Honour Killing: मनचाही शादी पर खूनी शिकंजा

Honour Killing: बिहार विधानसभा चुनाव में राष्ट्रीय जनता दल के नेता और बिहार के उपमुख्यमंत्री रह चुके तेजस्वी यादव ने एक वादा यह भी किया था कि ‘हमारी सरकार बनेगी, तो जिन भाईबहनों की शादी नहीं हो रही है, उन की शादी भी कराई जाएगी. घर में खुशहाली हो जाएगी और बालबच्चा भी हो जाएगा’.

तेजस्वी यादव की इस बात से साफ पता चलता है कि शादी न हो पाना एक समस्या बन रही है. शादी इसलिए नहीं हो रही है, क्योंकि अब लड़कियां अपने मातापिता की पसंद से अपनी ही जाति और गोत्र में शादी नहीं करना चाहती हैं, क्योंकि वहां लड़का और लड़की में समानता नहीं मिलती है.

लड़कियां अब दबना नहीं चाहती हैं. जो लड़कियां अपनी पसंद की शादी कर लेती हैं, उन में से कुछ को तो औनर किलिंग जैसे अपराध का सामना करना पड़ता है. यह केवल बिहार और उत्तर प्रदेश जैसे 1-2 राज्यों की समस्या नहीं है, बल्कि इस की जड़ें पूरे देश में फैली हुई हैं. इस में घर, परिवार और समाज के साथसाथ पुलिस भी शामिल होती है.

पुलिस इस तरह की घटनाओं को गंभीरता से नहीं लेती है. कई पुलिस वाले पितृसत्ता के हिमायती होते हैं. वे लड़की को ही गलत मानते हैं. वे मुकदमे को लिखने से ले कर उस की जांचपड़ताल तक में बचाव का रास्ता निकालने की कोशिश करते हैं.

पुलिस को भी मिली सजा

साल 2003 की बात है. तमिलनाडु के कुड्डालोर जिले में पुडकूरापेट्टई गांव में 20 साल की रत्ना और 22 साल का प्रभाकर रहते थे. रत्ना वन्नियार समुदाय से थी, जबकि प्रभाकर एससी था. वे दोनों आपस में प्यार करते थे, लेकिन वे यह भी जानते थे कि समाज उन को मिलने नहीं देगा.

इस वजह से उन्होंने चुपके से शादी कर ली और अपनी शादी का रजिस्ट्रेशन भी करवा लिया. शादी के बाद वे दोनों अपने गांव लौट आए और अपनेअपने परिवारों के साथ रहने लगे.

जुलाई, 2003 के पहले हफ्ते में रत्ना और प्रभाकर चुपचाप गांव छोड़ कर चले गए. घर वालों ने खोजना शुरू किया, तो प्रभाकर गांव से दूर एक सुनसान जगह पर मरा पाया गया. उस के सारे कपड़े उतार दिए गए थे. उसे एक खंभे से बांध दिया गया था. गांव वालों के सामने उस की बेरहमी से पिटाई की गई थी.

दरअसल, गांव वाले प्रभाकर से रत्ना का पता पूछने के लिए कर रहे थे. रत्ना का पता चलने के बाद उन दोनों को गांव के पास काजू के एक बाग में ले जाया गया, जहां दोनो को जहर दिया गया, जिस से उन की मौत हो गई. इस के बाद उन दोनों की लाश को अलगअलग जगह पर जला दिया गया.

पुलिस को इस वारदात के बारे में जानकारी मिली. वह घटना वाली जगह पर गई. इस के बाद भी एफआईआर दर्ज नहीं की गई. 9 दिनों के बाद, जब एससी समुदाय के कुछ नेताओं ने मीडिया में इस मुद्दे को उठाया, तब आखिर में 17 जुलाई, 2003 को मामला दर्ज किया गया.

पर लोकल पुलिस द्वारा की गई पूरी जांच जिस तरीके से की गई, उस के चलते प्रभाकर के परिवार को मद्रास हाईकोर्ट से दखल देने की मांग करनी पड़ी. एक याचिका दायर कर इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपने की गुजारिश की गई, जिसे हाईकोर्ट ने स्वीकार कर लिया.

सीबीआई जांच के बाद कुल 15 लोगों पर मुकदमा चला. ट्रायल कोर्ट ने 13 लोगों को इस मामले में कुसूरवार ठहराया. यही नहीं, ट्रायल कोर्ट ने आरोपी पुलिस वालों को भारतीय दंड संहिता की धारा 217, 218 और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 की धारा 3(2)(प), 4 के तहत कुसूरवार ठहराया और उन दोनों को उम्रकैद की सजा सुनाई.

बाद में मद्रास हाईकोर्ट ने अपने फैसले में आरोपी दारोगा की दोषसिद्धि और सजा को संशोधित करते हुए
उसे अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 3(2)(प) और भारतीय दंड संहिता की धारा 218 के तहत अपराधों के लिए बरी कर दिया, लेकिन अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अधिनियम की धारा 4 और भारतीय दंड संहिता की धारा 217 के तहत अपराधों के लिए उस की दोषसिद्धि को बरकरार रखा और इस तरह उस की सजा को उम्रकैद से घटा कर 11 साल की कड़ी कैद में बदल दिया.

आरोपी पुलिस वालों समेत 11 आरोपियों ने अपनी दोषसिद्धि और सजा को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया. सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में एफआईआर दर्ज होने से ले कर ट्रायल कोर्ट तक हुई लंबी और बहुत ज्यादा हुई देरी पर ध्यान दिया.

कोर्ट ने कहा कि यह एक ओर अभियोजन पक्ष की घोर अक्षमता और दूसरी ओर बचाव पक्ष द्वारा अपनाई गई टालमटोल की रणनीति को दिखाता है, जिस के चलते मुकदमा धीमा चला.

इस के अलावा, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी बताया कि इस मामले में अभियोजन पक्ष के कई गवाह अपने बयान से पलट गए हैं.

इस मामले में घटना साल 2003 में घटी. मामला साल 2010 में सैशन कोर्ट को सौंपा गया और आरोप साल 2017 में तय किए गए. ट्रायल कोर्ट ने अपना फैसला 24 सितंबर, 2021 को सुनाया. इस में 18 साल का समय लग गया.

कोर्ट ने पुलिस के लोगों को जिम्मेदार इसलिए ठहराया, क्योंकि स्थानीय पुलिस द्वारा की गई जांच पूरी तरह से गलत और बेईमानी से भरपूर थी, जिस का मकसद यह दिखाना था कि अपराध वन्नियार और एससी समुदाय द्वारा संयुक्त रूप से किया गया था.

यह अपराधियों और पीडि़त दोनों को एकसाथ आरोपी बनाता है. पुलिस ने मारे गए लड़के के पिता को भी आरोपियों में से एक बताया, जो एक छल था.

कोर्ट ने कहा कि किसी मुकदमे की तरह ही जांच का मकसद भी सच तक पहुंचना है. जांच अधिकारी का फर्ज विधिपूर्वक सुबूत जमा करना है. इस मामले में जांच अधिकारी ने न केवल सुबूतों को छिपाया, बल्कि खुद भी सुबूत गढ़े.

इस के जरीए बेकुसूरों को फंसाने और कुसूरवारों को छुड़ाने की कोशिश की गई. सीआरपीसी की धारा 154 और 157(1) के साथसाथ पुलिस अधिनियम, 1861 की धारा 23 और 24 का उल्लंघन किया.

सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के फैसले में किसी भी तरह का दखल देने से इनकार करते हुए राज्य सरकार को मारे गए लड़के के परिवार वालों को मुआवजा देने का निर्देश दिया. कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि सभी अपीलकर्त्ता जो जमानत पर हैं, अपनी बाकी सजा काटने के लिए 2 हफ्ते के भीतर सरैंडर कर दें.

25 जुलाई, 2025 की घटना है. उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के पलड़ा गांव में 16 साल की सानिया का गला दबा कर हत्या कर दी गई, जिस के बाद परिवार ने टीबी से मौत बता कर लाश को दफना दिया. 24 जुलाई को सानिया के प्रेमी सागर के पिता रामपाल ने घटना की जानकारी दोघट थाने में दी.

पुलिस ने सूचना को गंभीरता से नहीं लिया और रामपाल को टरकाते हुए दाहा पुलिस चौकी पर भेज दिया. इस के बाद भी पुलिस हरकत में नहीं आई, तो रामपाल ने इस घटना की सूचना एसपी बागपत को दी, जिस के बाद 25 जुलाई को दोघट पुलिस हरकत में आई और पूरे मामले की जांच शुरू कर दी.

पुलिस ने सानिया के ताऊ मतलूब को हिरासत में ले कर पूछताछ की, तो उस ने सारा राज उगल दिया. एसडीएम मनीष कुमार यादव और सीओ विजय कुमार की देखरेख में पुलिस ने सानिया की लाश को कब्र से निकाला और पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

पुलिस ने बताया कि 22 और 23 जुलाई की रात सानिया की हत्या करने की सूचना मिली थी. अब पुलिस ने कुसूरवारों को पकड़ कर सजा दिलाने की बात कर रही है. वैसे, पहले पुलिस ने इस को हलके में लिया था. वह मामले को उछालना ठीक नहीं समझ रही थी.

28 सितंबर, 2025 को मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में औनर किलिंग का सनसनीखेज मामला सामने आया. 17 साल की 12वीं जमात में पढ़ने वाली छात्रा दिव्या सिकरवार की घर के अंदर गोली मार कर हत्या कर दी गई और उस की लाश को परिवार वाले ही कुआरी नदी में फेंक आए. इस के बाद दिव्या की गुमशुदगी की बात पुलिस में दर्ज कराई.

पुलिस ने जब जांच की तो पता चला कि पिता भरत सिकरवार अपनी बेटी की लाश प्लास्टिक की पन्नी में लपेट कर कार से नदी तक ले गए थे. उसे पत्थर से बांधा और नदी में फेंक दिया.

पूछताछ में दिव्या के मातापिता बारबार बयान बदलते रहे. पहले कहा कि बेटी की मौत पंखे से करंट लगने से हुई, फिर कहा कि उस ने खुदकुशी कर ली. लेकिन फौरैंसिक जांच में साफ हुआ कि दिव्या को बेहद नजदीक से सिर में गोली मारी गई थी. घटना की रात से दिव्या का नाबालिग भाई और बहन भी गायब हो गए थे, जिस से पुलिस को घटना की जानकारी न मिल सके.

दिव्या के पिता भरत सिकरवार कहते हैं, ‘‘घर में माता की झांकी लगी थी. मैं बाहर था, तभी अंदर से बच्चा चीखा. मैं अंदर गया तो दिव्या घायल पड़ी थी. मैं ने उसे उठाया और महल्ले के एक लड़के की गाड़ी में साथ अस्पताल गया. रास्ते में दिव्या की मौत हो गई और मैं बेहोश हो गया. मैं अस्पताल के अंदर नहीं गया.’’

औनर किलिंग का यह कोई पहला मामला नहीं है. जून, 2025 में मुरैना की ही मलिका की हत्या उस के दादा ने कर दी थी. मलिका पर गैरजाति के लड़के से प्रेम संबंध रखने का आरोप था.

जनवरी, 2025 में ग्वालियर की 20 साल की तनु गुर्जर को उस के पिता और चचेरे भाई ने शादी से पहले ही मौत के घाट उतार दिया.

जून, 2023 में मुरैना में एक लड़की और उस के प्रेमी की हत्या कर लाश को चंबल नदी में फेंका गया.

हर राज्य है गुनाहगार

तमिलनाडु की घटना औनर किलिंग को सही से सम?ाने के लिए काफी है. इस से यह भी पता चलता है कि केवल उत्तर भारत में ही औनर किलिंग की घटनाएं नहीं घटती हैं, बल्कि दक्षिण भारत के राज्यों में भी ऐसी घटनाएं घटती हैं.

साल 1993 में पश्चिमी उत्तर प्रदेश में कांधला थाना क्षेत्र के गांव खंद्रावली में सतीश और सरिता की भरी पंचायत के बीच लड़की के पिता ने हत्या कर दी थी. साल 1998 में झिंझाना थाना क्षेत्र के अलीनगर में पिता ने अपनी बेटी को एक लड़के के साथ देख लिया था. इस के बाद दोनों को फांसी पर लटका कर हत्या कर दी थी.

साल 1999 में शामली कोतवाली क्षेत्र के महल्ला ब्रह्मानन से एक लड़की किसी लड़के के साथ चली गई थी. लड़की के लौटने के बाद पिता ने सड़क पर उसे कुल्हाड़ी से काट कर हत्या कर दी थी. साल 2022 में झिंझाना थाना क्षेत्र के नयागांव में पिता ने बेटी की हत्या कर लाश को गांव शामली शामला में बिटौड़े में फूंक दिया था.

यह सही है कि अब ज्यादा से ज्यादा मामले पुलिस तक पहुंच जाते हैं. इस के बाद भी पुलिस की जांच में मामले को कमजोर बनाने का काम किया जाता है. कोर्ट में सालोंसाल ये मामले चलते हैं. इस वजह से पीडि़त आरोपी दोनों ही परिवार थकहार जाते हैं. बहुत सारे मामले हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचते ही नहीं हैं.

तमिलनाडु के मामले में अगर पुलिस वालों को सजा नहीं मिली होती, तो यह मुकदमा भी सुप्रीम कोर्ट तक नहीं पहुंच पाता. ज्यादातर मामलों में परिवार वाले ही आरोपी होते हैं, तो वे दोहरी सजा भुगत रहे होते हैं.

राष्ट्रीय अपराध रिकौर्ड ब्यूरो यानी एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2019 और 2020 में औनर किलिंग की संख्या हर साल 25 रही है. साल 2021 में यह बढ़ कर 33 हो गई. जानकार लोग मानते हैं कि ये आंकड़े पूरे नहीं हैं. आज भी ज्यादातर मामलों में औनर किलिंग शब्द को हटा दिया जाता है. ऐसी घटनाएं हत्या या खुदकुशी के रूप में दर्ज हो जाती हैं.

तमिलनाडु और पुडुचेरी में एससी और एसटी के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए काम करने वाले एक गैरसरकारी संगठन, ऐविडैंस द्वारा की गई स्टडी के मुताबिक, पिछले 5 सालों में अकेले तमिलनाडु में औनर किलिंग के 195 ज्ञात मामले सामने आए हैं.

नवंबर, 2019 में एक ही हफ्ते के अंतराल में औनर किलिंग की 2 भयावह घटनाएं हुईं. नागपट्टिनम की 17 साल की जननी को उस की मां ने एक एससी लड़के के साथ संबंध रखने के चलते आग लगा दी. 5 दिन बाद 21 साल की नंबिराजन की लाश तिरुनेलवेली में रेल की पटरियों पर मिली. उसे उस की ससुराल वालों ने मार डाला था. जो उस की गरीबी को स्वीकार नहीं कर सकते थे, भले ही वह उसी समुदाय से था.

एनसीआरबी की सालाना रिपोर्ट केंद्र सरकार द्वारा तैयार की जाती है, जिस में राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों द्वारा उपलब्ध कराए गए आंकड़े शामिल होते हैं. राज्य सरकारों के पास औनर किलिंग पर नजर रखने का कोई विश्वसनीय तरीका नहीं है या वे ऐसा करना ही नहीं चाहतीं.

ह्यूमन राइट्स वाच औनर किलिंग को हिंसा का कृत्य, आमतौर पर हत्या, परिवार के मर्द सदस्यों द्वारा महिला सदस्यों के खिलाफ किया जाता है, जिन के बारे में माना जाता है कि उन्होंने अपनी जाति, वर्ग या धर्म से बाहर के पुरुषों के साथ प्रेम संबंध बना कर या उन से विवाह कर के परिवार का अपमान किया है.

औनर किलिंग की शिकार तकरीबन 97 फीसदी महिलाएं होती हैं. औनर किलिंग को अकसर रिश्तेदारों द्वारा खुदकुशी के रूप में रिपोर्ट किया जाता है.

परिवार के सदस्य तत्काल दाह संस्कार के नाम पर इस के उलट किसी भी सुबूत को खत्म कर देते हैं, जैसा कि अक्तूबर, 2019 में आंध्र प्रदेश के रेडलापल्ले गांव में एक नाबालिग लड़की की उस के परिवार द्वारा हत्या के मामले में हुआ. उन्हें पुलिस द्वारा हत्या के रूप में माना जाता है या अनुसूचित जातियों और जनजातियों के खिलाफ अत्याचार के रूप में माना जाता है.

एनसीआरबी के मुताबिक, साल 2018 में 10,773 लोग अपने ‘प्रेम संबंधों’ के चलते भाग गए. जो जोड़े भागते हैं, वे आमतौर पर ऐसा इसलिए करते हैं, क्योंकि उन्हें अपने वर्ग, जाति या धर्म के फर्क के चलते अपने रिश्तों को पारिवारिक रजामंदी न मिलने का सामना करना पड़ता है.

विदेशों में भी होती है औनर किलिंग

औनर किलिंग की घटनाएं विदेशों में भी होती हैं. ज्यादातर विदेशों में ये घटनाएं भारतीय मूल के लोगों में ही होती हैं. कुछ सालों में ब्रिटेन की अदालतों में ज्यादा मामले पहुंचे हैं.

कुछ मामलों में बलात्कार की शिकार महिलाओं की हत्या भी पीडि़त होने के ‘अपमान’ और इस से उन के परिवार पर पड़ने वाले असर के चलते की जाती है. ब्रिटेन में हर साल तकरीबन 12 औनर किलिंग होती हैं. ये आमतौर पर दक्षिण एशियाई और मध्यपूर्वी एशियाई परिवारों में होती हैं.

सब से ज्यादा उछले मामलों में से एक सरे की बानाज महमूद का मामला है, जिस की साल 2006 में हत्या उस के पिता और चाचा ने कराई थी. उस ने एक नाखुश अरेंज मैरिज छोड़ दी थी, जिस के बाद उस ने किसी और आदमी के साथ रिश्ता शुरू कर दिया था.

20 साल की इस लड़की की गला घोंट कर हत्या कर दी गई और उसे एक सूटकेस में छिपा कर बर्मिंघम
के एक मकान के नीचे दफना दिया गया था.

इस मामले को ठीक से न संभालने के लिए पुलिस की आलोचना की गई थी, जब बानाज महमूद ने अपनी मौत से पहले कई बार पुलिस से संपर्क किया था.

जबरन विवाह को रोकने और पहले से ही बिना सहमति के विवाह में रह रहे लोगों को इस से बाहर निकलने का रास्ता देने के लिए कानून नवंबर, 2008 में इंगलैंड, वेल्स और उत्तरी आयरलैंड में पेश किए गए थे.

किसी को विवाह के लिए मजबूर करने की कोशिश करने के कुसूरवार पाए जाने पर 2 साल तक की जेल हो सकती है. पहले साल के भीतर 86 जबरन विवाह संरक्षण आदेश लागू किए गए. दुनिया का कोई भी प्रमुख धर्म सम्मान से संबंधित अपराधों को स्वीकार नहीं करता. अपराधी धार्मिक आधार पर अपनी करतूत को उचित ठहराने की कोशिश करते हैं.

