छत्तीसगढ़ के सूरजपुर जिले में एक महिला ने अपने ही पति की निर्मम हत्या करवा उसे दुर्घटना का स्वरूप देकर पुलिस को भरमाना चाहा. अक्सर हम पति अथवा पुरुष के द्वारा महिलाओं की हत्या की खबर सुर्खियां बनते देखते हैं. मगर ऐसा बहुत ही कम होता है जब कोई महिला अपने पति, जिसके साथ उसने सात फेरे लिए हैं को रास्ते से हटाने के लिए षडयंत्र करती है और पति को मौत के घाट उतार दिया जाता है.
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छत्तीसगढ़ के जिला सूरजपुर में पुलिस ने सप्ताह भर पहले हुए कत्ल की गुत्थी को सुलझाने में सफलता हासिल की है. जिस एसईसीएल कोल इंडिया कर्मचारी की हत्या कर हादसा का स्वरुप देने की चेष्टा की गई, वो दरअसल हत्या मे सहभागी मिली . पुलिस की जांच के बाद यह तथ्य सामने आ गया कि हत्या का मास्टर माइंड कोई औऱ नहीं, बल्कि उसी की पत्नी थी. जिसने अपने भाई के साथ मिलकर पति को मौत के घाट उतार दिया था.
कारण बना अवैध संबंध
और जैसा कि अक्सर हर अपराध के पीछे कोई एक कारण बड़ा गंभीर होता है इस सनसनीखेज हत्याकांड में भी
हत्या की वजह पत्नी का अवैध संबंध उजागर हुआ है. विगत 26 मई2020 को भटगांव थाना क्षेत्र के चुनगढी खोपा मार्ग में एसईसीएल में काम करने वाले भैयालाल साहू की लाश सड़क किनारे मिली थी. मृतक के सर पर चोट के निशान थे जिससे पुलिस को साफ जाहिर हो रहा था कि मामला हत्या का है. इस अंधे कत्ल की गुत्थी सुलझाने के लिए भटगांव पुलिस डाग स्क्वायड की मदद से जांच कर रही थी. पुलिस को पूछताछ करते करते भैयालाल की पत्नी तारा साहू पर शक हुआ, तो उससे भी पूछताछ पुलिस ने की.पुलिस की कड़ाई से पूछताछ में सप्ताह भर पश्चात आरोपी पत्नी तारा ने हत्या की अंततः स्वीकारोक्ति की.
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भाई का सहारा मिला
इस सनसनीखेज हत्याकांड में यह बात सामने आई कि तारा साहू ने अपने भाई विकास साहू को किसी तरह अपने साथ मिला लिया था.आरोपी तारा साहू ने इकबालिया बयान में बताया कि पति को उसके अवैध संबंध के बारे में खबर लग चुकी थी. जिसके कारण वह तारा से मारपीट किया करता था. इस कारण तारा अपने पति को रास्ते से हटाने के लिए विगत एक साल से मौका ढूंढ रही थी. 25 मई2020 की रात जब पति शराब के नशे में था, तब तारा ने अपने भाई विकास साहू को घर बुलाया, फिर पति को नशे की हालत में रात को कार में बैठा गांव से बाहर ले गए. गांव से दूर खोपा मार्ग में भैयालाल साहू को कार से उतारा गया, उसके बाद सर पर तवे से तबाड़तोड़ वार कर मौत के घाट उतार दिया गया . हत्या को हादसा बताने के लिए उसके शरीर पर वाहन चढ़ा दिया. जिससे मामला दुर्घटना का प्रतीत हो . मगर पुलिस की पारखी नजर मे उनकी यह चालाकी ज्यादा समय तक टिक नहीं पाई.
पुलिस अधीक्षक राजेश कुकरेजा ने अंधे कत्ल का खुलासा करते हुए बताया कि अवैध संबंध के चलते भैयालाल साहू की हत्या की गई . हत्या के आरोपी पत्नी तारा साहू और भाई विकास साहू को गिरफ्तार कर लिया गया है.
घड़ी की टिकटिक करती सुइयां 11 मार्च, 2020 को अलविदा कह कर अगली तारीख पर दस्तक दे चुकी थीं. प्रणव जैन और उस की नानी मनोरमा जैन रात का पहला पहर बीत जाने पर भी बेचैनी से घर में टहल रहे थे.
प्रणव रात 10 बजे से ही अपनी मां रिनी जैन को फोन पर फोन कर रहा था, लेकिन उन का फोन लगातार बंद जा रहा था. इस उम्मीद में कि शायद अब फोन औन हो गया होगा, वह दोबारा फोन करता. लेकिन दूसरी तरफ से वही स्विच्ड औफ की आवाज सुन कर दिल निराशा से भर उठता.
प्रणव और उस की नानी के मन में बुरेबुरे ख्याल आ रहे थे. मां के साथ किसी अनिष्ट की आशंका से ही प्रणव का पूरा शरीर सिहर जाता था.
रिनी जैन (42) अपनी मां मनोरमा जैन और बेटे प्रणव जैन के साथ दिल्ली से सटे गाजियाबाद में मोहननगर के पास स्थित गुलमोहर ग्रीन सोसायटी में जी-5 एए फ्लैट में रहती हैं.
उन का बेटा प्रणव डीएलएफ स्कूल में 12वीं का छात्र है. तलाकशुदा रिनी जैन के साथ उन की मां मनोरमा भी रहती हैं. रिनी जैन गाजियाबाद में इग्नू से संबद्ध एक इंस्टीट्यूट में इग्नू की तरफ से बतौर काउंसलर नियुक्त थीं. साधनसंपन्न परिवार था.
रिनी जैन जिदंगी को खुल कर जीने वाली महिला थीं, इसीलिए अपने परिचितों में वह एक बिंदास और शौकीन मिजाज महिला के रूप में जानी जाती थीं.
11 मार्च, 2020 की शाम साढ़े 7 बजे रिनी अपनी मां और बेटे से यह कह कर घर से निकली थीं कि उन की किसी के साथ मीटिंग है और वह साढे़ 9 या 10 बजे तक लौट आएंगी. रिनी जैन अपनी स्विफ्ट कार यूपी14सी बी3394 ले कर अपनी सोसाइटी से निकलीं और देर रात तक घर नहीं लौटीं तो उन के बेटे व मां को चिंता सताने लगी.
परेशानहाल उन के बेटे व मां ने ऐसे तमाम लोगों को फोन करना शुरू कर दिया, जो रिनी जैन के परिचित थे और वह अकसर उन से मिलतीजुलती रहती थीं.
लेकिन किसी के पास रिनी के बारे में कोई ठोस जानकारी नहीं थी. उन्होंने अपनी ही सोसाइटी गुलमोहर ग्रीन के 812 एए में रहने वाले अपने परिचित संदीप कौशिक को भी फोन कर के रिनी के बारे में जानना चाहा. उन्होंने बताया कि दिन में एक बार उन की रिनी से बात तो हुई थी, लेकिन बीते दिन मुलाकात नहीं हुई थी.
प्रणव जैन और उन की नानी मनोरमा जैन की रात आंखोंआंखों में ही कटी. जैसेतैसे सुबह हुई तो प्रणव सोचने लगा कि अब क्या किया जाए. लेकिन 12 मार्च को सुबह 8 बजे कालोनी में रहने वाले उस के अंकल संदीप उन के घर पहुंच गए.
परिवार का हमदर्द बना संदीप
संदीप ने आते ही प्रणव से रिनी जैन के बारे में सारी बात पूछी. प्रणव ने उन्हें बताया कि वह घर में 9 या 10 बजे तक लौटने की बात कह कर गई थीं. यह जान संदीप भी चिंतित हो उठे. आखिरकार तय हुआ कि रिनी के लापता होने की गुमशुदगी दर्ज करा दी जाए.
इस दौरान 1-2 रिश्तेदार भी रिनी के लापता होने की खबर पा कर उन के घर पहुंच गए थे.
गुलमोहर ग्रीन सोसाइटी थाना साहिबाबाद के अंतर्गत आती है. प्रणव जैन रिश्तेदारों और संदीप कौशिक को ले कर सुबह करीब 10 बजे साहिबाबाद थाने पहुंच गए.
साहिबाबाद थाने के एसएचओ अनिल कुमार शाही, एडीशनल एसएचओ मुकेश कुमार तथा एसएसआई प्रमोद कुमार उस वक्त किसी मसले पर मंत्रणा कर रहे थे.
संदीप कौशिक के साथ साहिबाबाद थाने पहुंचे प्रणव जैन ने इंसपेक्टहर शाही को बताया कि उन की मां रिनी जैन बीती शाम से अपनी कार समेत लापता हैं और उन का मोबाइल फोन भी बंद है.
प्रणव जैन ने अपनी मां के साथ किसी अनहोनी की आशंका जताई, तो इंसपेक्टर शाही ने रिनी जैन का एक फोटो ले कर उन की गुमशुदगी की रिपोर्ट दर्ज करवा दी. साथ ही उन्होंने रिनी के हुलिए की जानकारी देते हुए जिले के सभी थानों और पूरे एनसीआर में वायरलैस पर उन की गुमशुदगी की सूचना प्रसारित करवा दी.
