Serial Story- संदूक में लाश: भाग 2

प्रस्तुति : एस. एम. खान

सांवल को गिरफ्तार करने जो एएसआई गया था, वह खाली हाथ वापस आ गया. उस ने कहा कि उस की हवेली की तलाशी में कुछ नहीं मिला. उस का इस तरह गायब होना शक को मजबूत कर रहा था. अब मुझे पक्का यकीन हो गया था कि हत्या उसी ने की है.

सांवल ने यह भी बताया था कि उस की पत्नी के शादी से पहले किसी बहलोलपुर के ही युवक से संबंध थे और वह उसी के साथ भाग गई है. मुझे लग रहा था कि कहीं ऐसा तो नहीं कि सांवल ने गुल्लो और शम्स को मिलते हुए रंगेहाथ पकड़ लिया हो.

देहात में ऐसे अपराध की सजा मौत से कम नहीं होती. गुल्लो के मांबाप से ज्यादा मुझे सांवल पर ही शक हो रहा था. अब सांवल से पूछताछ करनी जरूरी थी.

संयोग से अगले दिन सांवल खुद ही थाने आ गया. उस के साथ नंबरदार भी था. मैं ने डांट कर सांवल से पूछा, ‘‘तुम कहां थे?’’

‘‘मैं डर गया था हुजूर,’’ उस ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘‘मैं तो पहले से ही परेशान इंसान हूं. मेरे साथ बहलोलपुर वालों ने धोखा किया है. मेरी शादी ऐसी लड़की से कर दी, जिस का दिल पहले ही से कहीं और लगा था. उस का तो अपनी गंदी हरकतों के कारण अंत हो गया, लेकिन मेरे लिए मुसीबत खड़ी कर गई. साहब, मैं ने सुना है कि उस की मां थाने आ कर मेरे ऊपर इलजाम लगा रही थी?’’

कुछ कहने के बजाय मैं ने हवालात में बंद रोशन और जैन को बाहर निकलवा कर पूछा, ‘‘क्या यही वह आदमी है, जो तुम्हारे घर संदूक छोड़ कर गया था.’’

‘‘साहब, हम उस समय घर पर नहीं थे, मां और मेरी पत्नी ने देखा था.’’ रोशन ने कहा, ‘‘आप उन्हें ही बुला कर पहचान करा लें.’’

ये भी पढ़ें- झगड़ा: आखिर क्यों बैठी थी उस दिन पंचायत

मैं ने तुरंत एक सिपाही को दतवाल गांव रोशन की मां और घर वाली को लाने भेज दिया. आधे घंटे में वह उन दोनों औरतों को ले कर आ गया. मेरी नजर सांवल पर थी, वह काफी परेशान लग रहा था. उन दोनों औरतों को देख कर वह गरदन घुमाने लगा.

मैं ने उन दोनों औरतों से कहा, ‘‘इस आदमी को ध्यान से देखो और बताओ कि यह उन 2 औरतों के साथ था, जो संदूक के साथ तुम्हारे यहां आई थीं.’’

‘‘हम ने उन के साथ वाले आदमी को नहीं देखा था. हम ने केवल औरतों को ही देखा था.’’ रोशन की मां ने कहा.

औरतों की बात सुन कर सांवल के चेहरे की चमक लौट आई. तभी रोशन की पत्नी ने कहा, ‘‘अगर वे औरतें मेरे सामने आ जाएं तो मैं उन्हें पहचान लूंगी, एक के चेहरे पर मस्सा था.’’

सांवल बेचैनी से इधरउधर देखने लगा. उस की हर हरकत पर मेरी नजर थी. मैं उन औरतों को ले कर सादतपुर स्थित सांवल की हवेली पर पहुंचा. सांवल ने हवेली में कहलवा दिया कि पुलिस वाले आए हैं. वह आदमी अंदर गया और कुछ ही देर में वापस आ गया.

‘‘मेरे घर की सभी औरतें हवेली में मौजूद हैं, आप जा कर देख लें.’’ सांवल ने कहा.

मैं ने उन दोनों औरतों को हवेली के अंदर ले कर कहा, ‘‘इन औरतों को पहचान कर बताओ कि इन में वे औरतें हैं या नहीं?’’

दोनों ने देख कर कहा कि इन में वे नहीं हैं. मेरी सारी उम्मीद पर पानी फिर गया. इस बात से मैं बहुत हताशा हुआ. हत्या की एक पेचीदा गुत्थी सुलझतेसुलझते रह गई. नंबरदार भी वहां था, वह मुझे अपने मेहमान खाने में ले गया और वहां मुझे लस्सी दी. मैं तकिए से सिर लगा कर लेट गया.

कमरे का दरवाजा आधा खुला था. मुझे ऐसा लगा कि वहां से कोई गुजरा है. कुछ देर बाद फिर वह उधर से गुजरा. अब मेरी पुलिस वाली अनुभवशक्ति जाग गई. मैं ने दरवाजे की ओर नजरें गड़ा दीं. कुछ ही देर में तीसरी बार फिर कोई वहां से गुजरा.

इस बार मैं ने देख लिया. पता चला कि वह कोई आदमी है और सफेद कपड़े पहने है. मैं बिजली की तरह तेजी से उठा और दरवाजे के बाहर जा कर देखा. वह एक आदमी था, जिस के चेहरे पर दाढ़ी थी. मैं ने उसे अंदर बुलाया और उस से पूछा कि वह इस कमरे के बाहर बारबार क्यों चक्कर लगा रहा है?

उस ने कहा, ‘‘मेरा नाम रहमत है साहब, मैं एक जमींदार हूं और आप से एक बात कहना चाहता हूं.’’

ये भी पढ़ें- सप्ताह का एक दिन: क्या थी शोभा की समस्या

‘‘बताओ क्या बात है?’’

‘‘साहब, अगर आप मेरा नाम गुप्त रखें तो मैं आप को एक खास बात बताना चाहता हूं.’’ उस आदमी ने कहा.

मैं ने उसे पूरा यकीन दिलाया तो उस ने कहा, ‘‘साहब, सांवल ने आप को धोखा दिया है. उस ने अपनी मां को हवेली की पिछली दीवार से बाहर उतार दिया था. सांवल का इस गांव में बड़ा दबदबा है, इसलिए उस के सामने किसी की बोलने की हिम्मत नहीं है.’’

मैं ने उस आदमी को धन्यवाद दे कर भेज दिया. उस ने मेरी बहुत बड़ी मुश्किल आसान कर दी थी. गांव में अकसर आपस में दुश्मनियां होती हैं, रहमत ने भी अपनी कोई दुश्मनी सांवल से निकाली थी. बहरहाल, जो भी रहा हो, उस ने मेरा काम आसान कर दिया.

अब मुझे सांवल की मक्कारी पर बड़ा गुस्सा आ रहा था. मैं ने उसे कमरे में बुलवा लिया और गुस्से से पूछा, ‘‘क्या तुम ने अपने घर की सारी औरतों को पहचान के लिए पेश कर दिया था?’’

‘‘जी सरकार, सभी थीं. क्या आप  को कोई शक है?’’ उस ने कहा.

मैं ने एक झन्नाटेदार थप्पड़ उस के बाएं गाल पर मारा. थप्पड़ खा कर वह नीचे गिर पड़ा. उसे उठने का मौका दिए बगैर मैं अपना बूट उस के हाथों पर रख कर खड़ा हो गया. वह दर्द से छटपटाने लगा. मैं ने कहा, ‘‘तेरी मां कहां मर गई, उसे अभी हाजिर कर.’’

मेरा सवाल सुन कर वह भौचक्का रह गया. उस ने कहा, ‘‘मेरी बहन बीमार है, उसे देखने गई है.’’

‘‘अपनी मां को पेश कर दे, वरना ठीक नहीं होगा.’’ मैं ने अपना बूट उस के हाथ से हटा कर कहा.

उस ने खड़े हो कर कहा, ‘‘हुजूर, आप मेरी बात सुन लें, मेरी मां को मत बुलाएं. आप जैसा चाहेंगे, मैं आप को खुश कर दूंगा.’’

उस की बात सुन कर मैं खुश हो गया. मैं ने कहा, ‘‘मैं तुम्हारा नजराना ले लूंगा, लेकिन पहले तुम अपनी मां को पेश करो. उस के बाद लेनदेन की बात करेंगे.’’

मेरी बात सुन कर वह खुश हो गया. उस ने कहा, ‘‘वह घर में बैठी है, किसी को भेज कर बुलवा लें.’’

मैं ने सिपाही को भेजने के बजाय नंबरदार की नौकरानी को भेज कर उसे बुलवा लिया. कुछ ही देर में एक अधेड़ उम्र की भारीभरकम औरत नौकरानी के साथ मेरे कमरे में आ गई. कमरे में मुझे देख कर उस का रंग उड़ गया. मैं ने सब से पहले जो चीज नोट की, वह उस के माथे पर काला मस्सा. उसी समय मैं ने रोशन की मां और पत्नी को कमरे में बुलवा लिया.

ये भी पढ़ें- दो कदम साथ: क्या वे दो कदम भी साथ चल सके

जैसे ही उन की नजर सांवल की मां पर पड़ी, वे चौंक पड़ीं, ‘‘यही है वह मक्कार बुढि़या.’’ हुस्ना ने कहा, ‘‘यही वह संदूक हमारे घर पर रख गई थी. इस के कारण ही मेरे पति और देवर को हवालात में रहना पड़ा.’’

Serial Story- संदूक में लाश: भाग 3

मामला खुल गया था. मैं ने सांवल तथा उस की मां को गिरफ्तार कर लिया और रोशन एवं उस के भाई जैन को छोड़ दिया. इस के बाद सांवल से पूछताछ करने पर जो कहानी सामने आई, वह इस प्रकार थी—

सादतपुर वाले और बहलोलपुर वाले बालिके कहलाते थे. ये एक ही बिरादरी से आते थे. बालिके एक कबीला था, जो आपस में शादीब्याह कर लेता था. सांवल की शादी बहलोलपुर के करमू जाट की बेटी गुलबहार उर्फ गुल्लो से हुई थी.

गुल्लो बहुत सुंदर थी, लेकिन शादी के बाद वह चुप और खोईखोई सी रहती थी. पहले तो किसी ने ध्यान नहीं दिया, लेकिन जब काफी समय हो गया तो गांव की औरतों ने तरहतरह की बातें करनी शुरू कर दीं, जिस से सांवल के दिल में शक के बिच्छू ने पंजे गाड़ दिए.

उसे शक हुआ कि उस की पत्नी उसे नहीं चाहती, बल्कि किसी और को चाहती है. गुल्लो कभीकभी शाम के समय बिना बताए घर से निकल जाती थी. सांवल की मां ने उस से कहा कि वह अपनी पत्नी को संभाले, उस के लच्छन ठीक नहीं लगते.