जाति और धर्म हैं ज्यादा जिम्मेदार

भारत में जाति व्यवस्था समाज में गहरे तक पैठी गई है. औनर किलिंग इस का ही एक रूप है. जो शादीविवाह पर खूनी शिकंजा जैसा है.

हिंदू विवाह कानून बनने के बाद भी उस में ब्राह्मण, जाति और कुंडली का कसर खत्म नहीं हुआ. अंतर्जातीय विवाहों को संरक्षित करने के लिए स्पैशल मैरिज ऐक्ट भी बना है. इस के बाद भी मनपसंद शादी करने की आजादी नहीं है.

पूरे देश में औनर किलिंग की घटनाएं बढ़ रही हैं. इस के अलगअलग रूप सामने आ रहे है. औनर किलिंग बताती है कि कैसे परिवार और समाज ऐसी हिंसा को सही ठहराते हैं और संवैधानिक मूल्यों को कमजोर करते हैं.

औनर किलिंग हिंसा का वह रूप है, जो आमतौर पर हत्या के रूप में सामने आता है. ज्यादातर मामलों में परिवार के सदस्य ही इसे अंजाम देते हैं.

इस का शिकार वे जोड़े बनते हैं, जिन्हें यह माना जाता है कि उन्होंने जाति, समुदाय या धर्म के बनाए नियमों की अनदेखी कर के आपस में शादी की और परिवार की बेइज्जती की. इस में जाति, अंतर्विवाह और गोत्र बहिर्विवाह जैसे नियमों का उल्लंघन भी शामिल है. इस में परिवार के लोग ही औनर किलिंग को अंजाम देते हैं.

झूठी शान की खातिर मांबाप ही अपने बच्चों का कत्ल करते हैं. कभी पिता ने बेटी की कुल्हाड़ी से हत्या की, तो कभी पिता ने बेटी को बिटौड़े में जला दिया. कभी फांसी पर लटका कर लड़के और लड़की को मार दिया गया, तो कभी गोली मार कर हत्या कर दी.

सब से बड़ी बात, इन घटनाओं के बाद कानून और पुलिस अपना काम करते हैं. औनर किलिंग करने वाले और उस के साथियों के खिलाफ अब हत्या का मुकदमा दर्ज होता है. इस के बाद पुलिस और कोर्ट के चक्कर में पूरा परिवार तबाह हो जाता है. ऐसे में समाज भी साथ नहीं देता.

कितने लोग जमानत का पैसा और जमानत लेने वालों का इंतजाम नहीं करा पाते, जिस के चलते जेल से बाहर ही नहीं निकल पाते हैं.

औनर किलिंग को बढ़ावा देने वाली वजह

औनर किलिंग की सब से बड़ी वजह धर्म, परिवार और समाज हैं. शहरीकरण, शिक्षा और आधुनिक विचारों के बावजूद जाति की दीवार अब भी बनी हुई है. किसी भी लड़केलड़की को अपना मनपंसद जीवनसाथी चुनने का हक नहीं है. परिवार द्वारा तय की गई शादी में धार्मिक रीतिरिवाजों, अनुष्ठानों, पूजापाठ का पालन होता है. यह सब बच्चों को बचपन से ही सिखाया जाता है. बच्चे बचपन से ही जातिगत सीमाओं को स्वीकार कर लेते हैं, जिस से उन के सामाजिक संबंध, विवाह संबंधी फैसले के प्रति सोच पर असर पड़ता है.

तमिलनाडु, तेलंगाना, महाराष्ट्र और केरल जैसे राज्य, जहां दलित सशक्तीकरण थोड़ा ज्यादा है, वहां अंतर्जातीय विवाह भी ज्यादा होते हैं और साथ ही औनर किलिंग की घटनाएं भी ज्यादा सामने आती हैं. यह हिंसा उन प्रदेशों में ज्यादा दिखाई देती है, जहां जातिगत व्यवस्था की जड़ें गहरे तक पैठी होती हैं. एक सोच और भी है, जिस में यह माना जाता है कि इस के पूरी तरह से कुसूरवार मर्द ही होते हैं.

यह पूरा सच नहीं है. तमाम घटनाओं में यह देखा गया है कि लड़की की मां या लड़के की मां भी लड़की को कुसूरवार बताती है. कई बार लड़की की जान लेने में उस की मां का हाथ भी होता है.

कुछ घटनाएं ऐसी होती हैं, जिन में लड़कालड़की आपसी प्यार के साथ ही साथ शादी के पहले ही सैक्स संबंध बना लेते हैं. इस दौरान अगर लड़की को बच्चा ठहर गया, तो लड़की को मार कर खुदकुशी का रूप देने की कोशिश होती है. इस में पुलिस पैसा और दबाव दोनों चाहती है. कई मामलों में केस दब भी जाता है.

कई बार अगर लड़के वाले एतराज करते हैं, तो मामले की जांच हो जाती है. लड़की के घर वाले फंस भी जाते हैं. ज्यादातर मामलों में लड़कियां ऊंची जाति की होती हैं. उन के परिवार वाले लड़के की निचली जाति को सहन नहीं कर पाते हैं.

कई मामलों में उदारता देखी जाती है, जहां आपस में शादी कर के मामले का निबटारा कर दिया जाता है. कुछ मामलों में तो पुलिस भी पंडित बन कर गले में माला पहना कर आग के चक्कर लगवा कर शादियां करा देती है. मसला वहीं फंसता है, जहां जाति, धर्म और समाज का विवाद खड़ा हो जाता है. जाति और खाप पंचायतों का रुख ठीक न होने से यह परेशानी बनी हुई है.

लड़कियों की कमी के बाद भी लड़के और उन के घर वाले जाति और गोत्र का मोह छोड़ नहीं पा रहे हैं. इस परेशानी के शिकार लड़का या लड़की अगर जिंदा रहते हैं, तो उन के लिए समाज से शादी के रिश्ते आने बेहद कम हो जाते हैं. Honour Killing

Hindi Kahani: बदमाश हिरनी

Hindi Kahani: लाला जनार्दन मोटरसाइकिल से उधार देने और वसूली करने गांवगांव जाया करता था. एक दिन की बात है. दोपहर की उमस भरी गरमी से छुटकारा पाने के लिए जनार्दन ने अपनी मोटरसाइकिल एक खेत के किनारे खड़ी कर दी और वह कुछ गुनगुनाते हुए गन्ने के झुरमुट के बीच से चला जा रहा था.

अचानक जनार्दन ने देखा कि कुएं के पास एक लड़की बैलों की जोड़ी को हांक रही थी.

जनार्दन कुछ पल के लिए सांस रोके उस लड़की को देखता रहा. सिर पर पल्लू डाले हुए वह नईनई ब्याही लड़की जवान और खूबसूरत लग रही थी.

उसे इस तरह अपनी ओर निहारता देख वह लड़की एकाएक हंस पड़ी और बोली, ‘‘प्यास लगी है, तो पानी पी लो.’’

जनार्दन ने चुल्लू में पानी भर कर होंठों से लगाया, जिस से उस का गला तो तर हो गया, पर मन प्यासा रह गया.

लड़की ने दोबारा कुएं से पानी निकाल कर उस की ओर बढ़ा कर कहा, ‘‘और पी लो.’’

जनार्दन बोल उठा, ‘‘पिला दो.’’

उस लड़की ने लोटे से पानी पिलाना शुरू किया. पानी की फुहार से जनार्दन का तनमन जैसे भीग गया था.

वह ठिठका सा खड़ा था कि लड़की बोली, ‘‘रोटी खा लो.’’

जनार्दन के पास रोटी नहीं थी. उस की बीवी तो शहर में परिवार के साथ रहती थी. भरी दोपहर में जैसे उस की बरसों की सोई प्यास जाग उठी. इस के बावजूद वह चुपचाप वहां से लौटने को हुआ.

उस लड़की से रहा न गया. वह बोली, ‘‘यहीं रोटी खा लो…’’

जनार्दन पलभर के लिए रुका. उस ने गौर से देखा कि उस लड़की का टीका चमक रहा था. सूरज की सुनहरी किरणें उस के चंपा जैसे चेहरे को चूम रही थीं.

जनार्दन को झिझकते देख कर वह लड़की फिर बोली, ‘‘गरमी की वजह से मैं ने रोटी खाई नहीं है, तुम खा लो.’’

जनार्दन ने देखा कि वह लड़की महुआ की गंध की तरह मस्त नजर आ रही थी, मानो उस से मनुहार कर रही हो.

जनार्दन ने अपनी कमर में बंधी थैली को टटोला कि कहीं गिर तो नहीं गई है. आज ही तो उसे गिरवी में 2 कंगन मिले थे. उन्हें संभाल कर वह वहीं बैठ गया.

तभी जनार्दन को लड़की के बदन से दूध की सोंधी गंध महसूस हुई. लड़की का पसीने से भीगा आंचल उस के बदन से चिपका था. जनार्दन से दो कौर रोटी भी नहीं तोड़ी जा रही थी.

लड़की जान गई कि झिझक का मारा जनार्दन रोटी नहीं खा पा रहा है, इसलिए उस ने एक लोटा गन्ने का रस उसे पीने को दिया. इसी बीच सूरज डूब गया.

वह भारी मन से उठा. उस का हाथ कमर में बंधी पोटली पर गया. 2 कंगन अभी भी सहीसलामत थे.

जनार्दन की तिजोरी में न जाने कितने गहने पड़े सड़ रहे थे. वह कुछ पल सोच कर बोला, ‘‘इधर आ.’’

वह लड़की जनार्दन के सामने आ कर खड़ी हो गई.

जनार्दन ने कंगन निकाल कर उस की कलाइयों में पहना दिए.

वह लड़की नानुकर करती रही, पर जनार्दन ने उसे मना ही लिया.

जब जनार्दन जाने लगा, तो वह मतवाली लड़की कंगन पहने हाथों को हिला कर उसे विदा कर रही थी. जनार्दन ने उस पर भरपूर नजर डाली और बोला, ‘‘बदमाश हिरनी…’’ Hindi Kahani

Story In Hindi: सतरंगी आसमान

Story In Hindi: अपनी सुहागरात पर साकेत काया के उभारों के बीच उगे बाल देख कर हैरान रह गया और उस का मूड खराब हो गया. इस के बाद साकेत और काया के बीच दूरियां बढ़ गईं. फिर काया की जिंदगी में सुशांतो आया जो उम्र में उस से कम था. आगे क्या हुआ?

सुबह के 7 बज गए थे. साकेत और काया की सुहागरात बीत चुकी थी. साकेत की आंखें खुलीं, तो उस के मन में एक उदासी थी. आमतौर पर लोग सुहागरात बीतने के अगले दिन बहुत खुश नजर आते हैं, पर साकेत का मूड पूरी तरह से उखड़ा हुआ था.

साकेत ने अनमने मन से बिस्तर छोड़ा और बाथरूम में घुस गया. फ्रैश हो कर बाहर आया तो देखा कि उस की पत्नी काया सकुचाई सी ड्रैसिंग टेबल के सामने खड़ी हो कर अपनी बिंदी सही कर रही थी.

साकेत ने काया पर एक उचटी हुई सी नजर डाली और डाइनिंग टेबल की ओर बढ़ गया, जहां पर साकेत की मां नाश्ता लगा कर उस का इंतजार कर रही थीं.

साकेत ने जल्दीजल्दी नाश्ता किया और बाहर की ओर जाने लगा. मां के पूछने पर साकेत ने बताया कि उसे थोड़ा काम है, इसलिए बाहर जाना पड़ेगा.

साकेत तेजी से गाड़ी ड्राइव कर रहा था. पिछली रात को साकेत और काया की सुहागरात पर साकेत को कुछ ऐसा अनुभव हुआ था, जिस की कल्पना उस ने कभी नहीं की थी.

शादी के बाद पतिपत्नी एकदूसरे में पूरी तरह डूब जाना चाहते हैं, हर अंग को देख और जान लेना चाहते हैं और साकेत भी ऐसे मर्दों में से ही था. उस की आंखें काया की खूबसूरती को पूरी तरह से देख लेना चाहती थीं, पर काया अपने अंगों को बारबार सिकोड़ लेती थी और कमरे की लाइट बंद करने को कह रही थी.

पर साकेत तो टूट कर प्यार करना चाहता था और काया के सभी अंगों को चूम कर अपना प्यार जाहिर करना चाहता था, पर काया लगातार असहज हो रही थी और अपने दोनों हाथों से अपने उभारों को ढक ले रही थी, पर साकेत कुदरत की बनाई हुई इस खूबसूरत चीज के बीच डूब जाना चाहता था.

इसी सब में साकेत ने काया के दोनों हाथों को अपने हाथों के जोर से फैला दिया और काया के उभारों के बीच अपना चेहरा सटा दिया.

साकेत ने अपनी आंखों में काया के रूप को कैद करना शुरू कर दिया था और यही वह समय था, जब साकेत ने देखा कि काया के दोनों उभारों के बीच कुछ रोएं हैं और कुछ कालापन सा है, जो आमतौर पर सभी औरतों में नहीं होता.

पर चूंकि साकेत उस समय जिस्मानी रिश्ता बनाने के लिए उतावला हुआ जा रहा था, इसलिए उस ने कुछ नहीं पूछा, पर जब वह शांत हुआ, तब साकेत का सब से पहला सवाल यही था, ‘‘तुम्हारे उभारों के बीच रोएं और कालेपन का अजीब सा निशान कैसा है? ऐसा जो लगातार शेव करने के बाद आता है…’’

कुछ देर तक तो काया अनसुना कर के लेटी रही, पर जब साकेत बारबार वही सवाल दोहराता रहा, तो काया ने शरमाते हुए साकेत को बताया कि उस के उभारों के बीचोंबीच बाल हैं. उस ने काफी समय पहले यह समस्या अपनी मां से भी शेयर की थी, पर मां ने उसे चुप कराते हुए छोटे गले वाले सूट पहनने को कहा और सम झाया कि धीरेधीरे ये बाल अपनेआप गायब हो जाएंगे.

पर साकेत यह सब सुनना नहीं चाहता था. वह तो काया पर ही धोखाधड़ी का इलजाम लगाने लगा, ‘‘तो मु झे यह बात शादी से पहले क्यों नहीं बताई? मेरे साथ धोखा हुआ है.’’

काया और साकेत के बीच बातचीत में भी अब कड़वाहट घुलने लगी थी, पर काया, जो किशोरावस्था से ही उभारों के बीच बाल होने की समस्या से जूझती आ रही थी, अपने पति के ऐसे रिऐक्शन के लिए मानसिक रूप से पहले से ही तैयार थी.

28 साल की काया पेशे से एक एमबीबीएस डाक्टर थी. उस ने शांत स्वर में साकेत को सम झाया कि शरीर में कई जगह अनचाहे बाल होते हैं. कुछ लोगों में सीने के बीच रोएं होते हैं, तो कुछ में ये बड़े हो कर बाल का रूप धारण कर लेते हैं, जिन से पीछा छुड़ाना आसान नहीं होता, लेकिन आजकल हेयर रिमूवर, वैक्सिंग और लेजर तकनीक द्वारा शरीर के किसी भी हिस्से के अनचाहे बाल हटाए जा सकते हैं और वह भी ऐसा ही कोई साधन अपना लेगी.

साकेत ने काया की बात सुनी तो जरूर थी, पर छाती के बीच बाल वाली काया अब उस की आदर्श पत्नी नहीं रह गई थी.

साकेत और काया को 2 दिन बाद हनीमून के लिए मौरीशस जाना था, पर साकेत ने प्लान कैंसिल कर दिया था. मां ने वजह पूछी, तो साकेत ने काम ज्यादा होने और तबीयत सही न होने का बहाना बना दिया था.

काया ने बहुत सोचा और अपनी छुट्टियां रद्द कर दीं और अगले दिन से ही वह अस्पताल जाने लगी.

काया लखनऊ शहर के दीनदयाल उपाध्याय मैमोरियल अस्पताल में डाक्टर थी और वहां उस की इमेज बहुत अच्छी थी.

आज काया अस्पताल काम पर आई, तो उस ने दिनभर खूब मन से काम किया और रोज से ज्यादा समय दिया. शाम को 7 बजे वह घर चली गई.

रात को बिस्तर पर साकेत मुंह घुमा कर लेटा रहा. काया ने माहौल को नौर्मल करने के लिए उस से बात करना चाहा, पर साकेत शांत ही रहा.

काया ने धीरेधीरे साकेत के शरीर को सहलाना और चूमना शुरू किया. साकेत ने भी काया के शरीर को चूमा, पर ठीक तभी उस की नजर काया के उभारों के बीच के बालों पर पड़ गई और उस का मूड औफ हो गया.

काया के लिए छाती के बीच बालों का होना अब तक एक नौर्मल बात हो चुकी थी, पर साकेत के लिए तो यह एक बदसूरती की निशानी थी और इसीलिए उस ने काया से तलाक ले लेने की बात तक कह दी.

साकेत की यह बात सुन कर काया सन्न रह गई. वह कुछ न बोल सकी. अलबत्ता उस की आंखें जरूर डबडबा आई थीं.

काया के पिता तो उस के बचपन में ही गुजर गए थे. उन की जगह उस की मां ने नौकरी की और काया को पालपोस कर डाक्टर बनाया और उस के बाद कितने अरमानों से उस की शादी कराई थी और आज शादी के कुछ ही दिनों के बाद काया का पति उसे तलाक देने को कह रहा है. क्या गुजरेगी उस की मां पर…

अगली सुबह जब काया अस्पताल जाने के रास्ते में थी कि तभी उस के साथी डाक्टर वासुदेव आनंद का फोन आया, जो काया को जल्दी से अस्पताल आने के लिए कह रहे थे, क्योंकि 2 डाक्टर छुट्टी पर थे और अस्पताल में एक इमर्जैंसी केस आ गया था.

काया जल्दी से अस्पताल पहुंची तो उसे बताया गया कि 24 साल के एक नौजवान की नाक से बहुत खून निकल रहा है. फिलहाल डाक्टर वासुदेव आनंद ने प्राथमिक उपचार दे दिया है, बाकी की जांच और ट्रीटमैंट काया को करना होगा.

वह 24 साल का नौजवान बिस्तर पर लेटा हुआ था और उस के बगल में तकरीबन 50 साल का कोई शख्स खड़ा हुआ था.

काया ने नर्स को मरीज के कुछ जरूरी सैंपल लेने को कहा और मरीज से बातचीत करने लगी. इस बीच डाक्टर वासुदेव आनंद अपने राउंड पर चले गए थे.

काया ने नोटिस किया था कि उस नौजवान का शरीर देखने में काफी मजबूत लग रहा था.

‘‘आप इन के पिता हैं? जरूर इन की किसी से कोई लड़ाई हुई होगी,’’ काया ने उस पास खड़े आदमी की ओर देखते हुए पूछा, तो ट्रैक सूट पहने हुए उस आदमी ने बताया कि वह इस नौजवान का बौक्सिंग कोच है और सुशांतो नाम के इस लड़के को चोट भी मैच प्रैक्टिस के दौरान लगी थी.

इस बीच नर्स खून का सैंपल लेने आ गई थी. उस के सूई इंजैक्ट करते ही सुशांतो ने बड़ी जोर से मुंह बनाया मानो उसे बहुत दर्द हो रहा हो. उस की इस नाटकीयता पर काया मुसकराए बिना न रह सकी.

