एक आंख का नूर

घर में घुसते ही वारिस ने अपनी पत्नी को आवाज दी, ‘‘सलमा, 2 कप चाय बनाना.’’

सलमा खाना बनाने की तैयारी कर रही थी. पति ने 2 कप चाय मांगी थी, इस का मतलब उस के साथ कोई आया था. उस ने किचन से बाहर आ कर देखा तो वारिस किसी हमउम्र युवक के साथ बैठा था. सलमा उसे पहचानती नहीं थी. इस का मतलब वह पहली बार आया था.

कुछ देर में सलमा चाय और पानी ले कर आई तो युवक ने हाथ जोड़ कर नमस्ते किया. वह चायपानी की ट्रे रख कर खड़ी हुई तो वारिस ने उस युवक का परिचय कराया, ‘‘यह मेरा दोस्त सुलतान है, सीबीगंज के मथुरापुर गांव में रहता है. ये भी आटो ड्राइवर है.’’

चाय पी कर सुलतान जाने के लिए उठा तो सलमा ने कहा, ‘‘अभी आप इन से कह रहे थे कि आप की पत्नी की तबीयत ठीक नहीं है. मतलब घर में खाना भी नहीं बना होगा. खाने का समय है, खाना खा कर जाना.’’

सुलतान संकोचवश कुछ नहीं बोला तो वारिस ने पत्नी की हां में हां मिलाते हुए कहा, ‘‘अब तुम्हारी भाभी ने कह दिया है तो खाना खाना ही होगा. यह बिना खाना खाए नहीं जाने देगी.’’

सुलतान बैठ गया. सलमा ने जल्दीजल्दी सुलतान और पति के लिए खाना लगाया. सलमा ने सुलतान को इतने प्यार से खाना खिलाया कि वह जरूरत से ज्यादा खा गया. वह पेट पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘भाभी, आप बहुत अच्छा खाना बनाती हैं.’’

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30 वर्षीय सुलतान ने 2 निकाह किए थे. उस का पहला निकाह 5 साल पहले बरेली के बाकरगंज में रहने वाली रानो से हुआ था, जिस से उसे 2 बेटियां और एक बेटा था. रानो का चालचलन ठीक न होने पर सुलतान उसे उस के मायके छोड़ आया था.

इस के बाद सुलतान ने दूसरा निकाह बिहार के कटिहार जिले की शबीना से किया, जिस से 2 बेटे हुए.

सुलतान आटो चलाता था. एक ही काम में होने के वजह से दोनों में गहरी दोस्ती थी. वारिस अपने परिवार के साथ फतेहगंज (पश्चिम) के मोहल्ला कंचननगर में रहता था. परिवार में उस की पत्नी सलमा और 2 बेटे थे. जबकि सुलतान अपनी पत्नी और बेटियों के साथ महानगर बरेली के गांव मथुरानगर में रहता था.

दोस्ती की वजह से एक दिन वारिस सुलतान को अपने घर ले गया और चायनाश्ता ही नहीं, खाना भी खिलाया. उस दिन सुलतान ने कुछ नहीं कहा, लेकिन 4 दिन बाद उस की गाड़ी खराब हो गई तो वह वारिस के घर जा पहुंचा. पता चला वारिस नहा रहा है.

सुलतान ने सलमा से कहा, ‘‘भाभी, उस दिन आप ने जो खाना खिलाया था, बहुत स्वादिष्ट था. आप खाना बहुत अच्छा बनाती हैं.’’

‘‘मैं और काम भी बहुत अच्छे से करती हूं.’’ सलमा ने एक आंख दबा कर कहा.

सुलतान सलमा की इस हरकत से दंग रह गया. वह कुछ कहता, तभी वारिस ने बाथरूम से बाहर आ कर कहा, ‘‘सुबहसुबह कैसे आना हुआ भाई?’’

‘‘यार, मेरी गाड़ी खराब हो गई है, उसे मिस्त्री के यहां पहुंचाना है. मेरी गाड़ी अपनी गाड़ी में बांध लो तो आसानी हो जाएगी.’’

‘‘आज मेरी तबीयत ठीक नहीं है, इसलिए मैं काम पर नहीं जाऊंगा. तुम मेरी गाड़ी ले जाओ. उसी में अपनी गाड़ी बांध लेना. उसे मिस्त्री के यहां छोड़ कर पूरे दिन मेरी गाड़ी चलाना, शाम को गाड़ी खड़ी करने आओगे तो हिसाब दे देना.’’

सुलतान वारिस की गाड़ी ले गया. दिन भर गाड़ी चला कर वह हिसाब देने आया तो सलमा उस के लिए पानी ले कर आई. सुलतान ने गिलास थामते हुए उस की ओर देखा तो उस ने फिर आंख दबा दी. सुलतान अचकचा गया. सलमा धीरे से बोली, ‘‘मौका मिले तो आ जाना.’’

सुलतान को सलमा की हरकतें अजीब लग रही थीं. उस ने आने के लिए क्यों कहा, यह सोचते हुए सुलतान अपने घर आ गया.

एक दिन सुलतान स्टैंड पर खड़ा सवारियों का इंतजार कर रहा था, तभी उसे सलमा आती दिखाई दी. सब से आगे सुलतान का ही आटो खड़ा था. इसलिए उस ने सुलतान के पास आ कर मुसकराते हुए पूछा, ‘‘क्या मुझे मेरे घर तक छोड़ दोगे?’’

‘‘क्यों नहीं भाभी, आओ बैठो.’’ कह कर सुलतान सवारियों का इंतजार किए बिना ही सलमा को ले कर चल पड़ा.

सुलतान चुपचाप गाड़ी चला रहा था. उसे इस तरह खामोश देख कर सलमा ने पूछा, ‘‘क्या बात है, बहुत खामोश हो?’’

‘‘तबीयत कुछ भारीभारी सी है. आज वरिस नहीं दिखा, कहीं गया है क्या?’’

‘‘वह बाहर गए हुए हैं. आज बहुत गरमी है, घर चलो. तुम्हें नींबू का शरबत पिलाती हूं.’’ सलमा ने मीठे स्वर में कहा.

‘‘नहीं भाभी, आप को परेशान होने की जरूरत नहीं है. ड्राइवरों को गरमीसर्दी सब झेलनी पड़ती है.’’

‘‘कुछ भी हो, शरबत तो पीना ही पड़ेगा.’’ सलमा ने जिद की.

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सुलतान चुप रह गया. उस ने सलमा के घर के सामने गाड़ी रोकी तो सलमा ने आटो से उतर कर ताला खोला. उस ने सुलतान को अंदर बुला कर बैठा दिया और खुद शरबत बनाने लगी.

कांच के 2 गिलासों में शरबत ला कर वह सुलतान के पास बैठ गई. शरबत पी कर सुलतान उठने लगा तो सलमा ने उस का हाथ पकड़ कर बिठाते हुए कहा, ‘‘इतनी गरमी में कहां जाओगे, थोड़ी देर बैठो न. आज मैं भी अकेली हूं, दोनों बातें करते हैं.’’

सुलतान बैठ गया तो सलमा उठी और बाहर का दरवाजा बंद कर के कुंडी लगा दी. सुलतान अचकचाया. उस की समझ में नहीं आ रहा था कि सलमा को ऐसी कौन सी बात करनी है जो अंदर से दरवाजा बंद कर दिया.

दरवाजा बंद कर के सलमा सुलतान के पास बैठ गई और बोली, ‘‘तुम ने यह तो बता दिया था कि खाना बहुत अच्छा बना था, लेकिन यह नहीं बताया कि खाना बनाने वाली कैसी लगी?’’

यह सुन कर सुलतान की हैरानी और बढ़ गई. अकेले में दोस्त की पत्नी के साथ इस तरह बैठना उसे ठीक नहीं लग रहा था. इस के अलावा वह डर भी रहा था. उस की हालत देख कर सलमा ने कहा, ‘‘डरने की कोई बात नहीं है. इस समय यहां कोई नहीं आएगा.’’

लेकिन उस के आश्वासन के बावजूद सुलतान का डर कम नहीं हुआ. वह वहां से निकलने के बारे में सोच रहा था कि सलमा ने उस का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘तुम मुझे अच्छे लगने लगे हो.’’

सुलतान घबरा कर उठ खड़ा हुआ, ‘‘भाभी, मैं शादीशुदा हूं. मुझ से ऐसी बात न करो.’’

सलमा ने हंसते हुए कहा, ‘‘मैं ने तुम से यह थोड़े ही कहा है कि मैं तुम से शादी करना चाहती हूं. लेकिन मुझे तुम से प्यार जरूर हो गया है.’’

सलमा उस के एकदम करीब आ गई. सुलतान थोड़ा खिसकते हुए बोला, ‘‘वारिस क्या सोचेगा?’’

‘‘कोई कुछ नहीं सोचता सुलतान, सही बात तो यह है कि हर कोई अपने सुख के चक्कर में घूम रहा है. किसी के बारे में सोच कर परेशान होने की जरूरत नहीं है. मैं अपने बारे में सोचती हूं, मेरे पति भी अपने बारे में सोचते हैं. अब तुम भी अपने बारे में सोचो.’’

‘‘ये कैसी बातें कर रही हो आप?’’

‘‘ये अपने दिल से पूछो, अगर तुम्हारे दिल में मेरे साथ समय बिताने की इच्छा न होती तो तुम गाड़ी ले कर बाहर से ही लौट जाते, अंदर कतई नहीं आते.’’

‘‘अंदर तो आप ने बुलाया है.’’

‘‘ठीक है, बुलाया था पर तुम मना भी कर सकते थे.’’ सलमा ने कहा.

सुलतान हैरान था. यह सच था कि पिछले कई दिनों से वह सलमा के बारे में सोच रहा था. कई बार वह उस के दरवाजे तक आया भी था, लेकिन बाहर से ही लौट गया था.

सलमा उस के कंधे पर हाथ रख कर बोली, ‘‘प्यार करना गुनाह नहीं है. मैं जानती हूं कि तुम्हारे दिल में मेरे लिए एक नरम कोना है. मौके का फायदा उठाने से मत चूको.’’

उलझन में फंसा सुलतान सलमा के आकर्षण में बंधा था, इसलिए चाह कर भी वहां से नहीं जा पा रहा था. सुनसान घर में अकेली औरत नाजायज संबंध बनाने के लिए मजबूर कर रही थी. आखिर सुलतान ने खुद को सलमा के हवाले कर दिया.

उस दिन वह सलमा के घर से निकला तो उस की स्थिति अजीब सी थी. वह गाड़ी ले कर सीधा घर आ गया. जल्दी वापस आने पर शबीना ने कहा, ‘‘आज जल्दी आ गए, तबीयत ठीक नहीं है क्या?’’

‘‘सिर थोड़ा भारी लग रहा था. मैं ने सोचा थोड़ा आराम कर लूंगा तो ठीक हो जाऊंगा. मैं सोना चाहता हूं.’’ कह कर सुलतान कमरे में जा कर लेट गया. कुछ देर पहले उस के साथ जो कुछ गुजरा था, वह सब उसे याद आने लगा. उसे लगा कि वह शबीना का गुनहगार है.

वह अपराधबोध से ग्रस्त था. उस ने सोचा जो हो गया सो हो गया. भविष्य में वह ऐसी गलती नहीं करेगा. यह सोच कर उस का दिल कुछ हलका हुआ. लेकिन उस की वह रात करवट बदलते हुए गुजरी. सुबह उठा तो सिर भारी था.

सुबह को सुलतान काफी देर तक नहाता रहा, जिस से मन को कुछ शांति मिली. नाश्ते के बाद वह गाड़ी ले कर चला गया. सीधीसादी शबीना को पता ही नहीं चला कि पति ने उस के साथ बेवफाई कर डाली है.

अगले कुछ दिनों में सब सामान्य हो गया. सुलतान वारिस के घर की तरफ नहीं गया. लेकिन सलमा ने उसे फिर से तलाश कर कुछ सामान लाने को कहा. वारिस बाहर था, इसलिए सुलतान ने सामान ला कर सलमा के घर पर दे दिया. उस दिन भी सुलतान सलमा से दूर नहीं रह पाया.

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वह खुद को संभालने की लाख कोशिश करता, लेकिन उस की कोशिश धरी रह जाती. जब उसे लगा कि संभलना मुश्किल है तो उस ने सलमा के साथ इसे सिलसिला ही बना लिया.

दोनों को मौके की तलाश रहने लगी. मोबाइल फोन ने उन की राह आसान कर दी थी. इसी बीच सुलतान और वारिस आटो चलाना छोड़ कर कैंटर चलाने लगे थे. सुलतान फतेहगंज पश्चिमी के ही नवाजिश अली का कैंटर चलाता था, तो वारिस इमरान रजा का.

समय का पहिया अपनी गति से घूमता रहा. सलमा सुलतान को अपना बलमा तो नहीं बना सकती थी, लेकिन उस के दिल का सुलतान वही था.

7 फरवरी को देर रात तक सुलतान घर नहीं लौटा तो शबीना को चिंता हुई. उस ने पौने 8 बजे सुलतान को फोन किया तो उस ने आधे घंटे में पहुंचने की बात कही. लेकिन देर रात होने पर भी वह घर नहीं लौटा. उस का मोबाइल भी बंद हो गया था.

पति के बारे में पता करने के लिए शबीना ने अपने जेठ शाने अली को फोन किया तो पता चला कि वह राजस्थान से माल ले कर फतेहगंज लौट आया था. शाने अली ने शबीना से कहा कि रात होने की वजह से वह कहीं रुक गया होगा. सुबह होने पर भी जब सुलतान घर नहीं पहुंचा तो शाने अली उस की तलाश में लग गया.

