Women’s Cricket World Cup 2025: जुनून और जज्बे की जीत

Women’s Cricket World Cup 2025: शुरुआत एक ऐसे शख्स से करते हैं, जिस का नाम है अमोल मजूमदार. क्रिकेट को समर्पित ऐसा इनसान, जो एक समय मुंबई रणजी की जान हुआ करता था. उन्होंने फर्स्ट क्लास क्रिकेट में 11,000 से ज्यादा रन बनाए हैं, जिन में 30 सैंचुरी भी शामिल हैं.

अक्तूबर, 2023 में जब अमोल मजूमदार को भारतीय महिला क्रिकेट टीम का हैड कोच बनाया गया था, तब टीम बदलाव के दौर से गुजर रही थी. नए हैड कोच को नई मजबूत टीम बनानी थी. ठीक वैसे ही जैसे हिंदी फिल्म ‘चक दे इंडिया’ में कबीर खान (शाहरुख खान) ने अपनी हौकी टीम को बनाया और चमकाया था.

अमोल मजूमदार की मेहनत से आई इसी चमक का नतीजा आज यह है कि 2 नवंबर, 2025 को नवी मुंबई के डीवाई पाटिल स्टेडियम में भारत ने फाइनल मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को हरा कर खिताब अपने नाम किया.

बारिश के खलल से मैच थोड़ा देरी से शुरू हुआ था, पर जब भारतीय महिला टीम बल्लेबाजी करने मैदान पर उतरी, तो उस के बाद वह नया इतिहास बना कर ही खुशी के मारे नाचतीकूदती ड्रैसिंग रूम में लौटी.

टीम इंडिया ने महिला वनडे वर्ल्ड कप 2025 के फाइनल मुकाबले में दक्षिण अफ्रीका को 52 रन से हरा दिया. पहले बल्लेबाजी करते हुए भारत ने 50 ओवर में 7 विकेट पर 298 रन बनाए थे, जिस के जवाब में दक्षिण अफ्रीका की टीम 246 रन पर सिमट गई.

फाइनल मुकाबले में भारत की ओर से दीप्ति शर्मा के अलावा शेफाली वर्मा ने भी कमाल का खेल दिखाया. शेफाली ने बल्लेबाजी में 87 रन बनाने के अलावा 2 विकेट भी ?ाटके. वे ‘प्लेयर औफ द मैच’ रहीं.

दीप्ति शर्मा ने 5 विकेट अपने नाम किए. वे ‘प्लेयर औफ द सीरीज’ बनीं और फाइनल मुकाबले में उन्होंने
58 रन भी बनाए.

राह नहीं थी आसान

जीतने के बाद सबकुछ सही होता है. पर आज से कुछ साल पहले हाल यह था कि लोग भारतीय महिला खिलाडि़यों के नाम तक नहीं जानते थे. वे किस बैकग्राउंड से आती हैं, इस बात से किसी को कोई लेनादेना नहीं था. एक समय अंजुम चोपड़ा, मिताली राज, झूलन गोस्वामी ने थोड़ाबहुत नाम कमाया था, पर वे भी जनता की नजरों में ज्यादा नहीं चढ़ पाई थीं.

एक इंटरव्यू में मिताली राज ने बताया था कि एक समय ऐसा था जब उन्हें एक मैच खेलने के 1,000 रुपए मिलते थे.

मिताली राज ने ‘लल्नटौप’ को दिए इस इंटरव्यू में कहा था, ‘‘हमारा एनुअल कौन्ट्रैक्ट नहीं था. हमें बीसीसीआई के अंदर आने के बाद एनुअल कौन्ट्रैक्ट मिला. साथ ही हमें कोई मैच फीस भी नहीं मिलती थी.

मुझे लगता है कि जब हम 2005 वर्ल्ड कप में उपविजेता थे और हम लौटे तो हमें उस टूर्नामैंट में हर मैच के लिए 1,000 रुपए दिए गए थे. हम ने 8 मैच खेले थे, तो हमें 8,000 रुपए दिए गए थे.’’

इस बार की वर्ल्ड कप विजेता टीम की बहुत सी लड़कियां छोटे शहरों से आई हैं. कप्तान हरमनप्रीत कौर पंजाब के मोगा शहर की हैं, तो शेफाली वर्मा हरियाणा के रोहतक शहर की हैं. दीप्ति शर्मा उत्तर प्रदेश के आगरा शहर से हैं, तो रिचा घोष पश्चिम बंगाल के सिलीगुड़ी से वास्ता रखती हैं. उमा छेत्री असम के गोलाघाट से हैं, तो आदिवासी समाज की क्रांति गौड़ मध्य प्रदेश के घुवारा इलाके की हैं. स्मृति मंधाना महाराष्ट्र के सांगली इलाके से हैं.

सैमीफाइनल मुकाबले की स्टार खिलाड़ी जेमिमा रोड्रिग्स, जो मुंबई के बांद्रा की गलियों में पलीबढ़ी हैं, ने बताया कि उन के लिए यह वर्ल्ड कप इतना आसान नहीं रहा था. उन्होंने सैमीफाइनल जीतने के बाद कहा था कि इस पूरे दौरे में मैं तकरीबन हर दिन रोई हूं. मैं मानसिक रूप से ठीक नहीं थी, एंग्जायटी से गुजर रही थी. लेकिन मुझे पता था कि मुझे डटे रहना है.

सैमीफाइनल मुकाबले में अच्छी बल्लेबाजी के बाद जेमिमा रोड्रिग्स ने ‘जीजस’ का शुक्रिया अदा किया था, पर जब वे फाइनल मुकाबले में अच्छी बल्लेबाजी नहीं कर पाईं, तो उन्हें सोशल मीडिया पर ट्रोल कर दिया गया था.

फाइनल मुकाबले में जेमिमा के जल्दी आउट होने के बाद सोशल मीडिया पर एक यूजर ने लिखा, ‘जीसस ने आज मदद नहीं की?’

दरअसल, पिछले साल अक्तूबर में जेमिमा के पिता इवान रोड्रिग्स पर इलजाम लगा था कि उन्होंने क्लब की सुविधाओं का इस्तेमाल धर्म परिवर्तन से जुड़े कार्यक्रमों के लिए किया था. बताया गया कि इवान ब्रदर मैनुअल मिनिस्ट्रीज नामक एक संगठन से जुड़े थे और प्रैसिडैंशियल हाल में कई धार्मिक आयोजन कर धर्म परिवर्तन कराए थे. हालांकि, इन आरोपों पर जेमिमा के पिता ने साफ इनकार कर दिया था. उन्होंने कहा था कि उन का किसी भी धर्म परिवर्तन से कोई संबंध नहीं है.

इसी तरह फाइनल मुकाबले में अपने बल्ले और गेंद से जलवा दिखाने वाली शेफाली वर्मा तो इस वर्ल्ड कप का हिस्सा ही नहीं थीं. इस टीम की रैगुलर ओपनर प्रतीका रावल इंजर्ड हुईं और फिर शेफाली वर्मा को इस वर्ल्ड कप के सीधे सैमीफाइनल और फाइनल में दक्षिण अफ्रीका के खिलाफ खेलने का मौका मिला.

फाइनल मैच में बल्लेबाजी में उन्होंने 87 रन बनाए ही, वहीं 2 विकेट ले कर भी टीम की तरफ मैच झुकाया.

जेमिमा और शेफाली के बहाने हम ने यह बताने की कोशिश की है कि ग्लैमर के इस खेल क्रिकेट में महिला क्रिकेटरों की राह इतनी आसान नहीं है. वे अपने परिवार, रिश्तेदारों और पासपड़ोस के तानों, हिदायतों का बो?ा ले कर बल्ला या गेंद पकड़ने की हिम्मत करती हैं और मर्दों के दबदबे वाले इस खेल में अपना नाम कमाने की कोशिश करती हैं, ऊपर से लोग भी उन की कमियों पर बात का बतंगड़ बनाते हैं.

सब से बड़ी दिक्कत तो उन महिला क्रिकेटरों को होती हैं, जो समाज के उस निचले हिस्से से आती हैं, जिन्हें हर तरह की सहूलियत से दूर रखा जाता है. क्रांति गौड़ इस की जीतीजागती मिसाल हैं. एक समय ऐसा था, जब उन के पास के खाने तक को कुछ नहीं होता था.

बचपन में भाई के जूते पहन कर खेलने वाली क्रांति गौड़ की कामयाबी के पीछे उन के कोच सोनू वाल्मीकि की अहम भूमिका रही. मां ने गहने बेचे, पिता ने मजदूरी की और आज उसी मेहनत का फल है कि क्रांति भारत की नई क्रिकेट सनसनी बन गई हैं.

क्रिकेटर राधा यादव के पिता ने एक इंटरव्यू में बताया कि राधा जब छोटी थी, तभी से उस का क्रिकेटर बनने का सपना था. बेटी के सपने को पूरा करने के लिए कभी गरीबी को आड़े नहीं आने दिया. पहले बहुत मुश्किल 5 से 10 हजार कमा पाते थे और कभी कभी कर्ज भी लेना पड़ता था, लेकिन उन्होंने बेटियों के सपनों को पूरा करने की कोशिश की. जो लोग कल कहते थे कि शर्म नहीं आती लड़कों के साथ क्रिकेट खेलती है, आज वे ही मिठाई बांट रहे हैं.

अब बदल गए हैं हालात

यह वर्ल्ड कप जीतने के बाद भारतीय महिला क्रिकेट टीम पर पैसों की बरसात हुई है. लोगों से मिली शाबाशी के बाद वे हर लिहाज से मजबूत दिख रही हैं और कप्तान हरमनप्रीत कौर की अगुआई में एकजुट भी लग रही हैं. पर सब से बड़ी बात यह है कि भारत में महिला क्रिकेट खिलाडि़यों को अब दर्शक मिल रहे हैं. फाइनल मुकाबले में स्टेडियम भरा हुआ था और टैलीविजन पर भी करोड़ों लोगों ने इसे देखने का लुत्फ उठाया.

अगर कहें कि इस मैच के शुरू होने से पहले भारत की पुरुष क्रिकेट टीम ने आस्ट्रेलिया में हुए तीसरे टी20 मैच को जीतने के रंग को फीका कर दिया, तो यह सच ही है. वहां हो रही हिंदी कमैंट्री में महिला क्रिकेट वर्ल्ड कप के फाइनल मुकाबले की चर्चा ज्यादा हो रही थी.

होती भी क्यों न, यह जीत ही इतनी शानदार रही कि इस ने भारतीय महिला क्रिकेट टीम के सपने को पूरा कर दिया है. साथ ही, इस जीत ने हर उस लड़की को नई दिशा दी है, जो तमाम तरह की मुसीबतें झेलते हुए खेल के मैदान पर अपना कैरियर तलाशती है. Women’s Cricket World Cup 2025

Hindi Romantic Story: मर्यादा – स्वाति को फ्लर्टिंग करना क्यों अच्छा लगता था

Hindi Romantic Story: रात के 12 बज रहे थे, लेकिन स्वाति की आंखों में नींद नहीं थी. वह करवटें बदल रही थी. उस की बगल में लेटा पति वरुण गहरी नींद में खर्राटे भर रहा था. स्वाति दिन भर की थकान के बाद भी सो नहीं पा रही थी. आज का घटनाक्रम बारबार उस की आंखों में घूम रहा था.

