिए वह वड़ापाव का ठेला लगाता था. एक ही परिसर में रहने की वजह से अकसर उस की नजर शुभांगी पर पड़ जाती थी. खूबसूरत शुभांगी उसे ऐसी भायी कि वह उस का दीवाना बन गया. इस की एक वजह यह थी कि उस की शादी नहीं हुई थी. शायद मिर्गी की बीमारी की वजह से वह कुंवारा ही रह गया था. और जब उसे घर बसाने का मौका मिला तो उस में भी कामयाब नहीं हुआ. जिस लड़की से वह प्यार करता था, उस की हत्या हो गई थी. उस की हत्या का आरोप भी उसी पर लगा था, लेकिन अदालत से वह बरी हो गया था. बरी होने के बाद वह पुणे आ गया था और उसे शुभांगी से प्यार हुआ तो वह हाथ धो कर उस के पीछे पड़ गया. शुभांगी तक पहुंचने के लिए पहले उस ने उस के पति प्रकाश से यह बता कर दोस्ती कर ली कि वह भी उस के गांव के पास का रहने वाला है. इस के बाद जल्दी ही वह शुभांगी के परिवार में घुलमिल गया. शुभांगी के घर आनेजाने में ही उस ने शुभांगी से यह कह कर अपना टिफिन भी लगवा लिया कि दिन भर काम कर के वह इस तरह थक जाता है कि रात को उसे अपना खाना बनाने में काफी तकलीफ होती थी. शुभांगी को भला इस में क्या ऐतराज होता, उस का तो यह धंधा ही था. वह उस का भी टिफिन बना कर पहुंचाने लगी.

समय अपनी गति से सरकता रहा. शुभांगी विश्वास का टिफिन देने आती तो इसी बहाने वह उसे एक नजर देख लेता, साथ ही उसे प्रभावित करने के लिए उस के बनाए खाने की खूब तारीफ भी करता. अपनी तारीफ सुन कर शुभांगी कुछ कहने के बजाय सिर्फ हंस कर रह जाती. इस से विश्वास को लगने लगा कि वह उस के मन की बात जान गई है. शायद इसी का परिणाम था कि एक दिन उस ने अपने मन की बात शुभांगी से कह दी. उस की बातें सुन कर शुभांगी सन्न रह गई. वह संस्कारी और समझदार महिला थी, इसलिए नाराज होने के बजाय उस ने उसे समझाया, ‘‘मैं शादीशुदा ही नहीं, एक बच्चे की मां भी हूं. मेरा अच्छा सा पति है, जिस के साथ मैं खुश हूं. तुम हमारे गांव के पास के हो, इसलिए हम सब तुम्हारी इज्जत करते हैं. तुम अपने मन में कोई ऐसा भ्रम मत पालो, जो आगे चल कर तुम्हें तकलीफ दे.’’ लेकिन शुभांगी के लिए पागल हुए विश्वास पर शुभांगी के समझाने का कोई असर नहीं हुआ. उस ने लगभग गिड़गिड़ाते हुए कहा, ‘‘शुभांगी, तुम्हारी वजह से मेरी रातों की नींद और दिन का चैन लुट गया है. हर घड़ी तुम मेरी आंखों के सामने रहती हो. मुझे तुम से सचमुच प्यार हो गया है. तुम पति और बच्चे को छोड़ कर मेरे पास आ जाओ. मैं तुम्हें रानी बना कर रखूंगा. तुम्हें कोई काम नहीं करने दूंगा.’’

विश्वास कलेकर की इन बातों से शुभांगी का धैर्य जवाब दे गया. उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें इतना समझाया, फिर भी तुम्हारी समझ में नहीं आया. अगर फिर कभी इस तरह की बातें कीं तो ठीक नहीं होगा. मैं तुम्हारी शिकायत प्रकाश से कर दूंगी. जरूरत पड़ी तो पुलिस से भी कर दूंगी.’’ शुभांगी की इस धमकी से कुछ दिनों तक तो विश्वास शांत रहा. लेकिन एक दिन मौका मिलने पर वह शुभांगी के सामने आ कर खड़ा हो गया और पहले की ही तरह गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘शुभांगी, तुम मेरे साथ चलो. मैं तुम्हें जान से भी ज्यादा प्यार करता हूं. तुम्हारे बिना मैं जिंदा नहीं रह सकता.’’

शुभांगी ने नाराज हो कर उसे खरीखोटी तो सुनाई ही, उस की इस हरकत की शिकायत प्रकाश से भी कर दी. प्रकाश ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो उस की बात को समझने के बजाय वह उलटा उसे ही समझाने लगा. इस के बाद दोनों में कहासुनी हो गई.

परेशानी की बात यह थी कि इस के बाद भी विश्वास अपनी हरकतों से बाज नहीं आया. अब वह शुभांगी को परेशान करने लगा. जब इस की जानकारी शुभांगी के भाई को हुई तो उस ने विश्वास की पिटाई कर के चेतावनी दी कि अगर उस ने फिर कभी शुभांगी को परेशान किया तो ठीक नहीं होगा.

शुभांगी के भाई द्वारा पिटाई करने से विश्वास इतना आहत हुआ कि उस ने अपनी इस पिटाई और अपमान का बदला लेने के लिए शुभांगी के प्रति एक खतरनाक फैसला ले लिया. उसे शुभांगी के सारे कामों और आनेजाने की पूरी जानकारी थी ही, इसलिए 18 अक्तूबर, 2016 की सुबह 5 बजे जा कर वह केतन हाइट्स सोसायटी के पास खड़े हो कर उस का इंतजार करने लगा. शुभांगी अपने समय पर वहां पहुंची तो उस की स्कूटी के सामने आ कर उस ने उसे रोक लिया. उस की इस हरकत से नाराज हो कर शुभांगी ने कहा, ‘‘यह क्या बदतमीजी है. अभी तुम्हें या हमें चोट लग जाती तो?’’

‘‘कोई बात नहीं, तुम तो जानती ही हो, आशिक मरने से नहीं डरते. अपनी मंजिल पाने के लिए वे किसी भी हद तक जा सकते हैं.’’ विश्वास ने बेशर्मी से मुसकराते हुए कहा, ‘‘आखिर तुम मेरी बात मान क्यों नहीं लेती?’’

‘‘तुम्हारी बकवास सुनने का मेरे पास समय नहीं है, तुम मेरे सामने से हटो और मुझे काम पर जाने दो.’’

‘‘तुम ने मेरी बात का जवाब नहीं दिया?’’ विश्वास ने कहा.

‘‘मुझे तुम्हारी किसी बात का जवाब नहीं देना.’’ शुभांगी ने गुस्से में कहा.

‘‘तो क्या तुम्हारा यह आखिरी फैसला है?’’ विश्वास ने पूछा.

‘‘हां…हां,’’ शुभांगी ने लगभग चीखते हुए कहा, ‘‘हां, यह मेरा आखिरी फैसला है. तुम मुझे इस जन्म में तो क्या, अगले 7 जन्मों तक नहीं पा सकोगे.’’

शुभांगी के चेहरे पर अपने लिए नफरत और दृढ़ता देख कर विश्वास को गुस्सा आ गया. लंबी सांस लेते हुए उस ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें कितना समझाया कि तुम मेरी हो जाओ, लेकिन तुम ने मेरी बात नहीं मानी. अब मैं तुम्हारा 7 जन्मों तक इंतजार करूंगा.’’

कह कर विश्वास ने जेब से चाकू निकाला और ताबड़तोड़ वार कर के शुभांगी की हत्या कर दी. इस के बाद जल्दी से उस के मोबाइल फोन के दोनों सिम निकाल कर उसी की स्कूटी से भाग निकला. स्कूटी उस ने पुणे के रेलवे स्टेशन पर पार्किंग में खड़ी कर दी और ट्रेन से कोल्हापुर चला गया.

विस्तृत पूछताछ के बाद विजय कुमार शिंदे ने उस के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर के मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट के सामने पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. इस तरह एकतरफा प्यार करने वाला विश्वास अपनी सही जगह पर पहुंच गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Lifestyle: मूंछे करनी हैं स्टाइल में शामिल तो अपनाएं ये 4 टॉप टिप्स

Lifestyle: लड़को में मूंछे और बियर्ड रखने का चलन काफी समय से चल रहा है ज्यादतर आदमी विराट कोहली की तरह बियर्ड रखना पसंद करते है लेकिन उतना ही क्रेज मूंछे रखने का भी है, हालांकि मूंछे कैसी और कौन सी रखनी चाहिए इसके लिए ज़रुर है कि आपको अच्छी जानकारी हो, तो आज के आर्टिकल में हम आपके लिए कुछ ऐसे ही टिप्स लेकर आए है जिससे आप अपनी पसंद की मूंछे रख सकेंगे.

1. मूंछों काटने का सही समय

मूंछों को अपने हिसाब से ट्रिम करना है तो इनको शुरुआती दिनों में ही ट्रिम कर लें. इससे इन्हें हटाना कठिन नहीं होता है.लेकिन असल शेप देने का समय होगा इसके करीब 4 हफ्ते बाद. इस वक्त आप मूंछों के कंघे और वैक्स का इस्तेमाल भी कर सकते हैं. इस दौरान आप मूंछों के गैप भी सेट कर पाएंगे

2. मूंछों वाला कंघा

मूंछो पर कंघे का इस्तेमाल करना बेहतर होता है, इससे आप वैक्स कराने के बाद भी कर सकते है.तब आप वैक्स को बराबरी से फैला भी सकते है. मूंछो में गैप करने के लिए भी कंघा काम आता है.

3. गीली मूंछें हैं तो

मूंछें जब गीली होती हैं तो उन्हें काटने और ट्रिम करने की कोशिश बिल्कुल न करें. गीले बाल भारी हो जाते हैं और काटना मुश्किल होता है. गीले बालों को काटने के बाद जब ये सूखेंगे तो ये जरूरत से ज्यादा छोटे लग सकते हैं. इसलिए इन्हें सूखने पर ही काटें.

4. फेस स्क्रब के फायदे

मूंछें अच्छे से बढ़ें इसके लिए जरूरी है कि उनके पीछे स्किन साफ़ सुथरी रहे. इसमें डेड स्किन बिल्कुल भी ना हो. इसके लिए जरूरी है कि अच्छा फेस स्क्रब इस्तेमाल किया जाए. इसके पहले शैंपू और कंडिशनर का इस्तेमाल भी किया जाना चाहिए.

 

 

Readers Problem: मैं 6 फुट लंबा खूबसूरत नौजवान हूं, क्या मैं अपना करियर एक्टिंग में बना सकता हूं?

Readers Problem: सवाल-

मैं 21 साल का 6 फुट लंबा खूबसूरत नौजवान हूं. मेरे नैननक्श तीखे हैं और आसपास के लोग मुझे कहते हैं कि मैं फिल्मों में करियर बना सकता हूं.

मैं ने कभी लोगों के सामने ऐक्टिंग नहीं की है, लेकिन मैं सीखना जरूर चाहता हूं. क्या कोई संस्था ऐक्टिंग का कोर्स सिखाती है?

जवाब-

यह बात ‘नाच न जाने आंगन टेढ़ा’ सरीखी है. अगर तीखे नैननक्श और खूबसूरती ही फिल्मों में करियर के पैमाने या गारंटी होते तो हर चौथा आदमी फिल्म इंडस्ट्री में होता. लेकिन हकीकत यह है कि फिल्मों में जमने के लिए ऐक्टिंग का हुनर आना जरूरी है जो आप के मुताबिक आप में नहीं है, तो बेवजह वक्त बरबाद न करें और पढ़ाईलिखाई पर ध्यान दें.

ओम पुरी और कादर खान जैसे दर्जनों मामूली शक्लसूरत वाले ऐक्टर सिर्फ ऐक्टिंग के दम पर चले और विनोद मेहरा और राजकिरण सरीखे दर्जनों हीरो खूबसूरत और तीखे नैननक्श के होते हुए भी नहीं चल पाए, क्योंकि वे ऐक्टिंग में कमजोर थे.

अगर आप के पास मुकम्मल पैसा और वक्त हो तो पहले किसी नामी इंस्टीट्यूट से ऐक्टिंग का कोई कोर्स करें.

