उस दिन मार्च, 2020 की 17 तारीख थी. शाम के 4 बजे थे. मकान मालकिन पुष्पा किचन में चाय बनाने जा रही थी. तभी किसी ने डोरबैल बजाई. पुष्पा ने दरवाजा खोला तो दरवाजे पर 2 महिलाएं खड़ी थीं. उन में एक जवान थी, जबकि दूसरी अधेड़ उम्र की थी. पुष्पा ने अजनबी महिलाओं को देख कर परिचय पूछा तो उन्होंने कोई जवाब न दे कर पर्स से एक फोटो निकाली और पुष्पा को दिखाते हुए पूछा, ‘‘क्या यह आप के मकान में रहता है?’’
पुष्पा ने फोटो गौर से देखी फिर बोली, ‘‘हां, यह तो आशीष है. अपनी पत्नी सोना के साथ पिछले 6 महीने से हमारे मकान में रह रहा है. उस की पत्नी सोना कहीं बाहर काम करती है. इसलिए सप्ताह में 2-3 दिन ही आ पाती है. आज वह 12 बजे घर आई थी. आशीष भी घर पर था, लेकिन आधा घंटा पहले कहीं चला गया है.’’
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मकान मालकिन पुष्पा से पूछताछ करने के बाद दोनों महिलाएं वापस चली गईं. दरअसल, ये महिलाएं गीता और उन की बहू ज्योति थीं, जो सरायमीता पनकी, कानपुर की रहने वाली थीं. सोना गीता की बेटी थी और आशीष सोना का प्रेमी था.
आशीष ने कुछ देर पहले ज्योति के मोबाइल पर काल कर के जानकारी दी थी कि उस ने उस की ननद सोना को मार डाला है और उस की लाश दबौली निवासी पुष्पा के मकान में किराए वाले कमरे में पड़ी है, आ कर लाश ले जाओ. ज्योति ने यह बात अपनी सास गीता को बताई. फिर सासबहू जानकारी लेने के लिए पुष्पा के मकान पर पहुंची, लेकिन वहां हत्या जैसी कोई हलचल न होने से दोनों वापस लौट आई थीं.
चाय पीतेपीते पुष्पा के मन में आशीष को ले कर कुछ शंका हुई तो वह पहली मंजिल स्थित उस के कमरे पर पहुंची. कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद थी और अंदर से खून बह कर बाहर की ओर आ रहा था.
खून देख कर पुष्पा चीख पड़ी. मालकिन की चीख सुन कर अन्य किराएदार कमल, सुनील, टिंकू तथा शिवानंद आ गए. इस के बाद पुष्पा ने कमरे का दरवाजा खोल कर अंदर झांका तो उन की आंखें फटी रह गईं.
कमरे में फर्श पर खून से लथपथ सोना की लाश पड़ी थी. लाश से खून रिस कर कमरे के बाहर तक आ गया था. सोना की लाश देख कर किराएदार भी भयभीत हो उठे. इस के बाद तो हत्या की खबर थोड़ी देर में पूरे दबौली (उत्तर) में फैल गई. लोग पुष्पा के मकान के बाहर जुटने लगे.
शाम लगभग 5 बजे पुष्पा ने थाना गोविंद नगर फोन कर के किराएदार आशीष की पत्नी सोना की हत्या की जानकारी दे दी. हत्या की सूचना मिलते ही थानाप्रभारी अनुराग सिंह ने इस घटना से अधिकारियों को अवगत कराया और पुलिस टीम के साथ दबौली (उत्तर) स्थित पुष्पा के मकान पर जा पहुंचे.
मकान के बाहर भीड़ जुटी थी. लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. भीड़ को पीछे हटा कर थानाप्रभारी अनुराग सिंह पुलिस टीम के साथ मकान की पहली मंजिल स्थित उस कमरे में पहुंचे जहां लाश पड़ी थी.
सोना की हत्या बड़ी निर्दयता से की गई थी. लाश के पास ही खून से सनी कैंची तथा मोबाइल पड़ा था. देखने से लग रहा था कि हत्या के पहले मृतका से जोरजबरदस्ती की गई थी. विरोध करने पर उस के पति आशीष ने कैंची से वार कर उस की हत्या कर दी थी. न केवल सोना के पेट में कैंची घोंपी गई थी, बल्कि उस के गले को भी कैंची से छेदा गया था.
थानाप्रभारी अनुराग सिंह अभी घटनास्थल का निरीक्षण कर ही रहे थे कि एसएसपी अनंत देव, एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता और सीओ (गोविंद नगर) मनोज कुमार गुप्ता भी वहां आ गए. अधिकारियों ने मौके पर फोरैंसिक टीम को भी बुला लिया था.
पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया और इंसपेक्टर अनुराग सिंह से घटना के संबंध में जानकारी हासिल की. फोरैंसिक टीम ने निरीक्षण कर घटनास्थल से साक्ष्य जुटाए. कैंची, दरवाजा और मेज पर रखे गिलास से फिंगरप्रिंट उठाए. जमीन पर फैले खून का नमूना भी जांच हेतु लिया गया.
निरीक्षण के दौरान सीओ मनोज कुमार गुप्ता की नजर मेज पर रखे लेडीज पर्स पर पड़ी. उन्होंने पर्स की तलाशी ली तो उस में साजशृंगार का सामान, कुछ रुपए तथा एक आधार कार्ड मिला. आधार कार्ड में युवती का नाम सोना सोनकर, पिता का नाम मुन्ना लाल सोनकर, निवासी सराय मीता, पनकी कानपुर दर्ज था. गुप्ताजी ने 2 सिपाहियों को आधार कार्ड में दर्ज पते पर सूचना देने के लिए भेज दिया.
एसपी (साउथ) अपर्णा गुप्ता ने मकान मालकिन पुष्पा देवी से पूछताछ की तो उस ने बताया कि उस के पति देवकीनंदन की मृत्यु हो चुकी है. 2 बेटे हैं, अजय व राकेश, जो बाहर नौकरी करते हैं. मकान के भूतल पर वह स्वयं रहती है, जबकि पहली मंजिल पर बने कमरों को किराए पर उठा रखा है.
मकान में 4 किराएदार शिवानंद, कमल, सुनील व टिंकू पहले से रह रहे थे. 6 महीना पहले आशीष नाम का युवक एक युवती के साथ किराए पर कमरा लेने आया था.
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उस ने उस युवती को अपनी पत्नी बताया, साथ ही यह भी बताया कि उस की पत्नी सोना दूरदराज नौकरी करती है. वह सप्ताह में 2 या 3 दिन ही आया करेगी. मैं ने उसे रूम का किराया 1600 रुपए बताया तो वह राजी हो गया और किराएदार के रूप में रहने लगा. उस की पत्नी सोना सप्ताह में 2 या 3 दिन आती थी.
पुष्पा ने बताया कि आज 12 बजे सोना आशीष से मिलने आई थी. उस के बाद कमरे में क्या हुआ, उसे मालूम नहीं. आशीष 3 बजे चला गया था. उस के जाने के बाद 2 महिलाएं उस के बारे में पूछताछ करने आईं. लेकिन आशीष रूम में नहीं था, यह जान कर वे दोनों चली गईं. महिलाओं की बातों से मुझे कुछ शक हुआ, तो मैं आशीष के रूम पर गई. वहां कमरे के बाहर खून देख कर मैं चीखी तो बाकी किराएदार आ गए. उस के बाद मैं ने यह सूचना पुलिस को दे दी.
घटनास्थल पर अन्य किराएदार कमल, सुनील, टिंकू व शिवानंद भी मौजूद थे. सीओ मनोज कुमार गुप्ता ने उन से पूछताछ की तो उन सब ने बताया कि आशीष ने उन से सोना को अपनी पत्नी बताया था. वह हफ्ते में 2-3 बार आती थी. कमरा बंद कर दोनों खूब हंसतेबतियाते थे, कभीकभी उन दोनों में तूतूमैंमैं भी हो जाती थी.
आज सोना 12 बजे आई थी. बंद कमरे में दोनों का झगड़ा हो रहा था. तेज आवाजें आ रही थीं. लेकिन हम लोगों ने ध्यान नहीं दिया. घटना की जानकारी तब हुई, जब मकान मालकिन चीखी.
किराएदारों से पूछताछ में एक किराएदार कमल ने बताया कि आशीष ने एक बार बताया था कि वह कानपुर के गजनेर का रहने वाला है.
सीओ मनोज कुमार गुप्ता अभी किराएदारों से पूछताछ कर ही रहे थे कि मृतका सोना की मां गीता, बहन बरखा, निशू, भाभी ज्योति तथा भाई विक्की, सूरज, सनी और पीयूष आ गए. सोना का शव देख सभी दहाड़ मार कर रोने लगे. किसी तरह पुलिस अधिकारियों ने उन्हें शव से अलग किया और फिर पूछताछ की.
एसपी अपर्णा गुप्ता को मृतका की मां गीता ने बताया कि 3 साल पहले उन की बेटी सोना की आशीष से दोस्ती हो गई थी. दोनों एक ही फैक्ट्री में काम करते थे. जब उसे दोनों की दोस्ती की बात पता चली तो उस ने सोना का विवाह कर दिया. लेकिन सोना की अपने पति व ससुरालियों से नहीं पटी, वह मायके आ कर रहने लगी. अपने खर्चे के लिए उस ने गोविंद नगर स्थित एक स्कूल में नौकरी कर ली.
इस बीच आशीष ने सोना को फिर अपने प्रेम जाल में फंसा लिया और वह उसे अपने कमरे पर बुलाने लगा. कभीकभी वह घर भी आ जाता था. हम सब उसे अच्छी तरह जानते थे. पिछले कुछ दिनों से वह सोना पर शादी करने का दबाव डाल रहा था, लेकिन सोना शादी को राजी नहीं थी. आज भी आशीष ने सोना को अपने रूम में बुलाया और शादी का दबाव डाला. उस के न मानने पर आशीष ने जोरजबरदस्ती की और बेटी को मार डाला.
सोना को मौत की नींद सुलाने के बाद आशीष ने मेरी बहू ज्योति के मोबाइल पर हत्या की सूचना दी कि आ कर लाश ले जाओ. तब उस के सभी बेटे काम पर गए थे. वह बहू ज्योति को साथ ले कर दबौली आई और मकान मालकिन पुष्पा से मिली. लेकिन पुष्पा ने यह कह कर लौटा दिया कि आशीष अभी घर पर नहीं है. पुष्पा अगर हमें आशीष के कमरे तक जाने देती तो शायद उस की बेटी की जान बच जाती.
पूछताछ के बाद एसपी अपर्णा गुप्ता ने थानाप्रभारी अनुराग सिंह को आदेश दिया कि वह मृतका के शव को पोस्टमार्टम के लिए भेजे और रिपोर्ट दर्ज कर के कातिल आशीष को गिरफ्तार करें. उस की गिरफ्तारी के लिए उन्होंने सीओ मनोज कुमार गुप्ता के निर्देशन में एक पुलिस टीम भी गठित कर दी.
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पुलिस अधिकारियों के आदेश पर थानाप्रभारी अनुराग सिंह ने घटनास्थल से बरामद खून सनी कैंची, सोना का मोबाइल फोन और पर्स आदि चीजें जाब्ते की काररवाई में शामिल कर लीं. इस के बाद मृतका के शव को पोस्टमार्टम के लिए लाला लाजपतराय अस्पताल भेज दिया गया. थाने लौट कर अनुराग सिंह ने मृतका के भाई सूरज की तहरीर पर धारा 302 आईपीसी के तहत आशीष के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कर लिया.
