टूटे घरौंदे : भाग 1

“पापा, वहां क्या कुएं से पानी पीते हैं?”

“नहीं, नलका लगा है घर में.”

“मिट्टी के घर हैं क्या वहां?”

“नहीं, जैसे यहाँ हैं वैसे ही हैं.”

“और लालटेन जलानी पड़ेगी क्या?”

“नहीं, लाइट आतीजाती रहती है, अब चुप हो जा गांव जा कर पूछना,” मुरली ने अपनी 11 वर्षीया बेटी के एक के बाद एक प्रश्न से झेंप कर उसे चुप कराते हुए कहा.

मुरली अपनी पत्नी कविता और बेटी कोमल को 11 वर्षों बाद अपने गांव माकरोल ले कर जा रहा था. माकरोल उत्तर प्रदेश के अलीगढ़ जिले का छोटा सा गांव है. मुरली ने 13 साल पहले यह गांव छोड़ा था. वह गांव से अकेला दिल्ली आया था जिस के एक साल बाद ही उस की मां भी यहां आ गई थीं. यहीं उस की शादी मनीना में रहने वाली कविता से करा दी गई थी. जब मुरली की बेटी दो साल की हुई तो मां उसे हमेशा के लिए छोड़ कर जा चुकी थीं.

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वर्तमान में दिल्ली की हालत तो किसी से छुपी हुई नहीं है. कोरोना के चलते जितना सरकारी धनकोश लोगों के लिए खाली है उस से कही ज्यादा आम आदमी की जेब खाली हो चुकी है. दो महीने से काम न होने के चलते शहर के बोर्डर खुलते ही मुरली ने परिवार के साथ वापस गांव लौटने का फैसला कर लिया था.

बस में 6 घंटों का सफर अब समाप्त हो चुका था. मुरली, कविता और कोमल अपने सामान से लदालद भरे 4 बैग ले कर बस से उतरे. कविता का मुंह उस के दुपट्टे से, मुरली का गमछे और कोमल का मास्क से ढका हुआ था. गांव का नजारा शहर से बेहद अलग था. लग रहा था मानो कोरोना ने यहां किसी को छूआ ही न हो. लोग अब भी गुट बनाए बैठे बातें करते साफ दिख रहे थे.

गांव में जैसेजैसे मुरली बढ़ने लगा, उस के माथे पर बल पड़ने लगे. पसीना ऐसे झूटने लगा जैसे जून की गर्मी ने उस अकेले को ही जकड़ा हो. गली में आगे बढ़तेबढ़ते लोगों की नजरें टकटकी लगाए आने वाले उन छह कदमों को देख रही थीं. मुरली ने अपना गमछा हटाया और गली के कोने में बैठे आदमी को देख बोला, “और भैया का हाल है, सब ठीकठाक है?”

“अरे, भैया, कैसे हो, बहुत दिनों बाद आए हो.”

“हां, हम तो सब ठीक हैं, तुम सुनाओ तुम्हारे का हाल हैं,” मुरली बोला.

“हां भैया, कर रहे हैं हम तो अपना गुजारो,” वह कविता और कोमल की तरफ देखते हुए बोला, “भाभी नमस्ते, हम बिजेंदर, हम जेइ महल्ला में रेहत हैं कभी घर घूमने आइयों.”

कविता ने नमस्ते की मुद्रा में सिर हिला दिया.

“और चाची नजर ना आरीं कहां हैं?” मुरली ने बिजेंदर से पूछा.

“भैया, वो भैंस नभाईवे गई हैं,” बिजेंदर बोला.

यह सुन कोमल जोरजोर से हंसने लगी. वह अपने आसपास के इस नए माहौल को देखने में व्यस्त थी. कभी पूछती कि मम्मी यह कौन है वो कौन है, तो कभी कहती घर कितना दूर है जल्दी चलो. वहीं, मुरली आसपास जो भी जानपहचान का मिलता उसे नमस्ते कहता हुआ तो कभी हालचाल का आदानप्रदान करता हुआ जा रहा था.

थोड़ी दूरी पर ही मुरली एक घर के आगे आ कर रुका और अपना बैग खोल चाबी निकालने लगा. लाल रंग के गेट वाला यह घर मुरली का था. मुरली गेट खोलने लगा, तभी सामने वाले घर से एक बुजुर्ग बाहर निकल कर आए. उन्हें देख मुरली बोला, “ताऊ नमस्ते. ताई नजर नहीं आ रही, कहां गईं.”

“भैया तेरी ताई मर गई,” उन ताऊजी ने जवाब दिया.

“हैं, कैसे?” मुरली ने हैरानी से पूछा.

“खेत में घांस लेने गई, सांप खा गयो,” उन्होंने बात पूरी की.

मुरली सुन कर थोड़ा सकुचाया पर फिर नमस्ते कह घर के अंदर बढ़ गया. कविता और कोमल भी घर में घुस चैन की सांस ले पा रहे थे. कोमल ने अपना मास्क उतारा और घर को निहारने लगी. दो मिनट के लिए मुरली की नजरें कोमल पर टिकीं और लगने लगा जैसे वह किसी खयाल में डूब गया हो. उस ने कोमल से अपना ध्यान हटाया और जूते उतारने लगा.

घर बिलकुल गंदा पड़ा था, कहीं जाले लटक रहे थे, तो कहीं तसवीरों पर मिट्टी की परतें जमी हुई थीं. मुरली साल में दो बार 4-6 दिनों के लिए यहां आता था लेकिन अकेला, इसलिए हलकीफुलकी साफसफाई हो जाती थी.

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सुबह 11 से शाम 7 बजे तक कविता, कोमल और मुरली घर की सफाई में ही रम गए. चारपाई के नीचे से घासफूस हटाई गई, खिड़की से जाले झाड़े गए, बर्तनों को मांजा गया, चादरें बिछाई गईं और ढुलकाने के लिए हाथ वाले पंखें निकाले गए. दिनभर की मशक्कत के बाद तीनों खाना खाने बैठे तो एकबार फिर मुरली किसी सोच में खो गया.

“क्या सोच रहे हो?” कविता ने पूछा.

“नहीं, कुछ नहीं,” मुरली ने कहा.

“पापा, यहां मेरे दोस्त बन जाएंगे न?” कोमल बोलने लगी.

“कोई जरूरत नहीं है किसी से दोस्ती करने की. मेरा मतलब कि… कोरोना फैला है न बेटा तो जितना हो सके घर में रहो बाहर मत जाना,” मुरली की आवाज में हिचकिचाहट थी.

“हां, लेकिन थोड़ा तो बाहर निकलेंगे ही, किसी से हांहूं तो करेंगे ही न,” कविता ने कहा.

“कह दिया न कोई जरूरत नहीं है. तुम किसी को जानते नहीं हो तो ज्यादा रिश्ते जोड़ने की जरूरत नहीं है, वैसे भी हमें जिंदगी भर यहां नहीं रहना है.”

“पर..,” कविता कुछ बोलने ही जा रही थी कि मुरली ने उसे अचानक टोकते हुए कहा, “अब क्या चैन से खाना भी नहीं खाने दोगी क्या?”

कविता ने आगे कुछ नहीं कहा. कोमल का चेहरा भी मुरझाने लगा था, उसे लगा कि इस नए घर में बिना किसी दोस्त के वह बहुत बोर होने वाली है.

मुरली वैसे तो अपने परिवार से बेहद प्यार करता था, उन के साथ हंसताखेलता था, लेकिन इस गांव के जिक्र से ही वह हमेशा खिन्न जाता था. अब गरीबी में आटा गीला वाली बात तो यह हुई थी कि आखिर उसे यहीं रहने आना पड़ा, और इस बार अपने परिवार समेत.

मुरली के घर के बगल वाले घर की दीवार बिलकुल बराबर की थी. दोनों छतें आपस में जुड़ी हुई थीं और उस पर सब से अलग तो यह कि दोनों ही छतों पर बाउंडरी नहीं थी. वह घर किशोर का था. किशोर, एक जमाने में मूरली का दोस्त हुआ करता था पर अब सब बदल चुका था.

अगली सुबह कोमल छत पर अपने खिलौने ले कर गई तो उसे बगल वाली छत पर एक लड़की दिखी. कोमल ने उसे देखा तो देखती ही रह गई. उस ने उसे एक बार देखा, फिर पलक झपका कर एकबार फिर देखा, आंखों को मसल कर फिर देखने लगी. जितनी बार देखती उतनी ही ज्यादा हैरान होती.

वह उस लड़की के पास गई और कहने लगी, “तू कौन है, और तू…. एक मिनट बस यहीं रुक मैं अभी आई,” कह कर कोमल भागती हुई नीचे गई.

“मम्मी….मम्मी… जल्दी चलो देखो उस लड़की को.”

“क्या देखना है, बेटा काम करने दे जा. अभी तेरे पापा उठेंगे तो चिल्लाने लगेंगे,” कविता ने झाड़ू लगाते हुए कहा.

“अरे मम्मी, लेकिन एक बार देखो तो,” कोमल मम्मी के दाएंबाएं घूमती हुई बोली.

“कोमल, बेटा जा कर खेल और काम करने दे मुझे,” कविता ने गुस्से से कहा तो कोमल मुंह बनाते हुए निकल गई.

कोमल वापस छत पर पहुंची तो वह लड़की वहां से जा चुकी थी. उस ने यहांवहां झांकने की कोशिश की तो उसे वह लड़की कहीं नहीं दिखी. आखिर कोमल अपने खिलौने ले कर वापस कमरे में आ गई. खिड़की पर टंगे शीशे में वह बारबार अपना चेहरा देखने लगी. कभी मुंह दाईं तरफ करने लगती तो कभी बाईं तरफ, कभी ऊपर तो कभी नीचे.

