एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 3

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लेखिका- रेनू ‘अंशुल’

देखते ही देखते हफ्ता निकल गया. पार्टी का दिन भी आ गया. लौन में ही पार्टी का इंतजाम किया था. पहली बार मिशिका ने पार्टी का जिम्मा अपने सिर पर लिया था. बोली, ‘‘ममा, अभी परीक्षा की कोई टेंशन नहीं है, इस बार मैं देखूंगी सारा इंतजाम.’’

सुन कर पहली बार एहसास हुआ कि बेटी बड़ी हो गई है. पार्थ का खयाल एक बार फिर दिमाग में आ गया. मगर मेरी मजबूरी थी कि मैं चाह कर भी यह रिश्ता नहीं कर सकती थी. मुझे इस समय अपनी भतीजी के गुस्से में कहे शब्द याद आ रहे थे.

घर में मेहमान आने शुरू हो गए थे. मैं ने अपनी सोच को दरकिनार करने की कोशिश की और मेहमानों की आवभगत में लग गई. जज साहब के कुछ करीबी जल्दी ही आ गए थे. अत: वह उन्हें पीने व पिलाने में व्यस्त हो गए. मैं और मिशिका मेहमानों के स्वागत में लगे थे. बेटी पर बारबार नजरें जा कर ठहर जातीं क्योंकि आज वाकई वह बहुत सुंदर लग रही थी. अचानक दिल में खयाल आया कि अगर आज की पार्टी में पार्थ उसे देख ले और पसंद कर ले या उस की मम्मी ही मिशिका को अपने बेटे के लिए मांग लें तो…

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अचानक ही वह परिवार आंखों के सामने आ गया. श्रीमती सक्सेना अपने पति व दोनों बेटों के साथ चेहरे पर मुसकान लिए आती दिखाई दीं. समर्थ को तो उस दिन मौल में ही देख लिया था पर पार्थ तो उस से भी चार कदम आगे था. यह लड़का इतना हैंडसम होगा यह तो मैं ने सोचा भी नहीं था. उस पर आईएएस भी. मुझे फिर लगा कि मेरी चाहत मेरी सोच पर हावी हो गई है. फिर से मेरी चाहत जोर पकड़ने लगी कि यह लड़का तो बस, मेरा दामाद हो जाए. तभी नजदीक आ कर दोनों भाइयों ने मेरे और जज साहब के पैर छुए. मन कहीं अंदर तक उन्हें अपना मान गया.

सक्सेना दंपती तो हम बड़ों के ग्रुप में शामिल हो गए और दोनों भाई, मिशिका के फ्रेंड्स ग्रुप में.

पार्टी खूब मजेदार चली. खाना खाने के बाद सभी लोग एकएक कर जाने लगे थे. मगर सक्सेना परिवार अभी जमा हुआ था. मुझे भी उन के जाने की कहां जल्दी थी. मिशिका पार्थ के संग खड़ी कितनी अच्छी लग रही थी. मन में सचमुच ही बहुत मलाल था कि वे कायस्थ हैं.

अब तक करीब सभी मेहमान जा चुके थे. रात के 11 बज चुके थे. 30 अक्तूबर की रात, शरीर में ठंडीठंडी हवा की सिहरन सी हो उठी थी कि मिसेज सक्सेना ने, ‘‘एक कप कौफी हो जाए फिर हम भी चलेंगे,’’ कह कर अभी थोड़ा और रुकने का संकेत दिया.

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‘‘अरे, क्यों नहीं, क्यों नहीं,’’ कहते हुए वेटर को 4 कप कौफी लाने का आर्डर दे दिया.

मिशिका दोनों भाइयों को अभीअभी अंदर ले गई थी. शायद अपना शानदार कमरा दिखा रही हो. लड़कियों को अपना कमरा दिखाने का बहुत क्रेज होता है.

कौफी आ गई थी. हम चारों हंसी मजाक के साथ कौफी का मजा ले रहे थे कि वह हो गया, जो मेरी सोच में तो निरंतर चल रहा था मगर हकीकत में उस का कोई अनुमान नहीं था.

सक्सेना साहब ने विनम्रता से अपने दोनों हाथ जोड़ते हुए कहा, ‘‘अगर आप लोग हमें दे सकें तो अपनी मिशिका को हमारे पार्थ के लिए दे दीजिए.’’ उन के कहने के साथ ही मिसेज सक्सेना ने भी अपने दोनों हाथ जोड़ दिए.

मैं तो स्तब्ध, भौचक्की, किंकर्तव्य- विमूढ़ सी रह गई. जज साहब ने मेरी तरफ देखा. दोचार पल यों ही खामोशी में निकल गए फिर जज साहब ने कहा, ‘‘हमें यह रिश्ता मंजूर है. पार्थ हमें भी बहुत पसंद आया है और फिर आप से अच्छा और कौन मिलेगा हमें.’’

जज साहब की हां सुन कर मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि इस स्थिति में अब मैं क्या करूं? न हां करने की स्थिति में थी और न ही ना करने की. फिर कुछ सोचती सी बोली, ‘‘अरे, मिशिका से भी तो पूछना होगा न…उस की भी राय जानना जरूरी है. आप को तो पता ही है कि आजकल के बच्चे…’’

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मुझे लगा कि चलो, इस बहाने कुछ तो वक्त मिलेगा सोचने का. फिर कुछ सोच कर मना कर देंगे. सही बताऊं तो भैयाभाभी, अंतरा किसी का भी सामना करने की मुझ में हिम्मत नहीं थी.

मेरी इस बात को सुन कर मिसेज सक्सेना के साथ जज साहब और सक्सेना साहब दोनों हंस पड़े. इस के पहले कि मैं कुछ कह पाती, मिसेज सक्सेना अपनी हंसी रोकती हुई बोलीं, ‘‘अच्छा, पहले यह तो बताइए, आप तो राजी हैं न…’’

‘‘मैं…मैं तो…हां, और क्या. मुझे तो बहुत खुशी होगी आप से जुड़ कर,’’ मैं इस के अलावा और क्या कह सकती थी. जब जज साहब ने इस की स्वीकृति दे दी. ‘‘मगर मिशिका…’’ मैं ने फिर इस से बचने की कोशिश की.

‘‘अरे, निशिजी, मुझे तो बस, आप की ही इजाजत चाहिए थी. बाकी सब की इजाजत तो पहले से ही है,’’ इस बार सक्सेना साहब ने जिस अंदाज में कहा, मेरा चौंकना लाजिमी था. असमंजस में पड़ी बोली, ‘‘मतलब?’’

‘‘अरे, निशि, तुम्हारी और मिसेज सक्सेना की मुलाकात मौल में इसीलिए तो कराई थी कि आप दोनों में दोस्ती हो जाए, वरना तो मैं भी जा सकता था उस दिन. मैं ने तो कोर्ट में व्यस्त होने का बहाना किया था. हम लोग काफी दिनों से योजना बना रहे थे कि तुम दोनों को कैसे मिलाया जाए. सो इत्तफाक से मिशिका की गेटटूगेदर निकल आई. हालांकि मौल में मिलवाना मुश्किल था, लेकिन बच्चों ने सब मैनेज कर लिया.’’

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जज साहब बोलते जा रहे थे और मैं आंखें फाड़े उन्हें सुने जा रही थी.

‘‘निशि, जब मौल से लौट कर तुम ने पार्थ के बारे में अपनी चाहत बताई तो मुझे लगा कि हमारा तीर निशाने पर लगा है. प्रकट में मैं ने तुम्हारी बात को तूल नहीं दिया था.

‘‘निशि, तुम्हें याद होगा कि 4 साल पहले मैं जब एक सेमिनार में अमेरिका गया था तो वहां उस में सक्सेना साहब भी मिले थे. भारत से जो खास लोग उस सेमिनार में भेजे गए थे, उन को एक ही होटल में ठहराया गया था और सक्सेना साहब का कमरा मेरे बगल में ही था.’’

दोस्ती होना तो लाजिमी ही था न. देखो, तुम्हारी और मिसेज सक्सेना की दोस्ती तो चंद घंटों में ही हो गई, जबकि हम तो पूरे 15 दिन साथ रहे थे. इसी दौरान एक बार मेरी तबीयत भी बिगड़ गई थी तो सक्सेना साहब ने ही मुझे संभाला था और वे सारी बातें यहां आने पर मैं ने तुम को बताई थीं.

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‘‘हांहां, मुझे सब याद है,’’ मैं कुछ खोईखोई सी बोली.

‘‘उन्हीं दिनों हम दोनों, एकदूसरे के बेहद करीब आ गए थे. दोस्ती के उन्हीं लम्हों में हम ने आपस में एक वचन लिया कि समय आने पर मिशिका और पार्थ की शादी कर देंगे. आज पार्थ आई.ए.एस. हो गया है. मगर दोस्ती में किए गए वादे में कहीं कोई कमी नहीं आई है. सक्सेनाजी के पास तो अब कितने अच्छेअच्छे आफर आ रहे होंगे जबकि यह जानते हैं कि मैं ने तो जिंदगी भर शोहरत और इज्जत के अलावा कुछ नहीं कमाया. मेरे पास अपनी मिशिका को उन्हें सौंपने के अलावा और कुछ देने को नहीं है.’’

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

बहन की ईदी : भाग 1

उस दिन मई 2020 की 25 तारीख थी. कानपुर शहर में सादगी से ईद का त्यौहार मनाया जा रहा था. लौकडाउन के कारण बाजार, सड़कों पर ज्यादा चहलपहल तो नहीं थी. लेकिन लोग एकदूसरे के घर जा कर गले मिल रहे थे और ईद की मुबारकबाद दे रहे थे. अनवरगंज थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए क्षेत्रीय गश्त पर थे. दरअसल उन का थाना क्षेत्र मुसलिम बाहुल्य आबादी वाला तो था ही, संवेदनशील भी था. अधिकारियों के आदेश पर पुलिस चप्पेचप्पे पर नजर गड़ाए हुए थी.

शाम लगभग 3 बजे दिलीप कुमार बिंद क्षेत्रीय गश्त कर थाने वापस आए. अभी वह अपने कक्ष में आ कर बैठे ही थे कि उन के मोबाइल पर काल आई. उन्होंने काल रिसीव करते हुए पूछा, ‘‘मैं थाना अनवरगंज से इंसपेक्टर दिलीप कुमार. आप कौन?’’

‘‘सर, मैं कुली बाजार से मीट कारोबारी हाफिज मोहम्मद रईस बोल रहा हूं. मेरे जवान बेटे मोहम्मद जफर ने आत्महत्या कर ली है. आप जल्दी आ जाइए.’’

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थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद थकान महसूस कर रहे थे, फिर भी सूचना मिलते ही पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए. रवाना होने से पहले उन्होंने यह सूचना वरिष्ठ अधिकारियों को दे दी थी.

हाफिज मोहम्मद रईस कुली बाजार का चर्चित मीट कारोबारी था. थाने में मीट कारोबारियों की लिस्ट में उस का नामपता दर्ज था. इसलिए पुलिस को उस के घर पहुंचने में कोई परेशानी नहीं हुई. उस समय उस के घर भीड़ जुटी थी. भीड़ को हटाते हुए बिंद ने घर के अंदर प्रवेश किया. मोहम्मद जफर की लाश बाथरूम में पड़ी थी. उस के गले में गहरा घाव था, उम्र रही होगी 22 साल.

दिलीप कुमार बिंद अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल तथा सीओ (अनवरगंज) सैफुद्दीन बेग भी घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया. साथ ही मृतक के घर वालों से घटना के बारे में पूछताछ की.

मृतक के पिता मोहम्मद रईस ने बताया कि उन का बेटा मोहम्मद जफर पिछले कई महीने से मानसिक रूप से बीमार था. इसी के चलते उस ने आज दोपहर बाद गले को ब्लेड से चीर कर आत्महत्या कर ली. घटना के समय वह अपनी बेगम के साथ ईद मिलन को घर से बाहर गए थे. वापस आए तो जफर की लाश बाथरूम में पड़ी देखी. उस के बाद मैं ने थाने को सूचना दी.

मृतक की मां वसीम बानो ने बताया कि वह अपनी बेटी तसलीम के साथ पड़ोस में ईद मिलन को गई थी. वापस आई तो शौहर से पता चला कि बेटे ने ब्लेड से गला चीर कर आत्महत्या कर ली है. साहब, जफर मानसिक रोगी था. इसी मानसिक अवसाद में उस ने आत्महत्या कर ली. इतना कह वह फूटफूट कर रोने लगी.

वसीम बानो की बेटी तसलीम ने पूछताछ में कई बार बयान बदले. कभी वह कहती कि मां के साथ पड़ोस में गई थी, कभी कहती वह अकेले ही सहेली के घर गई थी. भाई जफर की मौत की जानकारी उसे अम्मीजान से मिली थी. उस ने यह भी कहा कि जफर मानसिक रोगी नहीं था. वह पूरी तरह से स्वस्थ था. उस ने आत्महत्या क्यों की, उसे पता नहीं है.