उसी दिन सिहानी गेट कोतवाली क्षेत्र में भट्ठा नंबर 5 के पास झाडि़यों में एक महिला का खून से लथपथ शव मिला था. उस के सिर में शायद गोली लगी थी. सिहानी गेट थाने की पुलिस ने उस अज्ञात महिला के शव के मिलने की जानकारी वायरलैस पर प्रसारित कराई थी.
वायरलैस पर मिली इस जानकारी से साहिबाबाद थाने की पुलिस को वह शव रिनी जैन का होने की आशंका हुई. इसलिए उसी दिन दोपहर में साहिबाबाद थाने के एसएसआई प्रमोद कुमार प्रणव जैन को साथ ले कर पहले सिहानी गेट थाने गए और फिर गाजियाबाद मोर्चरी पहुंचे.
सोसाइटी में रहने वाले फैमिली फ्रैंड संदीप कौशिक प्रणव के साथ थे. मोर्चरी में रखा महिला का शव बुरी तरह खून से लथपथ था. इस के बावजूद प्रणव शव को देखते ही फफकफफक कर रोने लगा. वह शव उस की मां का ही था.
प्रणव जैन ने पुलिस को बता दिया कि शव उस की मां का ही है. शव की शिनाख्त हो गई थी. लिहाजा एसपी (सिटी) मनीष कुमार मिश्रा के आदेश पर सिहानी गेट पुलिस ने अज्ञात महिला की हत्या के दर्ज मामले को उसी दिन साहिबाबाद पुलिस के सुपुर्द कर दिया.
साहिबाबाद पुलिस ने निरीक्षण में पाया कि सिर पर वार कर हत्या करने के बाद शव को झाड़ी में फेंका गया था. महिला का मोबाइल व स्विफ्ट डिजायर कार गायब थी. रिनी अपने बेटे से पार्टी में जाने की बात कह कर घर से निकली थी. साहिबाबाद पुलिस ने 12 मार्च को ही रिनी जैन की गुमशुदगी के मामले को भादंसं की धारा 302 यानी हत्या के रूप में दर्ज कर लिया.
चूंकि मामला हत्या जैसे गंभीर अपराध का था, इसलिए इस मामले की जांच का दायित्व इंसपेक्टर इन्वैस्टीगेशन मुकेश कुमार के सुपुर्द कर दिया गया.
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मामला एक सभ्रांत परिवार की हाईप्रोफाइल महिला की हत्या का था, इसलिए गाजियाबाद के एसएसपी कलानिधि नैथानी ने भी इस पर तत्काल संज्ञान लिया और एसपी (सिटी) को निर्देश दिया कि घटना का जल्द से जल्द खुलासा करें.
एसपी (सिटी) ने उसी दिन बौर्डर इलाके के सीओ डा. राकेश कुमार मिश्रा की निगरानी में थानाप्रभारी अनिल कुमार शाही, जांच अधिकारी इंसपेक्टर मुकेश कुमार, एसएसआई प्रमोद कुमार, सबइंसपेक्टर राजीव बालियान, नरेंद्र सिंह, हैडकांस्टेबल नाहर सिंह, कांस्टेबल सुजय कुमार, संजीव कुमार, ललित कुमार, सुनील कुमार और अनुज कुमार की टीम का गठन कर दिया और खुद जांच की मौनिटरिंग करने लगे.
जीवित गई रिनी लाश बन कर लौटी
थानाप्रभारी अनिल कुमार शाही ने उसी शाम को मृतका रिनी जैन के शव का पोस्टमार्टम करवा कर शव को उस के घर वालों के सुपुर्द करवा दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि रिनी जैन की मौत उन के सिर में 2 गोली लगने से हुई थी.
साथ ही उन के शव पर कई जगह चोट के निशान भी मिले थे. चूंकि रिनी जैन का मोबाइल व स्विफ्ट डिजायर कार गायब थी, इसलिए पुलिस को पहली नजर में लगा कि ये मामला लूटपाट के विरोध में हुई हत्या का हो सकता है.
हालांकि पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने तक पुलिस को शक था कि कहीं रिनी जैन की हत्या दुष्कर्म करने के बाद न की गई हो. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह शक गलत निकला.
पुलिस को एक शक यह भी था कि इस वारदात के पीछे उन के किसी परिचित का हाथ न रहा हो. क्योंकि मोहननगर में रहने वाली रिनी जैन का शव राजनगर एक्सटेंशन से लगे भट्ठा नंबर 5 के इलाके में मिलना यह दर्शाता था कि वहां तक वह किसी परिचित के साथ ही आई होंगी. क्योंकि उस इलाके में आमतौर पर कोई अपनी मरजी से घूमने नहीं आता.
पुलिस को यकीन था कि रिनी जैन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाने से कातिल तक पहुंचने में मदद मिल सकती है. इसलिए थानाप्रभारी अनिल कुमार शाही ने रिनी जैन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवा कर उस की पड़ताल शुरू करा दी, जिस से यह साफ हो गया कि रात के 10 बजे जब रिनी जैन का मोबाइल बंद हुआ था, तो उस की आखिरी लोकेशन राजनगर एक्सटेंशन की थी.
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पुलिस ने जब उस के मोबाइल की काल डिटेल्स तथा शाम 6 बजे से उस के मोबाइल की लोकेशन को चैक करने का काम शुरू किया तो रिनी जैन के कातिल का चेहरा बेनकाब होता चला गया.
पुलिस ने मोबाइल की टैक्निकल सर्विलांस और कुछ सीसीटीवी फुटेज का सहारा लेने के बाद आखिरकार 14 मार्च की सुबह कातिल को पकड़ने के लिए जाल बिछा दिया.
थाना साहिबाबाद के प्रभारी अनिल कुमार शाही ने गठित की गई पुलिस टीम के साथ 14 मार्च को राजनगर एक्सटेंशन में घेराबंदी कर दी और किसी का इंतजार करने लगे. आखिरकार थोडे़ इंतजार के बाद 2 लोग रिनी जैन की कार में बैठे हुए राजनगर एक्सटेंशन से गाजियाबाद की तरफ जाते दिखे.
जब उस गाड़ी को रोका गया, तो उस में सवार व्यक्ति को देख कर पुलिस टीम की बांछें खिल गईं. क्योंकि उस व्यक्ति को पकड़ने के लिए ही टीम ने जाल बिछाया था. वह शख्स कोई और नहीं, रिनी जैन की सोसाइटी में रहने वाला उन का फैमिली फ्रैंड संदीप कौशिक और उस की पत्नी प्रीति त्यागी थे.
संदीप की पत्नी प्रीति त्यागी न्यू देहली इंस्टीट्यूट औफ मैनेजमेंट, ओखला में विजिटिंग प्रोफेसर थी. वे दोनों जिस स्विफ्ट कार में सवार हो कर राजनगर एक्सटेंशन से गाजियाबाद की तरफ जा रहे थे, वह रिनी जैन की थी, जो लापता थी. पुलिस ने जब उस कार की तलाशी ली तो उस में रिनी जैन की हत्या में प्रयुक्त 6.35 बोर का रशियन पिस्टल बरामद हुआ.
इस मामले में अब तक पीडि़त परिवार के साथ उन का हमदर्द बन कर पुलिस को चकरघिन्नी की तरह घुमा रहे संदीप और उस की पत्नी के चोरी पकड़े जाते ही होश उड़ गए.
दोनों को रिनी जैन की कार समेत थाने लाया गया. एसपी (सिटी) मनीष कुमार और सीओ डा. राकेश कुमार मिश्रा भी साहिबाबाद पहुंच गए.
जब पुलिस ने सख्ती के साथ रिनी जैन की हत्या के बारे में संदीप और प्रीति से पूछताछ की, तो हत्याकांड के सारे राज बेपरदा होते चले गए.
अपने खुले विचारों के कारण रिनी जैन का अपने पति से 2004 में तलाक हो चुका था. पति से तलाक के बदले उसे अच्छीखासी रकम मिली थी.जिस के सहारे रिनी जैन कुछ साल तक गाजियाबाद के कविनगर में रहते हुए अपने बेटे को पालने लगी. साथ में उन की मां रहने लगी थी.
2014 में रिनी जैन की जिंदगी में तब अचानक बदलाव आया जब संदीप कौशिक से उस की जानपहचान हुई.
लेखक- अभिजीत माथुर
मैं घर के कामों से फारिग हो कर सोने की सोच ही रही थी कि फोन की घंटी घनघना उठी. मैं ने बड़े बेमन से रिसीवर उठाया व थके स्वर से कहा, ‘‘हैलो.’’
उधर से अपनी सहेली अंजु की आवाज सुन कर मेरी खुशी की सीमा नहीं रही.
‘‘यह हैलोहैलो क्या कर रही है,’’ अंजु बोली, ‘‘मैं ने तो तुझे एक खुशखबरी देने के लिए फोन किया है. तेरे भैया शैलेंद्र की 24 जून की शादी पक्की हो गई है. कल ही शैलेंद्र भैया कार्ड दे कर गए हैं. तुझे भी शादी में आना है, तू आएगी न?’’
यह सुन कर मैं हड़बड़ा गई और झूठ ही कह दिया, ‘‘हां, क्यों नहीं आऊंगी, मैं जरूर आऊंगी. भाई की शादी में बहन नहीं आएगी तो कौन आएगा. मैं तेरे जीजाजी के साथ जरूर आऊंगी.’’
