प्रैगनैंट महिलाओं पर घरेलू हिंसा का ऐसे पड़ता है प्रभाव

मुंबई की 24 साल की मनीषा जब गर्भवती हुई तो कुछ परेशान सी रहने लगी. वह न तो अपनी मनपसंद का खाना बना सकती थी और न ही खा सकती थी, क्योंकि परिवार में सासससुर हमेशा उसे अच्छा खाना बना कर खाने पर ताने देते थे. अगर मनीषा का पति अपने मांबाप से कुछ कहता तो वे उसे भी भलाबुरा कहते.

एक दिन तो इतनी कहासुनी हुई कि सासससुर ने मनीषा को घर से निकल जाने को कह दिया. मनीषा के घर छोड़ने के कदम में उस के पति ने भी उस का साथ दिया और दोनों ने बड़ी मुश्किल से अपनी अलग गृहस्थी जमाई. अब मनीषा को इस बात का डर सताने लगा था कि पता नहीं उस की डिलिवरी ठीक से होगी या नहीं. अपनेआप को काफी संभालने के बाद भी उस की प्रीमैच्योर डिलिवरी हुई. बच्ची ने काफी समय बाद बोलनाचलना सीखा.

नवजात पर बुरा असर

ऐसी कई घटनाएं हैं जहां डिलिवरी के समय या बाद में बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास कम होने पर डाक्टर जब इस की बारीकी से जांच करते हैं तब कई बार घरेलू हिंसा की बात सामने आती है. एक सर्वे में पाया गया कि 5 प्रैगनैंट महिलाओं में से एक महिला घरेलू हिंसा की शिकार अवश्य होती है. इन में से कुछ महिलाएं तो पहले इस बारे में बता देती हैं तो कुछ छिपाती हैं, जिस का पता डिलिवरी के बाद चलता है. यह घरेलू हिंसा ज्यादातर 21 से 35 वर्ष की महिलाओं के साथ होती है और खासकर गरीबी रेखा के नीचे रहने वाली महिलाओं के साथ और कुछ खास समुदाय और उच्च वर्ग की महिलाओं के साथ.

इस बारे में मुंबई के मल्हार नर्सिंगहोम की स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञा, डा. रेखा अंबेगांवकर कहती हैं, ‘‘घरेलू हिंसा की शिकार महिलाओं को केवल प्रैगनैंसी के दौरान या बाद में ही नहीं, बल्कि गर्भधारण के पहले से भी अगर उन्हें डोमैस्टिक वायलैंस का सामना करना पड़ता है, तो उस का असर प्रैगनैंसी के बाद भी बच्चे पर होता है. यह अधिकतर उन परिवारों में अधिक होता है जहां पति किसी नशे का आदी हो. निम्नवर्ग में यह अधिक है.

‘‘कई बार महिला नहीं चाहती कि उस का बच्चा ऐसे माहौल में जन्म ले, जहां उसे अच्छी परवरिश न मिले. ऐसे में गर्भधारण के बाद वह जरूरत के अनुसार खानापीना छोड़ देती है. सही समय पर अपना चैकअप नहीं कराती, जिस से बच्चे का विकास गर्भ में कम होता है और प्रीमैच्योर डिलिवरी हो जाती है, जिस से बाद में बच्चे में कई प्रकार की समस्याएं जन्म लेती हैं. मसलन, विकास सही तरह से न होना, बात न कर पाना. देरी से चलना आदि.

‘‘इस के अलावा अगर किसी ने पत्नी के पेट पर जोर से लात मारी हो या धक्का दिया हो तो कई बार प्लैसेंटा अलग हो जाने से भी बच्चा प्रीमैच्योर हो जाता है या फिर गर्भपात होने का डर रहता है.’’

डा. रेखा आगे कहती हैं, ‘‘शारीरिक हिंसा तो बाहर से दिखती है, लेकिन मानसिक यातनाओं को समझना मुश्किल होता है, क्योंकि महिलाएं उसे बताना नहीं चाहतीं. ऐसी कई महिलाएं मेरे पास आती हैं जो ट्रामा में होती हैं कि बच्चा लड़का है या लड़की. ऐसे केसेज को बहुत सावधानी से हैंडल करना पड़ता है.

‘‘शारीरिक यातनाओं की शिकार महिलाएं अधिकतर सरकारी अस्पतालों में दिखाई पड़ती हैं, क्योंकि वहां गरीब महिलाएं अधिक जाती हैं और उन के घरों में घरेलू हिंसा अधिक होती है.

‘‘थोड़े पढ़ेलिखे परिवारों में मेल चाइल्ड पर लोग अधिक फोकस्ड होते हैं, क्योंकि उन्हें 1 या 2 बच्चे ही चाहिए, उन्हें लड़का अवश्य चाहिए. उन्हें लिंग की जांच कराने के लिए मजबूर किया जाता है, जो वे नहीं कराना चाहतीं. ऐसे में अधिकतर महिलाएं मानसिक रूप से प्रताडि़त होती हैं.’’

हिंसा की शुरुआत

घरेलू हिंसा की शुरुआत पुरुष का पहले अपनी पत्नी को चांटा मारने से होती है. इस के बाद आती है शारीरिक और सैक्सुअल वायलैंस. कई बार घरेलू हिंसा इतनी अधिक होती है कि महिला की जान पर भी बन आती है. इस में अगर महिला कामकाजी है, तो कुछ विरोध करती है, लेकिन ऐसा करने पर परिवार के अन्य लोग और समाज उसे ही दोषी मानता है.

इस बारे में मुंबई के सूर्या हौस्पिटल के बाल रोग विशेषज्ञ डा. मेहुल दोषी कहते हैं, ‘‘घरेलू हिंसा की वजह से प्रैगनैंट वूमन हमेशा डरी रहती है. इस में चाहे शादी लव मैरिज हो या अरेंज्ड किसी में भी यह समस्या हो सकती है. ऐसी प्रताडि़त महिला का ब्लडप्रैशर सही नहीं होता. वह ऐनीमिक हो जाती है, उसे मधुमेह की बीमारी भी हो सकती है. इस से बच्चे का मानसिक और शारीरिक विकास सही नहीं हो पाता और उस का वजन कम होता है. बच्चा कुपोषण का शिकार होता है. मृत्यु दर भी इन बच्चों की अधिक है.’’

यह हिंसा उन परिवारों में भी अधिक है. जहां पतिपत्नी अकेले रहते हैं. संयुक्त परिवारों में इन की संख्या कम है. इस की वजह के बारे में मानसिक रोग विशेषज्ञ डा. राजीव आनंद बताते हैं, ‘‘प्रैगनैंसी के बाद महिला को कई सारे शारीरिक और मानसिक दौर से गुजरना पड़ता है. अकेले होने पर इस बदलाव को अपने ऊपर देख कर उन्हें अजीब अनुभव होता है, इस में पति का साथ न मिलने पर वे चिड़चिड़ी हो जाती हैं और पति इसे समझ नहीं पाता, परिणामस्वरूप, कहासुनी, बहस, मारपीट आदि शुरू हो जाती है जबकि संयुक्त परिवारों में सब का साथ मिलने से यह थोड़ा आसान हो जाता है. महिला अपनी समस्या को किसी के साथ शेयर कर सकती है.

बच्चे को जन्म देने के लिए पतिपत्नी दोनों को एकदूसरे के प्रति निष्ठावान होने की आवश्यकता होती है. कुछ दंपतियों में तो शादी के दूसरे साल से ही अनबन शुरू हो जाती है. ऐसे में पत्नी सोचने पर मजबूर हो जाती है कि वह बच्चे को जन्म दे या नहीं.

औडियोलौजिस्ट ऐंड स्पीच थेरैपिस्ट देवांगी दलाल का कहना है, ‘‘बचपन से अगर बच्चा कुपोषण का शिकार है, तो उस की बौडी मूवमैंट भी देर से होती है. अधिकतर ऐसे बच्चे 1 साल के बाद बोलने लगते हैं. इस की वजह उन का गर्भ में सही तरह विकास न होना है.

‘‘घरेलू हिंसा की शिकार अधिकतर महिलाओं के पति अशिक्षित और आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे होते हैं, जिन्हें बच्चा इसलिए नहीं चाहिए क्योंकि उन के लिए बच्चा बोझ है और वे अपनी पत्नी को गर्भपात के लिए मजबूर करते हैं. उन के न मानने पर मारपीट करते हैं. इसे कम करने के लिए महिलाओं का शिक्षित और आत्मनिर्भर होना आवश्यक है.’’

बच्चे की जिम्मेदारी पतिपत्नी दोनों की होती है, लेकिन अगर पति या पारिवारिक माहौल ठीक नहीं है तो निराश न हों, क्योंकि बच्चे की जिम्मेदारी मां की भी है और कुछ सावधानियां बरतने से इस से छुटकारा पाया जा सकता है. डाक्टर रेखा के अनुसार डोमैस्टिक वायलैंस से बचने के उपाय निम्न हैं:

  • सब से पहले पति का व्यवहार ठीक न होने पर परिवार के दूसरे सदस्यों का सहारा लें.
  • अधिक समस्या है, तो मनोरोग चिकित्सक के पास जाएं.
  • नशे या ड्रग के आदी पति से दूर रहें.
  • घरेलू हिंसा को सहें नहीं, बल्कि पुलिस में रिपोर्ट करें.
  • किसी एनजीओ की भी हैल्प ले सकती हैं.

उम्र में पत्नी से छोटे पति

Society News in Hindi: साल 1998 में अरबाज खान से शादी कर साल 2017 में तलाक लेने वाली 45 साला बौलीवुड की मशहूर ‘आइटम गर्ल’ मलाइका अरोड़ा अब अपने से 12 साल छोटे अर्जुन कपूर के साथ रिलेशनशिप में हैं. वे दोनों अब पब्लिकली नजर आने लगे हैं. उन की शादी होगी, ऐसी खबरें भी उड़ने लगी हैं. दोनों के डिनर डेट की तसवीरें वायरल हो रही हैं. 43 साल की सुष्मिता सेन पिछले कुछ दिनों से अचानक अपने अफेयर को ले कर फिर से चर्चा में हैं. इस बार वे खुद से 15 साल छोटे रोहमन शौल के साथ रिलेशनशिप को ले कर खबरों में हैं. वे दोनों कई पार्टियों में साथ भी नजर आए हैं.

खबरों में यह भी है कि रोहमन शौल ने सुष्मिता सेन को शादी के लिए प्रपोज किया है. वे दोनों तकरीबन 2-3 महीने पहले एक फैशन इवैंट में मिले थे और अब एकदूसरे को डेट कर रहे हैं.

प्रियंका चोपड़ा भी अपनी शादी से पहले पिछले दिनों न्यूयौर्क में प्रीब्राइडल सैरेमनी के बाद अपनी गर्लगैंग के साथ बैचलर पार्टी के लिए एमस्टरडम रवाना हुई थीं. उस के बाद वे अपने से 11 साल छोटे निक जोनस के साथ शादी कर चुकी हैं.

कुछ समय पहले अपने से 7 साल छोटे हर्ष से शादी कर कौमेडियन भारती ने भी सब को अचरज में डाल दिया था. इस से पहले 41 साल की उम्र में प्रीति जिंटा ने अपने से 10 साल छोटे फाइनैंशियल एनालिस्ट जीन गुडइनफ से शादी कर ली थी तो उर्मिला मातोंडकर ने भी 9 साल छोटे मोहसिन से शादी कर सब को हैरत में डाल दिया था.

जाहिर है कि पढ़ाईलिखाई, नौकरी और अपने पैरों पर खड़े होने के बाद अब औरतें रिलेशनशिप और शादी को ले कर भी खुल रही हैं.

पहले जब औरतें घर से बाहर नहीं निकलती थीं तब उन्हें आदमी के पैर की जूती माना जाता था. उन के पास कोई हक नहीं था. पति की बात मानना, उस के मुताबिक खुद को ढालना और पति जब कहे समर्पण के लिए तैयार रहना, यही आदर्श पत्नी की खासीयतें थीं.

मगर अब माहौल बदल रहा है. आज औरतें पढ़लिख कर आगे बढ़ रही हैं. वे काबिल बन रही हैं. वे भरपूर नाम, पैसा और रुतबा हासिल कर रही हैं. ऐसे में वे पति का दबदबा क्यों सहें?

इस सिलसिले में मनोवैज्ञानिक और सोशल ऐक्टिविस्ट अनुजा कपूर कहती हैं कि अगर मर्द कम उम्र की लड़की से शादी कर सकता है, 15 साल की लड़की 45 साल के अधेड़ की बीवी बन सकती है, तो औरतें खुद से छोटे लड़कों को पति क्यों नहीं बना सकतीं?

