कुलदीपक : शपांडे साहब का वंश

मुंबई का एक भीड़ भरा इलाका. सुबह के तकरीबन 8 बज रहे थे. शबनम सड़क पर तेजी से चलती चली जा रही थी. रातभर जम कर हुई बारिश ने अब जरा राहत की सांस ली थी. 4 महीने धूप में तपी धरती को अब जा कर कहीं थोड़ा चैन मिला था.

आसमान में अब भी बादलों की लुकाछिपी का खेल चल रहा था. पानी अब बरसा कि तब बरसा, कुल मिला कर यही माहौल बन चला था.

शबनम शिवाजी नगर चौक तक पहुंच चुकी थी. वह अमीर लोगों की बस्ती थी. प्रोफैसर, वकील वगैरह सब के दोमंजिला मकान. शबनम उस दोमंजिला बंगले के सामने जा रुकी, जो देशपांडे का था.

बंगले के सामने खूबसूरत बगीचा था, जिस में चमेली, गेंदा, गुड़हल वगैरह के फूल खिले थे. फूलों की खुशबू का एक ?ोंका शबनम की नाक को छू गया.

शबनम ने दरवाजे की घंटी बजाई. थोड़ी देर बाद एक खूबसूरत अधेड़ औरत ने दरवाजा खोला.

‘‘आप को किस से मिलना है?’’ उन्होंने शबनम से पूछा.

‘‘मैं… मैं शबनम. अम्मां बीमार हैं… इसलिए मैं काम करने आई हूं मैडम,’’ डरतेडरते शबनम एक आवाज में कह गई.

‘‘आ जा फिर भीतर… आ… क्या हुआ तेरी अम्मां को?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘बुखार है,’’ शबनम की आवाज में चिंता थी.

‘‘अरे सुनंदा, कौन है?’’ यह कहते हुए देशपांडे साहब भी अब तक बाहर के कमरे में आ गए थे.

उन्होंने शबनम की तरफ देखा, तो देखते ही रह गए. ऊंची कदकाठी, गोरी, चंपा के फूल की तरह नाक, बिल्लौरी आंखों वाली शबनम.

कुदरत का खेल भी कितना निराला होता है. कीचड़ में कमल खिलता है… शबनम नाम का वह कमल गरीबों की बस्ती में गरीबी से जूझती एक झोंपड़ी में खिला था.

देशपांडे साहब के एक ही बेटा था. वह 16 साल का था, जो मंदबुद्धि था. उस का पुणे के एक मशहूर डाक्टर के यहां इलाज चल रहा था.

पिछले 10 साल से वह वहीं उस डाक्टर की निगरानी में रह रहा था. इतने नामचीन प्रोफैसर का बेटा, बेतहाशा दौलत का मालिक… लेकिन दिमागी तौर पर विकलांग था.

बाहर अब जोरदार बारिश होने लगी थी. शबनम जल्दीजल्दी घर के काम निबटाने में लगी थी. उसे यहां से जल्दी से जल्दी निकल कर अपने घर पहुंचना था. इस बड़े बंगले में उस का दम घुट सा रहा था.

देशपांडे साहब की वह गरम नजर मानो उस के बदन पर डंक मार रही थी. इसी विचार में खोएखोए उस ने सारे काम निबटा डाले.

शबनम जब अपने घर पहुंची, तो अम्मां बैठी उस का इंतजार कर रही थीं.

‘‘अम्मां… अब कैसा लग रहा है?’’ पूछते हुए उस ने अपनी मां को खाना परोसा, फिर दवाएं खिलाईं.

‘‘अम्मां, ये गोलियां खा कर जल्दी ठीक हो जाओ. मुझेअच्छा नहीं लगता यह सब काम करना… अब मेरा कालेज भी शुरू होने वाला है.’’

‘‘क्या हुआ शबनम बेटी?’’ अम्मां को उस की चिंता खाए जा रही थी. जवान बेटी को इस तरह लोगों के घर पर काम करने के लिए भेजना उसे भी अच्छा नहीं लग रहा था, पर कोई दूसरा रास्ता भी तो नहीं था. सच, गरीबी बहुत बुरी चीज है.

शबनम जब 2 साल की थी, तभी उस के अब्बा चल बसे थे. अम्मां ने लोगों के घरों में झाड़ूपोंछा कर के शबनम को पालापोसा, पढ़ाया था. अब वह 12वीं जमात में है. उस की पढ़नेलिखने में बेहद दिलचस्पी है और वह खूब होशियार भी है.

8 दिन हो गए आज. शबनम की अम्मां का बुखार उतरने का नाम ही नहीं ले रहा था. अच्छे डाक्टर के पास दिखाने के लिए पैसे चाहिए, जो उस के पास नहीं थे.

इसी सोच में डूबतीउतरती शबनम देशपांडे साहब के बंगले पर पहुंची. दरवाजे की घंटी दबाई, दरवाजा देशपांडे साहब ने खोला.

‘‘मैडम…मैडम…’’ पुकारती हुई वह भीतर चली गई.

‘‘बंटी से मिलने के लिए वह पुणे गई है,’’ देशपांडे साहब ने उसे बताया. अब देशपांडे साहब घर में अकेले ही हैं. शबनम के मन को एक अजीब से डर ने दबोच लिया.

‘आज किसी तरह जल्दी से जल्दी काम निबटा लूं, कल से नहीं आऊंगी,’ अपने मन को यह सम?ाते हुए वह काम में जुट गई.

वह रसोई में पहुंची. पीछे से देशपांडे साहब भी वहां आ गए.

‘‘शबनम, चाय लोगी?’’ पूछते हुए उन्होंने गैस स्टोव सुलगा कर दूध गरम करने रख दिया. फिर चाय बना कर एक कप शबनम को थमा दिया और एक कप खुद ले कर सुड़कने लगे.

चाय पी कर वे आराम करने के लिए बैडरूम में चले गए.

‘‘साहब, कमरा साफ करना है… आप बाहर आ जाएं,’’ शबनम ने कहा.

‘‘आ ना… आ शबनम…’’ उन्होंने अलसाई सी आवाज में कहा और फिर करवट बदल ली.

लिहाजा, शबनम बैडरूम में दाखिल हो गई. उस के भीतर आते ही साहब ने झट से उठ कर दरवाजा बंद कर लिया और उस के संग जबरदस्ती करने लगे.

उम्र के लिहाज से वह उन की बेटी की तरह थी, लेकिन इनसान की नजर में जब वासना के डोरे उतर आते हैं, तब हैवानियत के कीड़े दिमाग में घुस कर उसे पूरी तरह शैतान बना देते हैं.

बेचारी शबनम उस ताकतवर राक्षस के आगे कुम्हला कर रह गई. उस की अनमोल इज्जत लुट गई.

देशपांडे साहब ने अब उस की अम्मां को इलाज के लिए एक बड़े अस्पताल में ले जा कर दिखा दिया था. वहां उन का अच्छी तरह इलाज चल रहा था, यहां शबनम रोजाना कोल्हू के बैल की तरह पिस रही थी.

8 दिन बाद देशपांडे मैडम अपने बेटे से मिल कर लौट आईं. वे खूब दुखी लग रही थीं.

एक दिन शबनम अपनी अम्मां को फलों का जूस बना कर दे रही थी, अचानक उस का जी मिचलाने लगा. वह बाथरूम की ओर दौड़ी और उलटी कर दी.

अम्मां की अनुभवी निगाहों ने जल्दी ही यह ताड़ लिया कि ये उलटियां सादा नहीं हैं.

‘‘शबनम, क्या हुआ बेटी?’’ अम्मां ने खूब पूछापुचकारा, लेकिन शबनम के मुंह से एक भी बोल न फूटा. बेटी ने अनमोल इज्जत गवां दी, खानदान की नाक कटवा दी, भीतर ही भीतर इस बेइज्जती में घुट कर आखिरकार अम्मां ने दम तोड़ दिया.

शबनम की अम्मां को गुजरे आज 40 दिन हो गए थे. उस ने देशपांडे साहब को अपने घर बुलाया था.

‘‘शबनम, मुझे पता है कि तेरे पेट में पल रहा बच्चा मेरा ही है. मैं इस बच्चे को और तुझे अपनाने को राजी हूं. तू इसे जन्म दे, शब्बो, मुझे वंश चलाने के लिए चिराग दे, कुलदीपक दे…’’ देशपांडे साहब ने भावुक हो कर उस से कहा.

फिर जल्दी ही एक दिन उन्होंने शबनम से एक मंदिर में शादी कर ली. उसे रहने के लिए अलग से एक मकान ले कर दे दिया.

9 महीने बाद शबनम ने एक बेटे को जन्म दिया. देशपांडे साहब को वंश चलाने के लिए चिराग मिल गया था, अपना कुलदीपक.

बाबा का सच : अंधविश्वास की एक सच्ची कहानी

मेरा तबादला उज्जैन से इंदौर के एक थाने में हो गया था. मैं ने बोरियाबिस्तर बांधा और रेलवे स्टेशन आया. रेल चलने के साथ ही उज्जैन के थाने में रहते हुए वहां गुजारे दिनों की यादें ताजा होने लगीं.

हुआ यह था कि एक दिन एक मुखबिर थाने में आ कर बोला, ‘‘सर, एक बाबा पास के ही एक गांव खाचरोंद में एक विधवा के घर ठहरा हुआ है. मुझे उस का बरताव कुछ गलत लग रहा है.’’

उस की बात सुन कर मैं सोच में पड़ गया. फिर मेरे पास उस बाबा के खिलाफ कोई ठोस सुबूत भी नहीं था.

लेकिन मुखबिर से मिली सूचना को हलके में लेना भी गलत था, सो उसी रात  मैं सादा कपड़ों में उस विधवा के घर जा पहुंचा. उस औरत ने पूछा, ‘‘आप किस से मिलना चाहते हैं?’’

मैं ने कहा, ‘‘दीदी, मैं ने सुना है कि आप के यहां कोई चमत्कारी बाबा ठहरे हैं, इसीलिए मैं उन से मिलने आया हूं.’’

वह औरत बोली, ‘‘भैया, अभी तो बाबा अपने किसी भक्त के घर गए हैं.’’

‘‘अगर आप को कोई एतराज न हो, तो क्या मैं आप से उन बाबा के बारे में कुछ बातें जान सकता हूं? दरअसल, मेरी एक बेटी है, जो बचपन से ही बीमार रहती है. मैं उस का इलाज इन बाबा से कराना चाहता हूं.’’

वह औरत बोली, ‘‘भैया, जितनी जानकारी मेरे पास है, वह मैं आप को बता सकती हूं.

‘‘एक दिन ये बाबा अपने 2 शिष्यों के साथ रात 8 बजे मेरे घर आए थे.

‘‘बाबा बोले थे, ‘तुम्हारे पति के गुजरने के बाद से तुम तंगहाल जिंदगी जी रही हो, जबकि उस के दादाजी परिवार के लिए लाखों रुपयों का सोना इस घर में दबा कर गए हैं.