आज ऐसा कुछ हुआ कि वह कांप कर रह गई. जिसे वह सिर्फ खेल समझती थी वह कितना गंभीर हो सकता है, उसे इस बात का भान नहीं था. वह मर्दों से हलकाफुलका मजाक और फ्लर्टिंग को सामान्य बात समझती थी. स्वाति अपनी फ्रैंड्स और रिश्तेदारों से कहती थी कि उस की मार्केट में इतनी जानपहचान है कि कोई भी सामान उसे स्पैशल डिस्काउंट पर मिलता है.

स्वाति फोन पर अपने मायके में भाभी से कहती कि आज मैं ने वैस्टर्न ड्रैस खरीदी. इतनी बढि़या और अच्छे डिजाइन में बहुत सस्ती मिल गई. मैं ने साड़ी बिलकुल नए कलर में खरीदी. 1000 की है पर मुझे सिर्फ 500 में मिल गई. डायमंड रिंग अपनी फ्रैंड से और्डर दे कर बनवाई.

ऐसी रिंग क्व2 लाख से कम नहीं, परंतु मुझे क्व11/2 लाख में मिल गई. भाभी की नजरों में स्वाति की छवि बहुत ही समझदार और पारखी महिला के रूप में थी. वह जब भी कोई सामान खरीद कर भेजने को कहती, स्वाति खुशीखुशी भिजवा देती. पूरे परिवार में उस के नाम का डंका बजता था.

स्वाति आकर्षक नैननक्श वाली पढ़ीलिखी महिला थी. बचपन से ही उसे खरीदारी का बेहद शौक था. लाखों रुपए की खरीदारी इतने कम दाम और चुटकियों में करती कि हर कोई हैरान रह जाता. स्वाति का मायका मिडल क्लास फैमिली से था. 15 साल पहले एक बड़े उद्योगपति परिवार में उस की शादी हुई. शादी भले ही करोड़पति घर में हो गई, लेकिन संस्कार वही मिडल क्लास फैमिली वाले ही थे. 1-1 पैसे की कीमत वह जानती थी. घर खर्च में पैसा बचाना और उस पैसे से स्वयं के लिए खरीदारी करने में उसे बहुत मजा आता. पति से भी पैसे मारना स्वाति को अच्छा लगता था.

अच्छे संस्कार, पढ़ीलिखी और समझदार स्वाति को एक बात बड़ी आसानी से समझ आ गई थी कि पुरुषों की कमजोरी क्या है. कैसे कम रेट पर खरीदारी करनी है. वह उस दुकान या शोरूम में ही खरीदारी करती जहां पुरुष मालिक होते. वह सेल्समैन से बात नहीं करती. सेल्समैन से वह कहती, ‘‘आप तो सामान दिखा दो, रेट मैं अपनेआप भैया से तय कर लूंगी.’’

और जब हिसाबकिताब की बारी आती, तो वह सेठ की आंखों में आंखें डाल कर कहती, ‘‘भैया सही रेट बताओ. आज की नहीं 10 सालों से आप की शौप पर आ रही हूं.’’

‘‘भाभी, आप को रेट गलत नहीं लगेगा, क्यों चिंता करती हैं?’’ सेठ कहता.

‘‘नहीं, इस बार ज्यादा लगा रहे हो. मुझे तो स्पैशल डिस्काउंट मिलता है, आप की शौप पर,’’ कहते हुए स्वाति काउंटर पर खड़े सेठ के हाथों को बातोंबातों में स्पर्श करती या फिर कहती, ‘‘भैया, आप तो मेरे देवर की तरह हो. देवरभाभी के बीच रुपएपैसे मत लाओ न.’’

अकसर दुकानदार स्वाति की मीठीमीठी बातों में आ कर उसे 10-20% तक स्पैशल डिस्काउंट दे देते थे. एक ज्वैलर से तो स्वाति ने जीजासाली का रिश्ता ही बना लिया था. ज्वैलरी आमतौर पर औरतों की कमजोरी होती है, स्वाति की भी कमजोरी थी. वह अकसर इस ज्वैलर के यहां पहुंच जाती. क्याक्या नई डिजाइनें आई हैं, देखने जाती तो कुछ न कुछ पसंद आ ही जाता. तब जीजासाली के बीच हंसीमजाक शुरू हो जाता.

स्वाति कहती, ‘‘साली आधी घरवाली होती है जीजाजी, इतने ही दूंगी.’’

ज्वैलर स्वाति का स्पर्शसुख पा कर निहाल हो जाता. उस के मन में स्पर्श को आगे बढ़ाने की प्लानिंग चलती रहती, पर स्वाति थी कि काबू में ही नहीं आती थी. सामान खरीदा और उड़न छू. उस दिन भतीजी की शादी के लिए सामान व ज्वैलरी खरीदने स्वाति ज्वैलर के यहां पहुंच गई. उसे भाभी ने बताया था कि क्याक्या खरीदना है.

स्वाति ने घर से निकलने से पहले ही ज्वैलर को फोन किया, ‘‘भतीजी की शादी के लिए ज्वैलरी खरीदने आ रही हूं. आप अच्छीअच्छी डिजाइनों का चयन करा कर रखना. मेरे पास ज्यादा टाइम नहीं होगा.’’

‘‘आप आइए तो सही साली साहिबा. आप के लिए सब हाजिर है,’’ ज्वैलर ने कहा. ज्वैलरी की यह दुकान कोई बड़ा शोरूम नहीं था, लेकिन वह खुद अच्छा कारीगर था और और्डर पर ज्वैलरी तैयार करता था. शहर की एक कालोनी में उस की दुकान थी जहां कुछ खास लोगों को और्डर पर तैयार ज्वैलरी भी दिखा कर बेच देता था और और्डर देने वाले को कुछ दिन बाद सप्लाई दे देता. स्वाति की एक फ्रैंड रजनी ने उस ज्वैलर्स से उस की मुलाकात कराई थी. लेकिन रजनी कभी यह बात समझ नहीं पाई थी कि आखिर यह ज्वैलर स्वाति पर इतना मेहरबान क्यों रहता है. उसे नईनई डिजाइनें दिखाता है और अतिरिक्त डिस्काउंट भी देता है.

‘‘जीजाजी, कुछ और डिजाइनें दिखाओ. ये तो मैं ने पिछली बार देखी थीं,’’ स्वाति ने ज्वैलर की आंखों में झांकते हुए कहा.

स्वाति को ज्वैलर की आंखों में शरारत नजर आ रही थी. वह बारबार सहज होने की कोशिश कर रहा था. अपनी आदत के मुताबिक स्वाति ने बातोंबातों में ज्वैलर के हाथों पर इधरउधर स्पर्श किया. उस का यह स्पर्श ज्वैलर को बेचैन कर रहा था. उस ने भी स्वाति की हरकतें देख हौसला दिखाना शुरू कर दिया. वह भी बातोंबातों में स्वाति के हाथों पर स्पर्श करने लगा. यह स्पर्श स्वाति को कुछ बेचैन कर रहा था, लेकिन वह सहज रही. उसे कुछ देर की हरकतों से स्पैशल डिस्काउंट जो लेना था. स्वाति ने देखा कि आज दुकान पर सिर्फ एक लड़का ही हैल्पर के तौर पर काम कर रहा था बाकी स्टाफ न था. ज्वैलर ने उसे एक सूची थमाते हुए कहा कि यह सामान मार्केट से ले आओ. और जाने से पहले फ्रिज में रखे 2 कोल्ड ड्रिंक खोल कर दे जाओ.’’

‘‘आप और नई डिजाइनें दिखाइए न,’’ स्वाति ने कहा.

‘‘हां, अभी दिखाता हूं. कल ही आई हैं. आप के लिए ही रखी हुई हैं अलग से.’’

‘‘तो दिखाइए न,’’ स्वाति ने चहकते हुए कहा.

‘‘आप ऐसा करें अंदर वाले कैबिन में आ कर पसंद कर लें. अभी अंदर ही रखी हैं… लड़का भी जा चुका है तो…’’

स्वाति ने देखा लड़का सामान की सूची ले कर जा चुका था. अब दुकान पर सिर्फ ज्वैलर और स्वाति ही थे. स्वाति को एक पल के लिए डर लगा कि अकेली देख ज्वैलर कोई हरकत न कर दे. वह ऐसा कुछ चाहती भी नहीं थी. वह तो सिर्फ कुछ हलकीफुलकी अदाएं दिखा कर दुकानदारों से फायदा उठाती आई थी. आज भी ऐसा कुछ कर के ज्वैलर से स्पैशल डिस्काउंट लेने की फिराक में थी. उस की धड़कनें बढ़ रही थीं. वह चाहती थी कि जल्दी से जल्दी खरीदारी कर के निकल ले. उस का दिमाग तेजी से काम कर रहा था कि क्या करे. वह अपनेआप को संभाल कर कैबिन में ज्वैलरी देखने घुस गई. उस ने अपने शब्दों में मिठास घोलते हुए कहा, ‘‘जीजाजी, आज कुछ सुस्त लग रहे हो क्या बात है?’’

‘‘नहींनहीं, ऐसा कुछ नहीं है.’’

‘‘कोई तो बात है, मुझ से छिपाओगे क्या?’’

‘‘आप नैकलैस देखिए, साथसाथ बातें करते हैं,’’ ज्वैलर ने कहा. स्वाति गजब की सुंदर लग रही थी. वह बनठन कर निकली थी. ज्वैलर के मन में हलचल थी जो उसे बेचैन कर रही थी. उस ने सोचा कि हिम्मत दिखाई जा सकती है. अत: उस ने स्वाति के हाथ को स्पर्श किया तो वह सहम गई. लेकिन उस ने सोचा कि अगर थोड़ा छू लिया तो उस से क्या फर्क पड़ेगा. स्वाति के रुख को देख ज्वैलर का हौसला बढ़ गया. उस ने स्वाति का हाथ पकड़ कर अपनी ओर खींचा. ज्वैलर की इस आकस्मिक हरकत से वह हड़बड़ा गई.

‘‘क्या कर रहे हो?’’ स्वाति ने हाथ छुड़ाते हुए कहा. ज्वैलर ने अपनी हरकत जारी रखी. स्वाति घबरा गई. ज्वैलर की हिम्मत देख दंग रह गई वह. मर्दों की कमजोरी का फायदा उठाने की सोच उसे भारी पड़ती नजर आ रही थी. वह कैसे ज्वैलर के चंगुल से बचे, सोचने लगी. फिर उस ने हिम्मत दिखाई और ज्वैलर के गाल पर थप्पड़ों की बारिश कर दी. स्वाति क्रोध से कांप रही थी. उस का यह रूप देख ज्वैलर हड़बड़ा गया. इसी हड़बड़ी में वह जमीन पर गिर गया. स्वाति के लिए यही मौका था कैबिन से बाहर निकल भागने का. अत: वह फुरती दिखाते हुए तुरंत कैबिन से बाहर निकल अपनी कार में जा बैठी. फिर तुरंत कार स्टार्ट कर वहां से चल दी. उस के अंदर तूफान चल रहा था. उसे आत्मग्लानि हो रही थी. लंबे समय से स्वाति जिसे खेल समझती आ रही थी, वह कितना गंभीर हो सकता है, उस ने यह कभी सोचा भी नहीं था. Hindi Romantic Story

Hindi Family Story: सासूजी ने पाया शौर्य सम्मान

Hindi Family Story: हमें दहेज में सास मिली हैं. हम ने उन्हें मां की तरह स्वीकार कर लिया है, क्योंकि बचपन में हमारी एकलौती मां हमें दुनिया में अकेला छोड़ कर उड़नछू हो गई थीं.