Crime Story: यह गाली नहीं बिहारी स्वाभिमान पर हमला

Crime Story: उत्तराखंड की महिला सशक्तीकरण और बाल विकास मंत्री रेखा आर्य के पति गिरधारी लाल साहू ने 2-3 जनवरी 2026 को पहलागढ़, अल्मोड़ा (सोमेश्वर) में एक कार्यक्रम के दौरान बिहारी लड़कियों को ले कर एक आपत्तिजनक टिप्पणी की थी. वायरल वीडियो में वे कह रहे थे किअगर शादी नहीं हो रही है तो बिहार से लड़की ले आओ… 20,000 से 25,000 रुपए में लड़कियां मिल जाती हैंऔरहम तुम्हें शादी करवा देंगे.’

इस बयान ने बिहार और देशभर में व्यापक आलोचना और राजनीतिक विवाद को जन्म दिया है. राष्ट्रीय जनता दल के विधायक अमरेंद्र्र कुमार कुशवाहा ने बताया कि बिहारी लड़कियों को ले कर दिया गया साहू का अभद्र, अश्लील और अपमानजनक बयान कोई सामान्य फिसलन या निजी टिप्पणी नहीं है. यह पूरे बिहार, बिहारी समाज और विशेष रूप से बिहारी स्त्रियों के स्वाभिमान पर सीधा हमला है.
यह बयान उस सामंती, अहंकारी और स्त्री विरोधी सोच का परिचायक है, जिस में बिहार को गाली देना और बिहारी पहचान को नीचा दिखाना एक तरह का अधिकार मान लिया गया है.

बिहारी लड़कियां किसी की जबान की गंदगी सहने के लिए पैदा नहीं हुई हैं. वे खेतों में काम करने वाली मेहनतकश महिलाएं भी हैं, यूनिवर्सिटी में रिसर्च करने वाली छात्राएं भी, प्रशासन, चिकित्सा, विज्ञान, खेल और कला के क्षेत्र में देश का नाम रोशन करने वाली सशक्त नागरिक भी. बिहार की महिलाओं ने उलट हालात में भी संघर्ष किया है, अपमान में भी आत्मसम्मान बचाया है और अवसर मिलने पर दुनिया को अपनी हैसियत दिखाई है. ऐसे में उन के खिलाफ गालीनुमा बयान देना केवल बेहूदगी नहीं, बल्कि सामाजिक अपराध भी है.

साहू का यह बयान उस पुरानी सोच को उजागर करता है, जिस में बिहार को हमेशा हाशिए पर, मजदूरी पर और उपहास के केंद्र में रखा गया. यह वही सोच है जो बिहारियों को सस्ते मजदूर के रूप में देखती है और बिहारी औरतों को सम्मान नहीं, बल्कि वस्तु सम?ाती है. यह बयान सिर्फ महिलाओं का अपमान नहीं करता, बल्कि पूरे बिहारी समाज को अपमानित करता है.सब से शर्मनाक पहलू यह है कि इस बयान के बाद सत्ता और संगठन की ओर से कोई साफ, सख्त और नैतिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई. चुप्पी केवल मौन नहीं होती, वह सहमति भी होती है.

यदि यही भाषा किसी और राज्य, किसी और समाज या किसी और वर्ग के लिए इस्तेमाल की गई होती, तो अब तक नैतिकता, संस्कृति और मर्यादा की दुहाई देते हुए बड़ेबड़े बयान चुके होते. लेकिन जब गाली बिहार और बिहारियों को दी जाती है, तो उसे हलके में ले लिया जाता है. यह दोहरा मापदंड नहीं, तो और क्या है? बिहारी स्वाभिमान किसी पार्टी, नेता या संगठन की जागीर नहीं है. यह उस समाज की सामूहिक चेतना है जिस ने देश के हर कोने में ईंटपत्थर जोड़े हैं, खेतों से ले कर फैक्टरियों तक काम किया है और लोकतंत्र को अपने वोट से जिंदा रखा है. बिहार को गाली देना आसान है, लेकिन बिहार के आत्मसम्मान को तोड़ना नामुमकिन.

आज जरूरत इस बात की है कि साहू के इस बयान की खुल कर, बिना लागलपेट के निंदा की जाए. यह कोईनिजी रायनहीं है, यह सार्वजनिक अपमान है. सार्वजनिक जीवन में रहने वालों को यह सम?ाना होगा कि उन की जबान उन की जिम्मेदारी होती है. गाली दे कर बच निकलना लोकतंत्र में स्वीकार करने लायक नहीं है और ही सभ्य समाज में. बिहारी समाज को भी अब साफ और एकजुट आवाज में कहना होगा कि वह बेइज्जती सहने के लिए नहीं बना है. हमारी बेटियां हमारी पहचान हैं, हमारी ताकत हैं और हमारे स्वाभिमान का प्रतीक हैं. उन के सम्मान पर किया गया कोई भी हमला, चाहे वह किसी भी शख्स, पद या राजनीतिक संरक्षण से लैस क्यों हो, बरदाश्त नहीं किया जाएगा.    

Film Story: मैं एक ड्रामा गर्ल हूं-केतकी कुलकर्णी

Film Story: खूबसूरत और हंसमुख हीरोइन केतकी कुलकर्णी ने एक्टिंग कैरियर की शुरुआत साल 2015 में मराठी टैलीविजन सीरियलअस्मितासे की थी, जिस में उन्होंने पूजा का किरदार निभाया था. इस के बाद उन्होंनेक्रांतिज्योति सावित्रीबाई फुलेसे हिंदी टीवी में काम शुरू किया, जिस में उन्होंने युवा सावित्रीबाई फुले का रोल निभाया था. इस के बादएचएम बने टीएम बने’, ‘बैरिस्टर बाबूजैसे कई सीरियलों में काम किया. मराठी और हिंदी सिरियलों के अलावा उन्होंने फिल्म ‘1920 : हौरर्स औफ हार्टमें भी काम किया. पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप का एक्टिंग जगत में आना कैसे हुआ?
मैं बचपन से ही एक्टिंग के क्षेत्र में आना चाहती थी. स्टेज पर प्रोग्राम करने से मेरा आत्मविश्वास बढ़ता चला गया. मैं ने 9 साल की उम्र में पहला आडिशन धारावाहिकअस्मिताके लिए दिया था, जिस के लिए मैं चुन ली गई थी. वहीं से मेरी मम्मी को हिंदी शो का कौन्टैक्ट मिला, जहां मैं ने अपने प्रोफाइल भेजा और उसी से मु? धीरेधीरे काम मिलने लगा. किस शो ने आप की जिंदगी बदली? पहले मु? दर्शकों नेअस्मिताशो में बचपन में देखा था, तब उन्होंने मेरे काम की तारीफ की थी. यहीं से मु? नया उत्साह मिला था.
इस क्षेत्र में आने के लिए आप के परिवार का सहयोग कैसा था?

मेरे पूरे परिवार का सहयोग हमेशा रहा है, लेकिन मेरी मां स्वाति कुलकर्णी ने सब से ज्यादा सपोर्ट दिया है. यहां तक पहुंचने का क्रेडिट मेरी मां को ही जाता है. उन की एक जिद थी कि मैं एक्टिंग करूं, क्योंकि वे इस विधा को बहुत पसंद करती हैं. मेरे पिता चार्टर्ड अकाउंटैंट हैं और मेरे लिए उन का सहयोग भी हमेशा रहा है.
क्या आप हिंदी फिल्मों में काम करने की इच्छा रखती हैं?
जरूर. जैसेजैसे काम मिलता जाएगा, मैं करूंगी. मैं हिंदी की रोमांटिक फिल्म करना चाहती हूं. मैं एक ड्रामा गर्ल हूं. मैं ऐसी हिंदी फिल्में करना चाहती हूं, जैसी डायरैक्टर संजय लीला भंसाली बनाते हैं. जैसी फिल्में धर्मा प्रोडक्शन की होती हैं.

इंटीमेट सीन करने में आप कितनी सहज रहती हैं?
मु? बहुत ज्यादा इंटीमेट सीन करना पसंद नहीं है. मैं ने अभी तक इस बारे में सोचा भी नहीं है. वैसे, मैं ज्यादा सहज नहीं हूं. मुझे आज तक जो भी लोग मिले हैं, उन्होंने मुझे सही गाइड किया है.
क्या आप कभी कास्टिंग काउच की शिकार हुई हैं?
ऐसा कभी नहीं हुआ, क्योंकि मैं सामने वाले की नीयत आसानी से सम? जाती हूं और गलत लोगों के बीच में नहीं गई.
आप ने औडिशन में नाकाम होने पर अपनी मायूसी को कैसे लिया?
मेरा औडिशन में तकरीबन 100 बार रिजैक्शन हुआ है. शो मिलतेमिलते रह गए. एग्रीमैंट साइन होने के बाद में भी मना कर देते हैं. मेरे लिए सब से बड़ी चुनौती मेरा चेहरा है.
जब मैं 15 साल की थी, तो सिर्फ
12 या 13 साल की तरह दिखती थी. इस से कई बार रोल मिलतेमिलते रह गए. ऐसे में मैं बहुत रोती थी. रोने से मेरा मन हलका हो जाता था.
आप की नजर में प्यार क्या है?
मेरी नजर में प्यार ही सबकुछ है, जिस से पूरी दुनिया चलती है. प्यार नहीं है, तो सबकुछ बेजान सा ही नजर आता है.                               

Sociopolitics: उत्तर प्रदेश और बिहार नहीं चाहिए जातिवादी दल

Sociopolitics: उत्तर प्रदेश और बिहार प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे दक्षिण भारत के कई प्रमुख राज्यों से पीछे हैं. इन राज्यों की प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से काफी ऊपर है. उत्तर प्रदेश और बिहार सब से कम आय वाले देश के 2 सब से बड़े राज्य हैं.

कर्नाटक की प्रति व्यक्ति आय
2 लाख, 4 हजार, 605, तमिलनाडु की 1 लाख, 96 हजार, 309 और तेलंगाना की 1 लाख, 87 हजार, 912 रुपए है. इन के मुकाबले उत्तर प्रदेश की प्रति व्यक्ति आय 1 लाख, 8 हजार, 572 और बिहार की महज 69 हजार, 321 रुपए है.
उत्तर प्रदेश और बिहार देश के 2 सब से बड़े राज्य हैं. उत्तर प्रदेश में लोकसभा की 80 सीटें और बिहार में 40 सीटें हैं. इस के बावजूद ये विकास की दौड़ में सब से पीछे हैं.
इस की सब से बड़ी वजह यह है कि साल 1990 के बाद से इन राज्यों में उन राजनीतिक दलों का कब्जा हो गया, जो जाति और धर्म के नाम पर सरकार चला रहे थे. उन का प्रदेश के विकास से कोई लेनादेना नहीं था.
जाति के नाम पर राजनीति करने वाले ऐसे दल परिवार और अपनी जाति से बाहर नहीं निकल पाए. जाति और धर्म की सोच ने संविधान और विकास को पीछे धकेल दिया. कोविड काल में इन दोनों राज्यों के रहने वाले मजदूर सब से ज्यादा सड़कों पर मर रहे थे. जान बचाने के लिए वे सब से ज्यादा पैदल चल रहे थे, जिस से इन राज्यों की माली हालत को सम? जा सकता है.
अपने घरपरिवार और प्रदेश को छोड़ कर मजदूरी करने वाले सब से ज्यादा उत्तर प्रदेश और बिहार के ही लोग बाहर रह रहे हैं.
उत्तर प्रदेश के ईश्रम पोर्टल पर रजिस्टर्ड श्रमिकों की संख्या 8 करोड़, 40 लाख है. बिहार में यह संख्या
3 करोड़ है. देश के किसी भी राज्य के मुकाबले उत्तर प्रदेश और बिहार के ही मजदूर सब से ज्यादा बाहर मजदूरी करते पाए जाते हैं.
उत्तर प्रदेश और बिहार की गरीबी के प्रमुख राजनीतिक कारणों में सुशासन की कमी, नीति निर्माण में नाकामी, भ्रष्टाचार और जाति पर आधारित राजनीति बाहुबलियों और अपराधियों का दबदबा शामिल है.
गरीबी मिटाने की जगह जातिवाद को बढ़ावा
इस के कारण शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में निवेश कम ही रहा है. इस के अलावा उत्तर प्रदेश और बिहार में राज करने वाली सरकारों का औद्योगिक विकास पर ध्यान नहीं दिया. सत्ता में बने रहने के लिए विकास की जगह इन दलों ने जातीय और धार्मिक धु्रवीकरण को बल दिया.
इन राज्यों में लंबे समय तक
स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं में ढंग से निवेश नहीं किया गया. राजनीतिक स्तर पर संसाधनों की लूट और विकास की जगह पर केवल सत्ता के लिए काम करने वाली सोच ने गरीबी को बढ़ावा दिया.
कमजोर बुनियादी ढांचे, नीतिगत अस्थिरता और खराब कानून व्यवस्था के कारण औद्योगिक विकास को बढ़ावा नहीं मिला. कृषि पर बहुत ज्यादा निर्भरता और गैरकृषि उद्योगों की कमी के चलते लोगों को दूसरे राज्यों में काम के लिए मजबूरन पलायन करना पड़ता है.
90 के दशक में शुरू हुए राममंदिर आंदोलन ने नौजवानों को धर्म से जोड़ दिया, जिस से वे विकास की बात को सम? ही नहीं पाए. इस से पूरी युवा पीढ़ी कांवड़ यात्रा और कलश यात्राओं के लिए ही काम करती रही.
राजनीतिक दलों ने अपनी सत्ता बनाए रखने के लिए जाति और धर्म का सहारा लिया. प्रदेश के विकास की सोच रखने वाले दलों को सत्ता से बाहर कर दिया गया.
1990 के पहले आईएएस परीक्षा में उत्तर प्रदेश और बिहार के लोगों की संख्या ज्यादा होती थी. धीरेधीरे बिहार और उत्तर प्रदेश के लोगों के नाम कम होने लगे. इस की जगह यहां अपराध और अपराधियों का बोलबाला हो गया.