बचपन की एकएक कर उभर रही तमाम घटनाओं ने विशाल के दिलोदिमाग पर बहुत ही गहरा असर छोड़ा था. यही वजह थी कि जब कभी भी वह किसी मर्द को औरत के ऊपर हाथ उठाते हुए देखता था तो उस की रगों में बहता जवान खून खौल जाता था.
बचपन में विशाल ने अपनी मां पर होने वाले बाप के जुल्मों को देखा था और यह उसी का नतीजा था.
विशाल का बाप शराबी था. वह शाम को शराब पी कर ही घर आता था. मां घर के राशनपानी के लिए पैसे मांगती थीं तो बाप गालियां बकने लगता था, पीटने लगता था.
मां को शराबी बाप की पिटाई से बचाने की कोशिश में विशाल कई बार बाप की टांगों से लिपट जाता था. इस पर शराबी बाप उसे दोनों हाथों से उठा कर चारपाई पर पटक देता था.
विशाल को एक ऐसे माहौल में रहने को मजबूर होना पड़ रहा था जहां मर्दों द्वारा औरतों से गालीगलौज और मारपीट करना एक मामूली बात थी.
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विशाल के बाप को उस की शराब ही ले डूबी थी. मां भी बहुत ज्यादा दिन जिंदा नहीं रही थीं पर मरने से पहले उन्होंने विशाल को इतना काबिल बना दिया था कि वह दो वक्त की रोटी कमा सके.
पेट पालने के लिए विशाल को कोई ढंग का रोजगार चाहिए था. लिहाजा, गांव को छोड़ वह कामधंधे की तलाश में शहर आ गया था. गांव वाला मकान बेच कर विशाल को इतने पैसे मिल गए थे कि शहर में कामधंधे की तलाश करते हुए वह कुछ दिन अपना गुजारा कर सके.
शहर में विशाल को रहने के लिए जहां किराए की जगह मिली वह एक झुग्गी बस्ती थी. वहां लड़ाईझगड़ा होना आम बात थी. इलाके में रहने वाले ज्यादातर लोग मेहनतमजदूरी कर के पेट पालते थे. सारा दिन मजदूरी कर के पैसे कमाना और रात को शराब पी कर गालीगलौज और लड़ाईझगड़ा करना वहां के तकरीबन सभी मर्दों की आदत थी.
विशाल को रहने के लिए किराए की जो जगह मिली थी, उस का मालिक रघुनाथ नाम का शख्स था. लोग उसे रघु कह कर पुकारते थे. रघु की उम्र 45 साल थी. वह किराए का आटोरिकशा चलाता था और पक्का शराबी था.
रघु ने अपने मकान का आगे वाला हिस्सा विशाल को किराए पर दिया था. वह कमरा अकेली जान के लिए काफी था. रघु मकान के पिछले वाले हिस्से में रहता था.
मकान के अगले और पिछले वाले हिस्से के बीच में एक आंगन था. आंगन में एक तरफ गुसलखाना और शौचालय बना हुआ था. वहां से कुछ ही दूरी पर पानी का सरकारी नल लगा हुआ था. सुबहशाम उस में एक घंटे के लिए पानी आता था.
रघु की बेहद खूबसूरत और जवान बीवी थी जो उम्र में उस से आधे से भी कम की लगती थी.
रघु की बीवी ने विशाल की जिंदगी में जबरदस्त हलचल पैदा कर दी थी. रघु की जवान बीवी से विशाल का सीधा आमनासामना किराए की जगह पर आने के 2 दिन बाद उस वक्त हुआ था जब वह सुबह आंगन में लगे हुए नल में से पानी की बालटी भर रहा था. ठीक उसी समय खाली बालटी हाथ में लिए अपने कमरे से बाहर निकल रघु की बीवी भी नल की तरफ आ गई.
वह अभीअभी नींद से जगी लगती थी. उस के बेहिसाब हुस्न और जवानी की दमक किसी बिजली की तरह विशाल के दिल पर गिरी. वह कुछ पल के लिए बुत बन कर रह गया. एकदम से गोरा रंग, तीखे नाकनक्श, खूब भराभरा सा बदन विशाल की रगों में बहता लहू उबलने लगा.
किसी तरह अपनी हालत को काबू में करते हुए विशाल ने अपनी बालटी को नल के नीचे से हटा दिया ताकि वह पहले पानी भर सके.
विशाल के बालटी हटाने पर उस ने अपनी खाली बालटी नल के नीचे रख दी और उस के भरने का इंतजार करने लगी. इस बात का फायदा उठाते हुए विशाल उस के रूप और जोबन का रसपान करता रहा.
बालटी जब लबालब भर गई तो वह झुक कर उस को उठाने लगी. वह दुपट्टा नहीं लिए थी इसलिए जब वह पानी से भरी बालटी उठाने के लिए झुकी तो कसे हुए सूट में से उस के उभारों की झलक विशाल पर जैसे सैकड़ों बिजलियां गिरा गईं.
विशाल को उस के चेहरे के भावों से लगा कि बालटी को उठा कर अपने कमरे तक ले जाने में उसे काफी दिक्कत महसूस हो रही थी. उस ने कहा, ‘‘लाइए, मैं छोड़ आता हूं.’’
उस ने इनकार नहीं किया. एक नजर विशाल को देखते हुए उस ने पानी से भरी हुई बालटी विशाल के बढ़े हाथ में थमा दी.
बालटी थामते वक्त विशाल का हाथ उस के हाथ से छू गया. विशाल की रगों में एक सनसनाहट सी फैल गई.
पानी से भरी बालटी उस के कमरे तक पहुंचा कर जब विशाल वापस जाने को हुआ तो वह एकाएक बोली, ‘‘तुम ही शायद नए किराएदार हो. मैं अभी तक तुम्हारा नाम भी नहीं जानती.’’
‘‘विशाल नाम है मेरा.’’
‘‘अच्छा नाम है. शादीशुदा हो?’’
‘‘शादी तो अभी बाद की बात है, फिलहाल तो मैं नौकरी ढूंढ़ रहा हूं,’’ विशाल ने कहा.
‘‘शराब पीते हो?’’ उस ने अटपटा सा सवाल पूछा.
‘‘नहीं, मुझे शराब से नफरत है,’’ विशाल ने जवाब दिया. पहली बार की मुलाकात में ही उस के इतने सवालों से विशाल हैरान था.
‘‘अच्छी बात है. कम से कम शादी के बाद तुम्हारी बीवी को पीटना तो नहीं पड़ेगा,’’ तारा ने ठहाका मार कर हंसते हुए कहा.
विशाल से बातचीत को खत्म करने से पहले रघु की बीवी एक बहाने से उसे अपना नाम बताना नहीं भूली, ‘‘हम दोनों की उम्र में इतना फासला नहीं है कि तुम मुझे आप कह कर बुलाओ. मेरा नाम तारा है. तुम मुझ को मेरा नाम ले कर भी बुला सकते हो,’’ इतना कहने के बाद वह पानी की बालटी उठा कर कमरे के अंदर चली गई.
इस के बाद तैयार हो कर विशाल काम की तलाश में घर से निकला तो उस के खयालों में तारा छाई हुई थी. तारा एक शादीशुदा औरत थी. उस के लिए जैसी भावनाएं विशाल के मन में जन्म ले रही थीं वे एक तरह से गलत थीं. मगर अपनी इन गलत भावनाओं पर विशाल का कोई कंट्रोल नहीं था.
नौकरी तो नहीं मिली, पर बाहर ढाबे पर खाना खा कर घर आने में विशाल को देरी हो गई.
घर का दरवाजा खुला हुआ था. अंदर दाखिल होने के बाद अपने कमरे का ताला खोलने से पहले विशाल ने एक सरसरी नजर आंगन के दूसरी तरफ डाली. वहां कमरे की लाइट जल रही थी और बरतनों की हलकी खनक भी सुनाई दे रही थी.
मकान के बाहर रघु का आटोरिकशा नहीं खड़ा था. इस का मतलब था कि वह अभी घर नहीं आया था.
विशाल में एक अजीब सी बेचैनी भर गई. उसे डर लगने लगा कि खयालों के भटकाव में उस से कहीं कुछ गलत न हो जाए. लिहाजा विशाल अपने कमरे में आया और अंदर से कुंडी लगा ली.
इस के बाद विशाल चारपाई पर लेट तो गया, मगर नींद उस की आंखों से कोसों दूर थी. न चाहते हुए भी उस का खयाल बारबार तारा की तरफ ही जा रहा था. नींद विशाल की आंखों से आंखमिचौली खेलती रही. उस रात वह हुआ जिस में एक बार फिर से विशाल में सालों पहले वाले हालात में ला कर खड़ा कर दिया.
उस रात रघु ज्यादा शराब पी कर घर आया था. ज्यादा कमाई होने पर शायद वह ज्यादा शराब पी लेता था.
विशाल ने आटोरिकशा के आने की आवाज सुनी. कुछ देर बाद मकान का दरवाजा भी जोरदार आवाज के साथ बंद हुआ.
विशाल को डर था कि रघु के ज्यादा पी कर आने के नतीजे में कुछ न कुछ अनहोनी होगी.
विशाल का डर गलत नहीं निकला. रात की खामोशी को चीरते हुए पहले ऊंची आवाज में रघु और तारा के बीच तीखी कहासुनी की आवाजें सुनाई दीं. इस के बाद एकाएक ही कहासुनी भारी गालीगलौज और मारपीट में बदल गई. तारा के दर्द से चीखनेचिल्लाने की आवाजें आने लगीं. साफ था कि रघु उसे पीट रहा था.
विशाल बेचैन हो बिस्तर से उठ बैठा. उस का खून खौल रहा था. बाजुओं की नसें फड़क रही थीं पर वह अपनी बेबसी पर छटपटाता रहा.
सवाल यह था कि वह कैसे और किस हैसियत से पतिपत्नी के मामले में दखल दे सकता था. समाज इस की इजाजत नहीं देता था.
रात के अनुभव से सुबह विशाल का मन खिन्न था. आंखें भी न सोने की वजह से भारी थीं इसलिए नौकरी की तलाश में घर से बाहर निकलने का इरादा उस ने छोड़ दिया.
रात को कसाई की तरह अपनी बीवी को पीटने वाला रघु अपने ठीक समय पर आटोरिकशा ले कर कामधंधे के लिए निकल गया.
विशाल दरवाजा खोल कर अपने कमरे से बाहर आ गया. उस की नजरें आंगन के दूसरी तरफ गईं. वहां कोई दिखाई नहीं दिया.
विशाल कुछ पल कशमकश वाली हालत में रहा और फिर उस के कदम अपनेआप आंगन के दूसरी तरफ जाने के लिए उठ गए.
विशाल को देख कर तारा चौंक गई. बीती रात हुई मारपीट के निशान उस के चेहरे पर साफ देखे जा सकते थे. उस की बाईं आंख के नीचे और ऊपरी होंठ पर सूजन नजर आ रही थी. बाकी जिस्म पर भी मारपीट के निशान जरूर रहे होंगे जो विशाल देख नहीं सकता था.
विशाल खुद को रोक नहीं सका और गुस्से का इजहार करते हुए बोला, ‘‘तुम्हारा मर्द इनसान है या जानवर. कोई अपनी औरत को इस तरह से पीटता है भला?’’