‘‘बौक्सिंग करते हो और एक छोटी सी सूई से डरते हो,’’ काया ने कहा.

‘‘अरे मैडम, पंच झेलना आसान है. पंच से डर भी नहीं लगता, मगर यह सूई उस से ज्यादा डराती है,’’ पहली बार सुशांतो कुछ बोला था.

सुशांतो की आवाज काफी भारी और रोबदार थी. काया ने एक बार फिर से सुशांतो के चेहरे की ओर देखा. कितना शांत चेहरा था सुशांतो का, मगर इस चोट ने फिलहाल किस तरह उस के चेहरे को बिगाड़ कर रख दिया था. बातचीत रोक कर काया बाकी की जांच करने लगी थी.

काया ने सुशांतो के कोच को बताया कि उसे सुशांतो को तकरीबन 48 घंटे के लिए अस्पताल में छोड़ना होगा और इस के बाद ही वह पूरी तरह से ठीक हो पाएगा. सुशांतो के कोच पूरी तरह आश्वस्त हो गए थे.

शाम को काया घर वापस आई तो उसे कमरे में बैठे साकेत के उतरे और खिसियाहट भरे चेहरे का सामना करना पड़ा. घर आते ही वही सब परेशानियां और शिकायतें.

अस्पताल में तो इतनी समस्याएं, बीमारियों से लड़ते मरीज और परेशानी झेलते उन के परिजन फिर भी सभी के मन में एक उम्मीद होती है कि एक दिन वे अपने मरीज को ठीक होता देखेंगे और उसे अपने घर ले जा सकेंगे, पर काया की जिंदगी में तो कुछ ऐसी समस्या आ चुकी थी, जिस का इलाज तो फिलहाल काया को भी समझ नहीं आ रहा था.

काया ने 1-2 बार साकेत से बोलने की कोशिश की, पर वह काया से बात नहीं करना चाहता था.

बिस्तर पर भी साकेत करवट ले कर ही लेटा रहा. ने काया के उभारों के बीच बालों की बात को उस के साथ हुआ धोखा सम झ लिया था और उभारों के बीच बालों की मौजूदगी उसे प्यार के समंदर में उतरने से पहले ही पस्त कर दे रही थी.

अगले दिन जब काया अस्पताल में सुशांतो के पास पहुची तो सुशांतो बिस्तर पर लेटा हुआ मोबाइल चला रहा था.

‘‘तुम लोग मोबाइल में कितना लगे रहते हो न…’’ काया ने मुसकराते हुए कहा, तो सुशांतो ने बड़े स्टाइल से झट से मोबाइल को तकिए के नीचे छिपा लिया.

काया और सुशांतो के बीच बातचीत बढ़ने लगी थी. सुशांतो उत्तर प्रदेश के तराई इलाके का रहने वाला था. उस के पिता एक प्राइवेट जौब करते थे. उस के घर में एक छोटी बहन भी थी.

पिता चाहते थे कि सुशांतो कोई नौकरी कर ले जिस से घर का खर्चा चले, पर सुशांतो तो फिटनैस फ्रीक था. उस की लगन देखते हुए उस के कालेज के स्पोर्ट्स टीचर ने उसे लखनऊ जा कर बौक्सिंग में कैरियर बनाने को कहा और तभी से वह लखनऊ में केडी सिंह बाबू स्टेडियम में बौक्सिग सीख रहा था.

‘‘आप के आते ही यह कमरा फूलों की खुशबू से भर जाता है डाक्टर मैडम. यह किस परफ्यूम की खुशबू है?’’ बड़े ही अलग अंदाज में सुशांतो ने यह सवाल पूछा, तो काया को थोड़ा अजीब लगा.

काया ने सुशांतो के चेहरे को देखा तो उस के चेहरे पर एक मासूम भोलापन था.

‘‘मेरा मतलब है कि आप का आना मु झे बहुत अच्छा लगता है और सच कहूं, तो आप भी मु झे बहुत अच्छी लगती हैं,’’ एक सांस में कह गया था सुशांतो.

काया बोली, ‘‘एक शादीशुदा डाक्टर से ऐसी बातें करना अच्छी बात नहीं,’’ कहते हुए वह कमरे से बाहर निकल गई और लौबी में रखे एक्वेरियम के पास आ कर खड़ी हो गई. वह रंगबिरंगी मछलियों को देखने लगी.

सभी मछलियां पानी में तैरती हुईं बिना किसी तनाव के औक्सीजन के बुलबुलों से अठखेलियां कर रही थीं. काया ने एक लंबी सांस छोड़ी और अपने केबिन की ओर बढ़ गई.

सुशांतो को आज डिस्चार्ज होना था. उस के कोच उसे लेने आ गए थे.

‘‘अब तुम्हें कोई तकलीफ नहीं होगी. चोट पूरी तरह से ठीक है और अगर समस्या हो तो डायरैक्ट मु झ से बात कर सकते हो,’’ काया ने अपना मोबाइल नंबर देते हुए हुए कहा था.

काया घर आई तो उस की सास ने उसे बताया कि साकत को औफिस के काम से 3-4 दिन के लिए बैंगलुरु जाना पड़ गया.

‘‘अचानक… साकेत कम से कम एक मैसेज तो कर सकता था…’’ काया बुदबुदा उठी.

फिर काया बिस्तर पर लेट गई. उस के जेहन में एक्वेरियम वाली मछलियां घूम रही थीं. तैरती हुईं, आजाद, औक्सीजन के बुलबुलों से अठखेलियां करती हुईं.

अगले दिन ‘डाक्टर्स डे’ था. काया के मोबाइल पर कुछ मैसेज आए थे. काया ने देखा कि ये मैसेज उसे सुशांतो ने किए थे, जिन में उस ने ‘डाक्टर्स डे’ विश करते हुए डाक्टरों की तारीफ के बारे में बहुतकुछ लिखा था… ‘और एक औरत का डाक्टर होना और भी माने रखता है, क्योंकि वह घर और बाहर दोनों जगह के मरीजों को अच्छी तरह से डील करना जानती है…’

काया प्रशांतो का मैसेज पढ़े जा रही थी, जिस में आगे लिखा हुआ था, ‘मेरे बौक्सिंग स्किल से खुश हो कर मेरे कोच आज मु झे नई बाइक दिला रहे हैं. अगर आज आप इस मरीज के लिए थोड़ा समय निकाल सको, तो इस मरीज की तबीयत और भी अच्छी हो जाएगी…’

काया ने मैसेज पढ़ कर खुशी महसूस की और उस का रिप्लाई कर दिया, ‘ओके, आज शाम को 5 बजे मिलते हैं.’

शाम को पौने 5 बजे ही सुशांतो का फोन आ गया. वह बाहर काया का इंतजार कर रहा था.

लाल और काले रंग की स्पोर्ट्स बाइक की सीट पर शान से बैठा हुआ प्रशांतो बहुत हैंडसम दिख रहा था. काया बाइक की सीट पर बैठ गई.

प्रशांतो ने बाइक को थोड़ा आगे बढ़ाया और फिर बाइक की रफ्तार बढ़ा दी. काया के रेशमी बाल हवा में लहराने लगे थे और सड़क पर प्रशांतो सब को पीछे छोड़ कर आगे बढ़ता जा रहा था.

अचानक से जब भी प्रशांतो को ब्रेक लेना पड़ता, तो काया के उभार प्रशांतो की पीठ से टकरा जा रहे थे. प्रशांतो को भी इस बात का अहसास हो रहा था और शायद इसीलिए अब वह बारबार ब्रेक लगाने लगा था.

कुछ देर बाद प्रशांतो ने ‘विबग्योर म्यूजिकल फाउंटेन’ के पास बाइक रोक दी, जहां रंगबिंरगा पानी संगीत की लय के साथ झूम रहा था. गीत के बोल थे, ‘तेरे हाथ में मेरा हाथ हो, सारी जन्नतें मेरे साथ हों…’

गीत ने रोमांटिक माहौल बना दिया था. प्रशांतो ने काया के नरम हाथों को अपने हाथों में ले लिया और
सहलाने लगा.

काया ने भी कोई विरोध नहीं किया. उस के अंदर की डाक्टर इस समय दरकिनार हो गई थी और उस के अंदर की औरत की इच्छाएं बलवती हो रही थीं. दोनों कुछ देर हाथ में हाथ डाले बैठे रहे, पर अचानक आए फोन ने दोनों की इस प्रेम तंद्रा को भंग किया.

काया झट से खड़ी हो गई. उधर से साकेत की आवाज थी, ‘तुम ने अपने शरीर की इस बीमारी को मु झ से छिपाया और मु झ से शादी कर के मु झे धोखा दिया. मैं तुम्हारे साथ और नहीं रह सकता. मुझे तुम से तलाक चाहिए,’ इस के बाद साकेत ने फोन काट दिया था.

साकेत की कड़वी बातें सुन कर काया काफी दुखी हो गई. उसे इस समय किसी साथी की तलाश महसूस हो रही थी. उसे न जाने क्या महसूस हुआ कि वह अपनी उम्र से छोटे प्रशांतो के सीने से लग गई.

एक डाक्टर और मरीज का रिश्ता अचानक सतरंगी हो चला था. आसपास के लोग अजीब नजरों से प्रशांतो और काया को देख रहे थे, पर उन दोनों को अब किसी की परवाह नहीं थी.

काया को घर जा कर नींद नहीं आई. वह एक दोराहे पर खड़ी थी. एक तरफ उस का पति था जो उस से नफरत करता था, दूसरी तरफ प्यार से लबरेज प्रशांतो था… पर क्या उस से कम उम्र का प्रशांतो अल्हड़ या फिर मौकापरस्त तो नहीं था? काया रातभर सोचती रही थी और सुबह होतेहोते वह किसी नतीजे पर भी पहुंच गई थी.

अगली सुबह अस्पताल से ही काया ने प्रशांतो को मैसेज किया, ‘आज मेरा बर्थडे है. मु झे विश नहीं करोगे?’

यह मैसेज पढ़ते ही प्रशांतो खुशी से झूम उठा और ताबड़तोड़ बधाई संदेश और शेरोशायरी भेजने लगा.
‘इन सब की जरूरत नहीं है, शाम को मिल कर केक काटते हैं,’ काया ने मैसेज किया.

प्रशांतो ने ‘थम्सअप’ का इमोजी देते हुए ‘ओके’ का मैसेज भेज दिया.

शाम को प्रशांतो बाइक ले कर पहले से ही खड़ा था. बाइक पर बैठते ही काया ने प्रशांतो को बाइक होटल ‘गोमती राइम्स’ की तरफ मोड़ने को कहा.

गूगल मैप पर लोकेशन देखने के बाद प्रशांतो ने बाइक को उसी दिशा में मोड़ दिया.

तकरीबन 20 मिनट के बाद वे दोनों होटल ‘गोमती राइम्स’ के अंदर थे, जहां पर काया ने खुद ही केक वगैरह का इंतजाम पहले से करा रखा था. यह एक खूबसूरत सा कमरा था, जो हनीमून कपल्स के लिए रिजर्व रखा जाता है.

उन दोनों ने केक काटा और प्रशांतो ने कुछ लाइनें भी बोलीं, जिन्हें वह पहले से लिख कर लाया था, ‘‘काया, तुम से मिलने के बाद तन्हाइयां मु झे भाती हैं, हर तरफ तुम्हारी परछाइयां नजर आती हैं. तुम दुनिया में सब से खूबसूरत हो, तुम्हारे आगे परियां भी कमतर नजर आती हैं.’’

कविता की लाइनें खत्म होते ही काया रोमांचित हो गई थी और प्रशांतो के गले लग गई और उस के मजबूत बदन को सहलाने लगी.

प्रशांतो की नसों में बहता खून लावा बनने लगा था और उस की सांसें भी तेज चलने लगी थीं. प्रशांतो के होंठ आगे बढ़े और काया के होंठों से टकरा गए. वे दोनों एकदूसरे की सांसों की खुशबू महसूस करने लगे थे.

काया ने पूरी तरह से खुद को प्रशांतो के हवाले कर दिया था. काया के बदन से कपड़े अलग हो चुके थे. प्रशांतो के हाथ कभी काया के उभारों को सहलाते तो कभी उन के बीच उगे रेशमी बालों को. कभीकभार प्रशांतो उन बालों को चूम भी लेता था.

काया ने अधखुली मदहोश आंखों से देखा कि प्रशांतो की नजरें उस के उभारों के बालों पर बारबार जा रही थीं, पर उन नजरों उदासी नहीं थी, बल्कि प्यार झलक रहा था.

कमरा दहक चला था. दोनों ने अपनीअपनी मंजिल पा ली थी.

‘‘मेरे इन बालों से तुम्हे नफरत नहीं हुई?’’ धीरे से काया ने पूछा.

‘‘जहां असली प्यार होता है, वहां नफरत के लिए कोई जगह नही होती. और फिर ये बाल तो तुम्हारे रूप की रेशमी परछाइयां हैं. इन्हें तो और प्यार करने की जरूरत है. इन्हें कभी मत हटाना,’’ प्रशांतो ने बालों को सहलाते हुए कहा.

‘‘शादी करोगे एक तलाकशुदा से?’’ काया ने पूछा.

‘‘मेरे जैसे आदमी को एक डाक्टर से अच्छी पत्नी कहां मिलेगी…’’ प्रशांतो ने कहा.

उस दिन के बाद होटल ‘गोमती राइम्स’ का यह कमरा कई बार उन दोनों के प्यार का गवाह बना.

काया ने अपने उभारों के बालों को किसी भी तरीके से रिमूव करना छोड़ दिया था, क्योंकि प्रशांतो को वह सब पसंद थी. किसी भी हार्मोनल गड़बड़ी के चलते आए जिस्मानी बदलाव को वह कमी नहीं मानता था.

उस दिन काया घर पर थोड़ी देर से पहुंची, तो साकेत घर पर नहीं था. काया ने अपना सामान पैक करना शुरू कर दिया था और मैसेज कर के साकेत को बता दिया कि अब वह उस की नफरत और नही सहेगी, क्योंकि वह उसे तलाक देने के लिए तैयार है.

काया ने अपने मैसेज में लिखा, ‘मैं किसी और रूप में किसी और के साथ अपनी नई जिंदगी की तरफ कदम बढ़ाने जा रही हूं. किसी ऐसे के साथ जो मेरे इन बालों की रेशमी परछाइयों को प्यार करेगा, नफरत नहीं.’

इस के बाद काया ने मैसेज भेज दिया था. काया बाहर खड़े प्रशांतो की बाइक पर आ कर बैठ गई. वे दोनों
अपने अरमानों एक नए आसमान की तरफ बढ़े चले जा रहे थे, एक सतरंगी आसमान की तरफ. Story In Hindi

Hindi News Story: दिल्ली की मेयर और जोहरान ममदानी

Hindi News Story: दिल्ली में गुलाबी ठंड शुरू हो चुकी थी, पर अभी भी दीवाली के बाद की घुटनभरी प्रदूषित हवा का गुबार दिल्ली का पीछा नहीं छोड़ रहा था. ऊपर से लालकिला बम धमाके ने दिल्ली और पूरे देश को दहला दिया था. उधर, जेएनयू छात्र संघ चुनाव में एबीवीपी के मुकाबले वामपंथी गुट ने चारों सीटें जीत ली थीं. दिल्ली नगरनिगम के उपचुनाव भी खामोशी से आगे बढ़ रहे थे.

अनामिका अपने कमरे की बालकनी में अखबार पढ़ रही थी. कल रात से विजय भी उसी के साथ था. कल की रात उन दोनों ने बड़ी मस्ती के साथ बिस्तर पर गुजारी थी.

विजय अभी भी सो रहा था. अनामिका सोच रही थी कि दिल्ली की इस बदहाली को क्या दिल्ली का मेयर सुधार सकता है? फिर उसे लगा कि वह आईएएस बन सकती है और मौका मिला तो उसे दिल्ली की मेयर की सीट पर भी अपनी नजर रखनी होगी.

यह सोच कर अनामिका जोश में आ गई और सीधा कमरे में गई. उस ने अपनी एक चुन्नी को माइक की तरह पकड़ा और आईने के सामने चिल्लाने लगी, ‘‘अगर मुझे दिल्ली का मेयर बनने का मौका मिला, तो मैं यहां सुधार के तमाम काम करा दूंगी. आप मुझे एक मौका दें…’’

‘‘यह सुबहसुबह क्या नौटंकी है? क्यों मेरी नींद खराब कर रही हो?’’ विजय ने आंख मसलते हुए पूछा.

‘‘तुम यहां सो रहे हो और दिल्ली को उस की नई मेयर मिल गई है,’’ अनामिका ने हंसते हुए कहा. ‘‘अब यह क्या नया शिगूफा है?’’ विजय ने पूछा.

‘‘यार, मैं सोच रही हूं कि पार्षद का चुनाव लड़ कर दिल्ली की मेयर बन जाऊं,’’ अनामिका बोली.

‘‘मतलब, तुम राजनीति के दलदल में कदम रखना चाहती हो?’’ विजय अब भी हैरान था.

‘‘तो क्या हुआ… मैं पढ़ीलिखी हूं, तर्क के साथ बात करने की तमीज है मुझ में, तो मैं क्यों नहीं दिल्ली की मेयर बन सकती?’’ अनामिका ने सवाल किया.

‘‘शायद तुम भूल गई हो कि चाहे चुनाव पंच का हो या सांसद का, भारत में आज भी वोट जाति और धर्म के नाम पर दिए जाते हैं,’’ विजय बिस्तर छोड़ कर बोला.

‘‘मतलब?’’ अनामिका हैरान हो कर बोली.

‘‘अरे यार, क्या तुम नहीं जानती अपनी जाति के बारे में… मुझ जैसे कुछ लोग तुम्हें जरूर वोट दे देंगे, पर दूसरे लोगों को जाति और धर्म के प्रपंच से कैसे बाहर निकाल पाओगी?

तुम्हारे बिहार के ही विधानसभा चुनाव देख लो. वहां भी धर्म और जाति का बोलबाला रहा. उम्मीदवार की जाति देख कर टिकट दिए गए,’’ विजय ने कहा.

‘‘पर यार, ऐसे तो अच्छे लोग राजनीति में कभी आ ही नहीं पाएंगे,’’ अनामिका बोली.

‘‘पर पहले तुम यह तो बताओ कि तुम पर सुबहसुबह दिल्ली की मेयर बनने का भूत कैसे चढ़ गया?’’ विजय ने पूछा.

‘‘जोहरान ममदानी ने मेरा जोश बढ़ाया है. जब से वे न्यूयौर्क के मेयर बने हैं, मुझे भी लगता है कि दिल्ली की मेयर मैं बन जाऊं,’’ अनामिका ने कहा.

‘‘ओह, तो यह मामला है. न्यूयौर्क से चली हवा दिल्ली तक आ गई है,’’ विजय बोला.

‘‘अरे भई, खरबूजे को देख कर ही तो खरबूजा रंग बदलता है. फिर जोहरान ममदानी में क्या कमी है… बंदा डंके की चोट पर मेयर बना और आते ही उस ने अपने तेवर दिखा दिए हैं,’’ अनामिका बोली.

‘‘तुम जोहरान ममदानी के बारे में जानती ही क्या हो? कौन है वह बंदा जो तुम इतना जोश में आ गई हो?’’ विजय ने चिढ़ते हुए पूछा.