एक नहीं रह पाए एससी और ओबीसी
बिहार में जमींदारी प्रथा खत्म होने का फायदा यादव, कुर्मी, कोइरी और भूमिहार जैसी जातियों को मिला. वे नए तरह के जमींदार बन कर उभरे. उन का बरताव एससी और एसटी के साथ वैसा ही होने लगा, जैसे पहले के जमींदारों का होता था.
1970 के दशक में इंदिरा गांधी के विरोध और 1990 में मंडल कमीशन लागू होने के बाद बिहार पर ऊंची जातियों का असर कम हुआ.
इस के उलट पिछड़ों में अगड़े खासकर यादव वर्ग ने लालू प्रसाद यादव के सहारे बिहार में जो किया उस ने बिहार को जंगलराज की तरफ धकेल दिया. कांग्रेस की सरकारों के समय बिहार में उद्योगधंधे लगे थे, वे सब बिहार छोड़ कर चले गए.
जिस बिहार को जमींदारी उन्मूलन के बाद पलायन पर काम करना था, वह जातीय बदले लेने पर उतर आया. इस ने नक्सलवाद को जन्म दिया. बिहार के पिछड़े तबके के नेता एससी और एसटी जातियों को कभी खुद के साथ जोड़ नहीं पाए.
1970 के बाद बिहार की राजनीति में कांग्रेस का ब्राह्मणवाद खत्म हुआ, तो 3 गुट बन गए. अगड़ी जातियां नीतीश कुमार के साथ, एससीएसटी जातियां रामविलास पासवान के साथ और ओबीसी जातियां लालू प्रसाद यादव के साथ जुड़ गईं.

लालू प्रसाद यादव ओबीसी में अतिपिछड़ी जातियों को अपने साथ रख कर नहीं चल पाए.
लालू प्रसाद यादव अपनी जाति और परिवार से अलग कोई और समुदाय जोड़ नहीं पाए. वे नए तरह के दबंग बन कर उभरे, जिस को लालू का जंगलराज कहा जाता है. वे अपने साथ रहने वाले को भी बेइज्जत करने से चूकते नहीं थे.
पान खाने के शौकीन लालू प्रसाद यादव जनता के बीच भी अपने किसी मंत्री और अफसर से पान थूकने के
लिए पीकदान उठाने के लिए कह देते थे. वे अपने करीबी रामविलास पासवान और नीतीश कुमार को जोड़ कर नहीं चल पाए. जमींदारी भले ही बिहार में खत्म हुई है, पर नए पैदा हुए जमींदारों ने बिहार को आगे नहीं बढ़ने दिया, जिस के चलते नीतीश कुमार प्रभावी हो गए और लालू राज को खत्म कर वे 20 साल बिहार के मुख्यमंत्री रहे.
साल 2025 के विधानसभा चुनाव में नीतीश कुमार को जीत मिली. कांग्रेस को वहां की सत्ता से बाहर हुए 35 साल का समय बीत गया है. इसी तरह उत्तर प्रदेश में भी साल 1989 के बाद से कांग्रेस का राज नहीं बन सका. कांग्रेस सभी जाति और धर्म को ले कर साथ चलते हुए विकास का काम करती थी.
जाति और धर्म की राजनीति ने उत्तर प्रदेश और बिहार को खत्म कर दिया है. यह चीन और दूसरे देशों से मुकाबला तो बाद में करेगे अभी तो कर्नाटक, तमिलनाडु और तेलंगाना जैसे दक्षिण भारत के कई प्रमुख राज्यों से पीछे हैं.
साल 2025 के विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल बिहार की जनता को नहीं सम? पाई कि लालू के दौर वाला जंगलराज वापस नहीं आएगा. राजद ने कांग्रेस को दबाकुचला सम? कर बरताव किया, जिस वजह से उसे हार का सामना करना पड़ा.

बिहार जैसे हालात हैं उत्तर प्रदेश में साल 1989 में उस समय के प्रधानमंत्री वीपी सिंह के मंडल कमीशन लागू करने के फैसले के बाद भाजपा ने इस की काट के तौर पर राम जन्मभूमि आंदोलन को आगे बढ़ाया. धर्म बनाम जाति या कहें या मंडल बनाम कमंडल की राजनीति में भाजपा को कामयाबी मिलती रही.
उत्तर प्रदेश और बिहार का इस से भला नहीं हुआ. भाजपा ने सवर्णों के अलावा गैरयादव ओबीसी को एकसाथ लाने में कामयाबी हासिल की.
उत्तर प्रदेश में सवर्ण यानी ऊंची जातियों के अलावा राज्य में ओबीसी तबके में कई जातियां हैं, जिन का राजनीतिक वजूद भी है. यादव, कुर्मी, शाक्य, कुशवाहा, निषाद, मौर्य, इन सब के अपने नेता भी हैं.
भारतीय जनता पार्टी ने कुर्मियों की अगुआई करने वाले अपना दल की नेता अनुप्रिया पटेल को अपने साथ लिया. अनुप्रिया पटेल केंद्र सरकार में राज्य मंत्री हैं, वहीं उन के पति आशीष पटेल प्रदेश में मंत्री हैं. उन की बहन डाक्टर पल्लवी पटेल जो समाजवादी पार्टी के सहयोग से साल 2022 का विधानसभा चुनाव जीती थीं, इस के बाद भी समाजवादी पार्टी उन को अपने साथ जोड़ कर नहीं चल पाई.
भाजपा के दूसरे सहयोगी दलों में निषाद पार्टी और सुहेल देव भारतीय समाज पार्टी (सुभासपा) भी हैं. निषाद पार्टी के नेता संजय निषाद, अपना दल के आशीष सिंह और सुभासपा के ओमप्रकाश राजभर उत्तर प्रदेश सरकार में मंत्री हैं.
समाजवादी पार्टी लंबे समय से मुसलिम और यादव के समीकरण के साथ चल रही है. साल 2024 में पार्टी ने पीडीए का नारा दिया और लोकसभा चुनाव में प्रदेश में सब से ज्यादा सीटें जीतीं.

समाजवादी पार्टी ने पीडीए का मतलब पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक बताया था. हालत यह है कि इस के नेता अखिलेश यादव समय के साथसाथ इस परिभाषा को बदलते रहते हैं.
बसपा ने दलितों को एकजुट कर के अपनी राजनीतिक पहचान बनाई और प्रदेश में मायावती 4 बार मुख्यमंत्री बनीं. इस के बाद भी दलितों के लिए कोई काम नहीं कर पाईं. बसपा 2024 के लोकसभा चुनाव में एक भी सीट नहीं जीत पाई. वहीं प्रदेश की 403 विधानसभा सीटों में उस का एक विधायक है.
उत्तर प्रदेश की राजनीति में पिछले
2 दशक में मायावती ने साल 2007 में अपने दम पर सर्व समाज का नारा दे कर सत्ता हासिल की थी. बसपा को 206 सीटों पर जीत मिली थी. इस के बाद कमोबेश अखिलेश यादव सब की बात कर के और मायावती सरकार के खिलाफ बने माहौल पर चुनाव जीते और साल 2012 में मुख्यमंत्री बने थे.
भाजपा ने 2017 और 2022 में सरकार बनाई है. इन दोनों चुनाव में हिंदुत्व का और सोशल इंजीनियरिंग का खास खयाल किया गया था. इस में कट्टर हिंदुत्व का तड़का लगाया.

भाजपा ने पहली बार प्रदेश में 312 सीटें जीती थीं. 2022 में भाजपा की सीटें पहले से कम हुईं, लेकिन तब भी पूर्ण बहुमत की सरकार बनी और योगी आदित्यनाथ दोबारा मुख्यमंत्री बने.
उत्तर प्रदेश में 2027 में विधानसभा चुनाव हैं. समाजवादी पार्टी पीडीए के भरोसे राजनीतिक दांव चल रही है. कांग्रेस अभी समाजवादी पार्टी के साथ है. मायावती ने अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा की है.
एक साल पहले ही 2027 के उत्तर प्रदेश में विधानसभा का चुनाव की तैयारियां शुरू हो चुकी हैं. समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी अपने अपने असर को बढ़ाने में जुट गई हैं. इस के तहत समाजवादी पार्टी कांग्रेस को ही कमजोर करने में लगी है. उत्तर प्रदेश कांग्रेस मीडिया विभाग के प्रभारी और कद्दावर नेता नसीमुद्दीन सिद्दीकी ने कांग्रेस छोड़ कर समाजवादी पार्टी जौइन कर ली.

साल 2024 के लोकसभा चुनाव
में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने एकदूसरे का साथ दे कर चुनाव लड़ा था, जिस के असर से लोकसभा चुनाव में सपा को 37 और कांग्रेस को 7 सीटों पर कामयाबी मिल गई थी.
लोकसभा चुनावों के बाद जो भी उपचुनाव हुए उस में सपा और कांग्रेस ने अलगअलग चुनाव लड़े थे. ये चुनाव भाजपा जीती और सपा और कांग्रेस हार गईं. साल 2027 के विधानसभा चुनाव में भी समाजवादी पार्टी कांग्रेस को कम से कम सीट देने की योजना पर चल रही है. वह सोच रही है कि जातीय राजनीति कर के चुनाव जीत लेगी.
ऐसे में सब से पहले वह मुसलिम तबके को अपने साथ रखना चाहती है. दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी है. वह ब्राह्मण तबके को अपने साथ रख कर चुनाव जीतना चाहती है.
साल 1993 का एक दौर था जब बहुजन समाज पार्टी और समाजवादी पार्टी मिल कर भारतीय जनता पार्टी को रोक रहे थे. सपाबसपा के बीच आपसी टकराव से यह गठबंधन टूट गया. इस के बाद एससी और ओबीसी जातियां एकजुट नहीं हो पाईं.
जिन मुलायम सिंह यादव और कांशीराम को एससी और ओबीसी जातियों के लिए काम करना था, वे मायावती और अखिलेश यादव की राजनीति को स्थापित करने में लग गए. दलित आंदोलन हो या मंडल कमीशन की सिफारिशों को लागू करना, सत्ता की दौड़ में यह पीछे छूट गया.
उत्तर प्रदेश हो या बिहार कांग्रेस ने जाति और धर्म की राजनीति नहीं की. वह हर समाज और संप्रदाय को साथ ले कर चल रही थी. उस के नेताओं ने भले ही इस को बढ़ाने का काम किया था, पर कांग्रेस की नीतियां विकासवादी थीं. जैसेजैसे कांग्रेस का उत्तर प्रदेश और बिहार से खात्मा हुआ, इन दोनों ही प्रदेशों में विकास की जगह जाति और धर्म ने ले ली. यहां विकास ठप हो गया.
उत्तर प्रदेश और बिहार को अब जातिवादी सोच वाले दल नहीं चाहिएजब तक जनता को यह सम? नहीं आएगा, ये दोनों ही प्रदेश विकास में अपने से छोटेछोटे प्रदेशों से पीछे रहेंगे.