एक बार रात के समय सांवल अपने फार्म के पश्चिमी छोर पर पहुंचा तो उसे पेड़ों के झुंड में 2 साए दिखाई दिए. उन के आकार से लग रहा था कि उन में एक औरत और एक मर्द है. सांवल को शक हुआ तो दबे पांव पास जा कर उस ने ललकारा तो उस आदमी ने सांवल पर लाठी से वार कर दिया.

ये भी पढ़ें- शुभचिंतक: शक्की पत्नी की दुविधा

सांवल ने वार बचा कर बरछी से उस पर वार कर दिया, जो उस के पैर में उचटती सी लगी. वह आदमी मुकाबला करने के बजाय खेतों में घुस कर गायब हो गया. सांवल ने पास जा कर उस औरत को देखा तो वह कोई और नहीं, उस की पत्नी गुल्लो थी. वह थरथर कांप रही थी. वहीं एक छोटा सा संदूक पड़ा था. उस में कीमती कपड़े और गहने थे.

गुल्लो उस आदमी के साथ भाग रही थी. सांवल उसे पकड़ कर घर ले आया और काठकबाड़ वाले कमरे में बंद कर दिया. उस ने यह बात अपनी मां को बताई तो दोनों ने आपस में तय किया कि उसे खत्म कर दिया जाए.

सांवल फरसा ले कर कबाड़ के कमरे में पहुंचा, जहां गुल्लो बैठी थी. पति के हाथ में फरसा देख कर वह डर गई. वह हाथ जोड़ कर गिड़गिड़ाने लगी. लेकिन सांवल पर तो खून सवार था, उस ने फरसा उठाया और उस की गरदन काट दी. वह छटपटाने लगी, इस के बाद बरछी उस के सीने में उतार दी, जिस से वह तड़प कर मर गई.

अब लाश को ठिकाने लगाने की बात आई. मांबेटे की समझ नहीं आ रहा कि लाश को कहां छिपाएं. अंत में सांवल ने लाश को एक संदूक में डाला और बैलगाड़ी में रख कर मां और भावज के साथ दतवाल पहुंचा.

सांवल ने सोचा था कि संदूक कहीं रख कर निकल आएंगे. एक घर के बाहर 2 औरतें बैठी हुई दिखाई दीं तो उस ने बैलगाड़ी वहीं रोक दी. वे रोशन की मां और पत्नी थीं. फिर बहाने से संदूक रख कर वह मां और भावज के साथ वापस आ गया.

सांवल से पूछताछ के बाद उस की निशादेही पर उस की हवेली से फरसा और बरछी बरामद कर ली गई. जहां गुल्लो की हत्या की गई थी, वहां की जमीन पर उस के खून के निशान थे, उस मिट्टी को खुरच कर सीलबंद कर दिया गया.

इस के बाद मैं ने सांवल की मां के बयान लिए तो उस ने सांवल के बयान की पुष्टि कर दी. मैं ने उस की बड़ी बहू को भी बुलवाया, जो उस के साथ संदूक छिपाने गई थी. उस ने बताया कि इस हत्या से उस का कोई लेनादेना नहीं है.

मैं ने उसे वादामाफ गवाह बनने को कहा तो वह खुशी से तैयार हो गई. इस के बाद एक रोचक बात यह हुई कि मुकदमा तैयार कर के जब मैं चार्जशीट अदालत में पेश करने की तैयारी कर रहा था, तभी एक दिन सवेरेसवेरे एक जवान आदमी मेरे पास आया. उस ने अपना नाम बताया तो मैं चौंका. वह गुल्लो का प्रेमी शम्स था. उस ने बताया कि वह और गुल्लो एकदूसरे से प्रेम करते थे, लेकिन बिरादरी अलग होने से उन की शादी नहीं हो सकी थी.

गुल्लो की शादी सांवल से हो गई थी. शादी के बाद हंसनेखेलने वाली गुल्लो को चुप्पी लग गई. शम्स उस से मिलने कभीकभी सादतपुर जाता था. गुल्लो उस से मिलती थी तो रोरो कर कहती थी कि वह उसे यहां से ले चले.

ये भी पढ़ें- नई सुबह: जिंदगी के दोराहे पर खड़ी अमृता

गुल्लो की हालत शम्स से देखी नहीं जा सकी और दोनों ने भागने का फैसला कर लिया. लेकिन जब वे भाग रहे थे तो पकडे़ गए. उस ने बताया कि वह इसलिए गायब हो गया था कि उस की टांग में बरछी लगी थी. सांवल उसे पहचान लेता तो उस की हत्या कर देता.

अब उसे पता चला है कि गुल्लो की हत्या कर दी गई है तो वह सांवल के खिलाफ बयान देने आया है. मैं ने उस का बयान लिया. बयान देते समय उस की आंखों में आंसू थे, लेकिन मुझे उस से कोई हमदर्दी नहीं थी, क्योंकि वह बुजदिल प्रेमी था. वह अपनी प्रेमिका को छोड़ कर भाग गया था और अब घडि़याली आंसू बहा रहा था.

मैं ने केस बहुत मजबूत बनाया था. अदालत ने सांवल को आजीवन कारावास और उस की मां को 7 साल की सजा सुनाई थी.

Serial Story- संदूक में लाश: भाग 1

प्रस्तुति : एस. एम. खान

बात तब की है जब मैं पंजाब के एक जिले का एसपी था. मेरे इलाके में जो गांव आते थे, उन में एक गांव सादतपुर था. एक दिन इसी गांव का नंबरदार थाने आया. उस के साथ एक जवान लड़का था, जो कपड़ों से खातेपीते घर का लग रहा था. नंबरदार से पता चला कि उस लड़के का नाम सांवल है और वह एक संपन्न जमींदार है.  नंबरदार ने बताया था कि सांवल की घरवाली गुलबहार उर्फ गुल्लो ्लल से लापता है.

मैं ने थोड़ा नाराज हो कर कहा, ‘‘तुम्हारी घरवाली कल से लापता है और तुम रिपोर्ट लिखवाने आज आ रहे हो.’’

‘‘इज्जत की बात है आगा जी,’’ सांवल ने कहा, ‘‘पहले हम ने उसे अपनी रिश्तेदारियों में ढूंढा, उस के घर भी पता किया. उस के बारे में कुछ बताने के बजाय उस के मांबाप ने उलटा हमारे ऊपर ही आरोप लगा दिया कि हम ने उसे जानबूझ कर गायब किया है. जब वह कहीं नहीं मिली तो रिपोर्ट लिखाने आ गया.’’

‘‘शादी को कितने दिन हुए हैं?’’ मैं ने पूछा.

‘‘3 महीने हुए हैं जी.’’ सांवल ने बताया.

‘‘किसी से दुश्मनी तो नहीं है?’’

‘‘नहीं जी, गांव में किसी की क्या मजाल जो हमारी तरफ नजर उठा कर देख ले.’’ सांवल ने अकड़ कर कहा.

‘‘फिर भी किसी पर कोई शक.’’ मैं ने पूछा.

‘‘जी, मुझे शक है कि शादी से पहले उस के किसी से अवैध संबंध थे. लगता है, उसी के साथ भाग गई है?’’

‘‘घर से कोई रकम, गहने आदि गायब हैं क्या?’’ मैं ने पूछा.

‘‘घर में जितने भी गहने और महंगे कपड़े थे, वे सब गायब हैं. उस के पैरों में सोने की वजनी झांझर भी थी, जो मैं ने पहनाई थी, उन्हें भी ले गई.’’

ये भी पढ़ें- पैबंद: रमा की जिंदगी में मदन ने कैसे भरा प्यार का रंग

मैंने गुल्लो की गुमशुदगी दर्ज कर उन्हें वापस भेज दिया. इश्तहार वगैरह दे कर मैं इस केस के बारे में सोचने लगा. मुझे यह केस प्रेमप्रसंग का लग रहा था.

एक सिपाही को बहलोलपुर भेज कर मैं ने गुल्लो के मातापिता को बुलवा लिया. वे दोनों काफी घबराए हुए थे. मैं ने उन्हें तसल्ली दी. गुल्लो की मां का नाम सरदारा और बाप का नाम करमू जाट था.

मैं ने उन से गुल्लो के गायब होने के बारे में पूछा तो गुल्लो की मां ने कहा, ‘‘हमारी बेटी को खुद सांवल ने गायब कराया है. गुल्लो जबान की तेज थी. हो सकता है किसी बात पर कोई झगड़ा हुआ हो और सांवल ने उसे मार दिया हो.’’

मैं ने उन्हें यह कह कर जाने दिया कि अगर उन की जरूरत हुई तो उन्हें फिर बुलाऊंगा. मैं ने मुखबिरों को लगा दिया. 2 दिनों बाद एक मुखबिर बहलोलपुर से आया. उस के साथ 30-32 साल की एक औरत थी. मुखबिर ने बताया कि यह औरत गुल्लो के मातापिता के घर साफसफाई का काम करती है.

उस औरत ने बताया कि गुल्लो के शम्स से नाजायज संबंध थे. वह औरत दोनों को अपने घर चोरीछिपे मिलवाती थी. इस के बदले में गुल्लो उसे अच्छे पैसे देती थी. वह औरत जाते समय हाथ जोड़ कर बोली कि उस ने जो कुछ बताया है, उस में उस का नाम नहीं आना चाहिए. मैं ने उसे तसल्ली दे कर भेज दिया.

उस के जाने के बाद मैं ने मुखबिर से पूछा, ‘‘शम्स कहां है, उसे साथ क्यों नहीं ले आए.’’

‘‘वह गांव में नहीं है साहब, वह उसी दिन से गायब है, जिस दिन से गुल्लो गायब हुई है. उस के घर वालों को भी उस का पता नहीं है.’’ मुखबिर ने बताया.

यह सुन कर मेरा संदेह यकीन में बदल गया. इस का मतलब गुल्लो अपने प्रेमी के साथ भाग गई थी. मैं ने मुखबिर से कहा कि वह गांव में ही रहे. 2 दिन गुजर गए, कहीं से कोई सूचना नहीं आई. तीसरे दिन जो सूचना आई, वह अद्भुत थी. दोपहर को पड़ोस के गांव दतवाल से वहां का नंबरदार सारू आया. उस के साथ 2 जवान लड़के भी थे. वे थाने के माहौल से काफी डरे हुए लग रहे थे. उन के हाथों में लोहे का एक संदूक था. उस संदूक में ताला नहीं लगा था. नंबरदार ने संदूक नीचे रखवा दिया.

मैं ने नंबरदार से पूछा, ‘‘ये दोनों कौन हैं और इस संदूक में क्या है?’’

नंबरदार ने बताया, ‘‘ये दोनों मेरे भाई हैं. बड़े का नाम रोशन और छोटे का नाम जैन है. ये दोनों दतवाल गांव में रहते हैं. कल जब ये घर पर नहीं थे तो सुबह के वक्त इन के घर एक आदमी और 2 औरतें आईं. उस समय घर में इन की मां और रोशन की पत्नी हुस्ना थी. औरतों ने पीने के लिए पानी मांगा तो रोशन की मां ने गांव के रिवाज के मुताबिक उन्हें लस्सी दी. उन लोगों के पास लोहे का एक संदूक था, जो उन्होंने घर के बाहर रख दिया था.

