आखिरी लोकल : भाग 2

लेखक-  राजीव रोहित

शिवानी पूरी मगन हो कर फिल्म देख रही थी. शिवेश का ध्यान बारबार घड़ी की तरफ था. इंटरवल हुआ तो उस समय तकरीबन 11 बज रहे थे. शिवानी ने उस की तरफ देखा और उस से पूछ बैठी, ‘‘क्या बात है, बहुत चिंतित लग रहे हो?’’ ‘‘11 बज रहे हैं. फिल्म खत्म होतेहोते साढ़े 12 बज जाएंगे. स्टेशन पहुंचने तक तो एक जरूर बज जाएगा.’’ ‘‘बजने दो. कौन परवाह करता है?’’ शिवानी ने बेफिक्र हो कर जवाब दिया.  इस बीच इंटरवल खत्म हो चुका था. फिल्म फिर शुरू हो गई. पूरी फिल्म के दौरान शिवेश बारबार घड़ी देख रहा था, जबकि शिवानी फिल्म देख रही थी.

फिल्म साढ़े 12 बजे खत्म हुई. दोनों बाहर निकले. पौने 1 बजे की लास्ट लोकल उन की आखिरी उम्मीद थी. तेजी से वे दोनों स्टेशन की तरफ बढ़ चले.  ‘‘आखिरी लोकल तो एक चालीस की खुलती है न?’’ शिवानी ने चलतेचलते पूछा.  ‘‘वह फिल्मी लोकल थी. हकीकत में रात 12 बज कर 45 मिनट पर आखिरी लोकल खुलती है.’’ शिवानी के चेहरे पर पहली बार डर नजर आया. ‘‘डरो मत. देखा जाएगा,’’ शिवेश ने आत्मविश्वास से भरी आवाज में जवाब दिया. आखिर वही हुआ, जिस का डर था. लोकल ट्रेन परिसर के फाटक बंद हो रहे थे. अंदर जो लोग थे, सब को बाहर किया जा रहा था. ‘अब कहां जाएंगे?’ दोनों एकदूसरे से आंखों में सवाल कर रहे थे.

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‘‘अब क्या करेंगे हम? पहली लोकल ट्रेन सुबह साढ़े 3 बजे की है?’’ शिवेश ने कहा.  शिवानी एकदम चुपचाप थी, जैसे सारा कुसूर उसी का था.  ‘‘मुझे माफ कर दो. मेरी ही जिद से यह सब हो रहा है,’’ शिवानी बोली. ‘‘कोई बात नहीं. आज हमें एक मौका मिला है. मुंबई को रात में देखने का, तो क्यों न इस मौके का भरपूर फायदा उठाया जाए.  ‘‘बहुत सुन रखा था, मुंबई रात को सोती नहीं है. रात जवान हो जाती है वगैरह. क्या खयाल है आप का?’’ शिवेश ने मुसकरा कर शिवानी की तरफ देखते हुए पूछा.

‘‘यहां पर तो मेरी जान जा रही है और तुम्हें मस्ती सूझ रही है. पता नहीं, घर वाले क्याक्या सोच रहे होंगे?’’ ‘‘तुम तो ऐसे डर रही हो, जैसे मैं तुम्हें यहां पर भगा कर लाया हूं.’’  शिवेश ने जोरदार ठहाका लगाते हुए कहा. ‘‘चलो, घर वालों को बता दो.’’ ‘‘बता दिया जी.’’ ‘‘वैरी गुड.’’ ‘‘जी मैडम, अब चलो कुछ खायापीया जाए.’’ दोनों स्टेशन परिसर से बाहर आए. कई होटल खुले हुए थे.  ‘‘चलो फुटपाथ के स्टौल पर खाते हैं,’’ शिवेश ने कहा.

स्टेशन के बाहर सभी तरह के खाने के कई स्टौल थे. वे एक स्टौल के पास रुके.  एक प्लेट चिकन फ्राइड राइस और एक प्लेट चिकन लौलीपौप ले कर एक ही प्लेट में दोनों ने खाया.  ‘‘अब मैरीन ड्राइव चला जाए?’’ शिवेश ने प्रस्ताव रखा. ‘‘इस समय…? रात के 2 बजने वाले हैं. मेरा खयाल है, स्टेशन के आसपास ही घूमा जाए. एकडेढ़ घंटे की ही तो बात है,’’ शिवानी ने उस का प्रस्ताव खारिज करते हुए कहा. ‘‘यह भी सही है,’’ शिवेश ने भी हथियार डाल दिए. वे दोनों एक बस स्टौप के पास आ कर रुके. यहां मेकअप में लिपीपुती कुछ लड़कियां खड़ी थीं.

शिवेश और शिवानी ने एकदूसरे की तरफ गौर से देखा. उन्हें मालूम था कि रात के अंधेरे में खड़ी ये किस तरह की औरतें हैं.  वे दोनों जल्दी से वहां से निकलना  चाहते थे. इतने में जैसे भगदड़ मच गई. बस स्टौप के पास एक पुलिस वैन आ कर रुकी. सारी औरतें पलभर में गायब हो गईं. लेकिन मुसीबत तो शिवानी और शिवेश पर आने वाली थी. ‘‘रुको, तुम दोनों…’’ एक पुलिस वाला उन पर चिल्लाया. शिवानी और शिवेश दोनों ठिठक कर रुक गए.

‘‘इतनी रात में तुम दोनों इधर कहां घूम रहे हो?’’ एक पुलिस वाले ने पूछा. ‘‘अरे देख यार, यह औरत तो धंधे वाली लगती है,’’ दूसरे पुलिस वाले ने बेशर्मी से कहा.  ‘‘किसी शरीफ औरत से बात करने का यह कौन सा नया तरीका है?’’ शिवेश को गुस्सा आ रहा था.  ‘‘शरीफ…? इतनी रात में शराफत दिखाने निकले हो शरीफजादे,’’ एक सिपाही ने गौर से शिवानी को घूरते हुए कहा. ‘‘वाह, ये धंधे वाली शरीफ औरतें कब से बन गईं?’’ दूसरे सिपाही ने  एक भद्दी हंसी हंसते हुए कहा.

शिवेश का जी चाहा कि एक जोरदार तमाचा जड़ दे.  ‘‘देखिए, हम लोग सरकारी दफ्तर में काम करते हैं. आखिरी लोकल मिस हो गई, इसलिए हम लोग फंस गए,’’ शिवेश ने समाने की कोशिश की. ‘‘वाह, यह तो और भी अजीब बात है. कौन सा सरकारी विभाग है, जहां रात के 12 बजे छुट्टी होती है? बेवकूफ बनाने की कोशिश न करो.’’ ‘‘ये रहे हमारे परिचयपत्र,’’ कहते हुए शिवेश ने अपना और शिवानी का परिचयपत्र दिखाया.  ‘‘ठीक है. अपने किसी भी औफिस वाले से बात कराओ, ताकि पता चल सके कि तुम लोग रात को 12 बजे तक औफिस में काम कर रहे थे,’’ इस बार पुलिस इंस्पैक्टर ने पूछा, जो वैन से बाहर आ गया था. ‘‘इतनी रात में किसे जगाऊं? सर, बात यह है कि हम ने औफिस के बाद नाइट शो का प्लान किया था. ये रहे टिकट,’’ शिवेश ने टिकट दिखाए.

‘‘मैं कुछ नहीं सुनूंगा. अब तो थाने चल कर ही बात होगी. चलो, दोनों को वैन में डालो,’’ इंस्पैक्टर वरदी के रोब में कुछ सुनने को तैयार ही नहीं था.  शिवानी की आंखों में आंसू आ गए.  बुरी तरह घबराए हुए शिवेश की समा में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे? किसे फोन करे? अचानक एक सिपाही शिवेश को पकड़ कर वैन की तरफ ले जाने लगा.  शिवानी चीख उठी, ‘‘हैल्प… हैल्प…’’ लोगों की भीड़ तो इकट्ठा हुई, पर पुलिस को देख कर कोई सामने आने की हिम्मत नहीं कर पाया.

थोड़ी देर में एक अधेड़ औरत भीड़ से निकल कर सामने आई. ‘‘साहब नमस्ते. क्यों इन लोगों को तंग कर रहे हो? ये शरीफ इज्जतदार लोग हैं,’’ वह औरत बोली. ‘‘अब धंधे वाली बताएगी कि कौन शरीफ है? चल निकल यहां से, वरना तुझे भी अंदर कर देंगे,’’ एक सिपाही गुर्राया. ‘‘साहब, आप को भी मालूम है कि इस एरिया में कितनी धंधे वाली हैं. मैं भी जानती हूं कि यह औरत हमारी तरह  नहीं है.’’ ‘‘इस बात का देगी बयान?’’ ‘‘हां साहब, जहां बयान देना होगा, दे दूंगी. बुला लेना मुझे. हफ्ता बाकी है, वह भी दे दूंगी. लेकिन अभी इन को छोड़ दो,’’ इस बार उस औरत की आवाज कठोर थी. ‘हफ्ता’ शब्द सुनते ही पुलिस वालों को मानो सांप सूंघ गया. इस बीच भीड़ के तेवर भी तीखे होने लगे.

पुलिस वालों को समा में आ गया कि उन्होंने गलत जगह हाथ डाला है. ‘‘ठीक है, अभी छोड़ देते हैं, फिर कभी रात में ऐसे मत भटकना.’’ ‘‘वह तो कल हमारे मैनेजर ही एसपी साहब से मिल कर बताएंगे कि रात में उन के मुलाजिम क्यों भटक रहे थे,’’ शिवेश बोला.   ‘‘जाने दे भाई, ये लोग मोटी चमड़ी के हैं. इन पर कोई असर नहीं  होगा,’’ उस अधेड़ औरत ने शिवेश को समाते हुए कहा. ‘‘अब निकलो साहब,’’ उस औरत ने पुलिस इंस्पैक्टर से कहा. सारे पुलिस वाले उसे, शिवानी, शिवेश और भीड़ को घूरते हुए वैन में सवार हो गए. वैन आगे बढ़ गई. शिवेश और शिवानी ने राहत की सांस ली.

‘‘आप का बहुतबहुत शुक्रिया. आप नहीं आतीं तो उन पुलिस वालों को समाना मुश्किल हो जाता,’’ शिवानी ने उस औरत का हाथ पकड़ कर कहा.  ‘‘पुलिस वालों को समाना शरीफों के बस की बात नहीं. अब जाओ और स्टेशन के आसपास ही रहो,’’ उस अधेड़ औरत ने शिवानी से कहा. ‘‘फिर भी, आप का एहसान हम जिंदगीभर नहीं भूल पाएंगे. कभी कोई काम पड़े तो हमें जरूर याद कीजिएगा,’’ शिवेश ने अपना विजिटिंग कार्ड निकाल कर उसे देते हुए कहा. ‘‘यह कार्डवार्ड ले कर हम क्या करेंगे? रहने दे भाई,’’ उस औरत ने कार्ड लेने से साफ इनकार कर दिया.

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शिवानी ने शिवेश की तरफ देखा, फिर अपने पर्स से 500 रुपए का एक नोट निकाल कर उसे देने के लिए हाथ आगे बढ़ाया. ‘‘कर दी न छोटी बात. तुम शरीफों की यही तकलीफ है. हर बात के लिए पैसा तैयार रखते हो. हर काम पैसे के लिए नहीं करती मैं…’’ उस औरत ने हंस कर कहा. ‘‘अब जाओ यहां से. वे दोबारा भी आ सकते हैं.’’ शिवेश और शिवानी की भावनाओं पर मानो घड़ों पानी फिर गया. वे दोनों वहां से स्टेशन की तरफ चल पड़े, पहली लोकल पकड़ने के लिए.  पहली लोकल मिली. फर्स्ट क्लास का पास होते हुए भी वे दोनों सैकंड क्लास के डब्बे में बैठ गए. ‘‘क्यों जी, आज सैकंड क्लास की जिद क्यों?’’ शिवानी ने पूछा.  ‘‘ऐसे ही मन किया. पता है, एक जमाने में ट्रेन में थर्ड क्लास भी हुआ करती थी,’’ शिवेश ने गंभीरता से कहा.