‘‘जोहरान ममदानी के बारे में मैं ने खबरों में काफी खंगाला है. वे एक शिया मुसलिम युगांडाई स्कौलर महमूद ममदानी और भारत की मशहूर फिल्मकार मीरा नायर के बेटे हैं. वैसे, महमूद ममदानी के पूर्वज भी भारतीय हैं. मीरा नायर भारत में एक हिंदू परिवार से हैं.

‘‘तुम ने मीरा नायर की बनाई गई कुछ चुनिंदा फिल्मों के बारे में तो सुना ही होगा, जैसे ‘सलाम बौम्बे’, ‘मानसून वैडिंग’, ‘द नेमसेक’, कामसूत्र-द टेल औफ लव और ‘मिसिसिपी मसाला’. ‘मानसून वैडिंग’ तो मेरी पसंदीदा फिल्मों में आती है,’’ अनामिका बोली.

‘‘और क्या जानती हो तुम जोहरान ममदानी के बारे में? सिर्फ मां के नाम पर तो कोई बड़ा नेता नहीं बन जाता है न…’’ विजय बोला.

‘‘तुम ने सही कहा. चलो, अब तुम्हें मैं जोहरान ममदानी के बारे में थोड़ा तफसील से बताती हूं. उन का जन्म 18 अक्तूबर, 1991 को युगांडा देश के कंपाला इलाके में हुआ था. उन का बचपन युगांडा, दक्षिण अफ्रीका और न्यूयौर्क में बीता.

‘‘अमेरिका में उन्होंने साल 2014 में बौडौइन कालेज से अफ्रीकाना स्टडीज में डिगरी हासिल करने से पहले बैंक स्ट्रीट स्कूल फौर चिल्ड्रन और ब्रोंक्स हाईस्कूल औफ साइंस में पढ़ाई की थी.

‘‘साल 2017 में जोहरान ममदानी राजनीतिक और सामाजिक संगठन ‘डैमोक्रैटिक सोशलिस्ट्स औफ अमेरिका’ में शामिल हो गए थे. उन्होंने साल 2020 में न्यूयौर्क राज्य विधानसभा के लिए चुनाव जीता था, जहां उन्होंने क्वींस के 36वें जिले की नुमाइंदगी की थी.

‘‘फिर वे साल 2022 और साल 2024 के चुनावों में निर्विरोध चुने गए थे. अपने कार्यकाल के दौरान ममदानी ने 20 विधेयकों का समर्थन किया था, जिन में से 3 कानून बन गए थे.

‘‘इतना ही नहीं, जोहरान ममदानी पर अपनी मां मीरा नायर के कला व्यवसाय का भी काफी असर रहा है. वे एक हिपहौप कलाकार भी रह चुके हैं, जो ‘यंग कार्डेमम’ या ‘मिस्टर कार्डेमम’ के नाम से जाने जाते हैं.

‘‘जोहरान ममदानी ने साल 2018 में अमेरिकी नागरिक के रूप में नागरिकता हासिल की थी और इसी साल उन्होंने सीरियाईअमेरिकी कलाकार रमा दुवाजी से शादी की है,’’ अनामिका ने बताया.

थोड़ा रुक कर अनामिका ने आगे बताया, ‘‘34 साल के जोहरान ममदानी ने अपने जबरदस्त अभियान के दम पर यह जीत हासिल की है. वे जब क्वींस से असैंबली मैंबर थे, तब उन्होंने अपने शहर के टैक्सी ड्राइवरों के लिए भूख हड़ताल की थी.

‘‘साल 2021 में 30 साल के ममदानी सिटी हाल पार्क में खड़े हुए और उन्होंने घोषणा की कि वे न्यूयौर्क शहर के टैक्सी ड्राइवरों को कर्ज से राहत दिलाने के लिए शहर के अफसरों पर दबाव डालने के लिए उपवास करेंगे.

‘‘उस समय, उन्हें पद संभाले हुए एक साल से भी कम समय हुआ था. यह हड़ताल टैक्सी मैडेलियन लोन से होने वाले भारी कर्ज के जवाब में की गई थी, जिस ने कई ड्राइवरों को मालीतौर पर बरबाद कर दिया था और कुछ को तो खुदकुशी करने पर भी मजबूर कर दिया था.’’

‘‘तुम्हें पता है न कि जोहरान ममदानी ने भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बारे में क्या कहा था?’’ विजय ने अनामिका से पूछा.

‘‘क्या उन्होंने कुछ गलत कहा था?’’ अनामिका बोली, ‘‘हां, चुनाव जीतने ने बाद उन्होंने जवाहरलाल नेहरू के बारे में अपने विचार रखते हुए कहा था कि आप के सामने खड़े हो कर मैं जवाहरलाल नेहरू के शब्दों के बारे में सोचता हूं कि एक ऐसा क्षण आता है, जब हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाते हैं. जब एक युग का अंत होता है और लंबे समय से दमित राष्ट्र की आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है. आज रात हम ने पुराने से नए युग में कदम रख लिया है.’’

यह सुन कर विजय ने कहा, ‘‘पर जोहरान ममदानी ने न्यूयौर्क शहर के मेयर पद के अपने प्रचार अभियान के दौरान भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ले कर विवादास्पद बयान दिया था.

‘‘एक मेयर फोरम के दौरान उन्होंने कहा था कि मोदी को उसी तरह देखा जाना चाहिए, जैसे लोग इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू को देखते हैं.
‘‘जब उन से यह सवाल पूछा गया कि अगर नरेंद्र मोदी न्यूयौर्क आएं, तो क्या वे उन से मुलाकात करेंगे, तो उन्होंने कहा था कि यह व्यक्ति (नरेंद्र मोदी) एक युद्ध अपराधी है.

‘‘जोहरान ममदानी ने यह भी कहा था कि उन के पिता का परिवार भारत के गुजरात राज्य से है. यह वही राज्य है जहां 2002 में हुए सांप्रदायिक दंगों के दौरान तकरीबन 1,000 मुसलमानों की मौत हुई थी.

‘‘उन्होंने आरोप लगाया कि उस समय मोदी की सरकार ने इन घटनाओं को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. नरेंद्र मोदी ने गुजरात में मुसलमानों के खिलाफ बड़े पैमाने पर हिंसा को इस हद तक बढ़ावा दिया कि आज कई लोग मानते हैं कि वहां अब मुसलमान बचे ही नहीं हैं.’’

‘‘पर किसी नेता को दूसरे नेता के बारे में अपने विचार रखने का हक है…’’ अनामिका बोली,’’ उन्होंने तो डोनाल्ड ट्रंप पर भी निशाना साधा था. उन्होंने कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप को अगर कोई हराने का तरीका दिखा सकता है, तो वह शहर ही है, जिस ने उन्हें जन्म दिया है.

‘‘अगर किसी तानाशाह को डराने का कोई तरीका है, तो वह उन हालात को खत्म करना है, जिन्होंने उसे सत्ता हासिल करने में मदद की. ममदानी ने ट्रंप पर अमेरिका को धोखा देने का आरोप लगाया.

‘‘और तुम यह क्यों नहीं समझ रहे हो कि न्यूयौर्क और न्यूजर्सी वे शहर हैं, जहां भारतीय अच्छीखासी तादाद में रहते हैं. अमेरिका में सब से ज्यादा भारतीय न्यूयौर्क में ही रहते हैं. तुम्हें नहीं लगता कि न्यूयौर्क और न्यूजर्सी जैसे शहरों में हारना डोनाल्ड ट्रंप के लिए सीधा मैसेज है.

‘‘भारतीयों का वोट उन्हें पाना है, तो भारत के प्रति सौफ्ट रहना होगा. ट्रंप अगर यह सोच रहे हैं कि भारत के खिलाफ कड़ा रुख अपना कर वे चुनाव जीत लेंगे, तो यह नहीं हो सकता.’’

‘‘मुझे तो यह दूर के ढोल सुहावने जैसे लगने वाली बात लगती है. डोनाल्ड ट्रंप बहुत ही माहिर खिलाड़ी हैं.
वे जोहरान ममदानी को इतनी आसानी से राजनीति नहीं करने देंगे,’’ विजय बोला.

‘‘तुम जोहरान ममदानी के नाम पर इतना उखड़ क्यों रहे हो? बात मेरे मेयर बनने के सपने को ले कर शुरू हुई थी. वैसे भी जब तक हम सपने नहीं देखेंगे, तब तक उन्हें पूरा करने की ताकत कैसे आएगी?

‘‘माना कि भारत में धर्म और जातिवाद के नाम पर सियासत की जाती है और नेता चुने जाते हैं, पर अभी भी इतना अंधेरा नहीं हुआ है, जितना तुम सोच रहे हो. मैं मेयर बनूं या न बनूं, पर मुझे यह तो समझ आया है कि सियासत की राह कभी भी आसान नहीं होगी.’’

‘‘अनामिका, मेरा वह मतलब नहीं था. तुम बहुत होशियार हो, पढ़ीलिखी हो और तुम में जनता के दुखदर्द को समझ सकने की काबीलियत है, पर यह काम तो तुम आईएएस बन कर भी कर सकती हो,’’ विजय ने कहा.

‘‘तुम्हारी बात में दम है. पर मुझे मौका मिला तो मैं दिल्ली की मेयर जरूर बनूंगी. फिर देखना कैसे मैं दिल्ली का सुधार करती हूं,’’ अनामिका ने हंसते हुए कहा.

‘‘ठीक है, पर अब जरा हम फ्रैश हो कर कौफी पीने चलें, क्योंकि इस गरमागरम बहस के बाद मुझे कौफी पीने की तलब लग गई है,’’ विजय बोला.

‘‘नेकी और पूछपूछ… जल्दी चलो और मुझे भी मस्त सी कौफी पिलवाओ,’’ अनामिका ने विजय के गले में अपनी बांहें डालते हुए कहा और उसे प्यार से चूम लिया. Hindi News Story

Story In Hindi: कोचिंग के पैसे

Story In Hindi: ‘‘तो आप और पैसे नहीं देंगे?’’ अशोक ने पूछा.

‘‘अरे, कहां से ला कर दूं तुम्हें. ये 10,000 रुपए कम हैं क्या… अब तुम अपने खर्च बढ़ा लो, तो मैं क्या कर सकता हूं. और अब हम से नहीं होगा,’’ अशोक के पिताजी ने कहा.

‘‘दे दीजिए न. अब बाहर रहता है, तो खर्चे तो होंगे ही,’’ अशोक की मां मन्नू देवी जब अपने पति बजरंगी बाबू से बोलीं, तो वे मानो गरजने लगे, ‘‘अभी खेती के पीछे इतने खर्चे तुम लोगों को नहीं दिख रहे क्या…

‘‘पहले ही कम बारिश के चलते खेती के पटवन के पीछे डीजल खरीदने में ही हालत खराब थी. भाड़े पर ट्रैक्टर लिया, तो खेत की जुताई हुई.

‘‘फिर बीज और खाद के पीछे अच्छीखासी रकम खर्च हो गई. अभी फसल थोड़ी ठीक लग रही, तो कीड़ों का प्रकोप शुरू हो गया है. उस के लिए भी दवाओं का छिड़काव करना होगा.

‘‘वासंती फसल में जो थोड़ीबहुत रकम आई थी, वह सब इन सब के पीछे स्वाहा हुई जा रही है. भंडार में देख लो जा कर. मुश्किल से 4-6 बोरा अनाज होगा. और शारदीय फसल तैयार होने में 2-4 महीने तो लग ही जाएंगे. यह खेती न हुई, खर्चों का घर हो गया. और इस को शहर की हवा लग रही है…’’

‘‘अभी पढ़ रहा है, तो खर्चे होंगे ही…’’ मन्नू देवी ने भी जवाब दिया, ‘‘यह खर्चा कहां गलत हो रहा है. कल को इस की नौकरी लगी, तो भरभर थैली रुपए बटोरते रहिएगा.’’

‘‘भरभर थैली… इतना आसान है नौकरी, जो मिल जाएगी. देख तो रहा हूं औरों को, पढ़लिख कर मारेमारे फिर रहे हैं,’’ बनारसी बाबू बोले.

‘‘अशुभ क्यों बोलते हैं जी. जो सब के साथ हुआ, वह कोई जरूरी थोड़े ही है कि हमारे साथ भी हो. शुभशुभ बोलो जी,’’ मन्नू देवी ने कहा.

‘‘सही बोल रहा हूं. और जो इस की नौकरी लगी, तो क्या सब हमारी ही जेब में रख जाएगा… इसी गांव में नौकरी करने वालों को भी देख रहा हूं कि वे क्या करते हैं…’’ बनारसी बाबू गुस्से में बोले.

‘‘फिरफिर वही बात. अरे, हम अपना फर्ज निभा दें, यही बहुत है. अभी हमारा जांगर चलता है, फिर बेटों से आस क्या रखना,’’ मन्नू देवी ने कहा.

अंदर कमरे में अपना बैग ठीक करता हुआ अशोक भनभना रहा था, ‘‘जब खर्चा नहीं दे सकते, तो बाहर शहर में पढ़ाने का शौक ही नहीं रखना था. अब वहां खर्चे हैं, तो हैं. उसे वह कैसे रोक सकता है. कुछ तो शहर का स्टैंडर्ड रखना ही होता है. अभी से उधर ध्यान नहीं दिया, तो आगे का भगवान ही मालिक है.’’

‘‘थोड़ा सम झा करो बाबू मेरे,’’ मां मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘बाप हैं तुम्हारे, कोई दुश्मन नहीं हैं. थोड़ा तुम भी सम झा करो कि वे ठीक कह रहे हैं कि नहीं. हर बाप का शौक होता है कि उस का बेटा खूब पढ़ेलिखे. इस में गलत क्या है?’’

‘‘तो मैं भी गलत कहां हूं मां. वहां शहर में जैसेतैसे तो नहीं रहा जा सकता न… सुमिरन साव के बेटे रतन को देख लो. ठाट से रहता है वहां. उस के जैसा खर्च करना तो मैं सोच भी नहीं सकता. फिर भी ढंग से रहना तो पड़ेगा ही. कोचिंग और पढ़ाई के अलावा खानेपीने, कौपीकिताब, टैंपोभाड़ा के खर्चे को कौन रोक सकता है…’’

अशोक अभी भी तैश में था, ‘‘वहां लड़के ही नहीं, लड़कियां भी साथ पढ़ती हैं. उन के साथ फटेपुराने कपड़े पहन कर तो नहीं रहा जा सकता न. अभी पूजा का मौसम है. मु झे भी नए कपड़े खरीदने ही होंगे. मैं खुद सस्ते में काम चलाता हूं. मगर तुम लोगों को लगता है कि मैं वहां ऐयाशी करता हूं.’’

‘‘ये कौन कह रहा है रे. 10,000 में आजकल क्या होता है…’’ मन्नू देवी उसे पुचकारती हुई बोलीं, ‘‘मैं अपने राजा बेटा को नहीं जानती क्या कि कितने कम खर्च में वह काम चलाता है.’’

‘‘साफसाफ कह देता हूं कि इस बार जो नए कपड़े नहीं खरीद पाया, तो छठ और दीवाली पर नहीं आऊंगा,’’ अशोक ने कहा.

मन्नू देवी के तो हाथपैर फूल गए. बाप रे, दीवाली और छठ जैसे पर्व में यह नहीं आया, तो किस के बूते वह इसे पार घाट लगाएगी. घर की साफसफाई से ले कर, छठ त्योहार का सारा इंतजाम तक यही दौड़दौड़ कर पूरा करता है. 2 साल पहले एक बार नहीं था, तो उन्हें कितनी परेशानी हुई थी.

इस के बाबूजी को तो जैसे कोई मतलब ही नहीं कि घर की साफसफाई कैसे होगी, और कि क्याक्या सामान चाहिए. उस के दोनों बच्चे अरुण और नन्ही इतने छोटे हैं कि उन्हें बाहर भेजने में डर लगता है. खेत से पूजा के लिए गन्ना लाने से ले कर, पूजा के लिए मौसमी फलों तक के इंतजाम अशोक कितनी तेजी से कर जाता है.

छठपूजा के समय तो मन्नू देवी घर में तकरीबन 2 दिनों तक पूजा के पकवान, ठेंकुआ वगैरह बनाने में बिजी हो जाती हैं कि बाहर निकलने का मौका ही नहीं मिलता. ऐसे में निर्जला उपवास किए बाहर निकलने की ताकत भी कहां रह जाती है.

घर से घाट और घाट से घर दौरा को सिर पर रख कर 3 किलोमीटर दूर नदी तक आनाजाना मामूली बात है क्या. वहां भी इतनी भीड़ और गहमागहमी रहती है. मन्नू देवी यह रिस्क तो नहीं ही ले सकतीं. ऐसे में अशोक नहीं आया, तो उन का मरण हो जाएगा.

बजरंगी बाबू खेतों की ओर जा रहे थे. मन्नू देवी दोबारा पति के पास आ कर निहोरा करने लगीं, तो वे चिल्ला कर बोले, ‘‘मेरे पास अभी नकद कुछ नहीं है. उस को कहो कि एक मन अनाज निकाल कर बेच आए और पैसा ले जाए.’’

अब यहां कौन सा तराजूबटखरा रखा था, जो कोई एक मन अनाज तुलवाता. मन्नू देवी आननफानन बगल में रह रहे भगलू राम को बुला लाईं. उस के सिर पर एक बोरा अनाज रखवाया और अशोक को आवाज देने लगीं, ‘‘अशोक, जरा इधर आना. यह अनाज ले कर सुमिरन साव के आढ़त पर तुलवा कर पैसे ले आना.

बाकी बचा अनाज यहीं रखवा देना.’’

अशोक सारी बातें सुन चुका था, इसलिए बैग में कपड़े रखना छोड़ बाहर निकल आया.

‘‘बाबूजी ने एक मन अनाज बेचने को कहा है… मन्नू देवी बोलीं, ‘‘बाकी अनाज इसी भगलू के सिर पर रख कर वापस ले आना.’’

बाजार में आढ़त पर बोरे का मुंह खुलवा कर गेहूं के दानों को देख कर सुमरिन साव मुंह बनाते हुए बोले, ‘‘घटिया माल है. इस को तो 15 रुपए किलो की दर से ही लेना होगा.’’

‘‘अरे, अभी तो यह 20 रुपए किलो की दर से चल रहा है,’’ अशोक ने हैरत से कहा.

‘‘इस सरकार ने फ्री राशन बांट कर सारा धंधा मंदा कर दिया है,’’ सुमिरन साव अपने चिड़चिड़े अंदाज में बोला, ‘‘हम भी कौन सा खैरात खाने वाले हैं.’’

‘‘खैरात खाने की तुम्हें क्या जरूरत. ऐसे ही नहीं तुम ने बिल्डिंगें और गोदाम बना लिया है…’’ अशोक बुदबुदाया, यही अनाज शहरों में आटे के रूप में 40 रुपए किलो की दर से उसे खरीदना होता है. लेकिन गांव में कोई ढंग का खरीदार भी तो नहीं. 40 किलो अनाज के 600 रुपए अशोक के हाथ में आए, तो वह भुनभुनाया, ‘‘इन 600 रुपए में क्या होगा. एक जींस पैंट ही 1,000 रुपए में आती है. उस पर 3-4 टीशर्ट लेनी हैं, वे भी 1,000 रुपए की पड़ जाएंगी. एक नए डिजाइन का जूता भी लेना है.

