क्या करें जब पड़ोस की लड़की भाने लगे

खैर, मसला यह है कि क्या करें जब पड़ोस की लड़की भाने लगे, उस के लिए दिल में कुछकुछ होने लगे और उसे देखने भर से मन न भरे. पहली बात जो इस मसले में जान लेना बहुत जरूरी है, यह है कि पड़ोस के प्यार के बारे में शायद आप को अब भी कुछ दुविधा हो कि यह प्यार है या नहीं, लेकिन, पूरे महल्ले के लिए तो आप का उसे एक नजर देखना भर ही “पक्का इन का चक्कर चल रहा है” कहने के लिए काफी होगा. तो, जरा संभल कर.

प्रोपोज करने से पहले सोच लें यदि आप यह सोचें की आप को अपने सामने वाले घर में रहने वाली लड़की अच्छी लगती है और आप के दिमाग में उसे देखते ही ‘मेरे सामने वाली खिड़की में एक चांद सा टुकड़ा रहता है’ गीत गुनगुनाने लगता है, तो इस का मतलब यह नहीं कि आप जा कर सीधा प्रोपोज कर दें.

पहले अपनी फीलिंग्स को ले कर क्लियर हो जाएं कि सच में आप उसे चाहने लगे हैं या यह छोटा मोटा क्रश है. इस के बाद उस लड़की के हावभाव नोटिस करें. अगर वह भी आप को उस नजर से देखती है जिस से आप देखते हैं, अगर वह भी आप को नोटिस करती है, अगर उस ने सच में कोई हिंट दिया है तो आप उसे प्रोपोज करने के बारे में सोच सकते हैं, नहीं तो नहीं.

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हां, परंतु उस का अपनी खिड़की पर आ कर बाल सुखाना और खिड़की का पर्दा खुला रखना आप के लिए कोई संकेत नहीं है, यह भी ध्यान रखें. उस की सामान्य क्रियाओं को प्रतिकिर्याओं के रूप में लेने की कोशिश न करें.

शब्दों का चुनाव सही हो

अगर आप को उस लड़की को प्रोपोज करना है तो अपने शब्दों का चुनाव सही रखना बेहद जरूरी है. उसे दो दिन पहले देखा और तीसरे दिन जा कर यह कह देना कि मैं तुम्हें बेहद प्यार करता हूं और तुम्हारे बिना मर जाऊंगा, बेतुका है. फिल्म रांझना के कुंदन बनने से कुछ होने वाला नहीं है, थोड़े समझदार व्यक्ति की तरह सोचें. यदि आप उसे पसंद करते हैं तो उसे यह कहें कि आप को वह पसंद है. आप को उसे देखना अच्छा लगता है तो उसे यह कहें कि वह खूबसूरत है और आप की नजरें उस पर रुक जाती हैं. जवानी के जोश में और अपने खुद के भ्रम में उस लड़की को उलझाने की कोशिश न करें. प्यार को चलता फिरता शब्द न बनाएं.

गति धीमी रखें

यदि आप की पड़ोस की लड़की भी आप को उतना ही पसंद करती है जितना आप करते हैं तो खुशी के मारे हर चीज़ हबड़तबड़ में न करें. आज उसे खत भेजना तो कल बाजार में हाथ पकड़े घूमना और परसो उसे कहना कि किस करे या सेक्स करे, गलत है. चीज़ें शुरू के दिनों में जितनी अच्छी लगेंगी ब्रेकअप होने के बाद उतनी ही खलेंगी भी. वैसे भी जल्बाजी करने पर चीज़े बिगड़ती ही हैं, फल अपना समय ले कर ही उगते हैं, जल्बाजी करने पर पेट में रसायन ही जाता है जो जानलेवा होता है.

आसपड़ोस का रखे ध्यान

अपने प्यार में इतना भी न खो जाएं कि आप आसपास देखना ही भूल जाएं. पड़ोस की लवस्टोरी में परिवार और पड़ोस की भी बड़ी भूमिका होती है. यदि जाने-अनजाने किसी को आप दोनों के प्रेमप्रसंग के बारे में पता चलता है तो यह आप दोनों के रिश्ते का अंत भी हो सकता है. यह न भूलें कि भारतीय परंपरा और प्रतिष्ठा से लिप्त परिवारों के लिए लड़के लड़की का शादी से पहले ‘प्यार’ का नाम लेना भी “थूथू” से कम नहीं. तो, बाजार में हाथ पकड़े न घूमें, हमेशा उसे ही ताकते न रहें, इशारों इशारों में इतनी भी बातें न करें कि पूरा महल्ला ही इस का दर्शक बन जाए.

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दोस्तों को हर बात न बताएं

माना दोस्तों से कुछ छुपाना नहीं चाहिए हम ने बचपन से सीखा है लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि आप इस बात को अपने अंदर इतना घुसा लें कि आप अपने प्रेमप्रसंग की बातें हर किसी को ही बताने लगें. आप का दोस्त यदि आप को जानता है तो उस लड़की को भी जानता ही होगा. एक ही महल्ले में रहने के कारण आप का दोस्त भी उस लड़की को हमेशा ‘भाभी’ की नजर से ही देखेगा जोकि सही नहीं है, क्योंकि इस से उस लड़की को अटपटा लग सकता है.

आप यदि अपने दोस्तों को अपने और उस लड़की के शारीरिक संबंधों के बारे में बताते फिरेंगे तो यकीन मानिए वे उस लड़की को वासना की नजर से देखने लगेंगे. कितनी ही बार तो ऐसी घटनाएं भी सामने आई हैं जब दोस्तों ने अपनी ही दोस्त की गर्लफ्रेंड को छेड़ा या उस के साथ बलात्कार की कोशिश की है. तो, जरा संभल कर.

पारिवारिक अस्मिता का ध्यान रखें

पड़ोस के प्यार में अकसर लड़के-लड़कियां पारिवारिक अस्मिता का ध्यान रखना भूल जाते हैं. एकदूसरे से छत पर छुपछुप कर मिलना, एकदूसरे के घर में घुस जाना, फंक्शन का फायदा उठा कर एकदूसरे को भरी महफिल में छूने की कोशिश करना, गलत है. कुछ भी करने से पहले अच्छी तरह सोच लें. इस पड़ोस के प्यार के पकड़े जाने पर आप और आप का परिवार तो आहत होते ही हैं, साथ ही लड़ाई झगड़ा होता है जिस का मनोरंजन पूरा महल्ला उठाता है और मजे लेता है. अपनी मोहब्बत को अपने परिवार की इज्जत उछालने का जरिया न बनने दें.

ब्रेकअप को सर पर न चढ़ने दें

हो सकता है आप को लग रहा हो कि अभी तो आप की लवस्टोरी शुरू भी नहीं हुई और मैं ब्रेकअप की बातें करने लगी. लेकिन, यह समझना भी बेहद जरूरी है. पड़ोस के प्यार में प्राइवेसी बहुत कम होती है, एकदूसरे का घर भी आसापास ही होता है इसलिए. ऐसे में यदि आप का ब्रेकअप हो जाए तो दो चीज़ें हो सकती हैं. पहला, आप इस ब्रेकअप से इतना टूट गए हैं कि उस लड़की की हंसी भी आप को अंगारों जैसी जला रही है.

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दूसरा, आप उस लड़की को अपनी खुशी दिखा कर जलाना चाहते हैं. दोनों ही मामलों में कुछ भी करने से पहले सोच लें. यह वही लड़की है जिस की चाहत में आप कुछ दिन पहले तक पागल हो गए थे, इसलिए अब उस के लिए कुछ बुरा सोचना या उस को नुक्सान पहुंचाने जैसी चीजें न सोचें. जो हो गया, सो हो गया. बातों को पकड़ कर न बैठे रहें बल्कि आगे बढें.

सुरा प्रेम में अव्वल भारत

साल 2005 से साल 2016 के बीच इस की खपत दोगुनी हो चुकी थी. मनोवैज्ञानिकों की रिसर्च बताती है कि किसी चीज की लत लग जाने से इनसान को दिमागी तनाव, असंतोष और हताशा होती है. हमें इस रिसर्च की वजहों की जांचपड़ताल खुशहाली के विश्व सूचकांक में करनी चाहिए. दुनिया के 155 देशों में हम नीचे खिसक कर 133वें पायदान पर आ गए हैं,

जबकि एक साल पहले हमारी जगह 122वीं थी. अगर आम आदमी बेचैन और परेशान है तो जाहिर है कि वह राहत की तलाश में शराब जैसे नशे का आसान सहारा लेता है. लेकिन उस के लिए पैसा भी तो होना चाहिए. भारत जैसे देश में, जहां राज्य सरकारें शाही खर्च पूरे करने के लिए शराब पर भारीभरकम टैक्स लगाती हों, ऐसे में सस्ती शराब गरीब के लिए वरदान जैसी बन जाती है. इसी कमजोरी का फायदा पैसे के लिए जिंदगी से खिलवाड़ करने वाले लोग उठाते हैं. केंद्र सरकार मानती है कि हर साल 2 से 3 हजार लोग जहरीली शराब पीने से अपनी जिंदगी से हाथ धो बैठते हैं. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड में एक बार फिर जहरीली व सस्ती शराब ने 110 से ज्यादा लोगों को मौत की नींद सुला दिया. यह तथाकथित शराब उत्तराखंड के पवित्र क्षेत्र हरिद्वार में बनी थी और एक पारिवारिक उत्सव के मौके पर वहां आए मेहमानों को परोसी गई थी. कहने की जरूरत नहीं है कि हर थोड़े समय पर लगातार होने वाली ऐसी घटनाएं निकम्मे प्रशासन, भ्रष्टाचार और जनविरोधी नीतियों की ओर ध्यान दिलाती हैं, लेकिन हमदर्दी और दिखावटी कानूनी कार्यवाही वाले खोखले उपायों से आगे हम कभी जा ही नहीं पाते हैं. नतीजतन, मौत का यह ताडंव बदस्तूर जारी रहता है.

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उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसा ही हादसा साल 2015 में मुंबई के इलाके मालवणी में हुआ था, जिस में तकरीबन 106 मजदूर सस्ती शराब पीने से अपनी जान गंवा बैठे थे. अगर उसी इलाके में जा कर देखा जाए तो वहां अब भी उसी तरह सस्ती व नकली शराब बनते हुए मिल जाएगी. निकम्मे प्रशासन और लचर कानून व्यवस्था की पोल खोलने वाले ऐसे हादसों के तत्काल बाद सरकारी मशीनरी छापे मारती है और तलाशी मुहिम चलाती है. ज्यादा कोशिश किए बिना ही वह नकली जहरीली शराब बनाने वाले ठिकानों तक पहुंच जाती है और सैकड़ोंहजारों लिटर जानलेवा शराब बरबाद करने की तसवीरें ले कर वाहवाही के लिए जनता के सामने आ खड़ी होती हैं. अंधाधुंध गिरफ्तारियों के साथ ही कुछ दिनों के लिए जहर के सौदागर ओझल हो जाते हैं और जैसे ही जनता का गुस्सा कम होने लगता है, वे फिर यह धंधा शुरू कर देते हैं. इस मामले में सब से जरूरी सवाल यह है कि सरकारें विभागीय जवाबदेही क्यों तय नहीं करती हैं? गैरकानूनी शराब के कारोबार पर निगरानी रखने के लिए सभी प्रदेशों में अलग विभाग काम कर रहे हैं. ऐसे हादसों के सामने आने पर इन विभागों से न केवल जवाबतलब किया जाना चाहिए, बल्कि इस के लिए जवाबदेह अफसरों और मुलाजिमों पर सख्त कार्यवाही भी की जानी चाहिए.

पर ऐसा होता नहीं है. प्रशासन वाले शायद इन आंकड़ों से खुश हो जाते हैं कि दुनिया में शराब का सब से बड़ा उपभोक्ता और तीसरा आयातकर्ता भारत है. हालांकि, देश में बहुत बड़े पैमाने पर कारखानों में शराब का उत्पादन होता है. ऐसे बड़े कारखानों की तादाद 10 है. इन में तैयार की जाने वाली शराब का 70 फीसदी देश में ही सुरा प्रेमियों द्वारा इस्तेमाल कर लिया जाता है, फिर भी ज्यादा सस्ता और आसान नशा मुहैया कराने के लिए शराब के नाम पर जहरीली चीजों से तैयार पेय का बेचा जाना आम बात है. ये पेय ही जानलेवा बन जाते हैं. देश के 8 राज्य ऐसे हैं, जिन में ऐसे 70 फीसदी हादसों से लोगों को दोचार होना पड़ता है. इन में उत्तर प्रदेश के अलावा महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना शामिल हैं. ऐसी घटनाएं शराबबंदी वाले गुजरात में भी सामने आ चुकी हैं, हालांकि कारोबारी हितों को ध्यान में रखते हुए इन पर कोई सख्त कारगर कार्यवाही नहीं की गई है. उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड हादसों से जुड़ी जानकारी बताती है कि जिस जहरीले पेय को पीने से इतनी बड़ी तादाद में लोग मौत का शिकार बने, उस की कीमत सिर्फ 10 रुपए से शुरू हो कर 30 रुपए तक थी.

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यहां यह तर्क दिया जा सकता है कि शराब पर सभी राज्य सरकारों को टैक्स की दरें घटानी चाहिए, लेकिन इस के खिलाफ एक दलील तो यह भी है कि शराब सस्ती होगी तो ज्यादा मात्रा में पीने की वजह से लोगों की सेहत से जुड़ी समस्याएं बढ़ेंगी. दूसरी परेशानी पैसे की है. सभी राज्य सरकारें तकरीबन 20 फीसदी राजस्व शराब पर टैक्स से जुटाती?हैं. जाहिर है, यह राजस्व का एक बड़ा जरीया है. यही वजह है कि शायद ही किसी राज्य का कोई ऐसा बजट आता हो, जिस में शराब पर टैक्स न बढ़ाए जाते हों. राज्य सरकारों की इस पैसा बटोरू लालची नीति ने शराब इतनी महंगी कर दी है कि गरीब आदमी की उस तक पहुंच मुश्किल हो गई. इन हालात ने ही सस्ती शराब बनाने के लिए संगठित अपराधी गिरोहों को मौका दिया है. ये गिरोह कई तरीकों से सस्ता नशा तैयार करते हैं. इन का तंत्र पूरी योजना बना कर काम करता है और निगरानी रखने वाले सरकारी अफसरों व मुलाजिमों के साथ भी उन की अच्छी दोस्ती बनी रहती है. आबकारी विभाग को सस्ता नशा बनाने वालों और बेचने वालों की जानकारी होती है.

सच तो यह है कि इस गैरकानूनी काम पर उन्हीं की सरपरस्ती है, वरना वे इतनी आसानी और कामयाबी से अपने आपराधिक कारोबार को चला ही नहीं सकते. आमतौर पर शराब की 4 किस्में प्रचलित हैं. इन में पहली है ताड़ी या कच्ची शराब, जिसे अरक या अर्क, ठर्रा, फैनी वगैरह कई नामों से पुकारा जाता है. दूसरी है देशी शराब, तीसरी बीयर और विदेशी कह कर सेवन की जाने वाली शराब और चौथे नंबर पर स्कौच या वाइन जैसी महंगी आयातित विदेशी शराब हैं. हम एक 5वीं किस्म भी रख सकते हैं जो गरीब बस्तियों या दूरदराज के गांवों में बिना कोशिश के मिल जाती है और जो सब से सस्ती लागत में तैयार करने के लिए जहरीली चीजों से बनाई जाती है. कच्ची शराब को ज्यादा नशीला बनाने की कोशिश में वह जहरीली हो जाती है. आमतौर पर इसे बनाने में गुड़, शीरा से लहन तैयार किया जाता है. लहन को मिट्टी में दबा दिया जाता है. इस में यूरिया और बेशरम बेल की पत्तियां डाली जाती हैं. ज्यादा नशीला बनाने के लिए इस में औक्सिटोसिन मिला दिया जाता है, जो थोड़ी भी मात्रा ज्यादा हो जाने पर मौत की वजह बनता है. कुछ जगहों पर कच्ची शराब बनाने के लिए गुड़ में खमीर और यूरिया मिला कर इसे मिट्टी में दबा दिया जाता है. खमीर उठने पर इसे भट्ठी पर चढ़ा दिया जाता है. गरम होने के बाद जब भाप उठती है तो उस से शराब उतारी जाती है. इस के अलावा सड़े संतरे, उस के छिलके और सड़ेगले अंगूर से भी खमीर तैयार किया जाता है. कच्ची शराब में औक्सिटोसिन और यूरिया जैसे कैमिकल मिलाने की वजह से मिथाइल अलकोहल बन जाता है.

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इस की वजह से ही लोगों की मौत होती है. मिथाइल अलकोहल के शरीर में जाते ही तेज रासायनिक क्रिया होने लगती है. इस का असर बढ़ने पर शरीर के अहम अंग जैसे जिगर, गुरदे, फेफड़े काम करना बंद करने लगते हैं. इस की वजह से कई बार तुरंत मौत हो जाती है. खपत के लिहाज से देश में सब से पहला नाम आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का है. वहां एक साल में औसत प्रति व्यक्ति 34.5 लिटर या हर हफ्ते 665 मिलीलिटर शराब इस्तेमाल की जाती है. कीमती या सस्ती शराब का सीधा ताल्लुक पीने वाले की कमाई और उस के रहनसहन से होता है. शहर में कुछ बेहतर किस्म की और गांव में देशी शराब को प्रमुखता से इस्तेमाल किया जाता है. वैसे, फिलहाल भारत में गुजरात, बिहार, केरल, लक्षद्वीप, नागालैंड और मणिपुर में शराबबंदी है. हाईवे पर शराब बिक्री बैन देश के हाईवे पर हर साल डेढ़ लाख लोगों की जान चली जाती है. इस की एक अहम वजह शराब के चलते होने वाले हादसों को माना जाता है. सुप्रीम कोर्ट ने इस दिशा में कदम उठाते हुए नैशनल हाईवे पर बेची जाने वाली शराब के नियमों में सख्ती की है. इन रास्तों से कम से कम 220 मीटर दूर ही शराब की दुकानें खोली जा सकेंगी.

