काला दरिंदा: जब बहादुर लड़की ने किया रेपिस्ट का सामना

वह एक टैक्सी ड्राइवर था. उस का रंग जले तवे की तरह काला था, तभी तो उस के घर वालों ने सोचसमझ कर उस का नाम काला रखा था. उस ने कार के पिछले शीशे पर मोटेमोटे अक्षरों में ‘काला’ लिखवा दिया था.

19 साल की उम्र में वह माहिर ड्राइवर बन गया था. तभी से वह टैक्सी चला रहा था. अब उस की उम्र 35 साल के करीब थी.

थोड़ी देर पहले एक ऐक्सप्रैस ट्रेन प्लेटफार्म पर आ कर रुकी थी. कुछ सवारियां गेट से बाहर निकलीं, तो काला मुस्तैदी से खड़ा हो गया. कुछ सवारियों से उस ने टैक्सी के लिए पूछा भी था लेकिन सवारियों ने मना कर दिया.

कुछ सवारियों को टैक्सी की जरूरत नहीं थी और जिन्हें जरूरत थी, वे अपने परिवार के साथ थे. उन्होंने शक्ल देखते ही काला को मना कर दिया था, क्योंकि शराब के नशे में डूबा काला शक्ल से ही बदमाश लगता था.

काला ने कलाई में बंधी घड़ी की तरफ देखा. रात के 10 बज रहे थे. समता ऐक्सप्रैस ट्रेन के आने का समय हो गया था. शायद उसे कोई सवारी मिल जाए, यह सोच कर काला ने बीड़ी सुलगा ली.

काला का जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था. 3 भाइयों में वह अकेला जिंदा बचा था. उस ने कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा था. उस की मां तो उसे स्कूल भेजना चाहती थी, पर उस का बाप उसे स्कूल भेजने के सख्त खिलाफ था.

काला की उम्र जब 10 साल की थी, तभी उस की मां मर गई थी और उस के बाप ने उसे एक लुहार के यहां काम पर लगा दिया था. सारा दिन भट्ठी के आगे बैठ कर वह लोहे का पंखा चलाता था. महीने में उसे मेहनत के जो पैसे मिलते थे, उन पैसों को उस का बाप शराब में उड़ा देता था.

7 साल तक काला ने लुहार की दुकान पर काम किया था. तभी उस के शराबी बाप की मौत हो गई थी. बाप के मरने का उसे जरा भी दुख नहीं हुआ था, क्योंकि अब वह पूरी तरह आजाद हो गया था.

कुछ गलत लड़कों के साथ काला का उठनाबैठना हो गया था. 20 साल का होतेहोते वह पक्का शराबीजुआरी बन चुका था. एक करीबी रिश्तेदार को उस पर दया आ गई थी. उसी ने भागदौड़ कर के उस की शादी करा दी थी. उस की औरत ज्यादा खूबसूरत तो नहीं थी, पर उस से कई गुना अच्छी थी.

काला ने हमेशा से ही अपनी बीवी को इस्तेमाल की चीज समझा था. अब वह 4 बच्चों का बाप बन चुका था. फिर भी बच्चों के लिए एक बाप की क्या जिम्मेदारियां होती हैं, इस का उसे पता नहीं था.

काला जितना शौकीन था, उस से कहीं ज्यादा मेहनती भी था. वह सुबह 7 बजे टैक्सी ले कर घर से निकल जाता था और रात 12 बजे के बाद ही लौटता था.

वह 300 से 500 रुपए तक रोजाना कमा लेता था. इतना कमाने के बाद भी उस के घर की माली हालत ठीक नहीं थी, क्योंकि उसे शराब पीने के अलावा कोठे पर जाने का भी शौक था.

रात 11 बजे समता ऐक्सप्रैस ट्रेन प्लेटफार्म पर आई. ट्रेन पूरे एक घंटा लेट थी. सवारियां जल्दीजल्दी स्टेशन के गेट से बाहर निकल रही थीं. काला सवारियों पर नजरें दौड़ाने लगा. अचानक उस की नजर एक लड़की पर पड़ी तो उस की आंखों में एक अजीब सी चमक उभर आई.

काला तेजी से उस लड़की की तरफ लपका और उस से पूछा, ‘‘मैडम क्या आप को टैक्सी चाहिए?’’

‘‘हां चाहिए,’’ लड़की ने उस की तरफ बिना देखे ही जवाब दिया.

‘‘कहां जाना है आप को?’’

‘‘विजय नगर,’’ लड़की ने बताया.

‘‘चलिए,’’ कह कर काला ने लड़की के हाथ से बैग ले लिया.

कुछ ही दूर टैक्सी स्टैंड पर काला की टैक्सी खड़ी थी.

काला ने डिक्की खोल कर बैग उस में रखा और फिर अपनी सीट पर जा कर बैठ गया. तब तक लड़की पिछली सीट पर बैठ चुकी थी.

उस लड़की की उम्र 22-23 साल के आसपास थी. वह बेहद खूबसूरत थी. पहनावे से वह अमीर और हाई सोसायटी की लग रही थी. वह शायद किसी सोच में गुम थी, तभी तो उस ने काला के ऊपर ध्यान नहीं दिया था, वरना काला का चेहरा और शराब के नशे में डूबी उस की आंखें देख कर वह उस की टैक्सी में कभी न बैठती.

लड़की पिछली सीट पर अधलेटी सी आंखें बंद किए हुए थी. काला सामने लगे शीशे में से उसे बारबार देख रहा था.

रेलवे स्टेशन से विजय नगर का रास्ता महज आधे घंटे का था. काला धीमी रफ्तार से टैक्सी चला रहा था. उस लड़की ने काला के अंदर उथलपुथल मचा रखी थी.

काला का ध्यान टैक्सी चलाने में कम, उस लड़की पर ज्यादा था. वह जितना उस लड़की को देख रहा था, उस पर उतना ही एक नशा सा छा रहा था.

काला एक नंबर का आवारा था. जवान लड़कियों को देख कर उस के खून में गरमी पैदा हो जाती थी.

एक बार स्कूटर पर जा रही एक लड़की को घूरते हुए वह अपने होश खो बैठा था. नतीजतन, उस की टैक्सी एक बस के पिछले हिस्से से जा टकराई थी. इत्तिफाक से वह बच गया था, मगर टैक्सी को काफी नुकसान पहुंचा था. लेकिन इस के बाद भी वह अपनी हरकतों से बाज नहीं आया था.

काला का दिमाग और ध्यान कार में बैठी लड़की पर ही लगा था. अचानक

5 महीने पहले की एक घटना याद कर उस के अंदर धीरेधीरे वासना का शैतान जागने लगा.

हुआ यों था कि उस रात वह कुछ सवारियों को रेलवे स्टेशन छोड़ने आया था. रात के तकरीबन साढ़े 11 बज रहे थे. शायद कोई सवारी मिल जाए, इस उम्मीद के साथ वह सवारी मिलने का इंतजार करने लगा था.

कुछ ही देर में उसे एक सवारी मिल गई थी. वह एक लड़की थी और उसे अशोक नगर जाना था. उसे टैक्सी की जरूरत थी. उस ने कई टैक्सी वालों से बात की थी. रेलवे स्टेशन से अशोक नगर काफी दूर था, तकरीबन एक घंटे का रास्ता था.

ज्यादातर टैक्सी वालों ने रात को इतनी दूर जाने से मना कर दिया था. कुछ टैक्सी वाले वहां जाने के लिए तैयार हुए भी, मगर उन्होंने किराया बहुत ज्यादा मांगा.

आखिर में लड़की का सौदा काला से पट गया था. वह लड़की कम उम्र की व खूबसूरत थी. सफर में बोरियत से बचने के लिए लड़की टाइमपास करने की नीयत से काला को ‘अंकल’ पुकार कर बातें करने लगी थी.

काला उस के सवालों के जवाब देने के साथसाथ खुद भी उस के बारे में पूछताछ करने लगा था.

उस लड़की का नाम श्वेता था. वह एक अमीर घर की लड़की थी. श्वेता अपने घर से दूर एक शहर में पढ़ती थी. वहां वह होस्टल में रहती थी. कुछ दिनों की छुट्टियों में वह अपने घर चली आई थी. श्वेता ने अपने आने की खबर घर वालों को नहीं दी थी. अगर वह फोन कर देती, तो उसे स्टेशन पर लेने घर से कार आ जाती.

श्वेता ने जानबूझ नहीं बताया था, क्योंकि अगले दिन उस का जन्मदिन था और वह अचानक अपने घर पहुंच कर घर वालों को चौंका देना चाहती थी.

श्वेता अब तक अपने घर पहुंच भी चुकी होती, अगर ट्रेन 2 घंटे लेट नहीं हुई होती. रात का समय था. जाड़े का मौसम होने की वजह से सड़क पर दूरदूर तक सन्नाटा था.

श्वेता से बात करते हुए काला टैक्सी चला जरूर रहा था, मगर उस का मन कहीं और भटक रहा था. उस के साथ गोरी रंग की जवान और हसीन लड़की थी, जिस के जिस्म से भीनीभीनी मदहोश कर देने वाली खुशबू आ रही थी.

काला पर एक अजीब सा नशा हावी होता जा रहा था. काला ने एक बेहद घटिया और भयानक फैसला कर लिया.

उस रात काला ड्राइवर से दरिंदा बन गया था. उस ने टैक्सी एक सुनसान जगह पर रोक दी थी. इस से पहले कि श्वेता कुछ समझ पाती, काला कार के अंदर ही उस पर टूट पड़ा था. श्वेता तो जैसे एकदम से हैरान ही रह गई थी. उसे काला से ऐसी उम्मीद हरगिज नहीं थी.

श्वेता रोते हुए काला से छोड़ देने के लिए गिड़गिड़ाने लगी थी, पर उस के रोनेगिड़गिड़ाने का असर काला पर नहीं हुआ था. फिर श्वेता रोनागिड़गिड़ाना छोड़ काला का विरोध करने लगी थी.

अचानक काला ने सीट के नीचे रखा चाकू निकाल लिया और बोला था, ‘सुन लड़की, अगर ज्यादा फड़फड़ाएगी तो इसी चाकू से तेरी गरदन काट डालूंगा. इस सुनसान जगह पर कोई तुझे बचाने नहीं आएगा. जान प्यारी है तो जैसा मैं कहता हूं वैसा ही कर.’

श्वेता पर इस धमकी का असर फौरन हुआ था. वह मासूम लड़की मौत के डर से बुत सी बन गई थी.

अपनी इच्छा पूरी करने के बाद काला बेहोशी की हालत में श्वेता और उस के सामान को सड़क के किनारे छोड़ कर रफूचक्कर हो गया था.

आज बहुत दिनों बाद काला को सुनहरा मौका मिला था, जिसे वह हाथ से नहीं जाने देना चाहता था. उस लड़की को अपना शिकार बनाने से पहले काला उस के और उस के घरपरिवार के बारे में जानना चाहता था.

काला ने अपनी तरफ से बातचीत की शुरुआत की, पर लड़की ने उस के किसी भी सवाल का जवाब ‘हां’ या ‘न’ से ज्यादा शब्दों में नहीं दिया.

पहले वाली लड़की श्वेता हंसमुख, चंचल और मिलनसार थी, जबकि यह उस के बिलकुल उलट, गंभीर, मगरूर और नकचढ़ी थी.

काफी सोचनेसमझने के बाद काला ने फैसला किया कि लड़की का संबंध चाहे किसी भी घर से हो, वह उस के साथ मनमानी जरूर करेगा, बाद में चाहे जो कुछ भी होता रहे.

सड़क पर सन्नाटा था. काला मन ही मन लड़की की इज्जत से खेलने का तानाबाना बुनने लगा था. विजय नगर से एक किलोमीटर पहले एक दूसरे शहर को सड़क जाती थी. वह सड़क ज्यादातर सुनसान रहती थी. काला ने टैक्सी उसी सड़क पर मोड़ दी थी.

कार में बैठी लड़की को अपने रास्ते का पता था, इसलिए उस ने फौरन काला से गलत रास्ता होने की बात की, पर काला ने उस की बात अनसुनी कर दी.

खतरा महसूस कर के लड़की विरोध करने लगी, तो काला ने एक जगह टैक्सी रोक दी और सीट के नीचे से चाकू निकाल कर दहाड़ा, ‘‘सुन लड़की, अगर जरा सी भी आनाकानी की तो पेट फाड़ दूंगा.’’

काला की भयानक आंखों में वासना के लाललाल डोरे तैर रहे थे. लड़की को धमकी दे कर काला उस पर टूट पड़ा.

अगले दिन जब काला को होश आया तो अपनेआप को अस्पताल में देख कर वह चौंक पड़ा. दर्द से उस का पूरा बदन दुख रहा था. कल रात के सीन उस के जेहन में घूमे तो उस का पूरा जिस्म कांप उठा. वह 2 बार दरिंदा बना था, एक बार उस दिन जिस दिन उस ने मासूम श्वेता की इज्जत लूटी थी और दूसरी बार कल रात.

कल रात वह दरिंदा बना जरूर था, लेकिन कामयाब नहीं हो सका था, क्योंकि कल रात वाली लड़की पहले वाली लड़की की तरह कमजोर नहीं थी. वह लड़की मुक्केबाजी और कराटे में माहिर थी. उस लड़की ने काला को बहुत पीटा था.

लड़की ने एक जोरदार लात काला की दोनों टांगों के बीच मारी थी. इस के बाद उसे कुछ होश नहीं था. वह अस्पताल कैसे पहुंचा? कब पहुंचा और किस ने पहुंचाया? इस का उसे कुछ पता नहीं था.