‘‘इस के अलावा बाकी के खर्चे अपनी जगह. सैलून में हेयर कटिंग, 3-4 तरह के इत्र, शैंपू, साबुनतेल वगैरह के भी तो खर्चे हैं.’’

अभी तो अशोक ने अपने खर्चे में कौपीकलम और किताब को जोड़ा ही नहीं. 1-1 गाइड ही 500 में आती है. उस ने एक स्टडी लाइब्रेरी में एडमिशन ले रखा है, जिस का मासिक किराया ही 1,000 है. फिर लौज के कमरे का 4,500 का किराया है. ढाबे पर जो वह नियमित दोनों टाइम भोजन करता है, उसे 3,000 महीना देना होता है.

कोचिंग आनेजाने के लिए जो टैंपो का भाड़ा है, उस में भी 1,000 रुपए निकल जाते हैं. इतना तब है, जब वह कितनी कंजूसी के साथ काम चलाता है. और बाप है कि 10,000 से एक रुपया ज्यादा देने को तैयार नहीं है.

अशोक ने तत्काल सारे गेहूं तुलवा दिए. कोई 100 किलो थे. सुमिरन साव ने उसे 1,500 सौ पकड़ा दिए.

घर वापस आ कर अशोक ने देखा, मां काम पर लगी थीं. भगलू अभी भी वहीं खड़ा था. उसे 20 रुपए उस के मेहनताने के देने थे.

अचानक अशोक ने भगलू से कहा, ‘‘एक बोरा अनाज और निकालो और मेरे साथ चलो.’’

सुमिरन साव के यहां वह अनाज तुलवा कर उस ने पैसे लिए. अब उस के पास 3,000 रुपए थे.

बाबूजी ने अशोक को मासिक खर्च के 10,000 पहले ही दे दिए थे. अब ये 3,000 और हैं. उस ने विचार किया कि इतने पैसे से उस का ऐक्स्ट्रा काम चल जाएगा.

अशोक भगलू को 50 का नोट थमाते हुए बोला, ‘‘मां और बाबूजी को मत बताना कि हम ने एक बोरा अनाज और निकाला है. वे यहां कौन गिनती करने आएंगे कि कितने बोरा अनाज निकला है. इतना अनाज तो यहां चूहे और कीड़े खा जाते हैं.’’

भगलू कुछ समझा, कुछ नहीं समझा. उसे जल्दीजल्दी ताड़ीखाने जो जाना था. उस के हाथ में 50 का एक करारा नोट फड़फड़ा रहा था. Story In Hindi

Best Hindi Story: ब्रा

Best Hindi Story: ‘‘उफ, इन औनलाइन शौपिंग वालों ने तो हमारा सारा कामधंधा ही चौपट कर दिया है,’’ सिलाई मशीन के पायदान पर पैर रखे हुए नौरीन अपनेआप से बुदबुदाते हुए बोल रही थी.

नौरीन की परेशानी की वजह यह थी कि अब उस के पास लोग कपड़े सिलवाने कम आते थे. हर हाथ में मोबाइल है. बस, मोबाइल उठाया और अपनी पसंद के कपड़े औनलाइन मंगवा लिए.

भारत और नेपाल की सीमा पर बसा हुआ यह कसबा रौनक से भरा रहता था. सीमा पर बसे होने के चलते चहलपहल बराबर बनी रहती थी. इस कसबे में जरूरत की सारी चीजें बड़ी आसानी से मिला करती थीं.

इस कसबे के जहीन बाग नामक महल्ले में नौरीन और उस की छोटी बहन रोशनआरा रहती थीं. नौरीन 22 साल की हो गई थी और सिलाई का काम कर के घर का खर्चा चलाती थी. कई बार तो उस ने सोचा कि सिलाई का काम बंद कर के कोई परचून की दुकान ही खोल ली जाए, कम से कम बोहनी तो हो जाया करेगी.

सिलाई के काम में तो कभीकभार कोई ग्राहक आता ही नहीं और घर से सिलाई का काम करने वाली नौरीन के पास कपड़े सिलवाने के ग्राहक के रूप में रजिया, फातिमा, सुनीता जैसे आसपास के दूसरे लोग ही आते थे. इन में से बहुत सी औरतें तो इतनी शर्मीली होती थीं कि कुरती का नाप देने में भी शर्म करती थीं.

इस बात पर नौरीन मुसकराते हुए कहती, ‘‘घबराओ मत भाभी, घर में कोई मर्द नहीं है और न ही कोई कैमरा लगा हुआ है, आराम से नाप दो.’’

नौरीन ने 12वीं तक पढ़ाई करने के बाद पढ़ाई छोड़ दी थी, क्योंकि घर का खर्चा चलाने के लिए उस का कमाना जरूरी था, इसलिए उस ने सिलाई के काम में अपनी अम्मी का हाथ बंटाना शुरू कर दिया. पहले तो अम्मी के पास खूब काम आता था. सलवारसूट, ब्लाउज के अलावा छोटे बच्चों की कमीजें तक सिलती थीं अम्मी.

कितनी लगन से नौरीन ने सिलाई का काम सीखा और जब अम्मी कमर दर्द से दोहरी हो जातीं, तो नौरीन उन्हें आराम करने को कहती और खुद मशीन के पायदान पर पैर जमा कर बैठ जाती और हलकेहलके पैर चला कर सिलाई करती.

उम्र के 22वें साल में नौरीन के कुंआरे और गोरे चेहरे पर चमक आने लगी. तभी उस की जिंदगी में अहमद की मुहब्बत ने दस्तक दी.

अहमद 25 साल का एक नौजवान था, जो लखीमपुर शहर का रहने वाला था और डिलीवरी बौय का काम करता था. काम के सिलसिले में नौरीन से निगाहें मिलीं और दोनों कब इश्क में गिरफ्तार हो गए, पता ही नहीं चला.

हालांकि, नौरीन की अम्मी को भी इन दोनों के फलतेफूलते इश्क का अहसास हो गया था, पर उन्होंने कभी कोई रोकटोक नहीं लगाई.

‘‘नौरीन के अब्बू नहीं रहे, भला इस उम्र में मैं कहां लड़का ढूंढ़ने जाऊंगी… अच्छा है बच्चे अपने मन से ही अपना साथी चुन लें तो…’’ अपनेआप से अकसर कह उठती थीं नौरीन की अम्मी.

दिन का 10 बजने को थे. नौरीन के मोबाइल पर अहमद का फोन आया, ‘शहर जा रहा हूं. मेरा दोस्त राज जिस होटल में काम करता है, वहां पर बड़े लोगों का सैमिनार है. हम दोनों चलते हैं. मुझे शहर में कुछ देर का काम है, फिर हम दोनों सैमिनार में बैठेंगे, खापी कर शाम तक वापस आ जाएंगे,’ अहमद ने एक सांस में यह बात कह दी थी.

मौसम भी सुहावना था और अहमद के साथ घूमने जाने की बात सुन कर नौरीन का मन भी मचल उठा था.
नौरीन ने अम्मी को बता दिया था कि वह अहमद के साथ शहर तक जा रही है, शाम तक वापस आ जाएगी.

अम्मी ने नौरीन के अहमद के साथ जाने पर कोई एतराज नहीं जताया और कहा, ‘‘अपना ध्यान रखना और शाम को जल्दी वापस आना.’’

अहमद और नौरीन बाइक पर बैठ कर शहर की ओर जाने लगे. शहर यहां से 30 किलोमीटर दूर था, पर नौरीन सोच रही थी कि काश शहर कभी न आए, बस वह यों ही अहमद के पीछे बैठ कर सफर करती रहे.

‘ग्रैंड रौयल्स’ नाम के एक होटल में वे दोनों पहुंच गए थे. अहमद ने अपने दोस्त राज से मुलाकात की और फिर वे तीनों उस हाल में गए, जहां पर सैमिनार चल रहा था. अहमद और नौरीन एकसाथ बैठ गए थे.

मंच पर 35 साल की एक खूबसूरत सी महिला ने बोलना शुरू किया, ‘‘हमारे इस सैमिनार का विषय कुछ हट कर है. दरअसल, यह कार्यक्रम महिलाओं की ‘ब्रा’ पर है. शहर में तो महिलाएं जागरूक हैं, पर हमारा अभियान गांव और कसबों की महिलाओं के बीच जागरूकता फैलाने का है, जो शर्म के चलते या तो ब्रा नहीं खरीदती हैं या फिर गलत ढंग की ब्रा पहनती हैं, जिस के चलते उन्हें पीठ दर्द तक का सामना करना पड़ता है…’’

नौरीन यह सब सुन कर पहले तो शरमाने लगी, पर जब उस महिला ने आगे काम की बातें बतानी शुरू कीं, तो उसे अच्छा लगने लगा.

‘‘हमें कसबों और गांवों की महिलाओं के मन से ब्रा के लिए छिपी शर्म निकालनी होगी. अरे भई, ब्रा महज कुछ कपड़ों का जोड़ ही तो है, जिसे हम अपने शरीर को सपोर्ट देने के लिए कुरती या ब्लाउज के अंदर पहनते हैं. अब भला इसे छिपा कर सुखाना या फिर इस की स्ट्रिप को दिख जाने से रोकना, इस में भला झिझकने की क्या बात है?’’ वह महिला बड़े अच्छे ढंग से समझा रही थी.

नौरीन गौर किया कि पीछे के बैनर पर उन की संस्था का नाम ‘नारी मन’ लिखे होने के साथ एक संदेश भी लिखा हुआ था, ‘हमारी ब्रा, हमारा शरीर, एक अभियान है. कब बदलेगा समाज, सवाल अनजान है’.

नौरीन ने बैनर पर लिखा हुआ मैडम की संस्था का मोबाइल नंबर नोट कर लिया और अहमद और नौरीन चाय और नाश्ता करने के बाद वापस कसबे की ओर चल दिए.

शाम को जब नौरीन घर पहुंची, तो उस ने अपनी अम्मी से उन की पुरानी संदूकची खोलने को कहा, तो अम्मी जरा चौंकीं, ‘‘अब भला तुझे उस संदूकची से क्या काम पड़ गया?’’

बदले में नौरीन ने मुसकराते हुए उस संदूकची को बिस्तर के नीचे से घसीटते हुए बाहर निकाला और खोलने लगी. उस संदूकची में अम्मी की उन की जवानी के दिनों की सैटिन की ब्रा लपेट कर रखी हुई थी.

नौरीन ने उस ब्रा को खोला और उलटपलट कर देखने लगी. उसे ऐसा करते देख कर अम्मी शर्म से गड़ गईं, ‘‘अरे मुई, यह तुझे क्या हो गया?’’ अम्मी अब भी शर्म से लाल थीं.

अम्मी को पुरानी बात याद आई, जब यह ब्रा नौरीन के अब्बू बाजार से खरीद कर लाए थे और कई बार अकेले में इसे पहन कर दिखाने के लिए कहा था, मगर उस जमाने में संयुक्त परिवार में रहने वाली अम्मी के लिए ऐसी डिजाइनर और सुर्ख लाल रंग की ब्रा को पहनने के बाद धोने और सुखाने में काफी परेशानी का सामना करना पड़ता था, इसलिए नौरीन की अम्मी कभी भी यह ब्रा पहन नहीं सकीं और कपड़ों के बीच लपेट कर इस संदूकची में रख दिया था.

नौरीन ने अम्मी की लाल ब्रा पकड़ कर हवा में लटका दी और उसे चारों तरफ से देखने लगी. उस की यह हरकत अब अम्मी को नागवार गुजर रही थी. उन्होंने अब नौरीन को डांटना चाहा, पर नौरीन बोल पड़ी, ‘‘अम्मी, मैं सोच रही हूं कि क्यों न हम ब्रा सिलने का ही काम शुरू कर दें…’’

नौरीन की यह बात सुन कर अम्मी ने अपना माथा पीट लिया, पर नौरीन ने उन्हें समझाया कि हमारे कसबे में रेडीमेड कपड़ों सभी दुकानों पर मर्द बैठे हैं. ज्यादातर महिलाएं उन से ब्रा खरीदते समय इतनी संकोच से भरी रहती हैं कि वे खरीदते समय ब्रा का साइज और क्वालिटी देखती तक नहीं और गलत साइज की ब्रा पहनते रहने से उन के शरीर का आकार खराब हो जाता है और कई बार वे पीठ दर्द से भी परेशान रहती हैं.

इस के बाद नौरीन बोली, ‘‘अम्मी, क्या हम घर पर इसी सिलाई मशीन से रेडीमेड जैसी दिखने वाली ब्रा सिल सकती हैं?’’

नौरीन ने पूछा तो अम्मी ने सकुचाते हुए कहा, ‘‘अगर घर पर कुछ जरूरी सामान जैसे इलास्टिक, हुक और प्लाटिक के कुंडे वगैरह खरीद लिए जाएं, तो घर पर रेडीमेड जैसी ब्रा बनाई जा सकती हैं, क्योंकि कुछ कपड़ों की खास तरह की कटिंग को जब सफाई से सिला जाता है, तो ब्रा तैयार हो जाती है और इस में और ज्यादा खूबसूरती लाने के लिए इस के कपड़े पर फूलबूटे और चिकन की कढ़ाई तक की जा सकती है.’’

अम्मी को भी नौरीन की बातें अब जंच तो रही थीं, पर उन के मन में शक था कि ये ब्रा उन से औरतें खरीदेंगी भी या नहीं?

‘‘अरे अम्मी, क्यों नहीं खरीदेंगी? जब उन को अच्छे कपड़े की ब्रा हमारे पास ही मिलेगी, जिसे वे कमरे में आराम से पहन कर आगेपीछे से चैक कर लेंगी और अपने बदन पर आराम महसूस करेंगी, तो भला कौन नहीं खरीदना चाहेगा…’’ नौरीन ने उम्मीदभरी बातों से अम्मी का मन मोह लिया था.

नौरीन ने अब उस ‘नारी मन’ संस्था की आंचल मैडम को फोन लगाया और अपने और अपने कसबे के बारे में सबकुछ बताते हुए उन्हें ब्रा के बिजनैस के बारे में बताया.

नौरीन का आइडिया सुन कर आंचल मैडम बहुत खुश हुईं और उन्होंने नौरीन को खूब सराहा और ब्रा सिलने के सामान से ले कर हरमुमकिन मदद देने का वादा किया.

नौरीन ने अपने पते पर ब्रा सिलने का कुछ सामान मंगवा लिया था. बस, अब चुनौती थी कि इन सब सामान को साथ ले कर बढि़या और आरामदायक ब्रा कैसे बनाई जाए. सो, इस के लिए नौरीन ने सिलाईकढ़ाई विशेषांक की पुरानी पत्रिकाएं पढ़ीं, कुछ मदद इंटरनैट से ली और बाकी का काम नौरीन की अम्मी ने आसान कर दिया.

दिनरात की मेहनत के बाद कुछ ब्रा झने कपड़े की तो कुछ कौटन की तैयार हो गई थीं. अब बारी थी कस्टमर ढूंढ़ने की, तो इस के लिए नौरीन ने एक तार पर ब्रा को लटका दिया और बड़े अक्षरों में लिख दिया, ‘यहां महिलाओं की पसंद के अनुसार हर साइज की ब्रा बनाई जाती हैं’.

जब भी कसबे की औरतें अपने सूट वगैरह का नाप देने आतीं, तो उन की नजर इस वाक्य पर जरूर पड़ती.

‘‘तो क्या आप ब्रा भी सिलती हैं?’’ एक दिन फरजाना ने हिम्मत कर के पूछ ही लिया.

फरजाना 40 साल की मोटी औरत थी और अभी तक की जिंदगी में मारे शर्म के वह सही ब्रा का चुनाव नहीं कर पाई थी, इसलिए उस का शरीर हमेशा ढलकाढलका रहता था.

नौरीन फरजाना अंदर कमरे में ले गई और एक आदमकद शीशे के सामने खड़ा कर दिया और ढेर सारी ब्रा उस के सामने रख दीं.

‘‘हमारे यहां आप बेखटक अपनी पसंद की ब्रा पहन कर ट्राई करो और पसंद आए तभी खरीदो,’’ नौरीन ने कहा और कमरे से बाहर चली गई.

फरजाना को यह अहसास पहली बार मिल रहा था. कितना हलकापन सा महसूस हो रहा था उसे जब उस ने अपने पसंदीदा गुलाबी रंग की ब्रा को अपने तन पर कसा और हुक लगाने के बाद चारों तरफ से अपने मोटे शरीर को निहारा. आज पहली बार उस की पीठ और कंधों को आराम मिल रहा था. उस ने शीशे में पहली बार अपना यह रूप देखा और शरमा गई. कितनी खूबसूरत लग रही थी वह इस गुलाबी ब्रा में.

फरजाना के द्वारा नौरीन के काम की तारीफ सुन कर और भी औरतें नौरीन के पास पहुंचीं और धीरेधीरे ब्रा बेचने का काम तेजी से चल निकला. अब तो जो औरत सिलाई करवाने आती कम से कम 2-3 ब्रा तो जरूर ही खरीदती.

नौरीन और उस की अम्मी बराबर सिलाई करती रहतीं, पर फिर भी नौरीन को इतना काम और उस से होने वाली आमदनी भी 3 लोगों का परिवार चलाने के लिए काफी नहीं लग रही थी.

इस के लिए नौरीन ने अहमद की मदद ली और कुछ छोटेछोटे परचे छपवाए और कसबे में या लखीमपुर शहर में जहां भी अहमद डिलीवरी करने जाता, तो ये परचे भी डिलीवरी करते समय ग्राहक को पकड़ा देता और मुसकरा कर कहता, ‘‘जी हमारे घर की औरतों ने काम शुरू किया है. एक बार सेवा का मौका जरूर दें.’’

यह कदम तो काफी आशावादी था, पर नौरीन को इस का फायदा तब दिखा, जब उस की दुकान में औरतों की तादाद में इजाफा दिखा.

अब तो अम्मी सिलाई मशीन पर बैठी रहतीं और नौरीन बराबर औरतों के ब्रा का नाप लेती रहतीं. यहां पर औरतों को बड़ा फायदा यह मिल रहा था कि वे अपने पसंद की ब्रा सिलवा सकती थीं. मसलन कपड़े और रंग का चुनाव, सीने पर आने वाले कप का चुनाव और स्ट्रिप की मोटाई और पतलापन… ये सब वे अपनी पसंद के मुताबिक बनवा सकती थीं.

अब तो नौरीन ने अपनी दुकान का नाम भी रख दिया था और यह नाम था ‘34 बी’.

यह एक ब्रा के साइज का नंबर होता है, इसलिए पहलेपहल तो नौरीन के काम का मजाक बना. अम्मी ने भी नौरीन से कहा कि वह कम से कम नाम तो कुछ ढंग का रख ले, महल्ले वाले क्या कहेंगे?

पर नौरीन ने अपनी बात रखते हुए कहा, ‘‘यह नाम मुझे महिलाओं की सोच बदलने में मदद करेगा. ब्रा पहनना या ब्रा का दिख जाना कोई गलत बात तो नहीं, जो इसे छिपाया जाए.’’