उसे देख कविता पूछने लगी, “यह क्या नौटंकी लगा रखी है तू ने सुबहसुबह.”

“अरे, मम्मी आप को नहीं पता वहां छत पर जो लड़की थी न बिलकुल मेरी जैसी दिख रही थी. बिलकुल मेरी जैसी मतलब बिलकुल मेरी ही जैसी.”

“बिलकुल तेरी जैसी का क्या मतलब, कुछ भी बोलती है.”

पास सो रहे मुरली की आंख खुल गई. “क्या हो रहा है,” वह बोला.

“पापा, मैं ने न बिलकुल अपनी जैसी एक लड़की देखी ऊपर छत पर,” कोमल कहने लगी.

“क्या…?” मुरली अचानक उठ कर बैठ गया. “बिलकुल तेरी जैसी नहीं दिख रही होगी, नींद में तुझे कुछ भी दिखता है. और तुझे कहा था न यहांवहां नहीं मंडराना. एक दिन हुआ नहीं और नाटक शुरू.”

“छत पर ही तो गई थी. अब क्या कैद हो जाए घर में, बच्ची एक तो अकेली है यहां ऊपर से छत पर भी न जाए. आप को दो दिन नहीं हुए यहां आए और आप का तो मानो रवैया ही बदल गया है,” कविता शिकायती लहजे में बोलने लगी.

“ऐसा कुछ नहीं है और तुम…..” मुरली कह ही रहा था कि दरवाजे पर दस्तक हुई.

मुरली दरवाजा खोलने गया. सामने किशोर और उस की बेटी सुमन को देख हक्काबक्का हो गया. ऐसा नहीं था कि वह उन दोनों को पहली बार देख रहा हो लेकिन आज वह उसे साक्षात यम नजर आ रहे थे.

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“भैया, शहर ते कब लौटे हो गांव, बताया भी नहीं चुपचाप आ गए,” किशोर कहने लगा.

“कल ही आए हैं. सबेरेसबेरे कैसे आना हुआ?” कहते हुए मुरली के माथे से पसीने की बूंदें गिरने लगीं.

“हमारी छोरी सुमन बोल रही कि पापा बगल वाली छत पर को मेरे जैसे छोरी दीखी, तो हम ने सोची देख लें,” किशोर ने कहा तो अंदर से कविता और कोमल भी निकल आए.

“मम्मी देखो बिलकुल मेरे जैसी दिख रही है,” कोमल कविता से कहने लगी.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

हिम्मत : क्या बबली बचा पाई अपनी इज्जत

अंधेरा होते ही बबली का पति काम कर के अपने घर आ गया था. बबली भी एक कबाड़ी के गोदाम पर गंदगी के ढेर से बेकार चीजों की छंटाई का काम करती थी. उसे 2 सौ रुपए रोजाना मिलते थे. पतिपत्नी दोनों बड़ी लगन से मेहनतमजदूरी करते थे, तभी घर का खर्च चल पाता था.

कबाड़ी के गोदाम पर बबली जैसी 4-5 औरतें काम करती थीं. सभी औरतें झोंपड़पट्टी इलाके की थीं. उन के पति भी किसी चौधरी के खेतों में काम करते थे. सुबह 6 बजे जाते थे और शाम को 6 बजे थकेहारे लौटते थे. घर आते ही उन में इतनी ताकत नहीं होती थी कि अपनी झोंपड़ी से थोड़ी दूर पैदल जा कर नहर में नहा आएं.

बबली का पति मेवालाल तो रोजाना की इस कड़ी मेहनत से सूख कर कांटा हो गया था. उस के बदन का रंग काला पड़ गया था.

गरमी के चलते कई दिनों से नल में पानी नहीं आ रहा था. अगर पानी आ भी जाता था, तो गरीब बस्ती से पहले दबंग लोगों की कालोनी थी, जहां हर घर में बिजली की मोटर लगी थी. जब बड़े घरों में बिजली की मोटरें चलेंगी, तो गरीबों के नल में पानी आना कतई मुमकिन नहीं. ऐसे हालात में गरीब बस्ती वालों का एकमात्र सहारा बस्ती से थोड़ी दूर बहती गंदे पानी की नहर थी.

अंधेरा होने पर बस्ती की जवान बहूबेटियों की इज्जत पर कितनी बार हमले हो चुके थे. गरीब लोग दबंगों के ऐसे हमले सहने को मजबूर थे.

मेवालाल सारा दिन मेहनतमजदूरी करने की वजह से प्यास से मरा जा रहा था. उसे नहाना भी था. घर में पानी की एक बूंद नहीं थी. उस ने बबली को नहर से पानी लाने को कहा.

बबली भी थकी हुई थी. उस ने तुनक कर जवाब दिया, ‘‘इतनी दूर से पानी कैसे लाऊंगी? मैं भी थकी हुई हूं. तुम नहर पर जा कर नहा आओ. देर भी हो गई है. अंधेरा फैला हुआ है.’’

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‘‘सारा दिन काम करतेकरते पूरे जिस्म से जान निकली जा रही है. अगर मैं मर गया, तो तुम विधवा हो जाओगी. चलता हूं तो चक्कर आते हैं. कहीं नहर में गिर गया तो…

‘‘मेरी नखरे वाली बिल्लो, जा पानी ले आ. अभी तो 3 बेटियां ब्याहनी हैं. अकेले ही तीनों को कैसे ठिकाने लगाओगी?’’ मेवालाल ने बबली की चिरौरी की, तो वह मान गई.

‘‘हांहां, मैं ही मिट्टी की बनी हूं. मुझ पर ही जवानी चढ़ी जा रही है. सारा दिन मैं भी तो मेहनत करती हूं,’’ बबली ने भी अपनी हालत बयान करते हुए थकेहारे लहजे में कहा, तो मेवालाल खामोश रहा. भारी थकावट के चलते उस का बदन दर्द के मारे दुखा जा रहा था. उस की उम्र अभी 35 साल से ज्यादा नहीं थी, मगर कमजोरी के चलते कितनी बीमारियों ने उस के बदन में घर बना लिया था.

थकीहारी बबली ने दुखी मन से बड़ा बरतन उठाया और पानी लेने चली गई. रास्ता कच्चा और ऊबड़खाबड़ था. अंधेरे के चलते बबली ठोकर खाती नहर

की तरफ बढ़ रही थी, तभी उस के कानों में एक मर्दाना आवाज आई. उस के सामने इलाके का दबंग आदमी रास्ता रोक कर खड़ा हो गया था. वह शायद शराब के नशे में चूर था. वह पहले भी इसी रास्ते पर बबली से जोरजबरदस्ती कर चुका था. बसअड्डे पर उस की मोटर मेकैनिक की दुकान थी.

उस दबंग की 2 बार शादी हुई थी. दोनों ही बार उस की शराब पीने की आदत के चलते घरवालियां भाग चुकी थीं. अब वह दूसरों की घरवालियों पर तिरछी नजर रखता था.

बबली कबाड़ के गोदाम पर काम करती थी. गोदाम का मालिक पाला राम उस का दोस्त था. इसी दोस्ती के चलते वह दबंग बबली पर अपना हक समझने लगा था.

‘‘अरे, इस अंधेरी रात में इतनी दूर से पानी ले कर आओगी. इस तरह तो तेरी जवानी का कचरा हो जाएगा. मेरी रानी, तू अगर रात को मेरे पास आ जाया करे, तो मैं तेरी झोंपड़ी के सामने ही पानी का ट्यूबवैल लगवा दूंगा. बोल, रोज रात को मेरे कमरे पर आया करेगी?’’ सामने रास्ता रोक कर उस मोटर मेकैनिक ने रोमांटिक होते हुए पूछा.

‘‘मुझे अपने घरवाले के लिए नहाने का पानी ले जाना है. मैं सारा दिन काम कर के थकीहारी लौटी हूं. कहीं दूसरी गंदी नाली में मुंह मार,’’ दहाड़ते हुए बबली ने कहा.

‘‘अरे, क्यों उस मरे हुए आदमी के लिए अपनी मस्त जवानी बरबाद कर रही है? उसे छोड़ कर मेरे साथ आ जा. मैं तुझे रानी बना कर रखूंगा,’’ कहते हुए हवस से भरे उस मोटर मेकैनिक ने थकीहारी बबली को गोद में उठा कर साथ ही के खाली प्लाट में जमीन पर गिरा दिया और उस की साड़ी उतारने पर आमादा हो गया.

सारे दिन की थकीहारी बबली अपनेआप को बचा नहीं पा रही थी. मोटर मेकैनिक अपनी मनमानी कर के माना. बबली अपनी आबरू गंवा बैठी.

जातेजाते वह दबंग 5 सौ रुपए का नोट देते हुए बोला, ‘‘ऐसे ही मजे देती रहेगी, तो तुझे मालामाल कर दूंगा.’’

‘‘मैं थूकती हूं तेरे रुपयों पर. आज तो तू ने अपनी मनमरजी कर ली, दोबारा ऐसी कोशिश मत करना. अगर कोशिश की, तो बहुत बुरा अंजाम होगा,’’ बबली ने उसे चेतावनी दी. उस ने अपने कपड़े पहने और रोतीसिसकती पानी लाने नहर पर चली गई.

घर जा कर बबली ने पति को सारी बात बताई और यह भी कहा कि मोटर मेकैनिक की बेहूदा हरकत पर उसे सबक सिखाना बहुत जरूरी हो गया है.

अगली सुबह मेवालाल बबली के साथ बस्ती के नजदीक पुलिस थाने पहुंचा. पहलेपहल तो थानेदार ने उन की शिकायत सुनी ही नहीं, उलटे बबली पर ही देह धंधा करने का आरोप लगा दिया.

जब बबली ने बड़े साहब के पास जाने की धमकी दी, तब थानेदार ने एक पुलिस वाला भेज कर मोटर मेकैनिक को थाने बुला लिया.