‘‘‘ऐसा कर कि तेरे बीच वाले कमरे की पूर्व दिशा वाला कोना थोड़ा खोद और फिर देख चमत्कार.’

‘‘मैं अपने बीच वाले कमरे में गई, तभी उन के दोनों शिष्य भी मेरे पीछेपीछे आ गए और बोले, ‘बहन, यह है तुम्हारे कमरे की पूर्व दिशा का कोना.’

‘‘मैं ने कोने को थोड़ा उकेरा, करीब 7-8 इंच कुरेदने के बाद मेरे हाथ में एक सिक्का लगा, जो एकदम पीला था.

‘‘उस सिक्के को अपनी हथेली पर रख कर बाबा बोले, ‘ऐसे हजारों सिक्के इस कमरे में दबे हैं. अगर तू चाहे, तो हम उन्हें निकाल कर तुझे दे सकते हैं.’

‘‘मैं ने बाबा से पूछा, ‘बाबा, ये दबे हुए सिक्के बाहर निकालने के लिए क्या करना होगा?’

‘‘वे बोले, ‘तुझे कुछ नहीं करना है. जो कुछ करेंगे, हम ही करेंगे, लेकिन तुम्हारे मकान के बीच के कमरे की खुदाई करनी होगी, वह भी रात में… चुपचाप… धीरेधीरे, क्योंकि अगर सरकार को यह मालूम पड़ गया कि तुम्हारे मकान में सोने के सिक्के गड़े हुए हैं, तो वह उस पर अपना हक जमा लेगी और तुम्हें उस में से कुछ नहीं मिलेगा.’

‘‘आगे वे बोले, ‘देखो, रात में चुपचाप खुदाई के लिए मजदूर लाने होंगे, वह भी किसी दूसरे गांव से, ताकि गांव वालों को कुछ पता न चल सके. इस खुदाई के काम में पैसा तो खर्च होगा ही. तुम्हारे पति ने तुम्हारे नाम पर डाकखाने में जो रुपया जमा कर रखा है, तुम उसे निकाल लो.’

‘‘इस के बाद बाबा ने कहा, ‘हम महीने भर बाद फिर से इस गांव में आएंगे, तब तक तुम पैसों का इंतजाम कर के रखना.’

‘‘डाकखाने में रखे 4 लाख रुपयों में से अब तक मैं बाबा को 2 लाख रुपए दे चुकी हूं.’’

‘‘दीदी, क्या मैं आप के बीच वाले कमरे को देख सकता हूं?’’

वह औरत बोली, ‘‘भैया, वैसे तो बाबा ने मना किया है, लेकिन इस समय वे यहां नहीं हैं, इसलिए आप देख लीजिए.’’

मैं फौरन उठा और बीच के कमरे में जा पहुंचा. मैं ने देखा कि सारा कमरा 2-2 फुट खुदा हुआ था और उस की मिट्टी एक कोने में पड़ी हुई थी.

मुझे लगा कि अगर अब कानूनी कार्यवाही करने में देर हुई, तो इस औरत के पास बचे 2 लाख रुपए भी वह बाबा ले जाएगा.

मैं ने उस औरत से कहा, ‘‘दीदी, मैं इस इलाके का थानेदार हूं और मुझे उस पाखंडी बाबा के बारे में जानकारी मिली थी, इसलिए मैं यहां आया हूं.

‘‘आप मेरे साथ थाने चलिए और उस बाबा के खिलाफ रिपोर्ट लिखवाइए, ताकि मैं उसे गिरफ्तार कर सकूं.’’

उस औरत को भी अपने ठगे जाने का एहसास हो गया था, इसलिए वह मेरे साथ थाने आई और उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखा दी.

चूंकि बाबा घाघ था, इसलिए उस ने उस औरत के घर के नुक्कड़ पर ही अपने एक शिष्य को नजर रखने के लिए  बैठा दिया था. इसलिए उसे यह पता चलते ही कि मैं उस औरत को ले कर उस के खिलाफ रिपोर्ट लिखाने थाने ले गया हूं. वह बाबा उस गांव को छोड़ कर भाग गया.

इस के बाद मैं ने आसपास के गांवों में मुखबिरों से जानकारी भी निकलवाई, लेकिन उस का पता नहीं चल सका. मैं यादों की बहती नदी से बाहर आया, तब तक गाड़ी इंदौर रेलवे स्टेशन पर आ कर ठहर गई थी.

जब मैं ने इंदौर का थाना जौइन किया, तब एक दिन एक फाइल पर मेरी नजर रुक गई. उसे पढ़ कर मेरे रोंगटे खड़े हो गए. रिपोर्ट में लिखा था, ‘गडे़ धन के लालच में एक मां ने अपने 7 साला बेटे का खून इंजैक्शन से निकाला.’

उस मां के खिलाफ लड़के के दादाजी और महल्ले वालों ने यह रिपोर्ट लिखाई थी.

यह पढ़ कर मैं सोच में पड़ गया कि कहीं यह वही खाचरोंद गांव वाला बाबा ही तो नहीं है.

मैं ने सबइंस्पैक्टर मोहन से कहा, ‘‘मैं इस मामले में उस लड़के के दादाजी से बात करना चाहता हूं. उन्हें थाने आने के लिए कहिए.’’

रात के तकरीबन 10 बजे एक बुजुर्ग  मेरे क्वार्टर पर आए. मैं ने उन से उन का परिचय पूछा. तब वे बोले, ‘‘मैं ही उस लड़के का दादाजी हूं.’’

‘‘दादाजी, मैं इस केस को जानना चाहता हूं,’’ मैं ने पूछा.

वे बताने लगे, ‘‘सर, घर में गड़े धन के लालच में बहू ने अपने 7 साल के बेटे की जान की परवाह किए बगैर इंजैक्शन से उस का खून निकाला और तांत्रिक बाबा को पूजा के लिए सौंप दिया.’’

‘‘दादाजी, आप मुझे उस बाबा के बारे में कुछ बताइए?’’ मैं ने पूछा.

‘‘सर, यह बात तब शुरू हुई, जब कुछ दिनों के लिए मैं अपने गांव गया था. फसल कटने वाली थी, इसलिए मेरा गांव जाना जरूरी था. उन्हीं दिनों यह तांत्रिक बाबा हमारे घर आया और बहू से बोला कि तुम्हारे घर में गड़ा हुआ धन है. इसे निकालने से पहले थोड़ी पूजापाठ करानी पड़ेगी.’’

‘‘मेरी बहू उस के कहने में आ गई. फिर उस तांत्रिक बाबा ने रात को अपना काम करना शुरू किया. पहले दिन उस ने नीबू, अंडा, कलेजी और सिंदूर का धुआं कर उसे पूरे घर में घुमाया, फिर उस ने बीच के कमरे में अपना त्रिशूल एक जगह जमीन पर गाड़ा और कहा कि यहां खोदने पर गड़ा धन मिलेगा.

‘‘उस के शिष्यों ने एक जगह 2 फुट का गड्ढा खोदा. चूंकि रात के 12 बज चुके थे, इसलिए उन्होंने यह कहते हुए काम रोक दिया कि अब खुदाई कल करेंगे.

‘‘इसी बीच मेरी 5 साल की पोती उस कमरे में आ गई. उसे देख कर तांत्रिक गुस्से में लालपीला हो गया और बोला कि आज की पूजा का तो सत्यानाश हो गया है. यह बच्ची यहां कैसे आ गई? अब इस का कोई उपचार खोजना पड़ेगा.

‘‘अगले दिन रात के 12 बजे वह तांत्रिक अकेला ही घर आया और बहू से बोला, ‘तू गड़ा हुआ धन पाना चाहती है या नहीं?’

‘‘बहू लालची थी, इसलिए बोली, ‘हां बाबा.’

‘‘फिर बाबा तैश में आ कर बोला, ‘कल रात उस बच्ची को कमरे में नहीं आने देना चाहिए था. अब उस बच्ची को भी ‘पूजा’ में बैठा कर अकेले में तांत्रिक क्रिया करनी पड़ेगी. जाओ और उस बच्ची को ले आओ.

‘‘इस पर मेरी बहू ने कहा, ‘लेकिन बाबा, वह तो सो रही है.’

‘‘बाबा बोला, ‘ठीक है, मैं ही उसे अपनी विधि से यहां ले कर आता हूं.

‘‘अगले दिन सुबह उस बच्ची ने अपनी दादी को बताया, ‘रात को वह तांत्रिक बाबा मुझे उठा कर बीच के कमरे में ले गया और मेरे सारे कपड़े उतार कर उस ने मेरे साथ गंदा काम किया.’

‘‘जब मेरी पत्नी ने बहू से पूछा, तो वह बोली, ‘बच्ची तो नादान है. कुछ भी कहती रहती है. आप ध्यान मत दो.’

‘‘अगले दिन बाबा ने बीच का कमरा खोद दिया. लेकिन कुछ नहीं निकला. फिर वह बाबा बोला, ‘बाई, लगता है कि तुम्हारे ही पुरखे तुम्हारे वंश का खून चाहते हैं, तुम्हें अपने बेटे की ‘बलि’ देनी होगी या उस का खून निकाल कर चढ़ाना होगा.’

‘‘गड़े धन के लालच में मां ने बिना कोई परवाह किए अपने बेटे का खून ‘इंजैक्शन’ से खींचा और उस का इस्तेमाल तांत्रिक क्रिया करने के लिए बाबा को दे दिया.

‘‘यह सब देख कर मेरी पत्नी से रहा नहीं गया और उस ने फोन पर ये सब बातें मुझे बताईं. मैं तभी सारे काम छोड़ कर इंदौर आया और अपने पोते और महल्ले वालों को ले कर थाने में रिपोर्ट दर्ज कराई.’’

‘‘दादाजी, इस समय वह तांत्रिक बाबा कहां है?’’

‘‘सर, मेरी बहू अभी भी उस के मोहपाश में बंधी है. चूंकि उसे मालूम पड़ चुका है कि मैं ने उस के खिलाफ पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई है, इसलिए वह हमारे घर नहीं आ रहा है, लेकिन मैं उस पर नजर रखे हुए हूं.’’

सुबह एक मुखबिर आया और बोला, ‘‘सर, एक सूचना मिली है कि अपने इलाके की एक मलिन बस्ती में एक तांत्रिक आज ही आ कर ठहरा है.’’

रात के 12 बजे मैं अपने कुछ पुलिस वालों को साथ ले कर सादा कपड़ों में वहां जा पहुंचा.

एक पुलिस वाले ने एक मकान से  धुआं निकलते देखा. हम ने चारों तरफ से उस मकान को घेर लिया.

जब मैं ने उस मकान का दरवाजा खटखटाया, तो एक अधेड़ औरत ने दरवाजा खोला और पूछा, ‘‘क्या है? यहां पूजा हो रही है. आप जाइए.’’

इतना सुनते ही मैं ने दरवाजे को जोर से धक्का दिया और बीच के कमरे में पहुंचा.