‘‘उसे हटाया क्यों?’’ शिवानी ने बड़ी मासूमियत से पूछा.  ‘‘सरकार को लगा होगा कि इस देश में 2 ही क्लास होनी चाहिए. फर्स्ट और सैकंड,’’ शिवेश ने कहा, ‘‘क्योंकि, सरकार को यह अंदाजा हो गया कि जिन का कोई क्लास नहीं होगा, वे लोग ही फर्स्ट और सैकंड क्लास वालों को बचाएंगे और वह थर्ड, फोर्थ वगैरहवगैरह कुछ भी हो सकता है,’’ शिवेश ने हंसते हुए कहा.  ‘‘बड़ी अजीब बात है. अच्छा, उस औरत को किस क्लास में रखोगे?’’ शिवानी ने मुसकरा कर पूछा. ‘‘हर क्लास से ऊपर,’’ शिवेश ने जवाब दिया.  ‘‘सच है, आज के जमाने में खुद आगे बढ़ कर कौन इतनी मदद करता है.

हम जिस्म बेचने वालियों के बारे में न जाने क्याक्या सोचते रहते हैं. कम से कम अच्छा तो नहीं सोचते. वह नहीं आती तो पुलिस वाले हमें परेशान करने की ठान चुके थे. हमेशा सुखी रहे वह. अरे, हम ने उन का नाम ही नहीं पूछा.’’ ‘‘क्या पता, वह अपना असली नाम बताती भी या नहीं. वैसे, एक बात तो तय है,’’ शिवेश ने कहा. ‘‘क्या…?’’ ‘‘अब हम कभी आखिरी लोकल पकड़ने का खतरा नहीं उठाएंगे. चाहे तुम्हारे हीरो की कितनी भी अच्छी फिल्म क्यों न हो?’’ शिवेश ने उसे चिढ़ाने की कोशिश की.

‘‘अब इस में उस बेचारे का क्या कुसूर है? चलो, अब ज्यादा खिंचाई  न करो. मो सोने दो,’’ शिवानी ने अपना सिर उस के कंधे पर टिकाते  हुए कहा. ‘‘अच्छा, ठीक है,’’ शिवेश ने बड़े प्यार से शिवानी की तरफ देखा. कई स्टेशनों पर रुकते हुए लोकल ट्रेन यानी मुंबई के ‘जीवन की धड़कन’ चल रही थी.

शिवेश सोच रहा था, ‘सचमुच जिंदगी के कई पहलू दिखाती है यह लोकल. आखिरी लोकल ट्रेन छूट जाए तब भी और पकड़ने के बाद तो खैर कहना ही क्या…’ शिवेश ने शिवानी की तरफ देखा, उस के चेहरे पर बेफिक्री के भाव थे. बहुत प्यारी लग रही थी वह.

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आखिरी लोकल : भाग 1

लेखक-  राजीव रोहित

शिवानी और शिवेश दोनों मुंबई के शिवाजी छत्रपति रेलवे स्टेशन पर लोकल से उतर कर रोज की तरह अपने औफिस की तरफ जाने के लिए मुड़ ही रहे थे कि शिवानी ने कहा, ‘‘सुनो, आज मुझे नाइट शो में ‘रईस’ देखनी ही देखनी है, चाहे कुछ भी हो जाए.’’ ‘‘अरे, यह कैसी जिद है?’’

शिवेश ने हैरान हो कर कहा. ‘‘जिदविद कुछ नहीं. मुझे बस आज फिल्म देखनी है तो देखनी है,’’ शिवानी ने जैसे फैसला सुना दिया हो.  ‘‘अच्छा पहले इस भीड़ से एक तरफ आ जाओ, फिर बात करते हैं,’’ शिवेश ने शिवानी का हाथ पकड़ कर एक तरफ ले जाते हुए कहा.

‘‘आज तो औफिस देर तक रहेगा. पता नहीं, कितनी देर हो जाएगी. तुम तो जानती हो,’’ शिवेश ने कहा.  ‘‘मुझे भी मालूम है. पर जनाब, इतनी भी देर नहीं लगने वाली है. ज्यादा बहाना बनाने की जरूरत नहीं है. यह कोई मार्च भी नहीं है कि रातभर रुकना पड़ेगा. सीधी तरह बताओ कि आज फिल्म दिखाओगे या नहीं?’’

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‘‘अच्छा, कोशिश करूंगा,’’ शिवेश ने मरी हुई आवाज में कहा.

‘‘कोशिश नहीं जी, मुझे देखनी है तो देखनी है,’’ शिवानी ने इस बार थोड़ा मुसकरा कर कहा. शिवेश ने शिवानी की इस दिलकश मुसकान के आगे हथियार डाल दिए.

‘‘ठीक है बाबा, आज हम फिल्म जरूर देखेंगे, चाहे कुछ भी हो जाए.’’  शिवानी की इसी मुसकान पर तो शिवेश कालेज के जमाने से ही अपना दिल हार बैठा था. दोनों ही कालेज के जमाने से एकदूसरे को जानते थे, पसंद करते थे.  शिवानी ने उस के प्यार को स्वीकार तो किया था, लेकिन एक शर्त भी रख दी थी कि जब तक दोनों को कोई ढंग की नौकरी नहीं मिलेगी, तब तक कोई शादी की बात नहीं करेगा.

शिवेश ने यह शर्त खुशीखुशी मान ली थी. दोनों ही प्रतियोगिता परिक्षाओं की तैयारी में जीजान से लग गए थे. आखिरकार दोनों को कामयाबी मिली. पहले शिवेश को एक निजी पर सरकार द्वारा नियंत्रित बीमा कंपनी में क्लर्क के पद पर पक्की नौकरी मिल गई, फिर उस के 7-8 महीने बाद शिवानी को भी एक सरकारी बैंक में अफसर के पद पर नौकरी मिल गई थी.

मुंबई में उन का यह तीसरा साल था. तबादला तो सरकारी कर्मचारी की नियति है. हर 3-4 साल के अंतराल पर उन का तबादला होता रहा था. 15 साल की नौकरी में अब तक दोनों 3 राज्यों के  4 शहरों में नौकरी कर चुके थे.  शिवानी ने इस बार तबादले के लिए मुंबई आवेदन किया था. दोनों को मुंबई अपने नाम से हमेशा ही खींचती आई थी. वैसे भी इस देश में यह बात आम है कि किसी भी शहर के नागरिकों में कम से कम एक बार मुंबई घूमने की ख्वाहिश जरूर होती है. कुछ लोगों को यह इतनी पसंद आती है कि वे मुंबई के हो कर ही रह जाते हैं.

इस शहर की आबादी दिनोंदिन बढ़ते रहने की एक वजह यह भी है. हालांकि शिवानी और शिवेश ने अभी तक मुंबई में बस जाने का फैसला नहीं लिया था, फिर भी फिलहाल मुंबई में कुछ दिन बिताने के बाद वे यहां के लाइफ स्टाइल से अच्छी तरह परिचित तो हो ही चुके थे.  वे तकरीबन पूरी मुंबई घूम चुके थे. जब कभी उन की मुंबई घूमने की इच्छा होती थी, तो वे मुंबई दर्शन की बस में बैठ जाते और पूरी मुंबई को देख लेते थे. अपने रिश्तेदारों के साथ भी वे यह तकनीक अपनाते थे.

कभीकभी जब शिवानी की इच्छा होती तो दोनों अकसर शनिवार की रात कोई फिल्म देख लेते थे. खासतौर पर जब शाहरुख खान की कोई नई फिल्म लगती तो शिवानी फिर जिद कर के रिलीज के दूसरे दिन यानी शनिवार को ही वह फिल्म देख लेती थी. आज भी उस के पसंदीदा हीरो की फिल्म की रिलीज का दूसरा ही दिन था. समीक्षकों ने फिल्म की धज्जियां उड़ा दी थीं, फिर भी शिवानी पर इस का कोई असर नहीं पड़ा था. बस देखनी है तो देखनी है.

‘‘ये फिल्मों की समीक्षा करने वाले फिल्म बनाने की औकात रखते हैं क्या?’’ वह चिढ़ कर कहती थी.  ‘‘ऐसा न कहो.

सब लोग अपने पेशे के मुताबिक ही काम करते हैं. समीक्षक  भी फिल्म कला से अच्छी तरह परिचित होते हैं. प्रजातांत्रिक देश है मैडमजी. कहने, सुनने और लिखने की पूरीपूरी आजादी है.  ‘‘यहां लोग पहले की समीक्षाएं पढ़ कर फिल्म समीक्षा करना सीखते हैं, जबकि विदेशों में फिल्म समीक्षा  भी पढ़ाई का एक जरूरी अंग है,’’ शिवेश अकसर समझाने की कोशिश करता था. ‘‘बसबस, ज्यादा ज्ञान देने की जरूरत नहीं. मैं समझ गई. लेकिन फिल्म मैं जरूर देखूंगी,’’ अकसर किसी भी बात का समापन शिवानी हाथ जोड़ते हुए मुसकरा कर अपनी बात कहती थी और शिवेश हथियार डाल देता था. आज भी वैसा ही हुआ. ‘‘अच्छा चलो महारानीजी, तुम जीती मैं हारा. रात का शो हम देख रहे हैं. अब खुश?’’ शिवेश ने भी हाथ जोड़ लिए.  ‘‘हां जी, जीत हमेशा पत्नी की होनी चाहिए.’’  ‘‘मान लिया जी,’’ शिवेश ने मुसकरा कर कहा.

‘‘मन तो कर रहा है कि तुम्हारा मुंह  चूम लूं, लेकिन जाने दो. बच गए. पब्लिक प्लेस है न,’’ शिवानी ने बड़ी अदा से कहा. इस मस्ती के बाद दोनों अपनेअपने औफिस की तरफ चल दिए. औफिस पहुंच कर दोनों अपने काम में बिजी हो गए. काम निबटातेनिबटाते कब साढ़े  5 बज जाते थे, किसी को पता ही नहीं चलता था. शिवेश ने आज के काम जल्दी निबटा लिए थे. ऐसे भी अगले दिन रविवार की छुट्टी थी.

लिहाजा, आराम से रात के शो में फिल्म देखी जा सकती थी. उस ने शिवानी से बात करने का मन बनाया. अपने मोबाइल से उस ने शिवानी को फोन लगाया. ‘हांजी पतिदेव महोदय, क्या इरादा है?’ शिवानी ने फोन उठाते हुए पूछा. ‘‘जी महोदया, मेरा काम तो पूरा हो चुका है. क्या हम साढ़े 6 बजे का शो भी देख सकते हैं?’’ ‘जी नहीं, माफ करें स्वामी. हमारा काम खत्म होने में कम से कम एक घंटा और लगेगा. आप एक घंटे तक मटरगश्ती भी कर सकते हैं,’ शिवानी ने मस्ती में कहा.

‘‘आवारागर्दी से क्या मतलब है तुम्हारा?’’ शिवेश जलभुन गया.

‘अरे बाबा, नाराज नहीं होते. मैं तो मजाक कर रही थी,’ कह कर शिवानी हंस पड़ी थी.  ‘‘मैं तुम्हारे औफिस आ जाऊं?’’ ‘नो बेबी, बिलकुल नहीं. तुम्हें यहां चुड़ैलों की नजर लग जाएगी. ऐसा करो, तुम सिनेमाघर के पास पहुंच जाओ. वहां किताबों की दुकान है. देख लो कुछ नई किताबें आई हैं क्या?’ ‘‘ठीक है,’’ शिवेश ने कहा, ‘‘और हां, टिकट खरीदने की बारी तुम्हारी है. याद है न?’’ ‘हां जी याद है. अब चलो फोन रखो,’ शिवानी ने हंस कर कहा.

शिवेश औफिस से निकल कर सिनेमाघर की तरफ चल पड़ा. मुंबई में ज्यादातर सिनेमाघर अब मल्टीप्लैक्स में शिफ्ट हो गए थे. यह हाल अभी तक सिंगल स्क्रीन वाला था. स्टेशन के नजदीक होने के चलते यहां किसी भी नई फिल्म का रिलीज होना तय था. मुंबई का छत्रपति शिवाजी रेलवे टर्मिनस, जो पहले विक्टोरिया टर्मिनस के नाम से मशहूर था, आज भी पुराने छोटे नाम ‘वीटी’ से ही मशहूर था.

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स्टेशन से लगा हुआ बहुत बड़ा बाजार था, जहां एक से एक हर किस्म के सामानों की दुकानें थीं. हुतात्मा चौक के पास फुटपाथों पर बिकने वाली किताबों की खुली दुकानों के अलावा भी किताबों की दुकानों की भरमार थी.  रेलवे स्टेशन से गेटवे औफ इंडिया तक मुंबई 2 भागों डीएन रोड और फोर्ट क्षेत्र में बंटा हुआ था. दुकानें दोनों तरफ थीं. एक मल्टीस्टोर भी था. यहां सभी ब्रांडों के म्यूजिक सिस्टम मिलते थे. इस के अलावा नईपुरानी फिल्मों की सीडी या फिर डीवीडी भी मिलती थी.

