Raksha Bandhan : बड़ा भाई- दो भाइयों की तनातनी

अमित ने बस्ता एक ओर फेंका और सुबकता हुआ बिस्तर पर औंधेमुंह लेट गया. मां ने देखा तो हैरानी से पूछा, ‘‘क्या हुआ अमित?’’

‘‘बड़ा आया अपने को बड़ा भाई समझने वाला, बड़ा है तो क्या हर समय मुझे डांटेगा,’’ सुबकते हुए अमित ने अपने बड़े भाई रवि की शिकायत की.

तभी रवि घर में घुसता हुआ बोला, ‘‘मां, आज फिर अमित आवारा लड़कों के साथ घूम रहा था. मैं ने इसे उन के साथ जाने से मना किया तो यह नाराज हो गया. मैं ने इसे कईर् बार कहा है कि वे अच्छे लड़के नहीं हैं, जैसी संगत होगी वैसी रंगत आएगी. संभल जाओ, इस बार तुम्हारे 10वीं के पेपर हैं, 2 महीने बचे हैं. अब भी साल भर की तरह मटरगश्ती में रहोगे तो अच्छे अंक कैसे आएंगे?’’

‘‘हां, तू तो जैसे बड़े अच्छे अंक लाया था न 10वीं में. मनचाहा सब्जैक्ट भी नहीं ले सका. तुझ से तो अच्छे ही अंक लाता हूं कम पढ़ने पर भी. बड़ा बनता है, बड़ा भाई,’’ अमित ने नाराजगी जताई.

‘‘मैं मनचाहा सब्जैक्ट नहीं ले पाया इसीलिए तो तुझे समझता हूं मेहनत कर. छोड़ ऐसे आवारा लड़कों की दोस्ती. मनचाहा सब्जैक्ट नहीं मिलेगा तो कैसे करेगा इंजीनियरिंग,’’ रवि ने समझाया.

‘‘हांहां, कर लूंगा, तू अपने काम से काम रख,’’ अमित ने झल्ला कर कहा.

‘‘नहीं बेटा, ऐसा नहीं कहते,’’ मां ने समझाया, ‘‘अगर वे गलत लड़के हैं तो उन का साथ ठीक नहीं, कल को किसी लफड़े में फंसे तो साथ रहने वाले का नाम भी खराब होता है  भले ही उस ने कुछ न किया हो.’’

‘‘औैर मां, वे लड़के तो क्लास से बंक मार कर कई बार सिनेमा देखने जाते हैं, कभी आवारा लड़कों की तरह आसपास अमरूद तोडेंगे. पता है पिछले महीने इस का दोस्त राजू बाहर घूमता लड़कियां छेड़ता पकड़ा गया था. कालोनी वाले उसे पकड़ कर लाए थे प्रिंसिपल के सामने और दूसरा, क्या नाम है उस का, मुन्ना, वह तो बातबात पर हाथापाई करने में गर्व समझता है. वह स्कूल बुलिंग में अव्वल है,’’ रवि ने स्पष्ट किया.

‘‘हां हैं, तो? हैं तो मेरे दोस्त ही न. तू घबरा मत. मैं इन के साथ रह कर भी गलत नहीं करूंगा, तू अपने काम से काम रख,’’ अमित बोला.

अमित और रवि दोनों भाई शहर के नामी स्कूल में पढ़ते थे. अमित 10वीं में था और उस का बड़ा भाई रवि 12वीं में. अमित बिगड़ैल दोस्तों की संगत में पड़ कर बिगड़ता जा रहा था. रवि बड़ा भाई होने के नाते उसे बारबार समझाता, लेकिन अमित के कान पर जूं न रेंगती. अभी परसों की तो बात थी. क्लास बंक कर अमित मुन्ना के साथ बाहर जाना चाहता था. स्कूल के गेट पर ड्यूटी देते 11वीं के छात्र से मुन्ना और अमित भिड़ गए. फिर गेट कूद कर दोनों बाहर भाग गए. एकाध घंटा मटरगश्ती करने के बाद वापस आए. तब तक प्रिंसिपल तक उन की शिकायत पहुंच चुकी थी. प्रिंसिपल ने मुन्ना के पिता को बुलाया था जबकि अमित के बड़े भाई रवि को उसी समय बुला कर हिदायत दी थी, ‘‘देखो, अमित आवारागर्दी, बुलिंग में आगे बढ़ता जा रहा है. इस का अंजाम आगे चल कर अच्छा नहीं होगा. इसे जिम्मेदार बनाओ, कुछ समझाओ. इस बार सिर्फ समझा रहा हूं. अगली बार पापा को बुलाऊंगा और स्कूल से निकाल दूंगा.’’

‘‘जी सर, मैं इसे समझा दूंगा. मैं इस की जिम्मेदारी लेता हूं. आइंदा यह ऐसा नहीं करेगा,’’ कह कर रवि ने अमित की जिम्मेदारी ली थी औैर किसी अन्य सजा से अमित को बचाया था.

इस के बाद भी जब घर आते समय अमित को समझाया तो ‘हूं’ कह कर अमित ने पल्ला झाड़ लिया. अमित ने मां को इस वाकेए से अवगत करवाया तो मां ने भी अमित को समझाया, लेकिन अमित उलटा बरस पड़ा, ‘‘वे मेरे दोस्त हैं. पता है वे दिलेर हैं इसलिए सब उन से डरते हैं. आज अगर 4 लड़के मुझे पीटने आ जाएं तो वही आगे दिखेंगे बचाने में, यह बड़ा भाई नहीं. खुद तो डरपोक है ही, औरों को भी डरपोक बनने की नसीहत देता है.’’ अमित की आवारगी बढ़ती ही जा रही थी. इधर पेपर नजदीक आ रहे थे. अमित पढ़ाई में भी पिछड़ रहा था, लेकिन वह किसी की मानने को तैयार न था. स्कूल में एक से पंगा हो जाए तो सभी गुंडागर्दी करने लगते, हौकीडंडे ले कर चल देते उन्हें पीटने, जिस कारण आसपास के स्कूलों के लड़कों से भी उन की दुश्मनी हो गई थी. अब तो अमित वैन में वापस घर भी न आता. रवि से कह देता, ‘मुझे तैयारी करने दोस्त के घर जाना है और थोड़ी देर बाद आऊंगा.’ फिर आवारगर्दी करते हुए 2-3 घंटे बाद वह घर आता.

स्कूल में फेयरवैल पार्टी थी. 10वीं वालों को 9वीं के बच्चे विदाई पार्टी दे रहे थे. 11वीं के बच्चों द्वारा 12वीं वालों को फेयरवैल पार्टी दी जानी थी, जो अगले हफ्ते थी. इस के बाद ऐग्जाम्स की तैयारी के लिए छुट्टियां हो जानी थीं.अमित घर से बड़ा हीरो बन कर निकला था. आज कुछ भी पहन कर आने की छूट थी. सो, अमित ने लैदर की जैकेट और जींस की पैंट पहनी औैर सुबह जल्दी यह कह कर निकला कि दोस्तों के साथ स्कूल जाऊंगा.  रवि के स्कूल पहुंचने के बाद भी वह स्कूल नहीं पहुंचा. काफी देर देखने के बाद रवि ने अमित के क्लासमेट रोहन से अमित के बारे में पूछा तो पता चला कि वह मुन्ना, राजू औैर अन्य दोस्तों के साथ गया है. वे किसी लड़की को छेड़ने के कारण झगड़ा कर बैठे हैं और हौकीडंडे आदि ले कर गए हैं उन्हें सबक सिखाने. रवि की तो ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे अटक गई. कहां सभी बच्चे पार्टी का लुत्फ उठा रहे हैं औैर उस का भाई अमित गुंडागर्दी में फंसा है. वह क्या करे समझ नहीं पा रहा था. तभी सामने से अमित अपने उन्हीं दोस्तों के साथ आता दिखा औैर आते ही वे सब ऐसा जताने लगे जैसे कोई किला फतेह कर आए हों, ‘‘आए बड़े मेरे दोस्त की गर्लफै्रंड को छेड़ने वाले,’’ अमित गर्व से कह रहा था.

अमित को देख रवि की जान में जान आई. वह अमित को ठीकठाक देख खुश था, लेकिन डांटने के लहजे में बोला, ‘‘प्रिंसिपल की डांट भूल गए लगता है. उस दिन वारनिंग भी मिली थी तुम्हें, मम्मीपापा भी अकसर समझाते हैं, मैं भी कई बार कह चुका हूं. तुम समझते क्यों नहीं? जरा सी ऊंचनीच हो गई तो सारा कैरियर चौपट हो जाएगा…’’ ‘‘अमित अपने भाई को समझा, हमें डराने की जरूरत नहीं. हम सब समझते हैं,’’ मुन्ना बीच में ही रवि की बात काटता हुआ बोला.

‘‘मुन्ना, तुम चुप रहो. मैं अपने भाई से बात कर रहा हूं. मैं इस का बड़ा भाई हूं, इस का भलाबुरा समझता हूं और मेरी जिम्मेदारी है कि मैं इसे गलत रास्ते पर जाने से रोकूं.’’

‘‘रवि,’’ अमित चिल्लाया. उसे यह बात सब दोस्तों के सामने इंसल्ट लगी, ‘‘ये मेरे दोस्त हैं, इन्हें कुछ कहने की जरूरत नहीं. घर चल कर कह लेना जो कहना है. अब जाओ अपनी क्लास में हमारी भी पार्टी शुरू होने वाली है, आया बड़ा भाई बन कर. हर बात में टांग अड़ाता रहता है.’’

रवि अपने पर खीजता हुआ वापस अपनी क्लास में चला गया. पार्टी शुरू हो गई. रवि की क्लास के एक लड़के राजन ने बताया कि आज उस के छोटे भाई अमित की क्लासमेट, जो उस के दोस्त राजू की गर्लफै्रंड भी है, को पास के स्कूल के एक लड़के ने छेड़ दिया था. वह पार्टी के लिए सजधज कर आ रही थी. वे सभी उन्हें सबक सिखाने गए थे. अमित और उस के साथी पार्टी में मशगूल थे, उधर वे उस स्कूल के जिस लड़के की पिटाई कर आए थे, उस ने बदला लेने की नीयत से कई लड़के इकट्ठे कर लिए थे और स्कूल से कुछ दूर एकत्र हो कर अमित और उस के साथियों के निकलने का इंतजार कर रहे थे. फेयरवैल पार्टी खत्म हुई तो सभी जाने को हुए. तभी किसी ने आ कर खबर दी कि स्कूल के बाहर पास वाले स्कूल के बहुत से लड़के लाठियां और हौकियां लिए अमित, मुन्ना व राजू का इंतजार कर रहे हैं. पिछले गेट से चले जाएं वरना खैर नहीं. उन में से एकदो के पास तो चाकू भी हैं.

खबर आग की तरह फैली औैर रवि के पास भी पहुंची. छुट्टी होते ही रवि अमित के पास जाने को हुआ. वह उसे साथ घर ले जाना चाहता था. किसी अनहोनी से आशंकित रवि अमित को ढूंढ़ रहा था, लेकिन अमित अपने दोस्तों के साथ उसी समय निकला था. सामने के स्कूल से कई लड़के हौकियां व डंडे लिए आते दिखे तो अमित के दोस्तों की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई, वे पीछे से कब भाग लिए अमित को पता ही न चला. तभी सामने से आते लड़कों में से एक ने चाकू निकाला और अमित के पेट में घोंपने को हुआ कि तभी रवि वहां भागता हुआ पहुंच गया. उस ने यह सब देख लिया था.     स्थिति भांपते हुए रवि ने अमित को एक ओर धक्का दे दिया, जिस से चाकू अमित के बजाय रवि के पेट में जा घुसा.

रवि के खून बहने लगा. यह देख सभी लड़के नौ दो ग्यारह हो गए, अमित बड़े भाई को इस हाल में देख परेशान हो उठा. तभी वहां कुछ स्कूल के लड़के व स्थानीय निवासी एकत्र हो गए, जिन के सहयोग से रवि को पास के नर्सिंगहोम पहुंचा दिया गया. डाक्टर ने बताया कि रवि का काफी खून बह गया है और वह बेहोश है. खबर मिलते ही प्रिंसिपल व अन्य छात्र भी नर्सिंगहोम पहुंच गए. कुछ छात्र आपस में फुसफुसा रहे थे, ‘‘देखा, बड़ा भाई, बड़ा ही होता है, जिन दोस्तों पर अमित को गुमान था सब भाग गए. मुसीबत में बड़े भाई ने ही अमित की जान बचाई.’’ अमित भी खुद पर खिन्न था. काश, उस ने बड़े भाई की बात मान ली होती. अब तो सब फंसेंगे. उधर चाकू मारने वाले लड़के को भी पुलिस पकड़ लाई थी, उस के कैरियर पर बात आ गई थी. पुलिस को रवि के होश में आने का इंतजार था ताकि उस का बयान ले सके और मामले में अभियुक्त को पकड़ सके.