चूंकि घर के सभी लोग कह रहे थे कि मोहम्मद जफर ने आत्महत्या की है और पासपड़ोस के लोग भी कोई शंका जाहिर नहीं कर रहे थे, इसलिए पुलिस अधिकारियों को लगा कि शायद मोहम्मद जफर ने आत्महत्या ही की है.

हालांकि मृतक के मांबाप, बहन के बयानों में विरोधाभास था और पुलिस अधिकारियों को कुछ संदेह भी हुआ था. फिर भी उन्होंने निरीक्षण के बाद शव को पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया.

दूसरे रोज शाम 5 बजे थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद को मृतक जफर की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. उन्होंने रिपोर्ट पढ़ी तो वह चौंके. रिपोर्ट के अनुसार मोहम्मद जफर की मौत अधिक खून बहने से हुई थी. उस का गला किसी तेज धार वाले औजार से काटा गया था. गले का वैसा घाव ब्लेड से संभव न था. गले के अलावा उस के शरीर पर चोट का कोई निशान नहीं था. न ही उस ने अल्कोहल की डोज ली थी.

थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने मृतक जफर की रिपोर्ट से एसपी (पूर्वी) राजकुमार अग्रवाल को अवगत कराया. उन्हें पहले ही परिवार के विरोधाभासी बयानों पर शक था. रिपोर्ट देखने के बाद उन्हें भी पक्का यकीन हो गया कि जफर की हत्या परिवार के ही किसी सदस्य ने की है. फिर साक्ष्य मिटा कर हत्या को आत्महत्या का रूप दिया गया है. उन्होंने सीओ (अनवरगंज) सैफुद्दीन बेग की अगुवाई में दिलीप कुमार बिंद को जफर की हत्या का रहस्य सुलझाने का आदेश दिया.

आदेश पाते ही दिलीप कुमार बिंद ने हकीकत का पता लगाने के लिए अपने क्षेत्र के एक खास खबरी को लगाया. एक दिन बाद ही उस ने थानाप्रभारी बिंद को एक चौंकाने वाली जानकारी दी. उस ने बताया कि मोहम्मद जफर न तो मानसिक रोगी था और न ही उसे कोई अन्य रोग था.

जफर की बहन तसलीम तथा पड़ोस में रहने वाले चचेरे भाई तौसीफ अहमद के बीच मोहब्बत पनप रही थी. जफर को दोनों के अवैध संबंधों की जानकारी थी और वह इस का विरोध करता था. इन्हीं नाजायज संबंधों के चलते जफर की हत्या हुई है. हत्या का रहस्य घर वालों के पेट में ही छिपा है. यदि कड़ाई से पूछताछ की जाए तो सारा भेद खुल सकता है.

दिलीप कुमार बिंद ने नाजायज रिश्तों की जानकारी सीओ सैफुद्दीन बेग को दी तो वह बिंद को साथ ले कर दोबारा मोहम्मद रईस के घर जा पहुंचे. उन्होंने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुलवा लिया. फोरैंसिक टीम ने अपनी जांच उस बाथरूम से शुरू की, जहां मोहम्मद जफर की लाश पड़ी मिली थी.

टीम प्रभारी प्रवीण कुमार ने बाथरूम का बेंजामिन टेस्ट किया तो वहां खून की एक भी बूंद का प्रमाण नहीं दिखा. इस के बाद टीम ने मकान के दूसरे बाथरूम का बेंजामिन टेस्ट किया तो वहां खून के प्रमाण मिले.

टीम ने दोनों बाथरूम के बीच 2 जगहों पर शक के आधार पर टेस्ट किया तो वहां भी खून के प्रमाण मिले. जाहिर था शव को एक बाथरूम से दूसरे बाथरूम में लाया गया था. टीम प्रभारी प्रवीण ने मृतक के मांबाप, भाईबहन के हाथों का बेंजामिन टेस्ट किया तो खून के प्रमाण मिले.

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फोरैंसिक टीम की जांच से हत्या के पुख्ता सबूत मिले तो सीओ सैफुद्दीन बेग ने मोहम्मद रईस, उस की पत्नी वसीम बानो तथा बेटी तसलीम से अलगअलग सख्ती से पूछताछ की.

पूछताछ में मोहम्मद रईस टूट गया. उस ने बताया कि बच्चों के जेल जाने के डर से उस ने झूठ बोला था कि जफर ने आत्महत्या की है. जफर तो मर ही गया था, सच बोलता तो परिवार के 2 बेटे और बेटी जेल चले जाते.

सच यह है कि मोहम्मद जफर ने अपनी बहन तसलीम को बाथरूम में चचेरे भाई तौसीफ अहमद के साथ आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया था. भेद खुलने के डर से तसलीम ने तौसीफ व उस के भाई सैफ के साथ मिल कर बकरा काटने वाले चाकू से जफर को गला रेत कर मार डाला था.

मोहम्मद रईस के टूटते ही उस की पत्नी वसीम बानो तथा बेटी तसलीम ने भी अपना जुर्म कबूल कर लिया. चूंकि हत्या में तसलीम का प्रेमी तौसीफ अहमद और उस का भाई सैफ भी शामिल था, अत: पुलिस ने उन दोनों को भी नाटकीय ढंग से पकड़ लिया.

दोनों को थाना अनवरगंज लाया गया. जब उन दोनों का सामना मोहम्मद रईस, वसीम बानो तथा तसलीम से हुआ तो वे समझ गए कि अब सच बताने में ही भलाई है. अत: उन दोनों ने सहज ही जुर्म कबूल कर लिया.

पुलिस अभी तक आलाकत्ल चाकू बरामद नहीं कर पाई थी. अत: थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने चाकू के संबंध में पूछताछ की तो तौसीफ ने बताया कि कत्ल करने के बाद चाकू को मकान के सीवर टैंक (मेन होल) में छिपा दिया था.

यह बात पता चलते ही दिलीप कुमार बिंद तौसीफ अहमद को घटनास्थल पर ले गए. वहां उस की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त चाकू बरामद कर लिया. बरामदगी के बाद तौसीफ को वापस थाने लाया गया और चाकू को सीलमोहर कर दिया गया.

चूंकि सभी ने मोहम्मद जफर की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था और आला कत्ल (चाकू) भी बरामद करा दिया था, इसलिए थानाप्रभारी दिलीप कुमार बिंद ने भादंवि की धारा 302/201 के तहत तसलीम, तौसीफ अहमद, सैफ, वसीम बानो तथा हाफिज मोहम्मद रईस के विरुद्व रिपोर्ट दर्ज कर ली तथा पांचों को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में इश्क में अंधी बहन द्वारा भाई को हलाल करने की सनसनीखेज घटना प्रकाश में आई.

उत्तर प्रदेश के कानपुर महानगर के अनवरगंज थाना क्षेत्र में मुसलिम बाहुल्य आबादी वाला एक मोहल्ला है कुली बाजार. इसी कुली बाजार में बड़ी मसजिद के पास हाफिज मोहम्मद रईस अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में पत्नी वसीम बानो के अलावा 2 बेटे तथा बेटी तसलीम थी.

मोहम्मद रईस मीट कारोबारी थे. इस कारोबार में उन के दोनों बेटे भी हाथ बंटाते थे. कुली बाजार में उन की चर्चित मीट की दुकान थी. कुली बाजार में ही उन का अपना निजी मकान था. उन की आर्थिक स्थिति मजबूत थी.

वसीम बानो की बेटी तसलीम खूबसूरत थी, तन से ही नहीं मन से भी खूबसूरत. इसलिए उसे हर कोई पसंद करता था. बचपन में जहां वह अपनी चंचलता की वजह से सब को प्यारी लगती थी, वहीं जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही वह अपने व्यवहार से सब की आंखों का तारा बनी हुई थी.

अपने मिलनसार स्वभाव की वजह से वह सब का मन मोह लेती थी. युवा जहां उस की सुंदरता के दीवाने थे, वहीं बड़ेबूढ़े उस के स्वभाव से खुश रहते थे. पढ़नेलिखने में भी वह तेज थी. उस ने जुबली इंटर कालेज से इंटरमीडिएट की परीक्षा पास कर ली थी.

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तसलीम के पड़ोस में तौसीफ अहमद रहता था. रिश्ते में वह उस का चचेरा भाई था. अपने पिता के साथ वह भी मीट का कारोबार करता था. तौसीफ दिखने में स्मार्ट था. रहता भी ठाटबाट से था. तसलीम और तौसीफ रिश्ते में चचेरे भाईबहन थे और हमउम्र थे, सो उन में खूब पटती थी. दोनों का एकदूसरे के घर आनाजाना लगा रहता था. दोनों परिवारों के बीच आपसी लगाव था और दुख की घड़ी में एकदूसरे की मदद को भी तत्पर रहते थे. ईद, बकरीद जैसे त्यौहार दोनों परिवार मिलजुल कर मनाते थे.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 2

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लेखिका- रेनू ‘अंशुल’

मुझे हमेशा से ही यह अनुभव होता था कि इस के विपरीत शादियां कभी सुखद और सफल नहीं होतीं. शुरूशुरू में तो सब ठीकठाक चलता है, पर कुछ समय बाद कहीं तलाक होता है, तो कहीं जबरदस्ती रिश्तों को ढोया जाता है. यहां तक कि अपने परिवारों में होने वाली कई इस तरह की शादियों में मैं ने अपना पूरा विरोध जाहिर किया था.

ऐसा नहीं है कि जातिबिरादरी में शादियां कर के किसी तरह की टेंशन नहीं होती है या इस तरह की शादियां टूटती नहीं हैं, फिर भी काफी हद तक इन झमेलों से बचा जा सकता है और मेरे अनुभवों ने मुझे यही सिखाया है कि जब एक हाथ की पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं तो यह तो समाज की सोच है जो न कभी एक हुई है और न ही होगी.

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इन सभी बातों में जज साहब और मेरे विचार एक से नहीं हैं तो औरों की क्या कहूं. कई बार उन्होंने अपनी बातों से मुझे भी समझाने की कोशिश की है, मगर मैं कभी इतने बड़े दिल की हो नहीं पाई.

पिछले साल मैं ने अपना यह विरोध अपने भैया पर थोप दिया था. जब उन्होंने बताया कि वह अंतरा यानी मेरी भतीजी की शादी एक ईसाई लड़के से तय कर रहे हैं. दोनों एकदूसरे को जहां बहुत चाहते हैं, वहीं लड़का और उस का परिवार सबकुछ बहुत बढि़या है. हम लोगों को बच्चों की खुशी के अलावा और क्या चाहिए.

तब भैया की बात सुन कर मैं ने बवंडर मचा दिया था. ‘आप ने तो भैया हद ही कर दी. बच्चों की जिदें क्या यों ही आंखें मूंद कर पूरी की जाती हैं? ईसाई लड़के से विवाह करोगे अपनी अंतरा का? चार दिन भी नहीं निभा पाएगी वह इस अलग जाति और धर्म के लड़के के संग… और फिर कर लो जो आप की मर्जी हो, मैं तो इस गलत शादी में आने से रही.’ मेरी बातों के आक्रोश ने भैया को भयभीत कर दिया और उन्होंने यह कह कर उस रिश्ते को टाल दिया कि इकलौती छोटी बहन ही शादी में शरीक नहीं होगी तो दुनिया क्या कहेगी?

उस दिन के बाद से अंतरा न अपने पापा से बात कर रही है और न मुझ से. एक दिन गुस्से में आ कर वह अपनी भड़ास निकाल गई थी, ‘‘बूआ, आप ने मेरा प्यार, मेरी जिंदगी मुझ से छीन ली. हम सब ने हमेशा आप को इतना प्यारसम्मान और स्नेह दिया, उस का यह सिला दिया आप ने. कल को आप को अपनी मिशिका की ऐसे ही किसी लड़के से शादी करनी पड़ी तब मैं देखूंगी कि कैसे आप जाति और धर्म का भेदभाव कर उस का दिल तोड़ पाती हैं.’’

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उस की आंखों में भरे हुए आंसू और अपने लिए नफरत, आज भी मुझे विचलित कर देते हैं. मुझे इस बात का एहसास बाद में हुआ कि वह उस लड़के के प्यार में इतनी दीवानी है कि उस के बिना किसी और से शादी नहीं करेगी. कभीकभी खुद पर भी बहुत गुस्सा आता है कि मैं ने इस कदर क्यों अपनी इच्छा, अपने विचार भैया पर थोपे, फिर सोचती हूं तो लगता है कि आखिर मैं ने गलत ही क्या किया. वह मेरे अपने थे, अगर अपनों को उन की गलती का एहसास करा दिया तो क्या गलत किया? अंतरा मेरी कोई दुश्मन थोड़े ही थी. खुद भैया को भी पता था कि मैं अंतरा से कितना प्यार करती हूं, पर मुझे उस समय जो सही लगा मैं ने वही किया. अब वही बातें मेरे जेहन में आ रही थीं.