शिवेश ने यहां अकसर कई पुरानी फिल्मों की डीवीडी और सीडी खरीदी  थी. आज  उस के पास किताबें और फिल्मों की डीवीडी और सीडी भरपूर मात्रा में थीं. हिंदी सिनेमा के सभी कलाकारों की पुरानी से पुरानी और नई फिल्मों की उस ने इकट्ठी कर के रखी थीं. ‘चलो आज नई किताबें ही देख लेते हैं,’ यह सोच कर के वह किताबों की दुकान में घुसने ही वाला था कि सामने एक पुराना औफिस साथी नरेश दिख दिख गया.

‘‘अरे शिवेश, आज इधर?’’  ‘‘हां, कुछ किताबें खरीदनी थीं,’’ शिवेश ने जवाब दिया.  ‘‘तुम तो दोनों कीड़े हो, किताबी भी और फिल्मी भी. फिल्में नहीं खरीदोगे?’’ ‘‘वे भी खरीदनी हैं, पर ब्रांडेड खरीदनी हैं.’’ ‘‘फिर तो इंतजार करना होगा. नई फिल्में इतनी जल्दी तो आएंगी नहीं.’’ ‘‘वह तो है, इसलिए आज सिर्फ किताबें खरीदनी हैं. आओ, साथ में अंदर चलो.’’

‘‘रहने दो यार. तुम तो जानते ही हो, किताबों से मेरा छत्तीस का आंकड़ा है,’’ यह कह कर हंसते हुए नरेश वहां से चला गया. शिवेश ने चैन की सांस ली कि चलो पीछा छूटा. इस बीच मोबाइल की घंटी बजी. ‘कहां हो बे?’ शिवानी ने पूछा.

‘‘अरे यार, कोई आसपास नहीं है क्या? कोई सुनेगा तो क्या कहेगा?’’ शिवेश ने झूठी नाराजगी जताई. शिवानी अकसर टपोरी भाषा में बात करती थी.  ‘अरे कोई नहीं है. सब लोग चले गए हैं. मैं भी शटडाउन कर रही हूं. बस निकल ही रही हूं.’ ‘‘इस का मतलब है, औफिस तुम्हें ही बंद करना होगा.’’ ‘बौस है न बैठा हुआ. वह करेगा औफिस बंद. पता नहीं, क्याक्या फर्जी आंकड़े तैयार कर रहा है?’ ‘‘मार्केटिंग का यही तो रोना है बेबी. खैर, छोड़ो. अपने को क्या करना है. तुम बस निकल लो यहां के लिए.’’

‘हां, पहुंच जाऊंगी.’ ‘‘साढ़े 9 बजे का शो है. अब भी सोच लो.’’ ‘अब सोचना क्या है जी. देखना है तो बस देखना है. भले ही रात स्टेशन पर गुजारनी पड़े.’ ‘‘पूछ कर गलती हो गई जानेमन. सहमत हुआ. देखना है तो देखना है.’’ शिवेश ने बात खत्म की और किताब  की दुकान के अंदर चला गया.

शिवेश ने कुछ किताबें खरीदीं और फिर बाहर आ कर शिवानी का इंतजार करने लगा. थोड़ी देर में ही शिवानी आ गई. दोनों सिनेमाघर पहुंच गए, जो वहां से कुछ ही दूरी पर था. भीड़ बहुत ज्यादा नजर नहीं आ रही थी.  ‘‘देख लो, तुम्हारे हीरो की फिल्म के लिए कितनी जबरदस्त भीड़ है,’’ शिवेश ने तंज कसते हुए कहा.  ‘‘रात का शो है न, इसलिए भी कम है.’’ शिवानी हार मानने वालों में कहां थी.  ‘‘बिलकुल सही. चलो टिकट लो,’’ शिवेश ने शिवानी से कहा.

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‘‘लेती हूं बाबा. याद है मुझे कि  आज मेरी  बारी है,’’ शिवानी ने हंसते हुए कहा.  शिवानी ने टिकट ली और शिवेश के साथ एक कोने में खड़ी हो गई.  शो अब शुरू ही होने वाला था. दोनों सिनेमाघर के अंदर चले गए. परदे पर फिल्म रील की लंबाई देख कर दोनों चिंतित हो गए. ‘‘ठीक 12 बजे हम लोग बाहर निकल जाएंगे, वरना आखिरी लोकल मिलने से रही,’’ शिवेश ने धीमे से शिवानी के कान में कहा.  ‘‘जो हो जाए, पूरी फिल्म देख कर ही जाएंगे.’’ ‘‘ठीक है बेबी. आज पता चलेगा कि नाइट शो का क्या मजा होता है.’’  फिर दोनों फिल्म देखने में मशगूल हो गए.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

रिश्तों में घोटाला : भाग 3

अजमेरिन मायके आई तो स्वच्छंद हो गई. निकाह के बाद घर वालों ने भी उसे रोकनाटोकना बंद कर दिया था. अत: वह पहले की तरह तेजपाल से मिलनेजुलने लगी. शारीरिक मिलन भी होने लगा. तेजपाल, अजमेरिन की हर ख्वाहिश पूरी करने लगा. 3 महीने बाद अजमेरिन दोबारा ससुराल चली गई लेकिन इस बार वह तेजपाल का दिया मोबाइल भी लाई थी. इस मोबाइल से वह ससुराल वालों से नजर बचा कर बात कर लेती थी.

इस के बाद तो यह सिलसिला ही चल पड़ा. अजमेरिन जब मायके आती तो प्रेमी तेजपाल के साथ गुलछर्रे उड़ाती और जब ससुराल में होती तो मोबाइल फोन पर बातें कर अपनी दिल की लगी बुझाती. देर रात मोबाइल फोन पर बतियाना न तो उस के सासससुर को अच्छा लगता था और न ही शौहर को. लतीफ ने कई बार उसे टोका भी. पर वह तुनक कर कहती, ‘‘क्या मैं अपने घर वालों से भी बात न करूं?’’

अजमेरिन को संयुक्त परिवार में रहना अच्छा नहीं लगता था. क्योंकि संयुक्त परिवार में बंदिशें थीं, सासससुर की हुकूमत थी, इसलिए जब मोबाइल फोन पर बात करने को ले कर टोकाटाकी होने लगी तो वह घर में झगड़ा करने लगी. सासससुर को तीखा जवाब देने लगी. घर में कलह बढ़ी तो साबिर अली ने अजमेरिन का चूल्हाचौका अलग कर दिया. घरजमीन का भी बंटवारा हो गया.

लतीफ अपने परिवार से अलग नहीं रहना चाहता था, लेकिन बीवी के आगे उसे झुकना पड़ा. अब वह अजमेरिन के साथ 2 कमरों वाले मकान में रहने लगा. अजमेरिन अलग रहने लगी तो वह पूरी तरह से स्वच्छंद हो गई. उस ने शर्मोहया त्याग दी और बेरोकटोक घर से निकलने लगी. वह सासससुर से तो दूरियां बनाए रखती थी, पर पड़ोसियों से हिलमिल कर रहती थी.

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अलग होने के बाद अजमेरिन ने तेजपाल से आर्थिक मदद मांगी तो वह राजी हो गया. आर्थिक मदद के बहाने तेजपाल का अजमेरिन की ससुराल में आनाजाना शुरू हो गया.

बातूनी तेजपाल ने अपनी बातों के जाल में अजमेरिन के शौहर लतीफ को भी फंसा लिया. उस ने उसे शराब का चस्का भी लगा दिया. अब जब भी तेजपाल आता तो शराब और गोस्त जरूर लाता.

शाम को अजमेरिन मीट पकाती और तेजपाल और लतीफ की शराब की पार्टी शुरू हो जाती. तेजपाल जानबूझकर लतीफ को ज्यादा पिला देता, उस के बाद लतीफ तो जैसेतैसे खाना खा कर चारपाई पर पसर जाता और तेजपाल रात भर अजमेरिन के साथ रंगरलियां मनाता. सवेरा होने के पहले ही वह मोटरसाइकिल पर सवार हो कर अपने गांव की ओर रवाना हो जाता.

चूंकि तेजपाल कभीकभी ही आता था, सो लतीफ को उस पर शक नहीं हुआ. दूसरे जब वह आता था तो लतीफ की मुफ्त में दारू पार्टी होती थी. इसलिए वह स्वयं भी उस के आने का इंतजार करता था. तीसरे, जब कभी उसे बीज खाद के लिए पैसों की जरूरत होती थी तो वह बेहिचक उस से मांग लेता था. लतीफ तेजपाल को अपना हमदर्द और दोस्त मानता था, जबकि तेजपाल यह सब अपने स्वार्थ के लिए करता था.

कहते हैं कि चोर कितना भी शातिर क्यों न हो, एक न एक दिन उस की चोरी पकड़ी ही जाती है.

अजमेरिन और तेजपाल के साथ भी यही हुआ. हुआ यह कि उस शाम लतीफ ने तेजपाल के साथ शराब तो जम कर पी थी, लेकिन कुछ देर बाद उसे उल्टी हो गई थी.

आधी रात के बाद उस की आंखें खुलीं तो अजमेरिन कमरे में नहीं थी. वह कमरे से बाहर निकला तो उसे दूसरे कमरे में कुछ खुसरफुसर सुनाई दी. लतीफ का माथा ठनका. वह दबे पांव कमरे में पहुंचा तो उस ने शर्मनाक नजारा देखा. अजमेरिन अपने मायके के यार के साथ मौजमस्ती कर रही थी.

उन दोनों को आपत्तिजनक स्थिति में देख कर लतीफ मानो बुत बन गया. उसे बीवी व दोस्त से ऐसी उम्मीद न थी. अजमेरिन और तेजपाल ने लतीफ को अपने सिर पर खड़े देखा तो हड़बड़ाकर अलग हो गए.

उस ने गालीगलौज शुरू की तो तेजपाल भाग गया, पर अजमेरिन कहां जाती. लतीफ ने उस की जम कर पिटाई की. मौके की नजाकत भांप कर अजमेरिन ने गिरगिट की तरह रंग बदला और शौहर से माफी मांग ली.

लतीफ अपनी बसीबसाई गृहस्थी नहीं उजाड़ना चाहता था. इसलिए अजमेरिन को चेतावनी देते हुए माफ कर दिया. अपने लटकोंझटकों से उस ने शौहर को भी मना लिया. हवस औरत को बहुत नीचे गिरा देती है.

पति द्वारा माफ करने पर अजमेरिन को संभल जाना चाहिए था. पर मायके के यार को वह भुला नहीं पाई और पति धर्म भूल गई. कुछ समय बाद वह तेजपाल से फिर मिलने लगी.

तेजपाल को ले कर घर में शुरू हुई कलह ने पैर पसार लिए थे. लतीफ और अजमेरिन में झगड़ा बढ़ा तो बात घर से निकल कर बाहर आ गई. पड़ोसी जान गए कि झगड़ा क्यों होता है. साबिर अली भी बहू की बदचलनी से वाकिफ हो गया. लतीफ अब शराब पी कर घर आता और अजमेरिन को पीटता. पिटाई से अजमेरिन बुरी तरह चीखतीचिल्लाती.

शराब पीने के कारण लतीफ की आर्थिक हालत खराब हो गई थी. उस ने अपना खेत भी गिरवी रख दिया था. आर्थिक स्थिति खराब हुई तो लतीफ कमाई करने के लिए हैदराबाद चला गया. वहां उस का एक दोस्त मजदूर सप्लाई करने वाले किसी ठेकेदार के पास काम करता था. उस ने लतीफ को भी मजदूरी के काम पर लगवा दिया था.

शौहर परदेश कमाने चला गया, तो अजमेरिन मायके आ गई. मायके आ कर उस ने तेजपाल को रोरो कर अपने उत्पीड़न की व्यथा बताई. उस ने साफ कह दिया कि अब वह शौहर के जुल्म बरदाश्त नहीं करेगी.

वह उस से छुटकारा चाहती है. फिर मायके में रहने के दौरान ही अजमेरिन ने प्रेमी तेजपाल के साथ मिल कर शौहर के कत्ल की योजना बनाई और उस के वापस घर आने का इंतजार करने लगी.