मुझे देखते ही वह तांत्रिक बाबा भागने की कोशिश करने लगा, तभी मेरे साथ आए पुलिस वालों ने उसे घेर लिया और गाड़ी में डाल कर थाने ले आए.

थाने में थर्ड डिगरी देने पर उस ने अपने सारे अपराध कबूल कर लिए, जिस में खाचरोंद गांव में की गई ठगी भी शामिल थी.

मैं थाने में बैठा सोच रहा था कि अखबारों में गड़े धन निकालने के बारे में ऐसे ठग बाबाओं की खबरें अकसर छपती ही रहती हैं, फिर भी न जाने क्यों लोग ऐसे बाबाओं के बहकावे में आ कर अपनी मेहनत की कमाई को उन के हाथों सौंप कर ठगे जाते हैं?

अपना अपना नजरिया : शुभी का क्यों था ऐसा बरताव – भाग 1

अजय कुछ दिन से चुपचुप सा है. समझ नहीं पा रही हूं कि क्या वजह है. मैं मानती हूं कि 18-20 साल की उम्र संवेदनशील होती है, मगर यही संवेदनशीलता अजय की चुप्पी का कारण होगी यह मानने को मेरा दिल नहीं मान रहा. अजय हंसमुख है, सदा मस्त रहता है फिर उस के मन में ऐसा क्या है, जो उसे गुपचुप सा बनाता जा रहा है.

‘‘क्या अकेला बच्चा स्वार्थी हो जाता है, मां?’’

‘‘क्या मतलब…मैं समझी नहीं?’’

सब्जी काटतेकाटते मेरे हाथ रुक से गए. अजय हमारी इकलौती संतान है, क्या वह अपने ही बारे में पूछ रहा है?

‘‘मैं ने मनोविज्ञान की एक किताब में पढ़ा है कि जो इनसान अपने मांबाप की इकलौती संतान होता है वह बेहद स्वार्थी होता है. उस की सोच सिर्फ अपने आसपास घूमती है. वह किसी के साथ न अपनी चीजें बांटना चाहता है न अधिकार. उस की सोच का दायरा इतना संकुचित होता है कि वह सिर्फ अपने सुखदुख के बारे में ही सोचता है…’’ कहताकहता अजय तनिक रुक गया. उस ने गौर से मेरा चेहरा देखा तो मुझे लगा मानो वह कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो.

‘‘मां, आप भी तो उस दिन कह रही थीं न कि आज का इनसान इसीलिए इतना स्वार्थी होता जा रहा है क्योंकि वह अकेला है. घर में 2 बच्चों में अकसर 1 बहन 1 भाई होने लगा है और बहन के ससुराल जाने के बाद बेटा मांबाप की हर चीज का एकमात्र अधिकारी बन जाता है.’’

‘‘बड़ी गहरी बातें करने लगा है मेरा बच्चा,’’ हंस पड़ी मैं, ‘‘हां, यह भी सत्य है, हर संस्कार बच्चा घर से ही तो ग्रहण करता है. लेनादेना भी तभी आएगा उसे जब वह इस प्रक्रिया से गुजरेगा. देने का सुख क्या होता है, यह वह कैसे जान सकता है जिस ने कभी किसी को कुछ दिया ही नहीं.’’

‘‘तो फिर दादी आप से इतनी घृणा क्यों करती हैं? क्या आप उन का अपमान करती रही हैं? जिस का फल वह आप से नफरत कर के आप को देना चाहती हैं?’’

अवाक् रह गई मैं. अजय का सवाल कहां से कहां चला आया था. कुछ दिन पहले वह अपनी दादी के साथ रहने गया था. मैं चाहती तो बेटे को वहां जाने से रोक सकती थी क्योंकि जिस औरत ने कभी मुझ से प्यार नहीं किया वह मेरे खून से प्यार कैसे करेगी? फिर भी भेज दिया था. मैं नहीं चाहती कि मेरा बेटा मेरे कहने पर अपना व्यवहार निर्धारित करे.

20 साल का बच्चा इतना भी छोटा या नासमझ नहीं होता कि उसे रिश्तों के बारे में उंगली पकड़ कर चलाया जाए. रिश्तों की समझ उसे उन रिश्तों के साथ जी कर ही आए तो वही ज्यादा अच्छा है. अजय जितना मेरा है उतना ही वह अपनी दादी का भी है न.

‘‘मां, दादी तुम से इतनी नफरत क्यों करती हैं?’’ अजय ने अपना प्रश्न दोहराया.

‘‘तुम दादी से ही पूछ लेते, यह सवाल मुझ से क्यों पूछ रहे हो?’’

हंस पड़ी मैं, यह सोच कर कि 3-4 दिन अपनी दादी के साथ रह कर मेरा बेटा यही बटोर पाया था. अब समझी मैं कि अजय इतना चुप क्यों है.

‘‘4 दिन मैं वहां रहा था मां. दादी ने जब भी आप से संबंधित कोई बात की उन की जबान की मिठास कड़वाहट में बदलती रही. एक बार भी उन के मुंह से आप का नाम नहीं सुना मैं ने. बूआ आईं तो उन्होंने भी आप के बारे में कुछ नहीं पूछा. पिछले दिनों आप अस्पताल में रहीं, आप का इतना बड़ा आपरेशन हुआ था. आप का हालचाल ही पूछ लेतीं एक बार.’’

‘‘तुम पूछते न उन से… पूछा क्यों नहीं…तुम्हारे पापा से भी मैं अकसर पूछती हूं पर वह भी कोई उत्तर नहीं देते. मुझे तो इतना ही समझ में आता है कि तुम्हारे पापा की पत्नी होना ही मेरा सब से बड़ा दोष है.’’

‘‘क्यों? क्या तुम्हारी शादी दादी की इच्छा के खिलाफ हुई थी?’’

‘‘नहीं तो. तुम्हारी दादी खुद गई थीं मेरा रिश्ता मांगने क्योंकि तुम्हारे पापा को मैं बहुत पसंद थी.’’

‘‘क्या पापा ने अपनी मां और बहन को मजबूर किया था इस शादी के लिए?’’

‘‘यह बात तुम अपने पापा से पूछना क्योेंकि कुछ सवालों का उत्तर मेरे पास है ही नहीं. लेकिन यह सच है कि तुम्हारी दादी ने हमारे 22 साल के विवाहित जीवन में कभी मुझ से प्यार के दो मीठे बोल नहीं बोले.’’

‘‘तुम तो उन के साथ भी नहीं रहती हो जो गिलेशिकवे की गुंजाइश उठती हो. जब भी हम घर जाते हैं या दादी यहां आती हैं वह आप से ज्यादा बात नहीं करतीं. हां, इतना जरूर है कि उन के आने से पापा का व्यवहार  बहुत अटपटा सा हो जाता है…अच्छा नहीं लगता मुझे… इसीलिए इस बार मैं उन के साथ रहने चला गया था यह सोच कर कि शायद मैं अकेला जाऊं तो उन्हें अच्छा लगे.’’

‘‘तो कैसा लगा उन्हें? क्या अच्छा लगा तुम्हें उन का व्यवहार?’’

‘‘मां, उन्हें तो मैं भी अच्छा नहीं लगा. एक दिन मैं ने इतना कह दिया था कि मां आलू की सब्जी बहुत अच्छी बनाती हैं. आप भी आज वैसी ही सब्जी बना कर खिलाएं. मेरा इतना कहना था कि दादी को गुस्सा आ गया. डोंगे में पड़ी सब्जी उठा कर बाहर डस्टबिन में गिरा दी. भूखा ही उठना पड़ा मुझे. रोेटियां भी उठा कर फेंक दीं. कहने लगीं कि इतनी अच्छी लगती है मां के हाथ की रोटी तो यहां क्या लेने आया है, जा, चला जा अपनी मां के पास…’’

अवाक् रह गई थी मैं. एक 80 साल की वृद्धा में इतनी जिद. बुरा तो लगा था मुझे लेकिन मेरे लिए यह नई बात नहीं थी.

‘‘क्या मैं अपनी मां के हाथ के खाने की तारीफ भी नहीं कर सकता हूं… आप का नाम लिया उस का फल यह मिला कि मुझे पूरी रात भूखा रहना पड़ा, ऐसा क्यों, मां?’’

मैं अपने बच्चे को उस क्यों का क्या उत्तर देती. मन भर आया मेरा. मेरा बच्चा पूरी रात भूखा रहा इस बात का अफसोस हुआ मुझे, मगर इतना संतोष भी हुआ कि मेरे सिवा कोई और भी है जिसे मेरी ही तरह अपमानित कर उस वृद्धा ने घर से बाहर निकलने पर मजबूर कर दिया. इस का मतलब अजय इसी वजह से जल्दी वापस चला आया होगा.

‘‘मेरे साथ तो तेरी दादी का व्यवहार ऐसा ही है. डोली से निक ली थी उस पल भी उन्होंने ऐसा ही व्यवहार किया था. तुम्हारे पापा ने तुम्हारी बूआ से बस, इतना ही कहा था कि दीदी, जरा शुभा को कुछ खिला देना, उस ने रास्ते में भी कुछ नहीं खाया. पर भाई के शगुन करना तो दूर, मांबेटी ने रोनापीटना शुरू कर दिया और उन के रोनेधोने से घर आए तमाम मेहमान जमा हो गए थे.’’

वो नीली आंखों वाला : वरुण को देखकर क्यों चौंक गई मालिनी – भाग 1

मधुमास के बाद लंबी प्रतीक्षा और सावनराजा के धरती पर कदम रखते ही हर जर्रा सोंधी सी सुगंध में सराबोर हो रहा है… मानो सब को सुंदर बूंदों की चुनरिया बना कर ओढ़ा दी हो. लेकिन अंबर के सीने से खुशी की फुलझड़ियां छूट रही हैं… जैसे वह अपने हृदय में उमड़ते अपार खुशी के सागर को आज ही धरती से जा आलिंगन करना चाहता है. बरखा रानी हवाई घोड़े पर सवार हैं, रुकने का नाम ही नहीं ले रही हैं. ऐसे बरस रही हैं, जैसे अब के बाद फिर कभी उसे धरती का सीना तरबतर करने और समस्त धरा को अपने स्नेह का कोमल स्पर्श करने आना ही नहीं है. हर पत्ता, हर डाली, हर फूल खुद को वैजयंती माल समझ इतरा रहा हो और इस धरती के रैंप पर मानो कैटवाक कर रहा हो….

घर की दुछत्ती यह सारा मंजर आंखें फाड़फाड़ कर देख रही है मानो ईर्ष्या से दरार पड़ गई हो, और उस का रुदन मालिनी के दिल को भी छलनी कर रहा है, जैसे एक बहन दूसरे के दुख में पसीज रही हो.

ऐसी बारिश जबजब पड़ी, उस ने मालिनी को हर बार उन बीती यादों की सुरंग में पीछे ले जा कर धकेल दिया.

उन यादों के खूबसूरत झूलों के झोटे तनमन में स्पंदन पैदा कर देते हैं.

