Crime Story: महज 10,491 वर्ग किलोमीटर क्षेत्रफल का त्रिपुरा पूर्वोत्तर भारत में बसा एक खूबसूरत राज्य है और उस से भी खूबसूरत हैं वहां के रहवासी. यहीं के उनाकोटी जिले के नंदानगर इलाके का रहने वाला एक नौजवान लड़का ऐंजल चकमा अपने सपने पूरे करने दूसरे पर्वतीय राज्य उत्तराखंड की राजधानी देहरादून गया था, जहां वह पढ़ाई कर रहा था.


पर 9 दिसंबर, 2025 का दिन ऐंजल चकमा पर कहर बन कर टूटा. एक छोटी सी कहासुनी मारपीट में बदली और फिर ऐसा खूनी खेल हुआ कि ऐंजल चकमा अपनी जिंदगी से ही हाथ धो बैठा. इस वारदात को ऐंजल चकमा के छोटे भाई माइकल चकमा के कहे मुताबिक सम?ाते हैं. 9 दिसंबर की शाम के तकरीबन 6 से 7 बजे माइकल अपने भाई ऐंजल के साथ कुछ सामान लेने घर से निकला था. वे दोनों सेलाकुई में ही रहते थे. ऐंजल देहरादून की जिज्ञासा यूनिवर्सिटी में एमबीए फाइनल ईयर की पढ़ाई कर रहा था, जबकि माइकल उत्तरांचल यूनिवर्सिटी में पढ़ रहा था.


जब वे दोनों मार्केट में पहुंचे तो बाइक और स्कूटी पर आए कुछ लड़के उन के पास आए. उन सभी लड़कों ने दोनों भाइयों पर कमैंट करना शुरू कर दिया. माइकल चकमा ने बताया, ‘‘हमें वे लोग लगातारचाइनीज’, ‘चिंकीऔरमोमोकह कर चिढ़ा रहे थे. पहले हम ने इग्नोर किया, लेकिन वे माने नहीं. जब मैं ने उन से पूछा कि क्या दिक्कत है? क्यों यह सब बोल रहे हो? तो उन्होंने पीटना शुरू कर दिया.
‘‘एक लड़के ने कड़े से मारा. मारपीट होती देख कर तुरंत ऐंजल बीचबचाव करने पहुंचा, फिर उन्होंने  छोड़ कर ऐंजल को बुरी तरह पीटना शुरू कर दिया. मैं ने काफी कोशिश की उन्हें रोकने की, लेकिन हम दोनों ही घिर चुके थे. वे लगातार हम दोनों को ही मार रहे थे.’’


इस बारे में ऐंजल चकमा के मामा ने बताया, ‘‘जब शुरुआत में वे लड़के कमैंट कर रहे थे, तो माइकल ने बाइक से उतर कर उन से कहा था किहम भी इंडियन हैंहमें चाइनीज क्यों बोल रहे हो?’ लेकिन उन्होंने एक नहीं सुनी. ‘‘उस रात उन लड़कों ने दोनों को सिर्फ कड़ों से ही नहीं मारा, बल्कि चाकू से भी ऐंजल के पेट में वार किया गया. वे लोग ऐंजल की गरदन पर कड़े से तब तक मारते रहे, जब तक उस की पूरी गरदन फट नहीं गई. खून भी निकलता रहा, लेकिन वे उसे बस पीटते ही रहे. गरदन पर किए गए घातक वार के चलते ही ऐंजल के सिर में खून जमा हो गया था.’’