10 मार्च को लतीफ हैदराबाद से वापस घर लौटा. आते ही उस ने अजमेरिन को मायके से बुलवा लिया. अजमेरिन पहले ही शौहर को हलाल करने की योजना बना चुकी थी. इसलिए वह बिना किसी हीलाहवाली के ससुराल वापस आ गई.

औरत एक बार फिसल जाए तो वह विश्वास के काबिल नहीं रहती. अजमेरिन भी विश्वास खो चुकी थी, सो लतीफ उसे शक की नजर से देखता था और अजमेरिन को पीट भी देता था. अजमेरिन तो कुछ और ही सोच कर आई थी, सो पिट कर भी जुबान बंद रखती थी.

8 अप्रैल की सुबह अजमेरिन ने मोबाइल फोन पर तेजपाल से बात की और देर शाम उसे घर बुलाया. तेजपाल समझ गया कि उसे क्यों बुलाया गया है. मोटरसाइकिल से वह रात 8 बजे बेहटा गांव पहुंच गया. उस ने अपनी मोटरसाइकिल मदरसे के सामने खड़ी की और पैदल ही अजमेरिन के घर पहुंच गया.

उस समय लतीफ घर में नहीं था. अजमेरिन ने उसे कमरे में बिठा दिया. देर रात लतीफ देशी शराब पी कर आया. अजमेरिन ने उसे खाना खिलाया फिर वह चारपाई पर जा कर लुढ़क गया.

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इस के बाद अजमेरिन तेजपाल के कमरे में पहुंची, जहां दोनों ने पहले हसरतें पूरी कीं. आधी रात के बाद दोनों लतीफ की चारपाई के पास पहुंचे और उसे दबोच लिया. दोनों ने मिल कर पहले लतीफ  की डंडों से पिटाई की फिर उसी के अंगौछे से गला कस कर उसे मार डाला.

हत्या करने के बाद शव को घर के बाहर बरामदे में तख्त पर डाल दिया. सुबह 4 बजे तेजपाल मोटरसाइकिल से फरार हो गया.

सुबह अजमेरिन रोनेपीटने लगी, तब घर और पड़ोसियों को लतीफ की हत्या की जानकारी हुई. कुछ देर बाद मृतक के पिता साबिर अली थाना ठठिया पहुंचे और बेटे की हत्या की सूचना दी.

तेजपाल और अजमेरिन से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें 15 अप्रैल को कन्नौज के जिला सत्र न्यायाधीश के आवास पर उन के समक्ष पेश किया, जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

रिश्तों में घोटाला : भाग 2

उत्तर प्रदेश के जिला कानपुर (देहात) के रसूलाबाद थाना अंतर्गत ककवन रोड पर एक गांव है सहवाजपुर. हिंदूमुसलिम की मिलीजुली आबादी वाला यह गांव पूरी तरह से विकसित है. सड़क मार्ग से जुड़ा होने के कारण गांव में दिन भर चहल पहल रहती है. यहां के ज्यादातर लोग या तो खेती करते हैं या फिर व्यवसाय. हफ्ते में हर बुधवार को यहां साप्ताहिक बाजार भी लगता है, जिस में आसपास के गांव के लोग आते हैं.

नूर आलम अपने परिवार के साथ इसी सहवाजपुर गांव में रहता था. उस के परिवार में बीवी खालिदा बेगम, 2 बेटियां अनीसा, अजमेरिन और बेटा ताहिर था. नूर आलम जूताचप्पल बेचने का काम करता था.

इस काम में उस का बेटा ताहिर भी मदद करता था. इसी धंधे से उस के परिवार का भरणपोषण आसानी से हो जाता था. बड़ी बेटी अनीसा का निकाह इरशाद के साथ कर दिया. इरशाद रसूलाबाद कस्बे में रहता था और फल बेचता था. अनीसा शौहर के साथ खुशहाल थी.

नूर आलम की बेटी अजमेरिन भाईबहनों में सब से छोटी थी. वह 5 जमात के आगे न पढ़ सकी. वह मां के साथ चौकाचूल्हा में हाथ बंटाने लगी थी.

गोरा चेहरा, नशीली आंखें और सुर्ख होठों पर कंपन लिए अजमेरिन जब मस्तानी चाल से घर से बाहर निकलती तो जवान युवकों की धड़कनें बढ़ जाती थीं. वह उसे देख कर फब्तियां कसते थे. उन की चुभती नजरें अजमेरिन को रोमांच से भर देती थीं.

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अजमेरिन के वैसे तो कई दीवाने थे, लेकिन 4 घर दूर रहने वाला तेजपाल उसे कुछ ज्यादा ही चाहता था. तेजपाल के पिता ओमप्रकाश किसान थे. उन के 3 बच्चों में तेजपाल सब से छोटा था. घर के बाहरी छोर पर उन की जनरल स्टोर की दुकान थी, जिस पर तेजपाल बैठता था. उन का बड़ा बेटा कानपुर शहर में नौकरी करता था, जबकि बेटी की शादी हो चुकी थी.

पड़ोस में रहने के कारण अजमेरिन और तेजपाल का आमनासामना अकसर हो जाता था. तेजपाल जहां अजमेरिन के रूप का दीवाना था, तो अजमेरिन भी तेजपाल के कुशल व्यवहार से प्रभावित थी. दोनों हंसबोल लेते थे.

अजमेरिन 20 साल की हो चुकी थी. उस के युवा तन में तरंगें उठने लगी थीं. तेजपाल भी 22 वर्ष की उम्र का बांका जवान था. उस की रातें भी बेचैनी से बीतती थीं. अजमेरिन जब भी उस की दुकान पर आती, तो तेजपाल उस के यौवन को निहारता रह जाता था. उसे इस तरह देखते देख अजमेरिन उसे मुसकरा कर देखती और हया से सिर झुका लेती. मोहब्बत का बीज शायद दोनों के मन में पड़ चुका था.

धीरेधीरे यह सिलसिला सा बन गया. जब भी अजमेरिन तेजपाल के सामने पड़ती, लाज से उस के गाल सुर्ख हो जाते. तेजपाल मंदमंद मुसकराते हुए उसे देखता तो वह और भी शरमा जाती. एक रोज एकांत पा कर अजमेरिन ने पूछ ही लिया, ‘‘मुझे देख कर यूं शरारत से क्यों मुसकराते हो?’’

‘‘इसलिए कि सीधीसादी अजमेरिन के हुस्न का खजाना मेरी आंखों में बस गया है.’’ तेजपाल ने कह दिया.

‘‘धत्त,’’ अजमेरिन ने तिरछी चितवन से उसे देखा और शरमा कर चली गई.

अब दोनों की निगाहें एकदूजे से कुछ कहने लगीं. एक रोज अजमेरिन तेजपाल की दुकान पर गई तो दुकान बंद थी. वह घर के अंदर गई तो तेजपाल खाना बना रहा था. दरअसल तेजपाल की मां बीमार थी, पिता उसे डाक्टर को दिखाने गए थे. अजमेरिन को शरारत सूझी तो वह बोली, ‘‘अपने हाथों से चपातियां ठोकते हो, शादी क्यों नहीं कर लेते?’’

‘‘चलो, तुम्हें मेरी परेशानी देख कर रहम तो आया,’’ तेजपाल ने ठंडी सांस छोड़ी, ‘‘जब तुम जैसी कोई हसीना मिलेगी, ब्याह रचा लूंगा.’’

अजमेरिन के गालों पर गुलाब खिल गए. उस ने उसे तिरछी चितवन से निहारा और बिना जवाब दिए मुड़ कर जाने लगी. तेजपाल ने उस का हाथ थाम लिया, ‘‘मेरा चैन ओ करार छीन कर मुसकराती हो’’?

‘‘तुम ने भी तो मेरी रातों की नींद छीन रखी है.’’ अजमेरिन ने कहा.

दोनों की मोहब्बत परवान चढ़ी तो दोनों मिलन का अवसर ढूंढने लगे. उन्हें यह मौका जल्द ही मिल गया. उस रोज अजमेरिन के घर वाले रिश्तेदार के घर गए थे और वह घर में अकेली थी. अजमेरिन ने ही तेजपाल को घर सूना होने की बात बता कर मिलन की राह सुझाई थी.

दोपहर के समय दुकान बंद कर तेजपाल, अजमेरिन के घर पहुंचा. उस समय वह उसी का इंतजार कर रही थी. तेजपाल ने धीरे से दरवाजा अंदर से बंद किया फिर अजमेरिन के पास आ कर उसे बांहों में भर लिया और शारीरिक छेड़छाड़़ करने लगा.

तेजपाल के इरादे को भांप कर अजमेरिन ने दिखावे के तौर पर विरोध किया, और बोली, ‘‘हंसना, बोलना और हंसीमजाक अपनी जगह ठीक है, लेकिन जो तुम चाहते हो वह पाप है.’’

‘‘पापपुण्य मैं नहीं जानता, मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि जो चेहरा मेरे सपनों में बस गया है, वह मुझे मिल जाए.’’ तेजपाल ने बाजू छोड़ कर उस का चेहरा हथेलियों में समेट लिया. धीरेधीरे तेजपाल का चेहरा नजदीक आता गया. इतना करीब कि सांसें एकदूसरे के चेहरे से टकराने लगीं. तेजपाल की गुनगुनी सांसें अजमेरिन को कमजोर करने लगीं. इतना ज्यादा कि मर्यादा हार गई और हसरत जीत गई.

दोनों ही विशुद्ध कुंवारे थे. प्रथम मिलन का असीम आनंद दोनों को मिला तो वह इस आनंद को पाने के लिए लालायित रहने लगे. अजमेरिन मौका पा कर सामान लेने के बहाने तेजपाल की दुकान पर जाती और मौका पाते ही दोनों मिलन कर लेते.

तेजपाल तो इतना दीवाना हो गया था कि वह अजमेरिन से शादी रचाने को भी राजी था. लेकिन अजमेरिन जानती थी कि वह मुसलमान है, अत: हिंदू लड़के, वह भी पड़ोसी, से कभी उस के परिवार वाले शादी को राजी नहीं होंगे.

तेजपाल का समयअसमय अजमेरिन के घर आना पड़ोसियों को नागवार लगा. उन्होंने अजमेरिन के भाई ताहिर से शिकायत की तो उस का माथा ठनका. उस ने बहन पर नजर रखनी शुरू कर दी.

एक रोज तेजपाल बहाने से घर आया और अजमेरिन से मिला तो ताहिर ने छिप कर दोनों पर नजर रखी. इस का नतीजा यह निकला कि उस ने दोनों को एकदूसरे को चूमते देख लिया. उस समय तो उस ने बहन से कुछ नहीं कहा. लेकिन दूसरे रोज उसे अकेले में समझाया कि तेजपाल हिंदू है और तू मुसलमान. उस से तेरा रिश्ता कभी नहीं हो सकता. इसलिए तू उस का ख्वाब छोड़ दे.

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अजमेरिन ने भाई से वादा किया कि वह तेजपाल से कभी नहीं मिलेगी. तेजपाल को भी ताहिर ने समझा दिया. लेकिन यौवन की आरजू के आगे अजमेरिन भी हार गई और तेजपाल भी. कुछ माह बीतने के बाद दोनों फिर छिपछिप कर मिलने लगे. इस का नतीजा यह निकला कि दोनों के नाजायज रिश्तों के चर्चे गांव की हर गली के मोड़़ पर होने लगे.

बदनामी ने पैर पसारे और बिरादरी में भी थूथू होने लगीं तो नूर आलम परेशान हो उठा. उस ने बेलगाम लड़की पर लगाम कसने के लिए, उस का जल्द ही जातिबिरादरी के लड़के के साथ निकाह करने की ठान ली. इस बाबत उस ने खोज शुरू की तो अजमेरिन के लिए उसे लतीफ पसंद आ गया.

लतीफ के पिता साबिर अली कन्नौज जनपद के ठठिया थाना अंतर्गत गांव बेहटा में रहते थे. उन की 4 औलादों में लतीफ सब से छोटा था. 2 बेटियां व एक बेटे की वह शादी कर चुके थे, जबकि लतीफ अभी कुंवारा था. लतीफ साधारण रंगरूप का था.

पिता के साथ वह किसानी करता था. नूर आलम ने जब लतीफ को देखा तो उस ने उसे अपनी बेटी अजमेरिन के लिए पसंद कर लिया. साल 2010 के जुलाई माह में अजमेरिन का शादी लतीफ के साथ हो गई.

