Politics: दिल्ली की सरकार ने बड़ी दरियादली दिखाते हुए रियायत दी है कि बिजली की गाडि़यों को निजी ड्राइवर शेयर टैक्सी की तरह चला सकते हैं. यह तो हमेशा समझ से परे है कि जब सड़कें सब की सा?ा हैं, गाडि़यां लोगों की अपनी हैं, ड्राइवर अपना है तो उस में कौन बैठेगाकौन नहीं, इस में सरकार बीच में कहां आती है.
जिसे हम इजाजत देंगे वही किराए पर गाड़ी चला सकता है, यह कानून अपनेआप में राजेरजवाड़ों के युग की धौंस है और सारे देश में लागू है. किसान ट्रैक्टरट्रौली में अपना भूसा ले जा सकता है, बराबर वाले का नहीं, ट्रैक्टरट्रौली पर सवारियां नहीं ले जा सकते. मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा वाला किराए पर नहीं चल सकता. अपनी मोटरसाइकिल किसी और को किराए पर नहीं दे सकते. अपनी बस खरीद ली तो उसे जहां डिमांड वहां नहीं चला सकते. हर तरह के कामकी परमिशन लो. यह परमिशन ऐसी है मानो कोई दया दिखाई जा रहा हो.
देश के सारे सरकारी दफ्तर इस तरह की परमिशन देने वालों से भरे हैं. ये लोग एक तरह से टैक्स देने वालों से जमा पैसे से सरकार से वेतन लेते हैं और फिर वहां परमिशन देने के लिए घूस लेते हैं जहां इन के दखल की कोई जरूरत ही नहीं. कानून की किताबें जनता के लिए नहीं बनी हैं, सिर्फ सरकारी परमिशनों के लिए बनती हैं.
एक जमाने में अंगरेजों को कोसा गया था कि उन्होंने बिहार, ओडिशा के किसानों को मजबूर किया था कि वे नील की खेती करें क्योंकि नील की जरूरत इंगलैंड की मिलों को थी. आज भी वैसा ही अंगरेजी राज है कि चाहे बाइक, कार, ट्रक, बस या हवाईजहाज के मालिक, जनता का कोई आदमी हो, परमिशन तो सरकारी बाबू ही देगा.
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