Winter Romance Special: जातिधर्म नहीं प्यार की खुमारी देखें

ये मुहब्ब्त में हादसे अकसर दिलों को तोड़ देते हैं,तुम मंजिल की बात करते हो लोग राहों में ही साथ छोड़ देते हैं इश्क की खुमारी में लोग इन बातों को गलत भी ठहरा रहे हैं. यह बात और है कि ‘ये इश्क नहीं आसां बस इतना समझ लीजे, इक आग का दरिया है और डूब कर जाना है’.

प्यार को लेकर कई तरह की बातें कही जाती हैं. कुछ लोग मानते हैं कि प्यार अंधा होता है. जहां दिल लग जाता है वहीं प्यार हो जाता है. बहुत से दूसरे लोग यह मानते हैं कि प्यार अंधा नहीं होता, बल्कि सूरत और शक्ल देख कर होता है.

असल में प्यार की खुमारी में जाति और धर्म देखने की जरूरत नहीं होती है. जो दिल को अच्छा लगे, जहां दिल मिले वहां प्यार करना चाहिए. प्यार जबरदस्ती का सौदा नहीं होता है. यह बात सच है कि प्यार जब शादी में बदलने वाला होता है, तब बहुत सारी दीवारें आज भी खड़ी हो जाती हैं.

समय के साथसाथ समाज और घरपरिवार ने कुछ समझते किए हैं, पर आज भी कई बातें ऐसी हैं, जिन को ले कर घरपरिवार और समाज तमाम तरह की रूढि़यों और कुरीतियों में फंसे हैं.

शेखर ने दिव्या के साथ 12 साल प्यार में गुजार दिए थे. जब वे 10वीं क्लास में थे, तभी से एकदूसरे को बखूबी जानतेपहचानते थे. शुरू से ही दोनों एक ही स्कूल में पढ़ते थे. एक ही गांव में रहते थे.

उन दोनों के घरपरिवार वाले भी एकदूसरे को अच्छी तरह जानते थे. इन सब से बड़ी बात यह थी कि दोनों एक ही जाति के थे. ऐसे में उन की शादी में कोई अड़चन नहीं थी. इस के बावजूद भी वे 12 साल बाद शादी कर सके.

दरअसल, स्कूल की पढ़ाई के बाद वे दोनों नौकरी करने लगे. गांव से दूर एक बड़े शहर में रहने लगे. उन के परिवार के लोग भी गांव छोड़ कर शहर में बस गए थे. इस के बाद भी शेखर और दिव्या एकदूसरे से दूर नहीं हुए.

उन दोनों के लिए अपने घर वालों को राजी करने में समय लगा. घर वाले इसलिए राजी नहीं हो रहे थे कि जाति में भी गोत्र का बंधन होता है. एक ही गोत्र में लड़कालड़की की शादी नहीं हो सकती. लिहाजा, गांव के रिश्ते में दोनों भाईबहन लगते थे.

किसी तरह जब घर वाले राजी हुए, तो उन की शर्त थी कि किसी को यह नहीं बताना कि यह शादी उन दोनों की मरजी से हुई है. शेखर और दिव्या ने इस बात के लिए हामी भर ली कि वे किसी को कुछ नहीं बताएंगे.

शादी से पहले सगाई हुई. सबकुछ ठीक था. शेखर और दिव्या ने अपने 12 साल के सबंधों को यादगार बनाने के लिए केक काटने का इंतजाम किया, जिस पर लिखा था ‘12 साल एकदूजे के साथ’.

रिश्तेदारी में कुछ लोगों की निगाह केक पर पड़ गई. वह इस का मतलब निकालने लगे. आखिर में सब को इस बात का पता चल गया कि यह शादी शेखर और दिव्या की मरजी से हो रही है. इस बात की काफी बुराई हुई. घरपरिवार के लोग अलग से नाराज हुए कि केक पर यह सब क्यों लिखा था.

पर अब कुछ हो नहीं सकता था. शेखर और दिव्या की शादी हो गई. अब वे दोनों हंसीखुशी एकदूसरे के साथ रहते हैं. इस से सबक मिलता है कि आप जिस से प्यार करें, उसे जिंदगीभर निभाएं. यही इश्क की असली खुमारी है. कई ऐसे उदहारण हैं, जो इश्क में जातिधर्म जैसी बंदिशों को स्वीकार नहीं करते हैं.

गांवों में नहीं सुधरे हालात

प्यारमुहब्बत को ले कर शहरों में तो हालात बदल गए हैं, पर गांवदेहात में अभी भी प्यार बंदिशों में रहता है. वहां नौजवानों को अपनी सोच बदलने की जरूरत है. कई नौजवान इस की कोशिश भी करते हैं. ऐसे में वे औनर किलिंग जैसी वारदातों के शिकार हो जाते हैं.

दरअसल, आजकल गांवदेहात में रहने वाली मुसलिम, एससीएसटी और ओबीसी जातियों की लड़कियां भी पढ़ने के लिए स्कूल जाने लगी हैं. वहां उन्हें अलगअलग लड़कों का साथ मिलता है. ये लड़कियां सुंदर और आकर्षक होती हैं. ऐसे में इन के साथ इश्क करने वाले कम नहीं होते हैं.

कई बार बहुत सी लड़कियां इश्क में पड़ भी जाती हैं, पर जब बात शादी की आती है, तो तमाम तरह की परेशानियां खड़ी हो जाती हैं. पर जो लड़केलड़कियां अपने पैरों पर खड़े होते हैं, वे अपने हक में फैसले कर लेते हैं.

निशा ओबीसी समाज से थी. गैरधर्म के अकील के साथ उस का इश्क हुआ. दोनों 12वीं क्लास के बाद आगे की पढ़ाई के लिए शहर चले गए. वहां उन को अच्छी नौकरी मिल गई. 2 साल के बाद उन दोनों ने शादी करने का फैसला लिया.

उन दोनों के घर वालों को जब इस बात का पता चला, तो वहां विरोध शुरू हो गया. निशा और अकील ने अपनेअपने घर वालों को समझने की लाख कोशिश की, पर कोई भी तैयार नहीं हुआ. लिहाजा, उन्होंने स्पैशल मैरिज ऐक्ट के तहत कोर्ट में शादी कर ली.

जो प्यार करने वाले जाति और धर्म को छोड़ कर इश्क की खुमारी देखते हैं, वे कामयाब होते हैं. कानून ने इस तरह के लोगों को सुरक्षा दे रखी है. जरूरत इस बात की है कि प्यार करने वाले अपने इश्क की खुमारी को पहचानें और एकदूसरे पर भरोसा रखें.

हां, यह बात जरूर है कि जब लड़कालड़की दोनों अपने पैरों पर खड़े होते हैं, तो किसी भी तरह की लड़ाई लड़ने में कामयाब हो जाते हैं. पर जब वे घरपरिवार के भरोसे रहते हैं, तो उन की शादी मुश्किल हो जाती है. लिहाजा, जाति और धर्म का कट्टरपन खत्म करने के लिए इश्क की खुमारी जरूरी है.

Cabs Service : कैसे बनते हैं कैब ड्राइवर, कितनी होती है महीने की कमाई

बाइक टैक्सी (Bike Taxi) वाली कंपनी रैपिडो (Repido) अब कैब सर्विस में भी आ गई है. कंपनी का कहना है कि उस की कैब सर्विस दूसरी कैब कंपनियों के मुकाबले काफी सस्ती होगी. रैपिडो कंपनी ने देशभर में एक लाख कारों के साथ अपनी कैब सर्विस की शुरुआत की है. इस से ओला (Ola) और उबर (Uber) जैसी कैब सर्विस देनी वाली कंपनियों पर असर पड़ सकता है.

पर अगर रोजगार की बात करें, तो कोई ड्राइवर किस तरह इन कैब कंपनियों के साथ जुड़ सकता है और कैसे कमाई कर सकता है, यह जानना भी जरूरी है. इसे हम एक कैब ड्राइवर इकबाल खान से हुई बातचीत से भी समझ सकते हैं, जो 47 साल के हैं और उबर व ओला दोनों कैब कंपनियों के साथ जुड़े हुए हैं.

इकबाल खान अपने परिवार के साथ दिल्ली के मयूर विहार फेस 1 के कोटला गांव में रहते हैं. वे पिछले 6 साल से ओला और उबर से जुड़े हैं, साथ ही फरीदाबाद की एक प्राइवेट कंपनी में भी काम करते हैं, जिस में वे गाजियाबाद से उस कंपनी के कर्मचारियों को सुबह फरीदाबाद छोड़ते हैं और शाम को 4 बजे उन्हें कंपनी से वापस गाजियाबाद ले जाते हैं. बाकी समय में वे कैब ड्राइवर के तौर पर सवारियों को लाते और ले जाते हैं.

इकबाल खान ने बताया, “पहले मेरी कोटला गांव में एम्ब्रोयडरी के काम की फैक्टरी थी और अच्छीखासी आमदनी थी, पर बाद में जीएसटी की वजह से हमारे काम पर बुरा असर पड़ा और धीरेधीरे कंपनी बंद हो गई.

“फिर एक दोस्त की सलाह पर मैं ने ड्राइवर के काम में हाथ आजमाया और अब फिर मेरी जिंदगी पटरी पर लौट आई है. जिस कंपनी में मेरी गाड़ी लगी है, वहां से मुझे महीने के 35,000 रुपए मिल जाते हैं और काम सोमवार से शुक्रवार तक रहता है.

“ओला और उबर में मेरी रोजाना की 10-12 राइड लग जाती हैं, जिन से अंदाजन 40 से 50 हजार रुपए महीने की आमदनी हो जाती है. मेरा रोज का सीएनजी गैस का 1,000 रुपए का खर्चा है. अगर कोई ग्राहक हमें कैश में पैसे देता है, तो हम कैब कंपनी को उस का कमीशन (जीएसटी समेत तकरीबन 25-30 फीसदी) दे देते हैं. अगर कोई ग्राहक औनलाइन पेमेंट करता है, तो कंपनी अपना कमीशन काट कर हमारे बैंक खाते में पैसे ट्रांसफर कर देती है.”

किसी कैब कंपनी से कैसे जुड़ा जाता है और किस तरह के दस्तावेज चाहिए? इस बारे में इकबाल खान ने कहा, “ओला जैसी कैब कंपनी के साथ अगर आप को जुड़ कर काम करना है, तो फिर आप को कुछ दस्तावेज जैसे पैनकार्ड, रद्द किया गया चैक या पासबुक, आधारकार्ड, पते का प्रमाण देना होगा. कार के कागजात के लिए आप को गाड़ी की आरसी, गाड़ी परमिट, गाड़ी के बीमा की जरूरत होगी. साथ ही ड्राइवर का लाइसैंस भी होना चाहिए.

“फिर आप को कैब कंपनी के औफिस जाना होगा. वहां कंपनी की टीम आप को पूरी जानकारी दे देगी. रजिस्ट्रेशन के लिए वह आप के दस्तावेज जांचेगी. कार और ड्राइवर का औडिट होगा. ड्राइवर को ट्रेनिंग दी जाएगी और फिर करार पर दस्तखत होंगे. पुलिस वैरिफिकेशन भी होता है.

