उम्र को मात देती हौसलों की उड़ान

पंकज त्रिपाठी और पत्रलेखा अभिनीत शौर्ट फिल्म ‘एल’ (एल फौर लर्निंग) मात्र डेढ़ मिनट में महिला सशक्तीकरण पर वह प्रभावोत्पादक टिप्पणी कर जाती है जो अब तक ढेरों सरकारी योजनाएं और नेताओं के छद्म वादोंभरे भाषण नहीं कर पाए. किस्सा कुछ यों है. मिडिल क्लास फैमिली को करीने से संभालती एक महिला को साइकिल चलानी नहीं आती.

जब वह अपने पति से साइकिल चलाना सिखाने के लिए कहती तो वह उस का उपहास करते हुए कहता कि इस उम्र में यह क्या नया शौक चढ़ा है, लोग देखेंगे तो हंसेंगे. पति से मिले मीठे इनकार के बाद जब वह अपने बच्चे की साइकिल ले कर पार्क में खुद ही सीखने की कोशिश करते हुए लड़खड़ाती है तो उस के बेटे को अपने दोस्तों के सामने काफी शर्मिंदगी होती है.

घर आ कर वह अपनी मां से उस की साइकिल दोबारा न छूने की हिदायत देता है. घर में अपने पति और बेटे के हतोत्साहित करते इन रवैयों से वह हार नहीं मानती और अंत में घर का सारा काम निबटा कर दोनों को बताए बगैर वह अपने ही दम पर साइकिल सीखने निकल पड़ती है.

सतही तौर पर देखें तो लगता है कोई बड़ी बात नहीं है. साइकिल तो कोई भी चला सकता है. लेकिन साइकिल का इस्तेमाल यहां प्रतीकात्मक तरीके से हुआ है. सिर्फ साइकिल ही नहीं, आज की महिला जब भी कोई नया काम सीखना चाहती है या फिर किसी पुरानी कमतरी से उबरना चाहती है तो उसे समाज से प्रोत्साहन के बजाए उपहास और उलाहना ही मिलता है. समाज की बात क्या करें, खुद के परिवार में भाई, बहन, पिता या पति भी महिलाओं को घर पर बैठने की हिदायत दे कर उन्हें कुछ नया सीखने से दूर रखते हैं.

याद कीजिए, श्रीदेवी की फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश.’ इस फिल्म में संभ्रांत परिवार का किस्सा था. जहां घर में सब अंगरेजी बोल लेते हैं सिवा शशि गोडबोले के. उस की इस कमतरी पर पति और बच्चे तक उसे जलील करने का मौका नहीं छोड़ते. आखिर में उसे भी खुद ही पहल करनी पड़ती है. वह अपने दम पर बगैर अपनी उम्र की परवा किए इंग्लिश कोचिंग क्लास में न सिर्फ दाखिला लेती है बल्कि इंग्लिश सीख कर अपना खोया आत्मविश्वास भी हासिल करती है.

हौसला और हुनर उम्र के मुहताज नहीं

फिल्म ‘इंग्लिश विंग्लिश’ की शशि गोडबोले और ‘एल’ की मिडिल क्लास वाइफ जैसी न जाने कितनी महिलाएं हैं हमारे देश में जिन में कइयों को कार ड्राइविंग करनी है, कई पाइलट बन कर प्लेन उड़ाना चाहती हैं, कोई अंतरिक्ष में जाना चाहती है तो किसी को शूटर बना है. किसी का सपना है कि वह एवरेस्ट की चढ़ाई करे तो कोई शादी के बाद मौडलिंग करना चाहती है.

किसी को डांस का शौक है तो कोई सिंगर बनना चाहती है. किसी को दंगल में धोबीपछाड़ लगानी है तो कोई अपनी अधूरीछूटी पढ़ाई को पूरा कर के डाक्टर या टीचर बनना चाहती है. लेकिन सब अपने परिवार की जिम्मेदारियां निभाने में कहीं पीछे छूट गईं. लेकिन जब आज वे फिर से अपने अधूरे ख्वाबों के परवाजों को पंख देना चाहती हैं तो समाज और परिवार उन्हें उम्र का हवाला दे कर उड़ने से रोकता है. कहता है कि इस उम्र में अब काहे जगहंसाई करवाओगी. चुपचाप घर में बैठो और बच्चे पालो.

जिन के हौसलों में दम होता है वे इन अड़चनों को आसानी से पार करने के लिए उम्र और अपनों के हतोत्साहन को रौंदते हुए न सिर्फ अपने सपनों को पूरा करती हैं बल्कि समाज और महिलाओं को यह संदेश भी दे जाती हैं कि हौसला और हुनर उम्र के मुहताज नहीं होते.

इस देश में कई मिसालें हैं जब महिलाओं की उम्र जान कर उन्हें कमजोर आंकने की गलती की गई. उन्होंने अपने साहस, लगन और बहादुरी से नामुमकिन को मुमकिन कर दिखाया. उन्होंने साबित कर दिया कि अगर कुछ करने का जज्बा हो तो आप शिखर पर पहुंच सकते हैं. आइए मिलते हैं कुछ ऐसी ही महिलाओं से, जो प्रेरणा हैं हम सब के लिए.

101 साल की गोल्ड मैडलिस्ट धावक

जब 101 वर्षीय एक महिला ने उम्र को मात देते हुए अमेरिकन मास्टर्स टूर्नामैंट में भारत की तरफ से गोल्ड मैडल जीता तो देखने वाले दांतों तले उंगली दबा कर रह गए. यह महिला कोई और नहीं, बल्कि भारतीय धावक मान कौर थीं जो 101 साल की उम्र में यह कारनामा कर दुनिया को बता रही हैं कि उम्र को बहाना बनाना छोड़ो और कर डालो जो भी हासिल करना है.

आश्चर्य की बात तो यह है कि मान कौर ने 93 वर्ष की उम्र से दौड़ना शुरू किया था. जिस उम्र में अधिकतर महिलाएं अपने बुढ़ापे का हवाला दे कर कभी नातीपोतों के साथ समय गुजारती हैं या फिर बिस्तर पर पड़ेपड़े मौत का इंतजार करती हैं, उस उम्र में मान कौर 100 मीटर की दौड़ पूरी करती हैं. पिछले साल भी उन्होंने इसी प्रतियोगिता में गोल्ड जीता था.

न्यूजीलैंड के औकलैंड शहर में आयोजित स्पर्धा में मान कौर ने 100 मीटर रेस में यह मैडल जीता है. मान ने अपने कैरियर में यह 17वां गोल्ड मैडल हासिल किया है. मान ने 1 मिनट 14 सैकंड्स में यह दूरी तय की, जो उसेन बोल्ट के 64.42 सैकंड के रिकौर्ड से कुछ सैकंड ही कम है. उसेन बोल्ट ने 2009 में 100 मीटर की रेस में यह रिकौर्ड कायम किया था. न्यूजीलैंड के मीडिया में ‘चंडीगढ़ का आश्चर्य’ कही जा रहीं मान कौर के लिए इस स्पर्धा में भाग लेना ही सब से बड़ा लक्ष्य था.

मान कौर कहती हैं कि उम्र की ढलान में अपने सपनों को दफन करना ठीक नहीं है. हम किसी भी उम्र में खेल सकते हैं. महिलाओं को खेलों में आना चाहिए, इस के लिए खानपान पर नियंत्रण रखना चाहिए. बढ़ती उम्र में चलतेफिरते रहने से बीमारियां दूर होती हैं. इस प्रतिस्पर्धा में मान की ऊर्जा अन्य प्रतिभागियों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई. इस से पहले उन्होंने भाला फेंक और शौट पुट में भी मैडल जीते थे. दुनियाभर के मास्टर्स खेलों में मान कौर अब तक 20 मैडल अपने नाम कर चुकी हैं.

फिटनैस का हौआ

उम्र को मात दे कर किस तरह हौसलों का शिखर पार किया जाता है, इस के 2 बड़े उदाहरण हैं. एक तरफ तेलंगाना से बेहद आर्थिक रूप से कमजोर परिवार से ताल्लुक रखती सिर्फ 13 साल की उम्र की मामलावत पूर्णा अपनी लगन से सब से कम उम्र की महिला पर्वतारोही बनने का गौरव हासिल करती है तो दूसरी तरफ प्रेमलता अग्रवाल हैं जो एवरेस्ट फतह करने वाली अब तक भारत की सब से उम्रदराज महिला हैं. उन्होंने उपलब्धि 48 साल की उम्र में हासिल की.

अब यह खिताब अपने नाम करने की कोशिश 52 साल की संगीता एस बहल कर रही हैं. पर्वतारोहण का शौक संगीता के लिए ज्यादा पुराना नहीं है. उन्होंने लगभग 47 साल की उम्र में पहली बार किलिमंजारो पर चढ़ाई की.

वे 2011 में संगीता किलिमंजारो, 2013 में एलब्रस, 2014 में विंसन, 2015 में अंकाकागुआ और कोसियुस्जको शिखर फतह कर चुकी हैं. 2015 में उत्तरी अमेरिका के डेनाली पर्वत पर वे दुर्घटना का शिकार हुईं. चढ़ाई के दौरान उन का घुटना टूट गया जिस के बाद सर्जन ने उन्हें पर्वतारोहण छोड़ने की सलाह दी. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी और इसे एक चुनौती की तरह लिया. उन का घुटना दोबारा जोड़ा गया. कई महीनों तक फिजियोथेरैपी ली. और उन की हिम्मत देखिए, चोट लगने के 6 महीने से भी कम समय में वे अंकाकागुआ पर्वत पर थीं.

उन की जगह कोई और होता तो आसानी से हार मान जाता और अपनी चोट व फिटनैस का हवाला दे कर घर बैठ जाता लेकिन जिसे कुछ करने की बेचैनी और जनून होता है वह हार नहीं मानता बल्कि औरों के लिए मिसाल बन जाता है.

कई बार महिलाएं या पुरुष यह सोच कर अपने कैरियर या सपने को पूरा करने में सकुचाते हैं कि अब उम्र हो गई है या फिर शरीर साथ नहीं देता. कम ही ऐसे होते हैं जो बढ़ती उम्र और फिटनैस से जुड़ी चुनौतियों का मजबूती से सामना कर कामयाबी हासिल कर पाते हैं.

महू के गोल्फर मुकेश कुमार ऐसे ही अपवाद हैं. उन्होंने 51 साल की उम्र में एशियन टूर जीत कर किसी उम्रदराज खिलाड़ी द्वारा विश्वस्तरीय गोल्फ टूर्नामैंट जीतने का रिकौर्ड अपने नाम किया है. कुछ साल पहले तक मुकेश भीतर से इतने मजबूत नहीं थे. उन्हें लगता था कि युवा खिलाडि़यों की तरह लंबे हिट लगाना अब उन के बस की बात नहीं. लगातार प्रैक्टिस और उस से मिले आत्मविश्वास के बल पर मुकेश को यह सफलता मिली.