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पहले के आदेश में यह दूरी 500 मीटर तय की गई थी, लेकिन राज्य सरकारों और केंद्र की दलीलों के बाद इसे कम कर दिया गया है. उन का कहना था कि पहाड़ी क्षेत्रों में 500 मीटर के फासले पर पहाड़ आ ही जाएगा. इस बदलाव का फायदा सिक्किम, मेघालय, हिमाचल प्रदेश राज्यों को भी मिलेगा. इसी तरह का तर्क गोवा के मामले में पेश किया गया कि इतनी कम दूरी पर समुद्र हर जगह पर आ जाएगा. इस आधार पर वहां भी यह फासला घटा दिया गया. अदालत से कुछ राज्यों ने यह गुहार भी लगाई गई कि वहां शराबबंदी लागू की जाए. इन में झारखंड, छत्तीसगढ़ जैसे राज्य शामिल हैं. एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि शराब की दुकानों का संचालन नहीं, नशे के कारोबार पर कंट्रोल करना सरकारों का काम है, इसलिए जो निगम या सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थान यह जिम्मेदारी निभा रहे हैं, उन को इस से हट जाना चाहिए.

संस्कार

लेखक- आशा जैन

नई मारुति दरवाजे के सामने आ कर खड़ी हो गई थी. शायद भैया के ससुराल वाले आए थे. बाबूजी चुपचाप दरवाजे की ओट में हाथ जोड़ कर खड़े हो गए और मां, जो पीछे आंगन में झाडू दे रही थीं, भाभी के आवाज लगाते ही हड़बड़ी में अस्तव्यस्त साड़ी में ही बाहर दौड़ी आईं.

आते ही भैया की छोटी साली ने रिंकू को गोद में भर लिया और अपने साथ लाए हुए कई कीमती खिलौने दे कर उसे बहलाने लगी. ड्राइंगरूम में भैया के सासससुर तथा भाभीभैया की गपशप आरंभ हो गई. भाभी ने मां को झटपट नाश्ता और चाय बनाने को कह दिया. मां ने मुझ से पूछ कर अपनी मैली साड़ी बदल डाली और रसोई में व्यस्त हो गईं. मां और बाबूजी के साथ ही ऐसा समय मुझे भी बड़ा कष्टकर प्रतीत होता था. इधर भैयाभाभी के हंसीठट्टे और उधर मां के ऊपर बढ़ता बोझ. यह वही मां थीं जो भैया की शादी से पूर्व कहा करती थीं, ‘‘इस घर में जल्दी से बहू आ जाए फिर तो मैं पलंग पर ही पानी मंगा कर पिऊंगी,’’ और बहू आने के बाद…कई बार पानी का गिलास भी बहू के हाथ में थमाना पड़ता था. जिस दिन भैया के ससुराल वाले आते थे, मां कपप्लेट धोने और बरतन मांजने का काम और भी फुरती से करने लगती थीं. घर के छोटेबड़े काम से ले कर बाजार से खरीदारी करने तक का सारा भार बाबूजी पर एकमुश्त टूट पड़ता था. कई बार यह सब देख कर मन भर आता था, क्योंकि उन लोगों के आते ही मांबाबूजी बहुत छोटे पड़ जाते थे. दरवाजे के बाहर बच्चों का शोरगुल सुन कर मैं ने बाहर झांक कर देखा.

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कई मैलेकुचैले बच्चे चमचमाती कार के पास एकत्र हो गए थे. भैया थोड़ीथोड़ी देर बाद कमरे से बाहर निकल कर देख लेते थे और बच्चों को इस तरह डांटते खदेड़ते थे, मानो वे कोई आवारा पशु हों. भैया के सासससुर के मध्य रिंकू की पढ़ाई तथा संस्कारों के बारे में वाक्युद्ध छिड़ा हुआ था. रिंकू बाबूजी द्वारा स्थापित महल्ले के ही ‘शिशु विहार’ में पढ़ता था. किंतु भाभी और उन के पिताजी का इरादा रिंकू को किसी पब्लिक स्कूल में दाखिला दिलवाने का था. भाभी के पिताजी बोले, ‘‘इंगलिश स्कूल में पढ़ेगा तो संस्कार भी बदलेंगे, वरना यहां रह कर तो बच्चा खराब हो जाएगा.’’ इस से पहले भी रिंकू को पब्लिक स्कूल में भेजने की बात को ले कर कई बार भैयाभाभी आपस में उलझ पड़े थे. भैया खर्च के बोझ की बात करते थे तो भाभी घर के खर्चों में कटौती करने की बात कह देती थीं. वह हर बार तमक कर एक ही बात कहती थीं, ‘‘लोग पागल नहीं हैं जो अपने बच्चों को अच्छे स्कूलों में पढ़ाते हैं. इन स्कूलों के बच्चे ही अच्छे पदों पर पहुंचते हैं.’’ भैया निरुत्तर रह जाते थे. बड़े उत्साह से भाभी ने स्कूल से फार्म मंगवाया था. रिंकू को किस प्रकार तैयारी करानी थी इस विषय में मुझे भी कई हिदायतें दी थीं. वह स्वयं सुबह जल्दी उठ रिंकू को पढ़ाने बैठ जाती थीं. उन्होंने कई बातें रिंकू को तोते की तरह रटा दी थीं. वह उठतेबैठते, सोतेजागते उस छोटे से बच्चे के मस्तिष्क में कई तरह की सामान्य ज्ञान की बातें भरती रहती थीं. अब मां और बाबूजी के साथ रिंकू का खेलना, घूमना, बातें करना, चहकना काफी कम हो गया था.

एक दिन वह मांबाबूजी के सामने ही महल्ले के बच्चों के साथ खेलने लगा. भाभी उबलती हुई आईं और तमक कर बाबूजी को भलाबुरा कहने लगीं, ‘‘आप रिंकू की जिंदगी को बरबाद कर के छोड़ेंगे. असभ्य, गंदे और निरक्षर बच्चों के साथ खेलेगा तो क्या सीखेगा.’’ और बाबूजी ने उसी समय दुलारते हुए रिंकू को अपनी गोद में भर लिया था. भाभी की बात सुन कर मेरे दिल में हलचल सी मच गई थी. ये अमीर लोग क्यों इतने भावनाशून्य होते हैं? भला बच्चों के बीच असमानता की खाई कैसी? बच्चा तो बच्चों के साथ ही खेलता है. एक मुरझाए हुए फूल से हम खुशबू की आशा कैसे कर सकते हैं. क्यों नहीं सोचतीं भाभी यह सबकुछ? एक बार उबलता दूध रिंकू के हाथ पर गिर गया था. वह दर्द से तड़प रहा था. सारा महल्ला परेशान हो कर एकत्र हो गया था, तरहतरह की दवाइयां, तरहतरह के सुझाव. बच्चे तो रिंकू को छोड़ कर जाने को ही तैयार नहीं थे. आश्चर्य तो तब हुआ जब भाभी के मुंह से उन बच्चों के प्रति वात्सल्य के दो बोल भी नहीं फूटे. वह उन की भावनाओं के साथ, उमड़ते हुए प्यार के साथ तालमेल ही नहीं बैठा पाई थीं. भाभी भी क्या करतीं? उन के स्वयं के संस्कार ही ऐसे बने थे. वह एक अमीर खानदान से ताल्लुक रखती थीं. पिता और भाइयों का लंबाचौड़ा व्यवसाय है. कालिज के जमाने से ही वह भैया पर लट्टू थीं. उन का प्यार दिनोंदिन बढ़ता गया. मध्यवर्गीय भैया ने कई बार अपनी परिस्थिति की यथार्थता का बोध कराया, लेकिन वह तो उन के प्यार में दीवानी हुई जा रही थीं.

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समविषम, ऊंचनीच का विचार न कर के उन्होंने भैया को अपना जीवनसाथी स्वीकार ही लिया. जब इस घर में आने के बाद एक के बाद एक अभावों का खाता खुलने लगा तो वह एकाएक जैसे ढहने सी लगी थीं. उन्होंने ही ड्राइंगरूम की सजावट और संगीत की धुनों को पहचाना था. इनसानों के साथ जज्बाती रिश्तों को वह क्या जानें? वह अभावों की परिभाषा से बेखबर रिंकू को अपने भाइयों के बच्चों की तरह ढालना चाहती थीं. भैया की औकात, भैया की मजबूरी, भैया की हैसियत का अंदाजा क्योंकर उन्हें होता? कभीकभी ग्लानि तो भैया पर भी होती थी. वह कैसे भाभी के ही सांचे में ढल गए थे. क्या वह भाभी को अपने अनुरूप नहीं ढाल सकते थे? रिंकू टेस्ट में पास हो गया था. भाभी की खुशी का ठिकाना न रहा था. मानो उन की कोई मनमांगी मुराद पूरी हो गई थी. अब वह बड़ी खुशखुश नजर आने लगी थीं. जुलाई से रिंकू को स्कूल में भेजे जाने की तैयारी होने लगी थी. नए कपड़े बनवाए गए थे. जूते, टाई तथा अन्य कई जरूरत की वस्तुएं खरीदी गई थीं. अब तो भाभी रिंकू के साथ टूटीफूटी अंगरेजी में बातें भी करने लगी थीं. उसे शिष्टाचार सिखाने लगी थीं. भाभी रिंकू को जल्दी उठा देती थीं, ‘‘बेटा, देखा नहीं, तुम्हारे मामा के ऋतु, पिंकी कैसे अपने हाथ से काम करते हैं. तुम्हें भी काम स्वयं करना चाहिए. थोड़ा चुस्त बनो.’’ भाभी उस नन्ही जान को चुस्त बनना सिखा रही थीं, जिसे खुद चुस्त का अर्थ मालूम नहीं था.

मां और बाबूजी रिंकू से अलग होने की बात सोच कर अंदर ही अंदर विचलित हो रहे थे. आखिर रिंकू के जाने का निश्चित दिन आ गया था. स्कूल ड्रेस में रिंकू सचमुच बदल गया था. वह जाते समय मुझ से लिपट गया. मैं ने उसे बड़े प्यार से पुचकार कर समझाया, ‘‘तुम वहां रहने नहीं, पढ़ने जा रहे हो, वहां तुम्हारे जैसे बहुत से बच्चे होंगे. उन में से कई तुम्हारे दोस्त बन जाएंगे. उन के साथ पढ़ना, उन के साथ खेलना. तुम हर छुट्टी में घर आ जाओगे. फिर मांबाबूजी भी तुम से मिलने आते रहेंगे.’’ भाभी भी उसे समझाती रहीं, तरहतरह के प्रलोभन दे कर. मां और बाबूजी के कंठ से आवाज ही नहीं निकल रही थी. बस, वे बारबार रिंकू को चूम रहे थे.

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रिंकू की विदाई का क्षण मुझे भी रुला गया. बोगनबेलिया के फूलों से ढके दरवाजे के पास से विदाई के समय हाथ हिलाता हुआ रिंकू…मां और बाबूजी के उठे हाथ तथा आंसुओं से भीगा चेहरा… उस खामोश वातावरण में एक आवाज उभरती रही थी. बोगनबेलिया के फूलों की पुरानी पंखडि़यां हवा के तेज झोंके से खरखर नीचे गिरने लगी थीं. उस के बाद उस में संस्कार के नए फूल खिलेंगे और अपनी महक बिखेरेंगे. द्य

मोक्ष

लेखक- सुधा गोयल 

‘‘मां,कुंभ नहाने चलोगी? काफी दिन से कह रही थीं कि मुझे गंगा नहला ला. इस बार तुम्हें नहला लाता हूं. आज ट्रेन का टिकट करा लिया है.’’ यह सुन कर गोमती चहक उठीं, ‘‘तू सच कह रहा है श्रवण, मुझे यकीन नहीं हो रहा.’’ ‘‘यकीन करो मां, ये देखो टिकटें,’’ श्रवण ने जेब से टिकटें निकाल कर गोमती को दिखाईं और बोला, ‘‘अब जाने की तैयारी कर लेना, जोजो सामान चाहिए बता देना. अगले हफ्ते आज के ही दिन चलेंगे.’’ ‘‘कौनकौन चलेगा बेटा? सभी चल रहे हैं न?’’ ‘‘नहीं मां, सब जा कर क्या करेंगे?

कुंभ पर बहुत भीड़ रहती है. सब को संभालना मुश्किल होगा. बस, हम दोनों ही चलेंगे.’’ गोमती ने श्वेता की ओर देखा. उन के अकेले जाने से कहीं बहू नाराज न हो. उन्हें लगा कि इतनी उम्र में अकेली बेटे के साथ कैसे जाएंगी? श्रवण कैसे संभालेगा उन्हें. घर में तो जैसेतैसे अपना काम कर लेती हैं, बाहर कै से उठेंगीबैठेंगी. घड़ीघड़ी श्रवण का सहारा मांगेंगी. फिर कहीं सब के सामने ही श्रवण झल्लाने लगा तो? दुविधा हुई उन्हें. ‘‘अब क्या सोचने लगीं, मांजी? आप के बेटे कह रहे हैं तो घूम आइए. हम सब तो फिर कभी चले जाएंगे. इस के बाद पूरे 12 साल बाद ही कुंभ पडे़गा.’’ ‘‘बहू, क्या श्रवण मुझे संभाल पाएगा?’’ गोमती ने अपना संशय सामने रखा तो श्रवण हंस पड़ा. ‘‘मां को अब अपने बेटे पर विश्वास नहीं है. जैसे आप बचपन में मेरा ध्यान रखती थीं वैसे ही रखूंगा. कहीं भी आप का हाथ नहीं छोडूंगा. खूब मेला घुमाऊंगा.’’ श्रवण की बात पर गोमती प्रसन्न हो गईं. उन की चिरप्रतीक्षित अभिलाषा पूरी होने जा रही थी. कुंभ स्नान कर मोक्ष पाने की कामना वह कब से कर रही थीं. कई बार श्रवण से कह चुकी थीं कि मरने से पहले एक बार कुंभ स्नान करना चाहती हैं. कुंभ पर नहीं ले जा सकता तो ऐसे ही हरिद्वार ले चल.

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वक्त खिसकता रहा, बात टलती रही. अब जब श्रवण अपनेआप कह रहा है तो उन का मन प्रसन्नता से नाचने लगा. उन्होंने बहूबेटे को आशीर्वाद से लाद दिया. 1 रात 1 दिन का सफर तय कर मांबेटा दोनों इलाहाबाद पहुंचे. गोमती का तो सफर में ही बुरा हाल हो गया. ट्रेन के धड़धड़ के शोर और सीटी ने रात भर गोमती को सोने नहीं दिया. श्रवण का हाथ थामे वह बारबार टायलेट जाती रहीं. ट्रेन खिसकने लगती तो पांव डगमगाने लगते. गिरतीपड़ती सीट तक पहुंचतीं. ‘‘अभी सफर शुरू हुआ है मां, आगे कैसे करोगी? संभालो स्वयं को.’’ ‘‘संभाल रही हूं बेटा, पर इस बुढ़ापे में हाथपांव झूलर बने रहते हैं. पकड़ ढीली पड़ जाती है. इस का इलाज मुझ पर नहीं है,’’ वह बेबस सी हो जातीं. ‘‘कोई बात नहीं. मैं हूं न, सब संभाल लूंगा,’’ श्रवण उन की बेबसी को समझता. खैर, सोतेजागते गोमती का सफर पूरा हुआ. गाड़ी इलाहाबाद स्टेशन पर रुकी तो प्लेटफार्म की चहलपहल और भीड़ देख कर वह हैरान रह गईं. श्रवण ने अपने कंधे पर बैग टांग लिया और एक हाथ से मां का हाथ पकड़ कर स्टेशन से बाहर आ गया. शहर आ कर श्रवण ने देखा कि आकाश में घटाएं घुमड़ रही थीं. यह सोच कर कि क्या पता कब बादल बरसने लगें, उस ने थोड़ी देर स्टेशन पर ही रुकने का फैसला किया. मां के साथ वह वेटिंग रूम में जा कर बैठ गया.

थोड़ी देर बाद मां से बोला, ‘‘मां, नित्यकर्म से यहीं निबट लो. जब तक बारिश रुकती है हम आराम से यहीं रुकेंगे. पहले आप चली जाओ,’’ और उस ने इशारे से मां को बता दिया कि कहां जाना है. थोड़ी देर में गोमती लौट आईं. फिर श्रवण चला गया. श्रवण जब लौटा तो उस के हाथ में गरमागरम चाय के 2 कुल्हड़ और एक थैली में समोसे थे. मांबेटे ने चाय पी और समोसे खाए. थोड़ा आराम मिला तो गोमती की आंखें झपकने लगीं. पूरी रात आंखों में कटी थी. वहीं सोफे की टेक ले कर आंखें मूंद लीं. करीब घंटे भर बाद सूरज फिर से झांकने लगा. वर्षा के कारण स्टेशन पर भीड़ बढ़ गई थी. अब धीरेधीरे छंटने लगी. गोमती और श्रवण ने भी आटोरिकशा पकड़ कर गंगाघाट तक पहुंचने का मन बनाया. आटोरिकशा ने मेलाक्षेत्र शुरू होते ही उन्हें उतार दिया. करीब 1 किलोमीटर पैदल चल कर वे गंगाघाट तक पहुंचे. गिरतेपड़ते बड़ी मुश्किल से एक डेरे में थोड़ा सा स्थान मिला. दोनों ने चादर बिछा कर अपना सामान जमाया और नहाने चल दिए. गोमती ने अपने अब तक के जीवन में इतनी भीड़ नहीं देखी थी. कहीं लाउडस्पीकरों का शोर, कहीं भजन गाती टोलियां, कहीं साधुसंतों के प्रवचन, कहीं रामायण पाठ, खिलौने वाले, झूले वाले, पूरीकचौरी, चाट व मिठाई की दुकानें, धार्मिक किताबों, तसवीरों, मालाओं व सिंदूर की दुकानें, हर जातिधर्म के लोगों को देखदेख कर गोमती चकित थीं. लगता था किसी दूसरे लोक में आ गई हैं. वह श्रवण का हाथ कस कर थामे थीं. भीड़ में रास्ता बनाता श्रवण उन्हें गंगा किनारे तक ले आया. यहां भी खूब भीड़ और धक्कमधक्का था. श्रवण ने हाथ पकड़ कर मां को स्नान कराया, फिर स्वयं किया. गोमती ने फूलबताशे गंगा में चढ़ाए. जाने कब से मन में पली साध पूरी हुई थी. हर्षातिरेक में आंसू निकल पडे़, हाथ जोड़ कर प्रार्थना की कि हे गंगा मैया, श्रवण सा बेटा हर मां को देना. आज उसी के कारण तुम्हारे दर्शन कर सकी हूं. श्रवण ने मां को मेला घुमाया. खूब खिलायापिलाया. ‘‘थक गई हूं. अब नहीं चला जाता, श्रवण,’’ गोमती के कहने पर श्रवण उन्हें डेरे पर ले आया. ‘‘मां, तुम आराम करो. मैं घूम कर अभी आया. थोड़े रुपए अपने पास रख लो,’’ उस ने मां को रुपए थमाए.