ये भी पढ़ें- फैसला: मां ने कैसे सुलझा दी समस्या

औरतों ने बताया था कि वे शादी का सामान खरीदने दतवाल की बाजार आई हैं. जब तक वे बाजार से लौटें, तब तक उन की संदूक वे घर में रख लें. उन औरतों ने अपना नाम और गांव नहीं बताया था. संदूक रख कर वे औरतें उस आदमी के साथ चली गईं.

शाम तक दोनों औरतें नहीं आईं. रोशन और जैन शाम को घर आए तो उन की मां ने संदूक वाली बात बताई. रोशन ने तुरंत बैठक में रखा संदूक देखा. उसे उस में से दुर्गंध आती लगी. उस ने जैसे ही संदूक खोला, दुर्गंध का भभका उस की नाक में समा गया. संदूक में एक औरत की मुड़ीतुड़ी लाश रखी थी.

लाश देखते ही घर वालों के हाथपांव फूल गए. हुस्ना और मां तो थरथर कांपने लगीं. जैसेतैसे रात गुजारी, सवेरा होते ही नंबरदार को बुलाया तो वह दोनों भाइयों और संदूक ले कर थाने गया था.

मैं ने संदूक खुलवाया, उस में 22-23 साल की एक सुंदर लड़की की लाश थी. मैं ने लाश बाहर निकलवाई. मुझे लाश पर एक चीज दिखाई दी, जिस ने मुझे चौंका दिया. वह चीज थी सोने की झांझर. मुझे तुरंत सांवल की वह बात याद आ गई, जो उस ने कही थी कि गुल्लो सोने की झांझर पहने थी.

इस से मुझे लगा कि कहीं यह सांवल की पत्नी गुल्लो की लाश तो नहीं है. मृतका का गला किसी धारदार हथियार से रेता हुआ लग रहा था. उस के सीने पर भी किसी तेज धारदार हथियार का घाव था.

मैं ने रोशन से पूछा कि उस की मां और पत्नी उन औरतों को पहचान लेंगी. रोशन ने कहा, ‘‘साहब, मेरी मां ने बताया था कि जो औरतें आई थीं, उन में से एक के माथे पर काला मस्सा था. लेकिन वह कहां की रहने वाली थीं, यह वह नहीं पूछ पाई थी.’’

मैं ने लाश के फोटो वगैरह खिंचवा कर उसे पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दिया. रोशन और जैन पर मुझे शक हो रहा था, इसलिए उन्हें मैं ने हवालात में डाल दिया था. यही नहीं, पूछताछ के लिए रोशन की मां और पत्नी हुस्ना को भी बुलवा लिया था. साथ ही एक सिपाही को सांवल को बुलाने के लिए भेज दिया था.

ये भी पढ़ें- Serial Story- फैसला: भाग 2

पर वह घर पर नहीं मिला. तब सिपाही ने उस के घर वालों से सख्त लहजे में कहा था कि वह सांवल को थाने में पेश कर दें, नहीं तो सभी के खिलाफ काररवाई की जाएगी. एक सिपाही को बहलोलपुर सांवल की ससुराल भेज दिया था, ताकि लाश की शिनाख्त हो सके.

करीब 2 घंटे बाद गुल्लो की मां और पिता करमू जाट भी थाने आ गए. करमू जाट एक जमींदार था. मैं ने दोनों को मृतका के फोटो और कपड़े दिखाए तो वे चीखचीख कर रोने लगे. इस से मैं समझ गया कि मरने वाली युवती इन की बेटी गुल्लो ही थी. मां रोरो कर यही कह रही थी कि सांवल ने ही उस की बेटी को मारा है.

पोस्टमार्टम होने के बाद लाश मृतका के मांबाप के हवाले कर दी थी, ताकि वे उस का अंतिम संस्कार कर सकें. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में बताया गया था कि मृतका गुल्लो गर्भवती थी.

जो युवक थाने में संदूक लाए थे, मुझे उन पर तो शक था ही, इस के अलावा मुझे गुल्लो का पति सांवल भी संदिग्ध लग रहा था. इस के अलावा गुल्लो की मां, जो रोतेरोते सांवल पर आरोप लगा रही थी, उस पर भी मैं ने गौर किया. अभी मुझे ऐसा कोई क्लू नहीं दिख रहा था, जिस से केस के खुलने की उम्मीद हो.

मैं इस केस की गुत्थी को जितनी जल्दी सुलझाना चाहता था, उतनी ही यह उलझती जा रही थी. मैं ने हवालात में बंद रोशन और उस के भाई जैन को निकलवा कर उन से ताबड़तोड़ सवाल किए. लेकिन उन से कुछ भी हासिल नहीं हो सका. इस से यही लगा कि इस हत्या में शायद इन का हाथ नहीं है.

अब मैं ने गुल्लो के पति सांवल और उस के प्रेमी शम्स के बारे में विचार किया. दोनों ही लापता थे. मैं ने एक एएसआई को सांवल को गिरफ्तार करने को कहा, साथ ही उस की हवेली की तलाशी लेने को भी कहा. उस का गायब होना मुझे शक में डाल रहा था.

गुल्लो के प्रेमी शम्स की भी कोई सूचना नहीं थी. अब मुझे शक हो रहा था कि कहीं गुल्लो के घर वालों ने शम्स और गुल्लो को एक साथ देख लिया हो, उस के बाद दोनों की हत्या कर दी हो. शम्स की लाश और कहीं डाल दी हो.

Serial Story- काश: भाग 2

रामशरण जी को अपनी सरकारी नौकरी के वे दिन याद आ गए जब उन के औफिस में आने वाला हर व्यक्ति उस महकमे के लिए शिकार समझा जाता था. जिसे काटना और आर्थिकरूप से निचोड़ना हर सरकारी कर्मचारी का प्रथम कर्तव्य था. दूसरों की क्या बातें करें, स्वयं

रामशरण जी प्रत्येक किए जाने वाले कार्य का दाम लगाया करते थे बिना यह जानेसमझे कि सामने वाला किस आर्थिक परिस्थिति का है, उस का कार्य समय पर न किए जाने की दशा में उस का कितना नुकसान हो सकता है.

सरकार की तरफ से मिलने वाला वेतन तो उन के लिए औफिस बेअरिंग चार्जेज जैसा ही था. बाकी जिस को जैसा कार्य करवाना हो उस के अनुसार भुगतान करना आवश्यक होता था.

रामशरण जी के औफिस का अपना नियम था- ‘देदे कर अपना काम करवाएं, न दे कर अपनी बेइज्जती करवाएं.’ और इसी नारे वाले सिद्धांत के तहत काम कर के उन्होंने वसूले गए पैसों से शहर में 5 आलीशान प्रौपर्टीज बना रखी हैं जिन का किराया ही लाखों रुपए में आता है और मिलने वाली पैंशन ज्यों की त्यों बैंक में जमा रहती है.

‘शाबाश बेटा. अपने सिद्धांतों पर सदा कायम रहो,’ रामशरण जी के मुंह से अचानक ही आशीर्वचन फूट पड़े. लेकिन मन ही मन कह रहे थे शादी होने के बाद बढ़ती जरूरतों के आगे सब सिद्धांत धरे के धरे रह जाएंगे.

टीटीई अगले कोच में चला गया और रामशरण जी अपनी बर्थ पर सो गए.

सुबह करीब 10 बजे रामशरण जी अपने गंतव्य स्थल पर पहुंच गए. अभी अपनी बर्थ से उठने का उपक्रम कर ही रहे थे कि लगभग 40 साल का व्यक्ति उन के सामने आ खड़ा हुआ.

ये भी पढ़ें- मेघनाद: आदमी की पहचान उसके गुणों से होती है!

‘सर, आप रामशरण जी हैं?’ उस व्यक्ति ने नम्रता से पूछा.

‘जी, हां, मैं रामशरण ही हूं,’ उन्होंने जवाब दिया.

‘मैं ईरिकशा का ड्राइवर रहमत खान हूं. आप को आप की कैब एट जीरो एट जीरो तक छोड़ने के लिए निर्देशित किया गया हूं,’ वह व्यक्ति बोला.

‘लेकिन मैं ने तो ऐसा कोई निर्देश नहीं दिया. खैर, बाहर तो जाना ही है, सो चलते हैं. कितने चार्जेज लेंगे आप?’ रामशरण जी ने पूछा.

‘आप जैसे बुजुर्गों के अनुभवों का लाभ उठाने और आशीर्वाद पाने के लिए यह सेवा मुफ्त है,’ रहमत खान बोला.

‘क्या बुजुर्गों का इतना सम्मान?’ रामशरण जी आश्चर्य से बोले. बोलने के साथ ही उन्हें यह भी याद आ गया कि एक बार उन के दफ्तर में एक बुजुर्ग किसी छोटे से काम के लिए आ गए थे. यद्यपि काम छोटा सा ही था और रामशरण जी चाहते तो उसे मिनटों में कर देते. लेकिन समस्या, बस, इतनी सी थी कि उसूले के पक्के उस बुजुर्ग ने ऊपर से ‘कुछ’ देने से इनकार कर दिया था. रामशरण जी ने तब उसे इतना परेशान कर दिया था कि भूख के मारे वह बूढ़ा गश खा कर गिर पड़ा था. बौस के हस्तक्षेप के बाद रामशरण जी को उस खूसट का काम मुफ्त

में करना पड़ा था.

‘जी, हां, आप तो हमारे देश कि धरोहर हैं. आप के अनुभवों से ही तो शिक्षा ग्रहण कर हमें आगे बढ़ना है,’ रहमत खान रिकशा चलाते हुए बोला, ‘लीजिए यह रही आप की टैक्सी कैब एट जीरो एट जीरो.’

‘इतनी भीड़ में से प्लेटफौर्म नंबर 5 से पार कर के यहां टैक्सी तक आना सचमुच एक दुष्कर कार्य था. आप का बहुतबहुत धन्यवाद. यह रहा आपका ईनाम,’ कहते हुए रामशरण जी ने ड्राइवर की तरफ 50 रुपए का एक नोट बढ़ा दिया.

‘जी धन्यवाद, मगर मैं इस तरह के ईनाम या बख्शिश को स्वीकार नहीं कर सकता. मैं अपनी कमाई से सुखी जीवन व्यतीत कर रह हूं. मुझे मेरी मेहनत का पर्याप्त पैसा मेरे नियोक्ता द्वारा दिया जा रहा है. वैसे भी, आप जो दे रहे हैं उसे साधारण भाषा में रिश्वत कहते है और उस का आधुनिक भारत में कोई स्थान नहीं है,’ ड्राइवर रहमत खान मुसकराते हुए बोला.

टीटीई के बाद एक छोटे से ड्राइवर की ईमानदारी ने रामशरण जी को सोचने पर विवश कर दिया. उन के लिए यह अनुभव बहुत ही शर्मिंदगीभरा था.