अंजु बोली, ‘‘ठीक है, तू जरूर आना, मैं तेरा इंतजार करूंगी,’’ यह कह कर अंजु ने फोन रख दिया.
फोन रखने के बाद मैं सोच में पड़ गई कि क्या मैं वाकई शादी में जा पाऊंगी? शायद नहीं. अगर मैं जाना भी चाहूं तो अखिल मुझे जाने नहीं देंगे. हमारी शादी के बाद अखिल ने जो कुछ झेला है वह उसे कैसे भूल सकते हैं.
मैं ने व अखिल ने 2 साल पहले घर वालों की इच्छा के खिलाफ कोर्ट में प्रेमविवाह किया था. मेरे घर वाले मेरे प्रेमविवाह करने पर काफी नाराज थे. उन्होंने मुझ से हमेशा के लिए रिश्ता ही तोड़ दिया था. वे अखिल को बिलकुल भी पसंद नहीं करते थे. हम विवाह के बाद घर वालों का आशीर्वाद लेने गए थे, पर हमें वहां से बेइज्जत कर के निकाल दिया गया था. तब से ले कर आज तक मैं ने व अखिल ने उस घर की दहलीज पर पैर नहीं रखा है.
मैं धीरेधीरे अपने इस संसार में रमती गई और अखिल के प्यार में पुरानी कड़वी यादें भूलती गई पर आज अंजु के फोन ने मुझे फिर उन्हीं यादों के भंवर में ला कर खड़ा कर दिया, जहां से मैं हमेशा दूर भागना चाहती थी. मैं सोच रही थी कि आखिर मैं ने ऐसा क्या किया है जो मेरे घर वाले मुझ से इतने खफा हैं कि उन्होंने मुझे शैलेंद्र भैया की शादी की सूचना तक नहीं दी. क्या मैं ने अखिल से प्रेमविवाह कर इतनी भारी भूल की है कि मेरा उस घर से रिश्ता ही तोड़ दिया, जिस घर में मैं पली और बड़ी हुई. उस भाई से नाता ही टूट गया जिसे मैं सब से ज्यादा चाहती थी, जिस से मैं लड़ कर हक से चीज छीन लिया करती थी.
क्याक्या सपने संजोए थे मैं ने शैलेंद्र भैया की शादी के कि यह करूंगी, वह करूंगी, पर सारे सपने धराशायी हो गए. मैं भैया की शादी में जाना तो दूर, जाने की सोच भी नहीं सकती थी.
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मैं दिन भर इसी ऊहापोह में रही कि इस बारे में अखिल को कहूं या नहीं.
शाम को अखिल के आने के बाद मैं ने बड़ी हिम्मत जुटा कर उन से शैलेंद्र भैया की शादी के बारे में कहा तो अखिल ने आराम से मेरी बातें सुनीं फिर मुसकराते हुए बोले, ‘‘अरे, वाह, मेरे साले की शादी है, तब तो हमें जरूर चलना चाहिए.’’
मैं ने कहा, ‘‘अखिल, कोई कार्ड या कोई संदेश नहीं आया है. यह तो मुझे अंजु ने फोन पर बताया है.’’
यह सुन अखिल कुछ सोच कर बोले, ‘‘तब तो हमारा न जाना ही ठीक है.’’
मैं अखिल के मुंह से यह सुन कर उदास हो गई और पूरी रात गुमसुम सी रही. अखिल कुछ कहते तो मैं केवल हूंहां में जवाब दे देती.
अगले दिन अखिल के आफिस जाने के बाद मेरा किसी काम में मन नहीं लगा और मैं घुटघुट कर रोए जा रही थी. बाहर से घंटी की आवाज सुन कर मैं दौड़ती हुई फाटक तक जाती कि शायद पोस्टमैन आया हो और शैलेंद्र भैया की शादी का कार्ड आया हो. फोन की घंटी बजने पर मैं सोचती, शायद ताऊजी या पापा का हो पर ऐसा कुछ नहीं था. मैं 3-4 दिन तक ऐसे ही रही थी. अखिल मेरा यह हाल रोज देखते और शायद परेशान होते.
एक रात अखिल मेरी उदासी से परेशान हो कर बोले, ‘‘बीना, क्या तुम शैलेंद्र भैया की शादी में शरीक होना चाहती हो?’’
मैं तो जैसे यह सुनने को तरस रही थी. बोली, ‘‘हां, अखिल, मैं अपने शैलेंद्र भैया को दूल्हा बने देखना चाहती हूं. मेरी यह दिली इच्छा थी कि मैं अपने भाई की शादी में खूब मौजमस्ती करूं. प्लीज, अखिल, शादी में चलो न. मैं एक बार भैया को दूल्हे के रूप में देखना चाहती हूं.’’
‘‘ठीक है, फिर हम तुम्हारे शैलेंद्र भैया की शादी में जरूर शरीक होंगे,’’ अखिल बोले, ‘‘मैं तुम्हारी यह ख्वाहिश जरूर पूरी करूंगा. लेकिन बीना, मेरी एक शर्त है.’’
‘‘शैलेंद्र भैया की शादी में जाने के लिए मुझे हर शर्त मंजूर है,’’ मैं खुशी से पागल होते हुए बोली.
‘‘बीना, हम तुम्हारे घर पर नहीं बल्कि वहां किसी होटल में रुकेंगे.’’
मैं ने कहा, ‘‘ठीक है.’’
24 जून को मैं व अखिल जयपुर के लिए रवाना हो गए. मैं पूरे रास्ते सपने संजोती रही कि मैं वहां यह करूंगी, वह करूंगी. हमें देख सब खुश होंगे. खुशी के मारे मुझे पता ही नहीं चला कि रास्ता कैसे कटा.
जयपुर पहुंचते ही होटल के कमरे में सामान रखने के बाद मैं फटाफट तैयार होने लगी. अखिल मुझे यों उतावले हो कर तैयार होते पहली बार देख रहे थे. उन की आंखों में उस दिन पहली बार मैं ने दर्द देखा था. मैं इतनी जल्दी तैयार हो गई तो अखिल बोले, ‘‘हमेशा डेढ़ घंटे में तैयार होने वाली तुम आज पहली बार 10 मिनट में तैयार हुई हो, वाकई घर वालों से मिलने के लिए कितनी बेकरार हो.’’
मैं ने कहा, ‘‘अब ज्यादा बातें मत करो, प्लीज, जल्दी टैक्सी ले आओ.’’
अखिल टैक्सी ले आए. मैं पूरे रास्ते घबराती रही कि पता नहीं वहां क्या होगा. मेरा दिल आने वाले हर पल के लिए घबरा रहा था.
हम घर पहुंचे तो हमें आया देख कर सब आश्चर्यचकित हो गए. शायद किसी को हमारे आने का गुमान नहीं था. सब हमें किसी अजनबी की तरह देख रहे थे. मैं 2 साल बाद अपने घर आई थी, पर वहां मुझे कुछ भी बदलाव नजर नहीं आया. सबकुछ वैसा ही था जैसा मैं छोड़ कर गई थी. बस, बदले नजर आ रहे थे तो अपने लोग जो मुझे एक अजनबी की तरह देख रहे थे. हां, मेरे छोटे भाईबहन मुझे व अखिल को घेर कर खड़े थे. कोई कह रहा था, ‘‘दीदी, आप कहां चली गई थीं? आप व जीजाजी अब कहीं मत जाना.’’
मैं बच्चों से बातें करने में व्यस्त हो गई. अखिल मेरी तरफ देख चुपचाप एक कुरसी पर जा कर बैठ गए. मैं ने देखा वह डबडबाई आंखों से मुझे देखे जा रहे थे.
मैं ने बूआजी के लड़के राकेश को चुपचाप शैलेंद्र भैया को बुलाने भेजा. शैलेंद्र भैया 15-20 मिनट तक नहीं आए तो मैं ने सोचा शायद वह हम से मिलना नहीं चाहते हैं. मैं अपने को कोस रही थी कि क्यों मैं ने यहां आने की जिद की. मैं फालतू ही यहां अपनी व अखिल की बेइज्जती कराने आ गई. मैं तो कितना चाव ले कर यहां आई थी पर इन लोगों को हमारे आने की जरा भी खुशी नहीं है. मैं समझ गई कि यहां कोई हमारी इज्जत नहीं करेगा. मैं ने वहां से वापस जाने की सोची.
मैं हारी हुई लुटेपिटे कदमों से अखिल के पास जा ही रही थी कि पीछे से आवाज आई, ‘‘बीनू.’’
मैं ने पलट कर देखा तो राकेश के साथ शैलेंद्र भैया खड़े थे. मैं भैया के पांव छूने झुकी तो उन्होंने मुझे गले लगा लिया. मैं रोने लगी. भैया भी रोने लगे और बोले, ‘‘कैसी है री, तू? मुझे अभीअभी पता चला कि तू आ चुकी है. मैं सब की नजर बचा कर दौड़ादौड़ा तेरे पास चला आया. अच्छा हुआ, अंजु ने तुझे सही समय पर सूचित कर दिया, नहीं तो मैं सोच रहा था कि पता नहीं अंजु तुझे कहेगी भी या नहीं.’’