8 फरवरी की सुबह फतेहगंज (पश्चिम) थाना क्षेत्र के गांव सफरी के कुछ लोगों ने सड़क किनारे स्थित बलवीर के खेत में एक अज्ञात युवक की लाश पड़ी देखी.

वहां भीड़ एकत्र हुई तो बात गांव के प्रधान तक पहुंची. प्रधान ने मौके पर जा कर देखा और इस की सूचना फतेहगंज (पश्चिम) थाने को दे दी.

सूचना मिलने पर इंसपेक्टर चंद्रकिरन पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. मृतक की उम्र 28-30 साल रही होगी. मृतक के गले पर कसे जाने के निशान मौजूद थे. साथ ही सिर पर काफी गहरे घाव भी थे.

घाव किसी वजनदार ठोस वस्तु के प्रहार के लग रहे थे. लाश के आसपास घटनास्थल का निरीक्षण करने पर कोई सुराग नहीं मिला. अलबत्ता वह मृतक के संघर्ष करने के निशान जरूर मौजूद थे. कई जगह मिट्टी उखड़ी हुई थी, कई लोगों के पैरों के निशान भी थे. मतलब हत्यारे एक से ज्यादा थे.

इस बीच लाश मिलने की सूचना आसपास के क्षेत्रों में फैल गई थी. कुछ लोगों ने लाश की फोटो सोशल मीडिया पर डाल दी थी. शाने अली के कुछ परिचितों ने फोटो देखी तो शाने अली को बताया कि सफरी गांव के पास एक लाश मिली है, कहीं वह सुलतान की तो नहीं, जा कर देख ले. शाने अली शबीना और भाई इरशाद के साथ मौके पर पहुंच गया.

लाश सुलतान की निकली. लाश की शिनाख्त हो गई तो इंसपेक्टर चंद्रकिरन ने सुलतान की पत्नी शबीना से पूछताछ की. उस ने बताया कि रात पौने 8 बजे सुलतान को फोन किया था तो उस ने आधे घंटे में घर पहुंचने की बात कही थी, लेकिन वह घर नहीं आया.

उस ने सुलतान के कैंटर मालिक नवाजिश अली और उस के बहनोई पर सुलतान की हत्या का शक जताते हुए बताया कि एक माह पहले रुपयों के लेनदेन को ले कर सुलतान का उन से झगड़ा हुआ था. दोनों ने सुलतान को जान से मारने की धमकी दी थी.

इसी बीच सीओ जगमोहन सिंह बुटोला और एसपी (ग्रामीण) संसार सिंह भी मौके पर पहुंच गए. अधिकारियों ने लाश व घटनास्थल का निरीक्षण करने के बाद आवश्यक पूछताछ की. उस के बाद वह इंसपेक्टर चंद्रकिरन को दिशानिर्देश दे कर वापस लौट गए.

शबीना की लिखित तहरीर पर नवाजिश अली और उस के बहनोई के विरुद्ध भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया गया.

इंसपेक्टर चंद्रकिरन ने केस की जांच शुरू की तो पता चला नवाजिश कैंसर से पीडि़त है और काफी समय से अस्पताल में भरती है. ऐसे में सुलतान की हत्या में उस का हाथ नहीं हो सकता था.

इस जानकारी के बाद उन्होंने सुलतान के प्रेम प्रसंग के संबंध में जानकारी जुटाई तो उस के किसी महिला से प्रेम प्रसंग की जानकारी मिली. इस पर उन्होंने सुलतान के मोबाइल की कालडिटेल्स निकलवाई. पता चला कि एक नंबर पर उस की हर रोज काफी देर तक बातें होती थीं.

वह नंबर सुलतान के नाम ही था. इस का मतलब यह था कि सुलतान ने ही वह नंबर किसी को दिया था. उस नंबर की लोकेशन फतेहगंज (पश्चिम)  के कंचननगर मोहल्ले की थी.

और जानकारी जुटाई गई तो पता चला सुलतान की दोस्ती कंचननगर में रहने वाले वारिस उर्फ चांद से थी. इस के बाद रहस्य से परदा उठते देर नहीं लगी. पता चला कि सुलतान के नाजायज संबंध वारिस की पत्नी सलमा से थे. सुलतान की हत्या इन्हीं संबंधों की परिणति थी.

इस के बाद इंसपेक्टर चंद्रकिरन ने 28 फरवरी को वारिस को गिरफ्तार कर लिया. थाने में जब उस से कड़ाई से पूछताछ की गई तो मामला नाजायज संबंधों का ही निकला.

सलमा और सुलतान के नाजायज संबंधों की भनक पड़ोसियों को भी लग गई थी. जब वारिस घर पर नहीं रहता था तो सुलतान घंटों तक उस के घर में पड़ा रहता था. इस से पड़ोसियों को समझते देर नहीं लगी कि सुलतान और सलमा के बीच क्या खिचड़ी पक रही थी.

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एक पड़ोसी ने वारिस को इस बारे में बता दिया था. यह जान कर कि सुलतान ने उसे दोस्ती में दगा दे कर उस की पीठ में धोखे का खंजर घोंपा है, वह आगबबूला हो उठा. इस के बाद उस ने सलमा को खूब पीटा और सुलतान का दिया हुआ मोबाइल और सिम भी खोज लिया, जिसे उस ने तोड़ दिया.

इस के बाद उस ने सुलतान को उस की दगाबाजी और इज्जत से खेलने के लिए सबक सिखाने का फैसला कर लिया.

इस के लिए उस ने कंचननगर में ही रहने वाले अपने फुफेरे भाई आमिर और भांजे दानिश उर्फ टाइगर को साथ देने के लिए तैयार कर लिया. दोनों ट्रांसपोर्ट पर मजदूरी का काम करते थे.

7 फरवरी की रात को सुलतान दिल्ली से माल ले कर बरेली आया. माल उतारने के बाद उस ने कैंटर को ठिरिया खेतल के नासिर ट्रांसपोर्ट पर खड़ा कर दिया. इस के बाद वह अपने घर की ओर चल दिया.

रास्ते में वारिस, आमिर और दानिश ने उसे मथुरापुर चलने की बात कह कर अपने कैंटर के केबिन में बैठा लिया. जब वारिस ने कैंटर शंघा-अगरास रोड पर मोड़ा तो सुलतान विरोध करने लगा. इस पर तीनों ने गमछे से उस का गला दबा दिया. सुलतान बेहोश हो गया.

सफरी गांव के पास उसे कैंटर से उतारा गया तो होश आने पर सुलतान ने भागने की कोशिश की. इस पर तीनों ने लोहे की रौड से पीटपीट कर उसे मार डाला और उस की लाश खेत में डाल दी.

खून से सने कपड़ों को इन लोगों ने एक थैले में रख कर टूल बौक्स में डाल दिया और अपनेअपने घर चले गए.

लेकिन गुनाह छिप न सका. वारिस की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त लोहे की रौड और खून से सने कपड़े बरामद कर लिए. इस के बाद वारिस को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया.

2 मार्च को पुलिस ने दानिश उर्फ टाइगर को भी गिरफ्तार कर लिया. साथ ही हत्या में इस्तेमाल वारिस का कैंटर नंबर यूपी25सी टी9339 भी बरामद कर लिया. कथा लिखे जाने तक आमिर फरार था, उस की गिरफ्तारी नहीं हो पाई थी.

(कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

अपराध : भाग 2

अमन को हाई ब्लड प्रेशर की दिक्कत थी. नैना का प्लान था कि शनिवार सुबह वह अमन के लंच में उस की बीपी की दवाइयां जरूरत से ज्यादा डाल देगी जिस से लंच के बाद उस की तबीयत बिगड़ेगी और शाम तक तो उस का खेल खत्म हो जाएगा. उस की औटोप्सी रिपोर्ट में जब आएगा कि उस की मौत हाइ डोज से हुई है तो सब को लगेगा कि उस ने जान कर दवाई इतनी मात्रा में ली. इस तथ्य की पुष्टी के लिए वह सब को कहेगी कि अमन डिप्रेस्सड रहने लगा था क्योंकि वे दोनों कब से बच्चा चाहते थे पर वह कंसीव नहीं कर पा रही थी और अमन की नौकरी से भी वह खासा टेंशन में था और इन्हीं सब चीजों की वजह से परेशान था. नैना को पूरा यकीन था कि वह बच निकलेगी.

शनिवार की सुबह प्लान के मुताबिक नैना ने अमन के टिफिन में दवाई मिला दी. अमन औफिस के लिए निकल गया. आज भी नैना ने कामवाली को छुट्टी दे रखी थी. विकास 12 बजे नैना के घर आ गया. नैना उसे देखते ही उस के गले से लिपट गई. उस के चेहरे को चूमने लगी. दोनों एकदूसरे की आगोश में खोने लगे. उन्हें बेडरूम में जाने की भी सुध नहीं रही. वे वहीं सोफे पर गिर गए. तभी दरवाजे की घंटी बजी. नैना और विकास एकदूसरे को देखने लगे. आखिर, इस वक्त कौन हो सकता है.

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नैना ने अपनी टीशर्ट और लोअर पहना और दरवाजे की तरफ बड़ गई. नैना ने अंदर वाला दरवाजा खोला ताकि वह जाली वाले दरवाजे से देख सके कि बाहर कौन है और वह उसे वहीं से लौटा दे. नैना ने दरवाजा खोला तो बाहर अमन को देख कर सन्न रह गई. वह अमन को तो लौटा नहीं सकती थी. उस की कनपट्टी से पसीने की लंबीलंबी धारें बहने लगीं. उस ने दरवाजा खोला और अमन का बैग हाथ में ले लिया.

‘तुम इतनी जल्दी कैसे?’ नैना ने हिम्मत कर पूछा

‘कुछ काम नहीं था और मैं ने अपना रेजिग्नेशन भी दे दिया तो बस आ गया.’

अमन अंदर बढ़ा और सामने विकास को अधनंग अवस्था में देख उस का सिर घूम गया. एक आदमी उस के घर में, अधनंग, उस की पत्नी के साथ क्या कर रहा था यह सोचने में उसे ज्यादा समय नहीं लगा. विकास अमन को देख उठ खड़ा हुआ. अमन मुड़ा और उस ने पीछे खड़ी, आंसू बहा रही नैना को देख उस के मुंह पर जोरदार तमाचा मार दिया. अमन के नैना पर हाथ उठाते ही विकास अमन पर कूद पड़ा.

अमन और विकास की आपस में हाथापाई होने लगी. नैना ने सामने टेबल पर पड़े कांच के वास को उठाया और ध्म्म से अमन के सिर पर मार दिया. अमन निढाल हो जमीन पर गिर पड़ा.

‘यह….य…य….यह क्या किया तुम ने?’ विकास ने अपना माथा पकड़ लिया.

‘मुझे नहीं पता…. यह कैसे हुआ मुझे नहीं पता… हमें इस की लाश को ठिकाने लगाना होगा.’ नैना सिर पकड़ कर जमीन पर बैठ गई.

‘मैं…मैं…हां, शाम को इस की लाश को गाड़ी में डाल फेंक आएंगे यमुना में. या कहीं गाड़ देंगे. यह सही है,’ विकास के पसीने छूट रहे थे.
‘हां, ठीक है.’

6 घंटे बीत गए थे. बाहर अंधेरा गहराने लगा था. अचानक विकास का फोन बज उठा. नैना विकास का मुंह ताकने लगी. विकास के हावभाव अचानक बदल गए. वह फोन पर जोरजोर से कहने लगा, ‘कैसे, कब…हां, मैं अभी आया…मैं आ रहा हूं…’

‘क्या हुआ,’ नैना पूछने लगी.

‘घर से फोन था. पापा की तबीयत अचानक खराब हो गई है, मुझे जाना होगा,’ विकास उठते हुए कहने लगा.

‘तुम पागल हो गए हो क्या? मैं यहां इस लाश का क्या करूं? पुलिस के आने का इंतजार? एक बात याद रखो, मैं जेल गई तो तुम्हें साथ ले कर जाऊंगी समझे तुम?’ नैना चिल्ला उठी.

‘मैं कल सुबह अंधेरा रहते आ जाऊंगा. किसी को कुछ पता ही नहीं चलेगा. पक्का जान, मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूंगा,’ विकास ने कहा और वहां से चला गया.

नैना रातभर सो नहीं पाई. उसे पता था अगर जल्द ही उस ने इस लाश से छुटकारा नहीं पाया तो इस की बदबू से सब जान जाएंगे कि माजरा क्या है. उस की आंखें पथरा रहीं थीं. कभी उसे लगता कि अमन का मर जाना ही उस के लिए सही है और कभी उसे लगता कि उस ने अपने हाथों अपनी गृहस्थी तोड़ दी. वह अमन के चेहरे को देखती तो कांपने लगती. उस ने घर की सभी लाइटें जला रखी थीं. लिविंग रूम का एसी फुल कर दिया ताकि कुछ भी हो लेकिन लाश बदबू न छोड़े.

अगली सुबह विकास नहीं आया. विकास करोल बाग में रहता था. मिडिल क्लास फैमिली थी उस की, घर का एकलौता बेटा था. एमफिल का विद्यार्थी था. उस के मातापिता को उस की अय्याशियों और आशिकी दोनों का ही कोई ज्ञान नहीं था. रविवार सुबह जनता कर्फ़्यू के चलते उसे कोई साधन नहीं मिला जिस से वह नैना के घर पहुंच सके और नैना घर से निकलने का रिस्क ले नहीं सकती थी. नैना उसे बारबार फोन कर रही थी लेकिन विकास फोन नहीं उठा रहा था. आखिर विकास ने फोन उठाया भी था तो अचानक काट दिया था.