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‘‘मैं इन रुपयों का क्या करूंगी? तू है तो मेरे पास. फिर 5-10 रुपए हैं मेरे पास,’’ गोमती ने मना किया. ‘‘वक्तबेवक्त काम आएंगे. तुम्हारा ही कुछ लेने का मन हो या कहीं मेले में मेरी जेब ही कट जाए तो…’’ श्रवण के समझाने पर गोमती ने रुपए ले लिए. गोमती ने रुपए संभाल कर रख लिए. उन्हें ध्यान आया कि ऐसे मेलों में चोर- उचक्के खूब घूमते हैं. लोगों को बेवकूफ बना कर हाथ की सफाई दिखा कर खूब ठगते हैं. श्रवण चला गया और गोमती थैला सिर के नीचे लगा बिछी चादर पर लेट गईं. उन का मन आह्लादित था. श्रवण ने खूब ध्यान रखा है. लेटेलेटे आंखें झपक गईं. जब खुलीं तो देखा कि सूरज ढलने जा रहा है और श्रवण अभी लौटा नहीं है. उन्हें चिंता हो आई. अनजान जगह, अजनबी लोग, श्रवण के बारे में किस से पूछें? अपना थैला टटोल कर देखा. सब- कुछ यथास्थान सुरक्षित था. कुछ रुपए एक रूमाल में बांध कर चुपचाप कपड़ों के साथ थैले में डाल लाई थीं. सोचा था पता नहीं परदेश में कहां जरूरत पड़ जाए. उसी रूमाल में श्रवण के दिए रुपए भी रख लिए. वह डेरे से बाहर आ कर इधरउधर देखने लगीं. आदमियों का रेला एक तरफ तेजी से भागने लगा. वह कुछ समझ पातीं कि चीखपुकार मच गई. पता लगा कि मेले में हाथी बिगड़ जाने से भगदड़ मच गई है. काफी लोग भगदड़ में गिरने के कारण कुचल कर मर गए हैं. सुन कर गोमती का कलेजा मुंह को आने लगा. कहीं उन का श्रवण भी…क्या इसी कारण अभी तक नहीं आया है? उन्होंने एक यात्री के पास जा कर पूछा, ‘‘भैया, यह किस समय की बात है?’’ ‘‘मांजी, शाम 4 बजे नागा साधु हाथियों पर बैठ कर स्नान करने जा रहे थे और पैसे फेंकते जा रहे थे.

उन के फेंके पैसों को लूटने के कारण यह कांड हुआ. जो जख्मी हैं उन्हें अस्पताल पहुंचाया जा रहा है और जो मर गए हैं उन्हें सरकारी गाड़ी से वहां से हटाया जा रहा है. आप का भी कोई है?’’ ‘‘भैया, मेरा बेटा 2 बजे घूमने निकला था और अभी तक नहीं लौटा है.’’ ‘‘उस का कोई फोटो है, मांजी?’’ यात्री ने पूछा. ‘‘फोटो तो नहीं है. अब क्या करूं?’’ गोमती रोने लगीं. ‘‘मांजी, आप रोओ मत. देखो, सामने पुलिस चौकी है. आप वहां जा कर पता करो.’’ गोमती ने चादर समेट कर थैले में रखी और पुलिस चौकी पहुंच कर रोने लगीं. लाउडस्पीकर से कई बार एनाउंस कराया गया. फिर एक सहृदय सिपाही अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर गोमती को वहां ले गया जहां मृतकों को एकसाथ रखा गया था. 1-2 अस्थायी बने अस्पतालों में भी ले गया, जहां जख्मी पड़े लोग कराह रहे थे और डाक्टर उन की मरहमपट्टी करने में जुटे थे. श्रवण का वहां कहीं भी पता न था. तभी गोमती को ध्यान आया कि कहीं श्रवण डेरे पर लौट न आया हो और उन का इंतजार कर रहा हो या उन्हें डेरे पर न पा कर वह भी उन्हीं की तरह तलाश कर रहा हो. हालांकि पुलिस चौकी पर वह अपने बेटे का हुलिया बता आई थीं और लौटने तक रोके रखने को भी कह आई थीं. गोमती ने आ कर मालूम किया तो पता चला कि उन्हें पूछने कोई नहीं आया था. वह डेरे पर गईं. वहां भी नहीं. आधी रात कभी डेरे में, कभी पुलिस चौकी पर कटी. जब रात के 12 बज गए तो पुलिस वालों ने कहा, ‘‘मांजी, आप डेरे पर जा कर आराम करो. आप का बेटा यहां पूछने आया तो आप के पास भेज देंगे.’’

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पुत्र के लिए व्याकुल गोमती उसे खोजते हुए डेरे पर लौट आईं. चादर बिछा कर लेट गईं लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी. कहां चला गया श्रवण? इस कुंभ नगरी में कहांकहां ढूंढ़ेंगी? यहां उन का अपना है कौन? यदि श्रवण न लौटा तो अकेली घर कैसे लौटेंगी? बहू का सामना कैसे करेंगी? खुद को ही कोसने लगीं, व्यर्थ ही कुंभ नहाने की जिद कर बैठी. टिकट ही तो लाया था श्रवण, यदि मना कर देती तो टिकट वापस भी हो जाते. ऐसी फजीहत तो न होती. फिर गोमती को खयाल आया कि कोई श्रवण को बहलाफुसला कर तो नहीं ले गया. वह है भी सीधा. आसानी से दूसरों की बातों में आ जाता है. किसी ने कुछ सुंघा कर बेहोश ही कर दिया हो और सारे पैसे व घड़ीअंगूठी छीन ली हो. मन में उठने वाली शंकाकुशंकाओं का अंत न था. दिन निकला. वह नहानाधोना सब भूल कर, सीधी पुलिस चौकी पहुंच गईं. एक ही दिन में पुलिस चौकी वाले उन्हें पहचान गए थे. देखते ही बोले, ‘‘मांजी, तुम्हारा बेटा नहीं लौटा.’’ रोने लगीं गोमती, ‘‘कहां ढूंढू़ं, तुम्हीं बताओ. किसी ने मारकाट कर कहीं डाल दिया हो तो. तुम्हीं ढूंढ़ कर लाओ,’’ गोमती का रोतेरोते बुरा हाल हो गया. ‘‘अम्मां, धीरज धरो. हम जरूर कुछ करेंगे. सभी डेरों पर एनाउंस कराएंगे. आप का बेटा मेले में कहीं भी होगा, जरूर आप तक पहुंचेगा. आप अपना नाम और पता लिखा दो. अब जाओ, स्नानध्यान करो,’’ पुलिस वालों को भी गोमती से हमदर्दी हो गई थी.

गोमती डेरे पर लौट आईं. गिरतीपड़ती गंगा भी नहा लीं और मन ही मन प्रार्थना की कि हे गंगा मैया, मेरा श्रवण जहां कहीं भी हो कुशल से हो, और वहीं घाट पर बैठ कर हर आनेजाने वाले को गौर से देखने लगीं. उन की निगाहें दूरदूर तक आनेजाने वालों का पीछा करतीं. कहीं श्रवण आता दीख जाए. गंगाघाट पर बैठे सुबह से दोपहर हो गई. कल शाम से पेट में पानी की बूंद भी न गई थी. ऐंठन सी होने लगी. उन्हें ध्यान आया, यदि यहां स्वयं ही बीमार पड़ गईं तो अपने श्रवण को कैसे ढूंढ़ेंगी? उसे ढूंढ़ना है तो स्वयं को ठीक रखना होगा. यहां कौन है जो उन्हें मनुहार कर खिलाएगा. गोमती ने आलू की सब्जी के साथ 4 पूरियां खाईं. गंगाजल पिया तो थोड़ी शांति मिली. 4 पूरियां शाम के लिए यह सोच कर बंधवा लीं कि यहां तक न आ सकीं तो डेरे में ही खा लेंगी या भूखा श्रवण लौटेगा तो उसे खिला देंगी. श्रवण का ध्यान आते ही उन्होंने कुछ केले भी खरीद लिए. ढूंढ़तीढूंढ़ती अपने डेरे पर पहुंच गईं. पुलिस चौकी में भी झांक आईं. देखते ही देखते 8 दिन निकल गए. मेला उखड़ने लगा. श्रवण भी नहीं लौटा. अब पुलिस वालों ने सलाह दी, ‘‘अम्मां, अपने घर लौट जाओ. लगता है आप का बेटा अब नहीं लौटेगा.’’ ‘‘मैं इतनी दूर अपने घर कैसे जाऊंगी. मैं तो अकेली कहीं आईगई नहीं,’’ वह फिर रोने लगीं. ‘‘अच्छा अम्मां, अपने घर का फोन नंबर बताओ. घर से कोई आ कर ले जाएगा,’’ पुलिस वालों ने पूछा. ‘‘घर से मुझे लेने कौन आएगा? अकेली बहू, बच्चों को छोड़ कर कैसे आएगी.’’ ‘‘बहू किसी नातेरिश्तेदार को भेज कर बुलवा लेगी. आप किसी का भी नंबर बताओ.’’ गोमती ने अपने दिमाग पर लाख जोर दिया, लेकिन हड़बड़ाहट में किसी का नंबर याद नहीं आया.

दुख और परेशानी के चलते दिमाग में सभी गड्डमड्ड हो गए. वह अपनी बेबसी पर फिर रोेने लगीं. बुढ़ापे में याददाश्त भी कमजोर हो जाती है. पुलिस चौकी में उन्हें रोता देख राह चलता एक यात्री ठिठका और पुलिस वालों से उन के रोने का कारण पूछने लगा. पुलिस वालों से सारी बात सुन कर वह यात्री बोला, ‘‘आप इस वृद्धा को मेरे साथ भेज दीजिए. मैं भी उधर का ही रहने वाला हूं. आज शाम 4 बजे टे्रन से जाऊंगा. इन्हें ट्रेन से उतार बस में बिठा दूंगा. यह आराम से अपने गांव पीपला पहुंच जाएंगी.’’ सिपाहियों ने गोमती को उस अनजान व्यक्ति के साथ कर दिया. उस का पता और फोन नंबर अपनी डायरी में लिख लिया. गोमती उस के साथ चल तो रही थीं पर मन ही मन डर भी रही थीं कि कहीं यह कोई ठग न हो. पर कहीं न कहीं किसी पर तो भरोसा करना ही पड़ेगा, वरना इस निर्जन में वह कब तक रहेंगी. ‘‘मांजी, आप डरें नहीं, मेरा नाम बिट्ठन लाल है. लोग मुझे बिट्ठू कह कर पुकारते हैं. राजकोट में बिट्ठन लाल हलवाई के नाम से मेरी दुकान है. आप अपने गांव पहुंच कर किसी से भी पूछ लेना. भरोसा रखो आप मुझ पर. यदि आप कहेंगी तो घर तक छोड़ आऊंगा. यह संसार एकदूसरे का हाथ पकड़ कर ही तो चल रहा है.’’ अब मुंह खोला गोमती ने, ‘‘भैया, विश्वास के सहारे ही तो तुम्हारे साथ आई हूं. इतना उपकार ही क्या कम है कि तुम मुझे अपने साथ लाए हो. तुम मुझे बस में बिठा दोगे तो पीपला पहुंच जाऊंगी. पर बेटे के न मिलने का गम मुझे खाए जा रहा है.’’ अगले दिन लगभग 1 बजे गोमती बस से अपने गांव के स्टैंड पर उतरीं और पैदल ही अपने घर की ओर चल दीं. उन के पैर मनमन भर के हो रहे थे. उन्हें यह समझ में न आ रहा था कि बहू से कैसे मिलेंगी. इसी सोचविचार में वह अपने घर के द्वार तक पहुंच गईं. वहां खूब चहलपहल थी. घर के आगे कनात लगी थीं और खाना चल रहा था. एक बार तो उन्हें लगा कि वह गलत जगह आ गई हैं. तभी पोते तन्मय की नजर उन पर पड़ी और वह आश्चर्य और खुशी से चिल्लाया,

‘‘पापा, दादी मां लौट आईं. दादी मां जिंदा हैं.’’ उस के चिल्लाने की आवाज सुन कर सब दौड़ कर बाहर आए. शोर मच गया, ‘अम्मां आ गईं,’ ‘गोमती आ गई.’ श्रवण भी दौड़ कर आ गया और मां से लिपट कर बोला, ‘‘तुम कहां चली गई थीं, मां. मैं तुम्हें ढूंढ़ कर थक गया.’’ बहू श्वेता भी दौड़ कर गोमती से लिपट गई और बोली, ‘‘हाय, हम ने सोचा था कि मांजी…’’ ‘‘नहीं रहीं. यही न बहू,’’ गोमती के जैसे ज्ञान चक्षु खुल गए, ‘‘इसीलिए आज अपनी सास की तेरहवीं कर रही हो और तू श्रवण, मुझे छोड़ कर यहां चला आया. मैं तो पगला गई थी. घाटघाट तुझे ढूंढ़ती रही. तू सकुशल है… तुझे देख कर मेरी जान लौट आई.’’ मांबेटे दोनों की निगाहें टकराईं और नीचे झुक गईं. ‘‘अब यह दावत मां के लौट आने की खुशी के उपलक्ष्य में है. सब खुशीखुशी खाओ. मेरी मां वापस आ गई हैं,’’ खुशी से नाचने लगा श्रवण. औरतों में कानाफूसी होने लगी, लेकिन फिर भी सब श्वेता और श्रवण को बधाई देने लगे. वे सभी रिश्तेदार जो गोमती की गमी में शामिल होने आए थे, गोमती के पांव छूने लगे. कोई बाजे वालों को बुला लाया. बाजे बजने लगे. बच्चे नाचनेकूदने लगे. माहौल एकदम बदल गया. श्रवण को देख कर गोमती सब भूल गईं. शाम होतेहोते सारे रिश्तेदार खापी कर विदा हो गए. रात को थक कर सब अपनेअपने कमरों में जा कर सो गए. गोमती को भी काफी दिन बाद निश्ंिचतता की नींद आई. अचानक रात में मांजी की आंखें खुल गईं, वह पानी पीने उठीं. श्रवण के कमरे की बत्ती जल रही थी और धीरेधीरे बोलने की आवाज आ रही थी. बातों के बीच ‘मां’ सुन कर वह सट कर श्रवण के कमरे के बाहर कान लगा कर सुनने लगीं. श्वेता कह रही थी, ‘तुम तो मां को मोक्ष दिलाने गए थे. मां तो वापस आ गईं.’ ‘मैं तो मां को डेरे में छोड़ कर आ गया था.

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मुझे क्या पता कि मां लौट आएंगी. मां का हाथ गंगा में छोड़ नहीं पाया. पिछले 8 दिन से मेरी आत्मा मुझे धिक्कार रही थी. मैं ने मां को मारने या त्यागने का पाप किया था. मैं सारा दिन यही सोचता कि भूखीप्यासी मेरी मां पता नहीं कहांकहां भटक रही होंगी. मां ने मुझ पर विश्वास किया और मैं ने मां के साथ विश्वासघात किया. मां को इस प्रकार गंगा घाट पर छोड़ कर आने का अपराध जीवन भर दुख पहुंचाता रहेगा. अच्छा हुआ कि मां लौट आईं और मैं मां की मृत्यु का कारण बनतेबनते बच गया.’ बेटे की बातें सुन कर गोमती के पैरों तले जमीन कांपने लगी. सारा दृश्य उन की आंखों के आगे सजीव हो उठा. वह इन 8 दिनों में लगभग सारा मेला क्षेत्र घूम लीं. उन्होंने बेटे के नाम की जगह- जगह घोषणा कराई पर अपने नाम की घोषणा कहीं नहीं सुनी. इतना बड़ा झूठ बोला श्रवण ने मुझ से? मुझ से मुक्त होने के लिए ही मुझे इलाहाबाद ले कर गया था. मैं इतना भार बन गई हूं कि मेरे अपने ही मुझे जीतेजी मारना चाहते हैं. वह खुद को संभाल पातीं कि धड़ाम से वहीं गिर पड़ीं. सब झेल गईं पर यह सदमा न झेल सकीं. उन्हें दिल का दौरा पड़ा और वह सचमुच मोक्ष…

मेरा संसार

लेखक- अमिताभ श्रीवास्तव

आज पूरा एक साल गुजर गया. आज के दिन ही उस से मेरी बातें बंद हुई थीं. उन 2 लोगों की बातें बंद हुई थीं, जो बगैर बात किए एक दिन भी नहीं रह पाते थे. कारण सिर्फ यही था कि किसी ऐसी बात पर वह नाराज हुई जिस का आभास मुझे आज तक नहीं लग पाया.

मैं पिछले साल की उस तारीख से ले कर आज तक इसी खोजबीन में लगा रहा कि आखिर ऐसा क्या घट गया कि जान छिड़कने वाली मुझ से अब बात करना भी पसंद नहीं करती? कभीकभी तो मुझे यह भी लगता है कि शायद वह इसी बहाने मुझ से दूर रहना चाहती हो. वैसे भी उस की दुनिया अलग है और मेरी दुनिया अलग. मैं उस की दुनिया की तरह कभी ढल नहीं पाया. सीधासादा मेरा परिवेश है, किसी तरह का कोई मुखौटा पहन कर बनावटी जीवन जीना मुझे कभी नहीं आया. सच को हमेशा सच की तरह पेश किया और जीवन के यथार्थ को ठीक उसी तरह उकेरा, जिस तरह वह होता है. यही बात उसे पसंद नहीं आती थी और यही मुझ से गलती हो जाती. वह चाहती है दिल बहलाने वाली बातें, उस के मन की तरह की जाने वाली हरकतें, चाहे वे झूठी ही क्यों न हों, चाहे जीवन के सत्य से वह कोसों दूर हों. यहीं मैं मात खा जाता रहा हूं. मैं अपने स्वभाव के आगे नतमस्तक हूं तो वह अपने स्वभाव को बदलना नहीं चाहती. विरोधाभास की यह रेखा हमारे प्रेम संबंधों में हमेशा आड़े आती रही है और पिछले वर्ष उस ने ऐसी दरार डाल दी कि अब सिर्फ यादें हैं और इंतजार है कि उस का कोई समाचार आ जाए. जीवन को जीने और उस के धर्म को निभाने की मेरी प्रकृति है अत: उस की यादों को समेटे अपने जैविक व्यवहार में लीन हूं, फिर भी हृदय का एक कोना अपनी रिक्तता का आभास हमेशा देता रहता है.