नौरीन ने अपना काम फैलाने और जागरूकता जगाने के लिए कसबे के ‘कन्या पाठशाला’ की प्रिंसिपल के साथ मिल कर लड़कियों और टीचरों के साथ एक गोष्ठी का आयोजन किया और लड़कियों को सही साइज की ब्रा पहनने के लिए बढ़ावा दिया.

बुटीक नंबर ‘34 बी’ का नाम अब कसबे और कसबे के बाहर भी फैल रहा था.

अम्मी ने एक बार फिर से नौरीन से बुटीक का नाम बदलने के लिए भी कहा पर नौरीन नहीं मानी. ‘34 बी’ नाम रखना तो एक बहाना है, असली मकसद तो औरतों की झिझक को बाहर भगाना है.

नौरीन और अम्मी के इस बुटीक की धूम चारों ओर छा चुकी थी. इसी बीच नौरीन के पास आंचल मैडम का फोन आया कि नौरीन और उस की अम्मी को उन की संस्था ने महिलाओं की शर्म और झिझक खत्म करने का अभियान चलाने के लिए सम्मानित करने का निश्चय किया है और इस महीने की 10 तारीख को उन दोनों लोगों को लखीमपुर में ‘इंदिरा आडिटोरियम’ में पहुंचना है, जहां पर उन्हें सम्मानित किया जाएगा.

नौरीन के लिए तो यह अनुभव नया था ही, पर इस से भी ज्यादा खुशी उस की अम्मी को मिल रही थी.

उन्होंने एक ऐसे समय को जिया था, जब किसी के लिए ब्रा बोलना या ब्रा को खुले में सुखाना बड़ी शर्म की बात मानी जाती थी और आज उन की बेटी की छोटी सी कोशिश ने खुद उके लिए तो रोजगार ढूंढ़ा ही है, साथ ही साथ बहुत सारी महिलाओं की झिझक खत्म करने में मदद की है और इस बात के लिए उन्हें सम्मानित किया जा रहा है.

आडिटोरियम में तालियों की गूंज थी. अहमद ने भी आज काम से छुट्टी ले ली, ताकि वह नौरीन को सम्मानित होते हुए देख सके. नौरीन की छोटी बहन रोशनआरा को भी अहमद साथ ले आया था.

नौरीन का नाम पुकारा गया और उसे सम्मानित किया गया. उसे माइक पर कुछ बोलने को कहा गया. नौरीन ने एक कविता सुनाई :

‘‘ये स्तन नहीं, ये संकल्प हैं.

ये बोझ नहीं, ये अधिकार हैं.

ये ब्रा खुद अपनी भाषा हैं,

जहां औरत खुद अपनी परिभाषा है.

छिपाने की नहीं, अब दिखाने की बारी है.

ये ब्रा नहीं हमारी इंकलाबी सवारी हैं.’’

तालियां लगातार बज रही थीं. नौरीन का एक छोटा सा कदम कसबे की औरतों और पूरी नारी जाति के लिए एक बड़ी छलांग थी. Best Hindi Story

Hindi Romantic Story: एक औरत का प्रेम मुकाम

Hindi Romantic Story: ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ उस घर के अहाते से रोज ऐसी ही मारपीट की आवाज सुनाई पड़ती थी. वह नया किराएदार था. शुरू में पड़ोसियों ने किसी के घरेलू मामले से दूर रहना ही बेहतर समझा. यही सोच कर कि किराएदार शराबी होगा. शाम को शराब पी कर आता होगा और अपनी पत्नी के साथ मारपीट करता होगा. लेकिन जब रोजरोज ऐसा होने लगा, तो पड़ोसियों का सब्र जवाब देने लगा.

दुनिया की रीत है कि अपने आंगन में क्या हो रहा है, इस को कोई नहीं देखता, लेकिन दूसरे के घर में एक बरतन भी खड़क जाए, तो सब के कान खड़े हो जाते हैं.

मामले को जानने के लिए किसी पड़ोसी ने दीवार के ऊपर से झांक कर देखा, तो किसी ने छत पर खड़े हो कर. मामले को जान कर कोई हंसा, तो कोई अचंभे से मुंह खोल कर रह गया. चटकारों का बाजार गरम हो गया.

पर यह मामला तो बिलकुल उलटा था. यह आदमी नहीं, बल्कि औरत थी, जो हर शाम को अपने आदमी की कुटाई करती थी. इस में अचंभे की बात यह भी थी कि आदमी इस कुटाई का कोई विरोध नहीं करता था.

वह सिर झुका कर अपनी पत्नी की ज्यादती को ऐसे सहन करता था, जैसे उस की पत्नी को उसे इस तरह पीटने का ‘सर्वाधिकार सुरक्षित’ हो, जैसे किसी लेखक और प्रकाशक का किसी किताब पर होता है.

पड़ोसियों को बैठेठाले हंसनेहंसाने, चटकारे लेने और मनोरंजन का काम कम से कम कुछ दिनों के लिए मुफ्त में ही मिल गया था. आज तक उन्होंने पतियों के द्वारा पत्नियों की पिटाई होने के किस्से बहुत सुने और देखे थे, लेकिन पत्नी के द्वारा पति की पिटाई होते वे पहली बार देख रहे थे. वह भी एकाध दिन नहीं, रोजाना शाम को तय समय पर और पिटाई के बाद निपट निल बटा सन्नाटा, जैसे कुछ हुआ ही न हो.

ये पति पत्नी कोई और नहीं, सुधाकर और सविता थे. सुधाकर अपने मातापिता की एकलौती औलाद था. वह हरियाणा के यमुनानगर की थापर पेपर मिल में अपने पिता की सिफारिश पर लैब असिस्टैंट की नौकरी पा गया था.

उस की तनख्वाह कम थी, लेकिन प्राइवेट लिमिटेड कंपनी में नौकरी पक्की थी, इसलिए उस की एमए पास पढ़ीलिखी लड़की सविता से शादी हो गई थी.

सविता देखने में सुंदर, सुशील और मासूम दिखाई पड़ती थी, लेकिन जल्दी ही पता चल गया कि असल में वह ऐसी थी नहीं. सासबहू के झगड़े वैसे तो आम बात है, लेकिन सविता ने तो जैसे ससुराल में आते ही इस जंग का आगाज कर दिया हो.

सुधाकर ने हरमुमकिन तरीके से सविता को समझाने की कोशिश की, लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात. वह यह समझाने में नाकाम रहा कि सविता आखिर उस की मां से लड़ती ही क्यों है. वह कोई न कोई बहाना ढूंढ़ कर उस की मां से भिड़ जाती थी, फिर तो दोनों तरफ से जबानी जंग शुरू हो जाती थी.

सुधाकर समझ नहीं पाया कि आखिर सविता चाहती क्या है? वह मां को समझाता तो तड़ाक से जवाब मिलता, ‘‘औरत के गुलाम, पिट्ठू. शर्म नहीं आती तुझे. अपनी औरत को तो समझाने से गया, मुझ बुढि़या को समझाने चला है, नालायक, कलयुगी.’’

यह सुन कर सुधाकर सहम जाता. अपनी औरत को समझाता, तो वह उसे उलटे हाथों लेती, ‘‘जाओ, मां के पेटीकोट में जा कर छिप जाओ. वहां से बाहर निकले ही क्यों थे? पूरी जिंदगी वहीं रहते.’’

सुधाकर मां और पत्नी के बीच चक्की के 2 पाटों के बीच जैसा पिसता. घर की इस कलह के बीच सुधाकर
2 बच्चों का पिता बन गया, एक बेटी और एक बेटा.

लेकिन जब घर में कलह की हद हो गई तो एक दिन उस के पिता ने समझाया, ‘‘सुधाकर, तेरी मां और बहू की खटपट से मैं तंग आ गया हूं. तू तो ड्यूटी पर चला जाता है, लेकिन मेरा जीना मुहाल हो जाता है. तू हमें कहीं किराए पर कमरा ले कर दे दे, जिस से यह बुढ़ापा चैन से कटे.’’

यह सुन कर सुधाकर सोच में पड़ गया. वह बोला, ‘‘पिताजी, आप ये कैसी बातें कर रहे हो? यह मकान दादाजी और आप के खूनपसीने की कमाई का पुश्तैनी मकान है. आप किराए के मकान में जा कर क्यों रहोगे? किराए पर रहने की जरूरत पड़ेगी तो हम जा कर रहेंगे.’’

‘‘बेटा, तू कुछ भी कर… अब इन सासबहू का एकसाथ रहना मुश्किल है.’’

सुधाकर को पता नहीं था कि बापबेटे की बात को सविता ने कान लगा कर सुन लिया है. जैसे ही वह अपने कमरे में पहुंचा, सविता ने उसे आड़े हाथों लेते हुए कहा, ‘‘क्या कह रहा था बुड्ढा?’’

‘‘सविता, जबान संभाल कर. गुस्से और नफरत में तहजीब नहीं खोते.’’

‘‘ऐसी तहजीब रखो अपने पास, मेरी जूती पर. बुड्ढे को बुड्ढा नहीं कहूंगी, तो क्या जवान कहूंगी. गोद में ले कर खिला लो, दूध पीता बच्चा है तुम्हारा बाप.’’

‘‘सविता, तुम हदें पार कर रही हो.’’

‘‘मैं तो हदें पार कर ही रही हूं. तुम ध्यान से सुन लो… अब इस घर में या तो तुम्हारे मांबाप रहेंगे या फिर हम रहेंगे. और यह मेरा आखिरी फैसला है.’’

अगले दिन से ही सविता ने जिन्ना की तरह घर को दो फाड़ करने का डायरैक्ट ऐक्शन शुरू कर दिया. सुधाकर घर की कलह से कांग्रेस के नेताओं की तरह घबरा गया. उस ने घर में किसी अनहोनी के डर से किराए का मकान तलाशना शुरू कर दिया.

मौडल टाउन में सुधाकर को एक ऐसा मकान किराए पर मिल गया, जिस का अहाता खास बड़ा था और जिस का मकान मालिक दूर जींद जिले में रहता था.

किराए के मकान में आ कर सुधाकर को लगा कि सविता के बरताव में बदलाव आ जाएगा, लेकिन जल्दी ही उसे एहसास हो गया कि सविता में रंचमात्र भी फर्क नहीं आया है. अब उस का सारा गुस्सा उस की तरफ डायवर्ट हो गया है. अब सविता का सारा गुस्सा उसे अपने ऊपर झेलना पड़ता.

सविता की नाराजगी अब यह थी कि सुधाकर अपने मांबाप के पास क्यों जाता है. वह सुधाकर के घर आते ही उस पर फट पड़ती थी. अब तो वह गालीगलौज से पेश आती थी और मारपीट पर भी उतर आती थी.

‘‘हरामखोर, यहां आता ही क्यों है? उन्हीं बुड्ढेबुढि़या की गोद में जा कर मर, जिन के बिना तुझ से रहा नहीं जाता. मुझ से शादी ही क्यों की थी, जब तुझे उन के साथ ही रहना था?’’

सुधाकर को समझमें नहीं आता था कि आखिर सविता को हो क्या गया है? कुछ भी हो पुश्तैनी घर में उस ने उस से कभी ‘तूतड़ाक’ से बात नहीं की थी और न ही अपने प्रति उसने आज तक इतनी नफरत देखी थी. आखिर यह नफरत उस के मन में आई कैसे?

सुधाकर कोई तमाशा नहीं खड़ा करना चाहता था. उस ने यह मकान ही किराए के लिए इसलिए पसंद किया था कि इस में मकान मालिक नहीं रहता था. ऐसे मकान मिलने बड़ी मुश्किल होते हैं. अगर उस ने तमाशा खड़ा किया और पड़ोसियों ने मकान मालिक से शिकायत कर दी, तो फिर ऐसा किराए का मकान मिलना मुश्किल हो जाएगा, इसलिए न चाह कर भी सुधाकर उस के जुल्म को सहता गया. मार खा कर भी वह चुप रहता, क्योंकि एक उम्मीद बाकी थी.

अपनी भड़ास उतारने के बाद सविता आश्चर्यजनक रूप से सामान्य हो जाती थी. सविता का यह राज भी आज तक उसे समझमें नहीं आया था. सविता का गुस्सा और नाराजगी उस के लिए पहेली बने हुए थे.

एक दिन सविता की कालेज के समय की सहेली सुदीक्षा उसे ‘सरप्राइज’ करने के लिए बिना सूचना दिए उस से मिलने के लिए उस का घर तलाशती हुई तकरीबन उसी समय उस के घर पर पहुंची, जब सुधाकर के घर वापस आने का समय था.

अभी सुदीक्षा दरवाजे पर पहुंची ही थी कि उसे घर के अंदर से ‘झपाट… तड़… तड़ाक…’ और गालीगलौच की आवाज सुनाई दी. ऐसे में वह घर के अंदर कैसे जाए? वह उलटे पांव वापस लौटी. उसे यकीन ही नहीं हो रहा था कि सविता अपने पति के साथ ऐसा भी कर सकती है. रातभर वह सविता के बारे में सोचती रही.

सुदीक्षा सविता को कालेज के दिनों से जानती थी और उस की नजर में उस की प्यारी सहेली सविता बिलकुल भी ऐसी नहीं थी. वह जितना उस के बारे में सोचती, उस का कौतूहल उतना ही बढ़ता जाता.

अगले दिन सुदीक्षा सविता से ऐसे समय मिलने पहुंची, जब उस का पति औफिस में और बेटी स्कूल गई हुई थी. बेटा तो सविता का अभी छोटा ही था.

सुदीक्षा को देखते ही सविता खुश हो गई. उस ने उसे गले लगा लिया. फिर दोनों बैठ कर बतियाने लगीं.

चाय पीते हुए चालाकी से बातों ही बातों में सुदीक्षा ने कल वाली बात छेड़ दी. पहले तो सविता बचती रही, फिर लंबी सांस खींच कर बोली, ‘सुदीक्षा, अब तुझसे क्या बताऊं और क्या छिपाऊं? तू तो मेरी कालेज लाइफ के बारे में सबकुछ जानती ही है.’’

‘‘हां, वह तो मैं अच्छे से जानती हूं. वरुण से तेरे लव अफेयर के बारे में भी,’’ सुदीक्षा ने चुटकी लेते हुए कहा.

‘‘तुझेतो पता ही है सुदीक्षा. मैं वरुण से कितना प्यार करती थी. हम दोनों ने साथ जीनेमरने की कसमें तक खा रखी थीं.’’

‘‘हांहां, मैं सब जानती हूं.’’

‘‘लेकिन सुदीक्षा, मैं उस समय ठहरी एक संस्कारी लड़की. मैं चाहती और जैसा वरुण चाहता भी था कि दूसरी बिगड़ी हुई लड़कियों की तरह खूब मौजमस्ती करती और गुलछर्रे उड़ा सकती थी. बहुत सी बिगड़ी लड़कियां तो अपने यारों के साथ कालेज के खाली पड़े क्लासरूम या फिर किसी कोने में ही…

‘‘उन दिनों सीसीटीवी कैमरे का चलन तो था ही नहीं. कुछ लड़कियां तो रोज ही किसी न किसी के साथ, लेकिन मैं ने ऐसा कुछ नहीं किया.’’

‘‘सही कह रही हो.’’

‘‘लेकिन मेरे मांबाप ने सबकुछ जानते हुए भी सुधाकर से मेरी शादी कर दी और मैं कोई विद्रोह न कर सकी. सारी कसमें धरी की धरी रह गईं. मैं तो वरुण की नजरों में बेवफा हो गई और सुधाकर को कभी मन से अपना न सकी. यह अपराधबोध मुझेदिनरात सताता है.’’

कुछ देर सुदीक्षा माथा पकड़ कर बैठी रही, फिर कुछ सोच कर बोली, ‘‘मेरी प्यारी लैला, क्या इस अपराधबोध और वरुण के प्यार को जिंदगीभर बंदरिया के मरे हुए बच्चे की तरह सीने से चिपटाए रखेगी?

ये लैला बनने के दिन नहीं, यह मौडर्न जमाना है… जरा कुछ सोच.’’

‘‘सुदीक्षा, तुम कुछ भी कहो. मुझेहमेशा लगता है कि मैं ने वरुण के साथ बहुत गलत किया. मैं इस के लिए खुद को कुसूरवार मानती हूं और गुस्से से भर उठती हूं. अपने बस में नहीं रहती. पहले यह गुस्सा अपने सासससुर पर निकालती थी और अब वह गुस्सा सुधाकर पर निकालती हूं. उस का चेहरा देख कर ही मैं तमतमा उठती हूं.’’

‘‘लेकिन सुधाकर तो बहुत अच्छे हैं, उन पर गुस्सा क्यों करती है?’’

‘‘सुदीक्षा, देख तू भी एक औरत है. एक औरत ही दूसरी औरत के दिल की बात को समझसकती है कोई मर्द नहीं. एक औरत का दिल जिस पर आता है, वह कभी उसे भुला नहीं सकती.

‘‘वरुण की कमी शादी के बाद मुझेबहुत खलने लगी. आज भी वह मेरे रोमरोम में बसा हुआ है. सुधाकर हीरे का भी क्यों न बन जाए, वह वरुण की जगह नहीं ले सकता.’’

‘‘अरे सविता, तू तो इस जमाने की हीर बन रही है, बुलाऊं क्या तेरे रांझवरुण को यहीं पर,’’ सुदीक्षा ने हंसते हुए उस के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘चल पगली कहीं की. वह तो बेचारा मेरी याद में न जाने कहां तड़प रहा होगा. काश, वह एक बार आ जाता तो मैं उस के पैरों में गिर कर उस से माफी मांग लेती.’’

‘‘अच्छा चल, वरुण की बात बाद में करेंगे, यह बता इस सब में सुधाकर की क्या गलती है?’’

‘‘सुधाकर की इस में यह गलती है कि वह इस दुनिया में जनमा ही क्यों? न वह इस दुनिया में होता और न मेरी उस से शादी होती. फिर शायद मैं वरुण की ही होती.’’

सुदीक्षा यह सुन कर अपना सिर पकड़कर बैठ गई, फिर हंसते हुए और अफसोस जताते हुए बोली, ‘‘सविता, हम औरतें इसी कारण से इस दुनिया में लांछित हैं. यह दुनिया एक औरत के प्रेम मुकाम को नहीं समझपाती. तुम्हारे पिताजी ने तुम्हारी शादी वरुण से कर दी होती तो यह सबकुछ न होता, जो तुम्हारे घर में हो रहा है.

‘‘लेकिन मर्द औरतों की भावनाओं को नहीं समझपाते. वे बेदर्द हो कर हमारी भावनाओं को कुचलते हैं और हम पर राज करने की कोशिश में लगे रहते हैं, इसलिए बहुत सी औरतों को विद्रोह भी करना पड़ता है. लेकिन कई बार हम भी मर्दों को नहीं समझपाती हैं.’’

‘‘मतलब?’’ सविता ने पूछा.

‘‘जिस वरुण के लिए सविता तू मरी जा रही है और अपने परिवार मैं तू ने उस के लिए इतनी उथलपुथल मचा रखी है, उस की करतूतों को सुन कर तेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक जाएगी.’’

‘‘यह क्या कह रही है सुदीक्षा. मेरा वरुण ऐसा कुछ नहीं कर सकता, जो मैं न सुन पाऊं. दुनिया में उस से अच्छा आदमी हो ही नहीं सकता.’’