आज औरतें कामयाब हैं. अपने पैरों पर खड़ी हैं. उन्हें अपने हक और कानून मालूम हैं. वे आदमी के बिना भी रह सकती हैं. वे घर के काम आराम से कर सकती हैं और बाहर के काम भी, इसलिए उन की जिंदगी में मर्द की अहमियत अब उतनी नहीं रही है.

पहले औरतों की शादी ज्यादा उम्र के शख्स से की जाती थी ताकि वे पति के कंट्रोल में रहें. उन की हर बात माने. ज्यादा उम्र के मर्दों के पास पैसा, तजरबा और रुतबा सबकुछ होता था. आज औरतें खुद ही इतनी काबिल, पढ़ीलिखी और कमाऊ हैं तो वे किसी का रोब क्यों सहें? वे अपने से कम उम्र के मर्द से शादी कर उस पर दबदबा बना कर रख सकती हैं. इसे एकदम से गलत भी नहीं माना जा सकता है, क्योंकि जो ज्यादा काबिल और रुतबेदार होगा वही दूसरे पर हावी रहेगा. यही समाज का नियम है.

सवाल उठता है कि मर्द क्यों अपने से ज्यादा उम्र की लड़की या औरत से शादी करते हैं? इस की कई वजहें हो सकती हैं, जैसे:

समझदार और अनुभवी

बड़ी उम्र की पत्नी स्वभाव से गंभीर होती है. उन के साथ रिलेशनशिप में कम उम्र वाले ड्रामों और बचपने की गुंजाइश नहीं रहती, बल्कि आपसी समझ बनी रहती है. उन्हें हर मामले में ज्यादा तजरबा रहता है.

रुपएपैसे से मदद

बड़ी उम्र की कमाऊ पत्नी पैसे के लिहाज से भी मजबूत होती है. अपने पति के कैरियर को आगे बढ़ाने में और सैटल होने में भी मददगार रहती है. वह हर मामले में बेहतर सलाह दे सकती है और अपने संपर्कों से पति को फायदे में पहुंचा सकती है.

ये औरतें कम उम्र की ऐसी हाउस वाइफ से बेहतर होती हैं जो पैसों की अहमियत नहीं समझती हैं, बेमतलब का खर्च करने की आदी होती हैं और पूरी तरह पति पर निर्भर होती हैं.

सब्र और परवाह वाली

बड़ी उम्र की बीवी कम मांग करती है और ज्यादा देखभाल करती है. वह पूरा प्यार देना जानती है. फिल्म ‘ऐ दिल है मुश्किल’ में ऐश्वर्या राय बच्चन का किरदार कुछ ऐसा ही था. वे रणबीर कपूर के साथ ऐसे ही एक रिश्ते में थीं जहां वे फेमस शायर थीं तो वहीं रणबीर कपूर टौय बौय की तरह उन के साथ जुड़े थे.

जहां तक बात साथ जिंदगी जीने की है तो क्या ऐसे रिश्ते कामयाब होते हैं? क्या हैल्थ और सैक्सुअल समस्याएं आ सकती हैं?

इस बारे में सैक्सुएलिटी पर काफी काम कर चुके अल्फ्रैड विनसे के मुताबिक, मर्दों में सैक्सुअल हार्मोन

18 साल की उम्र में हद पर होते हैं, जबकि औरतों में 30 साल की उम्र के बाद यह समय होता है. हैल्थ के नजरिए से भी औरतें 5 साल ज्यादा जीती हैं. ऐसा होने की वजह लाइफस्टाइल या बायोलौजी नहीं है.

एक विधुर के अनुपात में उसी उम्र की 4 विधवाएं जिंदा रहती हैं यानी अपने से ज्यादा उम्र की लड़की के साथ शादी करने वाले मर्द पत्नी के साथ ही बूढ़े होते हैं.

वैसे भी प्यार में उम्र का फर्क माने नहीं रखता. जिंदगी किस के साथ और किस तरह बीती, यह अहम होता है.

New Year 2024: नई आस का नया सवेरा

New Year Special: नया साल (New Year) आ गया है. सब एक दूसरे को बधाई (Greetings) दे रहे हैं और कह रहे हैं कि साल 2024 (Year 2024) आपके लिए खुशियां लाए. आप बाहर से कितने ही उपाय कर लें, सकारात्मक सोच की पचास किताबें पढ़ लें, सोचसोच कर पचासों वस्तुएं संगृहीत कर लें जो आप के लिए सुखदायक हैं, परंतु यदि आप की आंतरिक विचारणा अनर्गल, आत्मपीड़ित व निंदक है, आप ढुलमुल नीति के हैं, तब आप के जीवन में कोई महत्त्वपूर्ण परिवर्तन आने वाला नहीं. हमारे व्यवहार के गलत तरीके हमारे जीवन में तनाव लाते हैं, दुख से ही हमें अधिक परिचित कराते हैं. हम हर सुखात्मक स्थिति में भी तकलीफ ही तलाश करते हैं. क्या हो चुका है, यह हमें प्रीतिकर नहीं लगता, पर जो नहीं हुआ है उस पर हमारी दृष्टि लगी रहती है. हम स्वयं शांति चाहते हैं, हर काम में परफैक्शन तलाश करते हैं, तब हमारी निगाह हमेशा कमियां तलाश करने में चली जाती है और हम तो दुखी होते ही हैं, दूसरे के लिए भी दुखात्मक भावनाएं पैदा करते हैं. चाहे घर पर हों या कार्यालय में, हम कहीं भी खुश नहीं रह सकते, हम जीवन को दयनीय और दुखात्मक बनाते चले जाते हैं.

शेखर साहब बड़े अफसर रहे हैं. कार्यालय में आते ही वे पहले अपनी नाक पर उंगली रख कर सगुन देते. तब कुरसी पर बैठते. बजर बजाते, पीए अंदर आता तो सगुन देखते, सगुन चला तो अंदर आने देते, वरना वापस भेज देते. पूरा कार्यालय परेशान था. वे मेहनती व ईमानदार भी थे. पर न वे खुश रह पाते थे न किसी और को रहने दे सकते थे. एक बार उन के बड़े साहब आए. उन्हें यह पता था. वे अपने साथ नसवार से रंगा लिफाफा लाए थे. उन्हें दिया तो वे अचानक छींकने लग गए. शेखर साहब घबरा गए. सगुन जो बिगड़ गया था. बड़े साहब ने समझाया, सगुन की बात नहीं है, कागज में नसवार लगी है. छींक आएगी ही. सगुन को पालना बंद करो. तुम ने सब को दुखी कर रखा है.

जिंदगी चलने का नाम है

आप ने नट का खेल अवश्य देखा होगा. नट अपने संतुलन से बांस के सहारे रस्सी पर कुशलता से चलता है. यह जीवन जीने की वह कला है, जो बिना धन दिए प्राप्त की जा सकती है. कुछ रास्ते हैं, जहां आप खुशहाल जीवन को दुखी बना देते हैं जबकि दुखी जीवन को भी खुशी से जीने लायक बना सकते हैं.

हम अकसर आदर्शवादी विचारों से प्रभावित होते हैं. हमें बाहर यह बताया जाता है कि हम गलत बातों को छोड़ दें, यह समझाया जाता है कि जहां तक हो सके गलत विचारधारा को कम करते जाएं, इस से धीरेधीरे आप नकारात्मक सोच के प्रवाह से बाहर आते जाएंगे. पर यह भी उतना प्रभावशाली नहीं है.

हमारे भीतर नकारात्मकता का पहला वेग तेज उफान की तरह तब आता है, जब हम अपनेआप को दूसरों के साथ तुलना कर के देखते हैं. बचपन में यह सिखाया गया है, तुम्हें क्लास में फर्स्ट आना है. मातापिता हमेशा अपने बच्चे की दूसरों के साथ तुलना कर के उस का मूल्यांकन करते हैं.

क्या कभी हम ने अपनेआप से, अपनी कार्यकुशलता को, अपनी उत्पादकता को सराहा है? हमें यह सिखाया गया है कि इस से अहंकार पैदा हो जाता है. पर यह सोचना उचित नहीं है.

तुलना अपनेआप से करें

अपनी उपलब्धियों से तुलना करें. कल घूमने नहीं गया, व्यायाम नहीं किया, ब्लडशुगर बढ़ गई है आदि. अपनेआप अपने स्वास्थ्य के प्रति ध्यान जाएगा. ऐसे ही, कल बगीचे में पानी दिया था. पौधे अच्छे लग रहे हैं. आप हमेशा अपने आज की अपने कल से तुलना कर, बेहतर खुशी पा सकते हैं, अपनी कार्यकुशलता को बढ़ा सकते हैं. सुबह उठते ही समय अपनेआप को दें, आज यह काम करना है, टारगेट जो संभव हो उस से कम ही रखें. रात को एक बार अवश्य सोचें, कितना हो गया, क्या कमी रही, बस नींद गहरी आएगी. अपनेआप पर विश्वास आना शुरू होगा. खुश रहने की यह पहली सीढ़ी है.

खुद चुनें अपनी राह

आप बीमार हैं, अस्वस्थ हैं. अकसर आप पाएंगे कि पचासों लोग आप को देखने आ रहे हैं, वे सब के सब आप को सलाह दे रहे हैं. जहां खुशी होती है, वहां लोग नहीं जाते, पर जहां कहीं अभाव या कमी होती है, वहां सलाह देने वालों की जमात जमा हो जाती है. तो क्या हम सब को सुनने के लिए तैयार बैठे हैं? हम हमेशा सब को खुश नहीं कर सकते, सब की बातों को मान कर अपना रास्ता नहीं बना सकते.

माना सलाह और सलाहकार जीवन में महत्त्वपूर्ण हैं, पर रास्ता हमें स्वयं ही तय करना है. हर व्यक्ति को उस के सामर्थ्य की पहचान है. जो व्यक्ति, इस राह पर चले हों, उन की सफलता या असफलता के अनुभव ही आप के लिए सहायक हो सकते हैं. यह याद रहे. जिस किसी ने अपने अनुभव को बताया है, वह अतीत की घटना हो चुकी है. वर्तमान में हर घटना नई होती है. यहां दोहराव नहीं होता. चुनौती का सामना मात्र वर्तमान में ही रह कर होता है. हो सकता है, जो निर्णय लिया है, उस में कमी रह गई हो, वांछित लाभ न मिला हो पर यह असफलता आगे की रणनीति बनाने में सहायक होगी. जो कहा गया है, उसे सुनें. परंतु अपनी आंतरिक विचारणा का आधार न बनने दें.

तू दुख का सागर है

फिल्म ‘सीमा’ में मन्ना डे द्वारा गाया गीत ‘तू प्यार का सागर है’…आज उल्टा हो गया है. चारों ओर नकारात्मकता के सागर हिलोरे लेते रहते हैं. आज टैलीविजन, समाचारपत्र, नकारात्मकता के भंडार हो गए हैं. सुबह से ही टीवी पर राशियों व 9 ग्रहों का नकारात्मक मेला करोड़ों लोगों को नकारात्मक कर के कमजोर बनाने में लग जाता है. रोजाना पचासों ज्योतिषी, बारह खाने और 9 ग्रह की रामलीला बेच कर करोड़ों रुपए कमाते हैं. टीवी का रिमोट अपने हाथ में है. अपने मन को सजग रखें. ऐसी परिस्थितियों से नकारात्मकता बढ़ती है और आशावाद की जगह निराशावाद जन्म लेता है. इस से बचें. मन को सृजनात्मक कार्यों से जोड़ने का प्रयास करें.

कल ही की बात है शर्माजी बता रहे थे. उन्हें रात के 11 बजे उन की बेटी ने नींद से जगा कर फोन पर बताया कि दामाद के पिता का पुराने प्रेमसंबंध का पता लगने पर दोनों पितापुत्र बहुत झगड़ रहे थे. यह बात परिवार में घटी पुरानी घटना थी. घटना भी हजारों मील दूर की थी. यह बात अगले दिन भी तो बताई जा सकती थी. इस बात से शर्माजी रात भर बेचैन रहे. नकारात्मक लहरों में डूबे रहे.