काला ने डाक्टरों से जब यह खबर सुनी तो मानो उस की जान ही निकल गई. डाक्टरों ने उसे बताया कि उन्होंने उस की जान तो बचा ली, मगर अब वह कभी दरिंदा नहीं बन सकता था, क्योंकि टांगों के बीच चोट लग जाने से वह हमेशा के लिए नामर्द बन चुका था.

सस्ते में चूड़िया : आखिर क्या चाहती थी सुंदरी

पति के हाथ धुलाते हुए सुंदरी ने कहा, ‘‘अब की 2-2 सोने की चूड़ियां जरूर बनवा दो, नहीं तो राखी पर मायके वाले कहेंगे कि इतनी भी नहीं जुटा पाते कि…’’ तभी लू का एक जोरदार थपेड़ा सूरज की कनपटी पर तमाचा सा मारता हुआ ऊपर की ओर उड़ गया. कानों पर हथेलियां रख उस ने जवाब दिया, ‘‘आमों की फसल अच्छी आई है. कुदरत ने चाहा तो इस बार के शहर के चक्कर में ही चूड़ियां निकल आएंगी. तू अब घर जा. धूप तेज हो रही है.

’’ सुंदरी के चेहरे पर खुशी की एक लहर दौड़ गई. उठते हुए वह बोली, ‘‘हम इतने बुरे लगने लगे अब?’’ सूरज जानता था कि उस की बीवी के दिन चढ़े हैं. उस ने कुछ जवाब नहीं दिया. घर की ओर लौटती हुई बीवी की ओर वह तब तक देखता रहा, जब तक कि वह आंखों से ओझल न हो गई. उस ने सोचा, ‘सुंदरी सचमुच सुंदरी है. तन से ही नहीं, मन से भी.’ खलिहान उठ चुके थे. किसान किसी छप्पर अथवा पेड़ के नीचे आराम कर रहे थे. परंतु सूरज इस साल आम की रखवाली में डट गया था. वैसे तो गांव में और भी आम के पेड़ थे, पर सूरज के आमों का स्वाद ही गजब का था.

सूरज ने इस बार बौर आने पर ही पेड़ के नीचे बसेरा कर लिया था. गांव वाले मन ही मन गुस्सा कर रहे थे. सूरज की यह पहरेदारी उन्हें अच्छी नहीं लग रही थी. सुंदरी के हाथों की रोटियों ने पेट में पहुंचते ही अपना काम दिखाना शुरू कर दिया. सूरज की आंखें झपकने लगीं. एक पेड़ के नीचे अधलेटा हो उस ने आंखें मूंद लीं. अभी थोड़ी ही देर हुई थी कि खड़खड़ाहट सुन कर किसी जानवर को आया जान नींद की हालत में ही हाथ पसार उस ने मिट्टी का ढेला उठा कर मार फेंका.

अचानक जोर से ‘धम्म’ की एक आवाज ने उसे चौंका दिया. सूरज की नींद फुर्र हो गई. ढेला फूट कर चूरचूर हो चुका था और एक गाय धरती पर पड़ी छटपटा रही थी. सूरज को पसीना छूट गया. वह उठा, तो पैर डगमगा गए. उस ने पास जा कर देखा, तो गाय खामोश पड़ी थी. उस की जीभ बाहर निकल आई थी. सूरज ने सोचा, ‘हाय, गौहत्या. अब क्या करूं?’

तभी मंडन चौबे नदी से नहा कर लौटे. थोड़ी दूर हट कर वे रुक गए. उन्होंने सारी हालत का जायजा लिया. सूरज के चेहरे पर उड़ रही हवाइयां साफ बता रही थीं कि करतूत किस की है. वे बोले, ‘‘सूरज, तू बड़ा नीच है. तू ने गौहत्या कर डाली,’’

और ऊंची आवाज में ‘रामराम’ कहते हुए गांव की ओर चले गए. वह मरियल सी गाय एक हरिजन की थी. एक पल के लिए सूरज ने सोचा, ‘गई सुंदरी की चूड़ियां, रामू काका का हर्जाना ही पहले चुकाना होगा.’’ यह बात जल्दी ही पूरे गांव में फैल गई. सुंदरी के कानों ने सुना, तो मानो धरती पैरों के नीचे से सरक गई. लाज छोड़ ससुर के सामने जा रोई, ‘‘दादा, अब क्या होगा? सचझूठ का पता तो लगाओ.’’

दादा ने दुखी मन से कहा, ‘‘एक तो वैसे ही गरीबी से कमर टूटी जा रही है, तिस पर गौहत्या का कलंक.’’ सुंदरी की परेशानी कम होने के बजाय और बढ़ गई. सोचा, ‘क्यों न रामू काका के यहां जा कर विनती कर लूं.

उन की गाय मरी है, धीरेधीरे सब पैसा चुकता कर देंगे. अभी हाथ तंग है और आगे खर्चा भी लगा है,’ अपने बढ़े हुए पेट को देख कर आज न जाने क्यों पहली बार उसे खीज सी हुई. रामू काका बेरी की छाया में बैठे जूते सी रहे थे. थोड़ा सा घूंघट सरका कर सुंदरी कुछ कहे इस से पहले ही काका ने काकी को आवाज दे पीढ़ा लाने को कहा और काम छोड़ कर बैठ गए.

सुंदरी अपनेआप को बहुत छोटा महसूस करने लगी. उस की आंखें छलछला उठीं. बात करना भूल कर वह धरती कुरेदती रह गई. काका ने हलका सा चिलम का कश खींचा, तो खांसी आ गई. जब कुछ थमी तो हांफते से बोले, ‘‘बहुरिया, काहे को परेशान है. गाय बूढ़ी थी, मर गई. भैया के ढेले से आज नहीं तो कल भूख से मरती ही. छुट्टल फिरती थी, बांधूं तो तब जब उसे खिला सकूं.

परंतु यहां तो अपने लाले पड़े हैं. अच्छा हुआ, ठिकाने लग गई. मुसीबत तो यह है कि भाजपाइयों को खबर मिल गई तो बवाल कर देंगे. उस में भला क्या कर सकता हूं.’’ सुंदरी अब और चुप न रह सकी. बिलखती सी वह बोली, ‘‘काका, हम तुम्हारी भलमनसाहत का फायदा नहीं उठाएंगे. कुछ दिनों की बात है, पूरे पैसे दे देंगे…’’ रमुआ ने बात पूरी न होने दी. बीच में ही वह बोल उठे, ‘‘ऐसा पहले होता था सुंदरी.

हम छोटे भले ही हैं, पर इतने गिरे हुए तो नहीं, जो मरने का भोज लें और पैदा होने का भी. तू घर जा और सुन, अब से कभी यह मन में न आए कि काका को कुछ देना है. पर भाजपाइयों से तू कैसे निबटेगी और सूरज कैसे निबटेगा, मैं नहीं जानता.’’

सुंदरी लौट आई. रास्तेभर यही सोचती रही कि धरती पर आज भी कुछ इनसानियत बची है, वह गरीब की कुटिया में ही पल रही है. पर भाजपाइयों का डर उसे मन में सता रहा था. पिछले 10 सालों में गौहत्या के नाम पर हर बार बवाल मचता है. अब कैसे नहीं मचेगा. शाम तक चौपाल पर पंचायत जुट गई. 2-4 भगवे झंडे लग गए. सब के मुंह से लार ठपक रही थी.

बहुत दिनों से गांव में कोई ‘कांड’ नहीं हुआ था. विवाहशादी नहीं तो यही सही. मौका मुट्ठी में आता जान सब के मुंह में पानी आने लगा. सूरज और रमुआ को बुलाया गया. महंत बलदेव सरपंच भी थे. वे पार्टी के खास कार्यकर्ता थे. वे अपनी सख्ती के लिए आसपास के गांवों में ‘दुर्वासा’ के नाम से जाने जाते थे. उन्होंने एक बड़ा सा मंदिर बनवा लिया था चंदे पर, लेकिन उसे अपनी मिल्कीयत ही मानते थे. 10-12 लौंडे वहां पलते थे.

पंचायत के सामने रमुआ ने कहा भी कि हर्जाने की एक कौड़ी भी उसे मंजूर न होगी, क्योंकि गाय बूढ़ी थी और मरने को थी. सूरज ने भी बयान दिया कि उस का विचार गाय को मारने का बिलकुल नहीं था, वह तो उसे भगाना चाहता था. ढेला भी उस ने ढीले हाथ से नींद में फेंका था. परंतु वह गाय को कहां लगा और वह कैसे मर गई, वह अभी तक नहीं समझ पाया.

महंतों और पार्टी के पेशेवर वर्करों को यह आसान रास्ता रास नहीं आ रहा था. सब ने सलाहमशवरे के बाद तय किया कि रमुआ यदि हर्जाना नहीं लेना चाहता तो मजबूर नहीं किया जा सकता है. परंतु गऊ आखिर गऊ है. उस की हत्या करने के लिए सूरज को ‘ब्रह्मभोज’ देना पड़ेगा और गंगा स्नान भी करना होगा… तभी वह ‘शुद्ध’ हो सकेगा. पार्टी के लिए एक मंदिर भी अपनी जमीन पर बनवाना होगा, जिस का पट्टा महंतजी के नाम होगा. सूरज जवान था. थोड़ा पढ़ालिखा भी था.

उस ने पंचों के फैसले को नामंजूर करते हुए जब बहस करनी शुरू की, तो पंच ही नहीं बल्कि चौपाल में बैठे सभी लोग सन्न रह गए. सब की आंखें सरपंच की ओर उठ गईं. सूरज ने निडर हो कर कहा, ‘‘रामू काका की गाय मेरे द्वारा मारी गई. इसलिए उन्हें हर्जाना देने के लिए मैं जिम्मेदार हूं. यह उन का बड़प्पन है कि वे इसे लेने को तैयार नहीं. इस का मतलब यह नहीं कि मैं अपनी जिम्मेदारी से मुंह मोड़ लूं. वे 2 जने हैं. मैं भरी पंचायत में वादा करता हूं कि जब तक काकाकाकी जिंदा रहेंगे, मैं मातापिता की तरह उन की सेवा करता रहूंगा. ‘‘वे जाति से आप सब की नजर में जितने छोटे हैं, खयालों से उतने ही ऊंचे हैं.

वे अपने लिए कुछ नहीं चाहते, जबकि ‘ऊंचे’ कहाने वाले आप सब ठीकगलत सभी कुछ केवल अपने लिए ही चाहते हैं. ‘‘यह ‘ब्रह्मभोज’ क्यों? यह मंदिर क्यों? पार्टी के लिए पैसा क्यों?

इस ‘ब्रह्मभोज’ और मेरी ‘शुद्धि’ में ऐसा कौन सा सीधा रिश्ता है, यह मेरी समझ के बाहर की चीज है. ‘‘रमुआ आप लोगों के लिए अछूत हैं, परंतु उन की जूठन पर जिंदा रहने वाली गाय आप की पूज्या है, आप की नजर में पवित्र है. यह कैसी अक्लमंदी है? अगर पंचायत मुझे यह बात नहीं बताती, तो अपना फैसला वापस ले…’’ पंचों में कुछ खुसुरफुसुर हुई. तभी सरपंच के आसन से महंत बलदेव गरज कर बोले, ‘‘देखते क्या हो, घेर लो इस सूअर के बच्चे को… हाथपैर बांध कर चौपाल के नीम से कस दो. और मुनादी कर दो कि जो भी इधर से गुजरे, इस की खोपड़ी में 2 जूतियां जुड़ता जाए.

एक दिन में धरती पर आ जाएगा.’’ वहां एकदम सन्नाटा छा गया. सूरज का खून खौल उठा, भहें तन गईं. वह तमक कर बोलने को ही था कि बीच में रामू काका आ गए. वे उसे रोक कर बोले, ‘‘बेटा, गुस्से में किया काम अच्छा नहीं होता. फिर जब तुम ने मुझे पिता के बराबर माना है तो मेरा भी फैसला सुन लो.’’ सूरज का पिता और उस की बीवी हैरान से खड़े यह नजारा देख रहे थे. रामू काका पंचों की ओर हाथ जोड़ कर बोले,

‘‘मेरा घर और खेत इसी पल से पंचायत के हैं. जो भी कीमत आप ठीक समझें, दिला दें. मुझे उस में से एक पैसा भी नहीं चाहिए. जो मिलेगा वह ब्रह्मभोज में नहीं, बल्कि ‘ग्राम भोज’ के लिए दे दूंगा. मुझे इस बुढ़ापे में बेटा मिल गया, लक्ष्मी सी बहू मिली. इस के अलावा अब चाहिए ही क्या.’’ चारों ओर खामोशी छा गई. सब देख रहे थे. आंसू बहाता सूरज रामू काका के पैरों पर औंधा पड़ा था. पिता ने अपने बेटे के सिर पर हाथ रख कर उसे उठाया और सीने से लगा लिया. फिर वह पास खड़ी बहू से बोले, ‘‘ससुरजी के पांव छू बेटी.’’ काकी भी लाठी टेकते आ पहुंचीं.

सुंदरी ने आंचल का छोर पकड़ काकाकाकी के पैर छुए. इसी बीच मंडन चौबे कहते सुने गए, ‘‘भैया धरती से धर्म नहीं उठ सकता. गऊ माता को मार कर हाथ तक नहीं धोए और ऊपर से हरिजन के पैर धोधो पी रहे हैं. यह नहीं चलेगा.’’ देखतेदेखते पांचों जने घर की ओर चलने लगे कि महंत के लौंडे डंडों से पांचों की पिटाई करने लगे.