अजमेरिन खूबसूरत थी. वह लतीफ की दुलहन बन कर ससुराल पहुंची तो ससुराल वालों ने उसे हाथोंहाथ लिया और उस के हुस्न की तारीफ की. खूबसूरत बीवी पा कर लतीफ जहां खुश था, वहीं अजमेरिन साधारण रंगरूप वाले शौहर को देख कर उदास थी. उस ने तो अपने प्रेमी तेजपाल जैसे युवक की तमन्ना की थी, लेकिन उस की तमन्ना अधूरी रह गई.

2 हफ्ते ससुराल में रहने के बाद अजमेरिन मायके आई तो उस का चेहरा मुसकराने के बजाय कुम्हलाया हुआ था. अजमेरिन का सामना तेजपाल से हुआ तो वह रो पड़ी, ‘‘तेजपाल, मेरी तो किस्मत ही फूट गई. न शौहर ढंग का मिला न घरद्वार. पता नहीं उस घर में मेरा जीवन कैसे कटेगा. मुझे तो ससुराल में भी तुम्हारी याद सताती रही.’’

तेजपाल अजमेरिन के गोरे गालों पर लुढ़क आए आंसुओं को पोंछते हुए बोला, ‘‘तुम्हारे ससुराल चले जाने के बाद मुझे भी चैन कहां था. रातरात भर मैं तुम्हारे खयालों में ही खोया रहता था. आज मैं ने जब तुम्हें सामने देखा तो दिल को तसल्ली हुई. तुम किसी तरह की चिंता न करो. मैं तुम्हारा हमेशा साथ दूंगा.’’

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

रिश्तों में घोटाला : भाग 1

9 अप्रैल की सुबह 5 बजे अजमेरिन की चीख और रोनेपीटने की आवाज सुन कर घर वाले तथा पड़ोसी आ गए. उस ने अपने ससुर साबिर अली को बताया कि उस के शौहर लतीफ को किसी ने रात में मार डाला है. बेटे की हत्या की बात सुन कर साबिर अली अवाक रह गए.

इस के बाद तो बेहटा गांव में कोहराम मच गया. अजमेरिन को ले कर गांव में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. कुछ लोग दबी जुबान से तो कुछ खुल कर अजमेरिन को ही दोषी ठहरा रहे थे. घर वालों को भी अजमेरिन पर ही शक था.

कुछ देर बाद साबिर अली थाना ठठिया पहुंचे. उस समय थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह थाने पर मौजूद थे. उन्होंने अधेड़ उम्र के व्यक्ति को बदहवास देखा, तो पूछा, ‘‘बताइए, कैसे आना हुआ और इतने घबराए हुए क्यों हो?’’

‘‘साहब, मेरा नाम साबिर अली है. मैं गांव बेहटा का रहने वाला हूं. बीती रात किसी ने मेरे बेटे लतीफ की हत्या कर दी. वह 20 दिन पहले ही हैदराबाद से गांव लौटा था.’’

हत्या की बात सुन कर थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह चौंके. उन्होंने साबिर अली से पूछा, ‘‘तुम्हारे बेटे लतीफ की हत्या किस ने और क्यों की होगी? क्या उस की गांव में किसी से कोई दुश्मनी या लेनदेन का लफड़ा था?’’

‘‘साहब, लतीफ बहुत सीधासादा था. गांव में उस की न तो किसी से दुश्मनी थी और न ही किसी से लेनदेन का लफड़ा था. पर मुझे एक आदमी पर गहरा शक है.’’

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‘‘किस पर?’’ शैलेंद्र सिंह ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘लतीफ की बीवी अजमेरिन पर.’’ साबिर अली ने बताया.

‘‘वह कैसे?’’ थाना प्रभारी ने पूछा.

‘‘साहब, लतीफ की बीवी अजमेरिन का चरित्र ठीक नहीं है. वह मायके के यार तेजपाल को घर बुलाती थी. तेजपाल को ले कर मियांबीवी में झगड़ा होता था. मुझे शक है कि अजमेरिन ने ही अपने प्रेमी तेजपाल के साथ मिल कर मेरे बेटे को मार दिया है. अब वह पाकीजा बनने का नाटक कर रही है.’’

अवैध संबंधों में हुई हत्या का पता चलते ही थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह ने इस वारदात से वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को अवगत कराया और फिर पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पहुंच गए. उस समय लौकडाउन की वजह से इक्कादुक्का लोग ही मौजूद थे. पुलिस को देख कर शौहर के शव के पास बैठी अजमेरिन छाती पीटपीट कर रोने लगी. अजमेरिन रो जरूर रही थी, पर उस की आंखों से आंसू नहीं निकल रहे थे.

शैलेंद्र सिंह को समझते देर नहीं लगी कि अजमेरिन रोने का ड्रामा कर रही है. फिर भी सहानुभूति जताते हुए उन्होंने उसे शव से दूर किया और निरीक्षण कार्य में जुट गए. मृतक लतीफ का शव घर के बाहर बरामदे में तख्त पर पड़ा था. उस के शरीर पर चोटों के निशान थे. देखने से ऐसा लग रहा था कि हत्या गला दबा कर की गई थी. उस की उम्र 35 वर्ष के आसपास थी और वह शरीर से हृष्टपुष्ट था.

थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह अभी जांच कर ही रहे थे कि सूचना पा कर एसपी अमरेंद्र प्रसाद, एएसपी विनोद कुमार तथा सीओ सुबोध कुमार जायसवाल घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया फिर मृतक की बीवी अजमेरिन से पूछताछ की.

अजमेरिन ने बताया कि बीती रात 9 बजे उस ने शौहर के साथ बैठ कर खाना खाया था. कुछ देर दोनों बतियाते रहे, उस के बाद वह घर के बाहर बरामदे में जा कर तख्त पर सो गए. इस के बाद रात में किसी ने उन की हत्या कर दी. कैसे और कब, इस बारे में उसे नहीं मालूम.

सुबह जब वह सो कर उठी और साफसफाई करते हुए बरामदे में पहुंची तो उन्हें मृत पाया. पति को इस हालत में देख कर वह चीखीचिल्लाई तो ससुर व पड़ोसी आ गए. ससुर ने पुलिस को सूचना दी तो पुलिस आ गई.

पुलिस अधिकारियों ने मृतक के वालिद साबिर अली से बात की तो उस ने लतीफ की बीवी अजमेरिन पर शक जताया कि वह चरित्र की खोटी है. पुलिस अधिकारी पक्के सबूत के बिना अजमेरिन को गिरफ्तार नहीं करना चाहते थे.

इसलिए घटनास्थल की सारी काररवाई पूरी कर शव पोस्टमार्टम के लिए जिला अस्पताल कन्नौज भिजवा दिया गया. साथ ही थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को आदेश दिया कि वह पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिलने के बाद काररवाई करें.

10 अप्रैल की शाम 5 बजे थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को लतीफ की पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिल गई. रिपोर्ट के मुताबिक लतीफ की हत्या गला घोंट कर की गई थी. हत्या के पहले उस के साथ मारपीट भी हुई थी. उस के हाथों व पैरों पर गंभीर चोटों के निशान थे. भोजन पचा पाया गया, जिस से अनुमान लगाया कि हत्या रात 12 बजे के बाद हुई थी. जहर की आशंका को देखते हुए विसरा को सुरक्षित कर लिया गया.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट का अध्ययन करने के बाद शैलेंद्र सिंह दूसरे रोज सुबह 10 बजे मृतक की बीवी अजमेरिन से पूछताछ करने उस के गांव बेहटा पहुंचे लेकिन वहां दरवाजे पर ताला लटक रहा था.

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उन्होंने मृतक के पिता साबिर अली से पूछा, तो उन्होंने बताया कि अजमेरिन घर में ताला डाल कर फरार हो गई है. संभव है, वह अपने मायके चली गई है. उस का मायका कानपुर देहात जनपद के रसूलाबाद थाना अंतर्गत गांव सहवाजपुर में है. उसी गांव में उस का आशिक तेजपाल भी रहता है.

अजमेरिन के फरार होने से थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह को पक्का यकीन हो गया कि लतीफ की हत्या में उस का ही हाथ है. उसी ने अपने आशिक के साथ मिल कर शौहर की हत्या की है. अत: अजमेरिन और उस के आशिक को पकड़ने के लिए शैलेंद्र सिंह अपनी टीम के साथ थाना रसूलाबाद पहुंच गए.

वहां की पुलिस की मदद से उन्होंने गांव सहवाजपुर में अजमेरिन व तेजपाल के घर छापा मारा. लेकिन वह दोनों अपनेअपने घर में नहीं थे. तेजपाल के पिता ओमप्रकाश ने बताया कि तेजपाल 8 अप्रैल की सुबह मोटरसाइकिल ले कर घर से निकला था, तब से वह वापस नहीं आया. जबकि अजमेरिन के घर वालों ने बताया कि वह मायके आई ही नहीं है.

तेजपाल व अजमेरिन को पकड़ने के लिए थानाप्रभारी ने तमाम संभावित स्थानों पर छापे मारे, लेकिन दोनों पकड़ में नहीं आए. इस बीच उन्होंने उन के घर वालों से भी सख्ती से पूछताछ की, लेकिन उन का पता नहीं चला. इस पर थानाप्रभारी ने अपने खास मुखबिरों का जाल फैला दिया.

14 अप्रैल की सुबह 8 बजे एक मुखबिर ने थाने आ कर थानाप्रभारी को बताया कि अजमेरिन अपने आशिक तेजपाल के साथ नेरा पुल के पास मौजूद है. दोनों शायद किसी सुरक्षित ठिकाने की तलाश में है.

मुखबिर की इस सूचना पर शैलेंद्र सिंह सक्रिय हुए और पुलिस बल के साथ नेरा पुल के पास पहुंच गए. पुल पर उन्हें कोई नजर ही नहीं आया.

निरीक्षण करते हुए पुलिस जब पुल के नीचे पहुंची तो वहां एक युवक और एक युवती मिले. पुलिस को देख कर दोनों ने भागने की कोशिश की, लेकिन पुलिस ने घेराबंदी कर दोनों को पकड़ लिया.

थाना ठठिया ला कर जब उन से पूछताछ  की गई तो युवक ने अपना नाम तेजपाल बताया. जबकि युवती ने अपना नाम अजमेरिन बताया. उन से जब लतीफ की हत्या के संबंध में पूछा गया तो दोनों साफ मुकर गए. लेकिन जब पुलिस ने अपना असली रंग दिखाया तो दोनों टूट गए और हत्या का जुर्म कुबूल कर लिया.

यही नहीं उन्होंने हत्या में इस्तेमाल अंगौछा और डंडा भी बरामद करा दिया जिसे उन्होंने घर में छिपा दिया था. अजमेरिन ने बताया कि तेजपाल से उस के संबंध निकाह से पूर्व से थे. जो निकाह के बाद भी बने रहे.

उस का शौहर इन नाजायज ताल्लुकात का विरोध करता था और मारपीट और झगड़ा करता था. शौहर की शराबखोरी और मारपीट से आजिज आ कर उस ने तेजपाल के साथ मिल कर शौहर की हत्या की योजना बनाई.

फिर 8 अप्रैल की रात उस के साथ मारपीट की और गला घोंट कर मार डाला. अजमेरिन की बात का तेजपाल ने भी समर्थन किया.

थानाप्रभारी शैलेंद्र सिंह ने लतीफ हत्याकांड का परदाफाश करने और उस के कातिलों को पकड़ने की जानकारी पुलिस अधिकारियों को दी तो वह थाना ठठिया आ गए. उन्होंने हत्यारोपियों से खुद पूछताछ की. फिर एसपी अमरेंद्र प्रसाद सिंह ने आननफानन प्रैसवार्ता बुलाई और हत्यारोपियों को मीडिया के सामने पेश कर घटना का खुलासा किया.

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चूंकि हत्यारोपियों ने अपना जुर्म स्वीकार कर लिया था. इसलिए शैलेंद्र सिंह ने मृतक के पिता साबिर अली को वादी बना कर भादंवि की धारा 302 के तहत तेजपाल व अजमेरिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करवाई और दोनों को विधि सम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस जांच में एक ऐसी औरत की कहानी सामने आई जिस ने देह सुख के लिए शौहर का कत्ल करा दिया.