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तभी तो फोन पर आने वाली हर काल ऐसी लगती हैं मानो उस ने ही फोन किया हो. यही नहीं हर एसएमएस की टोन मेरे दिल की धड़कन बढ़ा देती हैं, किंतु जब भी देखता हूं मोबाइल पर उस का नाम नहीं मिलता. मेरी इस बेचैनी और बेबसी का रत्तीभर भी उसे ज्ञान नहीं होगा, यह मैं जानता हूं क्योंकि हर व्यक्ति सिर्फ अपने बारे में सोचता है और अपनी तरह के विचारों से अपना वातावरण तैयार करता है व उसी की तरह जीने की इच्छा रखता है. मेरे लिए मेरी सोच और मेरा व्यवहार ठीक है तो उस के लिए उस की सोच और उस का व्यवहार उत्तम है. यही एक कारण है हर संबंधों के बीच खाई पैदा करने का. दूरियां उसे समझने नहीं देतीं और मन में व्यर्थ विचारों की ऐसी पोटली बांध देती है जिस में व्यक्ति का कोरा प्रेममय हृदय भी मन मसोस कर पड़ा रह जाता है. जहां जिद होती है, अहम होता है, गुस्सा होता है. ऐसे में बेचारा प्रेम नितांत अकेला सिर्फ इंतजार की आग में झुलसता रहता है, जिस की तपन का एहसास भी किसी को नहीं हो पाता. मेरी स्थिति ठीक इसी प्रकार है. इन 365 दिनों में एक दिन भी ऐसा नहीं गया जब उस की याद न आई हो, उस के फोन का इंतजार न किया हो. रोज उस से बात करने के लिए मैं अपने फोन के बटन दबाता हूं किंतु फिर नंबर को यह सोच कर डिलीट कर देता हूं कि जब मेरी बातें ही उसे दुख पहुंचाती हैं तो क्यों उस से बातों का सिलसिला दोबारा प्रारंभ करूं? हालांकि मन उस से संपर्क करने को उतावला है. बावजूद उस के व्यवहार ने मेरी तमाम प्रेमशक्ति को संकुचित कर रख दिया है. मन सोचता है, आज जैसी भी वह है, कम से कम अपनी दुनिया में व्यस्त तो है, क्योंकि व्यस्त नहीं होती तो उस की जिद इतने दिन तक तो स्थिर नहीं रहती कि मुझ से वह कोई नाता ही न रखे.

संभव है मेरी तरह वह भी सोचती हो, किंतु मुझे लगता है यदि वह मुझ जैसा सोचती तो शायद यह दिन कभी देखने में ही नहीं आता, क्योंकि मेरी सोच हमेशा लचीली रही है, तरल रही है, हर पात्र में ढलने जैसी रही है, पर अफसोस वह आज तक समझ नहीं पाई. मई का सूरज आग उगल रहा है. इस सूनी दोपहर में मैं आज घर पर ही हूं. एक कमरा, एक किचन का छोटा सा घर और इस में मैं, मेरी बीवी और एक बच्ची. छोटा घर, छोटा परिवार. किंतु काम इतने कि हम तीनों एक समय मिलबैठ कर आराम से कभी बातें नहीं कर पाते. रोमी की तो शिकायत रहती है कि पापा का घर तो उन का आफिस है. मैं भी क्या करूं? कभी समझ नहीं पाया. चूंकि रोमी के स्कूल की छुट्टियां हैं तो उस की मां ज्योति उसे ले कर अपने मायके चली गई है. पिछले कुछ वर्षों से ज्योति अपनी मां से मिलने नहीं जा पाई थी. मैं अकेला हूं. यदि गंभीरता से सोच कर देखूं तो लगता है कि वाकई मैं बहुत अकेला हूं, घर में सब के रहने और बाहर भीड़ में रहने के बावजूद.

किंतु निरंतर व्यस्त रहने में उस अकेलेपन का भाव उपजता ही नहीं. बस, महसूस होता है तमाम उलझनों, समस्याओं को झेलते रहने और उस के समाधान में जुटे रहने की क्रियाओं के बीच, क्योंकि जिम्मेदारियों के साथ बाहरी दुनिया से लड़ना, हारना, जीतना मुझे ही तो है. आज छुट्टी है और कोई अपना दफ्तर का काम भी नहीं है इसलिए इस दोपहर की सूनी सी तपन के बीच खुद को देख पा रहा हूं. दूरदूर तक सिर्फ सूरज की आग और अपने अंदर भी विचारों की एक आग, ‘उस के’ निरंतर दिए जाने वाले दर्द की आग. गरमी से राहत पाने का इकलौता साधन कूलर खराब हो चुका है जिसे ठीक करना है, अखबार की रद्दी बेचनी है, दूध वाले का हिसाब करना है, ज्योति कह कर गई थी. रोमी का रिजल्ट भी लाना है और इन सब से भारी काम खाना बनाना है, और बर्तन भी मांजना है. घर की सफाई पिछले 2 दिनों से नहीं हुई है तो मकडि़यों ने भी अपने जाले बुनने का काम शुरू कर दिया है. उफ…बहुत सा काम है…, ज्योति रोज कैसे सबकुछ करती होगी और यदि एक दिन भी वह आराम से बैठती है तो मेरी आवाज बुलंद हो जाती है…मानो मैं सफाईपसंद इनसान हूं…कैसा पड़ा है घर? चिल्ला उठता हूं. ज्योति न केवल घर संभालती है, बल्कि रोमी के साथसाथ मुझे भी संभालती है. यह मैं आज महसूस कर रहा हूं, जब अलमारी में तमाम कपडे़ बगैर धुले ठुसे पडे़ हैं. रोज सोचता हूं, पानी आएगा तो धो डालूंगा. मगर आलस…पानी भी कहां भर पाता हूं, अकेला हूं तो सिर्फ एक घड़ा पीने का पानी और हाथपैर, नहाधो लेने के लिए एक बालटी पानी काफी है. ज्योति आएगी तभी सलीकेदार होगी जिंदगी, यही लगता है.

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तब तक फक्कड़ की तरह… मजबूरी जो होती है. सचमुच ज्योति कितना सारा काम करती है, बावजूद उस के चेहरे पर कोई शिकन तक नहीं देखी. यहां तक कि कभी उस ने मुझ से शिकायत भी नहीं की. ऊपर से जब मैं दफ्तर से लौटता हूं तो थका हुआ मान कर मेरे पैर दबाने लगती है. मानो दफ्तर जा कर मैं कोई नाहर मार कर लौटता हूं. दफ्तर और घर के दरम्यान मेरे ज्यादा घंटे दफ्तर में गुजरते हैं. न ज्योति का खयाल रख पाता हूं, न रोमी का. दायित्वों के नाम पर महज पैसा कमा कर देने के कुछ और तो करता ही नहीं. फोन की घंटी घनघनाई तो मेरा ध्यान भंग हुआ. ‘‘हैलो…? हां ज्योति…कैसी हो?…रोमी कैसी है?…मैं…मैं तो ठीक हूं…बस बैठा तुम्हारे बारे में ही सोच रहा था. अकेले मन नहीं लगता यार…’’ कुछ देर बात करने के बाद जब ज्योति ने फोन रखा तो फिर मेरा दिमाग दौड़ने लगा. ज्योति को सिर्फ मेरी चिंता है जबकि मैं उसे ले कर कभी इतना गंभीर नहीं हो पाया. कितना प्रेम करती है वह मुझ से…सच तो यह है कि प्रेम शरणागति का पर्याय है. बस देते रहना उस का धर्म है. ज्योति अपने लिए कभी कुछ मांगती नहीं…उसे तो मैं, रोमी और हम से जुडे़ तमाम लोगों की फिक्र रहती है. वह कहती भी तो है कि यदि तुम सुखी हो तो मेरा जीवन सुखी है. मैं तुम्हारे सुख, प्रसन्नता के बीच कैसे रोड़ा बन सकती हूं? उफ, मैं ने कभी क्यों नहीं इतना गंभीर हो कर सोचा? आज मुझे ऐसा क्यों लग रहा है?

इसलिए कि मैं अकेला हूं? रचना…फिर उस की याद…लड़ाई… गुस्सा…स्वार्थ…सिर्फ स्वयं के बारे में सोचनाविचारना….बावजूद मैं उसे प्रेम करता हूं? यही एक सत्य है. वह मुझे समझ नहीं पाई. मेरे प्रेम को, मेरे त्याग को, मेरे विचारों को. कितना नजरअंदाज करता हूं रचना को ले कर अपने इस छोटे से परिवार को? …ज्योति को, रोमी को, अपनी जिंदगी को. बिजली गुल हो गई तो पंखा चलतेचलते अचानक रुक गया. गरमी को भगाने और मुझे राहत देने के लिए जो पंखा इस तपन से संघर्ष कर रहा था वह भी हार कर थम गया. मैं समझता हूं, सुखी होने के लिए बिजली की तरह निरंतर प्रेम प्रवाहित होते रहना चाहिए, यदि कहीं व्यवधान होता है या प्रवाह रुकता है तो इसी तरह तपना पड़ता है, इंतजार करना होता है बिजली का, प्रेम प्रवाह का. घड़ी पर निगाहें डालीं तो पता चला कि दिन के साढे़ 3 बज रहे हैं और मैं यहां इसी तरह पिछले 2 घंटों से बैठा हूं. आदमी के पास कोई काम नहीं होता है तो दिमाग चौकड़ी भर दौड़ता है. थमने का नाम ही नहीं लेता. कुछ चीजें ऐसी होती हैं जहां दिमाग केंद्रित हो कर रस लेने लगता है, चाहे वह सुख हो या दुख. अपनी तरह का अध्ययन होता है, किसी प्रसंग की चीरफाड़ होती है और निष्कर्ष निकालने की उधेड़बुन. किंतु निष्कर्ष कभी निकलता नहीं क्योंकि परिस्थितियां व्यक्ति को पुन: धरातल पर ला पटकती हैं और वर्तमान का नजारा उस कल्पना लोक को किनारे कर देता है.

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फिर जब भी उस विचार का कोना पकड़ सोचने की प्रक्रिया प्रारंभ होती है तो नईनई बातें, नएनए शोध होने लगते हैं. तब का निष्कर्ष बदल कर नया रूप धरने लगता है. सोचा, डायरी लिखने बैठ जाऊं. डायरी निकाली तो रचना के लिखे कुछ पत्र उस में से गिरे. ये पत्र और आज का उस का व्यवहार, दोनों में जमीनआसमान का फर्क है. पत्रों में लिखी बातें, उन में दर्शाया गया प्रेम, उस के आज के व्यवहार से कतई मेल नहीं खाते. जिस प्रेम की बातें वह किया करती है, आज उसी के जरिए अपना सुख प्राप्त करने का यत्न करती है. उस के लिए पे्रेम के माने हैं कि मैं उस की हरेक बातों को स्वीकार करूं. जिस प्रकार वह सोचती है उसी प्रकार व्यवहार करूं, उस को हमेशा मानता रहूं, कभी दुख न पहुंचाऊं, यही उस का फंडा है. मैं उसे समझाने की कोशिश करता हूं कि यह महज व्यवहार होता है, प्रेम नहीं, तो वह भड़क जाती है. उस का अहम् सिर चढ़ कर बोलने लगता है कि प्रेम के संदर्भ में मैं उसे कैसे समझाने लगा? जो प्रेम वह करती है वही एकमात्र सही है. और यदि मुझे उस से बातें करनी हैं या प्रेम करना है तो नतमस्तक हो कर उस की हां में हां मिलाता रहूं. यह अप्रत्यक्ष शर्त है उस की. किंतु मेरे लिए पे्रेम का अर्थ सिर्फ प्रेम है, कोई शर्त नहीं, कोई बंधन नहीं. प्रेम तो स्वतंत्र, विस्तृत होता है. एकदम खुला हुआ, जहां स्वयं का भान नहीं बल्कि जिस से प्रेम होता है उस की ही मूर्ति, उस का ही गुणगान होता है. मैं प्रेम को किसी प्रकार का संबंध भी नहीं मानता क्योंकि संबंध भी तो एक बंधन होता है और प्रेम बंधता कहां है? वह तो खुले आसमान की तरह अपनी बांहें फैलाए रखता है. क्योंकि व्यवहार में अंतर आना हो सकता है किंतु प्रेम में? …संभव नहीं. सच तो यह है कि रचना मेरे प्रेम को समझना नहीं चाहती और मैं भी उसे कुछ समझाना नहीं चाहता. कभीकभी मुझे लगता है कि मैं बेकार ही अपने दिमाग को परेशान किए रखता हूं.

मैं ने कोई ठेका तो नहीं ले रखा है उसे समझाने का या उसे अपनी हालत बता कर सहानुभूति बटोरने का…यदि ऐसा है तो फिर मेरे प्रेम का अर्थ क्या हुआ? पेन पता नहीं कहां रख दिया…ज्योति मेरी हरेक चीज को कायदे से जमा कर रखती है, और जब भी मुझे कुछ लेना होता है उसे आवाज दे देता हूं…. ज्योति कहती है कि जब तक मैं हूं तुम्हें कुछ करने की जरूरत नहीं. इतने सारे कामों के बीच भी वह कभी कहती नहीं कि मैं थक चुकी हूं, कुछ तुम ही कर लो….पता नहीं ज्योति किस मिट्टी की बनी है. ओह, ज्योति तुम कहां हो. अचानक ज्योति की याद तेज हो गई. रचना कहीं खो गई. मैं ज्योति को कितना नजरअंदाज करता हूं इस के बावजूद ज्योति मेरा उतना ही ध्यान रखती है…क्या प्रेम यही होता है? ज्योति द्वारा किया जाने वाला व्यवहार मेरे प्रेम की परिभाषा को नए मोड़ पर ले जा रहा है, क्या मैं अब तक…यह जान नहीं पाया कि प्रेम होता क्या है? रचना द्वारा किए जाने वाला प्रेम और ज्योति द्वारा किया जाने वाला प्रेम…इस मुकाबले में मुझे तय करना है कि आखिर कौन सही है? आज इस अकेलेपन में निर्णय तो लेना ही होगा…मैं ने डायरी लिखने का मन बदल दिया और इसी द्वंद्व में स्वयं को धकेल दिया कि अचानक मोबाइल की रिंग बजी. फोन बजता रहा…, देखा तो धक्क रह गया…रचना का था. धड़कनें बढ़ गईं. इतने दिनों बाद उस का फोन…और मेरा इंतजार भी…, क्या करूं. मेरी हिम्मत नहीं हुई कि उसे रिसीव करूं. …अंतत: रिंग बजबज कर खत्म हो गई. मैं बैठा रहा, इंतजार करता रहा कि दोबारा वह फोन करेगी?

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किंतु काफी देर हो गई उस ने दोबारा नहीं किया. मन में कई तरह की बातें उठने लगीं. क्यों किया होगा उस ने फोन? वह भी इतने महीने बाद? आज ही? क्या मेरी टैलीपैथी ने काम किया? यदि ऐसा होता तो इस के पहले भी कई बार मैं ने उसे याद किया है, बहुत याद किया है किंतु उस ने फोन नहीं किया. आज ही क्यों? क्या मैं उसे फोन लगाऊं? मैं इसी उधेड़बुन में था कि ज्योति के फोन पर कही अंतिम बात दिमाग में घुसी, ‘यदि तुम्हें मेरी याद आए तो फोन कर देना क्योंकि यहां से फोन जल्दी नहीं लग पाता.’ खैर…ज्योति को तो फोन कर ही दूंगा. पर उस की याद कहां आ रही है. क्यों नहीं आती उस की याद? आती भी है तो सिर्फ इसलिए कि इतने काम कौन करेगा? क्या ज्योति से मेरा विवाह महज इसीलिए हुआ है कि वह घर और मेरा ध्यान रखे? यही उस का धर्म है, दायित्व है? मैं सिर्फ आदेश देता रहूं? नहीं…ऐसा तो कतई नहीं है. यदि ऐसा होता तो ज्योति भी यही सोचती. उसे क्या जरूरत है मेरा ध्यान रखने या मेरे लिए सोचते रहने की? क्या वह नहीं सोच सकती कि मैं उस के लिए कुछ करूं? कभी घुमाफिरा लाऊं या कभी मनोरंजन के लिए कोई फिल्म ही दिखा लाऊं? मैं ने ऐसा तो कभी उस के साथ किया नहीं, बावजूद वह मुझ से इतना लगाव रखती है. क्या मैं दुनिया का इतना बेशकीमती आदमी हूं? नहीं, एक मामूली सा ऐसा इंसान हूं, जो महीने के अंत में ठनठन गोपाल हो जाता है. फिर ज्योति से ही कहता है कि यदि उस ने कुछ बचत कर रखी है तो मेरे जेबखर्च के लिए दे दे. वह देती भी है. पता नहीं कहां से, कैसे बचत कर लेती है? रोमी की जिद भी तो उस की बचत से ही पूरी होती है. पर कभी वह अपने लिए कोई खर्च करते नहीं दिखी. मन विचारों में डूब चुका था. मुझे लगा कि शायद मैं स्वार्थी हूं? या ज्योति को अब तक नहीं समझ पाया. उस ने मुझे अच्छी तरह से समझ रखा है तभी तो मेरे लिए वह हमेशा तत्पर रहती है. सच तो यह है कि विवाह 2 ऐसे विरोधियों के बीच होता है जो सेतु बनाने में पूरी जिंदगी लगा देते हैं. यही उन का धर्म है.

मैं इसे निभा रहा हूं, सच है मगर जो प्रेम करता है उसे अनदेखा भी करता हूं, यह भी सच लगने लगा है. ज्योति ने कभी मुझ से कहा था कि प्रेम के लिए पात्र का होना आवश्यक है. एक ऐसे पात्र का जो प्रेम को अपने में समेट सके. कभीकभी ऐसा भी होता है कि हम जिस से प्रेम करते हैं, वह उसे पचा भी नहीं पाता, अपने प्रेम के अहम् में वह प्रेमी को अंकुश में रखना चाहता है जबकि यह नहीं होना चाहिए. ज्योति की यह बात मुझे रचना की स्मृति की ओर खींच देती है. आज जो हालात हैं रचना किसी प्रकार भी मेरे निश्छल प्रेम को समझ नहीं पाती. उसे नजरअंदाज करती है. घड़ी समय को खींचती हुई आगे बढ़ रही थी, डेढ़ घंटा बीत गया. रचना का फोन नहीं आया. मैं इंतजार कर रहा था.