“ड्राइवर को एप चलाना आता हो. वैसे, इस की ट्रेनिंग वीडियो द्वारा कंपनी भी देती है. उस के पास एक स्मार्ट फोन होना चाहिए और इंटरनैट सेवा भी.

“इस के अलावा बाद में कंपनी इस बात पर भी ध्यान देती है कि ड्राइवर का अपने ग्राहक के प्रति किस तरह का रवैया है. अगर उस की शिकायतें मिलती हैं, तो कंपनी उसे ‘औफ रोड’ कर देती है. ड्राइवर को कभी भी कोई नशा कर के ड्यूटी पर नहीं रहना चाहिए, उसे बात करने का सभ्य तरीका आना चाहिए और वह ग्राहक के प्रति ईमानदार भी होना चाहिए.

“अभी हाल ही में एक बुजुर्ग गुरुग्राम से मेरी कार में सवार हुए थे. वे दिल्ली के झंडेवाला इलाके में उतरे थे, पर गाड़ी में अपना मोबाइल फोन भूल गए थे. मैं ने गाड़ी में वहीं इंतजार किया, फिर उन का फोन वापस किया.

“यह रोजगार आमदनी का अच्छा जरीया है और आप अपनी सुविधानुसार कैब चला सकते हैं, क्योंकि इस में आप के पास 24 घंटे में से अपने मनमुताबिक काम करने की औप्शन है. जो लोग मेहनत कर के रोजीरोटी कमाना चाहते हैं, उन्हें यह क्षेत्र निराश नहीं करेगा.”

निम्मो: क्या मनोज को मिला उसका प्यार

बिशना ठाकुर के पास बहुत से मवेशी थे. उन की रखवाली बीरू करता था. वह तब बच्चा ही था. उस की मां ‘बडे़ घर’ यानी बिशना ठाकुर की हवेली में काम करती थीं. बीरू हमेशा घास पर सुस्त पड़ा आकाश में मंडराते कौओं को गिनता रहता था.

खेत जोतने के बाद खाना खाने के लिए मनोज घर नहीं जा पाता था कि कहीं मौका पा कर बैल सारी खेती साफ न कर डालें. अगर वे ठाकुर के खेतों में घुस जाते तो डांटफटकार सुननी पड़ती थी, इसीलिए मनोज की मां जब खेतों की रखवाली करने जाने लगतीं, तो रास्ते में उसे भात दे जाती थीं. उधर बीरू के लिए भी बड़े प्यार से कटोरदान में खाना आता था. वे दोनों साथ बैठ कर खाते थे. उसे उस कटोरदान का बड़ा घमंड था.

बीरू के लिए खाना बड़े घर की नौकरानी निम्मो लाती थी. उस घर में वह कहां से और कैसे आई, यह कोई नहीं जानता था. मनोज को यकीन था कि उसे तनख्वाह नहीं मिलती थी, बल्कि सिर्फ खाना और कपड़ा मिलता था. वह तब छोटी ही थी. उस की उम्र 13 या 14 साल रही होगी. तब मनोज 15 या 16 बरस का था.

निम्मो सांवली थी, पर थी खूबसूरत. उस की देह सुडौल और गठी हुई थी. मनोज को देखते ही निम्मो पता नहीं क्यों नाकभौं सिकोड़ लेती थी. मनोज के भात के साथ सब्जी नहीं होती थी. अचार भी बेस्वाद सा ही होता था. शायद वह इसीलिए चिढ़ती थी या फिर इसलिए कि मनोज ठाकुर के खेतों में बैल चराता था. लेकिन निम्मो उसे बहुत अच्छी लगती थी.

मनोज ने तो कई बार उस से बात करने की कोशिश की, लेकिन बदले में उसे सिर्फ झिड़कियां ही सुनने को मिलीं. बीरू को सिर्फ खाने से मतलब होता था. वह कभी निम्मो की तरफ आंख उठा कर भी नहीं देखता था.

एक दिन निम्मो ने बीरू के हिस्से में से थोड़ा सा अचार मनोज को भी दे दिया. अचार बहुत जायकेदार था. यह बात उस ने निम्मो से भी कही. उस के बाद वह हमेशा मनोज के लिए भी अचार के 1-2 टुकड़े ले आती थी. कई बार उस ने मनोज को थोड़ी सब्जी भी दी. अब वह झिड़कती तो नहीं थी, लेकिन बातें अभी भी नहीं हो पाती थीं.

निम्मो मनोज को अब बहुत ही प्यारी लगने लगी थी. उस ने कई बार उस के पास बैठ कर बातें करने की कोशिश की, पर वह ऐसे दूर भगा देती, मानो वह अछूत हो. दरअसल, मनोज उसे ही अछूत समझता था.

एक दिन बीरू खाना खा रहा था. निम्मो ने घास काटी और गट्ठर बांधा. फिर कटोरदान धो कर घर जाने की तैयारी करने लगी. वह चाहती थी कि मनोज घास का गट्ठर उस के सिर पर रखवा दे. वह बोली, ‘‘यह बीरू से तो उठेगा नहीं.’’

मनोज ने गट्ठर उस के सिर पर रखवा दिया. तब उसे पता चला कि वह बहुत ही हलका था. उसे उठाने के लिए किसी की मदद की जरूरत नहीं थी.

वे दोनों आमनेसामने खड़े थे. सिर पर गट्ठर रखवाते हुए मनोज के हाथ निम्मो की छातियों से टकरा गए. उसे झुरझुरी सी महसूस हुई. सारा शरीर गरम हो गया और दिल जैसे आसमान में उड़ने लगा.

निम्मो मुंह फेर कर ऐसे भागी, जैसे वह बहुत जल्दी में हो. मनोज उसे देखता ही रह गया. बीरू तब भी आसमान में मंडराते हुए कौए गिन रहा था.

इस घटना के बाद मनोज निम्मो को और भी ज्यादा चाहने लगा. जायकेदार अचार में से एक हिस्सा उसे मिलता रहता था. अब तो सब्जी भी रोजाना मिलने लगी. बीरू इस बात से चिढ़ता था, लेकिन छोटा होने की वजह से एतराज नहीं कर पाता था.

निम्मो ने अब रोजाना घास ले जाना शुरू कर दिया. उस का गट्ठर हर रोज भारी होता जा रहा था. मनोज निम्मो के जिस्म के सुडौल हिस्सों की बनावट पहचानने लगा था.

इस बीच मनोज निम्मो को पागलपन की हद तक चाहने लगा था. बिशना ठाकुर को मदद की जरूरत होती तो वह खुशी से चला जाता, ताकि निम्मो के साथ काम कर सके. वह घास के गट्ठर उठाने में हमेशा उस की मदद करता.

इस दौरान निम्मो से मनोज की बात नहीं हो पाई, क्योंकि खेतों में काम करने वाली औरतें उसे नफरत भरी निगाहों से देखती थीं. मनोज यह सब ताड़ जाता और लोगों की मौजूदगी में निम्मो भी ऐसा दिखावा करती, जैसे उस से बहुत नफरत करती हो. तब वह परेशान हो जाता. समझ नहीं पाता कि क्या करे.

फसल कटने के बाद निम्मो से मुलाकात नहीं हो पाई थी. मनोज बेचैनी से इंतजार करने लगा कि कब सर्दियां आएं और उसे पशुओं की रखवाली का मौका मिले.

उन्हीं दिनों बिशना ठाकुर की पत्नी बीमार हो गईं, इसलिए निम्मो के लिए घर के तमाम काम बढ़ गए. उस ने घास काटना बंद कर दिया. एक दिन वह बीरू को खाना पहुंचाने आई, तो उस के साथ एक और लड़की भी थी.

उस दिन निम्मो ने घास काटी और मनोज ने हमेशा की तरह गट्ठर उठाने में उस की मदद की. वह बोली, ‘‘आज से मेरी जगह यह लड़की खाना लाया करेगी.’’

मनोज के घर की माली हालत अच्छी नहीं थी. पिताजी अब भी कर्ज में डूबे हुए थे. सारी कमाई तो ब्याज में चली जाती थी. जरूरी कामों के लिए फिर कर्ज लेना पड़ता था. जिंदगी में बड़ी कड़वाहट आ चुकी थी.

उन्हीं दिनों गांव के कुछ लड़के कोलकाता चले गए थे. वे छुट्टी ले कर घर आते तो सारे गांव में उन का रोब पड़ता था. आखिरकार एक दिन मनोज भी अपने ही गांव के एक लड़के तिलक के साथ कोलकाता चला गया. वहां जा कर वह एक कारखाने में मजदूरी करने लगा.

मनोज के दोस्त छुट्टियों में घर जाते, लेकिन वह नहीं जाता था मानो इस काम के लिए उस के पास पैसे ही न हों. पिताजी चिट्ठियों में पैसों के लिए तकाजा करते, तो वह उन को मनीऔर्डर भेज दिया करता.

तकरीबन 3 साल बाद कारखाने की नौकरी छोड़ कर मनोज ने पान और सिगरेटबीड़ी की छोटी सी दुकान खोल ली. देखते ही देखते अच्छी आमदनी होने लगी. वह हर महीने अपने पिताजी को मनीऔर्डर भेजता रहता था. इस दौरान निम्मो के बारे में उसे कोई खबर नहीं मिली. वह अब उस से मिलने के लिए बेताब रहने लगा था.

इसी तड़प ने मनोज को गांव जाने के लिए मजबूर कर दिया. वहां पहुंचते ही उस ने सब से पहले निम्मो का पता लगाया. मालूम हुआ कि बिशना ठाकुर की बीवी को मरे 2 साल हो चुके हैं और उस घर में अब निम्मो का रोब चलता है. खेतों में काम करना तो दूर, वह उन दिनों घर से बहुत ही कम बाहर निकलती थी. अब वह कपड़े भी शानदार पहनती थी. नौकरचाकर उस से कांपते थे.

पिताजी के मना करने पर भी मनोज बिशना ठाकुर से मिलने बड़े घर गया. वहां पर न तो निम्मो दिखाई पड़ी और न ही उस के बारे में किसी से पूछा ही. बीरू ने भी कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई. मनोज ने इधरउधर की कुछ बातें पूछीं, पर वह टाल गया.

मनोज बहुत बेचैन रहा. बड़े तालाब के किनारे सब्जियों का खेत था. एक दिन वहां से गुजरते वक्त मनोज ने देखा कि निम्मो कोई सब्जी तोड़ रही है. उस की जवानी और गदराए बदन को देख कर वह सिहर उठा. एकटक उस की तरफ देखता रहा. समझ में नहीं आ रहा था कि उस से क्या कहे. आखिर में हिम्मत कर के उसे अपने पास बुला ही लिया.

निम्मो ने मुड़ कर मनोज की तरफ देखा, लेकिन उस के चेहरे पर जरा भी परेशानी नहीं थी.

‘‘निम्मो, मैं कोलकाता से कुछ दिनों के लिए आया हूं. मैं ने ठाकुर का सारा कर्ज चुका दिया है,’’ मनोज ने मुसकराते हुए कहा.