हम जब दिल्ली से ट्रेन द्वारा लौटे और अभी कमर सीधी भी नहीं हो पाई थी कि मोबाइल फोन की घंटी बज उठी, ‘क्या आप झुमरूलालजी बोल रहे हैं?’

‘‘जी फरमाइए,’’ उधर से किसी औरत की मधुर आवाज आई थी, इसलिए हमारी कोमल भावनाएं जाग उठी थीं.

‘आप की सासूजी का नाम लक्ष्मी देवी है?’

‘‘जी हां.’’

‘बधाई हो.’

‘‘किस बात के लिए?’’

‘हमारी एयरवेज की ओर से उन्हें ‘शौर्य सम्मान’ दिया जा रहा है,’ उधर से आवाज आई.

मैं तो सकते में रह गया. तभी उधर से दोबारा आवाज आई, ‘झुमरूलालजी, एयरवेज की ओर से इस सम्मान में एक प्रमाणपत्र, एक शील्ड और एक लाख रुपए की राशि दी जाती है.’

‘‘एक लाख रुपए…’’ हम ने बात को फिर से दोहराने की कोशिश की.

‘क्या कम है?’ उधर से औरत की मधुर आवाज आई.

‘‘जी…जी…वह…’’ कहते हुए हमारे गले में आवाज फंस रही थी.

‘इसी के साथ एक दर्जन मल्टीनैशनल कंपनियों की ओर से भी उन्हें कई चीजें दी जाएंगी.’

‘‘जी… अच्छा.’’

‘जैसे टैलीविजन, सोफा सैट, वाशिंग मशीन, मोबाइल फोन, फ्रिज, प्रोजैक्टर वगैरह.’

हम ने सुना तो लगा कि हमें चक्कर आ जाएगा. हमारी सासूजी इस उम्र में भी इतने अवार्ड जीत रही हैं, लेकिन यह ‘शौर्य सम्मान’ उन्हें ही क्यों दिया जा रहा है, हम समझ नहीं पाए थे.

हम ने विचार किया कि अगर कुछ बात पूछूं, तो कहीं नाराज हो कर फोन न काट दें, इस से बेहतर तो यही है कि गुपचुप स्वीकार कर लो.

उधर से मैडमजी की आवाज आई, ‘आप को आनेजाने का किराया मिलेगा. आप को फाइवस्टार होटल में ठहराया जाएगा. मंत्रीजी यह सम्मान देंगे.’

हमारे दिल की धड़कनें तेज हो रही थीं. हम ने तारीख नोट कर ली. अपना ईमेल एड्रैस दे दिया और वह फोन कट गया.

हम सोच रहे थे कि यह बात घर में बताएं या नहीं?

थोड़ी ही देर बाद हमारे ईमेल एड्रैस पर ईमेल भी आ गया. हम ने उस का प्रिंट आउट निकाला और अपनी धर्मपत्नी को पास बुला कर प्यार से पूछा, ‘‘क्या तुम्हें कपड़े धोने में दिक्कत आती है?’’

‘‘हां, आती तो है, तो क्या तुम कपडे़ धोओगे?’’ उस ने झन्ना कर हमें जवाब दिया. तबीयत तो हुई कि बात बंद कर दूं, लेकिन मां तो उसी की थीं.

हम ने झूठी हंसी हंस कर बात को उड़ा दिया और पूछा, ‘‘अगर हमारे घर में डबल डोर फ्रिज हो तो…’’

‘‘शेख चिल्ली की तरह बातें बंद करो, मुझे घर का काम करने दो.’’

‘‘कभी तो थोड़ी फुरसत निकाल कर हमारे पास बैठ जाया करो.’’

‘‘अब बकवास छोड़ो भी. मुझे काम करना है. आज मम्मी पापड़ बना रही हैं,’’ उस ने इतराते हुए हमें बताया.

‘‘मम्मी से काम मत लिया करो.’’

‘‘तो क्या मजदूर लगा लूं? आज यह तुम्हें हो क्या गया है, जो ऐसी बहकीबहकी बातें कर रहे हो?’’ पत्नी ने तुनक कर कहा.

वह जाने को उठी, तो हम ने उस का हाथ थाम लिया और कहा, ‘‘एक पल ठहरो तो…यह पढ़ तो लो…’’

‘‘यह क्या है?’’ पत्नी ने पूछा.

‘‘देखो तो सही,’’ हम ने कहा, तो उस ने कागज उठा कर पढ़ना शुरू किया.

पत्नी को कुछ समझ ही नहीं आया. उस ने किसी बेवकूफ की तरह हमारे चेहरे पर नजर गड़ा दी और कहने लगी, ‘‘कोई मम्मी को ‘शौर्य सम्मान’ और एक लाख रुपए क्यों देगा? तुम मुझे पागल मत बनाओ.’’

‘‘यह मजाक नहीं सच है. हमें वहां परसों पहुंचना है.’’

‘‘हां…’’ कहतेकहते वह हमारे कंधे का सहारा लेतेलेते बेहोश होतेहोते बची.

हम ने उस के माथे को प्यार से सहलाया, तो वह थोड़ी देर में ठीक हुई. तब हम दोनों ने तय किया कि सासूजी को यह खबर देंगे.

सासूजी पापड़ का आटा पत्थर से ऐसे कूट रही थीं, मानो पापड़ का आटा न हो कर किसी पर गुस्सा निकाल रही हों.

हमारी पत्नीजी ने अपनी मम्मी को पीछे से गले लगाते हुए कहा, ‘‘मम्मीजी, हमें दिल्ली चलना है.’’

‘‘चल हट. मजाक मत कर. पापड़ के आटे को कूटने दे,’’ सासूजी ने आंखें तरेरते हुए कहा.

‘‘नहीं मम्मी, कसम से… आप को एक भव्य समारोह में सम्मानित किया जाना है.’’

‘‘अच्छा… अपनी बकवास बंद कर और आटा कूटने दे,’’ कह कर वे दोबारा अपने काम में जुट गईं.

यह देख कर हम ने मोरचा संभाला और कहा, ‘‘मम्मीजी, सच में हमें

परसों दिल्ली पहुंचना है. वहां एक भव्य कार्यक्रम है.’’

‘‘कब चलना है?’’ सासूजी ने पूछा.

‘‘आज शाम को ही निकलना है,’’ हम ने कहा, तो वे खुशी से चहक

उठीं, ‘‘दामादजी, मुझे हवाईजहाज की कलाबाजी पसंद नहीं है.’’

‘‘हम तो ट्रेन से जा रहे हैं मम्मीजी.’’

‘‘तो ठीक है,’’ सासूजी ने कहा. हम ने उन्हें सम्मान राशि और शौर्य सम्मान की कोई जानकारी नहीं दी थी.

तत्काल में टिकट बनवाया और रात में ही दिल्ली के लिए रवाना हो गए.

अगली दोपहर को हम लोग दिल्ली में थे. स्टेशन पर ही हमें लेने के लिए कार आई हुई थी. हम शान से उस में बैठे, होटल के कमरे क्या थे, मानो महल की सुविधा थी.

पत्नीजी तो मानो सपनों की दुनिया में आ गई थीं. सासूजी तो हैरानी में डूबी हुई थीं. नाश्ता, भोजन मुफ्त में था, जो चाहो खाओ. घंटी बजाओ नौकर हाजिर. वाह रे सुख, स्वर्ग इसी को कहते होंगे.

हमें अगले दिन का कार्यक्रम समझा दिया गया था. कार्यक्रम की जगह पर एक घंटे पहले पहुंचना था. एक कार अगले दिन आ गई. हमें ले कर कार्यक्रम की जगह पर ले गई. वहां पर बहुत ज्यादा भीड़ थी.

हमारी पत्नी सासूजी को ले कर मंच तक गई. सम्मान राशि का चैक, ट्रौफी, शाल, सम्मानपत्र मिला. खूब फोटो उतरे. सासू मां हैरान थीं कि आखिर यह ‘शौर्य सम्मान’ उन्हें क्यों दिया गया है?

कार्यक्रम के बाद पत्रकारों ने तमाम सवाल किए, सब का जवाब हम ने यह कह कर दिया, ‘‘सासू मां के गले में दर्द है, जिस के चलते वे बोल नहीं पाएंगी.’’

खूब फोटो उतरवा कर, तमाम कंपनियों के ढेर से उपहार के साथ हम घर लौटे. पूरा घर विदेशी चीजों से भर गया था.

अब आप लोग सोच रहे होंगे कि हमारी सासूजी को यह ‘शौर्य सम्मान’ क्यों मिला?

हम अब सारी बात बताते हैं, क्योंकि लेने के पहले बता देते तो शायद वह राशि और उपहार नहीं मिलते.

हम ने आप को बताया था कि सासूजी हमें दहेज में मिली थीं.

बात कुछ ऐसी हो गई थी कि पिछले दिनों सासूजी सीढि़यों से गिर गई थीं और उन के सिर में चोट आ गई थी, जिस के चलते उन्हें आंखों से कम और कानों से बिलकुल सुनाई देना बंद हो गया था.

हमारी पत्नी बहुत घबराई. हम से कहा कि इन्हें बड़े डाक्टर को दिखाओ.

हम एक बूढ़े डाक्टर के पास ले गए. उस ने कहा कि दिल्ली ले जाओ. हम ने हवाईजहाज का टिकट लिया और दिल्ली के लिए रवाना हो गए.

सासूजी थोड़ी घबराई हुई बैठी थीं, लेकिन जब आसमान में हवाईजहाज उड़ा तो उन्हें बहुत अच्छा लगा.

हम सोच रहे थे कि जल्दी से पहुंच कर इलाज करवा लेंगे, तभी घोषणा हुई कि सभी मुसाफिर सावधान रहें, हवाईजहाज का इंजन अचानक बंद हो गया है. हम इसे ठीक करने की कोशिश कर रहे हैं.

सब लोग जोरजोर से चीखने लगे.  सासूजी भी खुशी में लोगों के चीखने को देख कर हंसते हुए चीख रही थीं. तब ही हवाईजहाज ने एक गोता खाया. सासूजी खुशी में खड़ी हो गईं. उन्हें अंगरेजी झूले का मजा आ रहा था. वे खुशी के मारे ताली बजा रही थीं. कभी आगे, कभी पीछे, जबकि हम सब की हवा टाइट थी.

एयर होस्टेस ने जो घोषणा की थी, वह सासूजी सुन ही नहीं पाई थीं. वे तो खुश हो कर किलकारी मार रही थीं. तब ही घोषणा हुई कि हवाईजहाज का दूसरा इंजन भी बंद हो गया है. हम 6 हजार फुट ऊपर हैं. कृपया सावधान रहें, बैल्ट बांध लें. हम उसे ठीक करने की पूरी कोशिश कर रहे हैं.