एक लौंडे ने सूरज के कान में कहा, ‘‘तू रात को सुंदरी को हमारे पास भेज दियो, सब सुलटा लेंगे.’’ सुंदरी ने सुन लिया और हामी भर दी. जीने के लिए आखिर कुछ तो देना पड़ेगा. पहले भी देते रहे थे. ये उस के दादा बताया करते थे. वे रजवाड़ों के दिन थे, जो लौट आए थे. अब सुंदरी के हाथों को चूडि़यों की जरूरत नहीं थी. रात को वहशियों ने उसे बुरी तरह हाथों और सारे बदन पर काटा था कि वह महीनों तक पट्टी बांधती रही. सारा पैसा तो इलाज में निकल गया. गनीमत यह रही कि मामला पुलिस में नहीं गया. महंत कई बार कहते, ‘‘सस्ते में छोड़ दिया.’

वो नीली आंखों वाला : वरुण को देखकर क्यों चौंक गई मालिनी – भाग 2

इतना ही नहीं, वरुण ने स्कूल में होने वाली रैगिंग से भी कई बार मालिनी को बचाया. और तो और रैगिंग को स्कूल से खत्म ही करवा दिया, क्योंकि वह हैडब्वौय था और उस के एक प्रार्थनापत्र ने प्रधानाचार्य को उस की बात स्वीकार करने के लिए राजी कर लिया, क्योंकि बात काफी हद तक सभी विद्यार्थियों के हितार्थ की थी.

अगले दिन मालिनी उस नीली आंखों वाले लड़के का स्वेटर स्कूल में लौटाती है, किंतु हिचक के कारण वही दो शब्द गले में फांस से अटके रह जाते हैं, जिस की टीस उस के मन में बनी रहती है.

शीघ्र ही स्कूल में बोर्ड के पेपर शुरू होने वाले हैं. सभी का ध्यान पूरी तरह से पढ़ाई पर केंद्रित हो जाता है, क्योंकि अच्छे अंक प्राप्त करना हर विद्यार्थी का लक्ष्य होता है.

बस मालिनी की वह वरुण से आखिरी मुलाकात बन कर रह गई, क्योंकि 9वीं और 11वीं के पेपर खत्म होते ही उन की छुट्टी कर दी गई थी, क्योंकि पूरे विद्यालय में 10वीं व 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं के लिए उचित व्यवस्था की जा रही थी.

फिर मालिनी चाह कर भी वरुण से नहीं मिल पाई, क्योंकि वह विद्यालय 12वीं तक ही था, जिस के बाद वरुण ने कहीं और दाखिला ले लिया होगा.

समय के साथसाथ मालिनी भी आगे की पढ़ाई में व्यस्त होती चली गई और वह 12वीं क्लास वाला लड़का उस के मन में एक सम्मानित व्यक्ति की छाप छोड़ कर जा चुका था.

धीरेधीरे मालिनी का ग्रेजुएशन पूरा हो गया और उस के पापा ने बड़े ही भले घर में उस का रिश्ता तय कर दिया. बड़े ही सफल बिजनेसमैन मिस्टर गुप्ता, उन्हीं के बेटे शशांक के साथ बात पक्की हो जाती है और आज अपनी खुशहाल शादीशुदा जिंदगी के 20 बरस बिता चुकी है. उस के 2 बेटे और एक प्यारी सी बेटी भी है.

“अरे मालिनी, कहां हो… जल्दी इधर आओ…” तब मालिनी की तंद्रा टूटती है, जो घंटों से खिड़की के पास खड़ेखड़े 20 बरस से हो रही हृदय की बारिश संग उन पुराने पलों को याद कर सराबोर हो रही होती है.

“हां, आती हूं. अरे, आप… इतना कहां भीग गए…?”

“आज कार रास्ते में ही बंद हो गई. बस, फिर वहां से पैदल ही…”

“आप भी बच्चों की तरह जिद करते हैं… फोन कर के औफिस से दूसरी कार या टैक्सी ले लेते.”

“अरे भई, हम बड़ों को भी तो कभीकभी नादानी कर अपने बचपन से मुलाकात कर लेनी चाहिए. वो मिट्टी की सोंधी सी सुगंध, महका रही थी मेरा तन और मन… याद आ रही थीं वो कागज की नावें…”

मालिनी शशांक को चुटकी काटते हुए बोली, “हरसिंगार सी महक उठ रही है…”

“अरे मैडम, आप का आशिक यों ही थोड़ी देर और ऐसे ही खड़ा रहा, तो सच मानिए आप का मरीज हो जाएगा…”

“आप को तो बस हर पल इमरान हाशमी (रोमांस) सूझता है. बच्चे बड़े हो गए हैं…”

“तो क्या हम बूढ़े हो गए हैं… हा… हा… हा… कभी नहीं मालिनी… मेरा शरीर बूढ़ा भले ही हो जाए, पर दिल हमेशा जवान रहेगा… देख लेना… उम्र पचपन की और दिल बचपन का…”

“अब बातें ही होंगी …मेम साहब या गरमागरम चायपकौड़ी भी…”

“बस, अभी लाई…”

“लीजिए हाजिर है… आप के पसंदीदा प्याज के पकौड़े.”

“वाह… मालिनी वाह… मजा आ गया. आज बहुत दिनों बाद ऐसी बारिश हुई और मैं जम कर भीगा…”

वह मन ही मन बोली, ” मैं भी…”

“अरे, एक बात तो तुम्हें बताना ही भूल गया कि कल हमारे औफिस की न्यू ब्रांच का उद्घाटन है, तो हमें सुबह 10 बजे वहां पहुंचना है. काफी चीफ गेस्ट आ रहे हैं. मैं ने खासतौर पर एक बहुत बड़े उद्योगपति हैं, मिस्टर शर्मा… उन्हें आमंत्रित किया है…

“देखो, वे आते भी हैं या नहीं.. बहुत बड़े आदमी हैं…”

मालिनी चेहरे पर प्यारी सी मुसकान लिए शशांक को अपनी बांहों का बधाईरूपी हार पहना देती है.

मालिनी को बांहों में भरते हुए शशांक भी अपना हाल ए दिल बयां करने से पीछे नहीं रहता. वह कहता है, “यह सब तुम्हारे शुभ कदमों का ही प्रताप है.

“मैं बुलंदी की कितनी ही सीढ़ियां हर पल चढ़ता चला गया… न जाने कितनी ख्वाहिशों को होम होना पड़ा. मैं चलता चला चुनौती भरी डगर पर… पाने को आसमां अपना, पूरी उम्मीद के साथ मिलेगा साथ अपनों का, ख्वाब आंखों में संजोए कि किसी दिन उन बिजनेस टायकून के साथ होगा नाम अपना…

“सच अगर तुम मेरी जिंदगी में ना होती, तो मेरा क्या होता…”

मालिनी हंसते हुए बोली, “हुजूर, वही जो मंजूरे खुदा होता…”

“हा… हा… हा.. हा… हाय, मैं मर जावा…”

अगली सुनहरी सुबह मालिनी और शशांक की राह में पलकें बिछाए खड़ी थी. वह कह रहा था, “कमाल लग रही हो… लगता है, सारी कायनात आज मेरी ही नजरों में समाने को आतुर है.
इस लाल सिल्क की कांजीवरम साड़ी में तो तुम नई दुलहन को भी फीका कर दो…”

“चलिए… अब बस भी कीजिए… बच्चे सुन लेंगे…”

“अरे ,सुनने दो… सुनेंगे नहीं तो सीखेंगे कैसे…”

“चलें अब..?”

“वाह, जी वाह, अपना तो सज लीं. अब जरा इस नाचीज पर भी थोड़ा रहम फरमाइए और यह टाई लगाने में हमारी मदद कीजिए.”

“जी, जरूर…”

“सच कहूं मालिनी, आज तुम्हारी आंखों में देख कर फिर मुझे वही 20 साल पुरानी बातें याद आ रही हैं…

“किस तरह मैं ने तुम्हें घुटने के बल बैठ कर गुलाब के साथ प्रपोज किया था…”

“जनाब, अब ख्वाबों की दुनिया से बाहर निकलिए… कहीं आप के चीफ गेस्ट आप के इंतजार में वहीं सूख कर कांटा ना हो जाए…”

“तो आइए, मोहतरमा तशरीफ लाइए…”

शशांक और मालिनी उद्घाटन समारोह के लिए निकलते हैं. वहां पहुंच कर दोनों अपने मुख्य अतिथि मिस्टर शर्मा का स्वागत करने के लिए गेट पर ही पलकें बिछाए खड़े रहते हैं. जैसे ही मि. शर्मा गाड़ी से उतरते हैं, उन्हें देखते ही मालिनी तो जैसे जड़ सी हो जाती है… उधर मिस्टर शर्मा भी…

“आइएआइए मिस्टर वरुण शर्मा… आप ने आज यहां आ कर हमारा सम्मान बढ़ा दिया.”

“अरे नहीं, आप बेतकल्लुफ हो रहे हैं…”

“बाय द वे माय वाइफ मालिनी…”

मालिनी तो सिर्फ उन्हें देख कर ही 20 बरस पीछे लौट गई. नाम तो सुनने की उसे आवश्यकता ही नहीं रही.

Bigg Boss 17: विक्की जैन ने अंकिता लोखंडे को लेकर दिया ये रिएक्शन, सामने आया Video

बिग बौस 17 की ट्रौफी भले ही मुनव्वर फारुखी ने अपने नाम कर ली है. जिनकी जीत के चर्चे भी खूब हो रहे है. लेकिन इसी के अलावा सुर्खियों में अकिंता लोखंडे अब भी बनीं हुई है. लोग उनके पति से उनकी हार के बारे में बात करते हुए नजर आ रहे है ऐसे में मीडिया ने विक्की जैन से पूछा तो उन्हे अंकिता को टॉप बताया है. वहीं, लोग उनका रिएक्शन देख तरह तरह के कमेंट करते नजर आ रहे है.

 

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शो में अंकिता लोखंडे और विक्की जैन का जमकर झगड़ा भी देखने को मिला था. इतना ही नहीं इन दोनों की सास ने एक-दूसरे पर गंभीर आरोप भी लगाए थे. लेकिन अब जब दोनों ही शो से बाहर आ गए है और अंकिता हार गई है तो मीडिया विक्की जैन से सवाल करती हुई नजर आ रही है. कि मुनव्वर की जीत पर आपका क्या कहना है तो उन्होंने कहा कि ‘बेस्ट है’, वही, जब उनसे पूछा गया कि अंकिता जी टॉप पर है? तो उन्होंने कहा कि ‘अंकिता जी मेरे दिल के टौप पर है.’

 

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विक्की के इस वायरल वीडियो पर लोग जमकर कमेंट बरसा रहे है और तरह तरह की बातें करते हुए दिख रहे है. एक यूजर ने लिखा कि पक्का अंकिता से लड़कर आया होगा. दूसरे ने लिखा, ‘मीडिया के सामने दिखावा क्यों कर रहे हो भाई. हम सब ने बिग बौस में देखा है.’ तीसरे यूजर ने लिखा, ‘दोनों ने बैठकर खूब बुराईयां की होगी’. चौथे ने लिखा कि ‘विक्की भईया अच्छे लग रहे है.’

किलर मूव्स दिखाती नजर आई भोजपुरी एक्ट्रेस श्वेता शर्मा, वायरल हुई रील

भोजपुरी की मशहूर एक्ट्रेस श्वेता शर्मा सोशल मीडिया पर काफी चर्चा में रहती हैं. श्वेता शर्मा अक्सर अपने फैंस के लिए तस्वीरें और वीडियो शेयर करती रहती है. ऐसे में श्वेता शर्मा का सोशल मीडिया पर एक वीडियो खूब वायरल हो रहा है. जिसमें हौट अवतार में नजर आ रही है.

 

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आपको बता दें कि श्वेता शर्मा अक्सर बोल्ड लुक में नजर आती है जिसकी झलक वो सोशल मीडिया पर शेयर करती है. अब हाल में श्वेता शर्मा ने एक वीडियो साझा किया है जिसमें वो ब्रा विद शोर्ट्स पहने नजर आ रही है. इस वीडियो में वो डांस मूव्स दिखाती हुई दिख रही है. इस वीडियो को लोग खूब पसंद कर रहे है. इस पर जमकर लाइक्स और कमेंट करते दिख रहे है.

श्वेता शर्मा इस वीडियो में ‘चुरा लिया है तुमने जो दिल को’ गाने पर पर्फोम करते दिख रही है. उनका ये वीडियो आते ही सोशल मीडिया पर धमाल मचा रहा है. श्वेता शर्मा इस वीडियो में किलर स्माइल पास करती हुई नजर आ रही हैं.

 

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श्वेता शर्मा ने ये वीडियो इंस्टाग्राम हैंडल पर शेयर की हैं. इस वीडियो को उनके फैंस काफी पसंद कर रहे है और खूब शेयर भी कर रहे है. बता दें श्वेता शर्मा वीडियो के साथ साथ फोटोज खूब शेयर करती है. जिस पर उनके फैंस खूब प्यार लूटाते हुए नजर आते है. बताते चले कि श्वेता शर्मा के इंस्टाग्राम पर अच्छे खासे फोलोअर्स है. उनके अबतक पांच लाख से ज्यादा फोलोअर्स है. वही, श्वेता शर्मा भोजपुरी के तमाम गानों में नजर आ चुकी हैं श्वेता शर्मा ‘भौजी के देवरा’ और ‘करंट कमरिया’ जैसे गानों में से अपनी छाप छोड़ चुकी है.

क्या गुरुघंटाल है विवेक बिंद्रा

भटके हुए यूथ को बेवकूफ बनाना आसान होता है चाहे धर्म के नाम पर हो या कैरियर के नाम पर. आजकल इन्हीं दोनों का इस्तेमाल कर सोशल मीडिया पर मोटिवेशन के नाम पर अपनी दुकान चलाने वाले इन्फ्लुएंसरों की फौज खड़ी हो गई है जो बड़ीबड़ी बातें कर के करोड़ों छाप रहे हैं. ऐसा ही एक मोटिवेशनल स्पीकर विवेक बिंद्रा है जो अब विवादों में है.