जानें आगे क्या हुआ अगले भाग में…

रिश्तों में घोटाला

Best of Crime Stories: सेक्स की चाहत में पत्नी बनी पति की दुश्मन

भागदौड़ भरी जिंदगी में सड़कों पर बढ़ती वाहनों की भीड़, उन से होने वाली दुर्घटनाएं और आए दिन होने वाले अपराधों को देखते हुए अगर घर से निकला कोई आदमी वापस न आए तो घर वाले परेशान हो उठते हैं. नेकीराम का परिवार भी बेटे को ले कर कुछ इसी तरह परेशान था. अध्यापक नेकीराम का परिवार उत्तर प्रदेश के जनपद सहारनपुर के मोहल्ला आनंद विहार में रहता था. उन का एकलौता बेटा अमन परिवार से अलग रहता था.

उस के परिवार में पत्नी अनुराधा के अलावा 5 साल का एक बेटा कृष और 4 साल की बेटी अनन्या थी. नेकीराम को बेटे के लापता होने का उस समय पता चला, जब 28 दिसंबर, 2016 की रात करीब साढ़े 9 बजे उन की बहू अनुराधा का फोन आया. उस ने जो कुछ बताया था, उस के अनुसार रात में उस की तबीयत खराब हो गई तो उस ने अमन से दवा लाने को कहा. वह मोटरसाइकिल से दवा लेने गया तो लौट कर नहीं आया.

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अनुराधा ने अमन को फोन किया तो उस का मोबाइल स्विच औफ बता रहा था. इस से वह परेशान हो उठी थी और उस ने सभी को इस बारे में बता दिया था. जब अमन का कुछ पता नहीं चला तो नेकीराम और उन के भतीजे रात में ही स्थानीय थाना सदर बाजार पहुंचे और पुलिस को सूचना दे दी थी.

पुलिस ने उन्हें सुबह तक इंतजार करने को कहा था. पुलिस का अनुमान था कि अमन कहीं अपने यारदोस्तों के पास न चला गया हो. पुलिस ने भले ही सुबह तक इंतजार करने को कहा था, लेकिन घर वाले अपने स्तर से उस की तलाश करते रहे.

इसी का नतीजा था कि आधी रात को शहर के रेलवे स्टेशन परिसर में रेलिंग के पास उस की मोटरसाइकिल खड़ी मिल गई थी. लेकिन अमन का कुछ अतापता नहीं था. घर वालों की रात चिंता में बीती. सुबह शहर से लगे गांव फतेहपुर वालों ने नजर की पुलिया के नीचे किसी युवक का शव पड़ा देखा तो इस की सूचना थाना पुलिस को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी मुनेंद्र सिंह मौके पर पहुंच गए. सूचना पा कर सीओ अब्दुल कादिर भी घटनास्थल पर आ गए. मृतक की गरदन पर चोट के निशान थे. इस से अंदाजा लगाया गया कि उस की हत्या गला दबा कर की गई थी. मौके पर मौजूद लोग उस की शिनाख्त नहीं कर सके. शव लापता युवक अमन का हो सकता है, यह सोच कर पुलिस ने उस के घर वालों को वहां बुलवा लिया.

घर वालों ने शव की पहचान अमन की लाश के रूप में कर दी. मामला हत्या का था, इसलिए पुलिस ने लाश का पंचनामा भर कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. साफ था, अमन की हत्या सुनियोजित तरीके से की गई थी, क्योंकि उस की मोटरसाइकिल रेलवे स्टेशन पर खड़ी मिली थी. घटनास्थल और रेलवे स्टेशन के बीच 4 किलोमीटर का फासला था. अंदाजा लगाया गया कि हत्यारे हत्या करने के बाद रेलवे स्टेशन पर पहुंचे होंगे और मोटरसाइकिल खड़ी कर के फरार हो गए होंगे. पुलिस ने अमन के ताऊ के बेटे मुकेश कुमार की तहरीर पर अज्ञात हत्यारों के खिलाफ अपराध संख्या 549/2016 पर हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया था.

पुलिस ने अमन के घर वालों से पूछताछ की तो उन्होंने किसी से भी अपनी रंजिश होने से इनकार कर दिया. उस के घर कोहराम मचा था. उस की पत्नी अनुराधा का रोरो कर बुरा हाल था. वह बदहवाश सी हो चुकी थी. वह इतनी दुखी थी कि बारबार बेहोश हो पा रही थी. पुलिस के सामने बड़ा सवाल यह था कि अमन की हत्या क्यों और किस ने की? इस से भी बड़ा सवाल यह था कि हत्यारों को उस के घर से निकलने की जानकारी किस तरह हुई?

एसएसपी उमेश कुमार श्रीवास्तव ने हत्याकांड का जल्द खुलासा करने का आदेश दिया. एसपी सिटी संजय सिंह ने इस मामले की जांच में अभिसूचना विंग के इंचार्ज पवन शर्मा को भी लगा दिया. उन्हें लगा कि हत्यारों ने अमन से तब संपर्क किया होगा, जब वह घर से निकला होगा. पुलिस ने अमन, उस की पत्नी अनुराधा और अन्य घर वालों के मोबाइल नंबर ले कर सभी नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. एसपी सिटी के निर्देशन में हत्याकांड के खुलासे के लिए एक पुलिस टीम का गठन किया गया, जिस में क्राइम ब्रांच के अलावा थानाप्रभारी मुनेंद्र सिंह, एसआई मनीष बिष्ट, जर्रार हुसैन, हैडकांस्टेबल विकास शर्मा, कांस्टेबल नेत्रपाल, अरुण राणा और मोहित को शामिल किया गया था.

सभी नंबरों की काल डिटेल्स की जांच की गई तो पता चला कि अनुराधा की एक नंबर पर बहुत ज्यादा बातें होती थीं. घटना वाली रात भी उस की उस नंबर पर बातें हुई थीं. उस नंबर के बारे में पता किया गया तो वह नंबर अंकित का निकला. उस के मोबाइल की लोकेशन पता की गई तो अमन के घर और घटनास्थल की पाई गई.

पुलिस को मामला प्रेम संबंधों का लगा और साथ ही अमन की पत्नी अनुराधा संदेह के दायरे में आ गई. 31 दिसंबर को अनुराधा को हिरासत में ले कर पूछताछ की गई तो जो सच्चाई समने आई, जान कर पुलिस हैरान रह गई, क्योंकि अमन की असली दुश्मन कोई और नहीं, उस की अपनी पत्नी ही थी. प्रेमी से अवैधसंबंधों को बनाए रखने के लिए प्रेमी के साथ मिल कर उसी ने पति की हत्या की योजना बनाई थी. पुलिस ने अनुराधा के प्रेमी अंकित और उस के दोस्त टीनू को गिरफ्तार कर लिया. तीनों से विस्तार से पूछताछ की गई तो उन के चरित्र और गुनाह की सारी परतें खुल गईं, जो इस प्रकार थीं—

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दरअसल, अनुराधा ने जैसे ही जवानी की दहलीज पर कदम रखा, तभी उस के प्रेमसंबंध कस्बा नागल के रहने वाले विजयपाल के बेटे अंकित से बन गए थे. जवानी के जोश में दोनों ने मर्यादा की दीवार भी गिराई और हमेशा साथ रहने का फैसला भी किया. लेकिन ऐसा हो नहीं सका. अनुराधा के घर वालों ने उस का विवाह अमन के साथ कर दिया. इस का न तो अनुराधा विरोध कर सकी थी और न ही अंकित. यह बात अलग थी कि अनुराधा अंकित को भूल नहीं सकी. विवाह के कुछ दिनों बाद ही अनुराधा ने अंकित से संपर्क कर लिया था. अंकित इस बात से खुश था कि प्रेमिका अभी भी उसे प्यार करती थी.

दोनों के संबंध गुपचुप चलते रहे. यही नहीं, अंकित अनुराधा से मिलने उस के घर भी आने लगा था. अमन चूंकि ट्रक चलाता था, इसलिए अनुराधा को अपने संबंधों को जारी रखने में परेशानी नहीं हो रही थी. अमन कभी शहर में होता था तो कभी शहर से बाहर. अनुराधा 2 बच्चों की मां बन चुकी थी, इस के बाद भी उस के अंकित से संबंध बने रहे. शायद अंकित उस की धड़कनों का हिस्सा था. शादी के 4 साल बाद तक अमन अंधेरे में रहा. पति की आड़ में अनुराधा अपने प्यार को गुलजार रखना चाहती थी. इस तरह के संबंध कभी छिपे नहीं रहते. अनुराधा अकसर फोन पर बिजी रहती थी, जिस से अमन को शक तो होता था, लेकिन वह कोई न कोई बहाना बना कर उसे बेवकूफ बना देती थी.

किसी के मन में अगर शक घर कर जाए तो उस का निकलना आसान नहीं होता. अमन भी इस का शिकार हो गया था. आसपास के लोगों ने भी उसे बता दिया था कि उस की गैरमौजूदगी में कोई युवक अनुराधा से मिलने आता है. पत्नी की करतूतों के बारे में पता चला तो उस ने उसे न सिर्फ जम कर फटकारा, बल्कि उस की पिटाई भी कर दी. करीब 4 महीने पहले एक दिन अमन ट्रक ले कर दूर जाने की बात कह कर घर से निकला जरूर, लेकिन दोपहर में ही वापस आ गया. उस समय अनुराधा अंकित की बांहों में समाई थी. अमन को अचानक सामने पा कर दोनों के होश उड़ गए. अंकित चला गया और अनुराधा ने गलती मान ली. इस के बावजूद उस ने अपनी आदतें नहीं बदलीं.

कुछ दिनों बाद वह फिर अंकित से मिलने लगी. अमन को इस की जानकारी हो गई. इस के बाद अंकित को ले कर घर में आए दिन विवाद होने लगा. एक दिन हद तब हो गई, जब अनुराधा बगावत पर उतर आई. उस ने साफ कर दिया कि वह अंकित से संबंध नहीं तोड़ सकती. पत्नी की बेहयाई से अमन गुस्से में आ गया और उस ने उस की जम कर पिटाई कर दी. अपने साथ होने वाली मारपीट से तंग अनुराधा ने प्रेमी अंकित से कहा, ‘‘मैं तुम्हारे प्यार की खातिर कब तक जुल्म सहती रहूंगी. अगर तुम मेरे लिए कुछ नहीं कर सकते तो मुझे हमेशा के लिए छोड़ क्यों नहीं देते?’’

‘‘ऐसा क्या हुआ?’’

‘‘आज फिर उस ने मेरे साथ मारपीट की. क्या मेरी किस्मत में इसी तरह पिटना ही लिखा है? तुम कुछ करो वरना मैं जान दे दूंगी.’’

‘‘क्या चाहती हो तुम?’’

‘‘हमेशा के लिए तुम्हारी होना चाहती हूं.’’

‘‘चाहता तो मैं भी यही हूं.’’

‘‘सिर्फ चाहने से नहीं होगा, इस के लिए कुछ करना होगा. क्योंकि अमन के रहते यह कभी नहीं हो सकेगा. तुम उसे हमेशा के लिए रास्ते से हटा दो, वरना मुझे भूल जाओ.’’ अनुराधा ने यह बात निर्णायक अंदाज में कही तो गलत संबंधों के जाल में उलझा अंकित सोचने को मजबूर हो गया. उस ने उस से थोड़ा इंतजार करने को कहा.

अंकित का एक आपराधिक प्रवृत्ति का दोस्त था टीनू, जो नजदीक के गांव पंडौली निवासी छोटेलाल का बेटा था. अंकित ने उसे सारी बात बताई और दोस्ती का वास्ता दे कर उस से साथ देने को कहा तो वह तैयार हो गया. इस के बाद दोनों अनुराधा से मिलने उस के घर आए तो तीनों ने मिल कर अमन को रास्ते से हटाने की योजना बना डाली. यह दिसंबर, 2016 के दूसरे सप्ताह की बात थी.

28 दिसंबर की शाम अनुराधा ने अंकित को फोन किया, ‘‘आज तुम आ कर अपना काम कर सकते हो.’’

‘‘ठीक है, मैं समय पर पहुंच जाऊंगा.’’ कह कर अंकित ने फोन काट दिया. इस के बाद वह अपने दोस्त टीनू को ले कर तकरीबन 9 बजे अनुराधा के घर पहुंचा. अनुराधा ने वादे की मुताबिक घर का दरवाजा खुला रखा था. अमन उस वक्त अपने कमरे में था और सोने की तैयारी कर रहा था. तीनों कमरे में दाखिल हुए तो अंकित को वहां देख कर अमन का खून खौल उठा. वह चिल्लाया, ‘‘तुम यहां क्यों आए हो?’’