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क्या रचना अब मुझ से प्रेम नहीं करती? उस ने क्यों किया था फोन? और जब किया था तो दोबारा क्यों नहीं किया? अभी यह सोच ही रहा था कि एक बार फिर मोबाइल बज उठा. मैं हड़बड़ा गया, फिर धड़कनें बढ़ गईं. रचना का होगा? मैं भी कैसा आदमी हूं, जो रचना के बारे में उल्टापुल्टा सोच रहा था. पर मेरी रचना ऐसी नहीं है, गुस्सा उतर गया होगा, बस यही सोचते हुए जैसे ही मैं ने फोन उठाया तो रिंग बज कर फिर खत्म हो गई. मैं ने देखा तो दंग रह गया. अपने आप को धिक्कारा, माथा ठोक बैठा… आज ही यह सब होना है? मैं ने मोबाइल पर नंबर मिलाया…यही सोच कर कि अब सिर्फ इसी नंबर पर बात होगी. यही नंबर मेरी जिंदगी का सच है…यही नंबर प्रेम का सार है…यही नंबर है जो यथार्थ है, यही नंबर है जो मुझ से निश्छल प्रेम करता है… ‘‘हैलो… ज्योति… तुम ने अभी फोन किया था न… क्यों?’’ ‘‘बस, ऐसे ही… मुझे लगा आप कुछ परेशान हैं….’’ ‘‘परेशान…, हां, बस यों ही…वैसे ऐसी कोई बात नहीं है….’’ ‘‘मैं कल आ रही हूं.’’ ‘‘सच.’’ ‘‘हां, सचमुच…’’ ‘‘पर इतनी जल्दी?’’ ‘‘हां…मुझे बस मम्मी से मिलना था सो मिल ली….’’ ‘‘सच ज्योति…तुम आ रही हो…ओह ज्योति… आ जाओ…तुम…, मुझे जरूरत है तुम्हारी…सिर्फ तुम्हारी.’’ फोन रख दिया. एकदम से पता नहीं क्या हुआ, पूरा माहौल बदल गया, जिस अतीत के बंधनों से मैं जकड़ा हुआ था, उस से मुक्त हो अचानक मैं खुशी से झूम उठा…यहां तक कि नाचने लगा और जोर से चिल्ला उठा…मुझे मेरा संसार मिल गया.

ले वोटर हलवा खा

जो बहुमत में हों वे सबकुछ तल्लीनता से ही करते हैं. करना भी चाहिए. कल को सरकार हो या न हो. सच कहूं तो जब से हाशिए पर गया हूं हलवा खाना तो दूर, हलवे का गीत सुनने तक को कान तरस गए हैं. समझते देर न लगी कि जनाब का हलवा पक रहा है. जनता तक पहुंचे या न पहुंचे, इस से उन्हें क्या सरोकार. हलवा गातेपकाते उन के बीच जश्न का माहौल था. कोई गैस की आंच कम तेज कर रहा था तो कोई हलवे में डालने को लाए मेवों से एकदूसरे से मुंह छिपा कर अपनीअपनी जेबें भर रहा था.

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सरकारी फंड से बन रहे हलवे की बू आते ही मुंह में कुछ पानी भर आया तो वे चिल्लाए, ‘‘रुक…’’ उन के चिल्लाने पर मैं रुका नहीं, ठिठक गया. उन्हें खुशी हुई कि चलो, उन के हलवे की बू से कोई तो रुका. ‘‘क्या है सर?’’ हलवा उन का था, सो अनजान सा बनते हुए पूछा. ‘‘देखो डियर, हम क्या बना रहे हैं?’’ वे मुझे गरदन से पकड़ कर कड़ाहे के पास ले गए. मैं डरा भी कि कहीं कड़ाहे में ही डाल दिया तो? जनता का राज है भाई साहब, ऐसे में जनता के साथ कुछ भी हो सकता है. ‘‘वाह सर, कमाल. यह क्या बन रहा है? वाह, इस से तो स्वर्ग वाली छप्पन भोगों सी खुशबू आ रही है,’’ मैं ने नाक बंद कर सूंघते हुए कहा तो वे आहआह की जगह वाहवाह कर उठे. ‘‘सरकारी हलवा बन रहा है,’’ कहते हुए हलवा चीफ गदगद थे. ‘‘किस के लिए?’’ ‘‘जनता के लिए यार. अपना तो सब काम जनता के लिए है प्यारे. तन से ले कर मन तक सब. हम तो बस जनता की खाल उतारने के लिए ही यहां आए हैं.’’ ‘‘जनता की खाल उतारने?’’ ‘‘नहीं यार, जबान फिसल गई.’’ ‘‘इसे हलवा कहते हैं क्या सर?’’ हलवा ऐसा होता है क्या सर? हलवा किस खुशी में? आप ने कोई और जनता गतिरोधी काम कर दिया है क्या?’’ मैं ने हलवे में सड़ी सूजी देख कर पूछा. पानी में मुसकराते कीड़े तैर रहे थे. सरकारी थे या अर्धसरकारी, यह तो उन को ही पता होगा.

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‘‘नहीं यार, मजाक मत कर. हमें पता है कि तुम सरकार के साथ जब देखो मजाक ही करते रहते हो.’’ ‘‘तो यह हलवा किस खुशी में? प्रभुभोगी साधुओं को पैंशनभोगी करने की खुशी में या…’’ ‘‘अरे, हम ने साधुसज्जनों को पैंशन की घोषणा क्या कर दी कि… बेचारों को पैंशन मिलेगी तो जोगी का जोगपना कम से कम चैन से तो कटेगा. वे अपने को मोक्ष पर, समाज कल्याण पर और ज्यादा फोकस कर पाएंगे?’’ ‘‘मतलब है कि आप उन को भी आरामभोगी बना कर ही दम लोगे? देखो बंधु, तुम सब पर राजनीति करो, पर साधुसंतों पर तो राजनीति मत ही करो.’’ ‘‘अच्छा चल, इस बारे में बाद में टैलीविजन पर डिबेट करेंगे कभी. अभी तो हलवा खा और बकबका मत,’’ कहते हुए वे कड़ाहे से जलताजलता हलवा मेरे हाथ पर धरने को हुए, तो मैं ने कहा, ‘‘यह क्या कर रहे हैं सर? मेरा हाथ जल जाएगा तो…?’’ ‘‘जल जाए. हम तो तुम जैसों का मुंह भी जलाना चाहते हैं, ताकि… बहुत सच कहते फिरते हो न तुम. अबे ला बे गरमागरम हलवा, जनाब के मुंह में डाल देते हैं और तब तक अपना मुंह बंद रखिएगा प्लीज, जब तक हलवा बंट नहीं जाता.’’

 

सैलाब से पहले…

लेखक- स्निग्धा श्रीवास्तव 

अंतिम भाग

पूर्व कथा

अंधेरे कमरे में बैठे विनय को देख कर इंदु उस के पास आती है तो वह पुरू के बारे में पूछता है और इंदु से पुरू को साथ ले कर पुलिस स्टेशन जाने को कहता है. इंदु के जाने पर विनय अतीत की यादों में खो जाता है कि पुरू और अरविंद की शादी के दिन सभी कितने खुश थे उन की जोड़ी को देख कर. इंदु ने लाख समझाया था कि लड़के वालों के बारे में तहकीकात तो कर लो पर विनय ने किसी की एक न चलने दी थी.

शादी के 4 दिन बाद पुरू के मायके आने पर इंदु उस के चेहरे की उदासी को भांप जाती है परंतु पूछने पर वह पुरू को कुछ नहीं बताती. विनय और इंदु को पुरू के मां बनने की खुशखबरी मिलती है. एक दिन पुरू के अकेले मायके आने पर सभी अरविंद के बारे में पूछते हैं तो वह कहती है कि ससुराल वाले उसे दहेज न लाने के लिए सताते हैं इसीलिए वह ससुराल छोड़ कर आई है. उस की बातें सुन कर सभी परेशान हो जाते हैं और विनय दुविधा में पड़ जाता है. बहन को रोते देख वरुण पुलिस स्टेशन चलने को कहता तो विनय उन्हें समझाने का प्रयास करता है. अब आगे पढि़ए… ‘पापा, दीदी की हालत देखने के बाद भी आप को उन लोगों से बात करने की पड़ी है,’ वरुण उत्तेजित हो उठा, ‘अब तो उन लोगों से सीधे अदालत में ही बात होगी.’ आखिर इंदु और वरुण के आगे विनय को हथियार डाल देने पड़े. केदार भी शहर से बाहर था वरना उस से विचारविमर्श किया जा सकता था. आखिर वही हुआ जो न चाहते हुए भी करने के लिए विनय विवश थे.

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पुलिस में एफ.आई.आर. दर्ज कराई गई. विनय, वरुण और इंदु के बयान… फिर पुरुष्णी के बयान के बाद तुरंत ही दीनानाथ, सुभद्रा और अरविंद सलाखों के पीछे पहुंच गए. मिलिंद अपने कालिज टूर पर बाहर गया हुआ था. घर में दूसरा कोई था ही नहीं, जो तुरंत उन लोगों के पक्ष में साथ देने अथवा सहायता के लिए खड़ा होता. रिश्तेदारी में बात फैलते देर ही कितनी लगती है. कौन दीनानाथजी के साथ खड़ा हुआ है कौन नहीं, अब विनय और इंदु को चिंता भी क्यों करनी थी? ‘इंस्पेक्टर साहब…इन की अच्छी खातिरदारी करिएगा,’ वरुण ने नथुने फुला कर जोश में कहा. पुरू गर्भावस्था का सफर तय कर रही थी…इस अवस्था में भी पति ने…सोच कर इंस्पेक्टर ने अरविंद को खूब फटकारा था. अरविंद खामोश था…

वरुण को गहरी निगाहों से ताकते हुए वह यों ही स्तब्ध खड़ा रहा. सारे दृश्य चलचित्र की भांति दिमाग में घूम रहे थे कि इंदु की आवाज ने चौंका दिया. सुबह 5 बजे इंदु नियमानुसार नहाधो कर स्नानघर से बाहर निकली तो विनय के कमरे से आहट पा कर वहां आ गई. ‘‘क्या…आप रातभर सोए नहीं. यों ही आरामकुरसी पर बैठेबैठे रात काट दी आप ने.’’ ‘‘नहीं इंदु, कैसे सोता मैं…अपराधी को सजा मिले बिना अब सो भी नहीं सकूंगा…’’ विनय ने गहरी सांस खींचते हुए कहा, ‘‘नहाधो ली हो तो एक कप चाय बना दो. तुम से कुछ जरूरी बातें करनी हैं. और हां, पुरू और वरुण को भी जगा दो. चाहता हूं जो भी बात है एकसाथ मिलबैठ कर की जाए.’’ असमंजस के भाव क्षण भर के लिए इंदु के चेहरे पर उभरे कि ऐसी कौन सी बात होगी. फिर कुछ सोचती हुई वह रसोईघर में चली गई. कुछ ही देर बाद इंदु, पुरू और वरुण तीनों विनय के सामने बैठे हुए थे. व्यग्रता तथा चिंता के मिश्रित भाव उन के चेहरे पर आजा रहे थे…उन से अधिक उलझन विनय के चेहरे पर दिखाई दे रही थी. खुद को कुछ संयत करते हुए विनय बोले, ‘‘चाहे सौ अपराधी छूट जाएं पर एक बेगुनाह को सजा नहीं मिलनी चाहिए, यह तो मानते हो न तुम लोग.’’ तीनों ही अचंभित से एकदूसरे को देखने लगे…आखिर विनय कहना क्या चाहते हैं. ‘‘बोलो, हां या नहीं?’’

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विनय का कड़क स्वर पुन: उभरा. ‘‘हां,’’ तीनों ने समवेत स्वर में उत्तर दिया. ‘‘तो आज हमें पुलिस थाने में चल कर दीनानाथजी, सुभद्रा और अरविंद तीनों के खिलाफ दर्ज कराई अपनी रिपोर्ट वापस लेनी है.’’ वरुण लगभग चिल्ला कर बोला, ‘‘पापा, आप होश में तो हैं.’’ ‘‘1 मिनट वरुण, अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है.’’ विनय ने कठोरता से कहा तो वरुण शांत हो कर बैठ गया. ‘‘बेगुनाह होने के बावजूद 4 दिन तक जेल में बंद रह कर जो जिल्लत व अपमान उन तीनों ने सहा है उस की भरपाई तो हम चार जन्मों में भी नहीं कर पाएंगे पर हमारी वजह से उन की प्रतिष्ठा पर जो बदनुमा दाग लग चुका है उसे धुंधलाने के लिए जितने भी संभावित उपाय हैं…हमें करने ही होंगे.’’ क्षण भर की चुप्पी के बाद विनय फिर बोल उठे, ‘‘वास्तविक अपराधी को सजा अवश्य मिलनी चाहिए ऐसा मेरा मानना है. अब सजा क्या हो यह पुरुष्णी तय करेगी क्योंकि पूरा मामला उसी से जुड़ा हुआ है,’’ कहते हुए विनय ने एक गहरी दृष्टि पुरुष्णी पर डाली जो यह सब सुन कर पत्ते की तरह कांपते हुए कातर निगाहों से देख रही थी. ‘‘इंदु, यह लो और पढ़ो,’’ कहते हुए विनय ने एक परचा इंदु की ओर बढ़ाया. आश्चर्य और उत्सुकता से वरुण भी मां के नजदीक खिसक आया व इंदु के साथसाथ परचे पर लिखा हुआ ध्यान से पढ़ने लगा.

पर पुरू मूर्तवत बैठी रही क्योंकि उसे जरूरत ही क्या थी वह पढ़ने की. वह परचा तो उसी का लिखा हुआ था जो उस ने अपने प्रेमी अक्षय को लिखा था पर उस तक पहुंचा नहीं पाई थी. ‘‘प्रिय अक्षय, तुम ने जीवन भर वफा निभाने का वादा मांगा है न. यों 2 हिस्सों में बंट कर जीना मेरे लिए दूभर होता जा रहा है. अरविंद से छुटकारा पाए बिना मैं पूर्णरूपेण तुम्हारी कभी नहीं हो पाऊंगी. अरविंद से तलाक पाने और तुम्हारा जीवन भर का साथ पाने का बस, यही एक रास्ता मुझे दिखाई दे रहा है. पता नहीं तुम इस बात से क्यों असहमत हो…पर अब मैं बिलकुल चुप बैठने वाली नहीं हूं. एक बार चुप्पी साध कर तुम्हें खो चुकी हूं, अब दोबारा खोना नहीं चाहती. मैं ने तय कर लिया है कि मैं अपनी योजना को निभाने…’’ आगे के अक्षर इंदु को धुंधला गए, चक्कर आने लगा. माथा पकड़ कर वह वरुण का सहारा लेने लगी… परचा हाथ से छूट कर जमीन पर जा गिरा. इंदु अचेत सी वरुण के कंधे पर लुढ़क गई. कुछ चेतना जगी तो सामने विनय, केदार और डाक्टर खड़े थे. धीरेधीरे सबकुछ स्पष्ट होता गया. वरुण माथा सहला रहा था और पुरू अपराधबोध से गठरी सी बंधी पैरों के पास बैठी सिसक रही थी. आराम की सलाह व कुछ दवाइयां दे कर डाक्टर चले गए. इतने लोगों के कमरे में होने पर भी एक अजीब किस्म का गहन सन्नाटा छा गया था.

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‘‘केदार, अब किस मुंह से माफी मांगूं तुझ से?’’ विनय के स्वर में टूट कर बिखरने का एहसास था. ‘‘विनय, माफी तुझे नहीं, पुरू को उन सब से मांगनी होगी जिनजिन का इस ने दिल दुखाया है. अरे, शादी के 2 माह बाद ही अरविंद ने मुझे अकेले में मिलने के लिए बुलाया था. तब उस ने बताया था कि पुरू हर वक्त मोबाइल पर किसी अक्षय नाम के लड़के से बात करती रहती है. अरविंद बहुत ही समझदार और धीरगंभीर किस्म का लड़का है. मैं उसे बचपन से ही जानता हूं…यों बेवजह वह पुरू पर शक करेगा नहीं. यह भी मैं अच्छी तरह जानता था, फिर भी मैं ने उसे तसल्ली दी थी कि पुरू नए जमाने की लड़की है. कोई पुराना सहपाठी होगा… तुम्हीं उस से खुल कर बात कर लो…और बेटे, कुछ बातें पतिपत्नी के बीच रह कर ही सुलझ जाएं तो बेहतर होता है. ‘‘मेरे इस समझाने के बाद फिर कभी उस ने यह विषय नहीं उठाया. पर परसों जब मिलिंद ने मुझे जयपुर में मोबाइल पर पूरी बात बताई तो मैं सन्न रह गया.