मैकडोनाल्ड की उस मुलाकात ने थोड़े ही समय में दोनों मांओं के बीच एक दोस्ती का सा रिश्ता बना दिया था. अपने- अपने मोबाइल नंबर और अतेपते दे कर हम ने विदा ली थी.

रास्ते भर मैं मिशिका से अपनी इस नई बनी दोस्त की बातें करती रही और वह भी अपनी तरहतरह की बातें मुझे बताती रही. उस के दोस्त की मम्मी के संग मैं आज सारे दिन रही और बोर नहीं हुई, इस से मेरी बेटी बहुत संतुष्ट थी. बोली, ‘‘ममा, आज आप बोर नहीं हुईं. नहीं तो पिछली बार की तरह मुझे सारे रास्ते आप के भाषण सुनने पड़ते. चलो, आगे से जब भी ऐसी कोई पार्टी होगी तो मैं आंटी से कहूंगी कि वह भी आप को कंपनी देने आ जाएं. तब तो ठीक रहेगा न मम्मी. मुझे भी टेंशन नहीं रहेगी कि ममा इतनी देर क्या करेंगी.’’ उस की बात सुन कर मैं मुसकरा पड़ी थी.

घर आने के बाद तरोताजा हो कर मैं बैठी ही थी कि मेरा मोबाइल बज उठा. नंबर देखा तो आज की बनी फें्रड मिसेज सक्सेना का ही था. तुरंत रिसीव किया. ‘‘आप घर पहुंच गईं क्या, मुझे तो आप की बड़ी याद आ रही है. सोच रही हूं कि जल्दी ही किसी रोज गाजियाबाद आ कर आप से मिलूं. आप से मिल कर बातें कर के बहुत अच्छा लगा.’’

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‘‘हां, मैं भी बस, आप के बारे में ही सोच रही थी. कभीकभी किसी से अचानक मिलने पर भी ऐसा नहीं लगता कि हम जिंदगी में पहली बार मिले हैं.’’ मैं ने भी उन की बात का जवाब उन्हीं के अंदाज में दे दिया.

थोड़ी देर तक इसी तरह इधरउधर की बातें होती रहीं. फिर पता नहीं मुझे क्या हुआ कि उन्हें अपने घर अगले सप्ताह होने वाली पार्टी के लिए आमंत्रित कर दिया. मौल में श्रीमती सक्सेना से इसीलिए पार्टी में आने को नहीं कहा था कि जज साहब से पूछ कर कहूंगी पर अब जब उन्होंने यह बताया कि मसूरी से इस रविवार को 5 दिन के लिए पार्थ भी आ रहा है, तो बस, उसे देखने की इच्छा दिल में जाग उठी और बोल बैठी, ‘‘अरे, तो आप सब लोग इस रविवार को हमारे घर आइए न. एक छोटी सी पार्टी रखी है. जज साहब को अच्छा लगेगा.’’

वह भी तुरंत तैयार हो गईं. जैसे आने के लिए बिलकुल तैयार बैठी हों.

शाम को जज साहब कोर्ट से लौटे तो चाय के दौरान मैं ने सबकुछ उन्हें बता दिया और अपने दिल की चाहत भी कह बैठी, ‘‘इतना अच्छा लड़का है. आईएएस है. परिवार भी समझदार और हैसियत वाला है. कायस्थ हैं, क्या ही अच्छा होता कि हमारी तरह वह भी ब्राह्मण होते तो हाथ जोड़ कर उन से मिशिका के लिए उन का पार्थ मांग लेती.’’

मेरे स्वभाव से परिचित जज साहब ने इस बात को जरा भी तूल नहीं दिया. सामान्य भाव से बोले, ‘‘अरे, निशि, जिस रास्ते जाना नहीं, उस बारे में क्या सोचना. जब हम मिशिका के लिए लड़का ढूंढ़ने निकलेंगे तो देखना लड़कों की कोई कमी नहीं आएगी. अभी तो हमारी बेटी का इंजीनियरिंग का ही एक साल बचा है फिर उसे एमबीए भी करना है. अभी कई साल हैं उस की शादी में.’’

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मैं ने भी सोचा कि जज साहब सही तो कह रहे हैं. अपनी जाति में भी लड़कों की कोई कमी थोड़े ही है. अभी ऐसी जल्दी भी क्या है. अंतरा की तरह मिशिका का किसी गैर जाति में अफेयर थोड़े ही है, जो मैं इस विषय में सोचूं.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 4

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लेखिका- रेनू ‘अंशुल’

सक्सेना साहब ने जज साहब का हाथ अपने हाथों में ले लिया था और भावविह्वल हो कर बोले, ‘‘ऐसीवैसी कोई बात मत कीजिए जज साहब, नहीं तो मैं उठ कर चला जाऊंगा. जिंदगी में सबकुछ मिल जाता है, मगर दोस्ती, अच्छे लोग, अच्छा परिवार बहुत कम लोगों को मिल पाता है और हम लोग उन्हीं में से एक हैं कि हमें आप मिले हैं.’’

‘‘सुन रही हो निशि. तुम जाति- बिरादरी की बातें करती रहती हो, क्या इन से अच्छा तुम्हें मिशिका के लिए कुछ मिल पाएगा. अच्छे लोग, अच्छे रिश्ते, अच्छे परिवार इन सब से बढ़ कर न धर्म है न जाति है और न ही कुछ और. आज मैं ने बिना तुम्हारी इच्छा जाने इस रिश्ते को हां कर दी है क्योंकि मैं जानता हूं कि मैं सही काम कर रहा हूं और अदालत में आएदिन परिवारों के टूटनेबिखरने के मामले मैं ने सुने और निबटाए हैं, उन में रिश्ते टूटने की वजह यह शायद ही हो कि उन की जाति अलग थी या धर्म.

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मुझे माफ करना निशि, तुम्हारी बेसिरपैर की बातों के लिए मैं इतना अच्छा रिश्ता नहीं ठुकरा सकता. अच्छा लड़का सोच कर ही पार्थ से मिशिका की शादी की बात खुद तुम्हारे दिमाग में आए इस के लिए ही वह मुलाकात करवाई गई और अब यह पार्टी भी रखी गई ताकि इस ड्रामे का सुखद अंत कर दिया जाए.’’

पत्नी को काफी कुछ कह कर अंत में जज साहब ने उन का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘मेरे खयाल से अब तुम्हें भी समझ जाना चाहिए कि तुम्हारी सोच बहुत संकीर्ण थी. वक्त और जमाने से हट कर थी. तुम्हारे भैया तुम्हारी बात सुन कर अपनी बेटी का जीवन बिगाड़ सकते हैं, पर मैं नहीं.’’

सभी अपनीअपनी बात कह चुके थे. मिशिका और पार्थ भी अपनी स्वीकृति दे चुके थे. अब मेरी बारी थी सो मैं ने भी हाथ जोड़ कर इस रिश्ते को अपनी स्वीकृति दे दी. मिसेज सक्सेना ने उठ कर मुझे गले लगाते हुए कहा, ‘‘बधाई हो निशिजी. सबकुछ कितनी जल्दी हो गया न. अभीअभी तो हम दोस्त बने थे और अभीअभी समधिनें. उन्होंने अपने गले में पहना एक जड़ाऊ हार उतार कर तुरंत मिशिका को पहनाते हुए कहा, ‘‘आज से तुम्हारी एक नहीं, दोदो मांएं हैं.’’

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सबकुछ बहुत अच्छा लग रहा था मगर दिल में कहीं एक डर और चिंता थी, जो मुझे खुल कर खुश नहीं होने दे रही थी. क्या करूंगी, कैसे जाऊंगी भैयाभाभी के सामने. यह सोचसोच कर ही मेरी जान सूखी जा रही थी. सभी थक कर सो गए थे, मगर मेरे मन का डर और अपराधभाव मुझे सोने ही नहीं दे रहा था.

अगली सुबह काफी देर से आंखें खुल पाईं. पता नहीं कितने बजे नींद आई थी. घड़ी पर नजर पड़ी तो पूरे 10 बज रहे थे. जज साहब के कोर्ट जाने की बात दिमाग में आते ही मैं तेजी से उठी कि भाभी ने चाय के प्याले के साथ कमरे में प्रवेश किया और हंसती हुई बोलीं, ‘‘क्या निशि, इतनी बड़ी खुशखबरी है और तुम सो रही हो अब तक?’’

जिस बात के लिए मैं अब तक इतनी परेशान थी, वह इतनी आसानी से सुलझ जाएगी, मैं ने सोचा भी न था. मुझे तो अपनी आंखों पर भरोसा ही नहीं हो रहा था.

मुझे हैरान देख भाभी बोलीं, ‘‘सुबहसुबह ही ननदोईजी का फोन आ गया और फोन पर उन्होंने जब रिश्ता तय होने की बात बताई तो हम से रहा नहीं गया और आप की खुशी में खुशी मनाने चले आए. अपने जीजाजी को देखने के लिए अंतरा भी बेचैन हो रही है, शाम को वह भी यहीं आएगी. सक्सेना परिवार को भी बुला लिया है, आज का डिनर मामामामी की तरफ से शहर के सब से अच्छे होटल में…’’ भाभी बोले जा रही थीं.

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मैं हैरत में पड़ी भाभी का चेहरा पढ़ने में लगी थी. मगर वहां स्नेह व प्यार के अलावा और कुछ भी नहीं था. मेरे इतना बड़ा दुख देने के बावजूद भाभी का यह व्यवहार…कुछ समझ में नहीं आया तो मैं भाभी से लिपट कर जोरजोर से रो पड़ी.

‘‘भाभी, मैं इस लायक कहां कि आप मुझे इतना प्यार दें. मैं ने आप लोगों को अपनी गलत सोच की वजह से इतना दुख पहुंचाया, मैं तो आप को अपना मुंह भी दिखाने की हिम्मत नहीं कर पा रही थी. मैं कितनी बुरी हूं भाभी, कितनी बुरी…’’ मेरा रुदन तेज हुआ जा रहा था और भाभी मेरी पीठ सहलाए जा रही थीं.

‘‘मत रो निशि, मत रो. अब वह भी तुम्हारा हम से अगाध प्रेम ही तो था, वरना किसी को क्या पड़ी है, अच्छा हो या बुरा हो. तुम्हें गलत लगा, इसीलिए तुम ने रोका और हमें तुम्हारी बात सही लगी इसीलिए हम ने उसे मान लिया.’’

‘‘तुम्हारी भाभी बिलकुल सही कह रही हैं निशि. जो हो गया उसे भूल जा, और दिल खोल कर आने वाली खुशियों का इंतजार कर.’’ तभी कमरे में जज साहब के संग भैया आतेआते बोले, ‘‘मेरे मन का बोझ इतनी सहजता से उतर जाएगा, सोचा नहीं था,’’ मैं ने कृतज्ञता से जज साहब को देखा जिन्होंने अपनी समझदारी से इतनी बड़ी खुशी मुझे दे दी थी. उन्होंने मेरी आंखें पढ़ लीं और मुसकरा दिए.

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‘‘मगर अभी तो अंतरा का दुख है मेरे सामने. वह तो बहुत नाराज है अपनी बूआ से. उसे कैसे वापस पा सकूंगी मैं?’’

‘‘अरे, अपने बच्चे छोटेछोटे हैं. ज्यादा देर तक अपने बड़ों से नाराज नहीं रहते. मैं ने उसे समझाया है निशि, उस के मन में तुम्हारे लिए कोई गुस्सा नहीं है.’’ भैया बोले तो साथसाथ भाभी भी बोल पड़ीं, ‘‘और अभी सुबहसुबह ही तो फूफाजी से उस की ढेरों बातें हुई हैं और फूफाजी ने उस से वादा किया है कि अब चाहे उस की बूआ कुछ भी कहें, वह अपनी अंतरा की शादी उसी के संग कराएंगे जिसे वह पसंद करती है. पहले चर्च में अंतरा की उस ईसाई लड़के से शादी होगी, फिर मिशिका की मंडप के नीचे. बच्चे जितनी जल्दी गुस्सा हो जाते हैं, उतनी ही जल्दी मान भी जाते हैं निशि.’’

भाभी अपनी बात कह चुकीं तो मैं ने खुश हो कर तुरंत कहा, ‘‘और अब सब से पहले तैयार हो कर हम लोग वहां चलेंगे. मुझे भी तो अपने दूसरे दामाद को शाम के डिनर के लिए आमंत्रित करना है. उन से भी तो माफी मांगनी है, इस बुरी बूआ को.’’