लोगों का काम है कहना

मेरी एक परिचित मेरे पास आई हुई थीं. उन्होंने बताया कि वे कुछ दूरी पर शनि मंदिर में गई थी. वहां पूजा करवाई थी. ‘पूजा…’ मैं चौंक गया. क्या शनि की भी पूजा होती है? हमारा मन इसीलिए इतना नकारात्मक हो गया है कि हम सब तरफ भय को ही देख पाते हैं. थोड़ी सी भी कठिनाई आई नहीं कि हम पंडित, ज्योतिषी, बाबा की शरण में पहुंच जाते हैं.

हमारा मन जैसा होता जाता है, वह उन्हीं बातों को संगृहीत करने लग जाता है. यह उस की आदत है. हम जब निरंतर चाहे अपने परिवार में हों या पड़ोस में, इन नेगेटिव लोगों से घिरे रहते हैं तो वे सचमुच हमारी रचनात्मकता को सोख लेते हैं. आप आशावादी कैसे होंगे जब आप के वातावरण में नकारात्मक लहरें चारों ओर से धक्के मार रही हों.

खुश रहना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार है. हम खुश रहें तो दवाओं का आधा खर्चा कम हो जाता है साथ ही, हमारी कार्यकुशलता भी बढ़ जाती है. वाणिज्य की भाषा में इस से बड़ा कोई इन्वेस्टमैंट नहीं है, जहां मुनाफा बहुत ज्यादा है.

आखिर हम हर मामूली बात को भी ज्यादा गंभीरता से क्यों लेते हैं? आम बोलचाल में अधिक कहना, बतियाना, हमारा स्वभाव हो गया है. पहले टैलीफोन पर बात करना कठिन था, महंगा बहुत था. बाहर की कौल सुबह से शाम तक नहीं लग पाती थी. तनाव कम था. अब मोबाइल क्रांति है. खाने वाली बाई फोन कर कहती है, ‘मैं शाम को नहीं आऊंगी.’ पूछा जाता है, ‘क्यों? 3 दिन पहले भी छुट्टी ली थी.’ वह फोन काट देती है. गृहिणी नाराज हो जाती है. वह फिर फोन करती है. वह फोन नहीं उठाती है. संघर्ष शुरू हो गया, परिवार अचानक तनाव में चला जाता है.

आज हालत यह है कि आप कहीं भी हों, मोबाइल हमेशा आप को जोड़े रखता है. सगाइयां विवाह के पहले टूट जाती हैं. आप को बतियाने का शौक है. पैसे कम लगते हैं, जो कहना…नहीं कहना है…सब कह दिया जाता है.

चुप रहने का अपना मजा है, अपने को बोलते हुए भी सुनें और खुश रहना एक बार आदत में आ गया तो कैसी भी कठिनाई आए, आप की सामना करने की ताकत बढ़ जाएगी. क्या आप यह नहीं चाहते हैं?

जब डॉक्टर करता है, गर्भपात का अपराध!

Scoiety News in Hindi: गांव में अपढ़ झोला छाप डाक्टर किसी गर्भपात (Abortion) के अपराध में शामिल होते हैं तो कहा जा सकता है कि उन्हें कानून का ज्ञान नहीं है. मगर यही काम अगर पढ़े लिखे चिकित्सक पैसों के लिए करने लगे तो समाज में यह सवाल उठ खड़ा होता है कि आखिर कानून कहां है और रुपयों की अंधी दौड़ कहां जाकर खत्म होती है. एक मसला छत्तीसगढ़ (Chhattisgarh) में एक चर्चा का विषय बना हुआ है.  एक महिला चिकित्सक (Female Doctor) जेल भेज दी गई है… शायद आप भी जानना चाहेंगे की एक महिला चिकित्सक ने किस तरह संबंधों और चंद रुपयों की खातिर अवैध गर्भपात करने का अपराध कर स्वयं और अपने पेशे पर प्रश्न चिन्ह लगा दिया है.

इस घटनाक्रम में तथ्य यह है कि महिला  डॉक्टर को कई दफे की छापामारी के बाद अंततः पुलिस ने दिल्ली में गिरफ्तार किया है. यानी की आरोपी डॉक्टर केस दर्ज होने के बाद 3 महीने से फरार थी.    नाबालिग को भ्रमित करके दुष्कर्म करने वाला युवक, और गर्भपात कराने वाले उसके परिजन माता-पिता सहित 4 लोग पहले से जेल के सीखचों के पीछे पहुंच गए हैं.

नाबालिक के गर्भपात से जुड़ी इस कहानी की  शुरुआत 20 जनवरी 2021 को हुई. छत्तीसगढ़ के धमतरी जिला के सिहावा थाने में नाबालिक रानी ( काल्पनिक नाम)  ने परिजनों के साथ आकर दुष्कर्म की रिपोर्ट लिखाई और बताया कि सिरसिदा कर्णेश्वर पारा निवासी लोकेश तिवारी ने उसके साथ दुष्कर्म किया है गर्भ ठहरने के बाद अपने रिश्तेदार संध्या रानी शर्मा के घर ओडिशा प्रांत ले गया. वहां वह रानी को सरकारी अस्पताल ले जाकर डॉक्टर से सांठगांठ कर उसका गर्भपात करा दिया. पुलिस ने मामले की विवेचना करने के पश्चात पुलिस जांच में दोषी पाए गए आरोपी लोकेश तिवारी, उसकी मां रेवती तिवारी, पिता देवराज तिवारी और रिश्तेदार संध्यारानी को जेल भेज दिया.

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कानून के साथ खिलवाड़….

दरअसल, हमारे आसपास समाज में ऐसे घटनाक्रम घटित होते चले जाते हैं. मगर जब कभी बात कानून के दरवाजे तक पहुंचती है तो फिर सफेदपोशों के चेहरे पर से नकाब उतरने लगती है. छत्तीसगढ़ के धमतरी में घटित घटना क्रम की तह में जाए तो यह सत्य सामने आ जाता है कि अपने बेटे लोकेश को बदनामी से बचाने मां रेवती तिवारी ने रिश्तेदार ओडिशा निवासी संध्या रानी शर्मा से बातचीत की. फिर डॉ. ममता रानी बेहरा को गर्भपात के लिए तैयार किया.

चिकित्सक ममता रानी संबधो के फेर में आकर के कानून को अपने हाथ में ले बैठी. मसले की जांच करने वाली महिला अधिकारी डीएसपी सारिता वैद्य के मुताबिक  रिपोर्ट के बाद से महिला डॉ. ममता रानी बेहरा गायब थी. लगातार पुलिस ढूंढ रही थी अंततः लंबे अंतराल के पश्चात दिल्ली में महिला डॉक्टर को पुलिस ने अपनी गिरफ्त में ले लिया. महिला डॉक्टर इतनी चालाक थी कि लंबे समय तक पुलिस को धोखा देती रही.

पुलिस के मुताबिक गर्भपात कराने वाली महिला डॉ. ममता रानी बेहरा (37) रायगढ़, ओडिशा की निवासी है.वहां के सरकारी अस्पताल में फार्मासिस्ट के पद पर पदस्थ थी. उसने नाबालिग को गर्भपात की दवा खिला गर्भपात करवा दिया और पुलिस से लंबे समय तक आंख मिचौली का खेल खेलते अंततः कानून के लंबे हाथों में आ ही गई.

गर्भपात और कानून

गर्भपात का अपराधीकरण कानूनी पेचीदिगियों से भरा हुआ है. एक समय था जब गर्भपात एक सामान्य घटना मानी जाती थी. मगर धीरे धीरे कानून बनता चला गया और  वैध और अवैध गर्भपात परिभाषित हुआ. हालांकि, सीमित मायनों में कानून के मुताबिक वयस्क महिलाओं को अपने लिए निर्णय लेने की स्वायत्तता  है (कि उसे बच्चे को जन्म देना है या नहीं), पर फिर भी एक महिला को केवल अपनी मर्जी से गर्भपात करने की कानूनी रूप से अनुमति नहीं है (यदि डॉक्टर ऐसा करने की सलाह न दे तो). यह जरुर है कि एक डॉक्टर को (गर्भपात को लेकर अपनी राय बनाने के बाद), माँ के अलावा किसी की सहमति की आवश्यकता नहीं होती.

ऐसे में यह सीधा सीधा गंभीर अपराध है कि नाबालिक मां की अनुमति के बिना गर्भपात कर दिया गया.गर्भपात की इस लंबी कहानी में नियम उप नियम बन चुके हैं. कानून के जानकार उच्च न्यायालय बिलासपुर के अधिवक्ता बी के शुक्ला के मुताबिक कुछ परिस्थितियों को छोड़कर बाकी गर्भपात को अपराध की श्रेणी में रखा गया है. नाबालिक का गर्भपात तो स्पष्ट रूप से गंभीर अपराध की संज्ञा में आता है और मामला सिद्ध हो जाने पर आरोपी को कठोर सजा भुगतनी होती है.

पुलिस अधिकारी विवेक शर्मा के मुताबिक बलात्कार के मामलों में न्यायालय की अनुमति से ही गर्भपात संभव है. अन्यथा कोई भी गर्भपात गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है.

Acid Attack जिंदगी सिमट नहीं जाती चमड़ी के सिकुड़ने से

Acid Attack News in Hindi: शनिवार का दिन था. रात के साढ़े 8 बजे थे. माला कर्मकार ‘सियालदहडायमंड हार्बर’ लोकल ट्रेन(Local Train) से दफ्तर से घर लौट रही थीं. उस समय लेडीज कंपार्टमैंट में कुछ गिनीचुनी औरतें ही थीं. एकाध स्टेशन के बाद उन में से 1-1 कर के और भी 4-5 औरतें उतर गईं. अब माला कर्मकार समेत 3 औरतें रह गईं. कल्याणपुर स्टेशन (kalyanpur Station) से कुछ सवारियों को उतार कर जब ट्रेन चली, तो अचानक चलती हुई ट्रेन की खिड़की के सामने एक नकाबपोश आया और उस ने खिड़की पर बैठी माला कर्मकार पर एसिड (Acid) फेंक दिया. यह वह घड़ी थी, जब माला की पूरी जिंदगी ही बदल गई. दरअसल, एक जमीन को ले कर स्वरूप हलदार नामक एक बिल्डर (Builder) के साथ माला कर्मकार के घर वालों का झगड़ा था. बिल्डर जमीन चाहता था और माला का परिवार जमीन बेचने को राजी नहीं था. बिल्डर स्वरूप हलदार कई बार माला कर्मकार के परिवार वालों को नतीजा भुगतने की धमकी दे चुका था. आखिरकार उस ने माला पर एसिड फेंक कर अपनी धमकी को पूरा कर ही दिया. अब वह हवालात में है. उस की जमानत (Bail) नहीं हो पा रही है.

एक और वाकिआ. मनीषा पैलान सुबहसवेरे जब नींद से जाग कर अपना चेहरा आईने में देखती हैं, तो एसिड से झुलसे चेहरे में गाल, आंखें, उस से नीचे गले और छाती की बीभत्सता से उन का पूरा बदन कांप जाता है.

एक मग एसिड ने मनीषा की दुनिया को पूरी तरह झुलसा कर रख दिया है.

मनीषा पैलान का सपना था कि वे अच्छी तरह पढ़लिख कर सब्जी बेचने वाले अपने पिता मुन्नाफ पैलान का सहारा बनें. वे अपने छोटे भाईबहन की पढ़ाई का खर्च जुटाना चाहती थीं, ताकि परिवार सिर ऊंचा कर के जी सके, इसीलिए पढ़ाई के साथसाथ वे नर्सिंग ट्रेनिंग, कंप्यूटर कोर्स, ब्यूटीशियन कोर्स भी कर रही थीं.

रूढ़िवादी मुसलिम परिवार में जनमी मनीषा पैलान कुछ भी कर के अपने पिता और परिवार की लड़खड़ाती जिंदगी को संभालने की कोशिश कर रही थीं.

साल 2015 में मनीषा पैलान ने अपने बचपन के प्यार सलीम हलदार से घर से भाग कर शादी कर ली. लेकिन कुछ समय बाद ही मनीषा के मन में अपने पैरों पर खड़ा हो कर पिता की मदद करने का सपना कुलबुलाने लगा.

मुसलिम परिवार में ऐसा सपना देखने की सख्त मनाही थी. जाहिर है, पतिपत्नी में अनबन होने लगी. मनीषा पैलान ने तलाक लेने का फैसला किया. मनीषा के मुताबिक, सलीम भी तलाक के लिए तैयार था, लेकिन वह इसे मन से स्वीकार नहीं कर पाया.