थानेदार ने जब मोटर मेकैनिक को बबली के साथ बलात्कार का मुकदमा दर्ज करने की धमकी दी, तो वह थानेदार के साथ मुंशी के केबिन में घुस गया.

पता नहीं, मुंशी के केबिन में उन के बीच क्या कानाफूसी हुई. थोड़ी देर में थानेदार केबिन से मोटर मेकैनिक के साथ बाहर निकला और उस के साथ बबली को धमकाते हुए फिर कभी ऐसी गलती न करने की चेतावनी देते हुए थाने से निकाल दिया.

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बबली ज्वालामुखी की तरह दहक उठी थी. वह तो मोटर मेकैनिक से बदला लेना चाहती थी. तब उस ने अपनी बस्ती की तमाम सयानी औरतों के सामने अपना दर्द रखा. साथ ही, यह गुहार भी लगाई कि अगर ऐसे दबंगों पर शिकंजा न कसा गया, तो ये किसी की भी बहनबेटी पर जबरन हाथ डाल सकते हैं.

सब औरतों ने बबली को भरोसा दिलाया कि अगर अब फिर कभी मोटर मेकैनिक ऐसी हरकत करेगा, तो वह बस्ती की दबंग औरत फुलवा को फोन कर के जगह बता दे.

बबली ने एक पुराना मोबाइल फोन खरीदा. उस ने सोच लिया था कि अगर मोटर मेकैनिक दोबारा ऐसा करता है, तो उस का अंजाम बहुत बुरा होगा. अब वह रोजाना नहर पर रात के अंधेरे में पानी लेने जाती थी.

एक दिन शाम ढलने के बाद वह पानी लेने गई, तभी मोटर मेकैनिक फिर मिल गया.

‘‘क्यों रानी, मेरी शिकायत पुलिस में कर के देख ली? क्या हुआ… कुछ भी नहीं. थानेदार भी मेरा चेला है. मेरे दबदबे से तो उस की हवा निकलती है. मेरी रातें रंगीन कर दे मेरी रानी. मैं तुझे महारानी बना दूंगा,’’ शराब के नशे में झूमते हुए मोटर मेकैनिक ने बबली के उभारों पर हाथ रखा.

‘‘यहां रास्ते में कोई आ जाएगा. मैं नदी पर जा रही हूं. तुम आगेआगे वहीं पहुंचो. नहाधो कर वहीं पर मजे लूटेंगे,’’ मन ही मन सुलगते हुए बबली शहद घुली आवाज में बोली.

बबली की यह बात सुन कर मोटर मेकैनिक खुशी के मारे झूम उठा. वह तेजतेज चलते हुए आगे बढ़ने लगा.

बबली ने अपनी बस्ती की फुलवा को फोन कर दिया. वह धीरेधीरे चलते हुए नहर के किनारे पहुंची.

मोटर मेकैनिक बेसब्री के आलम में जल्दीजल्दी बबली की साड़ी खोलने लगा.

बबली ने झिड़क कर उसे रोक दिया, ‘‘रुको… मैं नहा तो लूं. बदन की थकावट उतर जाएगी, तो मस्ती मारने का मजा भी खूब आएगा,’’ बबली ने रोकना चाहा, तो मोटर मेकैनिक रुका नहीं. उस ने बबली को अपनी बांहों में कस कर जमीन पर गिरा दिया.

मोटर मेकैनिक उस पर झपटने ही वाला था कि तभी एकसाथ कई आवाजें सुन कर वह चौंक उठा.

बस्ती की कितनी औरतें हाथों में जूतेचप्पलें ले कर आई थीं. जवान लड़के भी पूरी तैयारी के साथ वहां पहुंच गए थे. सब के हाथों में टौर्च भी थी.

‘‘बदमाश, तू दूसरों की बहनबेटियों को अपनी जागीर समझता है. बहुत जोश भरा है तेरे अंदर? अभी तेरा इलाज करते हैं,’’ बस्ती की फुलवा गुस्से के मारे दहाड़ उठी थी. इस के बाद तो रात के अंधेरे में सब उस मोटर मेकैनिक पर बरस पड़े.

मोटर मेकैनिक की हालत खराब हो गई थी. उसे कोई बचाने वाला नहीं था. सब उसे पकड़ कर घसीटते हुए बस्ती में ले आए.

‘‘यह ले, इस कागज पर दस्तखत कर दे, वरना तेरी हालत और भी बुरी हो जाएगी,’’ फुलवा ने एक सादा कागज उस के सामने रखते हुए कहा.

‘‘यह क्या है?’’ बुरी तरह घायल मोटर मेकैनिक ने बड़ी मुश्किल से पूछा. उस की आंखों के आगे अंधेरा छा रहा था. अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करते ही वह जमीन पर चीखते हुए गिर पड़ा था.

‘‘अगर फिर कभी दोबारा तुम ने किसी भी बहनबेटी की तरफ बुरी नजर से देखा, तो तेरा अंगअंग काट दिया जाएगा. इस सजा की जिम्मेदारी सिर्फ तेरी होगी. किसी दूसरे को आरोपी नहीं माना जाएगा, इसलिए तेरे दस्तखत कराना जरूरी है.

‘‘हम इस कागज की एक कौपी थाने में और एक कौपी कचहरी में जमा कराएंगे,’’ फुलवा ने सारी बात समझाई, तो उस की आंखों के सामने अंधेरा छा गया.

उस की समझ में कुछ भी नहीं आ रहा था. जबान मानो तालू से चिपक गई थी.

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‘‘अरे, मोटर मेकैनिक बाबा, अभी दस्तखत कर दो, वरना गुस्से में आई ये औरतें तेरा आज ही अंग भंग कर देंगी. अगर तुम इन औरतों से बच गए, तो हम तुझे अभी नहर में फेंक देंगे. बस्ती में हमारी मांबहनें रहती हैं. जल्दी दस्तखत कर,’’ वहां जमा हुए लड़कों में से एक ने कहा.

मोटर मेकैनिक ने कांपते हाथों से कागज पर अपने दस्तखत करने में ही भलाई समझी. दस्तखत करते ही वह बेहोश हो गया.

बबली ने साथ आई औरतों का शुक्रिया अदा किया. उस ने महसूस किया कि हिम्मत और सूझबूझ से बड़ी से बड़ी मुसीबत से पार पाई जा सकती है.

Best of Crime Stories : जीजा से जब लड़े नैन

दिल्ली जल बोर्ड में नौकरी करने वाला संजीव कौशिक अपनी पत्नी अंजू कौशिक को हर तरह से खुश रखता था. वह जो भी मांग करती, संजीव उसे जल्द से जल्द पूरी करने की कोशिश करता था. इस के बावजूद भी अंजू उसे पहले की तरह प्यार नहीं करती. आए दिन पति के प्रति उस का व्यवहार बदलता जा रहा था. बेटे के भविष्य को देखते हुए संजीव अपने घर में कलह नहीं करना चाहता था पर अंजू उस की बात को गंभीरता से समझने की कोशिश नहीं कर रही थी.

संजीव फरीदाबाद की ग्रीनफील्ड कालोनी का रहने वाला था. दिल्ली ड्यूटी करने के बाद जब वह घर पर पहुंचता तो घर वाले अंजू के बारे में बताते कि वह बेलगाम हो कर अकेली पता नहीं कहांकहां घूमती है. संजीव इस बारे में जब पत्नी से पूछता तो वह उलटे उस से झगड़ने पर आमादा हो जाती थी. इस के बाद संजीव को भी गुस्सा आ जाता तो वह उस की पिटाई कर देता था. इस तरह उन दोनों के बीच आए दिन झगड़ा होने लगा.

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संजीव अपने स्तर से यही पता लगाने की कोशिश करने लगा कि आखिर उस की पत्नी का किस के साथ चक्कर चल रहा है. पर उसे इस काम में सफलता नहीं मिल सकी. आखिर इसी साल जनवरी महीने में जब अंजू घर से भाग गई तो हकीकत सामने आई. पता चला कि अंजू के अपने ही ननदोई यानी संजीव के बहनोई राजू के साथ ही नाजायज संबंध थे.

जबकि संजीव का शक किसी मोहल्ले वाले पर था, लेकिन उसे क्या पता था कि उस का बहनोई ही आस्तीन का सांप बना हुआ है. अंजू जब राजू के साथ भागी थी तो अपने बेटे को भी साथ ले गई थी. तब संजीव ने फरीदाबाद के सेक्टर-7 थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई थी. इस के करीब एक महीने बाद अंजू को करनाल से बरामद किया गया था.

घर लौटने के बाद अंजू ने अपने किए की पति से माफी मांगी और भविष्य में राजू से न मिलने का वादा भी किया था. संजीव ने उसे माफ कर फिर से स्वीकार कर लिया. लेकिन कहते हैं कि चोर चोरी भले छोड़ दे लेकिन हेराफेरी नहीं छोड़ता. यही हाल अंजू का भी था.

कुछ दिनों तक तो अंजू ठीक रही लेकिन जब उसे अपने ननदोई यानी प्रेमी राजू की याद आती तो वह बेचैन रहने लगी. उधर राजू भी अंजू से मिलने के लिए बेताब था.

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दोनों ही जब एकदूसरे से मिलने के लिए मचलने लगे तब वे चोरीछिपे मिलने लगे. संजीव को जब पता चला तो उस ने पत्नी को समझाया पर वह नहीं मानी.

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वैसे भी जब किसी महिला के एक बार पैर फिसल जाते हैं तो वह रोके से भी नहीं रुकते. क्योंकि अवैध संबंधों की राह बड़ी ही ढलवां होती है. उस राह पर यदि कोई एक बार कदम रख देता है तो उस का संभलना मुश्किल होता है. यही हाल अंजू का हुआ.