‘‘अनुराधा से मिलने और तुम्हें जिंदगी से छुटकारा दिलाने.’’ अंकित ने घूरते हुए कहा.

‘‘तेरी इतनी हिम्मत?’’ अमन गुस्से में खड़ा हो गया. वह कुछ कर पाता, उस के पहले ही तीनों उस पर बाज की तरह झपट पड़े. अमन जमीन पर गिर पड़ा. अंकित उस के सीने पर सवार हो गया तो अनुराधा ने उस के हाथों को पकड़ लिया. टीनू ने पैर पकड़ लिए. अमन ने बचाव के लिए संघर्ष करते हुए चिल्लाने की कोशिश की तो अनुराधा ने उस के मुंह को तकिए से दबा दिया, जिस से उस की आवाज दब कर रह गई, साथ ही दम भी घुटने लगा.

तभी अंकित ने वहां पड़ा डंडा उठा कर उस के गले पर रख कर पूरी ताकत से दबा दिया. अमन छटपटाया, लेकिन उस पर किसी को दया नहीं आई. कुछ देर में अमन की सांसों की डोर टूट गई. अपने ही सिंदूर को मिटाने में अनुराधा को जरा भी हिचक नहीं हुई. हत्या के बाद उन्होंने शव ठिकाने लगाने की सोची. अंकित और टीनू ने अमन की ही मोटरसाइकिल ली और कंबल ओढ़ा कर लाश को मोटरसाइकिल से ले जा कर पुलिया के नीचे डाल दिया. इस के बाद मोटरसाइकिल स्टेशन पर लावारिस खड़ी कर के दोनों ट्रेन से नागल तक और फिर वहां से अपने अपने घर चले गए. इस के बाद अनुराधा ने अमन के लापता होने की बात उस के घर वालों को बताई और लाश मिलने पर खूब नौटंकी भी की, लेकिन आखिर उस की पोल खुल ही गई. आरोपियों की निशानदेही पर पुलिस ने हत्या में प्रयुक्त डंडा भी बरामद कर लिया था.

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एसपी संजय सिंह ने प्रेसवार्ता कर के हत्याकांड का खुलासा किया. इस के बाद सभी को न्यायालय में पेश किया गया, जहां से उन्हें 14 दिनों की न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

अनुराधा ने अपने बहकते कदमों को संभाल कर घरगृहस्थी पर ध्यान दिया होता तो ऐसी नौबत कभी न आती. उस की करतूत से मासूम बच्चे भी मां बाप के प्यार से महरूम हो गए. कथा लिखे जाने तक किसी भी आरोपी की जमानत नहीं हो सकी थी.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

बहन की ईदी

बहन की ईदी : भाग 2

एकदूसरे के घर आतेजाते तसलीम और तौसीफ एकदूसरे को चाहने लगे. तसलीम खूबसूरत थी, तो तौसीफ भी कम सुंदर न था. वह कमाता भी था. इसलिए तसलीम भी तौसीफ को पसंद करने लगी थी.

घर आतेजाते तसलीम भी मुसकराते हुए तिरछी निगाहों से तौसीफ अहमद को निहारने लगी थी. एक अजीब सा आकर्षण दोनों को एकदूसरे की ओर खींचने लगा. लेकिन नजरें बेईमान थीं. वे एकदूसरे को ढूंढती थीं, निहारती भी थीं. लेकिन पकड़े जाने पर अनजान बनने का नाटक करती थीं.

धीरेधीरे स्थिति यह आ गई कि बिना एकदूजे को देखे चैन नहीं मिलता था. फिर भी व्यवहार ऐसा करते थे, जैसे उन्हें एकदूसरे से कोई मतलब नहीं.

छिपछिप कर देखने में ही दोनों एकदूसरे को हद से ज्यादा चाहने लगे. साथ ही बेहतर भविष्य बनाने के सपने भी संजोने लगे. मगर अपनेअपने दिल की बात कहने की हिम्मत दोनो में नहीं थी. तसलीम जहां नारी सुलभ लज्जा के कारण खामोश थी, तो वहीं तौसीफ अहमद यह सोच कर अपने प्यार का इजहार नहीं कर पा रहा था कि कहीं दिल की बात कहने पर तसलीम नाराज न हो जाए.

गुजरते वक्त के साथ दोनों की मूक मोहब्बत परवान चढ़ती गई. तसलीम तौसीफ को अपने दिल की बात कहने के लिए उतावली थी. नजरों ही नजरों में बात कर लेने से तौसीफ का मन नहीं भरता था. वह चाहता था कि तसलीम से अपने दिल की बात कह कर मोहब्बत का इजहार करे. लेकिन इस के लिए वह हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था.

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इश्क भला कब तक बेजुबान बना रह सकता था. आखिर तौसीफ के दिल ने उसे मजबूर कर ही दिया. उधर तसलीम का भी यही हाल था. वह सोच रही थी कि तौसीफ जब उस से मोहब्बत करता है तो जुबान पर क्यों नहीं ला पा रहा. कहीं ऐसा तो नहीं कि वह मुझे पसंद ही न करता हो.

एक रोज तसलीम किसी काम से चाची के घर गई तो वह घर पर नहीं थीं. तौसीफ ही घर में था. उस ने पूछा, ‘‘चाची नहीं दिख रही हैं. बाहर गई हैं क्या?’’

‘‘हां, वे घर का सामान खरीदने हटिया बाजार गई हैं.’’

‘‘ठीक है, मैं शाम को आ जाऊंगी.’’ कहते हुए तसलीम मुड़ी, तभी तौसीफ सामने आ गया, ‘‘तसलीम, कुछ देर ठहरो. मैं तुम से एक बात कहना चाहता हूं.’’ तौसीफ बोला

‘‘कहो, क्या कहना चाहते हो?’’ तसलीम थोड़ा लजातेशरमाते बोली.

‘‘पहले वादा करो कि मेरी बात सुन कर नाराज नहीं होगी.’’ तौसीफ ने आग्रह किया.

‘‘ठीक है, किया वादा, अब बोलो क्या बात है?’’

‘‘तसलीम, मुझे तुम से मोहब्बत हो गई है. तुम्हारे बगैर सब कुछ सूना सा लगता है. क्या तुम्हारे दिल में मेरे लिए कोई जगह है? अगर हो, तो मेरी मोहब्बत कबूल कर लो.’’

‘‘तौसीफ तुम नहीं जानते कि मैं तुम्हारे मुंह से ये अल्फाज सुनने को कितनी बेकरार थी. कितनी देर लगा दी तुम ने अपनी मोहब्बत जाहिर करने में. मैं तुम्हें कैसे यकीन दिलाऊं कि जितना प्यार मैं तुम से करती हूं, तुम शायद उस का आधा भी नहीं करते होगे. आई लव यू तौसीफ, आई लव यू वेरी मच.’’

इस तरह दोनों के बीच इजहारे मोहब्बत हो गया. इस के बाद तो जैसे उन की दुनिया ही बदल गई. दोनों एक साथ हाटबाजार जाने लगे, रमणीक स्थलों पर साथसाथ घूमने लगे. तौसीफ अहमद, तसलीम पर दिल खोल कर पैसा खर्च करने लगा.

वह जो भी डिमांड करती, तौसीफ उसे हंसीखुशी से पूरा करता. बातचीत करने के लिए उस ने उसे महंगा मोबाइल फोन भी खरीद कर दे दिया था. हालांकि पहले से उस के पास मोबाइल था.

एक दिन दोपहर बाद तौसीफ तसलीम के घर पहुंचा तो वह घर पर अकेली थी. अब्बू और भाई लोग दुकान पर थे. अम्मी घर का सामान खरीदने बाजार गई थी. अच्छा मौका देख तौसीफ ने तसलीम को अपनी बांहों में बांध कर उस की उन्मादी आंखों में झांका, तसलीम भी मना नहीं कर पाई.

तसलीम की मौन स्वीकृति मिलते ही तौसीफ बेकाबू हो गया. तसलीम भी नाजुक रिश्तों और सामाजिक मर्यादाओं को ताक पर रख कर उस की बांहों में झूल गई. तसलीम ने कोई विरोध नहीं किया तो तौसीफ आगे ही बढ़ता चला गया. फिर दोनों अलग हुए तो उन के चेहरे पर पूर्ण संतुष्टि के भाव थे.

दोनों एक बार पाप के कुंए में कूदे, तो फिर उन का उस से बाहर निकलने का मन नहीं हुआ.

गलत काम कितना भी छिपा कर किया जाए, एक न एक दिन उजागर हो ही जाता है. धीरेधीरे तौसीफ और तसलीम के अवैध संबंधों को ले कर पासपड़ोस में तरहतरह की चर्चाएं होने लगीं. जब इस बात की भनक तसलीम के भाई मोहम्मद जफर को लगी तो उस ने बहन को फटकार लगाई, साथ ही तौसीफ के साथ झगड़ा भी किया.

जफर ने बहन के बहकते कदमों की शिकायत अपने मातापिता से भी की. इस पर हाफिज मोहम्मद रईस तथा उस की बेगम वसीम बानो ने तसलीम को अपनी इज्जत का वास्ता दे कर समझाबुझा कर सही रास्ते पर लाने की बहुत कोशिश की, पर तसलीम के बहके कदम नहीं थमे.

घर वालों की नसीहतों का तसलीम पर कोई असर नहीं हुआ. वह तौसीफ से अपने संबंध उसी तरह बनाए रही. अलबत्ता पोल खुल जाने के डर से वे दोनों कुछ सावधान जरूर रहने लगे थे. उन दोनों को सब से ज्यादा डर मोहम्मद जफर से रहता था. वही दोनों की ताकझांक में लगा रहता था.

जिस दिन उसे पता चल जाता कि तौसीफ घर आया था, उस रोज वह तसलीम को खरीखोटी सुनाता तथा तौसीफ के साथ भी झगड़ा करता. उस ने उन दोनों को चेतावनी दे रखी थी कि जिस दिन वह दोनों को रंगेहाथ पकड़ लेगा उस दिन अनर्थ हो जाएगा.

मोहम्मद जफर की इस धमकी से तसलीम अपने भाई को अपने प्यार का रोड़ा समझने लगी थी, उस से मन ही मन नफरत करने लगी थी. तौसीफ अहमद भी मोहम्मद जफर को अपना दुश्मन समझने लगा था. वह भी अंदर ही अंदर उस से नफरत करने लगा था. जफर के कारण दोनों का मिलन नहीं हो पाता था. अत: दोनों के दिलों में नफरत की आग तीव्र होती गई.

मार्च 2020 में कोरोना महामारी का प्रकोप बढ़ा तो देश मे तालाबंदी हो गई. कानपुर शहर भी लौकडाउन हो गया. शहर का मुसलिम बाहुल्य क्षेत्र कुली बाजार हाट स्पौट घोषित कर दिया गया.

पुलिस ने गलियों को सील कर दिया, जिस से लोगों को घरों में कैद हो कर रहना पड़ा. इस का असर तसलीम और तौसीफ पर भी पड़ा. उन का मिलन पूरी तरह बंद हो गया. मिलन न होने से दोनों बेचैन रहने लगे. हालांकि मोबाइल फोन पर बतिया कर दोनों अपने दिल की लगी बुझा लेते थे.

25 मई, 2020 को ईद का त्यौहार था. प्रशासन ने सशर्त छूट दी थी. ईद का त्यौहार धूमधाम से तो नहीं मनाया जा रहा था, लेकिन घरों में लोग आजा रहे थे. तौसीफ भी ईद मिलन के बहाने तसलीम के घर पहुंचा. उस वक्त तसलीम घर में अकेली थी. उस के दोनों भाई पतंग उड़ाने चले गए थे. जबकि अम्मीअब्बू पड़ोस में ईद मिलन को गए थे.

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लगभग 2 महीने बाद आमनासामना हुआ तो दोनों एकदूसरे से लिपट गए. दोनों की आंखों में प्यार का सागर उमड़ पड़ा. इसी बीच तौसीफ की शारीरिक प्यास जाग उठी. उस ने सूना घर देख कर तसलीम से प्रणय निवेदन किया तो लजातेशरमाते तसलीम मान गई. इस के बाद दोनों बाथरूम जा पहुंचे और शारीरिक प्यास बुझाने लगे. हड़बड़ाहट में वे घर का मुख्य दरवाजा बंद करना भूल गए थे.