‘क्या यह टैक्सी एट जीरो एट जीरो भी फ्री है?’ रामशरण जी ने अचकचाते हुए रिकशा के ड्राइवर से पूछा.

‘जी, नहीं. मगर इस में आप को सिर्फ 30 फीसदी किराया ही देना होगा,’ रिकशा के ड्राइवर ने बतलाया.

ये भी पढ़ें- बहके कदम: आखिर क्यों बहके उषा के कदम?

‘क्या आप ही रामशरण जी हैं?’ कैब के ड्राइवर ने टैक्सी का दरवाज़ा खोलते हुए पूछा.

‘जी, हां, मैं ही रामशरण हूं,’ जवाब में रामशरण जी ने बोला.

‘कृपया अपना आधारकार्ड दे दीजिए. उसे सिस्टम में अपडेट करना आवश्यक है,’ ड्राइवर बोला. डिटेल्स फीड होते ही कैब अपनी रफ़्तार से चल पड़ी. लगभग डेढ़ घंटे चलने के बाद कैब अपने गंतव्य स्थान पर थी. फेयर मीटर 930 रुपए का चार्ज बतला रहा था.

‘कितने पैसे हुए, भैया?’ रामशरण जी ने पूछा यद्यपि वे जानते थे कि उन्हें 30 फीसदी के हिसाब से 310 रुपए ही देना है.

‘279 रुपए, सर,’ कैब ड्राइवर कैलकुलेशन करने के बाद बोला.

‘अरे भैया, ठीक से कैलकुलेशन करो. 930 का थर्टी परसैंट 310 होता है, न कि 279. अपना नुकसान क्यों कर रहे हैं? आप को जेब से भरना पड़ेगा,’ रामशरण जी ने कहा.

‘जी, आप जैसे बाहर से आए हुए बुजुर्गों के लिए कैब कंपनी ने कुल बिल का 10 परसैंट डिस्काउंट औफर भी दिया हुआ है. सो 310 का 10 परसैंट 279 ही हुआ ना,’ कैब ड्राइवर मुसकराकर समझाता हुआ बोला.

‘अच्छा, अच्छा. यह लो 300 रुपए और बचे हुए पैसे अपने पास रख लो,’ रामशरण जी बोले.

Serial Story- काश: भाग 3

‘अरे जनाब, कमाल की बातें करते हैं आप. जिन पैसों पर मेरा हक नहीं, उन्हें कैसे ले लूं? क्या आप मेरे ईमान का इम्तिहान ले रहे हैं? कुदरत का करम है साहब हम पर. हमें अपनी मेहनत के अलावा नया पैसा भी नहीं चाहिए.’ स्पष्ट था कि कैब का ड्राइवर ज्यादा पढ़ालिखा नहीं था,

मगर फालतू पैसे लेना उसे गवारा नहीं था.

‘लीजिए साहब, यह आप के  21 रुपए. यदि पैसा देना ही है तो किसी मांगने वाले फ़कीर को दे दीजिए,’ ड्राइवर पैसे वापस करता हुआ बोला.

रामशरण जी का यह लगातार 3 विभिन्न स्तर के व्यक्तियों द्वारा किया गया अपमान था.

इतनी ईमानदारी व खुद्दारी कि बातें सुन कर रामशरण जी को ऐसा लगा मानो वे भारत में नहीं, किसी और देश में आ गए हैं. वर्ष दो हज़ार पचास (2050) का भारत इतना ईमानदार, खुद्दार. भ्रष्टाचार जैसे शब्दों से कोसों दूर. उन्हें तो यह विश्वास ही नहीं हो रहा था.

इस भारत पर रामशरण जी मन ही मन गर्व कर रहे थे. साथ ही साथ, वे अपनेआप को धिक्कार रहे थे अपने द्वारा किए गए भ्रष्टाचारों के लिए. वे सोच में पड़ गए..काश, स्वयं उन्होंने भी इन युवाओं की भांति राष्ट्रहित को व्यक्तिगत हितों के ऊपर रखा होता तो देश मीलों आगे होता.

मगर इतना बदलाव हुआ कैसे? 2020 में ही तो उन्होंने रिटायरमैंट लिया है. 70 सालों में जो देश भ्रष्टाचार को ख़त्म नहीं कर पाया था, मात्र 30 सालों में भारत इतना परिवर्तित कैसे हो गया? रामशरण जी इस बदलाव का कारण जानने के लिए अतिउत्सुक थे.

ये भी पढ़ें- मां: आखिर मां तो मां ही होती है

मृतक के अंतिम संस्कार के बाद सभी लोग हौल में बैठे हुए थे. माहौल थोड़ा हलका हो गया था. अपनी उम्र के लोगों के बीच बैठे रामशरण जी ने अपने साथ घटित हुई तीनों घटनाएं सुनाईं.

‘इस में आश्चर्य की क्या बात, अंकल जी. यह तो भारतवर्ष का पुनर्निर्माण चल रहा है. अब इस युवा पीढ़ी ने ठान लिया है कि भ्रष्टाचार नाम का शब्द हमारे शब्दकोष से हटाना ही है. इस भ्रष्टाचार के कारण न सिर्फ अपनों में, बल्कि अजनबियों और अंजानों में भी हमें नीचा देखना

पड़ा है,’ पास ही बैठा एक युवक बोल पड़ा जो इन लोगों की बातें सुन रहा था.

‘मगर यह हो किस की प्रेरणा से रहा है और इस के पीछे कारण क्या हैं?’ रामशरण जी ने कुतूहल से पूछा.

‘इस के पीछे किसी व्यक्तिविशेष की प्रेरणा नहीं है. बस, सब लोग अपने आत्मबल की प्रेरणा से अपने आत्मसम्मान को बचाने के लिए यह कार्य कर रहे है. विदेशियों द्वारा दिया गया भ्रष्ट भारतीय का तमगा इस युवा पीढ़ी को नागवार और अपमानित गुजरा. शायद यही कारण है

कि यहां के लोगों ने रिश्वत, नज़राना, उपहार, ईनाम और बख्शिश जैसे नामों से मिलने वाले पैसों का बहिष्कार पूरी नम्रता के साथ कर दिया है.

‘नई शिक्षा प्रणाली का भी इस में बड़ा योगदान है. आप लोगों के समय में आप लोग हमारे पिछले शासकों की वीरता, अंगरेजों से गुलामी मुक्ति की गाथा, सभ्यता का विकास और प्रेरणाशून्य कहानियां व कविताएं पढ़ा करते थे.

‘नई शिक्षा प्रणाली में पहली कक्षा से ही यह बतलाना शुरू कर दिया जाता है कि भ्रष्टाचार क्या है. भ्रष्टाचार के प्रकार और रूप क्याक्या हैं. भ्रष्टाचार से हमारे देश को क्याक्या नुकसान हैं. इस के कारण से हम प्रगति की रफ़्तार में किस सीमा तक पिछड़ रहे हैं. भ्रष्टाचार करने के बाद पकड़े गए लोगों को दी गई कड़ी सजा का भी पूरे विस्तार से वर्णन किया गया है.

‘इन कहानियों में भ्रष्टाचारियों को मिली सामजिक प्रताड़ना का जिक्र भी किया गया है तथा यह भी सुझाया गया है कि भ्रष्टाचारियों को आजीवन सामाजिक पृथक्करण जैसी सजाएं भी दी जानी चाहिए. इस तरह की कहानियों का आज की युवा पीढ़ी के बाल मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव पड़ा है और उसी परिवर्तन को आप देख व महसूस कर रहे हैं.

ये भी पढ़ें- समझौता: क्या देवर की शादी में गई शिखा

‘यही नहीं, ईश्वर क्या है? एक अनजाना, अज्ञात भय ही न? नई शिक्षा प्रणाली में भ्रष्टाचार के प्रति एक अनजाना भय पैदा करने कि सफल कोशिश भी की गई है ताकि लोग भ्रष्टाचार को दूर से ही सलाम करें,’ युवक ने एक ही सांस में अपनी पूरी बात कह दी.

‘काश, हमारे समय में भी शिक्षा प्रणाली ने इस तरह के परिवर्तन स्वीकार किए होते, तो शायद आज भारत की तसवीर भी बेदाग़ और साफ़ छवि वाली होती. हम लोग भी इस दलदल से मुक्त होते. भारत की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक स्थिति कहीं और अधिक सुदृढ़

होती,’ रामशरण जी बोल उठे.

“अजी, सुबह के 7 बज गए हैं, आज औफिस जाने का मूड नहीं है क्या?” पत्नी उन के चेहरे से कम्बल हटाती हुई बोली.

‘ओह, तो यह एक सपना था,’ रामशरण जी बुदबुदाए.

कहते हैं, सुबह का सपना सच होता है. काश, यह सपना भी सच हो जाए. काश, हमारी शिक्षा प्रणाली में इस तरह के सकारात्मक परिवर्तन आ जाएं. रही बात मेरी स्वयं की, तो मैं स्वयं किसी भी स्तर पर भ्रष्टाचार न करने और अपने काम को पूरी ईमानदारी से करने की कसम खाता हूं.

ये भी पढ़ें- अनोखा सबक: टीकाचंद के किस बात से दारोगाजी हैरान रह गए

रामशरण जी ने मन ही मन प्रण किया और एक झटके में बिस्तर से बाहर आ गए.

काश…

Serial Story- काश: भाग 1

रात के डेढ़ बज रहे थे. ट्रेन प्लेटफौर्म पर रुकी. 80-वर्षीय रामशरण जी सामने आए रिजर्वेशन कोच में चढ़ गए. उन के जाने का प्रोग्राम अचानक बना है और जाना अत्यंत जरूरी भी है. सो, वे बिना रिजर्वेशन के ही उस कोच में घुस गए थे.

उन्हें पूरा यकीन था कि अभी टीटीई आ कर उन्हें दसबीस खरीखोटी सुनाएगा और फिर जुर्माने का डर दिखला कर बिना रसीद दिए ही किसी सीट को एहसान के साथ अलौट कर देगा.

जिस कोच में रामशरण जी चढ़े थे, संयोग से उस मे उन्हें सामने वाली ही सीट खली दिखाई पड़ गई और वे उस पर जा कर बैठ गए. ट्रेन अपनी रफ़्तार से आगे बढ़ गई. अभी कुछ मिनट ही गुजरे थे कि सामने टीटीई आ कर खड़ा हो गया. टीटीई तकरीबन 27-28 साल का नवयुवक था.

‘आप अपना टिकट दिखलाएंगे, अंकल,’ टीटीई बोला.

‘जी, यह देखिए मेरा टिकट. यह सामान्य श्रेणी का है. मेरे जाने का प्रोग्राम एकदम आकस्मिक बना, इसी कारण रिजर्वेशन नहीं करवा पाया. कृपया कोई बर्थ हो तो दे दीजिए,’ रामशरण जी अनुरोध करते हुए बोले.

