घुट-घुट कर क्यों जीना: भाग 3

मैं ने उस घर के बाहर जा कर दरवाजा खटखटाया. अंदर से कुछ आवाज आई, पर किसी ने दरवाजा नहीं खोला. मैं आगे वाले दरवाजे पर गई, फिर दरवाजा खटखटाया. इस बार दरवाजा खुल गया.

अंदर से वह औरत नाइटी पहने आई. उस के पति भी उस के साथ थे. मेरी जान में जान आ गई. जो मैं सोच रही थी, वह सच नहीं था.

‘क्या हुआ नमन की मम्मी, इतनी रात गए आप यहां? सब ठीक तो है न?’

‘हां, वह नमन के पापा घर पर नहीं थे. जरा उन्हें फोन कर के पूछ लीजिए, मुझे संतुष्टि हो जाएगी.’

‘जी, अभी करता हूं फोन,’ उन्होंने हिचकिचाते हुए कहा.

उन्होेंने फोन मिलाया तो मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई. फोन की घंटी की आवाज पिछले कमरे से आ रही थी. वे वहीं थे.

मैं तेजी से उस कमरे की तरफ गई. पवन अधनंगे मेरे सामने खड़े थे. मेरी आंखों से आंसू फूट पड़े. मेरी दुनिया उस एक पल में रुक सी गई.

‘यह क्या धंधा लगा रखा है यहां… यह है आप का काम… यहां जा रही है आप की सारी कमाई… यह है आप की ऐयाशी…’

मेरी हालत उस पल में क्या थी, यह तो शायद ही मैं बयां कर पाऊं, लेकिन जवाब में पवन ने जो कहा, वह सुन कर मुझ में बचाखुचा जो आत्मसम्मान था, जो जान थी, सब मिट्टी में मिल गए.

‘इस में गलत क्या है? तुझ में बचा ही क्या है. तुझे जाना है तो सामान बांध कर निकल जा मेरे घर से,’ पवन कपड़े पहनते हुए बोले.

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मैं वहां से निकल गई. घर आई तो खुद पर अपने वजूद पर शर्म आई. मन तो किया कि सब छोड़छाड़ कर भाग जाऊं कहीं, मर जाऊं कहीं जा कर. पर बच्चों की शक्ल आंखों के सामने आ गई. उन्हें छोड़ कर मर गई तो वह कुलटा मेरे बच्चों को खा कर अपने बच्चों का पेट पालेगी. नहीं, मैं नहीं मरूंगी, मैं नहीं हारूंगी.

अगले दिन पवन घर आए तो न मैं ने उन से बात की और न उन्होंने. उन्हें खाना बना कर दिया जरूर, लेकिन वैसे ही जैसे घर की नौकरानी देती है.

अगले ही दिन जा कर मैं फिर से अपने काम पर लग गई. उस औरत का चक्कर तो पवन के मम्मीपापा के कानों तक पहुंचा तो उन्होंने छुड़वा दिया, लेकिन इस से मुझे क्या फर्क पड़ा,

पता नहीं.

शायद, मैं बहुत खुश थी क्योंकि पति तो आखिर पति ही है, वह चाहे कुछ भी करे. रिश्ते यों ही खत्म तो नहीं हो सकते न.

पवन ने मुझे से माफी मांगी तो मैं ने उन्हें कुछ दिनों में माफ भी कर दिया. जिंदगी पटरी पर तो आ गई थी, पर टूटी और चरमराई पटरी पर…

नमन और मीनू दोनों अब 22 साल और 24 साल के हैं. उन की मां आज भी कोठी मैं बरतन मांजती है. सिर के ऊपर अपनी छत नहीं है, क्योंकि बाप तो पहले ही उसे बेच कर खा गया. दोनों ने किसी तरह अपनी पढ़ाई पूरी की, यहांवहां से पैसे कमाकमा कर.

पवन की तो खुद की नौकरी का कोई ठिकाना तक नहीं है, कभी पी कर चले जाते हैं तो धक्के मार कर निकाल दिए जाते हैं. जिस उम्र में लोगों के बच्चे कालेज में पढ़ाई करते हैं, मेरे बच्चों को नौकरी करनी पड़ रही है. यह दुख मुझे खोखला करता है, हर दिन, हर पल.

हां, लेकिन मेरे बच्चे पढ़ेलिखे हैं. मेरा बेटा शराब या जुए का आदी नहीं है और न ही मेरी बेटी को कभी अपनी जिंदगी में किसी के घर में जूठे बरतन मांजने पड़ेंगे. वह मेरी तरह कभी रोएगी नहीं, घुटेगी नहीं उस तरह जिस तरह मैं घुटघुट कर जी हूं.

पवन एक जिम्मेदार बाप नहीं बन सके, मैं शायद जिम्मेदार मां बन गई. पवन से बैर करूं भी तो क्या, उन्होंने मुझे नमन और मीनू दिए हैं, जिस के लिए मैं उन की हमेशा एहसानमंद रहूंगी, लेकिन जिस जिंदगी के ख्वाब मैं देखा करती थी, वह हाथ तो आई, पर कभी मुंह न लगी.

‘‘सुन लिया तू ने. अब मैं सो जाऊं?’’

‘‘बस, एक सवाल और है.’’

‘‘पूछ…’’

‘‘आप ने जिंदगीभर इतना कुछ क्यों सहा? पापा को छोड़ क्यों नहीं दिया? मैं आप की जगह होती तो शायद ऐसे इनसान के साथ कभी न रहती.’’

‘‘मैं 12 साल की थी तो दुनिया से बहुत डरती थी, लेकिन ऐसे दिखाती थी कि चाहे शेर भी आ जाए तो मैं शेरनी बन कर उस से लड़ बैठूंगी. पर मैं अंदर ही अंदर बहुत डरती थी. तेरे पापा इस दुनिया के पहले इनसान थे जिन्होंने मेरे डर को जाना था.

‘‘जब मैं ने उन्हें जाना तो लगा कि इस भीड़ में कोई अपना मिल गया है. उन की आंखों में मेरे लिए जो प्यार था, वह कहीं और नहीं था.

‘‘जब मेरे सपने बिखरे, जब उन्होंने मुझे धोखा दिया, जब उन्होंने मुझे अनचाहा महसूस कराया, तो मैं फिर अकेली हो गई, डर गई थी मैं.

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‘‘कभीकभी तो लगता था घुटघुट कर जीना है तो जीया ही क्यों जाए, पर जब तुम दोनों के चेहरे देखती तो लगता था, जैसे तुम ही हो मेरी हिम्मत और अगर मैं टूट गई तो तुम्हें कैसे संभालूंगी.

‘‘तुम दोनों मुझ से छिन जाते या मेरे बिना तुम्हें कुछ हो जाता, मैं यह बरदाश्त नहीं कर सकती थी. तो बस जिंदगी जैसी थी, उसे अपना लिया मैं ने.’’

घुट-घुट कर क्यों जीना: भाग 1

मुझे यह तो पता था कि वे कभीकभार थोड़ीबहुत शराब पी लेते हैं, पर यह नहीं पता था कि उन का पीना इतना बढ़ जाएगा कि आज मेरे साथसाथ बच्चों को भी उन से नफरत होने लगेगी.

मैं ने उम्रभर जोकुछ सहा, जोकुछ किया, वह बस अपने बच्चों के लिए ही तो था, मगर मैं ने कभी यह क्यों नहीं सोचा कि बड़े होने पर मेरे बच्चे ऐसे पिता को कैसे स्वीकारेंगे जो उन के लिए कभी एक आदर्श पिता बन ही नहीं पाए.

बात तब की है, जब मेरा घर कोलकाता में हुआ करता था. गरीब परिवार था. एक बहन और एक भाई थे, जिन के साथ बिताया बचपन बहुत ज्यादा यादगार था.

मुझे तालाब में गोते लगाने का बहुत शौक था. मैं पेड़ से आम तोड़ कर लाया करती थी. जिंदगी कितनी अच्छी थी उस वक्त. दिनभर बस खेलते ही रहना. स्कूल तो जाना होता नहीं था.

मम्मी ने उस वक्त यह कह कर स्कूल में दाखिला नहीं कराया था कि पढ़ाईलिखाई लड़कियों का काम नहीं है.

मैं 13 साल की थी, जब मम्मीपापा का बहुत बुरा झगड़ा हुआ था. मम्मी भाई को गोद में उठा कर अपने साथ ले गईं. कहां ले गईं, पापा ने नहीं बताया.

पापा के ऊपर अब मेरी और दीदी की जिम्मेदारी थी, वह जिम्मेदारी जिसे उठाने में न उन्हें कोई दिलचस्पी थी, न फर्ज लगता था.

वे मुझे गांव की एक कोठी में ले गए और वहां झाड़ूपोंछे के काम में लगा दिया. मुझे वह काम ज्यादा अच्छे से तो नहीं आता था, पर मैं सीख गई. दीदी भी किसी दूसरी कोठी में काम करती थीं.

हम जहां काम करती थीं, वहीं रहती भी थीं इसलिए हमारा मिलना नहीं हो पाता था. मुझे घर की याद आती थी. कभीकभी मन करता था कि घर भाग जाऊं, लेकिन फिर खयाल आता कि अब वहां अपना है ही कौन.

मम्मी ने तो पहले ही अपनी छोटी औलाद के चलते या कहूं बेटा होने के चलते भाई को थाम लिया था.

मुझे उस कोठी में काम करते हुए 2 महीने ही हुए थे जब बड़े साहब की बेटी दिल्ली से आई थीं. उन्होंने मुझे काम करते देखा तो साहब से कहा कि दिल्ली में अच्छी नौकरानियां नहीं मिलती हैं. इस लड़की को मुझे दे दो, अच्छा खिलापहना तो दूंगी ही.