Hindi Story: लिफाफे में रसगुल्ला

Hindi Story:अपने देश में मिठाइयों की परंपरा बहुत पुरानी है. शादीब्याह, जन्मदिन, तबादला, चुनाव या कोई भी सैलिब्रेशन हो, मुंह मीठा करना तो बनता ही है. लेकिन मिठाइयां भी कई तरह की होती हैं. कुछ मिठाइयां कागज के डब्बे में आती हैं और कुछ मिठाइयां लिफाफे में आती हैं और लिफाफे में आया हुआ रसगुल्ला बेहद मीठा होता है. यह आधुनिक और विकसित भारत की सब से उन्नत मिठाई है.
यह ऐसी मिठाई है कि इस में चींटी लगती है, डायबिटीज बढ़ती है और ही ब्लड प्रैशर बढ़ता है.

बस, मन मीठा हो जाता है, सिस्टम मीठा हो जाता है. और जो रसगुल्ले लिफाफे में आते हैं, वे साधारण रसगुल्ले नहीं होते हैं. इतने मुलायम और पसंदीदा होते हैं कि इन के लिए नियमकानून खुद पिघल कर आइसक्रीम बन जाते हैं, जमीन पर बिछ जाते हैं. और ये इतने सफेद होते हैं कि काले से काले काम भी सफेदसफेद लगने लगते हैं. इन रसगुल्लों को खाने के बाद अफसर की फाइलें दौड़ने लगती हैं, जनता की अर्जियां इस टेबल से उस टेबल तक उछलकूद करने लगती हैं. जितना भारी लिफाफा, उतनी तेज दौड़ होती है उस फाइल की. देखने और सुनने में यह लिफाफा बहुत ही मासूम और खूबसूरत दिखता है, लेकिन उस पर रसगुल्ला लिखा होता है और ही मिठाई लिखी होती है, लेकिन मीठा पूरा होता है.

उस में खालिस देशी घी के लड्डू जितनी मिठास और काजू कतली के जैसे स्वाद भरे होते हैं. हलका इतना होता है कि जेब में रखा जा सके और भारी इतना होता है कि किसी भी काम का बो? अपने कंधे पर उठा सके. अगर कोई इस लिफाफे के बारे में नहीं जानता और सम?ाता है, तो या तो वह बहुत बड़ा गधा और बेवकूफ है या फिर बहुत ईमानदार है और उस की नईनई भरती हुई है और पानी में रह कर मगरमच्छ से बैर करने के बारे में सोच रहा है, जिस में उस की खैर नहीं है. जिसे ऐसे लिफाफे के बारे में ज्ञान नहीं है, उसे इस ज्ञान की बहुत जरूरत है. नेताजी किसी अफसर के घर जाते हैं, तो कहते हैं, ‘अरे साहब, बस
शगुन है.’ अफसर भी मुसकरा कर जवाब देते हैं, ‘अरे, इस की क्या जरूरत थी,’ जबकि दोनों जानते हैं कि सब से ज्यादा इसी चीज की जरूरत थी. बाकी बातें तो औपचारिकता होती हैं, मेन सैलिब्रिटी तो यही होता है.

फिर वह अफसर बड़े ही सलीके से शगुन को अलमारी में रख देता है, ताकि उस के बच्चों का भविष्य भी मीठामीठा रहे और उस की पत्नी के गले में नौलखा हार सजता रहे. लिफाफा के रसगुल्ले खाने का सब से बड़ा फायदा यह है कि ही इसे रिश्वत कहा जाता है और ही यह कड़वा और बदनाम और संवैधानिक होता है. एक तरह से देखा जाए, तो रिश्वत बहुत ही खराब शब्द हैयह भी कोई कहने का और बोलने का शब्द है. हां, रसगुल्ला कहना सही है. रसगुल्ला संस्कृति है, परंपरा है, मिठास है और जब लिफाफे में रहता है, तो सम्मान भी कहा जा सकता है. उधर ईमानदारी अपना माथा कूटती रहती है कि गलती मेरी ही थी क्या कि मैं ने लिफाफा को पहना और ही रसगुल्ला खा पाई और हिस्से में मेरी सूखी रोटी आई? सब भाषण में ईमानदारी की तारीफ करते हैं, लेकिन खाते समय कोई बांट कर खाना याद नहीं रखता है.

लिफाफे के रसगुल्ले को कमतर मत मानिए, क्योंकि लिफाफे का रसगुल्ला बहुत ही चमत्कारिक होता है. जो कल तक फाइल जांच के अधीन होती है, वह विचाराधीन हो जाती है और परसों मंजूर. अगर कोई भूलेभटके उस फाइल के बारे में पूछ ले, तोप्रोसैस चल रहा हैजैसे जवाब हमेशा तैयार रहते हैं. रसगुल्ला पाचन का तरीका इसे कह सकते हैं. सब से मजेदार बात यह है कि लिफाफे में रसगुल्ले देने वाला और लेने वाला दोनों ही खुद को नैतिकता का पहरेदार मानते हैं. देने वाला सोचता है कि मजबूरी में दे रहा हूं और लेने वाला सोचता है कि अब लक्ष्मी को कौन मना करने जाए. जनता सोचती रह जाती है कि वह क्या करे.
आजकल डिजिटल जमाना है. रसगुल्ले भी स्मार्ट हो गए हैं. पहले हाथ से दिए जाते थे, पर अब सिस्टम के जरीए पहुंचते हैं, पर नाम वही रहता है लिफाफे में रसगुल्ले. तकनीक बदली है, स्वाद नहीं बदला है और ही रसगुल्ले का मिजाज बदला है.

अगर आप को भी ऐसे रसगुल्ले खाने को मिलें, तो बेवकूफों के जैसे छोड़ कर पछताना नहीं. सम?ादार वही है जो लिफाफा खाए और मुंह मीठा होने का दावा भी करे. लेकिन एक बात का ध्यान जरूर रखना कि लिफाफे में रसगुल्ला सुन कर सचमुच लिफाफे में रसगुल्ला मत भेजिएगा, क्योंकि अफसर उसे आप के मुंह पर फेंक देगा. नारियल के चक्कर में नहर में बह गया बच्च उत्तर प्रदेश के ग्रेटर नोएडा में दनकौर के दौला रजपुरा गांव में 27 फरवरी को गंग नहर में बहते नारियल को पकड़ने की कोशिश में.

4 साल का अदनान तेज बहाव में डूब गया. दरअसल, दौला रजपुरा के रहने वाले इसरार का छोटा बेटा अदनान उस शाम को अपने 10 साल के बड़े भाई के साथ नहर किनारे खेल रहा था. उसी समय नहर में एक नारियल तैरता दिखाई दिया. दोनों भाई उसे लेने पानी में उतरे. बड़ा भाई किसी तरह बाहर निकल गया, लेकिन अदनान तेज बहाव के चलते पानी में बह गया. उस के परिवार वालों ने प्रशासन पर देरी करने का आरोप लगाया.

रेखा शाह

Hindi Story: अंधविश्वास

Hindi Story: जातियों को कंट्रोल करने के लिए मांगलिक दोष का डर बिहार के एक छोटे से कसबे में रहने वाली सविता शर्मा पढ़ीलिखी थी. वह नौकरी करती थी और अपने परिवार का सहारा भी थी. उस के लिए शादी के लिए रिश्ते आते थे, बातचीत होती थी, लड़का और लड़की एकदूसरे को पसंद भी कर लेते थे, लेकिन जैसे ही कुंडली मिलाई जाती, एक शब्द पूरे रिश्ते पर भारी पड़ जाता कि लड़कीमांगलिकहै.
इस के बाद सवाल होते, बातचीत. यह पूछा जाता कि सविता कैसी इनसान है. यह कि वह अच्छे जीवनसाथी के तौर पर कितनी जिम्मेदार साबित हो सकती है. बस, इतना कहा जाता कि हम अपने बेटे की जान खतरे में नहीं डाल सकते.

सविता शर्मा हर बार चुपचाप सुन लेती. धीरेधीरे उसे खुद पर शक होने लगा कि क्या सच में वह किसी की जिंदगी के लिए खतरा है? क्या उस के जन्म के समय मंगल ग्रह की किसी स्थिति ने उसे दोषी बना दिया है?
यह कहानी किसी एक सविता शर्मा की नहीं है, बल्कि उन लाखों लड़कियों और लड़कों की है, जिन की जिंदगी पर मांगलिक दोष नाम का एक अनदेखा लेकिन जालिम ठप्पा लगा दिया गया है खासकर ऊंची जातियों में, जिन में अमूमन कुंडली मिलान करने के बाद ही शादी तय होती है. बिना किसी अपराध, बिना किसी सुबूत, सिर्फ एक ज्योतिषीय सोच की बुनियाद पर. यहीं से शुरू होते हैं वे सवाल, जिन्हें पूछने से हमारा समाज आज भी डरता है.

मांगलिक दोष है कितना सच भारतीय समाज में शादी होने केवल 2 लोगों का निजी संबंध नहीं माना जाता, बल्कि उसे परिवार, परंपरा, धर्मजाति, कुलगोत्र और ग्रहनक्षत्रों से जोड़ कर देखा जाता है. इसी सिलसिले में मांगलिक दोष एक ऐसा शब्द बन चुका है, जिस ने असंख्य युवाओं, खासकर महिलाओं के जीवन में भय, अपमान, मानसिक यातना और अस्वीकार की दीवारें खड़ी की हैं. यह दोष केवल विवाह को कठिन बनाता है, बल्कि प्रेम, समानता और व्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे आधुनिक मूल्यों पर भी सीधा प्रहार करता है.
मांगलिक दोष के नाम पर आज भी भारत में रिश्ते टूटते हैं, लड़कियों को अशुभ कहा जाता है, लड़कों को डराया जाता है और परिवारों को मानसिक गुलामी में जकड़ दिया जाता है.

सवाल यह नहीं है कि ज्योतिष में मंगल ग्रह का क्या स्थान है? सवाल यह भी है कि क्या किसी ग्रह की कथित स्थिति के आधार पर किसी मनुष्य के पूरे जीवन को अभिशप्त घोषित कर देना नैतिक, वैज्ञानिक और मानवीय है? मांगलिक दोष क्या है, इस संबंध में पंडित वाचस्पति ने बताया कि ज्योतिषीय मान्यताओं के अनुसार, यदि किसी व्यक्ति की कुंडली में मंगल ग्रह कुछ विशेष भावों पहले, चौथे, सातवें, आठवें या बारहवें भाव में स्थित हो, तो उसे मांगलिक कहा जाता है. यह मान लिया जाता है कि ऐसा व्यक्ति विवाह के लिए अशुभ होता है और उस के जीवनसाथी को कष्ट, बीमारी या मृत्यु तक का सामना करना पड़ सकता है.

यहीं से समस्या शुरू होती है. बिना किसी वैज्ञानिक प्रमाण के, एक अनुमान को सामाजिक सत्य बना दिया गया. यह मान्यता पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही और धीरेधीरे यह भय, अफवाह और सामाजिक दबाव का औजार बन गई. विज्ञान बनाम ज्योतिष आज का युग विज्ञान, तर्क और प्रमाण का युग है. खगोल विज्ञान और ज्योतिष में बुनियादी अंतर है. खगोल विज्ञान ग्रहों की गति, दूरी और भौतिक गुणों का अध्ययन करता है, जबकि ज्योतिष उन ग्रहों को मनुष्य के भाग्य से जोड़ देता है, बिना किसी ठोस वैज्ञानिक आधार के.
अब तक दुनिया में ऐसी कोई वैज्ञानिक स्टडी नहीं हुई है जो यह साबित करे कि मंगल ग्रह की स्थिति शादी, मौत, बीमारी या शादी से जुड़े ?ागड़े की वजह बनती है. अगर मंगल ग्रह सच में इतना असरदार होता, तो एक ही दिन जनमे लाखों लोगों की जिंदगी एक सी होती, लेकिन हकीकत इस से ठीक उलट है.