निम्मो खामोश ही रही. मनोज की बात को जैसे उस ने सुना ही न हो.

अचानक मनोज पूछ बैठा, ‘‘क्या हम… शादी कर सकते हैं?’’

‘‘नहीं…’’ वह उसे घूरते हुए बोली.

‘‘क्यों?’’

निम्मो ने तपाक से जवाब दिया, ‘‘मैं तुम्हें नहीं चाहती. अगर तुम ने ठाकुर का कर्ज चुका दिया है, तो कौन सा एहसान किया है… वैसे, कोलकाता में मजदूरी ही तो करते हो…’’

‘‘नहीं निम्मो,’’ मनोज ने उसे टोकते हुए कहा, ‘‘पिछले साल मैं ने पानसिगरेट की दुकान खोल ली थी. अब मैं काफी पैसे कमा लेता हूं.’’

मनोज ने अपने उजले कपड़ों और घड़ी की ओर निगाह डालते हुए अकड़ कर कहा, ‘‘तुम्हें पहले वाले और अब के मनोज में कोई फर्क नजर नहीं आ रहा? मैं तुम्हें पलकों पर बिठाऊंगा.’’

‘‘बसबस… अब ज्यादा शेखी बघारने की जरूरत नहीं,’’ निम्मो ने नफरतभरी नजरों से मनोज की ओर देखा, ‘‘पान की दुकान खोल लेने से कोई धन्ना सेठ तो नहीं बन गए. मैं भी अब पहले वाली निम्मो नहीं रही… ठाकुर की हवेली की मालकिन हूं.

‘‘फेरे नहीं लिए तो क्या हुआ… ठाकुर तो अब दिनरात मेरे तलवे चाटता है. जहांजहां तक उस का दबदबा है, वहांवहां पर अब मेरी हुकूमत चलती है.

‘‘जितना तुम महीने में कमाते हो, उतना तो मैं बिंदी, पाउडर और क्रीम पर ही खर्च कर देती हूं,’’ निम्मो ने होंठों को सिकोड़ते हुए ताना कसा, ‘‘अरे कंगले, यहां मैं लाखों की मालकिन हूं… नौकरचाकर मुझे ‘सेठानी’ कहते हैं. मुझ से ब्याह करने के सपने अब भूल कर भी मत देखना… अपनी औकात मत भूल,’’ निम्मो गुस्से से पैर पटकते हुए हवेली की ओर चली गई.

मनोज डबडबाई आंखों से उसे जाते हुए देखता रहा. घर लौटते समय इस मतलबी दुनिया की सचाई उस की आंखों के आगे घूमने लगी, ‘इस दुनिया में पैसा ही सबकुछ है. पैसे के बिना आदमी की औकात दो कौड़ी की भी नहीं होती.’

गांव अब मनोज को काटने को दौड़ रहा था. वह मायूस रहने लगा. मां के आंसुओं की परवाह किए बगैर वह इस वादे के साथ कोलकाता लौट गया कि उसे अब उसे ज्यादा से ज्यादा पैसा कमाना है.

अब मनोज सुबह 8 बजे से ले कर रात 10-11 बजे तक दुकान खुली रखता, खूब मेहनत करता. नजदीक ही एक सिनेमाहाल बन जाने की वजह से वह दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की करने लगा. एक छोकरा भी मदद के लिए रख लिया. लेकिन गांव से सैकड़ों मील दूर कोलकाता में रहते हुए भी वह निम्मो को भुला नहीं पाया.

तकरीबन ढाई साल बाद मनोज फिर गांव गया. वह निम्मो से मिलने के लिए बेचैन था. शाम को उस के पैर बड़े घर की ओर बढ़ चले थे. थोड़ा आगे जाने पर उसे अपना पुराना दोस्त चमन मिल गया.

बातों ही बातों में मनोज ने चमन से निम्मो के बारे में पूछा, तो उस ने एक जोरदार ठहाका लगाया, ‘‘अरे, उस की मत पूछ… खुद को मालकिन और सेठानी समझने लगी थी, पर ठाकुर के मरते ही वह अपनी औकात पर आ गई…’’

‘‘क्या ठाकुर चल बसे…?’’ मनोज ने चौंक कर पूछा.

‘‘अरे, तुम्हें मालूम नहीं,’’ चमन हैरानी से बोला, ‘‘3-4 महीने पहले ही तो उन की मौत हुई थी. जैसे ही ठाकुर ने आंखें मूंदी, उन के बेटों ने उस बेहया को जूते मारमार कर हवेली से बाहर निकाल दिया.’’

‘‘तो निम्मो अब कहां रहती है?’’ मनोज ने जल्दी से पूछा.

‘‘अरे भैया, रहना कहां है… अपने सूबेदार जैमल सिंह दयालु आदमी हैं. उन्होंने उसे एक छोटी सी कोठरी रहने को दे रखी है. उन्हीं के खेतों में मजदूरी करती है और घर में सूबेदारनी की सेवाटहल करती रहती है… बड़ी चली थी मालकिन बनने…’’ कह कर चमन खिलखिलाता हुआ आगे बढ़ गया.

मनोज चंद पलों के लिए तो हक्काबक्का वहीं खड़ा रहा. अंधेरा घिर आया था. वह थके कदमों से घर की ओर चल पड़ा. खाना भी उस ने बेमन से खाया. रात को एक पल के लिए भी उसे नींद नहीं आई. सुबह जल्दी से नहाधो कर वह सूबेदार जैमल सिंह के घर की ओर चल पड़ा. बाहर का दरवाजा भीतर से बंद था. खटखटाने के थोड़ी देर बाद दरवाजा खुला.

अचानक निम्मो को बेचारगी की हालत में देख मनोज हैरान रह गया. वह एकदम सूख कर कांटा हो गई थी. चेहरे पर जैसे कालिख पोत दी गई थी.

मनोज कुछ कह पाता, इस से पहले ही वह धीरे से बोली, ‘‘तुम… कोलकाता से कब आए?’’

‘‘सूबेदारजी घर पर हैं?’’ मनोज ने धीरे से पूछा.

‘‘नहीं… घर में इस वक्त मैं अकेली ही हूं… सभी लोग पास के गांव में एक ब्याह में गए हैं.’’

‘‘चलो, यह भी अच्छा हुआ निम्मो, मैं सिर्फ तुम से ही मिलने आया हूं… अंदर आने को नहीं कहोगी?’’

‘‘मुझे से मिलने…? खैर, आओ,’’ कह कर निम्मो अंदर की ओर मुड़ गई.

मनोज उस के पीछेपीछे आंगन में जा कर चारपाई पर बैठ गया. निम्मो जमीन पर बिछी बोरी पर बैठ गई.

‘‘निम्मो, मेरे पास ज्यादा वक्त नहीं है… और, वैसे भी हमें यहां अकेले… यानी मैं और तुम… लोग बेकार में बातें बनाएंगे…’’

‘‘मैं बहुत बदनाम हो चुकी हूं… मैं… बस एक जिंदा लाश बन कर रह गई हूं,’’ डबडबाई आंखों से वह बोली, ‘‘खैर, यह बताओ, मुझ से क्या काम है?’’

‘‘ढाई साल पहले मैं ने तुम्हारे सामने शादी की बात रखी थी, मगर तब की बात और थी. मुझे चमन ने सबकुछ बता दिया है. जो हुआ उसे भूल जाओ… मैं आज भी तुम्हारे लिए तड़प रहा हूं… मुझे तुम्हारी जरूरत है निम्मो, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

‘‘क्या…? सबकुछ जानने के बाद भी…?’’ निम्मो ने मनोज को घूरते हुए कहा, ‘‘तुम सचमुच पागल हो. यहां गांव के लोग मुझे धंधेवाली, रखैल… और न जाने क्याक्या कहते रहते हैं… और तुम मुझ से ब्याह करोगे? यह दुनिया बहुत जालिम है. फिर मैं ने तो हमेशा तुम्हारी बेइज्जती ही की है… तुम्हें दुत्कारा है…’’

‘‘मैं कुछ नहीं सुनना चाहता. मैं अच्छी तरह जानता हूं कि मेरे घर वाले, जातिबिरादरी और गांव वाले मुझे ऐसा कदम उठाने की कभी भी इजाजत नहीं देंगे… लेकिन मैं हर हालत में तुम से ही ब्याह करूंगा.’’

मनोज पलभर रुक कर आगे बोला, ‘‘मैं मांबाप से कोलकाता जल्दी लौटने का कोई बहाना बना लूंगा… तुम आज से ठीक 3 दिन बाद… यानी इतवार की सुबह मुझे स्टेशन पर मिलना. गाड़ी

7 बजे यहां पहुंचती है… सोमवार की सुबहसुबह हम कोलकाता पहुंच जाएंगे, जहां हम ब्याह करेंगे और अपनी एक नई दुनिया बसाएंगे… अब इनकार मत करना.’’

‘‘यकीन रखो, मैं जरूर आऊंगी. तुम स्टेशन पर मेरा इंतजार करना,’’ निम्मो ने हौले से कहा.

इतवार की सुबह 6 बजे ही मनोज रेलवे स्टेशन पर पहुंच गया था. अभी चारों ओर अंधेरा ही था. वह बेसब्री से निम्मो का इंतजार करने लगा.

धीरेधीरे अंधेरा छंटने लगा था. लेकिन मनोज दुख, चिंता और नाकामियों के अंधेरे में घिरता चला जा रहा था. घड़ी में समय देखा. 7 बजने में 10 मिनट बाकी थे. उस की उम्मीदों पर काली छाया फैलने लगी थी कि अचानक निम्मो को आते हुए देख कर वह उस की ओर दौड़ा.

निम्मो के पास पहुंच कर मनोज ने हांफते हुए कहा, ‘‘निम्मो, गाड़ी आने ही वाली है… मैं टिकट ले कर आता हूं. हमें होशियार रहना होगा… कहीं कोई जानपहचान वाला न मिल जाए… बेकार में मुसीबत खड़ी हो जाएगी.

‘‘मैं तुम्हें इशारा करूंगा. तुम जनाना डब्बे में चढ़ जाना. अगले स्टेशन पर मैं तुम्हें अपने डब्बे में ले आऊंगा.’’

‘‘ठीक है,’’ निम्मो ने इधरउधर देखते हुए डरी हुई आवाज में कहा.

मनोज फौरन टिकट ले कर प्लेटफार्म पर आ खड़ा हुआ. जल्दी ही गाड़ी आ गई. वह निम्मो के करीब पहुंच गया और इशारे से उसे जनाना डब्बे में चढ़ा कर दरवाजे पर ही खड़ा हो गया. तभी गार्ड ने सीटी बजाई और हरी झंडी दिखाई.

धीरेधीरे गाड़ी सरकने लगी. मनोज खिड़की के पास वाली सीट पर बैठ गया. सुबह की ठंडी हवा के झोंकों के संग मनोज को यों महसूस हुआ, जैसे वह किसी उड़नखटोले पर सवार हो कर ऊंचे, नीले आसमान में घने बादलों में तैरता हुआ उड़ा चला जा रहा है. उस उड़नखटोले में वह अकेला नहीं था, उस की निम्मो भी उस के साथ थी.

