Political Story: कांग्रेसी चमचा और संघी देशभक्त जब भी आमनेसामने आ जाते तो उन में वैचारिक भिड़ंत उतनी ही स्वाभाविक होती जितनी आपस में टकराने वाले सांडों की भिड़ंत. उन में एकदूसरे को बरदाश्त करने की ताकत साल 1925 से ही ऐसी गायब हो गई थी जैसे गधे के सिर से सींग.
यह अद्भुत भिड़ंत आज भी जारी है और अनुमान ही नहीं समुद्र के खारे पानी की तरह पूरा विश्वास है कि जब तक सूरजचांद रहेगा, कांग्रेसी और संघी भिड़ंत का कोई तोड़ नहीं रहेगा. हाई वोल्टेज करंट की तरह ज्वलंत और किसी सुपर बल्ब की तरह यह भिड़ंत अनंतकाल तक जगमगाती रहेगी और आम पब्लिक गोलगप्पों की तरह चटकारे लेले कर इस का मजा लेती रहेगी. बंधुओ, इस में छटांक भर की भी कमी आ जाए तो कसम इस लेखनी की जो कभी फिर इसे लिखने के लिए उठा लूं.
एक संघी देशभक्त सुबह की शाखा से ऐसे ही खुश हो कर लौट रहा था, जैसे तरोताजा घोड़ा हष्टपुष्ट घास चरने और धूल में लोटने के बाद बिलकुल मस्त दिखाई देता है, लेकिन उसे क्या पता था कि अगले ही मोड़ पर उसे वह मनहूस सूरत दिखाई दे जाएगी, जिसे वह सपने में भी देख कर बिदक जाता है. अंदाजा लगाइए कि कौन मनहूस होगा वह? बिलकुल सटीक अंदाजा है आप का, वह था कांग्रेसी चमचा जो उस संघी के लिए किसी देशद्रोही से कम न था. एकदूसरे को देखते ही वे दोनों ऐसे ताव खा गए जैसे सांप और नेवला अचानक से एकदूसरे के सामने आ जाएं और जब आ ही गए और नूरा कुश्ती न हो, यह तो नामुमकिन ही है. एकदूसरे को देख कर दोनों गरम रेत में भुनते चने की तरह तड़तड़ भुनक गए.
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