पैसा कमाना गलत नहीं, लेकिन गलत हो कर पैसा कमाना गलत है. यह इस बात पर भी डिपैंड करता है कि आप का मीडियम क्या है और उन मीडियमों से आप कैसे सक्सैस हासिल करते हैं. आजकल यूथ ज्यादा और जल्दी पैसा कमाना चाहते हैं. सब को बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमना है, बड़ा घर चाहिए, नाम चाहिए, इज्जत चाहिए और ये सब मिल जाए तो एक अच्छी लड़की या लड़का किसे नहीं चाहिए भला. पर यह होगा कैसे, यह सवाल बारबार परेशान करता है. कभी यह सवाल नैया पार तो लगाता है पर बहुत बार इस से जू?ा रहा यूथ जल्दी किसी के लपेटे में भी आ जाता है.

यही कारण भी है कि इन को लपेटे में लेने के लिए सोशल मीडिया पर गुलाटियां खाने वाले मोटिवेशनल इन्फ्लुएंसर भरे पड़े हैं, जो खुलमखुल्ला लाखों रुपए महीने के कमाने के तरीके बताते हैं. आखिर ये शौर्टकट तरीके हैं क्या और इन की संभावनाएं कितनी हैं? क्या ये तरीके सही भी हैं?

इन्फ्लुएंसर विवेक बिंद्रा की कला

41 साल का विवेक बिंद्रा खुद को ‘डा. विवेक बिंद्रा : मोटिवेशनल स्पीकर’ के नाम से इंट्रोड्यूस करता है. इसी नाम से उस ने यूट्यूब चैनल बनाया हुआ है. इस चैनल में लगभग 2 करोड़ 13 लाख सब्सक्राइबर हैं. वहीं उस की हर वीडियो को लाखों लोग देखते हैं. सम?ा जा सकता है कि किस हद तक युवाओं के बीच इस ने पैठ बनाई है. इस के वीडियो के थंबनेल पर लिखा रहता है कि ‘फलाना अमीर कैसे बने’, ‘पैसों में खेलोगे’, ‘करोड़ों कैसे कमाएं’. यह युवा की इच्छा की नब्ज पर हाथ रखता है जिस के सपने वह युवा देखना शुरू कर देता है जिस की हलकी भूरी मूछदाढ़ी अभी आनी शुरू हुई है.

उस के बताए उदाहरण इतने लच्छेदार होते हैं कि कोई भी ट्रैप में फंस सकता है. जैसे, बिंद्रा ने एक वीडियो ‘चार्ली मुंगर’ पर बनाया है जो अमेरिकी बिसनैसमैन और इन्वैस्टर है. बिंद्रा बंदर की तरह उछलउछल कर बोलता है कि मुंगर 7 साल की उम्र में 10 घंटे ग्रौसरी की दुकान पर काम कर के पैसे कमाया करता था और वह 10 से 12 साल की उम्र तक आतेआते अपनी क्लास के बच्चों के होमवर्क, असाइनमैंट बना कर पैसे कमाया करता था.

बेसिरपैर के दावे

सवाल यह कि क्या किसी स्कूल का टीचर ऐसे तरीके बताएगा पैसे कमाने के? दूसरा, क्या कोई अपने 7 साल के बच्चे को इस उम्र में काम पर भेजेगा जब तक बड़ी मजबूरी न हो? दरअसल हकीकत यह है कि मुंगर ने अपनी टीनएज उम्र में जिस बफेट एंड सन ग्रौसरी शौप में काम किया उस का मालिक वारेन बफेट के दादा अर्नेस्ट पी बफेट थे. आगे चल कर मुंगर को वारेन बफेट की बर्कशायर हैथवे कंपनी का उपाध्यक्ष बनाया जाता है. मुंगर के दादा और पिता दोनों ही वकील थे. मुंगर का परिवार फाइनैंशियली व सोशियली रूप से पावरफुल था.

इस का प्रूफ यह कि जब चार्ली मुंगर ने अपने पिता के अल्मा मेटर,  हार्वर्ड लौ स्कूल में दाखिला लेने की कोशिश की तो डीन ने उसे ऐक्सैप्ट नहीं किया क्योंकि मुंगर ने ग्रेजुएशन की डिग्री पूरी नहीं की थी लेकिन हार्वर्ड लौ के पूर्व डीन और मुंगर परिवार के मित्र रोस्को पाउंड के आपसी संबंध अच्छे थे और उन के बीच हुई बातचीत के बाद कालेज के डीन नरम पड़ गए. बिंद्रा अपने वीडियो में बातों को तोड़मरोड़ कर बताता है. यही उस की कला है.

बिंद्रा ने अपने चैनल पर दावा किया है कि वह 10 दिनों में एमबीए कराएगा. एमबीए सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं क्योंकि इस डिग्री की अहमियत जितनी है उस से ज्यादा इस की फीस है. फीस इतनी कि बाप को सड़क पर आना पड़ जाए. एमिटी और शारदा वाले तो खाल खींचे बगैर बात भी नहीं करते.

एमबीए एक प्रोफैशनल डिग्री है जिसे तभी कराया जा सकता है जब उस संस्था को यूजीसी से सर्टिफिकेशन प्राप्त हो. अगर आप किसी सरकारी यूनिवर्सिटी से भी एमबीए करने की सोचेंगे तो आप से पहले वह आप की क्वालिफिकेशन पूछेगी, आप का एग्जाम होगा और उस के बावजूद 1 प्रतिशत चांस है कि आप को पढ़ने को मिले वह भी तब जब इस की फीस दो से तीन लाख रुपए देने की आप में हिम्मत हो.

सवाल यह कि 2 साल का कोर्स 10 दिनों में औनलाइन कोई कैसे करा सकता है? कोई करा सकता है तो इस की औथेंटिसिटी क्या है? इस में क्या सिखाया जाता है और इस की कितनी वैल्यू है? सवाल यह भी कि क्या बिंद्रा कोई जादूगर है जो पलक झपकते एमबीए बना देता है?

असल में यह कोई एमबीए है ही नहीं. विवेक बिंद्रा, जो यूट्यूबर कम और एंटरप्रेन्योर ज्यादा कहलवाना पसंद करता है, का ‘बड़ा बिजनैस प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से एक कंपनी है जो गोलमोल बातें कर बिजनैस स्ट्रैटेजी सिखाता है. वह मल्टी मार्केटिंग के नाम पर कोर्स बेचता है और पैसे कमाने का तरीका बताता है. यानी, आप का हजारों रुपए इस कोर्स में फंस चुका है और अगर अपना पैसा निकालना चाहते हैं तो और लोगों को इस जाल में फंसाइए. इसे ही पिरामिड स्कीम कहा जाता है.

इसे और आसान भाषा में सम?ाना है तो आप ने यूनिवर्सिटी, कालेज, स्कूल और नुक्कड़ों के आसपास सूटबूट पहने, टाई लगाए कुछ युवाओं को कोनोंखोंपचों में कुछ खुसरफुसर करते देखा होगा. ये लोग नैटवर्किंग मार्केट वाले कहलाते हैं. लंबीचौड़ी हांकते हैं, ?ाटपट अमीर बनने के नुस्खे बांटते हैं. आज बाइक-कार, कलपरसों मकान सब 10 मिनट की बात में दिलाने के सपने दिखा देते हैं. इन का लैवल डायमंड कैटेगरी तक बनने का होता है जो सब से ऊंचा पद होता है, जो ऊपर बैठ कर मलाई खाता है.

नाकामयाबी की गिरफ्त

विवेक बिंद्रा को देखनेसुनने वाले वे नौजवान हैं जो अपनेआप को जीवन में नाकामयाब सम?ाते हैं. उन्हें यह बताया जाता है कि बिजनैस से गरीब, अनपढ़ आदमी भी इन्वैस्टमैंट कर के महीने के लाखोंकरोड़ों रुपए कमा सकता है, एक कामयाब एंटरप्रेन्योर बन सकता है. बल्कि, सच यह है कि इन के पास कामयाब लोगों का कोई उदाहरण नहीं दिखता और जिसे सामने लाया जाता है वह खुद इन में से ही एक होता है. इन की भाषा बिलकुल दस का बीस, बीस का पचास, पचास का सौ जैसी होती है, बिलकुल वैसी जैसे दिल्ली के लालकिले के सामने लगने वाले चोर बाजार में मुंह में गुटका दबाए 20-21 साल का लड़का अपना सामान बेचने के लिए चिल्लाता है.

फैक्ट यह है कि देश में बेरोजगारी पिछले 50 वर्षों में आज सब से अधिक है. जिस हिसाब से जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई है उस के हिसाब से नौकरियों को नहीं बढ़ाया गया है. बड़ीबड़ी कंपनियां सरकारी क्षेत्र और छोटे व्यापारियों के बाजार पर नियंत्रण के लिए अपने बाजार का विस्तार करने में लगे हुए हैं.

इस का मतलब यह हुआ कि एक आदमी की कामयाबी हजारोंलाखों लोगों की बरबादी से गुजरती है. उदहारण के लिए एक कुरसी है और हजारों लोगों से पूछा जाता है आप को कितनी चाहिए. हरेक व्यक्ति एक ही बोलता है क्योंकि चाहिए उसे एक ही और वह रेस में दौड़ पड़ता है. दौड़ के बाद एक व्यक्ति को कुरसी मिलती है और बाकी लोग बाहर हो जाते हैं. बिजनैस तभी चलेगा जब बाकियों का बिजनैस कम हो या वे बरबाद हो जाएं क्योंकि दर्शक और उपभोक्ताओं की संख्या सीमित है.

बाजार के इसी नियम से कई लोग बनते हैं और करोड़ों लोग बिखरते हैं. ऐसी समस्याओं के बीच विवेक बिंद्रा जैसे लोग ठगी का जाल बुन कर सैकड़ोंकरोड़ों का मुनाफा बनाते हैं. आजकल स्टार्टअप, एंटरप्रेन्योर का शोर मचा पड़ा है. सब को रातोंरात स्टार बनाने की बात की जा रही है. वैसे ही जैसे आप इंस्टाग्राम पर अपनी तसवीर के साथ शाहरुख खान का गाना लगा कर फील करते हैं और हकीकत उस से बहुत अलग होती है.

टाटा, अंबानी, बिड़ला आदि भारत के सब से बड़े बिजनैसमेन माने जाते हैं. ये बड़े कारखाने चलाते हैं, प्रोडक्शन करते हैं, कुछ मैटीरियल तैयार करते हैं जिन्हें लोग कंज्यूम करते हैं जिस पर लोग मुनाफा कमाते हैं. बिंद्रा की कंपनी कोई प्रोडक्शन नहीं करती. वह लोगों को बिजनैस आइडिया बेच कर अपना धंधा चलाती है.

विवेक बिंद्रा आज के समय में जन्मे बेरोजगारों को भटकाने का काम करता है. यह व्यक्ति मार्केट में जोखिम उठा कर लोगों को पैसे लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है, इस में गलत नहीं पर उस के बाद उन की बदहाली से अपना मुंह फेर लेना किसी धोखे से कम नहीं. आप यूट्यूब पर ऐसे कई वीडियो देख सकते हैं जिन में लोगों का रुपया वापस नहीं मिलने की बात सामने आती है. ऐसी परिस्थिति में लोग और डिप्रैशन का शिकार होते हैं.

विवेक बिंद्रा एक न्यूज चैनल में इंटरव्यू देते कहता है, ‘‘बाजार को जो चाहिए वह हमारा स्कूली सिस्टम नहीं दे पाता.’’ सही है स्कूल में हर चीज नहीं सिखाई जाती, बेशक, यह लूटमार का अड्डा नहीं बन सकता, फ्रौड करने की दुकान तो बिलकुल नहीं बनना चाहिए. स्कूलों में 10 दिनों में एमबीए बनना और बनाने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती.

धर्म के नाम पर सब बिकता है

बिंद्रा जैसे लोग अपने व्यापार में धर्म व आस्था का भरपूर इस्तेमाल करना जानते हैं जिस से लोग इन की गलत बातों का भी सही मतलब सम?ों. यह एक तरह का जस्टिफिकेशन बन जाता है जिसे लोग ऐक्सैप्ट कर लेते हैं. हकीकत में यह इन के जाल बिछाने का एक रास्ता है. धर्म के मामले में यूथ टची होने लगा है. उन्हें मूर्ख बनाना पहले से कहीं आसान हो गया है जिस का फायदा इन्फ्लुएंसर उठाने लगे हैं. (मुक्ता के दिसंबर 2023 इशू में एल्विश यादव का उदाहरण इसी संबंध में विस्तार से बताया गया).

दरअसल, पढ़नेलिखने की आदत कम होने से युवाओं की सोचनेसम?ाने की क्षमता कम होती जा रही है. वह किसी भी बेबुनियादी बात को सच मान लेते हैं खासकर तब जब उन्हें इसे धर्म के रैपर में लपेट कर दिया गया हो.

विवेक बिंद्रा वर्णव्यवस्था के संबंध में एक वायरल वीडियो में कहता है कि समाज में कुछ लोग आदेश को पालन करवाने और कुछ लोग आदेश का पालन करने में ज्यादा सक्षम होते हैं. एक तरफ आरक्षण को बिंद्रा गलत मानता है और दूसरी तरफ जाति आधारित शोषण पर अपनी चुप्पी बनाए रखता है. हकीकत में इस का जाति, गरीबी और किसी भी कारण से पिछड़े लोगों की समस्या से कोई लेनादेना नहीं है बल्कि हर साल यह अपने मुनाफे को कैसे कई गुना बढ़ा सके, यह इस की प्रायोरिटी रहती है.