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बड़े साहब ने 2 मिनट नहीं लगाए और फैसला सुना दिया कि मैं अब शहर जाऊंगी.

मेरे मांबाप ने मुझे पार्वती नाम दिया था, शहर आ कर मेमसाहब ने मुझे पुष्पा नाम दे दिया. मुझे शहर में सब पुष्पा ही बुलाते थे. गांव में शहर के बारे में जैसा सुना था, यह बिलकुल वैसा ही था, बड़ीबड़ी सड़कें, मीनारों जैसी इमारतें, गाडि़यां और टीशर्ट पहनने वाली लड़कियां. सब पटरपटर इंगलिश बोलते थे वहां. कितनाकुछ था शहर में.

मेरी उम्र तब 17 साल थी. एक दिन जब मैं बरामदे में कपड़े सुखा रही थी, बगल वाले घर में काम करने वाली आंटी का बेटा मेमसाहब से पैसे मांगने आया था. वह देखने में सुंदर था, मेरी उम्र का ही था, गोराचिट्टा रंग और काले घने बाल.

मैं ने उस लड़के की तरफ देखा तो उस ने भी नजरें मेरी तरफ कर लीं. उस ने जिस तरह मुझे देखा था, उस तरह आज से पहले किसी और लड़के ने नहीं देखा था.

मेमसाहब के घर में सब बड़े मुझे बेटी की तरह मानते थे. उन के बच्चों की मैं ‘दीदी’ थी. घर में कोई मेहमान आता भी था तो मुझ जैसी नौकरानी पर किसी की नजर पड़ती भी तो क्यों? यह पहला लड़का था जिस का मुझे इस तरह देखना कुछ अलग सा लगा, अच्छा लगा.

अब वह रोज किसी न किसी बहाने यहां आया करता था. कभी आंटी को खाना देने, कभी कुछ सामान लेने या देने, कभी पैसे लौटाने और कभी तो अपने भाईबहनों की शिकायत ले कर. मैं उसे रोज देखा करती थी, कभीकभार तो मुसकरा भी दिया करती थी.

एक दिन मैं गेट के बाहर निकल कर झाड़ू लगा रही थी. तब वह लड़का मेरे पास आया और मुझ से मेरा नाम पूछा.

मैं ने उसे अपना नाम पुष्पा बताया. मैं ने उस का नाम पूछा तो उस ने अपना नाम पवन बताया.

‘हमारे नाम ‘प’ अक्षर से शुरू होते हैं,’ मुझे तो यही सोच कर मन ही मन खुशी होने लगी. उस ने मुझ से कहा कि उसे मैं पसंद हूं. मैं ने भी बताया कि मुझे भी वह अच्छा लगता है.

अब पवन अकसर मुझ से मिलने आया करता था. एक दिन जब वह आया तो साथ में एक अंगूठी भी लाया. वह सोने की अंगूठी थी. मेरी तो हवाइयां उड़ गईं. मेरे पास हर महीने मिलने वाली तनख्वाह के पैसों से खरीदी हुई एक सोने की अंगूठी थी और कान के कुंडल भी थे, लेकिन आज तक मेरे लिए इतना महंगा तोहफा कोई नहीं लाया था, कोई भी नहीं.

वैसे भी अपना कहने वाला मेरे पास था ही कौन? मेरी आंखों में आंसू थे. मैं रो पड़ी, तो उस ने मुझे गले से लगा लिया. मन हुआ कि बस इसी तरह, इसी तरह अपनी पूरी जिंदगी इन बांहों में गुजार दूं.

मैं ने पवन से शादी करने का मन बना लिया था. मेमसाहब को सब बताया तो वे भी बहुत खुश हुईं. मैं ने और पवन ने मंदिर में शादी कर ली. अब पवन मेरा सिर्फ प्यार नहीं थे, पति बन चुके थे.

हमारी शादी में उन का पूरा परिवार आया था और मेरे पास परिवार के नाम पर कोई नहीं था. मेमसाहब भी नहीं आई थीं. हां, उन्होंने कुछ तोहफे जरूर भिजवाए थे.

शादी को 2 हफ्ते ही बीते थे कि एक दिन पवन खूब शराब पी कर घर आए. उन की हालत सीधे खड़े होने की भी नहीं थी.

‘आप ने शराब पी है?’

‘हां.’

‘आप शराब कब से पीने लगे?’

‘हमेशा से.’

‘आप ने मुझे बताया क्यों नहीं?’

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‘चुप हो जा… सिर मत खा. चल, अलग हट,’ कहते हुए पवन ने मुझे इतनी तेज धक्का दिया कि मैं जमीन पर जा कर गिरी. मेरी चूडि़यां टूट कर हाथ में धंस गईं.

मैं पूरी रात नहीं सो पाई. शराब पीने के बाद इनसान इनसान नहीं रहता है, यह मैं बखूबी जानती थी.

मैं ने अगली सुबह पवन से बात नहीं की तो वे शाम को भी शराब पी कर घर आए. मैं ने पूछा नहीं, पर उन्होंने खुद ही कह दिया कि मेरी मुंह फुलाई शक्ल से मजबूर हो कर पी है.

अगले दिन वे मेरे लिए गजरा ले आए. मैं थोड़ा खुश भी हुई थी, पर वह खुशी शायद मेरी जिंदगी में ठहरने के लिए कभी आई ही नहीं.

घुट-घुट कर क्यों जीना: भाग 2

4 दिन बाद ही अचानक पवन ने काम पर जाना छोड़ दिया. कहने लगे कि मालिक ड्राइविंग के नाम पर सामान उठवाता है तो मैं काम नहीं करूंगा. एक हफ्ते अपने मांबाप के आगे गिड़गिड़ा कर पैसे मांगे और जब पैसे खत्म हो गए तो शुरू हुई हमारी लड़ाइयां.

‘मेरे पास पैसे नहीं हैं,’ पवन ने मेरी ओर देखते हुए कहा.

‘अब तो मालकिन के दिए पैसे भी नहीं हैं मेरे पास,’ मैं ने जवाब दिया.

‘मैं खुद को बेच सकता तो बेच  देता, क्या करूं मैं…’ पवन की आंखों में आंसू थे.

‘घर खर्च के लिए पैसे नहीं हैं तो क्या हुआ, मम्मीपापा दे देंगे हमें.’

‘बात वह नहीं है,’ पवन ने थोड़ा झिझकते हुए कहा.

‘फिर क्या बात है?’ मैं ने हैरानी  से पूछा.

‘वह… वह… मैं ने जुआ खेला है.’

‘जुआ…’ मैं तकरीबन चीख पड़ी.

‘हां, 10,000 रुपए हार गया मैं… कर्जदार आते ही होंगे. मुझे माफ कर दे पुष्पा, मुझे माफ कर दे. आज के बाद न मैं शराब पीऊंगा, न जुआ खेलूंगा, तेरी कसम.’

‘मेरे पास इतने पैसे नहीं हैं,’ मैं ने बेबस हो कर कहा.

‘तुम्हारे कुंडल और अंगूठी तो हैं.’

एक पल को तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूं, लेकिन हैं तो वे मेरे पति ही, उन का कहा मैं कैसे झुठला सकती हूं. आखिर अब सिर पर परेशानी आई है तो बोझ भी तो दोनों को उठाना है. साथ भी तो दोनों को ही निभाना है.

मैं ने जिस खुशी से अपने कानों में वे कुंडल और उंगलियों में वे अंगूठियां पहनी थीं, उतने ही दुख से उन्हें उतार कर पवन के सामने रख दिया.

वे सुबह के घर से निकले थे, शाम को आए तो हाथ में मिठाई के 2 डब्बे थे. चाल डगमगाई हुई थी और मुंह से शराब की बू आ रही थी…

उस दिन पवन से जो मेरा विश्वास टूटा, वह शायद फिर कभी जुड़ नहीं पाया. मैं उन से कहती भी तो क्या… करती भी तो क्या… मेरी सुनने वाला था ही कौन.

शादी को 11 साल ही हुए थे और नमन और मीनू 10 और 8 साल के हो गए थे. पवन ने एक बार फिर काम करना शुरू तो कर दिया था, पर जो कमाते शराब और जुए में लुटा आते. मेरे हाथ में पैसों के नाम पर चंद रुपए आते जो बच्चों के लिए दूध लाने में निकल जाते.

मेरी सास कोठियों में बरतन मांजने का काम करती ही थीं, तो मैं ने सोचा कि मैं भी फिर यही काम करने लग जाती हूं. दोनों बच्चे स्कूल जाते और मैं काम पर. जिंदगी पवन के साथ कैसे बीत रही थी, यह तो नहीं पता, पर कैसे कट रही थी, यह अच्छी तरह पता था.

पवन के पिता ने अपनी गांव की जमीन बेच कर हमें दिल्ली में एक घर दिला दिया था. मैं ने काम करना भी छोड़ दिया. पवन ने पीना तो नहीं छोड़ा, पर कम जरूर कर दिया था. बच्चे भी नई जगह और नए माहौल में ढल गए थे.

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हमारा गली के कोने में ही एक घर था. उस घर में रहने वाले मर्द कब पवन के दोस्त बन गए, पता नहीं चला. वे पवन के दोस्त बने तो उन की पत्नी मेरी दोस्त और उन के व हमारे बच्चे आपस में दोस्त बन गए.

वे लोग कुछ समय पहले तक बड़े गरीब थे. पर हाल के 2 सालों में उन के घर अच्छा खानापीना होने लगा. झुग्गी जैसा दिखने वाला घर अब मकान बन चुका था. वहीं दूसरी ओर पता नहीं क्यों, पर मेरे घर के हालात बिगड़ने लगे थे. पवन घर के खर्च में कटौती करने लगे थे. उन के और मेरे संबंध तो सामान्य थे, पर कुछ तो था जो अटपटा था.