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तुम्हारा इंतजार था

अभय अपनी यूरोप यात्रा के दौरान वेनिस गया हुआ था. वेनिस में सड़कें पानी की होती हैं, मतलब एक जगह से दूसरी जगह जाने के लिए कार नहीं, लांच नावों से जाना पड़ता है. वह मुरानो ग्लास फैक्टरी देखने गया था. वे लोग लाइव शो दिखाते हैं यानी ग्लास को पिघला कर कैसे उसे विभिन्न शक्लों में ढाला जाता है. अभी शो शुरू होने में कुछ वक्त बाकी था, सो, वह बाहर एक पेड़ की छाया में बैठ कर वेनिस की सुंदरता देख रहा था. ग्रैंड कैनाल में सैलानी वेनिस की विशेष नाव ‘गोंडोला’ और अभय मन ही मन सोच रहा था कि वेनिस बनाने वाले के दिमाग की दाद देनी होगी.

जुलाई का महीना था, काफी गरमी थी. तभी एक इंडियन लड़की आ कर उस के बगल में बैठ गई.

उस ने अभय से कहा, ‘‘हाय, मुझे लग रहा है कि आप इंडिया से हैं?’’

‘‘हां, मैं इंडियन हूं,’’ बोल कर अभय ने उस लड़की को एक बार गौर से ऊपर से नीचे तक देखा. मन ही मन सोच रहा था श्यामल वर्ण में भी इतना आकर्षण.

‘‘मैं, एल्मा. मैं केरल से हूं. वेनिस घूमने आई हूं,’’ लड़की बोली.

‘‘और मैं, अभय. बनारस से हूं. मैं भी एक टूर पैकेज पर आया हूं.’’

फिर एल्मा ही ने हाथ बढ़ाया और हैंड शेक कर कहा, ‘‘आप से मिल कर बहुत खुशी हुई.’’

‘‘मुझे भी. पर न जाने क्यों लग रहा है कि आप को पहले भी कहीं देखा है.’’

तब तक शो का समय हो गया था और दोनों फैक्टरी के अंदर चले गए. इस के बाद दोनों साथसाथ ही फैक्टरी घूमे. फैक्टरी से निकल कर दोनों ने फैक्टरी से जुड़ा भव्य शोरूम देखा. एक से बढ़ कर एक शीशे की कलाकृतियां और घरेलू उपयोग के सामान थे. उन्हें वहां खरीदा जा सकता था या और्डर देने पर वे लोग दिए पते पर इंश्योर्ड पार्सल कर देते थे. पर दोनों में किसी ने भी कुछ नहीं खरीदा था.

अभय ने पूछा, ‘‘क्या तुम अकेले यहां आई हो?’’

‘‘नहीं, मेरी सहेली भी साथ में है. हम तो यहां 3 दिनों से हैं. आज उस की तबीयत ठीक नहीं है तो वह नहीं निकल सकी. अब मैं यहां से सीधे होटल जाऊंगी उसी के पास.’’  एल्मा ने जवाब दिया और ‘‘ओके, बाय’’ बोल कर चली गई.

अगले दिन को वह वैटिकन सिटी में था. यह अत्यंत छोटा सा शहर जिसे एक स्वतंत्र देश का दरजा प्राप्त है और विश्वविख्यात है. यह विश्व का सब से छोटा देश है. यहीं पोप का मुख्यालय भी है. यह रोम शहर के अंदर ही दीवारों से घिरा एन्क्लेव (अंत:क्षेत्र) है. एक आइसक्रीम की दुकान पर खड़ेखड़े आइसक्रीम खा रहा था, तभी एल्मा भी वहां आ गई थी.

अभय ने कहा, ‘‘हाय एल्मा, क्या सुखद आश्चर्य है. आज फिर हम मिल गए. पर तुम आज भी अकेली हो? तुम्हारी सहेली कहां रह गई?’’

‘‘तुम ने इंडिया की न्यूज सुनी? कल मुंबई में सीरियल बम ब्लास्ट हुए हैं.

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2 सौ से ज्यादा लोग मरे हैं और सैकड़ों घायल हैं. घायलों में मेरी सहेली का भाई भी था. वह रोम चली गई है. वहां से सीधे मुंबई जाएगी.’’

‘‘ओह, हाउ सैड. पता नहीं हमारे देश को किस की नजर लग गई है. खैर, तुम वैटिकन घूम चुकी हो?’’

‘‘नहीं, अभी सेंट पीटर बैसिलिक बाकी है.’’

‘‘ओह, तुम क्रिश्चियन हो?’’ अभय ने पूछा.

‘‘हां,’’ बोली एल्मा.

‘‘पर एल्मा, मुझे क्यों बारबार लग रहा है कि पहले भी तुम्हें देख चुका हूं. एक बार से ज्यादा ही. तुम केरल में कहां रहती हो?’’

‘‘केरल मेरा नेटिव स्टेट है. पर स्कूलिंग के बाद वहां नहीं रही. मैं हैदराबाद चली आई.’’

अभय चौंक कर बोला ‘‘हैदराबाद.’’

‘‘क्यों? इस में चौंकने वाली क्या बात है? मैं ने वहीं माधापुर के नैशनल फैशन इंस्टिट्यूट से फैशन टैक्नोलौजी का कोर्स किया है और वहीं रेडीमेड कपड़े बनाने वाली कंपनी में काम भी करती हूं.’’

‘‘तभी मुझे बारबार लग रहा है कि मैं ने तुम्हें देखा है. मैं भी वहीं माधापुर के साइबर टावर्स में स्थित ओरेकल कंपनी में काम करता हूं.’’

‘‘चलो, अच्छा है, कोई परदेस में बिलकुल अपने शहर का आदमी मिलता है तो बहुत खुशी होती है.’’

अभय को तब तक कुछ याद आया तो कहा, ‘‘अब मैं बता सकता हूं कि तुम्हें मैं ने पहले कहां देखा है. वहां कोंडापुर के एक रैस्टोरैंट में जो हर संडे को 99 रुपए में बुफे ब्रेकफास्ट देता है.’’

‘‘सही कहा है तुम ने. मैं तो कोशिश करती हूं हर संडे वहां जाने की और 99 रुपए में ब्रंच (नाश्ता और दोपहर का मिलाजुला भोजन) कर लेती हूं. नाश्ते के नाम पर जीभर के जितना खानापीना हो सिर्फ 99 रुपए में हो जाता है,’’ एल्मा बोली, और हंस कर आगे कहा, ‘‘लड़कों का काम ही यही है. जहां मौका मिला, नजरें चुरा कर लड़कियों को देखने लगते हैं. डोंट माइंड, मजाक कर रही थी.’’

‘‘वैटिकन के बाद तुम्हारा क्या प्रोग्राम है?’’

‘‘मैं तो यहां से इंगलैंड होते हुए इंडिया जा रही हूं. और तुम?’’

‘‘मैं तो यहां से सीधे वापस इंडिया जाऊंगा.’’

लेकिन एल्मा को अब बैसिलिक रोमन विशेषाधिकार प्राप्त चर्च देखने जाना था. वह जातेजाते बोली, ‘‘ठीक है, मैं चलती हूं. जब दोनों हैदराबाद में ही हैं तो कभी मिल भी सकते हैं. अपना खयाल रखना.’’

‘‘एक मिनट रुको, हैदराबाद में मिलने के लिए यह रख लो,’’ बोलते हुए उस ने अपना कार्ड एल्मा को दे दिया. एल्मा ने भी पर्स से अपना एक कार्ड निकाल कर अभय को दे दिया. इस के बाद दोनों ने एकदूसरे को बाय किया.

कुछ दिनों के बाद दोनों हैदराबाद में थे. एक दिन अभय ने एल्मा से फोन कर के पूछा, ‘‘संडे को क्या प्रोग्राम है? रैस्टोरैंट में ब्रंच के लिए आ रही हो?’’

‘‘वह तो आना ही है. वरना 99 रुपए में भरपेट नाश्ता और खाना दोनों कहीं नहीं मिलेगा. वह भी क्वालिटी फूड.’’

‘‘चलो, तो फिर वहीं मिलते हैं.’’

संडे को दोनों उसी रैस्टोरैंट में मिले. दोनों अपनेअपने दोस्त व रूममेट के साथ गए थे. एल्मा ने अपनी सहेली निशा से दोनों का परिचय कराया. अभय ने भी अपने दोस्त का दोनों लड़कियों से परिचय कराया. चारों एक ही टेबल पर बैठे थे. बुफे था, चारों जम के पेटपूजा कर रहे थे, साथ में बातें भी हो रही थीं.

अपने दोस्त को इंगित करते हुए अभय बोला, ‘‘मैं कोंडापुर में इस के साथ अपार्टमैंट शेयर कर रहा हूं.  और तुम?’’

‘‘मैं भी निशा के साथ माधापुर में ही एक दोरूम का अपार्टमैंट शेयर करती हूं.’’

‘‘और आज क्या कर रही हो? मूवी चलोगी? बोलो तो मैं अपने मोबाइल से 4 टिकटें यहीं से बुक कर देता हूं.’’

एल्मा ने अपनी सहेली की ओर देखा तो उस ने कहा, ‘‘चलेगा.’’

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फिर अभय ने वहीं से दोपहर 2 बजे शो की टिकटें बुक कर दीं. इस के बाद चारों अपने अपार्टमैंट गए और फिर सही समय पर सिनेमाहौल पहुंच गए थे. मूवी देखने के बाद चारों ने कैफे में कौफी पी और फिर वे अपनेअपने अपार्टमैंट के लिए चल दिए.

इस के बाद अभय और एल्मा दोनों अब अकेले भी मिलने लगे थे. उन के साथ अब उन के रूममेट नहीं होते थे. छुट्टी के दिन वे दिनभर साथ रहते, घूमतेफिरते, होटलों में जाते और मूवी देखते थे. देखतेदेखते दोनों एकदूसरे को प्यार करने लगे थे. दोनों इस स्थिति को भी समझ रहे थे कि वे अलगअलग धर्मों के मानने वाले थे.

एक दिन अभय ने एल्मा को शादी के लिए प्रोपोज भी कर दिया था. एल्मा ने कहा, ‘‘मुझे तो तुम से बेहद प्यार है और मैं पर्सनली तो इस के लिए तैयार हूं. पर हम लोगों को एकबार अपने मातापिता को भी बताना चाहिए. संभव हो वे हमारी शादी से खुश भी हों.’’

अभय बोला, ‘‘ठीक है, हम दोनों अगले संडे को उन लोगों को यहां बुला लेते हैं.’’

अगले रविवार दोनों के मातापिता हैदराबाद पहुंच गए थे. उसी दिन शाम को वे 6 लोग, अभय, एल्मा और उन के मातापिता शाम को हैदराबाद के केबीआर पार्क में मिले. दोनों के मातापिता के बीच बहस चल रही थी.

अभय के पिता ने कहा ‘‘ये अंगरेज सब से पहले केरल में ही आए थे. फिर वहां के गरीब, असहाय या पिछड़े लोगों को प्रलोभन दे कर या बहका कर धर्मपरिवर्तन करवाते थे. उन के आने के पहले तो वहां क्रिश्चियन नहीं थे. हम लोग तो सदियों से हिंदू हैं. हम को यह शादी स्वीकार है बशर्ते कि आप लोग हिंदू धर्म अपना लें. वरना हमें यह रिश्ता मंजूर नहीं है.’’

एल्मा के पिता ने अपना तर्क देते हुए कहा, ‘‘हम तो दादा, परदादा के समय से ही क्रिश्चियन हैं. हम भी यही चाहते हैं कि अभय हमारा धर्म अपना ले. वैसे भी हिंदू धर्म तो बस इंडिया और नेपाल में ही है जबकि हमारा धर्म दुनिया के अनेक देशों में प्रचलित है. अभय के क्रिश्चियन बनने के बाद ही हम एल्मा की शादी की इजाजत दे सकते हैं. वरना हमें यह शादी मंजूर नहीं है.’’

अभय और एल्मा दोनों के मातापिता अपनीअपनी बात पर अड़े थे, कोई भी झुकने को तैयार न था. बल्कि बहस अब गरम हो चली थी. दोनों अपनेअपने धर्म को अच्छा साबित करने में लगे थे.

तभी अभय ने ऊंची आवाज में कहा, ‘‘आप लोग बहुत बोल चुके हैं. अब कृपया शांत रहे. कुछ हम दोनों पर भी छोड़ दीजिए. आखिरी फैसला हम दोनों मिल कर करेंगे.’’

एल्मा बिलकुल खामोश थी बल्कि थोड़ी सहमी थी. सब लोग पार्क से निकल अपनेअपने घर चले गए. अगले दिन ही दोनों के मातापिता हैदराबाद से लौट गए थे.

इधर, अभय ने एल्मा से पूछा ‘‘हम दोनों के मातापिता को बिना धर्मपरिवर्तन किए यह शादी मंजूर नहीं है. मैं तो कोर्टमैरिज करने को तैयार हूं. तुम मेरा साथ दोगी?’’