अब नैना अपने पति अमन की लाश के साथ इस घर में अकेली थी, बिलकुल अकेली. रविवार शाम जब सभी अपनी बालकनियों में आ कर खड़े हुए तो नैना बाहर नहीं निकली. तालियों और थालियों का शोर नैना के अंदर के खालीपन को अब भर नहीं सकता था. उस की आंखों से अश्रुधारा बहने लगी थी. वह अमन को देखती, फिर उस की नजर खिड़की की तरफ जाती और फिर अमन की तरफ.

रात 9 बजे जनता कर्फ़्यू हटना था. नैना एक बार फिर विकास को फोन मिलाने लगी. विकास का फोन स्विच औफ आने लगा. नैना ने दिनभर में उसे जितने भी मैसेज किए उन में से एक भी उसे डिलीवर नहीं हुआ था. नैना समझ गई कि विकास अब नहीं आएगा और अब वह अकेली है जिसे यह सब कुछ हैंडल करना है.

नैना ने अमन की लाश को पैर से पकड़ कर खिसकाने की कोशिश की. अमन का शरीर भारी था, नैना पूरा दम लगा कर उसे खींच रही थी और अचानक गिर पड़ी. वह फिर से उठी और उसे खिसकाने की कोशिश करने लगी. किसी तरह मशक्कत कर वह उसे बेडरूम तक ले गई और बेड के अंदर उस की लाश डाल दी. उस ने बेडरूम का एसी भी फुल पर रखा जिस से बदबू थमी रहे. उस ने पूरे घर में अपने महंगे से महंगे फ्रेश्नर को छिड़क दिया. पोछा मारा, हर तरफ से खून के धब्बे हटाए, अमन के फोन को एयरप्लेन मोड पर डाला मगर नेट औन रखा. रविवार का दिन बीत गया. विकास का कोई कौल नहीं आया. लाश ठिकाने लगाने की कोई सुध नहीं थी नैना को. वह अकेले लाश का क्या करेगी उसे कुछ समझ नहीं आया.

अमन के दोस्त और परिवार के एक के बाद एक मैसेज आने लगे कि उस का फोन बंद क्यों है और नैना अमन बन कर उन सभी के मैसेज का रिप्लाई कर कहने लगी कि फोन में नेटवर्क नहीं है. नैना ने इंटरनेट पर काफी कुछ सर्च किया और जाना कि लाश की बदबू 2-3 दिन में घर में फैल जाएगी और शायद बाहर भी, साथ ही, लाश डिकम्पोज होने लगेगी, सड़नेगलने लगेगी.

नैना को पता था कि वह ज्यादा दिन इस खेल को अंजाम नहीं दे पाएगी. उस ने अपनी कामवाली को घर आने से मना कर दिया और कहा कि कोरोना के चलते वह कुछ दिन छुट्टी ले ले. अगले दिन 23 मार्च की शाम नैना ने तय किया कि वह विकास के घर जाएगी और उस को पकड़ कर लाएगी, आखिर वह अपनी गलती से इस तरह भाग कैसे सकता है. खून में उस की भागीदारी पूरी थी तो लाश को ठिकाने लगाने का जिम्मा केवल नैना के सिर क्यों?

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नैना का यह प्लान भी धराशायी हो गया जब प्रधानमंत्री ने 21 दिनों के राष्ट्रीय लौकडाउन की घोषणा की. अब तो नैना किसी भी हालत में घर से बाहर नहीं निकल सकती थी. नैना रोने लगी, बिलखने लगी. कमरा लाश की गंध से भर उठा था. अमन की मौत को 3 दिन बीत चुके थे. पिछले 3 दिनों से उस ने खाने के नाम पर बासी 2 रोटियां ही खाई थीं. नैना उठी, अमन का उतारा हुआ मास्क पहना, बेडरूम में गई और अपना सब से महंगा पर्फ्यूम उठा कमरे में छिड़कने लगी. पिछले 3 दिनों से उसे ढंग से नींद नहीं आई थी. आज वह दूसरे बेडरूम में गई और जा कर सो गई, चैन की नींद.

अमन की मौत के चौथे दिन से लौकडाउन शुरू हो गया था. लोग अपनेअपने घरों में थे. बच्चे, बड़े सभी अपनी बालकनी में आ कर बैठने लगे. 4 दिननों से बंद खिड़कियां देख सभी को अजीब लगा जरूर पर पूछने का मन आखिर किस का होगा. यही तो हमारी हाइ सोसाइटी है जिसे खुद से ज्यादा किसी और से मतलब नहीं है. पड़ोस की महिमा जो अकसर बालकनी में खड़ी हो नैना से बातें किया करती थी, ने नैना को कौल किया. नैना पहले तो कौल नहीं उठाने वाली थी पर किसी को कोई शक न हो इसलिए उठा लिया.

“हैलो, हाय नैना, कहां हो आजकल दिखाई नहीं देती?”

“वो….एक्चुअली घर पर ही हूं पर कोरोना है न इसलिए सोशल डिस्टेन्स मैंटेन कर रहे हैं हम और कोई बात नहीं है,” नैना अपनी घबराहट छिपाते हुए कहने लगी.
“अच्छाअच्छा गुड, चलो ठीक है, बाय.”

नैना को लगा अब सब ठीक है. बस कुछ दिनों की बात है और फिर वह इस लाश से छुटकारा पा लेगी. उस के पास सोचने का बहुत सारा समय था अब. वह कभी विकास के धोके को याद करती, कभी नितिन के बारे में सोचती, कभी आकाश के बारे में तो कभी अपने मम्मीपापा का ख्याल आ जाता. शादी के बाद से अपनी पुरानी ज़िंदगी से वह कोई खास वास्ता नहीं रखती थी पर अब जैसे सब उस की आंखो के सामने कौंध रहा था. घर में हर पल गहरी होती लाश की बदबू से उस का दम घुटने लगा था लेकिन वह मजबूर थी.

वहां, सोसाइटी के लोगों के पास अब एकदूसरे की तांकाझांकी करने का पूरा समय था. लोगों ने नोटिस करना शुरू किया कि नैना और अमन को देखे उन्हें जाने कितने दिन हो गए. इस पर एक दिन बालकनी में खड़ी महिमा ने बगल वाली ज्योत्सना को कहा कि उसे लगता है कि नैना या अमन में से किसी एक को कोरोना हो गया है जिस कारण वे आइजोलेशन में हैं और इस से उन की पूरी सोसाइटी की जान खतरे में आ सकती है. ज्योत्सना ने यही बात अपनी पड़ोसन मिनी को बताई, मिनी ने कमलेश को और उस ने नीतिका को. पूरी सोसाइटी में बात फैल गई कि नैना या अमन को कोरोना हुआ है.

लोगों ने उन दोनों की कंप्लैन कोरोनावायरस हेल्पलाइन पर की और अगली सुबह नैना के घर के बाहर डाक्टरों की टीम खड़ी थी. सभी के मुंह पर मास्क था लेकिन उन्हें माजरा समझने में देर नहीं लगी. दरवाजे के बाहर तक लाश की बदबू आने लगी थी. नैना ने घंटी सुनी लेकिन वह दरवाजा खोलने की हिम्मत नहीं कर पाई. वह डर से कांपने लगी और बाथरूम में जा कर बैठ गई. दरवाजा खोला गया और दरवाजा खुलते ही नैना का राज भी खुल गया.

अमन की लाश हिरासत में ली गई. नैना और अमन के घरवालों को खबर भेजी गई. लौकडाउन के चलते वे अपने घरों में इस दुख से तड़पने को मजबूर थे. विकास को भी पकड़ा गया. नैना और विकास के खिलाफ सबूतों की लंबी लिस्ट थी पुलिस के पास. दोनों के मैसेज, कौल रिकोर्ड्स, हाई डोज वाला अमन के बैग में पड़ा सड़ा हुआ लंच, वास के टुकड़े और अमन की लाश.

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नैना ने जो अपराध किया उस की सजा तो उसे मिलेगी ही, लेकिन यह अपराध एक दिन या दो दिन पहले नहीं उपजा था. इस की जड़ें नैना के जीवन में बहुत पहले से ही उपजने लगी थीं. खैर, अमन की जान गई, नैना का वर्तमान भविष्य सब गया और रह गया तो बस उस का यह अपराध.

अपराध : भाग 1

“मुझे बहुत घबराहट हो रही है. तुम आ जाओ ना, कैसे भी आओ बस आ जाओ. मुझे अब डर लग रहा है…बहुत डर. तुम सुन रहे हो न? हैलो… हैलो… विकास… तुम सुन रहे हो न.. हैलो…..” उस तरफ से फोन कटा तो मानो नैना की सांसे भी थमने लगी. उस ने सोफे के बगल में पड़ी पति अमन की लाश की तरफ एक बार फिर नजर घुमाई और उस के होंठ थरथराने लगे और वह विकास को फिर फोन मिलाने लगी.

नैना और अमन की शादी जिस समय हुई थी तब नैना महज 23 साल की थी. कालेज के समय में तो कितने रिलेशनशिप्स रहे थे उस के लेकिन जब उस के लिए अमन का रिश्ता आया तो वह झट मान गई. मानती कैसे नहीं, अमन अच्छे घर का पैसे वाला आदमी था हालांकि उम्र में 6 साल बड़ा था नैना से लेकिन नैना को इस से कुछ खासा फर्क नहीं पड़ा था. उस की आंखों में तो जनकपुरी का 4 बीएचके का फ्लैट चमक रहा था जिस की तस्वीरें अपनी सहेलियों को भेजभेज कर वह दिखा देगी कि उस की जिंदगी भी क्या जिंदगी है. नैना की शादी के दिन करीब आ रहे थे तो उस के इंस्टाग्राम और व्हाट्सेप पर मैसेजों की कतारें बढ़ने लगी थीं. कभी एक्स बौयफ्रेंड का मैसेज होता तो कभी उस बौयफ्रेंड का जिस से वह ब्रेकअप करना ही भूल गई थी.

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नैना के मातापिता उस की इन हरकतों से अंजान थे. नैना अपने दोनों भाइयों से छोटी थी. यही कारण था कि उसे जितना रोका जाता वह उतना ही पंख फड़फड़ा उड़ने की कोशिश करती. हमेशा से गर्ल्स स्कूल में पढ़ी नैना के 10वीं से 12वीं कक्षा के बीच ही 3 बौयफ्रेंड रहे थे. पहले से तो उसे लगा जैसे उसे प्यार हो गया है लेकिन जब वह उस से अपने लिए कुछ मांगती और वह मना कर देता तो वह खीझ उठती. वह उस से अपनी सहेली कविता की मदद से मिली थी. कविता के मोहल्ले का ही लड़का था वह और नैना के स्कूल की छुट्टी के समय स्कूल के बाहर खड़ा होता था. नैना जब कविता के बौयफ्रेंड को देखती तो उसे लगता जैसे कविता ने जानबूझ कर उसे इस कालेकलूटे लड़के के साथ बांधा है. सो, पढ़ाई का बहाना मार नैना ने उस से ब्रेकअप कर लिया.

नैना ने जब कविता के बौयफ्रेंड नितिन को देखा था तभी से उस पर मोहित होने लगी थी. स्कूल से बंक मार जब कविता, नैना, साक्षी और तान्या घूमने गईं थीं तो वहां नितिन और साक्षी का बौयफ्रेंड विनय भी आया था. जब भी नैना का नितिन से सामना होता वह ऐसे दिखाने की कोशिश करती कि वह बेहद शालीन और शांत किस्म की लड़की है जबकि नितिन जानता था कि वह कितनी तेजतर्रार है. कविना ने नैना को बताया था कि नितिन अकसर उसे किस करने के लिए कहता था जिस पर वह मना कर देती थी. उस दिन लोधी गार्डेन घूमते हुए जब साक्षी, तान्या, विनय और कविता तस्वीरें क्लिक कर रहे थे तब नैना नितिन की तरफ इशारा कर झील के पास जाने लगी. नितिन ने कविता से कहा कि उसे यहां गर्मी लग रही है और वह भी झील के पास जा रहा है. झील के पास पहुंच बेंच पर बैठी नैना को देख नितिन उस के पास जा कर बैठ गया. नैना उस की आंखों में देख धीरेधीरे आंखें बंद करती हुई आगे झुकने लगी. नितिन ने मौका हाथ से जाने नहीं दिया और आगे झुक नैना को किस करने लगा. कविता नितिन को ढूंढते हुए वहां पहुंची तो नैना और नितिन को एकदूसरे को किस करते देख विफर पड़ी. वह उन दोनों को गालियां देने लगी जिस पर नैना ने भी उसे भुला भला कहना शुरू कर दिया. उस दिन के बाद न नैना और कविता ने एकदूसरे से कभी बात की और न नितिन ने उन दोनों से.

नैना 12वीं में थी तो उस के घर के बगल में रहने वाले आकाश से उसे प्यार हो गया या उसे लगा कि उसे प्यार हो गया. नैना का भाई शुभम मेरठ में पढ़ रहा था क्योंकि ग्रेजुएशन के बाद उस का कोई एंट्रैन्स क्लियर नहीं हुआ था कि वह दिल्ली में ही पढ़ सके. नैना के सब से बड़े भैया नाइट शिफ्ट में नौकरी करते थे इसीलिए दिनभर सोते थे और रात में औफिस जाते थे. मम्मीपापा को बस एक फिक्र थी कि नैना थोड़ा पढ़ ले और अच्छे घर में उस की शादी हो जाए. उन्हें नैना की परवरिश या व्यवहार में कभी कुछ गलत लगा ही नहीं. नैना शाम को भैया के औफिस के लिए घर से निकलते ही अपने कमरे में चली जाती थी. नैना के 50 गज के घर में उस का कमरा सब से ऊपर था. नैना की बालकनी और आकाश की बालकनी एकदूसरे से जुड़ी हुई थी. नैना बालकनी की ग्रिल पर चादर सुखाने के बहाने डाल देती और उस के सहारे बैठ जाती. आकाश भी यही किया करता. दोनों एकदूसरे से बातें करते और किसी को दिखते भी नहीं. नैना जब कालेज के फर्स्ट इयर में आई तो उस का मन आकाश से ऊब गया. अपने कालेज के बौयफ़्रेंड्स के साथ वह कितनी ही बार हमबिस्तर भी हुई थी लेकिन उसे रिलेशनशिप से बोरियत होने लगती और वह कोई न कोई बहाना बना ब्रेकअप कर लेती.