मैं बोली, ‘‘तो क्या आप ने अंजु को कहा था मुझे कहने के लिए?’’
भैया बोले, ‘‘हां…तू क्या सोचती है, तेरा भाई इतना निष्ठुर है कि अपनी प्यारी बहन को भूल जाए और अकेला जा कर शादी कर आए. अंजु को मैं ने ही कहा था कि वह तुझे जरूरजरूर किसी भी हालत में आने को कहे.’’
मैं बोली, ‘‘पर मुझे अंजु ने यह तो नहीं कहा था कि उसे आप ने बोला है मुझे आने के लिए.’’
भैया बोले, ‘‘उसे मैं ने ही मना किया था कि मेरा नाम नहीं ले क्योंकि मैं तुझे कहने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था. तेरे आने से मुझे तसल्ली है. तू मुझ से एक वादा कर, अब तुझे कोई कुछ भी कहे तू अपने भाई को छोड़ कर नहीं जाएगी.’’
मैं ने कहा, ‘‘ठीक है भैया, अब तो आप की खातिर सब सह लूंगी.’’
भैया बोले, ‘‘अखिल कहां हैं…मुझे उन से मिला तो सही.’’
भैया को मैं ने अखिल से मिलवाया तो भैया हाथ जोड़ कर अखिल से बोले, ‘‘अखिल, आप ने अच्छा किया जो मेरी बहन को आज के दिन ले आए. मैं आप का आभारी हूं. आप को शायद मैं अच्छी तरह अटेंड न कर पाऊं पर प्लीज, आप कहीं मत जाना, चाहे परिवार का कोई कुछ भी कहे.’’
अखिल बोले, ‘‘भाई साहब, आज तो हम आए ही आप की खातिर हैं, जैसा आप कहेंगे वैसा ही करेंगे.’’
भैया बोले, ‘‘अखिल, मैं अभी आता हूं. आप लोग यहीं रुकें.’’
फिर मैं व अखिल एकांत में कुरसी पर बैठ गए. मैं अखिल को अपने घर के बारे में, अपनी बचपन में की गई शरारतों के बारे में बताने लगी.
हमारे यहां रस्म है कि दोपहर में दूल्हे की एक आरती उस की बड़ी बहन करती है. वह रस्म जब होने जा रही थी तो मैं व अखिल चुपचाप कुरसी पर बैठे उसे देख रहे थे. मेरे पापा ने उस रस्म के लिए मेरी छोटी बहन शालिनी को आवाज लगाई तो शैलेंद्र भैया बोले, ‘‘पापा, बीना के यहां होते शालिनी कैसे आरती करेगी? क्या कभी शादीशुदा बहन के होते छोटी बहन आरती करती है? आरती तो बीना ही करेगी,’’ ऐसा कह कर भैया ने मुझे आवाज दी, ‘‘बीनू, यहां आओ, तुम्हें कसम है.’’
संदीप कौशिक रेस्तरां चलाता था. उस के परिवार में पत्नी प्रीति कौशिक के अलावा एक बेटी थी, जो लगभग प्रणव जैन की उम्र की ही थी.
2014 में जब संदीप की बेटी और रिनी जैन का बेटा गाजियाबाद के राजेंद्रनगर स्थित डीएलएफ स्कूल में एक साथ पढते थे, तभी रिनी जैन और संदीप की एकदूसरे से जानपहचान हुई थी. दोनों ही अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने जाते थे. बाद में वे टीचर पेरैंट्स मीटिंग में भी मिलने लगे.
रिनी ने संदीप में ढूंढा पति का प्यार
कुछ समय बाद दोनों एकदूसरे के आकर्षण में बंध गए. पति से तलाक के बाद अकेले रह गई रिनी जैन को किसी ऐसे मर्द की जरूरत थी, जो उस के तन की प्यास बुझाने के साथ उस की भावनाओं को भी समझता हो. संदीप में उसे वे सारे गुण दिखे. फलस्वरूप दोनों के बीच नाजायज रिश्ते बन गए. जल्द ही दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना भी शुरू हो गया. हालांकि संदीप ने अपनी पत्नी से रिनी जैन से अपने असली रिश्ते की बात छिपा ली थी.
रिनी जैन संदीप को बेपनाह प्यार करती थी. संदीप भी उस के हर दुखदर्द में बढ़चढ़ कर उस का साथ देता था. देखतेदेखते कई साल गुजर गए. दोनों के बच्चे भी जवानी की दहलीज पर कदम रख चुके थे.
संदीप की बेटी और रिनी का बेटा प्रणव डीएलएफ स्कूल में ही कक्षा 12 में साथ पढ़ रहे थे. 2 साल पहले रिनी जैन ने भी संदीप जैन की ही गुलमोहर ग्रीन सोसायटी में फ्लैट ले लिया और वहां आ कर रहने लगी. इस दौरान दोनों के संबंध और भी ज्यादा प्रगाढ़ हो गए.
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इधर रिनी जैन ने एक साल पहले संदीप के राजेंद्रनगर स्थित रेस्तरां अमिगो में कुछ पैसा भी इनवैस्ट किया था. एक तरह से वह रेस्तरां में उस क ी साइलेंट पार्टनर बन गई थी.
लेकिन एकदूसरे के साथ घूमनेफिरने और गाढ़ी दोस्ती के कारण अब लोग दोनों के संबंधों पर अंगुलियां उठाने लगे थे. रिनी जैन की कई महिला दोस्त तो उसे सलाह देने लगीं कि वह संदीप की इतनी मदद करती है, तो उस से शादी क्यों नहीं कर लेती. जब कई लोगों ने रिनी को ऐसी सलाह दी तो करीब 10 महीना पहले रिनी जैन ने संदीप पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह उस के साथ शादी कर लें.
शुरू में तो संदीप रिनी की बातों को हंसी में कही गई बात मान कर टालता रहा. लेकिन कुछ दिनों बाद जब उस ने ज्यादा दबाव बनाना शुरू किया तो संदीप को उस से कहना पड़ा, ‘‘यार, जब हम दोनों रिलेशनशिप में आए थे तो दोनों के बीच ऐसा कुछ तय नहीं हुआ था कि शादी करेंगे.’’
‘‘हां, तय नहीं हुआ था. लेकिन अब मैं कह रही हूं कि तुम्हें मुझ से शादी करनी पडे़गी.’’ रिनी ने धमकी भरे लहजे में कहा.
‘‘चलो तुम्हारी बात मान भी लूं तो अपने परिवार का क्या करूंगा. मेरी पत्नी तो मुझे जेल भिजवा देगी.’’ संदीप ने रिनी को अपनी मजबूरी समझाते हुए कहा.
‘‘अगर तुम उसे नहीं मना सकते तो उस की हत्या कर दो, लेकिन तुम्हें हर हाल में मुझ से शादी करनी पड़ेगी.’’
उस दिन रिनी ने संदीप को अंतिम चेतावनी देने के साथ जब संदीप को उस की पत्नी की हत्या करने का सुझाव दिया तो वह कांप उठा.
संदीप को लगा कि रिनी बहुत जहरीली औरत है. आखिर 2 महीने पहले संदीप कौशिक ने अपनी पत्नी प्रीति त्यागी को रिनी जैन के साथ अपने रिलेशन की बात बता दी और यह भी बता दिया कि रिनी जैन उस पर शादी का दबाव बना रही है. वह कह रही है कि अगर तुम इस के लिए तैयार नहीं हो तो मैं तुम्हारी हत्या कर दूं.
पति के मुंह से उस के अवैध संबधों की बात सुन कर प्रीति को गुस्सा भी आया और संदीप से जम कर झगड़ा भी हुआ. लेकिन जब प्रीति को इस बात का अहसास हुआ कि संदीप उस से इतना प्यार करता है कि उस की हत्या की बात आने पर उस ने रिनी से अपने संबधों तक की बात उसे बता दी.
इस के बाद संदीप और प्रीति योजना बनाने लगे कि उन्हें रिनी जैन से किस तरह निबटना है. दोनों ने रिनी पर यह जाहिर नहीं होने दिया कि उन्होंने एकदूसरे को सब कुछ बता दिया है.
लेकिन कुछ समय पहले से रिनी ने संदीप पर कुछ ज्यादा ही दबाव बनाना शुरू कर दिया. लिहाजा संदीप को कहना पड़ा कि वह अपने ही हाथों से अपनी पत्नी की हत्या नहीं कर सकता. अगर वह ऐसा करेगा तो वह पुलिस की पकड़ में आ जाएगा.
लेकिन रिनी पर तो किसी भी तरह संदीप को पाने का जुनून सवार था. लिहाजा उस ने संदीप को धमकी दी कि वह 17 मार्च से पहले अपनी पत्नी को मार दे, नहीं तो वह 17 मार्च को संदीप के घर पहुंच कर खुद उस की हत्या कर देगी.
उस ने संदीप से कहा कि वह उस दिन अपने घर के सारे सीसीटीवी कैमरे जरूर बंद कर दे ताकि उस के घर में जाने का कोई सबूत रिकौर्ड में ना आए. रिनी का इरादा था कि प्रीति की हत्या के कुछ दिन बाद दोनों शादी कर लेंगे.