‘‘मुझे तुम से प्यार है और शादी से कोई एतराज नहीं. पर बड़ी समस्या यह है कि मेरे मातापिता और मेरी छोटी बहन सभी मुझ पर आश्रित हैं. पिताजी ने काफी ख्ेत बंधक रखे हैं मेरी पढ़ाई के लिए. पिताजी ने कहा है कि अगर मैं ने अपनी मरजी से शादी की तो मुझ से उन का कोई रिश्ता नहीं रहेगा. अब मैं उन लोगों को कैसे छोड़ दूं? मेरी स्थिति समझ रहे हो न तुम?’’

‘‘तब मैं क्या समझूं? तुम्हारा फैसला?’’

‘‘मैं मजबूर हूं, मैं फिलहाल शादी नहीं कर सकती.’’

‘‘तो क्या मैं तुम्हारा इंतजार करूं?’’

एल्मा बोली, ‘‘मैं तो यह भी नहीं कहूंगी कि तुम मेरे लिए अनिश्चितता की स्थिति में रहो. तुम अपना फैसला लेने के लिए स्वतंत्र हो.’’

इस के बाद दोनों जुदा हो गए. मिलनाजुलना जानेअनजाने ही कभी हो पाता था, पर फोन पर संपर्क बना हुआ था. कुछ दिनों बाद अभय ने चंडीगढ़ के पास मोहाली में एक आईटी कंपनी जौइन कर ली थी. अब एल्मा से फोन पर भी संपर्क नहीं रहा था.

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इस बीच 3 साल बीत चुके थे. अभय शिमला घूमने गया था. दिसंबर का महीना था, बर्फ तो गिर ही रही थी ऊपर से मौसम भी खराब था. जोरों की बारिश हो रही थी. वह अपने होटल के कमरे में बैठा था. रात हो चुकी थी. तभी कौलबैल बजी, तो उस ने सोचा कि वेटर होगा और कहा, ‘‘खुला है, आ जाओ.’’

दरवाजा खुलने पर जो आकृति उसे नजर आई तो कुछ पल के लिए उसे लगा कि सपना देख रहा है. पर जब वह उस के और निकट आई तो वह आश्चर्य से कुछ देर तक उसे देखता ही रहा था. भीगे कपड़ों में एल्मा सामने खड़ी थी सूटकेस लिए.

अभय बोला ‘‘तुम अचानक यहां कैसे? यहां का पता तुम्हें किस ने दिया?’’

‘‘सब बताऊंगी. मैं भीग गई हूं. पहले मुझे चेंज करने दोगे?’’

‘‘ठीक है, बाथरूम में धुला टौवेल है. जाओ, चेंज कर लो.’’

थोड़ी देर में एल्मा चेंज कर निकली, तब तक अभय ने उस के लिए कौफी मंगा दी थी. उस ने कहा ‘‘कौफी गरम है, पी लो.’’

कौफी पीते हुए एल्मा ने कहा, ‘‘मैं ने हैदराबाद के तुम्हारे रूममेट से मोहाली का पता लिया. मोहाली गई तो वहां से तुम्हारे रूममेट ने मुझे यहां का पता दिया. मैं सब छोड़ तुम्हारे पास आई हूं. मुझे पता है तुम ने अभी तक शादी नहीं की है. क्या तुम मुझे अपनाने को तैयार हो? ’’

अभय बोला, ‘‘मैं तो पहले भी तैयार था, आज भी तैयार हूं, पर तुम्हारा धर्म, तुम्हारे मातापिता और बहन?’’

‘‘मैं तो प्यार को धर्म से बड़ा मानती हूं. हम दोनों धर्म बदले बिना भी अपना रिश्ता निभा सकते हैं.’’

‘‘मैं तो तैयार हूं पर तुम्हारा परिवार?’’ अभय बोला.

एल्मा बोली, ‘‘मेरी बहन नर्सिंग कर के दुबई में नर्स है. उस ने वहीं पर लवमैरिज कर ली है. उसी ने मुझे तुम्हारे पास आने की हिम्मत दी है. मातापिता को हम दोनों बहनें पैसे भेजती रहेंगी जिस से वे अपने खेत छुड़ा लेंगे. मैं भी चंडीगढ़ की गारमैंट कंपनी में जौब कर लूंगी.’’ थोड़ी देर की खामोशी के बाद एल्मा आगे बोली, ‘‘पर पहले यह बताओ, तुम ने अभी तक शादी क्यों नहीं की?’’

‘‘शादी कैसे करता? तुम्हारा इंतजार था,’’  अभय बोला.

‘‘वह तो ठीक है, पर तुम्हें यकीन था कि मैं वापस तुम्हारे पास आऊंगी.’’

‘‘मुझे अपने प्यार पर यकीन था,’’ बोल कर अभय ने एल्मा को अपनी आगोश में ले लिया.

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वार पर वार : आखिर क्या थी नमिता की कहानी ?

वार पर वार : भाग 1

नमिता एक हंसमुख और खुशमिजाज लड़की थी. उस के चेहरे की मासूमियत किसी का भी मन मोह लेती थी. उस के गुलाबी होंठ हमेशा मीठी मुसकराहट के दरिया में छोटी नाव की तरह हिचकोले खाते रहते थे. आंखों की पुतलियां सितारों की तरह नाचती रहती थीं. उस के चेहरे और बातों में ऐसा खिंचाव था, जो देखने वाले को बरबस अपनी तरफ खींच लेता था.

पर पिछले कुछ दिनों से नमिता के चेहरे की चमक धुंधली पड़ती जा रही थी. होंठों की मुसकराहट सिकुड़ कर मुरझाए फूल की तरह सिमट गई थी. आंखों की पुतलियों ने नाचना बंद कर दिया था. आंखों के नीचे काले घेरे पड़ने लगे थे.

नमिता समझ नहीं पा रही थी कि वह अपनी जिंदगी की कौन सी बेशकीमती चीज खोती जा रही थी. सबकुछ हाथ से फिसलता जा रहा था.

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नमिता के दुख की वजह क्या थी, यह वह किसी को बता नहीं पा रही थी… लोग पहले कानाफूसी में उस के बारे में बात करते रहे, फिर खुल कर बोलने लगे.

सीधे उसी से पूछते, ‘क्या हुआ है नमिता तुम्हारे साथ जो तुम ग्रहण लगे चांद की तरह चमक खोती जा रही हो?’

नमिता पूछने वाले की तरफ देखती भी नहीं थी, सिर झुका कर एक फीकी मुसकराहट के साथ बस इतना कहती थी, ‘नहीं, कुछ नहीं…’ शब्द जैसे उस का साथ छोड़ देते थे.

इस तरह के हालात कब तक चल सकते थे? नमिता किसकिस से मुंह छिपाती? अनजान लोगों से नजरें चुरा सकती थी, पर अपने घरपरिवार, परिचितों और औफिस के साथियों की निगाहों से कब तक बच सकती थी? उन की बातों का कब तक जवाब नहीं देती?

आखिर टूट ही गई एक दिन… सब के सामने नहीं… औफिस की एक साथी थी प्रीति. उम्र में उस से कुछ साल बड़ी.

एक दिन एकांत में जब उन्होंने नमिता से प्यार भरी आवाज में भरोसा देते हुए पूछा तो नमिता रोने लगी. सब्र का बांध टूट चुका था.

फालतू का पानी बह जाने के बाद जब नमिता ठीक हुई तो उस ने धीरेधीरे अपनी परेशानी की वजह को बयान कर दिया, जिसे सुन कर प्रीति हैरान रह गई थी.

नमिता स्टेनोग्राफर थी और औफिस हैड भूषण राज के साथ जुड़ी थी. भूषण राज अधेड़ उम्र का सुखी परिवार वाला शख्स था. औफिस में उस की अपनी पर्सनल असिस्टैंट थी, पर डिक्टेशन और टाइपिंग का काम वह नमिता से ही कराता था. काम कम कराता था, सामने बिठा कर बातें ज्यादा करता था. वह उसे मुसकराती नजरों से देखा करता था.

पहले नमिता भी मुसकराती थी और उस की बातों का जवाब भी देती थी, पर धीरेधीरे नमिता की समझ में आ गया कि भूषण राज की नजरों का मतलब कुछ दूसरा था, इसलिए वह सावधान हो गई.

जब वह कोई बेहूदा बात कहता तो वह अंदर से डर कर सिमट जाती, पर बाहर से अपनेआप को संभाले रहती कि सूने कमरे में कोई अनहोनी न हो जाए.

नमिता यह तो नहीं जानती थी कि भूषण राज के तहत काम करते हुए वह कितनी महफूज है या वह जिंदगी का कौन सा सुख उसे देगा या उस के घरपरिवार के लिए क्या करेगा, पर वह इतना जरूर जानती थी कि केंद्र सरकार के औफिस की यह पक्की नौकरी उस के लिए बहुत जरूरी थी. उस का 3 साल का प्रोबेशन था. 2 साल पूरे हो चुके थे. एक साल बाद उसे कन्फर्मेशन लैटर मिल जाएगा, तब उस की पक्की नौकरी हो जाएगी.

नमिता मिडिल क्लास परिवार की लड़की थी. मांबाप के अलावा घर में एक छोटा भाई और बहन थी. पापा एक प्राइवेट फर्म में अकाउंटैंट थे. सीमित आमदनी के बावजूद उन्होेंने नमिता को ऊंची पढ़ाई कराई थी.

घर में बड़ी होने के नाते नमिता अपने मांबाप की आंखों का तारा तो थी ही, साथ ही साथ उम्मीद का चिराग भी कि पढ़ाई पूरी करते ही कोई नौकरी मिल जाएगी तो घर की हालत में थोड़ा सुधार आ जाएगा. छोटे भाईबहन की पढ़ाई अच्छे ढंग से चलती रहेगी.

नमिता ने अपने मांबाप को निराश नहीं किया. बीए में दाखिला लेने के साथसाथ वह एक प्राइवेट इंस्टीट्यूट से शौर्टहैंड का कोर्स भी पूरा करती रही.

जैसे ही वह कोर्स पूरा हुआ, उस ने एसएससी का इम्तिहान दिया और आज अपनी मेहनत की बदौलत वह सरकारी नौकरी कर रही थी.

नमिता की चुप्पी ने भूषण राज की हिम्मत बढ़ा दी. उस ने और ज्यादा चारा फेंका, ‘‘अगर तुम चाहोगी तो तुम्हारे भाईबहन पढ़लिख कर अच्छी सर्विस में आ जाएंगे. मैं उन्हें आगे बढ़ने में मदद करूंगा.’’

नमिता ने अपनी निगाहें उठाईं और भूषण राज के लाललाल फूले गालों वाले चेहरे पर टिका दीं. उस की आंखों में दुनिया का सारा प्यार नमिता के लिए उमड़ रहा था. पर इस प्यार में उसे भूषण राज के खतरनाक इरादों का भी पता चल रहा था.

‘‘तुम चिंता मत करो. मैं तुम्हारे भाईबहन को गाइड करूंगा कि उन्हें प्रोफैशनल कोर्स करना चाहिए या सामान्य कोर्स कर के प्रतियोगी परीक्षा के जरीए लोक सेवा में आना चाहिए. मैं ने कई लोगों को गाइड किया है और आज कई लड़के ऊंची सरकारी नौकरी में हैं.’’

पर नमिता गुमसुम सी बैठी रही, उठ कर भाग नहीं सकती थी. न तो वह उसे खुल कर मना कर सकती थी, न अपने मन का दर्द किसी से कह सकती थी.

जब नमिता ने कोई जवाब नहीं दिया तो वह बोला, ‘‘अच्छा, तुम बोर हो रही होगी… एक काम करो, चलो, एक डीओ का डिक्टेशन ही ले लो.’’

नमिता जब तक अपना पैड और कलम संभालती, वह अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो गया और मेज की दाहिनी तरफ आ गया और कुछ सोचने का बहाना करते हुए नमिता की कुरसी के बाएं सिरे पर आ कर खड़ा हो गया. फिर दाहिनी तरफ नमिता के बाएं कंधे पर तकरीबन झुकते हुए बोला, ‘‘हां लिखो… माई डियर…’’ फिर एक पल की चुप्पी के बाद, ‘‘नहीं, यह छोड़ो. लिखो डियर श्री…’’ फिर भूषण राज की सूई तकरीबन अटक गई और वह ‘माई डियर’ या ‘डियर श्री’ से आगे नहीं बढ़ पाया.

यह शायद नमिता की खूबसूरती या उस के बदन का कमाल था कि पलभर में ही उस की सांसें फूलने लगीं और वह नमिता की चिकनी पीठ को लालसा भरी निगाहों से ताकते हुए लंबीलंबी सांसें लेने लगा. जब वह ज्यादा बेकाबू हो गया तो कसमसाते हुए नमिता के सिर पर हाथ रख कर बोला, ‘‘हां, क्या लिखा?’’

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नमिता के शरीर में एक लिजलिजी लहर समा गई.