‘क्या मैं आप के इस आकस्मिक कारण को जान सकता हूं?’ टीटीई के स्वर में अभी भी नरमी थी और रामशरण जी इस नरमी के मर्म को अच्छे से जानते थे. इस नरमी की आड़ में तगड़े पैसे खींचने की साजिश को भी वे अच्छे से जानते थे. वे स्वयं भी किसी ज़माने में सरकारी

अधिकारी रह चुके थे, सो, इन पैतरों को भलीभांति जानते थे.

‘जी, मेरे ताऊ जी के हमउम्र पुत्र का निधन हो गया है. वह मेरे काफी करीब था. इसी समाचार के कारण मुझे तुरंत निकलना पड़ा. चूंकि वह मेरी पीढ़ी का था, इसी कारण नई पीढ़ी के लोगों से उस का संपर्क नहीं के बराबर था. हम साथ खेलेबढे हुए हैं, सो, मैं ने स्वयं जाने का निर्णय

लिया. आप मुझे जो भी बर्थ उपलब्ध हो, दे दीजिए. जैसा भी कुछ होगा, हम एडजस्ट कर लेंगे,’ रामशरण जी संकेतों के माध्यम से अपने मंतव्य को समझाते हुए बोले.

ये भी पढ़ें- पैबंद: रमा की जिंदगी में मदन ने कैसे भरा प्यार का रंग

‘इस संदर्भ में क्या आप कोई प्रमाण प्रस्तुत कर सकते हैं?’ टीटीई ने प्रश्न किया.

‘जी, यह देखिए मेरे मोबाइल पर यह व्हाट्सऐप मैसेज. यह मुझे रात को 9 बजे मिला है,’ रामशरण जी अपना मोबाइल दिखाते हुए बोले.

‘जी, ठीक है,’ मैसेज चैक करते हुए टीटीई बोला.

‘क्या कुछ संभावनाए है बर्थ मिलने की?’ रामशरण जी ने आशाभरे स्वर में पूछा.

‘जी, निश्चिततौर पर आप को बर्थ मिल जाएगी. मैं एडजस्टमैंट देख कर आता हूं,’ कह कर टीटीई अगले कोच की तरफ बढ़ गया.

रामशरण जी की घनी सफ़ेद मूछों के बीच हलकी सी मुसकराहट फ़ैल गई. उन्हें गवर्नमैंट सर्विस से रिटायर हुए 20 वर्ष से अधिक गुजर चुके हैं मगर शिकार को फांसने के तरीके अभी भी वही सदियों पुराने ही हैं. नम्रता और शिष्टाचार जिस शब्द एडजस्टमैंट के नीचे दबे हुए  उस का प्रयोग टीटीई महोदय बड़ी चालाकी से कर के निकल गए हैं.

अभी 5-6 मिनट ही गुजरे थे कि वही टीटीई सामने से आता हुआ दिखाई दिया. उस का रटारटाया उत्तर रामशरण जी जानते थे. उन्हें पता था वह कहेगा बड़ी मुश्किल से एक बर्थ का जुगाड़ हुआ है. और अलौटमैंट के नाम पर टिकट चार्जेज के अलावा 5-6 सौ या कुछ और ज्यादा रुपए मांगेगा यह एहसास दिलाते हुए कि वह गलत कोच में चढ़ने का जुरमाना उन से नहीं ले रहा है.

‘अंकल जी, आप एस वन औब्लिग ओ कोच की 4 नंबर बर्थ पर चले जाइए,’ टीटीई ने रामशरण जी के पास आ कर नम्रता से कहा.

‘एस वन औब्लिग ओ? यह कौन सा कोच है? इस तरह का कोच तो मैं पहली बार सुन रहा हूं,’ रामशरण जी कुछ अविश्वसनीयता से बोले.

‘आधा कोच बुजुर्गों के लिए आरक्षित रहता है उस कोच में, इसी कारण उस में औब्लिग ओ का प्रयोग किया गया है. ओ का मतलब ओल्ड एज से है,’ टीटीई बोला, ‘यह हिस्सा यात्रा कर रहे उन बुजुर्गों के लिए है जोकि अकेले यात्रा कर रहे हैं. परिवार या पार्टी के साथ सफर कर रहे लोगों को उस में जगह नहीं दी जाती है.’

ये भी पढ़ें- फैसला: मां ने कैसे सुलझा दी समस्या

‘ओह, रिटायरमैंट के बाद तो मैं ने अकेले सफर कभी किया ही नहीं. इसी कारण मुझे इस संदर्भ में कुछ भी मालूम नहीं,’ रामशरण जी झेंपते हुए बोले, ‘कितनी दूर है यह कोच?’

‘यहां से 5वां कोच है. चलिए, मैं आप को छोड़ देता हूं,’ टीटीई उसी नम्र अंदाज में बोला.

‘अरे, आप क्यों तकलीफ करते हैं. मैं खुद ही धीरेधीरे चला जाऊंगा,’ रामशरण जी बोले. वे यह भी जानते थे कि टीटीई कि नम्रता का अर्थ ईद के ठीक पहले काटे जाने वाले बकरे सा ही है.

‘इस में तकलीफ कैसी? यह मेरी ड्यूटी का एक हिस्सा ही है. आप को निर्धारित बर्थ तक पहुंचा कर मुझे ख़ुशी ही होगी,’ टीटीई धीमे से बोला.

रामशरण जी आश्चर्यचकित थे. इस युवा के विनम्रतापूर्वक भ्रष्टाचार कि रूपरेखा बनाने के. वरना उन के रिटायरमैंट के समय तो ‘पार्टी’ से पैसा भी लिया जाता था तो पूरी दबंगई के साथ. वहीं ‘पार्टी’ को दोचार गालियां उपहारस्वरूप दी जाती थीं अलग से.

नए कोच में जाते समय टीटीई रास्ते में रामशरण जी के परिवार के बारे में तथा मरने वाले व्यक्ति से संबंधों के बारे में विस्तार से पूछता रहा.

‘लीजिए अंकल जी, आप की बर्थ आ गई. आप आराम से लेटिए. कोई आप को डिस्टर्ब नहीं करेगा. और हां, उतरने के बाद आप को लेने कोई स्टेशन पर आएगा क्या?’

‘जी धन्यवाद. ऐसे माहौल में मुझे नहीं लगता कि कोई रिसीव करने के लिए आ पाएगा. वैसे भी, मैं ने अपने आने की सूचना किसी को दी ही नहीं है,’ रामशरण जी बोले.

‘यदि आप चाहें तो आप के लिए टैक्सी बुक की जा सकती है,’ टीटीई ने कहा.

ओह, तो अब इन लोगों का पेट सिर्फ टिकट के ऊपरी पैसों से नहीं भरता. टैक्सी तक में अपना कमीशन फिक्स कर लिया है. लेकिन टैक्सी की तो जरूरत पड़ेगी ही. सो, क्यों न टीटीई के माध्यम से ही करवा ली जाए ताकि इस पर भी कुछ एहसान रहे. यही सब सोच कर रामशरण जी बोले, ‘जी हां, करवा दीजिए.’

‘लीजिए आप की टैक्सी भी बुक हो गई है. आप को स्टेशन से बाहर निकलते ही ग्रीन लेन में टैक्सी नंबर एट जीरो एट जीरो में बैठना है,’ टीटीई की नम्रता की भाषा अभी भी कायम थी.

‘थैंक्यू बेटा,’ कह कर रामशरण जी ने टीटीई का कंधा थपथपा दिया. उन्हें आशा थी कि अब जाते समय वह अपना मुंह फाड़ेगा.

ये भी पढ़ें- जुआरी: क्या थी बड़े भैया की वसीयत

‘कोई बात नहीं, अंकल. इट इज अ पार्ट औफ़ माय ड्यूटी,’ कह कर टीटीई ने अपने हाथ जोड़ लिए और वंहा से जाने लगा.

‘बेटा, कितने पैसे हुए तुम्हारे?’ बढ़ी हुई धड़कन के साथ आखिरकार रामशरण जी ने ही पूछ लिया.

‘किसी तरह के कोई पैसों कि आवश्यकता नहीं है,’ टीटीई एक बार फिर हाथ जोड़ कर बोला.

‘क्या, क्यों…’ रामशरण जी ने आश्चर्य से पूछा.

‘क्योंकि जिस कोच में आप बैठे हैं इस में से 10 बर्थ आपजैसे अकेले व आकस्मिकरूप से यात्रा करने वालों के लिए आरक्षित हैं. आपने जो टिकट लिया है उस में यह सब एडजस्ट हो चुका है,’ टीटीई ने बताया.

‘क्या… मगर वह तो साधारण दर्जे का था,’ रामशरण जी बोले.

‘जी, यह योजना पिछले 2 सालों से चल रही है. आपजैसे बुजुर्गों को जिन्हें कहीं आकस्मिक कारणों से जाना पड़ता है उन्हें साधारण दर्जे के किराए में मुफ्त सुरक्षित यात्रा रेलवे द्वारा करवाई जाती है,’ टीटीई ने विवरण दिया.

‘मगर इस यात्रा के वास्तविक कारणों का निर्धारण होता कैसे है?’ रामशरण जी ने उत्सुकता से पूछा.

‘आप के कारण की जांच आप के मोबाइल मैसेज द्वारा की गई है. इसी तरह हौस्पिटल की पर्ची या अन्य कोई भी प्रामाणिक प्रमाण जो मान्य हो के द्वारा कारण का निर्धारण होता है. यहां पर यह बतलाना आवश्यक है कि यह सुविधा सिर्फ अकेले व आकस्मिक कारणों से यात्रा करने वाले बुजुर्गों के लिए ही है. परिवार या पार्टी या ग्रुप में जा रहे लोगों के लिए नहीं,’ टीटीई ने बतलाया.

‘यह तो बड़ी ख़ुशी की बात है कि सरकार बुजुर्गों को इतना महत्त्व दे रही है,’ रामशरण जी खुश होते हुए बोले, ‘मगर इस तरह से बर्थ अलौट करते समय तुम मुझ से कुछ अतिरिक्त पैसे ले सकते थे. यह कुछ गलत भी नहीं है. सेवाशुल्क लेना तो आप का अधिकार बनता है.’ यह कहते हुए रामशरण जी ने 500 रुपए का नोट टीटीई की तरफ बढ़ाया.

‘जी धन्यवाद. मैं इसे ले नहीं सकता. मैं ने अपनी तरफ से कोई अतिरिक्त सुविधा आप को नहीं दी है. आप के आशीर्वाद से सरकार की तरफ से मुझे इतनी सैलरी मिल ही जाती है कि मुझे किसी तरह की बेईमानी नहीं करनी पड़ती है,’ टीटीई हाथ जोड़ कर नम्रता से बोला.

नाबालिगों के खून से “रंगे हाथ”!