‘‘तो कैसे पीटता है?’’ तारा ने सवाल किया.
तारा के सवाल का जवाब विशाल को नहीं सूझा और वह बगलें झांकने लगा.
यह देख तारा अजीब तरीके से हंस दी और बोली, ‘‘तुम अभी इस बस्ती में नएनए आए हो इसलिए अजीब लगता होगा. मगर इस बस्ती में सभी मर्द अपनी औरतों को ऐसे ही पीटते हैं. तुम को यहां रहना है तो यह सब देखने की आदत डालनी होगी.’’
‘‘शायद तुम ने भी अपने मर्द के हाथों इस तरह से पिटने की आदत डाल ली है?’’ विशाल ने चुभती हुई आवाज में कहा.
‘‘इस के सिवा मैं कर भी क्या सकती हूं?’’
‘‘ऐसे जानवर को छोड़ क्यों नहीं देतीं?’’
‘‘छोड़ कर मैं कहां ठिकाना करूं? मांबाप ने बेचा था तो इस जानवर के पल्ले पड़ गई. अब इसे छोड़ कर क्या मैं किसी कोठे पर जा कर बैठ जाऊं?’’ तारा का लहजा बड़ा तल्ख था.
‘‘इस तरह की बातें पागलपन हैं. जिंदगी जीने के और भी रास्ते हैं,’’ विशाल ने कहा.
‘‘हमदर्दी जताते के लिए शुक्रिया. बिना किसी मर्द के समाज में एक अकेली और बेसहारा औरत की जिंदगी खुले मैदान में पड़े मांस के टुकड़े से ज्यादा नहीं होती, जिस को हर कोई नोचना चाहेगा.’’
‘‘तुम किसी दूसरे मर्द का हाथ भी तो थाम सकती हो?’’
‘‘जबरदस्ती…? जब तक कोई मेरा हाथ मांगने के लिए अपना हाथ आगे नहीं करेगा तब तक मैं उस का हाथ कैसे मांग सकती हूं? असली जिंदगी और बातों में बड़ा फर्क होता है,’’ तारा बोली.
‘‘एक बार इस नरक की जिंदगी से छुटकारा पाने का इरादा कर लोगी तो कोई न कोई हाथ थामने वाला भी मिल ही जाएगा,’’ विशाल ने कहा.
‘‘तुम थामोगे मेरा हाथ…?’’ तारा ने पूछा.
‘‘हां, मैं ऐसा कर सकता हूं,’’
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जोश में विशाल की जबान से यह बात निकल गई.
‘‘एक बार फिर सोच लो. याद रखो, औरत एक बेल की तरह है. सहारा देने वाले से एक बार लिपट जाए तो आसानी से छोड़ती नहीं,’’ तारा ने जोर दे कर कहा.
‘‘बेल लिपटने की हिम्मत तो दिखाए. सहारा भी कभी उस को छोड़ना नहीं चाहेगा,’’ तारा के गदराए जिस्म पर नजर गड़ाते हुए विशाल ने कहा.
तारा को जैसे यही बात कहने का इंतजार था. वह किसी बेल की तरह विशाल से लिपट गई. सबकुछ इतना अचानक और तेजी से हुआ कि विशाल हक्काबक्का रह गया.
शादीशुदा होने के बावजूद मर्द के मामले में तारा प्यासी लगती थी. वासना के उफनते ज्वार में जो भूमिका एक मर्द होने के नाते विशाल की बनती उस को एक तरीके से तारा निभा रही थी और उसे बेतहाशा चूम रही थी.
कुछ पलों में ही तारा ने जैसे अपने जिस्म की सारी गरमी और प्यार विशाल की रगों में उतारने की कोशिश की.
जब ज्वार उतरा तो उस की आंखों में कोई पछतावा नहीं था बल्कि उस की जगह जीने की एक नई उमंग थी, कुछ सपने थे.
विशाल के लिए तारा का जिस्म पाना एक तिलिस्म जैसा था. तारा ने उस तिलिस्म को एक झटके में ही खोल दिया था. सबकुछ इतना जल्दी हो गया था कि विशाल हैरान था.
तारा के साथ गहराते रिश्तों के बीच विशाल को बहुत सी बातें जानने को मिलीं. कुछ महल्ले के लोगों से तो कुछ तारा की जबानी.
(क्रमश:)
क्या विशाल ने तारा का साथ जिंदगीभर निभाया? क्या तारा रघु से छुटकारा पा सकी? पढ़िए अगले अंक में…
पिछले अंक में आप ने पढ़ा था…
विशाल का बाप शराबी था. वह उस की मां को रोज पीटता था. विशाल को उस से नफरत हो गई थी. मांबाप के मरने के बाद विशाल रोजगार के लिए शहर आ गया और किराए पर रहने लगा. उस का मकान मालिक रघु अधेड़ उम्र का था, जो अपनी कमउम्र पत्नी तारा को जानवरों की तरह पीटता था. तारा की बेबसी देख कर विशाल उस का हमदर्द बन गया. धीरेधीरे तारा उस की ओर खिंचने लगी. कुछ दिनों बाद उन में संबंध बन गए.
अब पढ़िए आगे…
महल्ले के लोग रघु के बारे में अच्छी राय नहीं रखते थे. वे उसे मुंह लगाना भी पसंद नहीं करते थे. तारा को रघु ने जोरजबरदस्ती और पैसे के दम पर हासिल किया था. तारा की मानें तो रघु से पैसे ले कर उस के गरीब मांबाप ने उसे रघु के हवाले कर दिया था. शादी की रस्में तो कहने को निभाई गई थीं.
तारा के साथ जिस्मानी रिश्ता बनाने के बाद जब कोई परदा नहीं रहा तो विशाल ने उस के जिस्म पर मारपीट के निशान देखे. ‘‘यह इनसान तो मेरी उम्मीद से भी ज्यादा वहशी है. कब तक तुम यह सब सहती रहोगी?’’ विशाल ने पूछा.
‘‘जब तक मेरा नसीब चाहेगा,’’ एक ठंडी सांस भरते हुए तारा ने कहा. ‘‘नसीब को बदला भी जा सकता है,’’ विशाल बोला.
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‘‘अगर सचमुच ऐसा हो सकता है तो बिना देरी किए अभी मेरा हाथ थामो और यहां से कहीं दूर ले चलो,’’ उम्मीद भरी नजरों से विशाल को देखते हुए तारा ने कहा.
‘‘नहीं, अभी सही समय नहीं है. इस के लिए थोड़ा इंतजार करना होगा… जब तक मेरा कहीं और ठिकाना नहीं बन जाता,’’ विशाल बोला. ‘‘ठीक है, मैं तब तक इंतजार करूंगी. एक बात का ध्यान रखना कि मेरी बरदाश्त की हद हो सकती है, मगर रघु के वहशीपन और जुल्म की कोई हद नहीं है,’’ तारा की बात में एक किस्म की मायूसी थी.
‘‘मैं वह हद नहीं आने दूंगा. उस से पहले ही मैं तुम को इस नरक से निकाल दूंगा,’’ विशाल ने भरोसा दिया. ‘‘उम्मीद नहीं है कि मेरे साथ धोखा नहीं होगा,’’ तारा बोली. जाल में फड़फड़ाते पक्षी के समान वह जल्दी से इस जाल को काट कर उड़ने को बेचैन थी.
इस में जरा भी शक नहीं कि एक औरत के रूप में तारा ने विशाल को जितना दिया था उस से ज्यादा कोई भी औरत किसी मर्द को नहीं दे सकती थी. लेकिन विशाल की सोच एकाएक मतलबी हो चली थी. एक आम मर्द की तरह वह भी सोचने लगा था कि तारा अब तक उस को जो दे चुकी थी स्थायी रिश्ते में उस से ज्यादा क्या दे सकती थी? इनसानी हमदर्दी वाली सोच पर वासना हावी होने लगी थी.
औरत को जिस्मानी तौर पर हासिल करने के बाद अकसर कई मर्दों को यह लगने लगता है कि औरत के पास अब उस को देने के लिए कुछ खास नहीं रहा. इसी बीच न जाने कैसे अचानक रघु को इन दोनों के संबंधों को ले कर शक होने लगा. शक्की मर्द अकसर बेहद बेरहम हो जाता है, लेकिन रघु बेरहमी के मामले में पहले ही जानवर था. उस ने तारा पर जुल्मों की हद कर दी.
मगर यह क्या… तारा की रौंगटे खड़े कर देने वाली चीखों को सुन कर विशाल की रगों में बहते खून का खौलना एकाएक बंद हो गया था. खून के ठंडेपन से विशाल खुद भी हैरान था. इस सब के पीछे कहीं न कहीं विशाल के अंदर की कायरता थी. वह सच का सामना करने से घबरा रहा था. हालात का यही तकाजा था कि वह तारा को ले कर जल्दी ही कोई फैसला करे.
एक दिन सुबहसवेरे काम पर जाने से पहले रघु ने विशाल को एक हफ्ते के अंदर जगह खाली करने का हुक्म दे दिया, ‘‘7 दिन के अंदर शराफत से जगह खाली कर देना, वरना सामान उठा कर बाहर फेंक दूंगा.’’ रघु की धमकी वाली जबान विशाल को अखरी, फिर भी कड़वा घूंट पी कर वह खामोश रहा. वैसे देखा जाए तो विशाल वहां से भागने की तैयारी कर रहा था, चुपके से चोरों की तरह.
7 दिन में जगह खाली करने वाली बात तारा को शायद मालूम नहीं थी. मगर रघु के इतना कह कर जाने के कुछ देर बाद ही तारा विशाल के कमरे में आ गई. वह बहुत ही टूटी हुई नजर आ रही थी.
‘‘अब मुझ से और बरदाश्त नहीं होता. मैं पता नहीं क्या कर बैठूंगी? देखो, जालिम ने इस बार मुझ पर कैसा सितम ढाया है,’’ यह कहने के बाद तारा ने ब्लाउज को हटा कर अपने बदन पर जलती बीड़ी से दागने के निशान विशाल को दिखाए. उन निशानों को देख एक बार तो विशाल भी कांप गया.
‘‘क्या इतना सब देखने के बाद भी तुम मुझ को अभी इंतजार करने के लिए ही कहोगे?’’ तारा ने पूछा. विशाल से जवाब देते नहीं बना. तारा ने जैसे सीधे उस की मर्दानगी पर ही सवाल उठाया था.
‘‘नहीं, अब तुम को ज्यादा इंतजार नहीं करना होगा. मैं जल्दी ही तुम को इस नरक से निकाल कर कहीं दूर ले जाऊंगा,’’ सूखे होंठों पर जबान फेरते हुए विशाल ने कहा. ‘‘आज तुम्हारे शब्दों में पहले वाली आग नहीं रही है. फिर भी मेरे पास इस के सिवा कोई चारा नहीं कि मैं तुम्हारी बात पर यकीन करूं. वैसे भी मेरी हालत बेल जैसी है. सहारा गया तो खत्म,’’ तारा ने अजीब हंसी हंसते हुए कहा.
‘‘तुम को मुझ पर बने अपने भरोसे को कायम रखना चाहिए.’’ ‘‘इसी की कोशिश कर रही हूं, मगर मेरी बरदाश्त की एक हद है और इस हद के टूटने से मैं कब क्या कर बैठूंगी, मैं खुद नहीं जानती,’’ इतना कहने के बाद तारा चली गई.