संजीव अंजू के चालचलन से बहुत परेशान हो चुका था. उस की वजह से उस की रिश्तेदारियों में ही नहीं, बल्कि मोहल्ले में भी बदनामी हो रही थी. पत्नी को समझासमझा कर वह हार चुका था. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि वह ऐसी बदचलन पत्नी का क्या करे. पत्नी की वजह से वह तनाव में रहने लगा.

17 मार्च, 2018 को भी किसी बात को ले कर संजीव का पत्नी से झगड़ा हो गया. उस समय उस का 15 वर्षीय बेटा मनन अपने ताऊ के यहां था. झगड़े के दौरान अंजू ने ड्रेसिंग टेबल से कैंची निकाल कर पति पर हमला कर दिया. बचाव की कोशिश में संजीव की छोटी अंगुली (कनिष्ठा) कट गई. अंगुली कटने पर संजीव के हाथों से खून टपकने लगा.

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इस के बाद संजीव को गुस्सा आ गया. उस ने पत्नी से कैंची छीन कर उसी कैंची से उस की गरदन पर ताबड़तोड़ वार करने शुरू कर दिए. उस ने उस की गरदन पर तब तक वार किए, जब तक उस की मौत नहीं हो गई. इस के बाद उस ने उस की गरदन काट कर अलग कर दी.

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पत्नी की हत्या करने के बाद संजीव ने खून से सने अपने हाथपैर साफ किए और कपड़े बदल कर उस ने कहीं भाग जाने के मकसद से एक बैग में अपने कुछ कपड़े भर लिए. फिर वह अपने बड़े भाई के पास गया. वहां मौजूद बेटे ने बैग के बारे में पूछा तो उस ने बता दिया कि इस में कपड़े हैं जो धोबी को देने हैं. फिर वह वहां से चला गया.

दोपहर करीब एक बजे मनन जब घर पहुंचा तो दरवाजे पर ताला लगा हुआ था. उस ने पड़ोसियों से अपनी मां के बारे में पूछा तो कुछ पता नहीं चला. पिता को फोन मिलाया तो वह भी बंद मिला. तब उस ने फोन कर के अपने ताऊ को वहां बुला लिया.

ताऊ ने शक होने के बाद पुलिस को सूचना दी. पुलिस जब वहां पहुंची तो आसपास के लोग जमा थे. कमरे का ताला तोड़ कर पुलिस जब कमरे में गई तो बैडरूम में अंजू की लाश पड़ी थी, जिस का सिर धड़ से अलग था. फिर पुलिस ने जरूरी काररवाई कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

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पत्नी की हत्या करने के बाद संजीव 3 दिनों तक इधरउधर घूमता रहा. बाद में उसे लगा कि चाहे वह कितना भी छिपा रहे, पुलिस एक न एक दिन उसे गिरफ्तार कर ही लेगी. यही सोच कर उस ने खुद ही न्यायालय में आत्मसमर्पण करने का फैसला ले लिया और 21 मार्च, 2018 को फरीदाबाद न्यायालय में पहुंच कर आत्मसमर्पण कर दिया.

कोर्ट ने इस की सूचना डीएलएफ क्राइम ब्रांच को दे दी. तब क्राइम ब्रांच के इंचार्ज अशोक कुमार कोर्ट पहुंच गए. उन्होंने संजीव कौशिक को गिरफ्तार कर पूछताछ की, जिस में संजीव ने अपना अपराध स्वीकार कर पत्नी की हत्या में प्रयुक्त कैंची आदि पुलिस को बरामद करा दी. पुलिस ने संजीव कौशिक से पूछताछ के बाद उसे कोर्ट में पेश कर जेल भेज दिया.

टूटे घरौंदे : भाग 4

किशोर और मुरली चुपचाप खड़े थे और बोलने वाले मुंह केवल गांव के लोगों के थे. सभी कुछ न कुछ कहे जा रहे थे.

“देखो अब भी कैसे खड़ी है, बोल किसकिस के साथ चक्कर चल रो है तेरा,” मुखिया वृद्ध ने कहा.

“मैं सुमन के सिर पर हाथ रख के बोलरी हूं मेरा किसी के साथ कोई चक्कर नहीं है,” आखिर में सुबकते हुए ललिता ने कहा.

“इतना सब कर के भी मुंह खोलने की हिम्मत है इस की,” एक औरत ने कहा.

“मुंह दिखाने लायक न छोड़ा खानदान को,” यह किशोर की दूर के रिश्ते की बुआ थी जिस ने ललिता के कंधे पर जोर से प्रहार करते हुए कहा था. यह देख गांव की एकदो और औरतें भी ललिता को गाली देने लगीं और कभी उस की पीठ पर कोई जोर से मारती तो कोई सिर पर.

अपनी मम्मी के साथ यह सब होता देख सुमन जोरजोर से रोने लगी. ललिता ने सुमन का हाथ कस कर पकड़ा हुआ था और ऐसा लग रहा था जैसे उन दोनों का ही यहां कोई नहीं है.

“धक्के मार के गांव से निकालो इस औरत को, हमारी संस्कृति को मजाक बनाके रख दियो. गांव की बाकी छोरियां क्या सीखेंगी इस से, जातबिरादरी में किसी को मुंह ना दिखा सकते अब,” मुखिया ने कहा.

“मुझे इतना ज्ञान देने की बजाए आप इन को कुछ क्यों नहीं कहते? इन में कमी है पूछो इन से?” ललिता ने चिल्ला कर कहा.

“यह क्या बके जा रही है?” आसपास मौजूद सभी लोग चौंक कर कहने लगे.

“क्या बके जा रही हूं? शादी के बाद कोई सुख नहीं मिला इन से तो मेरे जो मन में आया मैं ने किया, इन से कोई कुछ क्यूं नहीं पूछा रहा है,” ललिता ने कहा तो किशोर वहां से उठ कर जाने लगा. किशोर के मुंह पर शर्मिंदगी के भाव साफ नजर आ रहे थे.

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“अरे, कैसी बेशर्म छोरी है, जा अपनी नाजायज औलाद को ले कर मर कहीं चुल्लू भर पानी में,” किशोर की दूर की बुआ चिल्ला कर बोली.

“खबरदार जो मेरी बेटी के लिए कुछ भी कहा. मेरा मुंह ना खुलवाओ नहीं तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. जो सुबह शाम महाभारत देखती हो उस में तो बड़ा गुणगान करती हो अर्जुन का, भीम का, वो कौन सा अपने बाप के जने है. उन्हें तो कभी नाजायज नहीं कहा,” ललिता ने कहा.

यह सुन कर दूर की बुआ के कानों से धुआं निकल गया. उन्होंने ललिता के बाल पकड़ लिए और उसे गालियां देने लगीं, अपशब्द कहने लगीं. वहां मौजूद लोगों में से कोई ललिता के साथ नहीं था न किसी ने उस के हक में कुछ कहा. मुरली भी चुपचाप यह सब देख रहा था. यह सब सुनते हुए कोमल भी कमरे से निकल आई थी और सुमन की ही तरह वह भी यह दृश्य देख रही थी.

ललिता ने उन बुआ का हाथ पकड़ा तो एक और औरत ललिता पर हावी होने आ गई. यह देख कविता अपनी जगह से ललिता के बगल में आई और उन औरतों को हटाते हुए बोली, “गलत क्या कह रही है वो. गलती इस अकेली की तो है नहीं न. इस को मारनेपीटने से या बच्ची को नाजायज कहने से आप लोगों को क्या मिलेगा?”

“तू बीच में मत बोल यह हमारे गाम का मामलो है,” एक आदमी ने कहा.

“आप से ज्यादा यह मेरे घर का मामला है. जाइए आप यहां से सभी,” कविता ने कहा.

“यह औरत हमारे घर नहीं आएगी न इस की छोरी को हम घर में घुसने देंगे,” रिश्तेदार बुआ बोलीं.

इस बात पर अन्य लोग भी हामी भरने लगे कि अब ललिता यहां नहीं रहेगी.

“ललिता, इन की बात मत सुनो, किशोर तुम्हारा पति है ऐसे कैसे छोड़ सकता है तुम्हें,” कविता ने कहा.

ललिता ने कविता के आगे हाथ जोड़ते हुए कहा, “मैं अपनी मां के घर अतरौली चली जाऊंगी, अब मेरा यहां कुछ नहीं है, लेकिन, मेरी छोरी को ले गई तो उस की जिंदगी खराब हो जाएगी. न वो पढ़लिख पाएगी और न उस के सिर पे बाप का साया होगा,” कहते हुए ललिता मुरली की तरफ मुड़ी, “तुम बाप हो न इस के, रख लो इसे. मैं तुम्हारा घर नहीं तोड़ना चाहती लेकिन मैं इसे ले जाने लायक नहीं हूं और इस के पापा को लगता था कि यह भगवान की कृपा से पैदा हुई है लेकिन, सचाई जान कर वो इसे अब नहीं आपनाएंगे. बच्चे किसी की कृपा से नहीं होते यह समझने में उन्हें इतने साल लग गए.”

“पर…,” मुरली कुछ कहता उस से पहले ही कविता बोल पड़ी, “सुमन हमारे साथ रहेगी, मेरी न सही इन की बेटी तो है न.”

लोग बढ़बढ़ाने लगे और ‘कैसी औरत है’, “बेचारा ‘घोर कलयुग आ गया है’, ‘बेचारा किशोर किस के पल्ले पड़ गया’,  कहते हुए निकलने लगे.

आखिर में ललिता जाने लगी तो सुमन उस से लिपट गई.

“मम्मी, कहां जारी है,” सुमन ने रोते हुए कहा, “मुझे भी ले चल.”

“नहीं, अब यही तेरा घर है,” ललिता ने घूंघट हटाया और पल्लू से सुमन के आंसू पोंछने लगी.