जब कोई किसी की हत्या कर देता है तो समाज, कानून और हम सोच में पड़ जाते हैं. मगर जब कोई किशोर, नाबालिक किसी “अपने” की ही हत्या कर देता है तो एक गहरा सनाका खींच जाता है. एक चींटी को भी मारने से पहले कोई मनुष्य कई कई बार सोचता है. दरअसल, मानव का मनोविज्ञान ही शांति भाव से सहजीवन है. ऐसे में कुछ परिस्थितियां ऐसी विकट हो जाती है कि बड़े बूढ़े, जवान तो क्या कभी-कभी किसी नाबालिग के हाथों भी अपने अथवा गैर की हत्या जैसा नृशंस कांड घटित हो जाता है.जो समाज को यह सोचने पर मजबूर करता है कि आज डिप्रेशन… तनाव और छोटी-छोटी बातों पर क्रोध के कारण ऐसी घटनाएं घटित हो रही हैं. जो मानव समाज के लिए एक गंभीर शोध और चिंता का सबब है.

आज इस रिपोर्ट में हम ऐसे ही कुछ घटनाक्रमों पर दृष्टिपात कर रहे हैं और यह स्पष्ट करना चाहते हैं कि ऐसा क्यों और किस लिए हो रहा है. और ऐसी घटनाओं को किस तरह रोका जा सकता है.

ये भी पढ़ें- Crime Story: मेरी नहीं तो किसी की नहीं- भाग 1

पहला घटनाक्रम-

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के तेलीबांधा में एक 15 वर्ष के नाबालिक ने जब उसकी साइकिल एक पड़ोसी के हाथों क्षतिग्रस्त हो गई तो गुस्से में आकर पड़ोसी को मार डाला.

दूसरा घटनाक्रम-

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक 16 वर्ष के लड़के के हाथों अपने ही एक दोस्त की हत्या हो गई, क्योंकि वह उसे गाली गलौज कर रहा था उसकी मां को गाली दी थी.

तीसरा घटनाक्रम-

जिला कोरबा के पाली थाना अंतर्गत ग्राम नूनेरा में एक किशोर बालक में अपने ही चाचा की हत्या कर दी क्योंकि चाचा उसे कुछ सीख दे रहा था और डांट भी रहा था.

ऐसी ही अनेक घटनाएं हमारे आस पास अचानक ही घट जाती हैं और हम सन्नाटे में रह जाते हैं. आइए! देखते हैं कि ऐसी घटनाएं क्यों घट रही हैं, और कैसे रोका जा सकता है.

ये भी पढ़ें- Crime Story- पराई औरत से मोहब्बत

गुस्से में दादी को मार डाला

छोटी उम्र में अगर कोई नशे का आदी हो जाता है तो यह उसके लिए भयंकर साबित हो सकता है. यह इस एक घटनाक्रम से स्पष्ट हो जाता है. सरगुजा जिले के सीतापुर थाना क्षेत्र के ग्राम पंचायत भिठुआ में 15 वर्षीय नाबालिग बालक के हाथ खून से रंग‌ गए. दरअसल, उसकी दादी ने उसे तंबाकू खाने से मना किया था, जिससे आहत होकर उसने यह कदम उठाया.

सीतापुर थाना जांच अधिकारी के अनुसार सीतापुर थाना क्षेत्र के ग्राम भिठुआ ढाबपारा निवासी एक बुजुर्ग ने जानकारी दी कि उसका नाती तम्बाकू का सेवन करता था. तम्बाकू सेवन करने से मना करने पर उसने गुस्से में आकर अपनी दादी फिरतीन बाई की हत्या कर दी

यहां यह महत्वपूर्ण है कि सरगुजा को एक अप्रैल से तंबाकू मुक्त बनाने जिला कलेक्टर व स्वास्थ्य विभाग के द्वारा लोगों को जागरूकता अभियान चलाया जा रहा है. लेकिन इस जागरूकता का असर ग्रामीण क्षेत्रों में दिखाई नहीं दे रहा है, जहां तंबाकू के सेवन से कैंसर जैसी जानलेवा बीमारी का सामना करना पड़ता है. वही हत्या और आत्महत्या जैसी घटनाएं भी प्रकाश में आ रही हैं.

कैसे मिल सकती है निजात

दरअसल, पम्पहाउस नाबालिक बच्चों को सही मार्गदर्शन और संवेदना के साथ एक ऐसा बेहतर माहौल मिलना चाहिए जिससे उनमें मानवीय भावना और आपसी स्नेह का संचार हो, जब इन सब चीजों का अभाव होता है और घर और समाज में तनाव बढ़ने लगता है माता-पिता अन्य परिजन आपसी विवाद में घर को जबरन असहज बनाने लगते हैं तो धीरे धीरे छोटे बच्चों में इसका गंभीर असर होने लगता है. यही कारण है कि छोटे बच्चे जिनका समय शिक्षा एवं आपसी प्रेम में व्यतीत होना चाहिए वे भटक जाते हैं और क्रूर होने लगते हैं. परिणाम स्वरूप या तो छोटे बच्चे अवसाद में आकर आत्महत्या कर लेते हैं या फिर किसी की हत्या कर देते हैं. यह दोनों ही तो स्थितियां समाज के लिए चिंता का विषय है.

मनोविज्ञान के जानकार संगीत शिक्षक घनश्याम तिवारी का मानना है कि ऐसी परिस्थितियां इसलिए निर्मित होती है क्योंकि परिवार का माहौल असंवेदनशील होता है. नित्य माता पिता यानी पति पत्नी की तनावपूर्ण बातचीत व्यवहार का बच्चों में गंभीर असर होने लगता है और परिणाम स्वरूप बड़ी घटना घट जाती है.

ये भी पढ़ें- Crime Story- अवैध ख्वाहिश का नतीजा

डॉक्टर गुलाब राय पंजवानी के मुताबिक घर का माहौल ही इसके लिए सबसे जिम्मेवार है अगर माता-पिता संवेदनशील है तो बच्चों में भी आपसी प्रेम की भावना उत्पन्न हो सकती है अन्यथा वे भटक सकते हैं.

पुलिस अधिकारी इंद्र भूषण सिंह के मुताबिक अनेक दफा ऐसे गंभीर मामले प्रकाश में आए हैं जब बच्चों अथवा नाबालिगों के द्वारा आत्महत्या या हत्या की घटना घटित हुई है जांच में यह तथ्य सामने आता है कि घर और आसपास के माहौल के कारण बच्चे दिशा से भटक गए.

Crime Story: मेरी नहीं तो किसी की नहीं- भाग 1

लेखक- विजय पांडेय/श्वेता पांडेय

सौजन्य- सत्यकथा

प्यार एक अहसास है, जब होता है तो अनूठी अनुभूति होती है. ऐसा न हो तो समझ लीजिए महज आकर्षण है. चंद्रशेखर रूपा के आकर्षण को प्यार समझ बैठा, यही उस की भूल थी और इसी भूल में उस ने वह कर डाला जो…

रूपा परेशान थी. सड़क किनारे खड़ी वह कभी सड़क पर आतीजाती गाडि़यों को देखती

तो कभी कलाई घड़ी की ओर. जैसेजैसे घड़ी की सुइयां आगे को सरक रही थीं, उस की बेचैनी भी बढ़ती जा रही थी. परेशान लहजे में वह स्वयं ही बड़बड़ाई, ‘लगता है, आज फिर लेट हो जाऊंगी कालेज के लिए.’

उस के चेहरे पर झुंझलाहट के भाव नुमाया हो रहे थे. एक बार फिर उस ने उम्मीद भरी निगाहों से दाईं ओर देखा. कोई चार पहिया मार्शल गाड़ी आ

रही थी. रूपा ने इशारा कर के गाड़ी रुकवा ली.

ड्राइवर ने उस से पूछा, ‘‘कहां जाना है?’’

‘‘मैं कालेज जाने को लेट हो रही हूं. कोई साधन नहीं मिल रहा. अगर आप मुझे लिफ्ट दे देंगे तो मेहरबानी होगी.’’ रूपा बोली.

‘‘हां हां, मैं कालेज की ओर ही जा रहा हूं. आओ, मैं तुम्हें छोड़ दूंगा.’’ कहते हुए ड्राइवर ने गेट खोल दिया.

रूपा तनिक झिझकी फिर ड्राइवर की बगल वाली सीट पर जा बैठी.

बेलसोंडा से उस का कालेज करीब 8 किलेमीटर दूर महासमुंद में था. वह करीब 10 मिनट में अपने कालेज पहुंच गई.

कालेज के सामने पहुंचते ही ड्राइवर ने गाड़ी रोक दी. उतर कर रूपा थैंक यू कह कर तेज कदमों से चली ही थी कि ड्राइवर ने उसे आवाज दी, ‘‘सुनो…’’

सुनते ही रूपा ने ड्राइवर की तरफ पलट कर देखा तो ड्राइवर ने रुमाल उठा कर रूपा की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘ये शायद आप का है.’’

गुलाबी रंग के उस रुमाल के एक किनारे पर सफेद रंग के थागे से कढ़ाई की गई थी. उस पर रूपा लिखा हुआ था.

ये भी पढ़ें- Crime Story- पराई औरत से मोहब्बत

‘‘हां, मेरा ही है.’’ रूपा उस से रुमाल लेते हुए बोली.

‘‘आप का नाम रूपा है?’’ ड्राइवर ने पूछा. रूपा ने हौले से सिर हिला दिया और मुसकरा कर कालेज की तरफ चली गई.

ड्राइवर तब तक रूपा को देखता रहा जब तक वह दिखाई देती रही. रूपा के ओझल होते होने के बाद ही वह वहां से गया. युवक ड्राइवर का नाम चंद्रशेखर था और वह नदी मोड़ घोड़ारी का रहने वाला था. रूपा से वह बहुत प्रभावित हुआ.

इस रूट पर उस का अकसर आनाजाना होता था. इस के बाद वह रूपा के आनेजाने के समय उस रोड पर चक्कर लगाने लगा.

जब भी रूपा उसे मिलती, वह ऐसा जाहिर करता मानो अचानक उस से मुलाकात हो गई हो. वह रूपा को कार से उस के कालेज तक और कभी कालेज से उस के घर के पास तक छोड़ देता.

रूपा इस बात को समझने लगी थी कि इत्तफाक बारबार नहीं होता.

महीने में वह कई बार महासमुंद से बेलसोंडा और बेलसोंडा से महासमुंद आईगई होगी.

सफर भले ही 10 मिनट का होता था लेकिन दोनों को सुकून चौबीस घंटे के लिए मिल जाया करता था. इस बीच दोनों एकदूसरे के बारे  में काफी कुछ जान चुके थे. इस छोटी सी यात्रा के दरमियान दोनों एकदूसरे से खुल गए थे. धीरेधीरे दोनों के बीच नजदीकियां बढ़ती गईं और कभीकभी वे गाड़ी से लंबी दूरी के लिए घूमने निकलने लगे.