वह खूबसूरत सा दिखने वाला, नीलीनीली आंखों वाला, लंबा स्मार्ट (कामदेव की ट्रू कौपी) वो 12वीं क्लास वाला लड़का आंखों के आगे घूम ही जाता.

मालिनी ने जब 9वीं कक्षा में स्कूल बदला तो वहां सिर्फ एक वही था, उन सभी अजनबियों के बीच… जिस ने उस की झिझक को समझा कि किस प्रकार एक लड़की को नए वातावरण में एडजस्ट होने में वक्त तो लगता ही है. पर साथ ही साथ किसी अच्छे साथी के साथ की भी आवश्यकता होती है. उस ने हिंदी मीडियम से अंगरेजी मीडियम में प्रवेश जो लिया था, इसी कारण सारी लड़कियां मालिनी को बैकवर्ड और लो क्लास समझ भाव ही नहीं देती थीं. वह जबजब इंटरवल या असेंबली में वरुण को दिख जाती, वही उस की खोजखबर लेता रहता.

“और बताओ… ‘छोटी’, कोई परेशानी तो नहीं…?” उस ने कभी मालिनी का नाम जानने की कोशिश ही नहीं की.

एक तो वह जूनियर थी और ऊपर से कद में भी छोटी और सुंदर. वो उसे प्यार से छोटी ही पुकारता और उस के अंदर हमेशा “मैं हूं ना” कह कर उसे आतेजाते शुक्ल पक्ष के चतुर्थी के चांद सी, छोटी सी मुसकराहट से सराबोर कर जाता. मालिनी का हृदय इस मुसकराहट से तीव्र गति से स्पंदित होने लगता… लेकिन ना जाने क्यों…?

उस को वरुण का हर समय हिफाजत भरी नजरों से देखना… कुछकुछ महसूस कराने लगा था. किंतु क्या…? वह यह समझ ही नहीं पा रही थी. क्या यही प्रेम की पराकाष्ठा थी? या किसी बहुत करीबी के द्वारा मिलने वाला स्नेह और दुलार था…?

किंतु इस सुखद अनुभूति में लिप्त मालिनी भी अब नि:संकोच हो कर मन लगा कर पढ़ने लगी. उसे जब भी कोई समस्या होती, उसी नीली आंखों वाले लड़के से साझा करती. हालांकि इतनी कम उम्र में लड़केलड़कियों में अट्रैक्शन तो आपस में रहता ही है, चाहे वह किसी भी रूप में हो…

सिर्फ दोस्त या सिर्फ प्रेमी या एक भाई जैसा संबोधन… शायद भाई कहना गलत होगा, क्योंकि इस रिश्ते का सहारा ज्यादातर लड़केलड़कियां स्वयं को मर्यादित रखने के चक्कर में लेते हैं.

मालिनी अति रूढ़िवादी परिवार में जनमी घर की दूसरे नंबर की बेटी थी. उस के 2 भाई और 2 बहनें थीं. वह देखने में अति सुंदर गोरी और पतली. सहज ही किसी का भी ध्यान अपनी ओर आकर्षित करने की काबिलीयत रखती थी.

एक दिन मालिनी स्कूल से लौटते वक्त बस स्टाप पर चुपचाप खड़ी थी. बस के आने में अभी टाइम था. खंभे से सट कर वह खड़ी हो गई, तभी वरुण वहां से साइकिल पर अपने घर जा रहा था कि उस की नजर मालिनी पर पड़ी और पास आ कर बोला, “छोटी, अभी बस नहीं आई…”

“नहीं…”

“चलो, मैं तुम्हारे साथ वेट करता हूं… बस के आने का..”

वह चुप ही रही. उस के मुंह से एक शब्द न फूटा.

सर्दियों की शाम में 4 बजे बाद ही ठंडक बढ़ने लगती है. आज बस शायद कुछ लेट थी. वह बारबार अपनी कलाई पर बंधी घड़ी को देखता, तो कभी बस के इंतजार में आंखें फैला देता.

पर, इतनी देर वह चुपचाप वहीं खड़ी रही जैसे उस के मुंह में दही जम रहा हो… टस से मस नहीं हुई…
दूर से आती बस को देख वह खुश हुआ. बोला, “चलो आ गई तुम्हारी बस. मैं भी निकलता हूं, ट्यूशन के लिए लेट हो रहा हूं.”

स्टाप पर आ कर बस रुक जाती है और सभी लड़कियां चढ़ जाती हैं, किंतु मालिनी वहीं की वहीं… यह देख वरुण आश्चर्यचकित हो अपने दिमाग के घोड़े दौड़ाने लगता है. बस आगे बढ़ जाती है.

वरुण थोड़ी देर सोचने के बाद… फौरन अपना स्वेटर उतार कर मालिनी को दे देता है. वह कहता है, “यह लो छोटी… इसे कमर पर बांध लो…

“और…”

“पर, आप… यह क्यों…”

“ज्यादा चूंचपड़ मत करो… मैं समझ सकता हूं तुम्हारी परेशानी…”

“पर, आप कैसे…?”

“मेरे घर में 2 बड़ी बहनें हैं. जब वे इस दौर से गुजरी, तभी मेरी मां ने उन दोनों को इस बारे में शिक्षित करने के साथसाथ मुझे भी इस बारे में पूरी तरह निर्देशित किया… जैसे गुलाब के साथ कांटों को भी हिदायत दी जाती है कि कभी उन्हें चुभना नहीं…

“क्योंकि मेरी मां का मानना था कि तुम्हारी बहनों को ऐसे समय में कोई लड़का छेड़ने के बजाय मदद करे, तो क्यों न इस की शुरुआत अपने घर से ही करूं…

“तो मुझे तुम्हारी स्थिति देख कर समझ आ गया था. चलो, अब जल्दी करो… और घर पहुंचो. तुम्हारी मां तुम्हारा इंतजार कर रही होंगी.”

मालिनी उस वक्त धन्यवाद के दो शब्द भी ना बोल पाई. उन्हें गले में अटका कर ही वहां से तेज कदमों से घर की ओर रवाना हुई.

फिर उसे अगले स्टाप पर घर जाने वाली दूसरी बस मिल गई.

उस के घर में दाखिल होते ही उस का हुलिया देख मां ऊपर वाले का लाखलाख धन्यवाद देने लगती है कि जिस बंदे ने आज मेरी बच्ची की यों मदद की है, उस की झोली खुशियों से भर दे. जरूर ही उस की मां देवी का रूप होगी.

हाय एंड बाय वाली बन कर न रह जाएं मेधा शंकर

सोशल मीडिया पर ‘12वीं फेल’ फिल्म को ले कर आजकल रील्स और मीम्स खूब वायरल हो रहे हैं. कोई कह रहा है, अगर सफल होना है तो गर्लफ्रैंड होना जरूरी है, सिंगल रहना आप को कहीं नहीं ले जाएगा तो कोई कह रहा है. अगर गर्लफ्रैंड लौयल हो तो लड़का आईपीएस भी बन सकता है.

 

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हर कोई अपनी गर्लफ्रैंड में फिल्म ‘12वीं फेल’ वाली श्रद्धा को ढूंढ़ रहा है. फिल्म में लीड कैरेक्टर मनोज के सपोर्ट सिस्टम का किरदार निभाने वाली हीरोइन मेधा शंकर नैशनल क्रश बन जाती हैं और उन के इस संघर्ष में उन का साथ देने वालों की भूमिका धुंधली पड़ जाती है. बेशक मेधा ने इस रोल के बाद खूब तारीफ बटोरी है लेकिन उस के किरदार को ले कर सोशल मीडिया में जो बातें चल रही हैं उन्होंने कुछ सवाल भी खड़े कर दिए हैं.

कौन है मेधा शंकर

नोएडा में रहने वाली मेधा शंकर एक महाराष्ट्रियन परिवार से हैं. डाक्टर बनने की चाह रखने वाली मेधा का इंटरैस्ट जब ग्लैमर और एंटरटेनमैंट की तरफ गया तो उन्होंने पीछे मुड़ कर नहीं देखा. शुरुआत में उन्होंने कई विज्ञापनों में काम किया. उस के बाद मेधा ने 2015 में आई शौर्ट फिल्म ‘विद यू फोर यू औलवेज’ से ऐक्ंिटग की दुनिया में कदम रखा.

2019 में वे ब्रिटिश सीरीज ‘बीचम हाउस’ में नजर आईं. उस के बाद 2021 में आई फिल्म ‘शादिस्थान’, टैलीविजन शो ‘बेकरार’ और डौक्यूमैंट्री सदैव ‘आप के साथ’ का भी हिस्सा रहीं. लेकिन फेम उन्हें फिल्म ‘12वीं फेल’ से मिला, जिस के बाद वे लड़कों की नैशनल क्रश बन गईं.

फिल्म में अपनी शानदार अदाकारी के चलते मेधा का नाम लगातार सुर्खियां बटोर रहा है. फिल्म रिलीज के बाद मेधा शंकर के सोशल मीडिया फौलोअर्स बड़ी तेजी से बढ़े. इस समय मेधा शंकर सोशल मीडिया क्वीन बनी हुई हैं और खूब लाइमलाइट बटोर रही हैं.

इंस्टैंट बौलीवुड के मुताबिक, ‘12वीं फेल’ की ओटीटी पर रिलीज से पहले मेधा के इंस्टाग्राम हैंडल पर 2 लाख के करीब फौलोअर्स थे जो रिलीज के बाद करीब 12 लाख हो गए हैं.

‘12वीं फेल’ सोशल आईना

फिल्म मध्य प्रदेश के मुरैना जिले में स्थित एक छोटे से गांव बिलगांव में जन्मे मनोज कुमार के संघर्ष से जुड़ी है. हालांकि सुर्खियों की वजह उन का आईपीएस बनने के स्ट्रगल से ज्यादा उन के पार्टनर का अंत तक साथ देने से है.

लेकिन सोशल मीडिया में उस की गर्लफ्रैंड श्रद्धा का साथ उस के खुद के स्ट्रगल पर भारी पड़ रहा है. मनोज कुमार शर्मा ने गरीबी पर काबू पा कर आईपीएस अधिकारी का पद हासिल किया. इसे बखूबी विधु विनोद चोपड़ा द्वारा निर्देशित फिल्म ‘12वीं फेल’ में दिखाया गया, लेकिन हर बौलीवुड फिल्म की तरह यह हकीकत से ज्यादा मनोरंजक बन गई.

फिल्म की कहानी कुछ ऐसी है, मनोज 12वीं कक्षा की परीक्षा में फेल हो जाता है. उस के बाद वह छोटीमोटी नौकरियां करता है. 16-16 घंटे काम करता है और हर रात सिर्फ 3 घंटे सोता व यूपीएससी परीक्षा की तैयारी करता है. देश की सब से प्रतिष्ठित संस्था, संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) की परीक्षा को पास करना आसान नहीं है. बात पढ़ाई की हो या मजबूत इरादों की, वर्षों लग जाते हैं यूपीएससी परीक्षा पास करने में. यही सब किया मनोज कुमार शर्मा ने भी. कुछ अलग नहीं था उन अधिकतर गरीब परिवार से आने वाले एस्पिरैंट्स से, जो अपने सपनों के लिए स्ट्रगल करते हैं. फर्क बस, इतना है कि वह अलग दिक्कतों का सामना कर रहा था.