मजबूरी इनसान को हद से ज्यादा सब्र वाला बना देती है. नमिता के साथ भी यही हो रहा था. वह अपने बौस की ज्यादतियों का शिकार हो रही थी, पर उस का विरोध नहीं कर पा रही थी. न शब्दों से, न हरकतों से…

नतीजा यह हुआ कि भूषण राज के हाथ अब नमिता के सिर से होते हुए उस की गरदन को गुदगुदाने लगे थे और कभीकभी उस के गालों तक पहुंच जाते थे. फिर कई बार उस की पीठ को सहलाते, जैसे कुछ ढूंढ़ने की कोशिश कर रहे हों. उस की ब्रा के ऊपर हाथ रोक कर उस के हुक को टटोलते हुए ऊपर से ही खोलने की कोशिश करते, पर नमिता कुछ इस तरह सिकुड़ जाती कि वह अपनी कोशिश में नाकाम हो कर कुरसी पर जा कर बैठ जाता और कहता, ‘‘निम्मी…’’ आजकल वह प्यार से उसे निम्मी कहने लगा था, ‘‘तुम कुछ हैल्प क्यों नहीं करती? तुम समझ रही हो न… मैं क्या कहना चाहता हूं?’’

पर नमिता झटके से उठ कर खड़ी हो जाती और बाहर निकल जाती.

नमिता किस मुसीबत में फंस गई थी? क्या करे, क्या न करे? वह रातदिन सोचती रहती. जब से भूषण राज ने उस की पीठ को सहलाना शुरू किया था और उस के गालों को उंगलियों के बीच फंसा कर कभी धीरे से तो कभी जोर से चिकोटी काट लेता था, तब से वह और ज्यादा डरने लगी थी.

भूषण राज जब इस तरह की हरकतें करता तो नमिता अपने शरीर को मेज पर टिका देती कि कहीं उस के हाथ उस गोलाइयों को न लपक लें. वह हर मुमकिन कोशिश करती कि भूषण राज उस के साथ कोई गलत हरकत न करने पाए, पर शिकारी भेडि़ए के पंजे अकसर उस के कोमल बदन को खरोंच देते.

एक दिन तो हद हो गई. भूषण राज ने उस के दोनों गालों पर हाथ फिराते हुए आगे की तरफ से ठोढ़ी और गरदन को सहलाना शुरू कर दिया, फिर धीरेधीरे हाथों को आगे बढ़ाते हुए उस के गालों की तरफ झुक आया. जब उस की गरम सांसें नमिता के बाएं गाल से टकराईं तो वह चौंकी, झटके से बाईं तरफ मुड़ी तो भूषण राज का मुंह सीधे उस के होंठों से जा लगा.

उस ने भूखे भेडि़ए की तरह नमिता के दोनों होंठ अपने मुंह में भर लिए. इसी हड़बड़ी में उस के हाथ नमिता की छाती को मसलने लगे. पलभर के लिए वह हैरान सी रह गई. जब उस की समझ में आया तो उस ने झटका दे कर अपनेआप को छुड़ाया और धक्का दे कर उसे पीछे किया. भूषण राज पीछे हटते हुए मेज से टकराया और गिरतेगिरते बचा.

नमिता कमरे से बाहर जा चुकी थी. अपनी सांसें काबू करने में उसे बहुत देर लगी. उस की आंखों के सामने अंधेरा सा छा गया था. उस का दिल और दिमाग दोनों सुन्न से हो गए थे. कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे?

उधर भूषण राज अपनी सांसों को काबू में करते हुए मन ही मन खुश हो रहा था कि एक मंजिल उस ने हासिल कर ली थी, अब आखिरी मंजिल हासिल करने में कितनी देर लग सकती थी.

नमिता के पास अब 2 ही रास्ते बचे थे. या तो वह नौकरी छोड़ देती या भूषण राज के साथ समझौता कर उस के साथ नाजायज रिश्ता बना लेती. पहला रास्ता आसान नहीं था और दूसरा रास्ता अपनाने से न केवल बदनामी होती, बल्कि उस की जिंदगी भी तबाह हो सकती थी.

भूषण राज उस का ही नहीं, पूरे औफिस का बौस था. नमिता को अब जब भी बौस उसे अपने कमरे में बुलाता, जानबूझ कर देरी से जाती. बारबार कहने के बावजूद भी नमिता कुरसी पर नहीं बैठती, बल्कि खड़ी ही रहती, ताकि जैसे ही बौस अपनी कुरसी से उठ कर खड़ा हो और उस की तरफ बढ़े, वह दरवाजे की तरफ सरक जाए.

भूषण राज चालाक भेडि़या था. उस ने अपना पैतरा बदला. अब वह नमिता को किसी सैक्शन से कोई फाइल ले कर आने के लिए कहता. वह फाइल को ले कर आती तो कहता, ‘‘देखो, इस में एक लैटर लगा होगा… पिछले महीने हम ने मुंबई औफिस से कुछ जानकारी मांगी थी. उस का जवाब अभी तक नहीं आया है. एक रिमाइंडर बना कर लाओ… बना लोगी?’’ वह थोड़ी तेज आवाज में कहता, जैसे धमकी दे रहा हो.

नमिता जानती थी कि भूषण राज जानबूझ कर उसे तंग करने के लिए यह काम सौंप रहा था, ताकि काम न कर पाने के चलते वह उसे डांटडपट सके.

‘‘मैं कर लूंगी सर,’’ कहते हुए वह बाहर निकल गई.

भूषण राज अपनी कुटिल मुसकान के साथ मन ही मन सोच रहा था, ‘कहां तक उड़ोगी मुझ से? पंख काट कर रख दूंगा.’

नमिता ने सब्र से काम लिया. वह संबंधित अनुभाग के अधीक्षक के पास गई और अपनी समस्या बताई. कार्यालय अधीक्षक समझदार था. उस ने नमिता का रिमाइंडर तैयार करा दिया. वह खुशी खुशी फाइल के साथ रिमाइंडर ले कर भूषण राज के चैंबर में घुसी. वह किसी फाइल पर झुका हुआ था, चश्मा नाक पर लटका कर उस ने आंखें उठाईं और त्योरियां चढ़ा कर पूछा, ‘‘तो रिमाइंडर बन गया?’’

‘‘जी सर, देख लीजिए,’’ नमिता आत्मविश्वास से बोली. उस की अंगरेजी और टाइपिंग दोनों अच्छी थीं. भूषण राज ने सरसरी तौर पर लैटर को देखा और घुड़क कर बोला, ‘‘तो ऐसे बनाया जाता है रिमाइंडर? तुम्हें कोई अक्ल भी है.

‘‘यह देखो, यह फिगर गलत है. यह कौलम तो बिलकुल सही नहीं बना है. इस का प्रेजेंटेशन ठीक नहीं है… और यह कौन से फौंट में टाइप किया है… जाओ, दोबारा से बना कर लाओ, वरना समझ लो, अभी प्रोबेशन में हो.

‘‘मन लगा कर काम करो, वरना जिंदगीभर इसी ग्रेड में पड़ी रहोगी. कभी प्रमोशन नहीं मिलेगा.’’

नमिता कुछ देर तो सहमी खड़ी रही. उस की समझ में कुछ नहीं आ रहा था कि ड्राफ्ट में क्या गलती थी. वह तकरीबन रोंआसी हो गई. 2 साल तक भूषण राज ने भले ही उस से एक पैसे का काम नहीं लिया था, पर बातें बहुत मीठी की थीं. अब अचानक उस के बरताव में आए इस बदलाव से नमिता हैरान थी.

अब यह रोज का नियम बन गया था. भूषण राज नमिता को रोज कोई न कोई मुश्किल काम बता देता. वह सही ढंग से काम कर भी देती, तब भी उस के काम में नुक्स निकालता, जोरजोर से सब के सामने उसे डांटता, उस को जलील करता.

‘‘तो यह है तुम्हारी परेशानी की वजह,’’ प्रीति ने लंबी सांस ले कर कहा, ‘‘समस्या बड़ी है… तो क्या सोचा है तुम ने? क्या तुम समझती हो कि इस तरह की लड़ाई से तुम खुद को बचा पाओगी? नामुमकिन है… मैं ने इस दफ्तर में तकरीबन 10 साल गुजारे हैं. मैं उस की एकएक हरकत से वाकिफ हूं.

‘‘मैं जब यहां आई थी, तब शादीशुदा थी. वह केवल कुंआरी लड़कियों पर नजर डालता है. 10 सालों में मैं ने बहुतकुछ देखा है… कितनी लड़कियों को मैं ने यहीं पर हालात से समझौता करते हुए देखा है, कितनी तो जबरदस्ती उस की हवस का शिकार हुई हैं.’’

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‘‘मेरे लिए यह अच्छी नौकरी और इज्जत दोनों ही जरूरी हैं. मैं दोनों में से किसी को खोना नहीं चाहती. नौकरी जाने से मेरे मांबाप, भाई और बहन की जिंदगी पर असर पड़ेगा. इज्जत खो दी, तो फिर मेरे जीने का क्या मकसद…’’ नमिता की आवाज में हताशा टपक रही थी.

प्रीति ने उस के हाथ को थामते हुए कहा, ‘‘इस तरह निराश होने से काम नहीं चलेगा. क्या तुम किसी लड़के को प्यार करती हो?’’

नमिता ने चौंकती नजरों से प्रीति को देखा. उस के इस अचानक किए गए सवाल का मतलब वह नहीं समझी, फिर सिर झुका कर बोली, ‘‘उस हद तक नहीं कि उस से शादी कर लूं. कालेज में इस तरह के प्यार हो जाते हैं, जिन का कोई गंभीर मतलब नहीं होता. बस, एकदूसरे के प्रति खिंचाव होता है. ऐसा ही पहले कुछ था… 2 लड़कों के साथ, पर अब नहीं, लेकिन आप ने क्यों पूछा?’’

‘‘यही कि शिद्दत से किसी को प्यार करने वाली लड़की के कदम जल्दी किसी और राह पर नहीं चलते. मैं ऐसा समझ रही थी, शायद तुम अपने प्यार की खातिर भूषण राज के मनमुताबिक नरमदिल नहीं हो पा रही हो, वरना रुपएपैसे के साथसाथ जवानी का मजा कौन लड़की नहीं उठाना चाहती.’’

नमिता के सीने पर जैसे किसी ने घूंसा मार दिया हो. वह कराहते हुए बोली, ‘‘तो क्या मैं भूषण राज के नीचे लेट जाती?

क्या किसी को प्यार न करने वाली लड़की इज्जतदार नहीं होती?’’ – क्रमश:

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

वार पर वार : भाग 3

पिछले अंकों में आप ने पढ़ा था :

सरकारी नौकरी कर रही नमिता का बौस भूषण राज उसे पाना चाहता था. नमिता ने यह बात अपनी एक साथी प्रीति को बताई तो वह नमिता से बोली कि तुम्हें भी रुपएपैसे के साथसाथ जवानी का मजा उठाना चाहिए. यह सुन कर नमिता हैरान रह गई, लेकिन फिर नमिता ने सोचा कि क्यों न वह अपना ट्रांसफर कहीं और करा ले, पर इस बारे में भी भूषण राज को पता चल गया और मामला बिगड़ गया.

अब पढि़ए आगे…

प्रीति आगे बोली, ‘‘अगर तुम्हारी नौकरी बनी रहेगी तो सारी सुखसुविधाएं तुम्हारे कदमों में बिछी रहेंगी. तुम्हारी सारी समस्याओं का समाधान हो जाएगा. अच्छे घर में शादी हो जाएगी. और क्या चाहिए तुम्हें?’’

नमिता की समझ में नहीं आया कि वह अपनी नौकरी कैसे बचा सकती थी? लेकिन पूछा नहीं… प्रीति खुद ही बताने लगी, ‘‘तुम नौकरी छोड़ दोगी तो दूसरी नौकरी जल्दी कहां मिलेगी? वह भी सरकारी नौकरी… प्राइवेट नौकरी भले ही मिल जाए.

‘‘पर, हर जगह एक ही से हालात हैं नमिता. इनसानरूपी मगरमच्छ हर जगह मुंह खोले जवान लड़कियों को निगलने के लिए तैयार रहते हैं. समझौता कर लो. किसी को पता भी नहीं चलेगा. सुख तुम्हारी झोली में भर जाएंगे और नौकरी भी बची रहेगी.’’

नमिता का शक सच में बदल गया. कई बार उसे लगता था कि प्रीति उसे किसी न किसी जाल में फंसाएगी… वह बौस भूषण राज की दलाल थी.

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उस ने प्रीति को गौर से देखा, तो वह हलके से मुसकराई. प्रीति बोली, ‘‘तुम अपने मन में कोई शक मत पालो. उस से तुम्हारी समस्या का समाधान नहीं होगा.

तुम मुझे भले ही बुरा समझो, पर इस में तुम्हारी ही भलाई है. सोचो, खूबसूरती और जवानी का क्या इस्तेमाल…?’’