एक दिन चंद्रशेखर लौंग ड्राइव पर निकला तो मार्शल गाड़ी के मालिक ने उसे देख लिया. मालिक ने उस समय तो कुछ नहीं कहा लेकिन शाम को उस ने चंद्रशेखर से पूछा, ‘‘तुम गाड़ी में किस लड़की को बिठा कर घूमते हो?’’

‘‘साहब, किसी को ले कर नहीं घूमता. बस एकदो बार बेलसोंडा की रहने वाली एक लड़की को उस के कालेज तक छोड़ा था. इस से ज्यादा कुछ नहीं.’’

चंद्रशेखर ने आगे कहा, ‘‘साहब,मैं पूरी ईमानदारी के साथ आप की सेवा करता रहा हूं. आप के हर आदेश पर मैं ने तुरंत अमल किया है और आप इतनी सी बात को ले कर मुझ पर नाराज हो रहे हैं.’’

मार्शल के मालिक ने साफसाफ कह दिया, ‘‘तुम्हारे लिए यह इतनी सी बात होगी लेकिन कल को कोई ऊंचनीच हो गई तो जवाबदेही तो मेरी होगी. अगर तुम्हें नौकरी करनी है तो ठीक से करो. सैरसपाटे के इतने ही शौकीन हो तो खुद की गाड़ी खरीद लो. फिर जहां चाहो, जिसे चाहो बिठा कर घूमते रहना.’’ मालिक ने दोटूक कह दिया.

ये भी पढ़ें- Crime Story- अवैध ख्वाहिश का नतीजा

चंद्रशेखर को मालिक की बात चुभ गई. उस ने बिना किसी पूर्वसूचना के नौकरी छोड़ दी. दूसरेतीसरे दिन वह रूपा से एक निश्चित जगह पर मिलने पहुंचा. वह अपनी बाइक से गया था. बाइक की सीट पर बैठा वह रूपा का इंतजार कर रहा था.

कुछ देर बाद रूपा वहां पहुंची. रूपा के बोलने से पहले ही चंद्रशेखर ने कहा, ‘‘बाइक पर बैठो.’’

रूपा बाइक पर बैठ गई तो वह बाइक ले कर चल दिया. उस वक्त उस की बाइक का रुख महासमुंद की ओर न हो कर रायपुर जाने वाली सड़क की ओर था. रूपा को यह पता नहीं था कि उस के प्रेमी ने नौकरी छोड़ दी है.

अगले भाग में पढ़ें- क्या रूपा और चंद्रशेखर का प्यार खत्म हो गया

Crime Story: मेरी नहीं तो किसी की नहीं- भाग 3

लेखक- विजय पांडेय/श्वेता पांडेय

सौजन्य- सत्यकथा

उस ने चंद्रशेखर की आवाज को कोई तरजीह नहीं दी. फिर वह उस ओर चला गया, जहां एक पेड़ के नीचे उस की बाइक खड़ी थी. सोचों का बवंडर चंद्रशेखर को झकझोरने लगा था. रूपा आखिर इतनी निर्मोही, बेमुरव्वत कैसे हो गई. वह अपने गांव की ओर बढ़ चला.

2 पखवाड़े बाद उस ने रूपा से मिलने का मंसूबा बनाया. किसी तरह से वह रूपा से मिलने में कामयाब भी रहा. अब की बार वह रूपा से मिल कर ठोस निर्णय लेने के पक्ष में था. वह उस स्थान पर खड़ा रहा, जहां पर रूपा से

मिलना था.

रूपा वहां आई, काफी इंतजार करवाने के बाद वह चंद्रशेखर से मिली. चंद्रशेखर ने किसी तरह की भूमिका नहीं बांधी. वह सीधे मुद्दे पर आ गया, ‘‘रूपा, मैं तुम से शादी करना चाहता हूं.’’

रूपा ने उसी अंदाज में जवाब दिया, ‘‘मैं तुम से शादी नहीं कर सकती.’’

चंद्रशेखर रूपा की ओर टकटकी लगा कर देखता हुआ बोला, ‘‘आखिर, तुम मुझ से शादी क्यों नहीं कर सकतीं? अच्छाभला कमा लेता हूं. घर से भी संपन्न हूं. अपनी हैसियत से बढ़ कर तुम्हें वह सब कुछ देने का प्रयास करूंगा, जिस की तुम ख्वाहिश रखती होगी.’’

‘‘चंद्रशेखर, मैं साफसाफ बता देती हूं कि मैं तुम से किसी भी कीमत पर शादी नहीं कर सकती.’’

चंद्रशेखर कुछ बोलने वाला ही था कि रूपा ने हाथ उठा कर चुप रहने का इशारा किया, ‘‘मेरे घर के लोग मेरी शादी जहां करेंगे, मुझे मंजूर होगा. उन की इच्छा के विरुद्ध मैं कुछ नहीं कर पाऊंगी. मैं पहले ही कह चुकी हूं कि मैं तुम से प्यार नहीं करती. और हां, अभी तक जो कुछ तुम ने मुझे दिया है. जस के तस लौटा रही हूं.’’ रूपा ने एक कैरीबैग चंद्रशेखर की ओर बढ़ा दिया.

‘‘अपने पास ही रखो इसे, मैं दी हुई चीज वापस नहीं लेता.’’

‘‘तुम्हारी मरजी. और हां, यह खयाल रखना कि आइंदा मुझ से मिलने की कोशिश मत करना.’’

रूपा जाने को हुई तो चंद्रशेखर ने धमकी दी, ‘‘रूपा, तुम्हारी शादी होगी तो सिर्फ मुझ से होगी. मैं तुम्हें किसी और की दुलहन बनते नहीं देख सकता. तुम मेरी नहीं हो सकतीं तो किसी और की भी नहीं बन पाओगी, याद रखना.’’

कुछ दिनों तक चंद्रशेखर के हवास पर रूपा का इनकार डंक मारता रहा. जलन की आग ने चंद्रशेखर को बुरी तरह सुलगा रखा था. उसे करार तभी आता जब या तो रूपा उस की हो जाती या वह रूपा के वजूद को मिटा देता.

उस पर पागलपन काबिज हो चुका था. दिमागी संतुलन खोता जा रहा था. आखिर उस ने एक योजना बना ली. उसी के तहत वह रूपा की रैकी करने लगा.

11 फरवरी, 2021 को दोपहर करीब सवा बजे रूपा अपनी बहन हेमलता के साथ दवा लेने एक मैडिकल स्टोर पर पहुंची. चंद्रशेखर कई दिनों से रूपा की टोह में लगा था.

ये भी पढ़ें- Crime- हत्या: जर जोरू और जमीन का त्रिकोण

किसी छलावे की तरह चंद्रशेखर रूपा के सामने पहुंच गया. उस के साथ बाइक पर उस के 2 दोस्त भरत निषाद और गोपाल यादव भी थे. अप्रत्याशित रूप से अपने सामने चंद्रशेखर को देख कर रूपा घबरा गई.

चंद्रशेखर ने दोनों को अपने साथ इसलिए रखा था कि किसी तरह का व्यवधान आने पर भरत निषाद और गोपाल यादव उस की मदद करेंगे.

तभी फुरती से देशी तमंचा निकाल कर चंद्रशेखर रूपा की ओर तानते हुए बोला, ‘‘रूपा, तुम मेरी नहीं तो किसी की नहीं.’’

चंद्रशेखर का खूंखार चेहरा देख कर रूपा ने डर कर भागना चाहा तभी चंद्रशेखर ने उस की कलाई पकड़ ली. उस की बड़ीबहन हेमलता ने बीचबचाव करने की कोशिश की. जब तक वह कामयाब होती तब तक गोली रूपा की कनपटी के बाहर हो चुकी थी.

गोली लगते ही रूपा जमीन पर गिर पड़ी. किसी को कुछ समझ में नहीं आया. वे तीनों बाइक पर बैठ कर वहां से भाग गए.

चंद्रशेखर के कहने पर उस के दोस्तों ने उसे नदी मोड़ के पास बाइक से उतार दिया. वारदात को अंजाम देने के बाद दोपहर सवा 2 बजे चंद्रशेखर सीधे थाना सिटी कोतवाली, महासमुंद पहुंचा और आत्मसमर्पण कर दिया. पुलिस को उस ने रूपा की हत्या करने की बात बता दी.

थानाप्रभारी ने उसे हिरासत में ले लिया और पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. थानाप्रभारी ने यह सूचना उच्चाधिकारियों को दे दी. कुछ ही देर में एडिशनल एसपी मेघा टेंभुरकर साहू, एसपी प्रफुल्ल ठाकुर के अलावा पुलिस अधिकारी शेर सिंह बंदे, यू.आर. साहू, संजय सिंह राजपूत (साइबर सेल प्रभारी) योगेश कुमार सोनी, टीकाराम सारथी आदि भी घटनास्थल पर पहुंच गए.

पुलिस ने मृतका के घर वालों से पूछताछ करने के बाद रूपा की लाश पोस्टमार्टम के लिए भेज दी.

Crime Story: अपनों की दुश्मनी

इस के बाद उसी दिन शाम के समय आरोपी भरत निषाद और गोपाल यादव को उन्हीं के गांव मुडैना से गिरफ्तार कर लिया गया.

तीनों आरोपियों से पूछताछ के बाद पुलिस ने उन्हें कोर्ट में पेश कर 15 फरवरी तक पुलिस रिमांड पर लिया. रिमांड अवधि पूरी होने से पहले ही पुलिस ने उन्हें फिर से कोर्ट में पेश कर महासमुंद जेल भेज दिया.

Crime Story: मेरी नहीं तो किसी की नहीं- भाग 2

लेखक- विजय पांडेय/श्वेता पांडेय

सौजन्य- सत्यकथा

रास्ते में उस ने एक पेड़ के नीचे बाइक खड़ी की. फिर रूपा को मालिक से हुई तकरार के बारे में बताया. सुन कर रूपा गंभीर हो गई. वह बोली, ‘‘उन्होंने जो कुछ कहा, वह अपनी जगह सही है. अच्छाखासा काम हाथ से निकल गया.’’

‘‘तुम क्यों परेशान हो रही हो रूपा, काम चला गया तो क्या हुआ. हाथपैर और मेरा हुनर थोड़े ही चला गया है.’’ चंद्रशेखर ने उसे समझाया, ‘‘काम करना है तो कहीं भी कर लेंगे. तुम पर ऐसी दरजनों गाडि़यां और नौकरियां कुरबान.’’

फिर चंद्रशेखर जेब के अंदर हाथ डाल कर बंद मुट्ठी निकाल कर बोला, ‘‘गेस करो रूपा, इस मुट्ठी में क्या है?’’

‘‘मुझे क्या मालूम.’’ वह बोली.

‘‘सोचो न.’’

‘‘टौफी है क्या?’’ रूपा ने पूछा.

‘‘नहीं…और कुछ, बताओ.’’

रूपा ने दिमाग पर जोर डाला. फिर उस ने अनभिज्ञता से कंधे उचकाए. तभी चंद्रशेखर बोला, ‘‘चलो, अपनी आंखें बंद करो…और हाथ आगे बढ़ाओ.’’