17 नवंबर, 2015. सर्दी की एक शाम. मनीषा कंप्यूटर क्लास से घर लौट रही थीं. सलीम अपने कुछ दोस्तों के साथ अचानक सामने आया और एक मग एसिड फेंक कर फरार हो गया. मनीषा से अलग होने का गुस्सा उस ने एसिड हमला कर के निकाला था.

सलीम से अलग होने के बाद मनीषा ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था कि उन के लिए एक बहुत बड़ी लड़ाई इंतजार कर रही है. लगातार थाना, पुलिस और अदालत के चक्कर लगाने के साथसाथ अपनी लड़ाई लड़ने के लिए वे मन को तैयार करती चली गईं.

एसिड हमले की वारदात और पुलिस की कार्यवाही के बाद सलीम समेत दूसरे 5 आरोपी जमानत पर खुलेआम घूम रहे हैं, धमकियां दे रहे हैं और मामला उठा लेने के लिए लगातार दबाव बना रहे हैं.

आखिरकार मनीषा को अपना कसबा छोड़ कर कोलकाता आना पड़ा. यहां मनीषा ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने 17 जुलाई को राज्य सरकार को मनीषा को 3 लाख रुपए हर्जाने के तौर पर दिए जाने का आदेश दिया.

गौरतलब है कि पश्चिम बंगाल में एसिड हमले के पीडि़तों को 3 लाख रुपए हर्जाना देने का कानून है. इस कानून के तहत हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया. इतना ही नहीं, जमानत पर खुलेआम घूम रहे पांचों आरोपियों को भी हाईकोर्ट ने फिर से गिरफ्तारी के साथ जांच का भी आदेश दिया.

सलीम फरार है. बाकियों को पुलिस गिरफ्तार कर चुकी है. जहां तक 3 लाख रुपए के हर्जाने का सवाल है, तो 21 साला मनीषा कहती हैं कि अगर काबिलीयत से उन्हें कोई नौकरी मिल गई, तो कुछ सालों में 3 लाख रुपए जमा कर लेना कोई बहुत मुश्किल काम नहीं है. सिर्फ चमड़ी ही तो जल कर सिकुड़ गई है. इस से जीने का रास्ता तो बंद नहीं हो जाता है न? नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ा होने के लिए चिकनी चमड़ी होना एकलौती काबिलीयत नहीं हो सकती है.

इलाज के दौरान जब पूरे चेहरे पर पट्टियां बंधी थीं, तब अस्पताल के बिस्तर पर लेटी मनीषा ने खुद को दिलासा दी थी कि जिंदगी यहीं खत्म नहीं हो जाती. इस के आगे भी दुनिया है. पर उस के लिए खुद को ही तैयार करना होगा.

मनीषा बताती हैं कि लोकल ट्रेन में उन की आपबीती सुन कर एक मुसाफिर ने यहां तक पूछ लिया था कि सिर्फ एसिड ही फेंका था या रेप भी हुआ था? ऐसी दुनिया से रूबरू होने के बाद भी वे आत्मविश्वास से लबालब हैं. उन का मानना है कि उन का जला चेहरा समाज का आईना है.

मनीषा को जब अस्पताल से छुट्टी मिली, तब उन्हें पता चला कि हमलावर जमानत पर छूट कर महल्ले में लौट आए हैं और छाती फुला कर उन के घर के आसपास घूम रहे हैं.

उसी समय मनीषा ने ठान लिया था कि पूरी हिम्मत के साथ उन्हें समझा देना है कि तुम्हारा एसिड मेरा कुछ भी नहीं जला पाया है. मेरे सपने को, मेरी चाह को जला नहीं सका है.

यही वजह है कि आज भी मनीषा गानों पर थिरकती हैं. ब्यूटीशियन का कोर्स कर के वे महल्ले की औरतों को सजातीसंवारती हैं.

इसी तरह मैत्री भट्टाचार्य द्वारा नाजायज संबंध बनाने से इनकार करने की सजा एसिड हमले से दी गई.

पश्चिम बंगाल के वर्दमान जिले के रानाघाट स्टेशन पर एक जानपहचान के लड़के ने मैत्री के चेहरे को निशाना बना कर एसिड फेंका. इस हमले में मैत्री का चेहरा तो झुलसा ही, साथ ही एक आंख भी जाती रही. लेकिन उन का मनोबल आज भी नहीं टूटा है.

वे कोलकाता मैडिकल कालेज में अपना इलाज करा रही हैं. उन के कंधे और दाहिने हाथ की चमड़ी ही नहीं, मांसपेशियां तक गल गई थीं और वहां सैप्टिक हो गया था. फिर भी वे दम साध कर कुसूरवारों को सजा दिलाने और एसिड हमले की पीडि़तों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने का संकल्प ले रही थीं. वे एसिड पीडि़तों को संदेश देना चाहती हैं कि जिंदगी सिमट नहीं जाती चमड़ी की सिकुड़न से.

मैत्री भट्टाचार्य कहती हैं कि बलात्कार के विरोध में लोग सड़कों पर उतरते हैं, लेकिन एसिड हमले का देश में सख्ती से कोई विरोध नहीं करता, इसीलिए वे इसे एक लंबी लड़ाई मानती हैं. इस लड़ाई में वे आम लोगों का साथ भी चाहती हैं.

आंकड़ों की जबानी

‘एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन औफ इंडिया’ के आंकड़े कहते हैं कि एसिड हमले की वारदातें हमारे देश में बड़ी तेजी से बढ़ रही हैं. साल 2011 में एसिड हमले की जहां महज 106 वारदातें सामने आई थीं, वहीं साल 2015 में 802 वारदातें दर्ज हुई हैं.

जाहिर है, यह चिंता की बात है. वैसे, फरवरी, 2013 से पहले हुए एसिड हमले के आंकड़े पुख्ता आंकड़े नहीं माने जा सकते. वजह, तब तक हमारे देश में एसिड हमले जैसी वारदातों के लिए भारतीय आपराधिक कानून में अलग से कोई धारा नहीं थी.

फरवरी, 2013 को भारतीय दंड विधान में संशोधन किया गया. 326ए और 326बी को गैरजमानती धारा के तहत ऐसे अपराध को चिह्नित किया गया. अपराध साबित होने पर कम से कम 7 साल और ज्यादा से ज्यादा 10 साल की सजा का प्रावधान किया गया.

इस तरह देखा जाए, तो एसिड हमले के पुख्ता आंकड़े साल 2014 में ही उपलब्ध हो पाए. नई धारा के तहत पूरे देश में एसिड हमले के 225 मामले दर्ज हुए और साल 2015 में यह आंकड़ा बढ़ कर 249 तक पहुंच गया.

सरकार की अनदेखी

पश्चिम बंगाल की बात करें, तो पिछले कुछ सालों से राज्य में एसिड हमले की वारदातें लगातार बढ़ती जा रही हैं. साल 2013 से ले कर अब तक राज्य में ऐसी घटनाएं आएदिन हो रही हैं. उन्हें देख कर साफ लगता है कि एसिड मामलों में पुलिस प्रशासन और सरकार उदासीन है.

नैशनल क्राइम रिकौर्ड ब्यूरो के आंकड़े कहते हैं कि बीते 5 सालों में राज्य में 131 मामले दर्ज हुए, वहीं साल 2014 और साल 2015 में 41-41 मामले दर्ज हुए. पर किसी भी आरोपी को सजा नहीं हुई है.

‘एसिड सर्वाइवल फाउंडेशन औफ इंडिया’ के विक्रमजीत सेन का मानना है कि गैरजमानती धारा में आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद ही ये जमानत पर छूट जाते हैं. ऐसा इसलिए होता है कि पुलिस पुख्ता चार्जशीट तैयार नहीं करती है.

सलफ्यूरिक, नाइट्रिक और हाइड्रोक्लोरिक एसिड खरीदनेबेचने में कंट्रोल के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने दिशानिर्देश जारी किए हैं, जिन के तहत राज्य सरकार ने 31 मार्च, 2014 को एसिड बिक्री से संबंधित कुछ नियम बनाए थे. मसलन, दुकानदारों को एसिड खरीदारों का एक अलग रजिस्टर रखना होगा और उस रजिस्टर में खरीदार का पूरा नामपता दर्ज करना होगा.

साथ ही, यह भी कहा गया था कि ऐक्जिक्यूटिव मजिस्ट्रेट जितनी हैसियत वाला कोई अफसर, सबइंस्पैक्टर की हैसियत वाला पुलिस औचक दौरा कर के एसिड विक्रेताओं के रजिस्टर की जांच कर सकता है.

कानूनी पचड़े में पीड़ित

पश्चिम बंगाल सरकार के मौजूदा नियम के मुताबिक, एसिड पीड़ित को अधिकतम 2 लाख रुपए हर्जाने व बतौर माली मदद के रूप में दिए जाने का प्रावधान है. उधर साल 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश जारी कर के कहा था कि एसिड पीड़ित को 15 दिनों के भीतर राज्य सरकार 3 लाख रुपए दे.

पिछले साल जून में एसिड हमले की पीड़िता मनीषा पैलान ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया. हाईकोर्ट ने सरकार को 3 लाख रुपए का हर्जाना देने का निर्देश दिया. लेकिन सरकार अभी तक मनीषा को रकम नहीं दे पाई है.

हालांकि इस बारे में गृह विभाग के एक अधिकारी के अनुसार, इस देरी की वजह कानूनी अड़चन है. दरअसल, वित्त विभाग की मंजूरी मिलने के बावजूद कानून विभाग से कानून में बदलाव की इजाजत अभी तक नहीं मिली है. इस के कारण मामला अधर में लटका हुआ है.

जाहिर है, राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट के आदेशानुसार हर्जाना नहीं दे पा रही है. सुप्रीम कोर्ट का निर्देश मान कर 3 लाख रुपए का हर्जाना देने के लिए राज्य सरकार को वित्त विभाग की इजाजत चाहिए और वित्त विभाग इस रकम की मंजूरी दे चुका है. लेकिन कानून विभाग द्वारा पुराने कानून में संशोधन किए बिना राज्य सरकार पीड़िता को वह रकम नहीं दे सकती.

पश्चिम बंगाल में एपीडीआर जैसे मानवाधिकार संगठनों और स्वयंसेवी संगठनों के लगातार दबाव बनाने के बाद हुआ सिर्फ इतना है कि सरकारी अस्पतालों में पीड़िता के मुफ्त इलाज का निर्देश सरकार ने जारी कर के छुट्टी पा ली है.

एक मिसाल यह भी

एसिड हमला न केवल पीड़िता के चेहरेमोहरे को बिगाड़ देता है, बल्कि उस के पूरे वजूद को झकझोर कर रख देता है. लेकिन यह एक नाकाम कोशिश होती है. ‘नाकाम कोशिश’ इसलिए है, क्योंकि इस तरह का हमला पीड़ित को कमजोर नहीं बनाता, बल्कि सब से डट कर मुकाबला करने का माद्दा ही पैदा करता है.

आगरा के फतेहाबाद रोड पर गेटवे होटल के ठीक सामने शिरोज हैंगआउट इसी बात का सुबूत है. इस कैफेटेरिया को एसिड हमले की पीड़ित लड़कियां व औरतें चलाती हैं. एसिड ने भले ही इन के चेहरे को बिगाड़ दिया है, लेकिन इन के चेहरे पर हजारों वाट की मुसकराहट है.

एसिड अटैक सर्वाइवल को दोबारा बसाने का अपनी ही तरह का देश में यह पहला प्रोजैक्ट है, बल्कि यह कहा जाना चाहिए कि एसिड सर्वाइवल द्वारा चलाया जाने वाला यह देश का पहला कैफेटेरिया है. बिगड़े चेहरे, समाज की अनदेखी, आसपड़ोस के लोगों की हमदर्दी, हंसीमजाक, डर को अंगूठा दिखा कर ये लड़कियां शिरोज हैंगआउट चला रही हैं.

साल 2014 में अकेले उत्तर प्रदेश में एसिड हमले के 186 मामले पुलिस ने दर्ज किए थे. इस के बाद मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने दिल्ली की एक स्वयंसेवी संस्था ‘छांव फाउंडेशन’ की मदद से इन लड़कियों के पुनर्वास की योजना बनाई.

मजेदार बात यह है कि इस कैफेटेरिया में चायकौफी और स्नैक्स के साथ कम्यूनिटी रेडियो सुनने का लुत्फ और लाइब्रेरी में बैठने की भी सहूलियत है. इस के अलावा समयसमय पर यहां आर्ट वर्कशौप और एग्जिबिशन भी कराई जाती हैं.