इस में अलग क्या था? सवाल गंभीर है. गंभीर इसलिए क्योंकि श्रद्धा, जोकि मनोज का अंत तक साथ देती है, नैशनल क्रश बन जाती है. लोग मनोज से ज्यादा श्रद्धा की तारीफों के पुल बांधते नहीं थकते और बाकी मजबूत किरदारों को साइड कर देते हैं क्योंकि वे उसी मेल सैंट्रिक कल्चर से प्रेरित हैं कि चाहे पुरुष कैसा भी हो, किसी भी हालात में हो, महिला को यह हक नहीं बनता कि वह उसे छोड़े. यहां प्यार कोई प्रेरणा नहीं है. औरत का अपने प्यार के लिए किया गया स्ट्रगल प्रेरणा है.

वर्तमान सोसाइटी आज भी उस लड़की को प्रेरणा मानती है जो अपने लिए नहीं, दूसरों के लिए, अपने परिवार के लिए सबकुछ सैक्रीफाइस करने को तैयार हो पर आप ऐसे कितने पुरुषों को जानते हैं जो अपने प्यार के लिए, अपनी गर्लफ्रैंड के लिए अपनी सुखसुविधाओं को अपने भविष्य को छोड़ने के लिए तैयार होते हैं. सम?ाते की उम्मीद तो केवल लड़कियों से ही की जाती है.

समस्या यह है कि सोशल मीडिया पर यूथ श्रद्धा के कंपैरिजन में ‘शादी में जरूर आना’ फिल्म की हीरोइन से करने लगे, जिस में उस की होने वाली सास शादी के बाद नौकरी करने के लिए उसे मना कर देती है और वह शादी के ऐन वक्त घर से भाग कर अपने कैरियर को पूरा करती है.

इस गुस्से में फिल्म के हीरो यूपीएससी पास कर आईपीएस बन जाता है वरना तो वह क्लर्क की नौकरी में भी खुश था और उस से बदला लेने में जुट जाता है. यहां वह हीरोइन नायिका होते हुए भी विलेन बन जाती है. क्यों? क्योंकि वह शादी से ज्यादा अपने सपने को महत्त्व दे बैठती है. अब बताइए उस ने गलत क्या किया था? अंधेरे भविष्य में जाने से बेहतर है कि वक्तरहते फैसले ले लिए जाएं. लड़के तो मांबाप तक को छोड़ कर भाग जाते हैं.

अगर उस की ससुराल वाले मान भी जाते तो क्या गारंटी है कि शादी के बाद वे पलटते नहीं. हमारे यहां तो वैसे भी शादी के बाद अपनी बात से पलट जाने का रिवाज रहा है. शादी से पहले कुछ और बाद में कुछ. लड़की को कहा जाता है कि वह पढ़ाई जारी रख सकती है, नौकरी कर सकती है पर शादी के पहले ही साल उस के हाथ में बच्चा थमा दिया जाता है.

प्यारमोहब्बत में पड़े कितने ही लड़के केवल अपनी मां की मरजी की लड़की से शादी करने के लिए उन का साथ छोड़ देते हैं, वे आसानी से फैमिली फर्स्ट का नारा दे कर इसे जस्टीफाई कर देते हैं.

किसी ने ट्विटर जो अब एक्स के नाम से जाना जाता है पर कहा था- ‘12वीं फेल’ को देख कर ऐसा लग रहा कि सब आईपीएस बन जाएंगे लेकिन उन को साथ देने वाली चाहिए और साथ देने वाली अगर साथ छोड़ देगी तो उस से भी ज्यादा ऊंची पोस्ट मिल जाएगी पर बिना दिल टूटे या साथ पाए, कुछ होने वाला नहीं है.

 

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अब कोचिंग इंस्टिट्यूटों की आवश्यकता नहीं है. बस, प्यारमोहब्बत सिखाया जाए. सब सैल्फ स्टडी से ही कंपीटिशन निकाल ले रहे हैं.

फिल्म दिखाती है, पेरैंट्स का स्ट्रगल, गरीबी और उन का प्यार आप को आईएएस नहीं बनाता, आप की गर्लफ्रैंड का आईलवयू आप को आईएएस बना देता है. हर लड़का श्रद्धा को ढूंढ़ना चाहता है पर श्रद्धा बनने में किसी की दिलचस्पी नहीं है. कोई किसी औरत के लिए अपने सपनों की बलि नहीं देना चाहता. उन्हें अनदेखा नहीं करना चाहता. ये जिम्मेदारियां केवल लड़कियों के हिस्से हैं. आप ने कितनी फिल्में और उदाहरण देखे हैं ऐसे?

ऐसी फिल्मों के जरिए समाज की वही घिसीपिटी बात रिपीट करने की कोशिश की जा रही है कि औरत को पुरुष का साथ देना ही चाहिए. चाहे पुरुष काबिल हो या न, चाहे औरत स्ट्रगल करने के लिए तैयार हो भी या न. अगर आप ऐसा करती हो तो आप नैशनल क्रश बनने की हकदार हो, क्योंकि अधिकतर भारतीय यही उम्मीद करते हैं, चाहे कुछ भी हो, कितना स्ट्रगल, कितने ही सपनों को आग लगानी हो.

उन को चाहिए कि वह अपने परिवार, पति और पार्टनर के लिए सब करे. कमाल की बात है. बस, कमाल की बात यही कि पिता के सपने, पति के लिए घर और बच्चों के लिए कैरियर, सब वही छोड़े, जिस पर सोशल मीडिया में लड़के मस्त हुए पड़े हैं

निरहुआ और आम्रपाली दुबे की वीडियो हुई वायरल, लोग ने दिया ये रिएक्शन

भोजपुरी की पौपुलर एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे की हर अदा पर फैंस फिदा है. उनकी खूबसूरती और शानदार अदाकारी के लिए एक्ट्रेस जानी जाती है. आम्रपाली दुबे के हुस्न पर लाखों लोग फिदा है. कई लोगों का मानना है कि आम्रपाली दुबे बौलीवुड और टीवी की कई एक्ट्रेसेस से ज्यादा खूबसूरत है. इतना ही नहीं वो अपने काम को लेकर भी चर्चा में बनीं रहती है. जी हां, हाल में उनका एक पुराना गाने का वीडियो वायरल हो रहा है. जो कि इंटरनेट पर लोगों के बीच चर्चा का विषय बन गया है.


आपको बता दें कि आम्रपाली ज्यादातर भोजपुरी स्टार एक्टर दिनेश लाल यादव के साथ दिखाई देती है. इस बीच इन दोनों का एक पुराना रील वीडियो सामने आया है, जिसकी इंटरनेट पर इन दिनों चर्चा हो रही है.सामने आए इस वीडियो में आम्रपाली, अपने खास दोस्त दिनेश लाल यादव के साथ बौलीवुड गाने पर रोमांस करते नजर आ रही हैं. इस वीडियो में आम्रपाली और दिनेश की जोड़ी काफी अच्छी लग रही हैं. दोनों की केमिस्ट्री फैंस को काफी पसंद आ रही है. लोग इस रील पर जमकर रिएक्ट करते हुए प्यार बरसा रहे हैं.


बताते चलें कि भोजपुरी एक्ट्रेस आम्रपाली दुबे और दिनेश लाल यादव को लेकर अक्सर ये खबरे सामने आती रहती है कि दोनों एक दूसरे को डेट कर रहे हैं. दोनों को काफी समय से एक साथ ही देखा जाता रहा है. बता दें कि आम्रपाली और दिनेश ये दावा करते हैं कि दोनों अच्छे दोस्त हैं. आम्रपाली और निरहुआ ने कई बार ये साफ किया है कि इन दोनों के बीच बस दोस्ती का रिश्ता है.

अब कोई नाता नहीं : अतुल-सुमित में से कौन बना अपना

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पिता बन गया दुश्मन, ओनर किलिंग का खौफनाक किस्सा

उत्तर प्रदेश के जिला प्रतापगढ़ की कोतवाली पट्टी का एक गांव है असुढ़ी. इसी गांव के रहने वाले भास्कर पांडेय का बेटा सौरभ प्रतापगढ़ शहर में रह कर बीकौम कर रहा था. वह जिस कालेज में पढ़ता था, उसी कालेज में गांव धनगढ़ सराय छिवलहां के रहने वाले राकेश कुमार सिंह की बेटी संजू सिंह भी बीएड कर रही थी. सौरभ और संजू आसपास के गांवों के रहने वाले थे, इसलिए दोनों में जानपहचान हो गई. दोनों की यह जानपहचान जल्दी ही दोस्ती में बदली तो दोनों अकसर मिलनेजुलने लगे. लगातार मिलने से दोनों में प्यार हो गया. धीरेधीरे उन का प्यार बढ़ता गया. फिर तो यह हाल हो गया कि जब तक दोनों एकदूसरे को देख न लेते, बातचीत न कर लेते, उन्हें चैन न मिलता.

सौरभ और संजू का यह प्यार परवान चढ़ा तो उन्होंने साथसाथ जीनेमरने की कसमें ही नहीं खाईं, बल्कि निश्चय कर लिया कि कुछ भी हो, लोग कितना भी विरोध करें, वे शादी जरूर करेंगे. लेकिन यह इतना आसान नहीं था. इस की वजह यह थी कि दोनों की जाति अलगअलग थी.

सच है, प्यार न तो जाति देखता है और न ही धर्म. संजू और सौरभ के साथ भी यही हुआ था. उन के प्यार को जमाने की नजर न लगे, उन्हें किसी तरह जुदा न कर दिया जाए, यह सोच कर उन्होंने शादी करने का फैसला ही नहीं किया, बल्कि पड़ोसी जिला इलाहाबाद जा कर पानदरीबा स्थित आर्यसमाज मंदिर में वहां की रीतिरिवाज के अनुसार विवाह कर लिया. यह 1 जुलाई, 2016 की बात है.

विवाह करने के बाद संजू अपने घर आ गई थी. उस के विवाह की भनक घर के किसी भी आदमी को नहीं लग पाई थी. शादी के बाद सौरभ आगे की पढ़ाई के लिए लखनऊ चला गया. वहां वह पढ़ाई के साथसाथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी भी कर रहा था.

सौरभ के लखनऊ चले जाने के बाद संजू की उस से मोबाइल पर बातें जरूर हो रही थीं, लेकिन वह खुद को अकेली महसूस कर रही थी. उसे सौरभ की दूरी बहुत परेशान कर रही थी. संजू भी पढ़लिख कर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी, इसलिए सौरभ ने आगे की पढ़ाई के लिए कानपुर में उस का एमएड में रजिस्ट्रेशन करा दिया.