रिनी की धमकी भारी पड़ी
रिनी जैन की ये धमकी सुन कर संदीप बुरी तरह डर गया और उस ने प्रीति को यह बात भी बता दी. दोनों ने योजना बनाई कि अगर रिनी की इस धमकी से बचना है तो उसे रास्ते से हटाना होगा. बस संदीप ने रिनी की हत्या की साजिश का तानाबाना बुन लिया.
संदीप ने कुछ दिन पहले से ही रिनी के दिलोदिमाग में यह बात बैठा दी थी कि वह 17 तारीख तक अपनी पत्नी प्रीति की हत्या कर देगा. लेकिन इस से पहले संदीप ने रिनी को रेस्टोटरेंट का काम बढ़ाने के लिए 3 लाख रुपए देने के लिए मना लिया. रिनी ने उस से कहा कि वह 11 मार्च को रकम का इंतजाम कर देगी.
रिनी जैन के पास इतनी बड़ी रकम नहीं थी, उस ने अपने एक दोस्त से 3 लाख रुपए उधार ले लिए. रकम का इंतजाम होने के बाद उस ने 11 मार्च की शाम को 5 बजे संदीप को फोन किया कि पैसे का इंतजाम हो गया है, वह रकम देने के लिए कहां मिले.
संदीप ने प्रीति को मिलने के लिए रेस्टोरेंट की जगह राजेंद्रनगर में एक क्लब के पास बुलाया. रिनी जब अपनी कार से वहां पहुंची तो संदीप पहले से उस का इंतजार कर रहा था. संदीप ने रिनी से घूमने चलने के लिए कहा. इस के बाद दोनों रिनी की कार से ही घूमते रहे.
लेकिन इस से पहले संदीप ने साजिश के तहत अपनी पत्नी प्रीति को अपना मोबाइल दे कर दिल्ली भेज दिया, ताकि उस की लोकेशन वहां की मिले. कुछ देर तक दोनों कार में ही ड्रिंक करते रहे.
रात करीब साढे़ 9 बजे संदीप ने रिनी से गाड़ी में ही सैक्स करने की फरमाइश की तो रिनी ने कार को किसी सुनसान इलाके में ले चलने को कहा. जिस के बाद संदीप रिनी की कार को ड्राइव करते हुए भट्ठा नंबर 5 पर सुनसान जगह ले आया.
वहां पूरा सन्नाटा देख कर संदीप ने बहाने से उसे कार से नीचे उतारा. इसी दौरान पीछे से छोटी रशियन पिस्टल से उस के सिर में 2 गोलियां मार दीं. इस के बाद संदीप ने रिनी का मोबाइल बंद कर दिया और वहां से निकल गया.
संदीप ने कार के पेपर हिंडन पुल के पास नदी में फेंक दिए और रिनी की कार, हत्या में प्रयुक्त पिस्टल व रकम के साथ गुलमोहर गार्डन में अपने एक परिचित के पास छोड़ दिया. बाद में वह कैब से घर आ गया. अगले दिन रिनी के बेटे के साथ हमदर्दी जताते हुए वह साहिबाबाद थाने में रिपोर्ट दर्ज करवाने पहुंच गया.
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खुल गया पूरा राज
दरअसल, पुलिस को संदीप कौशिक पर शक इसलिए हुआ क्योंकि जब रिनी जैन के मोबाइल की काल डिटेल्स निकाली गई तो दोनों के बीच हर रोज कई बार लंबीलंबी बातचीत के रिकौर्ड मिले. इन काल रिकौर्ड से साफ हो गया कि दोनों के बीच सिर्फ फैमिली फ्रैंड वाले रिश्ते नहीं हैं.
संदीप पर शक का एक कारण यह भी था कि उस ने पुलिस को यह बात नहीं बताई थी कि वारदात वाले दिन सुबह से ले कर शाम 5 बजे तक उस की रिनी जैन से छह बार बात हुई थी. इस के अलावा पुलिस को उन के बीच वाट्सऐप चैट के भी सबूत मिले.
हालांकि पुलिस की सामान्य पूछताछ में संदीप ने यही बताया था कि वारदात वाली रात को साढे़ 10 बजे तक वह अपने रेस्तरां पर था. लेकिन जब उस के मोबाइल की लोकेशन निकाली गई तो 6 बजे के बाद उस के मोबाइल की लोकेशन दिल्ली के कनाट प्लेस में मिली. बस इसी से पुलिस को उस पर शक हो गया.
इस के अलावा पुलिस ने शाम को 7 बजे से उस पूरी रात में गुलमोहर ग्रीन सोसाइटी के साथ आसपास की सोसाइटी के करीब 100 से 200 सीसीटीवी की जांच की थी.
इन्हीं कैमरों की फुटेज में संदीप गुलमोहर गार्डन अपार्टमेंट में रिनी जैन की कार को पार्किंग में ले जाते हुए और उसे पार्क करते दिखा था.
इस के बाद पुलिस ने संदीप कौशिक के मोबाइल को निगरानी में ले लिया और उस की हर गतिविधि को वाच किया जाने लगा. बस संदीप पर शक के पुख्ता होते ही पुलिस ने उसे पकड़ने का जाल बिछाया और उसे तब गिरफ्तार कर लिया जब वह अपनी पत्नी के साथ कार को ठिकाने लगाने के लिए ले जा रहा था.
विस्तृत पूछताछ के बाद संदीप ने अपने घर में रखे 3 लाख रुपए भी बरामद करवा दिए जो उस ने हत्या के बाद रिनी जैन से लूटे थे. पुलिस ने हत्या की साजिश में शामिल होने के आरोप में संदीप की पत्नी प्रीति त्यागी को भी संदीप के साथ सक्षम न्यायालय में पेश किया, जहां से दोनों को न्यायिक हिरासत में डासना जेल भेज दिया गया.
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– कथा पुलिस की जांच व आरोपियों के बयान पर आधारित है
लेखक- अभिजीत माथुर
यह सुन कर मेरी एकदम रुलाई फूट गई. मुझे यों अपमानित होते देख अखिल मेरे पास आए और बोले, ‘‘चलो, बीना, चलो यहां से. मैं तुम्हारी और बेइज्जती होते नहीं देख सकता.’’
यह सुन कर पापा बोले, ‘‘हां, हां…चले जाओ यहां से. वैसे भी यहां तुम्हें बुलाया किस ने है?’’
अखिल बोले, ‘‘आप ने हमें नहीं बुलाया लेकिन हम यहां इसलिए आए हैं क्योंकि बीना अपने भाई को दूल्हा बने देखना चाहती थी और मैं यहां इस की वह इच्छा पूरी करने आया था, पर मुझे क्या पता था कि यहां इस की इतनी बेइज्जती होगी.
‘‘अरे, आप को बेइज्जती करनी थी तो मेरी की होती. गुस्सा निकालना था तो मुझ पर निकाला होता, दोषी तो मैं हूं. इस मासूम का क्या कुसूर है? आप लोगों के लिए पराया तो मैं हूं, यह तो आप लोगों की अपनी है. आप के घर की बेटी है, आप का खून है. क्या खून का रिश्ता इतनी जल्दी मिट जाता है कि अपनी जाई बेटी पराई हो जाती है?
‘‘मैं इस के लिए पराया हो कर भी इसे अपना सकता हूं और आप लोग इस के अपने हो कर भी इसे दुत्कार रहे हैं. मैं पराया हो कर भी इस की खुशी, इस की इच्छा की खातिर अपनी बेइज्जती कराने यहां आ सकता हूं और आप लोग इस के अपने हो कर भी इस की बेइज्जती कर रहे हैं. इस की खुशी, इस की इच्छा की खातिर थोड़ा सा समझौता नहीं कर सकते. यह बेचारी तो कितने सपने संजो कर यहां आई है. कितने अरमान होंगे इस के दिल में अपने भाई की शादी के, पर आप लोगों को इस से क्या? आप लोग तो अपनी झूठी इज्जत, मानमर्यादा के लिए उन सब का गला घोटना चाहते हैं.
‘‘मैं पराया हो कर भी इसे 2 साल में इतना प्यार दे सकता हूं और आप जिन्होंने इसे बचपन से अपने पास रखा उसे जरा सा प्यार नहीं दे सकते. इस का गुनाह क्या है? यही न कि इस ने आप लोगों की इच्छा से, आप की जाति के लड़के से शादी न कर मुझ जैसे दूसरी जाति के लड़के से शादी की. इस का यह गुनाह इतना बड़ा तो नहीं है कि इसे हर पल, हर घड़ी बेइज्जत किया जाए. इस ने जो कुछ अपनी खुशी, अपनी जिंदगी के लिए किया वह इतना बुरा तो नहीं है कि जिस के लिए बेइज्जत किया जाए और रिश्ता तोड़ दिया जाए.’’
मैं आज अखिल को ऐसे बेबाक बोलते पहली बार देख रही थी. मैं अखिल को अपलक देखे जा रही थी.
अखिल फिर बोले, ‘‘आप शायद नहीं जानते कि यह आप लोगों को कितना प्यार करती है? आप लोग सोचते हैं कि इस ने आप की इच्छा के खिलाफ शादी की है तो यह आप लोगों की भूल है. यह आप लोगों को उतना नहीं, उस से भी कहीं ज्यादा प्यार करती है, जितना हमारी शादी से पहले करती थी.