अमन से शादी के बाद जब नैना इस घर में आई थी तो उसे मानो वह सब मिल गया था जिस की उसे चाहत थी, पैसा, आजादी और लक्जरी. अमन एक मल्टी नैशनल कंपनी में एचआर की पोस्ट पर था. अच्छा कमाता था, चालबाजियों से दूर शांत किस्म का लड़का. उस की भी कालेज के समय से कई गर्लफ्रेंड्स रही थीं लेकिन वह हमेशा से सीरियस रिलेशनशिप्स से दूर रहा था. उस के मम्मीपापा और बहन चंडीगढ़ में रहते थे और वह यहां दिल्ली में. चडीगढ़ में भी उस का अच्छा खासा घरबार था. अमन हमेशा से एक ही शर्त पर रिलेशनशिप में आता रहा कि वह शादी की कमिटमेंट नहीं कर सकता क्योंकि उस के मातापिता जातिधर्म को अत्यधिक महत्व देते हैं और इसलिए वह उन की मर्जी से ही शादी करेगा. औफिस में उसे एक लड़की बेहद पसंद थी लेकिन फिर वही कि वह शादी नहीं करेगा इसलिए वह लड़की उस के साथ कुछ दिन सैक्सुअल रिलेशनशिप में रही और फिर उस ने भी अमन से ब्रेकअप कर लिया. इस ब्रेकअप के बाद ही अमन के घरवालों ने उसे नैना से मिलवाया और किसी पंडेपुजारी और रिश्तेदारी के चलते दोनों की शादी हो गई. नैना दुबलीपतली, चटख गोरे रंग की, लंबे बाल और मदमस्त चाल वाली लड़की थी तो वहीं अमन मझले कदकाठी का गोरा मगर कम आकर्षक किस्म का लड़का था. नैना को देखते ही अमन उस पर लट्टू हो गया था तो वहीं अमन के स्टेटस ने नैना का दिल जीत लिया था.

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शादी के कुछ महीने तो नैना और अमन ने बड़े मजे से गुजारे, घूमना फिरना, ढेरों तस्वीरें लेना उन्हें अपने सोश्ल मीडिया पर पोस्ट करना, सैक्स का लुत्फ उठाना और नएनए एक्सपेरीमेंट्स करना. लेकिन, धीरेधीरे नैना इस जिंदगी से भी ऊबने लगी. अमन नैना की आंखों में झांकने की कोशिश करता और नैना अपनी निगाहें हटा लेती. सैक्स के तुरंत बाद भी जब अमन उसे बाहों में भरता तो नैना करवट ले सो जाती. नैना अपनी सहेलियों से अमन के परफ़ौर्मेंस को ले कर बातें करती तो कोई उस पर हंसने लगती तो कोई कहती पति के साथ रात में मज़ा नहीं तो दिन के लिए कोई और ढूंढ़ ले, और फिर यहां वहां की बातें होने लगतीं.
नैना घर पर ही रहती थी, अमन ने कई बार उसे कहा कि वह घर पर बोर हो तो नौकरी कर सकती है.

लेकिन नैना के मन में नौकरी का दूरदूर तक ख्याल नहीं था. एक दिन यों ही इंस्टाग्राम पर उसे किसी लड़के का मैसेज आया और नैना उस से बातें करने लगी. नौर्मल फ्लर्टिंग से शुरू हुई बात सैकस्टिंग तक पहुंच गई. पहले वह उस लड़के को डीप नेक वाली तस्वीरें भेजती और फिर अपनी सैक्सी लौंजरी फ़्लौंट करने लगी. नैना को इन सब में मजा आने लगा. बात एकदूसरे से मिलने तक भी पहुंची और एकदिन नैना दोपहर 1 बजे घर से निकली और शाम 5 बजे लौटी. आजकल रूम मिलना भी कोई मुश्किल काम नहीं. कामवाली को उस ने छुट्टी दे ही रखी थी तो उसे कोई टेंशन नहीं थी.

यह लड़का यही कोई 22 साल का था तो नैना को वैसे भी इस से प्यार जैसा कोई मतलब नहीं था लेकिन सैक्स में नैना को मजा आ रहा था. इस लड़के के साथ दो महीने टाइमपास के बाद नैना दूसरे और फिर तीसरे लड़के के साथ भी चैटिंग, सैक्सस्टिंग और फिर सैक्स करने लगी. अमन इन सब से अंजान था और नैना उसे शक का कोई मौका भी नहीं देती थी.

इसी तरह एक दिन वह विकास से मिली. विकास उसे अपनी एक दोस्त की बर्थडे पार्टी में मिला था. विकास ने नैना को देखा तो उस पर लट्टू हो गया. विकास आकर्षक व्यक्तित्व का व्यक्ति था, लंबा कद, लहराते बाल, एमफिल का स्टूडेंट. नैना की शादी को अभी 2 साल भी नहीं हुए थे. विकास की हमउम्र भी थी. पार्टी में उस ने पेंसिल स्कर्ट और पीच कलर का टौप पहना हुआ था. गले में एक चैन और सिंदूर तो वह अब लगाती ही नहीं थी. इतनी अच्छी पर्स्नालिटी की लड़की पर आखिर किस का दिल न आए.

दोनों का इंटरोडक्शन हुआ और बातें शुरू होने लगीं. पसंदनापसंद, खूबसूरती की तारीफें, गाने डेडिकेट करना, साथ घूमनाफिरना, क्लब जाना और न जाने क्या क्या. नैना को हर समय विकास का ख्याल आता रहता, उस से मिलने का मन करता. वह उसे चाहने लगी थी और अब अमन के साथ उसे कोई खुशी नहीं थी.

‘सुनो,’ नैना ने एक दिन विकास को मैसेज किया.

‘कहो,’ विकास का जवाब आया.

‘मैं सोच रही थी कि आज कहीं चलते हैंम आई मीन समझ रहे हो न?’ नैना रोमांटिक होते हुए कहने लगी.

‘कहां जाना है?’ विकास मंदमंद मुसकाते हुए कहने लगा.

‘ज्यादा भोले मत बनो. तुम्हें पता है मैं कहां जाने की बात कर रही हूं, रूम में चलते हैं कहीं,’ नैना ने बनावटी अंदाज में कहा.

‘अच्छा क्या करेंगे,’ विकास भी बनावटी भोलेपन से कहने लगा.

‘अच्छा, बताऊं तुम्हें अब? जाओ नहीं जाना कहीं.’

‘अरे बाबा, मजाक कर रहा हूं मेरी जान, तुम समझती ही नहीं हो. मैं तो कब से तड़प रहा था.’

बस फिर क्या, नैना और विकास के मिलनेजुलने और सैक्स का सिलसिला चल पड़ा. अब वह बाहर जाने की बजाए विकास को घर बुलाने लगी.

एक दिन नैना ने अपनी कामवाली को छुट्टी दे रखी थी. विकास और नैना बेड पर लेटे हुए थे. विकास अनायास ही बोल पड़ा, ‘नैना, अपने पति को तलाक दे दो. मुझे तुम से शादी करनी है, हमेशा तुम्हारे साथ ही रहना है. हम दोनों साथ रहेंगे हमेशा.’

‘बेबी, तुम कमाते हो नहीं, तलाक से एक पैसा नहीं मिलेगा, खाएंगे क्या?’ नैना विकास के बालों को सहलाते हुए बोली.

‘तलाक नहीं दे सकती तो हम कबतक ऐसे छुपछुप कर मिलते रहेंगे?’

‘और कर भी क्या सकते हैं? तुम खुद बताओ?’ नैना बोल उठी.

विकास उठ कर अपने कपड़े पहनने लगा. उस का मन उदास होने लगा था. ‘हम कुछ दिन नहीं मिलेंगे अब,’ विकास ने कहा.

‘क्यों? अचानक यह शादी की बात कर के तुम मुझे उलझन में डाल रहे हो. तुम जानते हो मैं अमन को नहीं छोड़ सकती ऐसे, फिर भी?’

‘मैट्रो से आना अब सही नहीं है. तुम ने सुना न कोरोनावायरस के बारे में. मैं बस कुछ दिन रिस्क नहीं लेना चाहता. और तुम्हें इस बीच हमारे रिश्ते के बारे में सोचने का समय भी मिल जाएगा.’
‘बेबी, बस यही है तुम्हारी मोहब्बत? कोरोना से इतना डर कि मुझ से नहीं मिलोगे?’

‘कम से कम मुझे तुम से मोहब्बत तो है, तुम्हारी तरह दो नाव पर सवारी तो नहीं कर रहा मैं,’ विकास ने तंज कसते हुए कहा.

‘अच्छा, तो क्या करूं? मार दूं क्या अपने पति को तुम्हारे लिए?’ नैना अचानक चिल्ला उठी.

‘हां, मार दो,’ विकास ने कहा और दरवाजे की तरफ बढ़ गया.

घड़ी में 8 बजकर 16 मिनट हुए और दरवाजे की बेल बजी. अमन को देख नैना ने मुसकुराते हुए उस के हाथ से बैग लिया. अमन अपने मुंह से मास्क हटाने लगा और सोफे पर जा बैठ गया. नैना अमन के लिए पानी का गिलास ले आई.

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‘कोरोनावायरस बहुत ज्यादा फैलने लगा है न?’ नैना ने अमन को गिलास थमाते हुए कहा.

‘हां, बहुत ज्यादा. सुनने में आ रहा है कि जल्द ही प्रधानमंत्री इस पर कुछ ऐक्शन लेने वाले हैं. हमारा काम भी वर्क फ़्रौम होम होने वाला है जल्दी ही. चलो अच्छा है इस बहाने तुम्हारे साथ समय बिताने का मौका भी मिलेगा.’

‘हां, डार्लिंग बिलकुल,’ नैना ने कहा और झूठी मुस्कराहट के साथ अमन को देखने लगी.

‘नैना, मुझे लग रहा है मुझे नई नौकरी के बारे में सोचना चाहिए.’
‘क्यों?’

‘मैं काफी समय से इंक्रीमेंट के बारे में सोच रहा हूं पर यह कंपनी खुद ही नुकसान में चल रही है तो नहीं करेगी.’

‘अच्छा, तुम्हें जैसा ठीक लगे.’

अमन बाथरूम में था जब नैना ने विकास को मैसेज किया, ‘मेरे पास एक प्लान है.’

अगले दिन प्रधानमंत्री ने घोषणा की कि इस रविवार जनता कर्फ़्यू लगने वाला है. अमन की शनिवार को अकसर छुट्टी होती है लेकिन इस बार उसे औफिस बुलाया गया था. नैना ने विकास के साथ अमन को जान से मारने का प्लान ऐसा बनाया था कि किसी को उस पर भूल कर भी शक नहीं होता और वह अमन के मरने के बाद चैन से विकास के साथ रहती.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

लौकडाउन : भाग 2

राय साहब ने जल्दी से मालिनी को फोन किया, ‘‘तुम अभी घर आ जाओ, हमें दाह संस्कार करना होगा. लाश को ज्यादा समय तक घर में नहीं रखा जा सकता.’’

लेकिन मालिनी ने असमर्थता जाहिर करते हुए आने से इनकार कर दिया. उस ने राय साहब को समझाने की कोशिश की कि शहर भर में पुलिस तैनात है. मैं नहीं आ सकती. कल आती हूं. बस एक ही दिन की तो बात है.

राय साहब क्या करते, उन्हें दिन भर पत्नी की लाश के साथ अकेले रहना था. वह बंगले में घूमघूम कर वक्त बिताने लगे. न खाना, न पीना.

राय साहब पर बिजली तब गिरी, जब प्रधानमंत्री ने अगले 21 दिन के लिए लौकडाउन की घोषणा कर दी. मालिनी नहीं आ सकी तो राय साहब को आत्मग्लानि होने लगी. उन के दिलोदिमाग में भय के बादल मंडराने लगे थे. कुछ नहीं सूझा तो उन्होंने जल्दी से बंगले की सारी खिड़की, दरवाजे बंद कर लिए. बाहर गेट पर ताला लगा दिया, जिस से कोई अंदर न आ सके.

कुछ पल शांत बैठ कर उन्होंने खुद को संभाला. एक कार मालिनी ले गई थी. गनीमत थी कि दूसरी खड़ी थी. उन्होंने सोचा रात में लाश को गाड़ी में ले जा कर ठिकाने लगा देंगे. बंगले से बाहर के लोग अंदर कुछ नहीं देख सकेंगे.

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लेकिन बंगले के चारों तरफ सीसीटीवी कैमरे लगे थे, जिन से राय साहब को बंगले के बाहर सड़क पर आनेजाने वालों की जानकारी मिल जाती थी.

राय साहब ने अपने मोबाइल पर सीसीटीवी फुटेज देखे, चारों तरफ मुस्तैदी से तैनात पुलिसकर्मी नजर आए. लौकडाउन का सख्ती से पालन कराया जा रहा था. आनेजाने वालों की चैकिंग हो रही थी. ऐसे में बाहर जाना खतरे से खाली नहीं था.