सफल और असफल विवाह, सुख और दुख, बीमारी और सेहत, ये सब सामाजिक, माली, दिमागी और बायोलोजिकल वजह से जुड़े होते हैं, कि किसी ग्रह की काल्पनिक स्थिति से. मांगलिक दोष के सब से बड़े शिकार भारतीय समाज में मांगलिक दोष का सब से खतरनाक असर लड़कियों पर पड़ता है. मांगलिक लड़की को अकसर मनहूस, अशुभ, खतरनाक जैसे शब्दों से नवाजा जाता है. उस की कुंडली उस के किरदार, उस की तालीम, उस की काबिलीयत से बड़ी मान ली जाती है. कई परिवारों में मांगलिक लड़की की शादी देर से होती है या उसे जबरन किसी ऐसे लड़के से ब्याह दिया जाता है, जिसे भी मांगलिक बताया गया हो. चाहे उन दोनों की सोच, पढ़ाईलिखाई या जिंदगी को सम?ाने के नजरिए में कोई तालमेल हो.ऐसे हालात में लड़की की नई सोच और आत्मसम्मान पर सीधा हमला होता है. उसे यह भरोसा दिला दिया जाता है कि वह अपने जीवनसाथी के लिए खतरा है. यह मानसिक हिंसा का एक गहरा और अनदेखा रूप है.

दिमागी सेहत पर असर
मांगलिक दोष के डर से पीडि़त नौजवान डिप्रैशन और चिंता का शिकार हो जाते हैं. कई लड़कियां यह मानने लगती हैं कि वे अपने पति की मौत की वजह बन सकती हैं. यह सोच उन के आत्मविश्वास को तोड़ देती है और जिंदगी को बो? बना देती है. कुछ मामलों में मांगलिक होने का ठप्पा खुदकुशी जैसे खतरनाक कदमों तक ले गया है. सवाल यह है कि क्या एक अप्रमाणित सोच किसी की जान से ज्यादा कीमती है?

धार्मिकता या सामाजिक कंट्रोल
अकसर मांगलिक दोष को धर्म से जोड़ कर उसे सवालों से परे रखा जाता है, लेकिन सच यह है कि यह धार्मिक आस्था से ज्यादा सामाजिक कंट्रोल का उपकरण बन चुका है. ब्याह के बाजार में यह दोष सौदेबाजी का हथियार बन जाता हैदहेज बढ़ाने, लड़की को नीचा दिखाने या रिश्ते तोड़ने के लिए.
मांगलिक दोष और पाखंड सब से बड़ा विरोधाभास यह है कि मांगलिक दोष को उपायों से खत्म किया जा सकता है.
ज्योतिषी द्वारा यह बताया जाता है कि मांगलिक लड़कियों का ग्रह से छुटकारा पाने के लिए पेड़ या मूर्ति से ब्याह पहले किया जाता है, खास तरह का पूजापाठ कराया जाता है. पर अगर कोई दोष इतना घातक है कि वह मौत तक करा सकता है, तो वह किसी पेड़ या मूर्ति से शादी कर के कैसे खत्म हो सकता है? यह साफ करता है कि मांगलिक दोष एक डर पैदा करने वाला सिद्धांत है, जिसे बाद में आर्थिक और धार्मिक पाखंड से जोड़ा गया.

कानून का नजरिया
भारतीय संविधान लोगों की बराबरी, इज्जत और आजादी की गारंटी देता है. किसी इनसान को ग्रहों की बुनियाद पर भेदभाव का शिकार बनाना, उस की शादी के हक को सीमित करना या मानसिक पीड़ा देना, संवैधानिक वैल्यू के खिलाफ है. हालांकि, कानून सीधे मांगलिक दोष को नहीं पहचानता, लेकिन इस के चलते होने वाला भेदभाव, दहेज, मानसिक हिंसा और सामाजिक बहिष्कार कानूनन अपराध की श्रेणी में सकते हैं.
तालीम और वैज्ञानिक सोच का रोल मांगलिक दोष जैसे अंधविश्वासों के खिलाफ सब से बड़ा हथियार पढ़ाईलिखाई है. वैज्ञानिक सोच, तर्कभरी बातें और सवाल करने की आदत समाज को इस डर से दूर कर सकती हैं. आज जरूरी है कि स्कूलकालेजों और सामाजिक मंचों पर यह चर्चा खुले रूप में हो कि शादी की बुनियाद ग्रह नहीं, बल्कि आपसी सम?, इज्जत और जिम्मेदारी होनी चाहिए.

नई पीढ़ी और बदलाव की उम्मीद
अच्छा संकेत यह है कि शहरी और पढ़ेलिखे नौजवानों में मांगलिक दोष की पकड़ कमजोर पड़ रही है. प्रेम विवाह, अंतर्जातीय विवाह और बराबरी की बुनियाद पर खड़े रिश्ते इस अंधविश्वास को चुनौती दे रहे हैं.
लेकिन यह बदलाव अभी अधूरा है. गांवदेहात के इलाकों और पारंपरिक परिवारों में आज भी यह डर गहराई से मौजूद है, इसलिए लड़ाई लंबी है, लेकिन लड़नी जरूरी है.

मांगलिक दोष के विरोध का मतलब
मांगलिक दोष का विरोध केवल ज्योतिष का विरोध नहीं है, बल्कि यह विरोध है मर्द और औरत की बराबरी के पक्ष में, वैज्ञानिक सोच के समर्थन में, मानसिक आजादी के लिए, शादी को इनसानी संबंध मानने के लिए, कि यह ग्रहों का खेल है. यह विरोध उस सिस्टम के खिलाफ है, जो डर पैदा कर के लोगों को कंट्रोल करता है, उन्हें बुजदिल बनाता है. ग्रह नहीं, इनसान जिम्मेदार हैं,
किसी भी शादी की कामयाबी या नाकामी की वजह कोई ग्रह नहीं, बल्कि इनसान होते हैं. उन की सोच, उन का बरताव, उन के हालात होते हैं. जब हम यह जिम्मेदारी ग्रहों पर डाल देते हैं, तो हम खुद से भागते हैं.
मांगलिक दोष जैसा अंधविश्वास एक सामाजिक भरम है, जिसे मिटाना बहुत ज्यादा जरूरी है. यह केवल लोगों की निजी आजादी का सवाल है, बल्कि एक ज्यादा बेहतर समाज बनाने की शर्त भी है.
जब तक हम यह नहीं सम?ोंगे कि इनसान का भविष्य किसी ग्रह की स्थिति से नहीं, बल्कि उस के काम, फीलिंग्स और सामाजिक ढांचे से बनता है, तब तक मांगलिक दोष जैसे अंधविश्वास हमारी जिंदगी पर ग्रहण बन कर छाए रहेंगे. अब समय गया है कि हम उस ग्रहण को हटाएं.                      

Political Story: इजराइल, अमेरिका, ईरान की रंगदारी दुनिया पर है भारी

Political Story: आ विजय ने अनामिका से मिलने का प्रोग्राम बनाया था. दोनों मिले भी, पर अनामिका का मूड कुछ उखड़ा हुआ था.
‘‘तुम्हारा चेहरा क्यों लटका हुआ है? क्या हुआ?’’ विजय ने पूछा.
‘‘यार, हमारे गांव में लफड़ा हो
गया है,’’ अनामिका बु? हुई आवाज में बोली.
‘‘लफड़ा मतलब? अंकल और आंटी ठीक तो हैं ?’’ विजय को चिंता हुई.
‘‘तुम तो जानते हो कि पापा का मछली का कारोबार है. हुआ यों कि वहां एक रंगदार है, जो हर किसी पर रोब जमाने के लिए धमकी देता था,’’ अनामिका बोली.

‘‘क्या उस ने अंकल से कुछ कह दिया?’’ विजय ने बीच में ही टोक कर कहा. ‘‘अरे नहीं, बल्कि एक दूसरे रंगदार ने मछली से भरी उस की नाव डुबो दी. पर वे मछलियां हमारी थीं. बैठेबिठाए पापा का नुकसान हो गया. अब पापा भी बदले की आग में गया,’’ अनामिका बोली. ‘‘ओह, यह तो बहुत बुरा हुआ. पर आजकल पूरी दुनिया में यही हो रहा है.’’

‘‘मतलब?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘इजराइल, अमेरिका और ईरान का युद्ध भी तो अपने दबदबे की लड़ाई है. इस सब में पिस वे देश और लोग रहे हैं, जिन्हें यह युद्ध चाहिए ही नहीं. कल तक शांति का नोबल पुरस्कार मांगने वाले डोनाल्ड ट्रंप ने पूरी दुनिया में खलबली मचा दी है. बस, किसी तरह अमेरिका सब से ज्यादा ताकतवर बन जाए, यही तो डोनाल्ड ट्रंप चाहता है.’’
‘‘अच्छा, यह बताओ कि ईरान और इजराइल का असली मसला क्या है? कोई तो इतिहास होगा , जो आज ये दोनों देश युद्ध की आग में खुद तो ?ालस रहे हैं, साथ ही और भी कई दूसरे देशों को बरबाद कर रहे हैं,’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘सोशल मीडिया पर तो तरहतरह के दावे किए जा रहे हैं, पर मैं उन पर ज्यादा यकीन नहीं करता. लेकिनजनसत्ताकी एक रिपोर्ट ने मेरा ध्यान जरूर अपनी तरफ खींचा. उस के मुताबिक, मध्यपूर्व में ईरान और इजराइल के बीच तनाव कोई नई बात नहीं है. यह संघर्ष दशकों पुराना है, जो समयसमय पर युद्ध जैसे हालात पैदा करता रहा है,’’ विजय ने अनामिका से कहा.

‘‘मुझे जरा पूरी बात समझा,’’ अनामिका बीच में ही बोली.
‘‘मेरी पूरी बात तो सुन लो तुमहां, तो मैं कह रहा था कि हाल के दिनों में यह टकराव (ईरान और इजराइल के बीच) और ज्यादा खतरनाक हो गया और अमेरिका और इजराइल ने शनिवार, 28 फरवरी, 2026 को ईरान पर हमला कर दिया.’’
‘‘टकराव तो ईरान और इजराइल के बीच है, फिर अमेरिका क्यों चौधरी बना?’’ अनामिका बोली.
‘‘इस हालिया युद्ध पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कहा कि इस सैनिक कार्रवाई का मकसद अमेरिका के लिए पैदा हुए सिक्योरिटी खतरे को खत्म करना है और ईरान के लोगों को अपने शासकों के खिलाफ खड़े होने का मौका देना है.
‘‘लेकिन अमेरिका, इजराइल और ईरान के इन हमलों के बाद क्षेत्र के तेल उत्पादक खाड़ी देशों में चिंता बढ़ गई, क्योंकि पूरे इलाके में संघर्ष के और बढ़ने का खतरा पैदा हो गया. वहीं इजराइल
ने कहा कि इस के जवाब में ईरान ने इजराइल की ओर मिसाइलें दागीं.

‘‘ईरान ने भी जवाबी हमला करते हुए चेतावनी दी कि वह इस कार्रवाई का बदला लेगा. ईरान की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के सचिव अली लारीजानी ने शनिवार, 28 फरवरी, 2026 को कहा कि इजराइल और अमेरिका को अपने इस कदम पर पछताना पड़ेगा.’’
‘‘लेकिन तुम ने बताया नहीं कि ईरान और इजराइल विवाद आखिर है क्या और क्यों पूरा मिडिल ईस्ट अब
इस संघर्ष को ?ोल रहा है?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘खबरों के मुताबिक, ईरान और इजराइल के बीच दुश्मनी की असली शुरुआत 1979 की ईरानी क्रांति के बाद हुई. इस क्रांति से पहले ईरान पर मोहम्मद रजा पहलवी का राज था और उस समय ईरान और इजराइल के रिश्ते सामान्य ही नहीं, बल्कि काफी सहयोगी भी थे. दोनों देशों के बीच व्यापार, खुफिया सहयोग और सैन्य संपर्क मौजूद थे.