कानपुर आने के बाद संजू सौरभ के साथ रहने की जिद करने लगी और 18 सितंबर, 2016 को वह लखनऊ आ गई. सौरभ लखनऊ के आशियाना में रहता था. संजू उसी के साथ उस के कमरे पर रहने लगी.

आगे चल कर कोई परेशानी न हो, इस के लिए 20 सितंबर, 2016 को सौरभ ने इलाहाबाद हाईकोर्ट में संजू के साथ कोर्टमैरिज कर ली. इस के बाद संजू के घर वालों को सौरभ के साथ उस की शादी का पता चल गया. चूंकि सौरभ उन की जाति का नहीं था, इसलिए पूरा परिवार आगबबूला हो उठा. बेटी द्वारा लिया गया यह निर्णय किसी को स्वीकार नहीं था. खास कर संजू के पिता राकेश कुमार सिंह को.

बेटी की इस हरकत से वह काफी नाराज थे. जबकि सौरभ के घर वाले बेटे के इस प्यार के बारे में जानते तो थे ही, उन्हें संजू बहू के रूप में स्वीकार भी थी. संजू के पिता राकेश सिंह जनता इंटर कालेज उड़ैयाडीह के प्रधानाचार्य थे. ऐसे में अपनी इज्जत को ले कर वह काफी परेशान थे. किसी भी कीमत पर वह इस शादी के लिए तैयार नहीं थे.

बेटी की इस हरकत से वह काफी तनाव में रहने लगे थे. वैसे भी वह काफी उग्र स्वभाव के थे. यही कारण था कि उन के घर के अन्य लोग संजू का प्रेम विवाह चाह कर भी स्वीकार करने की हिम्मत नहीं कर पा रहे थे.

संजू के लखनऊ आने के बाद दोनों पतिपत्नी की तरह रहते हुए अपनी आगे की पढ़ाई कर रहे थे और भविष्य के सपनों में खोए रहते थे. उन्हें जरा भी अंदाजा नहीं था कि एक ऐसा तूफान आने वाला है, जो उन की जिंदगी को झकझोर कर रख देगा.

सौरभ और संजू के दिन अच्छी तरह से कट रहे थे. लेकिन 10 अक्तूबर, 2016 को संजू के पिता राकेश कुमार सिंह अचानक सौरभ के कमरे पर आ धमके तो उन्हें देख कर पहले तो दोनों डरे, लेकिन जब उन्होंने कहा कि घबराने की कोई बात नहीं है, उन्होंने उन्हें माफ कर दिया है तो दोनों को थोड़ी राहत मिली.

राकेश कुमार सिंह ने कहा, ‘‘बच्चो, तुम्हारी शादी से हमें कोई परेशानी नहीं है. जो होना था, वह हो गया है. अब हम चाहते हैं कि समाज के जो रीतिरिवाज हैं, उन का पालन किया जाए.’’

इस के बाद संजू और सौरभ को विश्वास में ले कर गांव में धूमधाम से दोनों की शादी की बात कह कर राकेश कुमार सिंह संजू को अपने साथ ले कर गांव लौट आए.

सौरभ भी खुश था कि चलो देर ही सही, उस के ससुरजी ने नाराजगी त्याग कर बेटी को और उसे अपना लिया है. लेकिन संजू के गांव जाने के बाद जब उस ने उस से बात करने की कोशिश की तो बात नहीं हो सकी. क्योंकि संजू को उस से बात नहीं करने दी जा रही थी.

संजू पर तमाम पाबंदियां लगा दी गई थीं. एक तरह से उसे बंधक बना लिया गया था. 10 अक्तूबर, से 31 अक्तूबर, 2016 तक जब संजू से बात न हो पाई तो सौरभ अपनी ससुराल जा पहुंचा. लेकिन संजू से मिलने की कौन कहे, उसे घर पर रुकने तक नहीं दिया गया. उसे दुत्कार कर भगा दिया गया.

ऐसा कई बार हुआ तो सौरभ ने पत्नी को पाने के लिए हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच से गुहार लगाई. इस का नतीजा यह निकला कि 3 नवंबर, 2016 को हाईकोर्ट ने संजू को उसे सौंपने का आदेश तो दे दिया, साथ ही हाईकोर्ट में भी पेश करने को कहा. लेकिन निर्धारित तारीख पर संजू को हाईकोर्ट में पेश नहीं किया गया.

इस के बाद पट्टी कोतवाली पुलिस ने राकेश कुमार सिंह को संजू के साथ थाने बुलाया, जहां हुई पंचायत में संजू अपने पिता के साथ जाने को तैयार नहीं थी. वह बारबार अपने पति सौरभ के साथ जाने की बात कर रही थी. उस का कहना था कि उस ने सौरभ को ही अपना सब कुछ मान लिया है, अब वह मरेगी तो उसी के साथ और जिएगी भी तो उसी के साथ.

थाने में हुई पंचायत में संजू के फैसले एवं हाईकोर्ट के आदेश के बावजूद राकेश कुमार सिंह पुलिस पर दबाव डलवा कर संजू को अपने साथ घर ले आए. जबकि सौरभ ने पुलिस को हाईकोर्ट का आदेश दिखाने के साथ कोर्टमैरिज का प्रमाणपत्र भी दिखाया था. लेकिन पुलिस ने उस की एक नहीं सुनी थी.

30 अक्तूबर को दीपावली का त्यौहार था, जिस की वजह से कुछ नहीं हो सका. अगले दिन 31 अक्तूबर को पट्टी कोतवाली में सौरभ ने अपनी पत्नी संजू की जान का खतरा बताते हुए उस के पिता राकेश कुमार सिंह समेत 3 लोगों के खिलाफ नामजद तहरीर देते हुए न्याय की गुहार लगाई.

इस के अलावा सौरभ एसपी माधवप्रसाद वर्मा से मिला और उन्हें भी तहरीर दे कर पत्नी की जान बचाने की गुहार लगाई. एसपी ने इस मामले को गंभीरता से लेते हुए न केवल संजू को सौरभ के सुपुर्द कराने के निर्देश दिए, बल्कि सौरभ की तहरीर पर मुकदमा दर्ज कर काररवाई करने का भी आदेश दिया.

उन के आदेश का यह असर हुआ कि पट्टी कोतवाली पुलिस ने 2 नवंबर, 2016 को सौरभ की तहरीर पर राकेश कुमार सिंह, उस के छोटे भाई धीरेंद्र सिंह और छोटे बेटे शुभम के खिलाफ अपराध संख्या 376/2016 पर भादंवि की धारा 368 के तहत मुकदमा तो दर्ज कर लिया, लेकिन तुरंत कोई काररवाई नहीं की.

2 नवंबर को गांव धनगढ़ के लोगों से पट्टी पुलिस को पता चला कि संजू की मौत हो गई है तो पुलिस के हाथपांव फूल गए. पुलिस तुरंत गांव पहुंची और आननफानन संजू की लाश को कब्जे में ले कर पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया, साथ ही अपहरण के मुकदमे में हत्या की धारा 302 जोड़ कर नामजद लोगों की तलाश शुरू कर दी.

3 नवंबर, 2016 की सुबह संजू के पिता राकेश कुमार सिंह को उड़ैयाडीह मोड़ से गिरफ्तार कर लिया गया. पोस्टमार्टम रिपोर्ट से पता चला था कि संजू की मौत जहर से हुई थी. थाने ला कर राकेश कुमार सिंह से पूछताछ की गई तो उन्होंने कहा कि संजू ने उन की इज्जत से खिलवाड़ किया था, जिस की सजा जहर दे कर उस की हत्या कर के दी गई.

पूछताछ के बाद पटटी कोतवाली प्रभारी इंसपेक्टर राजकिशोर ने उसे अदालत में पेश कर के जेल भेज दिया. इस के बाद वह संजू के चाचा धीरेंद्र सिंह तथा भाई शुभम की तलाश में लगे थे. कथा लिखे जाने तक दोनों पकड़े नहीं जा सके थे.

– कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

लिवइन का साइड इफैक्ट, कैसे फंस गए ओए इंदौरी

इंदौर के एमआईजी थाने में 19 दिसंबर, 2023 को एक रेप केस दर्ज कराया गया. यह केस धारा 376 के तहत दर्ज किया गया और आरोपी बनाया गया हाल के समय में फेमस यूट्यूबर ओए इंदौरी को, जो अपने इंदौरी ऐक्सैंट के लिए फेमस है.

वैसे ओए इंदौरी का असली नाम रोबिन अग्रवाल जिंदल है जो कि इंदौर का रहने वाला है, इसलिए इस ने अपने यूट्यूब चैनल का नाम भी ‘ओए इंदौरी – अब हंसेगा इंडिया’ रखा है. उस पर अब तक 2,784,323,079 व्यूज हैं. इस ने अपना यूट्यूब चैनल 2017 में शुरू किया था लेकिन कोविड में जब सब अपनेअपने घरों में बंद थे तो लोगों ने खाली बैठेबैठे यूट्यूब का खूब इस्तेमाल किया. उसी समय ओए इंदौरी फेमस हो गया.

ओए इंदौरी के वीडियोज में कौमेडी और प्रैंक देखने को मिलता है. उस का एक इंस्टाग्राम अकाउंट भी है, जिस की आईडी है श4द्गट्ठद्बठ्ठस्रशह्म्द्ब. जिस पर उस के 7.4 मिलियन फौलोअर्स हैं. इस अकाउंट पर उस ने अब तक 1,413 पोस्ट की हैं. उस के इंस्टाग्राम बायो में लिखा है- ‘आई विल मेक यू लाफ.’ हालांकि जिस तरह के कंटैंट वह बनाता था उस पर हंसना तो दूर, उसे झेलना भी एक टास्क जैसा है.

ओए इंदौरी उर्फ रोबिन सोशल मीडिया पर सामान्य स्तर के व्यूअर्स के बीच फेमस चेहरा है. साल 2019 में कलर्स टीवी के एक शो में ओए इंदौरी ने अपनी मौजूदगी दर्ज कराई थी. बिना टैलेंट के बस फौलोअर्स के दम पर लोगों को भी मुकाम मिलता है, यह इस का सटीक उदाहरण ओए इंदौरी से समझ जा सकता है. उस शो को कौमेडियन भारती सिंह और उस के पति हर्ष लिम्बाचिया ने होस्ट किया था.

असल में विवाद तब खड़ा हुआ जब एक पीड़िता ने ओए इंदौरी उर्फ रोबिन अग्रवाल जिंदल पर रेप का केस दर्ज कराया. शिकायतकर्ता युवती खुद को तलाकशुदा बता रही है. उस का कहना है कि ओए इंदौरी ने उसे शादी का झांसा दे कर उस से शारीरिक संबंध बनाए हैं और बाद में किसी और लड़की से सगाई कर ली.

