Political story: अपने बचपन में खूब बाल पत्रिकाएं जैसे ‘नंदन’, ‘पराग’, ‘चंदामामा’, ‘बाल भारती’, ‘चंपक’ वगैरह पढ़ी थीं, जिन में राजारानियों, राजकुमारों, जानवरों से जुड़े मजेदार किरदारों की कहानियां हुआ करती थीं. अब राजारानी हैं, तो राजमहल भी होंगे ही. तो उस जमाने में हमारे जैसे बच्चे कल्पनालोक में डूब जाते थे कि राजमहल कैसा होता होगा. जाहिर सी बात है कि वे भव्य तो होंगे ही. होना भी चाहिए. वह समय राजतंत्र का भी था.
मगर वह राजतंत्र अब लोकतंत्र में बदल गया है, तो राजारानी तो हैं नहीं, मगर राजमहल मौजूद हैं, जो म्यूजियमों में या होटलों में बदल गए हैं. पुराने जमाने में इन राजमहलों की शानशौकत का कहना ही क्या था. फिर बाल कहानियों में तो वे अपनी पूरी शान से मौजूद रहते थे, जिस में रहने का हम सपना भी नहीं देख सकते थे. मगर एक इच्छा तो रहती ही है मन में कि वहां जा कर उन की भव्यता देखते कि राजपरिवार के लोग कैसे रत्नजटित राजमुकुट लगाए राजमहलों में रहते होंगे. राजा सोने के एक भव्य, बड़े सिंहासन पर सलमेसितारों से सजा मखमली छत्र लगा कर बैठा होगा.
उन की देह पर आभूषणों का भंडार जो सजा रहता था. गले में बड़ेबड़े हार, कानों में बड़ेबड़े झुमके या बड़ीबड़ी बालियां, बांह पर बाजूबंद, कलाई में कंगन और कमर में करधनी. ये सब खासे सच्चे सोने के होते थे, जिन की तसवीरें पत्रिकाओं में छपी होती थीं. आखिर ‘चंदामामा’, ‘नंदन’, ‘पराग’ वगैरह में बताए गए किरदार तेनालीराम, बीरबल, गोपाल भांड़ वगैरह तो सामान्य लोग ही थे, जो अपनी चतुराई और बुद्धिमानी से वहां पहुंच गए थे. मगर हम लोगों के पास न चतुराई थी और न ही बुद्धिमानी, सो वहीं के वहीं रह गए. और एक छोटी सी नौकरी तक पहुंच कर वोटर भर बन कर रह गए.
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