नई शुरुआत: सुमन क्यों जलने लगी थी बॉयफ्रेंड राजीव से

सुमन और राजीव दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे. दोनों बीएससी फाइनल में होने के बावजूद अलगअलग सैक्शन में पढ़ रहे थे. उन दोनों की पहली मुलाकात एक लाइब्रेरी में हुई थी. राजीव ने अपनी तरफ से नोट्स देने में सुमन की पूरी मदद की थी. यह बात सुमन को छू गई थी. राजीव वैसे भी लड़कियों से दूर ही रहता था. स्वभाव से शर्मीले राजीव को सुमन का सलीके से रहना पसंद आ गया था.

‘‘राजीव सुनो, क्या तुम मुझे एक कप चाय पिला सकते हो? मेरा सिरदर्द से फटा जा रहा है,’’ असल में सिर दर्द का तो बहाना था, सुमन राजीव के साथ कुछ देर रहना चाहती थी.

‘‘वैसे, मैं चाय नहीं पीता, लेकिन चलो तुम्हारे साथ पी लूंगा,’’ राजीव कहते हुए थोड़ा झेंप सा गया, तो सुमन मुसकरा दी. कालेज की कैंटीन की बैंच पर बैठ कर राजीव ने 2 कप चाय और्डर कर दी. सुमन बातचीत का सिलसिला शुरू करने की कोशिश करने लगी, ‘‘तुम्हारे, मेरा मतलब है कि आप के घर में और कौनकौन है?’’

‘‘जी, मेरा एक बड़ा भाई है और मांबाबूजी,’’ राजीव ने नजरें झुका कर जवाब दिया.

‘यह लड़का कहीं पिछले जन्म में लड़की तो नहीं था?’ राजीव की झिझक और शराफत देख कर सुमन सोचने लगी.

‘‘जी, आप ने मुझ से कुछ कहा?’’ राजीव ने सवाल किया, तो वह कुछ अचकचा सी गई.

‘‘बिलकुल नहीं जनाब, आप से नहीं कहूंगी तो क्या इस कैंटीन की छत से कहूंगी?’’ सुमन बोली.

इतने में बैरा चाय ले आया. राजीव ने कालेज के दूसरे लड़कों की तरह न तो बातचीत का सिलसिला आगे बढ़ाया और न ही कोई ऐसीवैसी हरकत करने की कोशिश की.

‘‘चलो चलें, पीरियड का समय हो गया है शायद,’’ अपनी चाय खत्म करते हुए राजीव बोला, तो मजबूरी में सुमन को भी अपनी चाय जल्दीजल्दी पीनी पड़ी.

इस मीटिंग के बाद न राजीव ने कोई दिलचस्पी दिखाई और न ही सुमन को राजीव से बात करने का मौका मिला.

‘‘तू ने तीर तो बिलकुल सही निशाने पर लगाया है राजीव. सुमन की एक झलक पाने के लिए लड़के लाइन लगाए खड़े रहते हैं, पर उस ने केवल तुझे घास डाली है,’’ राजीव की क्लास के दोस्त उसे छेड़ते.

‘‘तुम जैसा समझ रहे हो, वैसा कुछ नहीं है. उस ने मुझ से नोट्स मांगे थे और मैं ने दे दिए. बस, इस से ज्यादा कुछ भी नहीं,’’ राजीव झल्ला कर कहता.

‘‘तुम ने न जाने उस लल्लू कबूतर में ऐसा क्या देखा है जानेमन? एक नजर हम पर भी डाल दो. न जाने कब से लाइन लगा कर खड़े हैं तुम्हारे दीदार के लिए,’’ राजीव के साथ सुमन को देख कर दूसरे लड़कों के सीने पर भी सांप लोट जाता.

‘‘राजीव, चलो न कहीं घूम आते हैं. वैसे भी आज गुप्ता सर का पीरियड नहीं होने वाला है, क्योंकि वे आउट औफ स्टेशन हैं,’’ एक दिन सुमन ने राजीव को अपने पास बुला कर कहा.

‘‘पीरियड खाली है तो चलो लाइब्रेरी में चलते हैं, वहीं बैठ कर कुछ समय का सही इस्तेमाल करते हैं,’’ राजीव ने घमूने जाने के अरमान पर पानी फेरते हुए कहा, तो सुमन ने इसे अपनी हेठी समझ और पैर पटकते हुए राजीव को अकेला छोड़ कर चली गई.

सुमन को राजीव द्वारा इस तरह साफ इनकार करना बिलकुल पसंद नहीं आया. अपने साथ हुई इस बेइज्जती का बदला लेने के लिए वह तड़प उठी.

बहुत जल्दी ही सुमन को राजीव से अपनी बेइज्जती का बदला लेने का मौका भी मिल गया. एक दिन जब राजीव लाइब्रेरी से निकल कर अपनी क्लास की तरफ जा रहा था, तभी उस का ध्यान कहीं और होने के चलते वह एक लड़की नीलम से टकरा गया.

अचानक लगी इस टक्कर से नीलम खुद को संभाल न पाई और जमीन पर गिर गई. हालांकि उन दोनों ने ‘आई एम सौरी’ कह कर इस घटना को तूल नहीं दिया, पर सुमन ने बात का बतंगड़ बना कर हंगामा मचा दिया.

देखते ही देखते लड़कों की भीड़ वहां जमा हो गई और उन्होंने राजीव का कौलर पकड़ कर उसे नीलम से माफी मांगने के लिए मजबूर कर दिया.

राजीव को अपराधी की तरह खड़ा देख कर लड़कियों को बहुत मजा आ रहा था. बेचारा राजीव क्या करता, उसे कान पकड़ कर न केवल

माफी मांगनी पड़ी, बल्कि इतने सारे छात्रों के सामने जलील भी होना पड़ा.

सुमन को यह सब देख कर बहुत अच्छा लग रहा था, क्योंकि उस ने अपनी बेइज्जती का बदला जो राजीव से ले लिया था.

इस घटना को कई दिन बीत गए. राजीव हमेशा अपने काम से काम रखता था. यही बात सुमन को चुभ जाती थी और उसे रिएक्ट करने के लिए मजबूर कर देती थी.

दरअसल, सुमन यह चाहती थी कि राजीव उस के आसपास मंडराए और उस की जीहुजूरी करे. उसे ऐसा ही बौयफ्रैंड चाहिए था, जो उस के नखरे सह सके.

कुछ ही दिनों में छात्र संघ के चुनाव होने जा रहे थे. राजीव के दोस्त चाहते थे कि वह छात्र संघ अध्यक्ष का चुनाव लड़े. राजीव ऐसा नहीं चाहता था, पर दोस्तों के दबाव में उसे राजी होना ही पड़ा. उस का मुकाबला मोहित से था.

मोहित दबंग किस्म का हुल्लड़बाज लड़का था, जो किसी भी तरह अध्यक्ष पद पर काबिज होना चाहता था. लड़कों को अपने पक्ष में करने के लिए उस ने पैसा पानी की तरह बहाना शुरू कर दिया था, जबकि राजीव के पास लगाने के लिए ज्यादा पैसा नहीं था.

सुमन भी बढ़चढ़ कर मोहित के पक्ष में वोटिंग कराने के लिए कोई कसर नहीं छोड़ रही थी. राजीव को दब्बू, नकारा और कबूतर साबित करने के लिए उस ने झूठीसच्ची कहानियां भी छात्रों को सुनाईं, ताकि वह हार जाए और एक बार फिर उस के कलेजे को ठंडक पहुंचे.

चुनाव नतीजे आए, तो सब ने दांतों तले उंगली दबा ली. राजीव जीत गया था. सुमन के सारे अरमान हवा हो गए. जीत की खुशी में दोस्तों ने राजीव को अपने कंधे पर उठा लिया और गुलाल उड़ाते हुए कालेज का चक्कर लगाने लगे.

‘‘जीत मुबारक हो राजीव. मुझे पता था कि तुम ही यह चुनाव जीतोगे,’’ सुमन ने रस्मीतौर पर राजीव को बधाई देते हुए कहा, तो उस ने हाथ जोड़ दिए.

राजीव के रवैए से सुमन समझ गई कि वह उस की असलियत को जान चुका है, इसलिए उस ने अब राजीव के बारे में सोचना बंद कर दिया था. उसे अब राजीव से कोई मतलब नहीं रह गया था.

इधर सुमन के घर वाले भी अब उस का रिश्ता पक्का करना चाहते थे. उन्होंने कई लड़के सुमन को दिखाए भी, पर उन में से कोई भी उसे नहीं जंच रहा था. उधर राजीव अपनी ग्रेजुएशन पूरी कर के अच्छी नौकरी पर लग चुका था. एक तरह से सुमन उसे भुला ही चुकी थी.

‘‘सुमन, जल्दी से तैयार हो जाओ. लड़के वाले तुम्हें देखने आ रहे हैं. उन के आने का समय हो गया है,’’ एक शाम जब सुमन दोपहर में सो कर उठी, तो उस की मम्मी ने आ कर बताया.

सुमन अब एक तरह से लड़कों के आ कर देखे जाने से उकता चुकी थी. उसे अब इन बातों में इंटरैस्ट कम होता जा रहा था.

‘‘कौन है वह? और क्या करता है?’’ खुद को आईने में देखते हुए सुमन ने अपनी मां से पूछा, तो उन्होंने बताया कि लड़का अच्छी पोस्ट पर है और अच्छे खानदान से है.

खैर, सुमन को तो यह सब झेलने की आदत हो चुकी थी. बाहर कार का हौर्न बजा तो घर वाले सतर्क हो गए. सुमन ने भी एक बार अपने मेकअप और ड्रैस को अच्छे से देख कर सही कर लिया.

अब सुमन को चाय की ट्रे ले कर ड्राइंगरूम में जाना था. जैसे ही वह ट्रे ले कर वहां पहुंची, उस की नजर उसे देखने आए लड़के पर गई. उसे देखते ही वह बुरी तरह से चौंक गई और चाय की ट्रे उस के हाथ से गिरतेगिरते बची.

‘‘राजीव. तुम…?’’ दोनों शब्द उस के होंठों में फंस कर रह गए थे.

राजीव ने अपनी आदत के मुताबिक खड़े हो कर पहले हाथ जोड़े और फिर उसे हैलो कहा. उस का अंदाज बिलकुल नपातुला था.

बातों ही बातों में सुमन को पता चला कि राजीव एक अच्छी फर्म में मैनेजर हो चुका है और अच्छीखासी तनख्वाह पा रहा है.

‘‘सुमनजी, क्या आप को लगता है कि मैं आप का लाइफ पार्टनर बनने के काबिल हूं? अगर आप का दिल इस बात की गवाही देता हो तो ही आप हां करना, वरना साफ इनकार कर देना.’’

एकांत में जब राजीव ने सुमन से बड़े ही अदब के साथ पूछा, तो सुमन जैसे शर्म के मारे जमीन में गड़े जा रही थी. उसे लगा, जैसे राजीव ने उस से अपनी सारी बेइज्जती का बदला इस एक सवाल से ले लिया हो.