एक दिन मैं गली की ही अपनी एक सहेली कमल की मम्मी के साथ बैठ कर मटर छील रही थी. हम दोनों यों ही अपनी बातों में लगी हुई थीं.

‘नमन की मम्मी, एक बात थी जो मैं कई दिनों से तुम्हें बताने के बारे में सोच रही हूं,’ कमल की मम्मी ने झिझकते हुए कहा.

‘हांहां, बोलो न, क्या हुआ?’

‘वह… मैं ने नमन के पापा को …वे उन के दोस्त हैं न जो कोने वाले घर में रहते हैं, वहां एक दिन पीछे से रात में जाते हुए देखा था.’

‘हां, तो किसी काम से गए होंगे.’

‘वह तो पता नहीं, पर मुझे कुछ ठीक सा नहीं लगा. तुम अपनी हो तो सोचा बता दूं.’

मैं ने कमल की मम्मी की बातों पर विश्वास तो नहीं किया, पर वह बात मेरे दिमाग से निकल भी नहीं रही थी.

एक हफ्ता बीत गया, पर मुझे कुछ गड़बड़ नहीं लगी और पवन से सामने से कुछ भी पूछना मुझे सही नहीं लगा. आखिर पवन जैसे भी थे, बेवफा नहीं थे, धोखेबाज नहीं थे. वे मुझे इतना प्यार करते थे, मैं सपने में भी ऐसा कुछ नहीं सोच सकती थी.

अगली सुबह घर से निकलते वक्त पवन ने कहा कि वे रात को घर नहीं आएंगे, काम ज्यादा है औफिस में ही रुकेंगे.

रात के 2 बज रहे थे. बच्चे पलंग पर मेरे साथ ही सो रहे थे. मेरे मन में पता नहीं क्या आया, मैं उठी और मेरे पैर अपनेआप ही उस घर की तरफ मुड़ गए, जहां हमारे वे पड़ोसी रहते थे.

मैं घबराई, डर लग रहा था, पर मन में बारबार यही था कि जो मेरे दिमाग में है, वह बस सच न हो.

Crime- चैनलों की चकमक: करोड़ों की अनोखी ठगी

चैनलों के डिसटीब्यूशन से करोड़ों रुपए की कमाई का मायाजाल दिखाकर, दूर नोएडा में बैठ छत्तीसगढ़ की एक महिला के साथ बड़े ही आसानी से करोड़ों की ठगी हो गई.
ठगी की यह अपने आप में एक बेमिसाल कहानी है जो आपको बताती है कि ठग और ठगी का स्वरूप कितना विस्तार लिए हुए होता है. थोड़ी सी भी नादानी और लापरवाही आपको आपके बेशकीमती धन से महरूम कर सकती है.
आज छत्तीसगढ़ की राजधानी में घटित ऐसी ही एक घटना सुर्ख़ियों का सबब बनी हुई है. दरअसल हुआ यह कि रिलायंस बिग टीवी और टेक्नोलॉजी इंडिपेंट टीवी के डायरेक्टर विवेक प्रकाश को राजधानी की पुलिस ने गिरफ्तार किया है. रायपुर गुढ़ियारी की रहने वाली प्रीति मुंदड़ा पुलिस के पास पहुंची और शिकायत बताया कि किस तरह उसके साथ 1-2 करोड़ नहीं बल्कि 16 करोड़ों रुपए की ठगी हुई है.

पुलिस ने इस पर मामला दर्ज किया और जांच-पड़ताल प्रारंभ हो गई  पुलिस ने कथित रूप से आरोपी नोएडा से पकड़ा है. प्रीति ने अपनी शिकायत में कहा कि आरोपी ने उन्हें छत्तीसगढ़ जोनल डिस्ट्रीब्यूटर बनाने का झांसा देकर 16 करोड़ की ठगी की है.

crime

प्रीति ने पेंटल टेक्नोलॉजी इंडिपेन्टेड टीवी कंपनी के हेड अतुल मिश्रा, विवेक प्रकाश और अजय राठौर सहित कई डायरेक्टरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कराई . प्रीति के अनुसार  उनको प्रलोभन दिया गया था कि 500 चैनलों का प्रकाशन और पूरे प्रदेश में रिटेलर रूप में लाखों रुपए कमीशन मिलेगा. आरोपियों ने अलग-अलग बैंक खातों में 16 करोड़ रूपये जमा करा लिए बाद में उन्हें अहसास हुआ  की उसके साथ ठगी हो गयी है. पुलिस के अनुसार ऐसे ही देश भर के हजारों लोगों को ठगा  गया है.

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घटना के बाद रायपुर पुलिस से उपनिरीक्षक सेराज खान के नेतृत्व में 4 सदस्यीय टीम बनाकर नोएडा भेजी गई जहां विवेक प्रकाश को गिरफ्तार कर ट्रांजिट रिमाण्ड पर रायपुर कार्रवाई की जा रही है.

कैसे “फांसा” गया प्रीति को

इस संपूर्ण प्रकरण में चकित करने वाली बात यह सामने आई है कि ठगी करने वाला बेहद नफासत और शान से अपना जीवन नोएडा जैसी भव्यतम सिटी में व्यतीत कर रहा था.

नोएडा के एक पॉश इलाके से एक रईस कारोबारी को रायपुर पुलिस ने ठगी के मामले में गिरफ्तार किया और छत्तीसगढ़ ले आई. विवेक प्रकाश नाम के इस शख्स पर आरोप है कि इसने “बिजनेस पार्टनर” बनाने के नाम पर रायपुर की एक महिला से लगभग 16 करोड़ रुपए ले लिए. इसके बाद डील के मुताबिक महिला को कंपनी   मे ना कोई पोजिशन मिली और ना ही कोई जवाबदेही इस कारोबारी और इसके साथियों ने दी.

 प्रीति मूंदड़ा ने कुछ महीने पहले चारों तरफ से थक हार और निराश होकर  रायपुर के गुढ़ियारी थाना में अपनी फरियाद को शिकायत के रूप में शिकायत दर्ज करवाई .

 “करोड़ों रुपए” देकर क्या अच्छे समय का इंतजार

प्रीति मुंदड़ा और उसके परिवार को यह प्रतीत हो रहा था की करोड़ों रुपए  इन्वेस्ट करके आने वाले समय में उनका भविष्य सुखद और सुखमय बन जाएगा. ऐसा कुछ नहीं हुआ और ठगे जाने के बाद प्रीति मुद्रा की रिपोर्ट दर्ज होने के साथ  ही पुलिस सक्रिय हुई  छानबीन विवेचना प्रारंभ हुई. विवेक प्रकाश पेंटल टेक्नोलाजी इंडिपेन्टेड टी.वी. नाम की कंपनी चलाता है. यह एक जिस तरह से डिश और टाटा स्काय अपनी सेवाएं देते हैं, विवेक की कथित कंपनी भी ऐसी ही सर्विस देने का दावा करती रही. इनके सेट टॉप बॉक्स और डिश एंटिना भी बाजार में मिल रहे थे.

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इनके संपर्क में आई रायपुर की प्रीति सिंघल मुंदडा ने पुलिस कहा कि जोनल डिस्ट्रीब्यूटरशीप देने के नाम पर विवेक के साथी अतुल मिश्रा, अजय राठौर ने मार्च 2019 तक लगभग 16 करोड़ रुपए ले लिए. महिला से कहा गया कि लाखों की कमाई होगी, पूरे छत्तीसगढ़ में आपका बिजनेस साम्राज्य फैलेगा.  मगर रुपए लेने के बाद कोई सर्विस कंपनी ने नहीं दी . राजधानी पुलिस  ने एक  जांच टीम बना कर मामला उसके सुपुर्द कर दिया.

इतनी बड़ी राशि की हेराफेरी की वजह से पुलिस ने आरोपी को गिरफ्तार करने का एक्शन प्लान बनाया. एक साल से भी अधिक वक्त से आरोपी विवेक को तलाशने का काम जारी था. पुलिस टीम को पता चला कि विवेक नोएडा में रह रहा है. सब इंस्पेक्टर सेराज खान के साथ 4 लोगों की टीम जिला गौतम बुद्ध नगर (उ.प्र.) के नोएडा चली गई. टीम ने आरोपी विवेक का पता ढूंढ लिया और अंततः उसे गिरफ्तार करके छत्तीसगढ़ ले आई.

Crime Story: रान्ग नंबर भाग 3

ताजमहल वाली फोटो का राज: भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा 

9 दिसंबर को पूनम के भाई की शादी थी. इस में शिवकुमार अपनी पत्नी के साथ गया था. 3 दिन तक वह वहीं रहा. उसी दौरान पूनम को संदीप के साथ कई बार मिलने का मौका मिला. संदीप ने उस से कहा कि शिवकुमार से छुटकारा पाने का एक ही उपाय है कि उस की हत्या कर दी जाए.

जब वह विधवा हो जाएगी तो परिवार वाले एक गांव का होने के बावजूद उन की शादी करने के लिए मजबूर हो जाएंगे.

बात पूनम की समझ में आ गई. उस ने शिवकुमार की हत्या करने के लिए हामी भर दी. लेकिन शिवकुमार को कैसे मारा जाए कि उन पर कोई अंगुली भी न उठे. इस के लिए 2-3 मुलाकातों में पूनम ने संदीप से मिल कर हत्या की पूरी साजिश तैयार कर ली.