तारा के तेवर विशाल को हैरानी में डालने वाले थे. पहले कभी तारा ने ऐसे अंदाज में बात नहीं की थी. विशाल को महसूस भी हुआ कि वह कायर था, औरत पर जुल्म होता देख उस की रगों में उबलने वाला खून बासी कढ़ी में आए उबाल से ज्यादा नहीं था. हकीकत का सामना करने की उस में हिम्मत नहीं थी. तारा के प्रति हमदर्दी के पीछे कहीं वासना की वह चाशनी थी जिस का स्वाद चखने के बाद विशाल की सोच में बहुत बदलाव आ गया था.
विशाल यह बात भी नजरअंदाज नहीं कर सकता था कि तारा दुनिया की नजरों में एक शादीशुदा औरत थी. उस के साथ विशाल के संबंध दुनिया की नजरों में गलत थे. उस पर रघु भी एक खतरनाक इनसान था. उस से दुश्मनी मोल लेने की विशाल में हिम्मत नहीं थी. रघु विशाल को एक हफ्ते के अंदर कमरा खाली करने की चेतावनी दे चुका था. रघु और विशाल के बीच कोई लेनदेन नहीं रह गया था. जगह का किराया वह महीने के शुरू में ही रघु को दे चुका था.
सामान के नाम पर विशाल के पास भारीभरकम कुछ भी नहीं था. वह किसी भी समय जगह खाली करने के लिए आजाद था. रात के वक्त चुपचाप ही अपनी जगह को छोड़ने से बेहतर रास्ता विशाल को नजर नहीं आ रहा था. दिन के उजाले में तारा कभी भी उस को आसानी से जाने नहीं देती.
आखिर रघु द्वारा दी गई समय सीमा के खत्म होने से पहले ही एक रात को विशाल ने खामोशी से अपना सामान बांधा और चोरों की तरह वहां से निकल जाने का फैसला किया. पर आधी रात के समय इस से पहले कि विशाल चोरों की तरह अपना सामान उठा कर वहां से निकल पाता एकाएक तारा दरवाजे पर आ कर खड़ी हो गई.
तारा को देख विशाल सकते में आ गया. उस की चोर जैसी हालत हो गई. इस से पहले कि वह कुछ कह पाता, तारा ने एक नजर बंधे हुए सामान पर डाली और फिर उस की तरफ देखने लगी. तारा की खामोश आंखों में कई सवालों के रूप में एक आग सी धधक रही थी. उस आग ने विशाल को डरा दिया.
एकाएक तारा अजीब ढंग से हंसी और बोली, ‘‘मैं तुम्हारे भरोसे किस हद से गुजर गई और तुम एक मर्द हो कर भी इस तरह रात के अंधेरे में चोरों की तरह भाग रहे हो. मैं हैरान भी हूं और सदमे में भी हूं. आखिर मैं ने तुम्हारे जैसे कायर मर्द पर भरोसा कैसे कर लिया? ‘‘मगर, अब पछताने का कोई मतलब नहीं. मैं इतनी आगे बढ़ आई हूं कि वापसी के सभी रास्ते बंद हो चुके हैं.
‘‘तुम जैसे भी हो, मेरी किस्मत अब तुम्हारे साथ ही बंध गई है. मेरा हाथ पकड़ो और सुबह होने से पहले यहां से कहीं दूर निकल चलो. इस बात को तुम दिमाग से निकाल दो कि मैं तुम्हें अकेला यहां से जाने दूंगी.’’ तारा के लहजे में खुली धमकी थी जिस ने विशाल को चौंका दिया.
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‘‘तुम्हें गलतफहमी हो गई है. मैं इस समय कहीं नहीं जा रहा हूं, तुम को भी इस तरह इस वक्त मेरे कमरे में नहीं आना चाहिए था. रघु को इस बात का पता चल गया तो हम दोनों के लिए मुसीबत खड़ी हो जाएगी.’’ ‘‘एक औरत से प्यार भी करते हो और इस तरह डरते भी हो. तुम मुझ को एक खूबसूरत जिंदगी का सपना दिखा कर कायर हो गए और मैं तुम्हारे भरोसे क्या से क्या बन गई? झूठ बोलने से कोई फायदा नहीं.
‘‘मैं जानती हूं कि तुम चुपचाप यहां से भागने की तैयारी में थे. लेकिन अब मुझे साथ लिए बगैर तुम ऐसा नहीं कर सकोगे. मैं ने तुम से पहले ही कहा था कि औरत एक बेल की तरह होती है. लिपट जाए तो आसानी से छोड़ती नहीं. ‘‘रही बात रघु की, उस से डरने वाली कोई बात नहीं. वह यहां नहीं आएगा और न ही हमें जाने से रोकेगा. मुरदे कभी जागते नहीं,’’ तारा ने ठंडी आवाज में कहा.
‘‘क्या मतलब…?’’ विशाल के शरीर को जैसे बिजली का तार छू गया. ‘‘मतलब यह कि मैं ने उस जानवर को मौत के घाट उतार दिया है. जो खुद को मेरा पति कहता था और मुझ को इस का जरा भी अफसोस नहीं,’’ तारा की आवाज पहले की तरह ही बर्फ की सिल जैसी ठंडी थी.
विशाल के सिर पर जैसे कोई बम फूटा, वह हैरान सा तारा को देख रहा था. सामने खड़ी तारा को देख कर विशाल को कायर होने का एहसास हो रहा था.
गीता का पति मुन्नालाल सफाईकर्मी था और शराब पीने का आदी. स्वभाव से वह गुस्सैल था. इसलिए गीता ने सोना की असलियत उसे नहीं बताई. इस के बजाए उस ने पति पर सोना का विवाह जल्द से जल्द करने का दबाव बनाया. इसी के साथ गीता ने सोना का फैक्ट्री जाना भी बंद करा दिया और उस पर कड़ी नजर रखने लगी. उस ने अपनी बहू ज्योति तथा बेटों को भी सतर्क कर दिया था कि वह जहां भी जाए, उस के साथ कोई न कोई रहे.
मांभाइयों के कड़े प्रतिबंध के कारण सोना का आशीष से मिलन बंद हो गया. इस से सोना और आशीष परेशान हो उठे. दोनों मिलन के लिए बेचैन रहने लगे.
सोना को इस बात की भनक लग चुकी थी कि उस के घर वाले उस की शादी के लिए लड़का देख रहे हैं. जबकि सोना के सिर पर अब भी आशीष के प्यार का भूत सवार था.
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इधर मुन्नालाल की खोज भीमसागर पर समाप्त हुई. भीमसागर का पिता रामसागर दादानगर फैक्ट्री एरिया के मिश्रीलाल चौराहे के निकट रहता था. नहर की पटरी के किनारे उस का मकान था. रामसागर लकड़ी बेचने का काम करता था. उस का बेटा भीमसागर भी उस के काम में मदद करता था.
मुन्नालाल ने भीमसागर को देखा तो उसे सोना के लिए पसंद कर लिया. हालांकि सोना ने शादी से इनकार किया, लेकिन मुन्नालाल ने उस की एक नहीं सुनी. अंतत: सन 2017 के जनवरी महीने की 10 तारीख को सोना का विवाह भीमसागर के साथ कर दिया गया.
भीमसागर की दुलहन बन कर सोना ससुराल पहुंची तो सभी ने उसे हाथोंहाथ लिया. सुंदर पत्नी पा कर भीमसागर भी खुश था, वहीं उस के मातापिता भी बहू की तारीफ करते नहीं थक रहे थे. सब खुश थे, लेकिन सोना खुश नहीं नहीं थी.
सुहागरात को भी वह बेमन से पति को समर्पित हुई. भीमसागर तो तृप्त हो कर सो गया, पर सोना गीली लकड़ी की तरह सुलगती रही. न तो उस के जिस्म की प्यास बुझी थी, न रूह की.
उस रात के बाद हर रात मिलन की रस्म निभाई जाने लगी. चूंकि सोना इनकार नहीं कर सकती थी, सो अरुचि से पति की इच्छा पूरी करती रही.
घर वालों की जबरदस्ती के चलते सोना ने विवाह जरूर कर लिया था, पर वह मन से भीमसागर को पति नहीं मान सकी थी. अंतरंग क्षणों में वह केवल तन से पति के साथ होती थी, उस का प्यासा मन प्रेमी में भटक रहा होता था.
3-4 महीने तक सोना ने जैसेतैसे पति से निभाया, उस के बाद दोनों के बीच कलह होने लगी. कलह का पहला कारण सोना का एकांत में मोबाइल फोन पर बातें करना था. भीमसागर को शक हुआ कि सोना का शादी से पहले कोई यार था, जिस से वह चोरीछिपे एकांत में बातें करती है.
दूसरा कारण उस की फैशनपरस्ती तथा घर से बाहर जाना था. भीमसागर के मातापिता चाहते थे कि बहू मर्यादा में रहे और घर के बाहर कदम न रखे. लेकिन सोना को घर की चारदीवारी में रहना पसंद नहीं था. वह स्वच्छंद हो कर घूमती थी. इन्हीं 2 बातों को ले कर सोना का भीमसागर और ससुराल के लोगों से झगड़ा होने लगा. आजिज आ कर साल बीततेबीतते सोना ससुराल छोड़ कर मायके आ कर रहने लगी. गीता ने सोना को बहुत समझाया और ससुराल भेजने का प्रयास किया, लेकिन वह नहीं मानी. 6 महीने तक सोना घर में रही, उस के बाद उस ने गोविंद नगर स्थित एक स्कूल में आया की नौकरी कर ली. वह सुबह 8 बजे घर से निकलती, फिर शाम 5 बजे तक वापस आती. इस तरह वह मांबाप पर बोझ न बन कर खुद अपना भार उठाने लगी.
एक शाम सोना स्कूल से लौट रही थी कि दादानगर चौराहे पर उस की मुलाकात आशीष से हो गई. बिछड़े प्रेमी मिले तो दोनों खुश हुए. आशीष उसे नजदीक के एक रेस्तरां में ले गया, जहां दोनों ने एकदूसरे को अपनी व्यथाकथा सुनाई. बातोंबातों में आशीष उदास हो कर बोला, ‘‘अरमान मैं ने सजाए और तुम ने घर किसी और का बसा दिया.’’
सोना के मुंह से आह सी निकली, ‘‘हालात की मजबूरी इसी को कहते हैं. घर वालों ने मेरी मरजी के बिना शादी कर दी. मैं ने मन से उसे कभी पति नहीं माना. साल बीतते उस से मेरा मनमुटाव हो गया और मैं उसे छोड़ कर मायके आ गई.’’ आशीष मन ही मन खुश हुआ. फिर बोला, ‘‘क्या अब भी तुम मुझे पहले जैसा प्यार करती हो?’’
‘‘यह भी कोई पूछने की बात है. सच तो यह है कि मैं तुम्हें कभी भुला ही नहीं पाई. सुहागरात को भी तुम्हारी ही याद आती रही.’’ इस के बाद सोना और आशीष का फिर मिलन होने लगा. दोनों के बीच शारीरिक रिश्ता भी बन गया. आशीष कभीकभी सोना के घर भी जाने लगा. गीता को आशीष का घर आना अच्छा तो नहीं लगता था, पर उसे मना भी नहीं कर पाती थी. हालांकि गीता निश्चिंत थी कि सोना की शादी हो गई है. अब आशीष जूठे बरतन में मुंह नहीं मारेगा. पर यह उस की भूल थी.