उसी समय अमित के मम्मीपापा भी आ गए. सभी परेशान थे. अमित मां के गले लग उन के आंचल में अपना मुंह छिपाता दिख रहा था. पश्चात्ताप के आंसू रुक नहीं रहे थे. तभी डाक्टर ने आ कर बताया, ‘‘इंस्पैक्टर साहब, रवि को होश आ गया है. आप बयान ले सकते हैं.’’ इंस्पैक्टर अंदर गए औैर थोड़ी देर बाद बाहर आ गए. आते ही उन्होंने अपने सिपाही को चाकू मारने वाले लड़के को छोड़ने का आदेश दिया और बताया, ‘‘रवि के अनुसार भागते समय गिर जाने से सड़क पर पड़ी कोई लोहे की पत्ती उसे लग गई थी. इस में किसी का कोई कुसूर नहीं, सो किसी पर कोई केस नहीं बनता.’’

रवि के बयान पर सब हैरान थे. वह चाहता तो अपने भाई पर हमला करने वाले को पकड़वा सकता था, लेकिन उस के इस बयान ने सब को बचा लिया था. अमित के आंसू बह निकले, वाकई रवि बड़ा भाई है, उस ने बड़ा भाई होने की जिम्मेदारी बखूबी निभाई है. तभी डाक्टर ने बताया, ‘‘आप रवि से मिल सकते हैं, लेकिन रवि का काफी खून बह गया है, उसे खून चढ़ाना पड़ेगा. डोनर की व्यवस्था करें.’’

‘‘मैं दूंगा अपने बड़े भाई को खून…’’ पीछे से आवाज आई. अमित ने देखा यह वही लड़का था जिस ने चाकू से अमित पर वार किया था, लेकिन रवि को लग गया था.

‘‘हां अमित, अगर तुम्हारा बड़ा भाई चाहता तो हम सब को फंसा सकता था. इस से हम पर केस चलता, हम 10वीं के पेपर भी नहीं दे पाते, सजा भी भुगतनी पड़ती. बुलिंग करते समय इस के अंजाम के बारे में हम ने नहीं सोचा था. रवि ने हमें न केवल सीख दी है बल्कि बड़ा भाई होने की जिम्मेदारी भी निभाई है. मैं संकल्प लेता हूं आज से बुलिंग बंद,’’ वह बोला. तभी मुन्ना और राजू आगे आए औैर बोले, ‘‘तुम ठीक कहते हो दोस्त. रवि ने जान पर खेल कर हमें यह सबक सिखाया है कि हम गलत राह पर चल रहे हैं और अपने ऐसे बयान से सब को बचा कर बता दिया है कि वह अमित का ही नहीं, हम सब का बड़ा भाई है. हम सब उसे खून देंगे और जल्द ठीक कर लेंगे, अब जिम्मेदारी निभाने की बारी हमारी हैं,’’ कहते हुए मुन्ना की भी आंखे भर आईं.

अमित अपने मम्मीपापा के साथ अंदर गया और रवि से लिपट कर रो पड़ा, ‘‘मुझे माफ कर दो भैया. मैं अच्छा बन कर दिखाऊंगा,’’ साथ ही उस ने बड़े भाई के पांव छू कर संकल्प लिया कि मम्मीपापा का सपना पूरा करेगा और अच्छी पढ़ाई कर के इंजीनियर बन कर दिखाएगा.

Raksha Bandhan: कितने अजनबी- क्या भाईबहन के मतभेद खत्म हो पाए?

हम 4 एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग एकदूसरे से इतने अजनबी कि अपनेअपने खोल में सिमटे हुए हैं.

मैं रश्मि हूं. इस घर की सब से बड़ी बेटी. मैं ने अपने जीवन के 35 वसंत देख डाले हैं. मेरे जीवन में सब कुछ सामान्य गति से ही चलता रहता यदि आज उन्होंने जीवन के इस ठहरे पानी में कंकड़ न डाला होता.

मैं सोचती हूं, क्या मिलता है लोगों को इस तरह दूसरे को परेशान करने में. मैं ने तो आज तक कभी यह जानने की जरूरत नहीं समझी कि पड़ोसी क्या कर रहे हैं. पड़ोसी तो दूर अपनी सगी भाभी क्या कर रही हैं, यह तक जानने की कोशिश नहीं की लेकिन आज मेरे मिनटमिनट का हिसाब रखा जा रहा है. मेरा कुसूर क्या है? केवल यही न कि मैं अविवाहिता हूं. क्या यह इतना बड़ा गुनाह है कि मेरे बारे में बातचीत करते हुए सब निर्मम हो जाते हैं.

अभी कल की ही बात है. मकान मालकिन की बहू, जिसे मैं सगी भाभी जैसा सम्मान देती हूं, मेरी नईनवेली भाभी से कह रही थी, ‘‘देखो जलज, जरा अपनी बड़ी ननद से सावधान रहना. जब तुम और प्रतुल कमरे में होते हो तो उस के कान उधर ही लगे रहते हैं. मुझे तो लगता है कि वह ताकझांक भी करती होगी. अरी बहन, बड़ी उम्र तक शादी नहीं होगी तो क्या होगा, मन तो करता ही होगा…’’  कह कर वह जोर से हंस दी.

मैं नहीं सुन पाई कि मेरी इकलौती भाभी, जिस ने अभी मुझे जानासमझा ही कितना है, ने क्या कहा. पर मेरे लिए तो यह डूब मरने की बात है. मैं क्या इतनी फूहड़ हूं कि अपने भाई और भाभी के कमरे में झांकती फिरूंगी, उन की बातें सुनूंगी. मुझे मर जाना चाहिए. धरती पर बोझ बन कर रहने से क्या फायदा?

मैं अवनि हूं. इस घर की सब से छोटी बेटी. मैं बिना बात सब से उलझती रहती हूं. कुछ भी सोचेसमझे बिना जो मुंह में आता है बोल देती हूं और फिर बाद में पछताती भी हूं.

मेरी हर बात से यही जाहिर होता है कि मैं इस व्यवस्था का विरोध कर रही हूं जबकि खुद ही इस व्यवस्था का एक हिस्सा हूं.

मैं 32 साल की हो चुकी हूं. मेरे साथ की लड़कियां 1-2 बच्चों की मां  बन चुकी हैं. मैं उन से मिलतीजुलती हूं पर अब उन के साथ मुझे बातों में वह मजा नहीं आता जो उन की शादी से पहले आता था.

अब उन के पास सासपुराण, पति का यशगान और बच्चों की किचकिच के अलावा कोई दूसरा विषय होता ही नहीं है. मैं चिढ़ जाती हूं. क्या तुम लोग  इतना पढ़लिख कर इसी दिमागी स्तर की रह गई हो. वे सब हंसती हुई कहती हैं, ‘‘बन्नो, जब इन चक्करों में पड़ोगी तो जानोगी कि कितनी पूर्णता लगती है इस में.’’

‘क्या सच?’ मैं सोचती हूं एक स्कूल की मास्टरी करते हुए मुझे अपना जेबखर्च मिल जाता है. खूब सजधज कर जाती हूं. अच्छी किस्म की लिपस्टिक लगाती हूं. बढि़या सिल्क की साडि़यां पहनती हूं. पैरों में ऊंची हील की सैंडिल होती हैं जिन की खटखट की आवाज पर कितनी जोड़ी आंखें देखने लगती हैं. पर मैं किसी को कंधे पर हाथ नहीं रखने देती.

क्या मुझ में पूर्णता नहीं है? मैं एक परफैक्ट महिला हूं और मैं ऐसा प्रदर्शित भी करती हूं, लेकिन जब कोई हंसताखिलखिलाता जोड़ा 2 छोटेछोटे भागते पैरों के पीछे पार्क में दौड़ता दिख जाता है तो दिल में टीस सी उठती है. काश, मैं भी…

मैं जलज हूं. इस घर के इकलौते बेटे की पत्नी. अभी मेरी शादी को मात्र 6 महीने हुए हैं. मेरे पति प्रतुल बहुत अच्छे स्वभाव के हैं. एकांत में मेरे साथ ठीक से रहते हैं. हंसतेमुसकराते हैं, प्यार भी जताते हैं और मेरी हर छोटीबड़ी इच्छा का ध्यान रखते हैं लेकिन अपनी दोनों बहनों के सामने उन की चुप्पी लग जाती है.

सारे दिन मुझे बड़ी दीदी रश्मि की सूक्ष्मदर्शी आंखों के सामने घूमना पड़ता है. मेरा ओढ़नापहनना सबकुछ उन की इच्छा के अनुसार होता है. अभी मेरी शादी को 6 महीने ही हुए हैं पर वह मुझे छांटछांट कर हलके रंग वाले कपड़े ही पहनाती हैं. जरा सी बड़ी बिंदी लगा लो तो कहेंगी, ‘‘क्या गंवारों की तरह बड़ी बिंदी और भरभर हाथ चूडि़यां पहनती हो. जरा सोबर बनो सोबर. अवनि को देखो, कितनी स्मार्ट लगती है.’’

मैं कहना चाहती हूं कि दीदी, अवनि दीदी अविवाहित हैं और मैं सुहागिन, लेकिन कह नहीं सकती क्योंकि शादी से पहले प्रतुल ने मुझ से यह वादा ले लिया था कि दोनों बड़ी बहनों को कभी कोई जवाब न देना.

मैं अपने मन की बात किस से कहूं. घुटती रहती हूं. कल रश्मि दीदी कह रही थीं, ‘‘भाभी, भतीजा होगा तो मुझे क्या खिलाओगी.’’

मैं ने भी हंसते हुए कहा था, ‘‘दीदी, आप जो खाएंगी वही खिलाऊंगी.’’

चेहरे पर थोड़ी मुसकराहट और ढेर सारी कड़वाहट भर कर अवनि दीदी बीच में ही बोल पड़ीं, ‘‘भाभी, हमें थोड़ा सल्फास खिला देना.’’

मैं अवाक् रह गई. क्या मैं इन्हें सल्फास खिलाने आई हूं.

अगर भाभी के बारे में सोच ऐसी ही थी तो फिर अपने भाई की शादी क्यों की?

मैं 3 भाइयों की इकलौती बहन हूं. मातापिता मेरे भी नहीं हैं इसलिए इन बहनों का दर्द समझती हूं. ऐसा बहुतकुछ मेरे जीवन में भी गुजरा है. जब मैं इंटर पास कर बी.ए. में आई तो महल्लापड़ोस वाली औरतें मेरी भाभियों को सलाह देने लगीं, ‘‘अरे, बोझ उतारो अपने सिर से. बहुत दिन रख लिया. अगर कुछ ऊंचनीच हो गई तो रोती फिरोगी. भाई लाड़ करते हैं इसलिए नकचढ़ी हो गई है.’’

सच में मैं नकचढ़ी थी लेकिन बड़ी भाभी मेरी मां बन गई थीं. उन्होंने कहा था, ‘‘आप लोग अपनाअपना बोझ संभालो. मेरे घर की चिंता मत करो. जब तक पढ़लिख कर जलज किसी काबिल नहीं हो जाती और कोई सुपात्र नहीं मिल जाता, हम शादी नहीं करेंगे.’’

और सचमुच भाभी ने मुझे एम.ए., बी.एड. करवाया और अच्छे रिश्ते की खोज में लग गईं. यद्यपि प्रतुल और मुझ में 10 साल का अंतर है लेकिन इस रिश्ते की अच्छाई भाभी ने यह समझी कि अपनी जलज, बिन मांबाप की है. भाईभाभियों के बीच रह कर पलीबढ़ी है. बिना मांबाप की बच्चियों का दर्द खूब समझेगी और प्रतुल को सहयोग करेगी.

मैं नहीं जानती थी कि मुझे ऐसा माहौल मिलेगा. इतनी कुंठा से ग्रस्त ननदें होंगी. अरे, अगर शादी नहीं हुई या नहीं हो रही है तो क्या करने को कुछ नहीं है. बहुतकुछ है.

एक बार मैं ने यही बात अवनि दीदी से धीरे से कही थी तो किचन के दरवाजे पर हाथ अड़ा कर लगभग मेरा रास्ता रोकते हुए वह बड़ी क्रूरता से कह गई थीं, ‘आज आप की शादी हो गई है इसलिए कह रही हैं. अगर न होती और भाईभाभी के साथ जीवन भर रहना पड़ता तो पता चलता.’ बताइए, मैं 6 महीने पुरानी विवाहिता आज विवाहित होने का ताना सुन रही हूं.

मैं प्रतुल हूं. इस घर का इकलौता बेटा और बुजुर्ग भी. मेरी उम्र 40 वर्ष है. मेरे पिता की मृत्यु को अभी 5 वर्ष हुए हैं. इन 5 सालों में मैं बहुत परिपक्व हो गया हूं. जब मेरे पिता ने अंतिम सांस ली उस समय मेरी दोनों बहनें क्रमश: 30 और 27 वर्ष की थीं. मेरी उम्र 35 वर्ष की थी. उन्होंने हम में से किसी के बारे में कुछ नहीं सोचा. पिताजी की अच्छीखासी नौकरी थी, परंतु जितना कमाया उतना गंवाया. केवल बढि़या खाया और पहना. घर में क्या है यह नहीं जाना. अम्मां उन से 5 वर्ष पहले मरी थीं. यानी 10 साल पहले भी हम भाईबहन इतने छोटे नहीं थे कि अपनाअपना घर नहीं बसा सकते थे. मेरे दोस्तों के बच्चे लंबाई में उन के बराबर हो रहे हैं और यहां अभी बाप बनने का नंबर भी नहीं आया.