शादी के बाद पूनम पति शिवकुमार के साथ वापस आ गई. पूनम व संदीप के पास मोबाइल फोन थे, जिस के माध्यम से वे शादी के बाद से एकदूसरे से बातचीत करते थे. साथ ही वाट्सऐप कालिंग भी करते रहते थे.

लेकिन भाई की शादी से लौटने के बाद पूनम का संदीप से फोन पर बातचीत करने का सिलसिला ज्यादा बढ़ गया. क्योंकि शिवकुमार को रास्ते से हटाने के लिए उन्हें अपनी उस योजना को अंजाम देना था.

संदीप ने पूनम से कहा था कि अगले एकदो दिन में वह अपने पति को आगरा घूमने के लिए राजी कर ले और उसे अपने साथ आगरा ले आए.

अतीक अहमद खूंखार डौन की बेबसी: भाग 2

पूनम ने ऐसा ही किया. उस ने शिवकुमार से कहा कि शादी के बाद वह उसे कहीं घुमाने नहीं ले गया. कम से कम आगरा में प्यार की निशानी ताजमहल तो दिखा दें. फरमाइश कोई ज्यादा बड़ी और नाजायज नहीं थी, लिहाजा शिवकुमार परिवार वालों से इजाजत ले कर 14 दिसंबर को पूनम को ताजमहल दिखाने के लिए बस से आगरा ले आया.

14 दिसंबर को पूनम और शिवकुमार आगरा ताजमहल घूमते रहे. रात को एक होटल में रुके. अगले दिन सुबह यानी 15 दिसंबर को उन्होंने ताजमहल देखा और शाम को वहीं रुके.

अगली सुबह 6 बजे दोनों आगरा से बस द्वारा घर के लिए निकले. हालांकि शिवकुमार का प्लान यह था कि पहले मथुरा जा कर कृष्ण जन्मभूमि व प्रेम मंदिर देखेंगे उस के बाद मथुरा में अपने मामा से मिलेगा और बाद में घर जाएगा.

लेकिन बस में बैठते समय पूनम ने अनुरोध कर के उस का प्लान बदलवा दिया. दरअसल, पूनम ने उस से कहा कि राया के पास उस के रिश्ते के एक मौसा रहते हैं. उन्होंने कई बार उस से पति के साथ घर आने के लिए कहा है. थोड़ी देर के लिए उन से मिलने के बहाने वह शिवकुमार को ले कर राया के पास एक्सप्रेसवे के यमुना कट पर ही उतर गई.

दरअसल, शिवकुमार पत्नी से इतना प्यार करता था और भले स्वभाव का था कि उसे पता ही नहीं था कि पूनम साजिश के तहत उसे राया लाई है. हकीकत यह थी कि वहां उस का कोई मौसा नहीं रहता था.

इस दौरान संदीप से लगातार उस की बात चल रही थी. उस वक्त सुबह के करीब 7 बजे थे. एक्सप्रेसवे पर बस से उतरने के बाद पूनम ने चाय पीने की इच्छा जताई तो दोनों ने एक स्टाल पर रुक कर चाय पी.

इस के बाद पूनम ने साजिश के तहत शिवकुमार से टौयलेट जाने की बात कही तो वह असमंजस में पड़ गया. क्योंकि एक्सप्रेसवे पर सब जगह टायलेट नहीं होते. लेकिन पत्नी को इमरजेंसी थी, लिहाजा सब से उचित जगह सड़क के नीचे दिख रहा जंगल ही था.

शिवकुमार पूनम को ले कर नीचे जंगल की ओर उसे टौयलेट कराने के लिए ले गया. लेकिन उसे क्या पता था कि मौत पहले से वहां उस का इंतजार कर रही है. संदीप वहां पहले ही झाडि़यों में छिपा था.

जैसे ही शिवकुमार उस की तरफ पीठ कर के खड़ा हुआ, संदीप ने दबेपांव पीछे से जा कर शिवकुमार के सिर पर भारीभरकम पत्थर दे मारा. इस के बाद संदीप और पूनम ने शिवकुमार के सिर पर पत्थर से कई प्रहार किए.

शिवकुमार वहीं निढाल हो कर गिर पड़ा. शिवकुमार के पास 2 बैग थे. एक बैग में पूनम के कपडे़ थे, दूसरे में शिवकुमार के कपड़े. शिवकुमार के बैग से पूनम ने सारा सामान निकाल कर अपने बैग में रख लिया ताकि बैग में ऐसी कोई चीज न मिले, जिस से शिवकुमार की पहचान हो सके. लेकिन गलती से शिवकुमार और पूनम का ताजमहल पर खिंचवाया गया फोटो वाला लिफाफा थैले में ही रह गया था. इसी आधार पर पुलिस ने मृतक की शिनाख्त की थी.

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दरअसल, हत्या का ये पूरा प्लान संदीप ने तैयार किया था. शिवकुमार की हत्या करने के बाद वे दोनों वहां से टैंपो ले कर मथुरा की ओर भाग आए थे. इस के बाद वे इधर से उधर भागते रहे.

पूनम एक दिन बाद ससुराल जाने का मन बना रही थी. उस से पहले ही पुलिस ने उसे पकड़ लिया. पूनम की हालत ऐसी हो गई न तो सनम मिला ना विसाले सनम.

पुलिस ने पूनम व संदीप से पूछताछ करने के बाद उन्हें गिरफ्तार कर सक्षम न्यायालय में पेश कर दिया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया.

—कथा पुलिस की जांच व आरोपियों तथा पीडि़त परिवार के बयान पर आधारित

ताजमहल वाली फोटो का राज: भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा 

छानबीन करने के दौरान पुलिस टीम को आखिर एक ऐसा टिकट मिल गया, जो 2 लोगों के लिए बना था. उस में जो आईडी प्रूफ लगा था, वह हरियाणा के पलवल जिले के थाना होडल क्षेत्र के गांव सेवली में रहने वाले शिवकुमार का था. साथ में उस की पत्नी पूनम का नाम लिखा था.

पुलिस टीम ने ताजमहल प्रशासन की मदद से सीसीटीवी फुटेज और एंट्री टिकट का रिकौर्ड वहां से अपने कब्जे में ले लिया. इंसपेक्टर शर्मा अपनी टीम के साथ 16 दिसंबर की रात को ही मथुरा वापस लौट आए.

इंसपेक्टर शर्मा ने एक सिपाही को पलवल के सेवली गांव भेजा. जहां से वह अगली सुबह शिवकुमार के चाचा लक्ष्मण सिंह व अन्य परिजनों को अपने साथ राया थाने ले आया.

सब से पहले लक्ष्मण व अन्य परिजनों को पोस्टमार्टम हाउस में प्रिजर्व कर के रखा गया शव दिखाया तो उन्होंने देखते ही उस की पहचान शिवकुमार के रूप में कर दी.

लक्ष्मण सिंह ने कपड़ों को देख कर भी साफ कर दिया कि उस ने जो कपड़े पहने थे, वह घर से पहन कर गया था. साथ ही उन्होंने मृतक शिवकुमार के शव के पास मिली फोटो को देख कर स्पष्ट कर दिया कि वह फोटो शिवकुमार तथा उस की पत्नी पूनम की है.

पूछताछ करने पर लक्ष्मण ने बताया कि 14 दिसंबर को शिवकुमार अपनी पत्नी पूनम के साथ ताजमहल जाने की बात कह कर बस से गया था. वह दोपहर में अपने मामा ओंकार सिंह से मुलाकात करने के लिए भरतपुर गेट मथुरा जाने की बात कह रहा था.

उन्होंने बताया कि शिवकुमार की शादी इसी साल 29 जून को अलीगढ़ जिले के गांव गोरोला निवासी पूनम से हुई थी. लक्ष्मण ने बताया कि उन के बेटे सूरज की शादी भी इसी गांव में हुई थी और उस के सुझाव पर उन के भाई भरत सिंह ने बेटे शिवकुमार का विवाह पूनम से किया था.

चूंकि शादी के बाद से कोरोना की महामारी के कारण शिवकुमार अपनी पत्नी को कहीं भी घुमाने के लिए ले कर नहीं गया था, इसीलिए उस ने पहली बार पत्नी को घुमाने का प्लान बनाया था और ताजमहल घुमाने के लिए ले गया था.

शिवकुमार की हत्या और उस की पत्नी पूनम के लापता होने की गुत्थी को लक्ष्मण सिंह भी नहीं समझ पा रहे थे. इंसपेक्टर शर्मा को लग रहा था कि हो न हो शिवकुमार की हत्या और उस की पत्नी के लापता होने में कोई संबंध हो.

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शिवकुमार तथा उस की पत्नी पूनम के मोबाइल की काल डिटेल्स निकलवाई गई. शिवकुमार की काल डिटेल्स से तो पुलिस को कुछ खास मदद नहीं मिली. लेकिन पूनम की काल डिटेल्स खंगाली गई तो पता चला कि पिछले कुछ महीनों से उस की एक खास नंबर पर दिन में कई बार लंबीलंबी बातें होती थीं.

16 दिसंबर की सुबह जब पुलिस ने शिवकुमार का शव बरामद किया था, उस दिन तथा उस से पहले 3-4 दिन में उसी नंबर पर पूनम की कई बार लंबी बातचीत हुई थी.

पुलिस ने जब उस नंबर की काल डिटेल्स निकाली तो पता चला कि वह पूनम के ही गांव गोरोला में रहने वाले किसी संदीप के नाम है.

जांच जैसेजैसे आगे बढ़ रही थी, धीरेधीरे पूरा माजरा पुलिस की समझ में आ रहा था. क्योंकि जब पूनम व संदीप के फोन की लोकेशन ट्रेस की गई तो 15 दिसंबर की शाम से ले कर अभी तक दोनों के फोन की लोकेशन अलीगढ़ व मथुरा के बौर्डर एरिया में एक साथ मिल रही थी. साफ था कि पूनम व संदीप एक साथ थे.