घरेलू विवाद में फंसा

आज विवेक बिंद्रा अपनी निजी जिंदगी के कारण भी सुर्खियों में बना पड़ा है. 6 दिसंबर, 2023 को वह अपनी दूसरी पत्नी यानिका से विवाह करता है, जिस के अगले दिन बिंद्रा पर अपनी पत्नी से मारपीट और बदसलूकी का आरोप लगता है. एक वीडियो वायरल है जिस में यानिका बिंद्रा से उसे जाने देने की गुहार लगाती दिखाई दे रही है.

पहली पत्नी गीतिका के साथ भी बिंद्रा पर मारपीट करने का आरोप लगा था जिस के बाद उस ने बिंद्रा से तलाक ले लिया था. याद रहे, बिंद्रा एक मोटिवेशनल इन्फ्लुएंसर है जो युवाओं को ‘मोटिवेट’ करता है. अब सम?ों पत्नी पर डोमैस्टिक वायलैंस करने वाला कैसे बड़ेबड़े सैमिनारों के स्टेज पर फर्जी बातें करता रहा होगा? बिंद्रा अपनी दोनों पत्नियों के साथ मारपीट का आरोपी है. कई लोगों ने इस पर फ्रौड करने का आरोप लगाया है.

फ्रौड करने का आरोप

महेशवरी पेरी, जो ‘360 कैरियर’ के संस्थापक हैं, बताते हैं कि बिंद्रा की कंपनी की एक साल की कमाई 172 करोड़ रुपए है और 2 साल में कंपनी ने 308 करोड़ रुपए कमाए हैं. यह एक मल्टीलैवल मार्केटिंग कंपनी है. यह लोगों से ऐसे वादे करता है जिन को पूरा नहीं किया जा सकता. यह लोगों को महीने के लाख से 20 लाख कमाने का तरीका बताता है जबकि इस के खुद के एंपलौय मात्र 20-30 हजार रुपए महीने में काम कर रहे हैं.

इन की बातों में आप को एमबीए, एंटरप्रेन्योर, इंटरनैशनल कंसल्टैंट जैसे शब्द दिखेंगे जो छोटे शहरों के युवाओं के लिए बड़े सपने जैसा है. बिंद्रा की दुकान सपने बेच कर चलती है क्योंकि उस के बिना यह चलेगी ही नहीं. सोचिए, इस की जगह अगर वह स्किल डैवलपमैंट का इस्तेमाल करता तो कोई इतना ध्यान ही न देता.

सोशल मीडिया ने रास्ता दिखाने से ज्यादा लोगों को भटकाया है. जो सोशल मीडिया हमारी ताकत हो सकता था वह आज सोसाइटी को कमजोर व खोखला कर रहा है. लोग अपने आसपास के जीवन से दूर होते जा रहे हैं. लोगों को अकेला रहना बेहतर लगने लगा है.

देश में शिक्षा की स्थिति काफी खराब है. स्कूल पूरा होने से पहले ही स्टूडैंट्स का एक बड़ा हिस्सा बाहर निकल जाता है. पढ़ेलिखे लोगों को भी अच्छी नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है. कहने का मतलब एकदम साफ यह है कि देश में कोई ऐसा सिस्टम ही नहीं है जो युवाओं को रास्ता दिखा सके और इसी का फायदा बिंद्रा जैसे इन्फ्लुएंसर उठा रहे हैं.

सा कमाना गलत नहीं, लेकिन गलत हो कर पैसा कमाना गलत है. यह इस बात पर भी डिपैंड करता है कि आप का मीडियम क्या है और उन मीडियमों से आप कैसे सक्सैस हासिल करते हैं. आजकल यूथ ज्यादा और जल्दी पैसा कमाना चाहते हैं. सब को बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमना है, बड़ा घर चाहिए, नाम चाहिए, इज्जत चाहिए और ये सब मिल जाए तो एक अच्छी लड़की या लड़का किसे नहीं चाहिए भला. पर यह होगा कैसे, यह सवाल बारबार परेशान करता है. कभी यह सवाल नैया पार तो लगाता है पर बहुत बार इस से जूझ रहा यूथ जल्दी किसी के लपेटे में भी आ जाता है.

यही कारण भी है कि इन को लपेटे में लेने के लिए सोशल मीडिया पर गुलाटियां खाने वाले मोटिवेशनल इन्फ्लुएंसर भरे पड़े हैं, जो खुलमखुल्ला लाखों रुपए महीने के कमाने के तरीके बताते हैं. आखिर ये शौर्टकट तरीके हैं क्या और इन की संभावनाएं कितनी हैं? क्या ये तरीके सही भी हैं?

इन्फ्लुएंसर विवेक बिंद्रा की कला

41 साल का विवेक बिंद्रा खुद को ‘डा. विवेक बिंद्रा : मोटिवेशनल स्पीकर’ के नाम से इंट्रोड्यूस करता है. इसी नाम से उस ने यूट्यूब चैनल बनाया हुआ है. इस चैनल में लगभग 2 करोड़ 13 लाख सब्सक्राइबर हैं. वहीं उस की हर वीडियो को लाखों लोग देखते हैं. समझ जा सकता है कि किस हद तक युवाओं के बीच इस ने पैठ बनाई है. इस के वीडियो के थंबनेल पर लिखा रहता है कि ‘फलाना अमीर कैसे बने’, ‘पैसों में खेलोगे’, ‘करोड़ों कैसे कमाएं’. यह युवा की इच्छा की नब्ज पर हाथ रखता है जिस के सपने वह युवा देखना शुरू कर देता है जिस की हलकी भूरी मूछदाढ़ी अभी आनी शुरू हुई है.

उस के बताए उदाहरण इतने लच्छेदार होते हैं कि कोई भी ट्रैप में फंस सकता है. जैसे, बिंद्रा ने एक वीडियो ‘चार्ली मुंगर’ पर बनाया है जो अमेरिकी बिसनैसमैन और इन्वैस्टर है. बिंद्रा बंदर की तरह उछलउछल कर बोलता है कि मुंगर 7 साल की उम्र में 10 घंटे ग्रौसरी की दुकान पर काम कर के पैसे कमाया करता था और वह 10 से 12 साल की उम्र तक आतेआते अपनी क्लास के बच्चों के होमवर्क, असाइनमैंट बना कर पैसे कमाया करता था.

बेसिरपैर के दावे

सवाल यह कि क्या किसी स्कूल का टीचर ऐसे तरीके बताएगा पैसे कमाने के? दूसरा, क्या कोई अपने 7 साल के बच्चे को इस उम्र में काम पर भेजेगा जब तक बड़ी मजबूरी न हो? दरअसल हकीकत यह है कि मुंगर ने अपनी टीनएज उम्र में जिस बफेट एंड सन ग्रौसरी शौप में काम किया उस का मालिक वारेन बफेट के दादा अर्नेस्ट पी बफेट थे. आगे चल कर मुंगर को वारेन बफेट की बर्कशायर हैथवे कंपनी का उपाध्यक्ष बनाया जाता है. मुंगर के दादा और पिता दोनों ही वकील थे. मुंगर का परिवार फाइनैंशियली व सोशियली रूप से पावरफुल था.

इस का प्रूफ यह कि जब चार्ली मुंगर ने अपने पिता के अल्मा मेटर,  हार्वर्ड लौ स्कूल में दाखिला लेने की कोशिश की तो डीन ने उसे ऐक्सैप्ट नहीं किया क्योंकि मुंगर ने ग्रेजुएशन की डिग्री पूरी नहीं की थी लेकिन हार्वर्ड लौ के पूर्व डीन और मुंगर परिवार के मित्र रोस्को पाउंड के आपसी संबंध अच्छे थे और उन के बीच हुई बातचीत के बाद कालेज के डीन नरम पड़ गए. बिंद्रा अपने वीडियो में बातों को तोड़मरोड़ कर बताता है. यही उस की कला है.

बिंद्रा ने अपने चैनल पर दावा किया है कि वह 10 दिनों में एमबीए कराएगा. एमबीए सुनते ही कान खड़े हो जाते हैं क्योंकि इस डिग्री की अहमियत जितनी है उस से ज्यादा इस की फीस है. फीस इतनी कि बाप को सड़क पर आना पड़ जाए. एमिटी और शारदा वाले तो खाल खींचे बगैर बात भी नहीं करते.

एमबीए एक प्रोफैशनल डिग्री है जिसे तभी कराया जा सकता है जब उस संस्था को यूजीसी से सर्टिफिकेशन प्राप्त हो. अगर आप किसी सरकारी यूनिवर्सिटी से भी एमबीए करने की सोचेंगे तो आप से पहले वह आप की क्वालिफिकेशन पूछेगी, आप का एग्जाम होगा और उस के बावजूद 1 प्रतिशत चांस है कि आप को पढ़ने को मिले वह भी तब जब इस की फीस दो से तीन लाख रुपए देने की आप में हिम्मत हो.

सवाल यह कि 2 साल का कोर्स 10 दिनों में औनलाइन कोई कैसे करा सकता है? कोई करा सकता है तो इस की औथेंटिसिटी क्या है? इस में क्या सिखाया जाता है और इस की कितनी वैल्यू है? सवाल यह भी कि क्या बिंद्रा कोई जादूगर है जो पलक झपकते एमबीए बना देता है?

असल में यह कोई एमबीए है ही नहीं. विवेक बिंद्रा, जो यूट्यूबर कम और एंटरप्रेन्योर ज्यादा कहलवाना पसंद करता है, का ‘बड़ा बिजनैस प्राइवेट लिमिटेड’ नाम से एक कंपनी है जो गोलमोल बातें कर बिजनैस स्ट्रैटेजी सिखाता है. वह मल्टी मार्केटिंग के नाम पर कोर्स बेचता है और पैसे कमाने का तरीका बताता है. यानी, आप का हजारों रुपए इस कोर्स में फंस चुका है और अगर अपना पैसा निकालना चाहते हैं तो और लोगों को इस जाल में फंसाइए. इसे ही पिरामिड स्कीम कहा जाता है.

इसे और आसान भाषा में सम?ाना है तो आप ने यूनिवर्सिटी, कालेज, स्कूल और नुक्कड़ों के आसपास सूटबूट पहने, टाई लगाए कुछ युवाओं को कोनोंखोंपचों में कुछ खुसरफुसर करते देखा होगा. ये लोग नैटवर्किंग मार्केट वाले कहलाते हैं. लंबीचौड़ी हांकते हैं, झटपट अमीर बनने के नुस्खे बांटते हैं. आज बाइक-कार, कलपरसों मकान सब 10 मिनट की बात में दिलाने के सपने दिखा देते हैं. इन का लैवल डायमंड कैटेगरी तक बनने का होता है जो सब से ऊंचा पद होता है, जो ऊपर बैठ कर मलाई खाता है.

नाकामयाबी की गिरफ्त

विवेक बिंद्रा को देखनेसुनने वाले वे नौजवान हैं जो अपनेआप को जीवन में नाकामयाब सम?ाते हैं. उन्हें यह बताया जाता है कि बिजनैस से गरीब, अनपढ़ आदमी भी इन्वैस्टमैंट कर के महीने के लाखोंकरोड़ों रुपए कमा सकता है, एक कामयाब एंटरप्रेन्योर बन सकता है. बल्कि, सच यह है कि इन के पास कामयाब लोगों का कोई उदाहरण नहीं दिखता और जिसे सामने लाया जाता है वह खुद इन में से ही एक होता है. इन की भाषा बिलकुल दस का बीस, बीस का पचास, पचास का सौ जैसी होती है, बिलकुल वैसी जैसे दिल्ली के लालकिले के सामने लगने वाले चोर बाजार में मुंह में गुटका दबाए 20-21 साल का लड़का अपना सामान बेचने के लिए चिल्लाता है.

फैक्ट यह है कि देश में बेरोजगारी पिछले 50 वर्षों में आज सब से अधिक है. जिस हिसाब से जनसंख्या में बढ़ोतरी हुई है उस के हिसाब से नौकरियों को नहीं बढ़ाया गया है. बड़ीबड़ी कंपनियां सरकारी क्षेत्र और छोटे व्यापारियों के बाजार पर नियंत्रण के लिए अपने बाजार का विस्तार करने में लगे हुए हैं.

इस का मतलब यह हुआ कि एक आदमी की कामयाबी हजारोंलाखों लोगों की बरबादी से गुजरती है. उदहारण के लिए एक कुरसी है और हजारों लोगों से पूछा जाता है आप को कितनी चाहिए. हरेक व्यक्ति एक ही बोलता है क्योंकि चाहिए उसे एक ही और वह रेस में दौड़ पड़ता है. दौड़ के बाद एक व्यक्ति को कुरसी मिलती है और बाकी लोग बाहर हो जाते हैं. बिजनैस तभी चलेगा जब बाकियों का बिजनैस कम हो या वे बरबाद हो जाएं क्योंकि दर्शक और उपभोक्ताओं की संख्या सीमित है.

बाजार के इसी नियम से कई लोग बनते हैं और करोड़ों लोग बिखरते हैं. ऐसी समस्याओं के बीच विवेक बिंद्रा जैसे लोग ठगी का जाल बुन कर सैकड़ोंकरोड़ों का मुनाफा बनाते हैं. आजकल स्टार्टअप, एंटरप्रेन्योर का शोर मचा पड़ा है. सब को रातोंरात स्टार बनाने की बात की जा रही है. वैसे ही जैसे आप इंस्टाग्राम पर अपनी तसवीर के साथ शाहरुख खान का गाना लगा कर फील करते हैं और हकीकत उस से बहुत अलग होती है.

टाटा, अंबानी, बिड़ला आदि भारत के सब से बड़े बिजनैसमेन माने जाते हैं. ये बड़े कारखाने चलाते हैं, प्रोडक्शन करते हैं, कुछ मैटीरियल तैयार करते हैं जिन्हें लोग कंज्यूम करते हैं जिस पर लोग मुनाफा कमाते हैं. बिंद्रा की कंपनी कोई प्रोडक्शन नहीं करती. वह लोगों को बिजनैस आइडिया बेच कर अपना धंधा चलाती है.