नमिता अच्छी तरह समझ गई थी कि इस दुनिया में मर्द ही नहीं, बल्कि औरतें भी एकदूसरे की दुश्मन होती हैं. औरतें कब नागिन बन कर किसी को डस लें, पता ही नहीं चलता. उस ने एक कठोर फैसला किया.

प्रीति अभी तक नमिता के दिमाग की सफाई करने में जुटी हुई थी, ‘‘औरत और मर्द के संबंध में किसी का कुछ नहीं बिगड़ता, पर सुख दोनों को मिलता है… तुम ठीक से समझ रही हो न? जा कर एक बार बौस से माफी मांग लो. वे जैसा कहें, कर दो.’’

अब नमिता को किसी और प्रवचन की जरूरत नहीं थी. वह झटके से उठी और धीरेधीरे कदमों से बौस भूषण राज के चैंबर में चली गई. आज न तो उस के मन में डर था, न वह कांप रही थी. उस की आंखें भी झुकी हुई नहीं थीं. वह भूषण राज की आंखों में आंखें डाल कर देख रही थी.

पहले तो भूषण राज चौंका, फिर कुरसी से उठ कर बोला, ‘‘आओआओ, निम्मी. कैसी हो?’’ उस के मुंह से लार टपकने लगी थी.

‘‘मैं ठीक हूं सर…’’ नमिता ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘मैं आप से माफी मांगने आई हूं, उस सब के लिए, जो अभी

तक हुआ है और उस सब के लिए, जो अभी तक नहीं हुआ, पर कभी भी हो सकता है.’’

नमिता का अंदाज ऐसा था, जैसे वह कह रही हो, ‘भूषण साहब, मैं आप को देखने आई हूं कि कितने खूंख्वार भेडि़ए हैं आप. किसी तरह आप औरत के शरीर को खाते हैं, नोंच कर या पूरा… चलिए दिखाइए अपनी ताकत.’

भेडि़ए की खुशी का ठिकाना न रहा. शिकार अपनेआप उस के जाल में फंस गया था. वह अपनी जगह से उठा और इस तरह अंगड़ाई ली, जैसे वह अच्छी तरह जानता था कि अब शिकार उस के पंजे से बच कर कहीं नहीं जा सकता. उसे अपनी चालों पर पूरा भरोसा था. वह धीरेधीरे मुसकराते हुए आगे बढ़ रहा था.

भेड़ को डर नहीं लग रहा था. वह सीधे तन कर खड़ी थी. भेडि़या नजदीक आ गया था, वह फिर भी नहीं डरी.

भेडि़या थोड़ा सहमा… इस भेड़ को आज क्या हो गया. वह उस के भयानक मुंह के तीखे दांतों और नुकीले पंजों से भी नहीं डर रही थी.

भेडि़या भेड़ को जिंदा निगलने की जल्दबाजी में था. भेड़ अगर तन कर खड़ी रही, उस से डर कर भागी नहीं, तो फिर शिकार करने का फायदा क्या?

भेडि़ए ने अपने नुकीले पंजे भेड़ के कंधे पर रखे और दर्दनाक हालत तक उस के नरम गोश्त में चुभाया, पर भेडि़ए को भेड़ के कंधे पत्थर के लगे. उस ने अपना चेहरा भेड़ के खूबसूरत लपलपाते चेहरे की तरफ बढ़ाया तो उसे लगा जैसे वह एक आग का गोला निगल रहा हो.

नमिता ने बालों को मादक झटका दे कर और छातियों को हलका उभार देते हुए कहा, ‘‘शाम को 7 बजे घर पर आइएगा. घर पर और कोई नहीं है. बस, मैं, आप और पूरी रात.’’

भूषण राज भौचक्का रह गया, पर उस का विवेक तो मर चुका था. वह समझ नहीं सकता था कि ऐसी लड़की जो इतने दिन से उस के हर प्रस्ताव को ठुकरा रही थी, अचानक कैसे बदल गई.

भूषण राज ने दिन कैसे बिताया, यह बताना आसान नहीं, पर नमिता आधे दिन की छुट्टी ले कर यह कह कर चली गई थी कि घर को ठीक करना है.

शाम 6 बजे से ही भूषण राज को बेचैनी होने लगी थी. फिर भी उस ने 7 बजाए. औफिस में नहाया, कपड़ों की 1-2 जोड़ी वह हमेशा अपनी दराज में रखता था. पत्नी को कहा कि देर रात तक मीटिंग चलेगी, वह सो जाए.

शबाब मिल रहा था तो शराब भी होनी चाहिए. 2 बोतलें खरीदीं. शायद नमिता भी पी ले तो रात पूरी मस्त हो जाए.

भूषण राज नमिता के बताए पते पर पहुंचा तो थोड़ा मन खट्टा हुआ. बेहद मिडिल क्लास इलाका था. छोटे मैले मकानों में एक संकरे जीने पर चढ़ कर पुराने से दरवाजे को खटखटाया.

दरवाजा नमिता ने ही खोला था. वह पूरी तरह सजीधजी थी. बढि़या मेकअप. पोशाक जो उस के बदन को ढक कम रही थी, दिखा ज्यादा रही थी. घर में खुशबू फैली थी. रोशनी केवल मोमबत्तियों की थी या 2 टेबल लैंपों की.

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नमिता ने उसे बांहों में जकड़ लिया. इसी का तो इंतजार वह महीनों से कर रहा था.

‘‘आज तो बड़े स्मार्ट लग रहे हो सर,’’ कहते हुए वह उसे सोफे पर ले गई. सामने मेज पर खाने का सामान और कई गिलास थे. शायद नमिता जान गई थी, भूषण राज क्या चीज है. उस ने उस के हाथ से बोतलें लीं और कहा कि लाइए, इन्हें मैं फ्रिज में रख दूं.

‘यह कबूतरी तो खुद ही शिकारी के तीर तेज कर रही है…’ भूषण राज ने सोचा. उसे अपने पर गर्व हुआ. है ही वह ताकतवर. कौन चिडि़या है जो उस के जाल से निकल सकती है.

नमिता ने सोफे पर बैठा कर कहा, ‘‘सर, आप कपड़े तो उतारिए, मैं अभी आई.’’

भूषण राज तो सब सावधानियां छोड़ कर कपड़े उतारने लगा और सोफे पर आराम से पसर गया. फिर तसल्ली से खाना ठूंसा? नमिता शायद नहा रही थी.

‘आज तो मजा आ जाएगा… ऐसा सुख तो उसे कभी न मिला था.’

तभी दरवाजे पर खटखट हुई. भूषण राज ने सोचा, ‘कौन हो सकता है इस समय? नमिता ने तो कहा था कि वह अकेली है?’

बिना कपड़ों के किसी के घर में आ जाने पर क्या हो सकता है, वह जान सकता था. पर इस से पहले कि वह कुछ कहता, नमिता दूसरे कमरे से तकरीबन भागती हुई आई और दरवाजा खोल डाला.

बाहर पूरा स्टाफ खड़ा था. कुछ लोग कैमरे भी लिए थे.

‘हैप्पी बर्थडे नमिता’ की आवाज गूंजी और 10-15 लोग कमरे में घुस गए.

भूषण राज फटीफटी आंखों से देख रहा था. उस ने अपने कपड़े उठाने चाहे थे कि नमिता ने झपट कर छीन लिए.

उस के बाद बहुतकुछ हुआ. बहुत सारे फोटो ले लिए गए. भूषण राज की पत्नी को बुला लिया गया. नमिता को ट्रांसफर करने का आदेश पास हो गया. छोटे से घर में हंगामा हो गया. नमिता के घर वाले भी उसी समय पहुंच गए थे.

अब नमिता शान से काम कर रही थी उसी दफ्तर में. भूषण राज ने इस्तीफा दे दिया था और वह शहर बदल कर जा चुका था.

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नमिता की हिम्मत और आंखों की अनोखी चमक ने भूषण राज के सारे हौसलों को मात कर दिया. उस को अपने जाल में फंसाने के लिए भूषण राज ने न जाने कितने जतन किए थे, पर अब वह उस के फंदे में आ कर फंस गया था.

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गरमी का मौसम होने की वजह से पथरीला शहर कोटा जैसे तंदूर की तरह तप रहा था. मंगलवार 19 जून, 2018 का दिन भी कमोबेश ऐसा ही था. दोपहर ढल चुकी थी. इस के बावजूद कोटा के तापमान में कमी नहीं आई थी. अपराह्न के लगभग 4 बज चुके थे, सीओ नरसीलाल मीणा अपने चैंबर में बैठे बड़े गौर से ग्यारसीराम शृंगी नाम के शख्स की बातें सुन रहे थे.

लगभग 50 साल की उम्र पार कर चुका ग्यारसीराम बड़ौदा-राजस्थान क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक की गुमानपुरा शाखा में कैशियर के पद पर कार्यरत था. लेकिन वक्ती तौर पर वह इसी बैंक की कंसुआ शाखा में कैशियर का काम संभाल रहा था. कंसुआ अनंतपुरा थाना क्षेत्र में आता है.

अनंतपुरा पुलिस स्टेशन पर सीओ अमर सिंह राठौड़ थानाप्रभारी के पद पर तैनात थे. संयोग से उस वक्त राठौड़ भी मीणा साहब के चैंबर में बैठे थे. ग्यारसीराम जो समस्या ले कर उन के पास आया था, वह काफी गंभीर थी. इतनी गंभीर कि ग्यारसीराम की नौकरी और इज्जत दोनों ही दांव पर लग गई थीं.

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ग्यारसीराम ने नरसीलाल मीणा को बताया कि 3 बजे वह बैंक का अस्थाई कर्मचारी देवप्रकाश के साथ बैंक से 8 लाख रुपए ले कर रवाना हुआ था. मोटरसाइकिल वह खुद चला रहे थे जबकि पीछे बैठे देवप्रकाश ने रुपयों से भरा बैग थाम रखा था.

यह रकम भामाशाह मंडी स्थित बैंक की दूसरी शाखा में जमा करनी थी. जैसे ही वे भामाशाह मंडी की पुलिया तक पहुंचे, अचानक एक स्कूटी पर सवार 2 लोग आए और बड़ी फुरती से देवप्रकाश के हाथों से नोटों का बैग छीन कर भाग गए.

दोनों ने शोर मचाते हुए काफी दूर तक उन का पीछा भी किया, लेकिन बदमाश तेज रफ्तार के साथ भाग निकले. ग्यारसीराम ने बताया कि यह सब इतने अचानक हुआ कि वह ठीक से स्कूटी का नंबर और बदमाशों का हुलिया तक नहीं देख पाए. दोनों बदमाश 24-25 साल के आसपास के थे और स्कूटी काले रंग की थी.

‘‘जब रकम आप के बैंक में सुरक्षित थी तो उसे दूसरी शाखा में जमा कराने का क्या मतलब?’’ सीओ मीणा ने सवाल किया.

कैशियर ग्यारसीराम ने उन्हें बैंकिंग प्रक्रिया समझाते हुए कहा, ‘‘सर, बैंक की कंसुआ शाखा में 5 लाख से ज्यादा रकम रखने का प्रावधान नहीं है. जब बैंक में 8 लाख की रकम जमा हो गई तो बैंक की मुख्य ब्रांच भामाशाह मंडी शाखा में जमा कराना जरूरी हो गया था.’’

सीओ नरसीलाल मीणा ने ग्यारसीराम के चेहरे पर नजर गड़ाते हुए पूछा, ‘‘आप बैंक से कितने बजे रवाना हुए थे और वारदात कितने बजे हुई?’’

‘‘जी, यही कोई पौने 3 बजे…’’ हड़बड़ाते हुए ग्यारसीराम ने कहा.

‘‘मतलब वारदात 15 मिनट बाद ही हो गई, क्यों?’’ सीओ ने सवाल किया.

‘‘जी.’’ ग्यारसीराम के मुंह से निकला.

सीओ मीणा की आंखों में जैसे गहरी चमक कौंध गई. उन्होंने टेबल पर रखे पेपरवेट को घुमाते हुए कहा, ‘‘इस का मतलब किसी को आप के पूरे रूटीन की जानकारी थी.’’

ग्यारसीराम हक्काबक्का हो कर सीओ नरसीलाल मीणा की तरफ देखता रह गया.

वारदात जिस ढंग से हुई थी, उस का केंद्र भामाशाह मंडी की पुलिया थी और यह जगह वीरान नहीं बल्कि आमदरफ्त वाला चहलपहल भरा इलाका था.

मीणा ने तत्काल एसपी अंशुमान भोमिया को घटना का ब्यौरा दिया तो वह भी चौंके. उन के मुंह से बरबस निकला पड़ा, ‘‘ऐसा कैसे हो सकता है?’’