नाकामी पर भारी पक्के इरादे

इरादा पक्का हो तो अक्षमता की हर खाई लांघी जा सकती है. यह कर दिखाया बहराइच की पुष्पा ने. दिव्यांग पुष्पा सिंह हाथों से अक्षम हैं लेकिन उन्होंने इसे कभी भी इस अक्षमता को अपने पैशन के आड़े नहीं आने दिया. वे अपने पैरों से लिखती हैं. जब वे पीसीएस लोअर की परीक्षा देने पहुंचीं तो उन की हिम्मत देख कर सभी हैरान रह गए. पुष्पा स्कूलटीचर हैं, लेकिन उन का सपना प्रशासनिक अधिकारी बनने का है. प्रशासनिक अधिकारी बन कर पुष्पा समाज में बदलाव लाना चाहती हैं.

अभिनेत्री सुधा चंद्रन ने भी तब हार नहीं मानी थी जब एक दुर्घटना में उन की एक टांग काटनी पड़ी थी. मशहूर नृत्यांगना के लिए पैरों की क्या अहमियत होती है, इसे सिर्फ एक डांसर ही समझ सकता है. सुधा की हिम्मत ही थी कि उन्होंने कृत्रिम पैर के साथ न सिर्फ अपने डांस और अभिनय के जनून को जिंदा रखा बल्कि फिल्म ‘नाचे मयूरी’ में नृत्य प्रतिभा से सब को सकते में डाल दिया.

पैरा ओलिंपिक प्रतियोगिताओं में देखिए, किस तरह से दिव्यांग खिलाड़ी अपनी लगन और प्रैक्टिस से दुनियाभर के खेलों में अपने देश का नाम रोशन कर रहे हैं.

शादी के बाद एक नई शुरुआत

कई बार महिलाओं के सपने इस बात पर दम तोड़ देते हैं कि अब वे मां बन गई हैं और शरीर में वह बात नहीं रही जो शादी से पहले होती है. जबकि यह तथ्य बिलकुल फुजूल है. हैल्थ एक्सपर्ट मानते हैं कि शादी के बाद या मां बनने के बाद एक औरत का शरीर कमजोर नहीं होता बल्कि और मजबूत हो जाता है.

उत्तर प्रदेश के मथुरा की ताइक्वांडो चैंपियन नेहा की कहानी उन महिलाओं के लिए एक प्रेरणा है जो शादी के बाद यह मान लेती हैं कि उन का कैरियर ही खत्म हो गया है. नेहा ने न सिर्फ शादी के बाद पढ़ाई की, बल्कि अपनी मेहनत के दम पर नैशनल ताइक्वांडो प्रतियोगिता में गोल्ड मैडल भी हासिल किया. अगर नेहा शादी के बाद ताइक्वांडो चैंपियन हो सकती है तो कोई भी महिला शादी के बाद जो चाहे, वह कर सकती है.

दरअसल, शादी के बाद एक नई शुरुआत हो सकती है अपना हर वह हुनर आजमाने के लिए, जो शादी के पहले किन्हीं कारणों से अधूरा रह गया था. केरल की 70 वर्षीय दिलेर और जुझारू मीनाक्षी अम्मा को ही देख लीजिए. इस उम्र में औरतें अपने नातीपोतों के साथ घर पर अपना बुढ़ापा गुजारती हैं जबकि मीनाक्षी अम्मा मार्शल आर्ट कलारीपयटूट का निरंतर अभ्यास करती हैं.

कलारीपयटूट तलवारबाजी और लाठियों से खेला जाने वाला केरल का एक प्राचीन मार्शल आर्ट है. इस कला में वे इतनी पारंगत हैं कि अपने से आधी उम्र के मार्शल आर्ट योद्घाओं के छक्के छुड़ाने का दम रखती हैं.

वे कहती हैं, ‘‘आज जब लड़कियों के देररात घर से बाहर निकलने को सुरक्षित नहीं समझा जाता और इस पर सौ सवाल खड़े किए जाते हैं, कलारीपयटूट ने उन में इतना आत्मविश्वास पैदा कर दिया है कि उन्हें देररात भी घर से बाहर निकलने में किसी प्रकार की झिझक या डर महसूस नहीं होता.’’ उन्हें प्रतिष्ठित नागरिक पुरस्कार पद्मश्री से सम्मानित किया जा चुका है.

फैसला होने से पहले क्यों हार मानूं

उपरोक्त महिलाओं की उपलब्धिभरे आंकड़े और मिसालों भरे प्रेरणादायक किस्से इस तथ्य को पुष्ट कर रहे हैं कि उत्साह, लगन, संकल्प बना रहे तो किसी भी उम्र या स्थिति में कोई भी हुनर सीखा और उस में निपुण हुआ जा सकता है. कुछ पाने की तमन्ना हो, सकारात्मक सोच हो तो हम अपने जीवन को सफल व सार्थक बना सकते हैं. फिर चाहे पति, पिता और बेटे सपोर्ट करें या उपहास करें, महिलाओं को जो करना है उन्हें करने से कोई नहीं रोक सकता.

उम्र को थामना किसी के भी वश में नहीं है, इसलिए बढ़ती उम्र का हवाला दे कर अपने सपनों को बीच राह में छोड़ना तार्किक नहीं है. इन तमाम महिलाओं की तरह अपनी हर अक्षमता, उम्रदराजी, हालात और मजबूरियों के पहाड़ों को पार कर के ही महिला सशक्तीकरण के नए आयाम रचे जा सकते हैं. और इस चुनौती में अगर घर, समाज, परिवार उपहास करता है, राह में कांटे बिछाता है तो बिना किसी के सहारे भी आप अकेली काफी हैं.

‘फैसला होने से पहले, मैं भला क्यों हार मानूं. जग अभी जीता नहीं है, मैं अभी हारा नहीं हूं…’ ये पंक्तियां इशारा करती हैं कि हमें लोग क्या कहेंगे और इस उम्र में हम क्या करेंगे, जैसे बहानों को पीछे छोड़ कर तब तक संघर्ष और मेहनत करो जब तक अपनी मंजिल न पा लो.

सावधान मर्दो : सैक्स में भारी पड़ सकती है ज्यादा तेजी

अजय और रीना की शादी अभी कुछ समय पहले ही हुई थी. रीना सैक्स के लिए तैयार है या नहीं, यह जाने बगैर ही अजय खुद अपनी इच्छा पूरी कर के सो जाता. 2 मिनट के सैक्स में ही वह डिस्चार्ज हो जाता. रीना की इच्छा होने के पहले ही अजय की इच्छा पूरी हो जाती.

नतीजतन, रीना को पूरा मजा मिलना तो दूर की बात रही, उस की इच्छा भी ठीक से पूरी नहीं हो पाती थी. जब उसे पति से पूरी तरह शारीरिक सुख नहीं मिला तो इस का असर उस के दिमाग पर होने लगा. अब उसे अजय से नफरत सी होने लगी. वह सोचने लगी कि जो पति ठीक से जिस्मानी सुख नहीं दे सकता, उस के साथ जिंदगी कैसे काटी जा सकती है.

एक दिन रीना ने यह बात अपनी एक खास सहेली को बताई. उस ने रीना से कहा कि वह अजय से बात करे. अगर सैक्स लंबे समय तक न चल सके तो किसी अच्छे सैक्सोलौजिस्ट से मिल कर इस समस्या को दूर किया जा सकता है.

रीना की समझ में नहीं आ रहा था कि वह किस तरह इस संबंध में अजय से बात करे. फिर भी उस रात अजय उस की ओर बढ़ा तो उस ने बड़े ही प्यार से अपनी तकलीफ कही. रीना की बात अजय की समझ में आ गई.

रीना ने अजय को समझाते हुए कहा, “अभी तो हमारी जिंदगी की शुरुआत है. अगर हम दोनों के शारीरिक संबंध मजबूत रहेंगे तो हमारा भावानात्मक लगाव भी मजबूत होगा.

“अगर मेरी इच्छा नहीं पूरी होगी तो मेरा किसी दूसरे मर्द की ओर खिंचाव हो सकता है. इस से अच्छा है कि हम किसी अच्छे सैक्सोलौजिस्ट की सलाह ले कर एकदूसरे की शारीरिक जरूरत को समझ लें.”

अजय ने रीना की बात मानी और जैसा रीना ने कहा, वैसा ही किया. फिर तो दोनों की जिंदगी नौर्मल हो गई और वे एकदूसरे से खुश रहने लगे.

पतिपत्नी के रिश्ते में सब से खास बात एकदूसरे को शारीरिक सुख देना होता है. पर इसे भी बहुत से जोड़े किसी रूटीन काम की तरह निबटा देते हैं. पति को इस संबंध से कितना सुख मिला है, वह कभी उस से नहीं कहता है. इसी तरह पत्नी भी पति से कभी यह नहीं कहती कि उस की इच्छा पूरी हुई भी है या नहीं.

शारीरिक संबंध बनाने के लिए तैयार होने में लड़कियों या औरतों को हमेशा थोड़ा समय लगता है, जबकि मर्दों को ज्यादा समय नहीं लगता. ज्यादातर पति इच्छा होते ही पत्नी तैयार है या नहीं, इस बात पर ध्यान न दे कर सैक्स के लिए तैयार हो जाते हैं, जबकि तैयार न होने के बावजूद पत्नी को पति का साथ देना पड़ता है.

ऐसे में पति तो अपनी इच्छा पूरी कर लेता है, पर पत्नी की इच्छा अधूरी ही रह जाती है. ज्यादातर पत्नियों के साथ ऐसा ही होता है. पति तेजी से सैक्स के लिए तैयार होता है और 2-3 मिनट में अपना काम पूरा कर के करवट बदल कर सो जाता है, जबकि कोई भी पत्नी इतने कम समय में सैक्स के लिए तैयार नहीं होती और यह भी सच है कि इतने कम समय में उस की कभी इच्छा पूरी नहीं होती.

ऐसे तमाम मर्द हैं, जिन्हें सैक्स के दौरान तैयार होने में देर नहीं लगती. इस तरह के लोग डिस्चार्ज भी जल्दी हो जाते हैं. वे तो अपनी इच्छा पूरी कर लेते हैं, पर पत्नी की इच्छा पूरी नहीं हो पाती है.

ज्यादातर मर्द अपनी इस कमी की चर्चा करने या डाक्टर से मिल कर इस का हल निकालने में बेइज्जती महसूस करते हैं. नतीजतन, पति से खुश न होने वाली पत्नियां ही दूसरे मर्दों से शारीरिक सुख पाने के लिए भटकती हैं.

जो औरतें अपने पति से कुछ कह नहीं पाती हैं, वे धीरेधीरे अपने मन को मारने लगती हैं, जिस का बुरा असर उन की जिंदगी पर पड़ता है, इसलिए मर्दों को पत्नी के खुश न होने की इस समस्या को दूर करना जरूरी है. इस से जिंदगी में आने वाली तमाम तरह की समस्याओं को रोका जा सकता है.

डांसर हिना और हैवानियत के शिकार 2 मासूम

घर की आर्थिक स्थिति अच्छी न होने के कारण वह कक्षा 9 तक ही पढ़ सकी थी. सन 2012 में उस का निकाह बड़ौत निवासी आरिफ से हो गया था. आरिफ से हिना को 2 बच्चे महक व अर्श हुए. आरिफ दकियानूसी विचारों वाला था. जबकि हिना खुले विचारों की थी. फलस्वरूप दोनों में अकसर मनमुटाव होने लगा. इसी के चलते सन 2015 में उन का तलाक हो गया था. तलाक के बाद हिना अपने बच्चों के साथ हरिद्वार के कस्बा मंगलौर के मोहल्ला पठानपुरा में मुशर्रत के मकान में किराए पर रहने लगी थी.