‘‘यह पिछले 2 साल से मेरे साथ रह रही है. मैं इसे भरपूर प्यार देता हूं, कभी किसी बात की तकलीफ नहीं होने देता, फिर भी कभीकभी यह आप लोगों की याद में इतनी बेचैन हो जाती है कि रोने लग जाती है और खानापीना छोड़ कर खुद अपने को आप का गुनाहगार मानती है. कहने को यह आप लोगों से दूर है, पर इस का दिल, इस का मन तो आप लोगों के पास ही है.
‘‘मैं आप सभी से माफी चाहता हूं कि गुस्से व भावना में आ कर मैं आप लोगों को न जाने क्याक्या कह गया. पर मैं क्या करूं…मैं मजबूर था. मैं बीना की बेइज्जती होते नहीं देख सकता क्योंकि मैं बहुत प्यार करता हूं इसे, बहुत ज्यादा. अच्छा, हम चलते हैं…बिन बुलाए आए और आप की खुशियों में खलल डाला इस के लिए माफी चाहते हैं,’’ अखिल बोले और मेरी ओर देख कर कहा, ‘‘चलो, बीना.’’
हम दोनों चलने के लिए मुड़े ही थे कि शैलेंद्र भैया, जो इतनी देर से चुपचाप अखिल को बोलते देखे जा रहे थे, बोले, ‘‘ठहरो,’’ फिर घर वालों की ओर मुखातिब हो कर बोले, ‘‘पापा, ताऊजी, मैं जानता हूं कि यह बीना का दोष है कि इस ने हमारी इच्छा के खिलाफ जा कर हमारी जाति से अलग जाति के लड़के से शादी की है, पर इस का दोष इतना बड़ा तो नहीं कि हम इसे मरा समझ लें. आखिर इस ने जो भी किया, अपनी खुशी, अपनी जिंदगी के लिए किया. इस ने अपने लिए जो लड़का पसंद किया है वैसा तो शायद आपहम भी नहीं ढूंढ़ सकते थे.
‘‘यह अपने घर वालों का…हम लोगों का प्यार पाने के लिए कितना तड़प रही है. यह हमारा प्यार पाने के लिए पति के साथ अपने मानसम्मान की परवा न करते हुए यहां आई है ताकि यह अपने भाई को दूल्हा बना देख सके. यह हमारा प्यार पाने के लिए भटक रही है और हम इसे गले लगा कर प्यार देने के बजाय दुत्कार रहे हैं, बेइज्जत कर रहे हैं. क्या हमारा फर्ज नहीं बनता कि हम इसे गले लगा कर अपने प्यार के आंचल में भींच लें. जब अखिल पराया हो कर इसे प्यार से रख सकता है, तो हम लोग इतने गएगुजरे तो नहीं हैं कि इस के अपने हो कर भी इसे प्यार नहीं दे सकते.
‘‘पापा, अगर इस ने नादानी में कोई भूल की है तो हम तो समझदार हैं, हमें इसे माफ कर के गले लगा लेना चाहिए. मैं ने तो इसे कभी का माफ कर दिया था. मैं शायद आप लोगों को यह सब कभी नहीं कह पाता, पर आज जब अखिल को बोलते देखा तो मैं ने सोचा कि जब यह आदमी अपनी पत्नी, जो मात्र 2 बरस से इस के साथ रह रही है, उस की बेइज्जती सहन नहीं कर पाया तो मैं अपनी बहन की बेइज्जती कैसे सहन कर रहा हूं, जो मेरे साथ 20 साल रही है. मैं चाहता हूं कि आप लोग भी बीना को माफ कर दें व इसे गले लगा लें.’’
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मैं ने देखा भैया की आंखें भर आई हैं. फिर मैं ने अपनी ताईताऊजी, मम्मीपापा की तरफ देखा, सभी के चेहरे बुझे हुए थे व सभी की आंखों में आंसू थे. शायद उन पर अखिल की बातों का असर हो गया था. ताईजी व मम्मी, ताऊजी व पापा की तरफ याचिकापूर्ण दृष्टि से देख रही थीं.
अचानक ताऊजी मेरे पास आए और हाथ जोड़ कर बोले, ‘‘बेटी, मुझे माफ कर दो. मैं ने तुम्हें समझने में भूल की है. मैं तुम्हारी भावनाओं को नहीं समझ सका और अपनी ही शान में ऐंठा रहा, पर आज अखिल व शैलेंद्र की बातों ने मेरी आंखें खोल दी हैं. इन की बातों ने मेरी झूठी शान की अकड़ को मिटा दिया है. हमारा जीवन तुम्हारा गुनाहगार है, हमें माफ कर दो.’’
मैं ताऊजी को यों रोते देख हतप्रभ सी हो गई और मेरे मुंह से शब्द नहीं फूट रहे थे. अखिल ताऊजी और पापा के सामने आए और बोले, ‘‘ताऊजी व पापाजी, आप कैसी बातें करते हैं? बड़े क्या कभी बच्चों से माफी मांगते हैं. माफी तो हमें मांगनी चाहिए आप लोगों से कि हम ने आप को कष्ट दिया. गलती तो हम से हुई है कि हम ने आप लोगों की इच्छा के विरुद्ध कार्य किया. आप तो हम से बड़े हैं, आप का हाथ तो हमें आशीर्वाद देने के लिए है, हमारे सामने हाथ जोड़ने के लिए नहीं.’’
ताऊजी बोले, ‘‘नहीं बेटे, मैं ने तुम्हें समझने में बड़ी भूल की है. शैलेंद्र ने सही कहा कि बीनू ने तुम्हारे रूप में जो पति पसंद किया है वैसा तो शायद हम सब मिल कर भी नहीं ढूंढ़ पाते. तुम हमारी बेटी की खुशी, उस की ख्वाहिश के लिए अपने मानसम्मान की परवा किए बगैर यहां आ गए और हम ने तुम दोनों का आदरसत्कार करने के बजाय बेइज्जत किया. तुम्हारी भावनाओं को, तुम्हारे प्रेम को नहीं समझा बल्कि अपनी रौ में बह कर तुम्हें तवज्जुह नहीं दी. हमारा परिवार वाकई तुम दोनों का गुनाहगार है. हमें माफ कर दो. मैं व हरि दोनों अपने घर वालों की तरफ से तुम दोनों से क्षमा चाहते हैं.’’
तभी पापा बोले, ‘‘हां, अखिल बेटे, मेरी गलती को माफ कर दो और यहीं रुक जाओ. यह हमारे घरपरिवार की तरफ से प्रार्थना है. मैं तुम से हाथ जोड़ कर विनती करता हूं.’’
फिर ताऊजी, पापा, ताईजी व मम्मी सभी मेरे व अखिल के सामने हाथ जोड़ कर खड़े हो कर क्षमा मांगते हुए हमें रोकने लगे. यह देख अखिल बोले, ‘‘अरे, यह आप सब लोग क्या कर रहे हैं? प्लीज, आप लोग अपने बच्चों के सामने हाथ जोड़ कर खड़े न हों. आप लोग हमारे बुजुर्ग हैं. आप लोगों के हाथ तो आशीर्वाद देने के लिए हैं. मैं और बीना कहीं नहीं जाएंगे बल्कि पूरी शादी में खूब मजे करने के लिए यहीं रुकेंगे. यह तो आप लोगों का बड़प्पन है कि आप हम से बिना किसी गलती के माफी मांग रहे हैं.’’
ताऊजी यह सुन कर मुझ से बोले, ‘‘बीनू, वाकई तू ने एक हीरा पसंद किया है. हम ने इसे पहचानने में भूल कर दी थी,’’ फिर वह मेरे पास आ कर बोले, ‘‘क्यों बीना, तू ने मुझे माफ कर दिया या कोई कसर रह गई है. अगर रह गई है तो बेटी, पूरी कर ले. मैं तेरे सामने ही खड़ा हूं.’’
मैं ने हंस कर कहा, ‘‘क्या ताऊजी आप भी,’’ फिर मैं खुशी से ताऊजी के गले लग गई.
तभी पापा की आवाज आई, ‘‘अरे, बीना, जल्दी इधर आ और शैलेंद्र की आरती कर. देख, देर हो रही है. बाकी रस्में भी करनी हैं. फिर बरात ले कर तेरी भाभी को भी लेने जाना है.’’
मैं पापा की आवाज सुन कर खुशी से कूदती हुई शैलेंद्र भैया की आरती करने गई. मुझे ऐसा लग रहा था कि जैसे ग्रहण का हिस्सा जो मेरी जिंदगी पर लग गया.
लेखक- सुकेश कुमार श्रीवास्तव
‘‘जी…?’’ रजनी ने हैरानी से कहा. वह कुछ समझ न पाई.
‘‘शरद की हालत इतनी खराब नहीं है. उन की हालत ठीक भी नहीं है. समझ लीजिए कि कैंसर ने अभी दस्तक दी है. अंदर नहीं आया है.’’
‘‘यानी, उन्हें कैंसर नहीं है?’’