“नहीं, मुझे अपने घर जाना है, पापा के पास जाना है, मुझे भी ले चल.”

“एकबार कह दिया ना यहीं रहना है. ना मैं तेरी मां हूं न वो तेरे पापा. बचपन में मांग लिया था तुझे हम ने. अब और नहीं पाल सकते, जा अब,” ललिता ने सुमन का हाथ झड़कते हुए कहा.

कविता की आंखे भर आईं थी यह सब देखते हुए. ललिता वहां से चली गई और कुछ देर बाद एक बैग में सुमन के कपड़े और कुछ खिलौने दे गई. मुरली ने ललिता को देने के लिए कविता के हाथ में कुछ पैसे दिए थे जिन्हें लेने से कविता ने यह कह कर मना कर दिया था कि उन के इतने एहसान वह नहीं चुका पाएगी. जाते हुए वह सुमन को गले से लगा कर गई थी और सुमन उसे नहीं छोड़ रही थी. आखिर ललिता को उसे छोड़ जाना ही पड़ा.

किशोर ललिता के जाते ही अपने चाचा के घर रहने चला गया था, लोगों के मुंह से बारबार जो कुछ हुआ वह सुनना उस की बर्दाश्त के बाहर था. जाते हुए वह सुमन से मिल कर भी नहीं गया था.

शाम हो चुकी थी. सुमन कोने में खड़ी रो रही थी. कविता खुद नहीं समझ पा रही थी कि आखिर यह सब कैसे हो गया. कोमल मुरली के साथ चारपाई पर बैठी हुई थी.

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कविता ने सुमन को अपने पास बुलाना चाहा पर वह नहीं आई. वह खुद उठ कर उस के पास गई, बोली, “यह तुम्हारा घर है और यह तुम्हारी बहन है. हमें तुम चाची चाचा कह सकती हो. भूख लगी होगी न कुछ खा लो.”

“मुझे नहीं खाना है,” सुमन ने सुबकते हुए कहा.

“नहीं खाओगी तो बीमार हो जाओगी,” कह कर कविता ने कोमल को देखते हुए कहा, “कोमल इधर आ.”

कोमल आ गई.

“स्कूल में मैडम क्या कहतीं हैं, जब कोई खाना नहीं खाता तो क्या होता है?” कविता ने कोमल से पूछा.

“खाना नहीं खाते तो पेट में दर्द होने लगता है और चक्कर आने लगते हैं और दिमाग कमजोर हो जाता है,” कोमल बोली.

“लेकिन, मम्मी तो कुछ और कहवे है,” सुमन ने कहा.

“क्या कहती है?” कविता ने पूछा.

“मम्मी तो कह रही कि पेट में भूख के मारे चूहे मर जाते हैं और बदबू आने लगती है.”

“तू चिंता मत कर, मैं बिल्ली पकड़ कर ले आउंगी, वो तेरे चूहे खा जाएगी और बदबू भी नहीं आएगी,” कोमल ने कहा तो सुमन उस की बात सुन कर खिलखिला कर हंस दी.

यह देख मुरली और कविता मुस्कराने लगे. उन्हें इस नई जिंदगी में ढलने में वक्त लगेगा पर उम्मीदें थीं कि सब ठीक हो जाएगा.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

टूटे घरौंदे

हैवान होते पति

मामला 1

14 मई, 2019 को इंदौर शहर में एक औरत के आपरेशन में डाक्टरों ने उस के प्राइवेट पार्ट से मोटरसाइकिल का एक पार्ट निकाला, जो बच्चेदानी और पेशाब की थैली के बीच में फंसा था.

पार्वती (बदला नाम) इंदौर के स्कीम नंबर 71 में अपने पति प्रकाश भील के साथ एक झुग्गी में रहती थी. वे दोनों मेहनतमजदूरी कर के अपना और अपने 6 बच्चों का पेट पाल रहे थे.

बात अब से तकरीबन 2 साल पहले की है जब एक रात उन दोनों में जम कर झगड़ा हुआ. झगड़े की वजह थी पार्वती का शक कि प्रकाश के किसी औरत से नाजायज संबंध हैं.

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जैसे ही पार्वती ने इस बात पर एतराज जताया तो ‘तूतू मैंमैं’ शुरू हो गई जो झगड़े में तबदील हुई तो गुस्साए प्रकाश ने पार्वती के प्राइवेट पार्ट में बेरहमी से मोटरसाइकिल का क्लच लीवर घुसेड़ दिया.

उस समय चूंकि प्रकाश के साथसाथ पार्वती ने भी शराब पी रखी थी, इसलिए उसे दर्द महसूस नहीं हुआ और वह सो गई. लेकिन दर्द दूसरे दिन भी बरकरार रहा तो वह घबरा गई. बात कुछ ऐसी थी कि किसी को बताते हुए भी उसे शर्म आ रही थी.

इस शर्म का खमियाजा पार्वती दर्द की शक्ल में 2 साल झेलती रही, लेकिन 12 मई, 2019 को जब दर्द बरदाश्त के बाहर हो गया तो वह एमवाई अस्पताल गई जहां ऐक्सरे होने पर पता चला कि उस के प्राइवेट पार्ट के भीतर कोई भारीभरकम चीज घुसी हुई है.

पार्वती ने डाक्टरों को 2 साल पहले का सच बताया तो वे दहल गए और उसे पहले पुलिस में रिपोर्ट करने का मशवरा दिया. प्रकाश के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज होने के बाद डाक्टरों ने आपरेशन कर उस के प्राइवेट पार्ट से 9 सैंटीमीटर लंबा और 3 सैंटीमीटर चौड़ा मोटरसाइकिल का क्लच लीवर निकाला.

एमवाई अस्पताल की औरतों की नामी डाक्टर सोमेन भट्टाचार्य समेत डेढ़ दर्जन डाक्टरों की टीम ने इस आपरेशन को अंजाम दिया तब कहीं जा कर पार्वती की जान बच पाई.

मामला 2

दूसरा हादसा भोपाल के हनुमानगंज थाने के हमीदिया रोड का है. 13 मई, 2019 की सुबह निशा (बदला नाम) जब काम पर जा रही थी तो उस के पति रामप्रकाश ने उस पर तेजाब से हमला कर दिया. इस तेजाबी हमले में निशा बुरी तरह झुलस गई और राहगीरों ने आटोरिकशा में ले जा कर उसे हमीदिया अस्पताल में भरती कराया.

जिस भीड़ ने पति को पकड़ा, उसे नहीं मालूम था कि मामला क्या है. लिहाजा, उन्होंने रामप्रकाश को लुटेरा समझ कर तबीयत से धुन दिया जिस से वह भी अधमरा हो गया. निशा की छाती, पीठ और गरदन बुरी तरह झुलस गई थी.

जब थाने में मामला दर्ज हुआ तब पता चला कि 38 साला रामप्रकाश एक होटल में खाना बनाने का काम करता था. उस ने तकरीबन 15 साल पहले निशा से लव मैरिज की थी और दोनों के 3 बच्चे थे.

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कुछ दिनों से रामप्रकाश को शक हो गया था कि निशा के एक बैंक मुलाजिम से संबंध हैं तो उस ने बीवी के साथ मारपीट शुरू कर दी.

रामप्रकाश आदतन शराबी था. जब रोजरोज की कलह और मारकुटाई निशा की बरदाश्त से बाहर होने लगी तो वह रामप्रकाश से अलग हो कर द्वारिका नगर महल्ले में किराए का मकान ले कर रहने लगी.

लेकिन रामप्रकाश ने वहां भी निशा का पीछा नहीं छोड़ा. वह अकसर वहां पहुंच कर पत्नी को मारता था.

तंग आ कर निशा ने वकील के जरीए उसे तलाक का नोटिस भिजवा दिया तो रामप्रकाश आगबबूला हो गया. इस से उस का शक और पुख्ता हो गया.

तलाक के नोटिस को भी उस ने अपनी बेइज्जती समझा. लिहाजा, हादसे वाले दिन वह स्टील के बरतन में तेजाब ले कर बस स्टौप पर निशा का इंतजार करने लगा और जैसे ही वह आई तो उस पर तेजाब उड़ेल दिया.

प्रकाश की तरह रामप्रकाश भी जेल में है. अपने बयान में उस ने पुलिस को बताया कि उस का इरादा तो पत्नी को मार डालने का था, लेकिन वह बच गई.

मामला 3

सुनील (बदला नाम) अपनी पत्नी ज्योति (बदला नाम) के साथ शराब के नशे में मारपीट करता था. उसे भी पत्नी के चालचलन पर शक था.

पत्नी पुलिस वाली हो तो उस के साथ जरूरत से ज्यादा मारपीट करना मुमकिन नहीं रह जाता, इसलिए सुनील ने दूसरा तरीका अपनाया. उस ने ज्योति के पर्सनल फोटो सोशल मीडिया पर शेयर कर दिए थे. इस से ज्योति का किसी को मुंह दिखाना दूभर हो गया तो उस ने झक मार कर कमला नगर थाने में सुनील की इस करतूत की रिपोर्ट लिखाई.

सुनील भी प्रकाश और रामप्रकाश की तरह जेल में बंद है.

तीसरे का रोल अहम

तीनों ही मामलों में एक बात समान है कि पतिपत्नी के बीच कोई तीसरा या तीसरी थी जो पत्नी की ही ऐसी गत की वजह बने. इस में नुकसान भी पत्नी का ही हुआ जिस पर यह कहावत लागू होती है कि छुरा खरबूजे पर गिरे या खरबूजा छुरे पर कटना तो खरबूजे को ही पड़ता है.