विवेक बिंद्रा आज के समय में जन्मे बेरोजगारों को भटकाने का काम करता है. यह व्यक्ति मार्केट में जोखिम उठा कर लोगों को पैसे लगाने के लिए प्रोत्साहित करता है, इस में गलत नहीं पर उस के बाद उन की बदहाली से अपना मुंह फेर लेना किसी धोखे से कम नहीं. आप यूट्यूब पर ऐसे कई वीडियो देख सकते हैं जिन में लोगों का रुपया वापस नहीं मिलने की बात सामने आती है. ऐसी परिस्थिति में लोग और डिप्रैशन का शिकार होते हैं.

विवेक बिंद्रा एक न्यूज चैनल में इंटरव्यू देते कहता है, ‘‘बाजार को जो चाहिए वह हमारा स्कूली सिस्टम नहीं दे पाता.’’ सही है स्कूल में हर चीज नहीं सिखाई जाती, बेशक, यह लूटमार का अड्डा नहीं बन सकता, फ्रौड करने की दुकान तो बिलकुल नहीं बनना चाहिए. स्कूलों में 10 दिनों में एमबीए बनना और बनाने की ट्रेनिंग नहीं दी जाती.

धर्म के नाम पर सब बिकता है

बिंद्रा जैसे लोग अपने व्यापार में धर्म व आस्था का भरपूर इस्तेमाल करना जानते हैं जिस से लोग इन की गलत बातों का भी सही मतलब समझें. यह एक तरह का जस्टिफिकेशन बन जाता है जिसे लोग ऐक्सैप्ट कर लेते हैं. हकीकत में यह इन के जाल बिछाने का एक रास्ता है. धर्म के मामले में यूथ टची होने लगा है. उन्हें मूर्ख बनाना पहले से कहीं आसान हो गया है जिस का फायदा इन्फ्लुएंसर उठाने लगे हैं. (मुक्ता के दिसंबर 2023 इशू में एल्विश यादव का उदाहरण इसी संबंध में विस्तार से बताया गया).

दरअसल, पढ़नेलिखने की आदत कम होने से युवाओं की सोचनेसमझने की क्षमता कम होती जा रही है. वह किसी भी बेबुनियादी बात को सच मान लेते हैं खासकर तब जब उन्हें इसे धर्म के रैपर में लपेट कर दिया गया हो.

विवेक बिंद्रा वर्णव्यवस्था के संबंध में एक वायरल वीडियो में कहता है कि समाज में कुछ लोग आदेश को पालन करवाने और कुछ लोग आदेश का पालन करने में ज्यादा सक्षम होते हैं. एक तरफ आरक्षण को बिंद्रा गलत मानता है और दूसरी तरफ जाति आधारित शोषण पर अपनी चुप्पी बनाए रखता है. हकीकत में इस का जाति, गरीबी और किसी भी कारण से पिछड़े लोगों की समस्या से कोई लेनादेना नहीं है बल्कि हर साल यह अपने मुनाफे को कैसे कई गुना बढ़ा सके, यह इस की प्रायोरिटी रहती है.

घरेलू विवाद में फंसा

आज विवेक बिंद्रा अपनी निजी जिंदगी के कारण भी सुर्खियों में बना पड़ा है. 6 दिसंबर, 2023 को वह अपनी दूसरी पत्नी यानिका से विवाह करता है, जिस के अगले दिन बिंद्रा पर अपनी पत्नी से मारपीट और बदसलूकी का आरोप लगता है. एक वीडियो वायरल है जिस में यानिका बिंद्रा से उसे जाने देने की गुहार लगाती दिखाई दे रही है.

पहली पत्नी गीतिका के साथ भी बिंद्रा पर मारपीट करने का आरोप लगा था जिस के बाद उस ने बिंद्रा से तलाक ले लिया था. याद रहे, बिंद्रा एक मोटिवेशनल इन्फ्लुएंसर है जो युवाओं को ‘मोटिवेट’ करता है. अब समझें पत्नी पर डोमैस्टिक वायलैंस करने वाला कैसे बड़ेबड़े सैमिनारों के स्टेज पर फर्जी बातें करता रहा होगा? बिंद्रा अपनी दोनों पत्नियों के साथ मारपीट का आरोपी है. कई लोगों ने इस पर फ्रौड करने का आरोप लगाया है.

फ्रौड करने का आरोप

महेशवरी पेरी, जो ‘360 कैरियर’ के संस्थापक हैं, बताते हैं कि बिंद्रा की कंपनी की एक साल की कमाई 172 करोड़ रुपए है और 2 साल में कंपनी ने 308 करोड़ रुपए कमाए हैं. यह एक मल्टीलैवल मार्केटिंग कंपनी है. यह लोगों से ऐसे वादे करता है जिन को पूरा नहीं किया जा सकता. यह लोगों को महीने के लाख से 20 लाख कमाने का तरीका बताता है जबकि इस के खुद के एंपलौय मात्र 20-30 हजार रुपए महीने में काम कर रहे हैं.

इन की बातों में आप को एमबीए, एंटरप्रेन्योर, इंटरनैशनल कंसल्टैंट जैसे शब्द दिखेंगे जो छोटे शहरों के युवाओं के लिए बड़े सपने जैसा है. बिंद्रा की दुकान सपने बेच कर चलती है क्योंकि उस के बिना यह चलेगी ही नहीं. सोचिए, इस की जगह अगर वह स्किल डैवलपमैंट का इस्तेमाल करता तो कोई इतना ध्यान ही न देता.

सोशल मीडिया ने रास्ता दिखाने से ज्यादा लोगों को भटकाया है. जो सोशल मीडिया हमारी ताकत हो सकता था वह आज सोसाइटी को कमजोर व खोखला कर रहा है. लोग अपने आसपास के जीवन से दूर होते जा रहे हैं. लोगों को अकेला रहना बेहतर लगने लगा है.

देश में शिक्षा की स्थिति काफी खराब है. स्कूल पूरा होने से पहले ही स्टूडैंट्स का एक बड़ा हिस्सा बाहर निकल जाता है. पढ़ेलिखे लोगों को भी अच्छी नौकरी मिलना बहुत मुश्किल है. कहने का मतलब एकदम साफ यह है कि देश में कोई ऐसा सिस्टम ही नहीं है जो युवाओं को रास्ता दिखा सके और इसी का फायदा बिंद्रा जैसे इन्फ्लुएंसर उठा रहे हैं.

मेरे पति को शराब पीने की लत है, कैसे इसे कंट्रोल करूं?

सवाल 

मैं 34 साल की औरत हूं और हरियाणा के फरीदाबाद इलाके में रहती हूं. मेरे पति की उम्र 38 साल है और वे एक फैक्टरी में गार्ड हैं. हमारे 3 बच्चे हैं. पिछले कुछ समय से मेरे पति को शराब पी कर घर आने की आदत पड़ गई है और वे हम सब से लड़ते भी हैं. वे बच्चों को भी नहीं बख्शते हैं. समझाने पर वे कहते हैं कि ‘मैं इस घर का मालिक हूं, जो चाहे करूंगा’.

मुझे लगता है कि उन्हें किसी बात का तनाव रहता है. पर उन की शराब पीने की आदत का बुरा असर हमारे बच्चों पर भी पड़ रहा है. इस समस्या का क्या हल हो सकता है?

जवाब

आप के पति पियक्कड़ों की संगत में फंस गए हैं. मर्दानगी दिखाने के लिए ऐसे मर्द ही शराब पी कर घर में कलह करते हैं. आप को सब्र और समझ से काम लेना होगा, क्योंकि इस का असर आप की गृहस्थी पर पड़ रहा है. रोजरोज पति को शराब पीने को ले कर रोकें और टोकें नहीं और न ही उसे ताने मारें. लड़ाई झगड़ा और कलह इस का हल नहीं है और न ही बहुत ज्यादा समझाने से कोई फायदा होगा.

कोशिश करें कि पति को अगर कोई तनाव है, तो उसे समझे और दूर करने की कोशिश करें. उसे शराब पीने के नुकसान बताएं कि इस से सेहत, इज्जत और पैसे का नुकसान है. वह राजी हो जाए तो किसी काबिल डाक्टर या नशा मुक्ति केंद्र में ले जाएं.

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सवाल

मैं 23 साल की लड़की हूं और पंजाब के एक गांव में रहती हूं. मेरा एक रिश्तेदार मुझ पर बुरी नजर रखता है. वह मम्मी की तरफ से है, तो मम्मी सब जानने के बाद भी चुप्पी साध लेती हैं. मैं बड़ी परेशान रहती हूं. मैं ऐसा क्या करूं कि मेरी इस समस्या का हल हो जाए?

जवाब

लगता है कि आप की मम्मी या तो उस रिश्तेदार के किसी एहसान से दबी हैं या उन की कोई कमजोर नस उस रिश्तेदार ने दबा रखी है. जो भी हो आप झोकें या डरें नहीं और घर के किसी दूसरे बड़े को भरोसे में ले कर बात करें.

उस रिश्तेदार से दूरी बना कर चलें और उसे साफसाफ बता दें कि आप खामोशी से किसी भी ज्यादती या जबरदस्ती को बरदाश्त नहीं करेंगी, तो वह समझ जाएगा, नहीं तो आप के डर को वह रजामंदी ही समझेगा.

सच्ची सलाह के लिए कैसी भी परेशानी टैक्स्ट या वौइस मैसेज से भेजें.

मोबाइल नंबर : 08826099608

प्यार का ऐसा नशा कि कर दी मां की हत्या

बलराम ने जल्दीजल्दी इंटरव्यू लैटर, नोट बुक, पैन आदि बैग में रख कर सोनिया को आवाज दी, ‘‘दीदी, जल्दी से मेरा नाश्ता लगा दीजिए, मुझे देर हो रही है.’’

‘‘आ कर नाश्ता कर लो, मैं ने तुम्हारा नाश्ता तैयार कर दिया है.’’ सोनिया ने रसोईघर से ही कहा.

बलराम ने जल्दीजल्दी नाश्ता किया और अपना बैग ले कर मां के पास पहुंचा. शकुंतला देवी चारपाई पर लेटी थीं. बेटे को देख कर उन्होंने कहा, ‘‘जाओ बेटा, सफल हो कर लौटो. लेकिन तुम ने यह तो बताया ही नहीं कि इंटरव्यू देने कहां जा रहे हो?’’

‘‘मां चंडीगढ़ जा रहा हूं, एक बहुत बड़ी कंपनी में. अगर यह नौकरी मिल गई तो जिंदगी सुधर जाएगी.’’

‘‘जैसी प्रभु की इच्छा.’’ शकुंतला देवी ने कहा.

मां के पैर छू कर बलराम घर से निकल गया. यह 5 जून, 2015 की बात है. इंटरव्यू देने के बाद वह शाम के 7, साढ़े 7 बजे घर लौटा तो सोनिया रात का खाना बना रही थी. बैग रख कर बलराम मां के कमरे में पहुंचा तो वहां मां नहीं थी. बाहर आ कर उस ने बहन से मां के बारे में पूछा तो उस ने कहा, ‘‘शाम को कीर्तन करने की बात कह कर गई थीं, पर अभी तक लौटी नहीं हैं.’’

बलराम को पता था कि मां अकसर कीर्तन पर जाती थीं तो देर रात को लौटती थीं. पिताजी के घर छोड़ कर जाने के बाद मां ने खुद को भजनकीर्तन में लगा लिया था. मां की चिंता छोड़ कर उस ने हाथमुंह धोया तो बहन ने उस के लिए खाना परोस दिया.

खाना खा कर बलराम अपने कमरे में आराम करने चला गया. दिन भर का थका होने के कारण लेटते ही उसे नींद आ गई. रात के लगभग 1 बजे उस की आंख खुली तो उठ कर वह मां के कमरे में गया. मां वहां नहीं थी. समय देखा, रात के सवा बज रहे थे. वह बड़बड़ाया, ‘मां अभी तक नहीं आई?’

बलराम को चिंता हुई. उस के मन में बुरे विचार आने लगे. उस की चिंता यह थी कि पिताजी की तरह कहीं मां भी तो उसे छोड़ कर नहीं चली गईं?

पंजाब के जिला खन्ना के थाना जुलकां का एक गांव है मलकपुर कंबोआ. इसी गांव में लाल सिंह अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी शकुंतला के अलावा 2 बेटे और एक बेटी थी.

बड़ा बेटा सोहनलाल खेती करने के अलावा दूसरे राज्यों में जा कर कंबाइन मशीन से फसल काटने का काम करता था. उस से छोटी सोनिया थी, जो दसवीं तक पढ़ाई कर के अब घर में रहती थी. सब से छोटा बलराम बारहवीं पास कर के नौकरी की तलाश में था.

लाल सिंह के पास जो जमीन थी, उसी में मेहनत कर के जैसेतैसे तीनों बच्चों को पालापोसा और पढ़ायालिखाया था. बड़ा बेटा सोहन काम करने लगा तो उन्हें थोड़ी राहत मिली. अचानक न जाने ऐसा क्या हुआ कि लाल सिंह के ऊपर काफी कर्ज हो गया, जिस की वजह से उन्हें अपनी कुछ जमीन बेचनी पड़ी.

जमीन बेचने के बाद लाल सिंह गुमसुम रहने लगे. वह ना किसी से बात करते थे और ना किसी मामले में दखलंदाजी करते थे. ऐसे में ही एक दिन वह बिना किसी को कुछ बताए घर से निकले तो लौट कर नहीं आए. यह 5 साल पहले की बात है.