पति से अलग होने के बाद हिना के सामने अपना और बच्चों का खर्च चलाने की समस्या खड़ी हो गई. इस के लिए वह शादीविवाह में डांस करने लगी. डांस के लिए उसे बच्चों को अकेला छोड़ कर जाना होता था, इसलिए उस ने अपनी छोटी बहन आरजू को अपने पास बुला लिया, ताकि वह बच्चों का ध्यान रख सके.
पहली जनवरी, 2019 को हिना मुजफ्फरनगर गई थी. घर पर उस के दोनों बच्चों के अलावा छोटी बहन आरजू थी. उसी रात हिना जब वहां से घर लौटी तो दोनों बच्चे घर पर नहीं थे. उस ने आरजू से बच्चों के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि शाम के समय अर्श और महक पास की दुकान से चौकलेट लेने गए थे, तब से वापस नहीं लौटे.

यह सुन कर हिना के होश उड़ गए. वह बोली, ‘‘वहां से कहां गए? तूने उन्हें ढूंढा नहीं?’’

‘‘मैं ने उन्हें बहुत ढूंढा, लेकिन उन का पता नहीं चला.’’ आरजू बोली.

तब तक रात के 10 बज चुके थे. इतनी रात को वह बच्चों को कहां ढूंढे, यह हिना की समझ में नहीं आ रहा था. जिस दुकान पर वे गए थे वह भी बंद हो चुकी थी. 4 साल के बेटे अर्श और 6 साल की बेटी महक की चिंता में हिना रात भर लिहाफ ओढ़े बैठी रही. बच्चों की चिंता में भूखप्यास तो दूर, उसे नींद तक नहीं आई. उस ने सारी रात जागते हुए गुजारी.

सुबह होते ही वह बच्चों की खोज में जुट गई. परचून की दुकान खुलने पर वह दुकान वाले के पास गई. दुकानदार ने बताया कि दोनों बच्चे उस की दुकान पर आए तो थे, लेकिन जब वह चौकलेट ले कर अपने घर लौट रहे थे तो उसी वक्त वहां 2 युवक आए थे. उन दोनों ने बच्चों को गोद में उठा लिया था. इस के बाद वे उन्हें एक सफेद रंग की कार में बैठा कर उन्हें ले गए. बच्चे उन के साथ इस तरह चले गए थे, मानो वे दोनों युवक उन के परिचित हों.

यह सुन कर हिना घबरा गई. उस ने सोचा कि ऐसा कौन परिचित हो सकता है, जो बच्चों को कार में बैठा कर ले गया. हिना को अपने तलाकशुदा पति आरिफ पर शक हुआ. फिर भी उस ने अपनी सभी रिश्तेदारियों में बच्चों को ढूंढा. पूरे दिन बच्चों को यहांवहां तलाशने के बाद भी जब उन का कहीं पता न चला तो हिना 2 जनवरी को ही शाम के समय हरिद्वार की कोतवाली मंगलौर पहुंच गई.

वहां मौजूद इंसपेक्टर गिरीश चंद्र शर्मा को उस ने बच्चों के गायब होने की बात बता दी.

‘‘कल शाम बच्चों का अपरहण हुआ था, वारदात को 24 घंटे होने वाले हैं. तुम ने और तुम्हारी बहन ने घटना की सूचना पुलिस को क्यों नहीं दी?’’ इंसपेक्टर शर्मा ने नाराजगी भी जाहिर की.

‘‘सर, हम पहले तो बच्चों को आसपास ढूंढते रहे, इस के बाद सुबह से हम बच्चों को अपने रिश्तेदारों के घर जा कर ढूंढते रहे. जब वे वहां भी नहीं मिले तब हम यहां आए हैं.’’ हिना बोली.

‘‘ठीक है, तुम बच्चों के फोटो दे दो ताकि उन्हें तलाश करने में आसानी हो.’’ इंसपेक्टर शर्मा ने कहा तो हिना ने अपने पर्स से दोनों बच्चों के फोटो निकाल कर दे दिए.

हिना की तहरीर पर इंसपेक्टर गिरीश चंद्र शर्मा ने 4 वर्षीय अर्श उर्फ चांद और 6 वर्षीय महक के अपहरण की रिपोर्ट दर्ज कर ली. इस की जानकारी उन्होंने सीओ (मंगलौर) मनोज कत्याल, एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा व एसएसपी जन्मेजय खंडूरी को भी दे दी.

एक ही परिवार के 2 बच्चों के अपहरण की सूचना पा कर सीओ मनोज कत्याल और एसपी देहात मणिकांत मिश्रा कुछ देर में ही मंगलौर कोतवाली पहुंच गए. एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा ने इंसपेक्टर शर्मा को बच्चों के अपहरण के मामले में तेजी से काररवाई करने के निर्देश दिए.

इस के बाद कोतवाल शर्मा ने घटनास्थल के आसपास लगे सीसीटीवी कैमरों की फुटेज खंगालनी शुरू कर दीं. उस वक्त शाम के 6 बज चुके थे. उसी समय हिना 2 युवकों के साथ कोतवाली पहुंची. हिना ने अपने साथ आए एक युवक का परिचय कराते हुए बताया कि इन का नाम ताबीज है. यह पास के ही गांव बुक्कनपुर में रहते हैं और मेरे पारिवारिक मित्र हैं.

दूसरे युवक का नाम हिना ने आजम बताया. वह भी गांव बुक्कनपुर में रहता था. हिना ने बताया कि वे दोनों अकसर उस के घर पर आते रहते हैं. यदाकदा उस की मदद भी करते हैं. इस के बाद इंसपेक्टर शर्मा हिना, ताबीज व आजम को ले कर एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा व सीओ मनोज कत्याल के पास पहुंचे.

उन के हावभाव से एसपी (देहात) को उन पर शक हुआ तो उन्होंने दोनों युवकों से बच्चों के अपहरण की बाबत पूछताछ की. दोनों ने बताया कि जब बच्चे गायब हुए थे तो वे अपने घरों पर थे. उन्हें बच्चों के गायब होने की जानकारी हिना से मिली थी.

काफी पूछताछ के बाद भी उन से बच्चों के बारे में कोई जानकारी नहीं मिली. इस पर मणिकांत मिश्रा ने तत्काल उस दुकानदार को थाने बुलवाया, जिस के सामने 2 युवकों द्वारा दोनों बच्चों को गोद में उठा कर कार में ले जाया गया था.

जब दुकानदार वहां आया तो उस ने थाने में आए ताबीज व आजम को देख कर कहा कि ये दोनों ही अर्श व महक को अपने साथ ले गए थे. दुकानदार के यह बताते ही ताबीज व आजम की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. ताबीज ने पुलिस को बताया कि वे दोनों बच्चों को अपने साथ ले तो गए थे, लेकिन बच्चों को चौकलेट दिलवा कर उन्हें उन के घर के पास छोड़ दिया था.

हिना ने भी दोनों अधिकारियों को बताया कि वे दोनों उस के परिवार के हितैषी हैं. ये उस के बच्चों का अपहरण नहीं कर सकते. इस के बाद जब एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा ने हिना की बहन आरजू से फोन पर बात की तो उस ने बताया कि बच्चे चौकलेट ले कर एक बार घर आए थे. उस के बाद ही वे लापता हुए थे.

इस से पुलिस को आरजू की बातों पर भी शक होने लगा, क्योंकि उस ने पहले बताया था कि बच्चे दुकान से चौकलेट ले कर घर लौटे ही नहीं थे. इस तरह ताबीज और आजम के साथ आरजू भी संदेह के दायरे में आ गई. अधिकारियों ने उस समय उन से और पूछताछ नहीं की, बल्कि उन सभी को घर भेज दिया. इस मामले की जांच एसआई चंद्रमोहन सिंह को सौंप दी गई.

एसआई चंद्रमोहन सिंह ने एसपी (देहात) मणिकांत मिश्रा को बताया कि जहां से हिना के बच्चों का अपहरण होना बताया जा रहा है, वह स्थान सीसीटीवी कैमरे की रेंज में नहीं है. चूंकि ताबीज व आजम शक के घेरे में थे, इसलिए उन्होंने एसआई चंद्रमोहन सिंह को निर्देश दिए कि उन दोनों से अलगअलग वीडियो रिकौर्डिंग के साथ पूछताछ करें.

3 जनवरी, 2019 को पुलिस ताबीज व आजम को थाने ले आई. दोनों ने पुलिस को बताया कि वे पहली जनवरी को अपनी कार से हिना के घर आए थे. हिना उस वक्त घर पर नहीं थी. घर पर हिना की बहन आरजू थी. अर्श व महक को चौकलेट दिलाने के बाद वे वापस अपने घर चले गए थे.

जिस तरह से दोनों युवकों ने बताया उस से पुलिस को ऐसा लगा वे दोनों रटीरटाई बात बोल रहे हों. इसलिए कोतवाल शर्मा ने एसआई चंद्रमोहन को निर्देश दिए कि वह ताबीज को अलग कमरे में ले जा कर पूछताछ करें. खुद कोतवाल आजम से पूछताछ करने लगे.

दूसरे कमरे में जाते ही ताबीज ने स्वीकार कर लिया कि उस ने आजम के साथ हिना के दोनों बच्चों का अपहरण कर उन्हें गंगनहर में फेंक दिया था. आजम ने भी यह अपराध स्वीकार कर लिया. दोनों से पूछताछ के बाद बच्चों के अपरहण की जो कहानी सामने आई, वह प्यार की बुनियाद पर रचीबसी निकली—

मंगलौर में रहते हुए घर का खर्च चलाने के लिए हिना शादियों में डांस करने लगी थी. एक दिन हिना पिरान कलियर में एक निकाह में डांस कर रही थी. इस निकाह में गांव बुक्कनपुर निवासी ताबीज भी शामिल था. हिना को डांस करते देख ताबीज उस की अदाओं पर फिदा हो गया.

डांस समाप्त होने के बाद ताबीज ने हिना के डांस की तारीफ की. इस के बाद उस ने हिना से उस का मोबाइल नंबर भी ले लिया. इस के बाद वह जबतब हिना से बात करने लगा. कुछ दिनों बाद ताबीज ने हिना के घर भी आनाजाना शुरू कर दिया. वह जब भी जाता, हिना व उस के बच्चों के लिए कुछ न कुछ ले कर जाता था.

हिना से दोस्ती के बाद ताबीज ने उस के साथ निकाह करने के सपने भी देखने शुरू कर दिए. ताबीज के परिजन भी उस से हिना का निकाह कराने को तैयार थे लेकिन वह हिना के पहले शौहर के बच्चों को नहीं अपनाना चाहते थे.