हवाईजहाज तेजी से नीचे की ओर जा रहा था. हम जोरों से रो रहे थे. सासूजी हंस रही थीं.

हम जानते थे कि पलभर बाद हम सब मरे हुए होंगे, लेकिन सासूजी के चेहरे पर जरा भी डर नहीं था.

एयर होस्टेस उन्हें देख कर हैरान हो रही थी. तभी घोषणा हुई कि हवाईजहाज इमर्जैंसी लैंडिंग दिल्ली में कर रहा है. एक इंजन थोड़ा काम करने लगा है.

कुछ ही देर में हवाईजहाज जमीन पर तेजी से चलने लगा और थोड़ी देर में खड़ा हो गया. सब खुशी के मारे चीख रहे थे. हमारी सासूजी ने पूछा, ‘‘ये लोग चीख क्यों रहे हैं?’’

‘‘मतलब? क्या आप को सुनाई देने लगा है?’’

‘‘सुनाई क्या दिखाई भी साफ दे रहा है कि सब खुश हैं,’’ सासूजी ने कहा.

हम खुशी के मारे कबड्डी खेलने का मन बनाने लगे थे. एयर होस्टेस ने सासू मां को गले लगाया और ताली बजा कर स्वागत कर के विदाई दी.

इस के बाद का किस्सा आप को मालम ही है. दिल्ली के डाक्टर ने चैक कर के कहा कि खुशी से चीखनेचिल्लाने के चलते जिस नस में खून का बहना बंद हो गया था, वह खुल गई है. आप की सास अब पूरी तरह से ठीक हैं.’’

हम घर लौट आए. अब आप ही बताएं कि मैं क्या पत्रकारों को बताता कि उस समय मेरी सासू मां बहरी थीं, कम दिखाई देने की बीमारी से पीडि़त थीं. अगर वे ठीक होतीं तो खिड़की तोड़ कर कूद जातीं, लेकिन जो होता है, अच्छा होता है. हम आज आदरणीय सासूजी पर गर्व कर के खुश हैं. Hindi Family Story

Hindi Kahani: एक और बलात्कारी – क्या सुमेर सिंह से बच पाई रूपा

Hindi Kahani: रूपा पगडंडी के रास्ते से हो कर अपने घर की ओर लौट रही थी. उस के सिर पर घास का एक बड़ा गट्ठर भी था. उस के पैरों की पायल की ‘छनछन’ दूर खड़े बिरजू के कानों में गूंजी, तो वह पेड़ की छाया छोड़ उस पगडंडी को देखने लगा.

रूपा को पास आता देख बिरजू के दिल की धड़कनें तेज हो गईं और उस का दिल उस से मिलने को मचलने लगा.

जब रूपा उस के पास आई, तो वह चट्टान की तरह उस के रास्ते में आ कर खड़ा हो गया.

‘‘बिरजू, हट मेरे रास्ते से. गाय को चारा देना है,’’ रूपा ने बिरजू को रास्ते से हटाते हुए कहा.

‘‘गाय को तो तू रोज चारा डालती है, पर मुझे तो तू घास तक नहीं डालती. तेरे बापू किसी ऐरेगैरे से शादी कर देंगे, इस से अच्छा है कि तू मुझ से शादी कर ले. रानी बना कर रखूंगा तुझे. तू सारा दिन काम करती रहती है, मुझे बिलकुल भी अच्छा नहीं लगता.’’

‘‘गांव में और भी कई लड़कियां हैं, तू उन से अपनी शादी की बात क्यों नहीं करता?’’

‘‘तू इतना भी नहीं समझती, मैं तो तुझ से प्यार करता हूं. फिर और किसी से अपनी शादी की बात क्यों करूं?’’

‘‘ये प्यारव्यार की बातें छोड़ो और मेरे रास्ते से हट जाओ, वरना घास का गट्ठर तुम्हारे ऊपर फेंक दूंगी,’’ इतना सुनते ही बिरजू एक तरफ हो लिया और रूपा अपने रास्ते बढ़ चली.

शाम को जब सुमेर सिंह की हवेली से रामदीन अपने घर लौट रहा था, तो वह अपने होश में नहीं था. गांव वालों ने रूपा को बताया कि उस का बापू नहर के पास शराब के नशे में चूर पड़ा है.

‘‘इस ने तो मेरा जीना हराम कर दिया है. मैं अभी इसे ठीक करती हूं,’’ रूपा की मां बड़बड़ाते हुए गई और थोड़ी देर में रामदीन को घर ला कर टूटीफूटी चारपाई पर पटक दिया और पास में ही चटाई बिछा कर सो गई.

सुबह होते ही रूपा की मां रामदीन पर भड़क उठी, ‘‘रोज शराब के नशे में चूर रहते हो. सारा दिन सुमेर सिंह की मजदूरी करते हो और शाम होते ही शराब में डूब जाते हो. आखिर यह सब कब तक चलता रहेगा? रूपा भी सयानी होती जा रही है, उस की भी कोई चिंता है कि नहीं?’’

रामदीन चुपचाप उस की बातें सुनता रहा, फिर मुंह फेर कर लेट गया. रामदीन कई महीनों से सुमेर सिंह के पास मजदूरी का काम करता था. खेतों की रखवाली करना और बागबगीचों में पानी देना उस का रोज का काम था.

दरअसल, कुछ महीने पहले रामदीन का छोटा बेटा निमोनिया का शिकार हो गया था. पूरा शरीर पीला पड़ चुका था. गरीबी और तंगहाली के चलते वह उस का सही इलाज नहीं करा पा रहा था. एक दिन उस के छोटे बेटे को दौरा पड़ा, तो रामदीन फौरन उसे अस्पताल ले गया.

डाक्टर ने उस से कहा कि बच्चे के शरीर में खून व पानी की कमी हो गई है. इस का तुरंत इलाज करना होगा. इस में 10 हजार रुपए तक का खर्चा आ सकता है.

किसी तरह उसे अस्पताल में भरती करा कर रामदीन पैसे जुटाने में लग गया. पासपड़ोस से मदद मांगी, पर किसी ने उस की मदद नहीं की.

आखिरकार वह सुमेर सिंह के पास पहुंचा और उस से मदद मांगी, ‘‘हुजूर, मेरा छोटा बेटा बहुत बीमार है. उसे निमोनिया हो गया था. मुझे अभी 10 हजार रुपए की जरूरत है. मैं मजदूरी कर के आप की पाईपाई चुका दूंगा. बस, आप मुझे अभी रुपए दे दीजिए.’’

‘‘मैं तुम्हें अभी रुपए दिए दे देता हूं, लेकिन अगर समय पर रुपए नहीं लौटा सके, तो मजदूरी की एक फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा. बोलो, मंजूर है?’’

‘‘हां हुजूर, मुझे सब मंजूर है,’’ अपने बच्चे की जान की खातिर उस ने सबकुछ कबूल कर लिया.

पहले तो रामदीन कभीकभार ही अपनी थकावट दूर करने के लिए शराब पीता था, लेकिन सुमेर सिंह उसे रोज शराब के अड्डे पर ले जाता था और उसे मुफ्त में शराब पिलाता था. लेकिन अब तो शराब पीना एक आदत सी बन गई थी. शराब तो उसे मुफ्त में मिल जाती थी, लेकिन उस की मेहनत के पैसे सुमेर सिंह हजम कर जाता था. इस से उस के घर में गरीबी और तंगहाली और भी बढ़ती गई.

रामदीन शराब के नशे में यह भी भूल जाता था कि उस के ऊपर कितनी जिम्मेदारियां हैं. दिन पर दिन उस पर कर्ज भी बढ़ता जा रहा था. इस तरह कई महीने बीत गए. जब रामदीन ज्यादा नशे में होता, तो रूपा ही सुमेर सिंह का काम निबटा देती.

एक सुबह रामदीन सुमेर सिंह के पास पहुंचा, तो सुमेर सिंह ने हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहा, ‘‘रामदीन, आज तुम हमारे पास बैठो. हमें तुम से कुछ जरूरी बात करनी है.’’

‘‘हुजूर, आज कुछ खास काम है क्या?’’ रामदीन कहते हुए उस के पास बैठ गए.

‘‘देखो रामदीन, आज मैं तुम से घुमाफिरा कर बात नहीं करूंगा. तुम ने मुझ से जो कर्जा लिया है, वह तुम मुझे कब तक लौटा रहे हो? दिन पर दिन ब्याज भी तो बढ़ता जा रहा है. कुलमिला कर अब तक 15 हजार रुपए से भी ज्यादा हो गए हैं.’’

‘‘मेरी माली हालत तो बदतर है. आप की ही गुलामी करता हूं हुजूर, आप ही बताइए कि मैं क्या करूं?’’

सुमेर सिंह हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कुछ सोचने लगा. फिर बोला, ‘‘देख रामदीन, तू जितनी मेरी मजदूरी करता है, उस से कहीं ज्यादा शराब पी जाता है. फिर बीचबीच में तुझे राशनपानी देता ही रहता हूं. इस तरह तो तुम जिंदगीभर मेरा कर्जा उतार नहीं पाओगे, इसलिए मैं ने फैसला किया है कि अब अपनी जोरू को भी काम पर भेजना शुरू कर दे.’’

‘‘लेकिन हुजूर, मेरी जोरू यहां आ कर करेगी क्या?’’ रामदीन ने गिड़गिड़ाते हुए कहा.

‘‘मुझे एक नौकरानी की जरूरत है. सुबहशाम यहां झाड़ूपोंछा करेगी. घर के कपड़ेलत्ते साफ करेगी. उस के महीने के हजार रुपए दूंगा. उस में से 5 सौ रुपए काट कर हर महीने तेरा कर्जा वसूल करूंगा.

‘‘अगर तुम यह भी न कर सके, तो तुम मुझे जानते ही हो कि मैं जोरू और जमीन सबकुछ अपने कब्जे में ले लूंगा.’’

‘‘लेकिन हुजूर, मेरी जोरू पेट से है और उस की कमर में भी हमेशा दर्द रहता है.’’

‘‘बच्चे पैदा करना नहीं भूलते, पर मेरे पैसे देना जरूर भूल जाते हो. ठीक है, जोरू न सही, तू अपनी बड़ी बेटी रूपा को ही भेज देना.

‘‘रूपा सुबहशाम यहां झाड़ूपोंछा करेगी और दोपहर को हमारे खेतों से जानवरों के लिए चारा लाएगी. घर जा कर उसे सारे काम समझा देना. फिर दोबारा तुझे ऐसा मौका नहीं दूंगा.’’

अब रामदीन को ऐसा लगने लगा था, जैसे वह उस के भंवर में धंसता चला जा रहा है. सुमेर सिंह की शर्त न मानने के अलावा उस के पास कोई चारा भी नहीं बचा था.

शाम को रामदीन अपने घर लौटा, तो उस ने सुमेर सिंह की सारी बातें अपने बीवीबच्चों को सुनाईं.

यह सुन कर बीवी भड़क उठी, ‘‘रूपा सुमेर सिंह की हवेली पर बिलकुल नहीं जाएगी. आप तो जानते ही हैं. वह पहले भी कई औरतों की इज्जत के साथ खिलवाड़ कर चुका है. मैं खुद सुमेर सिंह की हवेली पर जाऊंगी.’’