सोना के कहने पर आशीष ने अगस्त, 2019 में दबौली (उत्तरी) में किराए पर एक कमरा ले लिया. कमरा पसंद करने सोना भी आशीष के साथ गई थी.
उस ने मकान मालकिन को बताया कि सोना उस की पत्नी है. मकान में अन्य किराएदार थे, उन को भी आशीष ने सोना को अपनी पत्नी बताया था.
सोना अब इस कमरे पर आशीष से मिलने आने लगी. सोना के आते ही दरवाजा बंद हो जाता और शारीरिक मिलन के बाद ही खुलता. किसी को ऐतराज इसलिए नहीं होता था, क्योंकि उन की नजर में सोना उस की पत्नी थी.
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आशीष के रूम में आतेजाते सोना को एक रोज एक फोटो हाथ लग गई, जिस में वह एक युवती और एक मासूम बच्चे के साथ था. इस युवती और बच्चे के संबंध में सोना ने आशीष से पूछा तो वह बगलें झांकने लगा. अंतत: उसे बताना ही पड़ा कि वह शादीशुदा है और तसवीर में उस की पत्नी व बच्चा है.
लेकिन मनमुटाव के चलते पत्नी घाटमपुर स्थित अपने मायके में रह रही है. यह पता चलने के बाद सोना का आशीष से झगड़ा हुआ. लेकिन आशीष ने किसी तरह सोना को मना लिया.
आशीष को लगा कि सच्चाई जानने के बाद सोना कहीं उस का साथ न छोड़ दे. इसलिए वह उस पर दबाव डालने लगा कि वह अपने पति को तलाक दे कर उस से शादी कर ले. लेकिन सोना ने यह कह कर मना कर दिया कि पहले तुम अपनी पत्नी को तलाक दो. तभी मैं अपने पति से तलाक लूंगी. इस के बाद तलाक को ले कर दोनों में अकसर झगड़ा होने लगा. 17 मार्च की दोपहर 12 बजे सोना दबौली स्थित आशीष के रूम पर पहुंची. आशीष ने उसे फोन कर के बुलाया था. सोना के आते ही आशीष ने रूम बंद कर लिया फिर दोनों में बातचीत होने लगी.
बातचीत के दौरान आशीष ने सोना से कहा कि वह अपने पति से तलाक ले कर उस से शादी कर ले, पर सोना इस के लिए राजी नहीं हुई. उलटे पलटवार करते हुए वह बोली, ‘‘पहले तुम अपनी पत्नी से तलाक क्यों नहीं लेते, एक म्यान में 2 तलवारें कैसे रहेंगी?’’
तलाक को ले कर दोनों में गरमागरम बहस होने लगी. बहस के बीच आशीष ने प्रणय निवेदन किया, जिसे सोना ने ठुकरा दिया. इस पर आशीष जबरदस्ती पर उतर आया और सोना के कपड़े खींच कर उसे अर्धनग्न कर दिया. सोना भी बचाव में भिड़ गई.
तलाक लेने से इनकार करने और शारीरिक संबंध न बन पाने से आशीष का गुस्सा आसमान पर जा पहुंचा. उस ने सामने अलमारी में रखी कैंची उठाई और सोना के पेट में घोंप दी.
सोना पेट पकड़ कर फर्श पर तड़पने लगी. उसी समय आशिष ने सोना के गले को कैंची से छेद डाला. सोना पेट पकड़ कर तड़पने लगी. उसी समय उस ने सोना के गले को कैंची से छेद डाला. कुछ देर बाद सोना ने दम तोड़ दिया.
सोना की हत्या करने के बाद आशीष ने कमरे के दरवाजे की कुंडी बाहर से बंद की और मकान के बाहर आ गया. बाहर आ कर उस ने सोना की भाभी ज्योति को सोना की हत्या की जानकारी दी, फिर फरार हो गया.
इस घटना का भेद तब खुला, जब मकान मालकिन पुष्पा पहली मंजिल पर स्थित आशीष के कमरे पर पहुंची. पुष्पा ने इस घटना की सूचना थाना गोविंद नगर को दे दी. जांच में अवैध रिश्तों में हुई हत्या की बात सामने आई. 20 मार्च, 2020 को थाना गोविंद नगर पुलिस ने अभियुक्त आशीष सिंह को कानपुर कोर्ट में रिमांड मजिस्ट्रैट ए.के. सिंह की अदालत में पेश किया, जहां से उसे जिला जेल भेज दिया गया.
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– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित
मुकदमा दर्ज होने के बाद पुलिस टीम आशीष की गिरफ्तारी के प्रयास में जुट गई. पुलिस टीम ने मृतका सोना का मोबाइल फोन खंगाला तो आशीष का नंबर मिल गया, जिसे सर्विलांस पर लगा दिया गया.
सर्विलांस से उस की लोकेशन गीतानगर मिली. पुलिस टीम रात 2 बजे गीतानगर पहुंची, लेकिन वहां पहुंचने से पहले ही आशीष का फोन स्विच्ड औफ हो गया, जिस से उस की लोकेशन मिलनी बंद हो गई. निराश हो कर पुलिस टीम वापस लौट आई.
निरीक्षण के दौरान एक किराएदार ने सीओ मनोज कुमार गुप्ता को बताया था कि आशीष कानपुर देहात के गजनेर कस्बे का रहने वाला है. इस पर उन्होंने एक पुलिस टीम को गजनेर भेज दिया, जहां आशीष की तलाश की गई. सादे कपड़ों में गई पुलिस टीम ने दुकानदारों व अन्य लोगों को आशीष की फोटो दिखा कर पूछताछ की.
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लेकिन फोटो में आशीष चश्मा लगाए हुए था, जिस की वजह से लोग उसे पहचान नहीं पा रहे थे. पुलिस टीम पूछताछ करते हुए जब मुख्य रोड पर आई तो एक पान विक्रेता ने फोटो पहचान ली. उस ने बताया कि वह अजय ठाकुर है जो कस्बे के लाल सिंह का छोटा बेटा है.
आशीष के पहचाने जाने से पुलिस को अपनी मेहनत रंग लाती दिखी. पुलिस टीम लाल सिंह के घर पहुंची. पुलिस ने लाल सिंह को फोटो दिखाई तो वह बोला, ‘‘यह फोटो मेरे बेटे आशीष सिंह की है. घर के लोग उसे अजय ठाकुर के नाम से बुलाते हैं. आशीष कानपुर में नौकरी करता है. मेरा बड़ा बेटा मनीष सिंह भी गीतानगर, कानपुर में रहता है. पर आप लोग हैं कौन और आशीष की फोटो क्यों दिखा रहे हैं. उस ने कोई ऐसावैसा काम तो नहीं कर दिया?’’
पुलिस टीम ने अपना परिचय दे कर बता दिया कि उन का बेटा सोना नाम की एक युवती की हत्या कर के फरार हो गया है. पुलिस उसी की तलाश में आई है. अगर वह घर में छिपा हो तो उसे पुलिस के हवाले कर दो, वरना खुद भी मुसीबत में फंस जाओगे.
पुलिस की बात सुन कर लाल सिंह घबरा कर बोला, ‘‘हुजूर, आशीष घर पर नहीं आया है. न ही उस ने मुझे कोई जानकारी दी है.’’
यह सुन कर पुलिस ने लाल सिंह को हिरासत में ले लिया. चूंकि लाल सिंह का बड़ा बेटा गीतानगर में रहता था और आशीष के मोबाइल फोन की लोकेशन भी गीता नगर की ही मिली थी. पुलिस को शक हुआ कि अजय ठाकुर उर्फ आशीष सिंह अपने बड़े भाई के घर में छिपा हो सकता है.
पुलिस टीम लाल सिंह को साथ ले कर वापस कानपुर आ गई और उस के बताने पर गीता नगर स्थित बड़े बेटे मनीष के घर छापा मारा. छापा पड़ने पर घर में हड़कंप मच गया. पिता के साथ पुलिस देख कर आशीष ने भागने का प्रयास किया, लेकिन पुलिस टीम ने उसे दबोच लिया और थाना गोविंद नगर ले आई.
थाना गोविंद नगर में जब आशीष सिंह से सोना की हत्या के संबंध में पूछा गया तो उस ने सहज ही हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया. आशीष ने बताया कि शादी के पहले से दोनों के बीच प्रेम संबंध थे. सोना के घर वालों को पता चला तो उन्होंने उस की शादी कर दी, लेकिन सोना की पति से पटरी नहीं बैठी.
वह ससुराल छोड़ कर मायके में आ कर रहने लगी. उस के बाद दोनों के बीच फिर से अवैध संबंध बन गए. सोना के कहने पर ही उस ने किराए का कमरा लिया था, जहां दोनों का शारीरिक मिलन होता था.
आशीष ने बताया कि घटना वाले दिन सोना 12 बजे आई थी. आशीष ने उस से कहा कि वह पति को तलाक दे कर उस से शादी कर ले. लेकिन वह नहीं मानी. इसी बात को ले कर दोनों में झगड़ा हुआ. झगड़े के बीच आशीष ने यह सोच कर प्रणय निवेदन किया कि यौन प्रक्रिया में गुस्सा शांत हो जाता है, लेकिन सोना ने उसे दुत्कार दिया.
शादी की बात न मानने और प्रणय निवेदन ठुकराने की वजह से आशीष को गुस्सा आ गया और उस ने पास रखी कैंची उठा कर सोना के पेट में घोंप दी. फिर उसी कैंची से उस का गला भी छेद डाला. हत्या करने के बाद वह फरार हो गया था. चूंकि आशीष सिंह ने सोना की हत्या का जुर्म स्वीकार कर लिया था और पुलिस आला ए कत्ल भी बरामद कर चुकी थी, इसलिए थानाप्रभारी अनुराग सिंह ने अजय ठाकुर उर्फ आशीष सिंह को विधिसम्मत गिरफ्तार कर लिया. पुलिस पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह इस तरह थी—
कानपुर महानगर के पनकी थाना क्षेत्र में एक मोहल्ला है सराय मीता. मुन्नालाल सोनकर अपने परिवार के साथ इसी मोहल्ले में रहता था. मुन्नालाल सोनकर नगर निगम में सफाई कर्मचारी था. उसे जो वेतन मिलता था, उसी से परिवार का भरणपोषण होता था.
मुन्नालाल अपनी बड़ी बेटी बरखा की शादी कर चुका था. बरखा से छोटी सोना 18 साल की हो गई थी. वह चंचल स्वभाव की थी. पढ़ाईलिखाई में मन लगाने के बजाए वह सजनेसंवरने पर ज्यादा ध्यान देती थी. नईनई फिल्में देखना, सैरसपाटा करना और आधुनिक फैशन के कपड़े खरीदना उस का शौक था. मुन्नालाल सीधासादा आदमी था. रहनसहन भी साधारण था. वह बेटी की फैशनपरस्ती से परेशान था.
सोना अपनी मां गीता के साथ दादानगर स्थित एक लोहा फैक्ट्री में काम करती थी. वहां से उसे जो वेतन मिलता था, उसे वह अपने फैशन पर खर्च करती थी. जिद्दी स्वभाव की सोना को बाजार में जो कपड़ा या अन्य सामान पसंद आ जाता, वह उसे खरीद कर ले आती. मातापिता रोकतेटोकते तो वह टका सा जवाब दे देती, ‘‘मैं ने सामान अपने पैसे से खरीदा है. फिर ऐतराज क्यों?’’