‘‘लेकिन 1979 में क्रांति होने के
बाद रुहोल्ला खोमैनी की अगुआई में ईरान में इसलामिक राज आया. नई सरकार ने अपनी विदेश नीति पूरी तरह बदल दी. ईरान ने इजराइल को मान्यता देने से साफ इनकार कर दिया और उसेअवैध राज्यबताते हुए अपना प्रमुख दुश्मन घोषित कर दिया.
‘‘इस के बाद ईरान ने फिलिस्तीन के समर्थन को अपनी नीति का अहम हिस्सा बना लिया. इसी वजह से उस ने हिजबुल्लाह और हमास जैसे समूहों को राजनीतिक और सैन्य समर्थन देना शुरू किया, जो इजराइल के खिलाफ संघर्ष करते हैं. इजराइल ने ईरान के परमाणु कार्यक्रम को अपनी सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बताया. यहीं से दोनों देशों के बीचशैडो वारका दौर शुरू हो गया.’’
‘‘अब यहशैडो वारक्या बला है?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘दरअसल, पिछले 20 सालों में इन दोनों देशों ने सीधे युद्ध के बजाय कई अप्रत्यक्ष तरीके अपनाए. इन में साइबर हमले, वैज्ञानिकों की हत्या, सीरिया और लेबनान में प्रौक्सी मिलिशिया (जैसे ईरान समर्थित हिजबुल्लाह या हूती, जो सीधे युद्ध में शामिल हुए बिना राज्य को फायदा पहुंचाते हैं) के जरीए हमले शामिल हैं. पिछले कुछ सालों के दौरान इजराइल कई बार सीरिया में ईरान समर्थित ठिकानों पर एयरस्ट्राइक करता रहा है.’’

‘‘तो फिर अमेरिका क्यों इस युद्ध में कूदा?’’ अनामिका ने सवाल किया.
‘‘28 फरवरी को जब अमेरिका और इजराइल ने ईरान पर बमबारी शुरू
की, तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान
पर आरोप लगाया कि वह ऐसे परमाणु हथियार बना रहा है, जो अमेरिकी सहयोगियों के लिए खतरा हैं और जल्द ही अमेरिका तक पहुंच सकते हैं.
‘‘हालांकि, 2 मार्च को अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो ने कहा कि प्रशासन को पता था कि इजराइल ईरान के खिलाफ कार्रवाई करने वाला है और ईरान इस के बाद अमेरिका को भी निशाना बनाता. इस वजह से अमेरिका को उस पर हमला करने की पहल करनी पड़ी,’’ विजय बोला.
‘‘यह बात कुछ हजम नहीं हुई. मु? लगता है कि ईरान, इजराइल और अमेरिका हमारे गांव के दबंग जैसे हैं, जो अपने निजी फायदे के लिए पूरी दुनिया के लिए सिरदर्द बन रहे हैं. इन की रंगदारी पूरी दुनिया के लिए खतरनाक साबित हो रही है,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम सच कह रही हो. 28 फरवरी को जब यह संघर्ष शुरू हुआ, तो किसी ने नहीं सोचा था कि महज एक हफ्ते के भीतर यह 14 देशों तक फैल जाएगा. एक तरफ जहां अमेरिका केआपरेशन एपिक फ्यूरीऔर इजरायल केरोरिंग लायनअभियान के तहत ईरान के सैन्य ठिकानों पर बड़े हमले हुए हैं, वहीं दूसरी तरफ ईरान ने भी अपनी पूरी ताकत ?ांकते हुए खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों पर मिसाइलों की बौछार की.
‘‘खबरों की मानें तो ईरान के सर्वोच्च नेता आयतुल्ला खामेनेई की मौत की खबरों से ले कर स्ट्रेट औफ होर्मुज की नाकाबंदी तक, इस एक हफ्ते ने दुनिया का नक्शा और समीकरण दोनों बदल दिए हैं. आसमान में आधुनिक फाइटर जैट्स के बीच सीधी भिड़ंत हो रही है, तो समंदर में युद्धपोत डूब रहे हैं. तबाही का आलम यह है कि 14 देश अब इस जंग का मैदान बन चुके हैं और हर बीतते दिन के साथ खतरा और गहरा होता जा रहा है.

‘‘जंग की शुरुआत अमेरिका और इजराइल के एक बेहद सटीक और सा? हमले से हुई. अमेरिका ने इसेएपिक फ्यूरीकहा, तो इजराइल ने इसेरोरिंग लायननाम दिया. इस हमले में 100 से ज्यादा लड़ाकू विमानों और भारी मिसाइलों का इस्तेमाल किया गया. टारगेट बिलकुल साफ था, ईरान की सरकारी इमारतें, राष्ट्रपति का घर और सुप्रीम लीडर का दफ्तर. देखते ही देखते खबर आई कि ईरान के सब से बड़े नेता आयतुल्ला अली खामेनेई इस हमले में मारे गए हैं.
‘‘दूसरी तरफ ईरान ने भी एक घंटे के भीतर ही जोरदार जवाब दिया. ईरान की सेना ने इजराइल और खाड़ी देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइलों और ड्रोनों से हमला बोला. इस कार्रवाई की रेंज में दुबई के कुछ प्रमुख पर्यटन स्थल भी रहे, जिन्हें निशाना बनाया गया था.

‘‘इसी दौरान ईरान के मीनाब इलाके में एक प्राइमरी स्कूल पर हमला हुआ, जिस में 165 मासूम लड़कियों की जान चली गई. इसे इस संघर्ष की अब तक की सब से बड़ी त्रासदी माना गया.
‘‘इसी दौरान ईरान के अंदर से 2 अलग तसवीरें सामने आईं. खामेनेई की मौत ने देश के लोगों को 2 हिस्सों में बांट दिया था. तेहरान में जहां लोग काले कपड़े पहन कर मातम मना रहे थे, वहीं करज में लोग अपनी गाडि़यां ले कर सड़कों पर उतर आए थे और हौर्न बजा कर अपनी खुशी जाहिर कर रहे थे.
‘‘जंग के तीसरे दिन तक यह लड़ाई सिर्फ 2-3 देशों के बीच नहीं रह गई थी, बल्कि धीरेधीरे इस में कुल
12 देश शामिल हो चुके थे. जैसेजैसे समय बीत रहा था, युद्ध का
मैदान और बड़ा होता जा रहा था. लेबनान के संगठन हिज्बुल्लाह ने मोरचा खोलते हुए इजराइल पर ताबड़तोड़ मिसाइलें दागनी शुरू कर दीं.

‘‘इजराइल ने भी इस का करारा जवाब दिया और बेरूत पर भीषण हवाई हमले किए, जिस में 31 लोगों की जान चली गई. तनाव इतना बढ़ गया कि पूरे मिडिल ईस्ट में सिर्फ धुएं का गुबार और सायरन की आवाजें सुनाई दे रही थीं.
‘‘इसी बीच ईरान ने सऊदी अरब की रास तनुरा रिफाइनरी को निशाना बनाया. इस हमले का मकसद साफ था दुनियाभर की ऊर्जा आपूर्ति को संकट में डालना. इसी अफरातफरी और भारी तनाव के बीच कुवैत से भी एक बड़ी खबर आई, जहां अमेरिका के 3 लड़ाकू विमान तकनीकी खराबी या आपसी टक्कर की वजह से क्रैश हो गए. अमेरिकी प्रशासन ने बाद में इसेफ्रैंडली फायर
यानी अपनी ही चूक से हुआ हादसा करार दिया.’’
‘‘क्या नाम दिया हैफ्रैंडली फायर’. शब्दों से खेलना तो कोई सियासी लोगों से सीखे. इन के
लिए लोगों का आग में ?ालस कर मर जाना भीफायरफ्रैंडलीहै,’’ अनामिका बोली.
‘‘अगर आगे के युद्ध की बात करें तो ईरान ने स्ट्रेट औफ होर्मुज को पूरी तरह बंद करने का ऐलान कर दिया. आप को बता दें कि यह वही समुद्री रास्ता है, जहां से दुनिया का तकरीबन 20 फीसदी तेल गुजरता है.

‘‘ईरान के इस फैसले ने इंटरनैशनल बाजार में खलबली मचा दी और कच्चे तेल की कीमतों को ले कर हर तरफ हाहाकार मच गया. ईरान यहीं नहीं रुका, उस ने रियाद और कुवैत में मौजूद अमेरिकी दूतावासों पर ड्रोन से हमले कर दिए, जिस से वहां कामकाज पूरी तरह ठप हो गया और डिप्लोमैटिक हलकों में सन्नाटा पसर गया.
‘‘इधर, युद्ध के मैदान में इजराइल ने अपनी नई और घातक तकनीकआयरन बीमका पहली बार इस्तेमाल किया. यह एक आधुनिक लेजर डिफैंस सिस्टम है, जिस ने हिज्बुल्लाह की तरफ से दागे गए रौकेटों को पलक ?ापकते ही हवा में जला कर राख कर दिया.
‘‘वहीं दूसरी ओर, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने कड़े तेवर दिखाते हुए साफ कर दिया कि फिलहाल किसी भी तरह के सम?ाते या युद्धविराम की कोई गुंजाइश नहीं है.

‘‘ट्रंप ने चेतावनी दी कि यह जंग अभी थमने वाली नहीं है और यह 5 हफ्ते से भी ज्यादा खिंच सकती है. भारत जैसे देशों के लिए यह खबर किसी बड़े ?ाटके से कम नहीं थी, क्योंकि खाड़ी देशों से तेल की सप्लाई रुकने का सीधा मतलब था देश में पैट्रोल और डीजल के दामों का आसमान पर पहुंच जाना.
‘‘फिर तो युद्ध का दायरा सिर्फ खाड़ी देशों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि यह हिंद महासागर और यूरोप की दहलीज तक जा पहुंचा. युद्ध में एक बड़ा मोड़ तब आया, जब तुर्की की ओर बढ़ रही एक ईरानी मिसाइल को नाटो के एयर डिफैंस सिस्टम ने बीच हवा में ही मार गिराया. नाटो के इस सीधे दखल ने पूरी दुनिया को चौंका दिया और यह साफ कर दिया कि अब यह जंग और भी बड़े लैवल पर फैल सकती है.
‘‘उधर, हिंद महासागर के गहरे पानी में एक और खौफनाक मंजर देखने को मिला. यहां एक अमेरिकी पनडुब्बी ने ईरान के शक्तिशाली युद्धपोतआईआरआईएस डेनाको टारपीडो से निशाना बनाया और उसे समंदर में डुबो दिया.

‘‘सब से दुखद बात यह रही कि यह ईरानी जहाज भारत में एक नौसैनिक अभ्यास पूरा कर के वापस लौट रहा था. इस अचानक हुए हमले में 87 ईरानी नाविकों की जान चली गई, जिस से हड़कंप मच गया.
‘‘इधर, इजराइली वायु सेना ने भी अपने तेवर और कड़े कर लिए. हालात इतने बिगड़ते देख, कई यूरोपीय देशों ने अपनी सुरक्षा को ले कर अपनी सेनाएं और जंगी जहाज मिडिल ईस्ट की ओर रवाना करना शुरू कर दिए. माहौल ऐसा बन चुका था कि पूरा इलाका मानो एक बारूद के ढेर पर बैठा हो, बस एक छोटी सी चिनगारी ही इसे पूरी तबाही में बदलने के लिए काफी थी.
‘‘इस के बाद इस महाजंग की आग अजरबैजान तक भी पहुंच गई. वहां के एक हवाईअड्डे पर हुए ड्रोन हमले में 4 लोग घायल हो गए, जिस से काकेशस क्षेत्र में भी तनाव चरम पर पहुंच गया.
स्ट्रेट औफ होर्मुज बंद होने का असर भी अब साफ दिखने लगा था, जिस के चलते समंदर में तेल टैंकरों की आवाजाही 90 फीसदी तक गिर गई थी. इस का नतीजा यह हुआ कि इंटरनैशनल बाजार में कच्चे तेल के दाम बेकाबू होने लगे और पूरी दुनिया में महंगाई का डर सताने लगा.