यह कैफेटेरिया आगरा में न केवल लोकल लोगों के बीच, बल्कि देशीविदेशी सैलानियों के बीच कम समय में ही मशहूर हो गया. इस की मशहूरी को देखते हुए लखनऊ में भी इस की एक शाखा खोल दी गई?है. जाहिर है, उत्तर प्रदेश की यह मिसाल उम्मीद जगाती है, पर इस में सरकार और समाज का साथ मिलना भी बेहद जरूरी है.

आज भी लोग अंधविश्वास में फंसे हैं

मुसाफिरों से भरी एक बस झारखंड से बिहार की तरफ जा रही थी. अचानक सुनसान सड़क के दूसरी तरफ से एक सियार पार कर गया. ड्राइवर ने तेजी से ब्रेक लगाए. झटका खाए मुसाफिरों में से एक ने पूछा, ‘‘भाई, बस क्यों रोक दी?’’

बस के खलासी ने जवाब दिया, ‘‘सड़क के दूसरी तरफ से सियार पार कर गया है, इसलिए बस कुछ देर के लिए रोक दी गई है.’’

सभी मुसाफिर भुनभुनाने लगे. कुछ लोग ड्राइवर की होशियारी की चर्चा भी करने लगे.

उस अंधेरी रात में जब तक कोई दूसरी गाड़ी सड़क का वह हिस्सा पार नहीं कर गई, तब तक वह बस वहीं खड़ी रही, लेकिन किसी ने यह नहीं कहा कि यह अंधविश्वास है.

सड़क है तो दूसरी तरफ से कोई भी जीवजंतु इधर से उधर पार कर सकता है. यह आम सी बात है. इस में बस रोकने जैसी कोई बात नहीं है, जबकि कई लोग मन ही मन कोई अनहोनी होने से डरने लगे थे.

रास्ते के इस पार से उस पार कुत्ता, बिल्ली, सियार जैसे जानवर आजा सकते हैं. इसे अंधविश्वास से जोड़ा जाना ठीक नहीं है. इस के लिए मन में किसी अनहोनी हो जाने का डर पालना भी बिलकुल गलत है.

बिहार के रोहतास जिले के डेहरी में बाल काटने वाले सैलून तो सातों दिन खुले रहते हैं. लेकिन, सोनू हेयरकट सैलून के मालिक से पूछे जाने पर वे बताते हैं, ‘‘ग्राहक तो पूरे हफ्ते में महज 4 दिन ही आते हैं. 3 दिन तो हम लोग खाली ही बैठे रहते हैं.

‘‘यहां के ज्यादातर हिंदू मंगलवार, गुरुवार और शनिवार को बाल नहीं कटवाते हैं. इन 3 दिनों में इक्कादुक्का लोग ही बाल कटवाने आते हैं या फिर जिन का ताल्लुक दूसरे धर्म से रहता है, वे लोग आते हैं.’’

भले ही लोग 21वीं सदी में जी रहे हैं, लेकिन आज भी हमारी सोच 18वीं सदी वाली है. डेहरी के बाशिंदे विनोद कुमार पेशे से कोयला कारोबारी हैं. उन का एक बेटा है, इसलिए वे सोमवार के दिन बालदाढ़ी नहीं कटवाते हैं.

पूछे जाने पर वे हंसते हुए कहते हैं, ‘‘ऐसा रिवाज है कि जिन के एक बेटा होता है, उन के पिता सोमवार के दिन बालदाढ़ी नहीं कटवाते हैं. इस के पीछे कोई खास वजह नहीं है. गांवघर में पहले के ढोंगी ब्राह्मणों ने यह फैला दिया है, तो आज भी यह अंधविश्वास जारी है.

‘‘दरअसल, लोगों के मन में सदियों से इस तरह की बेकार की बातें बैठा दी गई हैं, इसीलिए आज भी वे चलन में हैं.

‘‘पहले के लोग सीधेसादे होते थे. इस तरह के पाखंडी ब्राह्मणों ने जो चाहा, वह अपने फायदे के लिए समाज में फैला दिया.’’

आज भी लोग गांवदेहात में भूतप्रेत, ओझा, डायन वगैरह के बारे में खूब बातें करते हैं. लोगों को यकीन है कि गांव में डायन जादूटोना करती है.

औरंगाबाद के एक गांव के रहने वाले रणजीत का कहना है कि उन की पत्नी 2 साल से बीमार है. उन की पत्नी की बीमारी की वजह कुछ और नहीं, बल्कि डायन के जादूटोने के चलते है, इसीलिए वे किसी डाक्टर को दिखाने के बजाय कई सालों से ओझा के पास दिखा रहे हैं. कई सालों से वे मजार पर जाते हैं और चादर चढ़ाते हैं.

रोहतास जिले के एक गांव में एक लड़की को जहरीले सांप ने काट लिया था. उस के परिवार वाले बहुत देर तक झाड़फूंक करवाते रहे.

झाड़फूंक के बाद मामला जब बिगड़ गया, तो उसे अस्पताल ले जाया गया, जहां उसे बचाया नहीं जा सका, जबकि अखबार में भी इस के बारे में प्रचारप्रसार किया जाता रहा है कि किसी इनसान को सांप के काटने पर झाड़फूंक नहीं कराएं, बल्कि अस्पताल ले जाएं.

अगर समय रहते उसे अस्पताल ले जाया गया होता तो बचाया जा सकता था. पर आज भी लोग अंधविश्वास के चलते झाड़फूंक पर ज्यादा यकीन करते हैं. अभी भी लोग इलाज कराने के बजाय सांप काटने पर झाड़फूंक करवाना ही ठीक समझते हैं.

आज भी लोग झाड़फूंक, मंत्र, जादूटोना वगैरह पर यकीन करने के चलते अपनी जान गंवा रहे हैं. वे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि झाड़फूंक करवाने से कुछ नहीं होता है. इस से कोई फायदा नहीं होने वाला है. अगर समय रहते

सांप काटने वाले इनसान का इलाज कराया जाए तो उस की जान बचाई जा सकती थी.

बिहार के कई शहरों में ज्यादातर दुकानदार शनिवार को अपनी दुकान के आगे नीबूमिर्च लटकाते हैं. हर शनिवार की सुबह कुछ लोग नीबूमिर्च को एकसाथ धागे में पिरो कर दुकानदुकान बेचते भी मिल जाते हैं.

तकरीबन सभी दुकानदार इसे खरीदते हैं. वे पुरानी लटकी हुई नीबूमिर्च को सड़क पर फेंक देते हैं. लोगों के पैर उस पर न पड़ जाएं, इसलिए लोग बच कर चलते हैं. कई बार तो लोग अपनी गाड़ी के पहिए के नीचे आने से भी इन्हें बचाते हैं.

कुछ लोगों का मानना है कि पैरों के नीचे या गाड़ी के नीचे अगर फेंका हुआ नीबू और मिर्च आ जाए तो जिंदगी में परेशानी बढ़ सकती है.

कुछ दुकानदारों का मानना है कि नीबूमिर्च लटकाने से बुरी नजर से बचाव होता है. दुकान में बिक्री खूब होती है. इस तरह देखा जाए, तो फालतू में नीबूमिर्च आज भी बरबाद किए जा रहे हैं, जबकि इस तरह के नीबूमिर्च लटकाने का कोई फायदा नहीं है.

आज भी बहुत से लोग गरीब हैं. पैसे की कमी में वे नीबूमिर्च खरीदने की सोचते भी नहीं हैं. इस तरह से यह तो नीबूमिर्च की बरबादी है. ऐसा कहने वाला कोई भी धर्मगुरु, पंडित, पुजारी, मौलवी नहीं होता है.

दरअसल, आज भी यह अंधविश्वास  ज्यों का त्यों बना हुआ है. ऐसी बातें बहुत पहले से ही पाखंडी ब्राह्मणों, पंडेपुजारियों ने आम लोगों में फैला रखी हैं, इसीलिए ऐसा अंधविश्वास आज भी जारी है.

औरंगाबाद की रहने वाली मंजू कुमारी टीचर हैं. उन का कहना है कि वे एक बार पैदल ही इम्तिहान देने जा रही थीं. उन्होंने वहां जाने के लिए शौर्टकट रास्ता चुना था.

अभी इम्तिहान सैंटर काफी दूर था कि एक बिल्ली उन का रास्ता काट गई. वे काफी देर तक वहीं खड़ी इंतजार करती रहीं, पर उस रास्ते से कोई गुजरा नहीं. उन्हें ऐसा लगा कि उन का इम्तिहान छूट जाएगा, इसलिए वे जल्दीजल्दी उस रास्ते से हो कर इम्तिहान सैंटर तक पहुंचीं.

उन के मन में धुकधुकी हो रही थी कि आज इम्तिहान में कुछ न कुछ गड़बड़ होगी. लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ. बल्कि उन का इम्तिहान उस दिन बहुत अच्छा हुआ. बाद में अच्छे नंबर भी मिले थे.

उस दिन से वे इस तरह के अंधविश्वासों से बहुत दूर रहती हैं. वे मानती हैं कि अगर वे अंधविश्वास में रहतीं, तो उन का इम्तिहान छूटना तय था.

दरअसल, बचपन से ही घर के लोगों द्वारा यह सीख दी जाती है कि ब्राह्मणों, पोंगापंडितों, साधुओं, पाखंडियों, धर्मगुरुओं की कही गई बातें तुम्हें भी इसी रूप में माननी हैं. बचपन से लड़केलड़कियों को यह सब धर्म से जोड़ कर बताया जाता है. उन्हें विज्ञान से ज्यादा अंधविश्वास के प्रति मजबूत कर दिया जाता है.

यही वजह है कि पीढ़ी दर पीढ़ी आज भी अंधविश्वासों को लोग ढोते आ रहे हैं. विज्ञान यहां विकसित नहीं है. लेकिन अंधविश्वास खूब फलफूल रहा है. इस की जड़ें इतनी मजबूत हैं कि कोई काट ही नहीं सकता है.

यहां के लोग पर्यावरण, पेड़पौधे की हिफाजत करने के बजाय अंधविश्वास  की हिफाजत करते हैं.

जब देश में राफेल आता है, तो रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को नारियल फोड़ कर पूजा करते हुए मीडिया के जरीए दिखाया जाता है, तो देश में एक संदेश जाता है कि आम लोग ही अंधविश्वास में नहीं पड़े हुए हैं, बल्कि यहां के खास लोग भी इसे बढ़ावा देना चाहते हैं, जबकि कोरोना काल में देशभर के मंदिर, मसजिद, गुरुद्वारे वगैरह सभी बंद थे.

लोगों को भगवान के वजूद के बारे में समझ आने लगा था. लोगों को यकीन हो गया था कि देवीदेवताओं की मेहरबानी से यह बीमारी ठीक होने वाली नहीं है, बल्कि वैज्ञानिकों द्वारा जब दवा बनाई जाएगी, तभी यह बीमारी जाएगी.

लोगों में देवीदेवताओं के साथ ही मंदिरमसजिद के प्रति भी आस्था कम हुई है, तो दूसरी ओर भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी राम मंदिर में सीधे लोट जाते हैं और यह संदेश देने की कोशिश करते हैं कि सबकुछ ऊपर वाला ही है.

और तो और, एक टैलीविजन चैनल वाले ने तो दिखाया कि उस समय नरेंद्र मोदी ने ‘राम’ का नाम कितनी बार लिया, इसीलिए देश के कुछ हिस्सों में कोरोना जैसी महामारी को बीमारी कम समझा गया, इसे दैवीय प्रकोप समझने की भूल हो गई.

देश में कोरोना कहर बरपा रहा था, तो बिहार के कुछ इलाकों में कोरोना माता की पूजा की जा रही थी.

रोहतास जिले के डेहरी औन सोन में सोन नदी के किनारे कई दिनों तक औरतों ने आ कर पूजापाठ की. नदियों के किनारे औरतें झुंड में पहुंच कर 11 लड्डू और 11 फूल चढ़ा कर पूजा कर रही थीं.

घर के मर्दों द्वारा औरतों को मना करने के बजाय उन्हें बढ़ावा दिया जा रहा था, तभी तो वे अपनी गाड़ी में बैठा कर उन्हें नदी के किनारे पहुंचा रहे थे.

इस तरह के अंधविश्वास मोबाइल फोन के चलते गांवदेहात में काफी तेजी से फैलते हैं, इसलिए जरूरी है कि मांबाप अपने बच्चों को विज्ञान के प्रति जागरूक करें. उन्हें शुरू से ही यह बताने की जरूरत है कि विज्ञान से बदलाव किया जा सकता है. विज्ञान हमारी जरूरतें पूरी कर रहा है. इस तरह के अंधविश्वास से हम सभी पिछड़ जाएंगे.