इतने दिन लाश के साथ गुजारना भयावह था. वक्त का पहिया ऐसा घूमा कि जिंदगी ठहर सी गई. राय साहब की हालत खराब होने लगी. लाश के साथ रहना उन की मजबूरी थी. बारबार बैडरूम में जा कर वह चैक करते कि दामिनी का शरीर सुरक्षित है या नहीं.

पूरे बंगले में सिर्फ वह थे और दामिनी का मृत शरीर. लाश को घर में रखे रहना चिंता की बात थी. शरीर के सड़ने से बदबू फैल सकती थी. उन्होंने बैडरूम में एसी चला कर दामिनी के शरीर को पलंग पर लिटा दिया और कमरे का दरवाजा बंद कर दिया. कभी वह कमरे के बाहर जाते तो कभी खिड़कियों से झांकते. उन्हें बाहर जाने से भी डर लगने लगा था.

घबराहट धीरेधीरे कुंठा में परिवर्तित होने लगी थी. चेहरे पर भय और ग्लानि के भाव नजर आने लगे थे. वह जितना खुद को संयत करते, दामिनी की मौत को ले कर उन्हें उतना ही अपराधबोध होता. ऐसी स्थिति में उन्हें एकएक दिन गुजारना मुश्किल हो रहा था.

एक दिन वह कमरे में दामिनी को देखने गए तो न जाने किस भावावेश में पत्नी के मृत शरीर से लिपट गए और पागलों की तरह रोने लगे. उन के मुंह से खुदबखुद अपराधबोध के शब्द निकल रहे थे.

‘‘दामिनी, मुझे माफ कर दो. तुम्हें मेरी गलती की इतनी सजा मिली. इस घर के कोनेकोने में तुम्हारी यादें बसी हैं. मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता, प्लीज वापस आ जाओ. मैं ने मालिनी पर विश्वास कर के गलती की. मुझे माफ कर दो,’’ रोतेरोते उन की आंखें लाल हो गईं.

थोड़ी देर बाद राय साहब ने महसूस किया जैसे कोई उन के हाथ को सहला रहा हो. किसी की गर्म सांसें उन के चेहरे पर महसूस हुईं. उन के आगोश में कोई खास लिपटा था. वह मदमस्त से उस निश्चल धारा में बहने लगे. तभी अचानक न जाने कहां से उन के पालतू कुत्ते आ गए और उन के साथ खेलने लगे.

खेलतेखेलते कुत्तों ने अचानक उन के हाथों की अंगुलियों को मुंह में दबा लिया. राय साहब अंगुलियों को छुड़ाना चाहते थे, लेकिन उन की पकड़ मजबूत थी. कुत्तों के पैने दांतों के बीच दबी अंगुलियां कट सकती थीं. इस डर से वह जोर से चिल्लाने लगे. भयभीत हो कर उन्होंने आंखें खोलीं तो खुद को बिस्तर पर पाया. यह स्वप्न था. याद आया, उन के कुत्ते तो एक महीना पहले ही मर गए थे. शायद उन्हें जहर दिया गया था.

राय साहब की हालत पागलों वाली हो गई थी. खाने की चिंता तक नहीं रहती थी. सुबह को डिलिवरी बौय गेट के बाहर दूध और ब्रेड रख जाता था, उसी से काम चलाना होता था. उन्होंने देखा कि दामिनी के हाथ में उन का हाथ फंसा हुआ है. वह उन के शरीर से लिपटी हुई थी.

डर से राय साहब की चीख निकल गई. वह पसीने से तरबतर थे. भय से कांपते हुए वह जमीन पर बैठ गए. सांस उखड़ने लगी, गला सूख रहा था. किसी तरह उठ कर लड़खड़ाते कदमों से वह किचन की तरफ भागे. वहां खड़े हो कर उन्होंने 2-3 गिलास पानी पी कर खुद को संयत किया.

एक दिन राय साहब मानसिक उद्विग्नता की स्थिति में दामिनी की लाश के पास बैठे थे. तभी उन्होंने महसूस किया कि कोई मजबूती से उन का हाथ पकड़े है, लेकिन दिखा कोई नहीं. वह सोचने लगे, दामिनी ही होगी. इस तरह हाथ वही पकड़ती थी.

राय साहब को पत्नी की लाश के साथ घर में रहते हुए 15-20 दिन हो गए थे. हर एक दिन एकएक साल की तरह लग रहा था. बढ़ी हुई दाढ़ी, बिखरे बाल, भयग्रस्त चेहरा उन के सुंदर चेहरे को डरावना बना रहे थे.

घर में जो मिला, खा लिया. अब वह खाने से ज्यादा पीने लगे थे. गनीमत थी कि उस रोज की पार्टी की काफी शराब बच गई थी, वरना वह भी नहीं मिलती.

धीरेधीरे राय साहब को इन बातों की आदत सी पड़ने लगी. पहले वह लाश को देख कर डरते थे. लेकिन अब उस से बातें भी करने लगे थे. उन की मानसिक स्थिति अजीब सी हो गई थी.

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दामिनी उन की कल्पना में फिर से जी उठी. उस की अच्छाई, उस का निस्वार्थ प्रेम अकल्पनीय था. उन की दुनिया, भले ही वह खयालों में हो, फिर से दामिनी के इर्दगिर्द सिमटने लगी. काल्पनिक दुनिया में उन्होंने दामिनी से अपने सारे गिलेशिकवे दूर कर लिए.

अब उन की काल्पनिक दामिनी हर समय उन के साथ रहने लगी. नशे में धुत राय साहब घंटों तक दामिनी से बातें करने लगे. रोजाना दामिनी का शृंगार करना और उस के पास ही सो जाना, उन की दिनचर्या में शामिल हो गया.

आत्मग्लानि, अकेलापन और दुख राय साहब को मानसिक रूप से विक्षिप्त बना रहा था. बिछोह की अग्नि प्रबल होती जा रही थी. एक दिन वह पागलों जैसी हरकतें करने लगे. दामिनी के सड़ते हुए शरीर को गंदा समझ कर वह गीले कपड़े से साफ करने लगे तो शरीर से चमड़ी निकलने लगी.

तेज बदबू आ रही थी. फिर भी राय साहब किसी पागल दीवाने की तरह उस का शृंगार करने लगे. फिर उन्होंने अलमारी से शादी वाली साड़ी निकाली और दामिनी के शरीर पर डाल कर उसे दुलहन जैसा सजाने की कोशिश की. फिर मांग में सिंदूर भर कर निहारने लगे.

उन की नजर में वह वही सुंदर दामिनी थी. वह दामिनी से बातें करने लगे, ‘‘देखो दामिनी, कितनी सुंदर लग रही हो तुम.’’

राय साहब ने उस के माथे पर अपने प्यार की मुहर लगाई, फिर गले लग कर बोले, ‘‘अब तुम आराम करो, तुम तैयार हो गई हो. मैं भी नहा कर आता हूं. हमें बाहर जाना है.’’

राय साहब किसी पागल की तरह मुसकराए. वह कई दिनों से सोए नहीं थे. अब सुकून से सोना चाहते थे. आंखों में नींद भरी थी. पर आंखें थीं कि बंद नहीं हो रही थीं. गला सूख रहा था, उन्होंने उठ कर पानी पीया.

फिर न जाने किस नशे के अभिभूत हो कर नींद की ढेर सारी गोलियां खा लीं. उस के बाद वह बाथरूम में गए और टब में लेट गए. उन के मुंह से अस्फुट से शब्द निकल रहे थे कि आज उन का और दामिनी का पुनर्मिलन होगा.

एक महीने बाद जब लौकडाउन खत्म हुआ तो घर का गार्ड काम पर लौट आया. उस ने घर का दरवाजा देखा, वह अंदर से बंद था. फिर फोन लगाया, लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया. काफी देर तक घंटी बजाने के बाद भी किसी ने दरवाजा नहीं खोला.

कोई रास्ता न देख गार्ड ने पुलिस को बुलाया. बंगले के अंदर जाने पर तेज बदबू आ रही थी. सभी को किसी अनहोनी की आशंका होने लगी. अंदर जा कर देखा तो राय साहब और दामिनी की लाशें पड़ी थीं. लाशें सड़ चुकी थीं. एक लाश पलंग पर सुंदर कपड़ों में थी तो दूसरी वहीं जमीन पर तकिए के साथ पड़ी थी.

वहां की हालत देख कर सब का कलेजा मुंह को आ गया. दोनों का पोस्टमार्टम कराया गया. रिपोर्ट आने पर पता चला कि दोनों की दम घुटने के कारण मौत हुई थी. यानी दोनों का कत्ल किया गया था, लेकिन किस ने? यह बात हर किसी को परेशान कर रही थी कि जब सारे दरवाजे बंद थे तो घर के अंदर 2 कत्ल कैसे हुए.

पुलिस ने जांच में आत्महत्या वाले एंगल पर भी गौर किया. इस दिशा में जांच की गई तो एक बुक रैक के पास एक मेज पर दामिनी की तसवीर रखी मिली, जिस के पास अगरबत्तियों की राख पड़ी थी. वहीं फोल्ड किया एक पेपर रखा था.

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पुलिस ने खोल कर देखा. उस में राय साहब ने अपने मन के उद्गार लिखे थे. लिखा था, ‘मेरी दामिनी की हत्यारी मालिनी है. मुझे मालूम है, मालिनी मुझे भी मार डालेगी. मैं खुद भी यही चाहता हूं, क्योंकि मैं दामिनी का गुनहगार बन कर पुलिस और जेल की जलालत नहीं सह पाऊंगा. उस के पास मेरे बंगले की डुप्लीकेट चाबियां हैं. दामिनी के बिना मैं भी जीना नहीं चाहता.

‘बस एक चाहत है कि मालिनी मेरे बंगले को बेच न पाए. यह मेरे बेटे श्रेयस का है. अगर ऐसा नहीं हो पाया तो उस के इस कमीने बाप की आत्मा को कभी शांति नहीं मिल पाएगी.’

लौकडाउन : भाग 1

मालवा अपने इतिहास के लिए प्रसिद्ध है. जो लोग मालवा के इतिहास को जानते हैं, उन्हें आज भी यहां की मिट्टी में सौंधीसौंधी गंध आती है. इसी मालवा का सुप्रसिद्ध शहर है इंदौर.

पिछले 50-55 सालों में नगरोंमहानगरों ने बहुत तरक्की की है. स्थिति यह है कि एक नगर में 2-2 नगर बन गए हैं. एक नया, दूसरा पुराना. इंदौर की स्थिति भी यही है. शहरों या महानगरों में अंदर पुराने शहरों की स्थितियां भी अलग होती हैं. छोटेछोटे घर, पतली गलियां और इन गलियों के अपने अलग मोहल्ले.

खास बात यह कि इन गलियोंमोहल्लों में लोग एकदूसरे को जानते भी हैं और मानते भी हैं. जरूरत हो तो मोहल्ले के लोगों से हर किसी का खानदानी ब्यौरा मिल जाएगा. राय साहब का बंगला पुराने इंदौर के बीचोबीच जरूर था, लेकिन छोटा नहीं, बहुत बड़ा. बाद में बसे मोहल्ले ने बंगले को घेर जरूर लिया था. लेकिन उस की शानोशौकत में कोई कमी नहीं आई थी. वैसे एक सच यह भी था कि जो लोग बंगले के आसपास आ कर बसे थे, उन्हें जमीन राय साहब ने ही बेची थी.

राय साहब के बंगले की अपनी अलग ही खूबसूरती थी, ऐसा लगता था जैसे अथाह समुद्र में कोई टापू उग आया हो. तरहतरह के फूलों के अलावा कई किस्म के फलों के पेड़ भी थे. इस लंबेचौड़े खूबसूरत बंगलों में कुल मिला कर 3 लोग रहते थे, राय साहब, उन की पत्नी दामिनी और एक गार्ड. राय दंपति का एकलौता बेटा श्रेयस राय लंदन में पढ़ रहा था.

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गार्ड का कोई खास काम नहीं था, इसलिए रात को वह घर चला जाता था. हां, राय साहब के पास 2 लग्जरी कारें थीं, जब उन्हें कहीं जाना होता था तो गार्ड ही ड्राइवर बन जाता था. वह नहीं होता तो दामिनी कार ड्राइव करती थीं.

सामाजिक और आर्थिक रूप से उच्चस्तरीय लोगों के यहां पार्टियां वगैरह होना मामूली बात है. कभीकभी ऐसी पार्टियां केवल दोस्तों तक ही सीमित होती हैं. राय साहब भी पार्टियों के शौकीन थे. वह पार्टियों में जाते भी थे और समयसमय पर बंगले पर पार्टियां करते भी थे.

एक बार दामिनी के साथ वह एक पार्टी में गए तो वहां मालिनी मिल गई. वह लंदन में उन के साथ पढ़ती थी. दोनों में अच्छीभली दोस्ती थी. हां, पारिवारिक स्तर पर दोनों में से कोई भी एकदूसरे को नहीं जानता था.

राय साहब मन ही मन मालिनी को पसंद करते थे. उन्होंने उस से प्रेम निवेदन भी किया था, लेकिन रूपगर्विता मालिनी ने उन का प्रेम निवेदन ठुकरा दिया था. इस से राय साहब को दिली चोट पहुंची थी.

बाद में राय साहब जब भारत लौट आए तो शाही अंदाज में उन की शादी दामिनी से हो गई थी. दामिनी मालिनी से कहीं ज्यादा खूबसूरत थीं, उस में शाही नफासत भी थी. इस के बावजूद वह मालिनी को नहीं भूल सके. कभीकभी उन के दिल में मालिनी नाम का कांटा चुभ ही जाता था. यही वजह थी कि 25-30 साल बाद अचानक मालिनी को देख राय साहब को पुरानी बातें याद आ गईं.