‘‘नहीं मां, तुम ऐसी हालत में कहीं नहीं जाओगी. जिंदगीभर की गुलामी से अच्छा है कि कुछ महीने उस की गुलामी कर के सारे कर्ज उतार दूं,’’ रूपा ने अपनी बेचैनी दिखाई.

दूसरे दिन से ही रूपा ने सुमेर सिंह की हवेली पर काम करना शुरू कर दिया. वह सुबहशाम उस की हवेली पर झाड़ूपोंछा करती और दोपहर में जानवरों के लिए चारा लाने चली जाती.

अब सुमेर सिंह की तिरछी निगाहें हमेशा रूपा पर ही होती थीं. उस की मदहोश कर देनी वाली जवानी सुमेर सिंह के सोए हुए शैतान को जगा रही थी. रूपा के सामने तो उस की अपनी बीवी उसे फीकी लगने लगी थी.

सुमेर सिंह की हवेली पर सारा दिन लोगों का जमावड़ा लगा रहता था, लेकिन शाम को उस की निगाहें रूपा पर ही टिकी होती थीं.

रूपा के जिस्म में गजब की फुरती थी. शाम को जल्दीजल्दी सारे काम निबटा कर अपने घर जाने के लिए तैयार रहती थी. लेकिन सुमेर सिंह देर शाम तक कुछ और छोटेमोटे कामों में उसे हमेशा उलझाए रखता था. एक दोपहर जब रूपा पगडंडी के रास्ते अपने गांव की ओर बढ़ रही थी, तभी उस के सामने बिरजू आ धमका. उसे देखते ही रूपा ने अपना मुंह फेर लिया.

बिरजू उस से कहने लगा, ‘‘मैं जब भी तेरे सामने आता हूं, तू अपना मुंह क्यों फेर लेती है?’’

‘‘तो मैं क्या करूं? तुम्हें सीने से लगा लूं? मैं तुम जैसे आवारागर्दों के मुंह नहीं लगना चाहती,’’ रूपा ने दोटूक जवाब दिया.

‘‘देख रूपा, तू भले ही मुझ से नफरत कर ले, लेकिन मैं तो तुझ को प्यार करता ही रहूंगा. आजकल तो मैं ने सुना है, तू ने सुमेर सिंह की हवेली पर काम करना शुरू कर दिया है. शायद तुझे सुमेर सिंह की हैवानियत के बारे में पता नहीं. वह बिलकुल अजगर की तरह है. वह कब शिकारी को अपने चंगुल में फंसा कर निगल जाए, यह किसी को पता नहीं.

‘‘मुझे तो अब यह भी डर सताने लगा है कि कहीं वह तुम्हें नौकरानी से रखैल न बना ले, इसलिए अभी भी कहता हूं, तू मुझ से शादी कर ले.’’ यह सुन कर रूपा का मन हुआ कि वह बिरजू को 2-4 झापड़ जड़ दे, पर फिर लगा कि कहीं न कहीं इस की बातों में सचाई भी हो सकती है.

रूपा पहले भी कई लोगों से सुमेर सिंह की हैवानियत के बारे में सुन चुकी थी. इस के बावजूद वह सुमेर सिंह की गुलामी के अलावा कर भी क्या सकती थी. इधर सुमेर सिंह रूपा की जवानी का रसपान करने के लिए बेचैन हो रहा था, लेकिन रूपा उस के झांसे में आसानी से आने वाली नहीं थी.

सुमेर सिंह के लिए रूपा कोई बड़ी मछली नहीं थी, जिस के लिए उसे जाल बुनना पड़े.

एक दिन सुमेर सिंह ने रूपा को अपने पास बुलाया और कहा, ‘‘देखो रूपा, तुम कई दिनों से मेरे यहां काम कर रही हो, लेकिन महीने के 5 सौ रुपए से मेरा कर्जा इतनी जल्दी उतरने वाला नहीं है, जितना तुम सोच रही हो. इस में तो कई साल लग सकते हैं.

‘‘मेरे पास एक सुझाव है. तुम अगर चाहो, तो कुछ ही दिनों में मेरा सारा कर्जा उतार सकती हो. तेरी उम्र अभी पढ़नेलिखने और कुछ करने की है, मेरी गुलामी करने की नहीं,’’ सुमेर सिंह के शब्दों में जैसे एक मीठा जहर था.

‘‘मैं आप की बात समझी नहीं?’’ रूपा ने सवालिया नजरों से उसे देखा.

सुमेर सिंह की निगाहें रूपा के जिस्म को भेदने लगीं. फिर वह कुछ सोच कर बोला, ‘‘मैं तुम से घुमाफिरा कर बात नहीं करूंगा. तुम्हें आज ही एक सौदा करना होगा. अगर तुम्हें मेरा सौदा मंजूर होगा, तो मैं तुम्हारा सारा कर्जा माफ कर दूंगा और इतना ही नहीं, तेरी शादी तक का खर्चा मैं ही दूंगा.’’

रूपा बोली, ‘‘मुझे क्या सौदा करना होगा?’’

‘‘बस, तू कुछ दिनों तक अपनी जवानी का रसपान मुझे करा दे. अगर तुम ने मेरी इच्छा पूरी की, तो मैं भी अपना वादा जरूर निभाऊंगा,’’ सुमेर सिंह के तीखे शब्दों ने जैसे रूपा के जिस्म में आग लगा दी थी.

‘‘आप को मेरे साथ ऐसी गंदी बातें करते हुए शर्म नहीं आई,’’ रूपा गुस्से में आते हुए बोली.

‘‘शर्म की बातें छोड़ और मेरा कहा मान ले. तू क्या समझती है, तेरा बापू तेरी शादी धूमधाम से कर पाएगा? कतई नहीं, क्योंकि तेरी शादी के लिए वह मुझ से ही उधार लेगा.

‘‘इस बार तो मैं तेरे पूरे परिवार को गुलाम बनाऊंगा. अगर ब्याह के बाद तू मदद के लिए दोबारा मेरे पास आई भी तो मैं तुझे रखैल तक नहीं बनाऊंगा. अच्छी तरह सोच ले. मैं तुझे इस बारे में सोचने के लिए कुछ दिन की मुहलत भी देता हूं. अगर इस के बावजूद भी तू ने मेरी बात नहीं मानी, तो मुझे दूसरा रास्ता भी अपनाना आता है.’’

सुमेर सिंह की कही गई हर बात रूपा के जिस्म में कांटों की तरह चुभती चली गई. सुमेर सिंह की नीयत का आभास तो उसे पहले से ही था, लेकिन वह इतना बदमाश भी हो सकता है, यह उसे बिलकुल नहीं पता था.

रूपा को अब बिरजू की बातें याद आने लगीं. अब उस के मन में बिरजू के लिए कोई शिकायत नहीं थी.

रूपा ने यह बात किसी को बताना ठीक नहीं समझा. रात को तो वह बिलकुल सो नहीं पाई. सारी रात अपने वजूद के बारे में ही वह सोचती रही.

रूपा को सुमेर सिंह की बातों पर तनिक भी भरोसा नहीं था. उसे इस बात की ज्यादा चिंता होने लगी थी कि अगर अपना तन उसे सौंप भी दिया, तो क्या वह भी अपना वादा पूरा करेगा? अगर ऐसा नहीं हुआ, तो अपना सबकुछ गंवा कर भी बदनामी के अलावा उसे कुछ नहीं मिलेगा.

इधर सुमेर सिंह भी रूपा की जवानी का रसपान करने के लिए उतावला हो रहा था. उसे तो बस रूपा की हां का इंतजार था. धीरेधीरे वक्त गुजर रहा था. लेकिन रूपा ने उसे अब तक कोई संकेत नहीं दिया था. सुमेर सिंह ने मन ही मन कुछ और सोच लिया था.

यह सोच कर रूपा की भी बेचैनी बढ़ती जा रही थी. उसे खुद को सुमेर सिंह से बचा पाना मुश्किल लग रहा था. एक दोपहर जब रूपा सुमेर सिंह के खेतों में जानवरों के लिए चारा लाने गई, तो सब से पहले उस की निगाहें बिरजू को तलाशने लगीं, पर बिरजू का कोई अतापता नहीं था. फिर वह अपने काम में लग गई. तभी किसी ने उस के मुंह पर पीछे से हाथ रख दिया.

रूपा को लगा शायद बिरजू होगा, लेकिन जब वह पीछे की ओर मुड़ी, तो दंग रह गई. वह कोई और नहीं, बल्कि सुमेर सिंह था. उस की आंखों में वासना की भूख नजर आ रही थी.

तभी सुमेर सिंह ने रूपा को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ते हुए कहा, ‘‘हुं, आज तुझे मुझ से कोई बचाने वाला नहीं है. अब तेरा इंतजार भी करना बेकार है.’’

‘‘मैं तो बस आज रात आप के पास आने ही वाली थी. अभी आप मुझे छोड़ दीजिए, वरना मैं शोर मचाऊंगी,’’ रूपा ने उस के चंगुल से छूटने की नाकाम कोशिश की.

पर सुमेर सिंह के हौसले बुलंद थे. उस ने रूपा की एक न सुनी और घास की झाड़ी में उसे पूरी तरह से दबोच लिया.

रूपा ने उस से छूटने की भरपूर कोशिश की, पर रूपा की नाजुक कलाइयां उस के सामने कुछ खास कमाल न कर सकीं.

अब सुमेर सिंह का भारीभरकम बदन रूपा के जिस्म पर लोट रहा था, फिर धीरेधीरे उस ने रूपा के कपड़े फाड़ने शुरू किए.

जब रूपा ने शोर मचाने की कोशिश की, तो उस ने उस का मुंह उसी के दुपट्टे से बांध दिया, ताकि वह शोर भी न मचा सके.

अब तो रूपा पूरी तरह से सुमेर सिंह के शिकंजे में थी. वह आदमखोर की तरह उस पर झपट पड़ा. इस से पहले वह रूपा को अपनी हवस का शिकार बना पाता, तभी किसी ने उस के सिर पर किसी मजबूत डंडे से ताबड़तोड़ वार करना शुरू कर दिया. कुछ ही देर में वह ढेर हो गया.

रूपा ने जब गौर से देखा, तो वह कोई और नहीं, बल्कि बिरजू था. तभी वह उठ खड़ी हुई और बिरजू से लिपट गई. उस की आंखों में एक जीत नजर आ रही थी.

बिरजू ने उसे हौसला दिया और कहा, ‘‘तुम्हें अब डरने की कोई जरूरत नहीं है. मैं इसी तरह तेरी हिफाजत जिंदगीभर करता रहूंगा.’’ रूपा ने बिरजू का हाथ थाम लिया और अपने गांव की ओर चल दी. Hindi Kahani

Hindi Funny Story: क्या हाल है लतखोरीलाल

Hindi Funny Story, लेखक – राजेंद्र कुमार सिंह

आज की राजनीति में लतखोरों और चोरों की कमी नहीं है. जो जहां पर है, जिस को जहां मौका मिला, चौकाछक्का मार कर विकास का चक्का जाम कर हराम के माल पर कमाल करते हुए नमकहराम खुद आराम कर रहा है. जो भविष्य में बनता यही जी का जंजाल है. जनता देख रही जो नेता भलाई करने का संकल्प ले कर मैदान में उतरा, वही विकास के पर कतर मलाई चांप रहा है, मजे से नोट छाप रहा है. इस आड़ में कामयाबी का झठा झंडा गाड़ कर कहता है कि जनता जाए भाड़ में. विकास की चादर समेट बढि़या कमीशन लपेट कर अपना पेट भर निडर हो कर चल रहा है.