नौकरी पाने के लिए भी मैं ने खूब एडि़यां घिसीं. 8 सालों तक दैनिक वेतनभोगी के रूप में रहा. दोस्त और दुश्मन की पहचान उसी दौर में हुई थी. आज भी उस दौर के बारे में सोचता हूं तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं.

अम्मां सोतेउठते एक ही मंत्र फूंका करती थीं कि बेटा, इन बहनों की नइया तुझे ही पार लगानी है. लेकिन कैसे? वह भी नहीं जानती थीं.

मैं ने जब से होश संभाला, अम्मां और पिताजी को झगड़ते ही पाया. हर बहस का अंत अम्मां की भूख हड़ताल और पिताजी की दहाड़ पर समाप्त होता था. रोतीकलपती अम्मां थकहार कर खाने बैठ जातीं क्योंकि पिताजी पलट कर उन्हें पूछते ही नहीं थे. अम्मां को कोई गंभीर बीमारी न थी. एक दिन के बुखार में ही वह चल बसीं.

रिटायरमेंट के बाद पिताजी को गांव के पुश्तैनी मकान की याद आई. सबकुछ छोड़छाड़ कर वह गांव में जा बैठे तो झक मार कर हम सब को भी जाना पड़ा. पिछले 15 सालों में गांव और शहर के बीच तालमेल बैठातेबैठाते मैं न गांव का गबरू जवान रहा न शहर का छैलछबीला.

बहनों को पढ़ाया, खुद भी पढ़ा और नौकरी की तलाश में खूब भटका. उधर गांव में पिताजी की झकझक अब रश्मि और अवनि को झेलनी पड़ती थी. वे ऊटपटांग जवाब देतीं तो पिताजी उन्हें मारने के लिए डंडा उठा लेते. अजीब मनोस्थिति होती जब मैं छुट्टी में घर जाता था. घर जाना जरूरी भी था क्योंकि घर तो छोड़ नहीं सकता था.

पिताजी के बाद मैं दोनों बहनों को शहर ले आया. गांव का मकान, जिस का हिस्सा मात्र 2 कमरों का था, मैं अपने चचेरे भाई को सौंप आया. उस का परिवार बढ़ रहा था और वहां भी हमारे घर की तरह ‘तानाशाह’ थे.

शहर आ कर अवनि को मैं ने टाइप स्कूल में दाखिला दिलवा दिया लेकिन उस का मन उस में नहीं लगा. वह गांव के स्कूल में पढ़ाती थी इसलिए यहां भी वह पढ़ाना ही चाहती थी. मेरे साथ काम करने वाले पाठकजी की बेटी अपना स्कूल चलाती है, वहीं अवनि पढ़ाने लगी है. जितना उसे मिलता है, पिताजी की तरह अपने ऊपर खर्च करती है. बातबात में ताने देती है. बोलती है तो जहर उगलती है लेकिन मैं क्या करूं? पिताजी के बाद जो खजाना मुझे मिला वह केवल उन की 1 महीने की पेंशन थी. जिस शहर में रहने का ताना ये दोनों मुझ को देती थीं वही शहर हमारी सारी कमाई निगल रहा है.

40 बरस की आयु में आखिर परिस्थितियों से ऊब कर मैं ने शादी कर ली. जलज अच्छी लड़की है. शांत स्वभाव और धैर्य वाली. उस की बड़ीबड़ी आंखों में दुख के बादल कुछ क्षण मंडराते तो जरूर हैं लेकिन फिर छंट भी बहुत जल्दी जाते हैं. जलज ने आज तक मेरी बहनों के बारे में मुझ से किसी प्रकार की कोई शिकायत नहीं की. क्या करूं, मेरे प्रारब्ध से जुड़ कर उसे भी सबकुछ सहन करना पड़ रहा है.

माना कि बहनें छोटी हैं लेकिन कहने वाले कब चूकते हैं, ‘‘खुद की शादी कर ली और बहनों को भूल गया. बहनें भी तड़ से कहती हैं, ‘‘तुम अपनी जिंदगी देखो, हम को कब तक संभालोगे या तुम्हारे पास इतना पैसा कहां है कि हमें बैठा कर खिला सको.’’

पिताजी ने अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई. खुद खायापिया और मौज उड़ाई. इस में मेरा कुसूर क्या है? मैं कब कहता हूं कि बहनों का ब्याह नहीं करूंगा. अपनी जिम्मेदारी से मुंह नहीं मोड़ता पर मैं सब से कहता हूं, समय तो आने दो, धैर्य तो रखो.

एक तो कहीं बात नहीं बनती और कहीं थोड़ीबहुत गुंजाइश होती भी है तो ये दोनों मना करने लगती हैं. यह लड़का अच्छा नहीं है. गांव में शादी नहीं करेंगे. वास्तव में दोनों में निरंकुशता आ गई है. मुझे कुछ समझती ही नहीं. हैसियत मेरी बुजुर्ग वाली है लेकिन ये दोनों मुझे बच्चा समझ कर डपटती रहती हैं. मेरे साथ जलज भी डांट खाती है.

अम्मां पिताजी के उलझाव ने इन दोनों के स्वभाव में अजीब सा कसैलापन ला दिया है. पापा से उलझ कर अम्मां मुंह फुला कर लेट जातीं और यह तक न देखतीं कि रश्मि और अवनि क्या कर रही हैं, कैसे बोल रही हैं.

मैं अपनी दोनों बहनों और पत्नी के बीच सामंजस्य बैठाने की कोशिश में अपने ही खोल में सिमटता जा रहा हूं.

न जाने कब समाप्त होगा हमारा अजनबीपन.

Raksha Bandhan : टूटती और जुड़ती डोर- रिश्तों का बंधन

रक्षाबंधन का दिन था, इसलिए आज सांवरी को अपने छोटे भाई राहुल की बहुत याद आ रही थी. उस का चाय का ठेला लगाने का बिलकुल भी मन नहीं था, लेकिन फिर भी वह अपनी यादों को परे रख कर बेमन से अपना ठेला सजा रही थी. चूल्हा, गैस का छोटा सिलैंडर, दूध का भगौना, चायपत्ती व शक्कर का डब्बा, चाय के साथ खाने के लिए समोसा वगैरह… और भी न जाने क्याक्या.

सुबह के 5 बज चुके थे, इसीलिए सांवरी जल्दीजल्दी अपना ठेला तैयार कर रही थी, क्योंकि अगर वह अपना ठेला ले कर जल्दी नहीं पहुंची तो कोई दूसरा उस की जगह पर अपना ठेला खड़ा कर लेगा और फिर उसे ठेला ले कर इधरउधर भटकना पड़ेगा.

दूसरी बड़ी वजह यह भी थी कि सुबहसुबह सांवरी की चाय की बिक्री अच्छी हो जाती थी, क्योंकि सुबहसुबह चौराहे पर काम पर जाने वाले मजदूरों की अच्छीखासी भीड़ रहती थी और

वहीं से लोगों को काम करवाने के लिए मजदूर भी मिल जाते थे. उन में बहुत से ऐसे मजदूर भी थे, जो सांवरी की हर रोज चाय जरूर पीते थे, जिस से उस की कुछ आमदनी भी हो जाती थी.

पहले सांवरी को चाय का ठेला लगाने में बहुत शर्म महसूस होती थी, लेकिन पेट की आग, मां की बीमारी और मजबूरी की जंग के बीच उस की शर्म हमेशा हार जाती थी.

ठेला तैयार होते ही सांवरी मां के पास पहुंची. वे अभी सो रही थीं, इसीलिए उस ने उन्हें जगाना उचित नहीं समझा और वह चुपचाप कमरे से बाहर आ गई.

आज कितने दिनों के बाद मां को गहरी नींद में सोते देख कर सांवरी को बहुत सुकून महसूस हो रहा था. वे बेचारी सो भी कहां पाती हैं, बस दर्द में कराहती रहती हैं.

एक वक्त था, जब सांवरी भी दूसरी लड़कियों की तरह ही अपने बाबूजी, मां और अपने छोटे भाई राहुल के साथ शहर से सटे छोटे से गांव में खुशीखुशी रहती थी. बाबूजी के पास थोड़ीबहुत खेती थी. उसी में खेती कर के बाबूजी घरखर्च के अलावा सांवरी और राहुल की पढ़ाई का खर्च उठाते थे.

बाबूजी हमेशा सांवरी और राहुल को पढ़ालिखा कर बड़ा साहब बनाने की बात कहा करते थे. सांवरी और राहुल भी अपने बाबूजी के इस सपने को पूरा करने के लिए खूब मन लगा कर पढ़ते थे.

सांवरी के घर में कुछ न होते हुए भी सबकुछ था, लेकिन एक दिन घर की सारी खुशियां मातम और बेबसी में बदल गईं. उस दिन भी बाबूजी खेत से काम कर के आए थे और नल पर जा कर हाथमुंह धो रहे थे कि अचानक उन के सीने में तेज दर्द उठा और वे वहीं गिर गए. चीख सुन कर मां उन के पास पहुंच गईं, पर तब तक बाबूजी उन्हें छोड़ कर बहुत दूर चले गए थे.

बाबूजी के जाने के बाद धीरेधीरे सबकुछ बदल गया. घर में मां के पास बचेखुचे रुपए भी कुछ दिनों में ही खर्च हो गए. भूखे मरने की नौबत आ गई.

दिन बदलते ही नातेरिश्तेदारों ने मुंह फेर लिया. खराब हालत देख कर सांवरी की मां ने खेती की जमीन भी बेच दी. राहुल और उस की पढ़ाई भी छूट गई थी, लेकिन जमीन बेचने के बाद थोड़ेबहुत रुपए हाथ में आते ही सांवरी ने मां से जिद कर के राहुल की पढ़ाई दोबारा शुरू करवा दी और वह भी कुछ कमाने के इरादे से बाजार में चाय का ठेला लगाने लगी, जिस से घर का थोड़ाबहुत खर्च निकल आता था.

तभी सांवरी की बचीखुची खुशियों पर भी पानी फिर गया. उस की मां को लकवा मार गया और वे बिस्तर पर पहुंच गईं. अब राहुल की पढ़ाई और मां के इलाज की सारी जिम्मेदारी सांवरी पर आ गई थी.

फिर समय अपनी रफ्तार पकड़ता चला गया. राहुल आगे की पढ़ाई करने के लिए शहर चला गया. वह वहीं रह कर पढ़ाई कर रहा था.

सांवरी राहुल को अकसर जमा किए रुपए भेज दिया करती थी. उधर वह भी अब जवानी में कदम रख चुकी थी. उस के जिस्म में भी बदलाव आने शुरू हो गए थे. उस के सीने के उभार, उस का गदराया बदन और नाजुक पतली कमर देख कर जवान तो जवान बूढ़ों का भी का दिल मचल जाता था. अब कुछ लोग राह चलते उस पर छींटाकशी भी करने लगे थे, लेकिन उसे ऐसे लोगों से कोई मतलब नहीं था.

इन सब लोगों के बीच सुबोध भी था, जो सांवरी को अकसर आतेजाते देखा करता था. यही नहीं, वह कभीकभी उस के ठेले पर चाय पीने भी आ जाता था, जिसे देख कर वह डर जाती थी.

उसे पता चला था कि वह गुंडा है. सड़कों पर मारपीट करते और दुकानदारों से पैसा वसूली करते वह खुद उसे देखा करती थी.

हालांकि सुबोध ने कभी सांवरी के साथ छेड़छाड़ नहीं की थी और न ही वह उस से कभी गलत तरीके से बोला था, लेकिन फिर भी वह एक तरह के डर में घिरी रहती थी कि कब सुबोध उस की इज्जत से खेल डाले और उस की जवानी को तारतार कर दे.

अचानक पड़ोस में मुरगे की बांग सुन कर सांवरी यादों के भंवर से धरातल पर आ गई. तभी उसे अपने ठेले का ध्यान आया और वह बाहर आ गई. बाहर आते ही उस ने अपना ठेला संभाला और उसे ढकेलते हुए चलने लगी.

सांवरी जब चौराहे पर पहुंची, तो अभी वहां इक्कादुक्का लोग ही उसे दिखाई दिए. उस ने ठेले को अपनी तय जगह पर खड़ा कर दिया और स्टूल को ठेले से उतार कर वहीं जमीन पर रख कर उस पर बैठ गई.

‘‘ऐ सांवरी, जरा एक चाय बना दे,’’ तभी सेवकराम सांवरी के ठेले पर आ कर बोला.

सांवरी ने एक नजर सेवकराम को देखा. उस के कपड़ों को देख कर लगा कि वह आज मजदूरी करने नहीं जा रहा था.

सांवरी ने चूल्हा जला कर चाय का भगौना उस पर रख दिया और उस में दूध वगैरह डाल कर चाय बनाने लगी.

‘‘क्या बात है सेवकराम, आज कहां जाने की तैयारी है?’’ सांवरी ने सेवकराम से पूछा.

‘‘कहीं नहीं. दीदी के यहां जा रहा हूं. आज रक्षाबंधन है. इसी बहाने दीदी से भी मिल लूंगा और राखी भी बंधवा लूंगा. वैसे भी पिछले 2 साल से मैं अपनी दीदी से मिल भी नहीं पाया हूं,’’ सेवकराम कुछ खीजते हुए बोला.