‘‘यह सवाल तो मुझे आप से करना चाहिए था. मेरी इतनी गलतियों को माफ करने के बाद भी अगर आप मुझे अपनाने के बारे में सोच रहे हैं, तो यह आप की महानता है. मैं आप की गुनाहगार हूं, आप जो चाहे सजा मुझे दे सकते हैं,’’ सुमन के चेहरे पर शर्मिंदगी के भाव साफ नजर आ रहे थे.

‘‘अरे, आप तो रोने लगीं. माफी चाहता हूं कि मेरी वजह से आप का दिल दुखा. शादीब्याह कोई गुड्डेगुडि़या का खेल नहीं होता. मैं नहीं चाहता कि पुरानी यादें हमारी नई जिंदगी की शुरुआत में रोड़ा अटकाएं, इसलिए जो भी फैसला करो, सोचसमझ कर ही करना,’’ कह कर राजीव जाने को तैयार हुआ, तो सुमन उस के पैरों में गिर पड़ी.

‘‘यह आपआप क्या लगा रखी है राजीव? तुम्हारी बीवी बन कर मैं अपने सारे पापों का पछतावा करना चाहती हूं. क्या तुम मुझे यह मौका दोगे?’’

‘‘सोचेंगे…’’ उस समय बस इतना ही कह कर राजीव वापस ड्राइंगरूम में चला गया और अपनी मां के कान में कुछ फुसफुसा दिया.

‘‘भई, मेरे बेटे और हमें तो लड़की पसंद है. अगर सुमन को कोई एतराज न हो, तो आप दोनों की शादी तय कर दीजिए,’’ राजीव की मम्मी के कहे ये शब्द सुमन के कानों में मिश्री की तरह घुलते जा रहे थे. उस के मन की घबराहट अब धीरेधीरे खत्म होती जा रही थी.

भोजपुरी का यह ‘चौकलेटी बौय’ 9 महीने फिल्म की शूटिंग, 3 महीने खेती करता है

भोजपुरी सिनेमा कुछ चुनिंदा कलाकारों की बदौलत जाना जाता है. भोजपुरी के जो कलाकार आज बुलंदियों पर हैं, उस में उन की गायकी का बहुत बड़ा योगदान रहा है. भोजपुरी सिनेमा में गायक से नायक बने ऐक्टरों को छोड़ दिया जाए, तो जितने भी लोग भोजपुरी सिनेमा में अपनी किस्मत अजमाने आए, उन्हें दर्शकों ने एक सिरे से नकार दिया. लेकिन भोजपुरी सिनेमा में ऐक्टर विमल पांडेय एक ऐसा नाम हैं, जिन का गायन से दूरदूर तक कोई नाता नहीं रहा है. इस के बाद भी वे भोजपुरी सिनेमा के सब से कामयाब और बिजी ऐक्टरों में गिने जाते हैं.

विमल पांडेय भोजपुरी में लगातार सुपरहिट फिल्में देने की वजह से आजकल काफी सुर्खियों में हैं. भोजपुरिया बैल्ट में ‘चौकलेटी बौय’ और ‘लवर बौय’ के नाम से चर्चित विमल पांडेय ने इस भरम को तोड़ने में भी कामयाबी पाई है कि भोजपुरी सिनेमा में वही हीरो के तौर पर कामयाब हो सकता है, जिस ने गायकी के जरीए ऐक्टिंग जगत में कदम रखा है.

भोजपुरी में दर्जनों रोमांटिक फिल्में देने वाले विमल पांडेय की फिल्म ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’ ने लंबे समय बाद सिनेमाघरों के सूखे को खत्म करते हुए लगातार 3 हफ्ते तक हाउसफुल रहने का रिकौर्ड बनाया.

विमल पांडेय ने ‘मातृभूमि’, ‘मेरे हमसफर’, ‘आईपीएस देवी’, ‘गंगा तेरी मैली हो गई’, ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’, ‘दीवाना मैं या तू’, ‘बलम मोरा रंगरसिया’, ‘दिल धड़के तोहरे नाम’, ‘मैं हूं मजनू तेरा’, ‘हमरे मरद के मेहरारू’, ‘अकेले हम अकेले तुम’ जैसी दर्जनों फिल्में की हैं, जिन में से कुछ जल्द ही रिलीज होने वाली हैं.

उत्तर प्रदेश के गोरखपुर में अपनी फिल्म के प्रमोशन के सिलसिले में आए विमल पांडेय से हुई मुलाकात में लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :

भोजपुरी सिनेमा में बिना गायक बने आप को बतौर हीरो इतनी बड़ी कामयाबी कैसे मिली?

भोजपुरी में मेरी कामयाबी का राज केवल नैचुरल ऐक्टिंग और मेरा हीरो वाला लुक रहा है. मैं ने शुरुआती दौर में छोटेछोटे रोल के जरीए फिल्मों में पहचान बनाने की कोशिश की थी, लेकिन मेरी अदाकारी और लुक को देखते हुए मेरे ऊपर फिल्मकारों ने दांव लगाया, जिस का नतीजा यह रहा कि दर्शकों ने मुझे खूब प्यार दिया और फिल्मों में मुझे लगातार कामयाबी मिलती गई. मैं आज गर्व से कहता हूं कि मेरी कामयाबी में दर्शकों के साथसाथ फिल्म प्रोड्यूसरों के भरोसे का बड़ा योगदान रहा है.

आप की फिल्म ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’ सिनेमाघरों में लगातार 3 हफ्ते तक हाउसफुल रही है. इस बारे में आप कैसा महसूस कर रहे हैं?

मुझे खुशी है कि मेरी इस फिल्म ने लंबे समय के बाद टिकट खिड़की के दबाव को कम किया है. मुझे यकीन है कि इस से भोजपुरी सिनेमा में निराशा का दौर छंटेगा.

फिल्म ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’ में ऐसा क्या था, जो यह फिल्म इतनी बड़ी हिट रही?

यह एक फुल कौमेडी और पारिवारिक फिल्म है, जिस में सभी कलाकारों ने अपना बैस्ट देने की कोशिश की है. भोजपुरी सिनेमा में ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’ के रूप में दर्शकों को लंबे समय बाद ऐसी फुल मस्ती वाली फिल्म देखने को मिली थी और यही वजह है कि यह फिल्म हिट साबित हुई है.

आप ने अचानक फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन में भी कदम रख कर सब को चौंका दिया है. इस की क्या वजह है?

भोजपुरी सिनेमा में फिल्में तो बहुत बन रही हैं, लेकिन फिल्मों को मनचाही कामयाबी न मिलने से डिस्ट्रीब्यूटर पैसा लगाने से डरते हैं, इसीलिए मैं ने यह फैसला लिया कि भोजपुरी सिनेमा से जुड़े इस मिथक को मैं तोडूंगा. लिहाजा, मैं ने अपनी फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन कंपनी ‘विमल कुमार पांडेय ऐंटरटेनमैंट’ बना कर उत्तर प्रदेश सिनेमाघरों में अपनी ही फिल्म ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’ को रिलीज किया.

भोजपुरी के आप पहले ऐक्टर हैं, जो अपनी ऐक्टिंग के साथसाथ खेतीबारी को भरपूर समय देते हैं. लगातार फिल्मों की शूटिंग और इस के साथसाथ खेतीबारी का काम एकसाथ कैसे हो पाता है?

आप का प्रोफेशन आप की बुनियादी जरूरतें पूरी कर सकता है. आप की ख्वाहिशें पूरी कर सकता है, लेकिन पेट की आग केवल अनाज के निवाले से बुझ सकती है. मैं क्या दुनिया का कोई भी इनसान बिना खाए नहीं रह सकता है, इसलिए मैं जितना जरूरी अपने ऐक्टिंग प्रोफैशन को मानता हूं, उस से ज्यादा अपने बापदादा की विरासत और खेतीबारी को मानता हूं, इसलिए मैं खेतीबारी के सीजन में बोआई, कटाई और मंड़ाई के समय में फिल्मों के शूटिंग की तारीख नहीं देता हूं, बल्कि इन दिनों मै अपना पूरा समय खेतीबारी को देता हूं.

मेरा मानना है कि हर इनसान अगर साल के 3 महीने खेतीबारी को दे और 9 महीने अपने प्रोफैशन को दे, तो देश में कोई भी आदमी भूखा नहीं रहेगा.

भोजपुरी फिल्मकारों का का कहना है कि आप हमेशा खुद को चुनौती देना पसंद करते हैं. इस बारे में आप का क्या कहना है?

जिस क्षेत्र में चुनौतियां होती हैं, उस के जब नतीजे आते हैं, तो वे लीक से हट कर होते हैं. मेरा भी यही मानना है कि जब तक मेरे अभिनय में चुनौती नहीं होगी, तब तक मैं अपने असली हुनर को दर्शकों के सामने नहीं ला पाऊंगा, इसीलिए मैं हमेशा चुनौतियों वाले रोल ही पसंद करता हूं.

आप का खुद कहते हैं कि आप को चुनौतियां पसंद हैं, तो फिर भोजपुरी में सुपरहीरो पर फिल्में कब बनेंगी?

भोजपुरी में भी सुपरहीरो पर फिल्में बनेंगी और कामयाब भी होंगी. अभी भोजपुरी में सुपरहीरो पर फिल्में बनने का समय नहीं है, क्योंकि भोजपुरी फिल्मों का बजट उतना नहीं है, जितने में सुपरहीरो वाली फिल्में बनाई जा सकें. लेकिन आप ने बात छेड़ ही दी है, तो आप को भरोसा दिलाता हूं कि भोजपुरी में सुपरहीरो वाली पहली फिल्म की घोषणा मैं जल्द ही करूंगा.

ऐक्टिंग लाइफ से जुड़ा कोई ऐसा किस्सा जो आप को अच्छा न लगा हो?

हाल ही में मैं ने भोजपुरी की ‘बबली गर्ल’ रितु सिंह के साथ एक फिल्म ‘अकेले हम अकेले तुम’ की थी, जिस में एक सीन में रितु सिंह मेरे साथ ब्राइडल लुक में नजर आई थीं. पता नहीं यह फोटो कैसे वायरल हो गया, जिसे लोगों ने रियल शादी का नाम दे कर खूब वायरल किया, जबकि यह रील का हिस्सा था.

इसी तरह मेरी फिल्म ‘हीरा बाबू एमबीबीएस’ से जुड़े एक शादी के फोटो को वायरल कर एक हीरोइन से मेरे शादी के चर्चे उड़ा दिए गए थे. मुझे लगता है कि सोशल मीडिया पर कुछ लाइक्स और कमैंट्स के लिए इस तरह की चीजें नहीं होनी चाहिए.

जूनियर महमूद की यह है अंतिम इच्छा, भर आएंगी आप की आंखें

हिंदी फिल्मों में बहुत से बाल कलाकारों ने नाम कमाया है, पर जूनियर महमूद का एक अलग ही मुकाम बना था. आज भले ही वे कैंसर जैसी भयंकर बीमारी से जूझ रहे हैं, पर एक समय ऐसा था, जब लोग उन की हंसी से गुलजार अदाकारी देखने के लिए सिनेमाघरों का रुख करते थे और अपने गम भूल जाते थे.