ताबीज अच्छी तरह जानता था कि अगर उसे हिना से निकाह करना है तो हिना के बच्चों को रास्ते से हटाना होगा. इस बारे में उस ने हिना की छोटी बहन आरजू से बात की. आरजू भी दूसरी बार बहन का घर बसाने के लालच में ताबीज की इस दरिंदगी में शामिल हो गई.

घटना वाले दिन ताबीज अपनी वैगनआर कार से अपने दोस्त आजम के साथ हिना के घर के बाहर पहुंचा. वहां पर आरजू ने अर्श व महक को चौकलेट लेने के बहाने बाहर भेज दिया. बच्चे चूंकि ताबीज को पहचानते थे, इसलिए वे खुश हो कर उस के साथ कार में बैठ गए. उन मासूमों को क्या पता था कि वे दोनों उन्हें कार में बैठा कर घुमाने नहीं बल्कि मौत के घाट उतारने ले जा रहे हैं.

थोड़ी देर बाद आजम ने अर्श व महक को नशीली गोलियां मिली हुई चौकलेट खाने के लिए दीं. उस वक्त उन की कार मुजफ्फरनगर की ओर जा रही थी. कुछ ही देर में दोनों बच्चे नशे में बेसुध हो गए. जैसे ही कार गांव कुम्हेड़ा के पास गंगनहर पुल पर पहुंची तो ताबीज ने कार से दोनों बेसुध बच्चों को गंगनहर में फेंक दिया.

पुलिस ने आरजू को भी गिरफ्तार कर लिया और बच्चों के शवों की तलाश के लिए गोताखोरों की मदद ली. कई दिनों तक की खोजबीन के बाद भी दोनों बच्चों में से किसी का शव गोताखोरों को नहीं मिला. पुलिस ने ताबीज की निशानदेही पर उस के घर से अपहरण में इस्तेमाल की गई वैगनआर कार भी बरामद कर ली.

10 जनवरी, 2019 को मुजफ्फरनगर के थाना जानसठ के अंतर्गत पड़ने वाली गंगनहर की चित्तौड़ झाल पर तैनात कर्मचारी ने एक बच्ची का शव झाल में फंसा हुआ देखा, जिस की उम्र 5-6 साल थी.
उसे अखबारों की खबरों से यह पहले ही पता था कि हरिद्वार के मंगलौर थाने से 2 बच्चों का अपहरण कर उन्हें गंगनहर में फेंक दिया गया था, जिन की लाशें गोताखोर भी नहीं ढूंढ पाए थे. इसलिए उस ने फोन कर के बच्ची की लाश मिलने की सूचना फोन द्वारा मंगलौर कोतवाली को दे दी.

यह खबर मिलते ही एसआई चंद्रमोहन चित्तौड़ झाल पर पहुंचे. शव को उन्होंने पहचान लिया. वह शव महक का ही था. जरूरी काररवाई कर के उन्होंने उसे पोस्टमार्टम के लिए राजकीय अस्पताल मुजफ्फरनगर भेज दिया. बाद में पुलिस को महक की जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली, उस में उस की मौत का कारण पानी में डूबना बताया गया.

पुलिस ने ताबीज, आजम और आरजू से पूछताछ के बाद कोर्ट में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

आशा, आयशा शकील, आयशा मैसी : 3 किरदारों वाली एक औरत

उस का नाम कई बार बदला गया. उस ने जिंदगी के कई बडे़ उतारचढ़ाव देखे. झुग्गीझोंपड़ी की जिंदगी वही जान सकता है, जिस ने वहां जिंदगी बिताई हो. तंग गलियां, बारिश में टपकती छत. बाप मजदूरी करता, मां का साया था नहीं, मगर लगन थी पढ़ने की. सो, वह पास के ही एक स्कूल से मिडिल पास कर गई.

मिसेज क्लैरा से बातचीत कर के उस की अंगरेजी भी ठीक हो चली थी. पासपड़ोस के आवारा, निठल्ले लड़के जब फिकरे कसते, तो दिल करता कि वह यहां से निकल भागे. मगर वह जाती कहां? बाप ही तो एकमात्र सहारा था उस का. आम लड़कियों की तरह उस के भी सपने थे. अच्छा सा घर, पढ़ालिखा, अच्छे से कमाता पति. मगर सपने कब पूरे होते हैं?

उस का नाम आशा था. उस के लिए मिसेज क्लैरा ही सबकुछ थीं. वही उसे पढ़ालिखा भी रही थीं. वे कहतीं कि आगे पढ़ाई कर. नर्सिंग की ट्रेनिंग कराने का जिम्मा भी उन्हीं के सिर जाता है. उसे अच्छे से अस्पताल में नौकरी दिलाने में मिसेज क्लैरा का ही योगदान था. वह फूली नहीं समाती थी.

सफेद यूनिफौर्म में वह घर से जब निकली, तो वही आवारा लड़के आंखें फाड़ कर कहते, ‘‘मेम साहब, हम भी तो बीमार हैं. एक नजर इधर भी,’’ पर वह अनसुना कर के आगे बढ़ जाती.

पड़ोस का कलुआ भी उम्मीदवारों की लिस्ट में था. अस्पताल में शकील भी था. वह वहां फार्मासिस्ट था. वह था बेहद गोराचिट्टा और उस की बातों से फूल झड़ते थे.

लोगों ने महसूस किया कि फुरसत में वे दोनों गपें हांकते थे. आशा की हंसी को लोग शक की नजरों से देखने लगे थे. सोचते कि कुछ तो खिचड़ी पक रही है.

इस बात से मिसेज क्लैरा दुखी थीं. वे तो अपने भाई के साथ आशा को ब्याहना चाहती थीं. इश्क और मुश्क की गंध छिपती नहीं है. आखिरकार आशा से वह आयशा शकील बन गई. उन दोनों ने शानदार पार्टी दी थी.

यह देख मिसेज क्लैरा दिमागी आघात का शिकार हो गई थीं. वे कई दिन छुट्टी पर रहीं… आशा यानी आयशा उन से नजरें मिलाने से कतरा रही थी.

मिसेज क्लैरा का गुस्सा वाजिब था. वे तो अपने निखट्टू भाई के लिए एक कमाऊ पत्नी चाहती थीं. मगर अब क्या हो सकता था, तीर कमान से निकल चुका था.

आयशा वैसे तो हंसबोल रही थी, मगर उस के दिल पर एक बोझ था.

शकील ने भांपते हुए कहा, ‘‘क्या बात है? क्या तबीयत ठीक नहीं है?’’

‘‘नहीं, कुछ नहीं. बस, थकान है,’’ कह कर उस ने बात टाल दी.

मिसेज क्लैरा सबकुछ भुला कर अपने काम में बिजी हो गईं. आयशा ने उन की नजरों से बचने के लिए दूसरे अस्पताल में नौकरी तलाश ली थी.

आयशा की दिनचर्या में कोई बदलाव नहीं आया था. उस का स्वभाव अब भी वैसा ही था. मरीजों को दवा देना, उन का हालचाल पूछना.

उस का बचपन का देखा सपना पूरा हो चला था. वह कच्चे मकान और बदबूदार गलियों से निकल कर स्टाफ क्वार्टर में रहने को आ गई थी. धीरेधीरे कुशल घरेलू औरत की तरह उस ने सारे सुख के साधन जुटा लिए थे. 3 साल में वह दोनों 2 से 4 बन चुके थे. एक बेटा और एक बेटी.

कल्पनाओं की उड़ान इनसान को कहां से कहां ले जाती है. इच्छाएं दिनोंदिन बढ़ती चली जाती हैं. बच्चों की देखभाल की चिंता किए बिना ही शकील परदेश चला गया… आयशा ने लाख मना किया, मगर वह नहीं माना.

आयशा रोज परदेश में शकील से बातें करती व बच्चों का और अपने प्यार का वास्ता देती. बस, उस के सपने 4 साल ही चल सके. मिडिल ईस्ट में शायद शकील ने अलग घर बसा लिया था. आयशा के सपने बिखर गए.

शुरूशुरू में तो शकील के फोन भी आ जाते थे कि अपना और बच्चों का ध्यान रखना. कभीकभार वैसे भी आते रहे. दिनों के साथ प्यार पर नफरत की छाया पड़ने लगी.

‘‘बुजदिल… बच्चों पर ऐसा ही प्यार उमड़ रहा था, तो देश छोड़ कर गया ही क्यों?’’

आयशा समझ गई थी कि शकील अब लौट कर नहीं आएगा… वह नफरत से कहती, ‘‘सभी मर्द होते ही बेवफा हैं.’’

आयशा अब पछता रही थी. उसे अपने सपने पूरे करने के बजाय मिसेज क्लैरा के सपने पूरे करने चाहिए थे. ‘पलभर की भूल, जीवन का रोग’ सच साबित हो गया.

शकील भी शायद आयशा से छुटकारा पाना चाहता था और वह भी… आसानी से तलाक भी हो गया. उस दिन वह फूटफूट कर रोई थी.

बच्चों ने पूछा, ‘मम्मी, क्या पापा अब नहीं आएंगे?’

‘‘नहीं…’’ आयशा रोते हुए बोली थी.

‘क्यों नहीं?’ बच्चों ने पूछा था.

‘‘क्योंकि, तुम्हारे पापा ने नई मम्मी ढूंढ़ ली है.’’

आशा ने मिसेज क्लैरा के भाई से शादी कर ली… उन्हें शांति मिल गई थी. पर वे खुद कैंसर से पीडि़त थीं. अब वह आशा ग्रेस मैसी बन चुकी थी. मिसेज क्लैरा की जिंदगी ने आखिरी पड़ाव ले लिया था. वे भी दुनिया सिधार चुकी थीं. अब वह और ग्रेस मैस्सी… यही जीवन चक्र रह गया था. मगर उस का बेटा शारिक ग्रेस को स्वीकार न कर सका.

शारिक अकसर घर से बाहर रहने लगा. वह समझदार हो चला था. वह लाख मनाती कि अब तुम्हारे पापा यही हैं.

‘‘नहीं… मेरे पापा तो विदेश में हैं. मैं अभी तुम्हारी शिकायत पापा से करूंगा. मुझे पापा का फोन नंबर दो.’’

यह सुन कर आशा हैरान रह जाती. आशा की बेटी समीरा गुमसुम सी रहने लगी थी. ग्रेस भी आशा के पैसों पर ऐश कर रहा था. आज मिसेज क्लैरा न थीं, जो हालात संभाल लेतीं.

आशा आज कितनी अकेली पड़ गई थी. अस्पताल और घर के अलावा उस ने कहीं आनाजाना छोड़ दिया था. हंसी उस से कोसों दूर हो चली थी, मगर जिम्मेदारियों से वह खुद को अलग नहीं कर सकी थी.

शारिक को आशा ने अच्छी तालीम दिलाई. वह घर छोड़ कर जाना चाहता था. सो, वह भी चला गया. शराब ने ग्रेस को खोखला कर दिया था. वह दमे का मरीज बन चुका था.

शारिक 2-4 दिन को घर आता, तो नाराज हो जाता. वह कहता, ‘‘मम्मी, कहे देता हूं कि इसे घर से निकालो. यह हरदम खांसता रहता है. सारा पैसा इस की दवाओं पर खर्च हो जाता है.’’

‘‘ऐसा नहीं कहते बेटा.’’

‘‘मम्मी, आप ने दूसरी शादी क्यों की?’’

और यह सुन कर आशा चुप्पी लगा जाती. वह तो खुद को ही गुनाहगार मानती थी, मगर वह जानती थी कि उस ने मिसेज क्लैरा के चलते ऐसा किया. वह उस की गौडमदर थीं न?

आशा अब खुद ईसाई थी, मगर उस ने अपने बच्चों को वही धर्म दिया, जिस का अनुयायी उन का बाप था.

समीरा की शादी भी उस ने उसी धर्म में की, जिस का अनुयायी उस का बाप था.

आशा का घर दीमक का शिकार हो चला था. वह फिर से झुगनी बस्ती में रहने को पहुंच गई थी.

ग्रेस ने उसी झुगनी बस्ती में दम तोड़ा. बेटे शारिक को उस ने ग्रेस के मरने की सूचना दी, मगर वह नहीं आया.

आशा अब तनहा जिंदगी गुजार रही थी. उस की ढलती उम्र ने उसे भी जर्जर कर दिया था. रात में न जाने कितनी यादें, न जाने कितने आघात उसे घेर लेते. वह खुद से ही पूछती, ‘‘मां बनना क्या जुर्म है? क्या वही जिंदगी का बोझ ढोने को पैदा होती है?’’

उसे फिल्म ‘काजल’ का वह डायलौग याद आ रहा था, जिस में मां अपने बेटे का इंतजार करती है. धूपबत्ती जल रही है. गंगाजल मुंह में टपकाया जा रहा है. डूबती सांसों से कहती है, ‘स्त्री और पृथ्वी का जन्म तो बोझ उठाने के लिए ही हुआ है.’

आशा के सीने पर लगी चोट अब धीरेधीरे नासूर बन कर रिस रही थी. बेटा शारिक आखिरी समय में आया और बेटी समीरा भी आई. मां को देख बेटा भावविभोर था, ‘‘मम्मी, आखिरी समय है आप का. अब भी लौट आओ.

‘‘अच्छा, जैसी तुम्हारी इच्छा. मरने के बाद इस शरीर को चाहे आग में जला देना, चाहे मिट्टी के हवाले करना…’’ और वह दुनिया से चली गई.

किसी की आंख से एक आंसू भी नहीं टपका. अंतिम यात्रा में कुछ लोग ही शामिल थे.

‘‘क्या यह वही नर्स थी. क्या नाम था… मैसी?’’

‘‘तो क्या हुआ अंतिम समय में तो वह कलमा गो यानी मुसलिम थी. कहां ले जाएं इसे. यहीं पास में एक कब्रिस्तान है. वहीं ले चलें. और आशा मिट्टी में समा गई.’’

मैं अकसर उधर से गुजर रहा होता. आवारा लड़के क्रिकेट खेलते नजर आते. वहां कुछ ही कब्रें रही होंगी. शायद लावारिस लोगों की होंगी. लेकिन आशा के वारिस भी थे. एक बेटा और एक बेटी.

इस नाम के कब्रिस्तान में कोई दीया जलाने वाला न था. अब चारों तरफ ऊंचीऊंची इमारतें बन गई थीं. लोगों ने अपनी नालियों के पाइप इस कब्रिस्तान में डाल दिए थे.

3 महीने बाद आशा की बेटी समीरा बैंक की पासबुक लिए मेरे पास आई और बोली, ‘‘मम्मी के 50 हजार रुपए बैंक में जमा हैं. जरा चल कर आप सत्यापन कर दें. हम वारिस हैं न?’’

और मैं सोच रहा था कि आशा न जाने कितनी उम्मीदें लिए दुनिया से चली गई. वह जिस गंदी बस्ती में पलीबढ़ी, वहीं उस ने दम तोड़ा.

मेरे दिमाग में कई सवाल उभरे, ‘क्या फर्क पड़ता है, अगर आशा किसी ईसाई कब्रिस्तान में दफनाई जाती? क्या फर्क पड़ता है, अगर वह ताबूत में सोई होती? शायद, उस के नाम का एक पत्थर तो लगा होगा.’

‘‘हाय आशा…’’ मेरे मुंह से निकला और मेरी पलकें भीग गईं.

एक प्रश्न लगातार: भाग 2

‘तुम्हारी थीसिस सबमिट हो जाए तो मैं कुछ दिन के लिए कोलकाता जाना चाहता हूं.’

‘नहीं, मुकेश, अब मैं तुम्हें कहीं जाने नहीं दूंगी.’

‘अरी पगली, परिवार में तुम्हारे शुभागमन की सूचना तो मुझे देनी होगी न.’

‘सच कह रहे हो?’

‘क्यों नहीं कहूंगा?’

‘मुकेश, किस जन्म के पुण्यों का प्रतिफल है तुम्हारा साथ.’

‘तुम भी कुछ दिन के लिए घर हो आओ, ठीक रहेगा.’

परिवार में कमला का स्वागत गर्मजोशी से हुआ. पहले दिन वह दिन भर सोई. मां ने सोचा बेटी थकान उतार रही है. फिर भी उन्हें कुछ ठीक नहीं लग रहा था. अनुभवी आंखें बेटी की स्थिति ताड़ रही थीं. एक सप्ताह बीता, मां ने डाक्टर को दिखाने की बात उठाई तो कमला ने खुद ही खुलासा कर दिया.

‘विवाह से पहले शारीरिक संबंध… बेटी, समाज क्या सोचेगा?’

‘मां, आप चिंता न करें. हम दोनों शीघ्र ही विवाह करने वाले हैं. वैसे मुझे लखनऊ यूनिवर्सिटी में लेक्चररशिप भी मिल गई है. मुकेश भी वहीं प्रोफेसर हैं. मैं आज ही फोन से बात करूंगी.’

‘जरूर करना बेटी. समय पर विवाह हो जाए तो लोकलाज बच जाएगी.’

कमला ने 1 नहीं, 2 नहीं कम से कम 10 बार नंबर डायल किए, पर हर बार रांग नंबर ही सुनना पड़ा. वह बहुत दिनों तक आशा से बंधी रही. समय बीतता जा रहा था. उस की घबराहट बढ़ती जा रही थी. बड़ी बहन रोहिणी भी चिंतित थी. वह उसे अपने साथ पटना ले आई. नर्सिंग होम में भरती करने के दूसरे दिन ही उस ने एक कन्या को जन्म दिया. पर वह कमला की नहीं रोहिणी की बेटी कहलाई. सब ने यही जाना, यही समझा. इस तरह समस्या का निराकरण हो गया था. मन और शरीर से टूटी विवश कमला ड्यूटी पर लौट आई.

निसंतान रोहिणी को विवाह के 15 वर्ष बाद संतान सुख प्राप्त हुआ था. उस का आंगन खुशियों से महक उठा. बहुत प्रसन्न थी वह. कमला की पीड़ा भी वह समझती थी. सबकुछ भूल कर वह विवाह कर ले, अपनी दुनिया नए सिरे से बसा ले, यही चाहती थी वह. सभी ने बहुत प्रयत्न किए पर सफल नहीं हो पाए.

अवकाश समाप्त होने के कई महीनों बाद भी मुकेश नहीं लौटा था. बाद में उस के नेपाल में सेटिल होने की बात कमला ने सुनी थी. उस दिन वह बहुत रोई थी, पछताई थी अपनी भावुकता पर. आवेश में पुरुष मानसिकता को लांछित करती तो स्वयं भी लांछित होती. अत: जीवन को पुस्तकालय ही हंसतीबोलती दुनिया में तिरोहित कर दिया.

कभी अवकाश में दीदी के पास चली जाती, पर केतकी ज्योंज्यों बड़ी हो रही थी उसे मौसी का आना अखरने लगा था. वह देखती, समाज की वर्जनाओं की परवा न कर के जीजाजीजी ने बिटिया को पूरी छूट दे रखी है. आधुनिक पोशाकें डिस्को, ब्यूटीपार्लर, सिनेमा, थियेटर कहीं कोई रोकटोक नहीं थी. इतना सब होने पर भी वे बेटी का मुंह जोहते, कहीं किसी बात से राजकुमारी नाराज तो नहीं.

‘‘इस बार जन्मदिन पर मुझे कार चाहिए, पापा,’’ बेटी के साहस पर चकित थी रोहिणी. मन ही मन वह जानती थी कि जिस शक्ति का यह अंश है, संसार को उंगली पर नचाने की ऐसी ही क्षमता उस में भी थी. युवा होती केतकी के व्यवहार में रोहिणी को कमला की झलक दिखाई देती.

ऐसी ही हठी थी वह भी. मनमाना करने को छटपटाती रहती. हठ कर के लखनऊ चली आई. बेटी को त्यागने का निश्चय एक बार कर लिया तो कर ही लिया. पर आंख से ही दूर किया है, मन से कैसे हटा सकती है. अभी इस के एम.बी.बी.एस. पूरा करने में 2 वर्ष बाकी हैं. पर अभी से अच्छे जीवनसाथी की तलाश में जुटी हुई है. कैसे समझाऊं कमला को? कब तक छिपाए रखेंगे हम यह सबकुछ. एक न एक दिन तो वह जान ही जाएगी सब. सहसा केतकी के आगमन से उस के विचारों की शृंखला टूटी.

‘‘ममा, आप मेरे बारे में हर बात की राय मौसी से क्यों लेती हैं? माना वह कालिज में पढ़ाती हैं पर मैं जानती हूं कि वह आप से ज्यादा समझदार नहीं हैं.’’

‘‘मां को फुसलाने का यह बढि़या तरीका है.’’

‘‘नहीं, ममा, मैं सच कहती हूं. वह आप जैसी हो ही नहीं सकतीं. आप के साथ कितना अच्छा लगता है. और मौसी तो आते ही मुझे डिस्पिलिन की रस्सियों से बांधने की चेष्टा करने लगती हैं.’’

‘‘केतकी, कमला मुझे तुम्हारे समान ही प्रिय है. मेरी छोटी बहन है वह.’’

‘‘आप की बहन हैं, ठीक है पर मेरी जिंदगी के पीछे क्यों पड़ी रहती हैं?’’

‘‘बिटिया सोचसमझ कर बोला कर. मौसी का अर्थ होता है मां सी.’’

‘‘सौरी, ममा, इस बार आप की बहन को मैं भी खुश रखूंगी.’’

वातावरण हलका हो गया था.

जवाब : अनसुलझे सवालों के घेरे में माधुरी

Story in Hindi

टॉप 10 रोमांटिक कहानी लव स्टोरी Romantic kahani love story in Hindi

Top 10 Romantic kahani love story in Hindi आज हम कुछ ऐसी ही कहानियों की बात करें जिसमें केवल रोमांटिक कहानियोॆ की दास्तान होगी. जो कहानी प्यार के एंगल से शुरु हुई हो और प्यार के एंगल पर ही खत्म हो. रोमांटिक कहानियों में सिर्फ दो प्रेमियों के प्यार की कहानियां दी जाएंगी. जिसमें प्रेमियों के बीच प्यार कैसे होता है ये जानने को आपको मिलेगा. Romantic kahani love story in Hindi

1. आखिर कितना घूरोगे : बौस को हड़काने वाली दब्बू लड़की

काली, कजरारी, बड़ीबड़ी मृगनयनी आंखें भला किस को खूबसूरत नहीं लगतीं? मगर उन से भी ज्यादा खूबसूरत होते हैं उन आंखों में बसे सपने कुछ बनने के, कुछ करने के. सपने लड़कालड़की देख कर नहीं आते. छोटाबड़ा शहर देख कर नहीं आते.

फिर भी अकसर छोटे शहर की लड़कियां उन सपनों को किसी बड़े संदूक में छिपा लेती हैं. उस संदूक का नाम होता है- कल. कारण वही पुराना. अभी हमारे देश के छोटे शहरों और कसबों में सोच बदली कहां है? घर की इज्जत है लड़की, जल्दी शादी कर उसे घर भेजना है, वहां की अमानत बना कर मायके में पाली जा रही है. इसीलिए लड़कियों के सपने उस कभी न खुलने वाले संदूक में उन के साथसाथ ससुराल और अर्थी तक की यात्रा करते हैं पर कुछ लड़कियां बचपन में ही खोल देती हैं उस संदूक को, उन के सपने छिटक जाते हैं.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

2. दलदल : सूर्या की ब्लाइंड डेटlove story in hindi

सूर्या ने परफ्यूम की बोतल को ही तकरीबन खाली कर दिया. अगर वह किसी लड़की से मिलने जा रहा हो, तब तो कहने ही क्या. उसे ब्लाइंड डेट का रिवाज बेहद भाता है. आजकल कितनी ही औनलाइन साइटें हैं, जो इस तरह की डेट सैट करने में काफी मदद कर देती हैं.

सूर्या आज पहली बार ब्लाइंड डेट पर नहीं जा रहा है. हां, लेकिन आज की डेट का नाम उसे बहुत लुभा रहा है… चेरी. होटल के बेसमैंट में रैस्टोरैंट था. एक कोने की टेबल पहले ही रिजर्व थी. एक लड़की वहां पहले से ही बैठी थी.

‘‘माफ कीजिए चेरी, मुझे देर हो गई क्या? या फिर आप को मुझ से भी ज्यादा जल्दी थी?’’ तिरछी मुसकान लिए सूर्या फ्लर्ट करने में माहिर था.

‘‘नहीं, मैं ही कुछ जल्दी आ गई. वह नया फ्लाईओवर खुल गया है न, सो आने में समय ही नहीं लगा,’’ चेरी भी बातचीत करने लगी.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

3. पहेली : कौन था नव्या का कातिल?

Romantic love story 

पेड़ों के नीचे एक लड़की का निर्वस्त्र शव बरामद हुआ था, जो खरोंचों से भरा था. आशंका थी कि बलात्कार के बाद उस की हत्या की होगी. मृतका के पास मिले कागजातों से पता चला कि वह शव असिस्टैंट बैंक मैनेजर नव्या का था. उस की कार भी वहां से कुछ दूर खड़ी मिली. पुलिस वाले मुस्तैदी से अपने काम में जुटे थे. तभी जीप रुकी और एसआई राघव उतरे.

‘‘लाश को सब से पहले किस ने देखा था?’’ राघव ने कांस्टेबल से पूछा.

‘‘इस आदिवासी लड़की ने सर.’’ कांस्टेबल एक दुबलीपतली लड़की की ओर इशारा कर के बोला, ‘‘ये खाना बनाने के लिए यहां से सूखी लकड़ियां ले जाती है.’’

‘‘हुम्म…’’ राघव ने उस लड़की पर नजर डालते हुए अगला सवाल किया, ‘‘और मृतका के घर वाले…’’

‘‘ये हैं सर,’’ कांस्टेबल की उंगली घटनास्थल से थोड़ा हट के खड़े कुछ लोगों की ओर घूम गई.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

4. यादों के सहारे : प्रकाश का प्यार love story

वह बीते हुए पलों की यादों को भूल जाना चाहता था. और दिनों के बजाय वह आज  ज्यादा गुमसुम था. वह सविता सिनेमा के सामने वाले मैदान में अकेला बैठा था. उस के दोस्त उसे अकेला छोड़ कर जा चुके थे. उस ने घंटों से कुछ खाया तक नहीं था, ताकि भूख से उस लड़की की यादों को भूल जाए. पर यादें जाती ही नहीं दिल से, क्या करे. कैसे भुलाए, उस की समझ में नहीं आया.

उस ने उठने की कोशिश की, तो कमजोरी से पैर लड़खड़ा रहे थे. अगलबगल वाले लोग आपस में बतिया रहे थे, ‘भले घर का लगता है. जरूर किसी से प्यार का चक्कर होगा. लड़की ने इसे धोखा दिया होगा या लड़की के मांबाप ने उस की शादी कहीं और कर दी होगी…

‘प्यार में अकसर ऐसा हो जाता है, बेचारा…’ फिर एक चुप्पी छा गई थी. लोग फिर आपसी बातों में मशगूल हो गए. वह वहां से उठ कर कहीं दूर जा चुका था.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

5. विसाल ए यार : इश्क की अंगड़ाईRomantic love story

दिल्ली के साउथ कैंपस के लोधी रोड पर बने दयाल सिंह कालेज में रोहित बीकौम का स्टूडैंट था और उसी की क्लास में आयशा नाम की एक खूबसूरत लड़की पढ़ती थी.

रोहित मिडिल क्लास फैमिली से था, जो एक सैकंड हैंड बाइक पर कालेज जाता था. परिवार में एक बहन और एक छोटा भाई था. दोनों ही अभी स्कूल में पढ़ते थे.

मां कम पढ़ीलिखी थीं, मगर उन का सपना बच्चों को अच्छी ऊंची तालीम दिलाना था. पिता दर्जी थे और वे दिनरात मेहनत करते थे, ताकि बच्चों को अच्छी परवरिश दे सकें.

इधर आयशा दिल्ली के नामचीन कपड़ा कारोबारी की बेटी थी. कभी वह क्रेटा गाड़ी से कालेज आ रही थी, तो कभी इनोवा से, कभी होंडा सिटी से तो कभी औडी कार से… मतलब, उस के घर में कई कारें थीं और परिवार के नाम पर केवल एक छोटा भाई और पिता.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

6. एक हंसमुख लड़की : क्या था कजरी के दुख का कारण Romantic Story in Hindi

उस की उम्र थी, यही कोई 18-19 बरस. बड़ीबड़ी आंखें, घने बाल, सफेद मोतियों की लड़ी से दांत. जब हंसती थी, तो लगता था मानो बिजली चमक गई हो. गलीमहल्ले के मनचलों पर तो उस की हंसी कहर बरसाती थी.

मुझे आज भी याद है, एक बार पड़ोस के चित्तू बाबू का लड़का काफी बीमार हो गया था. उस के परिवार के लोग बहुत परेशान थे, लेकिन कजरी बड़े इतमीनान से हंसते हुए कह रही थी, ‘‘ऐ बाबू, भैया ठीक हो जाएंगे, तुम फिक्र न करो,’’ और फिर ढेरों लतीफे सुनाने लगी. यहां तक कि बीमार लड़का भी कजरी के लतीफे सुनसुन कर हंसने लगा था.

मैं तकरीबन 10 साल बाद उस शहर, उस महल्ले में जा रहा था, जहां कजरी अपने बापू के साथ अकेली रहते हुए भी महल्लेभर के सुखदुख में शरीक होती थी.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

7. बेईमान बनाया प्रेम ने: क्या हुआ था पुष्पक के साथ Romantic love story

अगर पत्नी पसंद न हो तो आज के जमाने में उस से छुटकारा पाना आसान नहीं है. क्योंकि दुनिया इतनी तरक्की कर चुकी है कि आज पत्नी को आसानी से तलाक भी नहीं दिया जा सकता. अगर आप सोच रहे हैं कि हत्या कर के छुटाकारा पाया जा सकता है तो हत्या करना तो आसान है, लेकिन लाश को ठिकाने लगाना आसान नहीं है.

इस के बावजूद दुनिया में ऐसे मर्दों की कमी नहीं है, जो पत्नी को मार कर उस की लाश को आसानी से ठिकाने लगा देते हैं. ऐसे भी लोग हैं जो जरूरत पड़ने पर तलाक दे कर भी पत्नी से छुटकारा पा लेते हैं. लेकिन यह सब वही लोग करते हैं, जो हिम्मत वाले होते हैं. हिम्मत वाला तो पुष्पक भी था, लेकिन उस के लिए समस्या यह थी कि पारिवारिक और भावनात्मक लगाव की वजह से वह पत्नी को तलाक नहीं देना चाहता था.

पुष्पक सरकारी बैंक में कैशियर था. उस ने स्वाति के साथ वैवाहिक जीवन के 10 साल गुजारे थे. अगर मालिनी उस की धड़कनों में न समा गई होती तो शायद बाकी का जीवन भी वह स्वाति के ही साथ बिता देता.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

8. बंद किताब : अभिषेक की चाहत Romantic love stories

‘‘तुम…’’

‘‘मुझे अभिषेक कहते हैं.’’

‘‘कैसे आए?’’

‘‘मुझे एक बीमारी है.’’

‘‘कैसी बीमारी?’’

‘‘पहले भीतर आने को तो कहो.’’

‘‘आओ, अब बताओ कैसी बीमारी?’’

‘‘किसी को मुसीबत में देख कर मैं अपनेआप को रोक नहीं पाता.’’

‘‘मैं तो किसी मुसीबत में नहीं हूं.’’

‘‘क्या तुम्हारे पति बीमार नहीं हैं?’’

‘‘तुम्हें कैसे पता चला?’’

‘‘मैं अस्पताल में बतौर कंपाउंडर काम करता हूं.’’

‘‘मैं ने तो उन्हें प्राइवेट नर्सिंग होम में दिखाया था.’’

‘‘वह बात भी मैं जानता हूं.’’

‘‘कैसे?’’

‘‘तुम ने सर्जन राजेश से अपने पति को दिखाया था न?’’

‘‘हां.’’

‘‘उन्होंने तुम्हारी मदद करने के लिए मुझे फोन किया था.’’

‘‘तुम्हें क्यों?’’

‘‘उन्हें मेरी काबिलीयत और ईमानदारी पर भरोसा है. वे हर केस में मुझे ही बुलाते हैं.’’

‘‘खैर, तुम असली बात पर आओ.’’

‘‘मैं यह कहने आया था कि यही मौका है, जब तुम अपने पति से छुटकारा पा सकती हो.’’

‘‘क्या मतलब?’’

‘‘बनो मत. मैं ने जोकुछ कहा है, वह तुम्हारे ही मन की बात है. तुम्हारी उम्र इस समय 30 साल से ज्यादा नहीं है, जबकि तुम्हारे पति 60 से ऊपर के हैं. औरत को सिर्फ दौलत ही नहीं चाहिए, उस की कुछ जिस्मानी जरूरतें भी होती हैं, जो तुम्हारे बूढ़े प्रोफैसर कभी पूरी नहीं कर सके.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

9. हम बेवफा न थे : अख्तर के दिल की आवाजRomantic story

‘‘अरे, आप लोग यहां क्या कर रहे हैं? सब लोग वहां आप दोनों के इंतजार में खड़े हैं,’’ हमशां ने अपने भैया और होने वाली भाभी को एक कोने में खड़े देख कर पूछा.

‘‘बस कुछ नहीं, ऐसे ही…’’ हमशां की होने वाली भाभी बोलीं.

‘‘पर भैया, आप तो ऐसे छिपने वाले नहीं थे…’’ हमशां ने हंसते हुए पूछा.

‘काश हमशां, तुम जान पातीं कि मैं आज कितना उदास हूं, मगर मैं चाह कर भी तुम्हें नहीं बता सकता,’ इतना सोच कर हमशां का भाई अख्तर लोगों के स्वागत के लिए दरवाजे पर आ कर खड़ा हो गया.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

10. अनोखा इश्क : मंगेतर की सहेली से आशिकी Romantic love story in hindi

पारस और दिव्या की सगाई के 10 दिन बाद पारस ने दिव्या से मिलने के लिए कहा. दिव्या परिवार की इजाजत ले कर उस से मिलने गई, मगर आस्था भी उस के साथ गई, क्योंकि दिव्या की मां उसे अकेले नहीं जाने देना चाहती थीं.

पारस आस्था को देखता ही रह गया. दिव्या का गोरा रंग और आस्था का सांवला रंग, दिव्या का भराभरा बदन और आस्था नौर्मल सी, मगर तीखे नैननक्श, पारस तो मानो आस्था में ही खो गया. दिव्या ने पारस को 2-3 बार पुकारा, तब जा कर जैसे उसे होश आया हो.

आस्था बोली, “हैलो जीजू…”

“आस्था, प्लीज, मुझे पारस कहो,” पारस ने साफसाफ कह दिया.

“ओके पारस…”

इस तरह अकसर पारस दिव्या को मिलने के लिए किसी रैस्टोरैंट या पार्क में बुलाता तो आस्था भी साथ होती. वह दिव्या की बैस्ट फ्रैंड जो थी.

इस पूरी कहानी को पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

माधुरी और संजय दत्त दिखे साथसाथ, क्या ‘खलनायक 2’ की चल रही है तैयारी

हिंदी फिल्मों की खूबसूरत हीरोइन माधुरी दीक्षित का हर कोई दीवाना है. उन के डांस और ऐक्टिंग का जवाब नहीं है, हर कोई उन की अदाओं पर फिदा है.

इन दिनों माधुरी दीक्षित की एक तसवीर खूब वायरल हो रही है, जिस में वे फिल्म हीरो संजय दत्त के साथ नजर आ रही हैं. फैंस इस तसवीर को देख खूब खुश हो रहे हैं और सोशल मीडिया पर पूछ रहे हैं कि कब फिल्म ‘खलनायक 2’ आ रही है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Dr Shriram Nene (@drneneofficial)


आप को बता दें कि साल 1993 में आई माधुरी दीक्षित, संजय दत्त, जैकी श्रौफ की फिल्म ‘खलनायक’ आई थी. इस फिल्म को लोगों ने खूब पसंद किया था और साथ ही लोगों ने माधुरी दीक्षित और संजय दत्त की जोड़ी को भी काफी सराहा था. अब एक बार फिर एक फंक्शन के दौरान इन सभी कलाकारों को एकसाथ देखा गया.

दरअसल, फिल्म डायरैक्टर और प्रोड्यूसर सुभाष घई और उन की पत्नी मुक्ता घई ने अपनी शादी की सालगिरह मनाने के लिए मुंबई में एक डिनर पार्टी की आयोजन किया था. इसी फंक्शन में इन सब को साथ देखा गया, जिस की तसवीरें सोशल मीडिया में काफी वायरल हो रही हैं और फैंस इस फोटो को देख ‘खलनायक 2’ की मांग कर रहे हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Dr Shriram Nene (@drneneofficial)


बता दें कि वायरल तसवीरों में सुभाष घई, माधुरी दीक्षित, संजय दत्त, जैकी श्रौफ और अनुपम खेर एकसाथ नजर आ रहे हैं. अब फैंस फिर से संजय दत्त और माधुरी दीक्षित को साथ में देखने की डिमांड कर रहे हैं. एक यूजर ने कमैंट में लिखा, ‘एक बार फिर वापस आए संजू और माधुरी.’ वहीं दूसरे यूजर ने लिखा, ‘गंगा, राम और बल्लू एकसाथ.’ कुछ लोगों ने तो फिल्म ‘खलनायक 2’ बनाने की मांग भी की. अब देखते हैं कि लोगों की यह डिमांड पूरी होती है या नहीं.

ब्रालैस लुक में वायरल हुईं सोशल मीडिया की सनसनी सोफिया अंसारी

इंटरनैट पर अपनी बोल्ड अदाओं से तहलका मचाने वाली सोफिया अंसारी को कौन नहीं जानता है. वे अपने बोल्ड लुक और फोटोज के लिए जानी जाती हैं. उन की हर तसवीर सोशल मीडिया पर धमाल मचा देती है. एक बार फिर उन की कुछ तसवीरें इंटरनैट पर वायरल हो रही हैं, जिन में वे बेहद ही हौट लग रही हैं. इन फोटोज में सोफिया ब्रालैस लुक और बिकिनी में दिखाई दे रही हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sofia Ansari (@sofia9__official)


सोफिया अंसारी की सामने आईं इन तसवीरों में वे बिकिनी टौप में सिजलिंग पोज मारती दिखीं. साथ ही उन्होंने अपनी ब्रालैस तसवीरें शेयर कर के भी फैंस के पसीने छुड़ा दिए.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sofia Ansari (@sofia9__official)


सोफिया अंसारी लेटैस्ट तसवीरों में बिकिनी टौप पहन कर झूमती दिखी हैं. उन की ये तसवीरें उन के फैंस को भी हैरान कर गई हैं. सोफिया अंसारी की सामने आईं इन तसवीरों में वे बेहद बोल्ड अवतार में दिख रही हैं. अदाकारा ने कई सारी तसवीरें शेयर कर फैंस से बैस्ट तसवीर चुनने के लिए भी कहा है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sofia Ansari (@sofia9__official)


बता दें कि सोफिया अंसारी सोशल मीडिया पर अपनी रील्स से छाई रहती हैं. वे अपनी बोल्ड तसवीरों से फैंस का ध्यान खींचती रहती हैं. सोफिया अंसारी सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं. उन्हें इंस्टाग्राम पर तकरीबन 9.5 मिलियन लोग फॉलो करते हैं. उन्होंने पीली जैकेट पहन कर भी अपनी ब्रालैस तसवीरें शेयर कर के फैंस को चौंका और हिला दिया था. अदाकारा की ये तसवीरें देखते ही देखते वायरल हो गई हैं.

परफैक्ट क्राइम : पीबी65-3372 नंबर कार का अंतिम संस्कार

इस केस की कहानी किसी फिल्म की पटकथा से कम नहीं थी. यह अलग बात है कि ऐसे विषयों पर अब तक कई फिल्में और धारावाहिक बन चुके हैं, जो काफी लोकप्रिय भी रहे. इस केस की स्क्रिप्ट चालाक अपराधियों ने इतनी सफाई से लिखी थी कि किसी को उन पर तनिक भी शक न हो. कहानी में दुर्घटना से ले कर मौत और मौत के बाद अंतिम संस्कार से ले कर भोग तक के हर दृश्य को बड़ी होशियारी और सफाई से लिखा गया था.

हिमाचल प्रदेश स्थित सिरमौर के काला अंब-पांवटा साहब हाइवे पर एक गांव है जुड्दा का जोहड़. वहां से 5 किलोमीटर दूर नवोदय स्कूल है. घटना 19-20 नवंबर, 2018 की रात की है. नवोदय स्कूल के पास एक कार, जिस का नंबर था पीबी65-3372, संतुलन खो कर पहले साइनबोर्ड से टकराई, फिर एक चट्टान से टकराने के बाद धूधू कर जलने लगी.

हादसे के वक्त कार की ड्राइविंग सीट पर एक व्यक्ति बैठा था. किसी ने फोन कर के इस की सूचना सिरमौर नाहन पुलिस को दी. फोन करने वाले ने एंबुलैंस को भी इस घटना की जानकारी दे कर तुरंत घटनास्थल पर पहुंचने का अनुरोध किया था.

जिस समय एंबुलैंस घटनास्थल पर पहुंची, तभी उन के फोन के वाट्सऐप पर किसी ने घटना से संबंधित एक वीडियो क्लिप भेजा, जिस में कार धूधू कर जलती नजर आ रही थी. सिरमौर पुलिस को भी ऐसा ही वीडियो भेजा गया था. इस के बाद यह वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया था.

बहरहाल, सूचना मिलते ही एसएचओ नाहन इंसपेक्टर विजय कुमार, एडीशनल एसएचओ योगिंदर सिंह और हवलदार जीरक व अमरिंदर के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. कार में सवार व्यक्ति पूरी तरह जल चुका था. आग इतनी भयानक लगी थी कि ड्राइवर को बाहर निकलने का मौका नहीं मिल पाया था. हालत देख कर ऐसा लग रहा था जैसे आग लगते ही कार का औटोमैटिक लौक लग गया हो.

कार में सवार व्यक्ति ऐसी स्थिति में नहीं था कि उसे उपचार के लिए अस्पताल पहुंचाया जाता. संभवत: जिंदा जलने से उस की मौत हो गई थी. कानूनी प्रक्रिया पूरी करने के लिए मृत व्यक्ति के कंकाल का पंचनामा बना कर पोस्टमार्टम के लिए नाहन मैडिकल कालेज अस्पताल भेजा गया.

घटना की जानकारी मिलते ही एसपी रोहित मालपानी, एडीशनल एसपी वीरेंदर ठाकुर, डीएसपी नाहन बबीता राणा सहित क्राइम टीम भी घटनास्थल पर पहुंच गई. कार को फोरैंसिक और मकैनिकल जांच के लिए पुलिस ने अपने कब्जे में ले लिया.

कार लगभग पूरी तरह से जल कर राख हो चुकी थी. तलाशी लेने पर कार के डैशबोर्ड की दराज से कार की जो आरसी मिली वो खरड़ निवासी नरिंदर कुमार पुत्र प्रताप सिंह के नाम थी. पुलिस ने कार दुर्घटना का मामला धारा 304, 279 के तहत दर्ज कर इस की सूचना पंजाब पुलिस को दे दी.

पंजाब पुलिस ने खरड़ जा कर जांच की, तो पता चला कार नरिंदर की ही थी, जो उस ने कुछ समय पहले डेराबस्सी निवासी आकाश को बेच दी थी. उस ने कार के पेपर अभी ट्रांसफर नहीं करवाए थे. आकाश डेराबस्सी का नामी बिल्डर था. दुर्घटना की सूचना जब उस के घर वालों को दी गई, तो उन्होंने मृतक की शिनाख्त आकाश के रूप में कर दी.