यह सुन कर सांवरी कुछ न बोली. चाय बन चुकी थी. उस ने चाय गिलास में डाल कर सेवकराम को दे दी और खुद स्टूल पर बैठ गई.

सेवकराम ने सांवरी को राहुल की याद दिला दी थी और उस का मन राहुल से मिलने को होने लगा था. उस ने गुल्लक से राखी निकाल कर अपने हाथ में पकड़ ली. उसे मालूम था कि आज फिर उस की खरीदी हुई राखी राहुल की सूनी कलाई की शोभा नहीं बढ़ा पाएगी, क्योंकि राहुल शायद उसे कब का भूल चुका था. आज भी राहुल के कड़वे शब्द उस के कानों में गूंज रहे थे.

अचानक एक बार फिर सांवरी यादों के भंवर में उलझ गई. कितनी खुश थी वह उस दिन, जब उसे पता लगा था कि राहुल पूरे 5 साल के बाद घर वापस आ रहा है. राहुल ने ही उसे बताया था कि उस की एक बड़ी कंपनी में नौकरी लग गई है, जहां वह मैनेजर है.

यह सुन कर सांवरी को लगा था  कि आज राहुल ने बाबूजी और उस के सपने को सच कर दिया और वह जिंदगी में कामयाबी की पहली सीढ़ी चढ़ गया है.

सांवरी को अब लग रहा था कि उस का छोटा भाई आते ही उस के सारे दुख दूर कर देगा और उस से कहेगा ‘दीदी, अब यह चाय बेचने का काम तुम नहीं करोगी. अब तुम्हारा और मां का खयाल मैं रखूंगा और तुम आराम करोगी.’

राहुल के घर आने की खबर मिलने की खुशी में सांवरी ने अपना चाय का ठेला भी नहीं लगाया. उस के अगले दिन रक्षाबंधन का त्योहार था, इसीलिए सांवरी ने बाजार से एक अच्छी राखी भी खरीद ली थी, जो वह अपने प्यारे भैया की कलाई पर बांधेगी.

दोपहर के तकरीबन एक बजे राहुल घर आ गया. राहुल को देख कर अनायास ही सांवरी उस से लिपट कर रो पड़ी और उस की सूख चुकी आंखों से धारा बह निकली. किसी बड़े साहब से कम नहीं लग रहा था उस का भाई.

आखिर मन हलका होने पर उस ने राहुल से हालचाल पूछा और फिर मां के पास उसे बैठा कर वह चायपानी का इंतजाम करने लगी.

उधर राहुल मां से बातें करने लगा. राहुल के आने पर मां भी अपनी बीमारी को भूल कर उस से बातें करने की कोशिश कर रही थीं. आज उन का चेहरा भी खुशी से दमक रहा था.

लेकिन आज सांवरी को राहुल कुछ बदलाबदला सा लग रहा था. वह काफी देर से राहुल को नोटिस कर रही थी कि वह उस से कटाकटा सा है. सफर की थकान होगी, ऐसा सोच कर उस ने राहुल से कुछ नहीं कहा था.

राहुल फ्रैश होने के बाद कमरे में आराम करने के लिए चला गया. सांवरी ने शाम को राहुल का मनपसंद खाना बनाया, लेकिन उस ने पेट भरा होने का बहाना बना कर उसे छुआ तक नहीं.

राहुल के खाना न खाने पर सांवरी का मन भी कुछ खाने का नहीं हुआ और उस ने खाने को यों ही वापस ढक कर रख दिया था. हां, उस ने मां को थोड़ाबहुत जरूर खिला दिया, जिस से वे दवा खा सकें.

सांवरी राहुल से ढेर सारी बातें करना चाहती थी, लेकिन राहुल उस से बात ही नहीं कर रहा था. वह समझ नहीं पा रही थी कि आखिर राहुल को क्या हो गया है. लेकिन सुबह होते ही राहुल उस

से कुछ न बोला और अपना बैग पैक करने लगा.

यह देख कर सांवरी चौंक गई. उस ने राहुल से बैग पैक करने की वजह पूछी, तो वह एकदम गुस्से से चीख पड़ा, ‘‘मुझे नहीं रहना तुम्हारे घर में, जहां कोई वेश्या रहती हो. मुझे शर्म आती है तुम्हें अपनी बहन कहने पर. मुझे लगता था कि तुम यहां सही से रहती होगी, लेकिन तुम तो अपने जिस्म को बेचती घूमती हो,’’ राहुल ने चीखते हुए उस से कहा.

‘‘राहुल, यह तुम क्या बक रहे हो…’’ राहुल की बात सुन कर सांवरी का खून खौल उठा था और उस ने एक जोरदार थप्पड़ राहुल को मार दिया, ‘‘मैं यहां कोई ऐसा गलत काम नहीं करती हूं कि तुम्हारा सिर शर्म से झुक जाए.

‘‘हां, मैं मेहनत करती हूं और चाय बेच कर मां का, अपना और तुम्हारा पेट भरती हूं. अपना जिस्म नहीं बेचती मैं…

‘‘और सुनो, मैं तुम्हारी पढ़ाई का खर्च भी चाय बेच कर ही उठाती थी. आज तुम जोकुछ भी हो, इसी की बदौलत हो… समझे तुम,’’ सांवरी गुस्से से राहुल को बोलती जा रही थी, लेकिन यह सब बोलते हुए उस की आंखों से आंसुओं की झड़ी बहने लगी थी.

सांवरी को सपने में भी उम्मीद नहीं थी कि उस का छोटा भाई राहुल उस से इस तरह बात करेगा और उस पर इतने भद्दे इलजाम लगाएगा.

सांवरी की इज्जत पर अभी तक किसी तरह की आंच नहीं आई थी, लेकिन आज उस के अपने छोटे भाई

ने ही उस की इज्जत को तारतार कर दिया था.

उधर राहुल सांवरी का थप्पड़ खाने के बाद एक पल भी वहां नहीं रुका और अपना बैग उठा कर घर से बाहर चला गया. सांवरी ने भी राहुल को रोकने की कोशिश नहीं की.

उस के बाद कितना वक्त बीत गया था, लेकिन राहुल ने सांवरी और मां की कोई खोजखबर नहीं ली थी. राहुल ने भाईबहन के बीच की डोर को भी तोड़ दिया था, लेकिन रक्षाबंधन का त्योहार आते ही सांवरी को राहुल की याद कुछ ज्यादा ही आने लगती थी, लेकिन राहुल के कड़वे शब्द उस के सीने में आज भी तीर की तरह चुभते थे.

‘‘सांवरी…’’ तभी किसी की आवाज सुन कर सांवरी चौंक गई. उस ने देखा कि सामने सुबोध खड़ा हुआ था. सांवरी ने आंखों से निकल कर गालों पर लुढ़क आए आंसुओं को पोंछ लिया.

सांवरी सुबोध को देख कर समझ गई कि वह चाय पीने के लिए ही उस के ठेले पर आया हुआ है. उस ने उस से बिना पूछे ही चाय बनने के लिए चूल्हे पर चढ़ा दी.

‘‘सांवरी, मुझे आज चाय नहीं पीनी. मैं किसी और काम से आया हूं तेरे पास,’’ सुबोध सांवरी से बोला.

‘‘फिर क्या काम है मुझ से?’’ सांवरी ने हैरान हो कर पूछा.

‘‘क्या तुम मुझे अपना भाई समझ कर मुझ को राखी बांध दोगी? मेरी कोई बहन नहीं है. मैं जब भी तुम्हें देखता हूं, तो मुझे लगता है कि जैसे मेरी छोटी बहन मेरे सामने आ गई हो,’’ सुबोध ने अपना हाथ आगे बढ़ाते हुए सांवरी से कहा.

सुबोध की बात सुन कर सांवरी उसे देखती ही रह गई. उसे सुबोध की बात पर यकीन नहीं हो रहा था कि जिसे उस ने इतना गलत समझा था, वह उसे किसी तरह की गलत नजरों से नहीं, बल्कि छोटी बहन के रूप में देखता था. एक भाई बहन के बीच की डोर तोड़ कर उस से दूर चला गया था और दूसरा उस डोर को जोड़ने की बात कर रहा था.

सुबोध की बात सुन कर सांवरी की आंखों से आंसुओं की धारा बहने लगी थी और उस ने बिना देर किए राखी सुबोध की कलाई पर बांध दी. राखी के कलाई पर बंधते ही सुबोध की आंखों के कोर भी गीले होने लगे थे.

सांवरी सोच रही थी कि जहां कभी रिश्ते की एक डोर हमेशा के लिए टूट गई थी, तो वहीं आज दूसरी डोर जुड़ गई थी.

 

बहनों से छेड़छाड़, भाइयों की मुसीबत

साधारण परिवार से ताल्लुक रखने वाला राजा नामक नौजवान दिल्ली से लगे नोएडा के एक कार गैराज में नौकरी करता था. उसे घायल हालत में अस्पताल में भरती कराया गया. 3 दिन जिंदगी और मौत से जूझने के बाद राजा की सांसों की डोर हमेशा के लिए टूट गई. वह मारपीट में बुरी तरह से घायल हुआ था. उस के सिर व बदन के दूसरे हिस्सों पर चोटों के निशान थे. उस की मौत ने न सिर्फ उस के परिवार, बल्कि उस के जानकारों को भी हिला कर रख दिया. राजा की गलती महज इतनी थी कि वह अपनी बहन के साथ आएदिन होने वाली छेड़छाड़ का विरोध करता था. किसी ने सोचा भी नहीं था कि विरोध करने पर मनचला अपने साथियों के साथ उसे इस तरह निशाना बना लेगा.

एक भाई के लिए यह जरूरी भी हो जाता है कि जब कोई सिरफिरा शोहदा उस की बहन को छेड़े, तो वह विरोध करे, लेकिन मनचलों के हौसले बुलंद होते हैं. उन्हें लगता है कि ऐसे विरोध से उन की तौहीन हो गई है और वे सीनाजोरी कर के मरनेमारने पर उतारू हो जाते हैं.

दरअसल, राजा की बहन को एक शोहदा वसीम अकसर ही परेशान किया करता था. मौका लगने पर छेड़छाड़ और फब्तियां कसता था. राजा ने इस बात का कई बार विरोध किया, लेकिन उस की हरकतें बंद नहीं हुईं.

एक दिन वसीम ने अपने साथियों के साथ मिल कर राजा की जम कर पिटाई कर दी. गंभीर चोटों के बाद उस की मौत हो गई.

पुलिस ने आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया. कानून ने अपना काम किया, लेकिन बात सिर्फ इतने पर खत्म नहीं हो जाती. सवाल है कि किसी सभ्य समाज में क्या एक भाई को यह सब सहना चाहिए?

समाज में इस तरह की वारदातों में इजाफा हो रहा है. हर छोटेबड़े शहर में शोहदे हैं. हर मिनट कोई लड़की आहत हो कर खून का घूंट पी रही होती है और शोहदे कौलर तान कर निकल जाते हैं. विरोध करने पर सिरफुटौव्वल होती है.

बहन के साथ होने वाली छेड़छाड़ के विरोध की कीमत चुकाने वाला राजा कोई एक अकेला नौजवान नहीं था. उत्तर प्रदेश के बरेली में तो बहन से छेड़छाड़ करने पर दबंगों ने एक भाई की सरेआम हत्या कर दी.

दरअसल, संजय नगर इलाके में एक लड़की सावित्री घर के बाहर खड़े हो कर अपने भाई नन्हे से बात कर रही थी. इसी बीच मोटरसाइकिल सवार एक लड़के ने उसे हलकी टक्कर मार दी.

सावित्री ने विरोध किया, तो उस ने दबंगई दिखा कर छेड़छाड़ कर दी. गुस्से में आए भाई ने उस लड़के को पीट दिया.

वह लड़का तब तो चला गया, लेकिन कुछ देर बाद वह अपने दोस्तों के साथ आया और भाई से मारपीट कर दी. उन्होंने उस के सिर पर फरसे से वार किए. तेज वार से नन्हे लहूलुहान हो कर गिर गया और उस की मौत हो गई.

मामला किसी छोटी जाति की लड़की का हो, तो दबंग उस पर अपना हक समझते हैं कि वह बिना नानुकर किए उन की बात मान ले.

सुलतानपुर का मामला कुछ ऐसा ही है. कादीपुर कोतवाली क्षेत्र में पिछड़ी जाति के निषाद की बेटी रीना (बदला नाम) खेत पर गई थी, तभी 3 दबंगों ने छेड़छाड़ करते हुए उसे दबोच लिया.

इसी बीच रीना का भाई उधर पहुंच गया. बहन की चीखपुकार सुन कर उस की आबरू बचाने के लिए वह दबंगों से भिड़ गया. उन्होंने उसे मारपीट कर अधमरा कर दिया. बाद में अस्पताल में उस की मौत हो गई.

गांवदेहात में कमजोर लोगों की बहूबेटियों पर दबंगों की गंदी नजरें मंडराती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है. विरोध करने पर उन्हें तरहतरह से सताया जाता है.

हापुड़ के हरसांव गांव का रहने वाला एक लड़का अपनी बहन के साथ जा रहा था, तभी रास्ते में एक मनचले ने उस की बहन का हाथ पकड़ लिया. भाई ने विरोध किया, तो उस के साथ मारपीट कर मनचला मौके से फरार हो गया.