शुरू के 2 मामलों में तीसरे या तीसरी की ऐंट्री शादी के कई साल बाद हुई जबकि तीसरे मामले में तीसरे को आए ज्यादा दिन नहीं हुए थे यानी शक इस तरह की वारदातों की बड़ी वजह है जिस के चलते पतिपत्नी रोज झगड़ते हैं, फिर एक दिन पति अपनी मर्दानगी दिखा ही देता है. इस के बाद वह अपने अंजाम और बच्चों की जिंदगी की भी परवाह नहीं करता है.

शादीशुदा जिंदगी में कोई पति या पत्नी यह बरदाश्त नहीं कर पाते हैं कि उन के पार्टनर के कहीं और संबंध बनें तो यह हक कम पार्टनर का आदी हो जाना ज्यादा है. पार्टनर का अलग कहीं संबंध बना लेना कोई नई बात नहीं है और इस में पत्नियां भी पीछे नहीं रहती हैं.

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लेकिन अफसोस की बात यह कि पिटती हमेशा पत्नी ही है क्योंकि औरत होने के नाते वह कुदरती तौर पर कमजोर होती है और घर के बाहर उस का कोई सहारा आमतौर पर नहीं होता है.

पुलिस में जाना भी इस समस्या का हल नहीं है क्योंकि पुलिस वाले जब तक कोई बड़ी वारदात न हो तब तक पतिपत्नी के बीच दखल नहीं देते हैं.

जाएं तो जाएं कहां

निशा ने सही कदम उठाया था लेकिन अलग होने के बाद भी पति उस का पीछा नहीं छोड़ रहा था. शादी के

5-6 साल बाद अगर पतिपत्नी में झगड़े होते हैं और पत्नी अलग रहने का फैसला लेती है तब उस का साथ कोई नहीं देता और कोई देता भी है तो उस की कीमत वसूलता है.

पत्नियां अगर मायके में जा कर रहें तो वहां भी बोझ समझी जाती हैं और उन्हें अपने ही घर में नौकरों की तरह काम करना पड़ता है.

फिर पति की मारकुटाई की सताई औरतें जाएं तो जाएं कहां? इस सवाल का जवाब किसी के पास नहीं है और इस का फायदा ही पति उठाते हैं.

नौबत या बात जब जान लेने और देने तक आ जाए तब जरूर पत्नियों को संभल जाना चाहिए और यह समझना चाहिए कि रोजरोज एक ही मसले पर कलह किसी के लिए ठीक नहीं, इसलिए कलह की वजह कुछ भी हो, पति के मुंह ज्यादा नहीं लगना चाहिए. खासतौर से उस वक्त, जब वह शराब के नशे में हो.

तो क्या फिर पत्नियां यों ही पिटती रहेंगी या फिर पति की हैवानियत का शिकार होती रहेंगी? इस सवाल का जवाब बड़े अफसोसजनक ढंग से हां में ही निकलता है, क्योंकि समाज मर्दों का है, घर के मुखिया वे ही होते हैं और पत्नी जब ज्यादा खिलाफत या कलह करती है, तो उसे मारने तक उतारू हो आते हैं.

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चिंता की बात हैवान शौहरों की तादाद में इजाफा होना है. रोज हजारों पार्वती, निशा और ज्योति शौहर की हैवानियत का शिकार हो रही होती हैं, लेकिन कड़वा सच यही है कि वे जाएं तो जाएं कहां?

स्मृति चक्र

स्मृति चक्र: भाग 1

लेखिका- विनीता कुमार

विभा ने झटके से खिड़की का परदा एक ओर सरका दिया तो सूर्य की किरणों से कमरा भर उठा.

‘‘मनु, जल्दी उठो, स्कूल जाना है न,’’ कह कर विभा ने जल्दी से रसोई में जा कर दूध गैस पर रख दिया.

मनु को जल्दीजल्दी तैयार कर के जानकी के साथ स्कूल भेज कर विभा अभी स्नानघर में घुसी ही थी कि फिर घंटी बजी. दरवाजा खोल कर देखा, सामने नवीन कुमार खड़े मुसकरा रहे थे.

‘‘नमस्कार, विभाजी, आज सुबहसुबह आप को कष्ट देने आ गया हूं,’’ कह कर नवीन कुमार ने एक कार्ड विभा के हाथ में थमा दिया, ‘‘आज हमारे बेटे की 5वीं वर्षगांठ है. आप को और मनु को जरूर आना है. अच्छा, मैं चलूं. अभी बहुत जगह कार्ड देने जाना है.’’

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निमंत्रणपत्र हाथ में लिए पलभर को विभा खोई सी खड़ी रह गई. 6-7 दिन पहले ही तो मनु उस के पीछे पड़ रही थी, ‘मां, सब बच्चों की तरह आप मेरा जन्मदिन क्यों नहीं मनातीं? इस बार मनाएंगी न, मां.’

‘हां,’ गरदन हिला कर विभा ने मनु को झूठी दिलासा दे कर बहला दिया था.

जल्दीजल्दी तैयार हो विभा दफ्तर जाने लगी तो जानकी से कह गई कि रात को सब्जी आदि न बनाए, क्योंकि मांबेटी दोनों को नवीन कुमार के घर दावत पर जाना था.

घर से दफ्तर तक का बस का सफर रोज ही विभा को उबा देता था, किंतु उस दिन तो जैसे नवीन कुमार का निमंत्रणपत्र बीते दिनों की मीठी स्मृतियों का तानाबाना सा बुन रहा था.

मनु जब 2 साल की हुई थी, एक दिन नाश्ते की मेज पर नितिन ने विभा से कहा था, ‘विभा, जब अगले साल हम मनु की सालगिरह मनाएंगे तो सारे व्यंजन तुम अपने हाथों से बनाना. कितना स्वादिष्ठ खाना बनाती हो, मैं तो खाखा कर मोटा होता जा रहा हूं. बनाओगी न, वादा करो.’

नितिन और विभा का ब्याह हुए 4 साल हो चुके थे. शादी के 2 साल बाद मनु का जन्म हुआ था. पतिपत्नी के संबंध बहुत ही मधुर थे. नितिन का काम ऐसी जगह था जहां लड़कियां ज्यादा, लड़के कम थे. वह प्रसाधन सामग्री बनाने वाली कंपनी में सहायक प्रबंधक था. नितिन जैसे खूबसूरत व्यक्ति के लिए लड़कियों का घेरा मामूली बात थी, पर उस ने अपना पारिवारिक जीवन सुखमय बनाने के लिए अपने चारों ओर विभा के ही अस्तित्व का कवच पहन रखा था. विभा जैसी गुणवान, समझदार और सुंदर पत्नी पा कर नितिन बहुत प्रसन्न था.

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विलेपार्ले के फ्लैट में रहते नितिन को 6 महीने ही हुए थे. मनु ढाई साल की हो गई थी. उन्हीं दिनों उन के बगल वाले फ्लैट में कोई कुलदीप राज व सामने वाले फ्लैट में नवीन कुमार के परिवार आ कर रहने लगे थे. दोनों परिवारों में जमीन- आसमान का अंतर था. जहां नवीन कुमार दंपती नित्य मनु को प्यार से अपने घर ले जा कर उसे कभी टौफी, चाकलेट व खिलौने देते, वहीं कुलदीप राज और उन की पत्नी मनु के द्वारा छुई गई उन की मनीप्लांट की पत्ती के टूट जाने का रोना भी कम से कम 2 दिन तक रोते रहते.

एक दिन नवीन कुमार के परिवार के साथ नितिन, विभा और मनु पिकनिक मनाने जुहू गए थे. वहां नवीन का पुत्र सौमित्र व मनु रेत के घर बना रहे थे.

अचानक नितिन बोला, ‘विभा, क्यों न हम अपनी मनु की शादी सौमित्र से तय कर दें. पहले जमाने में भी मांबाप बच्चों की शादी बचपन में ही तय कर देते थे.’

नितिन की बात सुन कर सभी खिलखिला कर हंस पड़े तो नितिन एकाएक उदास हो गया. उदासी का कारण पूछने पर वह बोला, ‘जानती हो विभा, एक ज्योतिषी ने मेरी उम्र सिर्फ 30 साल बताई है.’

विभा ने झट अपना हाथ नितिन के होंठों पर रख उसे चुप कर दिया था और झरझर आंसू की लडि़यां बिखेर कर कह उठी थी, ‘ठीक है, अगर तुम कहते हो तो सौमित्र से ही मनु का ब्याह करेंगे, पर कन्यादान हम दोनों एकसाथ करेंगे, मैं अकेली नहीं. वादा करो.’

बस रुकी तो विभा जैसे किसी गहरी तंद्रा से जाग उठी, दफ्तर आ गया था.

लौटते समय बस का इंतजार करना विभा ने व्यर्थ समझा. धीरेधीरे पैदल ही चलती हुई घंटाघर के चौराहे को पार करने लगी, जहां कभी वह और नितिन अकसर पार्क की बेंच पर बैठ अपनी शामें गुजारते थे.

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सभी कुछ वैसा ही था. न पार्क बदला था और न वह पत्थर की लाल बेंच. विभा समझ नहीं पा रही थी कि उस दिन उसे क्या हो रहा था. जहां उसे घर जाने की जल्दी रहती थी, वहीं वह जानबूझ कर विलंब कर रही थी. यों तो वह इन यादों को जीतोड़ कोशिशों के बाद किसी कुनैन की गोली के समान ही सटक कर अपनेआप को संयमित कर चुकी थी.

हालांकि वह तूफान उस के दांपत्य जीवन में आया था, तब वह अपनेआप को बहुत ही कमजोर व मानसिक रूप से असंतुलित महसूस करती थी और सोचती थी कि शायद ही वह अधिक दिनों तक जी पाएगी, पर 3 साल कैसे निकल गए, कभी पीछे मुड़ कर विभा देखती तो सिर्फ मनु ही उसे अंधेरे में रोशनी की एक किरण नजर आती, जिस के सहारे वह अपनी जिंदगी के दिन काट रही थी.