सार्वजनिक संपत्ति पर अपने अधिकार से कटौती कर बपौती समझ कर यूज कर रहा है. आज जनता को सजग होते ही इन की करतूतों को देख कहर बन कर टूट रही है. जो सार्वजनिक संपत्ति को अपना समझने की भूल कर रहे थे, उन की कलई खुल रही है. जनता के गुस्से से उन का जोश बेहोश हो कर धराशायी हो गया.

वह कितना बेकल, बेहाल व लाचार है. चल रहा कभी पातपात, तो कभी भाग रहा इस डाल तो उस डाल है. इसी तरह के सांपसीढ़ी के खेल में देश का खस्ताहाल है. पूरे देश में एक अलग स्लोगन चल रहा है. जनता जो सोई थी, अपनी हसरतें जो डुबोई थी, अब वह मचल रही है, रोड पर निकल उछल रही है.

आज लोकतंत्र बिलकुल तंगतंग हो गया है. दूसरे शब्दों में लोकतंग या प्रजातंग कह सकते हैं. सुकून और शांति सत्ता की होड़ में जो पहले से आसन पर बैठ झठा आश्वासन परोस रहा है. सूचना तंत्र इन की साजिश के झंसे में आ गया है. वह भी खापी कर दंड मार रहा है. बोझ से दबा बैठा है. कुछ अजीब तरह की हरकत करते हुए कुंठित हो कर बीचबीच में ऐसा कानून या विधेयक लाता है, मुंह की खाता है. जनता जाग गई लेते हुई अंगड़ाई. अगले अंजाम को तमाम करने के लिए क्वालिफाई कर रही है.

और इसी तरह के जुनून में हमारे महल्ले के उभरते नेता सुखीराम ने भी इस जंग में कूद कर अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया. मौका देख कर चौका मारने में कमाल का महारत हासिल है. जब जान गया कि ऐसेऐसे मौके पर कुछ भेटने वाला है, तो समेटने के लिए निकल पड़ता है. उन के साथ में एक टोली होती है जो अगले की बोली पर ताला लगा देने के लिए जानी जाती है.

यही वजह है कि वे समयसमय पर लतियाए जाते हैं. कभी खूब पिटाते हैं. उस में सब से ज्यादा प्रसाद सुखीराम ही पाते हैं. लोगबाग अब असली नाम के जगह नेता लतखोरीलाल कहते हैं. ये जब जब पिटा कर आए, पड़ोसी होने के नाते पूछ लिया, ‘‘क्या हाल है लतखोरीलाल भाई?’’

क्योंकि ये पक्ष हो या विपक्ष तहसनहस कराने, मामला को बिगाड़ने के लिए मशहूर हैं. हालांकि, हवा का रुख देख कर चलते हैं, इसलिए जबजब सत्ता बदलती है, ये भी बदल जाते हैं. खरीदफरोख्त में मोलतोल करने में इन का जवाब नहीं, महारत हासिल है. सामान तो इनसान भी खरीदते हैं, नेता खरीदने में इन का क्या कहना.

देश की संपत्ति को ये बपौती समझकर आमजन की सुविधाओं में कटौती कर पनौती लगाने के लिए भी जाने जाते हैं, इसलिए जनमानस जैसे ही सड़कों पर उतरा, शायद इन पर मंडराना शुरू हो गया खतरा. अभी जंग जारी है. नया मुद्दा अभी कुछ ज्यादा उछल रहा है किसी आयोग को ले कर. जनता भी पड़ गई है इन के पीछे हाथ धो कर. Hindi Funny Story

Story In Hindi: शैतान मंदिर का – क्या हुआ था वीरमती के साथ?

Story In Hindi: ‘‘मेरा मन तो मंदिर जाने को बिलकुल भी नहीं कर रहा है,’’ मंदिर की पहली सीढ़ी के पास भोलू का हाथ पकड़ते हुए वीरमती ने कहा.

‘‘चाहता तो मैं भी यही हूं वीरमती, पर तुम सब्र रखो और एक बार मंदिर जा कर लौट आओ. मैं यहां खड़ा रह कर तुम्हारा इंतजार करूंगा,’’ वीरमती के गले में अपनी बांहें डाल कर भोलू ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘पुरानी कहानियों और किताबों में कहीं भी नहीं पढ़ा कि कोई देवता पति से पहले नई ब्याहता से सुहागरात मनाता है,’’ अपने भोलू की आंखों में   झांकते हुए वीरमती ने उदासी से कहा.

‘‘हां, पर मंदिर में ऐसा सच में थोड़े ही होगा. यह तो रस्म मात्र है. तुम जानती हो कि मैं डांभरी देवता में यकीन नहीं करता, लेकिन रिवाज है. अब तुम जाओ,’’ भोलू ने हौसला देते हुए कहा.

2 गांवों डांभरी और टिक्करी के बीच एकांत में और पेड़ों से घिरी एक समतल जगह पर डांभरी देवता का मंदिर बना था. मंदिर से थोड़ी दूर गढ़ की तरह भंडारगृह था. यहां सन्नाटे और डर का माहौल ही रहता था.

दोनों गांव के लोग देवता की खुशी में खुश रहते थे और उसे तरहतरह के उपहार देते थे. मांसभात का चढ़ावा तो वहां चढ़ता ही रहता था.

गुर दितू के जरीए देवता गांव वालों की सुखसमृद्धि की सूचना देता था. जो शख्स देवता पर शक करता था, उसे देवता गुर में प्रवेश कर कठोर सजा देता था.

गुर दितू का दोनों गांवों में खूब आदरसत्कार था. उस का कहा तो पत्थर की लकीर होता था.

डांभरी देवता पर भरोसा नहीं था तो केवल भोलू को, जबकि वीरमती को उस पर यकीन था, पर गुर दितू में देवता का प्रवेश करना उसे कतई सच नहीं लगता था.

दोनों गांवों में जब भी किसी लड़के की शादी होती थी, तो नई ब्याही दुलहन को सुहागरात से पहले देवता के मंदिर में पूजाअर्चना करने के साथ देवता से सुहागरात मनाने का निवेदन करना होता था और मंदिर में रखे तख्तपोश पर सो कर ही लौटना होता था.

यों तो छोटी जाति के लोगों का मंदिर में घुसना मना था, लेकिन उन की नई दुलहन मंदिर में आ सकती थी.

गांव के राघव ने अपनी दुलहन को मंदिर में नहीं भेजा था. नतीजतन, उस की दुलहन 7वें दिन मरी पाई गई थी और वह पागल हो गया था.

भोलू और वीरमती को उन के मांबाप और गांव वालों ने बहुत सम  झाबु  झाकर ही भेजा था. मंदिर को जाती पहली सीढ़ी से आगे नई दुलहन के पति समेत किसी को भी जाने की इजाजत नहीं थी.

भोलू पहली सीढ़ी के पास जलाभुना सा खड़ा हो गया था. वीरमती मुड़मुड़ कर बहुत प्यार से उसे देखती एकएक सीढ़ी चढ़ती जाती थी. भोलू का दिल धड़क जाता था. उसे वीरमती का जाना भीतर ही भीतर कचोट रहा था.

वीरमती नंगे पैर बरामदे तक पहुंच गई थी. उस ने उस डरावनी जगह पर चारों ओर नजर दौड़ाई, फिर नीचे खड़े भोलू को देखने लगी.

भोलू ने उसे नीचे से हाथ हिला कर इशारा किया, तो वह मुसकरा उठी.

वीरमती हिम्मत के साथ मंदिर की ओर बढ़ गई. दरवाजे के पास रुक कर उस ने भीतर   झांका. पहले तो उसे काफी अंधेरा जान पड़ा, पर कुछ देर बाद उतना अंधेरा नहीं लगा और डांभरी देवता की सफेद पिंडी उसे साफसाफ दिखाई देने लगी.

वीरमती ने देवता की पिंडी पर हार पहनाया और धूप जला कर धूपदान में रखी. फिर पिंडी के सामने हाथ जोड़ कर और आंखें बंद करते हुए धीमी आवाज में बोली, ‘‘हे देवता, आप अच्छे गुणों के स्वामी हैं. आप मेरे मातापिता भी हैं, पर आप के साथ होने वाली सुहागरात के बारे में सोचना भी मेरे लिए पाप है…

‘‘हे देवता, इस तरह की प्रथा को हटाओ. ऐसा नहीं होना चाहिए.’’

इसके बाद वीरमती तख्तपोश की ओर मुड़ी, तो उसे एक सरसराहट सी सुनाई दी.

वीरमती ने चौकन्ना हो कर इधरउधर देखा, पर कुछ दिखाई न दिया. फिर भी उस की धड़कनें कुछ बढ़ सी गई थीं, जिसे वह सन्नाटे और डरावने माहौल में महसूस करने लगी थी.

कुछ देर खड़े रहने पर वीरमती ने उस सरसराहट को मन का वहम सम  झा और तख्तपोश पर सोने के लिए जाने लगी कि अचानक एक बड़े डीलडौल वाला नंगा आदमी उस पर   झपट पड़ा. उस आदमी के चेहरे पर डरावना मुखौटा लगा था. उस के लंबे बाल उसे और भी भयानक बना रहे थे.

इस के पहले कि वीरमती की चीख निकलती, उस डरावने आदमी का एक हाथ वीरमती के मुंह पर चिपक गया, ताकि वह चीख न सके.

उस डरावने आदमी का दूसरा हाथ उस के कमरबंद खोलने को रेंगने लगा. उस आदमी की सांसें मुखौटे के पीछे से पूरे सन्नाटे में गूंजने लगीं.

वीरमती उस शख्स की मंसा समझ चुकी थी कि यह देवता नहीं, बल्कि कोई शैतान है. उसे भोलू का ध्यान आया और पूरी हिम्मत बटोर कर उस ने अपने दाएं हाथ से वह मुखौटा हटाया और बाएं हाथ से अपने बालों के जूड़े में छिपाया चाकू निकाल लिया.

नंगे आदमी का चेहरा देख कर वीरमती का शक यकीन में बदल गया कि वह गुर दितू था.

वीरमती जोर से चिल्लाई, ‘‘पापी, ले दरिंदगी की सजा,’’ और उस ने   झट से गुर दितू की नाक काट दी.

भयंकर दर्द से बेहाल गुर दितू जोर से चिंघाड़ा. उस की चिंघाड़ दूर तक गूंज गई. दर्द से तड़पता हुआ अब तो वह हिंसक बाघ बन गया.

एक आदमी की चिंघाड़ सुन कर किसी अनहोनी के डर से भोलू पूरी ताकत लगा कर सीढि़यों पर चढ़ चला. पहली ही सीढ़ी से ऊपर न चढ़ने का नियम भंग होने की उसे कतई चिंता न थी.

इधर खून से लथपथ गुर दितू ने वीरमती को उठने न दिया. वह एक हाथ से उस का गला दबाने लगा, पर वीरमती का चाकू ‘खचाक’ से उस की कलाई पर चला और बंधन छूट गया.