इस मामले का खुलासा करने के लिए भोमिया साहब ने एडीशनल एसपी समीर कुमार दुबे की अगुवाई में स्पैशल टीम का गठन किया. इस टीम में सीओ नरसीलाल मीणा के अलावा अनंतपुरा थानाप्रभारी अमर सिंह राठौड़, एएसआई आनंद यादव, दिनेश त्यागी, हैडकांस्टेबल कमल सिंह, कांस्टेबल रामकरण आदि को शामिल किया गया.

भामाशाह मंडी के पास जहां वारदात हुई थी, उधर जाने वाला रास्ता एकदम सुनसान नहीं था. वहां आसपास दुकानें और छोटेबडे़ कई मकान भी थे. दुकानें भी छोटेमोटे बाजारनुमा थीं.

पुलिस की शुरुआती तहकीकात का नतीजा ही चौंकाने वाला निकला. दुकानदारों से बात की तो उन्होंने बताया कि उन्होंने यहां ऐसी कोई वारदात होती नहीं देखी.

घटनास्थल के पास स्थित स्टाल पर चाय बेचने वाले ने बताया कि यहां लूट की कोई वारदात हुई ही नहीं है और न ही उस ने यहां लूट को ले कर किसी का शोर सुना. जबकि ग्यारसीराम ने शोर मचाने की बात पुलिस को बताई थी.

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पुलिस ने सीसीटीवी कैमरे भी खंगाले, लेकिन कहीं कुछ नहीं मिला. एएसपी दुबे के मन में शक तब हुआ, जब ग्यारसीराम ने उन्हें बताया कि एफआईआर दर्ज कराने के लिए देवप्रकाश उस के साथ नहीं आया, जबकि वारदात के दौरान रकम का बैग उसी के पास था.

घटना को ले कर संदेहास्पद स्थितियों ने कई सवाल खड़े कर दिए थे. जैसे लूट की वारदात अचानक हुई थी, ऐसी स्थिति में बाइक का गिरना तो दूर की बात, उस का संतुलन तक नहीं बिगड़ा था. चौंकाने वाला सवाल यह भी था कि लूट दोपहर 3 बजे हुई लेकिन उन्होंने तत्काल पुलिस को सूचित करने के बजाए एक घंटे बाद यानी 4 बजे खबर की.

पुलिस ने अब यह पता लगाने की कोशिश की कि इस पूरे मामले में कैशियर ग्यारसीराम की क्या भूमिका थी. एएसपी समीर कुमार दुबे ने एक बार फिर ग्यारसीराम से बात की.

इस बार उस ने जो बताया, उस ने तहकीकात का नया खाका खींच दिया. उस ने कहा, ‘‘वारदात के दिन कंसुआ बैंक शाखा के मैनेजर और नियमित कैशियर दोनों छुट्टी पर थे. मेरी तैनाती तो बैंक की गुमानपुरा शाखा में है. मुझे वक्ती तौर पर एवजी कैशियर के रूप में बैंक में रकम जमा करवाने के लिए बुलवाया गया था.’’

‘‘लेकिन पुलिस को इत्तला करने में एक घंटा क्यों जाया किया गया? क्या वारदात की जानकारी पुलिस को तुरंत नहीं दी जानी चाहिए थी?’’ एएसपी दुबे ने सवाल किया.

‘‘सर, हम ने पहले अपने स्तर पर कोशिश की. गोबरिया बावड़ी तक हम ने दौड़ भी लगाई. फिर वापस बैंक आए. लेकिन जब कोई नतीजा नहीं निकला तो पुलिस के पास तो आना ही था.’’ उस ने बताया.

एएसपी दुबे को लगा कि ग्यारसीराम जो कह रहा है, शायद सच हो. इसलिए उस से कहा, ‘‘ठीक है, आप अभी घर चले जाइए लेकिन कहीं बाहर मत जाना. पूछताछ के लिए जरूरत पड़ सकती है.’’

एएसपी दुबे का संदेह अब पूरी तरह देवप्रकाश पर टिक गया. इस की वजह भी साफ थी कि वारदात के दौरान वह बाइक के पीछे बैठा था और लुटेरों ने रकम से भरा बैग उसी से छीना था. ऐसे में उसे भी ग्यारसीराम के साथ थाने आना चाहिए था, लेकिन नहीं आया.

एएसपी दुबे अभी इस बारे में सोच ही रहे थे कि उसी समय सीओ नरसीलाल मीणा और इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ ने उन के चैंबर में प्रवेश किया. सीओ मीणा ने आते ही कहा, ‘‘सर, बैंक की गतिविधियों से पूरी तरह वाकिफ अंदर का आदमी तो देवप्रकाश ही है, क्या आप इस बात पर यकीन नहीं कर पा रहे?’’

‘‘नहीं, मुझे पूरा यकीन है लेकिन ऐसे मामलों में जल्दबाजी ठीक नहीं होती.’’ एएसपी दुबे ने बात का खुलासा करते हुए कहा, ‘‘मुझे शक ही नहीं, पूरा विश्वास है कि इस वारदात का मास्टरमाइंड देवप्रकाश के अलावा और कोई नहीं हो सकता. लेकिन वारदात को तो उस के 2 साथियों ने अंजाम दिया था न?

‘‘अब अगर सीधे देवप्रकाश को गिरफ्तार किया जाता है तो उस के दोनों साथी भाग जाएंगे और हमें ऐसा नहीं होने देना है. हमें उसे अंधेरे में रखना है कि पुलिस को उस पर शक नहीं है. इस का नतीजा यह होगा कि वह बेफिक्र हो कर रकम के बंटवारे के लिए अपने साथियों से मिलने की कोशिश करेगा. तभी हम आसानी से उसे और उस के साथियों को दबोच लेंगे.’’

‘‘और हां, आप ने देवप्रकाश की जन्मकुंडली तो खंगाल ली होगी?’’ एएसपी दुबे ने पूछा.

‘‘यस सर,’’ सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ ने बताया, ‘‘देवप्रकाश पिछले 4 सालों से बतौर अस्थाई कर्मचारी बैंक में चपरासी तैनात है, इसलिए बैंक की तमाम गतिविधियों से वह पूरी तरह वाकिफ है. आदमी खुराफाती किस्म का है. उस की संगत भी कुछ गड़बड़ नजर आती है. बैंक के सामने ही एक मोबाइल की दुकान है. दुकान अरुण कुमार बुलीवाल की है. देवप्रकाश और अरुण में अच्छी दोस्ती है.’’

‘‘हां, अब बात का सिरा नजर आ गया है.’’ एएसपी ने अमर सिंह राठौड़ की बात बीच में ही काट कर सीओ मीणा की तरफ देखते हुए कहा, ‘‘फौरन इस अरुण कुमार को थामो. बिल्ली की पूंछ पर पैर पड़ेगा तो उस के गले में घंटी बांधने में देर नहीं लगेगी.’’

योजना के मुताबिक, सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ अगले दिन सादे कपड़ों में बैंक के सामने स्थित अरुण की मोबाइल की दुकान पर पहुंच गए. ग्राहक के रूप में मोबाइल खरीदारी की बात कर के उन्होंने तसल्ली कर ली कि जिस से वह रूबरू हुए हैं, वह अरुण बुलीवाल ही है. दुकान पर राठौड़ कुछ इस तरह खड़े थे कि बैंक में लोगों की आवाजाही साफ दिखाई दे.

लगभग आधे घंटे बाद देवप्रकाश अरुण की दुकान पर आया. उस की दुकान में दाखिल होते ही अरुण अमर सिंह राठौड़ को छोड़ कर देवप्रकाश को गली के दूसरे मुहाने पर ले जाने लगा. जाते समय वह सर्किल इंसपेक्टर अमर सिंह राठौड़ से बोला, ‘‘मैं अपने दोस्त से कोई जरूरी बात कर लूं, तब तक आप मोबाइल सैट पसंद कर लीजिए.’’

‘‘ठीक है, तुम बात कर लो. मुझे कोई जल्दी नहीं है. लेकिन तुम इस तरह हड़बड़ाए हुए क्यों हो?’’ राठौड़ ने बड़े सहज भाव से अरुण की कलाई थामते हुए कहा.

‘‘कहां साब, आप अपना मोबाइल खरीदो और चलते बनो.’’ अनजान शख्स की मौजूदगी से अरुण हड़बड़ा गया था. फिर भी उस ने साहस बटोरते हुए कहा, ‘‘अब तुम फूटो यहां से, मुझे तुम्हें कोई मोबाइल नहीं देना है. पता नहीं कैसेकैसे लोग चले आते हैं.’’

‘‘तो चलो एक बात बताओ, जिस के साथ तुम जा रहे हो वह बैंक में काम करने वाला देवप्रकाश ही है न, तुम्हारा जिगरी दोस्त.’’

शेर बनने की कोशिश करने वाला अरुण अब सकपकाते हुए बोला, ‘‘भाई, तुम क्यों पंगा कर रहे हो? जरूर तुम्हें कोई गलतफहमी हुई है.’’

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‘‘कोई बात नहीं, गलतफहमी हो गई है तो अभी दूर कर देते हैं.’’ राठौड़ ने अरुण के गले में बांह डालते हुए गली के मुहाने की तरफ घसीटते हुए कहा, ‘‘चलो, तुम्हें कुछ दिखाते हैं.’’

यह सुन कर अरुण के होश फाख्ता हो गए. उस ने सामने जो नजारा देखा उसे देख वह बुरी तरह थरथराने लगा. देवप्रकाश को 2 सिपाही पकड़े हुए खड़े थे. सीआई राठौर ने उसे घुड़कते हुए कहा, ‘‘अरुण, तुम्हारी भलाई इसी में है कि तुम सब सचसच बता दो. तुम ने देवप्रकाश के साथ मिल कर कैसे बैंक की रकम लूटने की योजना बनाई और  तुम्हारे इस खेल में कौनकौन शामिल था?’’

तब तक दोनों सिपाही देवप्रकाश को राठौड़ के पास ले आए. देवप्रकाश का खेल खत्म हो चुका था. सीआई राठौड़ ने वहीं पर देवप्रकाश के 2-3 थप्पड़ जड़ते हुए कहा, ‘‘2 तो तुम हो गए, अब और साथियों के नाम बता दो.’’

थप्पड़ और राठौड़ के पुलिसिया खौफ से थर्राए देवप्रकाश ने राहुल राठौड़ का नाम बताया. पुलिस ने तत्काल राहुल राठौड़ के घर छापा मारा. पुलिस को देखते ही राहुल के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

पुलिस पूछताछ में देवप्रकाश ने अपना अपराध स्वीकार करते हुए बताया, ‘‘सर, बैंक से रकम लूटने की योजना मैं ने ही बनाई थी.’’ इस के साथ ही अरुण की तरफ देखते हुए बोला, ‘‘इस पर अमल करने का तरीका अरुण ने बताया था. बैग छीनने के लिए स्कूटी अरुण ने ही ड्राइव की थी.’’

‘‘…और तीसरा कौन था, जिस ने देवप्रकाश से बैग छीनैती को अंजाम दिया?’’ एसपी भोमिया साहब ने घुड़कते हुए पूछा.

‘‘साहब, यह काम राहुल ने किया था.’’ उस ने राहुल की तरफ इशारा किया.

पुलिस को देवप्रकाश ने जो कुछ बताया, उस के मुताबिक मौजमजे में उस ने काफी लोगों से कर्ज ले लिया था और अब वह उन के तकाजों से परेशान था. बैंक के सामने स्थित मोबाइल की दुकान के मालिक अरुण बुलीवाल से उस की गहरी दोस्ती थी. आर्थिक दृष्टि से अरुण भी तंगहाली में था.

बैंक से रकम निकालने जमा कराने के काम में कैशियर के साथ उसी को आनाजाना होता था. देवप्रकाश को अपनी तंगहाली से उबरने का एक ही उपाय सूझा कि लूट का ऐसा नाटक रचा जाए ताकि किसी को शक भी न हो और अच्छीखासी रकम भी हाथ लग जाए. लेकिन कोई मुनासिब मौका हाथ नहीं आ रहा था.

वारदात के लिए मंगलवार 19 जून, 2018 का दिन उस ने इसलिए चुना क्योंकि बैंक का नियमित कैशियर तो छुट्टी पर था ही, बैंक मैनेजर के परिवार में किसी की मौत की वजह से वह भी छुट्टी पर थे. कैश जमा करवाने के लिए बैंक की गुमानपुरा शाखा के कैशियर ग्यारसीराम को बुलवाया गया था.

वारदात के मास्टरमाइंड देवप्रकाश ने सारी प्लानिंग कर रखी थी. मौका मिला तो वारदात को अंजाम भी दे दिया. योजना बनाते समय देवप्रकाश ने तीनों का हिस्सा तय कर रखा था. पुलिस ने तीनों से 8 लाख रुपए बरामद कर लिए. देवप्रकाश की गरदन शर्म से झुक गई. कथा लिखने तक देवप्रकाश, राहुल और अरुण तीनों न्यायिक अभिरक्षा में थे.

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– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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