उस दिन की घटना इतना भयानक रूप ले लेगी, विभा और नितिन दोनों ने कभी ऐसी कल्पना भी नहीं की थी.

एक दिन विभा के दफ्तर से लौटते ही एक बेहद खूबसूरत तितलीनुमा लड़की उन के घर आई थी, ‘‘आप ही नितिन कुमार की पत्नी हैं?’’

‘‘जी, हां. कहिए, आप को पहचाना नहीं मैं ने,’’ विभा असमंजस की स्थिति में थी.

उस आधुनिका ने पर्स में से सिगरेट निकाल कर सुलगा ली थी. विभा कुछ पूछती उस से पहले ही उस ने अपनी कहानी शुरू कर दी, ‘‘देखिए, मेरा नाम शुभ्रा है. मैं दिल्ली में नितिन के साथ ही कालिज में पढ़ती थी. हम दोनों एकदूसरे को बेहद चाहते थे. अचानक नितिन को नौकरी मिल गई. वह मुंबई चला आया और मैं, जो उस के बच्चे की मां बनने वाली थी, तड़पती रह गई. उस के बाद मातापिता ने मुझे घर से निकाल दिया. फिर वही हुआ जो एक अकेली लड़की का इस वहशी दुनिया में होता है. न जाने कितने मर्दों के हाथों का मैं खिलौना बनी.’’

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

Short Story : पापा मिल गए- सोफिया को कैसे मिले उसके पापा

शब्बीर की मौत के बाद दोबारा शादी का जोड़ा पहन कर इकबाल को अपना पति मानने के लिए बानो को दिल पर पत्थर रख कर फैसला करना पड़ा, क्योंकि हालात से समझौता करने के सिवा कोई दूसरा रास्ता भी तो उस के पास नहीं था.

अपनी विधवा मां पर फिर से बोझ बन जाने का एहसास बानो को बारबार कचोटता और बच्ची सोफिया के भविष्य का सवाल न होता, तो वह दोबारा शादी की बात सोचती तक नहीं.

‘‘शादी मुबारक हो,’’ कमरे में घुसते ही इकबाल ने कहा.

‘‘आप को भी,’’ सुन कर बानो को शब्बीर की याद आ गई.

इकबाल को भी नुसरत की याद आ गई, जो शादी के 6-7 महीने बाद ही चल बसी थी. वह बानो को प्यार से देखते हुए बोला, ‘‘क्या मैं ने अपनी नस्सू को फिर से पा लिया है?’’

तभी किसी ने दरवाजा खटखटाया.

‘‘क्या बात है?’’ कहते हुए इकबाल ने दरवाजा खोला तो देखा कि सामने उस की साली सलमा रोतीबिलखती सोफिया को लादे खड़ी है.

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‘‘आपा के लिए यह कब से परेशान है? चुप होने का नाम ही नहीं लेती. थोड़ी देर के लिए आपा इसे सीने से लगा लेतीं, तो यह सो जाती,’’ सलमा ने डरतेडरते कहा.

‘‘हां… हां… क्यों नहीं,’’ सलमा को अंदर आ जाने का इशारा करते हुए इकबाल ने गुस्से में कहा.

रोती हुई सोफिया को बानो की गोद में डाल कर सलमा तेजी से कमरे से बाहर निकल गई. इधर बानो की अजीब दशा हो रही थी. वह कभी सोफिया को चुप कराने की कोशिश करती, तो कभी इकबाल के चेहरे को पढ़ने की कोशिश करती.

सोफिया के लिए इकबाल के चेहरे पर गुस्सा साफ झलक रहा था. इस पर बानो मन ही मन सोचने लगी कि सोफिया की भलाई के चक्कर में कहीं वह गलत फैसला तो नहीं कर बैठी?

सुबह विदाई के समय सोफिया ने अपनी अम्मी को एक अजनबी के साथ घर से निकलते देखा, तो झट से इकबाल का हाथ पकड़ लिया और कहने लगी, ‘‘आप कौन हैं? अम्मी को कहां ले जा रहे हैं?’’

सोफिया के बगैर ससुराल में बानो का मन बिलकुल नहीं लग रहा था. अगर हंसतीबोलती थी, तो केवल इकबाल की खातिर. शादी के बाद बानो केवल 2-4 दिन के लिए मायके आई थी. उन दिनों सोफिया इकबाल से बारबार पूछती, ‘‘मेरी अम्मी को आप कहां ले गए थे? कौन हैं आप?’’

‘‘गंदी बात बेटी, ऐसा नहीं बोलते. यह तुम्हारे खोए हुए पापा हैं, जो तुम्हें मिल गए हैं,’’ बानो सोफिया को भरोसा दिलाने की कोशिश करती.

‘‘नहीं, ये पापा नहीं हो सकते. रोजी के पापा उसे बहुत प्यार करते हैं. लेकिन ये तो मुझे पास भी नहीं बुलाते,’’ सोफिया मासूमियत से कहती.

सोफिया की इस मासूम नाराजगी पर एक दिन जाने कैसे इकबाल का दिल पसीज उठा. उसे गोद में उठा कर इकबाल ने कहा, ‘‘हां बेटी, मैं ही तुम्हारा पापा हूं.’’

यह सुन कर बानो को लगने लगा कि सोफिया अब बेसहारा नहीं रही. मगर सच तो यह था कि उस का यह भरोसा शक के सिवा कुछ न था. इस बात का एहसास बानो को उस समय हुआ, जब इकबाल ने सोफिया को अपने साथ न रखने का फैसला सुनाया.

‘‘मैं मानता हूं कि सोफिया तुम्हारी बेटी है. इस से जुड़ी तुम्हारी जो भावनाएं हैं, उन की मैं भी कद्र करता हूं, मगर तुम को मेरी भी तो फिक्र करनी चाहिए. आखिर कैसी बीवी हो तुम?’’ इकबाल ने कहा.

‘‘बस… बस… समझ गई आप को,’’ बानो ने करीब खड़ी सोफिया को जोर से सीने में भींच लिया.

इस बार बानो ससुराल गई, तो पूरे 8 महीने बाद मायके लौट कर वापस आई. आने के दोढाई हफ्ते बाद ही उस ने एक फूल जैसे बच्चे को जन्म दिया. इकबाल फूला नहीं समा रहा था. उस के खिलेखिले चेहरे और बच्चे के प्रति प्यार से साफ जाहिर था कि असल में तो वह अब बाप बना है.

आसिफ के जन्म के बाद इकबाल सोफिया से और ज्यादा दूर रहने लगा था. इस बात को केवल बानो ही नहीं, बल्कि उस के घर वाले भी महसूस करने लगे थे.

इकबाल के रूखे बरताव से परेशान सोफिया एक दिन अम्मी से पूछ बैठी, ‘‘पापा, मुझ से नाराज क्यों रहते हैं? टौफी खरीदने के लिए पैसे भी नहीं देते. रोजी के पापा तो रोज उसे एक सिक्का देते हैं.’’

‘‘ऐसी बात नहीं है बेटी. पापा तुम से भला नाराज क्यों रहेंगे. वे तुम्हें टौफी के लिए पैसा इसलिए नहीं देते, क्योंकि तुम अभी बहुत छोटी हो. पैसा ले कर बाहर निकलोगी, तो कोई छीन लेगा.

‘‘पापा तुम्हारा पैसा बैंक में जमा कर रहे हैं. बड़ी हो जाओगी, तो सारे पैसे निकाल कर तुम्हें दे देंगे.’’

‘‘मगर, पापा मुझे प्यार क्यों नहीं करते? केवल आसिफ को ही दुलार करते हैं,’’ सोफिया ने फिर सवाल किया.

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‘‘दरअसल, आसिफ अभी बहुत छोटा है. अगर पापा उस का खयाल नहीं रखेंगे, तो वह नाराज हो जाएगा,’’ बानो ने समझाने की कोशिश की.

इसी बीच आसिफ रोने लगा, तभी इकबाल आ गया, ‘‘यह सब क्या हो रहा है बानो? बच्चा रो रहा है और तुम इस कमबख्त की आंखों में आंखें डाल कर अपने खो चुके प्यार को ढूंढ़ रही हो.’’ इकबाल के शब्दों ने बानो के दिल को गहरी चोट पहुंचाई.

‘यह क्या हो रहा है?’ घबरा कर उस ने दिल ही दिल में खुद से सवाल किया, ‘मैं ने तो सोफिया के भले के लिए जिंदगी से समझौता किया था, मगर…’ वह सिसक पड़ी.

इकबाल ने घर लौटने का फैसला सुनाया, तो बानो डरतेडरते बोली, ‘‘4-5 रोज से आसिफ थोड़ा बुझाबुझा सा लग रहा है. शायद इस की तबीयत ठीक नहीं है. डाक्टर को दिखाने के बाद चलते तो बेहतर होता.’’

इकबाल ने कोई जवाब नहीं दिया. आसिफ को उसी दिन डाक्टर के पास ले जाया गया.

‘‘इस बच्चे को जौंडिस है. तुरंत इमर्जैंसी वार्ड में भरती करना पड़ेगा,’’ डाक्टर ने बच्चे का चैकअप करने के बाद फैसला सुनाया, तो इकबाल माथा पकड़ कर बैठ गया.

‘‘अब क्या होगा?’’ माली तंगी और बच्चे की बीमारी से घबरा कर इकबाल रोने लगा.

‘‘पापा, आप तो कभी नहीं रोते थे. आज क्यों रो रहे हैं?’’ पास खड़ी सोफिया इकबाल की आंखों में आंसू देख कर मचल उठी.

डरतेडरते सोफिया बिलकुल पास आ गई और इकबाल की भीगी आंखों को अपनी नाजुक हथेली से पोंछते हुए फिर बोली, ‘‘बोलिए न पापा, आप किसलिए रो रहे हैं? आसिफ को क्या हो गया है? वह दूध क्यों नहीं पी रहा?’’