भोलू हांफता हुआ मंदिर में पहुंच गया. कुछ देर तो उसे चूडि़यों की खनक के सिवा कुछ दिखाई नहीं दिया, पर फिर सबकुछ साफ नजर आने लगा.

भीतर का सीन देख कर वह सम  झ गया और उस का खून खौल उठा. सकपका कर डरते हुए गुर दितू उठने लगा, पर वीरमती ने बालों से पकड़ कर उसे   झक  झोरना शुरू कर दिया.

भोलू ने आव देखा न ताव देवता की पिंडी के पास पड़ी तलवार उठा ली. वह गुर्राते हुए बोला, ‘‘ठहर जा शैतान, मैं आज तु  झे जिंदा नहीं छोड़ूंगा. तेरा यह खेल अब हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा.’’

वीरमती द्वारा बालों से पकड़े नंगे गुर दितू को भोलू की जोर की लात पड़ी और वह दरवाजे पर गिर पड़ा.

भोलू ने तलवार सीधे उस की गरदन पर दे मारी, लेकिन वीरमती के रोकने से तलवार उस का कान काटती हुई दरवाजे में धंस गई.

‘‘इस शैतान को मार कर अपने सिर हत्या का जुर्म न लें. इस की करतूतों की सजा इसे गांव वाले और पुलिस देगी,’’ वीरमती ने प्यार से समझाते हुए कहा.

गुस्से से तड़पता भोलू न चाहते हुए भी मान गया. वे दोनों गुर दितू को बालों से घसीटते हुए मंदिर से बाहर ले चले, तो उन्होंने देखा कि गांव वालों का जमघट चढ़ाई चढ़ते हुए बड़ी तेजी से मंदिर की ओर ही आ रहा है.

अब गुर दितू गिड़गिड़ाते हुए उन से माफी मांगने लगा. वह अपने नंगे बदन को हाथों से ढकता और दर्द से कराहता भी जाता था. उस के कटे नाककान से खून निकलना बंद नहीं हो रहा था.

गुर दितू को नंगा देख कर कई औरतें चेहरा घुमा कर हंसने लगी थीं, जबकि वह सिर   झुकाए उकड़ू बैठ गया था.

एक औरत ने गुर दितू की ओर अपना दुपट्टा फेंका, जिसे उस ने   झट से लपक कर कमर पर लपेट लिया था.

इसी दौरान एक औरत ने अपनी चप्पल निकाल कर गुर दितू के सिर पर मारनी शुरू कर दी थी. जब वह थक गई, तो रोतेरोते उस ने गुर दितू द्वारा उस से किए कुकर्म की बात सभी को बता दी.

उस औरत ने यह भी बताया कि वीरमती को चाकू रखने की सलाह उसी ने दी थी. अनहोनी के डर से गांव वालों को भी वही साथ लाई थी.

डांभरी और टिक्करी गांव के लोग बहुत दुखी हुए. तभी सब से पीछे खड़ी 11 दिन पहले ब्याही रघु पंडित की बहू भी जोरजोर से रो पड़ी.

वह रोतेरोते बोली, ‘‘मंदिर में बेहोश होने पर भी इस दुराचारी ने मेरे साथ कुकर्म किया था.’’

उस के पति ने दिलासा दे कर उसे चुप कराया और नफरत से गुर दितू की ओर थूक दिया.

अब सब गांव वाले देवता के नाम पर हो रहे पाखंड को पूरी तरह जान गए थे. वे अपनी नासम  झी और अनपढ़ता पर बहुत दुखी थे.

इस दौरान 5-6 नौजवानों ने औरतों के दुपट्टों से गुर दितू को बांध लिया था.

सभी गांव वालों ने एकमत हो कर गुर दितू और डांभरी देवता के चारों कारदारों को पुलिस के हवाले करने और उन का सामाजिक बहिष्कार करने का फैसला ले लिया.

दोनों गांवों के सरपंचों ने भंडारगृह का सारा अनाज गरीबों में बांटने और मंदिर के साथ भंडारगृह को भी हमेशा के लिए ताला लगाने का फैसला सुना दिया. अब वे सब गुर दितू को पकड़ कर गांव की ओर ले जाने लगे थे.

सालों से गांव का यह धूर्त पुजारी ऊंचनीच की बात कर के गांव वालों की औरतों को लूट रहा था. कुछ के तो उस से बच्चे भी हुए थे, गोरेचिट्टे.

मांएं यही सोच कर खुश रहती थीं कि पंडित की संतान हैं, तो उस के अगले जन्म तो सुधरेंगे. कई औरतें तो बाद में भी पुजारी की सेवा करने आती रहतीं और यही कहतीं कि देवता उन पर खुश हैं. Story In Hindi

Sexual Harrassment: मेरे कलीग ने मेरे साथ जबरदस्ती करने की कोशिश की

Sexual Harrassment: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मेरी उम्र 24 साल है मैं दिल्ली की एक प्राइवेट कंपनी में जौब करती हूं. मेरा एक कलीग है जो बौस के बेहद करीब है. वे मुझसे पहले का इस कंपनी में काम कर रहा है. बौस ने एक असाइमेंट के चलते उसे और मुझे मीटिंग के लिए शहर से दूर जयपुर जाने के लिए बोला. बौस के कहने पर हमें एक ही रूम में रुकना था जो कि मुझे बिल्कुल भी कम्फरटेबल नहीं लगा और इस बात पर मैंने बौस से बात भी की लेकिन उन्होनें मुझे एडजस्ट करने को कहा. होटल के रूम में उस लड़के ने मेरे साथ बदत्तमीजी करने की कोशिश की और कहा कि अगर मुझे प्रोमोशन चाहिए तो मैं उसका साथ दूं. मैं इस बात पर उससे बहुत नाराज हुई और उसे खुद से दूर सोने को कहा. मैं पूरी रात उस कमरे में सो नहीं पाई और सुबह होते ही दिल्ली आ गई. मैंने पूरी बात जब बौस को बताई तो उन्होनें इस पर कोई रिएक्शन ना देते हुए कहा कि वे उस लड़के से बात करके उसे समझाएंगे. मुझे समझ नहीं आ रहा कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब –

जैसा कि आपने बताया कि आपका कलीग बौस के काफी करीब है तो हो सकता है उस लड़के ने ही बौस से कहा हो कि आपको उसके साथ भेजे और होटल में एक ही कमरा बुक कराने में बौस और उसका हाथ हो. सबसे पहले तो आपको ऐसी कंपनी छोड़ देनी चाहिए जहां इस तरह की चीजें होती हों.

उसके बाद आप सारी बात अपने घरवालों को बताएं ताकी वे आपके सपोर्ट में खड़े रहें और आपको बौस और उस लड़के के खिलाफ पुलिस कम्पलेंट करनी चाहिए क्योंकि अगर आप आज बेइज्जती के डर से चुप हो जाएंगी तो आपकी जगह कोई और लड़की ऐसे लोगों की शिकार बन जाएगी.

आपको ऐसे लोगों को सजा दिलानी चाहिए ताकी औफिस में काम कर रही हर लड़की के सामने उन दोनों की असलीयत आ सके. आप एक बहादुर और इमानदार लड़की हैं और आपका एक कदम कई लड़कियों की इज्जत से खिलवाड़ होने से बचा सकता है.

व्हाट्सऐप मैसेज या व्हाट्सऐप औडियो से अपनी समस्या इस नम्बर पर 8588843415 भेजें. Sexual Harrassment

Hindi Crime Story: बायोडाटा चिपकाने वाला गैंगस्टर हुआ ढेर

Hindi Crime Story: ‘सिग्मा’ का मतलब है, जो अपनी मरजी से काम करता है और सामाजिक बंधनों से भी खुद को अलग रखने की कोशिश करता है. वह भीड़ की बजाय अपनी कंपनी में रहना पसंद करता है. पर ‘सिग्मा एंड कंपनी’ गिरोह बनाने वाले रंजन पाठक को लोगों में दहशत फैलाने के बाद अपना प्रचार करने का जुनून था. तभी तो ‘सिग्मा एंड कंपनी’ गिरोह अपने शिकार को गिन कर 6 गोली मारता था. हत्या के बाद उस के ठिकाने, मकान या दुकान पर अपना बायोडाटा भी चिपका देता था.

पर अब ‘सिग्मा एंड कंपनी’ गिरोह का सरगना रंजन पाठक इस दुनिया में नहीं है. दिल्ली के रोहिणी इलाके में बुधवार, 22 अक्तूबर की देर रात बिहार पुलिस और दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच की जौइंट टीम ने एक बड़ा आपरेशन अंजाम दिया.

इस ऐनकाउंटर में बिहार के 4 मोस्ट वांटेड गैंगस्टर ढेर हो गए थे. मरने वालों में गैंग सरगना रंजन पाठक भी शामिल था, जिस पर हत्या, रंगदारी और लूट जैसे कई गंभीर मामलों में आरोप लगे थे.

मिली जानकारी के मुताबिक, रंजन पाठक ‘सिग्मा एंड कंपनी’ के नाम से अपना गैंग चलाता था. बिहार के सीतामढ़ी और आपसपास के इलाकों में 5 हाईप्रोफाइल हत्याओं को इस गैंग ने अंजाम दिया था. पुलिस की तरफ से रंजन पाठक पर 25,000 रुपए का इनाम रखा गया था.

पुलिस के मुताबिक, रंजन पाठक गैंग लंबे समय से बिहार में सक्रिय था और हाल ही में दिल्ली में छिपा हुआ था. बिहार पुलिस को इस गैंग की तलाश कई महीनों से थी. बताया जा रहा है कि यह वही गिरोह था जो सीतामढ़ी, मुजफ्फरपुर और मधुबनी में हुई कई बड़ी वारदात में शामिल रहा है.

इस गिरोह ने आदित्य कुमार, मदन कुशवाहा, ब्रह्मर्षि सेना के पूर्व अध्यक्ष राममनोहर शर्मा और श्रवण कुमार समेत 5 हत्याएं की थीं. पुलिस सूत्रों के मुताबिक, यह गिरोह चुनाव के दौरान बड़ी साजिश को अंजाम देने की तैयारी में था और सीतामढ़ी जिले के कारोबारियों व नेताओं से रंगदारी मांग कर दहशत फैलाता था.

बिहार पुलिस से मिले इनपुट की बुनियाद पर डीसीपी संजीव यादव की निगरानी में क्राइम ब्रांच और बिहार पुलिस की जौइंट टीम ने बुधवार, 22 अक्तूबर, 2025 की देर रात को बेगमपुर इलाके में जाल बिछाया.

पुलिस के रोकने पर आरोपियों ने अंधाधुंध गोलियां चलाईं, जवाबी कार्रवाई में चारों घायल हो गए और अस्पताल में मृत घोषित कर दिए गए.

मृतकों की पहचान 25 साल के रंजन पाठक, 25 साल के बिमलेश महतो, 21 साल के अमन ठाकुर और 33 साल के मनीष पाठक के रूप में हुई.