हिंदी फिल्मों के दिग्गज कलाकार महमूद ने जूनियर महूमद को यह नाम दिया था, जबकि उन का असली नाम नईम सैय्यद है और उन का जन्म 15 नवंबर, 1956 को मुंबई में हुआ था.

नईम सैय्यद यानी जूनियर महमूद ने 7 भाषाओं में 265 से भी ज्यादा फिल्मों में काम किया है. साथ ही, उन्होंने कई मराठी फिल्में भी निर्देशित की हैं. ‘ब्रह्मचारी’, ‘दो रास्ते’, ‘आन मिलो सजना’, ‘हाथी मेरे साथी’, ‘कटी पतंग’, ‘हरे राम हरे कृष्णा’, ‘जौहर महमूद इन हांगकांग’, ‘बॉम्बे टू गोवा’, ‘गुरु और चेला’ जैसी कुछ हिंदी फिल्मों में उन्होंने अपनी उम्दा अदाकारी से लोगों का दिल जीत लिया था.

साल 1969 में आई फिल्म ‘सुहागरात’ में पहली दफा नईम सैय्यद को महमूद के साथ काम करने का मौका मिला था. महमूद उन के काम से खुश हुए थे और इस के बाद उन्होंने ही नईम को जूनियर महमूद का खिताब दिया था.

आज 67 साल की उम्र में यही कलाकार कैंसर से जूझ रहा है और अपने पुराने साथियों को याद कर रहा है. फिल्म इंडस्ट्री के बहुत से कलाकार जैसे जौनी लीवर, मास्टर राजू, सचिन पिलगांवकर, जितेंद्र अपने चहेते सहकलाकार से मिलने उन के घर जा पहुंचे हैं. जूनियर महमूद ने खुद जितेंद्र और सचिन से मिलने की इच्छा जताई थी, जिसे उन दोनों ने पूरा किया है.

जानकारी के मुताबिक, जूनियर महमूद के लंग्स और लिवर में कैंसर है. साथ ही आंत में ट्यूमर भी है. डाक्टरों ने बताया है कि उन का कैंसर चौथी स्टेज पर है और इस कारण उन का वजन भी लगातार कम हो रहा है. जूनियर महमूद की अंतिम इच्छा है कि ‘मैं मरूं तो दुनिया बोले कि बंदा अच्छा था बस’.

क्या क्रिकेट बन रहा है भारत में हिंदूमुसलिम करने वाला खेल?

आम भारतीयों के लिए चाहे क्रिकेट एक आस्था वाला खेल है, दुनिया के लिए यह केवल गोरे अंगरेजों के साहबों का खेल है जिसे दक्षिणी एशिया के गुलाम रहे देशों में दिल से अपना लिया गया. पहले इसे भारत की फुरसत को गिनाने के लिए 5-5 दिन खेला जाता था और सिर्फ साहब लोग खेलते थे जैसा आमिर खान की फिल्म ‘लगान’ में दिखाया गया था. अब नए साहबों का खेल हो गया है पर यह गुलाम देशों से ज्यादा जगह नहीं खेला जा रहा है और इस बार भी 184-185 देशों में से कुल जमा 10 देशों के खेल को वर्ल्ड कप कहा गया और उसी में भारतीय महीनेभर से ज्यादा अपना समय बरबाद करते रहे.

क्रिकेट ऐसा खेल है जिस में खिलाड़ी तो 22 होते हैं पर 9 तो सिर्फ स्टेडियम में बैठे रहते हैं और कुछ देर 1 को हिलनाडुलना होता है तो कुछ देर 2 से 5 तक को, बाकी समय फील्ड पर 10-11 खिलाड़ी खड़े ही रहते हैं. यह जैंटलमैनों का खेल है पर भारत में काले साहबों को भी खुश करने के लिए ले लिया गया और धीरेधीरे इसी खेल ने राजनीतिक रंग ले लिया और भारतपाकिस्तान खेल होता है तो देशप्रेम का सवाल भी उठ खड़ा होता है.

क्रिकेट का भारत और पाकिस्तान में खेल से ज्यादा धर्म से संबंध हो गया है. भारत की क्रिकेट टीम खेलती है तो हिंदू आरोप लगाते हैं कि मुसलिम दुआ करते हैं कि भारत हार जाए और पाकिस्तान खेल रहा हो तो हिंदू प्रार्थना करते हैं कि पाकिस्तान हार जाए. ये हिंदूमुसलिम किस देश में रह रहे हैं इस का कोई फर्क नहीं पड़ता. इंगलैंड में पाकिस्तान और आस्ट्रेलिया खेल रहे हों तो भारत से गए हिंदू तालियां पाकिस्तान की हार पर बजाते हैं.

इस तरह का हिंदूमुसलिम करने वाला खेल असल में तो पढ़ेलिखे तार्किक लोगों के लिए एक टैबू होना चाहिए पर जिस तरह भारतपाकिस्तान और फाइनल में भारतआस्ट्रेलिया मैचों में भीड़ उमड़ी थी और हर जगह बड़ी स्क्रीनें लगा कर हंगामा मचा था उस से यह तो साफ है कि यह कभी एक जमीन, एक देश में रहे लोगों के बीच की रेखाओं में से एक है.

भारतीय टीम का 2023 के वर्ल्ड कप फाइनल में 6 विकेट से हार जाना अपनेआप में कोई बड़ी बात नहीं है क्योंकि खेलों में हारजीत चलती है. भारत पहले इसी कप में आस्ट्रेलिया को हरा चुका था इसलिए उम्मीद थी कि यह फाइनल भी जीतेगा पर आस्ट्रेलिया ने जता दिया कि इस खेल में कला और कौशल के साथ बहुतकुछ और भी है.

यह खेल असल में सब से बड़ा जुआ बन चुका है. हर बात पर शर्तें लगती हैं. खिलाडि़यों पर आरोप लगते हैं कि वे शर्तों के व्यापार में लगे लोगों से रिश्वतें लेते हैं. हर क्रिकेट बोर्ड पर कोई राजनीतिक हैसियत वाला बैठा है क्योंकि वही ही रिश्वतों की, जुए की और विज्ञापनों से होने वाली आमदनी को जेब में रखने का हकदार है. क्रिकेट को धर्म की तरह बेचा जाता है जिस के धर्मगुरु हैं, पुजारी हैं, देवीदेवता हैं, कुछ देवीदेवता दूसरे खेमें में चले गए तो उन्हें दस्युओं की तरह आज के पंडों ने निकाल फेंका है.

आस्ट्रेलिया से वर्ल्ड कप हारने का मतलब यह नहीं कि भारतीय टीम कम हो गई है. शायद इस का कारण यही है आस्ट्रेलिया के खिलाड़ी बैटिंग (जुए वाली बैटिंग) के अनुसार खेलने को तैयार नहीं थे. भारत ने जीत की पूरी तैयारी कर ली थी. नरेंद्र मोदी और अमित शाह पूरे समय स्टेडियम में डटे रहे. इस दौरान देश पर कोई आर्थिक संकट नहीं आया. उत्तराखंड की सुरंग में फंसे दलितशूद्र मजदूरों का कोई खयाल नहीं आया क्योंकि यह क्रिकेट धर्म का मामला था.

भारत की तैयारी बेकार गई पर पैसा जिस का बनना था, पूरा बना होगा. यह कितना पैसा था, कितना लोगों ने खोया, कितना कमाया यह अंदाजा लगाना आसान नहीं है. बस अब अगले खेल के रिजल्ट का इंतजार है 3 दिसंबर को 5 विधानसभाओं के और 2024 में लोकसभा के. वे भी क्रिकेट की तरह ही हैं.

हिमालय की मिट्टी ढीली है, इस में ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की जाए

गहरे अंधेरे में जहां गरीबों और मजदूरों की कोई कीमत नहीं होती, हर कोशिश का इस्तेमाल करना और बिना हिचकिचाहट के पैसा खर्च कर के उत्तराखंड में सिलक्यारा सुरंग के बीच में ढहने से फंसे 41 मजदूरों की जान बचाने के लिए कोशिश एक बहुत अच्छी बात है. सदियों से हर बड़े काम में छोटे लोगों की मौत को कुछ पैसे का नुकसान समझ कर छोड़ दिया जाता था.

यहां 4.5 किलोमीटर की बन रही सुरंग के बीच में फंसे 41 मजदूरों की जान बचाने के लिए रातदिन सैकड़ों लोग लगे हैं, दुनियाभर से मशीनें एयरफोर्स के हवाईजहाजों से मंगाई जा रही हैं. यह सुरंग बनेगी तो 20 किलोमीटर का यमुनोत्री का रास्ता छोटा हो जाएगा. 12 नवंबर को इस बन रही सुरंग के 2 तरफ से मिट्टी ऊपर से नीचे आ गिरी और दोनों ओर से रास्ते बंद हो गए. 41 मजदूरों को अपने हाल पर मरने को न छोड़ कर बेतहाशा कोशिश करना अपनेआप में अजूबा में है क्योंकि इस देश में आमतौर पर गरीब की जान की कोई कीमत नहीं होती. यह देश तो ऐसा है जिस में सिर्फ मृत्यु के बाद स्वर्ग पहुंचने के लिए पुरी में यात्रा के समय बड़े लकड़ी के पहियों के रथों को जिन्हें सैकड़ों लोग खींच रहे होते हैं, लोग जानबूझ कर पहियों के नीचे आ कर मर जाते हैं.

ऐसे देश में धार्मिक चारधाम यात्रा के रास्ते छोटा करने वाली सड़क की सुरंग में फंसे लोगों को सुरंग में पाइपों से खाना पहुंचाने, फोटो खींचने और दोनों तरफ से हवापानी और खाना पहुंचाने का रातदिन का काम जताता है कि देश में लोकतंत्र का कितना लाभ है.

5 राज्यों में हो रहे चुनावों से ऐन पहले हुई इस दुर्घटना में मौतों का असर न सिर्फ चुनावों पर पड़ता, राम मंदिर के पूजापाठी कार्यक्रम पर भी ग्रहण लगता. सरकार किसी भी तरह धार्मिक मार्ग पर मौतों की पगड़ी पहनने को तैयार नहीं थी.

यह सुंरग नेताओं की अपनी खब्त का नतीजा है क्योंकि हिमालय को जानने वाले पहले भी कहते रहे हैं कि हिमालय पर्वत की मिट्टी ढीली है और इस में ज्यादा छेड़छाड़ नहीं की जाए. लाखों साल पहले यहां समुद्र था जो नीचे के दक्षिण पठार के ऊपर एशिया की तरफ खिसकने की वजह से ऊंचा, दुनिया का सब से ऊंचा पर्वत बन गया है.