उस के इस जवाब से सब चुप हो जाते थे. सोना की अपनी भाभी ज्योति से खूब पटरी बैठती थी.
सोना दादानगर स्थित जिस लोहा फैक्ट्री में काम करती थी, आशीष सिंह उसी में सुपरवाइजर था. वह मूलरूप से जिला कानपुर के देहात क्षेत्र के कस्बा गजनेर का रहने वाला था. उस का घरेलू नाम अजय था. लोग उसे अजय ठाकुर कहते थे. उस के पिता गांव में किसानी करते थे. सोना लोहा फैक्ट्री में पैकिंग का काम करती थी.
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निरीक्षण के दौरान एक रोज आशीष सिंह की निगाह खूबसूरत सोना पर पड़ी. दोनों की नजरें मिलीं तो दोनों कुछ देर तक आकर्षण में खोए रहे. जब आकर्षण टूटा तो सोना मुसकरा दी और नजरें झुका कर पैकिंग में जुट गई. नजरें मिलने का सुखद अहसास दोनों को हुआ.
अगले दिन सोना कुछ ज्यादा ही बनसंवर कर आई. आशीष उस के पास पहुंचा और इशारे से उसे अपने औफिस के कमरे में आने को कहा. वह उस के औफिस में आई तो आशीष ने उस से कुछ कहा, जिसे सुन कर सोना सकपका गई. वह यह कह कर वहां से चली गई कि कोई देख लेगा. सोना की ओर से हरी झंडी मिली तो आशीष बहुत खुश हुआ.
आशीष सिंह पढ़ालिखा हृष्टपुष्ट युवक था. वह अच्छाखासा कमा भी रहा था. लेकिन वह शादीशुदा और एक बच्चे का बाप था. उस की पत्नी से नहीं बनी तो वह घाटमपुर स्थित अपने मायके में रहने लगी थी. आशीष सिंह ने सोना से यह बात छिपा ली थी. उस ने उसे खुद को कुंवारा बताया था.
सोना सजीले युवक आशीष से मन ही मन प्यार करने लगी और मां से नजरें बचा कर आशीष से फैक्ट्री के बाहर एकांत में मिलने लगी. दोनों के बीच प्यार भरी बातें होने लगीं. धीरेधीरे आशीष सोना का दीवाना हो गया. सोना भी उसे बेपनाह मोहब्बत करने लगी.
प्यार परवान चढ़ा तो देह की प्यास जाग उठी. एक रोज आशीष सोना को अपने दादानगर वाले कमरे पर ले गया, जहां वह किराए पर रहता था. सोना जैसे ही कमरे में पहुंची, आशीष ने उसे अपनी बांहों में भर लिया. आशीष के स्पर्श से सोना को बहकते देर नहीं लगी. आशीष जो कर रहा था, सोना को उस की अरसे से तमन्ना थी. इसलिए वह भी आशीष का सहयोग करने लगी.
कुछ देर बाद आशीष और सोना अलग हुए तो बहुत खुश थे. इस के बाद तो यह सिलसिला ही बन गया. जब भी मन होता, शारीरिक संबंध बना लेते. आशीष कमरे में अकेला रहता था, जिस से दोनों आसानी से मिल लेते थे. लेकिन कहते हैं कि प्यार चाहे जितना चोरीछिपे किया जाए, एक न एक दिन उस का भेद खुल ही जाता है.
एक शाम सोना और गीता एक साथ फैक्ट्री से निकली तो कुछ दूर चल कर सोना बोली, ‘‘मां, मुझे गोविंद नगर बाजार से कुछ सामान लेना है. तुम घर चलो, मैं आ जाऊंगी.’’
गीता ने कुछ नहीं कहा. लेकिन उसे सोना पर संदेह हुआ. इसलिए उस ने सोना का गुप्तरूप से पीछा किया और उसे आशीष के साथ रंगेहाथ पकड़ लिया.
गीता ने सोना को फटकारा और भलाबुरा कहा. साथ ही प्रेम से सिर पर हाथ रख कर समझाया भी, ‘‘बेटी, आशीष ठाकुर जाति का है और तुम दलित की बेटी हो. आशीष के घर वाले दलित की बेटी को कभी स्वीकार नहीं करेंगे. इसलिए मेरी बात मानो और आशीष का साथ छोड़ दो, इसी में हम सब की भलाई है.’’
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पिछले अंक में आप ने पढ़ा:
सुंदर एक फैक्टरी में क्लर्क था. उस के पास पैसे की कमी थी, इसलिए उस के दोस्त उस से कन्नी काटते थे. वे उसे अपनी पार्टियों में भी शामिल नहीं करते थे. लेकिन खूबसूरत कलावती से शादी के बाद वे उसे भी बीवी के साथ पार्टियों का न्योता भेजने लगे. दिलफेंक हरीश तो कलावती पर लट्टू हो गया था. वह उसे महंगेमहंगे गिफ्ट देने लगा था. पहले तो सुंदर को बहुत बुरा लगा, लेकिन बाद में उस ने इस बात का फायदा उठाना चाहा और अपनी बात कलावती के सामने रखी.
अब पढ़िए आगे…
जिस दिन सुंदर ने कलावती से आमदनी का अच्छा जरीया वाली बात की, उसी दिन कलावती काफी रात हुए घर आई. हरीश उस को अपनी गाड़ी से घर के बाहर तक छोड़ने आया था.
यह शायद पहला मौका था, जब हरीश घर के अंदर नहीं आया था.
कलावती अकेले ही अंदर आई थी. उस के होंठों की फीकी पड़ी लिपस्टिक और बिखरेबिखरे बाल जैसे खुद ही कोई कहानी बयान कर रहे थे.
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सबकुछ समझते हुए भी सुंदर आज उसे अनदेखा करने के मूड में था. कलावती ने सुंदर को कुछ कहने या सवाल करने का मौका ही नहीं दिया.
होंठों के एक कोर पर फैली लिपस्टिक को हाथ के अंगूठे से साफ करते हुए कलावती ने कहा, ‘‘मैं ने हरीश से बात की है. वह बिना किसी इंवैस्टमैंट के ही हमें अपने काम में 10 फीसदी की पार्टनरशिप देने को तैयार है. इस के लिए मुझे उस के दफ्तर में बैठ कर ही कामकाज में उस का हाथ बंटाना होगा.
‘‘हरीश जो भी सामान बेचता है, वह सब औरतों के इस्तेमाल में आने वाला है, इसलिए उस को लगता है कि एक औरत होने के नाते मैं उस के कारोबार को बेहतर तरीके से देख सकती हूं. जब ऐक्स्ट्रा आमदनी रैगुलर आमदनी की शक्ल ले लेगी, तो मैं बेशक नौकरी छोड़ दूंगी. तुम को मेरे इस फैसले पर कोई एतराज तो नहीं…?’’
‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ सुंदर ने उतावलेपन से कहा.
इस के बाद कलावती हरीश के दफ्तर में जाने लगी. कई बार कलावती खुद चली जाती और कभी उस को लेने के लिए हरीश की गाड़ी आ जाती. रात को कलावती अकसर 9-10 बजे से पहले घर नहीं आती थी. कभी रात को हरीश का ड्राइवर घर पर उसे छोड़ने आता था और कभी हरीश खुद.
कलावती अकसर खाना भी खा कर ही आती थी. अगर वह खाना खा कर नहीं आती, तो घर पर नहीं बनाती थी. सुंदर किसी ढाबे या होटल से खाना ले आता और दोनों मिल कर खा लेते थे.
कलावती के रंगढंग और तेवर लगातार बदल रहे थे. कई बार तो वह रात को घर आती, तो उस के मुंह से तीखी गंध आ रही होती थी. यह तीखी गंध शराब की होती थी.
कलावती के बेतरतीब कपड़ों और बिगड़ा हुआ मेकअप भी खामोश जबान में बहुतकुछ कहता था.
मगर सुंदर ने इन सब चीजों की तरफ से जैसे आंखें मूंद ली थीं. उस का खून अब जोश नहीं मारता था.
जो दोस्त कभी सुंदर को घास नहीं डालते थे, वे अपनी की गई मेहरबानियों की कीमत वसूले बिना कैसे रह सकते थे?
अब तो सारा खेल जैसे खुला ही था. एक मर्द अपनी बीवी का इस्तेमाल अपने फायदे के लिए कर रहा था और बीवी सबकुछ समझते हुए भी अपनी खुशी से इस्तेमाल हो रही थी.
इस सारे खेल में हरीश भी खुद को एक बड़े और चतुर खिलाड़ी के रूप में ही देखता था. कारोबार में 10 फीसदी की साझेदारी का दांव खेल कर उस ने अपने दोस्त की खूबसूरत बीवी पर एक तरह से कब्जा ही कर लिया था. अब उस को कई बहाने से दोस्त के घर जाने की जरूरत नहीं रह गई थी. वह पति की रजामंदी से खुद ही उस के पास जो आ गई थी.
जल्दी ही कलावती अपने बैग में नोटों की गड्डियां भर कर लाने लगी थी. कहने को तो नोटों की ये गड्डियां साझेदारी में 10 फीसदी हिस्सा थीं, मगर असलियत में वह कलावती के जिस्म की कीमत थी.
दिन बदलने लगे. केवल एक साल में ही किराए के घर को छोड़ कर सुंदर और कलावती अपने खरीदे हुए नए मकान में आ गए. नया खरीदा मकान जल्दी ही टैलीविजन, वाशिंग मशीन, फ्रिज और एयरकंडीशन से सज भी गया.
दूसरे साल में उन के घर के बाहर एक कार भी सवारी के लिए नजर आने लगी.
लेकिन, इस के साथ ही साथ कलावती जैसे नाम की ही सुंदर की पत्नी रह गई थी. कलावती में घरेलू औरतों वाली कोई भी बात नहीं रह गई थी. अपने पति के कहने पर ही वह पैसा बनाने वाली एक मांसल मशीन बन गई थी.
लोग सुंदर के बारे में तरहतरह की बातें करने लगे थे. कुछ लोग तो पीठ पीछे यह भी कहने लगे थे कि कलावती बीवी तो थी सुंदर की, मगर सोती थी उस के दोस्त हरीश के साथ.
10 फीसदी की मुंहजबानी साझेदारी के नाम पर अगर हरीश उन को कुछ दे रहा था, तो बदले में पूरी शिद्दत से वसूल भी कर रहा था. कलावती के मांसल जिस्म को उस ने ताश के पत्तों के तरह फेंट डाला था.
सुंदर जब लोगों का सामना करता था, तो उन की शरारत से चमकती हुई आंखों में बहुतकुछ होता था. कुछ लोग तो इशारों ही इशारों में कलावती को ले कर सुंदर से बहुतकुछ कह भी देते थे, मगर इस से न ही तो अब सुंदर की मर्दानगी को चोट लगती थी और न ही उस का खून खौलता था. उस की सोच मानो बेशर्म हो गई थी.
हरीश जैसे रंगीनमिजाज रईस मर्दों और कलावती जैसी शादीशुदा औरतों के संबंध ज्यादा दिनों तक टिकते नहीं हैं और न ही इस की उम्र ज्यादा लंबी होती है.
हरीश का मन भी कलावती से भरने लगा था. उस ने कलावती से छुटकारा पाने के लिए उस के प्रति बेरुखी दिखानी शुरू कर दी थी.