हमले के बाद ऐंजल और माइकल दोनों गंभीर हालत में ग्राफिक एरा अस्पताल पहुंचे. माइकल के सिर में हलकी चोट थी, लेकिन ऐंजल को आईसीयू में भर्ती कर दिया गया. वह अस्पताल में जिंदगी और मौत से रहा और 26 दिसंबर, 2025 की सुबह तकरीबन 4 बजे उस ने दम तोड़ दिया. इस के बाद पूरे देश में एक बहस सी गई कि ऐंजल चकमा हेट क्राइम का शिकार हुआ है, जबकि देहरादून एसएसपी अजय सिंह ने इस हत्याकांड को हेट क्राइम मानने से साफ इनकार किया. उन के मुताबिक, यह 2 गुटों के बीच अचानक हुई कहासुनी का नतीजा था.


देहरादून पुलिस की ओर से अब तक हुई जांच में सामने आया है कि ऐंजल चकमा और उस के भाई माइकल चकमा पर हमला करने वाले आरोपी भी पूर्वोत्तर में मणिपुर और पड़ोसी देश नेपाल जैसे पर्वतीय इलाके के हैं. पुलिस ने तेजी दिखाते हुए 6 में से 5 आरोपियों को गिरफ्तार किया. उन में 2 नाबालिग शामिल थे, जबकि एक आरोपी को फरार बताया गया. उस पर पुलिस ने 25,000 रुपए का इनाम भी घोषित किया था.


भारत में हेट क्राइम की वजह
सितंबर, 2015 और दिसंबर, 2019 के बीच भारत में दर्ज हेट क्राइम की ज्यादातर वारदात एससी तबके पर टारगेट ले कर की गई थीं, इस के बाद मुसलिमों का नंबर रहा. कथिततौर पर नफरत के चलते जाति, धर्म से ले कर औनर किलिंग और लव जिहाद तक कुल 902 अपराध दर्ज किए गए. अगर वजह की बात करें तो हमारे देश में रूढि़वाद परिवार, धर्म और तालीम में गहराई से घुसा हुआ है. इतना ज्यादा कि ऊंची जाति के बच्चे कुछ समुदायों या जातियों को अपने से नीचा मानते हुए उन्हें नफरत से देखते हैं, जानवर से बदतर  हैं.


यही वजह है कि जब लोग राजनीति में अपनी पहचान बनाते हैं तो वोटबैंक जुटाने के चक्कर में अकसर हेट क्राइम का सहारा लेते हैं. जाति और धर्म को देश से ऊपर मनाने वाले बहुत से नेता कभीकभी अपने समर्थकों को एकजुट करने के लिए नफरती भाषा का इस्तेमाल करते हैं, ताकि उन के समाज के लोग उन्हें ही वोट दें. इस के अलावा भारत का कमजोर कानूनी ढांचा भी नफरती अपराधों से निबटने में बेबस सा दिखता है और ज्यादातर मामले भारतीय दंड संहिता की उन धाराओं के तहत दर्ज किए जाते हैं, जिन में मारपीट, हत्या या दंगे की बात कही गई है, जबकि हेट क्राइम की मूल जड़ को नजरअंदाज कर दिया जाता है.


जब से भारत में सोशल मीडिया हावी हुआ है, बहुत से प्लेटफार्म अकसर हेट क्राइम को बढ़ाने वाली सामग्री को बढ़ावा देते हैं. सियासी माहौल गरमाया पर चूंकि यह मामला हेट क्राइम जैसा था तो इस पर सियासी उबाल आना लाजिमी था. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष और कांग्रेस के कद्दावर नेता राहुल गांधी ने इस मामले में कहा कि हमें एक ऐसा मरा हुआ समाज नहीं बनना चाहिए जो देशवासियों को निशाना बनाए
जाने पर आंखें मूंद ले.

ऐसी घटनाएं उस नफरत का नतीजा हैं, जो नौजवानों के बीच परोसी जा रही हैं. इस मामले में समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने कहा कि यह नफरती सोच का बुरा नतीजा है. विघटनकारी सोच रोज किसी की जान ले रही है और सरकारी अभयदान हासिल ये लोग विषबेल की तरह फलफूल रहे हैं. दूसरी तरफ उत्तराखंड के मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने त्रिपुरा के मारे गए छात्र ऐंजल चकमा की पिता तरुण प्रसाद चकमा से फोन पर बात की और कहा कि सरकार पूरी तरह से पीडि़त परिवार के साथ खड़ी है.