शकुंतला पति के इंतजार में दरवाजे की ओर टकटकी बांधे देखती रहती थी. उस दिन मां के कीर्तन से न लौटने पर बलराम चिंतित हो उठा. उस ने बहन को जगा कर कहा, ‘‘दीदी उठो, अभी तक मां लौट कर नहीं आई है.’’

‘‘क्या कहा, मां अभी तक लौट कर नहीं आई है?’’

‘‘हां दीदी, रात के 2 बज रहे हैं. इस समय कौन सा मंदिर खुला होगा, जो मां कीर्तन कर रही हैं?’’ रुआंसा हो कर बलराम बोला.

सोनिया घबरा कर उठी. उस ने चिंतित हो कर कहा, ‘‘बल्लू, इस समय हम मां को ढूंढने कहां चलेंगे?’’

बात सही भी थी. उस समय रात के 2 बज रहे थे. उतनी रात को वे कहां जाते. लेकिन मां के बारे में पता तो करना ही था. भाईबहन हिम्मत कर के घर से बाहर निकले. पूरे गांव में सन्नाटा पसरा था, सिर्फ कुत्ते भौंक रहे थे. दोनों मंदिर तक गए. वहां घुप्प अंधेरा था. गांव की हर गली में चक्कर लगाया कि शायद किसी के घर कथाकीर्तन हो रही हो, लेकिन गांव में ऐसा कुछ भी आयोजन नहीं था.

सवेरा होने पर बलराम ने मंदिर जा कर पूछा तो पता चला कि शकुंतला तो कल मंदिर आई ही नहीं थी. थोड़ी ही देर में शकुंतला के गायब होने की बात पूरे गांव में फैल गई. हर कोई अफसोस जता रहा था कि 5 साल पहले बच्चों का बाप गायब हो गया और अब मां गायब हो गई. गांव के कुछ लोग भी शकुंतला की तलाश में लग गए.

बलराम ने बड़े भाई सोहन को भी फोन कर के मां के गायब होने की बात बता दी. उस समय वह मध्य प्रदेश में कंबाइन मशीन ले कर फसल की कटाई कर रहा था. छोटे भाई को सांत्वना दे कर उस ने कहा कि वह तुरंत आ रहा है. अगले दिन दोपहर बाद सोहन घर पहुंचा तो कुछ रिश्तेदार एवं गांव वालों के साथ थाना जुलकां जा कर मां की गुमशुदगी दर्ज करा दी.

शकुंतला का फोटो ले कर पुलिस ने इश्तेहार शोरेगोगा छपवा कर सभी थानों, बसअड्डों, रेलवे स्टेशनों तथा प्रमुख स्थानों पर लगवा दिए, साथ ही वायरलैस द्वारा उस का हुलिया भी प्रसारित करवा दिया.

दिन, सप्ताह, महीने बीतने लगे, शकुंतला का कुछ पता नहीं चला. धीरेधीरे साल बीत गया. उस की गुमशुदगी के रहस्य से परदा नहीं उठ सका. सोनिया और सोहन ने तो संतोष कर लिया, पर बलराम, जो मां का चहेता भी था, वह मां के गायब होने के रहस्य को जानना चाहता था. इसलिए मार्च, 2016 में उस ने मां की गुमशुदगी की एक चिट्ठी लिखी और खन्ना जा कर एसपी (डी) जसकरण सिंह तेजा से मिला. उन से उस ने हाथ जोड़ कहा, ‘‘सर, मेरी मां को ढुंढवा दीजिए.’’

जसकरण सिंह तेजा ने बलराम के निवेदन को गंभीरता से लिया और डीएसपी (देहात) हरविंदर सिंह विर्क और डीएसपी (सिटी) हरवंत कौर को बलराम द्वारा दी गई चिट्टी दे कर सख्त आदेश दिया कि जल्द से जल्द वे इस मामले का खुलासा करें.

हरविंदर सिंह और हरवंत कौर ने शकुंतला का पता लगाने के लिए थाना जुलकां के थानाप्रभारी इंसपेक्टर रणवीर सिंह को नियुक्त किया. उन की मदद के लिए इंसपेक्टर जगजीत सिंह को लगा दिया गया.

शकुंतला की गुमशुदगी की फाइल को निकाल कर फिर से जांच शुरू हुई. पुलिस अधिकारियों ने अपने मुखबिरों को भी शकुंतला की गुमशुदगी का रहस्य पता करने को लगा दिया.

शकुंतला के दोनों बेटों, बेटी तथा रिश्तेदारों से भी पूछताछ की गई. सोहन उन दिनों मध्य प्रदेश में था. उस से छोटा बलराम इंटरव्यू देने चंडीगढ़ गया था. सिर्फ बेटी सोनिया ही घर में थी. पूछताछ में पुलिस ने देखा कि सोनिया बारबार बयान बदल रही है.

रणवीर सिंह ने यह बात डीएसपी हरवंत कौर को बताई तो उन्होंने कहा कि वह अपने मुखबिर सोनिया पर नजर रखने के लिए लगा दें, साथ ही उस के बारे में पता करें.

मुखबिरों से पुलिस को पता चला कि सोनिया के गांव के ही कुलविंदर से प्रेमसंबंध थे. जब से पुलिस दोबारा इस मामले की जांच कर रही है, तब से वह काफी बेचैन और परेशान रहती है. अकसर वह गांव से बाहर खेतों में कुलविंदर से सलाहमशविरा करती दिखाई देती है.

रणवीर सिंह और जगजीत सिंह ने समय न गंवाते हुए एएसआई सुरजीत सिंह से कहा कि वह शकुंतला के घर जा कर उस के बेटों सोहन, बलराम और बेटी सोनिया तथा नजदीकी रिश्तेदारों को थाने ले आएं. अगर वे थाने आने की वजह पूछें तो उन्हें बता देना कि शकुंतला का पता चल गया है. सुरजीत सभी को थाने ले आए. जैसा रणवीर सिंह ने सोचा था वैसा ही था.

सोनिया के चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. उस के पैर कांप रहे थे. उन्होंने बड़े नाटकीय ढंग से कहा, ‘‘सोहन सिंह, तुम्हारी मां का पता चल गया है. यह मेरे अलावा तुम्हारी बहन सोनिया को भी पता है कि तुम्हारी मां कहां है? इसलिए तुम उस से पूछ लो कि वह कहां हैं, वरना मैं तो तुम्हारी मां से तुम्हें मिलवा ही दूंगा.’’

रणवीर की इस बात पर सोहन सिंह ने हैरानी से बहन की ओर देखा. वह खुद हैरानी से रणवीर सिंह को देख रही थी. उस का चेहरा एकदम सफेद पड़ा हुआ था. टांगें पहले से ज्यादा कांप रही थीं. सोहन सिंह ने जब उस से पूछा कि क्या वह जानती है कि मां कहां हैं तो वह कांपती आवाज में बोली, ‘‘नहीं भैया, मुझे नहीं पता कि मां कहां है.’’

‘‘बताओ न तुम्हारी मां कहां है?’’ रणवीर सिंह ने डांट कर कहा तो सोनिया ने सिर झुका लिया. उस के दोनों भाई और साथ आए रिश्तेदार उसे हैरानी से देख रहे थे.

उन की समझ में नहीं आ रहा था कि जब सोनिया को मां के बारे में पता था तो उस ने अब तक बताया क्यों नहीं. रणवीर सिंह ने जब दोबारा डांट कर पूछा तो उस ने रोते हुए अपनी मां की लगभग 11 महीने की गुमशुदगी के रहस्य से परदा उठाते हुए कहा कि उस ने अपने प्रेमी कुलविंदर के साथ मिल कर उस की हत्या कर दी है.

इस के बाद उस ने शकुंतला की गुमशुदगी के पीछे की जो कहानी सुनाई, वह इस प्रकार थी—

सोनिया और कुलविंदर कभी साथसाथ पढ़ा करते थे. दसवीं पास कर के सोनिया ने पढ़ाई छोड़ दी तो दोनों अलग हो गए. सालों बाद युवा होने पर जब उन की मुलाकात हुई तो बचपन की यादें ताजा हो उठीं. युवा होने पर उन के शरीरों में जो बदलाव आया था, वह काफी आकर्षक था.

दोनों ही खूबसूरत तो थे ही, कुलविंदर का कसरती बदन काफी लुभावना था, जिस से दोनों ही एकदूसरे के आकर्षण में बंधते गए. परिणामस्वरूप दोनों गांव के बाहर खेतों में मिलने लगे. जब इस बात की जानकारी शकुंतला को हुई तो वह परेशान हो उठी.

उस ने कुलविंदर को देखा था. वैसे तो उस में कोई कमी नहीं थी, लेकिन वह नशा करता था. इस के अलावा वह दूसरी जाति का भी था, यही वजहें थीं कि शकुंतला ने बेटी को मर्यादा में रहने को कहा.

जबकि सोनिया पर तो कुलविंदर के प्यार का ऐसा नशा चढ़ा था कि उस ने मां की एक नहीं सुनी, बल्कि वह खुश थी कि मां को उस के और कुलविंदर के प्यार के बारे में पता चल गया था.

इस के बाद वह कुलविंदर को घर बुलाने लगी. अगर शकुंतला कुछ कहती तो वह कुलविंदर को ले कर अपने कमरे में चली जाती. गायब होने से 2 दिन पहले 3 जून, 2015 को शकुंतला गांव में किसी के यहां गई थी. मां के जाते ही सोनिया ने कुलविंदर को बुला लिया था.

अचानक शकुंतला आ गई और उस ने सोनिया और कुलविंदर को आपत्तिजनक स्थिति में पकड़ लिया. कुलविंदर तो डर के मारे भाग गया, बेटी को शकुंतला ने खूब खरीखोटी सुनाई. चुप रहने के बजाय सोनिया विद्रोह कर बैठी. उस ने मां को धमकाते हुए कहा, ‘‘सुन मां, अगर मेरे और कुलविंदर के बीच कोई आया तो मैं उसे छोड़ूंगी नहीं.’’

फिर उसी दिन शाम को सोनिया ने कुलविंदर के साथ मिल कर मां को ठिकाने लगाने की योजना बना डाली. उस ने यह योजना कुलविंदर को समझा दी. 5 जून को सोनिया ने दोपहर को खाना बनाया और मां के खाने में नींद की गोलियां मिला दीं. खाना खाने के कुछ देर बाद ही शकुंतला गहरी नींद में सो गई थी. सोनिया ने मां को हिलाडुला कर देखा. जब देखा कि मां होश खो बैठी है तो उस ने फोन कर के कुलविंदर को बुला लिया. कुलविंदर के आने पर सोनिया ने उसे फावड़ा दे कर आंगन में गड्ढा खोदवाया और शकुंतला की गला दबा कर हत्या कर दी.

इस के बाद लाश को उसी गड्ढे में डाल कर मिट्टी भर दी. ऊपर से गोबर का लेप लगा दिया, ताकि किसी को संदेह न हो. सारे काम निपटा कर दोनों ने शकुंतला के कमरे में उसी के बिस्तर पर इच्छा पूरी की. इस के बाद क्या हुआ आप पढ़ ही चुके हैं. सोनिया के अपराध स्वीकार करने के बाद शकुंतला की गुमशुदगी को हत्या में तब्दील कर सोनिया और कुलविंदर को दोषी बनाया गया.

सोनिया की निशानदेही पर मैट्रोपौलिटन मजिस्ट्रैट बहादुर सिंह, एसपी (डी) जसकरण सिंह तेजा, डीएसपी (देहात) हरविंदर सिंह विर्क, डीएसपी (सिटी) हरवंत कौर, थाना जुलकां के प्रभारी रणवीर सिंह एवं जगजीत सिंह, सोहन, बलराम और गांव के सरपंच की मौजूदगी में आंगन में गड्ढा खोद कर शकुंतला की लाश बरामद की गई, जो कंकाल बन चुकी थी.

लाश का पंचनामा तैयार कर फौरैंसिक लैब भेजा गया. इस के बाद सोनिया को गिरफ्तार कर अदालत में पेश कर एक दिन के पुलिस रिमांड पर लिया गया. चूंकि कुलविंदर फरार हो चुका था, इसलिए रिमांड खत्म होने पर सोनिया को पुन: अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया. पुलिस कुलविंदर की तलाश कर रही है.

50+पुरुष डेटिंग के वक्त फिर से घर बसाने की नहीं सोचता!

55 वर्षीय राजेश की पत्नी का देहांत करीब 5 साल पहले हो गया था. राजेश के दो बच्चे हैं, दोनो की शादी हो चुकी है. दोनों वेल सेटेल्ड हैं. राजेश सरकारी कर्मचारी है. दिखने में अभी भी शरीर लम्बा-चैड़ा और सुडौल है. चूंकि राजेश बच्चों से अलग रहता है इसलिए अपनी शारीरिक जरूरतों के लिए किसी महिला दोस्त की तलाश में भी रहता है और इर्दगिर्द तांकझांक भी करता है. लेकिन इस उम्र में वह शादी नहीं करना चाहता. उसे महिला दोस्त तो चाहिए, मगर जीवनसंगिनी नहीं.

कहने की बात यह है कि 50 साल पार करने के बाद महिला व पुरुष की सोच में जमीन-आसमान का अंतर आ जाता है. महिला 50 साल बाद भी यदि अपनी जिंदगी को नए सिरे से शुरुआत करती हैं तो वह कोशिश करती है कि किसी के साथ सेटेल हो. जबकि 50+का पुरुष मौज मस्ती और जिंदगी जीने पर यकीन रखता है. इसमें कोई दो राय नहीं है कि 25 वर्षीय युवा और 50 वर्षीय अधेड़ पुरुषों की सोच में अच्छा खासा पफर्क होता है. 50 साल का व्यक्ति ज्यादा समझदार, व्यवहारिक और लॉजिकल तरीके से सोचते वाला होता है. इसलिए दोनो का डेटिंग फंडा भी एक दूसरे से भिन्न होता है.