पुलिस की एक टीम पूनम की तलाश में उस के मायके पहुंची, लेकिन वहां उस का कोई पता नहीं चल सका.

पुलिस ने लोकेशन के आधार पर कई टीमें बना कर अलीगढ़ में अलगअलग छापेमारी शुरू कर दी. आखिरकार पुलिस ने पूनम व संदीप को मथुरा व अलीगढ़ बौर्डर के गांव नगला गंजू से उस के एक दोस्त के घर से गिरफ्तार कर लिया.

दोनों को राया थाने ला कर पूछताछ शुरू की गई तो पुलिस को शिवकुमार की हत्या का राज खुलवाने में ज्यादा परेशानी नहीं हुई. पूनम पति से बेवफाई और अपनी निजी जिंदगी का एकएक राज खोलती चली गई.

24 साल की पूनम ने जब से जवानी की दहलीज पर कदम रखा था, तब से संदीप को ही अपना सब कुछ मान लिया था. दोनों एक ही बिरादरी के थे, इसलिए पूनम ने कभी सोचा ही नहीं था कि संदीप को पति के रूप में देखने का उस का सपना कभी पूरा नहीं होगा.

अलीगढ़ जिले के गोरोला गांव के रहने वाले चंद्रपाल सिंह के 4 बच्चों में पूनम सब से बड़ी थी. उस से छोटी एक बहन व 2 भाई थे. गांव में खेतीकिसानी करने वाले पिता को जब एक साल पहले पता चला कि बड़ी बेटी पूनम गांव में ही रहने वाले महावीर के छोटे बेटे

संदीप से प्यार करती है तो उन का गुस्सा फूट पडा.

दरअसल पश्चिमी उत्तर प्रदेश में आज भी एक ही गांव में रहने वाले युवकयुवतियों को आपस में भाईबहन मानने की प्रथा है. इसलिए चंद्रपाल सिंह ने पूनम से साफ कह दिया कि वे मर जाएंगे, लेकिन संदीप से उस की शादी नहीं करेंगे.

पूनम ने पिता से साफ कहा कि वह संदीप से 3 सालों से प्यार करती है और उस के बिना जीने की उस ने कल्पना भी नहीं की है. अगर उन्होंने उस की शादी कहीं कर भी दी तो वह खुश नहीं रह पाएगी. क्योंकि वह तन मन से संदीप को ही अपना पति मान चुकी है.

चंद्रपाल सिंह ने बेटी को ऊंचनीच और समाज का वास्ता दे कर उस वक्त शांत तो कर दिया लेकिन उन्हें लगा कि अगर जल्द ही बेटी के हाथ पीले नहीं किए तो वह समाज में उसे बदनाम कर सकती है.

गांव में बिरादरी के ही एक दोस्त की बेटी की शादी पलवल के सूरज से हुई थी. सूरज के परिवार और खानदान के बारे में उन्हें पता था कि निहायत शरीफ और अच्छे परिवार का लड़का है. चंद्रपाल ने दोस्त से कह कर पूनम के लिए अपने घरपरिवार में कोई लड़का देखने की बात कही तो सूरज ने उसे बताया कि उस के चाचा का लड़का शिवकुमार भी शादी के लायक है.

Crime: अंधविश्वास, झाड़-फूंक और ‘औलाद का सुख’

शिवकुमार भाइयों में सब से बड़ा था. हालांकि घर में थोड़ीबहुत जमीन थी, जिस पर परिवार के लोग खेती करते थे. लेकिन इस के अलावा भी शिवकुमार पलवल में एक कारखाने में नौकरी करता था. जब खेती का काम ज्यादा होता तो वह नौकरी छोड़ देता था. कुल मिला कर जिंदगी की गुजरबसर ठीक तरह से हो रही थी.

सूरज ने जब अपने चाचा और पिता को अपनी ससुराल में रहने वाले चंद्रपाल की लड़की पूनम का जिक्र किया तो परिवार को लगा कि देखाभाला परिवार है दोनों भाइयों की ससुराल एक ही गांव में होगी तो अच्छा रहेगा.

एक दिन सूरज ने शिवकुमार को अपनी ससुराल ले जा कर चोरी से पूनम को दिखा भी दिया. शिवकुमार को पूनम पहली ही नजर में भा गई. गांव की सीधीसादी और मासूम सी पूनम को देख कर शिवकुमार ने घर वालों से शादी की हां कर दी. इस के बाद दोनों परिवारों में बात हुई और कोरोना के कारण दोनों परिवारों ने सादगी के साथ शादी संपन्न करा दी.

शादी के बाद पूनम शिवकुमार की दुलहन बन कर उस के गांव सेवली आ गई. दोनों का वक्त धीरेधीरे प्यार के बीच गुजरने लगा. लेकिन शादी के बाद पूनम अपने दिल से संदीप का प्यार व उस की यादों को निकाल नहीं सकी.

वक्त जैसेजैसे गुजर रहा था, संदीप के लिए उस की तड़प और ज्यादा बढ़ती जा रही थी. वह जब भी मायके जाती तो चोरीछिपे संदीप से जरूर मिलती तो उस पर किसी तरह शिवकुमार से छुटकारा दिला कर अपनी बनाने का दबाव डालती.

संदीप भी पूनम के बिना खुद को अधूरा समझता था. उस ने पूनम को भरोसा दिलाया कि जल्द ही वह उस के लिए कुछ करेगा.

अगले भाग में पढ़ें- दरअसल, हत्या का ये पूरा प्लान संदीप ने तैयार किया था

ताजमहल वाली फोटो का राज: भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा 

16दिसंबर, 2020 की सुबह करीब 9 बजे का वक्त था. यमुना एक्सप्रेसवे से मथुरा के राया कस्बे में उतरने वाले रास्ते के किनारे लोगों ने झाडि़यों में खून से लथपथ एक युवक का शव पड़ा देखा.

कुछ ही देर में वहां राहगीर जुटने लगे. उसी दौरान किसी ने इस की सूचना पुलिस कंट्रोल रूम को दे दी. चूंकि यह क्षेत्र थाना राया क्षेत्र में आता था, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा वायरलैस मैसेज दे कर घटना से अवगत करा दिया गया.

राया थाने के प्रभारी निरीक्षक सूरज प्रकाश शर्मा को उन के मुंशी ने हत्या के बारे में बताया तो थानाप्रभारी एस.पी. शर्मा तत्काल तैयार हो गए. एसआई मोहनलाल यादव, राजकुमार, कांस्टेबल यशपाल, आशुतोष कुमार व प्रदीप कुमार को साथ ले कर वह उस स्थान पर पहुंच गए, जहां खून से लथपथ शव पड़े होने की सूचना मिली थी.

लाश को देखते ही इंसपेक्टर शर्मा समझ गए कि मामला दुर्घटना का नहीं बल्कि हत्या का है. क्योंकि पास में ही एक बड़ा सा पत्थर पड़ा था, जिस पर लगा खून इस बात की गवाही दे रहा था कि उसी पत्थर से मृतक के सिर पर प्रहार किया गया था. इसी से मृतक का सिर व चेहरा खून से सराबोर थे. उस के चेहरे पर ताजा खून बह रहा था. मतलब हत्या हुए ज्यादा वक्त नहीं बीता था. मृतक के चेहरे पर घनी दाढ़ी थी जो खून से लथपथ थी.

थानाप्रभारी ने एसएसपी डा. गौरव ग्रोवर तथा सीओ आरती सिंह को राया मोड़ पर मिले शव के बारे में सूचना दे दी. एसएसपी व सीओ सूचना मिलने के कुछ देर बाद ही घटनास्थल पर पहुंच गए. फोरैंसिक टीम का दस्ता भी मौके पर आ गया.

मृतक की उम्र 26 साल के आसपास रही होगी. शरीर पर जींस और जैकेट के साथ पैरों के जूतों से लग रहा था कि वह कोई राहगीर था, जिस से या तो लूटपाट के लिए उस की हत्या की गई थी या किसी ने रंजिशन यहां ला कर मार डाला था.

मृतक के जेबों की तलाशी में ऐसी कोई चीज बरामद नहीं हो सकी, जिस से उस की पहचान की जा सकती. इंसपेक्टर शर्मा शव का मुआयना कर रहे थे, तभी उन की नजर लाश से कुछ दूरी पर पड़े एक बैग पर पड़ी. लेकिन बैग खाली था. तलाशी लेने पर उस में कागज का एक लिफाफा पड़ा मिला, जिस में एक फोटो थी.

फोटो ताजमहल के सामने खिंचवाई गई थी. फोटो में मृतक के साथ एक महिला भी खड़ी थी. फोटो इस तरह खिंचाई गई थी जिस तरह नवदंपति खिंचवाते हैं. फोटो बहुत पुरानी नहीं थी, क्योंकि मृतक के शरीर पर जो कपड़े थे, फोटो में भी उस ने वही कपड़े पहने हुए थे. मतलब मृतक ताजमहल घूम कर लौटा था.

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लेकिन सवाल यह था कि अगर फोटो में उस के साथ खड़ी महिला उस की पत्नी थी तो वह कहां है? अचानक इंसपेक्टर एस.पी. शर्मा के मन में सवाल कौंधा कि कहीं पत्नी ने ही तो उस का काम तमाम नहीं कर दिया.

लेकिन ये तमाम सवाल तब तक कयास थे, जब तक मृतक की शिनाख्त नहीं होती. ताजमहल देख कर राया के इस रास्ते पर उतरने से इस बात की भी संभावना थी कि मृतक आसपास के ही किसी गांव का रहने वाला हो सकता है.