लोगों का फूटा गुस्सा किसी पहाड़ी राज्य में एक पहाड़ी लड़के कोचाइनीज’, ‘चिंकीयामोमोकह कर उस पर जानलेवा वार करना हमारे देश की एकता पर एक सवालिया निशान है. हम किसी को उस के रूपरंग, चेहरेमोहरे और बोलने के अंदाज से कैसे जज कर के उस का मजाक बना सकते हैं? यही वजह है कि इस हत्याकांड के बाद उत्तराखंड से ले कर त्रिपुरा तक विरोधप्रदर्शन हुए और लोगों ने अपनी नाराजगी जाहिर की.


यही वजह थी कि केंद्रीय मंत्री किरेन रिजिजू ने पूर्वोत्तर के लोगों की सुरक्षा और संरक्षण तय करने की जरूरत पर जोर दिया और कहा कि भारतीय समाज में नस्लवाद और भेदभाव के लिए कोई जगह नहीं है.
किसी भी जाति, नस्ल या धर्म के लोगों का मजाक नहीं उड़ाया जाना चाहिए. केवल पूर्वोत्तर के लोग ही नहीं, बल्कि सभी को इस तरह की घटनाओं से दुखी होना चाहिए, क्योंकि यह किसी के साथ भी हो सकता है. पर केंद्रीय मंत्री के इतना कह देने भर से पीडि़त परिवार के जख्मों पर मरहम नहीं लग सकती और कभी कभी तो लगता है कि एक समाज के तौर पर हम वहशीपन के दौर में पहुंच गए हैं. अब यहां लोगों के कपड़े और उस कपड़े के रंग से पहचान दी जा रही है.


इतना ही नहीं, लोगों के खानपान, नाम, नैननक्श से भी यह निशानदेही की जा रही है कि कौन हमारे हक में है और कौन नहीं. देश भगवा, हरे और नीले रंग की दरारों से पटता जा रहा है और देश के बड़े से बड़े नेता के कान पर जूं तक नहीं रेंग रही. अब तो लगता है कि हर सियासी नेता चाहता है कि देश उन्मादी नदी में गोते लगाए. और यही उन्मादी नदी अब धर्म के नाम पर तांडव करने लगी है. कहीं गौमाता के नाम पर मौब लिंचिंग हो रही है तो कहीं सिर तन से जुदा होगा के जहरीले नारे लग रहे हैं.


वैलेंटाइन डे पर नौजवानों को सरेआम धर्म की आड़ ले कर पीटा जा रहा है. कोई घुसपैठिया है तो कोई देश का गद्दार. फिल्म सितारे शाहरुख खान की देशभक्ति भी अब सवालों के घेरे में गई है. इस सब में हम यह भूल जाते हैं कि इस तरह के हत्याकांड एक परिवार को उम्रभर के लिए तोड़ देते हैं. ऐंजल का छोटा भाई माइकल क्या अपने भाई की इस दर्दनाक मौत को भूल पाएगा? कभी नहीं. उस के दिल परचाइनीज’, ‘चिंकीऔरमोमोजैसे शब्द परमानैंट टैटू की तरह गोद दिए गए हैं.


ऐंजल के मामा मोमेन चकमा ने बताया कि ऐंजल के पिता ने भारी कर्ज ले कर अगरतला के बाहरी इलाके नंदननगर में एक नया घर खरीदा था. इस के अलावा ऐंजल ने देहरादून से एमबीए करने के लिए एजूकेशन लोन लिया था और हम सभी जानते हैं कि देहरादून में ऐसा कोर्स करना महंगा होता है. अब सबकुछ बरबाद हो गया है. ऐंजल चकमा के पिता तरुण प्रसाद चकमा ने कहा कि वे नहीं चाहते कि जो उन के बच्चे के साथ हुआ वह किसी और के साथ हो. वे बौर्डर सिक्योरिटी फोर्स में हैं और इस वक्त मणिपुर में तैनात हैं.