रस्मों की मौजमस्ती धर्म में फंसाने का धंधा

धर्म को ईश्वर से मिलाने का माध्यम माना गया है. धर्म मोहमाया, सांसारिक सुखों के त्याग की सीख देता है. धर्मग्रंथों में धर्म की कई परिभाषाएं दी गई हैं. कहा गया है कि धर्म तो वह मार्ग है जिस पर चल कर मनुष्य मोक्ष की मंजिल तय कर सकता है. ईश्वर के करीब पहुंच सकता है. धर्म के मानवीय गुण प्रेम, शांति, करुणा, दया, क्षमा, अहिंसा को व्यक्ति जीवन में उतार कर  मनुष्यता धारण कर सकता है. सांसारिक सुखदुख के जंजाल से छुटकारा पा सकता है. जिस ने धर्म के इस मार्ग पर चल कर ईश्वर को पा लिया वह संसार सागर से पार हो गया.

लेकिन व्यवहार में धर्म क्या है? धर्म का वह मार्ग कैसा है? लोग किस मार्ग पर चल रहे हैं? हिंदू समाज में धार्मिक उसे माना जाता है जो मंदिर जाता है, पूजापाठ करता है, जागरणकीर्तन, हवनयज्ञ कराता है, लोगों को भोजन कराता है, गुरु को आदरमान देता है, प्रवचन सुनता है, धार्मिक कर्मकांड कराता है, जीवन में पगपग पर धर्म के नाम पर रची गई रस्मों को निभाता चलता है और इन सब में दानदक्षिणा जरूर देता है.

धर्मग्रंथ और धर्मगुरु व साधुसंत कहते हैं कि धर्म के मार्ग पर चलने के लिए ये सब करो तो बेड़ा पार हो जाएगा.

ईश्वर तक पहुंचाने वाले इस धर्म का असल स्वरूप कैसा है? हिंदू समाज में धर्म के नाम पर वास्तव में रस्मों का आडंबर है. चारों तरफ रस्मों की ही महिमा है. पगपग पर रस्में बिछी हैं. ‘पीने वालों को पीने का बहाना चाहिए’ की तर्ज पर धार्मिक रस्मों में नाचना, गाना, खानापीना, कीर्तन, यात्रा, किट्टी पार्टी, गपबाजी, विरोधियों की पोल खोलना, आदि  शामिल हैं. हिंदू समाज में जन्म से ले कर मृत्यु और उस के बाद तक अलगअलग तरह की रस्में हैं. अंधभक्त धर्म के नाम पर बनी इन रस्मों को बड़े उत्साह से निभाते हैं. वे इन रस्मों में उल्लास के साथ भाग लेते हैं.

विवाहशादी, जनममरण की रस्में छोड़ भी दें तो जीवन में और बहुत सारी धार्मिक रस्मों का पाखंड व्याप्त है. पाखंड से भरे रस्मों के प्रति लोगों के निरंतर प्रचार के कारण श्रद्धा बढ़ रही है.

कृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर दही हांडी फोड़ने के साथ नाचगाने व अन्य मनोरंजक रस्में महाराष्ट्र में जगहजगह होती हैं. गणेशोत्सव पर तरहतरह की झांकियां निकाली जाती हैं. इन में बच्चे व बड़े हाथी की सूंड लगाए, देवीदेवताओं के मुखौटे चढ़ाए नाचतेगाते दिखते हैं. जागरणों- कीर्तनों की धूम दिखाई देती है. इस तरह पूरे साल धार्मिक रस्में चलती रहती हैं. रस्मों का महाजाल बिछा है. कुछ लोग भय से, लालच से और आनंद उठाने के लिए धार्मिक रस्मों को करने में लगे हुए हैं.

धार्मिक रस्मों में पूजा कई रूपों में की जाती है. पूजापाठ के अनोखे तरीके हैं. नाचगाने, फिल्मी धुनों पर भजनों की बहार के साथ उछलतेकूदते भक्तगणों की टोलियां नाइट क्लबों की तरह करतब दिखाती नजर आती हैं. भक्त मूर्ति को प्रतीकात्मक तौर पर खाद्य सामग्री, पानी और पुष्प चढ़ाते हैं. मूर्ति के आगे  मोमबत्ती या अगरबत्ती जला कर घुमाई जाती है. फिर घंटी बजाने की रस्म की जाती है. भगवान का नाम बारबार जपा जाता है. भगवान को खाने की जो चीज चढाई जाती है उसे ‘प्रसाद’ कहा जाता है. इस ‘प्रसाद’ के बारे में प्रचारित किया गया है कि ‘प्रसाद’ खाना ‘आत्मा’ के लिए लाभप्रद है.

हर धर्म में तीर्थयात्रा जरूर बताई गई है. नदी के किनारे बसे शहरों की तीर्थ यात्रा पर गए लोग नदी में जलता हुआ दीपक और पुष्प रखा हुआ दोना बहाते हैं, मंदिरों में जलते हुए दीपक की लौ को सिरआंखों पर लगाते हैं. राख या चंदन का तिलक माथे के अलावा गले, छाती, नाभि पर लगाते हैं.

ऐसा करने के पीछे कोई तार्किकता नहीं है पर लोगों को ऐसा करने के लिए फायदा होने का लालच दिखाया गया है. दोना बहाने पर सुखसमृद्धि व पतिपत्नी के रिश्ते दूर तक चलने और दीपक की लौ से रोगदोष कटने की बात कही जाती है. हां, इन्हें देखना बड़ा सुखद लगता है, दृश्य फिल्मी हो जाता है.

जागरणकीर्तन की रस्म में लोग फिल्मी धुनों पर रचे भजन गाते हैं और थिरकते हैं. परिवार सहित अन्य लोगों को आमंत्रित किया जाता है तथा सब को भोजन कराया जाता है. धर्म की कमाई नहीं आनंद, मौजमस्ती की कमाई होती है.

लोग कहते फिरते हैं कि धार्मिक रस्में बहुत सुंदर होती हैं. प्रशंसा करते नहीं अघाते कि वाह, कैसा सुंदर जागरण- कीर्तन था. खूब मजा आया. झांकी कितनी खूबसूरत थी यानी मामला भगवान के पास जाने का नहीं, मनोरंजन का है.

रस्मों के नाम पर कहीं सुंदर नए वस्त्र पहने जाते हैं, कहीं तलवार, लाठीबाजी के करतब भी किए जाते हैं तो कहीं जुआ खेला जाता है. शिवरात्रि पर भांग पीना भी एक रस्म मानी जाती है. भंडारा यानी खानापीना और दान की रस्में तो सर्वोपरि हैं. इन रस्मों के बिना तो धर्म ही अधूरा है. सारा पुण्यकर्म ही बेकार है. धार्मिक कार्यक्रमों में भोजन कराना बड़े पुण्य का काम समझा जाता है. इसे प्रसाद मान कर लोगों को खिलाया जाता है. यहां भी बच्चों और बड़े भक्तों का मनोरंजन ही सर्वोपरि होता है. ऊबाऊ फीकी रस्मों के पीछे कम लोग ही पागल होते हैं.

महिलाओं को लुभाने के लिए उन्हें सजनेसंवरने के लिए सुंदर वस्त्र, आभूषण पहनने, घर को सजाने में रुचि रखने वाली औरतों के लिए घर के द्वार पर वंदनवार बांधने, कलश स्थापना जैसी रस्में भी रची गई हैं. औरतें अपनी सब से सुंदर साडि़यां पहन कर, जेवरों से लदफद कर, मोटा मेकअप कर के भगवान के सन्निकट आने के लिए घर का कामकाज छोड़छाड़ कर निकलती हैं. रस्मों के दौरान खूब हंसीठट्ठा होता है. हाहा हीही होती है. छेड़खानी होती है. आसपास मर्द हों तो उन्हें आकर्षित करने का अवसर नहीं छोड़ा जाता.

भांग खाने, जुआसट्टा खेलने की रस्म, गरबा खेलने की रस्म, धार्मिक उत्सवों में लाठी, तलवारबाजी की रस्में की जाती हैं. यहां भी आड़ भगवान की ले ली जाती है यानी रस्म के नाम पर नशेबाजों, जुआसट्टेबाजों, रोमांच, रोमांस के शौकीनों को भी धर्म के फंदे में फंसा लिया गया है. होली, दशहरा, नवरात्र, शिवरात्रि जैसे धार्मिक उत्सवों पर नशा, छेड़छाड़, गरबा, डांडिया उत्सव में रोमांस के मौके उपलब्ध होते हैं.

अरे, वाह, ईश्वर तक पहुंचने का क्या खूब रास्ता है. भगवान तक पहुंचने का यह मार्ग है तभी लोगों की भीड़ बेकाबू होती है.

दक्षिण भारत में धार्मिक रस्मों के नाम पर लोग लोहे की नुकीली लंबीलंबी कीलें दोनों गालों के आरपार निकालने का करतब दिखाते हैं. कई लोग धर्मस्थलों तक मीलों पैदल चल कर जाते हैं, कुछ लेट कर पेट के बल चल कर जाते हैं. यह सबकुछ सर्कसों में भी होता है. गोदान, शैयादान करने की रस्म, बेजान मूर्तियों के आगे देवदासियों (जवान युवतियों) के नाचने की भी रस्म है. कहीं बाल कटवाने की रस्म है, कहीं मंदिरों में पेड़ों पर कलावा, नारियल, घंटी बांधने की रस्म है. कुछ समय पहले तक तीर्थों पर पंडों द्वारा युवा स्त्रियों को दान करवा लेने की परंपरा थी. शुद्धिकरण, पंडों के चरण धो कर गंदा पानी पीने की रस्म, मनों दूध नदियों में बहाने, मनों घी, हवन सामग्री को अग्नि में फूंक डालने की रस्म है. जानवरों को मार कर खाना, देवीदेवताओं को चढ़ाना रस्म है, और यही मांस बतौर प्रसाद फिर खाने को मिलता है क्योंकि भगवान तो आ कर खाने से रहे.

अरे, भाई, यह क्या पागलपन है. क्या भगवान तक पहुंचने का मार्ग ढूंढ़ा जा रहा है या खानेपीने का लाभ होता है? शायद लोहे के सरियों से जबड़े फाड़ कर, भांग पी कर, जुआ खेल कर, गंजे हो कर, नाचगा कर ईश्वर तक पहुंचने के बजाय बोरियत दूर की जाती है. चूंकि धर्म का धंधा इसी पर टिका है, पंडेपुजारियों ने इस तरह के रोमांच, रोमांस, मौजमस्ती वाली रस्में रची हैं.

रस्मों में खानेपीने यानी भंडारे और दान की रस्म का खास महत्त्व है. ये रस्में हर धर्म में हैं. बाद में खाने की अनापशनाप सामग्री चाहे कूड़े के ढेर में फेंकनी पड़े. धर्म के नाम पर खाना खिलाने की यह रस्म इस गरीब देश के लिए शर्म की बात है. जहां देश की 20 प्रतिशत आबादी को दो वक्त की भरपेट रोटी नहीं मिलती, वहां ऐसी रस्मों में टनों खाद्य सामग्री बरबाद की जाती है.

कुंभ जैसे धार्मिक मेलों में तो रस्मों के नाम पर बड़े मजेदार तमाशे देखने को मिलते हैं. पिछले नासिक कुंभ मेले में इस प्रतिनिधि ने स्वयं देखा, रस्मों के नाम पर लोग गोदावरी के गंदे पानी में बड़ी श्रद्धा से स्नान कर रहे थे, पुष्प, जलते दीपक का दोना नदी में बहा रहे थे. ‘अमृत लूटने वाले दिन’ दोपहर को जब एक महामंडलेश्वर की मंडली घाट पर आई और उस ने नदी में पैसे, प्रसाद फेंके तो भक्तों की भीड़ इस ‘अमृत’ को लूटने के लिए नदी में कूद पड़ी. पैसे के लिए मची, भगदड़ में कई भक्त मोक्ष पा गए.