‘‘लेकिन तभी सब से बड़ी खबर आई वाशिंगटन से, जहां राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हथियार बनाने वाली बड़ी कंपनियों के साथ मीटिंग की और ईरान को खुली चेतावनी दे दी. ट्रंप ने दो टूक कहा, ‘अब ईरान के साथ कोई बातचीत या नई डील नहीं होगी. अगर बचना है, तो बिना शर्त सरैंडर करना होगा’. उन्होंने यह भी कहा कि वे ईरान की अर्थव्यवस्था को सुधार देंगे, लेकिन पहले उसे घुटने टेकने होंगे,’’ विजय ने अपनी बात पूरी की.
‘‘तुम ने एक बात और नोटिस की?’’ अनामिका ने पूछा.
‘‘क्या?’’ विजय ने थोड़ा हैरान हो कर कहा.
‘‘इस युद्ध में सोशल मीडिया ने भी बहुत अड़ंगा लगाया है. पहले जब युद्ध होते थे तो उन से जुड़ी प्रैस रिलीज में गंभीरता से सारी बात लिखी होती थी और भाषा भी बड़ी सधी हुई होती थी. लेकिन अब जब सेएक्सया दूसरे सोशल मीडिया हैंडल पर बड़ेबड़े
नेताओं के बयान आते हैं, तो वे
भड़काऊ या बचकाने ज्यादा लगते हैं,’’ अनामिका बोली.
‘‘जैसे?’’ विजय ने पूछा.
‘‘यह युद्ध शुरू होने से पहले अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने
सोशल मीडिया (ट्रुथ सोशल) पर ईरान के खिलाफ आक्रामक बयान दिए थे, जिस में उन्होंने ईरान सेबिना शर्त आत्मसमर्पणकी मांग की थी.‘‘उन्होंने दावा किया था कि ईरान की सैन्य क्षमता नष्ट हो चुकी है और वे ईरानी जनता को शासन बदलने के लिए प्रेरित कर रहे हैं, साथ ही किसी भी हमले की हालत में विनाशकारी नतीजे की चेतावनी दी थी.

‘‘यह बयान अपनेआप में बड़ा विनाशकारी बना और आज नतीजा देख लो कि कितने देश बिना किसी वजह के युद्ध की आग में ?ांक दिए गए हैं. मैं तो इजराइल, अमेरिका और ईरान तीनों को अपने गांव के रंगदारों जैसा ही गुंडा मानती हूं, जो अपने फायदे के लिए दूसरे का नुकसान करने से भी बाज नहीं आते हैं,’’ अनामिका बोली. ‘‘तुम्हारी बात में दम है. सोशल मीडिया ने हमें शब्दों और विचारों से पंगु बना दिया है. चार लाइनें लिख दो, बस हो गया काम खत्म. पढ़ने और लिखने की तो जैसे आदत ही नहीं रही है. यह ट्रैंड नई पीढ़ी के लिए खतरनाक साबित हो सकता है. इमोशनल हो कर सोशल मीडिया पर कुछ भी लिख दो, फिर भुगतो ट्रोल सेना को.
‘‘मुझे लगता है कि इन तीनों देशों के लोग पढ़नेलिखने से ज्यादा सोशल मीडिया पर यकीन करते हैं. एक्स हैंडल तो जैसे दिल का गुबार निकालने का औजार बन गया है.
‘‘तुम्हें याद होगी भारत की आजादी की लड़ाई और महात्मा गांधी के वे लेख जोनवजीवनऔरहरिजनअखबारों में लिखे जाते थे. ज्यादातर तो गुजराती भाषा में होते थे. बाद में उन के अनुवाद दूसरी भाषाओं में और अखबारों में छपते थे.

‘‘ऐसे लेखों में विचार बड़े संतुलित होते थे, शब्द बड़े मारक होते थे, जनता के हित लिए होते थे, पर आज सोशल मीडिया पर किसी बात पर भरोसा नहीं किया जा सकता. हर कोई कुछ भी लिख मारता है, चाहे काम का हो नहीं,’’ विजय ने अपनी भड़ास निकाली.
‘‘तुम सही कह रहे हो. लोगों को खुद समझना होगा कि सोशल मीडिया उन की लिखने की ताकत की हत्या कर रहा हैचलो, देखते हैं कि यह युद्ध का ऊंट किस करवट बैठेगा. उम्मीद है कि यह लड़ाई जल्दी खत्म हो और इन तीनों रंगदारों से दुनिया को नजात मिले,’’ अनामिका बोली.
‘‘तुम अपने पापा को कहो कि कारोबार का जो भी नुकसान हुआ है, उसे भूल जाएं और वहां के रंगदारों से बातचीत कर के बीच का कोई रास्ता निकालें, क्योंकि इस तरह की दुश्मनी से कुछ हासिल नहीं होगा,’’ विजय ने अपनी राय दी.

‘‘मैं जरूर करूंगी पापा से बात,’’ अनामिका ने अनमने मन से कहा.औनलाइन सट्टे में मिली हार, परिवार पर किया जानलेवा वार मुनचुन नाम का एक शख्स अपने परिवार के साथ दिल्ली में समयपुर बादली में सिरसपुर के चंदन पार्क में किराए के मकान पर रहता था.
उसे सट्टेबाजी की बुरी लत लग गई थी. वह पैसा कमाता और सट्टेबाजी में गंवा देता था. गंवाया हुआ पैसा वापस पाने के लिए उस ने कर्ज ले कर सट्टा लगाया, लेकिन वे भी पैसे डूब गए. वह पूरी तरह से कर्ज में डूब गया था. फिर उस ने एक कांड कर दिया. पुलिस ने उसे पकड़ा तो अपने कुबूलनामे में उस ने बताया कि वह क्रिकेट में सट्टा लगाता था. अचानक उस के पास एक फोन आया, जिस के बाद उस ने अपनी और अपने परिवार की जिंदगी खत्म करने का फैसला कर लिया. बाजार से कटहल काटने के नाम पर 90 रुपए का चाकू खरीद कर लाया और पत्नी समेत 3 बेटियों का गला काट कर उन्हें मौत के घाट उतार दिया. आरोपी का कहना है कि वह खुद भी खुदकुशी करना चाहता था, लेकिन कर नहीं सका.

हरियाणा में महिला के नाम पर गाड़ी लेने से मिलेगी छूट हरियाणा सरकार ने बजट 2026-27 में दी गई राहतों के तहत एक घोषणा यह भी की है कि अगर कोई परिवार अपनी पत्नी, बेटी या मां के नाम पर गैरपरिवहन (निजी उपयोग) गाड़ी रजिस्टर करवाता है, तो मोटर वाहन टैक्स में एक फीसदी की छूट मिलेगी. यह लाभ कार, स्कूटर या दूसरे निजी वाहनों पर लागू होगा. इस पहल का उद्देश्य महिलाओं के नाम पर संपत्ति बढ़ाना और उन की आर्थिक भागीदारी को मजबूत करना है.

Hindi Story: शिकार-काव्या पर क्यों टूटा दुख का पहाड़

Hindi Story: वहीं दूसरी ओर काव्या गोरीचिट्टी, छरहरे बदन की गुडि़या सी दिखने वाली एक भोलीभाली, मासूम सी लड़की थी. मुश्किल से अभी उस ने 20वां वसंत पार किया होगा. कुछ महीने पहले दुख क्या होता है, तकलीफ कैसी होती है, वह जानती तक न थी.

मांबाप के प्यार और स्नेह की शीतल छाया में काव्या बढि़या जिंदगी गुजार रही थी, पर दुख की एक तेज आंधी आई और उस के परिवार के सिर से प्यार, स्नेह और सुरक्षा की वह पिता रूपी शीतल छाया छिन गई.

अभी काव्या दुखों की इस आंधी से अपने और अपने परिवार को निकालने के लिए जद्दोजेहद कर ही रही थी कि एक नई समस्या उस के सामने आ खड़ी हुई.

उस दिन काव्या अपनी नईनई लगी नौकरी पर पहुंचने के लिए घर से थोड़ी दूर ही आई थी कि उस आदमी ने उस का रास्ता रोक लिया था.

एकबारगी तो काव्या घबरा उठी थी, फिर संभलते हुए बोली थी, ‘‘क्या है?’’

वह उसे भूखी नजरों से घूर रहा था, फिर बोला था, ‘‘तू बहुत ही खूबसूरत है.’’

‘‘क्या मतलब…?’’ उस की आंखों से झांकती भूख से डरी काव्या कांपती आवाज में बोली.

‘‘रंजन नाम है मेरा और खूबसूरत चीजें मेरी कमजोरी हैं…’’ उस की हवस भरी नजरें काव्या के खूबसूरत चेहरे और भरे जिस्म पर फिसल रही थीं, ‘‘खासकर खूबसूरत लड़कियां… मैं जब भी उन्हें देखता हूं, मेरा दिल उन्हें पाने को मचल उठता है.’’

‘‘क्या बकवास कर रहे हो…’’ अपने अंदर के डर से लड़ती काव्या कठोर आवाज में बोली, ‘‘मेरे सामने से हटो. मुझे अपने काम पर जाना है.’’

‘‘चली जाना, पर मेरे दिल की प्यास तो बुझा दो.’’

काव्या ने अपने चारों ओर निगाह डाली. इक्कादुक्का लोग आजा रहे थे. लोगों को देख कर उस के डरे हुए दिल को थोड़ी राहत मिली. उस ने हिम्मत कर के अपना रास्ता बदला और रंजन से बच कर आगे निकल गई.

आगे बढ़ते हुए भी उस का दिल बुरी तरह धड़क रहा था. ऐसा लगता था जैसे रंजन आगे बढ़ कर उसे पकड़ लेगा.

पर ऐसा कुछ नहीं हुआ. उस ने कुछ दूरी तय करने के बाद पीछे मुड़ कर देखा. रंजन को अपने पीछे न पा कर उस ने राहत की सांस ली.

काव्या लोकल ट्रेन पकड़ कर अपने काम पर पहुंची, पर उस दिन उस का मन पूरे दिन अपने काम में नहीं लगा. वह दिनभर रंजन के बारे में ही सोचती रही. जिस अंदाज से उस ने उस का रास्ता रोका था, उस से बातें की थीं, उस से इस बात का आसानी से अंदाजा लगाया जा सकता था कि रंजन की नीयत ठीक नहीं थी.

शाम को घर पहुंचने के बाद भी काव्या थोड़ी डरी हुई थी, लेकिन फिर उस ने यह सोच कर अपने दिल को हिम्मत बंधाई कि रंजन कोई सड़कछाप बदमाश था और वक्ती तौर पर उस ने उस का रास्ता रोक लिया था.

आगे से ऐसा कुछ नहीं होने वाला. लेकिन काव्या की यह सोच गलत साबित हुई. रंजन ने आगे भी उस का रास्ता बारबार रोका. कई बार उस की इस हरकत से काव्या इतनी परेशान हुई कि उस का जी चाहा कि वह सबकुछ अपनी मां को बता दे, लेकिन यह सोच कर खामोश रही कि इस से पहले से ही दुखी उस की मां और ज्यादा परेशान हो जाएंगी. काश, आज उस के पापा जिंदा होते तो उसे इतना न सोचना पड़ता.

पापा की याद आते ही काव्या की आंखें नम हो उठीं. उन के रहते उस का परिवार कितना खुश था. मम्मीपापा और उस का एक छोटा भाई. कुल 4 सदस्यों का परिवार था उस का.

उस के पापा एक ट्रांसपोर्ट कंपनी में काम करते थे और उन्हें जो पैसे मिलते थे, उस से उन का परिवार मजे में चल रहा था. जहां काव्या अपने पापा की दुलारी थी, वहीं उस की मां उस से बेहद प्यार करती थीं.

उस दिन काव्या के पापा अपनी कंपनी के काम के चलते मोटरसाइकिल से कहीं जा रहे थे कि पीछे से एक कार वाले ने उन की मोटरसाइकिल को तेज टक्कर मार दी.

वे मोटरसाइकिल से उछले, फिर सिर के बल सड़क पर जा गिरे. उस से उन के सिर के पिछले हिस्से में बेहद गंभीर चोट लगी थी.

टक्कर लगने के बाद लोगों की भीड़ जमा हो गई. भीड़ के दबाव के चलते कार वाले ने उस के घायल पापा को उठा कर नजदीक के एक निजी अस्पताल में भरती कराया, फिर फरार हो गया.

पापा की जेब से मिले आईकार्ड पर लिखे मोबाइल से अस्पताल वालों ने जब उन्हें फोन किया तो वे बदहवास अस्पताल पहुंचे, पर वहां पहुंच कर उन्होंने जिस हालत में उन्हें पाया, उसे देख कर उन का कलेजा मुंह को आ गया.

उस के पापा कोमा में जा चुके थे. उन की आंखें तो खुली थीं, पर वे किसी को पहचान नहीं पा रहे थे.

फिर शुरू हुआ मुश्किलों का न थमने वाला एक सिलसिला. डाक्टरों ने बताया कि पापा के सिर का आपरेशन करना होगा. इस का खर्च उन्होंने ढाई लाख रुपए बताया.