युवती ने कहा कि वह जब इंदौर आई थी तो उसे घर ढूंढ़ने में परेशानी हो रही थी. उस वक्त ओए इंदौरी ने उस की हैल्प की थी. बस, तभी से वे दोनों अच्छे दोस्त बन गए थे. उस के बाद ओए इंदौरी ने उस से अपने दिल की बात कही. वे दोनों लिवइन रिलेशनशिप में आ गए. उस दौरान उन के बीच फिजिकल रिलेशन बने. तब ओए इंदौरी ने उस से कहा था कि वह उस से ही शादी करेगा.

लेकिन 23 नंवबर को ओए इंदौरी की इंस्टाग्राम पोस्ट से पता चला कि उस की इंगेजमैंट किसी और से हो चुकी है. इस के बाद युवती ने पुलिस स्टेशन में केस दर्ज कराया. इस से पहले भी युवती ने मार्च के महीने में भी रिपोर्ट दर्ज कराई थी. लेकिन आपसी समझाता होने के बाद युवती ने केस वापस ले लिया. अब चूंकि ओए इंदौरी ने अपना वादा नहीं निभाया तो युवती फिर से पुलिस स्टेशन पहुंच गई. ओए इंदौरी के खिलाफ केस दर्ज कराने वाली युवती एक प्राइवेट कंपनी में जौब करती है.

गौरतलब है कि रोबिन ने कुछ समय पहले ही इंदौर के एक बड़े होटल में सगाई की है. उस की मंगेतर भी फेमस सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर है. उस का नाम अलिशा राजपूत है. उस के इंस्टाग्राम पर 7.31 मिलियन फौलोअर्स हैं. इस रिंग सैरेमनी में सोशल मीडिया की कई हस्तियां शामिल हुई थीं.

ओए इंदौरी पर लगे रेप आरोप के बारे में एमआईजी थाने के एसआई सचिन आर्य ने बताया कि रोबिन जिंदल पुत्र मिथिलेश अग्रवाल निवासी महालक्ष्मी नगर के खिलाफ शादी का झांसा दे कर रेप करने का मामला दर्ज किया गया है. केस दर्ज होने के बाद ओए इंदौरी फरार है. फिलहाल हम उस तक पहुंचने की कोशिश कर रहे हैं. केस दर्ज होने के बाद ओए इंदौरी ने अग्रिम जमानत की याचिका दायर की थी, जिसे कोर्ट ने खारिज कर दिया है.

इस केस के बाद ओए इंदौरी बुरी तरह फंस गया है. साथ ही, उस का फेम भी खतरे में आ गया है. वैसे भी, किसी इन्फ्लुएंसर की लाइफ मुश्किल ही 6 महीने से ऊपर टिकती है. ओए इंदौरी जैसे किसी नामचीन इन्फ्लुएंसर के साथ यह होना अपवाद नहीं है. सोशल मीडिया की चमक, लोगों के बीच फेमस होना और खुद को बड़ा आदमी समझाने की भूल ऐसे लफड़ों में फंसा ही डालती है. लिवइन गलत नहीं पर संबंध किस से कैसे निभते हैं, यह समझ होना जरूरी है.

आजकल यंगस्टर्स बड़ी संख्या में लिव इनरिलेशनशिप को अपना रहे हैं. लिवइन रिलेशनशिप में रहते हुए आप ऐसे ही किसी केस में न फंसें, इस के लिए जरूरी है कि यंगस्टर्स को लिवइन रिलेशनशिप के बारे में सही जानकारी हो.

लिवइन के कंसीक्वेंसेस

लिवइन रिलेशनशिप का मतलब ‘शादी जैसा रिश्ता’ होता है. जब एक अनमैरिड लड़का और लड़की मैरिड कपल की तरह एक ही छत के नीचे रहते हैं तो उसे लिवइन रिलेशनशिप माना जाता है. लेकिन भारत के कानून में लिवइन रिलेशनशिप को ढंग से परिभाषित नहीं किया गया है. यहां लिवइन रिलेशनशिप को 2 अनमैरिड लोगों के बीच ‘नेचर औफ मैरिज’ के तौर पर रखा जाता है.

लिवइन रिलेशनशिप में रह रही महिला भी घरेलू हिंसा कानून का इस्तेमाल कर सकती है. सुप्रीम कोर्ट के अनुसार, ‘‘अगर कोई महिला किसी आदमी के साथ लिवइन में रहती है और महिला यह नहीं जानती कि आदमी पहले से मैरिड है तो इस सिचुएशन में दोनों पार्टनर्स के साथ रहने को ‘डोमैस्टिक रिलेशनशिप’ माना जाएगा.’’ ऐसी हालत में महिला को घरेलू हिंसा अधिनियम 2005 के तहत गुजारा भत्ता लेने का अधिकार दिया गया है.

2011 में एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया था कि लिवइन रिलेशनशिप में रहने वाली महिला को सीआरपीसी की धारा 125 के तहत भरणपोषण पाने का अधिकार है और महिला को यह कह कर मना नहीं किया जा सकता कि उस ने कोई वैध शादी नहीं की थी.

अगर कोई लड़का और लड़की लिवइन में रहना चाहते हैं तो दोनों का अनमैरिड होना जरूरी है. अगर किसी पार्टनर की पहले शादी हुई है तो उस के डायवोर्स के पेपर जारी होने के बाद ही वह कानूनी रूप से लिवइन में रह सकता है वरना यह व्यभिचार में आएगा.

भारत में लिवइन रिलेशनशिप का कल्चर भी बढ़ रहा है. 2018 में एक सर्वे हुआ था. इस सर्वे में शामिल 80 फीसदी लोगों ने लिवइन रिलेशनशिप को सपोर्ट किया था. इन में से 26 फीसदी ने कहा था कि अगर मौका मिला तो वे भी लिवइन रिलेशन में रहेंगे.

सुप्रीम कोर्ट ने लता वर्सेस यूपी राज्य, एआईआर 2006 एससी 2522 में यह माना कि एक एडल्ट महिला अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति से शादी करने या अपनी पसंद के किसी भी व्यक्ति के साथ रहने के लिए आजाद थी. जैसेजैसे लोग लिवइन रिलेशनशिप को प्रायोरिटी देने लगे, रेप के झूठे केसेस बढ़ते चले गए. कई केसेस में ब्रेकअप के बाद महिला पार्टनर रेप की झठी एफआईआर फाइल कराती है.

बात करें अगर कानून की, तो भारतीय दंड संहिता 1860 के सैक्शन 375 के तहत रेप को डिफाइन किया गया है. इस में कहा गया है कि इन सिचुएशंस में माना जाएगा कि एक पुरुष ने एक महिला का ‘रेप’ किया है-

  1. अगर किसी महिला से शादी का झांसा दे कर संबंध बनाए गए हों.
  2. जब महिला के साथ उस की सहमति के बिना सैक्सुअल रिलेशन बनाया जाए.
  3. जब महिला फिजिकल रिलेशन बनाने के लिए इस डर के साथ सहमति दे कि ऐसा न करने पर उसे या उस के किसी प्रिय व्यक्ति को चोट या जान का खतरा है.
  4. जब ऐसा करने की सहमति देते समय महिला मन से अस्वस्थ हो या किसी भी तरह मानसिक रूप से बीमार हो.
  5. जब महिला नशे की वजह से या किसी अन्य मूर्खतापूर्ण या हानिकारक चीज की वजह से सैक्सुअल रिलेशन बनाने की प्रकृति और रिजल्ट्स को समझने में अक्षम है और सहमति देती है.
  6. जब महिला 16 साल की उम्र से कम है फिर चाहे सैक्स मरजी से हो या बिना मरजी के.

ओए इंदौरी के केस में देखा जाए तो शादी का झांसा दे कर फिजिकल रिलेशन बनाने के चार्जेज लग सकते हैं. अब देखना यह होगा कि इस मामले के आखिर में क्या होता है. सारे परिणाम इस सुझाव की तरफ इशारा करते हैं कि अगर आप लिवइन रिलेशनशिप में हैं या आने की सोच रहे हैं तो आप को इस के सारे कानून और अधिकार पता हों ताकि बाद में आप किसी पचड़े में न पड़ें.

हग एंड किस, डोंट मिस: पर रखें इन बातों का ध्यान

पब्लिक प्लेस में कपल्स को हग या किस करते यानी गले लगाते और चूमते देखकर कई लोग नाकमुंह सिकोड़ लेते हैं. इसे मोरली खराब माना जाता है और अश्लीलता की कैटेगरी में डाल दिया जाता है. यंग जेनरेशन इस सिचुएशन को किस तरह हैंडल करती है, जानिए.

कपल के लिए हग और किस करना प्यार जताने का एक तरीका है. यह उन के लिए बहुत नौर्मल बात है. लेकिन पब्लिक प्लेस में हग और किस करना इंडिया में अभी नौर्मल बात नहीं है. हालांकि मैट्रो सिटीज में यह धीरेधीरे नौर्मल होता जा रहा है. इस का कारण यह है कि मैट्रो सिटीज में रहने वाले ज्यादातर लोग यंग हैं.

पब्लिक प्लेस में कपल का हग करना फैमिली के साथ आए लोगों को असहज कर देता है. ऐसा कंजरवेटिवथिंकिंग से ग्रसित लोगों का कहना है. लेकिन सच तो यह है कि वे अपनेआप को बदलना ही नहीं चाहते. उन का यह कहना है कि ये सब वैस्टर्न कल्चर की देन है. हमारे कल्चर में यह सब नहीं होता.

हमारे देश में पब्लिक प्लेस पर हग या किस करना अकसर सांस्कृतिक और पारंपरिक मापदंडों के कारण गलत माना जाता है. इंडियन सोसाइटी में पब्लिकली गले मिलना या कहें हग करना स्वीकार नहीं किया जाता है क्योंकि इसे बेहद गुप्त में होने वाली क्रिया माना जाता है. इसे प्यार जताने से ज्यादा गुप्त यौन क्रिया मान कर इसे पब्लिकली करने से खारिज कर दिया जाता है.

लेकिन बात करें अगर वैस्टर्न कंट्रीज की तो कपल का हग और किस करना बहुत ही नौर्मल है. लंदन की सड़कों पर कपल अकसर किस करते हुए दिख जाते हैं. न तो वह इमोरल दिखता है न ही भद्दा लगता है. बल्कि बहुत बार तो बहुत प्यारा लगता है और यह वहां बहुत ही नौर्मल है. लेकिन इंडिया में जहां 5000 साल पुरानी वेदपुराणों वाली पंरपराओं को सबकुछ मान कर चलने से बहुत रोकटोक इंसान अपनी जिंदगी में लगाता है या जो उसे इन ग्रंथों के मुताबिक चलने को कहता है वह चुपचाप बिना सवाल किए चलने लगता है.

हमारे देश में हमें सांस्कृतिक मापदंडों का ध्यान रखने और उन का सम्मान करने का पाठ बचपन से ही पढ़ाया जाता है. बिना यह जाने कि यूथ यह पाठ पढ़ना चाहते भी हैं या नहीं. बस हमें संस्कृतियों के जाल में फंसा दिया जाता है और मरते दम तक हम इसी जाल में फंसे रहते हैं.