कलावती ने उस की बदली हुई नजरों को पहचान लिया, मगर उस को इस की कोई परवाह नहीं थी. हरीश से साफतौर पर कलावती के लेनदेन वाले संबंध थे और वह काफी हद तक इन संबंधों को कैश कर भी चुकी थी. मकान, घर का सारा कीमती सामान और गाड़ी हरीश की बदौलत ही तो थी.
वैसे, कलावती की नजरों में भी हरीश बेकार होने लगा था. उस को और निचोड़ना मुश्किल था.
हरीश ने साफ शब्दों में कलावती से छुटकारा मांगा. इस के बदले में कलावती ने भी एक बड़ी रकम मांगी. हरीश ने वह मांगी रकम दे दी.
हरीश से संबंध खत्म करने पर सुंदर ने कलावती से कहा, ‘‘हमारे पास अब सबकुछ है, इसलिए हमें पतिपत्नी के रूप में अपनी पुरानी जिंदगी में लौट आना चाहिए.’’
सुंदर की बात पर कलावती खिलखिला कर हंस पड़ी और बोली, ‘‘मुझ को नहीं लगता कि अब ऐसा हो सकता है. पतिपत्नी का रिश्ता तो इस मकान की बुनियाद में कहीं दफन हो चुका है. क्या तुम को नहीं लगता कि पति बनने के बजाय तुम केवल अपनी बीवी के दलाल बन कर ही रह गए? ऐसे में मुझ से दोबारा कोई सती सावित्री बनने की उम्मीद तुम कैसे कर सकते हो?’’
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कलावती के जवाब से सुंदर का चेहरा जैसे सफेद पड़ गया. कलावती ने जैसे उस को आईना दिखा दिया था.
कलावती वह औरत नहीं रह गई थी, जो अब घर की चारदीवारी में बंद हो कर रह पाती.
सुंदर भी जान गया था कि उस ने अपनी बीवी को दोस्तों के सामने चारे के रूप में इस्तेमाल कर के हासिल तो बहुतकुछ कर लिया था, मगर अपने जमीर और मर्दानगी दोनों को ही गंवा दिया था.
हरीश को छोड़ने के बाद कलावती ने सुंदर के एक और अमीर दोस्त दिनेश से संबंध बना लिए.
उधर कलावती बाहर मौजमस्ती कर रही थी, इधर सुंदर ने खूब शराब पीनी शुरू कर दी. कभीकभी शराब पी कर सुंदर इतना बहक जाता कि गलीमहल्ले के बच्चे उस का मजाक उड़ाते और उस पर कई तरह की फब्तियां भी कसते.
कुछ फब्तियां तो ऐसी कड़वी और धारदार होतीं कि नशे में होने के बावजूद सुंदर खड़ेखड़े ही जैसे सौ बार मर जाता.
जैसे शराब के नशे में एक बार जब सुंदर लड़खड़ा कर गली में गंदी नाली के पास गिर पड़ा, तो वहां खेल रहे कुछ लड़के खेलना छोड़ उसे उठाने के लिए लपकने को हुए, तो उन में से एक लड़के ने उन को रोक लिया और बोला, ‘‘रहने दो, मेरा बापू कहता है कि यह अपनी औरत की घटिया कमाई खाने वाला एक गंदा इनसान है. इज्जतदार और शरीफ लोगों को इस से दूर रहना चाहिए.’’
एक लड़के का इतना ही कहना था कि बाकी लड़कों के कदम वहीं रुक गए. शराब के नशे में लड़खड़ा कर सुंदर गिर जरूर गया था, मगर बेहोश नहीं था. लड़के के कहे हुए शब्द गरम लावे की तरह उस के कानों में उतर गए.
अपनी बुजदिली और लालच के चलते आज सुंदर कितना नीचे गिर चुका था, इस का सही एहसास गली में खेलने वाले लड़के के मुंह से निकले शब्दों से उसे हो रहा था.
एक बार संबंध बन जाने के बाद यह सिलसिला सा बन गया. इस के बाद आतिश मोनिका की और ज्यादा मदद करने लगा. मोनिका का व्यवहार भी अब बदल चुका था. अब वह केसरवानी परिवार में ऐसे आत्मविश्वास के साथ काम और बातें करने लगी जैसे वह उस परिवार की ही सदस्य हो. मौका मिलने पर आतिश भी मोनिका को मौल, रेस्टोरेंट आदि जगहों पर ले जाने लगा.
अवैध संबंधों को कोई लाख छिपाने की कोशिश करे, लेकिन एक न एक दिन उन की पोल खुल ही जाती है. आतिश और मोनिका के साथ भी यही हुआ. एक दिन आतिश की बहन नीहारिका ने अपने भाई को मोनिका के साथ छेड़छाड़ करते देख लिया. हालांकि नीहारिका को मोनिका की बातों आदि से शक तो काफी दिनों से हो रहा था, लेकिन उस दिन सब कुछ अपनी आंखों से देखने के बाद उस का शक विश्वास में बदल गया.
यह बात छिपाने वाली नहीं थी. लिहाजा उस ने यह बात अपनी मां के कानों में डाल दी. मां ने आतिश को तो समझाया ही, साथ ही मोनिका को भी अपने घर के कामों से हटाने का फैसला ले लिया. लेकिन आतिश ने मोनिका का काम छुड़वाने का विरोध किया और साथ ही मां से वादा किया कि अब वह मोनिका से दूर रहेगा.
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घर वालों ने भी सोचा कि शायद आतिश अब मान जाएगा, लेकिनवह नहीं माना. मौका मिलते ही वह और मोनिका अपनी हसरतें पूरी कर लेते थे. उधर नीहारिका और किरण की निगाहें आतिश और मोनिका की हरकतों को समझ लेती थीं.
यह बात जब आतिश की पत्नी प्रियंका को पता चली तो उस ने घर में कोहराम मचा दिया. तब गुस्से में आतिश ने पत्नी की पिटाई कर दी. घर के सभी लोग आतिश को समझातेसमझाते थक गए, लेकिन उस के दिमाग में उन की बातें नहीं घुसी. उसे तो मोनिका के अलावा घर के सभी लोग दुश्मन लगने लगे थे.
आतिश की बहन नीहारिका को कहीं से आतिश और मोनिका की एक फोटो मिल गई, जिस में दोनों साथसाथ थे. उस ने भाई से कहा कि वह मोनिका को भूल जाए, वरना इस फोटो को सोशल मीडिया पर डाल देगी.
आतिश ने उस से कहा कि अगर वह अपने मोबाइल से फोटो डिलीट कर देगी तो वह मोनिका से नहीं मिलेगा. नीहारिका ने कहा कि वह कुछ दिनों तक देखेगी, अगर इस दौरान उस ने मोनिका से बात नहीं की तो वह फोटो डिलीट कर देगी.
आतिश 2-4 दिन तो मोनिका से नहीं मिला, लेकिन वह फिर उस से बातें करने लगा. जब नीहारिका ने देखा कि दोनों ने अपनी आदत नहीं सुधारी है तो उस ने आतिश और मोनिका की वह फोटो फेसबुक पर डाल दी. यह बात जब आतिश को पता लगी तो उस ने नीहारिका की पिटाई कर दी.
नौकरानी मोनिका से पति के संबंधों की वजह से प्रियंका मानसिक तनाव में रहने लगी, क्योंकि पति से वह कुछ कहती तो वह उस की पिटाई कर देता था.
इस बात को ले कर घर में कलह रहने लगी. मां किरण बेटी और बहू का पक्ष लेती थीं, इसलिए आतिश मां को बुराभला कहने से नहीं चूकता था.
दिनोंदिन घर के हालात सुधरने के बजाए बिगड़ते जा रहे थे. आतिश अपने मांबाप तक की पिटाई करने लगा था. शोरशराबा सुन कर पड़ोसी घर आ कर आतिश को समझाने की कोशिश करते तो वह उन्हें भी बेइज्जत कर देता. लिहाजा पड़ोसी भी परेशान हो गए.
पिता तुलसीदास केसरवानी जब ज्यादा परेशान हो गए तो उन्होंने एक दिन अपने शुभचिंतक पड़ोसी से बात की. पड़ोसी की सलाह पर तुलसीदास ने फैसला लिया कि वह धूमनगंज थाने जा कर बेटे के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराएंगे.
किसी तरह आतिश को इस बात की भनक लग गई कि उस के पिता थाने में उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने जाने वाले हैं. रिपोर्ट दर्ज होने के बाद उस के खिलाफ काररवाई हो सकती थी, लिहाजा उस ने अपने मातापिता के सामने हाथ जोड़ते हुए अपने किए की माफी मांगी और सुधर जाने का भरोसा दिया. मांबाप ने भी सोचा कि बेटे को अपनी गलती का अहसास हो रहा है तो उसे माफ कर देने में कोई बुराई नहीं है. लिहाजा उन्होंने उसे सुधर जाने की नसीहत देते हुए माफ कर दिया.
लेकिन माफी मांगने के पीछे आतिश के दिमाग में दूसरी ही खिचड़ी पक चुकी थी. उस ने सोच लिया था कि वह किसी तरह घर के सारे लोगों का काम तमाम कराएगा. उस के बाद पिता की सारी संपत्ति का मालिक बन जाएगा. साथ ही मोनिका के साथ रहने से उसे कोई रोकने वाला भी नहीं होगा.
आतिश की दुकान पर कई सालों से अनुज श्रीवास्तव नाम का एक युवक काम कर रहा था. वह दबंग किस्म का था. आतिश ने अपने घर वालों का कत्ल करने की बात उस से शेयर की, इस के लिए वह पैसे देने को भी तैयार था. अनुज पैसों के लालच में आ गया. 8 लाख रुपए में आतिश ने घर के 4 सदस्यों की हत्या कराने का सौदा पक्का कर दिया. इस के लिए उस ने अनुज को 75 हजार रुपए एडवांस भी दे दिए.
अनुज को लगा कि यह काम वह अकेला नहीं कर सकेगा, इसलिए उस ने कौशांबी के अजुहा गांव के अपने मामा राजकृष्ण श्रीवास्तव व एक अन्य आदमी को भी योजना में शामिल कर लिया. सभी ने तय किया कि गोली के बजाए चाकू से वारदात को अंजाम देना आसान रहेगा.
योजना को अंजाम देने के लिए 14 मई, 2020 बृहस्पतिवार का दिन तय हो गया. योजना के अनुसार आतिश दोपहर डेढ़ बजे किस्त जमा कराने के लिए बैंक चला गया, ताकि उस पर कोई शक न करे और बैंक के सीसीटीवी में भी उस की फुटेज आ जाए.
लौकडाउन की वजह से तुलसीदास की दुकान बंद थी. आतिश के घर से निकलने के बाद अनुज अपने मामा और साथी को ले कर तुलसीदास के घर पहुंच गया. चूंकि अनुज को घर के सभी लोग जानते थे, इसलिए उन्होंने सभी को घर में बुला लिया.
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अनुज ने तुलसीदास केसरवानी से साथ आए लोगों का परिचय अपने रिश्तेदारों के रूप में कराया और कहा कि लौकडाउन की वजह से इन्हें आर्थिक परेशानी है. अगर आप कुछ मदद कर दें तो इन का भला हो जाएगा.