दीनानाथजी मेरे बड़े भाई समान हैं और सुभद्रा भाभी तो मेरी मां के स्थान पर हैं. तभी मैं ने तत्काल फोन पर तुम से बात की और तह तक जाने के लिए कहा था. काश, तुम्हारे इस कदम उठाने के पहले ही मैं तुम से बात कर पाता,’’ केदार अपनी लाचारी पर बेचैन हो उठे. अफसोस और अवसाद एकसाथ उन के चेहरे पर उभर आया मानो वह ही कोई दोष कर बैठे हों. ‘‘नहीं केदार, दोष तुम्हारा नहीं है, यह तहकीकात तो मुझे तुम्हारे फोन आने से पहले ही कर लेनी चाहिए थी पर पुत्री प्रेम कह लो चाहे परिस्थिति की नजाकत…न जाने मैं विवेक कैसे खो बैठा…तुम से बात न कर सका था न सही, पर एक बार दीनानाथजी से खुद मिल लेता,’’ विनय का स्वर पश्चाताप से कसक उठा, ‘‘तुम्हारे फोन आने के बाद मैं ने पुरू के सामान की छानबीन की और उसी में यह पत्र मिला जो शायद अक्षय तक पहुंच नहीं पाया था. क्यों पुरू?’’ विनय ने सख्त लहजे में कहा तो पुरू, जो इतनी देर से लगातार अपनी करतूत पर शर्म से गड़ी जा रही थी, उठ कर विनय से लिपट कर रो पड़ी. ‘‘सौरी, पापा,’’ पुरू बोली, ‘‘मैं अक्षय से प्यार करती हूं, यह बात मैं शादी से पहले आप को बताना चाहती थी पर सिर्फ इसलिए नहीं बता पाई थी, क्योंकि उस वक्त अक्षय अचानक होस्टल छोड़ कर न जाने कहां चला गया था. मैं आप को उस से मिलवाना भी चाहती थी. मैं ने अक्षय की बहुत खोजबीन की पर कहीं कुछ पता नहीं चला और जब वह लौटा तो बहुत देर हो चुकी थी. ‘‘उस ने मुझे बताया कि उस के पिताजी की अचानक तबीयत खराब होने के कारण वह अपने शहर चला गया था पर वह अब भी मुझे प्रेम करता है इसलिए मुझ से रोज फोन पर बातें करता. मैं भी स्वयं को रोक नहीं पाती थी. अपने प्रेम का वास्ता दे कर वह मुझे मिलने के लिए बुलाता पर मैं अपनी विवशता पर रोने के सिवा कुछ न कर पाती. मैं भी हर हाल में उसे पाना चाहती थी. पर अरविंद से अलग हुए बिना यह संभव नहीं था. बस, इसलिए मैं ने…’’ कहतेकहते पुरू सिसक उठी, ‘‘मैं जानती हूं कि मैं ने जो रास्ता अपनाया वह गलत है…बहुत बड़ी गलती की है मैं ने, पर मैं अक्षय के बिना नहीं रह सकती पापा…

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ये सब मैं ने सिर्फ उसे पाने के लिए…’’ ‘‘और जिसे पाने के लिए तुम ने अपने सासससुर को सलाखों के पीछे पहुंचा दिया, अरविंद जैसे नेक इनसान के साथ विश्वासघात किया, जानती हो उस अक्षय का क्या जवाब है?’’ विनय ने पुरू पर नजरें गड़ाते हुए पूछा. ‘‘क्या…आप अक्षय से मिले थे?’’ पुरू आश्चर्य से आंखें फाड़ कर देखने लगी. ‘‘हां, तुम्हारा यह पत्र पढ़ने के बाद मैं और केदार अक्षय से मिलने गए थे. उस ने तो तुम्हें जानने से भी इनकार कर दिया. बहुत जोर डालने पर बताया कि हां, तुम उस के साथ पढ़ती थीं और उस के पीछे हाथ धो कर पड़ी हुई थीं. यकीन है मेरी बात पर या उस से मिल कर ही यकीन करोगी?’’ विनय ने गरज कर पूछा. पुरू का तो मानो खून जम गया था कि जिस के लिए उस ने इतना बड़ा कदम उठाया वह उसे पहचानने से भी इनकार कर रहा है…विवाह के पहले अचानक होस्टल से गायब हो जाना भी कहीं उस से बचने का बहाना तो नहीं था…मन हुआ कि धरती फट जाए तो वह उसी में समा जाए. वह किसी से भी नजरें नहीं मिला पा रही थी. क्षण भर यों ही बुत बनी खड़ी रही पर अगले ही क्षण दोनों हाथों से अपना चेहरा छिपा कर तेज कदमों से अपने कमरे में दौड़ गई. वास्तविकता से रूबरू होते ही इंदु का सिर पुन: चकराने लगा. ‘अब क्या होगा मेरी पुरू का.’ ममता की मारी इंदु सबकुछ भुला कर यह सोचने लगी कि पुरू पर से अक्षय के प्रेम का भूत उतरेगा या नहीं…पुरू फिर से अरविंद के साथ जिंदगी बिताने के लिए मानेगी या नहीं… ‘‘अब बात हमारे या पुरू के मानने की नहीं है इंदु, ये हक तो हम कब का खो चुके हैं. अब बात दीनानाथजी, सुभद्रा भाभी और अरविंद के मानने की है. हमारी पुरू को माफ करें, उसे पुन: स्वीकार करें ये कहने का साहस मुझ में तो रहा नहीं और किस मुंह से कहें हम. बेटी के प्यार और विश्वास के वशीभूत हो कर जो महाभूल हम लोग कर बैठे हैं उस का प्रायश्चित्त तो हमें करना ही पड़ेगा,’’ विनय के स्वर में हताशा के साथ निश्चय भी था. ‘‘प्रायश्चित्त…यह क्या कह रहे हैं आप?’’ इंदु कांपते स्वर में बोल पड़ी. ‘‘हां, इंदु. अपनी रिपोर्ट वापस लेने के साथ ही मुझे पुरू की गलत रिपोर्ट दर्ज कराने की बात भी पुलिस को बतानी पड़ेगी. किसी सभ्यशरीफ इनसान को अपने स्वार्थ के लिए कानून का दुरुपयोग कर के फंसाना कोई छोटामोटा अपराध नहीं है. तुम्हीं ने कहा था न कि अपराधी को सजा मिलनी ही चाहिए.’’ ‘‘पर विनय, पुरू के भविष्य की तो सोचो. इस समय उस के अंदर एक नन्ही जान भी पल रही है,’’ आवाज लड़खड़ा गई इंदु की. वरुण भी लगभग रो पड़ा, ‘‘पापा…पापा, प्लीज, एक बार और सोच लीजिए.’’

‘‘नहीं वरुण, कल को यही स्थिति हमारे साथ होती तो क्या तुम अपनी पत्नी को माफ कर देते? प्रतिष्ठा कांच की तरह नाजुक होती है वरुण, एक बार चटक जाए तो क्षतिपूर्ति असंभव है. मुझे अफसोस है कि दीनानाथजी की इस क्षति का कारण हम बने हैं.’’ निरुत्तरित हो गया था वरुण. कितनी अभद्रता से पेश आया था वह अरविंद के साथ. पर अरविंद का वह मौन केवल पुरू को बदनामी से बचाने के लिए ही था. ‘‘ओह, ये हम से क्या हो गया,’’ आह सी निकली वरुण के दिल से. सन्नाटा सा छा गया था सब के बीच. सभी भयाकुल से आने वाले दुर्दिनों के ताप का मन ही मन अनुमान लगा रहे थे.

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कितना सोचसमझ कर नाम रखा था विनय ने अपनी प्यारी बेटी का…अपने गांव के किनारे से कलकल कर बहती निर्मल जलधारा वाली मनोहर नदी ‘पुरुष्णी’. पर आज यह नदी भावनाओं के आवेग से दिशाहीन हो कर बह निकली थी. अपने सैलाब के आगोश में न जाने भविष्य के गर्भ से क्याक्या तहसनहस कर ले डूबने वाली थी यह. नदी जब तक तटों के बंधन में अनुशासित रहती है, पोषक होती है, पर तटों की मर्यादाओं का उल्लंघन कर उच्छृंखल हो जाने से वह न केवल विनाशक हो जाती है बल्कि अपना अस्तित्व भी खोने लगती है. आज पुरू उर्फ पुरुष्णी ने भी अपने मायके तथा ससुराल, दोनों तटों का अतिक्रमण कर तबाही निश्चित कर डाली थी. काश, मैं ने समय रहते ही इस पुरुष्णी पर सख्ती का ‘बांध’ बांध दिया होता…मन ही मन सोचते हुए विनय इस जलसमाधि के लिए खुद को जिम्मेदार मानने लगा.

शायद यही सच है

पूर्व कथा

‘इसे आप लोगों ने पसंद किया है? इस की लटकी सूरत देख कर तो लगता है कहीं से दोचार जूते खा कर आया हो, मुझे नहीं करनी इस से शादी.’ अगली बार भारती की शादी उस के मांबाप ने जिस लड़के से तय की वहां अपने कैरियर के बिगड़ने की बात कह कर उस ने इस से इनकार कर दिया.

फिर भारती का अपने सहपाठी हिमेश से जब कुछ दिन तक प्रेमप्रसंग चला तो बात शादी तक पहुंची. लेकिन इस बार भारती ने यह कह कर रिश्ता ठुकरा दिया कि वह संयुक्त परिवार के साथ नहीं रह सकती. इसी बीच भारती के पिता का देहांत हो गया. पिता की मृत्यु के बाद भारती के दोनों भाई अपनेअपने परिवार के साथ अलग रहने लगे. इस से मां को गहरा सदमा पहुंचा. उन्होंने भारती के लिए दूर के रिश्ते में एक इंजीनियर लड़के का रिश्ता सुझाया. इस बार तो भारती ने मां से खुल कर कह दिया, ‘‘मां, क्या जीवन की सार्थकता केवल शादी में है? आज मैं प्रथम श्रेणी की अफसर हूं. अच्छा कमाती हूं क्या यह उपलब्धियां कम हैं?’ परंतु जब भारती की मां ने उसे बहुत समझाया तो वह मोहित के साथ शादी करने के लिए तैयार हो जाती है. भारती और मोहित दोनों एकदूसरे को पसंद करते हैं. शादी की तारीख एक माह बाद की तय हो जाती है, अब आगे… भारती को अपने रूप और पद का इतना गुमान था कि जो भी रिश्ते आते वह शादी से इनकार करती रही. आखिर 50 वर्ष की उम्र तक कुंआरी रह कर जब उस ने अपने अतीत का विश्लेषण किया तो उसे एक ठोस निर्णय लेने पर मजबूर होना पड़ा. यथार्थ के धरातल पर जीवन के कटु सत्य को उजागर करती नरेंद्र कौर छाबड़ा की कहानी.

अंतिम भाग मां खुश थीं कि अब बेटी का घर बस जाएगा तो वह किसी भी बेटे के पास रहने चली जाएंगी. भारती व मोहित भी 1-2 दिन छोड़ कर फोन पर बात कर लेते थे. उस दिन भारती का जन्मदिन था. सबेरे से ही वह मोहित के फोन का इंतजार कर रही थी. बैंक के सभी सहयोगियों ने उसे शुभकामनाएं दीं. मां ने भी उस के लिए विशेष पकवान बनाए पर दिन गुजर गया मोहित का फोन नहीं आया. रात होतेहोते भारती का इंतजार खीज व क्रोध में बदलने लगा. हार कर उस ने मां से कह ही दिया, ‘मां, जिस व्यक्ति को शादी से पहले होने वाली पत्नी का जन्मदिन तक याद नहीं, वह शादी के बाद क्या खयाल रखेगा?’ मां समझाती रहीं, ‘बेटा, कोई जरूरी काम होगा या शायद उस की तबीयत ठीक न हो या शहर से बाहर गया हो.’ ‘फिर भी एक फोन तो कहीं से भी किया जा सकता है. क्या ऐसा नीरस इनसान मुझे शादी के बाद खुशियां दे सकेगा?’ जिद्दी बेटी कहीं कोई गलत कदम न उठा ले, यह सोच मां बोलीं, ‘ऐसा करो, तुम ही फोन लगा लो, पता लग जाएगा क्या बात है.’ ‘मैं फोन क्यों लगाऊं? उस से फोन कर के कहूं कि मेरे जन्मदिन पर मुझे बधाई दे? इतनी गईबीती नहीं हूं…

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आखिर मेरी भी इज्जत है…वह समझता क्या है अपनेआप को.’ अगले दिन भारती के बैंक जाने के बाद मां ने मोहित को फोन लगाया तो उस ने बताया कि काम के सिलसिले में वह इतना व्यस्त था कि भारती के जन्मदिन का याद ही नहीं रहा. उस ने मांजी से माफी मांगी और कहा, वह इसी वक्त भारती से फोन पर बात करेगा. मोहित ने भारती को फोन मिलाया तो उस ने बेरुखी से शिकायत की. मोहित ने समझाते हुए कहा, ‘भारती, इतनी नाराजगी ठीक नहीं. आखिर अब हम परिपक्वता के उस मुकाम पर हैं कि इन छोटीछोटी बातों के लिए शिकायतें बचकानी लगती हैं. नौजवान पीढ़ी ऐसी हरकतें करे तो चल सकता है लेकिन हम तो अधेड़ावस्था में हैं. कम से कम उम्र की गरिमा का तो खयाल रखना चाहिए.’ भारती ने आगबबूला होते हुए कहा, ‘तुम्हारी भावनाएं मर गई हैं तो क्या मैं भी अपनी भावनाओं को कुचल डालूं? तुम इतने नीरस हो तो जिंदगी में क्या रस रह जाएगा?’ मोहित को भी क्रोध आ गया और गुस्से में बोला, ‘तुम में अभी तक परिपक्वता नहीं आई, जो ऐसी बचकानी बातें कर रही हो.’ भारती ने मोहित के साथ शादी करने से साफ इनकार कर दिया. मां समझाती रहीं लेकिन जिद्दी, अडि़यल, तुनकमिजाज बेटी ने एक न सुनी. मां को इतना गहरा सदमा पहुंचा कि साल के भीतर ही दिल के दौरे से चल बसीं. अब भारती एकदम अकेली रह गई. शुरू में तो अकेलापन बहुत खलता था लेकिन धीरेधीरे इस अकेलेपन के साथ उस ने समझौता कर लिया. कितने तनाव होते हैं गृहस्थी में. कभी बच्चे बीमार कभी उन के स्कूल पढ़ाई का तनाव, कभी पति का लंबा आफिस दौरा, कितना मुश्किल है हर स्थिति को संभालना. तुम अपनी मर्जी की मालिक हो, न पति की झिकझिक न बच्चों की सिरदर्दी. यही सोच कर वह संतुष्ट हो जाती और अपने निर्णय पर उसे गर्व भी होता. देखते ही देखते समय छलांगें लगाते हुए सालों में बीतता गया.

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अब 50 वर्ष की आयु बीत जाने पर वैसे भी शादी की संभावना नहीं रहती. पदोन्नति पा कर भारती सहायक मैनेजर के पद पर कार्यरत थी. अपना छोटा सा फ्लैट व कार भी उस ने खरीद ली थी. भाइयों के साथ महीने में कभीकभी ही मुलाकात हो पाती थी. पिछले सप्ताह बैंक मैनेजर का तबादला हो गया और जो नए मैनेजर आए वे प्रौढ़ विधुर थे. कुछ ही समय में अपने नम्र, शालीन और अपनत्व से भरे व्यवहार से उन्होंने सभी कर्मचारियों को बेहद प्रभावित कर लिया. काम के सिलसिले में भारती को रोजाना ही उन से मिलना होता था. वह भी उन के व्यक्तित्व से प्रभावित थी. उस दिन कुछ काम का बोझ भी था और कुछ मानसिक तनाव भी चल रहा था. काम करतेकरते उसे बेचैनी, घबराहट महसूस होने लगी. सीने में हलका सा दर्द भी महसूस हुआ तो वह छुट्टी ले कर डाक्टर के पास पहुंची. डाक्टर ने पूरी जांच के बाद बताया कि उसे हलका सा दिल का दौरा पड़ा है. कम से कम 2 सप्ताह उसे आराम करना पड़ेगा. भारती ने छुट्टी की अर्जी भेज दी. अगले दिन से बैंक के सहकर्मी उस का हालचाल पूछने घर आने लगे. मैनेजर भी उस का हाल पूछने आए तो वह कुछ संकोच से भर उठी. काम वाली बाई ने ही चाय बना कर दी. घर में और कोई सदस्य तो था नहीं. भाईभाभियां आए, औपचारिक बातें कीं, अपने सुझाव दिए और चले गए. उस दिन भारती को पहली बार महसूस हुआ कि वह जीवन में नितांत अकेली है. दुख में भी कोई उस का हमदर्द नहीं है. काम वाली बाई ही उस के लिए खाना बना रही थी और वही उस के पास दिन भर रुकती भी थी. रात को भारती एकदम अकेली ही रहती थी. मैनेजर साहब ने कुछ देर तक औपचारिक बातें कीं फिर बोले, ‘मिस भारती, वैसे तो किसी के व्यक्तिगत जीवन के बारे में बोलना शिष्टाचार के खिलाफ है फिर भी मैं आप से कुछ कहना चाहूंगा. उम्मीद है आप बुरा नहीं मानेंगी. देखिए, आप के अविवाहित रहने का फैसला आप का नितांत निजी फैसला है. इस में किसी को दखलंदाजी करने का अधिकार नहीं है, मुझे भी नहीं. पर मैं केवल इस बारे में अपने विचार रखूंगा, आप को सुझाव उपदेश देने की मेरी कोई मंशा नहीं है अत: इसे अन्यथा न लें. ‘दरअसल, विवाह को सामाजिक संस्था की मान्यता इसीलिए दी गई है कि व्यक्ति सारी उम्र अकेला नहीं रह सकता. पुरुष हो या स्त्री, सहारा दोनों के लिए जरूरी है.

कभीकभी परिस्थिति या अपरिहार्य कारणों से जो स्त्रीपुरुष अविवाहित रह जाते हैं वे ऊपरी तौर पर बेशक खुश रहने या सहज होने की बात करते हों लेकिन भीतर से अकेले, भयभीत, तनावग्रस्त व अवसाद से भरे रहते हैं. खासतौर पर अधेड़ावस्था उन्हें कुंठित, तनावग्रस्त व तुनकमिजाज बना देती है. असुरक्षा की भावना के चलते वे भीतर से भयभीत भी रहते हैं. जीवन में किस घड़ी कौन सी मुसीबत, दुर्घटना, बीमारी आ जाए क्या पता? उस समय उन की देखभाल कौन करेगा? इस तरह के सवाल उन्हें घेरे रहते हैं. ‘मनुष्य के जीवन में कई ऐसे अवसर आते हैं, कई ऐसे खुशी के मौके आते हैं जिन्हें वह किसी के संग बांटना चाहता है. दूर क्यों जाएं अपने दफ्तर की बातें, कोई दिलचस्प घटना या तनाव भी अपने साथी को बताते हैं, इस से मन हलका हो जाता है. मैं स्वयं अपने अकेलेपन को शिद्दत के साथ महसूस करता हूं. बेटे विदेश में बस गए हैं, अच्छी नौकरियां कर रहे हैं. पत्नी के निधन के बाद जिंदगी बोझिल सी लगती है. जितने समय कामकाज में व्यस्त रहता हूं जीवन सहज लगता है लेकिन जब काम से फारिग हो जाता हूं तो अकेले समय काटना बड़ी मुसीबत बन जाता है. पता नहीं आप ने इतना लंबा समय कैसे अकेले काट लिया? अच्छा, अब मैं चलता हूं. अपनी सेहत का खयाल रखना.’ अगले सप्ताह से भारती दफ्तर जाने लगी. मैनेजर साहब की बातों का उस पर इतना असर पड़ा कि अब सचमुच उसे अकेलापन काटने लगता. कभीकभी सोचती कि मेरे जीवन का उद्देश्य क्या है? मैं किस के लिए जी रही हूं? किस के लिए धन जमा कर रही हूं? अतीत का विश्लेषण करने पर महसूस होता शायद अपनी जिद, अडि़यल स्वभाव के कारण कुछ गलत फैसले ले कर अपने जीवन को एकाकी, रसहीन, उद्देश्यहीन बना लिया. मां मेरे सुखी जीवन के, खुशहाल परिवार के सपने देखतेदेखते दुनिया से बिदा हो गईं. मैं ने किसी की नहीं सुनी. केवल अपने कैरियर, अपनी इच्छाओं के बारे में ही सोचती रही. अपने निर्णय की गलती का एहसास अब हो रहा था.