ऐसे बना गिरोह का सरगना

पुलिस के मुताबिक, रंजन पाठक का जन्म गांव मलाही में हुआ था. वह मनोज पाठक और विमला देवी का सब से बड़ा बेटा था. उस के परिवार में एक छोटा भाई और 5 बहनें भी हैं. जब रंजन पाठक महज 19 साल का था, तभी उसे पता चला कि उस की एक सौतेली बहन को भूमिहार जाति के शख्स से प्यार हो गया है.

इस बात से गुस्साए रंजन ने अपने दोस्त के साथ मिल कर उस शख्स की गोली मार कर हत्या कर दी थी.
इस कांड में हुई लड़ाई के दौरान रंजन पाठक के सिर में गोली लगी थी, लेकिन वह भागने में कामयाब रहा था.

रंजन पाठक के सिर में लगी उस गोली का निशान अब उस की पहचान बन चुका था. इस बीच वह कई बार जेल गया और साल 2025 में जेल से छूटने के बाद वह सीतामढ़ी के नामी गैंगस्टर शशि कपूर से मिला और फिर उस ने शराब की तस्करी के लिए ‘सिग्मा एंड कंपनी’ खोल डाली.

पुलिस के मुताबिक, शराब की तस्करी के लिए रंजन पाठक को लोकल सरपंच का भी साथ मिला हुआ था. आदित्य ठाकुर नाम के दूसरे शराब तस्कर ने जब एतराज जताया, तो रंजन ठाकुर ने मार डाला. इस के बाद सीतामढ़ी में खूनी खेल शुरू हो गया था. पर अब रंजन पाठक भी निबट गया है.

दुनियाभर के बदनाम गैंगस्टर

ऐसा नहीं है कि अकेला रंजन पाठक ही कोई गैंग चलाता था. पूरी दुनिया में ऐसे गैंगस्टर हुए हैं, जिन्होंने अपने देश की सरकार और पुलिस की नाक में दम कर दिया था. वे बेरहम तो थे ही, पैसे से भी बहुत ज्यादा ताकतवर थे.

भारत में आज भी बहुत से गैंगस्टर जेल में बैठ का अपना डर का धंधा चमका रहे हैं. इन में लौरेंस बिश्नोई, नीरज बवानिया, लखबीर सिंह सरन उर्फ लक्खा सिधाणा, सुनील सरढानिया, काला जठेड़ी, हाशिम बाबा, कपिल सांगवान, इरफान उर्फ छेनू खास हैं.

ये पुलिस के निशाने पर तो रहते ही हैं, आपसी गैंगवार में भी खत्म हो जाते हैं. ऐसा भी देखा गया है कि बहुत से नेता ऐसे गैंगस्टरों के कंधे पर बंदूक रख कर अपना उल्लू सीधा करते हैं. वे अपने मतलब के लिए लोगों को डराने और चुनाव में मदद करने के लिए इस्तेमाल करते हैं.

नौजवान गैंगस्टर क्यों बनते हैं? इस सवाल पर लखबीर सिंह सरन उर्फ लक्खा सिधाणा ने बीबीसी से बात करते हुए बताया था, ‘‘मैं ने कालेज में छोटेमोटे अपराध करने शुरू किए. मुझे इस जिंदगी से प्यार हो गया. हम ताकत और शोहरत के नशे में चूर थे. हमें इस बात से खुशी मिलती थी कि लोग हम से डरते हैं, उन्हें डरता देख कर हम और ताकतवर महसूस करते थे.’’

पर हाल ही में हरियाणा के पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह ने विदेश में छिपे गैंगस्टर्स को लोमड़ी, सियार, गीदड़ और सांपबिच्छू जैसा बताया है. उन्होंने कहा कि गीदड़ की तरह भागते रहते हैं, कुत्ते की तरह मारे जाते हैं. काहे के गैंगस्टर, काहे का खौफ. ओपी सिंह की बात में दम है, क्योंकि ज्यादातर गैंगस्टर का ऐसा ही हाल होता है.

लखबीर सिंह सरन भी पुलिस महानिदेशक ओपी सिंह की बात को सच साबित करते हैं. उन्होंने बीबीसी से हुई बातचीत में कहा था, ‘‘मैं बगैर हथियारों के या अकेले कहीं नहीं जा सकता, क्योंकि मुझे दुश्मनों से या ऐसे किसी भी शख्स से खतरा है, जो मेरी जान लेना चाहता हो. मेरी पत्नी और परिवार डर के साए में जीते हैं. मेरी आने वाली 2-3 पीढि़यां तक सुरक्षित नहीं हैं. यह शोहरत बस नाम की है.’’ Hindi Crime Story

Editorial: बिहार में शराबबंदी पर सियासत तेज – नीतीश कुमार की मुश्किलें बढ़ीं

Editorial: बिहार में शराबबंदी एक मुद्दा बना और नीतीश कुमार जिन्होंने शराबबंदी लागू की, इस बारे में कुछ ज्यादा नहीं बोल सके, एक परेशान करने वाली बात है. शराबबंदी का कदम नीतीश कुमार का एक अकेला अच्छा काम था जिस की हिम्मत कम ही नेता दिखा पाते हैं, उसे चुनाव में बलि का बकरा बना दिया गया है और नएनवेले घोड़े प्रशांत कुमार और पुराने खिलाड़ी तेजस्वी यादव दोनों इसे खत्म करने का वादा कर रहे हैं.

शराब एक बुराई ही नहीं है, यह लूटने की साजिश है, जैसे अंगरेजों ने चीन पर 1850 के आसपास अफीम लड़ाइयां लड़ कर भारत में उगी अफीम चीन में बेची और चीनियों को अफीमची ही नहीं बनाया उन की जमा पूंजी से दुनियाभर में राज करने के लिए पैसा कमाया. बिहार में शराब पिलापिला कर लोगों को लूटा जाता है और जमीनें, घर, बचत छीन कर उन्हें दरदर भटकने के लिए मजबूर किया जाता है.

शराबबंदी से सरकार को चाहे कर का नुकसान हो कम से कम यह खुलेआम आसानी से तो नहीं बिकती. गैरकानूनी धंधा चलता है, माफिया पैदा होता है, गुंडाराज बढ़ता है पर सब की कीमत उस घर की शांति से कम है जो होशोहवास में आया आदमी घर में घुसते हुए चाहता है. नशे में चूर आदमी न सिर्फ पैसा बरबाद करता है, बीवीबच्चों को पीटता है, भूखा रखता है.

शराबबंदी के कारण बिहार में 2016 से 2023 तक 6 लाख से ज्यादा लोगों पर मुकदमे दायर हुए, चाहे सिर्फ 1500 लोगों को सजा मिली. शराबबंदीको खत्म करना कोई शाबाशी का काम नहीं है. शराब ठेकेदारों को अरबों का नुकसान हुआ हो और जिन पर मुकदमे चले उन्हें वकीलों पर खर्च करना पड़ा हो पर कुल खपत जितनी भी कम हुई हो, अच्छी है.

शराब असल में ऊंची जातियों की साजिश है कि एससीएसटी को किस तरह गरीब रखा जाए, शराब की आदत डाल कर उन्हें पूरी जिंदगी का गुलाम बना डाला जाता है और नशीली ड्रग्स भी एससीएसटी को ही दी जाती हैं चाहे वे पंजाब में हों, उत्तर प्रदेश में या तमिलनाडु में हों. ऊंची जातियों में शराबी होते हैं पर उन पर कंट्रोल करने के सैकड़ों तरीके ऊंची जातियों के पास हैं.

एससीएसटी चूंकि खुद शराब से कमाई करते हैं, उन्हें लगता है कि सरकार ने शराबबंदी से उन के पेट पर लात मारी है जबकि नीतीश कुमार ने भगवा पार्टी के साथ मिल कर भी इस नीति को नहीं बदला तो इसलिए कि वे इस की जरूरत सम?ाते हैं. भगवा पार्टियां तो मांसमच्छी तक से परहेज करने की आदत घरों में डलवा देती हैं पर वे दूसरों को शराब, ड्रग्स देती रही हैं.

आज देश के जितने धन्ना सेठ हैं, सब के पुरखों ने असल कमाई अंगरेजों के साथ मिल कर अफीम के व्यापार से ही की थी. हर तीर्थस्थान में गांजा, अफीम, चरस भरपूर मिलती है. यह एक बड़ी साजिश है गरीब को न समझने देने की.

सरकारों से अच्छे कामों की उम्मीदकम होती है पर गरीबों के बच्चे पढ़ने स्कूल आएं इस के लिए जो मिड डे मील पौलिसी देश में चल रही है, वह अच्छी है. देश की 80-90 करोड़ जनता आज भी भुखमरी के कगार पर है और चाहे भारत दुनिया की तीसरी सब से बड़ी इकोनौमी बन जाए, इन गरीबों पर असर नहीं पड़ेगा क्योकि पैसा तो ऊपरी 5-7 फीसदी के पास ही है.

बच्चे स्कूल जाएं और खाने के लिए घर न भागें इसलिए स्कूल में दोपहर का खाना दिया जा रहा है. अब कुछ राज्यों ने मांग की है कि यह खाना सुबह नाश्ते का भी दिया जाए ताकि बच्चे भूखे पेट न मरें. इस से बच्चों को सुबह से दोपहर तक स्कूल में रहना पड़ेगा.

राज्यों ने यह भी कहा है कि यह खाना जो अब 8वीं क्लास तक मिलता है, 12वीं तक दिया जाए. यह भी अच्छी मांग है. पर यह सब उस खोखलेपन को जताता है जो इस देश में है पर इस की बात दया के रूप में की जाती है, अपनी गलती की शक्ल में नहीं. अगर बच्चे भूखे रहते हैं तो इसलिए कि मांबाप के पास खाना कम होता है कि वे बांध कर दे सकें. स्कूल में जाने पर उन्हें खाना भी मिलता है और पढ़ाई भी मिलती है.

यह साजिश है कि जब देश का किसान इतना अनाज पैदा कर रहा है कि सब को खिला सके तो इतना पैसा गरीबों के हाथों में क्यों नहीं आ रहा कि वे खुद बच्चों को खिला सकें. सरकार और समाज ने ऐसा ढांचा बना रखा है कि गरीब बच्चे को हाथ फैलाने की आदत पड़ जाए. बचपन से उसे पट्टी पढ़ा दी जाती है कि वह तो मुफ्तखोर है. मांग कर खाता है. इस साजिश के बावजूद यह फैसला सही है कि शायद अगली पीढ़ी का बच्चा हुनर सीख कर ज्यादा कमा सके और सरकार की दया पर न जिए.

सुबह का नाश्ता और मिड डे मील सरकार की कमजोरी को जाहिर करते हैं पर सरकारें उसे दया की शक्त देती हैं. इस स्कीम का नाम ‘पीएम पोषण योजना’ है ताकि हरेक को कहा जा सके कि देखो तुम तो बड़े भी पीएम की कृपा पर हुए हो. ऐसा हल्ला मचाया जाता है मानो पीएम ने खुद अरबों का खाना उगाया था. सरकार ने इन्हीं बच्चों के बापों से पैसा छीना था टैक्सों की शक्ल में और उसी पैसे से अनाज खरीद कर बांटा जाता है.

फिर भी जब तक समाज चेतता नहीं है, गरीब अपनी ताकत नहीं समझता, यह स्कीम ज्यादा से ज्यादा बच्चों को दवा की शक्ल में मिले तो अच्छा है. Editorial

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