मेले में कहीं रस्सी के सहारे बाबा लटके हुए थे, इन के आगे एक बोर्ड लगा था और उस पर लिखा था, बाबा खड़ेश्वरी. आगे एक दानपात्र पड़ा था. कहीं लाल मिर्च का ढेर लगा था और 30 मिर्चों को जला कर हवन किया जा रहा था. स्नान के लिए गुरुओं की झांकियां निकल रही थीं. भिखमंगों, अपंगों की भीड़ उमड़ी पड़ी थी. धर्म में बहुरूप धरने वालों का भी रिवाज है. मेले में तरहतरह के बहुरुपिए नजर आ रहे थे. कोई शिव, कोई हनुमान, कोई बंदर, कोई गरुड़ बना हुआ था लेकिन इन के हाथों में कटोरा अवश्य था. हर जगह ऐसा लग रहा था मानो मदारियों को जमा कर रखा है. अगर ये मदारी न हों तो कुंभ मेले में शायद कोई जाए ही नहीं.

दरअसल, रस्मों का यह एक मोहजाल फैलाया गया है. रस्मों के नाम पर इन में मौजमस्ती, रोमांच ज्यादा है. रस्में बनाई ही इसलिए गई हैं कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को आकर्षित किया जा सके क्योंकि मस्ती, मनोरंजन, खानपान, रोमांच के प्रति मनुष्य का जन्मजात स्वभाव है.

धर्म में इन रस्मों का यह स्वरूप आदमी की कमजोरी को भांप कर धीरेधीरे निर्धारित किया गया क्योंकि ज्यादातर हिंदुओं का धार्मिक जीवन देवीदेवताओं पर केंद्रित होता है. लोग नाच कर, गा कर, खाना खा कर, तरह- तरह के मनोरंजक तमाशे कर के खुश होते हैं और बहाना बनाते हैं पूजा करने का. पंडेपुजारी इस  बात को जानते हैं और वे इवेंट मैनेजर बन जाते हैं.

असल में रस्में अंधविश्वासों का जाल हैं. यह संसार का एक विचित्र गोरखधंधा है. तरक्की रोकने की बाधाएं हैं. असल बात तो यह है कि धर्म के पेशेवर धंधेबाजों ने रस्मों के नाम पर जेब खाली कराने के लिए सैकड़ों रास्ते निकाल लिए हैं. भिन्नभिन्न प्रकार की चतुराई भरी तरकीबों से हर धार्मिक, सामाजिक उत्सवों  पर रस्में रच दी गईं. इन रस्मों के ऊपर दानदक्षिणा, चंदा मांगने की रस्म और बना दी गई. कह दिया गया कि दान के बिना धर्म का हर काम अधूरा है. जनता अपने पसीने की कमाई में से रस्मों के नाम पर पैसा देना अपना धर्म समझती है.

हरिदास परंपरा के संगीत, सूरदास, कबीर, मीराबाई के भजन आखिर हों क्यों? क्यों शब्दजाल से सम्मोहित किया जाता है. भक्तों का मनोरंजन उद्देश्य है या ईश्वर की प्राप्ति? अब इस गीतसंगीत की जगह फिल्मी गीतसंगीत ने ले ली है. अच्छा है. नए युग में नया मनोरंजन. पुराने भजनों से भक्त आकर्षित नहीं होते. लिहाजा भक्तों की रुचि का पूरा खयाल रखा जाता है और अब उन्हें ‘ये लड़की आंख मारे’, ‘चोली के पीछे क्या है’ जैसे उत्तेजक फिल्मी गीतसंगीत पर रचे भजन गाएसुनाए जाते हैं.

धर्म के धंधेबाज लोगों में भय और लालच फैलाते हैं कि फलां रस्म न की गई तो ऐसा अनर्थ हो जाएगा व फलां रस्म की गई तो यह पुण्य होगा, इच्छाएं पूरी होंगी. सुखसमृद्धि आएगी. जन्म के बाद बच्चे का मुंडन नहीं कराया, इसलिए बच्चा बीमार रहने लगा. चाहे किसी कारणवश बच्चा बीमार हो गया हो, दोष रस्म न करना मान लिया जाता है. इस तरह के सैकड़ों भय दिखा कर लोगों को दिमागी गुलाम बना दिया गया है.

भयभीत, अनर्थ से आशंकित लोग यंत्रवत हर धार्मिक रस्म करने को आतुर हैं. चाहे जेब इजाजत दे या न दे. कर्ज ले कर धार्मिक रस्म तो करनी ही है. लोग खुशीखुशी अपनी जमा पूंजी खर्च कर देते हैं, क्योंकि मुंडन पर सैकड़ों को बुला कर खाना खिलाने का अवसर मिलता है. रिश्तेदार जमा होते हैं. देवरभाभी, जीजासाली घंटों चुहलबाजी करते हैं.

घर में बच्चा पैदा हुआ है, यह बताने के लिए डाक्टरी विज्ञान है. विज्ञान पढ़ कर भी इसे भगवान की कृपा मान कर जागरणकीर्तन की रस्म की जाती है. खाना, कपड़े, गहने दान किए जाते हैं. जागरण में अंशिमांएं भरी जाती हैं, सिर नवा कर भगवान को अर्पित कौन करता है? क्या यही सब करने से भक्त भगवान का दर्शन पा जाते हैं?

हम अपने धर्म, संस्कृति को महान बताते रहे. इस की श्रेष्ठता, महानता, गुरुता का गुण गाते रहे पर दूसरी जातियों और संस्कृतियों शक, हूण, यवन, अंगरेजों ने देश में आ कर हमें सैकड़ों सालों तक गुलाम बना कर रखा फिर भी हम अपना पागलपन नहीं त्याग पाए हैं. यह सब इसी पागलपन के कारण हुआ.

धर्म में अगर रस्मों के नाम पर इस तरह के मनोरंजक तमाशे न हों तो सबकुछ नीरस, फीकाफीका, ऊबाऊ लगेगा. रस, मौजमस्ती चाहने वालों की भीड़ नहीं जुटेगी. रस्मों की मौजमस्ती का धर्म की खिचड़ी में तड़का लगा दिया गया, इसलिए भक्तों को स्वाद आने लगा. आनंदरस मिलने लगा. यही कारण है कि धर्म हर किसी को लुभाता है और रस्में धर्म की जान बन गईं.

असल में धर्म का महल रस्मों के इन्हीं खंभों पर ही तो टिका है. तभी तो इस के रखवालों में जरा सी आलोचना से खलबली मच जाती है. घबरा उठते हैं वे कि कहीं असलियत सामने न आ जाए. पोल न खुल जाए. अगर धर्म मनोरंजन करने का एजेंट न बने तो धर्म बेजान, बेकार, दिवालिया सा दिखाई दे. धर्म की दुकानें सूनी, वीरान नजर आएं. क्या फिर ऐसे फीके, उबाऊ धर्म की ओर कोई झांकेगा.

जाहिर सी बात है, हर एजेंट अपना माल बेचने के लिए उसे तरहतरह से सजाएगा, संवारेगा, चांदी सी चमकती वर्क लगा कर दिखाएगा, प्रदर्शित करेगा. ग्राहकों को सब्जबाग दिखाएगा तभी तो ग्राहक आकर्षित होंगे. हिंदू धर्म में औरों से ज्यादा मनोरंजक तमाशे, रस्मों की मौजमस्ती हैं इसलिए यहां अधिक पैसा बरसता है. धर्म मालामाल है. यह सब मनोरंजन, मौजमस्ती न होती तो धर्म का अस्तित्व न होता. यही तो धर्म का मर्म है.

शर्मनाक: जीती जागती लड़की का मृत्युभोज

कल एक ह्वाट्सएप ‘ग्रुप में शोक संदेश का कार्ड आया. शोक संदेश में एक लड़की की मौत होने और उस की ‘पीहर गौरणी’ यानी मृत्युभोज का आयोजन होने का ब्योरा छपा था. शोक संदेश पर लड़की की तसवीर भी छपी थी.

बहुत ही कमउम्र लड़की की मौत के इस शोक संदेश को पढ़ कर दुख हुआ, लेकिन जैसे ही कार्ड के साथ लिखी इबारत को पढ़ा तो मैं हैरान रह गया. आंखें हैरानी से खुली रह गईं, क्योंकि यह मृत्युभोज किसी लड़की की मौत पर नहीं, बल्कि उस के जीतेजी किया जा रहा था.

उस शोक संदेश में लड़की की मौत की तारीख  1 जून, 2023 लिखी थी और मृत्युभोज  का आयोजन 13 जून, 2023 को आयोजित किया जाना लिखा था. यह मृत्युभोज लड़की के दादा, पिता, चाचा, ताऊ और भाई कर रहे थे.

यह मामला केवल हैरानी तक सीमित नहीं है, बल्कि यह परेशान करने वाला है. इस से पता चलता है कि हमारा समाज आज भी किस मोड़ पर खड़ा है. यह शोक संदेश राजस्थान के भीलवाड़ा जिले के एक गांव से आया था.

वहां की 18 साल की एक लड़की ने अपनी पसंद के लड़के से शादी रचा ली थी और उस के इस ‘अपराध’ की सजा उसे जीतेजीते मरा घोषित कर के दी जा रही थी.

इस लड़की की सगाई गांव के ही एक लड़के से हुई थी. किसी वजह से परिवार वालों ने यह सगाई तोड़ दी, लेकिन लड़की ने इसे मंजूर नहीं किया. वह उसी लड़के से शादी करने पर अड़ गई.

परिवार वालों ने हामी नहीं भरी, तो लड़की ने घर से भाग कर उसी लड़के से शादी कर ली.  जब परिवार वालों ने लड़की की गुमशुदगी दर्ज कराई, तो पुलिस ने उसे ढूंढ़ कर बयान लिए. लड़की ने अपनी मरजी से शादी करने की बात कह कर परिवार वालों के साथ जाने से इनकार कर दिया.

लड़की का यह रवैया परिवार वालों को किस कदर नागवार गुजरा होगा, इस बात का अंदाजा शोक संदेश से लगाया जा सकता है. उन्होंने इस के विरोध में वही तरीका अपनाया, जो गांवदेहात में प्रचलित है यानी लड़की को मरा घोषित कर के उस का मृत्युभोज कर देना.

लड़की के परिवार वालों ने इसे अपनी ‘पगड़ी की लाज’ बचाने का कदम बताया है.  जब कोई लड़की भाग कर शादी कर लेती है, तो समाज उस के परिवार वालों को किस कदर शर्मिंदा करता है, यह किसी से छिपा नहीं है.

लड़की के भाग जाने की खबर सार्वजनिक होते ही उस के परिवार वालों पर थूथू की जाने लगती है. इस मामले में भी यही हुआ. जब प्रिया नामक इस लड़की ने अपनी मरजी से शादी रचाई, तो किसी ने इस की खुशी नहीं मनाई.

परिवार वालों पर यह खबर बिजली की तरह गिरी. उन्हें लगा कि वे किसी को चेहरा दिखाने लायक नहीं रहे. गांव के पंचपटेलों ने भी जलती आग  में घी का काम किया.

इस का नतीजा जीतीजागती लड़की के शोक संदेश के रूप में सामने आया. यह अपनी तरह का कोई पहला मामला नहीं है. लड़की के अपनी मरजी से शादी कर लेने पर गांवदेहात में ऐसी बातें अकसर सुनने को मिलती रहती हैं.

पहले ऐसी बातें अखबारों की सुर्खियां नहीं बनती थीं, लेकिन सोशल मीडिया के दौर में अब ऐसी बातें फौरन घरघर तक पहुंच जाती हैं. 2-3 साल पहले मध्य प्रदेश में मंदसौर के पास एक गांव की 19 साल की शारदा ने अपनी पसंद के लड़के से शादी की, तो उस के परिवार वालों ने भी वैसा ही कुछ किया था, जो अब प्रिया के परिवार वालों ने करने की सोची.

सवाल उठता है कि आखिर ऐसा कर के किसी को मिलेगा क्या? दरअसल, भाग कर शादी करने वाली लड़कियों के परिवार वाले उन के जीतेजी मृत्युभोज कर के अपनी नाक ‘ऊंची’ फिर से करना चाहते हैं.  उन्हें लगता है कि जब वे अपनी लड़की को मरा मान लेंगे, तो समाज उन्हें कुसूरवार नहीं ठहराएगा, बल्कि उन की गिनती उन ‘बेचारों’ में होगी, जिन की परवाह उस औलाद ने भी  नहीं की, जिसे उन्होंने पालापोसा और पढ़ायालिखाया.

21वीं सदी में पहुंचने के बावजूद भी समाज की असली तसवीर यही है. इस का सुबूत हैं वे बातें, जो भीलवाड़ा की प्रिया के मृत्युभोज का कार्ड सोशल मीडिया पर वायरल होने पर सामने आईं.  ऐसे लोगों की तादाद कम नहीं है, जो जीतीजागती लड़की का मृत्युभोज करने को सही ठहरा रहे हैं.