पार्टी में राय साहब ने मालिनी को देखा जरूर, लेकिन अपनी ओर से कोई प्रतिक्रिया व्यक्त नहीं की. मालिनी हाथ में शराब का जाम थामे खुद ही उन के पास आ गई. राय साहब उस की ओर से अनभिज्ञ बने रहे. उसी ने नजदीक आ कर उन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘कैसे हैं शांतनु साहब?’’

मालिनी को नशा तो नहीं हुआ था, लेकिन उस की नशीली आंखों में ऐसा कुछ जरूर था, जो पल भर के लिए राय साहब को अंदर तक विचलित कर गया.

‘‘अच्छा हूं मालिनी, तुम बताओ इतने बरसों बाद यहां?’’

‘‘काम के सिलसिले में आई थी. लंबे समय बाद मुलाकात हो रही है, कभी अपने घर बुलाना.’’ मालिनी ने निस्संकोच कहा.

इस से पहले कि वह या राय साहब कुछ कहते, दामिनी ने आ कर राय साहब के हाथों में हाथ डाल दिए. फिर बोली, ‘‘अब घर चलो, कितनी देर हो गई है, आज आप ने पी ज्यादा ली है.’’

दामिनी के आने पर राय साहब ने मालिनी से दामिनी का परिचय कराया. औपचारिक बातों के बाद पतिपत्नी वहां से चले गए. राय साहब वहां से चले तो गए लेकिन मालिनी की यादों को साथ ले गए. मालिनी को भी लगा जैसे बरसों बाद कोई अपना मिला हो.

लेकिन यह जुदाई नहीं बल्कि मुलाकातों की शुरुआत थी. दोनों आए दिन पार्टियों वगैरह में मिलने लगे. एक बार मालिनी ने ताना मारा तो राय साहब ने उसे घर आने का निमंत्रण दे दिया. इस के बाद मालिनी यदाकदा बंगले पर आने लगी. अविवाहित मालिनी को राय साहब के ठाठबाठ, शानोशौकत, इतना बड़ा बंगला देख कर दामिनी की किस्मत से रश्क होने लगा. उस के मन में एक टीस सी उठी कि काश उस ने राय साहब के प्रस्ताव को ठुकराया न होता, तो आज दामिनी की जगह वह होती.

मालिनी के आनेजाने से राय साहब के दिल में दबी चिंगारी सुलगने लगी, जिसे मालिनी ने भी महसूस किया. यही भावना दोनों को एकदूसरे की तरफ खींचने लगी. नतीजतन दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ने लगीं.

उम्र के इस पड़ाव पर भी दोनों पारस्परिक आकर्षण, ताजगी, रोमांस और रूमानियत से जीवन में रंग भरने लगे. धीरेधीरे मालिनी का बंगले पर आना बढ़ गया. उस ने दामिनी से भी अपनत्व भरी मित्रता कर ली थी.

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बढ़ते हुए कदमों ने मालिनी व राय साहब को एकदूसरे के बिलकुल नजदीक ला दिया था. दोनों प्रेम में घायल पंछियों की तरह खुले आसमान में उड़ान भरना चाहते थे. यह जानते हुए भी कि यह संभव नहीं है. एक दिन मौका मिला तो मालिनी ने राय साहब से कहा, ‘‘शांतनु, ऐसा कब तक चलेगा, अब दूरियां बरदाश्त नहीं होतीं.’’

राय साहब ने तो कोई जवाब नहीं दिया, लेकिन किस्मत ने जल्दी दोनों को मौका दे दिया.

उस दिन राय साहब ने बंगले पर छोटी सी पार्टी रखी थी, दोस्तों के लिए. मालिनी को भी बुलाया था. देर रात तक चली पार्टी का नशा पूरे शबाब पर था.

मालिनी ने चुपके से दामिनी के ड्रिंक में नींद की गोलियां मिला दीं. अधूरी तमन्नाओं और रात रंगीन करने की चाहत ने उसे अंधा बना दिया था.

जब नशे का असर शुरू होने लगा तो वह दामिनी को उस के कमरे में ले गई. राय साहब ने देखा तो पीछेपीछे आ कर पूछा, ‘‘दामिनी को क्या हुआ?’’

मालिनी ने उन्हें चुप कराते हुए कहा, ‘‘पार्टी खत्म करो, फिर बात करेंगे. सब ठीक है.’’

पलभर रुक कर उस ने राय को सब कुछ बता कर कहा, ‘‘तुम चिंता मत करो. उसे कुछ नहीं होगा. बस नशा थोड़ा ज्यादा हो गया है. अब वह सुबह तक नहीं उठेगी. बस रात की ही बात है.’’ कहते हुए मालिनी राय साहब के गले लग गई.

लेकिन तभी अचानक दामिनी उठ गई, वह नशे में थी. यह देख मालिनी डर गई. जल्दी में कुछ नहीं सूझा तो उस ने दामिनी को धक्का दे दिया, जिस से वह पलंग से टकरा कर वहीं लुढ़क गई.

नशे में चूर राय साहब के लिए उस वक्त आंख और कान मालिनी बनी हुई थी, इसलिए वह इस मामले की गहराई में नहीं गए. उन्होंने वही माना जो मालिनी ने कहा.

पार्टी खत्म हो गई. विदा ले कर सब चले गए. राय साहब ने वेटरों को भी मेहनताना दे कर भेज दिया.

सुबह जब नशे की खुमारी उतरी तो राय साहब को अपनी गलती का अहसास हुआ. वह लंबे डग भरते हुए अपने कमरे की तरफ भागे. लेकिन दामिनी कमरे में नहीं थी.

उन्होंने बाथरूम का दरवाजा खोला तो मुंह से चीख निकल गई. दामिनी बाथटब के अंदर पानी में पड़ी थी. राय साहब ने उसे बाथटब से बाहर निकाल कर पेट से पानी निकालने का प्रयास किया. मुंह से सांस देने की कोशिश की, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. दामिनी का शरीर ठंडा पड़ चुका था.

राय साहब की चीख सुन कर मालिनी दौड़ी आई. दामिनी को निस्तेज देख कर उस ने पूछा, ‘‘क्या हुआ, ये सब कैसे हो गया?’’ बात उस के गले में अटक रही थी. आंखें डबडबाने को थीं.

दामिनी के शव को देख उस ने रुआंसी हो कर कहा, ‘‘मैं ने ड्रिंक में सिर्फ नींद की गोलियां मिलाई थीं. मैं इस की जान नहीं लेना चाहती थी.’’

राय साहब ने उसे गुस्से में परे धकेल दिया. फिर चीख कर बोले, ‘‘जाओ, जल्दी से किसी डाक्टर को बुलाओ. यह नहीं होना चाहिए था.’’

मालिनी के चेहरे पर भय उतर आया था. फिर भी उस ने राय साहब को शांत करने की कोशिश की.

राय साहब गुस्से में बड़बड़ा रहे थे. मालिनी ने उन के कंधे पर हाथ रख कर सांत्वना देते हुए कहा, ‘‘तुम शांत हो जाओ, इस की सांस बंद हो चुकी है. डाक्टर से क्या कहोगे? पुलिस केस बनेगा. तहकीकात होगी. बात का बतंगड़ बन जाएगा. शाम को चुपचाप दाह संस्कार कर देंगे, इसी में हमारी भलाई है.

‘‘इन परेशानियों से बचने के लिए हमारा चुप रहना ही ठीक रहेगा. मैं तुम्हारे साथ हूं, चिंता मत करो. मैं रात को आऊंगी. गार्ड छुट्टी पर है, कलपरसों तक आएगा. किसी को पता नहीं चलेगा.’’ मालिनी ने राय साहब को शांत कराने की कोशिश की.

मालिनी की बात से सहमत होने के अलावा राय साहब के पास कोई दूसरा रास्ता नहीं था. उन्हें समझाने के बाद मालिनी बोली, ‘‘अब मैं जा रही हूं. शाम को आऊंगी. तुम्हारी गाड़ी ले जा रही हूं. चाबी दे दो.’’

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राय साहब से कार की चाबी ले कर मालिनी बाहर निकल गई. राय साहब उसे छोड़ने बाहर आए. वह कार ले कर निकल गई तो मुख्य गेट उन्होंने ही बंद किया.

राय साहब ने किसी तरह दिन काटा और शाम को मालिनी के आने का इंतजार करने लगे. मन को बहलाने के लिए वह टीवी पर समाचार सुन रहे थे, तभी एक खबर ने उन्हें चौंका दिया. देश में कोरोना महामारी फैलने की वजह से जनता कर्फ्यू लगा दिया गया था.  किसी को भी घर से बाहर निकलने की मनाही थी. बात साफ थी आज रात वे दामिनी के शव के साथ बाहर नहीं जा सकते थे.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

 

पत्रकारजी

…और नेताओं की कुर्सी हिलने लगी. आखिर पत्रकार जी ने बाण ही ऐसा चलाया था, जो अचूक था. हमारे शहर में हालांकि पत्रकार तो बहुतेरे हैं. मगर नेताओं की कुर्सी हिला सके, वह तो बस पत्रकार जी के बस या कहें बूते की बात हुआ करती है.

तो नेताओं की कुर्सी हिलने लगी थी.

पत्रकार जी ने ऐसी खोज खबर भरी रिपोर्टिंग की कि मुख्यमंत्री तलक कान खड़े हो गए .आप कहेंगे- भई! आखिर रिपोर्टिंग क्या थी ?…रुकिये!   हमारे पास इतना वक्त नहीं कि आपको एक एक बात तफसील से बताते फिरें.

हम तो सिर्फ यह बता रहे हैं… और जरा कान खोल कर सुन लीजिए… नेताओं की कुर्सी डग-मग, डग-मग हिलने लगी. साधु समान मुख्यमंत्री से  जब कस्बे के नेतागण राजधानी में मिलने पहुंचे तो देखते ही उन्होंने कहा- “अमां! आप लोग क्या खा कर राजनीति कर रहे हो…! ”

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सभी एक दूसरे की ओर देखने लगे. सांसद, विधायक की ओर, और विधायक पार्टी के सदर की और प्रश्न वाचक भाव लेकर देखने लगा. सभी की आंखों में असहजता का भाव था.

मुख्यमंत्री सांसद की और दृष्टिपात करते हुए बोले- “कस्बे के एक पत्रकार को तुम लोग काबू में नहीं रख पाये…वह यहां तक आ धमका.”

“जी .” सांसद बांसुरीनंद हकलाये.

“हां…अब कस्बे और आसपास के पत्रकारों को तो कम से कम आप लोग सुलटा लिया करो. यह बड़ी कमजोरी की बात है… एक कस्बे का पत्रकार राजधानी और हमारे गिरेबां तक आ पहुंचा.

छी…!” मुख्यमंत्री  डॉ. चमनानंद  का मुंह मानो कड़ुवा हो गया था.

“- माई बाप… जरूर यह यह गलती, इस लखनानंद  की होगी…इसने संसदीय सचिव बनने के बाद न तो पत्रकारों को पार्टी दी, न ही विज्ञापन बांटे…बस यही गलती हो गई इससे. ” सांसद बांसुरीनंद  ने आंखों पर चश्मे को ठीक से बैठाते हुए विनम्रता भरे शब्दों में कहा. यह सुन लखनानंद  उचक कर आगे आया-

“हुजूरे आला ! यह बात बेबुनियाद है, मैं तो कस्बे के हर एक पत्रकार से मधुर संबंध रखता हूं. बीच-बीच में खुश भी रखता हूं . एक-दो को तो ऐसे रखा है कि सुबह उठकर मुझसे बाते किये बिना और रात को सोने से पहले…कस्बे की एक एक बात का हालो हवास दिए बिना नींद भी नहीं आती है.”

मुख्यमंत्री ने अपने प्रिय विधायक और  संसदीय सचिव की और स्निग्ध मुस्कुराहट डालते  हुए देखा.

सांसद और विधायक को साफ-साफ बचता देख पीछे दुबके खड़े जिले के सदर अशोकानंद  हाथ जोड़कर आगे आए, -“मालिक ! मैं भी गुनाहगार नहीं हूं.मेरी बखत ही क्या है, मगर मैं कस्बे  के पत्रकारों को भरसक साध कर रखे हुए  हूं.. मेरे पास कोई बड़ा स्रोत भी नहीं है… मगर…” सदर अपनी सफाई दे रहा था कि मुख्यमंत्री ने सभी की और तीक्ष्ण दृष्टिपात करते हुए थोड़ा सा कठोर होते हुए कहा-” मैं एक खास पत्रकार की और तुम सभी का ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं.”

” जी हुजूर ! ” सांसद, विधायक और सदर के साथ मौजूद वरिष्ठ पार्टी कार्यकर्ता समवेत स्वर में बोल पड़े.

” एक पत्रकार है, जिसने बडे मार्के की शिकायत की हुई है…

सूचना अधिकार के तहत . अब हम क्या करें .” मुख्यमंत्री डॉ. चमनानंद यह कह कर चुप हो गए और सभी की ओर नजरें फिराने लगे.

… “हुजूर आदेश !”… सभी शहद से लिपटे हुए शब्द नि:सृत करने लगे.

मुख्यमंत्री बोले-” सूचना  अधिकार का ब्रह्मास्त्र चलाकर तुम्हारे कस्बे के पत्रकार ने मानो हमको घायल कर दिया है…. अब हमारा कार्यालय जवाब देता है तो मुश्किल… नहीं देता है तो मुश्किल…. ”

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” हुजूरे आलिया !  सांसद उछल पड़े- “आप…. मैं समझ गया आप तनिक भी चिंता न करें. अरे पत्रकार जी तो हैं… इसका काम ही उंगली करना है आप…. निश्चित रहिए, हम उसे देख लेंगे.” सदर अशोकानंद ने  कंधे उचका कर कर कहा -” हां हां… ठीक हो जायेगा .”