‘‘तेरा सोचना कुछ भी गलत नहीं है. सब लैलाओं को अपना मजनूं ऐसा ही लगता है. ले अब सुन अपने रांझवरुण की करतूत. तेरी शादी के कुछ महीने बाद ही वह अपने पड़ोस की शादीशुदा भाभी को भगा ले गया, फिर वह कई दिन जेल में रहा.’’

‘‘नहीं, वह ऐसा नहीं कर सकता,’’ सविता ने अपने कानों पर हाथ धरते हुए कहा.

‘‘अब अनजान मत कर. अपने रोमियो की हकीकत सुन. बहुत बन ली तू जुलियट, अपने परिवार में टैंशन कर के. पता है आजकल वह एक नहीं 2-2 बिगड़ी लड़कियों के साथ गुलछर्रे उड़ा रहा है और तू कहती है वह कुंआरा ही तेरी याद में तड़प रहा होगा. यह मर्द जात है कहीं भी मुंह मार देती है, बस मौका मिला चाहिए.’’

‘‘तू झठ बोल रही है,’’ सविता ने कहा.

‘‘मैं झठ बोल रही हूं, तो ले यह देख, मैं सुबूत साथ लाई हूं.’’

जब सुदीक्षा ने अपने मोबाइल में वरुण और उस की प्रेमिकाओं के फोटो और उस की जेल जाने की तसवीरें दिखाईं, तो सविता का प्रेम भूत एक झटके में उतर गया. उसे तो अपनी आंखों पर विश्वास ही नहीं हो रहा था, लेकिन वह हकीकत को भी तो झठला नहीं सकती थी.

प्रेम भूत उतरते ही सविता को सुधाकर वरुण से लाख अच्छा लगने लगा था.

‘‘सुदीक्षा, तू ने तो सच में मेरी आंखें खोल दीं. मैं वरुण के प्रेम में डूब कर अपना घर तबाह कर रही थी.’’

‘‘मैं तो तुझसे केवल वैसे ही मिलने आई थी, लेकिन तेरे हालात ने मुझेतेरे सामने हकीकत लाने को मजबूर कर दिया. वरुण की करतूतों के बारे में तो मुझेबहुत पहले ही पता चल गया था, लेकिन मुझेयह नहीं पता था कि तू उस के प्रेम की यादों को अभी तक सीने से चिपकाए बैठी है.’’

कुछ देर और रुकने के बाद सुदीक्षा वहां से चली गई. अगली बार जब सुदीक्षा उस से मिलने आई, तो उस ने सविता को पुश्तैनी मकान में अपने सासससुर के साथ सुख से रहते पाया. यह देख कर उस के चेहरे पर भी मुसकान खिल गई. Hindi Romantic Story

Right To Study: एससीएसटी और मुसलिम लड़कियां – पढ़ने का हक मांगें

Right To Study: आज से कुछ साल पहले ‘औक्सफैम इंडिया’ नामक एक संस्था ने अपनी एक रिपोर्ट ‘सर्वाइवल औफ द रिचैस्ट : द इंडिया स्टोरी’ में एक चौंकाने वाली जानकारी दी थी कि देश की आधी यानी 50 फीसदी आबादी के पास भारत की टोटल वैल्थ (कुल संपत्ति) का सिर्फ 3 फीसदी है.

इस रिपोर्ट में आगे बताया गया था कि नवंबर, 2022 तक कोरोना महामारी शुरू होने के बाद से भारत में अरबपतियों ने अपनी संपत्ति में 121 फीसदी या 3,608 करोड़ रुपए प्रतिदिन की ग्रोथ देखी थी. दूसरी ओर साल 2021-22 में जीएसटी यानी गुड्स एंड सर्विस टैक्स में टोटल 14.83 लाख करोड़ रुपए का तकरीबन 64 फीसदी आधी आबादी से आया, वहीं जीएसटी का सिर्फ 3 फीसदी ही टौप 10 से मिला.

‘औक्सफैम इंडिया’ ने आगे बताया कि भारत में अरबपतियों की टोटल संख्या साल 2020 की संख्या 102 से बढ़ कर साल 2022 में 166 हो गई. भारत के 100 सब से अमीर लोगों की संयुक्त संपत्ति 660 अरब डौलर (54.12 लाख करोड़ रुपए) तक पहुंच गई. यह एक ऐसी राशि है जो 18 महीने से ज्यादा के केंद्रीय बजट को फंड दे सकती है.

मतलब, भारत की जो वंचित बहुजन आबादी है, वह चंद मुट्ठीभर अरबपतियों के चंगुल में बुरी तरह उल झी हुई है. एक अरबपति के उदाहरण से इस बात को सम झते हैं. गौतम अडाणी का नाम तो आप ने सुना ही होगा. ‘औक्सफैम इंडिया’ की इस रिपोर्ट में बताया गया है कि सिर्फ एक बिलियनेयर गौतम अडाणी को साल 2017 से साल 2021 के बीच मिले अनरियलाइज्ड गेन (इंवैसमैंट पर हो सकने वाला मुनाफा) पर एकमुश्त टैक्स से 1.79 लाख करोड़ रुपए जुटाए जा सकते हैं. इन पैसों से 50 लाख प्राइमरी स्कूल टीचरों को एक साल तक सैलरी दी जा सकती है.

अब उस बहुजन समाज के उस वंचित हिस्से की बात करते हैं, जो हर लिहाज से दबाया और सताया जाता है. पराए तो क्या उन्हें अपने भी कुछ नहीं सम झते हैं. इन के पल्ले तो टोटल वैल्थ का फीसदी के नाम पर बस झुन झुना ही बजता है, जो अब बजने के लायक भी नहीं बचा है.

ये हैं एससी, एसटी और मुसलिम समुदाय की वे लड़कियां जो सामाजिक, वैचारिक और धार्मिक नजरिए का हवाला दे कर विवेकशून्य कर दी गई हैं. इन के नाम पर सरकारी योजनाएं तो खूब बनती हैं, पर वे कागजी घोड़ों की तरह धरती के किस कोने में दौड़ती हैं, पता ही नहीं चलता. ‘पेपरलैस देश’ की डुगडुगी बजाने वालों के लिए वैसे भी कागजी घोड़ों की कोई वैल्यू नहीं है.

ऐसी लड़कियों की समस्याएं गिनाने लग जाएंगे, तो शब्द कम पड़ जाएंगे, पर चूंकि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का नारा देश की केंद्र सरकार ने बुलंद किया है, तो फिलहाल इन की पढ़ाईलिखाई पर ही बात करते हैं.

पर समस्या तो शुरू में ही खड़ी हो जाती है, जब पता चलता है कि चाहे कितना भी मन क्यों न हो, ऐसी लड़कियों का स्कूल जाना खुद कुआं खोद कर पानी पीने के समान ‘हरक्यूलियन टास्क’ है. पर माहौल को थोड़ा हलका करने के लिए बात एक ऐसी लड़की से शुरू करते हैं, जिस ने इस ‘हरक्यूलियन टास्क’ को अपनी कड़ी मेहनत से पूरा किया और अपने जैसी वंचित और शोषित लड़कियों को एक नई राह दिखाने का काम किया है.

इस का नाम है रोहिणी और इस ने अपने पहले ही अटैप्ट में जेईई मेन्स ऐग्जाम क्रैक किया. जेईई मेन्स 2024 ऐग्जाम में 73.8 फीसदी नंबर ला कर रोहिणी को नैशनल इंस्टीट्यूट औफ टैक्नोलौजी (एनआईटी) त्रिची में एडमिशन मिल गया और वह मेकैनिकल इंजीनियरिंग की स्टूडैंट है.

तमिलनाडु राज्य के आदिवासी समुदाय से इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने वाली रोहिणी पहली लड़की है. उस ने चिन्ना इलुपुर के सरकारी आदिवासी आवासीय विद्यालय से पढ़ाई की. वह अपने मातापिता के साथ चिन्ना इलुपुर गांव में रहती है. उस के पिता मथिया झागन केरल में मजदूर के तौर पर काम करते हैं, जबकि उन की मां वसंती चिन्ना इलुपुर में खेत मजदूर हैं.

आज की तारीख में हो सकता है कि इस परिवार के हालात थोड़े बदल गए हों और इस तरह की खबरें हमें खुशी तो बहुत देती हैं, पर जब पूरे समाज के हालात को खंगालते हैं, तो पता चलता है कि दिल्ली अभी बहुत दूर है.

अगर सिर्फ पढ़ाईलिखाई की बात करें, तो एससीएसटी और मुसलिम समुदाय की लड़कियों को बहुत सी वजहों से पढ़नेलिखने से दूर रखा जाता है. अगर वे पढ़ने चली भी जाती हैं, तो भी बहुत जल्दी उन का स्कूल छूट जाता है या छुड़ा दिया जाता है. इस की सब से आसान वजह यह दी जाती है कि उन में पढ़ने की ललक ही नहीं है.

पर क्या ऐसा ही है? मान लो कि इस समाज की बहुत सारी लड़कियां 5वीं जमात के बाद स्कूल छोड़ देती हैं, तब अमूमन उन की उम्र 10 से 12 साल तक होती है (कुछ मामलों में उम्र ज्यादा भी हो सकती है), तो क्या यह सम झ लिया जाए कि औसतन 10 साल का बच्चा यह फैसला ले सकता है कि उसे आगे नहीं पढ़ना है, क्योंकि पढ़ना उस के बस का रोग नहीं है?

अरे भई, इस उम्र के हर बच्चे से पूछोगे, तो ज्यादातर का यही जवाब होगा कि उन का पढ़ाईलिखाई में मन नहीं लगता है. तो क्या सब की पढ़ाई छुड़वा दी जाए? दरअसल, एससीएसटी और मुसलिम समुदाय की लड़कियों की पढ़ाई छोड़ने की सब से बड़ी वजह है उन के साथ जातिगत और धार्मिक भेदभाव का होना.

वे अपने परिवार में ही निम्न दर्जे की हैसियत रखती हैं, तो फिर ऊंची जातियों का तो कहना ही क्या.

पायल तड़वी याद है आप को? एक होनहार लड़की, जो डाक्टर बनने का सपना देख रही थी, ने इस वजह से अपनी जिंदगी खत्म कर ली थी, क्योंकि उसे जातिगत टिप्पणियों के जरीए मानसिक रूप से कुरेदा जाता था.

डाक्टर को ‘जान बचाने वाला’ कहा जाता है और जो इनसान किसी की जान बचाने का माद्दा रखता है, वह मानसिक रूप से खुद कितना मजबूत होगा, यह आसानी से समझा जा सकता है पर पायल तड़वी का इस तरह दुनिया से जाना यह जता देता है कि कुछ लोग अपनी जाति के दंभ में इतने मगरूर हो जाते हैं कि वे किसी को उस की जाति के नाम पर इतना ज्यादा तंग करते हैं कि वह अपनी जान देने पर आमादा हो जाएं.

पायल की मां आबेदा ने ‘फौरवर्ड प्रैस’ से हुई एक बातचीत में कहा था, ‘पायल पढ़ाई पूरी करने के बाद आदिवासी इलाको में जा कर काम करना चाहती थी. पायल हम सब का सहारा थी, मेरा ही नहीं हमारे पूरे आदिवासी समाज का. वह हमारे आदिवासी समाज की ऐसी पहली लड़की होती जो एमडी डाक्टर बनने वाली थी.

‘हमारा विश्वास था कि पायल हमारे समाज की कमियों को पूरा कर देगी, लेकिन हमारा सपना अधूरा ही रह गया. तीन सीनियर महिला डाक्टरों ने उस की रैगिंग की और उस को नीचा दिखाने के लिए जातिसूचक शब्दों का इस्तेमाल किया जिस से तंग आ कर उस ने आत्महत्या की.

‘मेरी बेटी बहुत होशियार लड़की थी. उस को 10वीं में 88 फीसदी मार्क्स मिले थे. उस ने बहुत मेहनत से मैडिकल की पढ़ाई की थी और बहुत कम समय में कई लोगों का इलाज भी किया था.

‘पायल का छोटा भाई जन्म से ही विकलांग है. उसे देख कर ही पायल को डाक्टर बनने की प्रेरणा मिली थी. लोगों की सेवा करना ही उन का उद्देश्य था.’

‘तू छोटी जात का हो कर मेरी बराबरी करेगा…’ अगड़ों की यही सोच एससीएसटी समाज को हमेशा बैकफुट पर ले जाती है. इतना ज्यादा पीछे की यह समाज पढ़ने के लिए स्कूल की दहलीज पार करने से भी डरता है. इन से पहले इन की परछाईं जाति की तख्ती अपने गले में लटकाए स्कूल में पहुंच जाती है. अगर कोई हिम्मत कर के स्कूल में दाखिला ले भी लेता है, तो वहां मिली दुत्कार उसे स्कूल छोड़ने पर मजबूर कर देती है.

चूंकि हम एससीएसटी और मुसलिम लड़कियों के स्कूल छोड़ने पर बात कर रहे हैं, तो ‘ह्यूमन राइट्स वाच’ की एक रिपोर्ट पर नजर डालते हैं, जिस के मुताबिक एससी बच्चों के साथ स्कूल में इस हद तक भेदभाव किया जाता है कि वे पढ़ाई छोड़ने पर मजबूर हो जाते हैं. एससी बच्चों के लिए प्राइमरी स्कूल छोड़ने की दर 51 फीसदी है, जबकि राष्ट्रीय औसत 37 फीसदी है. सब से ज्यादा प्रभावित किशोर लड़कियां हैं, जिन की स्कूल छोड़ने की दर 64 फीसदी है और अगर लड़की एससी, एसटी या मुसलिम है, तो यह दर और भी ज्यादा है.

‘मुसलिम मिरर’ की एक रिपोर्ट में बताया गया है कि भारतीय मुसलिमों में कुल साक्षरता दर 79.5 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 80.9 फीसदी से बस थोड़ी कम है. फिर भी, केवल 77 फीसदी मुसलिम लड़कियां ही प्राइमरी एजूकेशन में नामांकित हैं और इस लैवल पर उन की स्कूल छोड़ने की दर 6.4 फीसदी राष्ट्रीय औसत 4.5 फीसदी से काफी ज्यादा है.

इस से भी ज्यादा चिंताजनक बात यह है कि 18-23 साल की आयुवर्ग की केवल 5 फीसदी मुसलिम महिलाएं ही ऊंची तालीम हासिल करती हैं, जो नैशनल लैवल पर 8 फीसदी की तुलना में काफी कम है.

प्राइमरी स्कूलों में मुसलिम लड़कियों की संख्या 12.9 फीसदी है, जबकि कालेजों में यह महज 1.7 फीसदी है.

क्यों हैं ऐसे हालात

सवाल उठता है कि एससीएसटी और मुसलिम समुदाय की लड़कियां पढ़ाई लिखाई से दूर क्यों रहती हैं या धीरेधीरे होती जाती हैं? इस का जवाब समाज का वह ढांचा है जो आज भी लड़कियों को घरेलू कामों में झोंकने का काम करता है.

मुसलिम लड़कियों पर तो यह दबाव रहता है कि वे मदरसे में जा कर दीनी तालीम तो ले सकती हैं, पर मौडर्न स्टाइल की पढ़ाई से वे अपने धर्म से हट सकती हैं. फिर उन का कम उम्र में ब्याह कर देना भी उन की तालीम पर गलत असर डालता है.

अगर लड़की घर मे बड़ी है तो उसे अपने छोटे भाई बहनों को पालने की जिम्मेदारी भी रहती है. सब से बड़ी बात यह कि ‘वे पढ़ कर क्या ही कर लेंगी’ वाली सोच उन्हें पढ़ाईलिखाई से दूर रखती हैं.

इस सब में लड़की क्या चाहती है, उस के बारे में कोई दूरदूर तक कोई नहीं सोचता है. पढ़ाईलिखाई का मतलब यह नहीं है कि हम नौकरी लायक बनते हैं, बल्कि इस से हमारा दिमाग खुलता है. हम दुनिया को जाननेसम झने लगते हैं. अपनी बात कहने की हिम्मत आती है. हमें अच्छेबुरे की पहचान होती है.

हम परिवार, समाज, देश और धर्म की कुरीतियों पर बहस करने लायक बनते हैं. मोबाइल फोन पर रील देखने से दुनिया की सम झ नहीं आती है, बल्कि अच्छा पढ़ने से हम सही माने में लायक बनते हैं.

शुरुआत में हम ने बताया था कि देश पर चंद अमीर अरबपति कारोबारी राज करते हैं. हमें उन्हें कोसने से कुछ हासिल नहीं होगा, पर उन से सीख ले सकते हैं कि जो जिंदगी में रिस्क लेता है, वह कामयाबी पाने का हकदार बन जाता है.

एससीएसटी और मुसलिम समुदाय की लड़कियों को अपनी शुरुआती जिंदगी में पढ़ाई करने का रिस्क लेना होगा. रिस्क इसलिए कि पढ़ना ही कामयाब होने की पहली सीढ़ी है, जिस पर समाज क्या परिवार के लोग ही नहीं चढ़ने देते हैं.

लिहाजा, अपना आदर्श किसी ऐसे को बनाओ जो आप की उंगली पकड़ कर स्कूल ले जाए और जब तक आप कोई मुकाम हासिल न कर लें, तब तक उस आदर्श की उंगली मत छोड़ो. पढ़ाई का यह हक आप की जिंदगी बदल देगा, यह हमारा वादा है. Right To Study

Healthcare Awareness: गूगल से इलाज न बने जी का जंजाल

Healthcare Awareness: योगेंद्र को कुछ दिनों से लगातार सिर में दर्द बना रहता था. उस ने 1-2 दिन दर्द निवारक दवाएं लीं, लेकिन उन का कोई असर नहीं हुआ. इस वजह से योगेंद्र के मन खयाल आया कि कहीं किसी गंभीर समस्या के चलते तो उस के सिर में दर्द नहीं बना रहता है?

एक दिन योगेंद्र ने लगातार सिर में दर्द बनने की वजहों को गूगल पर सर्च किया, तो उसे अलगअलग लेख और वीडियो देखने को मिल गए. उस ने कुछ लेख पढ़े और वीडियो देखे, तो उन में सिर में लगातार दर्द बने रहने की कई वजहें बताई गई थीं. लेकिन उन लेखों और वीडियो में सिर में ब्रेन ट्यूमर या कैंसर होने की वजह से भी सिरदर्द बताया गया था, जिस के लिए उस में सिरदर्द की पहचान और उस का इलाज भी बताया गया था.

अगले दिन योगेंद्र ने अपने औफिस में 5 दिनों की छुट्टी के लिए अर्जी लगाई और एक वीडियो में बताए मुताबिक अपने सिर का सीटी स्कैन कराया. उसे सीटी स्कैन में बीमारियों की पहचान की जानकारी तो थी नहीं, फिर मजबूरन उसे डाक्टर को दिखाना पड़ा.

डाक्टर ने रिपोर्ट देख कर योगेंद्र को बताया कि उसे कोई बीमारी नहीं है. उस ने सिर्फ वहम पाल रखा है. उस डाक्टर ने योगेंद्र की नौकरी के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि वह एक कंपनी में अकाउंट का काम देखता है, जिस के चलते उसे दिनभर कंप्यूटर पर काम करना पड़ता है.