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कैसे काटेगी इतनी लंबी जिंदगी अकेले? और इसी के साथ भारती ने बंद आंखें खोलीं तो उस का वर्तमान उस के सामने था. वह सोफे से उठी और कपड़े बदल कर बोझिल मन से बिस्तर पर जा पड़ी और अतीत की उस कड़ी को अपने आज से जोड़ कर देखने लगी. एकाएक भारती के मन में विचार कौंधा कि कहीं मैनेजर साहब ने अप्रत्यक्ष रूप से मेरे सामने शादी का प्रस्ताव तो नहीं रखा था? दिल और दिमाग के बीच तर्कवितर्क होने लगा. दिल कहता कि इस में हर्ज ही क्या है…मैनेजर साहब इतने भले व नेक इनसान हैं कि उन के साथ जिंदगी बिताई जा सकती है. दिमाग कहता कि तुम अपनेआप ही सपने बुनने लगी हो. क्या उन्होंने तुम्हारे सामने कोई प्रस्ताव रखा? फिर इस उम्र में शादी करोगी तो लोग क्या कहेंगे…दिल कहता कि लोगों का क्या है, कहने दो. वैसे पुरुष तो 60 वर्ष की उम्र में भी शादी कर ले तो समाज विरोध नहीं करता, फिर मैं तो अभी 50 की हूं. रही बात प्रस्ताव की तो हो सकता है कि वे भी मन ही मन इस की योजना बना रहे हों. दिमाग कहता कि तुम निरंकुश, आजादी की हिमायती शादी के बंधन में स्वयं को बांध पाओगी, वह भी उस पुरुष के साथ जो लंबे समय तक अपने बीवीबच्चों के साथ खुशहाल जीवन जी चुका है. दिल कहता, अब तो उसे भी साथी की जरूरत है, सामंजस्य तो दोनों को ही बैठाना पड़ेगा. अगर मुझे शेष बची जिंदगी चैन के साथ बितानी है तो कुछ समझौते तो करने ही पड़ेंगे. जिद छोड़ कर दिमाग कहता, ‘अगर मैनेजर साहब के साथ पटरी न बैठ पाई तो क्या करोगी? दिल ने कहा, जब दोनों को एकदूसरे की जरूरत है तो पटरी बैठ ही जाएगी. अब तक मैं इस गलतफहमी में जी रही थी कि मैं अकेली जी सकती हूं, किसी के सहारे की मुझे जरूरत नहीं. पर अब मेरी चेतना जागृत हो चुकी है. जीवन में समझौते करने ही पड़ते हैं.’ भारती इंतजार करती रही लेकिन मैनेजर साहब की ओर से कोई प्रस्ताव, कोई पहल नहीं हुई. कुछ समय बीत गया. अब कुछ ही समय रह गया था मैनेजर साहब की अवकाश प्राप्ति में. भारती चाह रही थी उन की तरफ से बात शुरू हो, लेकिन उस के चाहने से क्या होना था.

एक दिन उन्होंने बातचीत के दौरान कह ही दिया, ‘‘मिस भारती, अब मैं तो 2-3 महीने में सेवानिवृत्त हो कर चला जाऊंगा. जाने से पहले…’’ ‘‘आप की भविष्य की क्या योजना है?’’ उन की बात को बीच में ही काटते हुए भारती ने पूछा. ‘‘उम्र के इस पड़ाव में अकेले रहना बहुत कष्टप्रद होता है. मैं ने काफी सोचविचार कर यह फैसला लिया है कि बेटों के पास चला जाऊंगा. कम से कम उन के परिवार, बच्चों के साथ एकाकीपन की समस्या तो नहीं रहेगी. जीवन में समझौते तो करने ही पड़ते हैं,’’ कहतेकहते वह कुछ मायूस हो गए. भारती को महसूस हुआ, मानो पाने से पहले ही उस का सबकुछ लुट गया हो. भीतर बेचैनी सी उठने लगी, रुलाई सी आने लगी. बड़ी कठिनाई से उस ने खुद को संयत किया. मैनेजर साहब ने उस का उतरा हुआ चेहरा देखा तो बोले, ‘‘क्या बात है, तुम बड़ी परेशान नजर आ रही हो?’’ बड़ी मुश्किल से खुद को संभालते हुए भारती झिझकते हुए बोली, ‘‘मैं…सोच रही थी…क्या ऐसा नहीं हो सकता कि दो अकेले मिल कर एक नई जिंदगी की शुरुआत कर लें.’’ मैनेजर साहब हैरानी से उछल पड़े, ‘‘भारती, यह तुम कह रही हो? क्या तुम ने अच्छी तरह सोचविचार कर लिया है? उम्र के ये 50-52 साल तुम ने अपनी मनमरजी से बिताए हैं. अब समझौते के साथ जीवन जीना तुम्हें स्वीकार होगा?’’ ‘‘मैं बहुत सोचविचार के बाद इस नतीजे पर पहुंची हूं कि अकेले जिंदगी काटनी किसी सजा से कम नहीं है. अब तक निरंकुश, स्वतंत्र, अपनी इच्छा से जिंदगी जीने को ही मैं आदर्श जीवन माने बैठी थी, पर जब जीवन की सचाइयों से वास्ता पड़ा तो मेरा मोहभंग हुआ. जीवन समझौतों का ही दूसरा नाम है, यह अब मेरी समझ में आया है और शायद यही सच भी है.’’ भारती के मुंह से यह सुनने के बाद मैनेजर साहब के चेहरे पर भी धीरेधीरे राहत के भाव उभरने लगे थे.

कम्मो

‘‘ठीक है कम्मो, जरा देखभाल कर घर जाया करो रात को. आजकल ऐसा ही जमाना है.’’ ‘‘बाबूजी, मुझे अकेले कोई डर नहीं लगता. मैं ऐसे लोगों से बखूबी निबटना जानती हूं,’’ कम्मो ने राजेश की ओर देखते हुए कहा और कमरे से बाहर निकल गई. कुछ देर बाद राजेश उठे और दरवाजा बंद कर बिस्तर पर बैठ गए. राजेश की उम्र 62 साल हो चुकी थी. 2 साल पहले वे एक सरकारी महकमे से अफसर रिटायर हुए थे. परिवार में पत्नी कमला और 2 बेटे विकेश और विजय थे.

दोनों बेटों को पढ़ालिखा कर इंजीनियर बनाया. दोनों ने बेंगलुरु में नौकरी कर ली. दोनों की शादी कर दी गई और वे अपनी पत्नियों के साथ खूब मजे में रह रहे थे. जब तक पत्नी कमला का साथ रहा, राजेश को कुछ भी कमी महसूस न हुई. नौकरी के दौरान खूब पैसा कमाया. बड़ा 4 कमरों का मकान बना लिया. पिछले साल एक दिन कमला को हार्ट अटैक हुआ और अस्पताल पहुंचने से पहले ही दम तोड़ दिया. कमला के मरने के बाद राजेश बिलकुल अकेले हो गए. दिन तो किसी तरह कट जाता, पर रात काटनी बहुत मुश्किल हो जाती. विकेश और विजय ने बारबार फोन कर के उन को अपने पास बुला लिया. दोनों के घर एकएक महीना बिता कर वे फिर यहां अपने मकान में आ गए. सुबह का नाश्ता, सफाई, पोंछा व कपड़ों की धुलाई का काम जमुना करती थी. दोपहर व शाम का खाना शांति बनाती थी. एक दिन राजेश ने कहा था, ‘जमुना, मैं चाहता हूं कि तुम किसी ऐसी काम वाली को ढूंढ़ दो जो सुबह 9 बजे से रात के 8 बजे तक रहे. सुबह नाश्ते से रात के खाने तक के सारे काम कर सके.’ ‘ठीक है बाबूजी, मैं तलाश करूंगी,’ जमुना ने कहा था. एक दिन सुबह जमुना एक औरत को ले कर आई. जमुना ने कहा, ‘बाबूजी, यह कम्मो है. जब मैं ने यहां काम के बारे में बताया तो यह तैयार हो गई. यह सुबह 9 बजे से रात के 8 बजे तक रहेगी.’ राजेश ने कम्मो की तरफ देखा.

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सांवला रंग, गदराया बदन, मोटीमोटी आंखें. उम्र तकरीबन 30-32 साल. माथे पर बिंदी और मांग में सिंदूर. अगले दिन सुबह कम्मो आई तो राजेश अखबार पढ़ रहे थे. कम्मो ने ‘नमस्ते बाबूजी’ कहा. ‘आओ कम्मो,’ राजेश ने उसे देखते हुए कहा, ‘बैठो.’ कम्मो वहां रखी कुरसी पर बैठ गई. ‘कम्मो, जरा अपने बारे में कुछ बताओ?’ राजेश ने पूछा. ‘बाबूजी, मेरा नाम कामिनी है, पर सभी मुझे कम्मो कहते हैं. मैं बिहार में पटना के पास ही एक गांव की रहने वाली हूं. मैं ने 10वीं तक पढ़ाई की है. मैं ने अपने मातापिता को नहीं देखा. वे दोनों मजदूरी करते थे. एक दिन एक मकान का लैंटर टूट गया तो उस में दब कर दोनों मर गए. मकान मालिक ने मेरे मामा को 3 लाख रुपए दे दिए थे तब मेरी उम्र 5 साल थी. मामामामी ने ही पाला है. ‘18 साल की उम्र में मामा ने मेरी शादी पास के ही एक गांव में कर दी. शादी के 3 महीने बाद मेरे पति की सड़क हादसे में मौत हो गई. कुछ समय बाद देवर मोहन के साथ मेरी शादी हो गई. वह शहर में एक फैक्टरी में काम करता था. रोज सुबह चला जाता और शाम को लौटता था. ‘मेरी सास नहीं थी. एक दिन दोपहर का खाना खा कर मैं आराम कर रही थी तो अचानक ही ससुर ने मुझे दबोच लिया. मैं ने बहुत मना किया, पर वह नहीं माना. मैं ने इस बारे में पति मोहन को बता दिया. ‘उन दोनों की लड़ाई हो गई. इस लड़ाई में ससुर के हाथ से मोहन की हत्या हो गई. ससुर को पुलिस ने पकड़ लिया. मैं वहां उस घर में अकेली कैसे रहती, इसलिए मैं अपने मामामामी के पास लौट गई. ‘कुछ महीने बाद एक आदमी मामा के घर आया. वह आदमी मेरी तरफ ही देख रहा था. मामा ने मुझे बताया कि यह किशनलाल है.

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मुजफ्फरनगर का रहने वाला है. यह सब्जी बेचने का काम करता है. इस की घर वाली को पीलिया हो गया था. इलाज कराने पर भी वह बच नहीं सकी. घर में 20 साल का बेटा कमल है. वह 7वीं क्लास तक ही पढ़ सका, किसी दुकान पर नौकरी करता है. ‘मामा ने एक मंदिर में मेरी शादी किशनलाल से कर दी. मैं अपने पति के साथ यहां आ गई. मुझे बाद में पता चला कि मेरे मामा ने इस शादी के लिए 40,000 रुपए लिए थे. ‘मेरी शादी कर के मामा बहुत खुश था कि रुपए भी मिल गए और छाती पर बैठी मुसीबत भी टल गई. ‘एक दिन मुझे पता चला कि मेरे ससुर को हत्या के जुर्म में उम्रकैद की सजा हो गई है. यहां सब ठीकठाक चल रहा था. पहले तो मेरा पति कभीकभार शराब पी कर आता था, पर धीरेधीरे उसे रोज पीने की आदत पड़ गई. वह जुआ भी खेलने लगा था. ‘पति ने रेहड़ी लगानी बंद कर दी. मंडी वालों का कर्ज सिर पर चढ़ गया था. घर में जो जमापूंजी, जेवर वगैरह रखे थे, मंडी वालों को दे कर पीछा छुड़ाया. इस के बाद मैं ने घरों में काम करना शुरू कर दिया,’ कम्मो ने अपने बारे में बताया. ‘ठीक है कम्मो, अब तुम घर का काम संभालो.’ ‘बाबूजी, इतनी देर तक अपनी दुखभरी कहानी सुना कर मैं ने आप के सिर में दर्द कर दिया न? आप कहें तो सब से पहले मैं आप के लिए बढि़या सी चाय बना दूं?’ कम्मो ने हंसते हुए कहा था. राजेश मना नहीं कर सके थे. कम्मो ने घर में काम करना शुरू कर दिया. सुबह नाश्ते से ले कर रात के खाने तक सभी काम बहुत सलीके से करती थी. उसे राजेश के यहां काम करते हुए 2 महीने हो चुके थे. अकसर फर्श की सफाई करते हुए जब कम्मो पोंछा लगाती तो उस के उभार ब्लाउज से बाहर निकलने को हो जाते. राजेश कुरसी पर बैठे हुए अखबार पढ़ रहे होते तो उन की नजरें उभारों पर टिक जातीं.

वे इधरउधर देखने की कोशिश करते, पर फिर भी उन की नजर कम्मो की गदराई जवानी पर आ कर ठहर जाती. वे अखबार की आड़ ले कर एकटक उसे देखते रहते. कम्मो भी यह सब जानती थी कि बाबूजी क्या देख रहे हैं. वह चुपचाप अपने काम में लगी रहती मानो उसे कुछ पता ही न हो. एक दिन कम्मो ने राजेश से कहा, ‘‘बाबूजी, कमल के पापा की तबीयत ठीक नहीं चल रही है. उस को किसी अच्छे डाक्टर को दिखाना पड़ेगा.’’ ‘‘क्या हो गया है उसे?’’ ‘‘भूख नहीं लगती. कमजोरी भी आ गई है. महल्ले का डाक्टर कह रहा था कि शराब पीने के चलते गुरदे खराब हो रहे हैं.’’ ‘‘जब इतनी शराब पीएगा तो गुरदे तो खराब होंगे ही.’’ ‘‘बाबूजी, मुझे कुछ पैसे दे दीजिए.’’ ‘‘कितने पैसे चाहिए?’’ ‘‘5,000 रुपए दे दीजिए. डाक्टर की फीस, टैस्ट, दवा वगैरह में इतने तो लग ही जाएंगे.’ ‘‘ठीक है, रात को जब घर जाएगी तो मुझ से लेती जाना.’’ कम्मो ने चेहरे पर मुसकान बिखेर कर कहा, ‘‘बाबूजी, आप बहुत अच्छे इनसान हैं जो हम जैसे गरीबों की कभी भी मदद कर देते हो.’’ ‘‘जब तुम यहां इतना अच्छा काम कर रही हो तो मेरा भी फर्ज बनता है कि मैं तुम्हारी मदद करूं,’’ राजेश ने कम्मो की तरफ देखते हुए कहा. कुछ दिन बाद राजेश का एक पुराना दोस्त मदनलाल दिल्ली से आया. वह उन का पुराना साथी था.

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वह भी सरकारी नौकरी से रिटायर हुआ था. कम्मो चाय व कुछ खाने का सामान ले कर आई और मेज पर सजा कर चली गई. चाय पीतेपीते मदनलाल ने कहा, ‘‘यार राजेश, यह नौकरानी तो एकदम पटाखा है. कहां से ढूंढ़ कर लाए हो?’’ ‘‘बस अपनेआप ही मिल गई.’’ ‘‘तुम्हारी किस्मत तो बहुत ही तेज है डियर, जो ऐसी जबरदस्त नौकरानी मिल गई. एकदम हीरोइन लगती है. अगर मैं तुम्हारी जगह होता तो ऐसी मस्त नौकरानी से खूब मजे लेता. अरे भाई, हमारे पास रुपएपैसे की कमी नहीं है. हमारी औलादें खूब मजे में हैं. वे बढि़या नौकरी पर हैं. हम क्यों और किस के लिए कंजूसी करें? हमें भी तो अपनी बाकी जिंदगी हंसीखुशी और मजे में गुजारनी चाहिए.’’ राजेश ने कोई जवाब नहीं दिया. कुछ देर बाद कम्मो चाय के खाली बरतन उठाने आई तो मदनलाल उस की तरफ एकटक देखता रहा. ‘‘अच्छा राजेश डियर, मैं चलता हूं,’’ एक घंटे बाद मदनलाल बोला. ‘‘वापस दिल्ली कब जाना है?’’ ‘‘शाम को ही लौट जाऊंगा. अगर तुम रात को कम्मो को यहीं रोक सको तो मैं भी रुक जाऊंगा.’’ ‘‘यार, लगता है कि तुम मेरी नौकरानी को भगा कर ही रहोगे.’’ ‘‘यह तुम्हें छोड़ कर कहीं नहीं जाएगी, क्योंकि तुम जैसे इनसान बहुत कम हैं जो किसी की मजबूरी का फायदा नहीं उठाते. यह भी हो सकता है कि यह किसी दिन तुम्हारी मजबूरी का फायदा उठा ले.’’ ‘‘वह कैसे?’’ ‘‘मैं क्या बताऊं, यह तो समय ही बताएगा,’’ मदनलाल ने कहा और हंसते हुए राजेश से विदा ली. रात का खाना खा कर राजेश आराम कुरसी पर बैठे थे. उन के दिमाग में मदनलाल की बातें घूमने लगीं. उन की आंखों के सामने कम्मो का हंसतामुसकराता चेहरा, गदराया बदन, ब्लाउज से बाहर निकलते उभार आने लगे. दिल और दिमाग में अजीब सी बेचैनी होने लगी. वे आराम कुरसी पर सिर पकड़ कर बैठ गए. कुछ देर बाद कम्मो ने कमरे में आ कर कहा, ‘‘क्या हुआ बाबूजी? लगता है, आप की तबीयत खराब है.’’ ‘‘सिर में दर्द हो रहा है,’’ राजेश ने झूठ बोल दिया.