‘‘कहना मुश्किल है, पर दवाओं ने असर किया है. मानिए, 5 फीसदी सुधार हुआ है.’’
‘‘तो अभी इन का टैस्ट नहीं होना है?’’
‘‘टैस्टवैस्ट नहीं करना है. वह मैं ने इन्हें डराने के लिए कहा था. ये डर भी गए हैं, अच्छा हुआ. इन्हें पान मसाला या गुटखा खाने से डर लगने लगा है. इस डर ने ही इन्हें गुटखे से 5 दिन दूर रखा है. अब मैं ने इन्हें 5 दिन की दवा और दी है. अगर ये 10 दिन तक गुटखे से दूर रहे, तो गुटखा इन से छूट सकता है.
‘‘यह स्टडी है कि टोबैको ऐडिक्ट अगर 10 दिन तक टोबैको से दूर रहे, और उस की विल पावर स्ट्रौंग हो तो टोबैको की आदत छूट सकती है.’’
‘‘पर, इन का मुंह तो पूरा नहीं खुल पा रहा है.’’
‘‘देखिए मिसेज शरद, हर गंभीर बीमारी अपने आने का संकेत देती है और संभलने का मौका भी देती है. माउथ कैंसर का भी यही हाल है. पहली दस्तक मुंह का न खुलना या कम खुलना है. उन की यह हालत 2-3 महीने से होगी. यह फर्स्ट स्टेज है.
‘‘फिर आता है, मुंह का छाला. एक या 2 छाले. ये छाले होने के 5 या 6 दिनों में अपनेआप ठीक हो जाते हैं. इन में कोई दर्द वगैरह भी नहीं होता. 10-15 दिनों के बाद एकाध छाला और होता है और ठीक हो जाता है. इसे आप सैकंड स्टेज समझिए. यहां तक लोग इस की सीरियसनैस नहीं समझते.
फिर आती है, थर्ड स्टेज. एकसाथ कई छाले होते हैं. ये सूखते नहीं हैं. इन में घाव हो जाते हैं और अंदर ही इन में पस पड़ जाती है.
‘‘इस के बाद आती है, लास्ट स्टेज. जब छाले का घाव गाल के दूसरी तरफ यानी बाहरी तरफ आ आता है. यह स्टेज बहुत तेजी से आती है और घाव व कैंसर सेल की ग्रोथ गाल से गले तक हो जाती है. यह लाइलाज है.’’
‘‘यानी, ये सैकंड स्टेज पर पहुंच गए थे.’’
‘‘कह सकते हैं. सैकंड स्टेज की प्राइमरी स्टेज पर.’’
‘‘इस का इलाज क्या है?’’
‘‘सैकंड स्टेज तक ही इलाज किया जाता है. थर्ड स्टेज आने पर आपरेशन कभीकभी कामयाब होता है. फोर्थ स्टेज लाइलाज है. इस का एक ही इलाज है. पहली स्टेज होते ही तंबाकू से परहेज, खासकर पान मसाला या गुटखा से. 1, 2 या 5 रुपए के गुटखे में क्वालिटी की उम्मीद आप कैसे कर सकते हैं. यह सामान्य सी बात लोग क्यों नहीं समझते. फिर इस के बनाने वाले इसी 1-2 रुपए से करोड़पति हो जाते हैं और सरकारें हजारों करोड़ टैक्स से भी कमा लेती हैं. 2 रुपए के पाउच की क्वालिटी शायद 20 पैसे की भी नहीं होती.’’
‘‘जब ऐसा है, तो सरकार इसे रोक क्यों नहीं देती?’’
‘‘छोडि़ए. यह बड़ी बहस की बात है.’’
‘‘तो ये बच सकते हैं?’’
‘‘शरद बाबू बच जाएंगे, बशर्ते ये तंबाकू से दूर रहें.
रजनी से रहा न गया. उस ने सिर पर आंचल रख लिया और उठ कर डाक्टर साहब के पैर छू लिए.
‘‘अरे… यह आप क्या कर रही हैं. उठिए.’’
‘‘आप… आप डाक्टर नहीं हैं…’’ रजनी की आंखों से आंसू बहने लगे.
‘‘बड़ी हत्यारी चीज है यह गुटखा मिसेज शरद…’’ डाक्टर साहब गमगीन हो गए. ‘‘मैं ने अपना बेटा खोया है. मैं… मैं उसे बचा नहीं पाया. उस का चेहरा देखने लायक नहीं रहा था.
‘‘हां बेटी, मेरा बेटा भी पान मसाला खाता था. एक दिन एकएक डब्बा खा जाता था. यह चीज ही ऐसी है, जो गरीबअमीर, ऊंचानीचा कुछ नहीं देखती है. बस इसलिए मैं अपने को रोक नहीं पाता हूं. आउट औफ द वे जा कर भी कोशिश करता हूं कि इस से किसी को बचा सकूं.’’
रजनी कुछ कह न सकी. बस एकटक डाक्टर को देखती रही, जो अब एक गमगीन पिता लग रहे थे.
‘‘अब तुम जाओ और वैसा ही करो, जैसा मैं ने कहा है. याद रखना, शरदजी को ठीक करने में जितनी मेरी कोशिश है, उतनी ही जिम्मेदारी तुम्हारी भी है. जाओ और अपनी गृहस्थी, अपने परिवार को बचाओ.’’
रजनी बाहर आ गई. शरद बेचैन हो रहा था.
‘‘क्या कह रहे थे डाक्टर साहब?’’ बाहर आते ही उस ने पूछा.
‘‘चलो, घर चल कर बात करते हैं,’’ रजनी ने गमगीन लहजे में कहा. वे रिकशा से ही आए थे, रिकशा से ही वापसी हुई.
‘‘अब तो बताओ. क्या डाक्टर साहब ने बता दिया है कि मेरे पास कितने दिन बचे हैं?’’
‘‘तुम कैंसर की सैकंड स्टेज पर पहुंच गए हो…’’ रजनी ने साफसाफ कह दिया, ‘‘अब अगर तुम गुटखा खाओगे, तो लास्ट स्टेज पर पहुंचोगे. फिर कोई इलाज नहीं होगा.’’
‘‘अरे, गुटखे का तो अब नाम न लो. अब तो मैं गुटखे की तरफ देखूंगा भी नहीं. अभी कोई इलाज है क्या?’’
‘‘अभी डाक्टर साहब ने साफसाफ नहीं बताया है. 10 दिन बाद बताएंगे. तुम्हें पूरा आराम करना होगा. तुम्हें छुट्टी बढ़ानी होगी.’’
‘‘मैं कल ही एक महीने की छुट्टी बढ़ा दूंगा.’’
शरद ने एक महीने की छुट्टी बढ़ा दी, पर उसे 2 महीने लग गए.
शरद के औफिस जौइन करने से 2 दिन पहले औफिस के सभी कुलीग उस से मिलने घर आए. सभी खुश थे. तभी रजनी ने प्रस्ताव रखा कि शरद के ठीक होने की खुशी में कल यानी रविवार को सभी सपरिवार रात के खाने पर उन के यहां आएं. सभी ने तालियां बजा कर सहमति दी.
‘‘पर, भाभीजी हमारी एक शर्त है,’’ नीरज ने कहा.
‘‘बताइए नीरजजी?’’ रजनी ने मुसकरा कर कहा.
‘‘हमारी भी एक शर्त है…’’ नीरज ने नाटकीयता से कहा, ‘‘कि सभी अतिथितियों का स्वागत पान मसाले से किया जाए.’’
यह सुन कर वहां सन्नाटा पसर गया.
‘‘भाड़ में जाओ…’’ तभी शरद ने मुंह बना कर कहा, ‘‘मेरे सामने कोई पान मसाले से स्वागत तो क्या कोई पान मसाले का नाम भी न ले. पार्टीवार्टी भी जाए भाड़ में.’’
‘‘अरे… अरे… गलती हो गई भाभीजी. पान मसाले से नहीं, बल्कि हमारी शर्त है कि अतिथियों का स्वागत शरबत के गिलासों से किया जाए.’’
‘‘मंजूर है,’’ रजनी ने कहा तो सभी की हंसी गूंज उठी. शरद की भी, क्योंकि अब उस का मुंह पूरा खुल रहा था.
बड़ी जिम्मेदारियां थीं शरद के ऊपर. अभी उस की उम्र ही क्या थी. महज 35 साल. रजनी सिर्फ 31 साल की थी और सोनू तो अभी 3 साल का ही था. उस ने जेब में हाथ डाल कर गुटखे के दोनों पाउच को सामने ही रखे बड़े से डस्टबिन में फेंक दिया.
‘देखिए, अभी कुछ कहा नहीं जा सकता…’ शरद को लगा, जैसे डाक्टर का कहा उस के जेहन में गूंज रहा हो, ‘अगर दवाओं से आराम हो गया तो ठीक है, नहीं तो कुछ कहा नहीं जा सकता. मुंह पूरा नहीं खुल पा रहा है. अगर आराम नहीं हुआ तो कुछ टैस्ट कराने पड़ेंगे. 5 दिन की दवा दे रहा हूं, उस के बाद दिखाइएगा.’