उस समय तुलसीदास केसरवानी और उन की पत्नी किरण ही वहां मौजूद थे. बेटी नीहारिका ऊपर की मंजिल पर अपनी भाभी प्रियंका के पास थी. अनुज की बात पर तुलसीदास को दया आ गई. वह पैसे लेने के लिए अपनी दुकान की तरफ गए. क्योंकि उन की दुकान में जाने का एक दरवाजा घर के अंदर से भी था.
तुलसीदास के पीछेपीछे अनुज और उसका मामा भी गया. उन दोनों ने वहीं पर तुलसीदास केसरवानी का मुंह दबोच कर गला रेत दिया. गला कटने के बाद तुलसीदास जमीन पर गिरे तो आवाज सुन कर उन की पत्नी किरण वहां आई तो बदमाशों ने उन का भी गला रेत दिया. उसी दौरान बेटी नीहारिका भाभी के पास से नीचे आई तो उस की भी उन्होंने गला रेत कर हत्या कर दी.
इस के बाद वे ऊपर की मंजिल पर गए. वहां आतिश की पत्नी प्रियंका की भी उन्होंने हत्या कर दी. घर में 4 लोगों की हत्या करने के बाद उन्होंने बाथरूम में पहुंच कर खून से सने हाथ साफ किए. फिर दरवाजा भिड़ा कर वहां से चले गए.
सीओ बृजनारायण सिंह ने आरोपी आशीष उर्फ आतिश से पूछताछ के बाद अन्य आरोपियों को गिरफ्तार करने के लिए उन के घरों पर टीमें भेजीं. लेकिन अनुज श्रीवास्तव ही पुलिस के हाथ लग सका, अन्य अभियुक्त अपने घरों से फरार मिले. पूछताछ में अनुज श्रीवास्तव ने भी अपना अपराध स्वीकार कर लिया.
हत्यारोपी अनुज श्रीवास्तव और आशीष उर्फ आतिश से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश कर जिला जेल भेज दिया.
– कथा पुलिस सूत्रों व जनचर्चा पर आधारित
उस समय घर के सभी लोग ठीकठाक थे. जब वह पौने 4 बजे बैंक से घर लौटा तो उसे घर का दरवाजा भिड़ा हुआ मिला, घर में सभी लोगों की लहूलुहान लाशें पड़ी थीं. कहतेकहते आतिश रोने लगा.
मामला गंभीर जरूर था, लेकिन पुलिस अधिकारियों को इस बात की संभावना नजर आ रही थी कि इस केस में ऐसा कोई व्यक्ति शामिल था, जिस के इस परिवार से नजदीकी संबंध थे. प्रारंभिक पूछताछ के बाद पुलिस ने चारों शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिए.
हत्या के इस मामले को सुलझाने के लिए एसएसपी सत्यार्थ पंकज ने सीओ बृजनारायण सिंह की अगुवाई में कई पुलिस टीमों को लगा दिया. सभी पुलिस टीमें अलगअलग ऐंगल से केस की तह में पहुंचने की कोशिश में जुट गई.
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एक पुलिस टीम क्षेत्र में स्थित मोबाइल फोन टावर के संपर्क में आने वाले फोन नंबरों (डंप डाटा) को खंगालने में लगी थी तो दूसरी टीम तुलसीदास केसरवानी के घर के बाहर और रास्ते में लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज देखने में लगी थी. मृतकों के घर के बाहर भी सीसीटीवी कैमरा लगा था, लेकिन जांच में पता चला कि वह कैमरा पहले से ही खराब था.
सीओ बृजनारायण सिंह अब यह पता लगाने में जुट गए कि केसरवानी परिवार के यहां किनकिन लोगों का आनाजाना था और उन के ऐसे कौनकौन नजदीकी रिश्तेदार या संबंधी हैं, जिन का उन के यहां आनाजाना था.
यह सब जानने के लिए उन्होंने आशीष उर्फ आतिश को कोतवाली बुलवाया. पुलिस की एक टीम को लोगों से बातचीत कर के जानकारी मिली थी कि शादीशुदा आतिश के एक महिला के साथ प्रेम संबंध हैं, जिस की वजह से उस के घर में अकसर झगड़ा होता था.
पुलिस के लिए यह जानकारी महत्त्वपूर्ण थी. पुलिस को इस बिंदु पर भी आतिश से बात करनी थी. सीओ बृजनारायण सिंह ने आतिश से सब से पहले पूछा कि उस की या उस के पिता की किसी से कोई दुश्मनी तो नहीं थी.
आतिश ने किसी से रंजिश होने की बात से इनकार कर दिया. इस के बाद उन्होंने आतिश से उन रिश्तेदारों, दोस्तों या संबंधियों के बारे में पूछा जो उस के घर आतेजाते थे. आतिश ने उन सभी के नाम लिखवा दिए.
यह जानकारी लेने के बाद सीओ साहब ने आतिश से उस महिला के बारे में पूछा, जिस के साथ उस के प्रेम संबंध थे. यह सुनते ही आतिश के चेहरे का रंग उड़ गया. वह संभलते हुए बोला, ‘‘सर, मेरी तो शादी हो चुकी थी, पत्नी प्रियंका के होते मैं यह सब कैसे कर सकता था?’’
‘‘क्या शादीशुदा पुरुषों के किसी दूसरी महिला के साथ संबंध नहीं होते?’’ सीओ साहब ने पूछा.
‘‘सर, होते होंगे, लेकिन मैं ऐसा नहीं हूं.’’ आतिश बोला.
‘‘जब ऐसी बात नहीं थी तो तुम्हारी पत्नी और मातापिता के साथ तुम्हारा किस बात को ले कर झगड़ा होता था?’’ सीओ बृजनारायण सिंह ने उस से पूछा.
‘‘सर, घरेलू बातों को ले कर कभीकभी कहासुनी हो जाती थी.’’ आतिश ने सफाई दी.
‘‘आतिश, तुम झूठ बोल रहे हो. बात घरेलू नहीं बल्कि उस औरत और तुम्हारे संबंधों की ही थी. जिस की वजह से तुम ने कई बार अपने मातापिता और पत्नी की पिटाई तक कर दी थी. तुम बात को छिपाने की कोशिश मत करो, हमें सच्चाई बता दोगे तो सही रहेगा वरना हमें दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा.’’ सीओ साहब ने तल्खी से कहा.
सख्ती की बात सुन कर आतिश को लगा कि अब उस का झूठ ज्यादा देर तक नहीं चलेगा. उस की आंखों में आंसू छलक आए. वह सीओ साहब के सामने हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘सर, मुझे माफ कर दो. मुझ से बहुत बड़ी गलती हो गई. मेरी मति मारी गई थी, जो अपने ही घर वालों का दुश्मन बन बैठा.’’
सीओ बृजनारायण सिंह ने उसे तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘कभीकभी इंसान अपने स्वार्थ में इतना अंधा हो जाता है कि अपनों का ही अहित कर बैठता है. तुम तो पढ़ेलिखे, अच्छे बिजनैसमैन हो तो फिर यह सब कैसे हो गया?’’
‘‘सर, मातापिता, बहन और पत्नी की हत्या का जिम्मेदार मैं खुद ही हूं. मैं ने 8 लाख रुपए की सुपारी दे कर उन की हत्या कराई थी.’’ आतिश ने बताया.
आतिश से पूछताछ के बाद रिश्तों का कत्ल करने की एक ऐसी कहानी सामने आई, जो दिल को झकझोर देने वाली थी—
तुलसीदास केसरवानी अपने परिवार के साथ प्रयागराज की पौश कालोनी प्रीतम नगर में रहते थे. तुलसीदास केसरवानी मूलरूप से कौशांबी जिले के मंझनपुर के रहने वाले थे. सालों पहले वह प्रयागराज आ कर बस गए थे.
उन के परिवार में पत्नी किरण के अलावा एक बेटा आशीष उर्फ आतिश और एक बेटी नीहारिका उर्फ गुडि़या थी. तुलसीदास केसरवानी ने अपने घर में ही अपनी बेटी के नाम पर गुडि़या इलैक्ट्रिकल्स की दुकान खोल ली थी. उन की बिजली के उपकरण बेचने की काफी बड़ी दुकान थी. उन की यह दुकान कालोनी में होने के बावजूद अच्छी चलती थी. दुकान की आमदनी से न केवल उन का घर ठीक से चल रहा था, बल्कि दोनों बच्चों को भी पढ़ायालिखाया.
बेटा आतिश ग्रैजुएशन करने के बाद पिता के साथ दुकान पर बैठने लगा था. तुलसीदास धीरेधीरे दुकान की जिम्मेदारी आतिश को ही सौंपने लगे थे. उन्होंने अपनी दुकान पर काम करने के लिए अनुज नाम के एक युवक को नौकरी पर रख लिया था.
करीब 4 साल पहले आतिश ने शहर की ही प्रियंका से लवमैरिज कर ली थी. पिता तुलसीदास केसरवानी पुराने विचारों के थे. वह मन में एकलौते बेटे की शादी के सपने संजोए थे, लेकिन जब बेटे ने प्रियंका को चुन लिया तो उन्होंने उसे ही बहू स्वीकार कर लिया.
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प्रियंका ने भी अपने व्यवहार से ससुराल के सभी लोगों के दिलों में जगह बना ली. नीहारिका वैसे तो प्रियंका की ननद थी लेकिन उन दोनों की आपस में फ्रैंड की तरह अच्छी पटती थी.
सब कुछ ठीकठाक चल रहा था, लेकिन करीब 6 महीने पहले मोनिका (परिवर्तित) नाम की एक महिला आतिश के जीवन में ऐसी आई कि केसरवानी परिवार में हलचल मच गई.
दरअसल, धूमनगंज की रहने वाली मोनिका आतिश के घर में घरेलू काम करने आती थी. उस का विकलांग पति सरकारी नौकरी करता था लेकिन एक फरजीवाड़े के आरोप में वह बरखास्त हो गया था. इस के बाद उस के घर में आर्थिक समस्या खड़ी हो गई थी.
कुछ दिनों तक तो पतिपत्नी अपनी जमापूंजी से घर का खर्च चलाते रहे. इस के बाद उन्होंने लोगों से पैसे उधार ले कर काम चलाया. चूंकि मोनिका का पति विकलांग था, इसलिए वह कोई दूसरा मेहनत का काम नहीं कर सकता था. इसलिए जब भूखों मरने की नौबत आ गई तो मोनिका ने ही काम करने के लिए घर से बाहर कदम रखे.
वह घरों में काम करने लगी. इसी दौरान तुलसीदास केसरवानी की पत्नी किरण ने दया दिखाते हुए मोनिका को अपने यहां घर के काम करने के लिए रख लिया.
मोनिका खूबसूरत होने के साथसाथ घर के काम करने में होशियार थी. इसलिए केसरवानी परिवार में मोनिका को हमदर्दी भरा प्यार मिला, इस से वह केसरवानी परिवार के सभी सदस्यों से घुलमिल गई.
मोनिका जवान व हंसमुख थी. आतिश को उस का हंसमुख होना पसंद था. मोनिका की इसी आदत ने आतिश के दिल में जगह बना ली. यानी शादीशुदा होते हुए भी उस का झुकाव मोनिका की तरफ हो गया. वह समयसमय पर उसे आर्थिक सहयोग भी देने लगा. इस का नतीजा यह हुआ कि दोनों बहुत जल्दी ही एकदूसरे के करीब आ गए. फिर एक दिन ऐसा भी आया, जब दोनों ने अपनेअपने जीवनसाथियों को धोखा दे कर हसरतें पूरी कर लीं.