इसी उम्मीद में इंसपेक्टर सूरज प्रकाश शर्मा ने उस इलाके में 5 किलोमीटर तक पड़ने वाले सभी गांवों में अपनी पुलिस टीम से कह कर ऐसे जिम्मेदार लोगों को मौके पर बुलवाया, जो अपने गांव के अधिकांश लोगों को जानते हों.

कई घंटे मशक्कत की गई, लेकिन काफी लोगों को दिखाने के बाद भी मृतक की शिनाख्त नहीं हो सकी तो पुलिस ने मौके की काररवाई पूरी कर लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

पुलिस अधिकारी घटनास्थल से थाने लौट आए. पुलिस ने अज्ञात आरोपियों के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. एसएसपी डा. गौरव ग्रोवर ने जांच की जिम्मेदारी राया थाने के प्रभारी निरीक्षक सूरज प्रकाश शर्मा को ही सौंप दी. साथ ही उन्होंने सीओ आरती सिंह के नेतृत्व में एक टीम भी गठित कर दी.

टीम में थानाप्रभारी के अलावा एसआई मोहनलाल यादव, राजकुमार, कांस्टेबल यशपाल, आशुतोष कुमार, प्रदीप, इंसपेक्टर (सर्विलांस) जसवीर सिंह तथा उन की टीम के कांस्टेबल राघवेंद्र सिंह, समुनेश, योगेश कुमार और गोपाल सिंह को शामिल किया गया. एसएसपी ने इस हत्याकांड का जल्द से जल्द खुलासा कर आरोपियों को पकड़ने के निर्देश दिए.

पुलिस के पास मृतक की पहचान करने व वारदात का खुलासा करने के लिए केवल एक ही लीड थी और वह था बरामद हुआ फोटो.

थानाप्रभारी एस.पी. शर्मा खुद पुलिस टीम ले कर आगरा पहुंच गए. उन्होंने आगरा पहुंच कर वहां ताजमहल के आसपास फोटो खींचने वाले फोटोग्राफरों को मृतक के पास से मिले फोटो दिखा कर जानकारी हासिल करनी चाही. लेकिन इस प्रयास में उन्हें कोई सफलता नहीं मिली.

क्योंकि वहां सैकड़ों फोटोग्राफर थे और सभी से संपर्क होना बेहद मुश्किल था. अचानक उन्होंने उस साइट का निरीक्षण किया, जहां खड़े हो कर मृतक ने फोटो खिंचवाई थी. इस से एक बात स्पष्ट हो गई कि मृतक ने ताजमहल के भीतर जा कर फोटो खिंचवाई थी.

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इंसपेक्टर शर्मा ने ताजमहल प्रशासन की मदद से ताजमहल के भीतर प्रवेश करने वाले गेट की पिछले 2 दिनों की सीसीटीवी फुटेज देखी तो 15 दिसंबर को मृतक एक महिला के साथ ताजमहल में प्रवेश करते हुए दिखाई पड़ गया. इस से यह साफ हो गई कि मृतक आगरा से घूम कर ही मथुरा गया था, जहां उस की हत्या हो गई.

आगे का काम पुलिस के लिए बेहद आसान हो गया. पुलिस ने ताजमहल प्रशासन की मदद से 15 दिसंबर को ताजमहल देखने वालों के टिकट की छानबीन शुरू कर दी. दरअसल ताजमहल देखने जाने वालों को अपना नाम, पता और मोबाइल नंबर की जानकारी देनी होती है.

अगले भाग में पढ़ें- शिवकुमार की हत्या और उस की पत्नी के लापता होने में कोई संबंध हो

Crime: भूत प्रेत, अंधविश्वास और हत्या!

भूत प्रेत और अंधविश्वास का संजाल कुछ ऐसा तारी होता है कि आदमी को भय के जाल में फंस कर कुछ भी सुनाई नहीं देता, दिखाई नहीं देता.

यह भूत प्रेत का मायाजाल अशिक्षित अपढ़ और दुरस्थ ग्रामीण अंचल में हो तो यह समझा जा सकता है कि इसका मूल कारण अशिक्षा है. मगर यही भूत प्रेत का खेल अगर शहर और महानगर में होने लगे तो और ज्यादा भयावह और चिंता का सबब होना चाहिए.

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के स्थल गुढ़ियारी में एक महिला को कथित रूप से भूत प्रेत दिखाई देते थे. एक दिन महिला की लाश ओवर ब्रिज के पास मिली. पुलिस ने जांच की तो जो सनसनीखेज तथ्य सामने आए उसके आधार पर पुलिस मान रही है कि मामला भूत प्रेत अंधविश्वास के माया जाल में फंस कर पति द्वारा पत्नी की हत्या का है.

नए वर्ष जनवरी के द्वितीय पखवाड़े में राजधानी रायपुर के मंदिर हसौद क्षेत्र में एक महिला स्मिता बोपचे (लगभग 35 वर्ष) की हत्या मामले को पुलिस ने कथित रूप से सुलझा लिया है.मगर इस संपूर्ण प्रकरण में कुछ प्रश्न ऐसे हैं जिनके जवाब मृतक महिला के परिवार के पास है और विवेचना करने वाली पुलिस के पास.

परिणाम स्वरूप यह कहा जा सकता है कि आज हमारी पुलिस हमारा समाज हमारी कानून व्यवस्था, न्याय व्यवस्था एक ऐसे अंधेरे में अपना काम कर रही है जिसमें सच्चाई संभवत छुप कर रह जाती है. लोगों को पता ही नहीं चलता. फलस्वरूप अंधविश्वास की बीमारी समाज को अनेक तरीके से एक भ्रम के मायाजाल में उलझा कर रख देती है और पता ही नहीं चलता कि सच्चाई आखिर है क्या? महिला की हत्या के इस सनसनीखेज मामले में कई ऐसे हैं जिनका जवाब पुलिस को देना चाहिए.

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पुलिस मानती है हत्यारा पति है!

महिला की लाश मिलने के बाद पुलिस ने जांच की और माना कि महिला का हत्यारा कोई और नहीं बल्की मृतका का पति है! सायबर सेल और पुलिस की टीम ने आरोपी पति राजेंद्र बोपचे को गिरफ्तार कर लिया है. इस मामले में खुलासा करते हुए इसकी जानकारी ग्रामीण अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक और क्राइम अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक अभिषेक माहेश्वरी ने दी.

घटना मंदिर हसौद थाना के छेरीखेड़ी ओवर ब्रिज के पास की है. यहां पर एक सुनसान प्लाट में महिला की लाश 18 जनवरी को मिली थी. महिला के शव पर जख्म के कई निशान भी पाये गये थे.साथ ही आरोपी ने महिला की पहचान छुपाने के लिए चेहरे को बुरी तरह से कुचल दिया था.इस घटना की सूचना के बाद मंदिर हसौद पुलिस और सायबर सेल की टीम मौके पर पहुंची हुई थी. जांच के दौरान पुलिस को पता चला कि मृतिका महिला का नाम स्मिता बोपचे, पति राजेन्द्र बोपचे है, जो गुढ़ियारी की रहने वाली थी. महिला की पहचान होने के बाद संदेह के आधार पर पुलिस ने मृतिका के पति राजेन्द्र बोपचे को हिरासत में लेकर उससे कढ़ाई से पूछताछ शुरू की.पूछताछ के दौरान आरोपी ने हत्या की बात कबूल करते हुये पुलिस की टीम को बताया कि,उसकी पत्नी मानसिक रूप से बीमार थी.

आरोपी पति ने पुलिस को आगे बताया कि उसकी पत्नी को लगता था कि उस पर भूत-प्रेत और आत्माओं का साया है और इसी बात लेकर दोनों में अक्सर विवाद भी होता रहता था. घटना वाले दिन भी उसकी पत्नी ने भूत देखने की बात कह कर उसे अपने साथ मंदिर हसौद के छेरीखेड़ी स्थित खाली प्लाट में लेकर आयी. यहां पर उसकी पत्नी ने अचानक से उसके उपर पत्थरों से हमला करना शुरू कर दिया.इस बीच विवाद के दौरान राजेन्द्र ने भी अपनी पत्नी से मारपीट करते उसके सिर को पत्थरों में कुचलकर उसकी हत्या कर दी. घटना के बाद वह फरार हो गया. आरोपी राजेंद्र बोपचे कुछ माह पहले ही बालाघाट ( मध्यप्रदेश ) से रायपुर के गुढ़ियारी आया था. यहाँ पर एक किराये के मकान में अपनी पत्नी के साथ रह रहा था.

कुछ अनसुलझे सवाल?

संपूर्ण घटनाक्रम को एक बारगी करने पर यह तथ्य स्पष्ट दिखाई देता है कि पति सफेद झूठ बोल रहा है की स्मिता को भूत प्रेत दिखाई देते थे. दूसरी सबसे बड़ी बात यह कि पत्नी ने कहा- चलो, मैं तुम्हें भूत प्रेत दिखाऊं और पति पर पत्थरों की वर्षा कर दी. ऐसा था तो पति महाशय वहां से भाग क्यों नहीं गया! वह अपनी जान भागकर बचा सकता था.

सवाल यह भी है कि क्या कोई महिला इतनी ताकतवर हो सकती है कि पति पर पत्थर बरसाने लगे? और आगे पुलिस कहती है कि अपने को बचाने के लिए पति ने पत्थर बरसाने शुरू कर दिए. संपूर्ण बयानों में कई पेंच है जो बताते हैं कि यह पति द्वारा बताया गया कथित घटनाक्रम एक झूठ और कल्पना का पुलिंदा मात्र है. सवाल यह भी है कि अगर महिला को भूत प्रेत की व्याधि थी तो उसका इलाज क्यों नहीं कराया गया? उसका इलाज कहां कराया जा रहा था? यह भी स्पष्ट नहीं है.