लेकिन जहां तक बात महिलाओं की है तो वह पुरुषों से बिल्कुल उलट होती हैं. महिलाएं हमेशा खुद को सामाजिक रीति रिवाजों से अलग नहीं कर पातीं. अब आप 53 वर्षीय सीमा को ही लें. सीमा बचपन से ही बहुत महत्वाकांक्षी रही हैं. नतीजतन बहुत कम उम्र में उसने सरहानीय सपफलता हासिल कर ली. लेकिन इसका घातक परिणाम उसकी निजी जिंदगी में देखने को मिला. उसकी उम्र के लड़के या तो अभी सफलता की सीढ़िया चढ़ रहे थे या फिर  प्रारंभ कर रहे थे. नतीजतन उसे कोई लड़का नहीं भाया. इसके बावजूद उसके माता-पिता ने उसकी शादी एक अधेड़  उम्र के पुरुष से कर दी जिसके साथ घूमना-फिरना, रोमांस करना उसे कतई पसंद नहीं आया.

आखिरकार उसने उससे तलाक ले लिया. जिंदगी में इतने उतार चढ़ाव के बाद 50 साल के पड़ाव से गुजरते हुए सीमा को किसी साथी की कमी बहुत खलती है. यही कारण है कि 50 साल का होने के बाद भी वह अपने लिए किसी ऐसे पार्टनर की तलाश कर रही है जो उसकी जिंदगी मंे ठहराव ला सके. सीमा अकेली ऐसी महिला नहीं है जिसे ठहराव के लिए किसी साथी की कमी न खलती हो. असल में हर महिला ऐसा ही चाहती है. पुरुष जहां इस उम्र में जिंदगी की तमाम जद्दोजहद, परेशानियों  असफल वैवाहिक आदि से तनावग्रस्त होकर फिर से शादी के बंधन में नहीं बंधना चाहते, वे नए सिरे से परिवार बनाना, बच्चों की परवरिश करना, पत्नी के नाज नखरे सिर पर उठाने जैसी चीजों से ऊब हो चुके होते हैं.

वहीं महिलाएं इस उम्र में भी शुरु से शुरु करना चाहती हैं. शायद इसलिए क्योंकि महिला स्वभाव से ही केयर करने वाली होती है. वह चाहे मां की भूमिका में हो, बहन की भूमिका में हो, पत्नी की भूमिका में हो या गर्लप्रफेंड की भूमिका में. वह हर रूप में पुरुष की बच्चे की तरह देखरेख करना चाहती है. 50 वर्षीय पुरुषों को इन सब बातों से कोफ़्त  होने लगती है. मनोविदों का मानना है कि महिलाओं की ऐसी छवि के पीछे प्रमुख वजह यह है कि महिलाएं हमेशा से ही पुरुषों पर आश्रित रहती हैं. उन्हें हर कदम पर ऐसे व्यक्ति की जरुरत होती. जो उनकी दूसरों से रक्षा कर सके. जबकि पुरुषों को किसी के अंडर रहने की आवश्यकता नहीं होती.

62 वर्षीय अजय मागो के मुताबिक, ‘आज से 15 साल पहले मेरी पत्नी मुझे बिना तलाक दिये छोड़कर चली गई थी. खैर, वह मेरा गुजरा हुआ कल है. इसलिए उसे याद करके कोई फायदा नहीं है. अगर चाहता तो शायद तब शादी कर सकता था. मगर जैसे जैसे उम्र निकलती गई, मेरा इस बारे में विश्वास दृढ़ होता गया कि आप 50-55 साल के बाद नए सिरे से घर नहीं बना सकते. इसके पीछे कई वजहें हैं. पहली तो समाज इसकी इजाजत नहीं देता.

अगर मैं ऐसा करता तो निश्चित रूप से मेरे बच्चों को कापफी बुरा लगता. उनके दोस्त उन्हें ताना देते हुए अजीबोगरीब कमेंट करते. सो, मैं अपनी खुशी के लिए उन्हें दांव पर नहीं लगा सकता. इसके अलावा नए सिरे से घर की शुरुआत यानी एक और पत्नी, उसके बच्चे और उसके बच्चे की जिम्मेदारी. कुल मिलाकर बात यह हुई कि 80 साल की उम्र तक मैं बच्चों की परवरिश से जूझता रहूं. मेरे हिसाब से यह मुमकिन नहीं है. अतः मैं 50 साल के बाद नये सिरे से घर की शुरुआत करने के पक्ष में नहीं हैं.’

लब्बोलुआब यह कि महिला चाहे उम्र के किसी भी पड़ाव में क्यों न हो उसे हर वक्त सहारे की जरुरत होती है. जबकि पुरुषों की सोच 50 साल बाद बिल्कुल उलट जाती है. विशेषकर उन पुरुषों की जिनके साथ जिंदगी की असपफल दास्तानें जुड़ी हुई हैं. सो, महिलाएं ध्यान रखें अगर आप किसी 50$ पुरुष के साथ डेटिंग कर रही हैं तो उससे शादी करने का इरादा न बना लें. क्योंकि वह आपको अपनी संगिनी बनाना नहीं चाहता. वह तो सिपर्फ अपने आपको इंटरटेन कर रहा है. इसके उलट पुरुष भी इस बात का खास ख्याल रखें कि यदि 50+महिला आपके साथ डेटिंग कर रही है तो वह उस उम्र में भी आपको अपना जीवनसाथी बनाने की चाहत रखती है. 50 साल से ज्यादा उम्र का पुरुष परिपक्व होता है, माहौल से परिचित होता है, उसके लिए कोई चीज नई नहीं होती. इसलिए उनकी सोच अलग होती है, चाहत अलग होती है.

क्या इसी को प्यार कहते हैं?

कमरे के अंदर घुसते ही जगमोहन ने चुपके से दरवाजा बंद कर के रेवती को अपनी बांहों में भरा और उसे बेतहाशा चूमने लगा.

रेवती छिटकती हुई बोली, ‘‘क्या करते हो, रुको तो…’’

‘‘रेवती, अब मुझे कोई नहीं रोक सकता, क्योंकि अब तो हम ने शादी भी कर ली है…’’

रेवती ने ताना कसा, ‘‘वाह जी वाह, तुम तो ऐसे बोल रहे हो, जैसे शादी के इंतजार में ही अब तक रुके हुए थे…’’

‘‘तुम हो ही ऐसी कि देख कर मेरा मन बेकाबू हो जाता है, लेकिन अब तुम बाकायदा मेरी दुलहन हो. आज से हम एकदम नए ढंग से जिंदगी शुरू करेंगे. पहले तुम सज लो…

‘‘अच्छा रुको, मैं खुद तुम्हें सजा कर दुलहन बनाऊंगा, फिर हम दोनों आज अपनी सुहागरात मनाएंगे…’’

यह सुन कर रेवती का चेहरा शर्म से लाल पड़ गया. उस ने मना करना चाहा, पर जगमोहन उस के कपडे़ उतारने लगा. ब्लाउज उतारने के बाद जगमोहन उसे अपने दहकते होंठों से चूमने लगा.

रेवती के पूरे बदन में जैसे आग सुलग उठी. वह तड़प कर जगमोहन से लिपट गई.

जगमोहन ने रेवती को उठा कर बिस्तर पर लिटा दिया. इस के साथ ही रेवती ने गलबहियां डाल कर उसे भी अपने ऊपर खींच लिया. लेकिन अचानक दरवाजे पर आहट सुन कर जगमोहन ने चौंक कर धीमे से पूछा, ‘‘कौन आया है?’’

‘‘मैं हूं… धर्मशाला का मैनेजर,’’ बाहर से आवाज आई, ‘‘जल्दी से दरवाजा खोलो. बाहर पुलिस वाले खड़े हैं…’’

पुलिस का नाम सुनते ही रेवती एक बार तो डर के मारे पीली पड़ गई. जगमोहन का भी सारा जोश ठंडा पड़ गया. वह बुझबुझ आवाज में रेवती से बोला, ‘‘लगता है, तुम्हारे घर वालों ने थाने में रिपोर्ट कर दी है…’’

इतनी देर में रेवती भी संभल चुकी थी. झटके से उठ कर वह जल्दीजल्दी कपड़े पहनती हुई बोली, ‘‘तो तुम डरते क्यों हो? मैं तुम्हारे साथ हूं न.

‘‘हम दोनों बालिग हैं और कचहरी में शादी कर के कानूनन पतिपत्नी बन चुके हैं. हमें अब कोई नहीं अलग कर सकता…’’

लेकिन दरवाजा खोलते ही रेवती को जैसे सांप सूंघ गया. 2 पुलिस वालों के साथ अपने पिता रमाशंकर और चाचा कृपाशंकर को देखते ही उस की नजर जमीन में गड़ गई.

रेवती के पिता रमाशंकर एक प्राइवेट कंपनी में हिसाबकिताब देखा करते हैं. रेवती उन की सब से बड़ी बेटी है. उस से छोटी 3 और बेटियां थीं शांति, मालती व कांति.

रमाशंकर की पत्नी सालों से बीमार थी, इसलिए अब वे बेटे की ओर से निराश हो चुके थे और बेटियों को ही अपना बेटा सम?ा कर पालपोस रहे थे. उन की सब से छोटी बेटी कांति 8वीं जमात में पढ़ती थी. शांति और मालती इंटर में पढ़ रही थीं. रेवती ने भी घर से भागने के कुछ दिनों पहले ही बीए में दाखिला लिया था.

रमाशंकर चाहते थे कि उन की लड़कियां खूब पढ़लिख कर कुछ बन जाएं. वे समाज को दिखा देना चाहते थे कि बेटियां बेटों से किसी मामले में कम नहीं होतीं और वे भी सच्चे माने में मर्दों के साथ कंधे से कंधा मिला कर चल सकती हैं, इसलिए उन्होंने इंटर पास करने के बाद रेवती को आगे की पढ़ाई के लिए यूनिवर्सिटी में भेज दिया था.

बस, यही उन से चूक हो गई. वे यह भूल गए कि जवान लड़केलड़कियों का रिश्ता आग व फूस जैसा होता है और जहां ये दोनों साथ होंगे, कभी न कभी चिनगारी जरूर उठेगी.

रेवती भी जगमोहन का साथ पा कर सुलग उठी. जगमोहन उस से एक साल सीनियर था. देखने में स्मार्ट और घर से अमीर.

देखते ही देखते मुलाकातें बढ़ने लगीं और दोनों में प्यार हो गया. रेवती सुबह के 9 बजतेबजते कालेज जाने के लिए तैयार होने लगती और शाम को अकसर लाइबे्ररी या जीरो पीरियड लगने का बहाना कर के देर से घर लौटती, लेकिन बीच का सारा समय जगमोहन के साथ घूमने में बीतता था.

ऐसे ही एकांत के क्षणों में एक दिन भावनाओं में बह कर रेवती ने अपना सबकुछ जगमोहन को सौंप दिया था. इस के बाद यह तकरीबन रोज का सिलसिला बन गया था.

एक दिन अचानक रेवती ने बताया कि वह मां बनने वाली है. यह सुन कर जगमोहन चौंका जरूर था, पर उस ने रेवती का हाथ थाम कर कहा था, ‘पहले हम अपने पैरों पर खड़े हो जाते, तो ठीक रहता. लेकिन जो भी हो, बदनामी होने के पहले ही हमें शादी कर लेनी चाहिए, क्या तुम तैयार हो?’

‘मैं तो तैयार हूं, लेकिन मेरे घर वाले इस रिश्ते को कभी नहीं मानेंगे. अब तो बस एक ही उपाय है कि तुम मुझे ले कर यहां से कहीं दूर ले चलो…’

‘यह क्या कह रही हो रेवती? इस से हमारी कितनी बदनामी होगी? हमें घर वालों को मुंह दिखाना भी मुश्किल हो जाएगा…’

‘यानी कि तुम को मुझ से ज्यादा अपने घर वालों की इज्जत प्यारी है? लेकिन एक बात याद रखो, अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं भी कम नहीं हूं, अपनी जान दे दूंगी…’

रेवती के कहने पर ही जगमोहन उसे ले कर ग्वालियर चला गया और एक महीना इधरउधर छिपता हुआ दिन काटता रहा. आखिर एक वकील की मदद से उस की अदालत में शादी हो गई, तब जा कर वह बेफिक्र हो पाया.

लेकिन पकड़े जाते ही रेवती ने अपना असली रंग दिखा दिया और पुलिस के पूछने पर वह सिसकती हुई कहने लगी, ‘‘जगमोहन कई महीनों से डराधमका कर मेरे साथ मुंह काला कर रहा था, फिर जान से मारने की धमकी दे कर वह मुझे यहां भगा लाया. आज डराधमका कर उस ने मेरे साथ कोर्ट में शादी भी कर ली.’’

यह सुनते ही जगमोहन के पैरों तले जमीन सरक गई. वह चिल्ला पड़ा, ‘‘ऐसा मत कहो रेवती, हमारे प्यार को बदनाम मत करो. तुम नहीं जानती कि तुम्हारे बयान से मेरी जिंदगी पूरी तरह से बरबाद हो जाएगी.’’

लेकिन रेवती ने आंख उठा कर उस की ओर देखा भी नहीं. पुलिस वालों के एक सवाल के जवाब में उस ने अपने पिता और चाचा की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मैं अपने घर जाना चाहती हूं.’’

अदालत के आदेश पर रेवती को उस के पिता के हवाले कर दिया.

जगमोहन अपहरण और बलात्कार के आरोप में हिरासत में जेल में बंद है.

रेवती के इस बरताव ने जगमोहन को जैसे गूंगाबहरा बना दिया है. वह हरदम एक ही बात सोचता रहता है, ‘क्या इसी को प्यार कहते हैं?’

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