पब्लिक प्लेस में हग और किस करना सही है या गलत. इस बात पर सब का नजरिया अलगअलग है. पुरानी जेनेरेशन जहां इसे असभ्य तो नहीं इसे सामान्य व्यवहार में गिनती है. इस विषय पर शारदा यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाली यामिनी मेहता कहती है, ‘‘मेरे फ्रैंड्स सर्कल में लड़के और लड़कियां दोनों हैं. हम लोग साथ में चिलआउट करते हैं. क्लब जाते हैं. कई बार कालेज के बाद हम सभी कालेज के आसपास ही घूमने निकल जाते हैं.

‘‘मेरी आदत है कि मैं जब भी अपने दोस्तों से मिलती हूं तो उन्हें साइड हग जरूर करती हूं. वहीं जब मैं अपने पार्टनर से मिलती हूं तो मेरा हग करने का तरीका बदल जाता है. मैं अपने पार्टनर को एक वार्म हग करती हूं और कभीकभी मेरा पार्टनर और मैं एकदूसरे को किस भी कर देते हैं. हमारे लिए यह बहुत नौर्मल है.

‘‘लेकिन कई बार जब मैं पब्लिक प्लेस में अपने पार्टनर को हग करती हूं तो उस वक्त वहां के लोग हमें घूरघूर कर देखने लगते हैं जैसे हम ने कोई अपराध किया हो. ऐसा नहीं है कि इन में सिर्फ मर्द ही शामिल हों. बल्कि महिलाएं भी हमें आंखें दिखाने लगती हैं. उस समय अटपटा लगता है. ये लोग तब तो घूरघूर कर नहीं देखते जब इन की बहूबेटियों को इन के घर के मर्द पीटते और मांबहन की गंदीगंदी गालीगलौच करते हैं. संस्कृति और परंपरा तब क्यों नहीं आती?’’

यामिनी आगे कहती है, ‘‘मुझे नहीं लगता कि हग और किस अश्लीलता की श्रेणी में आते हैं. ‘हग’ केयर का ही एक पार्ट होता है और हम अपने चाहने वालों की केयर तो करते ही हैं. ऐसे में यही केयर हम अपने पार्टनर की भी करते हैं, जिस में हग कुछ देर ज्यादा और वार्म होता है. हां, इस में केयर के तौर पर बौडी को थोड़ी देर सहलाना शामिल है. हम अपनी फीलिंग्स अपने पार्टनर से शेयर कर रहे हैं तो इस में कुछ भी गलत नहीं है. यह सिर्फ अपना प्यार जताने का एक तरीका है.

‘‘जिन लोगों को लगता है कि पब्लिक प्लेस में कपल का हग करना सही नहीं है तो वह गलत है. वे लोग गलत मानसिकता के शिकार हैं. वे अभी भी पुरानी सोच पर टिके हुए हैं. उन्हें अपनी इस मानसिकता को बदल कर लिबरल होना होगा.’’

यामिनी हमारी इंडियन सोसाइटी पर सवाल करते हुए कहती है, ‘‘इंडिया में लोग पब्लिक प्लेस में एकदूसरे को किस क्यों नहीं कर सकते? जब प्यार सार्वभौमिक है तो उस के जताने के तरीकों को यहां विदेशी क्यों माना जाता है? हमारा समाज बदलाव को अपनाना क्यों नहीं चाहता? क्यों यह बदलाव से इतना डरा हुआ है?’’

कभीकभी ऐसा भी होता है कि आप जिस व्यक्ति को हग करना चाहते हैं वह तो ओपन माइंडेड होता है लेकिन आप के आसपास के लोग ओपन माइंडेड नहीं होते. वह वही दकियानूसी सोच लिए हुए बैठे होते हैं जो सालों से चली आ रही है. इन्हें पब्लिक प्लेस में चिपकाचिपकी पसंद नहीं आती. ये चाहते हैं कि कपल्स को जो भी करना है वे अपने घर में करें. हमारी सोसाइटी में गंदगी न फैलाएं. इन सब चीजों से हमारे बच्चों पर बुरा असर पड़ता है इसलिए वे चाहते हैं कि ये पब्लिक प्लेस में अपनी मर्यादा में बने रहें.

इंडियन सोसाइटी में हग करने को पैरा-रोमांटिक चीज माना जाता है. तभी इतना हौव्वा होता है. लेकिन पश्चिमी शहरों में ऐसा नहीं है. वहां सड़कों पर किस भी बहुत नौर्मल है. इस का एक कारण यह भी है कि वहां प्यार करने की आजादी है, सैक्स करना पाप नहीं माना जाता, दोस्ती करना अच्छे नेचर की निशानी मानी जाती है. जबकि इस के ठीक उलट यहां है.

दूसरी तरफ अगर बात करें एक फ्रैंडशिप में हमारे मन में ऐसा डर बैठा दिया है कि अपोजिट सैक्स वालों को हम नमस्ते या सिर्फ ‘हाय’ के साथ ही मिलते हैं. ऐसा गलत नहीं है लेकिन सिर्फ गले मिलना गलत क्यों? मैट्रो सिटीज में हग करना अब मेल नहीं चाहते कि वे अपनी तरफ से पहल करें और नमस्ते करना एक सेफ चौइस है. वहीं आज की लड़कियों को हग करने में कोई परेशानी नहीं होती. वे हग करने में सहज हैं लेकिन वे सोसाइटी की दकियानूसी बातों के पचड़े में नहीं पड़ना चाहतीं.

140 करोड़ से अधिक की आबादी के बावजूद हम इंडियन सैक्स के टौपिक पर पब्लिक प्लेस में खुल कर बात नहीं कर सकते हैं. हम सैक्स को सैक्स कहने से कतराते हैं. पब्लिक प्लेस में किस को अपराध करने जैसा माना जाता है और पब्लिक प्लेस में सैक्स के बारे में बात करना सही नहीं माना जाता है. एक कमरे के अंदर आप हर दिन सैक्स कर सकते हैं और 10 बच्चे पैदा कर सकते हैं लेकिन बाहर जनसंख्या नियंत्रण के लिए सैक्स एजुकेशन भी नहीं दे सकते.

असल में, हमारे विचारों और दिमाग में रूढि़वाद अपनी गहरी जड़ें जमा चुका है, जिसे आसानी से तब तक नहीं हटाया जा सकता जब तक कि हमारा समाज खुद को बदलने की पहल न करे. इस दिशा में फिल्मी कलाकर और सोशल मीडिया इन्फ्लुएंसर अपनी भूमिका निभा सकते हैं, क्योंकि इन का सोसाइटी पर बहुत बड़ा इंपैक्ट पड़ता है, लेकिन ऐसा तभी होगा जब उन में सोसाइटी के नौर्म्स से टकराने की हिम्मत होगी.

हौलीवुड फिल्मों में मेल या फीमेल कैरेक्टर पूरी तरह से न्यूड हो जाते हैं, इस से भी उन की औडियंस को कोई परेशानी नहीं होती है. लेकिन बौलीवुड में 2 मिनट के स्मूच सीन से हायतौबा मच जाती है, जबकि इंटरनैट के जमाने में 18 साल का लड़का क्या कुछ देखपढ़ रहा है इस पर संस्कृति चाह कर भी कुछ नहीं कर पाती.

पुलिस और लोग हमारे अस्पष्ट कानूनों का नकारात्मक लाभ उठाते हैं. सब से बड़ा दोष यह परिभाषित न करना है कि अश्लील क्या है. उन पुलिस अधिकारियों द्वारा कानून को नियंत्रणीय बनाना जिन की अश्लीलता की परिभाषा अलग है, अब तक की सब से मूर्खतापूर्ण बात है. मूलरूप से इस का मतलब यह है कि हम सोचते हैं कि हर पुलिसवाले का फैसला हमेशा सही होता है जो सच नहीं है. यह मूलरूप से हमारे संविधान की एक मूर्खता है, जिस में व्यापक और अस्पष्ट कानून हैं जिन्हें आसानी से मोड़ा जा सकता है.

क्या कहता है कानून

भारतीय दंड संहिता की धारा 294 कहती है, ‘‘सार्वजनिक रूप से अश्लीलता एक आपराधिक अपराध है, लेकिन सार्वजनिक रूप से किस या हग करने के बारे में विशेष रूप से कुछ भी नहीं कहा गया है इसलिए यह कोई अपराध नहीं कहा जा सकता है.

भारतीय दंड संहिता की धारा 294 के तहत अगर कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को चिढ़ाने के इरादे से किसी भी पब्लिक प्लेस पर कोई भी अश्लील हरकत करता है या किसी भी सार्वजनिक स्थान या उस के आसपास कोई अश्लील गाना या शब्द गाता है या बोलता है तो उसे सजा दी जा सकती है. आईपीसी की धारा 294 का उल्लंघन करने वाले व्यक्ति को अधिकतम 3 महीने की जेल या आर्थिक दंड या दोनों से दंडित किया जा सकता है.

कानूनी नजरिए से अश्लीलता एक क्राइम है और इस के लिए भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 292, 293 और 294 के तहत सजा का प्रावधान है. हालांकि इस में यह स्पष्ट नहीं किया गया कि आश्लीलता है क्या और इस का दायरा क्या है.

कानूनी जानकारों की मानें तो अगर कोई शख्स ऐसी अभद्र सामग्री, किताब या अन्य आपत्तिनजनक सामान बेचे या सर्कुलेट करे जिस से दूसरों को नैतिक रूप से परेशानी हो तो उस के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जाएगी.

इस मामले में दोषी पाए जाने पर आरोपी को 2 साल की सजा और 2000 रुपए जुर्माना देना पड़ सकता है. अगर दूसरी बार वह ऐसे ही मामले में दोषी पाया जाता है तो उसे 5 साल की जेल और 5000 रुपए जुर्माना देना होगा. इस के अलावा भी कई और धाराएं अश्लीलता को ले कर बनी हैं.

भारत में अश्लीलता पर कानून तो बना है लेकिन इसे स्पष्टरूप से परिभाषित नहीं किया गया है. आईपीसी धारा 292 और आईटी एक्ट 67 में उन सामग्री को अश्लील बताया गया है जो सैक्सुअल या सैक्सुअलिटी पैदा करती है या फिर इसे देखने, पढ़ने और सुनने से सैक्सुअलिटी पैदा होती हो. लेकिन कानून में सैक्सुअल और सैक्सुअलिटी किसे माना जाए इस को ले कर स्पष्ट नहीं किया गया है. इस की व्याख्या करने का अधिकार कोर्ट पर छोड़ दिया गया है.

पब्लिक प्लेस में हग और किस करना नैतिक है या अनैतिक, इस बात का जवाब बस इतना है कि यह आप की पर्सनल चौइस है. अगर आप कंफर्टेबल हैं तो किस हग करने में कोई हर्ज नहीं है. यह पूरी तरह से आप पर डिपैंड करता है.

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