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बालाघाट से रायपुर आ कर के रहना और पत्नी की हत्या यह सब एक अपराधिक मानसिक बनावट के संकेत देती है जो बताती है राजेंद्र ने बड़े ही चालाकी से पत्नी को मौत के घाट उतार दिया. इस संदर्भ में अधिवक्ता डॉ उत्पल अग्रवाल के मुताबिक आगे चलकर न्यायालय में जब इस प्रकरण की सुनवाई होगी तो पति यह कह कर की पत्नी को भूत प्रेत का साया था, आसानी से सजा से बच जाएगा. अथवा बहुत ही कम सजा पाकर एक बार फिर समाज में अपराध के लिए तैयार और कानून व्यवस्था पर हंसता हुआ मिलेगा.

Crime Story: रान्ग नंबर भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

मध्य प्रदेश के जबलपुर का उपनगरीय इलाका रांझी रक्षा मंत्रालय की फैक्ट्रियों के लिए जाना जाता है. यहां पर गन कैरेज, आर्डिनैंस, व्हीकल और ग्रे आयरन फाउंडी में सेना के उपयोग में आने वाले गोलाबारूद, टैंक और भारी वाहन बनाए जाते हैं.

ग्रे आयरन फाउंडी के गेट नंबर 2 के पास ही रांझी के रिछाई अखाड़ा मोहल्ले में 40 साल का सोनू ठाकुर अपनी 28 साल की पत्नी नीतू और 2 बेटियों के साथ रहता था. मूलरूप से दामोह जिले के हिनौता गांव का रहने वाला सोनू परिवार में 4 भाईबहनों में सब से बड़ा था.

शादी के बाद खर्चे बढ़े तो सोनू गांव में परेशान रहने लगा. वैसे भी गांव में उस का छोटा सा घर था, जिस में उस का पूरा परिवार रहता था. जहां पतिपत्नी एकदूसरे से ढंग से बात भी नहीं कर पाते थे. रात को दोनों एक छोटी सी कोठरी में सोते थे, जहां मन की बातें नहीं हो पाती थी. यह नीतू को बहुत अखरता था.

रात को जब घर के सभी लोग सो जाते, तब उन्हें एकदूसरे का साथ मिलता था. नीतू उलाहना दे कर अकसर सोनू से कहती थी कि वह कहीं अलग घर ले कर रहे. तब सोनू उसे समझा देता कि हमारी नईनई शादी हुई है. अभी परिवार से अलग रहेंगे तो घर वालों को अच्छा नहीं लगेगा. कुछ महीनों के बाद वह अपना कामधंधा जमा कर अलग  रहने लगेगा.

जब शादी को साल भर का समय बीत गया तो एक रात नीतू ने सोनू को सलाह देते हुए कहा, ‘‘क्यों न हम लोग गांव से दूर शहर जा कर कुछ कामधंधा कर लें.’’

सोनू को पत्नी की सलाह पसंद आई. जबलपुर शहर में हिनौता गांव के कुछ लड़के काम करते थे. सोनू ने उन के घर वालों से मोबाइल नंबर ले कर बातचीत की तो उन्होंने बताया कि उसे जबलपुर में आसानी से काम मिल जाएगा.

शादी के साल भर बाद सोनू बीवी के साथ काम की तलाश में जबलपुर आ गया था. दोनों रांझी के अखाड़ा मोहल्ले में वे किराए का कमरा ले कर रहने लगे. नीतू सिलाईकढ़ाई का काम करने लगी और सोनू को बड़ा फुहारा में घमंडी चौक पर कपड़े की एक दुकान में सेल्समैन का काम मिल गया.

देखतेदेखते सोनू को जबलपुर आए करीब 5 साल हो गए थे. पतिपत्नी ने धीरेधीरे तिनकातिनका जोड़ कर एक छोटा सा घर बना लिया था. इन सालों में नीतू 2 बेटियों की मां बन चुकी थी. सोनू और नीतू की गृहस्थी की गाड़ी हंसीखुशी से चल रही थी, मगर एक रौंग नंबर की काल ने उन के जीवन में जहर घोल दिया.

2020 के जनवरी महीने की बात है. दोपहर का वक्त था. घर के कामकाज से फुरसत पा कर नीतू मोबाइल फोन में यूट्यूब पर वीडियो देख रही थी. तभी मोबाइल की रिंग बजी. नीतू ने काल रिसीव की तो दूसरी तरफ से आवाज आई, ‘‘हैलो, मैं राजू बोल रहा हूं.’’

‘‘कौन राजू? मैं ने आप को पहचाना नहीं.’’

‘‘जी, मैं गाजीपुर से राजू राजभर बोल रहा हूं. कंप्यूटर ट्रेडिंग का काम करता हूं. क्या मेरी बात निशा वर्मा से हो रही है?’’

‘‘जी नहीं, आप ने गलत नंबर लगाया है.’’ नीतू ने जबाब दिया.

‘‘जी सौरी, मुझे निशा वर्मा के घर प्रिंटर भिजवाना था. गलती से आप का नंबर लग गया. वैसे आप कहां से बोल रही हैं?’’ राजू ने विनम्रता से पूछा.

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‘‘मैं तो जबलपुर से बोल रही हूं.’’

‘‘आप की आवाज बड़ी प्यारी है. क्या मैं आप का नाम जान सकता हूं?’’ वह बोला.

‘‘मेरा नाम नीतू ठाकुर है.’’ नीतू ने कहा.

‘‘नीतूजी, आप से बात कर के बहुत अच्छा लगा.’’

‘‘जी शुक्रिया.’’ कह कर नीतू ने फोन डिसकनेक्ट कर दिया. नीतू को राजू का इस तरह से बात करना अच्छा लगा. इस के बाद राजू नीतू के मोबाइल पर काल करने लगा. रौंग नंबर से शुरू हुआ बातचीत का सिललिला धीरेधीरे दोस्ती में बदल गया. अब नीतू भी हर दिन राजू के फोन आने का इंतजार करने लगी. एकदूसरे को वीडियो काल कर के दोनों की बातचीत होने लगी.

तीखे नैननक्श वाली नीतू ने हायर सेकेंडरी तक पढ़ाई की थी. उसे घूमनेफिरने और मौजमस्ती करने का बड़ा शौक था. उस ने शादी के पहले जो रंगीन ख्वाब देखे थे, वे सोनू से शादी कर के बिखर चुके थे.

थोड़ी सी पगार में घरगृहस्थी चलाने वाला उस का पति सोनू दिन भर काम में लगा रहता और नीतू घर की चारदीवारी में कैद घर के काम में लगी रहती.

पति के काम पर जाने के बाद फुरसत मिलती तो वह मोबाइल पर सोशल मीडिया साइट पर व्यस्त हो जाती.

मोबाइल फोन के जरिए राजू और नीतू का संबंध जब परवान चढ़ने लगा तो दोनों एकदूसरे से मिलने को बेताब रहने लगे. नीतू राजू के प्रेम में इस कदर खो चुकी थी कि बारबार राजू से जबलपुर आ कर मिलने की बात करती.

आग राजू के सीने में भी धधक रही थी. राजू नीतू को भरोसा दिलाता कि वह जल्द ही जबलपुर आ कर उस से मिलेगा.

इसी बीच मार्च महीने में कोरोना महामारी के कारण 24 मार्च को लौकडाउन लग गया. लौकडाउन में भी नीतू और राजू की मोबाइल पर बातें होती रहीं. नीतू का पति सोनू घर के बाहर गली में जब भी टहलने जाता, नीतू राजू को काल कर लेती. जैसेजैसे लौकडाउन में ढील मिलने लगी, राजू जबलपुर जाने की प्लानिंग करने लगा.

राजू जिस कंपनी के लिए कंप्यूटर ट्रेडिंग का काम करता था, उस का कारोबार जबलपुर शहर में भी था. किसी तरह कंपनी के मार्केटिंग मैनेजर से बात कर के उस ने जबलपुर की कंपनी में काम करने का जुगाड़ कर लिया. कंपनी की तरफ से उसे जबलपुर में काम करने का मौका मिला तो उस के मन की मुराद पूरी हो गई.

इसी हसरत में 25 साल का कुंवारा राजू नीतू की चाहत में सितंबर 2020 में अपने गांव जफरपुर, गाजीपुर से जबलपुर आ गया .

जिस दिन राजू जबलपुर आ कर नीतू से मिला तो नीतू की खुशी का ठिकाना न रहा. राजू ने नीतू को करीब से देखा तो देखता ही रह गया.

‘‘वाकई तुम बहुत खूबसूरत हो,’’ राजू ने नीतू से कहा तो वह शरमा कर बोली, ‘‘मेरी तारीफ बाद में करना. मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

जब नीतू राजू के लिए चाय बनाने किचन में गई, राजू अपने आप को रोक नहीं सका. वह भी किचन में पहुंच गया और नीतू को अपनी बांहों में भर लिया. वह उस के गालों को चूमते हुए बोला, ‘‘तुम्हें पाने को कितना इंतजार करना पड़ा.’’

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नीतू ने अपने आप को छुड़ाते हुए नखरे दिखा कर कहा, ‘‘थोड़ा सब्र और करो, धीरज का फल मीठा होता है.’’

नीतू राजू को चाय का कप पकड़ा कर बाहर आ गई. उस ने बाहर आ कर देखा उस की दोनों बेटियां आंगन में खेल में मस्त थीं.