छेड़छाड़ करने वाले सड़कों, महल्लों से ले कर स्कूलकालेजों के बाहर तक मंडराते हैं. गाजियाबाद शहर के एक कालेज के बाहर 10वीं जमात की एक छात्रा के साथ मनचले अकसर छेड़छाड़ किया करते थे. उस ने इस की शिकायत अपने भाई से की.

एक दिन उस छात्रा का भाई छुट्टी के वक्त पहुंच गया. मनचलों ने वही हरकत दोहराई, तो भाई ने विरोध किया. मनचलों को यह बात नागवार गुजरी और उन्होंने भाई को दौड़ादौड़ा कर इतना पीटा कि उसे आईसीयू में भरती कराना पड़ा. हालांकि बाद में पुलिस ने मनचलों को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया.

इसी तरह कानपुर शहर में एक वारदात हुई. 12वीं जमात की एक छात्रा के साथ एक मनचला अकसर छेड़खानी किया करता था. एक दिन वह घर से कोचिंग क्लास के लिए निकली, तो मनचले ने रास्ता घेर कर उसे रोक लिया और उसे जबरन मोटरसाइकिल पर बैठाने की कोशिश की.

घर पहुंच कर उस लड़की ने अपने भाई को जानकारी दी. गुस्साया भाई अपने एक दोस्त के साथ मनचले के घर शिकायत करने पहुंचा. मनचले ने उलटा उन पर हमला बोल दिया. बैल्ट व डंडों से पीट कर उन दोनों को घायल कर दिया.

मेरठ शहर के सदर इलाके में भी एक नौजवान को अपनी बहन के साथ हुई छेड़छाड़ का विरोध करना भारी पड़ गया. हुआ यों कि एक लड़की अपने घर के बाहर खड़ी थी. इसी दौरान 2 दोस्तों के साथ जा रहे एक लड़के ने लड़की पर फब्तियां कसीं और उस का मोबाइल नंबर पूछा.

इसी बीच घर से बाहर निकले भाई ने उन लड़कों की इस हरकत का विरोध किया, तो उन्होंने उस के साथ मारपीट कर दी. मौके पर खड़ी भीड़ तमाशा देखती रही. पुलिस के पहुंचने तक हमलावर फरार हो गए.

छेड़छाड़ करने वाले ज्यादातर मनचले इस सोच के मारे होते हैं कि वे कुछ भी हासिल कर सकते हैं. जो लड़की के पक्ष में आता है, उसे गुंडई कर के सबक भी सिखाते हैं. ऐसे मनचले लड़कियों को गंदे इशारे करते हैं, उन्हें छू कर निकलते हैं, वासना भरी नजरों से घूरते हैं और सीटी बजाते हैं.

अमूमन हर रोज ऐसी हरकतों को सहा जाता है. जब कोई भाई अपनी बहन को छेड़छाड़ से बचाने की कोशिश करता है, तो उसे बहुतकुछ सहना पड़ता है. मामला मारपीट और पुलिस तक जाए, तो समाज कई बार लड़की को ही गलत नजर से देखता है. उस का घर से निकलना तक बंद हो जाता है. मनचलों को कानून का डर नहीं होता. छेड़छाड़ के मामले में शायद ही कभी किसी को सजा हुई हो.

वकील सुदेश त्यागी बताते हैं कि पुलिस ऐसे मामलों में छेड़छाड़ करने वालों के खिलाफ धारा-294 के तहत कार्यवाही करती है. इस में ज्यादा से ज्यादा 3 महीने की सजा या जुर्माने का प्रावधान है. ऐसे में अपराध अदालत के सामने साबित भी करना होता है.

समाज में बढ़ती छेड़छाड़ की बीमारी से उन भाइयों की हालत का सहज अंदाजा लगाया जा सकता है, जो अपनी बहन की आबरू को ले कर फिक्रमंद रहते हैं. वे गलत हरकत का विरोध करते हैं, तो उन्हें तमाम परेशानियों का सामना करना पड़ता है, रंजिशें पनपती हैं और हत्याएं तक हो जाती हैं.

पुलिस अफसर नरेंद्र प्रताप कहते हैं कि इस तरह के मामलों में तुरंत पुलिस को सूचित करना चाहिए. औरतों के लिए अलग से भी हैल्पलाइन नंबर हैं. उन पर भी सूचना दी जा सकती है.

दुखी हो कर बने कातिल

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले का रहने वाला संतराम भी ऐसा ही एक भाई है, जिसे छेड़छाड़ से तंग आ कर हत्या तक करनी पड़ गई. दरअसल, राजीव नामक दबंग लड़का संतराम की बहन पर बुरी नजर रखता था. वह अकसर उस के साथ छेड़छाड़ करता था. बारबार समझाने पर भी जब वह नहीं माना, तो संतराम ने दूसरा रास्ता अख्तियार कर लिया.

एक दिन संतराम ने अपने साथी के साथ मिल कर राजीव को बुलाया. पहले उसे शराब पिलाई, फिर डंडे से सिर पर वार कर के उस की हत्या कर दी. तफतीश में मामला खुला, तो पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

हरियाणा के करनाल शहर का मामला भी कुछ ऐसा ही रहा. 5 नौजवानों ने चाकुओं से गोद कर बसस्टैंड इलाके में एक लड़के विजय राणा की हत्या कर दी. गिरफ्तारी के बाद पता चला कि विजय राणा आरोपियों में से एक की बहन के साथ छेड़छाड़ व पीछा किया करता था. इसी बात से गुस्साए भाई ने अपने साथियों के साथ मिल कर उस की हत्या कर डाली.

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया-भाग 3

अनिता चुंबन से रोमांचित हो गई. उस ने प्रतिरोध करने के बजाय बस इतना ही कहा, ‘‘कोई आ गया तो…’’

अनिरुद्ध समझ गया कि अनिता को भी पुराने प्रेम प्रसंग को चलाए रखने में कोई आपत्ति नहीं है. बस, सब कुछ छिपा कर सावधानीपूर्वक करना पड़ेगा.

‘‘सौरी यार, इतने दिनों बाद तुम्हें अकेले पा कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पा रहा हूं.’’

‘‘धीरज रखो, सब हो जाएगा,’’ कह कर अनिता ने अपनी मादक मुसकान बिखेरते हुए हामी भर दी. बदले में अनिरुद्ध भी मुसकरा पड़ा.

अनिता को लग रहा था कि आज उस का पुराना प्रेम उसे वापस मिल गया. पर इस प्रेम प्रसंग को चलाए रखने के लिए यह जरूरी था कि अविनाश की प्रमोशन हो जाए. इसी प्रमोशन के लिए तो अविनाश उसे आज अनिरुद्ध के यहां लाया और उन्हें एकांत में छोड़ कर चला गया. अनिता ने बिना किसी भूमिका के अनिरुद्ध को सब कुछ बता दिया.

‘‘यह प्रमोशन क्या चीज है, तुम्हारे लिए मैं कुछ भी कर सकता हूं,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने एक बार फिर से अनिता का दीर्घ चुंबन ले डाला.

अनिता ने कोई प्रतिरोध नहीं किया और बनावटी नाराजगी दिखाते हुए बोली, ‘‘मैं ने कहा न सब कुछ हो जाएगा. मैं तो शुरू से ही तुम्हारी हूं, थोड़ा धीरज रखो,’’ और अपने पर्स से रूमाल निकाल कर अनिरुद्ध के मुंह पर लगी लिपस्टिक पोंछने लगी. फिर यह कहते हुए अंजलि के कमरे की तरफ मुड़ गई, ‘‘यहां बैठना ठीक नहीं. पता नहीं तुम क्या कर बैठो.’’

अविनाश काफी देर बाद लौटा. आते ही वह फिर आने का वादा कर के अनिता और बेटे के साथ वहां से चल पड़ा. उस से रहा नहीं जा रहा था. वह रास्ते में ही अनिता से पूछ बैठा, ‘‘क्या हुआ, प्रमोशन के लिए कहा कि नहीं ’’

‘‘कहा तो है. कह रहा था कि देखूंगा,’’ अनिता ने पर्याप्त सतर्कता बरतते हुए बताया.

‘‘प्रमोशन हो जाए तो मजा आ जाए,’’ अविनाश अपने सपने में खोया हुआ बोला.

2-3 दिन बाद ही अविनाश को प्रमोशन का और्डर मिल गया, उस की खुशी की कोई सीमा न रही. दफ्तर से लौटते ही उस ने मारे खुशी के अनिता को गोद में उठा लिया और लगा चूमने.

‘‘अरे, क्या हो गया  आज तो बहुत खुश लग रहे हो ’’

‘‘खुशी की बात ही है. जानती हो, आज मेरी प्रमोशन हो गई. पिछले कई सालों से इंतजार कर रहा था मैं. सचमुच, नए मैनेजर साहब बड़े अच्छे आदमी हैं. तुम सोच रही थीं कि पता नहीं सुनेंगे भी कि नहीं, लेकिन उन्होंने मेरी प्रमोशन कर दी. सुनो, छुट्टी के दिन उन के घर चलेंगे, उन्हें धन्यवाद देने,’’ अविनाश खुशी में कहे जा रहा था.

अविनाश को खुश देख कर अनिता की आंखों में भी आंसू छलक आए.

छुट्टी के दिन वे अनिरुद्ध के यहां गए. इस के बाद तो आनेजाने का सिलसिला चल निकला. अनिरुद्ध अविनाश को आर्थिक फायदा दिलाने की गरज से कंपनी के काम से बाहर भी भेजने लगा. अब तो अविनाश हर शाम दफ्तर से आते वक्त अनिरुद्ध के घर हो कर ही आता था. अंजलि को भी मानो मुफ्त का एक नौकर मिल गया था. वह कभी अविनाश को सब्जी लेने भेज देती तो कभी दूध लेने. अविनाश बिजली, पानी, मोबाइल के बिल, पिंकी की फीस आदि भरने का काम भी खुशी से करता.

अनिरुद्ध अगर कंपनी के काम से कहीं बाहर जाता तो वह अविनाश को कह जाता कि मेरे घर का कोई काम हो तो देख लेना. प्रमोद भी पिंकी से घुलमिल गया था, इसलिए वह भी अकसर पिंकी के घर चला जाता और दोनों पिंकी के कमरे में घंटों बातें करते, खेलते.

उधर अनिरुद्ध और अनिता के दिल में प्रेम की पुरानी आग भड़क गई थी. वे अपनी सारी हसरतें पूरी कर लेना चाहते थे, इसलिए वे दोनों अपने में मगन थे. जब भी मौका मिलता अनिता अनिरुद्ध को फोन कर के घर आने के लिए कह देती और दोनों एकदूसरे में खो जाते. कहीं कुछ और भी हो रहा है, यह जानने और समझने की उन्हें मानो फुरसत ही न थी.

उस दिन अनिरुद्ध काम से थक कर रात में लगभग 8 बजे अपने कमरे से बाहर थोड़ी देर के लिए निकला, तो उस ने देखा कि पिंकी के कमरे की लाइट जल रही थी. पिछले कई दिनों की व्यस्तता की वजह से वह अपनी बेटी पिंकी से कायदे से बात तक नहीं कर पाया था. उस के दिल में आया कि पिंकी के कमरे में ही चल कर बातें करते हैं. अभी पिंकी के कमरे से वह कुछ दूरी पर ही था कि उसे कुछ आवाजें सुनाई पड़ीं. उस ने सोचा कि शायद पिंकी की कोई सहेली आई है और वह उस से बातें कर रही है. यों जाना ठीक नहीं , खिड़की से झांक लेता हूं कि कौन है.

उस ने खिड़की से झांक कर देखा तो मानो उसे चक्कर सा आ गया. उस ने देखा कि पिंकी और प्रमोद अर्धनग्न अवस्था में एकदूसरे से लिपटे हुए हैं. प्रमोद पिंकी से कह रहा था, ‘‘तुम्हारे पापा मेरी मम्मी से रोमांस करते हैं. एक दिन मैं ने देखा कि दोनों बैडरूम में एकदूसरे से लिपटे पड़े हैं.’’

‘‘तेरे पापा का भी मेरी मम्मी से ऐसा ही रिश्ता है. एक दिन मैं ने भी उन्हें सामने वाले कमरे में एकदूसरे से लिपटे देखा,’’ पिंकी बोली.

‘‘क्या मजेदार बात है. तेरे पापा मेरी मम्मी से और मेरी मम्मी तेरे पापा से रोमांस कर रही हैं और हम दोनों एकदूसरे से,’’ कह कर प्रमोद हंस पड़ा.

‘‘लेकिन यार, वे लोग तो शादीशुदा हैं. कुछ गड़बड़ हो गई तो भी किसी को पता नहीं चलेगा. पर हम लोगों के बीच कुछ हो गया तो मैं मुसीबत में पड़ जाऊंगी.’’

‘‘तुम चिंता मत करो, मैं कंडोम लाया हूं न.’’

‘‘तुम हो बड़े समझदार,’’ कह पिंकी ने खिलखिलाते हुए प्रमोद को भींच लिया.