तसलीम और तौसीफ अभी बाथरूम में शारीरिक प्यास बुझा ही रहे थे कि तसलीम का भाई मोहम्मद जफर आ गया. उस ने दोनों को बाथरूम में आपत्तिजनक स्थिति में देख लिया. यह सब उस के लिए नाकाबिले बरदाश्त था. उस का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा. वह गालीगलौज करते हुए तौसीफ से भिड़ गया.

तसलीम और तौसीफ को लगा कि मोहम्मद जफर आज दोनों की पोल खोल देगा और झगड़ा भी करेगा. अत: दोनों ने एकदूसरे को इशारा किया और फिर तसलीम बकरा काटने वाली छुरी ले आई. उस ने छुरी तौसीफ को थमाई और बोली, ‘‘तौसीफ, आज इसे हलाल कर ही दो. जिंदा बच गया तो पोल खोल देगा और दोनों को बदनाम कर देगा.’’

बहन का यह रूप देख कर मोहम्मद जफर घबरा गया और जान बचा कर दरवाजे की ओर भागा. तभी सामने से तौसीफ का छोटा भाई सैफ आ गया. उस ने भाई के इशारे पर उसे पकड़ लिया. दोनों भाई उसे पकड़ कर बाथरूम ले आए और फर्श पर पटक दिया. सैफ ने पैर दबोचे और तसलीम ने उस के हाथ पकड़े. इस के बाद तौसीफ अहमद ने जफर की छाती पर सवार हो कर चाकू से उस का गला रेत दिया. जफर कुछ देर तड़प कर ठंडा हो गया.

हत्या करने के बाद तौसीफ व उस का भाई सैफ घर से भाग पाते, उस के पहले ही हाफिज मोहम्मद रईस व उन की पत्नी वसीम बानो आ गई. घर के अंदर बाथरूम में जवान बेटे की खून से रंगी लाश देख कर दोनों अवाक रह गए. वसीम बानो ने बेटी से पूछताछ की तो उस ने साफसाफ बता दिया कि जफर ने उसे तौसीफ के साथ रंगेहाथों पकड़ लिया था, हम ने उसे मार डाला.

यह सुनते ही दोनों ने माथा पीट लिया. वे सोचने लगे बेटा तो मर ही गया है. अब पुलिस से सच्चाई बयां की तो परिवार के 2 बेटों के साथ बेटी भी जेल चली जाएगी.

उन लोगों ने मोहम्मद जफर की हत्या को आत्महत्या का रूप देने के लिए जफर के शव को सबमर्सिबल पंप चला कर लाश को तब तक धोया जब तक गले के घाव से रिस रहा खून बंद नहीं हो गया. उस के बाद शव को दूसरे बाथरूम में रख दिया. सारे सबूतों को मिटाने के बाद हाफिज मोहम्मद रईस ने थाना अनवरगंज पुलिस को अवसाद के चलते बेटे जफर द्वारा आत्महत्या की सूचना दी.

पुलिस ने घर वालों की बात पर विश्वास कर शव को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पुलिस को हत्या का शक हुआ. दोबारा जांच शुरू की तो हत्या का परदाफाश हो गया और कातिल पकड़े गए.

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30 मई, 2020 को थाना अनवरगंज पुलिस ने अभियुक्त तौसीफ अहमद, सैफ, हाफिज मोहम्मद रईस, वसीम बानो तथा तसलीम को कानपुर कोर्ट में पेश किया. जहां से उन्हें जिला जेल भेज दिया गया.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

एक मुलाकात ऐसी भी: भाग 1

लेखिका- रेनू ‘अंशुल’

मौल में पहुंचे ही थे कि मिशिका को उस के फें्रड्स सामने दिख गए और वह मुझे तेजी से बायबाय कह कर उन के साथ हो ली. वह नोएडा के एमिटी कालिज से इंजीनियरिंग कर रही है. उस के सभी मित्रों को अच्छी कैंपस प्लेसमेंट मिल गई थी सो इसी खुशी में उस के ग्रुप के सभी साथी यहां पिज्जा हट में खुशियां मना रहे थे.

नोएडा का यह मशहूर जीआईपी यानी ‘गे्रट इंडिया प्लेस’ मौल युवाओं का पसंदीदा स्थान है. हम गाजियाबाद में रहते हैं. मिशिका अकेले ही रोज गाजियाबाद से कालिज आती है मगर इस तरह पार्टी आदि में जाना हो तो मैं या उस के पापा साथ आते हैं. यों अकेले तैयार हो कर बेटी को घूमनेफिरने जाने देने की हिम्मत नहीं होती. एक तो उस के पापा का जिला जज होना, पता नहीं कितने दुश्मन, कितने दोस्त, दूसरे आएदिन होने वाले हादसे, मैं तो डरी सी ही रहती हूं. क्या करूं? आखिर मां हूं न…

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बच्चे अपने मातापिता की भावनाओं को कहां समझ पाते हैं. उन्हें तो यही लगता है कि हम उन की आजादी पर रोक लगा रहे हैं. कई बार मिशिका भी बड़ी हाइपर हुई है इस बात को ले कर कि ममा, आप ने तो मुझे अभी तक बिलकुल बच्चा बना कर रखा है. अब मैं बड़ी हो गई हूं. अपना ध्यान रख सकती हूं. अब उस नादान को क्या समझाएं कि मातापिता के लिए तो बच्चे हमेशा बच्चे ही रहते हैं. चाहे वे कितने भी बड़े क्यों न हो जाएं.

हां, मेरी तरह शायद जज साहब से वह इतना कुछ नहीं कह पाती. उन की लाडली, सिर चढ़ी जो है. जो बात मनवानी होती है, मनवा ही लेती है. बात तो शायद मैं भी उस की मान ही लेती हूं लेकिन उसे बहुत कुछ समझाबुझा कर, जिस से वह मुझ से खीझ सी जाती है.

अब क्या करूं, जब मुझे इस तरह के आधुनिक तौरतरीके पसंद नहीं आते तो. मैं तो हर बार इसे ही तरजीह देती हूं कि वह अपने पापा के संग ही आए. दोनों बापबेटी के शौकमिजाज एक से हैं. कितनी ही देर मौल में घुमवा लो, दोनों में से कोई पहल नहीं करता घर चलने की. मैं भी कभीकभी बस फंस ही जाती हूं. जैसे आज वह नहीं वक्त निकाल पाए. कोर्ट में कुछ जरूरी काम था.

मैं थोड़ी देर तक यों ही एक दुकान से दूसरी दुकान में टहलती रही. खरीदारी तो वैसे भी मुझे कुछ यहां करनी नहीं होती है. वह तो मैं हमेशा अपने शहर की कुछ चुनिंदा दुकानों से ही करती हूं. सरकारी गाड़ी में अर्दलियों और सिपाहियों के संग रौब से जाओ और बस, रौब से वापस आ जाओ. सामान में कोई कमी हो तो चाहे महीने भर बाद दुकान पर पटक आओ. यहां मौल में, इतनी भीड़ में किस को किस की परवा है, कौन पहचान रहा है कि जज की बीवी शौपिंग कर रही है या कोई और. शायद इतने सालों से इसी माहौल की आदी हो गई हूं और कुछ अच्छा ही नहीं लगता.

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खैर समय तो गुजारना ही था. यों ही बेमतलब घूमते रहने से थकान सी भी होने लगी थी. घड़ी पर नजर डाली तो बस, आधा घंटा ही बीता था. सोचतेविचरते मैं मैकडोनाल्ड की तरफ आ गई. कार्य दिवस होने के बावजूद वहां इतनी भीड़ थी कि बस, लगा कालिज बंक कर के सब बच्चे यहीं आ गए हों. माहौल को देख कर मिशिका का खयाल फिर दिलोदिमाग पर छा गया कि पता नहीं, यह क्या मौलवौल में पार्टी करने का प्रचलन हो गया है. अरे, तसल्ली से घर में मित्रों को बुलाओ, खूब खिलाओपिलाओ, मौजमस्ती करो, कोई मनाही थोड़े ही है.

थोड़ी देर में ही सही, मेरा भी कौफी का नंबर आ ही गया था. कौफी और फ्रेंचफ्राइज ले कर भीड़ से बचतेबचाते मैं एक खाली सीट पर जा कर बैठ गई और अपने चारों तरफ देखती कौफी का सिप भरती जा रही थी.

तभी मेरे पास एक बड़ी स्मार्ट सी महिला आईं और खाली पड़ी सीट की ओर इशारा कर बोलीं, ‘‘क्या मैं यहां बैठ सकती हूं?’’

‘‘हांहां. क्यों नहीं…आप चाहें तो यहां बैठ सकती हैं,’’ इतना कहने के साथ ही मेरी इधरउधर की सोच पर वर्तमान ने बे्रक लगा दिया.

मैं उस संभ्रांत महिला को कौफी पीतेपीते देखती रही. उस ने कांजीवरम की भारी सी साड़ी पहन रखी थी. उसी से मेल खाता खूबसूरत सा कोई नैकलेस डाल रखा था. पर्स भी उस के हाथ में बहुत सुंदर सा था. कुल मिला कर वह हाइसोसाइटी की दिख रही थी.

मुझ से रहा नहीं गया. अटपटा सा लग रहा था कि उस के सामने मैं फे्रंचफ्राइज का मजा अकेले ही ले रही थी और वह सिर्फ कौफी ले कर बैठी थी. संकोच छोड़ मैं ने अपने चिप्स उस की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘अकेले ही शौपिंग हो रही है…’’

अपने होंठों पर हलकी सी हंसी ला कर वह बोलीं, ‘‘शौपिंग नहीं, आज तो अपने बेटे के संग आई हूं. दरअसल, आज बच्चों की गेटटूगेदर है. मेरे पति रिटायर्ड आई.ए.एस. हैं. यहीं सेक्टर 30 में हमारा छोटा सा घर है. पति तो अपनी ताशमंडली में व्यस्त रहते हैं और मैं बस, कभी क्लब, कभी किटी और कभी समाज- सेवा…रिटायर होने के बाद कहीं न कहीं तो अपने को व्यस्त रखना ही पड़ता है न.’’

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‘‘आज मेरा छोटा बेटा समर्थ बोला कि ममा, मेरे संग मौल चलिए, आप को अच्छा लगेगा. सो आज यहां का कार्यक्रम बना लिया,’’ उस ने दोचार फ्रेंचफ्राइज बिना किसी झिझक के उठाते हुए बताया.

हम समझ गए थे कि हमारे बच्चे एक ही ग्रुप में हैं. थोड़ी देर में ही हम सहज हो क र बातें करने लगे. कुछ अपने परिवार के बारे में वह बता रही थीं और कुछ मैं. बीचबीच में हम खानेपीने की चीजें भी मंगाते जा रहे थे. अब किसी के संग रहने से अच्छा लगने लगा था. बातोंबातों में ही पता चला कि उन के 2 बेटे थे. छोटा समर्थ, मिशिका के संग पढ़ रहा था और बड़ा पार्थ इंजीनियरिंग के बाद पिछले साल सिविल सर्विस में सिलेक्ट हो गया था. इस समय लाल बहादुर शास्त्री एकेडमी, मसूरी में उस की टे्रनिंग चल रही थी.

मैं ने सोचा कि बापबेटा दोनों आईएएस. शुरू में ही मुझे लग गया था कि मेरी तरह यह महिला कोई ऊंची हस्ती है.

उन का बेटा आईएएस है और जल्दी ही वह उस की शादी करने की इच्छुक हैं, यह जान कर तो मेरी रुचि उन में और भी बढ़ गई. मैं तो खुद मिशिका के लिए अच्छा वर ढूंढ़ने की कोशिश में थी और एक आईएएस लड़के को अपना दामाद बनाना तो जैसे मेरे ख्वाबों में ही था.

पार्थ के बारे में जान कर मुझे सबकुछ अच्छा लगा था, लेकिन एक अड़चन थी कि वे कायस्थ थे, हमारी तरह ब्राह्मण नहीं थे जो मेरे लिए तो जमीं और आसमान को मिलाने वाली बात थी. अपनी इकलौती बेटी की गैर जाति में शादी करना मेरी सोच में कहीं दूरदूर तक नहीं था. एक तरह से तो मैं इस तरह के विवाह के बिलकुल खिलाफ थी.

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जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

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