इसी मौके का फायदा उठा कर नीतू ने राजू के पास जा कर कमरे का दरवाजा बंद कर लिया और राजू के सीने से लग गई. राजू ने नीतू की कमर में हाथ डाला और उसे बिस्तर पर ले गया. 8 महीने से मोबाइल पर चल रहे उन के संबंध के हसीन ख्वाब पूरे हो गए. उस दिन दोनों ने दिल खोल कर अपनी हसरतें पूरी कर लीं.

राजू ने जब उसे बताया कि उस ने अपना ट्रांसफर जबलपुर करा लिया है, इसलिए अब यहीं रहेगा. नीतू बड़ी खुश हुई. इतना ही नहीं, उस ने राजू को अपना रिश्तेदार बताते हुए उसे अपने मोहल्ले में भाड़े पर खाली कमरा दिला दिया. उस के खानेपीने की जिम्मेदारी वह खुद उठाने लगी.

नीतू ने राजू से मिलने का एक तरीका खोज लिया था. उस ने पति सोनू से बात कर उसे इस बात के लिए राजी कर लिया कि ढाई हजार रुपए महीने में राजू को दोनों टाइम खाना बना कर देगी. सोनू ने यह सोच कर हामी भर दी कि थोड़ी सी मेहनत से बैठे ठाले ढाई हजार रुपए महीने की आमदनी बढ़ जाएगी, जो उस की बेटियों की पढ़ाईलिखाई के काम आएगी.

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Crime Story: रान्ग नंबर भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

सोनू का यही निर्णय उस के लिए घातक साबित हुआ. नीतू को तो बस अपने प्रेमी से मिलने का बहाना चाहिए था. अब वह बेरोकटोक राजू के लिए खाने का टिफिन देने के बहाने उस से मिलनेजुलने लगी.

सोनू सुबह 9 बजे घर से निकल जाता और दिन भर कपड़े की दुकान में काम कर के थकाहारा रात 9 बजे के बाद घर पहुंचता. नीतू और उस के पति सोनू की उम्र में 12 साल का फासला था. यही वजह थी कि नीतू की शारीरिक जरूरतों को वह पूरा नहीं कर पाता था.

जब भी राजू को मौका मिलता वह नीतू के घर भी आ जाता. नीतू भी अपनी बेटियों तनु और गुड्डी को काम के बहाने घर से बाहर भेज देती और दोनों जी भर कर हसरतें पूरी करते.

29 नवंबर, 2020 की सुबह के साढ़े 7 बजे जबलपुर के रांझी थाने को फोन पर सूचना मिली कि ग्रे आयरन फाउंडी के गेट नंबर 2 के पास की नाली में कंबल में लिपटी एक लाश पड़ी है.

खबर मिलते ही टीआई आर.के. मालवीय ने पुलिस के आला अधिकारियों को सूचना दी और पुलिस टीम के साथ घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

घटनास्थल पर आसपास के लोगों की भीड़ मौजूद थी. लोगों ने लाश की शिनाख्त कर बताया कि वह पास में ही रहने वाले सोनू ठाकुर की लाश है. सोनू की गरदन और बाएं हाथ की नस कटी हुई थीं. घटनास्थल के पास ही सोनू की पत्नी अपनी दोनों बेटियों को सीने से चिपकाए चीखचीख कर रो रही थी.

जब पुलिस ने सोनू के बारे में नीतू से पूछताछ की तो उस ने बताया कि रात को साढ़े 10 बजे यह घर से घूमने की बात कह कर निकले थे. जब देर रात तक नहीं लौटे तो उस ने फोन किया. फोन स्विच्ड औफ बता रहा था.

नीतू से प्रारंभिक पूछताछ करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दी और आसपास रहने वाले लोगों से पूछताछ कर मामले की जांच शुरू कर दी.

जांच के दौरान पुलिस टीम के ट्रेनी आईपीएस अमित कुमार, टीआई आर.के. मालवीय और फोरैंसिक टीम ने घटनास्थल का बारीकी से मुआयना किया और पाया कि जीआईएफ गेट नंबर 2 के पास की जिस नाली में सोनू की लाश मिली थी, वहां खून के धब्बों के निशान थे.

सड़क पर मिले खून के निशानों का पीछा करतेकरते पुलिस सोनू के घर तक पहुंच गई.

जांच टीम को सोनू के घर में भी खून के धब्बे मिले. जबकि नीतू ने सोनू के रात साढ़े 10 बजे घर से बाहर जाने की बात कही थी. पुलिस को जांच में यह भी पता चला कि नीतू के मोहल्ले में रहने वाले एक युवक राजू से संबंध थे.

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संदेह की सुई नीतू की तरफ घूमी तो पुलिस ने नीतू को हिरासत में ले कर सख्ती से पूछताछ की. पहले नीतू पुलिस को गोलमोल जबाब देती रही. लेकिन जब पुलिस टीम की महिला आरक्षक ने उस से सख्ती के साथ पूछताछ की तो जल्द ही उस ने अपना गुनाह कबूल कर लिया.

नीतू के बयान के आधार पर रांझी पुलिस ने राजू को भी हिरासत में ले कर पूछताछ की. पुलिस पूछताछ में नीतू और राजू ने पुलिस को जो कहानी बताई, वह नाजायज संबंधों की ऐसी कहानी निकली जो दोनों को गुनाह के रास्ते पर ले गई थी.

रौंग नंबर फोन काल से शुरू हुए नीतू और राजू के अवैध संबंधों की जानकारी धीरेधीरे पूरे मोहल्ले में चर्चा का विषय बन चुकी थी. नीतू द्वारा फोन पर की जाने वाली लंबी बातें सोनू के मन में शक की जड़ें जमा चुकी थीं.

शक होने पर सोनू नीतू पर नजर रखने लगा. एक दिन सोनू ने नीतू को मोबाइल फोन पर किसी से अमर्यादित बातें करते हुए सुन लिया तो इसे ले कर दोनों में विवाद हो गया. अपनी गलती छिपाने के लिए नीतू रोनेधोने का नाटक करने लगी. उस ने कहा कि वह उस के चरित्र पर शक कर रहा है.

राजू सोनू की गैरमौजूदगी में उसे और उस की बच्चियों को घुमाने ले जाता था. दोनों के नाजायज संबंधों का यह खेल ज्यादा दिनों तक समाज की नजरों से नहीं छिप सका. दोनों के संबंधों की चर्चा मोहल्ले में खुलेआम होने लगी. मोहल्ले के कुछ लोगों ने सोनू को बताया कि उस की गैरमौजूदगी में राजू अकसर उस के घर आताजाता है.

सोनू को अब इस बात का पक्का यकीन हो गया था कि पत्नी उस के साथ बेवफाई कर रही है. इस बात से सोनू मानसिक रूप से परेशान रहने लगा.

एक दिन सोनू को अपनी तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही थी. इसलिए अपने सेठ से बोल कर वह दोपहर के वक्त घर आ गया. उस की बेटियां खिलौनों के साथ खेल रही थीं. उस ने जैसे ही कमरे का दरवाजा खोला, अंदर का दृश्य देख उस के होश उड़ गए. बिस्तर पर नीतू अपने प्रेमी के साथ रंगरलियां मना रही थी.

यह देख उस की आंखों में खून उतर आया. वह पत्नी पर चीखा, ‘‘हरामजादी, मेरी गैरमौजूदगी में आशिक के साथ ये गुल खिला रही है.’’

सोनू की चीख सुन कर दोनों हड़बड़ा कर कर अलग हो गए. राजू अपने कपड़े समेट कर भाग खड़ा हुआ और नीतू अपराधबोध से नजरें नीची किए खड़ी रही. उस ने पति से माफी मांगी और भविष्य में ऐसी गलती न दोहराने का वादा किया. सोनू ने भी उसे माफ कर दिया.

नीतू कुछ दिन तो ठीक रही, लेकिन उस से प्रेमी की जुदाई बरदाश्त नहीं हो रही थी. इसलिए वह उस से फिर मिलनेजुलने लगी. सोनू सब कुछ जान कर भी पत्नी की वेवफाई को बरदाश्त कर रहा था. कई बार उस के मन में विचार आता कि वेवफा पत्नी को हमेशाहमेशा के लिए छोड़ कर कहीं चला जाए, परंतु मासूम बेटियों के भविष्य की खातिर वह चुप रह जाता.

सोनू को कुछ नहीं सूझ रहा था. वैसे तो सोनू ने जीआईएफ गेट नंबर 2 के सामने खुद का घर बना लिया था. मगर नीतू के बहके कदमों को रोकने के लिए उस ने सोचविचार के बाद फैसला कर लिया कि इसी रविवार कुछ दिनों के लिए वह बीवीबच्चों को ले कर गांव चला जाएगा और गांव में ही कुछ कामधंधा करेगा.

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उसे भरोसा था कि कुछ दिन नीतू राजू से दूर रहेगी तो यह रोग भी दूर हो जाएगा. नीतू अपनी बेटियों की परवरिश में सब कुछ भूल कर सही रास्ते पर आ जाएगी. वापस गांव लौटने के अपने इस फैसले की जानकारी उस ने नीतू को भी दे दी थी.

जब नीतू ने राजू से परिवार सहित गांव वापस लौटने की बात कही तो राजू के माथे पर भी चिंता की लकीरें उभर आईं.

उसे लगा कि जिस नीतू की खातिर वह अपने गांव से इतनी दूर आ गया, वही अब उस की नजरों से दूर चली जाएगी. राजू की प्लानिंग नीतू के साथ शादी कर के घर बसाने की थी. राजू के इस निर्णय में नीतू की भी सहमति थी.

अगले भाग में पढ़ें- अब दोनों सोनू की लाश को ठिकाने लगाने की सोचने लगे

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