आगे कुछ सुन पाना अनिरुद्ध के बस में न था. वह किसी तरह हिम्मत बटोर कर अपने कमरे तक आया और बिस्तर पर निढाल पड़ गया. आज वह खुद की निगाहों में ही गिर गया था. वह किसी से कुछ कह भी तो नहीं सकता था. बेटी तक से नहीं. अगर कुछ कहा और पिंकी ने भी पलट कर जवाब दे दिया तो  वह खुद को ही दोषी मान रहा था कि अपने क्षणिक सुख के लिए उस ने जो कुछ किया, अब उसी राह पर बच्चे भी चल पड़े हैं. उस की हरकतों के कारण बच्चों का भविष्य दांव पर लग गया. कितना अंधा हो गया था वह. अंजलि को भी क्या कहे वह. इस सब के लिए वह खुद जिम्मेदार है. शुरुआत तो उस ने ही की.

रात को अनिरुद्ध ने खाना भी नहीं खाया. रात भर वह दुख और पश्चात्ताप की आग में जलता रहा और रो कर खुद को हलका करता रहा. सुबह होने से पहले ही उस ने सोचा कि जो हो गया, रोने से कोई फायदा नहीं. फिर अब क्या किया जाए, इस पर वह सोचताविचारता रहा.

थोड़ी देर में ही वह निर्णय पर पहुंच गया और सुबह होते ही उस ने कंपनी के जीएम से फोन पर अपना स्थानांतरण करने का निवेदन किया. जीएम उस के काम से सदैव खुश रहते थे, इसलिए उन्होंने उस के निवेदन को स्वीकार करने में तनिक भी देर न लगाई. उस का स्थानांतरण उसी पल कोलकाता कर दिया.

4 दिन बाद अनिरुद्ध परिवार सहित कोलकाता की ट्रेन पर सवार हो गया. किसी को भी न पता चला कि क्या हुआ. अनिरुद्ध ने सारा राज अपने सीने में दफन कर लिया.

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया-भाग 2

पर आदमी का सोचा हुआ सब कुछ होता कहां है. 12वीं कक्षा का परीक्षाफल भी नहीं निकला था कि अनिता के पिता का स्थानांतरण वाराणसी हो गया और अनिता और अनिरुद्ध द्वारा बनाया गया सपनों का महल ढह कर चूर हो गया. तब न तो टैलीफोन की इतनी सुविधा थी और न ही आनेजाने के इतने साधन. इसलिए समय बीतने के साथसाथ दोनों को एकदूसरे को भुला भी देना पड़ा.

कहते हैं कि स्त्री अपने पहले प्यार को कभी भुला नहीं पाती. आज इतने दिन बाद अनिरुद्ध को अपने सामने पा कर अनिता के प्यार की आग फिर से भड़क गई. अविनाश जितनी बार अनिरुद्ध को सर कहता अनिता शर्म से मानो गड़ जाती. आज वह अनिरुद्ध के सामने खुद को छोटा महसूस कर रही थी. उस के मन के किसी कोने में यह भी खयाल आया कि अगर उस का पहला प्यार सफल हो गया होता, तो आज वही कंपनी के मैनेजर की पत्नी होती. सभी उस का सम्मान करते और उसे छोटीछोटी चीजों के लिए तरसना न पड़ता. यही सब सोचतेसोचते अनिता की आंख लग गई.

अविनाश का सारा काम विज्ञापन विभाग तक ही सीमित था. विज्ञापन विभाग का प्रमुख उस के सारे काम देखता था. अविनाश को यह उम्मीद थी कि अनिरुद्ध अगले ही दिन उसे बुलाएगा और मौका देख कर वह उस के प्रमोशन की बात कहेगा. अनिता से अपने पुराने परिचय का इतना खयाल तो वह करेगा ही. पर धीरेधीरे 1 सप्ताह बीत गया और अनिरुद्ध का बुलावा नहीं आया तो अविनाश निराश हो गया.

लेकिन एक दिन जब अविनाश को अनिरुद्ध का बुलावा मिला तो उस की खुशी का ठिकाना न रहा. वह तत्काल इजाजत ले कर अनिरुद्ध के कमरे में पहुंच गया. अनिरुद्ध ने उसे बैठने के लिए इशारा किया और बोला, ‘‘उस दिन काफी भीड़ थी, इसलिए कायदे से बात न हो पाई. ऐसा करो, कल छुट्टी है अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आओ, आराम से बातें करेंगे. एक बात और दफ्तर में किसी को भी पता न चले कि हम लोग परिचित हैं. यह जान कर लोग तुम से अपने कामों की सिफारिश के लिए कहेंगे और मुझे दफ्तर चलाने में दिक्कत आएगी. समझ रहे हो न ’’

‘‘जी सर,’’ अविनाश अभी इतना ही कह पाया था कि चपरासी कुछ फाइलें ले कर अनिरुद्ध के कमरे में आ गया. अविनाश वापस अपनी सीट पर लौट आया पर आज वह बहुत खुश था.

घर लौट कर अविनाश अनिता से बोला, ‘‘आज मैनेजर साहब ने मुझे अपने कमरे में बुलाया था. कह रहे थे कि भीड़ के कारण कायदे से बातें नहीं हो पाईं, कल अपनी पत्नी और बच्चों के साथ आओ, इतमीनान से बातें करेंगे.’’

अनिरुद्ध से मुलाकात होने के बारे में सोच अनिता खुश तो बहुत हुई पर अपनी खुशी छिपा कर उस ने पूछा, ‘‘अरे, अपनी प्रमोशन की बात की कि नहीं ’’

‘‘कहां की. एक तो फुरसत नहीं मिली फिर कोई आ गया. खुद की प्रमोशन की बात मैं कैसे कह दूं, यह मेरी समझ में नहीं आता. ऐसा है, कल चलेंगे न तो मौका देख कर तुम्हीं कहना. तुम्हारी बात शायद मना न कर पाएं. मैं मौका देख कर थोड़ी देर के लिए कहीं इधरउधर चला जाऊंगा.’’

‘‘मुझ से नहीं हो पाएगा,’’ अनिता ने बहाना बनाया.

‘‘अरे, तुम मेरी पत्नी हो. मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकतीं. सोचो, प्रमोशन मिलते ही वेतन बढ़ जाएगा और अन्य सुविधाएं भी मिलेंगी. हमारी जिंदगी आरामदेह हो जाएगी. अभी तुम जिन छोटीछोटी चीजों के लिए तरस जाती हो, वे सब एक झटके में आ जाएंगी. मौके का फायदा उठाना चाहिए. ऐसे मौके बारबार नहीं आते. तुम एक बार कह कर तो देखो, मेरी खातिर.’’

‘‘ठीक है, मौका देख कर जरूर कहूंगी,’’ अनिता समझ गई कि अविनाश प्रमोशन के लिए कुछ भी कर सकता है. यह कायदे से मुझ से बात नहीं करता, लेकिन प्रमोशन के लिए मुझ से इतनी गुजारिश कर रहा है.

अगले दिन अविनाश, अनिता अपने 16 वर्षीय बेटे प्रमोद के साथ अनिरुद्ध के घर पहुंचे. अनिरुद्ध का कोठीनुमा घर देख कर अनिता की आंखें चुंधिया गईं. हर कमरे की साजसज्जा देख कर वह आह भर कर रह जाती कि काश मेरा घर भी ऐसा होता… अंजलि ने घर पर सहेलियों की किट्टी पार्टी आयोजित कर रखी थी, इसलिए अनिरुद्ध अपने कमरे में अलगथलग बैठा हुआ था. अंजलि ने अविनाश और अनिता का स्वागत तो किया पर यह कह कर किट्टी पार्टी चल रही है, उन्हें अनिरुद्ध के कमरे में ले जा कर बैठा दिया. हां, जातेजाते उस ने यह जरूर कहा कि जाइएगा नहीं, पार्टी खत्म होते ही मैं आऊंगी.

अविनाश के साथ ही प्रमोद ने भी अनिरुद्ध को नमस्कार किया और अविनाश ने बताया कि यह मेरा बेटा प्रमोद है. बस, यही एक लड़का है.

अनिरुद्ध ने वहीं बैठेबैठे आवाज लगाई, ‘‘पिंकी… पिंकी.’’

थोड़ी ही देर में प्रमोद की समवयस्क एक किशोरी प्रकट हुई और अनिरुद्ध ने उस का परिचय कराते हुए बताया कि यह उन की बेटी है.

फिर कहा, ‘‘पिंकी बेटे, प्रमोद को ले जा कर अपना कमरा दिखाओ, खेलो और कुछ खिलाओपिलाओ,’’ अनिरुद्ध का इतना कहना था कि पिंकी प्रमोद का हाथ पकड़ उसे अपने साथ ले गई. उस का कमरा सब से पीछे था एकदम अलगथलग.

इधर अनिरुद्ध के कमरे में थोड़ी ही देर में नौकर चायनाश्ता ले आया. इधरउधर की औपचारिक बातों के बीच चायनाश्ता शुरू हुआ. अनिता अधिकतर चुप ही रही. वह अविनाश को यह भनक नहीं लगने देना चाहती थी कि उस की कभी अनिरुद्ध के साथ घनिष्ठता थी. वह चुपचाप अनिरुद्ध को देख रही थी कि कितना बदल गया है वह.

इसी बीच अविनाश के मोबाइल की घंटी बजी. वह तो ऐसे ही किसी मौके की तलाश में था. उस ने अनिरुद्ध से कहा, ‘‘सर, बुरा मत मानिएगा. मैं अभी थोड़ी देर में आ रहा हूं, एक जरूरी काम है.’’

अनिरुद्ध के ‘ठीक है’ कहते ही अविनाश तेजी से बाहर निकल गया. एक पल के लिए अनिता का मन यह सोच कर कसैला हो गया कि आदमी अपने स्वार्थ के आगे इतना अंधा हो जाता है कि अपनी बीवी को दूसरे के पास अकेले में छोड़ जाता है. पर अगले ही पल वह अपने पुराने प्यार में खो गई.

अब कमरे में केवल अनिरुद्ध और अनिता रह गए. थोड़ी देर के लिए तो वहां एकदम शांति व्याप्त हो गई. दोनों में से किसी को कुछ सूझ ही नहीं रहा था कि क्या कहे. वक्त जैसे थम गया था.

बात अनिरुद्ध ने ही शुरू की, ‘‘मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था कि हम फिर मिलेंगे.’’

‘‘मैं ने भी.’’

अनिरुद्ध खड़ा हो गया था, ‘‘तुम नहीं जानतीं कि मैं ने तुम्हारी याद में कितनी रातें रोरो कर बिताईं. पर क्या करता मजबूर था. पढ़ाई पूरी करने और नौकरी करने के बाद मैं तुम्हारी खोज में एक बार वाराणसी भी गया था. वहां पता लगा तुम्हारी शादी हो गई है. इस के बाद ही मैं ने अपनी शादी के लिए हां की,’’ अनिरुद्ध भावुक हो गया था.

अनिता की आंखों से आंसू झरने लगे थे. उस ने बिना एक शब्द कहे अपने आंसुओं के सहारे कह दिया था कि वह भी उस के लिए कम नहीं रोई है.

अनिरुद्ध ने देखा कि अनिता रो रही है, तो उस ने अपने हाथों से उस के आंसू पोंछ कर उसे सांत्वना दी, ‘‘जो कुछ हुआ उस में तुम्हारा क्या कुसूर है  मैं जानता हूं कि तुम मुझे आज भी इस दुनिया में सब से ज्यादा प्यार करती हो,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने अनिता को गले लगा कर उस के अधरों का एक चुंबन ले लिया.

बस अब और नहीं: अनिरुद्ध के व्यवहार में बदलाव क्यो आया-भाग 1

उस दिन जब अविनाश अपने दफ्तर से लौटा तो बहुत खुश दिख रहा था. उसे इतना खुश देख कर अनिता को कुछ आश्चर्य हुआ, क्योंकि वह दफ्तर से लौटे अविनाश को थकाहारा, परेशान और दुखी देखने की आदी हो चुकी थी. अविनाश का इस कदर परेशान होना बिना वजह भी नहीं था. सब से बड़ी वजह तो यही थी कि पिछले 10 सालों से वह इस कंपनी में काम कर रहा था, पर उसे आज तक एक भी प्रमोशन न मिला था. वह कंपनी के मैनेजर को अपने काम से खुश करने की पूरी कोशिश करता, पर उसे आज तक असफलता ही मिली थी.

प्रमोशन न होने के कारण उसे वेतन इतना कम मिलता था कि मुश्किल से घर का खर्च चल पाता था. उस की कंपनी बहुत मशहूर थी और वह अपना काम अच्छी तरह से समझ गया था, इसलिए वह कंपनी छोड़ना भी नहीं चाहता था.

अनिता अविनाश के दुखी और परेशान रहने की वजह जानती थी, पर वह कर ही क्या सकती थी.

उस दिन अविनाश को खुश देख कर उस से रहा नहीं गया. वह चाय का कप अविनाश को पकड़ा कर अपना कप ले कर बगल में बैठ गई और उस से पूछा, ‘‘क्या बात है, आज बहुत खुश लग रहे हो ’’

‘‘बात ही खुश होने की है. तुम सुनोगी तो तुम भी खुश होगी.’’

‘‘अरे, ऐसी क्या बात हो गई है  जल्दी बताओ.’’