सोफिया की प्यारी बातों से अचानक पिघल कर इकबाल ने कहा, ‘‘बेटी, आसिफ की तबीयत खराब हो गई है. इलाज के लिए डाक्टर बहुत पैसे मांग रहे हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं पापा. आप ने मेरी टौफी के लिए जो पैसे बैंक में जमा कर रखे हैं, उन्हें निकाल कर जल्दी से डाक्टर अंकल को दे दीजिए. वह आसिफ को ठीक कर देंगे,’’ सोफिया ने मासूमियत से कहा.

इकबाल सोफिया की बात समझ नहीं सका. पूछने के लिए उस ने बानो को बुलाना चाहा, मगर वह कहीं दिखाई नहीं दी. दरअसल, बानो इकबाल को बिना बताए आसिफ को अपनी मां की गोद में डाल कर बैंक से वह पैसा निकालने गई हुई थी, जो शब्बीर ने सोफिया के लिए जमा किए थे.

‘‘इकबाल बाबू, बानो किसी जरूरी काम से बाहर गई है, आती ही होगी. आप आसिफ को तुरंत भरती कर दें. पैसे का इंतजाम हो जाएगा,’’ आसिफ को गोद में चिपकाए बानो की मां ने पास आ कर कहा, तो इकबाल आसिफ को ले कर बोझिल मन से इमर्जैंसी वार्ड की तरफ बढ़ गया.

सेहत में काफी सुधार आने के बाद आसिफ को घर ले आया गया.

‘‘यह तुम ने क्या किया बानो? शब्बीर भाई ने सोफिया के लिए कितनी मुश्किल से पैसा जमा किया होगा, मगर…’’ असलियत जानने के बाद इकबाल बानो से बोला.

‘‘सोफिया की बाद में आसिफ की जिंदगी पहले थी,’’ बानो ने कहा.

‘‘तुम कितनी अच्छी हो. वाकई तुम्हें पा कर मैं ने नस्सू को पा लिया है.’’

‘‘वाकई बेटी, बैंक में अगर तुम्हारी टौफी के पैसे जमा न होते, तो आसिफ को बचाना मुश्किल हो जाता,’’ बानो की तरफ से नजरें घुमा कर सोफिया को प्यार से देखते हुए इकबाल ने कहा.

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‘‘मैं कहती थी न कि यही तुम्हारे पापा हैं?’’ बानो ने सोफिया से कहा.

इकबाल ने भी कहा, ‘‘हां बेटी, मैं ही तुम्हारा पापा हूं.’’

सोफिया ने बानो की गोद में खेल रहे आसिफ के सिर को सीने से सटा लिया और इकबाल का हाथ पकड़ कर बोली, ‘‘मेरे पापा… मेरे अच्छे पापा.’’

Best of Manohar Kahaniya: जैंट्स पार्लरों में चलता गरम जिस्म का खेल

बिहार की राजधानी पटना के तकरीबन हर इलाके में जैंट्स पार्लरों की भरमार सी है. चमचमाते और रंगबिरंगे पार्लर मनचले नौजवानों और मर्दों को खुलेआम न्योता देते रहते हैं. इन पार्लरों के आसपास गहरा मेकअप किए इठलातीबलखाती और मचलती लड़कियां मोबाइल फोन पर बातें करती दिख जाती हैं. अपने परमानैंट ग्राहकों को सैक्सी बातों से रिझातीपटाती नजर आ ही जाती हैं. वैसे, इन पार्लरों में हर तरह की ‘सेवा’ दी जाती है. कुरसी के हैडरैस्ट के बजाय लड़कियों के सीने पर सिर रख कर शेव बनवाने और फेस मसाज का मजा लीजिए या फिर लड़कियों के गालों पर चिकोटियां काटते हुए मसाज का मजा लीजिए.

फेस मसाज, हाफ बौडी मसाज से ले कर फुल बौडी मसाज की सर्विस हाजिर है. जैसा काम, वैसी फीस यानी पैसा फेंकिए और केवल तमाशा मत देखिए, बल्कि खुद भी तमाशे में शामिल हो कर जिस्मानी सुख का भरपूर मजा उठाइए.

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जैंट्स पार्लरों में ग्राहकों से मनमाने दाम वसूले जाते हैं. शेव बनवाने की फीस 5 सौ से एक हजार रुपए तक है. फेस मसाज कराना है, तो एक हजार से 2 हजार रुपए तक ढीले करने होंगे. हाफ बौडी मसाज के लिए 3 हजार से 5 हजार रुपए देने पड़ेंगे और फुल बौडी मसाज के तो कोई फिक्स दाम नहीं हैं.

पटना के बोरिंग रोड, फ्रेजर रोड, ऐक्जिबिशन रोड, डाकबंगला रोड, कदमकुआं, पीरबहोर, मौर्यलोक कौंप्लैक्स, स्टेशन रोड, राजा बाजार, कंकड़बाग, एसके नगर वगैरह इलाकों में जैंट्स मसाज पार्लरों की भरमार है.

पिछले कुछ महीनों में पुलिस की छापामारी से जैंट्स पार्लरों का धंधा कुछ मंदा तो हुआ?है, पर पूरी तरह से बंद नहीं हुआ है. थानों की मिलीभगत से जैंट्स पार्लरों का खेल चल रहा है.

कुछ साल पहले तक मसाज पार्लरों में नेपाली और बंगलादेशी लड़कियों की भरमार थी, पर अब उन की तादाद कम हुई है. बिहार और उत्तर प्रदेश की  लड़कियां अब उन में काम कर रही हैं. इन में ज्यादातर गरीब घरों की लड़कियां ही होती हैं, जो पेट की आग बुझाने के लिए यह धंधा करने को मजबूर हैं.

फ्रेजर रोड के एक पार्लर में काम करने वाली सलमा बताती है कि उस का शौहर उसे छोड़ कर मुंबई भाग गया. अपनी 7 साल की बेटी को पालने के लिए उसे मजबूरी में मसाज पार्लर में काम करना पड़ा.

इसी तरह पति की मौत हो जाने के बाद ससुराल वालों की मारपीट की वजह से रोहतास से भाग कर पटना पहुंची सोनी काम की खोज में बहुत भटकी, पर उसे कोई काम नहीं मिला. बाद में उस की सहेली ने उसे जैंट्स पार्लर में काम दिलाया.

सोनी बताती है कि पहले तो उसे मर्दों की सैक्सी निगाहों और हरकतों से काफी शर्म आती थी. कई बार यह काम छोड़ने का मन किया, पर अब इन सब की आदत हो गई है.

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समाजसेवी प्रवीण सिन्हा कहते हैं कि ऐसे पार्लरों में काम करने वाली ज्यादातर लड़कियों और औरतों के पीछे बेबसी और मजबूरी की कहानी होती है. कुछ लड़कियां ही ऐसी होती हैं, जो ऐशमौज करने और महंगे शौक पूरा करने के लिए मसाज करने और जिस्म बेचने का काम करती हैं.

वहां आसपास रहने वाले लोगों की कई शिकायतों के बाद कभीकभार पुलिस जागती है और एकसाथ कई मसाज पार्लरों पर छापामारी कर कई लड़कियों, पार्लर चलाने वालों और दर्जनों ग्राहकों को पकड़ कर ले जाती है.

पुलिस देह धंधा करने के आरोप में लड़कियों और ग्राहकों की धरपकड़ करती है. 2-3 दिनों तक तो पार्लर पर ताला दिखता है और फिर पुलिस, कानून और समाज के ठेकेदारों को ठेंगा दिखाते हुए धंधा चालू हो जाता है और बेधड़क चलता रहता है.

पुलिस के एक आला अफसर कहते हैं कि जिस्मानी धंधे की शिकायत मिलने के बाद ही पुलिस छापामारी करती है. प्रिवैंशन औफ इम्मोरल ट्रैफिक ऐक्ट के तहत शिकायतों के बाद छापामारी की जाती है. पार्लर से पकड़ी गई लड़कियां या औरतें यह नहीं बताती हैं कि उन्हें जबरदस्ती या लालच दे कर काम कराया जा रहा है. वे तो पुलिस को यही बयान देती हैं कि वे अपनी मरजी से काम कर रही हैं. अगर वे देह बेचने को मजबूर नहीं की गई हैं, तो प्रिवैंशन औफ इम्मोरल ट्रैफिक ऐक्ट बेमानी हो जाता है. इस से कानून कुछ नहीं कर पाता है.

पुलिस के एक रिटायर्ड अफसर की मानें, तो ऐसे पार्लरों पर छापामारी पुलिस के लिए पैसा उगाही का जरीया भर है. पुलिस को पता है कि ऐसे मसाज पार्लरों पर कानूनी कार्यवाही नहीं हो सकती है, वह महज रोबधौंस दिखा कर ‘वसूली’ कर लड़कियों और संचालकों को छोड़ देती है. जो पार्लर सही समय पर थानों में चढ़ावा नहीं चढ़ाते हैं, वहीं छापामारी की जाती है.

पटना हाईकोर्ट के वकील उपेंद्र प्रसाद कहते हैं कि जिस्म के धंधे और यौन शोषण की शिकायत पर कानूनी कार्यवाही तभी हो सकती है, जब वह दबाव बना कर कराया जा रहा हो. जब किसी औरत का जबरन या खरीदफरोख्त के लिए यौन शोषण नहीं किया जा रहा है, तो वह कानूनन देह धंधा नहीं माना जाएगा.

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मसाज पार्लरों से पकड़ी गई लड़कियां कभी यह नहीं कहती हैं कि उन से जबरन कोई काम कराया जा रहा है, फिर यह कैसे कहा जा सकता है कि किसी जैंट्स पार्लर में जिस्मफरोशी का धंधा चलता है?

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