जिन पर ऐंजल चकमा की जान लेने का आरोप लगा है उन में 25 साल के अविनाश नेगी, 25 साल के सुमित, 18 साल के सूरज खवास और 22 साल के यज्ञराज अवस्थी का नाम सामने आया है. बाकी 2 लड़के नाबालिग हैं. देखा जाए तो जिंदगी इन की और इन के परिवार की भी बरबाद हुई है. ये सारे 25 साल या उस से कम उम्र के हैं. वैसे, इस मामले में अनूप प्रकाश ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की है, जिस में हेट क्राइम से निबटने में हुई संवैधानिक नाकामी की न्यायिक जांच की मांग की गई है. जब ऊना और खैरलांजी में शर्मसार हुआ था देश


11 जुलाई, 2016 की बात है. गांधी के गुजरात के ऊना में खुद कोगौरक्षककहलाने वाले लोगों ने सामाजिकतौर पर निचले कहे जाने वाले समुदाय के 7 सदस्यों की बेरहमी से पिटाई से पिटाई की थी, जिस के बाद देशभर में बवाल मच गया था. दरअसल, गिर सोमनाथ जिले के मोटा समाधियाला गांव में वशराम सरवैया और उन के भाइयों को तथाकथितगौरक्षकोंने अधनंगा कर के पीटा था और उन पर पर गौहत्या में लिप्त होने का आरोप लगाया था.


हमलावरों के दावे के उलट बाद में हुई जांच में पता चला कि एससी परिवार एक मरी गाय की खाल उतार रहा था, जिसे वे बेदिया गांव से लाए थे. अब महाराष्ट्र के भंडारा जिले के खैरलांजी गांव की बात करते हैं, जहां रहने वाली महार जाति की सुरेखा भोतमांगे और उन का परिवार नफरती हिंसा की भेंट चढ़ गया था.
दरअसल, सुरेखा भोतमांगे एक पढ़ीलिखी औरत थीं और उन्होंने अपनी मेहनत से अपने परिवार को गरीबी से उबारा और एक पक्का मकान बनवाया. उन के परिवार में उन के पति भैयालाल, 2 बेटे सुधीर रोशन और बेटी प्रियंका शामिल थे. प्रियंका 12वीं की टौपर थी.


खैरलांजी के कुनबी मराठा समुदाय को सुरेखा भोतमांगे की यह तरक्की बरदाश्त नहीं हो रही थी. लिहाजा, सुरेखा और उन के परिवार को तरहतरह से दबाने की कोशिश की गई. सुरेखा डरी नहीं और स्थानीय पुलिस हवलदार सिद्धार्थ गजभिये, जो भोतमांगे परिवार के रिश्तेदार थे, ने उन्हें समर्थन दिया और एससीएसटी कानून के तहत कार्रवाई की धमकी दी, जिस से कुनबियों में गुस्सा और बढ़ गया. नतीजतन, 29 सितंबर, 2006 की शाम को तकरीबन 70 कुनबियों ने सुरेखा के घर पर हमला कर दिया. उस समय घर पर सिर्फ सुरेखा और उन के बच्चे थे, जबकि उन के पति खेतों में काम कर रहे थे.

इन हमलावरों ने सुरेखा और उन की बेटी प्रियंका को नंगा कर पूरे गांव में घुमाया. इस के बाद उन के साथ गैंगरेप किया गया. सुरेखा के दोनों बेटों सुधीर और रोशन को भी नंगा कर के उन की बेरहमी से हत्या कर दी गई. बाद में सुरेखा और प्रियंका की भी हत्या कर उन की लाशों को सूखी नदी में फेंक दिया गया. Crime Story

    

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