‘‘कंपनी का मैनेजर बदल गया. आज नए मैनेजर ने कंपनी का काम संभाल लिया. बड़ा भला आदमी है. उम्र भी ज्यादा नहीं है. मेरी ही उम्र का है. पर इतनी छोटी उम्र में मैनेजर बन जाने के बाद भी घमंड उसे छू तक नहीं गया है. आज उस ने सभी कर्मचारियों की एक मीटिंग ली. उस में सभी विभागों के हैड भी थे. उस ने कहा कि यह कंपनी हम सभी लोगों की है. इसे आगे बढ़ाने में हम सभी का योगदान है. हम सब एक परिवार के सदस्यों की तरह हैं. हमें एकदूसरे की मदद करनी चाहिए. कंपनी के किसी भी सदस्य को कोई परेशानी हो तो वह मेरे पास आए. मैं वादा करता हूं सभी की बातें सुनी जाएंगी और जो सही होगा वह किया जाएगा.

‘‘आखिर में उस ने कहा कि इस इतवार को मेरे घर पर कंपनी के सभी कर्मचारियों की पार्टी है. आप सभी अपनी पत्नियों के साथ आएं ताकि हम सब लोग एकदूसरे को अच्छी तरह से जान और समझ सकें. लगता है अब मेरे दिन भी बदलेंगे. तुम चलोगी न ’’

‘‘तुम ले चलोगे तो क्यों नहीं चलूंगी ’’ कह कर मुसकराते हुए अनिता वापस रसोई में चली गई.

कंपनी के कर्मचारियों की संख्या 100 से अधिक थी, जिन के रात के खाने का प्रबंध था. मैनेजर ने अपने घर के सामने एक बड़ा सा शामियाना लगवाया था. मैनेजर अपनी पत्नी के साथ शामियाने के दरवाजे पर ही उपस्थित था और आने वाले मेहमानों का स्वागत कर रहा था. मेहमान एकएक कर के आ रहे थे और मैनेजर से अपना परिचय नाम और काम के जिक्र के साथ दे रहे थे.

अविनाश ने भी मैनेजर से हाथ मिलाया और अनिता ने उन की पत्नी को नमस्कार किया. अचानक मैनेजर की निगाह अनिता पर पड़ी तो उस के मुंह से निकला, ‘‘अरे, अनिता तुम  तुम यहां कैसे ’’

अनिता भी चौंक उठी. उस के मुंह से बोल तक न फूटे.

‘‘पहचाना नहीं  मैं अनिरुद्ध…’’

‘‘पहचान गई, तुम काफी बदल गए हो.’’

‘‘हर आदमी बदल जाता है, पर तुम नहीं बदलीं. आज भी वैसी ही दिख रही हो,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने अपनी पत्नी की तरफ संकेत किया, ‘‘अनिता, यह है अंजलि मेरी पत्नी और तुम्हारे पति कहां हैं ’’

अनिता ने अविनाश को आगे कर के इशारा किया और अंजलि को अभिवादन कर उस से बातें करने लगी.

अब तक सिमटा हुआ अविनाश सामने आ कर बोला, ‘‘सर, मैं हूं अविनाश. आप की कंपनी के ऐड विभाग में सहायक.’’

‘‘यह तो बड़ी अच्छी बात है,’’ कहते हुए अनिरुद्ध ने अंजलि से कहा, ‘‘अंजलि, यह है अनिता. बचपन में हम दोनों एक ही सरकारी कालोनी में रहते थे और एक ही स्कूल में एक ही क्लास में पढ़ते थे. इन के पिताजी पापा के बौस थे.’’

‘‘पर आज उलटा है. आप अविनाश के बौस के भी बौस हैं,’’ कह कर अनिता हंस पड़ी.

‘‘नहीं, हम लोग आज से बौस और मातहत के बजाय एक दोस्त के रूप में काम करेंगे. क्यों अविनाश, ठीक है न  खैर, और बातें किसी और दिन करेंगे, आज तो बड़ी भीड़भाड़ है,’’ कहते हुए अनिरुद्ध अन्य मेहमानों की तरफ मुखातिब हुआ, क्योंकि अब तक कई मेहमान आ कर खड़े हो चुके थे.

पार्टी समाप्त होने पर अन्य लोगों की तरह अविनाश और अनिता भी वापस अपने घर लौट आए. अविनाश बहुत खुश था. उस से अपनी खुशी संभाले नहीं संभल रही थी. सोते समय अविनाश ने अनिता से पूछा, ‘‘क्या यह सच है कि मैनेजर साहब तुम्हारी कालोनी में रहते थे और तुम्हारी क्लास में पढ़ते थे ’’

‘‘इस में झूठ की क्या बात है  जब पिताजी की नियुक्ति जौनपुर में थी तो हमारी कोठी की बगल में ही अनिरुद्ध का क्वार्टर था और अनिरुद्ध मेरी ही क्लास में पढ़ता था. अनिरुद्ध पढ़ने में तेज था, इसलिए वह आज तुम्हारी कंपनी में मैनेजर बन गया और मैं पढ़ने में कमजोर थी, इसलिए तुम्हारी बीवी बन कर रह गई,’’ कह कर अनिता मुसकरा तो पड़ी पर यह मुसकराहट जीवन की दौड़ में पिछड़ जाने की कसक को भुलाने के लिए थी.

अविनाश तो किसी और दुनिया में मशगूल था. उसे इस बात की बड़ी खुशी थी कि मैनेजर साहब उस की पत्नी के पुराने परिचितों में से हैं.

‘‘मैनेजर साहब इतना तो सोचेंगे ही कि मेरा प्रमोशन हो जाए.’’

‘‘पता नहीं, लोग बड़े आदमी बन कर अपना अतीत भूल जाते हैं.’’

‘‘नहीं अनिता, मैनेजर साहब ऐसे आदमी नहीं लगते. देखा नहीं, कितनी आत्मीयता से हम लोगों से वे मिले और यह बताने में भी नहीं चूके कि तुम्हारे पिता उन के पिता के बौस थे.’’

‘‘मुझे नींद आ रही है. वैसे भी कल सुबह उठ कर प्रमोद को तैयार कर के स्कूल भेजना है,’’ कह कर अनिता ने नींद का बहाना बना कर करवट बदल ली. थोड़ी ही देर में अविनाश भी खर्राटे भरने लगा.

नींद अनिता की आंखों से कोसों दूर थी. उस ने कुशल स्त्री की भांति अविनाश को सिर्फ इतना ही बताया था कि वह अनिरुद्ध से परिचित है. वह बड़ी कुशलता से यह छिपा गई कि दोनों एकसाथ पढ़तेपढ़ते एकदूसरे को चाहने लगे थे. 12वीं कक्षा में तो दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया था. पर दोनों जानते थे कि उन दोनों की आर्थिक स्थिति में बहुत अंतर है और दोनों की जाति भी अलग है, इसलिए घर वाले दोनों को विवाह करने की अनुमति कभी नहीं देंगे. दोनों ने यह तय किया था कि पढ़ाई पूरी करने के बाद वे दोनों नौकरी तलाशेंगे और उस के बाद अपनी मरजी से विवाह कर लेंगे.

तहखाने: क्या अंशी दोहरे तहखाने से आजाद हो पाई?- भाग 3

अखिल की निगाहें बराबर अंशी पर लगी हैं. वह कई बार उठ कर खुद उस के पास आयागया और इन 4-5 घंटों में 6 बार उसे अपने केबिन में बुला चुका है. शायद उसे आज के ड्रेसप के लिए कोई
काम्पलीमैंट भी दिया है.

अंशी ने इतरा कर अपनी अदा से उसे कोई खास महत्व नहीं दिया है. वह ऐसी गंभीरता का अभिनय कर रही है, जैसे इस दफ्तर की सिलेब्रिटी है और अखिल उस का बौस न हो कर कोई कुलीग है.

दफ्तर के उस हाल में एक धुंध सी है, जिस में सब साफ दिखाई नहीं दे रहा है, मगर ये तय है कि अंशी
अपनी जिंदगी को जी रही है अपनी शर्तों पर, अपनी सुविधा से अपने बनाए नियमों से अपने रास्ते खुद तय कर रही है. वह खुश है, किसी से शिकायत भी नहीं. कभी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में मजबूरियों का
दुखड़ा रोते भी नहीं सुना है.

जिंदगी इसी का नाम तो नहीं? नहीं… नहीं… ये सभ्यता नहीं, हमारी परंपराएं इसे आदर से नहीं देखतीं, मर्दों के कंधे पर हाथ रख कर बात करना, बातबात पर ठहाके लगा कर हंस देना… छोटेछोटे कपड़ों से झांकते आमंत्रित करते अंग… लाज का नामोनिशान नहीं… उफ्फ… बेशर्मी को आधुनिकता नहीं कहा जा सकता.

अगर यही है परिवर्तन तो नहीं चाहिए ऐसा बदलाव… अपनों की नजर में न सही, पर अपनी नजर में तो सम्माननीय हूं न, नहीं मिला जीने का सुख तो क्या? आत्मसम्मान से तो धनी हूं मैं… नहीं चाहिए मुझे अंशी जैसी जिंदगी… क्या सचमुच अंशी की जिंदगीखराब है?

क्या वह खुश नहीं? या लोग उस से खुश नहीं? सब तो बैलेंस कर के चलती है वह… फिर क्यों आपत्ति है मुझे या किसी को…? विचारों के झूले पर झूलते मन को दिव्या ने अपने तर्कवितर्क से रोक दिया है और अपने काम में लग गई है.

शाम को अंशी अखिल की गाड़ी में सवार हो कर निकली है. अपनी गाड़ी को उस ने पोर्च में लगा दिया है.
बहुत स्टाइल से वह अखिल के बराबर वाली सीट पर बैठी है और पर्स पीछे वाली सीट पर फेंक दिया है.

दिनभर की थकान से अनमनी सी अंशी जैसे अखिल की गोद में लुढ़क ही जाएगी. अखिल ने उस के हाथ को कस कर पकड़ लिया है और गाड़ी में ही एक जबरदस्त किस अंकित कर दिया. उस की इस हरकत से अंशी बनावटी नाराजगी जाहिर करते हुए कहने लगी है, “इतने बेसब्र मर्द मुझे बिलकुल पसंद नहीं अखिल.”

“ये तो रोमांस का टेलर है मेरी…” बात को अधूरा ही छोड़ दिया है.”

“यही तो कमी है तुम मर्दों में, कि मिल जाए तो औरत को समूचा ही खा लेना चाहते हो तुम लोग?”

“अंशी, नाराज क्यों होती हो जान…”

“माइंड योर लैंग्वेज, मैं कोई जानवान नहीं हूं अखिल… ये सब छलावा है… मैं इसे नहीं मानती.”

“मेरे साथ मेरा रूम शेयर कर सकती हो? ये छलावा नहीं है?”

“मैं अपनी इच्छाओं की मालिक हूं अखिल, जो चाहूं कर सकती हूं. न तुम मुझे रोक सकते हो और न ये
जमाना.”

“मैं तुम्हे चाहने लगा हूं अंशी… बाई गौड…”

“हा… हा… हा… चाहत… किसी से भी… इतनी सस्ती होती है क्या?”

“तुम सस्ती कहां हो अंशी? मेरे दिल से पूछो, कितनी कीमती हो तुम मेरे लिए?”

“अच्छा… कितनी कीमत लगाई है तुम ने मेरी?”

“ओह्ह, बस कर दी न दिल तोड़ने वाली बात…”

“सचाई हकीकत से बहुत अलग होती है.”

“तुम मेरी बगल वाली सीट पर बैठी हो, ये सचाई नहीं है क्या?”

“हां, यह सचाई है, मगर ये पूरी सचाई है कि मैं तुम्हें या तुम मुझे नहीं चाहते हो.”

“अब कैसे दिखाऊं तुम्हें? अंशी, मैं सोतेजागते बस तुम्हारे ही बारे में ही सोचता रहता हूं, यकीन करो
मुझ पर…”

“हा… हा… हा… दूसरा छलावा… कोई शादीशुदा मर्द अपनी खूबसूरत बीवी की गैरहाजिरी में किसी लड़की को घर में लाता है. उस के साथ अय्याशी करता है. बीवी के आते ही चूहे की तरह दुबक जाता है और कहता है कि वह चाहने लगा है… हा… हा… हा.”

“तुम भी तो अपने पति को धोखा दे रही हो अंशी… तुम भी तो शादीशुदा हो… बताओ… मैं झूठ बोल रहा हूं क्या?””तुम बेवकूफ हो अखिल… जरूरत को चाहत समझ बैठे हो… तुम्हारा साथ, तुम्हारी कंपनी. मेरी जरूरत है बस और कुछ नहीं… मैं सतीसावित्री नहीं बनना चाहती… न ही बिना अपराध रोज सूली पर चढ़ना चाहती हूं…”

“ये झूठ है, मैं ने तो कभी अपनी पत्नी को सूली पर नहीं चढ़ाया… न ही कोई इलजाम लगाया उस पर.”

“हा… हा… हा… एक संस्कारी औरत का खिताब उस के माथे पर लगा कर बिंदास जिंदगी जी रहे हो और क्या चाहते हो… वो बेचारी अबला तो तुम्हें पति परमेश्वर ही समझती होगी न?”

“यार, तुम भी ये क्या बातें ले कर बैठ गईं?” हारे हुए अखिल को इस गरमाहट के खत्म होने का डर सताने
लगा, तो वह झुंझला उठा.