विधायक लखनानंद  ने धीमे स्वर में कहा- “माई बाप! गलती हो गई होगी… मुआफ करें….हम उसे देख लेंगे.”

दोनों सांसद की और उत्सुक भाव से देखने लगे. सांसद डॉ. बांसुरीनंद हंसकर बोले,- “अरे हमारे पत्रकार जी तो हैं ही ऐसे….थोड़ा टेढ़े है मगर उसे बुलाकर सीधा कर लेंगे. हमसे बाहर नहीं जाएगा ।”

” हूं !” मुख्यमंत्री ने हुंकार भरी और हौले से मुस्कुरा कर आगे बढ़ गए । सभी नेताऔ ने लौटते ही पत्रकार जी  को तलब किया. सांसद डॉक्टर बांसुरीनंद ने उसे वक्र दृष्टि से  देखा और कहा- “कइसे रे ! ऐसने पत्रकारिता करथे .”

पत्रकार जी सामने सोफे पर बैठे है.सोच रहे हैं… इनसे बैर ठीक नहीं. पुलिस कप्तान, कलेक्टर सभी इनके इशारे पर नृत्य कर रहे हैं.आत्मसमर्पण में ही बुद्धिमत्ता है .

सांसद चुप हुए तो विधायक बोल पड़े- “अरे भाई यह कैसी पत्रकारिता है.कुछ लिखो पढ़ो… सुचना अधिकार से क्या होगा ? सरकार से टकराकर खैर से रहा है कोई…”

” मुख्यमंत्री महोदय! को हम लोगों ने आश्वस्त किया है. पत्रकार जी हमारे हैं, चुक हो गई होगी .हम समझा लेंगे . यह सदर की सुमधुर वाणी थी.

पत्रकार जी की आंखें झुकी हुई थी.

पलकें उठाई  बारी-बारी सबको देख कर धीरे से उसने मन की पीड़ा उड़ेली – ” में क्या करता ! स॔सदीय सचिव बने तो  कोई विज्ञापन नहीं,… सांसद  बने तो कुछ नहीं …. जन्मदिन आया कुछ नहीं, कस्बे में मुख्यमंत्री आये, खाली डब्बा, मै क्या करता बताओ.”

“- चलो शांत हो जाओ.,” सांसद बांसुरीनंद  ने जेब से  एक हजार  का नोट निकाला …. “लो रख लो ..और विधायक चल  तहूं  एक हजार दे.”

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” -ऐ पांच सौ मेरी ओर से .”

सदर अशोकानंद  के चेहरे पर हास्य है . पत्रकार जी ने रुपये थामे. चाय पी और दफ्तर की ओर कदम बढ़ा दिए.

लौकडाउन : मालिनी ने शांतनु को क्यों ठुकरा दिया था?

उम्मीद : संतू को क्या थी सांवरी से उम्मीद

संतू किसी ढाबे पर ट्रक रोकने का मन बना रहा था, तभी सड़क के किनारे खड़ी सांवरी ने हाथ दे कर ट्रक रुकवाया और इठलाते हुए कहा, ‘‘और कितना ट्रक चलाएगा… चल, आराम कर ले.’’ संतू ने सांवरी पर निगाह डाली. ट्रक की खिड़की से सांवरी के कसे हुए उभारों को देख कर संतू एक बार तो पागल सा हो गया.

संतू को अच्छी तरह मालूम था कि इस रास्ते पर ढाबे वाले ग्राहकों को लुभाने के लिए लड़कियों का सहारा लिया करते हैं. उस ने ट्रक सड़क किनारे लगाया और सांवरी के बताए रास्ते पर चल कर उस की झोंपड़ी में पहुंच गया. सांवरी कह रही थी, ‘‘अरे, ढाबे वाले अच्छा खाना कहां देते हैं, इसलिए तुझे यहां अपना समझ कर ले आई. अब तू आराम से खापी, मौज कर. सुबह निकल लेना.’’

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संतू के ऊपर सांवरी की खुमारी चढ़ती जा रही थी. चूल्हा अभी गरम था. रोटी और मटन की खुशबू ने संतू की भूख और बढ़ा दी थी. चूल्हे की लौ में सांवरी की देह तपे हुए सोने सी लग रही थी. उस ने देशी दारू का पौवा निकाला और संतू को पिला कर दोनों ने खाना खाया.

खाना खाने के थोड़ी देर बाद ही वह सांवरी के आगोश में समा गया. सुबह 5 बजे जब संतू जागा, तब उस ने देखा कि न वहां सांवरी थी और न ही सड़क किनारे ट्रक. ट्रक में कम से कम एक लाख रुपए का सामान भरा हुआ था. अब अगर वह बिना सामान के लौटेगा, तब कंपनी को क्या जवाब देगा और जेल की हवा खानी पड़ेगी सो अलग.

तभी कुछ दूरी पर संतू को अपना ट्रक खड़ा दिखा. जब वह वहां पहुंचा, तब उस ने देखा कि उस का सामान गायब था, लेकिन कुछ दूर खड़ी सांवरी हंस रही थी. संतू कुछ बोले, इस के पहले ही सांवरी ने संतू से कहा, ‘‘ऐ ड्राइवर, अब चुपचाप निकल ले. इसी में तेरी भलाई है, वरना…’’

संतू ने कहा, ‘‘तू ने अपनी कातिल निगाहों से तो मुझे घायल कर ही दिया है, अब एक एहसान और कर कि इस चाकू से मुझे भी घायल कर दे, ताकि…’’ खून से लथपथ संतू किसी तरह ट्रक चला कर कंपनी के दफ्तर पहुंचा. कंपनी ने संतू को इलाज के लिए 10 हजार रुपए दिए और एक महीने की छुट्टी दी.

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कंपनी वाले इसलिए खुश हो रहे थे कि सामान भले ही गया, पर उस का बीमा तो मिल जाएगा, लेकिन संतू ट्रक सहीसलामत ले आया था.

अब घर पर रमिया संतू की दवादारू कर रही थी. संतू ठीक हो गया था और रात को ट्रक ले कर इस उम्मीद से उसी रास्ते से गुजर रहा था कि सांवरी उसे फिर मिलेगी.

टूटे घरौंदे : भाग 3

वह किसी को कुछ समझा नहीं सकता था न कोई सफाई दे सकता था. ललिता ने सबकुछ क्यों किया यह तो उसे आजतक नहीं पता चला न उस ने जानना चाहा लेकिन उस के दिमाग में कई बार यह बात जरूर कौंधी थी कि सुमन ललिता की एकलौती बेटी थी. क्या इस का मतलब यह कि किशोर में कुछ कम… नहीं नहीं वह इस तरह की कोई बात सोचना भी नहीं चाहता था.

वह अब क्या करेगा नहीं जानता. लेकिन कविता को सब सच बता देगा यह तो तय है. लेकिन, कविता से माफी मांग लेने से या माफी मिल भी जाए तब भी गांववालों और किशोर से कैसे सामना करेगा यह वह नहीं जानता. उस की एक गलती इतने सालों बाद उस का घरौंदा तोड़ देगी मुरली ने इस की कल्पना भी नहीं की थी.

दिन लंबा था और उसे काटना बेहद मुश्किल. कोमल बाहर आंगन में अपने खिलौनों में गुम थी और कविता कभी धम से एक परात पटकती तो कभी भगौना.

सुबह के वाकेया को 3 घंटे बीत चुके थे. धूप गहराई हुई थी. मुरली और कोमल अंदर कमरे में थे और कविता ने रसोई को अपना कमरा बना रखा था. घर में लाइट नहीं थी और यह दिल्ली तो थी नहीं कि इनवर्टर चला पंखें की हवा खा सकें. गरमी से मुरली का सिर भन्ना रहा था, पंखा ढुलकाते हुए उस के हाथ दुखने लगे थे. कोमल सो रही थी और मुरली उसे भी हवा कर रहा था. लेकिन, छोटी सी रसोई में कविता गरमी से कम और आक्रोश से ज्यादा तप रही थी.   मुरली को चिंता होने लगी कि कविता कहीं बीमार न पड़ जाए.

“कविता,” मुरली ने रसोई के दरवाजे पर खड़े हो कर कहा

कविता पसीने से लथपथ थी. उस आंखें गुस्से में रोने से लाल थीं यह मुरली देख पा रहा था. कविता की जिंदगी में दुखों के बादल कभी नहीं छाए थे. वह अच्छे घर की लड़की थी, 10वीं पास थी जो उस के लिए कालेज से कम न था. घर में 3 और बहनें थीं जो आसपास के गांवों में बिहा दी गईं थी और दो भाई थे जिन के पास पिता के छोड़े हुए खेतखलिहान थे, मकान था और मां के कुछ गहने भी. कविता के हिस्से नाममात्र की चीजें आईं थी लेकिन घर में सब से छोटी होने के नाते उसे इस की भी कोई उम्मीद नहीं थी, सो वह खुश थी.

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अपने घर और आसपास की सहेलियों में वह पहली थी जो शादी कर दिल्ली आई थी. मुरली सुंदर लड़का था और शादी के बाद जो कुछ एक पत्नी को अपने पति से चाहिए होता है वह सब उस से उसे मिला था. मुरली की बातें, रवैया, बोलचाल सभी से कविता प्रभावित थी और उस पर मर मिटती थी. कोमल के जन्म के बाद से तो उसे जैसे सब कुछ मिल गया था. उस का मानना था कि एक बच्ची को वह जितना सुख दे सकते हैं उतना दो बच्चों को नहीं दे पाएंगे और इसलिए वह दूसरा बच्चा नहीं चाहती थी. मुरली उस की इस बात से बेहद प्रभावित हुआ था और हामी भर दी थी.

जीवन का यह पहला और सब से बड़ा आघात कविता को इस तरह लगेगा यह उस की कल्पना से परे था. वह मुरली को किसी और से बांटने के बारे में सोच भी नहीं सकती थी, और किसी गैर औरत के साथ संबंध रखने की बात उस के दिल में उतर नहीं रही थी. उसे लगने लगा जैसे मुरली इतने साल उस से प्यार करने का केवल ढोंग रचता आया है और उस की खुशियों का संसार केवल झूठ की इमारतों से बना हुआ था.

“कविता, एक बार बात सुन लो,” मुरली ने एक बार फिर कहा लेकिन कविता ने उसे देख कर मुंह फेर लिया था.

“जैसा तुम सोच रही हो वैसा कुछ नहीं है, मेरा उस औरत…” मुरली कह ही रहा था कि कविता ने उस की बात बीच में ही काट दी और बोली, “इसीलिए आते थे तुम यहां. और कितनी औरतों के साथ घर बसाएं हैं तुम ने और कितने बच्चे पाले हुए हैं यहां,” उस का गला रूंध गया था.

“ऐसा कुछ नहीं है, मैं ऐसा आदमी नहीं हूं तुम जानती हो. यह बस सालों पहले की गलती थी और बस एक ही बार हुआ था जो हुआ था. मैं इस औरत से उस के बाद कभी मिला भी नहीं, न मुझे कुछ सालों पहले तक सुमन के बारे में पता था. मेरे लिए तुम और कोमल ही मेरा सब कुछ हो और कोई भी नहीं….”

“हां, इसलिए तो धोखा दिया है इतना बड़ा. मैं कल ही अपने भैया के घर चली जाऊंगी मनीना. रख लेना अपनी दोनों बेटियों को और उस औरत को अपने पास. मुझे न यहां रहना है न किसी से कोई रिश्ता रखना है. यह दिन देखने से अच्छा तो मैं शहर में कोरोना से ही मर जाती,” कविता कहती ही जा रही थी.

“तुम कहीं नहीं जाओगी और न मरने की बातें करोगी,” मुरली की आंखों में आंसू थे. वह कविता के आगे घुटनों के बल झुक गया और उस के दोनों हाथ अपने हाथों में ले कहने लगा, “मैं ने कभी उस से प्यार नहीं किया, किसी से नहीं किया तुम्हारे अलावा, सच कह रहा हूं. हम जल्द ही दिल्ली चलेंगे और इस गांव की तरफ मुड़ कर नहीं देखेंगे. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई, मुझे माफ कर दो,” मुरली सुबकने लगा था. कविता और मुरली दोनों ही रोये जा रहे थे और अब शब्द भी उन के कंठ में अटक कर रह गए थे.

कुछ देर ही बीती थी कि दरवाजे पर एकबार फिर दस्तक हुई. मुरली उठा और मुंह पोंछ कर दरवाजा खोलने गया. कविता ने सिर पर दुपट्टे से पल्ला डाला और रसोई से बाहर खड़ी हो देखने लगी.

दरवाजे पर खुद को मुखिया समझने वाले कुछ बुजुर्ग, चौधरी बन घूमने वाले कुछ नौजवान जिन में से कईयों को मुरली जानता था, लाठी लिए एक बूढ़ी औरत जिसे उम्र के चलते चौधराइन बनने की पूरी इजाजत थी, कुछ औरतें जो मुंह पर पल्ला डाले चुगली के इस सुनहरे अवसर को छोड़ना नहीं चाहती थीं, और कुछ बिना किसी मतलब के आए बच्चे थे. किशोर भी वहीं था लेकिन उस के चहरे पर कोई गुस्सा नहीं था बल्कि असमंजस के भाव मालूम पड़ते थे.