तब सोनू पैदा नहीं हुआ था. रजनी के मामा के लड़के की शादी थी. शरद की खुद की शादी को अभी एक साल भी पूरा नहीं हुआ था. शादी के बाद ससुराल में पहली शादी थी. उन्हें बड़े मन से बुलाया गया था.
रजनी के मामाजी का घर बिहार के एक कसबेनुमा शहर में था. रजनी के पिताजी, मां, भाई व बहन भी आ ही रहे थे. दफ्तर में छुट्टी की कोई समस्या नहीं थी, इसलिए शरद ने भी जाना तय कर लिया था. ट्रेन सीधे उस शहर को जाती थी. रात में चल कर सुबहसुबह वहां पहुंच जाती थी, पर ट्रेन लेट हो कर 10 बजे पहुंची.
स्टेशन से ही आवभगत शुरू हो गई. उन्हें 4 लोग लेने आए थे. उन्हीं में थे विनय भैया. थे तो वे शरद के साले, पर उम्र थी उन की 42 साल. खुद ही बताया था उन्होंने. वे रजनी के मामाजी के दूर के रिश्ते के भाई के लड़के थे.
वे खुलते गेहुंए रंग के जरा नाटे, पर मजबूत बदन के थे. सिर के बाल घने व एकदम काले थे. उन की आंखें बड़ीबड़ी व गोल थीं. वे बड़े हंसमुख थे और मामाजी के करीबी थे.
‘आइए… आइए बाबू…’ उन्होंने शरद को अपनी कौली में भर लिया, ‘पहली बार आप हमारे यहां आ रहे हैं. स्वागत है. आप बिहार पहली बार आ रहे हैं या पहले भी आ चुके हैं?’
‘जी, मैं तो पहली बार ही आया हूं साहब,’ शरद ने भी गर्मजोशी से गले मिलते हुए अपना हाथ छुड़ाया.
‘अरे, हम साहब नहीं हैं जमाई बाबू…’ उन के मुंह में पान भरा था, ‘हम आप के साले हैं. नातेरिश्तेदारी में सब से बड़े साले. नाम है हमारा विनय बाबू. उमर है 42 साल. सहरसा में अध्यापक हैं, पर रहते यहीं हैं. कभीकभार वहां जाते हैं.’
‘आप अध्यापक हैं और स्कूल नहीं जाते?’ शरद ने हैरानी से कहा.
‘अरे, स्कूल नहीं कालेज जमाई बाबू…’ उन्होंने जोर से पान की पीक थूकी, ‘हां, नहीं जाते. ससुरे वेतन ही नहीं देते. चलिए, अब तो आप से खूब बातें होंगी. आइए, अब चलें.’
तब तक साथ आए लोगों ने प्रणाम कर शरद का सामान उठा लिया था. वे स्टेशन से बाहर की ओर चले.
‘आप किस विषय के अध्यापक हैं?’ शरद ने चलतेचलते पूछा.
‘हम अंगरेजी के अध्यापक हैं…’ उन्होंने गर्व से बताया, ‘हाईस्कूल की कक्षाएं लेता हूं जमाई बाबू.’
स्टेशन के बाहर आ कर सभी तांगे से घर पहुंचे. शरद का सभी रिश्तेदारों से परिचय हुआ.
तब शरद को पता चला कि विनय भैया नातेरिश्ते में होने वाले शादीब्याह के अभिन्न अंग हैं. वे हलवाई के पास बैठते थे. विनय भैया सुबह से शाम तक हलवाइयों के साथ लगे रहते थे.
दूसरे दिन विनय भैया आए.
‘आइए जमाई बाबू…’ विनय भैया बोले, ‘आप बोर हो गए होंगे. आइए, जरा आप को बाहर की हवा खिलाएं.’
सुबह का नाश्ता हो चुका था. शरद अपने कमरे में अकेला बैठा था. वह तुरंत उठ खड़ा हुआ. घर से बाहर निकलते ही विनय भैया ने नाली में पान थूका.
‘आप पान बहुत खाते हैं विनय भैया,’ शरद से रहा नहीं गया.
‘बस यही पान का तो सहारा है…’ उन्होंने मुसकराते हुए कहा, ‘खाना चाहे एक बखत न मिले, पर पान जरूर मिलना चाहिए. आइए, पान खाते हैं.’
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वे उसे आगे मोड़ पर बनी पान की दुकान की ओर ले चले.
‘मगही पान लगाओ. चूना कम, भीगी सुपारी, इलायची और सादा पत्ती. ऊपर से तंबाकू,’ उन्होंने पान वाले से कहा.
‘आप कैसा पान खाएंगे जमाई बाबू?’ उन्होंने उस से पूछा.
‘मैं पान नहीं खाता,’ शरद बोला.
‘अरे, ऐसा कहीं होता है. पान खाने वाली चीज है, न खाने वाली नहीं जमाई बाबू.’
‘सच में मैं पान नहीं खाता, पर चलिए, मैं मीठा पान खा लूंगा.’
‘मीठा पान तो औरतें खाती हैं, बल्कि वे भी जर्दा ले लेती हैं.’
‘नहीं, मैं जर्दातंबाकू बिलकुल नहीं खाता.’
‘अच्छा भाई, जमाई बाबू के लिए जनाना पान लगाओ.’
पान वाले ने पान में मीठा डाल कर दिया.
वे वापस आ कर हलवाई के पास पड़ी कुरसियों पर बैठ गए और हलवाई से बातें करने लगे. आधा घंटा बीत गया.
तभी विनय भैया ने एक लड़के से कहा, ‘अबे चिथरू, जा के 2 बीड़ा पान लगवा लाओ. बोलना विनय बाबू मंगवाए हैं.’
वह लड़का दौड़ कर गया और पान लगवा लाया.
‘लीजिए जमाई बाबू, पान खाइए. अबे, जमाई बाबू वाला पान कौन सा है?’
‘आप पान खाइए…’ शरद ने कहा, ‘मेरी आदत नहीं है.’
‘चलो तंबाकू अलग से दिए हैं…’ विनय बाबू ने पान चैक किए, ‘लीजिए. यह तो सादा चूनाकत्था है. जरा सी सादा पत्ती डाल देते हैं.’
‘नहीं विनय भैया, मु झे बरदाश्त नहीं होगी.’
‘अरे, क्या कहते हैं जमाई बाबू? सादा पत्ती भी कोई तंबाकू होती है क्या. वैसे जर्दातंबाकू खाना तो मर्दानगी की निशानी है. सिगरेट आप पीते नहीं, दारू वगैरह को तो सुना है, आप हाथ भी नहीं लगाते. जर्दातंबाकू की मर्दानगी तो यहां बच्चों में भी होती है.’
तब तक विनय बाबू पान में एक चुटकी सादा पत्ती वाला तंबाकू डाल कर उस की तरफ बढ़ा चुके थे. शरद ने उन से पान ले कर मुंह में रख लिया. कुछ नहीं हुआ. मर्दानगी के पैमाने को उस ने पार कर लिया था.
शादी से लौट कर शरद ने पान खाना शुरू कर दिया. बहुत संभाल कर बहुत थोड़ी सी सादा पत्ती व तंबाकू लेने लगा. फिर तो वह कायदे से पान खाने लगा. कुछ नहीं हुआ. बस यह हुआ कि उस के खूबसूरत दांत बदसूरत हो गए.
एक बार शरद को दफ्तर के काम से एक छोटी सी तहसील में जाना पड़ा. गाड़ी से उतर कर उस ने एक दुकान से पान खाया. पान एकदम रद्दी था. कत्था तो एकदम ही बेकार था. तुरंत मुंह कट गया.
‘बड़ा रद्दी पान लगाया है,’ शरद ने पान वाले से कहा.
‘यहां तो यही मिलता है बाबूजी.’
‘पूरा मुंह खराब कर दिया यार.’
‘यह लो बाबूजी, इस को दबा लो,’ उस ने एक पाउच बढ़ाया.
‘यह क्या है?’
‘यह गुटखा है. नया चला है. इस से मुंह कभी नहीं कटेगा. इस में सुपारी, कत्था, चूना, इलायची सब मिला है. पान से ज्यादा किक देता है बाबूजी.’
शरद ने गुटखे का पाउच फाड़ कर मुंह में डाल लिया.
अपने शहर में आ कर अपनी दुकान से शरद ने पान खाया. आज मजा नहीं आया. उस ने 4 गुटखे ले कर जेब में डाल लिए.
सोतेसोते तक में शरद चारों गुटखे खा गया. सुबह उठते ही ब्रश करते ही गुटखा ले आया. धीरेधीरे उस की पान खाने की आदत छूट गई. खड़े हो कर पान लगवाने की जगह गुटखा तुरंत मिल जाता था. रखने में भी आसानी थी. खाने में भी आसानी थी. परेशानी थोड़ी ही थी. मुंह का स्वाद खत्म हो गया. खाने में टेस्ट कम आता था.
रजनी परेशान हो गई. शरद की सारी कमीजों पर दाग पड़ गए, जो छूटते ही नहीं थे. सारी पैंटों की जेबों में भी दाग थे. उसे कब्ज रहने लगी. पहले उठते ही प्रैशर रहता था, जाना पड़ता था. अब उठ कर ब्रश कर के, चाय पी कर व फिर जब तक एक गुटखा न दबा ले, हाजत नहीं होती थी.