किसी तरह रुपयों का इंतजाम किया गया. पापा का आपरेशन हुआ, पर इस से कोई खास फायदा न हुआ. उन्हें विभिन्न यंत्रों के सहारे एसी वार्ड में रखा गया था, जिस की एक दिन की फीस 10,000 रुपए थी.

धीरेधीरे घर का सारा पैसा खत्म होने लगा. काव्या की मां के गहने तक बिक गए, फिर नौबत यहां तक आई कि उन के पास के सारे पैसे खत्म हो गए.

बुरी तरह टूट चुकी काव्या की मां जब अपने बच्चों को यों बिलखते देखतीं तो उन का कलेजा मुंह को आ जाता, पर अपने बच्चों के लिए वे अपनेआप को किसी तरह संभाले हुए थीं. कभीकभी उन्हें लगता कि पापा की हालत में सुधार हो रहा है तो उन के दिल में उम्मीद की किरण जागती, पर अगले ही दिन उन की हालत बिगड़ने लगती तो यह आस टूट जाती.

डेढ़ महीना बीत गया और अब ऐसी हालत हो गई कि वे अस्पताल के एकएक दिन की फीस चुकाने में नाकाम होने लगे. आपस में रायमशवरा कर उन्होंने पापा को सरकारी अस्पताल में भरती कराने का फैसला किया.

पापा को ले कर सरकारी अस्पताल गए, पर वहां बैड न होने के चलते उन्हें एक रात बरामदे में गुजारनी पड़ी. वही रात पापा के लिए कयामत की रात साबित हुई. काव्या के पापा की सांसों की डोर टूट गई और उस के साथ ही उम्मीद की किरण हमेशा के लिए बुझ गई.

फिर तो उन की जिंदगी दुख, पीड़ा और निराशा के अंधकार में डूबती चली गई. तब तक काव्या एमबीए का फाइनल इम्तिहान दे चुकी थी.

बुरे हालात को देखते हुए और अपने परिवार को दुख के इस भंवर से निकालने के लिए काव्या नौकरी की तलाश में निकल पड़ी. उसे एक प्राइवेट बैंक में 20,000 रुपए की नौकरी मिल गई और उस के परिवार की गाड़ी खिसकने लगी. तब उस के छोटे भाई की पढ़ाई का आखिरी साल था. उस ने कहा कि वह भी कोई छोटीमोटी नौकरी पकड़ लेगा, पर काव्या ने उसे सख्ती से मना कर दिया और उस से अपनी पढ़ाई पूरी करने को कहा.

20 साल की उम्र में काव्या ने अपने नाजुक कंधों पर परिवार की सारी जिम्मेदारी ले ली थी, पर इसे संभालते हुए कभीकभी वह बुरी तरह परेशान हो उठती और तब वह रोते हुए अपनी मां से कहती, ‘‘मम्मी, आखिर पापा हमें छोड़ कर इतनी दूर क्यों चले गए जहां से कोई वापस नहीं लौटता,’’ और तब उस की मां उसे बांहों में समेटते हुए खुद रो पड़तीं.

धीरेधीरे दुख का आवेग कम हुआ और फिर काव्या का परिवार जिंदगी की जद्दोजेहद में जुट गया.

समय बीतने लगा और बीतते समय के साथ सबकुछ एक ढर्रे पर चलने लगा तभी यह एक नई समस्या काव्या के सामने आ खड़ी हुई.

काव्या जानती थी कि बड़ी मुश्किल से उस की मां और छोटे भाई ने उस के पापा की मौत का गम सहा है. अगर उस के साथ कुछ हो गया तो वे यह सदमा सहन नहीं कर पाएंगे और उस का परिवार, जिसे संभालने की वह भरपूर कोशिश कर रही है, टूट कर बिखर जाएगा.

काव्या ने इस बारे में काफी सोचा, फिर इस निश्चय पर पहुंची कि उसे एक बार रंजन से गंभीरता से बात करनी होगी. उसे अपनी जिंदगी की परेशानियां बता कर उस से गुजारिश करनी होगी

कि वह उसे बख्श दे. उम्मीद तो कम थी कि वह उस की बात समझेगा, पर फिर भी उस ने एक कोशिश करने का मन बना लिया.

अगली बार जब रंजन ने काव्या का रास्ता रोका तो वह बोली, ‘‘आखिर तुम मुझ से चाहते क्या हो? क्यों बारबार मेरा रास्ता रोकते हो?’’

‘‘मैं तुम्हें चाहता हूं,’’ रंजन उस के खूबसूरत चेहरे को देखता हुआ बोला, ‘‘मेरा यकीन करो. मैं ने जब से तुम्हें देखा है, मेरी रातों की नींद उड़ गई है. आंखें बंद करता हूं तो तुम्हारा खूबसूरत चेहरा सामने आ जाता है.’’

‘‘सड़क पर बात करने से क्या यह बेहतर नहीं होगा कि हम किसी रैस्टोरैंट में चल कर बात करें.’’

काव्या के इस प्रस्ताव पर पहले तो रंजन चौंका, फिर उस की आंखों में एक अनोखी चमक जाग उठी. वह जल्दी से बोला, ‘‘हांहां, क्यों नहीं.’’

रंजन काव्या को ले कर सड़क के किनारे बने एक रैस्टोरैंट में पहुंचा, फिर बोला, ‘‘क्या लोगी?’’

‘‘कुछ नहीं.’’

‘‘कुछ तो लेना होगा.’’

‘‘तुम्हारी जो मरजी मंगवा लो.’’

रंजन ने काव्या और अपने लिए कौफी मंगवाईं और जब वे कौफी पी चुके तो वह बोला, ‘‘हां, अब कहो, तुम क्या कहना चाहती हो?’’

‘‘देखो, मैं उस तरह की लड़की नहीं हूं जैसा तुम समझते हो,’’ काव्या ने गंभीर लहजे में कहना शुरू किया, ‘‘मैं एक मध्यम और इज्जतदार परिवार से हूं, जहां लड़की की इज्जत को काफी अहमियत दी जाती है. अगर उस की इज्जत पर कोई आंच आई तो उस का और उस के परिवार का जीना मुश्किल हो जाता है.

‘‘वैसे भी आजकल मेरा परिवार जिस मुश्किल दौर से गुजर रहा है, उस में ऐसी कोई बात मेरे परिवार की बरबादी का कारण बन सकती है.’’

‘‘कैसी मुश्किलों का दौर?’’ रंजन ने जोर दे कर पूछा.

काव्या ने उसे सबकुछ बताया, फिर अपनी बात खत्म करते हुए बोली, ‘‘मेरी मां और भाई बड़ी मुश्किल से पापा की मौत के गम को बरदाश्त कर पाए हैं, ऐसे में अगर मेरे साथ कुछ हुआ तो मेरा परिवार टूट कर बिखर जाएगा…’’ कहतेकहते काव्या की आंखों में आंसू आ गए और उस ने उस के आगे हाथ जोड़ दिए, ‘‘इसलिए मेरी तुम से विनती है कि तुम मेरा पीछा करना छोड़ दो.’’

पलभर के लिए रंजन की आंखों में दया और हमदर्दी के भाव उभरे, फिर उस के होंठों पर एक मक्कारी भरी मुसकान फैल गई.

रंजन काव्या के जुड़े हाथ थामता हुआ बोला, ‘‘मेरी बात मान लो, तुम्हारी सारी परेशानियों का खात्मा हो जाएगा. मैं तुम्हें पैसे भी दूंगा और प्यार भी. तू रानी बन कर राज करेगी.’’

काव्या को समझते देर न लगी कि उस के सामने बैठा आदमी इनसान नहीं, बल्कि भेडि़या है. उस के सामने रोने, गिड़गिड़ाने और दया की भीख मांगने का कोई फायदा नहीं. उसे तो उसी की भाषा में समझाना होगा. वह मजबूरी भरी भाषा में बोली, ‘‘अगर मैं ने तुम्हारी बात मान ली तो क्या तुम मुझे बख्श दोगे?’’

‘‘बिलकुल,’’ रंजन की आंखों में तेज चमक जागी, ‘‘बस, एक बार मुझे अपने हुस्न के दरिया में उतरने का मौका दे दो.’’

‘‘बस, एक बार?’’

‘‘हां.’’

‘‘ठीक है,’’ काव्या ने धीरे से अपना हाथ उस के हाथ से छुड़ाया, ‘‘मैं तुम्हें यह मौका दूंगी.’’

‘‘कब?’’

‘‘बहुत जल्द…’’ काव्या बोली, ‘‘पर, याद रखो सिर्फ एक बार,’’ कहने के बाद काव्या उठी, फिर रैस्टोरैंट के दरवाजे की ओर चल पड़ी.

‘तुम एक बार मेरे जाल में फंसो तो सही, फिर तुम्हारे पंख ऐसे काटूंगा कि तुम उड़ने लायक ही न रहोगी,’ रंजन बुदबुदाया.

रात के 12 बजे थे. काव्या महानगर से तकरीबन 3 किलोमीटर दूर एक सुनसान जगह पर एक नई बन रही इमारत की 10वीं मंजिल की छत पर खड़ी थी. छत के चारों तरफ अभी रेलिंग नहीं बनी थी और थोड़ी सी लापरवाही बरतने के चलते छत पर खड़ा कोई शख्स छत से नीचे गिर सकता था.

काव्या ने इस समय बहुत ही भड़कीले कपड़े पहन रखे थे जिस से उस की जवानी छलक रही थी. इस समय उस की आंखों में एक हिंसक चमक उभरी हुई थी और वह जंगल में शिकार के लिए निकले किसी चीते की तरह चौकन्नी थी.

अचानक काव्या को किसी के सीढि़यों पर चढ़ने की आवाज सुनाई पड़ी. उस की आंखें सीढि़यों की ओर लग गईं.

आने वाला रंजन ही था. उस की नजर जब कयामत बनी काव्या पर पड़ी, तो उस की आंखों में हवस की तेज चमक उभरी. वह तेजी से काव्या की ओर लपका. पर उस के पहले कि वह काव्या के करीब पहुंचे, काव्या के होंठों पर एक कातिलाना मुसकान उभरी और वह उस से दूर भागी.

‘‘काव्या, मेरी बांहों में आओ,’’ रंजन उस के पीछे भागता हुआ बोला.

‘‘दम है तो पकड़ लो,’’ काव्या हंसते हुए बोली.

काव्या की इस कातिल हंसी ने रंजन की पहले से ही भड़की हुई हवस को और भड़का दिया. उस ने अपनी रफ्तार तेज की, पर काव्या की रफ्तार उस से कहीं तेज थी.

थोड़ी देर बाद हालात ये थे कि काव्या छत के किनारेकिनारे तेजी से भाग रही थी और रंजन उस का पीछा कर रहा था. पर हिरनी की तरह चंचल काव्या को रंजन पकड़ नहीं पा रहा था.

रंजन की सांसें उखड़ने लगी थीं और फिर वह एक जगह रुक कर हांफने लगा.

इस समय रंजन छत के बिलकुल किनारे खड़ा था, जबकि काव्या ठीक उस के सामने खड़ी हिंसक नजरों से उसे घूर रही थी.

अचानक काव्या तेजी से रंजन की ओर दौड़ी. इस से पहले कि रंजन कुछ समझ सके, उछल कर अपने दोनों पैरों की ठोकर रंजन की छाती पर मारी.

ठोकर लगते ही रंजन के पैर उखड़े और वह छत से नीचे जा गिरा. उस की लहराती हुई चीख उस सुनसान इलाके में गूंजी, फिर ‘धड़ाम’ की एक तेज आवाज हुई. दूसरी ओर काव्या विपरीत दिशा में छत पर गिरी थी.

काव्या कई पलों तक यों ही पड़ी रही, फिर उठ कर सीढि़यों की ओर दौड़ी. जब वह नीचे पहुंची तो रंजन को अपने ही खून में नहाया जमीन पर पड़ा पाया. उस की आंखें खुली हुई थीं और उस में खौफ और हैरानी के भाव ठहर कर रह गए थे. शायद उस ने सपने में भी नहीं सोचा था कि उस की मौत इतनी भयानक होगी.

काव्या ने नफरत भरी एक नजर रंजन की लाश पर डाली, फिर अंधेरे में गुम होती चली गई.

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