रूपा ने आंखें बंद कर के अपनी हथेलियां उस के सामने खोल दीं. तभी चंद्रशेखर ने रूपा की हथेली पर कुछ रख कर कहा, ‘‘अब अपनी आंखें खोलो.’’

रूपा ने आंखें खोलीं. एक अंगूठी थी जो अमेरिकन डायमंड की थी और जगमगा रही थी.

अंगूठी पर पेड़ के पत्तों से छन कर आती हुई सूर्य की किरणें पड़ रही थीं. और रिफ्लेक्ट हो कर सात रंगों की किरणें बिखर रही थीं. अंगूठी देख कर रूपा बहुत खुश हुई.

‘‘कैसा लगा?’’ चंद्रशेखर ने पूछा.

‘‘बहुत सुंदर…बहुत ही प्यारा है.’’

‘‘पहन कर दिखाओ जरा.’’

‘‘जब लाए ही हो तो तुम्हीं पहना दो न.’’ कहती हुई रूपा ने अपना हाथ चंद्रशेखर की ओर बढ़ा दिया. रूपा के हाथ से अंगूठी ले कर रूपा को पहना दी. उस की अंगुली में अंगूठी अच्छी लग रही थी.

सड़क के किनारे गन्ने का एक खेत था. चंद्रशेखर ने उस ओर इशारा किया तो रूपा बोली, ‘‘गन्ना खाना चाहते हो तो जाओ ले आओ.’’

ये भी पढ़ें- Crime Story: मोहब्बत की खौफनाक साजिश- भाग 2

‘‘ऐसा करते हैं दोनों वहीं खेत में चलते हैं.’’

‘‘नहीं…नहीं मुझे गन्ने के झुरमुटों से डर लगता है. मैं नहीं जाऊंगी.’’

चंद्रशेखर ने जिद की तो रूपा को झुकना पड़ा. फिर दोनों गन्ने के खेत की ओर बढ़े और खेत में भीतर घुस गए. दोचार कदम चलने के बाद रूपा ठिठकी. तो चंद्रशेखर बोला, ‘‘अरे, आओ न… आओ, आती क्यों नहीं. अच्छा सा गन्ना तोडें़गे.’’

डरतीझिझकती रूपा चंद्रशेखर के पीछे चलने लगी. गन्ने के सूखे भूरे पत्ते पैरों में दब कर चर्रमर्र की आवाज कर रहे थे. जब दोनों काफी भीतर घुस गए तब चंद्रशेखर ने अपनी बाइक और सड़क की ओर देखा. लेकिन झुरमुटों की वजह से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था. अचानक चंद्रशेखर ठिठका. उसे ठिठकते देख कर रूपा भी ठिठक पड़ी.

चंद्रशेखर उस की ओर देखते हुए मुसकराया, ‘‘रूपा, यहां तक चली आई. गन्ना ही खाना होता तो इतनी दूर आने की क्या जरूरत थी. पहले ही न तोड़ लेता.’’

‘‘फिर क्यों आए इतनी दूर? मैं अभी भी नहीं समझी.’’

चंद्रशेखर के होंठों पर शरारत उभर आई. वह रूपा के करीब पहुंचा

और उस के हाथों को अपने हाथ में ले लिया, ‘‘रूपा…’’

चंद्रशेखर ने तर्जनी अंगुली को अंगुली पर रखा तो रूपा बोली, ‘‘ओह… इसलिए मुझे यहां इतनी दूर लाए हो.’’

‘‘हां, तुम तो जानती हो कि वहां तो ऐसा कुछ कर नहीं पाते, जगह भी मुफीद नहीं थी. यहां भला हमें कौन देखेगा.’’ कह कर चंद्रशेखर ने रूपा को अपने बाहुपाश में लेना चाहा. वह कोई ठोस निर्णय ले पाता कि उस ने देखा रूपा उस के पीछे देख रही है.

वह पीछे पलटा तो एक गाय तेजी से दौड़ती आ रही थी. गाय के पीछे से रखवाली करने वाले किसान की हा…हू.. की आवाज उन दोनों के कानों तक पहुंची. रूपा बोली, ‘‘चलो, यहां से. गाय आ रही है. लगता है, किसान गांव के पीछेपीछे आ रहा है.’’

फिर कई गायों का झुंड गन्ने में घुस आया. किसान की आवाज भी करीब आती जा रही थी. फिर रूपा वहां नहीं ठहरी. वह हाथों से गन्ने के पत्तों को अलग करती हुई वहां से भागी. चंद्रशेखर भी हड़बड़ाए अंदाज में बाइक की ओर भागा.

रूपा हांफ रही थी. वह हांफती हुई बोली, ‘‘खा लिए गन्ने? ऊपर से देखो…’’ उस के सैंडिल की पट्टी एक ओर से उखड़ गई थी. पत्तों से हाथपैर अलग छिल गए थे.

रूपा बोली, ‘‘कहां ला कर फंसा दिया.’’

फिर दोनों वहां ठहरे नहीं. बाइक पर बैठ कर चले गए.

इस के बाद दोनों की मेलमुलाकातों की चर्चाएं पहले कानाफूसी में तब्दील हुईं. फिर बेलसोंडा में दोनों की मुलाकात और प्यार की चर्चाएं होने लगीं. यह बात रूपा के पिता सुरेंद्र और मां जमुना के कानों तक भी पहुंची.

ये भी पढ़ें- Crime Story- रसूखदारों की घिनौनी कहानी: भाग 3

चूंकि लड़की बालिग हो चुकी थी और बगावत पर उतर सकती थी. इसलिए सुरेंद्र ने रूपा को अपनी बड़ी बेटी हेमलता की ससुराल में उस के पास भेज दिया. रूपा हेमलता के यहां 20-25 दिन रह कर पिता के घर आ गई.

इस बीच चंद्रशेखर ट्रक चलाने लगा था. गुजरे हुए समय में रूपा और चंद्रशेखर ने सैकड़ों ख्वाब देखे थे. गांव आने के बाद कुछ समय तक सब कुछ ठीक चलता रहा.

20-25 दिनों की जुदाई के बाद चंद्रशेखर और रूपा की मुलाकात हुई. चंद्रशेखर ने उस से शिकायत की, ‘‘रूपा, तुम अपनी बहन के पास रायपुर जा कर इतनी मशगूल हो गईं कि एक फोन तक नहीं किया.’’

‘‘मेरे पास फोन था ही कहां,’’ रूपा सफाई में बोली.

‘‘क्यों, कहां गया तुम्हारा फोन?’’

‘‘घर वालों ने ले लिया था.’’

‘‘नंबर तो जानती हो. फोन किसी से मांग लेती.’’

‘‘मैं दीदी की देखभाल में थी.’’

‘‘यह क्यों नहीं कहतीं कि मैं याद ही नहीं रहा तुम्हें.’’ चंद्रशेखर ने कहा.

‘‘नहीं…नहीं, ऐसी बात नहीं है. हमारा मिलना और हमारा प्यार गांव वालों की नजरों में आ चुका है. अब ऐसा लगता है कि हमें एकदूसरे से नहीं मिलना चाहिए.’’ रूपा बोली.

‘‘रूपा…तुम मिलने की बात पर अटकी हो, मैं तो तुम से शादी करना चाहता हूं.’’ चंद्रशेखर बोला.

‘‘हमारे चाहने से क्या होगा? घर वालों और समाज की मंजूरी भी जरूरी है.’’ रूपा तनिक चिढ़ गई.

‘‘रूपा, तुम्हारी यह बात गलत है. बताओ, जब तुम ने मुझ से प्यारर किया था तो क्या घर, समाज और परिवार से पूछ कर किया था?’’

‘‘नहीं, उस वक्त मुझ पर घरपरिवार और समाज का दबाव नहीं था. और आज मैं इन तीनों की निगाहों में हूं. मुझ में इतनी ताकत नहीं है कि मैं इन से लड़ कर विद्रोह कर सकूं.’’ रूपा ने कहा.

‘‘यह बात तुम्हें उस वक्त सोचनी चाहिए थी, जब प्यार की डगर पर चंद कदम ही बढ़ी थीं. अब तो हम बहुत दूर निकल आए हैं रूपा. इस का मतलब, तुम मेरा साथ नहीं दोगी?’’

‘‘माना कि हम दोनों साल भर साथ रहे, दोस्त की तरह. लेकिन इस अपनेपन को प्यार का नाम नहीं दिया जा सकता.’’

कुछ पलों तक हैरानगी, बेचारगी से रूपा की ओर देख कर चंद्रशेखर बोला, ‘‘ऐसा मत कहो रूपा. हमारी चाहत को अपनेपन का लबादा मत ओढ़ाओ. मैं ने तुम्हें और खुद को ले कर ढेरों ख्वाब देखे हैं. तुम्हारे विचार जान कर जी चाहता है कि इसी सड़क पर किसी वाहन के नीचे कुचल कर मर जाऊं.’’

वह गहरी सांस ले कर फिर बोला, ‘‘सचमुच मैं बहुत दूर निकल आया हूं तुम्हारे साथ, अब वापस लौटना मुमकिन नहीं.’’

‘‘सड़क पर सिर पटक कर मरना चाहते हो, ऐसा कर के क्या यह जाहिर करना चाह रहे हो कि तुम मेरे बिना जी नहीं सकते?’’ रूपा तीखे शब्दों में बोली.

चंद्रशेखर रूपा की बात सुन कर पहली बार आपे से बाहर होता हुआ बोला, ‘‘मत भूलो रूपा कि जिस सड़क पर मैं स्वयं को फना करने का माद्दा रखता हूं. यहीं इस सड़क पर तुम्हारे साथ भी कर सकता हूं.’’

वह फिर गिड़गिड़ाया, ‘‘प्लीज रूपा, ऐसा मत कहो.’’

‘‘चंद्रशेखर, तुम समझने का प्रयास नहीं कर रहे हो या फिर समझना नहीं चाहते.’’

‘‘रूपा, तुम क्या समझाना चाह रही हो? और मैं क्या नहीं समझ रहा हूं?’’

‘‘तो सुनो, फिर कह रही हूं कि जिसे तुम प्यार समझ रहे हो, वह प्यार नहीं. सिर्फ दोस्ती थी.’’ इस के बाद चंद्रशेखर के होंठों से बेबसी में शब्द निकले, ‘‘रूपा, जिस प्यार को तुम दोस्ती का नाम दे रही हो, इस से अच्छा है कि इसे बेनाम ही रहने दो. मैं देख रहा हूं तुम्हारा व्यवहार बदल रहा है.’’

चंद्रशेखर अभी कुछ और बोलने ही जा रहा था कि रूपा यह कहते हुए वहां से चली गई कि तुम्हें जो समझना है, समझते रहो. इतना मान कर चलो कि अब मैं तुम से कभी नहीं मिलूंगी.

अगले भाग में पढ़ें- चंद्रशेखर ने रूपा पर किया हमला

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें