रश्मि की मौत : शराबी ड्राइवर को छोड़ने की सजा

Social Story in Hindi: सुबह के 7 बजे थे. गाड़ियां सड़क पर सरपट दौड़ रही थीं. ट्रैफिक इंस्पैक्टर बलविंदर सिंह सड़क के किनारे एक फुटओवर ब्रिज के नीचे अपने साथी हवलदार मनीष के साथ कुरसी पर बैठा हुआ था. उस की नाइट ड्यूटी खत्म होने वाली थी और वह अपनी जगह नए इंस्पैक्टर के आने का इंतजार कर रहा था. बलविंदर सिंह ने हाथमुंह धोया और मनीष से बोला, ‘‘भाई, चाय पिलवा दो.’’ मनीष उठा और सड़क किनारे एक रेहड़ी वाले को चाय की बोल कर वापस आ गया. तुरंत ही चाय भी आ गई. दोनों चाय पीते हुए बातें करने लगे. बलविंदर सिंह ने कहा, ‘‘अरे भाई, रातभर गाडि़यों के जितने चालान हुए हैं, जरा उस का हिसाब मिला लेते.’’

मनीष बोला, ‘‘जनाब, मैं ने पूरा हिसाब पहले ही मिला लिया है.’’

इसी बीच बलविंदर सिंह के मोबाइल फोन की घंटी बजी. वह बड़े मजाकिया अंदाज में फोन उठा कर बोला, ‘‘बस, निकल रहा हूं. मैडम, सुबहसुबह बड़ी फिक्र हो रही है…’’

अचानक बलविंदर सिंह के चेहरे का रंग उड़ गया. वह हकलाते हुए बोला, ‘‘मनीष… जल्दी चल. रश्मि का ऐक्सिडैंट हो गया है.’’

दोनों अपनाअपना हैलमैट पहन तेजी से मोटरसाइकिल से चल दिए.

दरअसल, रश्मि बलविंदर सिंह की 6 साल की एकलौती बेटी थी. उस के ऐक्सिडैंट की बात सुन कर वह परेशान हो गया था. उस के दिमाग में बुरे खयाल आ रहे थे और सामने रश्मि की तसवीर घूम रही थी.

बीच रास्ते में एक ट्रक खराब हो गया था, जिस के पीछे काफी लंबा ट्रैफिक जाम लगा हुआ था. बलविंदर सिंह में इतना सब्र कहां… मोटरसाइकिल का सायरन चालू किया, फुटपाथ पर मोटरसाइकिल चढ़ाई और तेजी से जाम से आगे निकल गया.

अगले 5 मिनट में वे दोनों उस जगह पर पहुंच गए, जहां ऐक्सिडैंट हुआ था.

बलविंदर सिंह ने जब वहां का सीन देखा, तो वह किसी अनजान डर से कांप उठा. एक सफेद रंग की गाड़ी आधी फुटपाथ पर चढ़ी हुई थी. गाड़ी के आगे के शीशे टूटे हुए थे. एक पैर का छोटा सा जूता और पानी की लाल रंग की बोतल नीचे पड़ी थी. बोतल पिचक गई थी. ऐसा लग रहा था कि कुछ लोगों के पैरों से कुचल गई हो. वहां जमीन पर खून की कुछ बूंदें गिरी हुई थीं. कुछ राहगीरों ने उसे घेरा हुआ था.

बलविंदर सिंह भीड़ को चीरता हुआ अंदर पहुंचा और वहां के हालात देख सन्न रह गया. रश्मि जमीन पर खून से लथपथ बेसुध पड़ी हुई थी. उस की पत्नी नम्रता चुपचाप रश्मि को देख रही थी. नम्रता की आंखों में आंसू की एक बूंद नहीं थी.

बलविंदर सिंह के पैर नहीं संभले और वह वहीं रश्मि के पास लड़खड़ा कर घुटने के बल गिर गया. उस ने रश्मि को गोद में उठाने की कोशिश की, लेकिन रश्मि का शरीर तो बिलकुल ढीला पड़ चुका था.

बलविंदर सिंह को यह बात सम  झ में आ गई कि उस की लाड़ली इस दुनिया को छोड़ कर जा चुकी है. उसे ऐसा लगा, जैसे किसी ने उस का कलेजा निकाल लिया हो.

बलविंदर सिंह की आंखों के सामने रश्मि की पुरानी यादें घूमने लगीं.

अगर वह रात के 2 बजे भी घर आता, तो रश्मि उठ बैठती, पापा के साथ उसे रोटी के दो निवाले जो खाने होते थे. वह तोतली जबान में कविताएं सुनाती, दिनभर की धमाचौकड़ी और मम्मी के साथ झगड़ों की बातें बताती, लेकिन अब वह शायद कभी नहीं बोलेगी. वह किस के साथ खेलेगा? किस को छेड़ेगा?

बलविंदर सिंह बच्चों की तरह फूटफूट कर रोने लगा. कोई है भी तो नहीं, जो उसे चुप करा सके. नम्रता वैसे ही पत्थर की तरह बुत बनी बैठी हुई थी.

हलवदार मनीष ने डरते हुए बलविंदर सिंह को आवाज लगाई, ‘‘सरजी, गाड़ी के ड्राइवर को लोगों ने पकड़ रखा है… वह उधर सामने है.’’

बलविंदर सिंह पागलों की तरह उस की तरफ झपटा, ‘‘कहां है?’’

बलविंदर सिंह की आंखों में खून उतर आया था. ऐसा लगा, जैसे वह ड्राइवर का खून कर देगा. ड्राइवर एक कोने में दुबका बैठा हुआ था. लोगों ने शायद उसे बुरी तरह से पीटा था. उस के चेहरे पर कई जगह चोट के निशान थे.

बलविंदर सिंह तकरीबन भागते हुए ड्राइवर की तरफ बढ़ा, लेकिन जैसेजैसे वह ड्राइवर के पास आया, उस की चाल और त्योरियां धीमी होती गईं. हवलदार मनीष वहीं पास खड़ा था, लेकिन वह ड्राइवर को कुछ नहीं बोला.

बलविंदर सिंह ने बेदम हाथों से ड्राइवर का कौलर पकड़ा, ऐसा लग रहा था, जैसे वह चाह कर भी कुछ नहीं कर पा रहा हो.

दरअसल, कुछ समय पहले ही बलविंदर सिंह का सामना इस शराबी ड्राइवर से हुआ था.

सुबह के 6 बजे थे. बलविंदर सिंह सड़क के किनारे उसी फुटओवर ब्रिज के नीचे कुरसी पर बैठा हुआ था. थोड़ी देर में मनीष एक ड्राइवर का हाथ पकड़ कर ले आया. ड्राइवर ने शराब पी रखी थी और अभी एक मोटरसाइकिल वाले को टक्कर मार दी थी.

मोटरसाइकिल वाले की पैंट घुटने के पास फटी हुई थी और वहां से थोड़ा खून भी निकल रहा था.

बलविंदर सिंह ने ड्राइवर को एक जोरदार थप्पड़ मारा था और चिल्लाया, ‘सुबहसुबह चढ़ा ली तू ने… दूर से ही बदबू मार रहा है.’

ड्राइवर गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘साहब, गलती हो गई. कल इतवार था. रात को दोस्तों के साथ थोड़ी पार्टी कर ली. ड्यूटी पर जाना है, घर जा रहा हूं. मेरी गलती नहीं है. यह एकाएक सामने आ गया.’

बलविंदर सिंह ने फिर थप्पड़ उठाया था, लेकिन मारा नहीं और जोर से चिल्लाया, ‘क्यों अभी इस की जान चली जाती और तू कहता है कि यह खुद से सामने आ गया. दारू तू ने पी रखी

है, लेकिन गलती इस की है… सही है…मनीष, इस की गाड़ी जब्त करो और थाने ले चलो.’

ड्राइवर हाथ जोड़ते हुए बोला था, ‘साहब, मैं मानता हूं कि मेरी गलती है. मैं इस के इलाज का खर्चा देता हूं.’

ड्राइवर ने 5 सौ रुपए निकाल कर उस आदमी को दे दिए. बलविंदर सिंह ने फिर से उसे घमकाया भी, ‘बेटा, चालान तो तेरा होगा ही और लाइसैंस कैंसिल होगा… चल, लाइसैंस और गाड़ी के कागज दे.’

ड्राइवर फिर गिड़गिड़ाया था, ‘साहब, गरीब आदमी हूं. जाने दो,’ कहते हुए ड्राइवर ने 5 सौ के 2 नोट मोड़ कर धीरे से बलविंदर सिंह के हाथ पर रख दिए.

बलविंदर सिंह ने उस के हाथ में ही नोट गिन लिए और उस की त्योरियां थोड़ी कम हो गईं.

वह झूठमूठ का गुस्सा करते हुए बोला था, ‘इस बार तो छोड़ रहा हूं, लेकिन अगली बार ऐसे मिला, तो तेरा पक्का चालान होगा.’

ड्राइवर और मोटरसाइकिल सवार दोनों चले गए. बलविंदर सिंह और मनीष एकदूसरे को देख कर हंसने लगे. बलविंदर बोला, ‘सुबहसुबह चढ़ा कर आ गया.’

मनीष ने कहा, ‘जनाब, कोई बात नहीं. वह कुछ दे कर ही गया है.’ वे दोनों जोरजोर से हंसे थे.

अब बलविंदर सिंह को अपनी ही हंसी अपने कानों में गूंजती हुई सुनाई दे रही थी और उस ने ड्राइवर का कौलर छोड़ दिया. उस का सिर शर्म से झुका हुआ था.

बलविंदर और मनीष एकदूसरे की तरफ नहीं देख पा रहे थे. वहां खड़े लोगों को कुछ समझ नहीं आया कि क्या हुआ है, क्यों इन्होंने ड्राइवर को छोड़ दिया.

मनीष ने पुलिस कंट्रोल रूम में एंबुलैंस को फोन कर दिया. थोड़ी देर में पीसीआर वैन और एंबुलैंस आ कर वहां खड़ी हो गई.

पुलिस वालों ने ड्राइवर को पकड़ कर पीसीआर वैन में बिठाया. ड्राइवर एकटक बलविंदर सिंह की तरफ देख रहा था, पर बलविंदर सिंह चुपचाप गरदन नीचे किए रश्मि की लाश के पास आ कर बैठ गया. उस के चेहरे से गुस्से का भाव गायब था और आत्मग्लानि से भरे हुए मन में तरहतरह के विचारों का बवंडर उठा, ‘काश, मैं ने ड्राइवर को रिश्वत ले कर छोड़ने के बजाय तत्काल जेल भेजा होता, तो इतना बड़ा नुकसान नहीं होता.’

ऐसा प्यार कहां : क्या रेशमा ही पवन की गीता थी

Romantic Story in Hindi: पवन जमीन पर अपने दोनों हाथों को सिर पर रखे हुए ऊकड़ू बैठा था. वह अचरज भरी निगाहों से देखता कि कैसे जयपुर की तेज रफ्तार में सभी अपनी राह पर सरपट भागे जा रहे थे. अचानक एक गरीब लड़का, जो भीख मांग रहा था, एक गाड़ी के धक्के से गिर गया. मगर उस की तरफ मुड़ कर देखने की जहमत किसी ने नहीं उठाई. थोड़ी देर तक तो उस लड़के ने इधरउधर देखा कि कोई उस की मदद करने आएगा और सहारा दे कर उठाएगा, मगर जब कोई मदद न मिली तो वह खुद ही उठ खड़ा हुआ और आगे बढ़ गया. उस लड़के को देख पवन ने कुछ देर सोचा और फिर उठ कर सामने रखी बालटी के पानी से मुंह धोया और जेब से कंघी निकाल कर बालों को संवारा.

तभी चाय की दुकान पर बैठे एक बुजुर्ग आदमी बोले, ‘‘पवन, तुम यहां 2 महीने से चक्कर काट रहे हो. देखो जरा, तुम ने अपना क्या हाल बना रखा है. तुम्हारा शरीर भी कपड़े की तरह मैला हो गया है. यह जयपुर है बेटा, यहां तो सिर्फ पैसा बोलता है. तुम जैसे गांव से आए हुए अनपढ़ और गरीब आदमी की बात कौन सुनेगा. मेरी बात मानो और तुम अपने गांव लौट जाओ.’’

‘‘काका, मुझे किसी की जरूरत नहीं है. मैं अपनी पत्नी को खुद ही ढूंढ़ लूंगा,’’ पवन ने कहा.

‘‘यह हुई न हीरो वाली बात… यह लो गरमागरम चाय,’’ रमेश चाय वाला बोला.

चाय की दुकान और रमेश ही पवन का ठिकाना थे. उस का सारा दिन थाने के चक्कर काटने में बीतता और रात होते ही वह इसी दुकान की बैंच को बिस्तर बना कर सो जाता. वह तो रमेश चाय वाला भला आदमी था जो उसे इस तरह पड़ा रहने देता था और कभी उस पर दया आ जाती तो चायबिसकुट भी दे देता.

अकेले में पवन को उदासी घेर लेती थी. हर दिन जब वह सुबह उठता तो सोचता कि आज तो गीता उस के साथ होगी, मगर उसे नाकामी ही हाथ लगती.

उस दिन की घटना ने तो पवन को एकदम तोड़ दिया था. लंबे समय तक हर जगह की खाक छानने के बाद उसे एक घर में गीता सफाई करते हुए मिली तो उस की खुशी का ठिकाना ही न रहा. वह भाग कर गीता से लिपट गया.

गीता की आंखों में भी पानी आ गया था. तभी गार्ड आ गया और उन दोनों को अलग कर के पवन को धक्के मार कर बाहर कर दिया.

बेचारा पवन बहुत चिल्लाया, ‘यह मेरी गीता है… गीता… गीता… तुम घबराना नहीं, मैं तुम्हें यहां से ले जाऊंगा,’ मगर आधे शब्द उस की जबान से बाहर ही न आ पाए कि कोई भारी चीज उस के सिर पर लगी और वह बेहोश हो गया.

आंखें खुलीं तो देखा कि पवन की जिंदगी की तरह बाहर भी स्याह अंधेरा फैल गया. किसी तरह अपने लड़खड़ाते कदमों से पुलिस स्टेशन जा कर वह मदद की गुहार लगाने लगा और थकहार कर वहीं सड़क किनारे सो गया.

सुबह होते ही पवन फिर पुलिस स्टेशन जा पहुंचा, तभी उन में से एक पुलिस वाले को उस की हालत पर तरस आ गया. वह बोला, ‘‘ठीक है, मैं तुम्हारे कहने पर चलता हूं, पर यह बात झूठ नहीं होनी चाहिए.’’

पुलिस को ले कर पवन उसी घर में पहुंचा और गीता के बारे में पूछा. वहां के मालिक ने कहा, ‘हमारे यहां गीता नाम की कोई लड़की काम नहीं करती.’

‘आप उसे बुलाएं. हम खुद ही उस से बात करेंगे,’ हवलदार ने डंडा लहराते हुए रोब से कहा.

अंदर से डरीसहमी एक लड़की आई. उसे देखते ही पवन चिल्लाया, ‘साहब, यही मेरी गीता है. गीता, तुम डरना नहीं, इंस्पैक्टर साहब को सबकुछ सचसच बता दो.’

‘क्या नाम है तेरा?’

‘साहब, मेरा नाम सपना है.’

‘क्या यह तुम्हारा पति है?’

‘नहीं साहब, मैं तो इसे जानती तक नहीं हूं.’

पवन भौचक्का सा कभी गीता को तो कभी पुलिस वाले को देखता रहा.

तभी पुलिस वाला बोला, ‘सौरी सर, आप को तकलीफ हुई.’

सभी लोग बाहर आ गए.

पवन कहता रहा कि वह उस की पत्नी है, पर किसी ने उस की न सुनी. सब उस से शादी का सुबूत मांगते रहे, पर वह गरीब सुबूत कहां से लाता.

‘‘पवन… ओ पवन, कल मेरी दुकान में एक मैडम आई थीं,’’ रमेश चाय वाले की यह बात सुन कर पवन अपने दिमाग में चल रही उथलपुथल से बाहर आ गया. वह अपना सिर खुजलाते हुए बोला, ‘‘हां, बोलो.’’

तभी रमेश चाय वाले ने उसे चाय का गरमागरम प्याला पकड़ाते हुए कहा, ‘‘कल मेरी दुकान में एक मैडम आई थीं और वे गीता जैसी लड़कियों की मदद के लिए एनजीओ चलाती हैं. हो सकता है कि वे हमारी कुछ मदद कर सकें.’’

थोड़ी देर बाद ही वे दोनों मैडम के सामने बैठे थे. मैडम ने पूछा, ‘‘उस ने तुम्हें पहचानने से क्यों मना कर दिया? अपना नाम गलत क्यों बताया?’’

‘‘मैडम, मैं ने गीता की आंखों से लुढ़कता हुआ प्यार देखा था. उन लोगों ने जरूर मेरी गीता को डराया होगा.’’

‘‘अच्छा ठीक है, तुम शुरू से अपना पूरा मामला बताओ.’’

यह सुन कर पवन उन यादों में खो गया था, जब गीता से उस की शादी हुई थी. दोनों अपनी जिंदगी में कितना खुश थे. सुबह वह ट्रैक्टर चलाने ठाकुर के खेतों में चला जाता और शाम होने का इंतजार करता कि जल्दी से गीता की बांहों में खो जाए.

इधर गीता घर पर मांबाबूजी को पहले ही खाना खिला देती और पवन के आने पर वे दोनों साथ बैठ कर खाना खाते और फिर अपने प्यार के पलों में खो जाते.

मगर कुछ दिनों से पवन परेशान रहने लगा था. गीता के बहुत पूछने पर वह बोला, ‘पहले मैं इतना कमा लेता था कि 3 लोगों का पेट भर जाता था, पर अब 4 हो गए और कल को 5 भी होंगे. बच्चों की परवरिश भी तो करनी होगी. सोचता हूं कि शहर जा कर कोई कामधंधा करूं. कुछ ज्यादा आमदनी हो जाएगी और वहां कोई कामकाज भी सीख लूंगा. उस के बाद गांव आ कर एक छोटी सी दुकान खोल लूंगा.’

‘आप के बिना तो मेरा मन ही नहीं लगेगा.’

‘क्या बात है…’ पवन ने शरारत भरे अंदाज में गीता से पूछा तो गीता भी शरमा गई और दोनों अपने भविष्य के सपने संजोते हुए सो गए.

कुछ दिनों बाद वे दोनों शहर आ गए. वहां उन्हें काम ढूंढ़ने के लिए ज्यादा परेशान नहीं होना पड़ा. जल्दी ही एक जगह काम और सिर छिपाने की जगह मिल गई. रोजमर्रा की तरह जिंदगी आगे बढ़ने लगी.

पवन को लगा कि गीता से इतनी मेहनत नहीं हो पा रही है तो उस ने उस का काम पर जाना बंद करा दिया. वैसे भी फूल सी नाजुक और खूबसूरत लड़की ईंटपत्थर ढोने के लिए नहीं बनी थी.

अभी बमुश्किल एक हफ्ता ही बीता था कि जहां पवन काम करता था वहां उस दिन बहुत कम लोग आए थे. वहां के मालिक ने पूछा, ‘क्या हुआ पवन, आजकल तेरी घरवाली काम पर नहीं आ रही है?’

पवन ने अपनी परेशानी बताई तो मालिक बोले, ‘कुछ दिनों से मेरे घर पर कामवाली बाई नहीं आ रही है, अगर तुम चाहो तो तुम्हारी घरवाली हमारे यहां काम कर सकती है और तुम इस काम के अलावा हमारी कोठी में माली का काम भी कर लो.’

पवन को जैसे मनचाहा वरदान मिल गया. सोचा कि इस से पैसा भी आएगा और गीता इस काम को कर भी पाएगी. उस ने गीता को बताया तो वह खुशीखुशी राजी हो गई.

इस तरह कुछ महीने आराम से बीत गए. कुछ ही समय में उन्होंने अपना पेट काट कर काफी पैसे इकट्ठा कर लिए थे और अकसर ही बैठ कर बातें करते कि अब कुछ ही समय में अपने गांव लौट जाएंगे.

मगर वे दोनों अपने ऊपर आने वाले खतरे से अनजान थे. गीता जहां काम करती थी, उन के ड्राइवर की नजर गीता पर थी. उधर मालकिन को गीता का काम बहुत पसंद था. वे अकसर पूरा घर गीता के भरोसे छोड़ कर चली जाती थीं.

रोज की तरह एक दिन पवन जब गीता को लेने पहुंचा और बाहर खड़ा हो कर इंतजार करने लगा. तभी ड्राइवर ने उसे साजिशन अंदर जाने के लिए कहा.

डरतेडरते पवन ने ड्राइंगरूम में पैर रखा तभी गीता आ गई और वे दोनों घर चले गए.

सुबह जब दोनों जैसे ही काम पर निकलने लगे कि देखा, मालिक पुलिस को लिए उन के दरवाजे पर खड़े थे.

‘क्या हुआ?’

‘इंस्पैक्टर, गिरफ्तार कर लो इसे.’

पुलिस ने पवन को पकड़ लिया तो उस ने पूछा, ‘मगर, मेरा कुसूर क्या है?’

‘जब तुम कल इन के घर गए थे तब तुम ने इन के घर से पैसे चुराए थे.’

वे दोनों बहुत समझाते रहे कि ऐसा नहीं है, मगर उन गरीबों की बात किसी ने नहीं सुनी और पवन को 2 महीने की सजा हो गई.

उधर गीता को मालिक ने घर से निकाल दिया. उस का तो बस एक ही ठिकाना रह गया था, वह बरसाती वाला घर और पवन की यादें.

उधर पवन के खिलाफ कोई पुख्ता सुबूत न होने के चलते कोर्ट ने उसे 2 महीने बाद निजी मुचलके पर छोड़ दिया.

जब पवन जेल से बाहर आया तो सीधे अपने घर गया, मगर वहां गीता का कोई अतापता नहीं था.

आसपास पूछने पर भी कोई बताने को तैयार नहीं हुआ. मगर उसी जगह काम करने वाली एक बुजुर्ग औरत को दया आ गई, ‘बेटा, मैं तुम्हें सबकुछ बताती हूं. तुम जब जेल में थे, उसी दौरान गीता के पास न कोई सहारा, न ही कोई काम रह गया था. तभी यहां के एक ठेकेदार ने उसे अपने घर के कामकाज के लिए रख लिया, क्योंकि वह अकेला रहता था.

‘तन और मन से टूटी गीता की मदद करने के बहाने वह करीब आने लगा. पहले तो वह मन से पास आया, फिर धीरेधीरे दोनों तन से भी करीब आ गए. गीता को अकसर उस के साथ बनसंवर कर घूमते देखा गया.

‘अब तुम्हीं बताओ, कोई अपनी काम वाली के साथ ऐसे घूमता है क्या? मैं ने तो यहां तक सुना है कि काम करतेकरते उस के साथ सोने भी लगी थी. अब इतनी बला की खूबसूरत लड़की के साथ यही तो होगा.

‘जब लोगों ने बातें करना शुरू कर दिया तो एक दिन रात के अंधेरे में सारा सामान ले कर चली गई. पर कुछ समय पहले ही मुझे बाजार में मिली थी. कह रही थी कि यहीं कालोनी के आसपास घरों में काम करती है.’

यह सब सुन कर पवन को बहुत दुख हुआ, पर उन की कही किसी बात पर उसे यकीन नहीं हुआ.

इतना जानने के बाद एनजीओ वाली मैडम ने पवन से आगे की कहानी पूछी.

पवन ने कहा, ‘‘मैं उसे ढूंढ़ता हुआ वहां पहुंच ही गया. मैं ने गीता को एक घर के अंदर जाते हुए देखा. उस ने पहचानने से मना कर दिया,’’ और पवन की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे.

‘‘यह लो पवन, पानी पी लो,’’ मैडम ने कहा, ‘‘तुम ने उस से दोबारा मिलने की कोशिश क्यों नहीं की?’’

‘‘आप को क्या लगता है कि मैं ने उस से मिलने की कोशिश नहीं की होगी. पुलिस का कहना है कि जब तक तू शादी का सुबूत नहीं लाता तब तक उस घर क्या गली में भी दिखाई दिया तो तुझे फिर से जेल में डाल देंगे.

‘‘मैं गरीब कहां से शादी का सुबूत लाऊं? मेरी शादी में तो एक फोटो तक नहीं खिंचा था.’’

‘‘ठीक है पवन, हम तुम्हारी जरूर मदद करेंगे,’’ मैडम ने कहा.

कुछ दिन बाद वे मैडम पवन और पुलिस को साथ ले कर गीता से मिलने गई और वहां जा कर पूछा कि आप के यहां गीता काम करती?है क्या?

उन लोगों में से एक ने एक बार में ही सच बयां कर दिया, ‘‘गीता ही हमारे यहां काम करती थी, मगर उस ने अपना नाम सपना क्यों बताया, यह हम नहीं जानते. जिस दिन पवन पुलिस को ले कर आया था. उसी दिन से वह बिना बताए कहीं चली गई और कभी वापस भी नहीं आई.’’

‘‘मैडम, ये सब झूठ बोल रहे हैं. आप इन के घर की तलाशी लीजिए.’’

मगर गीता सचमुच जा चुकी थी. तभी पुलिस ने गार्ड से पूछा, ‘‘क्या तुम ने गीता को जाते हुए देखा था?’’

‘‘हां साहब… उसी दिन रात 10 बजे के आसपास उसे ड्राइवर से बातें करते हुए देखा था.’’

पुलिस ने उत्सुकतावश पूछा, ‘‘कौन सा ड्राइवर?’’

गार्ड बोला, ‘‘साहब, जहां वह पहले काम करती थी वहीं का कोई ड्राइवर अकसर उस से मिलने आताजाता था.’’

पुलिस ने ड्राइवर का पताठिकाना निकाला. पहले तो उस ने मना कर दिया कि वह गीता को नहीं जानता, पर जब सख्ती की गई तो ड्राइवर ने पुलिस को बताया, ‘‘गीता इस घर के पास ही एक और घर में काम करती थी. उस का वहां के आदमी से अफेयर था. वह आदमी गीता की मजबूरी का फायदा उठाता रहा. उस के उस से नाजायज संबंध थे. उस ने तो गीता को अपने ही मकान में एक छोटा कमरा भी दे रखा था.

‘‘रोजाना गहरी होती हर रात को शराब के नशे में धुत्त वह गीता पर जबरदस्ती करता था. गीता चाहती तो गांव वापस जा सकती थी, पर वहां गांव में कुनबे के लिए रोटी बनाने से बेहतर काम उसे यह सब करना ज्यादा अच्छा लगने लगा था, क्योंकि उसे तो पाउडर और लिपस्टिक से लिपेपुते शहरी चेहरे की आदत हो गई थी.

‘‘मगर जब प्रेमी का मन भर गया और उस में कोई रस नहीं दिखाई देने लगा तो एक दिन चुपचाप अपने घर में ताला लगा कर चला गया.

‘‘जब वह 2-4 दिन बाद भी वापस नहीं आया तो गीता ने उस बन रही बिल्डिंग में जा कर उसे ढूंढ़ा लेकिन वहां पर भी उसे निराशा ही हाथ लगी. उस के रहने का ठिकाना भी न रहा.

‘‘उस के जाने के बाद अपनी जरूरतों को पूरा करने के लिए वह देह धंधे में उतर गई.’’

इतना सुनते ही पवन के होश उड़ गए और वह अपने उस दिन के फैसले पर पछताने लगा कि वे दोनों शहर क्यों आए थे. लेकिन पवन अच्छी तरह जानता था कि ऐसी औरतों के ठिकाने कहां होते हैं.

कुछ दिनों में पुलिस ने फौरीतौर पर छानबीन कर फाइल भी बंद कर दी और मैडम ने भी हार मान ली.

वे पवन को समझाने लगीं, ‘‘उस दुनिया में जाने के बाद सारे प्यार और जज्बात मर जाते हैं. वहां से कोई वापस नहीं आता. जब हम और पुलिस मिल कर कुछ नहीं कर पाए तो तुम अकेले क्या कर पाओगे? अच्छा होगा कि तुम भी गांव वापस चले जाओ और नई जिंदगी शुरू करो.’’

पर, पवन पर तो जैसे भूत सवार था. वह अपनी गीता को किसी भी कीमत पर पाना चाहता था. वह सारा दिन काम करता और रातभर रैडलाइट एरिया में भटकता रहता.

इसी तरह कई महीने बीत गए, मगर उस ने हार नहीं मानी. एक दिन रात को ढूंढ़ते हुए उस की निगाह ऊपर छज्जे पर खड़ी लड़की पर पड़ी. चमकीली साड़ी, आंखों पर भरपूर काजल, होंठो पर चटक लाल रंग की लिपस्टिक और उस पर से अधखुला बदन. अपने मन को मजबूत कर उस ने उस से आंखें मिलाने की हिम्मत की तो देखा कि तो गीता थी.

पवन दूसरे दिन मैडम को ले कर रैडलाइट एरिया के उसी मकान पर गया और लकड़ी की बनी सीढ़ियों के सहारे झटपट ऊपर पहुंचा और बोला, ‘‘गीता, तुम यहां…’’ और यह कहते हुए उस के करीब जाने लगा, तभी उस ने उसे झटक कर दूर किया और कहा, ‘‘मैं रेशमा हूं.’’

पवन बोला, ‘‘मैं अब तुम्हारी कोई बात नहीं मानूंगा. तुम मेरी गीता हो… केवल मेरी… गीता घर लौट चलो… मैं तुझ से बहुत प्यार करता हूं, मैं तुम्हें वह हर खुशी दूंगा जो तुम चाहती हो. अब और झूठ मत बोलो.

‘‘मैं जानता हूं कि तुम गीता हो, तुम अपने पवन के पास वापस लौट आओ. तुझे उस प्यार की कसम जो शायद थोड़ा भी कभी तुम ने किया हो. यहां पर तुम्हारा कोई नहीं है. सब जिस्म के भूखे हैं. चंद सालों में यह सारी चमक खत्म हो जाएगी.’’

गीता भी चिल्लाते हुए बोली, ‘‘पवन, मैं चाह कर भी तुम्हारे साथ नहीं चल सकती. तुम्हारी गीता उसी दिन मर गई थी जिस दिन उस ने यहां कदम रखा था. तुम समझने की कोशिश क्यों नहीं करते हो कि मैं गंदी हो चुकी हूं.’’

पवन उस के और करीब जा कर उस का चेहरा अपने हाथों में ले कर बोला, ‘‘तुम औरत नहीं, मेरी पत्नी हो, तुम कभी गंदी नहीं हो सकती. जहां वह रहती है वो जगह पवित्र हो जाती है, तुम यहां से निकलने की कोशिश तो करो. मैं तुम्हारे साथ हूं. तुम्हारा पवन सबकुछ भुला कर नई जिंदगी की शुरुआत करना चाहता है.’’

गीता भी शायद कहीं न कहीं इस जिंदगी से तंग आ चुकी थी. पवन की बातों से वह जल्दी ही टूट गई. वे दोनों एकदूसरे से लिपट गए और फफक कर रो पड़े. पवन और गीता अपनी नई जिंदगी की शुरुआत करने वहां से वापस चल दिए.

मैडम उन को जाते देख बोली, ‘‘जहां न कानून कुछ कर पाया और न ही समाज, वहां इस के प्यार की ताकत ने वह कर दिखाया जो नामुमकिन था. सच में… ऐसा प्यार कहां…’’

मेरा ब्रेकअप हो चुका है पर बॉयफ्रेंड कहता है कि लौट आओ, मैं क्या करूं

सवाल

मैं एक लड़के से 5 वर्षों से प्यार करती हूं. वह भी मुझ से प्यार करता है. बीच में हम दोनों में कुछ मनमुटाव हो गया था. अब वह कहता है कि वह मुझे नहीं किसी और को चाहता है. मैं उसे भुला नहीं सकती. दिनरात रोती हूं. कभीकभी वह कहता है कि लौट आओ. मुझे उस के व्यवहार को ले कर बहुत गुस्सा आता है, यह सोच कर कि उस ने मेरा मजाक बना रखा है. क्या मैं उस पर भरोसा करूं या नहीं?

जवाब 

एकदूसरे को समझने के लिए 5 साल का समय बहुत होता है. यदि आप का प्रेमी आप से साफसाफ कह चुका है कि वह आप को नहीं किसी और लड़की को चाहता है तो आप को किसी गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए और उस से किनारा कर लेना चाहिए. अपने पहले प्यार को भुलाना थोड़ा मुश्किल जरूर होता है पर नामुमकिन नहीं. समय बीतने के साथ आप के दिलोदिमाग से उस की यादें मिट जाएंगी.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

शर्मनाक : दलित घोड़ी नहीं चढ़ेगा

Scoiety News in Hindi: राजस्थान सरकार(Rajasthan Goverment) के गृह मंत्री (Home Minister) गुलाबचंद कटारिया (Gulabchand Katariya) ने विधानसभा में बताया कि प्रदेश में पिछले 3 साल में दलित (Schedule Cast) दूल्हों को घोड़ी पर चढ़ने से रोकने के 38 मामलों में मुकदमे दर्ज हुए हैं. सालभर पहले मध्य प्रदेश (Madhya Pradesh) के रतलाम से आई एक तसवीर ने भी लोगों को चौंका दिया था. वहां एक दलित दूल्हे को हैलमैट पहन कर घोड़ी पर चढ़ना पड़ा, क्योंकि गांव के ऊंची जाति के लोग नहीं चाहते थे कि वह घोड़ी पर चढ़े. पहले तो उस दलित की घोड़ी छीन ली गई और फिर पत्थर फेंके गए. पत्थरों से दूल्हे को बचाने के लिए जब पुलिस ने हैलमैट का बंदोबस्त किया, तब जा कर बरात निकली.

उत्तर प्रदेश के कासगंज में पुलिस ने आधिकारिक तौर पर कह दिया था कि दलित दूल्हे का घोड़ी पर बैठना शांति के लिए खतरा है. दादरी जिले के संजरवास गांव में पिछले साल जब एक दलित दूल्हे की बरात आई तो राजपूतों ने हमला कर दिया.

इस वारदात में दूल्हे संजय समेत कई बराती और लड़की वाले जख्मी हो गए. हमला करने वालों का कहना था कि दलित दूल्हा घोड़ी पर सवार हो कर नहीं आ सकता, क्योंकि उन्हें इस का हक नहीं है.

उत्तर प्रदेश के रहने वाले संजय जाटव को कासगंज जिले में बरात निकालने की इजाजत नहीं मिली. 2 साल पहले हरियाणा के कुरुक्षेत्र में दलित समाज की एक बरात पर ऊंची जाति वालों ने यह कह कर हमला कर दिया था कि दलित दूल्हा घोड़ी की बग्गी पर सवार हो कर उन के मंदिर में नहीं आ सकता. उसे जाना है तो रविदास मंदिर में जाए. पुलिस की सिक्योरिटी के बावजूद पथराव हुआ.

शादियों के मौसम में तकरीबन हर हफ्ते देश के किसी न किसी हिस्से से ऐसी किसी घटना की खबर आ ही जाती?है. इन घटनाओं में जो एक बात हर जगह समान होती है, वह यह है कि दूल्हा दलित होता है, वह घोड़ी पर सवार होता है और हमलावर ऊंची जाति के लोग होते हैं.

इन घटनाओं के 2 मतलब हैं. एक, दलित समुदाय के लोग पहले घुड़चढ़ी की रस्म नहीं करते थे. न सिर्फ ऊंची जाति वाले बल्कि दलित भी मानते थे कि घुड़चढ़ी अगड़ों की रस्म है, लेकिन अब दलित इस फर्क को नहीं मान रहे हैं. दलित दूल्हे भी घोड़ी पर सवार होने लगे हैं.

यह अपने से ऊपर वाली जाति के जैसा बनने या दिखने की कोशिश है. इसे लोकतंत्र का भी असर कहा जा सकता है, जिस ने दलितों में भी बराबरी का भाव और आत्मसम्मान पैदा कर दिया है. यह पिछड़ी जातियों से चल कर दलितों तक पहुंचा है. दूसरा, ऊंची मानी गई जातियां इसे आसानी से स्वीकार नहीं कर पा रही हैं. उन के हिसाब से दूल्हे का घोड़ी पर सवार होना ऊंची जाति वालों का ही हक है और इसे कोई और नहीं ले सकता.

लिहाजा, वे इस बदलाव को रोकने की तमाम कोशिशें कर रहे हैं. हिंसा उन में से एक तरीका है और इस के लिए वे गिरफ्तार होने और जेल जाने तक के लिए भी तैयार हैं. देश में लोकतंत्र होने के बावजूद ऊंची जाति वालों में यह जागरूकता नहीं आ रही है कि सभी नागरिक बराबर हैं.

कई साल पहले पिछड़ी जातियों के लोगों ने जब बिहार में जनेऊ पहनने की मुहिम चलाई थी, तो ऐसी ही हिंसक वारदातें हुई थीं और कई लोग मारे गए थे. दलितों के मंदिर में घुसने की कोशिश अब भी कई जगहों पर हिंसक वारदातों को जन्म देती है.

इसी का एक रूप 3 साल पहले उत्तर प्रदेश के प्रतापगढ़ जिले में देखने को मिला था. वहां के रेहुआ लालगंज गांव के राजू और ब्रजेश सरोज ने जब आईआईटी का ऐंट्रैंस इम्तिहान पास कर लिया, तो गांव के ऊंची जाति वालों ने उन के घर पर पत्थरबाजी की.

यह तब हुआ जबकि इन भाइयों के आईआईटी ऐंट्रैंस इम्तिहान पास करने का देशभर में स्वागत हुआ था और तब के मानव संसाधन विकास मंत्री ने इन की हर तरह की फीस और खर्च माफ करने का ऐलान किया था.

दलितों को इस तरह सताने के मामलों की तादाद बहुत ज्यादा है जो कहीं दर्ज नहीं होते, नैशनल लैवल पर जिन की चर्चा नहीं होती. दरअसल, एक घुड़चढ़ी पर किया गया हमला सैकड़ों दलित दूल्हों को घुड़चढ़ी से रोकता है, यानी सामाजिक बराबरी की तरफ कदम बढ़ाने से रोकता है.

गांवों का समाज अभी भी वैसा ही है और दलित कई जगहों पर मालीतौर पर ऊंची जाति वालों पर निर्भर हैं इसलिए वे खुद भी ऐसा कुछ करने से बचते हैं, जिस से ऊंची जाति वाले नाराज हों.

इन मामलों को अब तक दलितों को सताने के तौर पर देखा गया है, पर अब जरूरत इस बात की भी है कि इन को ‘सवर्णों की समस्या’ की तरह देखा जाए. कोई बीमार समाज ही किसी दूल्हे के घोड़ी पर चढ़ने या किसी के आईआईटी पास करने पर पत्थर फेंक सकता है.

दुनिया में किसी भी देश में इसे मामूली नहीं माना जाएगा. 21वीं सदी में तो इसे किसी भी हालत में आम घटना के तौर पर नहीं लिया जाना चाहिए.

हावी है पिछड़ापन

यह समझने की कोशिश की जाए कि आधुनिकता और लोकतंत्र के इतने सालों के अनुभव के बाद भी कुछ समुदाय सभ्य क्यों नहीं बन पाए हैं? ऐसी कौन सी चीज है, जिस की वजह से ऊंची जाति वाले यह मानने को तैयार नहीं हैं कि वे भी बाकी लोगों की तरह इनसान हैं और उन्हें कोई जन्मजात खास हक हासिल नहीं हैं और न ही कुछ लोग सिर्फ जन्म की वजह से उन से नीचे हैं.

अगर पुराने दौर में ऊंची जाति वालों को कुछ खास हक हासिल थे भी तो लोकतंत्र में उन्हें यह सुविधा हासिल नहीं है. इसे भारतीय आधुनिकता की समस्या के तौर पर भी देखा जाना चाहिए. यूरोप और अमेरिका में परंपरा की कब्र पर आधुनिकता का विकास हुआ है. जोकुछ सामंती या छोड़ देने लायक था, उसे खारिज करने की कोशिश की गई. चर्च और पादरियों को पीछे हटना पड़ा, तब जा कर बर्बर यूरोप बदला और वहां वैज्ञानिक और औद्योगिक क्रांति हुई.

यूरोप से सीखी हुई आधुनिकता और भारतीय परंपरा के नाम पर जारी नाइंसाफी भारत में गलबहियां कर गईं. जिंदगी जीने का ढर्रा नहीं बदला. यही वजह है कि उपग्रह भेजने की कामयाबी के लिए मंदिर में पूजा को आम बात माना जाता है.

जातिवाद एक बड़ी समस्या का ही हिस्सा है, जहां वैज्ञानिक जागरूकता और लोकतांत्रिक सोच से टकराव हर लैवल पर दिखाई देता है. मसलन, क्या यह धार्मिक मामला है कि दिल्ली में अरबिंदो मार्ग पर आईआईटी के गेट पर शनि मंदिर बनाया गया है जहां टीचर और स्टूडैंट सरसों का तेल चढ़ाते हैं? भारतीय समाज कई मामलों में एक भैंसागाड़ी की तरह है, जिस में इंजन लगा दिया गया हो.

भारत में लोकतंत्र जैसी आधुनिक शासन प्रणाली को तो अपना लिया गया, लेकिन समाज में गोलबंदी का आधार धर्म और जाति बने रहे. संविधान सभा में बाबा साहब अंबेडकर ने इसे भारतीय लोकतंत्र के लिए भविष्य की सब से बड़ी चुनौती के रूप में स्वीकार किया था.

उन्होंने कहा था कि हर शख्स का एक वोट और हर वोट की एक कीमत तो है लेकिन हर लोग समान नहीं हैं. उन्होंने उम्मीद जताई थी कि ये हालात बदलेंगे. लेकिन दलितों की घुड़चढ़ी पर पत्थर फेंकने वाले ऊंची जाति वालों ने भारत के संविधान निर्माताओं को निराश ही किया है.

सैक्स से जुड़ी बात करते ही शर्मिंदगी से मुंह न बिचकाएं

Sex News in Hindi: कुदरत ने हम इनसानों के भीतर सैक्स (Sex) को ले कर जबरदस्त इमोशन दिए हैं. ये इमोशन इतने मजबूत हैं कि इनसान इन के बारे में सोचे बगैर नहीं रह सकता. यही वजह है कि हम अपनी सैक्स इच्छाओं को जितना दबाते चले जाते हैं या बगैर चर्चा के सही दिशा में आगे नहीं बढ़ने देते तो यह इच्छा उतने ही गलत व ओछे तरीकों से हमारे सामने आ खड़ी होती है. सावधान, यह मुद्दा हमारी सोच से थोड़ा अटपटा है, तो पाठकों को सुझाव है कि मैगजीन (Magazine) के पन्ने को हलका सा अंदर की तरफ मोड़ लें, ताकि अगलबगल का कोई इनसान इसे पढ़ते हुए आप को न देख ले. वह क्या है न कि सैक्स से जुड़ी बातें कहीं आप को शर्मिंदा न कर दें.

माफ कीजिएगा, ऐसा इसलिए कहना पड़ रहा है कि भारत में सैक्स के बारे में हर कोई अपने भीतर इच्छा तो पालता है, लेकिन सैक्स से जुड़ी बात करते ही शर्मिंदगी से मुंह बिचकाते हुए गरदन  झुका लेता है.

खैर, दिल्ली के अशोक नगर में रहने वाले जोड़े 32 साला विक्रम और  29 साला मालती की शादी को तकरीबन 8 साल बीत चुके हैं. दोनों की साल 2012 में अरेंज मैरिज हुई थी. अच्छी बात यह है कि दोनों ने एकदूसरे को पसंद किया था.

शादी के पहले साल में मालती ने एक बेटे ने जन्म दिया और एक साल होल्ड कर के अगले साल एक बेटी को. फिलहाल उन का एक भरापूरा परिवार है और वे अब आगे और बच्चे पैदा करने के बारे में नहीं सोच रहे हैं. लेकिन इस में जरूरी यह है कि उन्होंने अपने जिस्मानी रिश्ते को बच्चा पैदा करने तक खत्म नहीं किया. वे उस के बाद भी नियमित रूप से सैक्स करते रहे.

इस जोड़े ने इन 8 सालों में न जाने कितनी बार एकदूसरे की गरमाहट भरी उस छुअन को महसूस किया होगा, जो पतिपत्नी की डोर को बनाए रखने में जरूरी होती है. कितनी ही बार उन्होंने एकदूसरे के जिस्मानी सुख में गोते लगाते हुए चरमसुख का मजा लिया होगा.

जाहिर है कि जितनी बार भी उन्होंने आपसी संबंध बनाए होंगे, उन में से 99.9 फीसदी वजह शरीर का चरमसुख हासिल करना रहा होगा यानी कहा जा सकता है कि किसी मर्दऔरत के लिए सैक्स सिर्फ उन के बच्चे पैदा होने पर निर्भर नहीं करता.

लेकिन मसला यह है कि भारत में सैक्स बहुत ज्यादा निजी और गुप्त रखा गया है. यह इतना निजी होता है कि  8 साल से हर रोज एकदूसरे के साथ हमबिस्तर होने वाले विक्रम और मालती सरीखे जोड़े तक भी खुले में एकदूसरे का हाथ पकड़ने, एकदूसरे के साथ बैठने तक में हिचक जाते हैं.

वे एकदूसरे का हाथ पकड़ने को सैक्स के दायरे में रख देते हैं, क्योंकि समाज और खुद उन की नजर में सैक्स गुप्त है, तो एकदूसरे को खुले में किसी भी तरह छूना गलत है. उन को एकदूसरे को निहारना, गाल पर चुंबन लेना, तारीफ करना, सहलाना और यहां तक कि करीब आना बेहूदा लगने लगता है.

यह मसला सिर्फ कुछ लोगों का नहीं, हर घर में इस पर यही भाव आम है. खुद मेरे परिवार में ऐसा कोई पल आज तक मेरे जेहन में नहीं, जहां मेरे पिता ने मेरी माताजी का हाथ हमारे सामने थामा हो या गाल तो दूर की बात माथा भी चूमा हो. हालत तो यह है कि आज भी जब वे कहीं बाहर एकदूसरे के साथ कहीं निकलते भी हैं, तो उन में भारी असहजता होती है. यही वजह है कि मेरे पिताजी मेरी माताजी से 10 कदम आगे चलते हैं. वे पिछले 30 सालों से ऐसी ही शादीशुदा जिंदगी जीते आ रहे हैं?

सैक्स पर चर्चा है मना

भारत में ‘सैक्स’ व ‘सैक्स पर चर्चा’ को निजी रखा जाता है. यहां तक कि इस के गुप्त होने पर गर्व भी महसूस किया जाता है. इसे कथित महान संस्कृति से जोड़ दिया जाता है.

हम भारतीयों के मुताबिक सैक्स पर चर्चा करने से हमारी संस्कृति, समाज और नई पौध के नौजवानों पर इस का गलत असर पड़ता है.

भारत में सैक्स का मतलब गंदा और शर्मिंदा होने से है. ज्यादातर भारतीय अपनी चर्चा इस विषय में बहुत ही गुप्त रखते हैं. उन्हें डर होता है कि कहीं इस वजह से उन को चरित्रहीन के कैटिगरी में न डाल दिया जाए, खासकर औरतों के लिए यह शब्द ही बेशर्म है.

औरतों को इस बारे में ऐक्स्ट्रा केयरफुल रहना सिखाया जाता है. इस की ट्रेनिंग बचपन से ही घर में मां द्वारा देनी शुरू हो जाती है. उन्हें सम झाया जाता है कि उन के निजी अंग पूरे परिवार की इज्जत हैं, उन्हें हर हाल में शुद्ध व पवित्र रखने की खास जरूरत है, चाहे जान ही क्यों न चली जाए.

एक अच्छी औरत या लड़की वही मानी जाती है, जो सैक्स और इस से संबंधी चर्चा से खुद को दूर रखे. यहां तक कि वे इन विषयों के बारे में सोचें तक नहीं. अगर वे कभी अपने दोस्तों में भी सैक्स संबंधी विषयों पर चर्चा करती हैं, तो उन के चरित्र पर लांछन लगने में देर नहीं लगती.

हालांकि, भारत में सैक्स को थोड़ीबहुत जगह कहीं मिलती भी है, तो वह शादी के बाद है, लेकिन उस के बावजूद भी यह इतना निजी है कि पतिपत्नी इस पर की गई चर्चा को बंद कमरों के बाहर ही नहीं आने देते. बहुत बार वे एकदूसरे से बेहतर सैक्स की इच्छा जाहिर करने से भी कतराते हैं और नए प्रयोग करने से  िझ झकते हैं. इस से खुद उन के जीवन में नीरसता आ जाती है, नयापन खत्म हो जाता है.

मर्द तो जैसेतैसे अपनी जरूरत पूरी कर लेते हैं, लेकिन इस का बड़ा खमियाजा औरतों को भुगतना पड़ता है. वे मर्द के सामने सिर्फ उस की इच्छा पूरी करने में रह जाती हैं और खुद की इच्छाएं अपने सीने में ही दबा लेती हैं.

इस का असर सिर्फ पतिपत्नी पर ही नहीं, बल्कि उन के बच्चों पर भी पड़ता है. मातापिता, जो अपने बच्चों को किशोर उम्र से ही सैक्स ऐजूकेशन के जरीए बेहतर शिक्षा दे सकते हैं, वे ऐसी चर्चा घर में बच्चों के साथ करने में  िझ झकते हैं. यहां तक कि यह सब उन के लिए अनैतिकता और फूहड़ता के दायरे में आ जाता है. इस वजह से बच्चे इस के बारे में जहांतहां से गलत जानकारी हासिल कर लेते हैं. ये अधकचरी जानकारी उन की सैक्स लाइफ को तो खराब करता ही है, साथ ही बेहतर इनसान बनने के भी आड़े आ सकता है.

सवाल उठता है कि आखिर शादी में ढोलनगाड़े, बैंडबाजा, गुलाब के फूलों से सजे सुहागरात के बिस्तर पर चरमसुख लेने के बावजूद भारतीय लोग सैक्स से जुड़ी चर्चाओं से इतना क्यों बचते हैं?

धर्म यही सिखाता

दुनिया की अलगअलग धर्म व संस्कृतियों में अगर किसी विषय के बारे में सब से ज्यादा लिखा और सम झाया गया है, तो वह यौनिकता को नियंत्रित किए जाने को ले कर है.

लंबे अंतराल के बाद आधुनिक समय में यूरोप के देशों में भले ही इस विषय में सकारात्मक बदलाव आए हों, लेकिन दक्षिण एशिया और मध्यपूर्व देशों में रूढि़वाद अभी भी काफी हावी है.

यही वजह है कि इस विषय पर कोई भी तर्क दिए जाने को ले कर तमाम रूढि़वादियों को यह विषय हमेशा वैस्टर्न संस्कृति का हिस्सा लगे, जबकि वे यह कह कर खजुराहो और कामसूत्र के अपने ही इतिहास का गला घोंटने का काम करते रहे हैं.

हिंदू समाज में तमाम धर्मग्रंथों और धर्म के ठेकेदारों ने मर्दऔरत के संबंधों पर नियमकानून और अनेक रोकटोक की हैं. उन्हें ‘किस से सैक्स करना है’, ‘कब करना है’ और ‘कैसे करना है’ कई तरीकों से कंट्रोल किया गया.

जाहिर है, सैक्स दो लोगों के बीच आपसी सम झदारी और मजा लेने का विषय है. इस में दोनों का खुल कर एकदूसरे से मिलन जरूरी है, लेकिन धर्म ने इस मामले में सिर्फ मर्द को छूट दी है कि वह औरत से जिस्मानी हसरत पूरी कर ले. औरत की तमाम इच्छाएं दबा दी गईं. उन के उठनेबैठने, बोलनेहंसने, कपड़ेलत्ते और घर में कैद रखने से यौन इच्छा को नियंत्रित किया गया.

ऐसा तकरीबन सभी धर्मों के पोंगापंथियों द्वारा स्थापित करने की कोशिश की गई. यहां तक कि आज भी जहांजहां धार्मिक कट्टरपन हावी है, वहां सैक्स संबंधी चर्चाओं को हद से ज्यादा दबाने की बात की जाती रही है.

ऐसे में औरतें खुल कर अपनी बात रखने से हिचकिचाती हैं. अपनी यौन जरूरतों को कह नहीं पातीं. पति चाहे कैसा भी हो, उसी के मुताबिक खुश रहना पड़ता है. क्या आज यह सामने नहीं है कि मर्द सैक्स के लिए कहीं भी हामी भरने की आजादी रख लेता है, लेकिन औरत को इस तरह के फैसले लेने के लिए खुद को कई तरह से सम झाना और तैयार करना होता है?

ऐसे में दोनों की आपसी सम झदारी, जो खुल कर इस विषय को सही आधार दे सकती है, वहां धर्म की मोटी दीवार क्या इस पर आड़े आने का काम नहीं करती है?

रहनुमा ही बुझेबुझे

भारत में सैक्स ऐसा विषय है, जिस पर चर्चा हमारे द्वारा चुने गए नेता प्रतिनिधि तक नहीं करना चाहते. यहां तक कि भारतीय समाज में उन नेताओं की ही ज्यादा तूती बोलती है या लोगों द्वारा उन नेताओं पर ज्यादा भरोसा किया जाता है, जिन्होंने खुद को ब्रह्मचारी के तौर पर प्रचारित किया हो.

लोगों का मानना रहता है कि उक्त नेता की अगर पत्नी या परिवार नहीं तो वह तमाम तरह की ‘मोहमाया’ से दूर है और वह जनता की सच्ची सेवा कर सकता है.

एक वजह यह भी है कि आज इस तरह के नेताओं, जो खुद को मोहमाया से दूर और साधुसंत बता रहे हैं, पर लोग जल्दी से विश्वास कर लेते हैं. ऐसे में भारत में किसी नेता का खुद को सैक्स लाइफ से अलग दिखाना उस की मजबूरी भी बन जाती है और उस के नेता बनने की योग्यता भी, फिर चाहे वह भीतरखाने में कुछ भी कर रहा हो.

अमेरिका में जहां राष्ट्रपति की वाइफ को ससम्मान ‘फर्स्ट लेडी’ के तौर पर पुकारा जाता है, उन के निजी जीवन को स्वीकृति दी जाती है, वहीं हमारे देश में प्रधानमंत्री से ले कर तमाम नेता अपनी फैमिली को चर्चाओं से दूर रखने की पूरी कोशिश में जुटे रहते हैं.

यह सिर्फ संयोग नहीं हो सकता कि महात्मा गांधी से ले कर नरेंद्र मोदी तक कई नामी बड़े नेता अपने निजी जीवन के त्याग के चलते ज्यादा चर्चित रहे. वहीं अगर कोई नेता दूसरी शादी कर ले तो वह इस कारण ही आलोचना, लांछन का शिकार हो जाता है यानी कुलमिला कर समाज को अपने नीतिनियमों और विचारों से चलाने वाले नेता भी इस विषय में या तो रूढि़वादी होते हैं या असहज हो जाते हैं या फिर वे विचारों से खुले भी हैं, जो तमाम दबाव के चलते सैक्स संबंधी विषयों को हाथ लगाने से कतराते हैं.

यह इस बात से सम झा जा सकता है कि लौकडाउन के दौरान जहां यूरोप के कुछ देश कपल्स व लवर्स के मिलने के लिए स्पैशल परमिट दे रहे थे, वहीं इन विषयों पर हमारे देश के नेताओं द्वारा सोचना तो दूर, कोई सोच ले तो उसे अधर्मी बता कर विरोध जरूर हो जाता.

बात करना है जरूरी

भारत में बच्चा पैदा होते ही भगवान या अल्लाह की देन वाले वाक्यों ने तो मांबाप का सारा क्रेडिट ही खा लिया है. ऐसे में यह कहा जा सकता है कि देश में 130 करोड़ की आबादी तो सिर्फ भगवान का नाम जपतेजपते ही पैदा हुई है.

आज भी सैक्स पर बात करते हुए हमारी ज्यादातर आबादी को ऐसी शर्म महसूस हो जाती है मानो यह सैक्स दूसरे ग्रह का विषय है, जिस का उन की जिंदगी से कोई लेनादेना नहीं. सैक्स से संबंधित तमाम सामग्रियां तक भी हमारे लिए किसी अनबु झी पहेलियों सरीखी लगती हैं.

किसी शख्स की जेब में अगर कंडोम पाया जाता है, तो वह उस के लिए शर्मिंदगी का विषय बन जाता है मानो कंडोम पास में होना अपराध हो, जबकि सोचा जाए तो यह सब से जरूरी सामग्री में से एक है. फिर वे सारी चीजें जैसे अंडरवियर, ब्रा, पैंटी, इमर्जैंसी पिल्स, सैनेटरी पैड सबकुछ हमारे लिए अजूबा चीजें बन जाती हैं.

किंतु हकीकत यह है कि भारत इस समय पूरी दुनिया में सब से ज्यादा पोर्न देखने वाला देश है. भारत में आमतौर पर 70 फीसदी इंटरनैट ब्राउजिंग पोर्न कंटैंट के लिए होती है खासकर एंड्रौयड फोन के आने के बाद भारत में तमाम रोकटोक और पाबंदियों के बावजूद पोर्न की खपत काफी बढ़ गई है. ऐसे में यह तो कहीं से नहीं लगता है कि हम लोग सैक्स नहीं चाहते, बल्कि सैक्स को ले कर सामने आए आंकड़े हैरान करने वाले हैं. लौकडाउन के दौरान भारत में सैक्स टौयज में 65 फीसदी की बढ़ोतरी हुई.

सच तो यही है कि हम भारतीय बाद में हैं, पहले इनसान हैं. कुदरत ने हम इनसानों के भीतर सैक्स को ले कर जबरदस्त इमोशन दिए हैं. ये इमोशन इतने मजबूत हैं कि सैक्स के बारे में सोचे बगैर हम नहीं रह सकते.

यही वजह है कि हम यौन इच्छाओं को जितना दबाते चले जाते हैं या बगैर चर्चा के सही दिशा में आगे नहीं बढ़ने देते, तो ये विचार उतने ही गलत व भौंड़े तरीकों से हमारे सामने आ खड़े होते हैं. फिर इस का अंजाम ‘बाल यौन शौषण’, ‘महिला छेड़छाड़’, ‘क्रूर बलात्कार’, ‘महिला असुरक्षा’ जैसे अपराधों के तौर पर बांहें फैला कर सामने दिखने लगते हैं, जो भारत में काफी आम हो चले हैं.

सैक्स संबंधी विषयों को चर्चा में न ला कर हम खुद के लिए दोहरापन भरे हैं. एक तरफ हमारे दिमाग में अधिकाधिक यौन इच्छाएं पलती रहती हैं, वहीं दूसरी तरफ हम इसे अधिकाधिक दबाते चले जाते हैं. यही दोहरापन इनसान की भावनाओं को कुंठित करता है.

सैक्स को ले कर गलत व आधीअधूरी जानकारी से खुद को अक्षम सम झने वाले मानसिक बीमारी से घिरने लगते हैं. ऐसे में गुप्त समस्याओं का इलाज करने वालों की फौज तो बढ़ती रही है, लेकिन इलाज के चक्कर में उन्हें दरदर भटकना ही पड़ता है. यह भी हमारे देश की हकीकत है कि सैक्स की जानकारी की कमी में भारत लगातार वर्ल्ड फोरम पर एचआईवी एड्स के मामलों में ऊपर की ओर अग्रसर है. भारत में एड्स से होने वाली मौतों का भी आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है.

जरूरी है कि हमें सैक्स को ले कर अपने उसूलों को फिर से ताजा करने की जरूरत है. रूढि़वाद बनाम आधुनिकता के इस संतुलन में थोड़ा और अधिक आधुनिक होने की तरफ बढ़ना चाहिए और सैक्स की चर्चा को वर्तमान के समय के मुताबिक अधिक अनुकूल बनाने की जरूरत है, वरना इस से जुड़ी गलत धारणाओं, अपराधों और पाखंडों को खत्म नहीं किया जा सकेगा.

एसिड अटैक : महादलित औरतों पर सरेआम फेंका तेजाब

Acid Attack Crime News in Hindi: 27 जनवरी, 2016 की सुबह. बिहार (Bihar) के अररिया (Araria) जिले के नरपतगंज थाने की फतेहपुर पंचायत में सड़क बनने को ले कर दबंगों और महादलितों (Maha Dalit) के बीच झगड़ा शुरू हुआ, जो देखतेदेखते तीखी बहस, गालीगलौज और फिर मारपीट में बदल गया. महादलितों का कहना था कि वे पिछले कई सालों से बस्ती में रह रहे हैं, इसलिए उन के टोले तक पक्की सड़क बननी चाहिए. वहीं दबंग अपनी जमीन से हो कर पक्की सड़क नहीं बनने देना चाहते थे. महादलितों की जिद पर अड़ने से दबंगों का गुस्सा इस कदर बढ़ा कि उन्होंने महादलित औरतों के ऊपर तेजाब फेंक डाला. इस एसिड अटैक से कई औरतों समेत बहुत से लोग बुरी तरह जख्मी हो गए. गीता देवी, दुलारी देवी, बुदनी देवी, मीरा देवी समेत दर्जनभर लोगों के जिस्म तेजाब से जल गए और उन्हें आननफानन अस्पताल में भरती कराना पड़ा.

पुलिस ने इस मामले के आरोपी सुरेंद्र ठाकुर, अमित ठाकुर, अमरजीत ठाकुर और सुमित को गिरफ्तार कर कानूनी खानापूरी तो कर ली, लेकिन तेजाब से जख्मी हुई औरतों के जिस्म के साथ जो उन के सपने भी जल गए, उन की भरपाई कैसे होगी और कौन करेगा

बिहार के मनेर ब्लौक के छितनावां गांव की 2 बहनों चंचल और सोनम की हालत और उन के चेहरे को देख कर अच्छेअच्छों का कलेजा कांप सकता है. 21 अक्तूबर, 2012 की काली रात ने चंचल और उस की बहन सोनम की जिंदगी में घुप अंधेरा भर दिया था. समूचा इलाका दशहरे के मेले से जगमगा रहा था. दोनों बहनें भी मेला घूम कर छत पर आराम से सो रही थीं.

आधी रात को जब गांव में पूरी तरह सन्नाटा पसरा हुआ था, तो चंचल को छत पर कुछ आवाजें सुनाई दीं. उस की नींद खुल गई. उस ने देखा कि 3 लड़के उस की छत पर खडे़ थे.

अंधेरे में जब तक चंचल उन्हें पहचानने की कोशिश करती, तब तक लड़के उस के करीब आ चुके थे. सभी के हाथ में तेजाब से भरी बोतल थी. जब तक चंचल कुछ समझ पाती, बदमाशों ने उस के ऊपर तेजाब डाल दिया.

दर्द से बिलबिलाती चंचल की आवाज सुन कर सोनम की नींद भी खुल गई. बदमाशों ने उस के ऊपर भी तेजाब उलट दिया.

इस के बाद वे तीनों बदमाश छत से कूद कर भाग गए. जातेजाते वे धमकी दे गए कि अगर पुलिस को कुछ बताया, तो समूचे घर में आग लगा दी जाएगी.

इन दोनों बहनों का कुसूर इतना ही था कि इन्होंने छेड़खानी करने वाले लफंगों को जम कर लताड़ लगाई थी.

चंचल कहती है कि जब भी वह कंप्यूटर की कोचिंग के लिए घर से निकलती थी, तो रास्ते में अनिल राय, राजकुमार और घनश्याम नाम के 3 लड़के उस के साथ छेड़खानी करते थे.

शुरूशुरू में तो वह चुपचाप सब सहती रही, पर इस से उन बदमाशों का हौसला बढ़ गया. वे उस का दुपट्टा तक खींचने लगे और गंदे इशारे करने लगे.

एक दिन चंचल ने गुस्से में आ कर बदमाशों को फटकार लगा दी.  इस के बाद बौखलाए बदमाश 21 अक्तूबर, 2012 की रात को उस के घर की छत पर चढ़ आए और चंचल और उस की बहन सोनम के जिस्म पर तेजाब डाल दिया.

चंचल के पिता शैलेश पासवान राजमिस्त्री का काम कर के भी अपनी दोनों बेटियों को बड़ा अफसर बनाने का सपना देखा करते थे और उन की दोनों बेटियां भी पिता के सपनों को हकीकत में बदलने के लिए दिनरात  मेहनत के साथ पढ़ाई किया करती थीं.

चंचल कंप्यूटर इंजीनियर बनना चाहती थी और इंजीनियरिंग कालेज में दाखिले की तैयारी के लिए कोचिंग कर रही थी. वह अपने गांव से 20 किलोमीटर दूर दानापुर में कोचिंग क्लास करने जाया करती थी. चंचल की मां सुनैना कहती हैं कि गांव के लफंगों और दबंगों ने उन की बेटियों की जिंदगी तबाह कर दी है.

आरोपी के साथी और परिवार वाले आज भी चंचल के परिवार को तंग करने से बाज नहीं आ रहे हैं. मुख्य आरोपी अनिल कुमार जेल में है और बाकी दोनों आरोपी जमानत पर छूटे हुए हैं. चंचल के घर पर अकसर पत्थर फेंके जाते हैं. लोग उस के घर के पास मजमा लगा कर गालीगलौज करते हैं, धमकी देते हैं और केस वापस लेने का दबाव भी बनाया जाता है.

पुलिस, प्रशासन और सरकार दलित जाति की तरक्की और हिफाजत की बात तो खूब करती है, लेकिन मनेर के छितनावां गांव के एसिड अटैक से पीड़ित शैलेश पासवान और उन की बेटियों के दर्द को कम करने वाला कोई नजर नहीं आता है.

चंचल और उस की बहन सोनम के इलाज पर अब तक 8 लाख रुपए  की रकम खर्च हो गई है. ऐक्टर जौन अब्राहम समेत कई एनजीओ की मदद से इलाज की रकम जुटाई गई है, लेकिन सरकार की ओर से कभी कोई पहल नहीं की जा सकी है.

बिना मेकअप वायरल हुई भोजपुरी ऐक्ट्रैस मोनालिसा के फोटो, फैंस हुए घायल

भोजपुरी (Bhojpuri) से ले कर टीवी इंडस्ट्री तक में अपना जलवा बिखेरने वाली एक्ट्रैस मोनालिसा (Monalisa) अपने सोशल मीडिया फोटोज की वजह से चर्चा में बनी रहती हैं. मोनालिसा की कोई भी तसवीर इंटरनैट वर्ल्ड में आते ही छा जाती है. मोनालिसा की हर एक तसवीर पर फैंस जम कर प्यार बरसाते हैं. इस बीच भोजपुरी हीरोइन मोनालिसा की कुछ तसवीरें सामने आई हैं, जिन में वे नो मेकअप(No-Makeup) लुक में नजर आ रही हैं. उन का यह अंदाज फैंस को काफी पसंद आ रहा है.

 

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भोजपुरी ऐक्ट्रैस मोनालिसा ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को अपडेट करते हुए कुछ तसवीरें शेयर की हैं, जो कि इंटरनैट पर लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गई हैं. सामने आई तसवीरों में मोनालिसा नो मेकअप लुक में नजर आ रही हैं. उन को इस अवतार में देख फैंस खुशी से खिलखिला उठे हैं.

इन फोटोज में भोजपुरी हीरोइन मोनालिसा एक से बढ़ कर एक पोज दिए हैं. अदाकारा का हर एक पोज इंटरनैट पर वायरल हो रहा है. मोनालिसा की इन फोटोज पर लोग जम कर कमैंट कर रहे हैं. एक यूजर ने लिखा, ‘वाह चांद से मुखड़ा से आप का.’ वहीं दूसरे ने लिखा, ‘रियल ब्यूटी.’

 

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मालूम हो कि मोनालिसा (Monalisa) ने पहले तो भोजपुरी इंडस्ट्री में अपना जलवा बिखेरा था. उन्होंने पवन सिंह से ले कर खेसारी लाल यादव तक के साथ काम किया था. उन की अदाकारी को लोग काफी पसंद करते हैं. इस के बाद मोनालिसा ‘बिग बौस 10’ में नजर आईं. इसी शो से मोनालिसा को असल पहचान मिली थी. फिलहाल वे टीवी इंडस्ट्री में धमाल मचा रही हैं. मोनालिसा ने कई टीवी सीरियल्स में काम किया हैं.

उर्फी जावेद ने पहनी यूनिक ड्रैस, लोगों ने कहा डायपर ऊपर नहीं, नीचे पहनते हैं

टीवी एक्ट्रेस और मौडल उर्फी जावेद (Uorfi Javed) हमेशा अपनी यूनिक ड्रैस से लोगों को हैरान कर देती हैं. वे हमेशा ही अपनी ड्रैस के साथ कुछ न कुछ नया एक्पेरीमैंट करती रहती हैं. ऐसा ही फिर उर्फी जावेद ने अपने अतरंगी आउटफिट से लोगों को चौंकाया दिया है. दरअसल, उर्फी जावेद एयरपोर्ट पर स्पौट हुई हैं जहां उन्होंने व्हाइट कलर (White Colour) की यूनिक ड्रैस पहनी थी.

 

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आप को बता दें कि उर्फी जावेद की इस ड्रैस में कई तसवीरें क्लिक हुईं और सोशल मीडिया पर वायरल हुई हैं. उर्फी जावेद की लेटेस्ट फोटोज पर जम कर रिएक्शन आ रहे हैं. वहीं, उर्फी जावेद ने पैपराजी को निराश नहीं किया और जम कर पोज दिए. उर्फी जावेद की अलगअलग एंगल से कई तसवीरें कैमरे में कैद हुईं. उर्फी ने व्हाइट कलर का यूनिक आउटफिट पहना हुआ था. उर्फी जावेद ने अपने ड्रैस मिलतीजुलती कैप भी पहनी हुई थी.

उर्फी जावेद की तसवीरों को जहां फैंस पसंद कर रहे हैं, वहीं सोशल मीडिया पर तमाम यूजर्स ने उर्फी जावेद को फिर से ट्रोल किया है.

उर्फी जावेद को ले कर एक यूजर ने लिखा है, ‘डायपर नीचे पहनते हैं मैडम, आप ने ऊपर पहन लिया.’ एक यूजर ने लिखा है, ‘इस को जेल में रखना चाहिए था.’ एक यूजर ने लिखा है, ‘इस को क्या बीमारी है.’ एक यूजर ने लिखा है, ‘बेहूदा महिला.’ एक यूजर ने लिखा है, ‘पागल लड़की.’

उर्फी जावेद अपने फैशन और ड्रैसिंग सैंस को ले कर अकसर ट्रोल होती हैं. हालांकि, उर्फी जावेद को लोगों के कमैंट से कोई फर्क नहीं पड़ता है.

फिसलती : क्या था ब्लैक दफ्तर

बहुत देर से अपनी बीवी प्रेमा को सजतासंवरता देख बलवीर से रहा नहीं गया. उस ने पूछा, ‘‘क्योंजी, आज क्या खास बात है?’’

‘‘देखोजी…’’ कहते हुए प्रेमा उस की ओर पलटी. उस का जूड़े में फूल खोंसता हुआ हाथ वहीं रुक गया, ‘‘आप को कितनी बार कहा है कि बाहर जाते समय टोकाटाकी न किया करो.’’

‘‘फिर भी…’’

‘‘आज मुझे जनप्रतिनिधि की ट्रेनिंग लेने जाना है,’’ प्रेमा ने जूड़े में फूल खोंस लिया. उस के बाद उस ने माथे पर बिंदिया भी लगा ली.

‘‘अरे हां…’’ बलवीर को भी याद आया, ‘‘कल ही तो चौधरी दुर्जन सिंह ने कहलवाया था कि इलाके के सभी जनप्रतिनिधियों को ब्लौक दफ्तर में

ट्रेनिंग दी जानी है,’’ उस ने होंठों पर जीभ फिरा कर कहा, ‘‘प्रेमा, जरा संभल कर. आजकल हर जगह का माहौल बहुत ही खराब है. कहीं…’’

‘‘जानती हूं…’’ प्रेमा ने मेज से पर्स उठा लिया, ‘‘अच्छी तरह से जानती हूं.’’

‘‘देख लो…’’ बलवीर ने उसे चेतावनी दी, ‘‘कहीं दुर्जन सिंह अपनी नीचता पर न उतर आए.’’

‘‘अजी, कुछ न होगा,’’ कह कर प्रेमा घर से बाहर निकल गई.

प्रेमा जब 7वीं क्लास में पढ़ा करती थी, तभी से वह देश की राजनीति में दिलचस्पी लेने लगी थी.

शादी के बाद वह गांव की औरतों से राजनीति पर ही बातें किया करती. कुरेदकुरेद कर वह लोगों के खयाल जाना करती थी.

इस साल के पंचायती चुनावों में सरकार ने औरतों के लिए कुछ रिजर्व सीटों का ऐलान किया था. प्रेमा चाह कर भी चुनावी दंगल में नहीं उतर पा रही थी.

गांव की कुछ औरतों ने अपने नामांकनपत्र दाखिल करा दिए थे. तभी एक दिन उस के यहां दुर्जन सिंह आया और उसे चुनाव लड़ने के लिए उकसाने लगा.

इस पर बलवीर ने खीजते हुए कहा था, ‘नहीं चौधरी साहब, चुनाव लड़ना अपने बूते की बात नहीं है.’

‘क्यों भाई?’ दुर्जन सिंह ने पूछा था, ‘ऐसी क्या बात हो गई?’

‘हमारे पास पैसा नहीं है न,’ बलवीर ने कहा था.

‘तू चिंता न कर…’ दुर्जन सिंह ने छाती ठोंक कर कहा था, ‘वैसे, इस चुनाव में ज्यादा पैसों की जरूरत नहीं है. फिर भी जो भी खर्चा आएगा, उसे पार्टी दे देगी.’

‘तो क्या यह पार्टी की तरफ से लड़ेगी?’ बलवीर ने पूछा था.

‘हां…’ दुर्जन सिंह ने मुसकरा कर कहा था, ‘मैं ही तो उसे पार्टी का टिकट दिलवा रहा हूं.’

‘फिर ठीक है,’ बलवीर बोला था.

इस प्रकार प्रेमा उस चुनावी दंगल में उतर गई थी. सच में चौधरी दुर्जन सिंह ने चुनाव प्रचार का सारा खर्चा पार्टी फंड से दिला दिया था.

प्रेमा भी दिनरात महिला मतदाताओं से मुलाकात करने लगी थी. उस का चुनावी नारा था, ‘शराब हटाओ, देहात बचाओ.’

चुनाव होने से पहले ही मतदाताओं की हवा प्रेमा की ओर बहने लगी थी. चुनाव में वह भारी बहुमत से जीत गई थी. एक उम्मीदवार की तो जमानत तक जब्त हो गई थी. तब से चौधरी साहब का प्रेमा के यहां आनाजाना कुछ ज्यादा ही होने लगा था.

गांव से निकल कर प्रेमा सड़क के किनारे बस का इंतजार करने लगी. वहां से ब्लौक दफ्तर तकरीबन 20 किलोमीटर दूर था. बस आई, तो वह उस में चढ़ गई. बस में कुछ और सभापति भी बैठी हुई थीं. वह उन्हीं के साथ बैठ गई.

ब्लौक दफ्तर में काफी चहलपहल थी. प्रेमा वहां पहुंची, तो माइक से ‘हैलोहैलो’ कहता हुआ कोई माइक को चैक कर रहा था.

उस शिविर में राज्य के एक बड़े नेता भी आए हुए थे. मंच पर उन्हें माला पहनाई गई. उस के बाद उन्होंने लोगों की ओर मुखातिब हो कर कहा, ‘‘भाइयो और बहनो, आप लोग जनता के प्रतिनिधि हैं. यहां आप सब का स्वागत है. तजरबेकार सभासद आप को बताएंगे कि आप को किनकिन नियमों का पालन करना है.

‘‘इस शिविर में आप लोगों की मदद यही तजरबेकार जनप्रतिनिधि किया करेंगे. आप को उन्हीं के बताए रास्ते पर चलना है.’’

प्रेमा की नजर मंच पर बैठे चौधरी दुर्जन सिंह पर पड़ी. वह खास सभासदों के बीच बैठा हुआ था.

समारोह खत्म होने के बाद दुर्जन सिंह प्रेमा के पास चला आया. उस ने उस से अपनेपन से कहा, ‘‘प्रेमा, जरा सुन तो.’’

‘‘जी,’’ प्रेमा ने कहा.

दुर्जन सिंह उसे एक कोने में ले गया. उस का हाथ प्रेमा के कंधे पर आतेआते रह गया. उस ने कहा, ‘‘कल तुम मु?ा से मेरे घर पर मिल लेना. मुझे तुम से कुछ जरूरी काम है.’’

‘‘जी,’’ कह कर प्रेमा दूसरी औरतों के पास चली गई.

ट्रेनिंग के पहले ही दिन इलाकाई जनप्रतिनिधियों को उन के फर्ज की जानकारी दी गई. राज्य के एक बूढ़े सभासद ने बताया कि किस प्रकार सभी सभासदों को सदन की गरिमा बनाए रखनी चाहिए. उस के बाद सभी चायनाश्ता करने लगे.

दोपहर बाद प्रेमा ब्लौक दफ्तर से घर चली आई.

उधर दुर्जन सिंह को याद आया कि जब पहली बार उस ने प्रेमा को देखा था, उसी दिन से उस का मन डगमगाने लगा था. उसे पहली बार पता चला था कि देहात में भी हूरें हुआ करती हैं.

आज दुर्जन सिंह बिस्तर से उठते ही अपने खयालों को हवा देने लगा. उस ने दाढ़ी बनाई और शीशे के सामने जा खड़ा हुआ. 60 साल की उम्र में भी वह नौजवान लग रहा था.

आज दुर्जन सिंह की बीवी पति के मन की थाह नहीं ले पा रही थी. ऐसे तो वह कभी भी नहीं सजते थे.

आखिरकार उस ने पूछ ही लिया, ‘‘क्योंजी, आज क्या बात हो गई?’’

‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ दुर्जन सिंह ने मासूम बनते हुए पूछा.

‘‘आज तो आप कुछ ज्यादा ही बनठन रहे हैं.’’

‘‘अरे हां,’’ दुर्जन सिंह ने मूंछों पर ताव दे कर कहा, ‘‘आज मैं ने 2-3 सभासदों को अपने घर पर बुलाया है. उन से पार्टी की बातें करनी हैं.’’

‘‘फिर उन की खातिरदारी कौन करेगा?’’ चौधराइन ने पूछा.

‘‘हम ही कर लेंगे…’’ दुर्जन सिंह ने लापरवाही से कहा, ‘‘उन्हें चाय ही तो पिलानी है न? मैं बना दूंगा.’’

‘‘ठीक है,’’ चौधराइन भी बाहर जाने की तैयारी करने लगी.

चौधराइन के बड़े भाई के यहां गांव में पोता हुआ था, उसे उसी खुशी में बुलवाया गया था.

चौधराइन पति के पास आ कर बोली, ‘‘मैं जा रही हूं.’’

‘‘ठीक है…’’ दुर्जन सिंह उसे सड़क तक छोड़ने चल दिया, ‘‘जब मन करे, तब चली आना.’’

अब दुर्जन सिंह घर में अकेला ही रह गया. प्रेमा को उस ने सोचसमझ कर ही बुलाया था. वह बारबार घड़ी देखता और मन के लड्डू फोड़ता.

दुर्जन सिंह ने अपने कपड़ों पर इत्र छिड़का और खिड़की पर जा खड़ा हुआ. सामने से उन्हें अपना कारिंदा मोर सिंह आता दिखाई दिया.

दुर्जन सिंह ने उस से पूछा, ‘‘हां भई, क्या बात है?’’

‘‘मालिक…’’ कारिंदे ने कहा, ‘‘कल रात जंगली जानवर हमारी फसल को बरबाद कर गए.’’

‘‘वह कैसे?’’

‘‘वे मक्के के खेतों को नुकसान पहुंचा गए हैं…’’ मोर सिंह ने बताया, ‘‘मैं ने बहुत हांक लगाई, तब जा कर कुछ फसल बच पाई.’’

‘‘तू इस समय चला जा…’’ दुर्जन सिंह ने बात को टालते हुए कहा, ‘‘इस समय मेरे पास कोई खास मेहमान आने वाला है. मैं कल आऊंगा.’’

‘‘ठीक है मालिक,’’ मोर सिंह हाथ जोड़ कर चल दिया.

अब दुर्जन सिंह था और उस की कुलबुलाती ख्वाहिशें थीं. वह वहीं आंगन में एक कुरसी पर बैठ गया और आंखें मूंद कर प्रेमा की छवि को अपनी आंखों में भरने लगा.

चूडि़यों की खनक से दुर्जन सिंह ने अपनी आंखें खोलीं. सामने हूर की तरह खूबसूरत प्रेमा खड़ी थी.

वह मुसकराते हुए बोला, ‘‘आ प्रेमा, तेरी लंबी उम्र है. मैं अभीअभी तुझे ही याद कर रहा था.

‘‘और सुना…’’ दुर्जन सिंह उस की ओर घूम गया, ‘‘शिविर में तुम ने कुछ सीखा या नहीं?’’

‘‘बहुतकुछ सीखा है मैं ने चौधरी साहब,’’ प्रेमा ने हंसते हुए कहा.

‘‘मैं चाहता हूं कि तुझे मैं एक दबंग नेता बना दूं,’’ दुर्जन सिंह उस के आगे चारा डालने लगा.

‘‘जी,’’ प्रेमा बोली.

दुर्जन सिंह ने कहा, ‘‘यह सब सिखाने वाले पर ही निर्भर करता है.’’

‘‘जी.’’

‘‘देख प्रेमा,’’ दुर्जन सिंह ने चालबाजी से कहा, ‘‘सोना भी आग में तप कर ही चमका करता है.’’

‘‘जी.’’

‘‘आ, अंदर चल कर बातें करते हैं,’’ इतना कह कर दुर्जन सिंह कुरसी से उठ गया.

‘‘चलिए,’’ कह कर प्रेमा भी उस के पीछेपीछे चल दी.

बैठक में पहुंच कर दुर्जन सिंह ने प्रेमा को सोफे पर बैठा दिया और उसे एक बहुत बड़ा अलबम थमा दिया, ‘‘तब तक तू इसे देखती रह. मैं ने जिंदगी में जो भी काम किया है, इस में उन सभी का लेखाजोखा है. तु?ो बड़ा मजा आएगा.’’

‘‘आप भी बैठिए न,’’ प्रेमा ने कहा.

‘‘मैं तेरे लिए चायनाश्ते का इंतजाम करता हूं,’’ दुर्जन सिंह ने कहा.

‘‘चौधराइनजी नहीं हैं क्या?’’ प्रेमा ने पूछा.

‘‘अचानक ही आज उसे मायके जाना पड़ गया,’’ दुर्जन सिंह ने बताया.

दुर्जन सिंह रसोईघर की ओर चल दिया. प्रेमा अलबम के फोटो देखने लगी.

तभी दुर्जन सिंह एक बड़ी प्लेट में ढेर सारी भुजिया ले आया और उसे टेबल पर रख दिया.

साथ ही, दुर्जन सिंह ने टेबल पर 2 गिलास और 1 बोतल दारू रख दी. उसे देख कर प्रेमा बिदक पड़ी, ‘‘आप तो…’’

‘‘अरे भई, यह विदेशी चीज है…’’ दुर्जन सिंह मुसकरा दिया, ‘‘यह लाल परी मीठामीठा नशा दिया करती है.’’

‘‘तो आप शराब पीएंगे?’’ प्रेमा ने तल्खी से पूछा.

‘‘मैं कभीकभी ले लेता हूं,’’ दुर्जन सिंह गिलासों में शराब उड़ेलने लगा.

‘‘यह तो अच्छी बात नहीं है चौधरी साहब,’’ प्रेमा नाकभौं सिकोड़ते हुए बोली.

‘‘प्रेमा रानी…’’ इतना कह कर दुर्जन सिंह का भारीभरकम हाथ प्रेमा के कंधे पर आ लगा.

प्रेमा ने उस का हाथ झिड़क दिया और बोली, ‘‘आप तो बदतमीजी करने लगे हैं.’’

दुर्जन सिंह ने शराब का घूंट भर कर कहा, ‘‘इसे पी कर मैं तुम्हें ऐसी बातें बताऊंगा कि तुम भूल नहीं पाओगी. रातोंरात आसमान को छूने लगोगी.’’

प्रेमा चुप ही रही. दुर्जन सिंह ने उस से गुजारिश की, ‘‘लो, कुछ घूंट तुम भी ले लो. दिमाग की सारी खिड़कियां खुल जाएंगी.’’

‘‘मैं तो इसे छूती तक नहीं,’’ प्रेमा गुस्से से बोली.

‘‘लेकिन, हम तो इसे गले लगाए रहते हैं,’’ दुर्जन सिंह उसे बरगलाने लगा.

प्रेमा ने नफरत से कहा, ‘‘लानत है ऐसी जिंदगी पर.’’

‘‘देख…’’ दुर्जन सिंह के हाथ उस के कंधों पर फिर से जा लगे, ‘‘तू मेरा कहा मान. मैं तेरी राजनीतिक जिंदगी संवार दूंगा.’’

इतना सुनते ही प्रेमा दहाड़ उठी, ‘‘आप जैसे पिता की उम्र के आदमी से मुझे इस तरह की उम्मीद नहीं थी.’’

मगर तब भी दुर्जन सिंह के हाथों का दबाव बढ़ता ही गया. प्रेमा शेरनी से बिजली बन बैठी. उस ने एक ही झटके में चौधरी के हाथ एक ओर झटक दिए और दहाड़ी, ‘‘मुझे मालूम न था कि आप इतने गिरे हुए हैं.’’

दुर्जन सिंह खिसियाई आवाज में बोला, ‘‘राजनीति का दलदल आदमी को दुराचारी बना देता है. तू मेरा कहा मान ले. तेरी पांचों उंगलियां घी में रहा करेंगी. तुझे लोग याद करेंगे.’’

‘‘नहीं…’’ प्रेमा जोर से चीख उठी, ‘‘मैं अपने ही बूते पर एक दबंग नेता बनूंगी.’’

इस के बाद वह झट से बाहर निकल गई. दुर्जन सिंह को लगा, जैसे उस के हाथ से मछली फिसल गई?हो.

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