जोशीमठ ही नहीं, और बहुत सी जगह के लैंड स्लाइड और बाढ़ का नमूना लोग देख चुके हैं. फिर भी दानदक्षिणा और धर्म के नशे को पिलाने के लिए इस रास्ते को छोटा करने के लिए यह सुरंग बन रही है. इस में जानें जाने से बचाना एक अच्छी बात है और उम्मीद है कि जब तक आप ये लाइनें पढ़ेंगे, जानें बच चुकी होंगी.

Winter Romance Special: सर्दी में रात का इश्क

राज और मोहिनी की हाल ही में शादी हुई थी. पर जब से जाड़े ने जोर पकड़ना शुरू किया था, इन दोनों की सैक्स लाइफ ठंडी पड़ने लगी थी. राज को लगता था कि मोहिनी बिस्तर पर बर्फ की सिल्ली की तरह पड़ जाती है और कितना ही जोर लगा लो, गरम ही नहीं हो पाती है. उसे बड़ी कोफ्त होती थी.

उधर मोहिनी की दिक्कत यह है कि उसे ठंड बहुत ज्यादा लगती है और वह बिस्तर पर बिना गरम कपड़ों के नहीं रह सकती है. ठंड में सैक्स करने के नाम से ही उसे कंपकंपी छूट जाती है.

उत्तर भारत में जब गुलाबी जाड़े की दस्तक होती है, तभी शादियों का सीजन भी शुरू हो जाता है. गुलाबी जाड़े में गुलाबी इश्क, यह मेल कमाल का होता है. पर एक सच यह भी है कि सर्दी में हमारी सैक्स की इच्छा भी कम हो जाती है. यह सुन कर हैरानी होती है न? बिस्तर पर रजाई हो और पहलू में सैक्स पार्टनर, तो फिर यह इच्छा अचानक क्यों सिकुड़ जाती है?

दरअसल, मोहिनी की तरह बहुत से जोड़ों की यह शिकायत रहती है कि सर्दी के मौसम में वे काफी रूखे और सूखे हो जाते हैं. साथ ही, सर्दी में विटामिन डी का लैवल भी कम होता है, जो शरीर की ताकत बढ़ाने के लिए बहुत जरूरी होता है. इस की कमी के चलते लोग अपने मूड में सब से खराब बदलाव महसूस करते हैं. दिन छोटे और रातें बड़ी हो जाती हैं. जल्दी अंधेरा होने की वजह से लोग और भी ज्यादा बुरा महसूस करते हैं. पर साथ ही यह भी याद रखिए कि भले ही सर्दी में सैक्स के प्रति दिलचस्पी कम हो जाती है, लेकिन इस मौसम में मर्दों में टैस्टोस्टैरोन का लैवल हाई होता है, जिस में स्पर्म की तादाद ज्यादा होती है. वहीं, औरतों में भी ज्यादा फर्टिलिटी होती है, इसलिए चिंता की कोई बात नहीं है. सर्दी में रात का इश्क भी गरमागरम हो सकता है, बस थोड़े से सब्र और नए उपाय करने की जरूरत होती है.

सर्दी में इश्क का मजा लेना हो, तो अपने काम से कुछ दिन की छुट्टी ले लें और अपने पार्टनर के साथ कहीं घूमने चले जाएं. दिन में बाइक पर सट कर बैठते हुए एकदूसरे के अंगों की गरमाहट लें और रात को कमरे में बेबाक हो कर एकदूसरे में समा जाएं.

यकीन मानिए, काम के बोझ से हलका आप का मन तन को इतनी ज्यादा गरमाहट से भर देगा कि बिस्तर पर आप दोनों बिना कपड़ों के भी हीटर की तरह सुलग रहे होंगे.

एक काम और जरूर करें. बिस्तर पर अपनी सैक्स पोजीशन और किस अंग को छूने से आप की गरमाहट बढ़ती है, इस पर खुल कर बात करें. एकदूसरे के शरीर को बेशर्म हो कर देखें, चूमें और सहलाएं. रात के कालेपन और सर्दी की ठिठुरन को भूल कर एकदूसरे के शरीर की गरमी को महसूस करें.

अगर कमरे के अंधेरे से दिक्कत है, तो बल्ब की रोशनी के बजाय मोमबत्ती की हलकी रोशनी कर लें. जलते मोम की गंध आप के शरीर के पसीने की गंध को और ज्यादा महका देगी और आप दोनों के रिश्ते में एक अलग तरह की रोमानियत ले आएगी.

सर्दी में कमरे के भीतर आप अपने पार्टनर की मालिश कर सकते हैं. यह नुसखा प्यार बढ़ाने के लिए अचूक माना जाता है. इस से शरीर की गरमी तो बढ़ती ही है, साथ ही खून का दौरा भी तेज हो जाता है.

मालिश करते हुए एकदूसरे के नाजुक अंगों से भी खूब खेलें और जोश को बढ़ा दें. यह एक तरह का फोरप्ले होता है, जो दोनों पार्टनर को जिस्मानी रिश्ता बनाने के लिए तैयार कर देता है. पर इस के लिए जरूरी है कि आप साफसुथरे हों, इत्र वगैरह लगाया हो, ब्रश किया हो और नाखून भी ट्रिम किए हुए हों, ताकि मालिश के दौरान जोश में शरीर नोचने पर चोट न लगे.

अगर इस सब के बावजूद जाड़े में रात को कमरा ठंडा लगता है, तो ब्लोअर या हीटर ले आएं और उस की आंच पर अपने इश्क की खीर पकाएं.

प्याज के आंसू: क्यों पत्नी ने बर्बाद कर दिया पति का जीवन

आज घर का माहौल बहुत गमगीन था. भैया का सामान ट्रक से उतारा जा रहा था और हमारे पुराने घर में इस सामान के लिए  जैसेतैसे जगह बनाई जा रही थी. मेरे भतीजे और ममेरे, फुफेरे भाई सभी सजल नेत्रों के साथ सामान उतार रहे थे. वे किस तरह सहेज और संभाल कर सामान उतार रहे थे उसे देख कर मन भीग सा गया. काश, भाभी भी जीवन को इसी तरह सहेज कर चलतीं तो दरके मन के साथ भैया को आज यह दिन तो नहीं देखना पड़ता.

मन बरबस ही आज से 12 साल पहले  के माहौल में चला गया जब भैया मात्र 20 वर्ष की आयु में सरकारी नौकरी प्राप्त करने में सफल रहे थे. घर में मम्मीपापा ही क्या हम सब भाईबहन भी बेहद खुश थे. भैया दिल्ली में सेना मुख्यालय में निजी सहायक के पद पर चयनित हुए थे. 2 साल की कड़ी मेहनत के बाद उन के जीवन में खुशी का यह क्षण आया था.

मम्मी और पापा यह सोच कर अत्यंत  भावुक हो गए थे कि दिल्ली जैसे बड़े शहर में बेटा कहां रहेगा, उस के खानेपीने का ध्यान कौन रखेगा, लेकिन भैया बहुत उत्साहित थे. एक युवा मन में नौकरी पाने के बाद जो उमंग और उत्साह होता है वह सब भैया में मौजूद था.

भैया अपना सूटकेस ले कर एक अनजान शहर में जा चुके थे. दिल्ली जैसे महानगर में रहने की समस्या, खानेपीने की समस्या और आफिस आनेजाने की समस्या से भी भैया का सामना हुआ और उन्होंने इस का न केवल डट कर मुकाबला किया बल्कि इस पर विजय भी पाई.

बड़े शहर में जितने जन उतने सपने. हर इनसान एक जीताजागता सपना होता है और अपने सपने से संघर्ष करता हुआ नजर आता है. भैया भी इस भीड़ में शामिल हो गए थे और अपने सपनों को साकार करने में जुट गए.

भैया ने पढ़ाई से नाता जोड़े रखा और तमाम तरह की तकलीफों से अकेले जूझते हुए उन्होंने अपना ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन पूरा किया और अपनेआप को सिविल सेवा के लिए तैयार करने में जुट गए लेकिन वह इस में सफल नहीं हो सके.

भैया को जब भी अवकाश मिलता था वह घर आ जाते थे और हम सब मिल कर बहुत खुश होते थे. धीरेधीरे 5 वर्ष निकल गए. इन 5 सालों में बहुत कुछ बदल गया था. पापा अपनी नौकरी से रिटायर हो चुके थे. मैं खुद इंजीनियरिंग करने के बाद एक अदद नौकरी की तलाश में भटक रहा था. उधर भैया भी अपना जीवन स्तर उठाने के लिए संघर्ष कर रहे थे. हम सब बहुत ही खुश थे और जिंदगी ठीकठाक चल रही थी.

भैया के सरकारी नौकरी में होने की वजह से उन के लिए जगहजगह से शादी के रिश्ते आने लगे थे. भैया बेहद स्मार्ट एवं सुडौल शरीर के मालिक थे. उन्हें ऐसी लड़की चाहिए थी जो पढ़ीलिखी, सुंदर व तेज दिमाग वाली हो ताकि दिल्ली जैसे शहर की सचाइयों के साथ जी सके और साथ ही भैया को अपनी परिपक्वता से कुछ सुकून के पल दे सके क्योंकि वह अब तक संघर्ष कर के बुरी तरह थक चुके थे और प्यार की, अपनत्व भरे सहयोग की शीतल छांव में थोड़ा विश्राम करना चाहते थे.

भैया की यह तलाश इंदौर जा कर समाप्त हुई. शादी बहुत ही धूमधाम से हुई. शादी में दोनों परिवारों ने दिल खोल कर खर्च किया था. शादी संपन्न होने के बाद सभी अपनीअपनी घरगृहस्थी में रम गए. भैयाभाभी बहुत खुश थे. दोनों ने मिल कर कहीं बाहर घूमने का कार्यक्रम बनाया और वे लोग हनीमून मनाने के लिए शिमला गए.

मम्मीपापा  भी अपने को थोड़ा हलका महसूस कर रहे थे क्योंकि पापा ने अपनी एक जिम्मेदारी सफलतापूर्वक निभा दी थी. भैया अपनी नौकरी और पत्नी में लीन हो  गए. कभीकभी मम्मी शिकायत भरे लहजे में कह भी देती थीं कि शादी के बाद तू बदल गया है, लेकिन ऐसा शायद नहीं था.

भैया ने भाभी को भी आगे पढ़ने व अपना एक मुकाम हासिल करने के लिए प्रेरित किया लेकिन अपने अंतर्मुखी स्वभाव के चलते वह वैसा न कर सकीं जैसा भैया चाहते थे. वह अपने को पति तक ही सीमित रखती थीं और  घर में किसी से ज्यादा बात नहीं करती थीं. यहां तक कि मम्मी और पापा से भी वह बात करना पसंद नहीं करती थीं.

भैया सदैव भाभी को खुश रखने का प्रयास करते थे. उन्हें न केवल सारी सुख- सुविधा देने का प्रयास करते बल्कि भाभी की हर इच्छा को पूरी करना अपना कर्तव्य समझते थे. अपने प्रति भैया का यह लगाव भाभी ने उन की कमजोरी समझ लिया और फिर पूरे षड्यंत्र के तहत वह सब किया जो आज की आम बात हो गई है.