मुरली ने हाथ जोड़े तो बाहर खड़े लोगों में से मुरली के दूर के ताऊ लगने वाला वृद्ध पूरे अधिकार से आंगन में आने लगा जिन के पीछे पूरी फौज भी आ धमकी. मुरली जानता था अब यहां पंचायती होगी और उस पर खूब कीचड़ उछलेगा पर वह यह नहीं जानता था कि असल कीचड़ में किशोर लथपथ होने वाला है.

लोगों ने आंगन का कोनाकोना घेर लिया और कोई चारपाई तो कोई जमीन पर ही चौकड़ी जमा बैठ गया.

“गांव में सुबह से तुम लोगों के बारे में बाते हो रही हैं, हम ने सोची कि पूछें गाम में का माजरो है,” बुजुर्ग मुखिया ने कहा.

“तेरे और किशोर की लुगाई के बीच का चलरो है तू खुद ही बता दे,” दूसरे बुजुर्ग ने कहा.

“मुखिया जी, मैं तुम से कह रहा हूं के ऐसी कोई बात ना है, दोनों छोरियों की शकल मिल रही है तो बस इत्तेफाक है,” किशोर ने कहा.

किशोर के मुंह से यह सुन कर मुरली को हैरानी हुई. मतलब या तो किशोर सब जानता है या जानना नहीं चाहता है.

“जा दुनिया में एक शक्ल के 7 आदमी होते हैं, तुम लोग गांव के गवार ही रहोगे, बेमतलब बहस कर रहे हैं. मैं तुम से कह रहा हूं ना घर कू चलो, यह पंचायती करने का कोई फायदा नहीं है. बात का बतंगड़ मत बनाओ,” किशोर ने फिर कहा.

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मुरली सब के बीच चुप बैठा था और कविता कोने में खड़ी सब सुन रही थी.

“ऐसे कैसे मान लें के कोई बात ना है. हम कोई आंधरे थोड़ी हैं. तेरी बीवी का चक्कर है इस मुरली के साथ, हम जा बात की सचाई जानीवो चाहत हैं,” एक ने कहा.

“मुखिया जी, तुम मेरे घर के मामले में मत कूदो, मैं तुम्हारे हाथ जोड़ता हूं,” किशोर बोला.

“ऐसे कैसे न बोलें, यह तेरे घर का मामला नहीं है अब गाम को मामला है, गाम की इज्जत को मामलो है,” बूढ़ी औरत ने कहा.

“अरे, चम्पा जा तू जाके इस की लुगाई को बुलाके ला,” दूसरे बुजुर्ग ने कहा.

ललिता भी मुरली के आंगन में आ गई. उस ने मुंह घूंघट से ढका हुआ था और हाथ बांधे खड़ी थी. सुमन उस के साथ ही थी.

“हां, ये छोरी तेरी और मुरली की है बता अब सब को,” पीछे से आवाज आई.

“गाम से निकाल दो ऐसी औरत को तो, पति के पीठपीछे रंगरलियां मनाने वाली औरत है ये,” किसी औरत ने कहा.

“मैं न कहता था ललिता भाभी के चालचलन अच्छे न हैं, अब देख लो,” यह गली का ही कोई लड़का था जिस की किशोर से अच्छी दोस्ती थी और ललिता से भी बेधड़ंग मजाक किया करता था.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

टूटे घरौंदे : भाग 2

गांव के जो एकदो लोग किशोर के साथ दरवाजे पर थे वह भी दोनों बच्चियों की एक सी शक्ल देख कर हैरान थे. किशोर की आंखें भी लगभग फटी हुई थीं, कविता को अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ और सब से अलग मुरली अपनी नजरें सभी से छुपाने लगा.

हरतरफ से आवाज आने लगी, कोई कहता “ये तो एक ही शक्ल की हैं,” तो कहीं से आवाज आती “बिलकुल जुड़वां बहनें लग रही हैं”.

ऐसा लग रहा था जैसे सचमुच किसी फिल्म का दृश्य हो. जैसे गोविंदा की एक फिल्म में उस की दो बीवियों से दो बच्चे थे और दोनों की ही शक्लें बिलकुल एक जैसी थीं.

सुमन और कोमल की उम्र में एक साल का अंतर था लेकिन शक्ल में रत्ती बराबर का भी नहीं. सुमन की आंखें भी बड़ी और गोल थीं, कोमल की आंखें भी. सुमन के होंठ भी पतले थे, कोमल के होंठ भी. सुमन का माथा भी चौड़ा था, कोमल का भी. यहां तक कि सुमन का रंग भी गोरा था और कोमल का भी. आखिर, यह कैसे संभव था कि दो अलगअलग कोख से जन्मी बच्चियां एक सी हों बजाए कि उन का पिता एक हो.

सभी के दिमाग में यह बात आने में देर नहीं लगी. किशोर सुमन को ले कर अपने घर चला गया.  किशोर की पत्नी ललिता घर में पसीनापसीना हो रखी थी. किशोर ने उसे देखा और देखते ही उस की बांह कसकर भींच ली.

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“चल कमरे में,” किशोर ने कहा.

“क्या… हुआ?” ललिता ने हकलाते हुए कहा.

“इस छोरी की शक्ल उस मुरली की छोरी से कैसे मिलती है?”

“मुझे क्या पता, और आप पूछ क्यों रहे हैं, भला मुझे कैसे पता होगा.”

किशोर ललिता की बात सुन कर कुछ नहीं बोला. वह वहां से उठ कर बाहर निकल गया.

सुमन समझ नहीं पाई कि उस की शक्ल किसी से मिलने पर पापा खुश होने की बजाए नाराज क्यों हो रहे हैं. उस ने मम्मी से जा कर पूछा, “मम्मी, पापा को क्या हुआ?”

“कुछ नहीं, जा कमरे में जा कर खेल,” इतना कह ललिता कुछ सोचते हुए अपने काम में लग गई.

मुरली ने दरवाजा बंद किया तो कविता की आंखों में उसे ढेरों सवाल साफ दिखाई दे रहे थे. उसे समझ आ गया था कि जो राज उस ने 12 सालों तक छुपा कर रखा था अब वह और नहीं छुपा पाएगा.

“तुम जो सोच रही हो वैसा कुछ नहीं है,” मुरली ने कविता से कहा तो वह रसोई में जा बर्तन धोने लगी जोकि ऐसा लग रहा था जैसे बर्तन पटक रही हो.

मुरली चारपाई पर लेट गया और हाथ अपनी आंखों पर रख अतीत में गुम होने लगा.

मुरली जवान तंदरुस्त लड़का था जिस की सुबह दिनभर खेत में घूमने और रात दोस्तों के साथ महल्ले में मटरगश्ती करते निकलती थी. किशोर मुरली का बचपन का दोस्त था. दोनों का घर अगलबगल में ही था तो जब देखो तब दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना रहता था. किशोर की शादी जब ललिता से हुई थी तब मुरली और किशोर दोनों ही 19 वर्ष के थे और ललिता 18 वर्ष की. शादी में जब पहली बार मुरली ने ललिता को देखा था तो उसे वह बेहद अच्छी लगी थी.

शादी के बाद जब भी मुरली किशोर के घर जाता तो ललिता को निहारने से खुद को रोक नहीं पाता था. ललिता मुरली के सामने अकसर घूंघट में रहती थी. सासससुर के होते हुए तो उसे लगभग 24 घंटे ही घूंघट में रहने की हिदायतें दी गईं थीं. मुरली समझता था कि जिस नजर से वह ललिता को देख रहा है वह सही नहीं है लेकिन उस के खयाल उस के काबू में नहीं थे. ललिता खूबसूरत थी, उस का गोरा रंग, हिरणी सा शरीर, पतली बाहें, सबकुछ मुरली को अपनी तरफ खींचता था, लेकिन उस की ललिता को पाने की ख्वाहिश पूरी नहीं होगी यह वह जानता था.

‘भाभी, किशोर को भेजना तो जरा,’ एक दोपहर मुरली ने दरवाजे पर खड़े हो कर कहा.

‘वह सो रहे हैं, आप जगाना चाहें तो आ जाइए,’ ललिता ने मुरली से कहा.

मुरली ललिता के पीछेपीछे कमरे तक चला गया. ललिता के सासससुर दोनों ही घर पर नहीं थे तो उस ने कमरे में घुसते हुए अपना घूंघट हटा लिया. मुरली किशोर को उठाने तो गया था लेकिन ललिता को देख वह चुपचाप सोते हुए किशोर के बगल में बैठ गया. ललिता की नजरें भी मुरली पर टिकी थीं. मुरली को यकीन नहीं हुआ कि सच में ललिता उसे इस तरह देख रही है. वह थोड़ा सकपका गया और किशोर को जगाने लगा.

अगले दिन से मुरली किसी न किसी बहाने छत पर जाने लगा जहां उसे दूसरे कोने पर ललिता उसी समय पर दिख जाती थी. उसे पता था कि यह कोई इत्तेफाक नहीं है, ललिता जानबूझ कर छत पर आती है.

लेकिन, वह यह नहीं समझ पा रहा था कि आखिर ललिता किशोर की बजाय उस में इतनी दिलचस्पी क्यों दिखा रही है. मुरली तो अविवाहित है लेकिन ललिता किसी की पत्नी होते हुए यह सब क्यों कर रही है.

मुरली ललिता की तरफ आकर्षित था लेकिन ललिता का आकर्षण कितना खतरनाक साबित हो सकता था यह भी वह अच्छी तरह समझता था. और फिर एक दिन वही हुआ जो वह सोच रहा था.

किशोर के मातापिता दूसरे गांव एक शादी में गए हुए थे. घर पर सिर्फ किशोर और ललिता ही थे. मुरली और किशोर अपने बाकी दोस्तों के साथ मुरली के घर खानेपीने में लगे थे. किशोर ने एक के बाद एक गिलास शराब पी ली जिस कारण उस के लिए होश संभालना मुश्किल होने लगा. रात गहराने लगी थी और सभी दोस्त एकएक कर अपने घर जाने लगे. किशोर ने इतनी पी ली थी कि उसे ठीक से खड़े होने में भी परेशानी हो रही थी.

मुरली किशोर को उस के घर ले जाने लगा. रात गहरी थी और लोग अपने घरों में सोए थे. मुरली ने पहले सोचा था कि किशोर को उस की छत से ही छोड़ आए पर फिर सोचा कि उसे सीढ़ियों पर चढ़ाना मुश्किल होगा तो सीधा दरवाजे से ही ले गया.

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घर में घुसा तो मुरली की मदद करने के लिए ललिता किशोर को पकड़ने लगी. किशोर को पकड़तेपकड़ते ललिता के हाथ मुरली के हाथों को बारबार छू रहे थे. मुरली के लिए इस तरह किसी औरत का छूना बहुत नया था. खुद को रोक पाना मुरली के लिए कठिन था, और आज तो मौका भी था और ललिता की ‘हां’ थी यह भी वह जानता था. किशोर को कमरे में लेटा कर वह कमरे से बाहर निकला तो ललिता ने कमरे से निकल दरवाजे पर कुंडी लगा दी और मुरली को देखने लगी.

उस ने मुरली को दूसरे कमरे में आने का इशारा किया और मुरली उस के पीछे चला गया. उसे ललिता से कुछ पूछने की सुध नहीं थी और ललिता उसे कुछ बताना नहीं चाहती थी. लगभग 45 मिनट मुरली और ललिता का जिस्मानी संबंध चलता रहा. मुरली उत्तेजित था और उस ने वासना के चलते एक दोस्त की भूमिका भुला दी थी.

वह अपने घर गया तो इस ग्लानी ने उसे घेर लिया. एक तरफ वह ललिता के साथ इस प्रसंग को दोहराना चाहता था और दूसरी तरफ इस बात को स्वीकारना नहीं चाहता था कि उस ने अपने दोस्त की पीठ में छूरा घोंपा है. उस ने किशोर के घर जाना छोड़ दिया. किशोर और बाकी दोस्त उसे बुलाने आते तो साफ मना कर देता. ललिता की तो शक्ल ही नहीं देखना चाहता था वह.

एक हफ्ता ही हुआ था कि उस ने गांव छोड़ने का फैसला कर लिया था. दिल्ली में उस के दूर की रिश्तेदारी का एक लड़का नौकरी कर रहा था. उसी के भरोसे वह दिल्ली आ गया. समयसमय पर घर पर बात हो जाती तो सभी की खबर मिल जाती. 6 महीने बाद घर आया तो ललिता के गर्भवती होने की बात जान कर भी उसे कोई हैरानी नहीं हुई. वह दो दिन के लिए आया था और किसी से मिले बिना ही चला गया था. किशोर और बाकी दोस्त उसे बड़ा आदमी तो कभी घमंडी कहते और अपनी दिनचर्या में रम जाते.

ललिता की बच्ची को ले कर मुरली को पहली बार हैरानी तब हुई जब उस की बेटी कोमल 4 साल और ललिता की बेटी सुमन 5 साल की थी. वह गांव आया था जमीन के किसी मसले को ले कर जब उस ने सुमन को पहली बार देखा था. उस का चेहरा हूबहू कोमल जैसा था. मुरली समझ चुका था कि उस रात ललिता और उस के बीच जो कुछ भी हुआ उस से ललिता गर्भवती हुई थी और यह बच्ची किशोर की नहीं बल्कि मुरली की थी.

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उस ने फैसला कर लिया था कि कभी दोनों बच्चियों का न सामना होने देगा न किसी को यह बात पता चलने देगा. पर अब इतने सालों बाद बात हाथ से निकल चुकी थी. उस के पास गांव वापस आने के अलावा कोई चारा ही नहीं था. शहर में भूखों मरने की नौबत आने से पहले निकल जाना जरूरी था. राज खुलने की आशंका तो उसे थी लेकिन यह सब इतनी जल्दी हो जाएगा यह उस ने नहीं सोचा था.

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