Hindi Kahani: जवानी की दहलीज पर खड़े दिवाकर की एक अजीब आदत थी कि जहां भी कोई लड़की दिख जाती, उस की आंखें उसी पर टिक जातीं. राह चलती, बाजार जाती, मंदिर या कालेज जाती, कोई भी लड़की दिवाकर की पारखी निगाहों से बच नहीं पाती. वह हर लड़की को ऊपर से नीचे तक ऐसे ताड़ता, जैसे उस की आंखों में सचमुच एक्सरे मशीन लगी हो.


एक दिन बाजार जाते समय की बात है. इसी हरकत को देख कर दिवाकर के एक दोस्त सोमेश ने पूछ ही लिया, ‘‘यार, इस तरह लड़कियों को घूरने से तुम्हें क्या मिलता है?’’ दिवाकर तुरंत उछल पड़ा और बोला,‘‘नयनसुख, पार्टनर नयनसुख. देखना तो मेरा शौक है , कोई गुस्ताखी थोड़े ही कर रहा हूं.’’ सोमेश ने गंभीर हो कर कहा, ‘‘लेकिन यह गलत बात है. किसी को यों घूरना भी एक तरह की बदतमीजी है, पता है ?’’


दिवाकर ने हंसते हुए हाथ ?ाटका, ‘‘अरे यार, मैं कौन सा लड़की छेड़ रहा हूं या भद्दे कमैंट्स पास कर रहा हूं? बस, खामोशी से आंखें ही तो सेंकता हूं. मेरी आंखें एक्सरे हैं, जो देखना होता है, देख लेती हैं. हा... हा... हा.’’ दिवाकर की बेशर्मी देख कर सोमेश ने सब्र रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हें अंदाजा है कि तुम्हारी इसटकटकीसे लड़कियां कितना अनकंफर्टेबल महसूस करती हैं?’’ दिवाकर ने जैसे कुछ सुना ही हो और बोला, ‘‘अरे यार, अब तू मत शुरू हो जा किसी सत्संगी बाबा की तरह प्रवचन ले कर. इस उम्र में यह सब करूं तो क्या बुढ़ापे में करूंगा?’’


सोमेश ने बात बढ़ाना बेकार समझ पर दोस्ती के नाते सम?ाता हुआ साथ चलता गया. इसी दौरान वे दोनों कालेज की ओर जाने वाली सड़क पर पहुंच गए. अचानक दिवाकर की नजर सड़क किनारे खड़ी एक लड़की पर गई. वह उस की छोटी बहन दिव्या थी, जो बुरी तरह परेशान हो कर स्कूटी स्टार्ट करने की कोशिश कर रही थी. दिवाकर फौरन दौड़ पड़ा और बोला, ‘‘क्या हुआ दिव्या?’’ दिवाकर को देख कर दिव्या ने राहत की सांस ली और बोली, ‘‘अच्छा हुआ भैया कि आप गए. मेरी स्कूटी बंद हो गई है. आज कालेज में मेरा इंटरनल टैस्ट है, अगर इसे घर रख कर जाती हूं, तो पेपर छूट जाएगा. अच्छा हुआ कि आप मिल गए.’’

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