भैया के घर आने पर वह किसी को कुछ नहीं समझती थीं लेकिन हम लोग भैया के डर से चुप रहते थे और सोचते थे कि थोड़े दिनों के लिए ये आए हैं जैसे रहते हैं रहने दिया जाए क्योंकि दोनों अपनी जिंदगी से खुश थे और उन की खुशी में ही हम सब की खुशी थी.

भाभी हमेशा अपने मायके वालों को ही सबकुछ समझती रहीं और उन के अंदर कभी इस परिवार के प्रति समर्पण व त्याग की भावना नहीं जागी जिस में वह शादी कर के आई थीं. शायद उन की शिक्षा ही ऐसी थी कि उन का दिमाग सदैव इसी बात में लगा रहता था कि किस प्रकार भैया को घर की तरफ से विमुख रखा जाए.

भैया का वैचारिक स्तर काफी ऊंचा व सुलझा हुआ था. भैया और मम्मी की वैचारिक बहस में कभीकभी मतभेद हो जाया करता था और इस वैचारिक मतभेद का भाभी व उन के मायके वालों ने बड़ा गलत फायदा उठाया. भाभी  को कभी भी हमारे परिवार के सदस्यों का सम्मान करने की शिक्षा नहीं दी गई. भैया भी भाभी पर ही विश्वास करते थे लेकिन भाभी लगातार इसी विश्वास का फायदा उठाने में लगी थीं और अपने घर वालों के साथ मिल कर भैया को उन के परिवार से दूर रखने का घिनौना प्रयास ही करती रहीं.

भाभी के मम्मीपापा व अन्य रिश्तेदार उन का लगातार दिमाग खराब कर रहे थे. वे इन बातों को समझ नहीं पा रही थीं कि ऐसा कर के अपनी ही घरगृहस्थी में सेंध लगा रही हैं. भैया को उन के परिवार से दूर रखने की जो कुत्सित मुहिम चलाई जा रही थी उस का पता उन को अपने ही ससुराल के एक अन्य सदस्य से लग गया और भैया ने अपने ससुराल वालों के यहां आनाजाना व उन्हें महत्त्व देना बंद कर दिया, लेकिन तब तक भाभी का दिमाग इतना खराब कर दिया गया था कि वह इस से उबर नहीं पा रही थीं और उन्हें वही सही लगता था जो उन के मायके वाले कहते थे. और आखिर तक इस मकड़जाल से वह कभी नहीं निकल पाईं. भाभी का दिमाग इतना खराब कर दिया गया कि वह भैया पर शक करने लगीं. भैया की हर गतिविधि को शक के घेरे में रख कर देखने लगीं और उन का दिमाग एक कूड़ेदान की तरह हो गया था जिस में कितनी भी अच्छी बातों को डाला जाए वह सड़  ही जाती है.

भैया ने भाभी को प्यार से कई बार समझाने का प्रयत्न किया और कहा कि अपना दिमाग ठीक रखो. भाभी के शंकालु स्वभाव के कारण भैया की परेशानी बढ़ गई और वह चिड़चिड़े हो गए. जब भाभी प्यार से नहीं मानती थीं तो धीरेधीरे उन के बीच झगड़ा होने लगा और उन का घरेलू जीवन एकदम नीरस हो गया. दोनों अकेले रहते थे लेकिन खुश नहीं थे.  भैया, भाभी को अपने  हिसाब से  रहने को कहते थे परंतु भाभी का अहंम बहुत ही चरम पर था. उन्होंने भैया की कोई बात न मानने की जैसे कसम ही खा ली थी.

भैया को अपने सपने टूटते से लगे और धीरेधीरे यह बात घर के बड़ेबुजुर्गों तक भी पहुंच गई. भैया को यह जान कर भी बहुत दुख हुआ था कि भाभी के मायके वाले भी उन्हें समझाने को तैयार नहीं थे और लगातार षड्यंत्र रच रहे थे.

भैया और भाभी के बीच का तनाव इतना ज्यादा बढ़ गया कि उसे देख कर दोनों परिवार के सदस्य परेशान हो गए. भाभी चोरीछिपे अपने मायके फोन कर के उलटासीधा बताने लगीं जिस ने जलती आग में घी का काम किया. समस्या के प्रति भाभी के मायके वाले कभी गंभीर नहीं रहे और उन्होंने कभी आमनेसामने खुल कर बात नहीं की और फिर वही हुआ जिस का सब को डर था.

एक रात भाभी दिल्ली जैसे शहर से अकेली भैया को बिना बताए ही अपने मायके पहुंच गईं. उन के घर के लोग पहले से ही भरे बैठे थे, उन्होंने भैया को सबक सिखाने की ठान ली.

उधर भाभी के इस तरह से अचानक चले जाने से भैया बहुत परेशान हुए और जगहजगह उन्हें ढूंढ़ते रहे. भाभी के मायके फोन कर के पूछने पर भी उन लोगों ने भैया को नहीं बताया कि भाभी उन के पास पहुंच गई हैं. अंतत: भाभी की गुमशुदगी की रिपोर्ट उन्होंने थाने में दर्ज करवा दी. इसी के बाद भैया के ससुराल के लोग उन्हें बरबाद करने की सोचने लगे.

भैया पर क्या बीत रही है जब इस का पता घर के लोगों को चला तो कुनबे के बड़ेबूढ़ों को ले कर पापा, भाभी को लेने उन के घर गए लेकिन उन्होंने शायद फैसला कर लिया था कि लड़की को नहीं भेजना है. वहां सभी बड़ों का अपमान होता रहा और भाभी परदे के पीछे से यह सब देखती रहीं. क्या मेरे घर के बुजुर्ग उन के कुछ नहीं लगते थे, शायद नहीं, तभी तो वह हमारे परिवार की बुजुर्गियत को शर्मसार होते चुपचाप देखती रही थीं.

इधर भैया यह सोच कर बहुत ही परेशान थे कि जिस औरत के साथ वह पिछले 5 सालों से रह रहे थे और जिस पर वह अपनों से ज्यादा भरोसा करते थे वही औरत उन के साथ इतना बड़ा  विश्वास- घात कैसे कर सकती है, लेकिन उन्हें क्या पता था कि उस औरत की संवेदनशीलता मर चुकी थी.

भैया ने कई बार भाभी से फोन पर बात करने की कोशिश की लेकिन उन के घर वालों ने भैया को अपनी ही पत्नी से बात नहीं करने दी. इस से बड़ा दुख तो इस बात का है कि भाभी ने कभी एक बार भी अपनी तरफ से भैया से बात नहीं की. भैया एक बार खुद भाभी को लेने पहुंचे तो ससुराल वालों ने सभी परंपराओं व मान्यताओं को ताक पर रख कर उन को बेइज्जत कर के घर से निकाल दिया और यह सब होते हुए भाभी चुपचाप देखती रहीं. इतना सब हो गया कि आपस का प्यार व विश्वास तारतार हो गया. रहीसही कसर भाभी की उस हरकत ने पूरी कर दी जिसे आज औरत अपना सब से बड़ा हथियार मानती है और वह है भारतीय कानून की धारा 498.

भाभी ने भैया पर कई बेबुनियाद आरोप लगाए, उन्हें चरित्रहीन साबित करने की कोशिश की, उन पर मारपीट करने, दहेज के लिए प्रताडि़त करने का आरोप लगाया और ऐसे आरोप भैया के लिए मौत के समान थे. वह अपने पर लगाए गए आरोपों से टूट गए. भाभी ने मम्मी व मुझ पर भी आरोप लगाए, मेरी बड़ी बहन पर भी आरोप लगाए जबकि हम सब उन से करीब 1,500 किलोमीटर दूर रहते हैं. लेकिन यह एक परंपरा चल निकली है कि दहेज के  घेरे में सभी को रखा जाए और परेशान किया जाए, भले ही सचाई से इस का कोई लेनादेना नहीं. पुलिस भी कानून के आगे बेबस है.

भैया के लिए इन आरोपों का आघात किसी वज्रपात से कम न था. उन का सारा जीवन तबाह हो गया. इस घटना के बाद हंसतेमुसकराते भैया गम के गहरे सागर में चले गए थे जहां से उबरना उन के लिए शायद अब कभी संभव नहीं होगा. और हम लोग उन्हें धीरेधीरे खत्म होते देखने के लिए विवश थे.

भैया के लिए यह असहनीय बात थी कि वह एक ऐसी औरत के साथ पूरे मन से रह रहे थे जो पूरे मन के साथ उन के साथ नहीं रह रही थी. वह दोहरे चरित्र की साक्षी थीं. उन के दिलोदिमाग में भैया के लिए कितना जहर भरा था यह उन के द्वारा लिखे गए शिकायती पत्रों से पता चलता है जोकि उन्होंने थाने में व भैया के आफिस में लिखे और जिस के कारण भैया की सरकारी नौकरी चली गई.

उस दिन तो भैया पूरी तरह से ही टूट गए जिस दिन इंदौर की पुलिस ने मां व दीदी को थाने में आने के लिए कहा. भाभी को इस बात का एहसास ही नहीं था कि वह क्या कर रही हैं. किसी की मांबहन को पुलिस से बेइज्जत कराने का क्या मतलब होता है? यह शायद उन्हें मालूम नहीं था, और फिर क्या मेरी मां तथा दीदी उन की कुछ नहीं लगती थीं, शायद नहीं.

आज भैया बीमार हैं और बहुत ही थकेथके से लगते हैं. वे अकेले में बहुत रोते हैं और शायद उन का पुरुष मन उन्हें सब के सामने रोने नहीं देता इसलिए वे रसोई में प्याज काटने चले जाते हैं ताकि उन की आंखों के पानी को प्याज की तिक्तता समझा जाए लेकिन मैं इतना नादान नहीं था.

मैं जब भी भैया को देखता यही सोचता कि इस देश का कानून क्यों एक औरत को इतनी निरंकुश होने की इजाजत देता है कि वह अपने अहं को शांत करने के लिए सबकुछ बरबाद कर दे, किसी के भी आत्मसम्मान के साथ मनमाना खेल, खेल सके.

पूरे घटनाक्रम में भाभी पूरी तरह से स्वयं षड्यंत्र का शिकार नजर आ रही थीं.

भारत में औरत को त्याग, बलिदान व  तपस्या की मूर्ति कहा जाता है लेकिन भाभी तो छोड़ गई थीं भैया को तिलतिल कर मरने के लिए. मुझे तो इस बात का भी आश्चर्य है कि वह इतना सब होते हुए प्रत्यक्ष देखने के बाद इस संसार में कैसे चैन से रह सकेंगी, कैसे वह अपनेआप से नजरें मिला सकेंगी और इस दंश से अपनेआप को कैसे मुक्त कर सकेंगी कि वह एक घर से भागी हुई तथा एक जिंदादिल इनसान और उस की रोजीरोटी की हत्यारिन हैं.

ट्रक वाला मुझ से बाकी पैसे देने को कह रहा था और मेरी तंद्रा टूट गई. मैं वर्तमान में आ गया था. भैया का सामान उतारा जा चुका था और भैया के स्वर्णिम कैरियर का दुखद अंत हो चुका था.

लेखक- छबी पराते

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