“अच्छा नहीं करती… बस… सुनो अखिल, रास्ते से बियर की बोतल ले लेना प्लीज…”

“यस डार्लिंग… मुझे याद है…”

“ठंडी बियर…”

“हां.”

शौप से 2 बोतल गाड़ी की पिछली सीट पर डाल कर अखिल ने ड्राइविंग सीट को संभाल लिया है.

घर आने तक बहस की गहमागहमी फिर से रोमांस में तबदील हो चुकी है. चुप्पी ने माहौल को रोमांटिक कर दिया है.

अंशी के स्टैपकट बाल उस के टौप पर पड़े अखिल को अधीर कर रहे हैं. इस बात
से बेखबर अंशी गाड़ी के बाहर लगातार चलती गाड़ियों को देख रही है, जो रुकेंगी नहीं… दौड़ती
रहेंगी… लगातार… यही जिंदगी है… अपनी धुन में दौड़ना… संतुष्टि तक दौड़ते रहना…

14वें माले पर लिफ्ट से पहुंच कर अखिल ने जेब से चाबी निकाल कर दरवाजे का लौक खोला. अंदर आ कर उसी तरह वापस से लौक भी कर दिया.

“तुम्हें शावर लेना है अंशी? चाहो तो फ्रेश हो जाओ… प्रिया की नाइटी ले लेना.”

“तुम जाओ अखिल… मैं देखती हूं,” अंशी ने मोबाइल को स्विच औफ मोड पर डाल दिया है और बैड पर
पर्स फेंक कर पसर गई है.

6 इंची मोटे डनलप के गद्दों ने उस की थकान को छूमंतर कर दिया है. अखिल ने बाशरूम से आ कर म्यूजिक औन कर दिया. उस का मूड एकदम अलग सा दिख रहा है. अब अंशी भी शावर लेने के बाद ब्लैक कलर की औफ शोल्डर नाइटी में है.

अखिल ने सारी लाइट औफ कर दी है और रूम स्प्रे से कमरे को महका दिया है. बैडरूम में हलकीहलकी सी रोशनी है, जो रोमांस में डूबने को मचल रही है. एक रंगीन मोमबत्ती डिजाइनर वाल की सीध में जल रही है, जो हजारों सितारों की तरह रोशनी दे रही है.

अखिल कांच के गिलास में पैग बना रहा है. अंशी उस के करीब आ कर बैठ गई है, बिलकुल करीब. उस की सांसों की गरमाहट अखिल महसूस कर रहा है. चीयर्स कर पहला पैग खत्म किया
है… फिर दूसरा… तीसरा… और चौथा… नशा गहराने लगा है… उस ने अंशी को बांहों में भर लिया. उस की आंखें बंद हैं. उस ने उस की दोनों बंद आंखों पर एकएक चुम्बन अंकित कर दिया है.

अंशी ने अपनी बांहों को उस के गले में डाल कर उस का चेहरा अपने करीब कर लिया है. अखिल के हाथ उस की पीठ पर रेंग रहे हैं.
इसी मुद्रा में लिपटे दोनों बैठे हैं, जरूरत के साधनमात्र… न प्रेम, न चाहत, न कसक, न भावनाएं…

डुबोने के बाद पूरा समंदर एकदम शांत है. अंशी ने हौले से अपने सीने पर रखा अखिल का हाथ हटाया. नाईटी पहन कर वह ड्राइंगरूम में आ गई है.

पर्स से सिगरेट निकाल कर सुलगाई है और सोफे पर बैठ कर पैर टेबल पर फैला लिए हैं. एक गहरा कश लिया है… “लक्ष्य, मेरे पति.. हा… हा… हा… तुम्हारे हाथों की कठपुतली नहीं हूं मैं, अपनी मरजी से जीना आता है मुझे… और तुम्हारी औकात ही क्या है?

मुझ जैसी लड़की को शिकंजे में जकड़ने की? नहीं… लक्ष्य ये कभी नहीं होगा… जाओ, चले जाओ… देखती हूं… कौन तुम्हें अपने दिल में जगह देगी? यहां से वहां चाटते रहना सब की जूतियां… एक दिन सब की
सब छोड़ के चली जाएंगी…

फिर मैं भी थूक दूंगी तुम्हारे मुंह पर… देखो, मैं ने थूक ही दिया है तुम्हारे पूरे मुंह पर… तुम्हारी औकात यही है लक्ष्य… तुम ने मेरा जीना दुश्वार किया है न… अब मेरी भी इच्छाओं के तहखाने खुल गए हैं, जो कब के बंद पड़े थे. मेरे भी सपने हैं, जो उन तहखानों से झांक रहे हैं, खुली हवा में सांस लेने को मचल रहे हैं. अब ये तहखाने कभी बंद नहीं होंगे.

मेरे हौसले की किरणें इस की सीलन को खत्म कर देंगी. घुटघुट कर जीना मेरे हिस्से में नहीं, अब तुम्हारे हिस्से में होगा… अब तुम मेरा इंतजार करोगे… मेरे लिए अपनी सारी सांसें न्योछावर करोगे और बदले में कुछ नहीं मिलेगा. राहत, हमदर्दी का एक लफ्ज भी नहीं…

तुम मेरी मौजूदगी को घर के कोनेकोने में तलाशोगे और मैं अपनी रंगीन दुनिया में ऐश करूंगी… मैं परंपरावादी, संस्कारी, आश्रित और बेचारी नही हूं… सुना तुम ने…? ऐश के रास्ते जितना तुम्हारे लिए खुले हैं, उतना मेरे लिए भी… मैं… मैं हूं… अब मैं नहीं, तुम मुझ से डरोगे… दहशत खाओगे… जैसे मैं खाती हूं… लक्ष्य, मैं नहीं हूं अब… तुम ने मुझे खो दिया है.

तहखाने: क्या अंशी दोहरे तहखाने से आजाद हो पाई? – भाग 2

अब जितना जी चाहे रोपीट ले, कोई मसीहा नहीं आने वाला, बेचारगी को कौन पसंद करता है भला, एक जोरदार ठहाका लगा कर बैड पर पड़ा सफेद फैंसी पर्स उठा कर उस ने कंधे पर टांग लिया और लैपटौप बैग हाथ में ले कर चल दी.

ड्राइविंग सीट पर बैठते ही अंशी ने अपने लहराते बालों को हाथों से संवारा और बालों में फंसेबड़े फ्रेम के ब्रांडेड गौगल्स को आंखों पर चढ़ा लिया. कार स्टार्ट करते ही पहले म्यूजिक औन किया है… नौटी… नौटी.. नौटी.. नौटी… ऐ जी नौटी सिरमौर बालिए… हिमाचली लोकसंगीत की धुन पर झूमते, गुनगुनाते हुए उस ने क्लिच दबा कर गाड़ी का एक्सीलेटर दे दिया है. गाड़ी अपनी स्पीड से दौड़ रही है.

दफ्तर की सीढ़ियां चढ़ते समय 6 गज की साड़ी में लिपटी दिव्या से उस का आमनासामना हो गया है. सादगी को ओढ़े, दायरों का बौर्डर जिस्म से चिपका, उपस्थित हो कर भी सब से अलग, मुंह में जबान न के
बराबर. हमेशा डरीसहमी सी जैसे दफ्तर न हो कर कोई कब्रगाह हो. इशारों पर नाचती दिव्या से बौस ने
कहा, “ओवर टाइम.”

“यस सर,” उस ने कहा. किसी और की टेबल का काम करने को तो न चाहते हुए भी उसे कहना पड़ा, “यस सर,” फिर भी नौकरी जाने और बौस की नजरों से उतरने का डर.

अंशी ने गर्मजोशी से “हाय” कह कर पहल की और बोली, °बहुत सुंदर साड़ी है आप की, मगर रोजरोज कैसे संभालती हो आप इसे?”

“आदत हो गई है अब तो…”

“दिव्याजी, आप को देख कर मुझे अपनी मम्मा याद आ जाती हैं। बिलकुल आप की हूबहू तसवीर, सेम
पहनावा, सेम व्यक्तित्व और…”

“और… और क्या?”
जवाब में हंस दी वह.

“आदर्शवादी, संस्कारी महिला,” दिव्या अब उत्साहित हो मुसकराई, “हम ने साड़ी को जीवित रखा है आज भी और संस्कारों को भी…” नाक सिकोड़ते हुए अंशी ने लापरवाही से उस की भावनाओं को सहमति दी है.

“चलिए, आ गया हमारा
स्थायी पड़ाव.”

“स्थायी…?”

“हां, कम से कम दफ्तर तो स्थायी ही रहना है रिटायरमेंट तक, बाकी का मुझे भरोसा नहीं.”

“भरोसा तो जिंदगी का भी नहीं है, बस सब जिए जा रहे हैं. या यों कहो, लाठी से हांके जा रहे हैं,” ठहाका लगाते हुए अंशी ने दिव्या को कंधे से पकड़ लिया, “टूटी हुई बातें, बुझा हुआ निराश चेहरा… सब के सब गहने हैं आप जैसी औरतों के, जो एक दिन सांप बन कर न डसे तो कहना.”

“तो और क्या करें? समाज में रहना है, मर्यादा में न रहें तो कौन इज्जत देगा.”

“कौन सी इज्जत दिव्याजी, बताओ तो जरा… बुरा न मानना… कौन इज्जत देता है आप को? या परवाह
करता है घर में या दफ्तर में? आप के बच्चे? आप के पति? या दफ्तर में बौस? क्या कमी छोड़ी है आप ने? फिर भी…”

अंशी की बातों से उस के होंठों ने खामोशी को अख्तयार कर लिया और वह सकपका कर अपनी टेबल की ओर बढ़ गई है. अंशी का बिंदास नजरिया दिव्या को कभी न भाया. उस का पहनावा, देह भाषा और निडरता कुछ भी नहीं, भला शोभा देती है क्या भले घर की औरतों को मर्दों जैसी हरकतें? मन ही मन
बुदबुदा कर दिव्या ने अपना काम संभाला, मगर कहीं न कहीं उस की बातें आज उसे झकझोर रही हैं. सही तो कह रही है

वह, क्या गलत कहा अंशी ने? क्या पाया आज तक उस ने? दिनभर पिलने के बाद घर
में सब की जीहुजूरी, बच्चों को लाड़दुलार करते और दूसरों की पसंद पूछतेपूछते भूल ही गई है कि उसे
क्या पसंद है? और किसी ने पूछा भी कहां कभी? न किसी ने उस की इच्छाएं पूछीं, न सपने.

सपने तो होते ही कहां हैं औरतों के, वह तो परिवार के सपनों पर जीती हैं. सुबह से खटतेखटते आई हूं और जा कर भी आराम कहां? न बनाव, न श्रंगार, जरा सा हंस लूं तो जवाब देही… रो लूं तो उपेक्षा झेलूं… उफ्फ… जरा भी सलीका न सीखा हम ने, हाथों के नाखूनों से जमे आटे को चोरी से साफ करने लगी है.

बेबी बंप फ्लॉन्ट करती दिखीं स्वरा भास्कर, पति संग दिए रोमांटिक पोज

बॉलीवुड एक्ट्रेस स्वरा भास्कर इन दिनों अपने फोटोशूट को लेकर सुर्खियों में छाई हुई है, उनका वायरल हुआ फोटोशूट कोई सिंपल नहीं है बल्कि बेबी बंप फ्लॉन्ट करती दिख रही है. जी हां, स्वरा भास्कर जल्द ही मां बनने वाली है. इसका उन्होने फोटोशूट कराया है जिसमें वो पति फहाद अहदम के साथ रोमांटिक पोज देती हुई नजर आ रही है.

 

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आपको बता दें, कि स्वरा भास्कर और पति फहाद अहदम ने इसी साल फरवरी में शादी रचाई थी.पहले कपल ने कोर्ट मैरिज की थी फिर उसके बाद दोनों ने मुस्लिम रिती-रिवाजों के साथ निकाह किया. जिसके कुछ ही दिनों बाद स्वरा ने सबको गुड न्यूज दे दी और अब मैटरनिटी फोटोशूट कराया है. जिसमें दोनों साथ-साथ दिखाई दे रहे है, साथ ही बेबी बंप भी शो हो रहा है. बता दें, पेशे से स्वरा के पति एक पॉलिटिशियन है.

 

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इन फोटोज में स्वरा भास्कर व्हाइट कलर की ड्रेस में नजर आ रही है. कपल एक छाते के नीचे खड़े पोज देते दिख रहे है दोनो की ये रोमांटिक फोटो खूब वायरल हो रही है. लोग इन फोटोज पर जमकर प्यार बरसा रहे है दोनों की ये प्यारी सी फोटो सोशल मीडिया की लाइमलाइट में आ गई है. इन तस्वीरों को शेयर करते हुए एक्ट्रेस स्वरा भास्कर ने कैप्शन में लिखा है कि, “कभी-कभी जिंदगी आपको अप्रत्याशित रूप से आशीर्वाद देता है और आपको आत्म-खोज और एकजुटता दोनों की यात्रा पर ले जाता है!” बता दें कि स्वरा भास्कर और फहाद अहमद की पहली मुलाकात साल 2020 में एक रैली के दौरान हुई थी. दोनों में पहले दोस्ती हुई और धीरे- धीरे उनकी ये दोस्ती प्यार में तब्दील हुई.

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