इसे अच्छी पहल बताया जा रहा है. समाज में हम अकसर लोगों को नारी सशक्तीकरण की बातें करते सुनते हैं, लेकिन जब कोई लड़की अपनी मरजी  से शादी कर लेती है, तो उसे कुलटा, कलंकिनी, कुलबैरन, खानदान की नाक कटाने वाली और न जाने क्याक्या कहा जाने लगता है.

कई बार तो मनमरजी से शादी करने का बदला लड़की की हत्या कर के लिया जाता है. समझ नहीं आता कि लड़की के अपनी मरजी से शादी करने पर ही कुल की नाक नीची क्यों होती है? कोई लड़का अगर पसंद की लड़की से शादी कर ले, तो ऐसा हंगामा क्यों नहीं बरपता? इस से भी बड़ा सवाल यह है कि क्या एक बालिग लड़की को अपनी पसंद से शादी करने का भी हक नहीं है?

नाबालिग लड़कियों का प्यार!

किशोरावस्था में लड़कियां जब किसी के प्यार के फंदे में फंस जाती है, तो अक्सर आगे जाकर अपनी जिंदगी तबाह कर लेती है.

यह एक ऐसी उम्र होती है, जब युवा आकर्षण में नवयुवतियां ऐसी भूल कर बैठती है कि आने वाला समय उनके लिए अंधकार मय हो सकता है. क्योंकि उन्हें पता नहीं होता कि सामने जो युवक है अथवा अधेड़ उम्र का व्यक्ति है, उसकी मंशा कितनी “सौ सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली” वाली है.

दरअसल, युवावस्था में पांव रखने वाली युवती एक ऐसी मोहक अवस्था में होती है कि जब उसे दुनियादारी का पता नहीं होता.आम तौर पर मीठी चुपड़ी बातों में आकर वह जब प्यार की अंधी गली में आगे बढ़ जाती है तो पीछे मुड़ कर देखने का वक्त ही नहीं रह जाता और जिंदगी तबाही की ओर अग्रसर हो चुकी होती है.

आइए! आज इस अत्यंत महत्वपूर्ण सामाजिक त्रासदी पर दृष्टिपात करते हुए इस रिपोर्ट के माध्यम से यह संदेश युवा पीढ़ी को देने का प्रयास करें कि ठीक है आपकी उम्र प्यार… मोहब्बत की है, मगर थोड़ा संभल कर, समझ के साथ कर आगे बढ़ना.

शादी का झांसा, जिंदगी बर्बाद!

छत्तीसगढ़ के जगदलपुर आदिवासी बाहुल्य जिले में नाबालिग को विवाह झांसा देकर भगाने का मामला सामने आया है. युवक ने नाबालिग को भगाकर अवैध सम्बन्ध बनाए. पुलिस के अधिकारी ने हमारे संवाददाता को बताया कि परपा थाना इलाके के एक युवक शादी का झांसा देकर एक नाबालिग लड़की को अपने साथ भगाकर ले गया और उसका शीलभंग कर शादी करने का आश्वासन देता रहा .
पुलिस में रिपोर्ट के पश्चात तथ्यों की विवेचना की गई . इधर जब परिजनों को लापता हो गई लड़की नही मिली तो उन्होंने भी ख़ोज बीन शुरू की. पुलिस ने तलाश की, अंततः आरोपी को बड़े आमाबाल खरियापारा से गिरफ्तार कर लिया.

इस मसले पर परपा नगर निरीक्षक बी.आर.नाग ने बताया मामला नाबालिग लड़की का था अतः हमने संवेदनशीलता के साथ जांच प्रारंभ की और आरोपी की खोजबीन की गई. आखिरकार साइबर सेल और मुखबिर से जानकारी मिली कि गुम लड़की और आरोपी युवक भानपुरी इलाके के बड़े आमाबाल में है. टीम ने दबिश देकर नाबालिग लड़की को शामु कुमार बघेल के कब्जे से बरामद किया. लड़की ने बताया कि आरोपी ने उसे शादी का प्रलोभन देकर जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाकर दुष्कर्म किया है. आरोपी शामु कुमार बघेल को पुलिस ने कड़ा सबक सिखाते हुए धारा 366क, 376 भादवि, 06 पाक्सो एक्ट के तहत कार्यवाही कर कोर्ट में पेश किया गया. जहा से आरोपी को न्यायिक रिमाण्ड पर जेल भेजा गया है.

इस धोखे का हल क्या है?

सवाल यह है, कि इस धोखे और झांसे का हल क्या है. आखिरकार कैसे नाबालिक लड़कियां झांसे…. धोखेबाजी से बच सकती हैं. इस संदर्भ में पुलिस अधिकारी इंद्र भूषण सिंह कहते हैं कि सबसे बड़ा दायित्व होता है माता पिता और परिवार का. जो नाबालिक लड़कियों को, बच्चों को संस्कार दे सकते हैं.आज की इस आपाधापी के समय में माता पिता के पास समय नहीं रहता कि वे बच्चों से खुलकर अंतरंग बातें कर सकें. फलस्वरूप नाबालिक विशेष रूप से लड़कियां जब कहीं थोड़ा सा भी आसरा, झुकाव… प्यार का संबंल मिलता है तो किसी बेल की तरह लिपटने लगती है.

इस संदर्भ में प्रसिद्ध चिकित्सक डॉक्टर जी. आर. पंजवानी के मुताबिक बच्चों को अच्छे संस्कार हेतु श्रेष्ठतम पुस्तकें पढ़ने की आदत डालनी चाहिए जिन्हें पढ़कर वे सकारात्मक उर्जा से ओतप्रोत हो सकते हैं और गलत राह ओर नहीं बढ़ेंगे.

मिसाल: सामाजिक भाईचारा- जाट के घर से उठी, दलित लड़की की डोली

देवाराम जाखड़ की प्रगतिशील सोच व क्रांतिकारी पहल के चलते एक दलित समाज की लड़की पुष्पा की शादी एक जाट किसान परिवार के आंगन में पूरी होने पर देवाराम जाखड़ की सोच, उन की कोशिश और उन की हिम्मत की हर कोई तारीफ कर रहा है. गंवई इलाके में सब से ज्यादा अछूत समझी जाने वाली हरिजन जाति का नौजवान चाऊ गांव में दूल्हा बन कर घोड़ी पर ही नहीं बैठा, बल्कि वह घोड़ी पर सवार हो कर तोरण मारने के लिए जाट जाति के घर भी पहुंच गया.

जाखड़ों वाली ढाणी पर जब यह बरात पहुंची, तो जाटणी (देवाराम जाखड़ की पत्नी) ने दूल्हे का स्वागत चांदी के सिक्के से तिलक लगा कर किया. जाखड़ों की ढाणी में घोड़ी पर बैठे हरिजन दूल्हे के आगे भी वैसे ही नाचगान चल रहे थे, जैसे अकसर यहां के जाटों में होने वाले शादीब्याह में चलते रहते हैं. देवाराम जाखड़ ने शादी के कार्ड में कार्ल मार्क्स का संदेश ‘लोगों की खुशी के लिए पहली आवश्यकता धर्म का अंत है. धर्म अफीम की तरह है,’ लिखवाया.

कार्ड में कई संदेश दिए गए, जिन में पहला संदेश ज्योतिबा फुले का था, जिस में ज्योतिबा फुले को राष्ट्रपिता मानते हुए असमान व शोषक समाज को उखाड़ फेंकने के उन के ऐलान को उजागर किया गया. इस कार्ड में देवाराम जाखड़ ने ‘धरती आबा’ बिरसा मुंडा जैसे क्रांतिकारियों के क्रांतिकारी संदेश लिखवाए, जिन का नाम इस इलाके के लोगों ने पहली बार सुना. शादी के कार्ड में भगत सिंह, डाक्टर भीमराव अंबेडकर, सर छोटूराम, जयपाल सिंह, बिरसा मुंडा जैसे क्रांतिकारियों के संदेश लिखवाए गए, पर देवाराम जाखड़ ने किसी ब्राह्मणवादी देवीदेवता को पास भी नहीं फटकने दिया. शादी के कार्ड में एकमात्र तसवीर विद्रोही संत रैदास की थी.

शादी के इस कार्ड के कवर पेज पर ‘जय जवान जय किसान’ के स्लोगन के साथ ‘शिक्षित बनो, संगठित रहो, संघर्ष करो’ का ऐलान किया गया. इतना ही नहीं, इन्होंने इस कार्ड के कवर पेज पर शिक्षा और आजादी के बारे में लिखते हुए ‘किताबों संग आजादी, पढ़े चलो, बढ़े चलो’ का नारा भी दिया.

जाखड़ का यह गांव मशहूर मारवाड़ी लोककवि कानदानजी के गांव ‘मरुधर म्हारो देश झोरड़ों’ का ग्राम पंचायत मुख्यालय है, इसलिए इस निमंत्रणपत्र को पढ़ कर कानदानजी की एक कविता में थार के रेगिस्तान में बसने वाले ऐसे ही हीरेमोतियों के लिए दी गई उपमा ‘मरुधर का मोती’ याद आती है. शायद देवाराम जाखड़ जैसी ऊंची सोच रखने वाले लोगों के लिए ही कानदानजी ने यह उपमा दी होगी. देवाराम जाखड़ द्वारा खेतीकिसानी की आमदनी से करवाई गई यह शादी मरुधर में जाति आधारित ऊंचनीच और अंधविश्वास मिटाने की दिशा में बहुत बड़ा कदम होगा.

गौरतलब है कि इस देश में वर्ण व्यवस्था के चलते हजारों बरसों से सामाजिक व्यवस्था में एक दमघोंटू सा माहौल रहा है, हद दर्जे की छोटी सोच का बोलबाला रहा है, धार्मिक कर्मकांडों के चलते इनसानियत कहीं एक कोने में सदियों तक दफन रही है, दम तोड़ती रही है, सिसकती रही है… कह सकते हैं कि इस दमघोंटू व्यवस्था के खिलाफ भी लोगों ने सोचना और कदम उठाना शुरू किया है.

जाट एक किसान कौम है, जो हमेशा इंसाफ और सच के साथ रही है, जो इतिहास में कमजोर तबके के साथ खड़ी मिली है. जाट पुरखों ने अपना सबकुछ दांव पर लगा कर भी दलितों और कमजोरों के हक की लड़ाई पूरे दमखम के साथ लड़ी है. ज्यादातर यह कौम पाखंड और कर्मकांडी जमात से अकसर दूर ही रही है, बल्कि इन का मुखर विरोध भी रहा है. 11वीं शताब्दी में पैदा हुए इस कौम के महापुरुष वीर तेजाजी का जीवन इस का प्रमाण है, जिन्होंने दलितों को अपने साथ रखा, दूसरों की खातिर अपना जीवन बलिदान कर दिया था. आज भी यह शादी उसी परंपरा में एक और कड़ी है.

देवाराम जाखड़ कहते हैं, ‘‘हमें यह बात समझ लेनी चाहिए कि हमारे असली और स्वाभाविक साथी एससी और एसटी ही हैं. मनुवादी और सामंती  तत्त्वों से हमारी परंपरागत सोच का कोई मेल न कभी गुजरे कल में हुआ और आज और भविष्य में तो इस की उम्मीद कम ही लगती है, क्योंकि उन के हित और हमारे हित एक नहीं हैं. ‘दलित वर्गों से हमारे हितों का कोई टकराव नहीं है, हमारा और इन का मेल स्वाभाविक है. हमें यह बात दिल और अपनी समझ में बैठानी होगी कि बिना एससी व एसटी के साथ हम अधूरे हैं. अगर ये सब एक नहीं हुए, तो सब नुकसान में ही रहेंगे. वक्त की जरूरत को समझते हुए इन की एकता बहुत जरूरी है.’’

यहां केवल यही एक बड़ी बात नहीं है कि इस किसान परिवार ने बिना मांबाप की एक दलित लड़की पुष्पा की शादी का खर्चा उठाया है. इस में बड़ी बात यह है कि ठेठ थार के रेगिस्तान की इस धोरा री धरती में, जहां की बड़ी आबादी ब्राह्मणवाद की गुलाम है, जो 100 फीसदी पिछड़ी सोच में जी रही है, जहां हरिजन लोग मेघवालों, नायकों, बावरियों, ढोली, भीलों और चौकीदारों वगैरह के घर के दरवाजे से भी काफी दूर खड़े रहते हैं, वहां जाट कौम के किसान परिवार ने एक हरिजन की बेटी की शादी अपने घर के आंगन में की है.

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