‘‘मैं आप का सिर दबा देती हूं. आप बिस्तर पर लेट जाइए. माथे पर बाम भी लगा देती हूं.’’ राजेश बिस्तर पर लेट गए. कम्मो ने उन के माथे पर बाम लगाते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, यह सिरदर्द ज्यादा सोचने से होता है, आप ज्यादा न सोचा कीजिए. भला आप को क्या कमी है? आप को किस बात की चिंता है? फिर इतना क्यों सोचते हैं आप?’’ राजेश के एक हाथ की उंगलियां कम्मो की कमर पर चलने लगीं. ‘‘बाबूजी, यह क्या कर रहे हैं आप?’’ कम्मो ने राजेश की ओर देखते हुए कहा. ‘‘कुछ नहीं कम्मो, आज मन बहुत बेचैन हो गया है,’’ राजेश ने धड़कते दिल से कम्मो को अपनी ओर खींच लिया. कम्मो ने मना नहीं किया. कुछ देर बाद कम्मो ने कमरे से बाहर निकलते हुए कहा, ‘‘अच्छा बाबूजी, अब मैं चलती हूं.’’ ‘‘ठीक है, जाओ,’’ राजेश ने कहा और बिस्तर पर लेटेलेटे वे बहुत देर तक उन पलों के बारे में सोचते रहे जो अभी कम्मो के साथ बिताए थे. सुबह कम्मो आई तो एकदम नौर्मल थी. रात की घटना की कोई नाराजगी उस के चेहरे पर न थी. यह देख राजेश को तसल्ली हुई कि कम्मो नाराज नहीं है. एक रात कम्मो ने घर जाने से पहले राजेश के पास आ कर कहा, ‘‘बाबूजी, आप से एक बात कहनी थी.’’ ‘‘हांहां, कहो.’’ ‘‘पहले यह बताइए कि आप की तबीयत तो ठीक है न? कहो तो आप का सिर दबा दूं?’’ कम्मो ने राजेश की ओर देखा. राजेश ने उसे अपनी तरफ खींच लिया. कुछ देर बाद कम्मो बिस्तर से उठ कर जाने लगी तो राजेश ने पूछा, ‘‘तुम कुछ कह रही थी न कम्मो?’’ ‘‘हां बाबूजी, कमल फलों की रेहड़ी लगाना चाहता है.

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अगर आप कुछ मदद कर दें तो वह रेहड़ी लगा लेगा.’’ ‘‘कितने रुपए में लग जाएगी रेहड़ी?’’ ‘‘तकरीबन 15,000 रुपए…’’ ‘‘ठीक है, कल ले जाना रुपए.’’ ‘‘बाबूजी, आप बहुत अच्छे इनसान हैं,’’ कम्मो ने कहा और मुसकराते हुए चली गई. एक महीने बाद काम करतेकरते कम्मो को अचानक उलटी हो गई. राजेश ने कम्मो को बुला कर पूछा, ‘‘क्या बात है कम्मो? तबीयत तो ठीक है न?’’ ‘‘बाबूजी लगता है कि मैं पेट से हो गई हूं. मुझे महीना भी नहीं हुआ है.’’ ‘‘तुम डाक्टर से चैकअप कराओ. शाम को नर्सिंग होम में चली जाना. नर्सिंग होम से सीधे अपने घर पहुंच जाना. मुझे मोबाइल पर बता देना जैसा भी डाक्टर बताता है.’ रात को राजेश को कम्मो ने सूचना दे दी कि वह पेट से हो गई है. अगले दिन सुबह जब कम्मो काम करने आई तो राजेश ने उसे अपने कमरे में बुलाया. कम्मो बोली, ‘‘बाबूजी, आप ने मेरे साथ संबंध बनाए तो उसी के चलते मैं पेट से हो गई हूं. अब मेरे पेट में आप का बच्चा पल रहा है.’’ ‘‘कम्मो, यह तुम कैसे कह सकती हो कि यह मेरा ही बच्चा है, यह तुम्हारे पति का भी तो हो सकता है.’’ ‘‘बाबूजी, कमल का पापा तो 3 महीने से मेरे पास आया ही नहीं, वह बीमार रहता है.’’ ‘‘कम्मो, मेरा कहा मानोगी…’’ ‘‘कहिए बाबूजी?’’ ‘‘तुम अपना बच्चा गिरवा लो.’’ ‘‘नहीं बाबूजी, मैं बच्चा नहीं गिराऊंगी. मैं हत्या नहीं कराऊंगी. चाहे यह बेटा हो या बेटी, मैं इसे पालपोस कर बड़ा करूंगी. ‘‘मेरा कहना मान लो कम्मो, तुम बच्चा गिरा दो.’’ ‘‘नहीं बाबूजी, आप मुझे ऐसी सलाह न दें. इस के पैदा होने पर मैं सभी को बता दूंगी कि इस का पापा कौन है, क्योंकि इस की शक्ल आप से मिलेगी.’’ ‘‘अगर मुझ से शक्ल न मिली तो…?’’ ‘‘तो मैं इतनी भोली भी नहीं हूं जो चुपचाप बैठ जाऊंगी. मैं सब से पहले इस बच्चे का डीएनए टैस्ट कराऊंगी और मीडिया को बता दूंगी कि यह बच्चा भी आप की जायदाद का वारिस है,’’ कम्मो ने राजेश की ओर देखते हुए कहा.

उस के चहरे पर मुसकान थी. यह सुन कर राजेश को पसीना आ गया. वे तो कम्मो को बहुत भोली समझ रहे थे, पर यह तो जरूरत से ज्यादा समझदार व चालाक है. इस ने तो उसे ही जाल में फंसा दिया है. राजेश ने कहा, ‘‘सुनो कम्मो, जो होना था हो गया. अब तुम यह बताओ कि इस मुसीबत से बचने के लिए मैं तुम्हें कितने रुपए दे दूं?’’ ‘‘बाबूजी, मुझे आप पर तरस आता है. आप बस 5 लाख रुपए दे दो. मैं बच्चा गिरवा दूंगी.’’ ‘‘5 लाख रुपए…? क्या कह रही हो तुम? पागल हो गई हो क्या?’’ ‘‘बाबूजी, मैं नहीं उस रात तो आप पागल हो गए थे जिस का नतीजा मेरे पेट में पल रहा है.’’ ‘‘मैं तुम्हें 5 लाख तो नहीं, 50,000 रुपए दे सकता हूं.’’ ‘‘बाबूजी, आप की इज्जत और आप के इस बच्चे की कीमत महज 50,000 ही है क्या?’’ इस के बाद सौदेबाजी हुई और कम्मो 2 लाख रुपए लेने पर मान गई. राजेश ने दोपहर को बैंक से 2 लाख रुपए निकाल कर कम्मो को दे दिए. ‘‘बाबूजी, मैं कल ही सफाई करा लूंगी. इस के बाद 5-7 दिन मुझे आराम भी करना पड़ेगा.’’ ‘‘कोई बात नहीं, तुम अपने घर पर आराम कर लेना.’’ ‘‘मैं किसी दूसरी कामवाली को भेज दूंगी, ताकि आप को कोई परेशानी न हो.’’ ‘‘तुम किसी को न भेजना. मैं कुछ दिन के लिए बेंगलुरु चला जाऊंगा अपने बेटे के पास,’’ राजेश ने कुढ़ते हुए कहा. कम्मो चुपचाप काम में लग गई. राजेश ठगे से कुरसी पर बैठ गए. उन को अपने किए पर पछतावा हो रहा था. अपनी इज्जत बचाने के लिए उन्हें 2 लाख रुपए देने पड़े. कम्मो ने उस रात की भरपूर कीमत वसूली है. कुछ दिन बेटे के पास बेंगलुरु में रहने के बाद फिर वापस यहीं लौटना है. यहां लौट कर फिर अकेलापन घेर लेगा.

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अब तो इस अकेलेपन को दूर करने का कुछ न कुछ उपाय करना ही होगा. अगले दिन से ही राजेश ने अखबार व इंटरनैट पर ऐसे वैवाहिक विज्ञापन देखने शुरू कर दिए जिन में विधवा, छोड़ी गई व तलाकशुदा औरतों को जीवनसाथी की तलाश थी. उन को लग रहा था कि बाकी की जिंदगी अकेले बिना साथी के काटना बहुत मुश्किल होगा. द्य

वचन हुआ पूरा

‘‘बस, कह दिया मैं ने कि नहीं जाऊंगी तो नहीं जाऊंगी.’’ ‘‘मगर, क्यों नहीं जाएगी?’’ जगदीश जरा नाराज हो कर बोला. ‘‘उन साहब की नीयत जरा भी अच्छी नहीं है.’’ ‘‘तू नहीं जाएगी तो साहब मुझे परमानैंट नहीं करेंगे…’’ इस समय जगदीश की आंखों में गुजारिश थी. पलभर बाद वह दोबारा बोला, ‘‘देख रामकली, जब तक ये साहब हैं, तू काम छोड़ने की मत सोच. साहब मेरी नौकरी परमानैंट कर देंगे, फिर मत मांजना बरतन.’’ ‘‘देखोजी, मुझे वहां जाने को मजबूर मत करो. औरत एक बार सब की हो जाती है न…’’ पलभर बाद वह बोली, ‘‘खैर, जाने दो. आप कहते हैं तो मैं नहीं छोड़ूंगी. यह जहर भी पी जाऊंगी.’’

‘‘सच रामकली, मुझे तुझ से यही उम्मीद थी,’’ कह कर जगदीश का चेहरा खिल उठा. रामकली कोई जवाब नहीं दे पाई. वह चुपचाप मुंह लटकाए रसोईघर के भीतर चली गई. जब से ये नए साहब आए हैं तब से इन्हें बरतन मांजने वाली एक बाई की जरूरत थी. जगदीश उन के दफ्तर में काम करता है. 15 साल बीत गए, पर परमानैंट नहीं हुआ है. कितने ही साहब आए, सब ने परमानैंट करने का भरोसा दिया और परमानैंट किए बिना ही ट्रांसफर हो कर चले गए. ये साहब भी अपना परिवार इसलिए ले कर नहीं आए थे कि उन के बच्चे अभी पढ़ रहे हैं, इसलिए यहां एडमिशन दिला कर वे रिस्क नहीं उठाना चाहते थे. बंगले में चौकीदार था. रसोइया भी था. मगर बरतन मांजने के लिए उन्हें एक बाई चाहिए थी. साहब एक दिन जगदीश से बोले थे, ‘बरतन मांजने वाली एक बाई चाहिए.’ ‘साहब, वह तो मिल जाएगी, मगर उस के लिए पैसा क्यों खर्च करें…’ जगदीश ने सलाह दी थी, ‘मैं गुलाम हूं न, मैं ही मांज दिया करूंगा बरतन.’ ‘नहीं जगदीश, मुझे कोई बाई चाहिए,’

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साहब इनकार करते हुए बोले थे. तब जगदीश ने सोचा था कि मौका अच्छा है. बाई की जगह वह अपनी लुगाई को क्यों न रखवा दे. साहब खुश होंगे और उसे परमानैंट कर देंगे. जगदीश को चुप देख कर साहब बोले थे, ‘कोई बाई है तुम्हारी नजर में?’ ‘साहब, मेरी घरवाली सुबहशाम आ कर बरतन मांज दिया करेगी,’ जगदीश ने जब यह कहा, तब साहब बोले थे, ‘नेकी और पूछपूछ… तू अपनी जोरू को भेज दे.’ ‘ठीक है साहब, उसे मैं तैयार करता हूं,’ जगदीश ने उस दिन साहब को कह तो दिया था, मगर लुगाई को मनाना इतना आसान नहीं था. उसे कैसे मनाएगा. क्या वह आसानी से मान जाएगी? रामकली के पास आ कर जगदीश बोला था, ‘रामकली, मैं ने एक वादा किया है?’ ‘वादा… कैसा वादा और किस से?’ रामकली ने हैरान हो कर पूछा था. ‘साहब से?’ ‘कैसा वादा?’ ‘अरे रामकली, उन्हें बरतन मांजने वाली एक बाई चाहिए थी. मैं ने कहा कि चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है. इस के लिए रामकली है न.’ ‘हाय, तू ने मुझ से बिना पूछे ही साहब से वादा कर दिया.’ ‘हां रामकली, इस में भी मेरा लालच था?’ ‘लालच, कैसा लालच?’ रामकली आंखें फाड़ कर बोली थी. ‘देख रामकली, तू तो जानती है कि मैं अभी परमानैंट नहीं हूं. परमानैंट होने के बाद मेरी तनख्वाह बढ़ जाएगी. इन साहब ने मुझ से वादा किया है कि वे मुझे परमानैंट कर देंगे. तुम साहब के यहां जा कर बरतन मांजोगी तो साहब खुश हो जाएंगे, इसलिए मैं ने तेरा नाम बोल दिया.’

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‘अरे, तू ने हर साहब के घर का इतना काम किया. बरतन भी मांजे, पर किसी भी साहब ने खुश हो कर तुझे परमानैंट नहीं किया. इस साहब की भी तू कितनी भी चमचागीरी कर ले, यह साहब भी परमानैंट करने वाला नहीं है,’ कह कर रामकली ने अपनी सारी भड़ास निकाल दी थी. जगदीश बोला था, ‘देख रामकली, इनकार मत कर, नहीं तो यह मौका भी हाथ से निकल जाएगा. तब फिर कभी परमानैंट नहीं हो सकूंगा. छोटी सी तनख्वाह में ही मरतेखपते रहेंगे. ‘‘मैं अपनी भलाई के लिए तुझ पर यह दबाव डाल रहा हूं. इनकार मत कर रामकली. साहब को खुश करने के लिए सब करना पड़ेगा.’ ‘ठीक है, तुम कहते हो तो मैं चली जाया करूंगी. हम तो छोटे लोग हैं. साहब बहुत बड़े आदमी हैं,’ कह कर रामकली ने हामी भर दी थी. इस के बाद रामकली सुबहशाम साहब के बंगले पर जा कर बरतन मांजने लगी थी. रामकली 3 बच्चों की मां होते हुए भी जवान लगती थी. गठा हुआ बदन और उभार उस की खूबसूरती में चार चांद लगा रहे थे. रामकली के ऐसे रूप पर साहब भी फिदा हो गए थे.

जब भी वह बरतन मांजती, किसी न किसी बहाने भीतर आ कर उस के उभारों को एकटक देखते रहते थे. रामकली सब समझ जाती और अपने उभारों को आंचल में छिपा लेती थी. वे उस की लाचारी का फायदा उठाएं, उस के पहले ही वह सचेत रहने लगी थी. यह खेल कई दिनों तक चलता रहा था. आखिरकार मौका पा कर साहब उस का हाथ पकड़ते हुए बोले थे, ‘रामकली, तुम अभी भी ताजा फूल हो.’ ‘साहब, आप बड़े आदमी हैं. हम जैसे छोटों के साथ ऐसी नीच हरकत करना आप को शोभा नहीं देता है,’ अपना विरोध दर्ज कराते हुए रामकली बोली थी. ‘क्या छोटा और क्या बड़ा, यह ऐसी आग है कि न छोटा देखती है और न बड़ा. आज मेरे भीतर की लगी आग बुझा दो रामकली,’ कह कर साहब की आंखों में हवस साफ दिख रही थी. साहब अपना कदम और आगे बढ़ाते, इस से पहले रामकली जरा गुस्से से बोली, ‘देखो साहब, आप मेरे मरद के साहब हैं, इसलिए लिहाज कर रही हूं. मैं गिरी हुई औरत नहीं हूं. मेरी भी अपनी इज्जत है. कल से मैं बरतन मांजने नहीं आऊंगी,’ इतना कह कर वह बाहर निकल गई थी. आज रामकली ने जगदीश से साहब के घर न जाने की बात कही, तो वह नाराज हो गया. कहता है कि मुझे परमानैंट होना है. साहब को खुश करने के लिए उस का बरतन मांजना जरूरी है, क्योंकि ऐसा करना उन्हीं साहब के हाथ में है. जगदीश अगर परमानैंट हो जाएगा, तब उस की तनख्वाह भी बढ़ जाएगी. फिर किसी साहब के यहां जीहुजूरी नहीं करनी पड़ेगी. क्या हुआ, साहब ही तो हैं.

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उन को खुश करने से अगर जगदीश को फायदा होता है तो क्यों न एक बार खुद को उन्हें सौंप दे. वैसे भी औरत का शरीर तो धर्मशाला होता है. उस के साथ सात फेरे लेने वाले पति के अलावा दूसरे मर्द भी तो लार टपकाते हैं. उस ने कई ऐसी औरतें देखी हैं, जो अपने मर्द के होते दूसरे मर्द से लगी रहती हैं. फिर आजकल सुप्रीम कोर्ट ने भी तो फैसला दिया है कि अगर कोई औरत अपने मर्द के अलावा दूसरे मर्द से जिस्मानी संबंध बना भी लेती है, तब वह अपराध नहीं माना जाएगा. फिर वह तो अपने जगदीश के फायदे के लिए जिस्म सौंप रही है. जिस्म सौंपने से पहले साहब को साफसाफ कह देगी. इस शर्त पर यह सब कर रही हूं कि जगदीश को परमानैंट कर देना. इस मामले में मर्द औरत का गुलाम रहता है. इस तरह रामकली ने अपनेआप को तैयार कर लिया. ‘‘देखो रामकली, एक बार मैं फिर कहता हूं कि तुम साहब के यहां बरतन मांजने जरूर जाओगी,’’ जगदीश ने फिर यह कहा तो रामकली बोली, ‘‘हां बाबा, जा रही हूं. तुम्हारे साहब को खुश रखने की कोशिश करूंगी. और मैं भी उन से सिफारिश करूंगी कि वे तुझे परमानैंट कर दें,’’ कह कर रामकली साहब के बंगले पर चली गई. अभी हफ्ताभर भी नहीं बीता था कि जगदीश ने घर आ कर रामकली को बताया, ‘‘साहब ने काम से खुश हो कर मेरा परमानैंट नौकरी का और्डर निकाल दिया है. तनख्वाह भी बढ़ जाएगी.’’ ‘‘क्या सचमुच तुझे परमानैंट कर दिया?’’ खुशी से उछलती रामकली ने पूछा. ‘‘हां रामकली, साहब कह रहे थे कि तू ने भी सिफारिश की थी,’’

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जगदीश ने जब यह कहा, तब रामकली ने कोई जवाब नहीं दिया. वह जानती है कि साहब से उस के जिस्म के बदले यह वचन लिया था. उसी वचन को साहब ने पूरा किया, तभी तो इतनी जल्दी आदेश निकाल दिया. उसे चुप देख जगदीश फिर बोला, ‘‘अरे रामकली, तुझे खुशी नहीं हुई?’’ ‘‘मुझे तो तुझ से ज्यादा खुशी हुई. मैं ने जोर दे कर साहब से कहा था,’’ रामकली बोली, ‘‘उन्होंने मेरे वचन को पूरा कर दिया.’’ ‘‘अब तुझे बरतन मांजने की जरूरत नहीं है. मैं साहब के लिए दूसरी औरत का इंतजाम करता हूं.’’ ‘‘नहीं जगदीश, जब तक ये साहब हैं, मैं बरतन मांजने जाऊंगी. मैं ने यही तो साहब से वादा किया है. चलती हूं साहब के यहां,’’ कह कर रामकली घर से बाहर चली गई.

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