डाक्टर ने योगेंद्र को बताया कि ज्यादा समय तक कंयूटर पर काम करने से सिरदर्द की समस्या होना आम बात है, फिर उस के मन में यह बात कहां से आई कि उसे कैंसर है?

योगेंद्र ने बताया कि उस ने गूगल पर सर्च किया था, जिस में सिरदर्द होने की एक वजह कैंसर होना भी बताई गई थी.

डाक्टर ने योगेंद्र को कुछ एहतियात बताईं और कुछ दवाएं लिख कर दीं, जिन के सेवन से योगेंद्र का सिरदर्द कुछ ही दिनों में एकदम ठीक हो गया.

गूगल नहीं, डाक्टर की मानें

अगर आप भी हलकी सी छींक आने, कान में दर्द होने से ले कर गंभीर से गंभीर बीमारी जैसे हार्ट अटैक, ब्रेन स्ट्रोक का इलाज गूगल पर ढूंढ़ते हैं, तो इसे कंट्रोल कर लें, क्योंकि अगर आप अपनी बीमारियों के इलाज के लिए गूगल की मदद ले कर सैल्फ मैडिकेशन करते हैं, तो यह आप के लिए खतरनाक हो सकता है.

अगर आप भी योगेंद्र जैसे लोगों में शामिल हैं, जो डाक्टर की सलाह से पहले और बाद में गूगल पर सर्च करते हैं या गूगल पर आंख मूंद कर विश्वास करते हैं, तो यह सम?ा लीजिए कि आप को गूगल सिंड्रोम है, जिस के चलते मरीज अपनी बीमारी से संबंधित हर छोटी से छोटी जानकारी गूगल से जानने की कोशिश में लगे रहते हैं.

इस वजह से कई बार ऐसे लोग ऐक्सपर्ट डाक्टर की सलाह और उस के ट्रीटमैंट को गलत ठहराने में भी देरी नहीं करते हैं, जिस से उन्हें सही इलाज नहीं मिल पाता है और कई बार वे डिप्रैशन का शिकार हो जाते हैं.

गूगल महज सर्च इंजन

इंटरनैट और सोशल मीडिया के ऐक्सपर्ट गिरजेश शुक्ल ‘गगन’ का कहना है कि इंटरनैट, गूगल, यूट्यूब या सोशल मीडिया पर जो भी कंटैंट पढ़ने या देखने को मिलते हैं, वे हम आप जैसे लोग ही मुहैया कराते हैं.

गूगल और यूट्यूब पर बीमारियों और इलाज से जुड़ी सूचनाएं या वीडियो डालने वाले 2 तरह के लोग होते हैं. एक तो वे जो गूगल या यूट्यूब के जरीए पैसा कमाते हैं. ऐसे लोग बिना जांचपरख किए भ्रामक और जानलेवा सु?ाव भी डालते रहते हैं, जबकि दूसरे लोग वे हैं जो किसी बड़े संस्थान, रिसर्च इंस्टीट्यूट या हौस्पिटल से जुड़े माहिर डाक्टर या दूसरे ऐक्सपर्ट लोग होते हैं, जो सही जानकारियां देते हैं. लेकिन इन के वीडियो और लेख में कहीं भी इस बात का जिक्र नहीं होता है कि जांच या इलाज खुद से शुरू करना है.

उत्तर प्रदेश में बस्ती जिले के मनोरोग के माहिर डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन ने बातचीत के दौरान बताया कि उन के पास एक ऐसा मरीज आया था, जो मानसिक बीमारी को दिल की बीमारी समझ कर लाखों रुपए अपने इलाज और जांच पर खर्च कर चुका था.

उसे समस्या यह थी कि कभीकभार उस का दिल तेजी से धड़कने लगता था और धड़कनें तेज हो जाती थीं.

इस से उसे सांस लेने में भी कठिनाई या घुटन महसूस होती थी. इस दौरान उसे चक्कर आता, हलकापन महसूस होता और बेहोशी की हालत हो जाती. पूरे शरीर में कंपकंपी या थरथराहट महसूस होती थी. ज्यादा पसीना आता था, डर लगता था जैसे कि कुछ बुरा होने वाला है.

उस मरीज ने अपने लक्षणों को गूगल पर डाल कर सर्च किया, तो ये सारे लक्षण हार्ट अटैक जैसे बताए गए थे. इस के बाद वह इतना डर गया कि उस ने एक साल के भीतर हार्ट से जुड़ी सैकड़ों जांच कराईं और कई डाक्टरों के पास गया, लेकिन उस की रिपोर्ट नौर्मल ही आती.

उस मरीज ने बताया कि उस ने आखिरी बार जिस हार्ट स्पैश्लिस्ट को दिखाया, वहां डाक्टर ने कहा कि यह दिल से जुड़ा मामला नहीं, बल्कि दिमाग से जुड़ा मामला है.

उस मरीज को तब लगा कि उस ने गूगल के चक्कर में तकरीबन 5 लाख रुपए जांच और इलाज के नाम पर खर्च कर दिए.

इस के बाद वह डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन के पास गया, तो डाक्टर ने उस के रहनसहन, नौकरी, पारिवारिक हालात की हिस्ट्री ली. जिस के आधार उन्होंने इस समस्या को पैनिक अटैक या एंजाइटी नाम की एक दिमाग से जुड़ी बीमारी बताया, जिस के लक्षण हार्ट अटैक जैसे ही होते हैं.

डाक्टर मलिक मोहम्मद अकमलुद्दीन का कहना है कि ऐसे लक्षण वाले मरीजों को हार्ट अटैक से ज्यादा डर लगता है. उन्हें लगता है कि वह अभी मरने वाला है. उन्होंने उस मरीज का इलाज शुरू किया और
अब उस मरीज की हालत में काफी सुधार आ गया है.

पैनिक अटैक या एंग्जाइटी का इलाज लंबा चलता है, जिस में तकरीबन 3 से 4 साल लग जाते हैं. इस की दवाएं बहुत सस्ती होती हैं और इन लंबे समय तक खाने से दवाओं की लत भी नहीं लगती है. अगर मरीज पूरा इलाज कर ले तो, फिर इस बीमारी के दोबारा होने की संभावना कम होती है.

डाक्टर का ट्रीटमैंट गलत न ठहराएं

जिला चिकित्सालय, बस्ती के डाक्टर वीके वर्मा का कहना है कि गूगल से जानकारी जरूर लें, पर उसे आजमाएं नहीं. इस के लिए केवल डाक्टर की सलाह लें. डाक्टर को इस जानकारी के आधार पर अपना नजरिया बताएं. सर्च कर के जो इलाज ढूंढ़ा है, उस के आधार पर डाक्टर का ट्रीटमैंट गलत मानना सही नहीं है.

आप भरोसे के साथ डाक्टर के पास जाएं. जब आप डाक्टर पर भरोसा दिखाएंगे, तभी इलाज भी हो पाएगा. आप दूसरे डाक्टर की सलाह भी ले लीजिए, लेकिन इंटरनैट के आधार पर फैसला न लें.

बच्चों के मामले में रहें सावधान

जिला चिकित्सालय, बस्ती में बाल रोग विशेषज्ञ डाक्टर सरफराज खान का कहना है कि कई लोग अपनी बीमारियों का इलाज गूगल से ढूंढ़ते हैं. वे नवजात और बच्चों का इलाज भी गूगल द्वारा बताई गई विधियों और दवाओं से करने की कोशिश करते हैं.

चूंकि बीमारी का इलाज उस के लक्षण, जांच रिपोर्ट और बीमारी के आधार पर किया जाता है, जिस में डाक्टर यह तय करता है कि बच्चे को उस की उम्र और वजन के मुताबिक दवा की कितनी डोज देनी है.

डाक्टर सरफराज खान का कहना है कि जागरूकता के लिए इंटरनैट सही है, लेकिन इस के ज्यादा इस्तेमाल से नुकसान भी हो रहा है. वे बताते हैं कि उन के सामने कई ऐसे मामले आते रहते हैं, जिन में परिजन पहले गूगल का सहारा ले कर बच्चे का इलाज करने की कोशिश कर रहे थे और बाद में हालत नाजुक होने के बाद बच्चे को मेरे पास लाना पड़ा.

बढ़ानी होगी जागरूकता

टीचर मंगला मौर्य का कहना है कि स्कूल में भी बच्चों को इस मामले में जागरूक करने की जरूरत है कि वे बीमारी के इलाज के लिए खुद और परिवार वालों को जागरूक करें कि खुद से दवा लेने से बीमारी का गलत इलाज, दवा के शरीर पर होने वाले गंभीर नतीजे, डाक्टर की सलाह से वंचित हो जाना, फर्जी दवाओं के इस्तेमाल का डर रहता है. ऐसे में इस से बचने की जरूरत है.

जानकारी लें, आजमाएं नहीं

डाक्टर नवीन सिंह का कहना है कि कई लोग ऐसे हैं जो हर चीज का हल गूगल या यूट्यूब के जरीए निकालना चाहते हैं, चाहे वह किसी खाने की रैसिपी हो, खेतीबारी से जुड़ी जानकारी हो या कोई भी मुद्दा. लेकिन सेहत का मुद्दा इन सब से अलग होता है. अगर आप गूगल और यूट्यूब से टिप्स ले कर खुद ही अपना इलाज करना चाहते हैं, तो यह जानलेवा भी हो सकता है.

इसी तरह की एक घटना उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में घटी जहां 11 मार्च, 2019 को एक ऐसा मामला सामने आया, जिस में एक महिला ने प्रसव के लिए गूगल और यूट्यूब का सहारा लिया था. इस मामले में एक महिला यूट्यूब देख कर अपना प्रसव करा रही थी. वह किराए के मकान में रहती थी. जब कमरे से खून का रिसाव होने लगा, तो यह देख कर मकान मालिक ने पुलिस को सूचना दी. कमरे के अंदर जाने पर महिला और नवजात बच्चा तड़पते हुए पाए गए. वहीं जमीन पर पड़े मोबाइल में यूट्यूब पर प्रसव कराने का वीडियो चल रहा था. प्रसव के बाद जच्चाबच्चा दोनों की मौत हो गई थी.

पुलिस की जांच में पता चला कि मरने वाली औरत की शादी नहीं हुई थी, जिस से वह बहराइच जिले से गोरखपुर में आ कर रह रही थी. कुंआरी मां बनने की बात किसी को पता न चल जाए, इसलिए उस ने खुद ही यूट्यूब से प्रसव कराने का फैसला लिया, जिस की वजह से उस की और उस के नवजात बच्चे की जान चली गई.

भ्रामक जानकारी साझा करने की इजाजत नहीं

इंटरनैट के माहिर आनंद कुमार का कहना है कि यूट्यूब पर किसी बीमारी, उस के इलाज या दवा के बारे में गलत जानकारी देना वाला कोई कंटैंट अपलोड करने की इजाजत नहीं है. इस का मतलब है कि कंटैंट में ऐसी जानकारी न हो जो स्थानीय स्वास्थ्य विभाग के दिशानिर्देशों से मेल न खाती हो और इस से लोगों की सेहत को बहुत गंभीर नुकसान या फिर चोट का खतरा हो. इस नीति के दायरे में यह कैटेगिरी आती है.

अगर किसी यूजर द्वारा गूगल या यूट्यूब कंटैंट नीति का उल्लंघन किया जाता है, तो उस का सिस्टम आटोमैटिक रूप से या तो हटा देता है या ईमेल कर आगाह करता है.

गूगल के कम्यूनिटी दिशानिर्देशों या सेवा की शर्तों का बारबार उल्लंघन करने पर यूजर के चैनल या खाते को बंद कर दिया जाता है. Healthcare Awareness

Story In Hindi: अंदर बाहर – जब पीछे पड़ गया सांड

Story In Hindi: ‘‘मिल गया. 15 रुपए की एक बता रहा था. 20 रुपए में 2 दे दी. यानी 10 रुपए की एक फूलगोभी,’’ कहते हुए बेनी बाबू जंग जीतने वाले सेनापति के अंदाज में खुश हो गए.

आलू, बैगन, अदरक, बंदगोभी वगैरह सब्जियों से भरे झोले को संभालते हुए वे जल्दीजल्दी घर लौट रहे थे. सड़क पर दोनों तरफ सब्जी वाले बैठे थे. कोई हांक लगा रहा था, ‘‘20 में डेढ़, टमाटर ढेर.’’

फल वाला नारा बुलंद कर रहा था, ‘‘बहुत हो गया सस्ता, अमरूद ले भर बस्ता.’’ बिजली के तार पर बैठे बंदर सोच रहे थे, ‘मौका मिले, तो झपट कर अमरूद उठा लें. सौ फीसदी मुफ्त में.’

वैसे, भाषा विज्ञान का एक सवाल है कि पेड़ की शाखा पर चलने के कारण अगर बंदरों का नाम ‘शाखामृग’ पड़ा, तो आजकल के टैलीफोन और बिजली के तारों पर चलने के कारण उन का नाम ‘तारमृग’ भी क्यों न हो? उधर बेनी बाबू ने यह खयाल नहीं किया था कि भीड़ में कोई उन के पीछेपीछे चल रहा है. वह था एक भारीभरकम काला सांड़, जो शायद सोच रहा था, ‘बच्चू, तू अकेलेअकेले सब खाएगा? हजम नहीं होगा बे. एक फूलगोभी तो मुझे देता जा.’

पीछे से आती आवाज से चौंक कर बेनी बाबू ने पीछे मुड़ कर देखा और उन के मुंह से निकला, ‘‘अरे, सत्यानाश हो.’’ वे सिर पर पैर रख कर भागे. कुछकुछ उड़ते हुए.

‘अबे भाग कहां रहा है? सरकार का टैक्स है. पुलिसगुंडे सब का टैक्स है. हमारा टैक्स नहीं देगा क्या? चल, फूलगोभी निकाल,’ मानो सांड़ यह सोच कर उन के पीछे दौड़ने लगा. बेनी बाबू मानो यह सोचते हुए आगे भागे, ‘न मानूं, न मानूं, न मानूं रे. दगाबाज, तेरी बतिया न मानूं रे.’

‘अबे तुझे हजम नहीं होगा. तेरे पेट से निकलेगी गंगा. तेरा खानदान न रहेगा चंगा,’ सांड़ को जैसे गुस्सा आ गया.

एक राही ने जोरदार आवाज में कहा, ‘‘भाई साहब, जल्दीजल्दी भागिए.’’ दूसरे आदमी ने यूएनओ स्टाइल में समझौता कराना चाहा, ‘‘एक फूलगोभी उस के आगे फेंक कर घर जाइए.’’

‘जाऊं तो जाऊं कहां ऐ दिल, कहां है तेरी मंजिल?’ यह सोचते हुए तड़पने लगे बेनी बाबू. तभी ध्यान आया कि दाहिने हाथ की गली के ठीक सामने पुलिस चौकी है. और कोई न बचाए, खाकी, अपनी रख लो लाज. बचा लो मुसीबत से आज. दौड़तेहांफते हुए हाथ में थैला लटकाए बेनी बाबू थाने में दाखिल हुए.

बेनी बाबू को भीतर आता देख दारोगा बलीराम चिल्लाए, ‘‘अरे, यह क्या हो रहा है? तुम… आप कौन हैं? ऐ गिरधारी, यह कौन अंदर दाखिल हो गया? देख तो…’’ ‘‘एक सांड़ मेरे पीछे पड़ा है,’’ बेनी बाबू ने अपनी समस्या बताई.

‘‘सांड़? पीछा कर रहा है? कोई गुंडाबदमाश होता तो कोई बात होती,’’ दारोगा बलीराम ने कहा. ‘‘अरे साहब, यह सांड़ तो गुंडेबदमाश से भी दो कदम आगे है.’’

बाहर से गिरधारी ने मुनादी कर दी, ‘‘लीजिए, वे भी पधार चुके हैं.’’ इसी बीच थाने के अंदर काले पहाड़ जैसे सांड़ की ऐंट्री.

दारोगा बलीराम चौंक गए और बोले, ‘‘सुबहसुबह यह क्या बला आ गई?’’ इतने में सांड़ झपटा बेनी बाबू की ओर. वे छिप गए दारोगा बलीराम के पीछे. शुरू हो गई म्यूजिकल चेयर

रेस. टेबिल के चारों ओर चक्कर लगा रहे थे तीनों. सब से पहले बेनी, उन के पीछे दारोगा बलीराम और उन

दोनों को खदेड़ता हुआ काला पहाड़ जैसा वह सांड़… ‘‘अरे गिरधारी, इस को भगाओ, नहीं तो तुम सब को लाइन हाजिर कराऊंगा,’’ फौजी स्टाइल में दारोगा बलीराम चिल्लाए.

‘‘साहब, हम क्या करें? मामूली चोरउचक्के तो हाथ से छूट जाते हैं, ये तो बौखलाए सांड़ हैं. कैसे संभालें?’’ गिरधारी ने सच कहा. उधर झूमझूम कर, घूमघूम कर चल रहा था तीनों का चक्कर. बीच में टेबिल को घेर कर.

दारोगा बलीराम ने आदेश दिया, ‘‘हवालात का दरवाजा खोल कर इसे अंदर करो.’’ ‘‘हम लोग दरवाजा खोल रहे हैं हुजूर. आप अंदर से उसे बाहर हांकिए,’’ गिरधारी ने जोरदार आवाज में कहा.

‘‘यह तो मुझे दौड़ा रहा है. मैं कैसे हांकूंगा? इस आदमी को यहां से निकाल बाहर करो.’’ ‘‘आप ही लोग जनता की हिफाजत नहीं करेंगे, तो कौन हमें बचाएगा?’’ बेनी बाबू बोले.

‘‘निकलते हो कि नहीं…’’ दारोगा बलीराम बेनी बाबू पर यों झपटे कि झोला समेत उसे निकाल बाहर करें. सांड़ उन पर लपका. बेनी बाबू ने तुरंत टेबिल के नीचे हाथ में झोला संभालते हुए आसन जमा लिया.

सांड़ हैरान रह गया. गोभी वाला बाबू गया कहां? उसे दारोगा पर गुस्सा आ गया कि कहीं इसी ने तो गोभी नहीं खा ली? वह सांड़ दारोगा बलीराम के पीछे दौड़ता हुआ मानो बोला, ‘छुप गए तारे नजारे सारे, ओए क्या बात हो गई. तू ने गोभी चुराई तो दिन में रात हो गई.’ हवालात का दरवाजा खुला था. बलीराम पहुंचे अंदर और चिल्लाए, ‘‘अरे गिरधारी, हवालात का दरवाजा बंद कर… जल्दी से.’’

गिरधारी ने तभी आदेश का पालन किया. सांड़ बंद हवालात के सामने फुफकारने लगा और मानो बोला, ‘हुजूर, अब खोलो दरवाजा. मैं प्रजा हूं, तुम हो राजा. भूखे की गोभी मत छीनो. सुना नहीं क्या अरे कमीनो?’

इस के बाद क्या हुआ, मत पूछिए. दूसरे दिन अखबार में इस सीन की फोटो समेत खबर छपी थी. हां, इतना बता सकता हूं कि मिसेज बेनी को दोनों फूलगोभी मिल गई थीं. सहीसलामत. Story In Hindi

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