रहस्य बनी रही बर्निंग कार

पोस्टमार्टम के बाद मृतक की कंकालनुमा लाश उस के परिजनों के हवाले कर दी गई, जिस का उन्होंने अंतिम संस्कार भी कर दिया. पुलिस ने इसे दुर्घटना मान कर फाइल बंद कर दी. देखने को तो दुर्घटना के इस मामले का पटाक्षेप यहीं हो गया था, पर पिक्चर अभी बाकी थी.

इस कहानी का एक पहलू यह भी था कि दुर्घटना के 2 दिन बाद 22 नवंबर को ढोलपुर राजस्थान निवासी बबलू नामक एक युवक और उसकी मां ने थाना डेराबस्सी में अपने भाई राजू के गुमशुदा होने की रिपोर्ट दर्ज करवाई थी. बबलू के अनुसार उस का भाई आकाश नामक बिल्डर के पास काम करता था और हर समय उस के साथ ही रहता था.

बबलू ने अपने बयान में यह भी बताया कि आकाश के घर वालों के अनुसार आकाश की मृत्यु हो चुकी है. राजू को आखिरी बार आकाश के साथ ही देखा गया था. डेराबसी पुलिस ने राजू की गुमशुदगी दर्ज कर उस की तलाश शुरू कर दी. इसी सिलसिले में डेराबस्सी पुलिस ने सिरमौर पुलिस से भी संपर्क किया.

सिरमौर पुलिस ने पंजाब पुलिस को बताया कि कार एक्सीडेंट के समय कार में केवल एक ही व्यक्ति था.
इस जानकारी के बाद पुलिस को यह सोचने पर मजबूर होना पड़ा कि कार में जब अकेला आकाश था तो फिर हर वक्त उस के साथ रहने वाला राजू कहां गया? कहीं ऐसा तो नहीं कि कार में आकाश नहीं बल्कि राजू रहा हो. लेकिन राजू के भाई बबलू के अनुसार, राजू को कार चलाना नहीं आता था.

इस जानकारी के बाद सिरमौर और पंजाब पुलिस को यह मामला संदिग्ध लगने लगा. सिरमौर पुलिस ने मामले की तह तक जाने के लिए गुपचुप तरीके से जांच शुरू कर दी. मामले के संदिग्ध होने की एक वजह यह भी थी कि जलती कार का वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर भेजा गया था. उस वीडियो को भेजने वाला व्यक्ति कौन था?

साधारण मामला नहीं था

पुलिस अधिकारियों ने जब उस वीडियो को ध्यान से देखा तो पता चला कि एक कार चट्टान से टकराती है और फिर उस में आग लग जाती है. इस के बावजूद कार में सवार व्यक्ति बिना हिलेडुले चुपचाप बैठा रहता है. आग लगने पर ना तो वह तड़पता है और न ही कार से बाहर निकलने की कोशिश करता है. भला ऐसा कैसे हो सकता है कि कोई आदमी अपना बचाव किए बिना खामोशी से जल कर मौत को गले लगा ले. यह बात पुलिस के गले से नहीं उतरी.

इस बीच मृतक आकाश के घर वालों ने थाने आ कर आकाश के मृत्यु प्रमाण पत्र की मांग करनी शुरू कर दी. मृत्यु प्रमाणपत्र प्राप्त करने के मामले में उन्होंने इतनी जल्दी मचाई कि पुलिस को सोचना पड़ा. आखिर ऐसा क्या कारण है कि आकाश के घर वाले इतनी जल्दी कर रहे हैं. इस मामले में किसी षडयंत्र की बू आती दिखाई दे रही थी.

सिरमौर पुलिस ने इस केस में डेराबस्सी पुलिस से सहयोग मांगा और केस को महज दुर्घटना का साधारण मामला न समझ इस की तह तक जाने का निश्चय किया. एडीशनल एसपी वीरेंदर ठाकुर की देखरेख में एसएचओ इंसपेक्टर विजय कुमार ने इस केस की पुन: तफ्तीश शुरू करते हुए शहर में लगे उन तमाम सीसीटीवी कैमरों की फुटेज निकलवाई जो दुर्घटना वाली रात काम कर रहे थे. उस रात की फुटेज देखी गईं, तो कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं.

दुर्घटना वाली रात सैंट्रो एचआर03-3504 और मारुति पीबी65-डब्ल्यू 3372 नंबर की 2 कारें शहर में आगेपीछे चलती नजर आईं. ये कारें शहर में 2 बार देखी गईं. इन दोनों कारों ने पहले शहर का एक चक्कर काटा और फिर दूसरा चक्कर काटते हुए मौकाएवारदात की ओर निकल गईं. दोनों कारों में एकदो मिनट का अंतर था.

शक यकीन में तब बदला जब मारुति कार के पीछे सैंट्रो कार भी घटनास्थल पर गई. अब संदेह की कोई गुंजाइश नहीं रही थी. जलते वक्त आदमी छटपपटाता है, जान बचाने की लाख कोशिश करता है. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ था. आकाश के घर वालों द्वारा मृत्यु प्रमाण पत्र मांगने की जल्दी करना, स्वयं घटनास्थल का वीडियो बना कर वायरल करना, एक सोचीसमझी साजिश का हिस्सा लग रहा था.
इंसपेक्टर विजय कुमार ने इस मामले के तमाम पुख्ता सबूत इकट्ठा कर के 3 दिसंबर को डेराबस्सी से आकाश के भतीजे रवि को हिरासत में ले लिया. रवि की गिरफ्तारी के बाद इस मामले की परतें खुदबखुद खुलती चली गईं.

इस षडयंत्र का मुख्य आरोपी विदेश भागने की फिराक में था, इसलिए उस की गिरफ्तारी से पहले रवि की गिरफ्तारी को भी परदे में रखा गया. पूछताछ के दौरान रवि ने पुलिस को बताया कि कार में जलने वाला आकाश नहीं था. आकाश नेपाल के रास्ते विदेश जाने वाला था.

50 लाख का बीमा लेने के लिए रचा षडयंत्र 

खास मुखबिरों से इंसपेक्टर विजय को खबर मिली कि आकाश रेल मार्ग से नेपाल जाने वाला है. इस मामले में नाहन पुलिस ने रेलवे पुलिस की मदद से अपना जाल बिछा दिया और आकाश को ट्रेन में सफर करते हुए हरियाणा के पलवल से गिरफ्तार कर लिया गया. पुलिस ने आकाश और रवि को अदालत में पेश कर पूछताछ के लिए रिमांड पर ले लिया. पूछताछ के दौरान इस बर्निंग कार मामले की पूरी कहानी सामने आ गई. आकाश अपने भतीजे के साथ मिल कर खुद को मरा हुआ साबित करना चाहता था ताकि 50 लाख की बीमा राशि उस के घर वालों को मिल जाए.

योजना को कार दुर्घटना का जामा पहना कर आकाश ने अपने नौकर राजू को जिंदा जला दिया था. जबकि उस की मां और भाई राजू की तलाश में दरदर की ठोकरें खाते भटक रहे थे.

पैसों के लालच में मानवीय संवेदनाएं भुला कर पेशे से ठेकेदार आकाश इतने वहशीपन पर उतर आया था कि उस ने अपने ही मजदूर राजू को जिंदा जला कर ऐसी दर्दनाक मौत दी, जिसे देखना तो दूर सुनने वाले की भी रूह कांप जाए.

बड़ेबड़े ठेकेदारों के साथ ठेकेदारी करने वाले आकाश ने अपनी मौत की ही नहीं, बल्कि अपने क्रियाकर्म तक की स्क्रिप्ट खुद लिखी थी. इस स्क्रिप्ट के अनुसार उस के घर वालों ने बाकायदा उस के अंतिम संस्कार से ले कर उस की तेरहवीं पर क्रियाकर्म का खाना खिलाने तक बखूबी भूमिका निभाई थी. पुलिस अब इस बात की भी जांच करेगी कि इस मामले में उस के घर वालों का भी हाथ था या नहीं?

बीमा राशि डकारने के लिए आकाश ने पहले अपने नौकर राजू को जम कर शराब पिलाई थी. इस के बाद जब वह नशे में बेसुध हो गया तो रवि और आकाश ने मिल कर आकाश के कपड़े राजू को पहना दिए. साथ ही अपनी अंगूठी और ब्रैसलेट भी राजू के हाथ में पहना दिया, ताकि पुलिस उसे आकाश समझे.

इस के बाद आकाश कार में काला अंब-पांवटा सड़क पर जुड्दा का जोहड़ के पास पहुंचा और तारपीन का तेल छिड़क कर कार को आग लगा दी. शातिरों ने हत्या की वारदात को दुर्घटना का रूप देने के लिए बाकायदा जलती कार का वीडियो बना कर खुद ही वायरल कर दिया था.

बेचारा गरीब मजदूर मारा गया

राजस्थान का राजू आकाश के पास बतौर मजदूर काम करता था. लेकिन मेहनतमजदूरी कर अपना और अपने परिवार का भरणपोषण करने आए राजू को शायद इस बात का तनिक भी इल्म नहीं था कि जिस के पास वह काम करता है वही उसे ऐसी दर्दनाक मौत देगा.

उधर रोरो कर बुरा हाल करती राजू की मां का कहना था कि उस ने जिगर के टुकड़े को पालपोस कर बड़ा किया. पढ़ायालिखाया. वह पैसा कमाने के लिए पंजाब चला आया था. लेकिन बुढ़ापे में सहारा बनने वाला बेटा मिलना तो दूर मां को उस के अंतिम दर्शन भी नहीं हो सके. अपने दिल के टुकड़े के खोने से वह भीतर तक टूट चुकी थी.

सिरमौर पुलिस की सूचना के बाद मृतक राजू की मां और भाई बबलू नाहन पुलिस के बुलावे पर नाहन गए. पुलिस ने दोनों से राजू के बारे में जानकारी ली और जली हुई कार से बरामद मृतक राजू के शरीर के कुछ अंशों का डीएनए करवाने के लिए उस की मां और भाई के ब्लड सैंपल लिए. डीएनए मैच होने के बाद वैज्ञानिक तौर पर यह पुष्टि हो पाएगी कि मृतक राजू ही था.

इस मामले में हैरान करने वाली बात यह भी थी कि बर्निंग कार हत्याकांड की स्क्रिप्ट पहले ही लिखी जा चुकी थी. पर सवाल यह था कि वारदात को अंजाम देने के लिए सिरमौर ही क्यों चुना गया था.

दरअसल स्क्रिप्ट के लेखकों को ऐसा स्थान चाहिए था, जहां कार को न्यूट्रल करने के बाद आग लगाई जा सके. यह सुनसान स्थान नाहन से 5 किलोमीटर की दूरी पर था.

इस बर्निंग कार हत्याकांड के मामले से लगभग एक दशक पूर्व हुए सूटकेस कांड की भी यादें जुड़ी हुई है. 10 वर्ष पहले इसी इलाके में सूटकेस कांड हुआ था. पुलिस को यहीं पर एक महिला और एक बच्ची की लाशें 2 अलगअलग सूटकेसों में बंद मिली थीं. यह मामला अभी तक अनसुलझा है.

इस मामले में पुलिस काररवाई पूरी करने के बाद 12 दिसंबर को दोनों दोषियों को अदालत में पेश कर न्यायिक हिरासत में जिला जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें