रूठी रानी उमादे : राव मालदेव शक्तिशाली शासक

रेतीले राजस्थान को शूरवीरों की वीरता और प्रेम की कहानियों के लिए जाना जाता है. राजस्थान के इतिहास में प्रेम रस और वीर रस से भरी तमाम ऐसी कहानियां भरी पड़ी हैं, जिन्हें पढ़सुन कर ऐसा लगता है जैसे ये सच्ची कहानियां कल्पनाओं की दुनिया में ढूंढ कर लाई गई हों.

मेड़ता के राव वीरमदेव और राव जयमल के काल में जोधपुर के राव मालदेव शासन करते थे. राव मालदेव अपने समय के राजपूताना के सर्वाधिक शक्तिशाली शासक थे. शूरवीर और धुन के पक्के. उन्होंने अपने बल पर  जोधपुर राज्य की सीमाओं का काफी विस्तार किया था. उन की सेना में राव जैता व कूंपा नाम के 2 शूरवीर सेनापति थे.

यदि मालदेव, राव वीरमदेव व उन के पुत्र वीर शिरोमणि जयमल से बैर न रखते और जयमल की प्रस्तावित संधि मान लेते, जिस में राव जयमल ने शांति के लिए अपने पैतृक टिकाई राज्य जोधपुर की अधीनता तक स्वीकार करने की पेशकश की थी, तो स्थिति बदल जाती. जयमल जैसे वीर, जैता कूंपा जैसे सेनापतियों के होते राव मालदेव दिल्ली को फतह करने में समर्थ हो जाते.

राव मालदेव के 31 साल के शासन काल तक पूरे भारत में उन की टक्कर का कोई राजा नहीं था. लेकिन यह परम शूरवीर राजा अपनी एक रूठी रानी को पूरी जिंदगी नहीं मना सका और वह रानी मरते दम तक अपने पति से रूठी रही.

जीवन में 52 युद्ध लड़ने वाले इस शूरवीर राव मालदेव की शादी 24 वर्ष की आयु में वर्ष 1535 में जैसलमेर के रावल लूनकरण की बेटी राजकुमारी उमादे के साथ हुई थी. उमादे अपनी सुंदरता व चतुराई के लिए प्रसिद्ध थीं. राठौड़ राव मालदेव की शादी बारात लवाजमे के साथ जैसलमेर पहुंची. बारात का खूब स्वागतसत्कार हुआ. बारातियों के लिए विशेष ‘जानी डेरे’ की व्यवस्था की गई.

ऊंट, घोड़ों, हाथियों के लिए चारा, दाना, पानी की व्यवस्था की गई. राजकुमारी उमादे राव मालदेव जैसा शूरवीर और महाप्रतापी राजा पति के रूप में पाकर बेहद खुश थीं. पंडितों ने शुभ वेला में राव मालदेव की राजकुमारी उमादे से शादी संपन्न कराई.

चारों तरफ हंसीखुशी का माहौल था. शादी के बाद राव मालदेव अपने सरदारों व सगेसंबंधियों के साथ महफिल में बैठ गए. महफिल काफी रात गए तक चली.

इस के बाद तमाम घराती, बाराती खापी कर सोने चले गए. राव मालदेव ने थोड़ीथोड़ी कर के काफी शराब पी ली थी.

उन्हें नशा हो रहा था. वह महफिल से उठ कर अपने कक्ष में नहीं आए. उमादे सुहाग सेज पर उन की राह देखतीदेखती थक गईं. नईनवेली दुलहन उमादे अपनी खास दासी भारमली जिसे उमादे को दहेज में दिया गया था, को मालदेव को बुलाने भेजने का फैसला किया. उमादे ने भारमली से कहा, ‘‘भारमली, जा कर रावजी को बुला लाओ. बहुत देर कर दी उन्होंने…’’

भारमली ने आज्ञा का पालन किया. वह राव मालदेव को बुलाने उन के कक्ष में चली गई. राव मालदेव शराब के नशे में थे. नशे की वजह से उन की आंखें मुंद रही थीं कि पायल की रुनझुन से राव ने दरवाजे पर देखा तो जैसे होश गुम हो गए. फानूस तो छत में था, पर रोशनी सामने से आ रही थी. मुंह खुला का खुला रह गया.

जैसे 17-18 साल की कोई अप्सरा सामने खड़ी थी. गोरेगोरे भरे गालों से मलाई टपक रही थी. शरीर मछली जैसा नरमनरम. होंठों के ऊपर मौसर पर पसीने की हलकीहलकी बूंदें झिलमिला रही थीं होठों से जैसे रस छलक रहा हो.

भारमली कुछ बोलती, उस से पहले ही राव मालदेव ने यह सोच कर कि उन की नवव्याहता रानी उमादे है, झट से उसे अपने आगोश में ले लिया. भारमली को कुछ बोलने का मौका नहीं मिला या वह जानबूझ कर नहीं बोली, वह ही जाने.

भारमली भी जब काफी देर तक वापस नहीं लौटी तो रानी उमादे ने जिस थाल से रावजी की आरती उतारनी थी, उठाया और उस कक्ष की तरफ चल पड़ीं, जिस कक्ष में राव मालदेव का डेरा था.

उधर राव मालदे ने भारमली को अपनी रानी समझ लिया था और वह शराब के नशे में उस से प्रेम कर रहे थे. रानी उमादे जब रावजी के कक्ष में गई तो भारमली को उन के आगोश में देख रानी ने आरती का थाल यह कह कर ‘अब राव मालदेव मेरे लायक नहीं रहे,’ पटक दिया और वापस चली गईं.

अब तक राव मालदेव के सब कुछ समझ में आ गया था. मगर देर हो चुकी थी. उन्होंने सोचा कि जैसेतैसे रानी को मना लेंगे. भारमली ने राव मालदेव को सारी बात बता दी कि वह उमादे के कहने पर उन्हें बुलाने आई थी. उन्होंने उसे कुछ बोलने नहीं दिया और आगोश में भर लिया. रानी उमादे ने यहां आ कर यह सब देखा तो रूठ कर चली गईं.

सुबह तक राव मालदेव का सारा नशा उतर चुका था. वह बहुत शर्मिंदा हुए. रानी उमादे के पास जा कर शर्मिंदगी जाहिर करते हुए कहा कि वह नशे में भारमली को रानी उमादे समझ बैठे थे.

मगर उमादे रूठी हुई थीं. उन्होंने स्पष्ट कह दिया कि वह बारात के साथ नहीं जाएंगी. वो भारमली को ले जाएं. फलस्वरूप एक शक्तिशाली राजा को बिना दुलहन के एक दासी को ले कर बारात वापस ले जानी पड़ी.

रानी उमादे आजीवन राम मालदेव से रूठी ही रहीं और इतिहास में रूठी रानी के नाम से मशहूर हुईं. जैसलमेर की यह राजकुमारी रूठने के बाद जैसलमेर में ही रह गई थीं. राव मालदेव दहेज में मिली दासी भारमली बारात के साथ बिना दुलहन के जोधपुर आ गए थे. उन्हें इस का बड़ा दुख हुआ था. सब कुछ एक गलतफहमी के कारण हुआ था.

राव मालदेव ने अपनी रूठी रानी उमादे के लिए जोधपुर में किले के पास एक हवेली बनवाई. उन्हें विश्वास था कि कभी न कभी रानी मान जाएगी.

जैसलमेर की यह राजकुमारी बहुत खूबसूरत व चतुर थी. उस समय उमादे जैसी खूबसूरत महिला पूरे राजपूताने में नहीं थी. वही सुंदर राजकुमारी मात्र फेरे ले कर राव मालदेव की रानी बन

गई थी. ऐसी रानी जो पति से आजीवन रूठी रही. जोधपुर के इस शक्तिशाली राजा मालदेव ने उमादे को मनाने की बहुत कोशिशें कीं मगर सब व्यर्थ. वह नहीं मानी तो नहीं मानी. आखिर में राव मालदेव ने एक बार फिर कोशिश की उमादे को मनाने की. इस बार राव मालदव ने अपने चतुर कवि आशानंदजी चारण को उमादे को मना कर लाने के लिए जैसलमेर भेजा.

चारण जाति के लोग बुद्धि से चतुर व वाणी से वाकपटुता व उत्कृष्ट कवि के तौर पर जाने जाते हैं. राव मालदेव के दरबार के कवि आशानंद चारण बड़े भावुक थे. निर्भीक प्रकृति के वाकपटु व्यक्ति.

जैसलमेर जा कर आशानंद चारण ने किसी तरह अपनी वाकपटुता के जरिए रूठी रानी उमादे को मना भी लिया और उन्हें ले कर जोधपुर के लिए रवाना भी हो गए. रास्ते में एक जगह रानी उमादे ने मालदेव व दासी भारमली के बारे में कवि आशानंदजी से एक बात पूछी.

मस्त कवि समय व परिणाम की चिंता नहीं करता. निर्भीक व मस्त कवि आशानंद ने भी बिना परिणाम की चिंता किए रानी को 2 पंक्तियों का एक दोहा बोल कर उत्तर दिया—

माण रखै तो पीव तज, पीव रखै तज माण.

दोदो गयंदनी बंधही, हेको खंभु ठाण.

यानी मान रखना है तो पति को त्याग दे और पति को रखना है तो मान को त्याग दे. लेकिन दोदो हाथियों को एक ही खंभे से बांधा जाना असंभव है.

आशानंद चारण के इस दोहे की दो पंक्तियों ने रानी उमादे की सोई रोषाग्नि को वापस प्रज्जवलित करने के लिए आग में घी का काम किया. उन्होंने कहा, ‘‘मुझे ऐसे पति की आवश्यकता नहीं है.’’ रानी उमादे ने उसी पल रथ को वापस जैसलमेर ले चलने का आदेश दे दिया.

आशानंदजी ने मन ही मन अपने कहे गए शब्दों पर विचार किया और बहुत पछताए, लेकिन शब्द वापस कैसे लिए जा सकते थे. उमादे जो इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध है, अपनी रूपवती दासी भारमली के कारण ही अपने पति राजा मालदेव से रूठ गई थीं और आजीवन रूठी ही रहीं.

जैसलमेर आए कवि आशानंद चारण ने फिर रूठी रानी को मनाने की लाख कोशिश की लेकिन वह नहीं मानीं. तब आशानंदजी चारण ने जैसलमेर के राजा लूणकरणजी से कहा कि अपनी पुत्री का भला चाहते हो तो दासी भारमली को जोधपुर से वापस बुलवा लीजिए. रावल लूणकरणजी ने ऐसा ही किया और भारमली को जोधपुर से जैसलमेर बुलवा लिया.

भारमली जैसलमेर आ गई. लूणकरणजी ने भारमली का यौवन रूप देखा तो वह उस पर मुग्ध हो गए. लूणकरणजी का भारमली से बढ़ता स्नेह उन की दोनों रानियों की आंखों से छिप न सका. लूणकरणजी अब दोनों रानियों के बजाय भारमली पर प्रेम वर्षा कर रहे थे. यह कोई औरत कैसे सहन कर सकती है.

लूणकरणजी की दोनों रानियों ने भारमली को कहीं दूर भिजवाने की सोची. दोनों रानियां भारमली को जैसलमेर से कहीं दूर भेजने की योजना में लग गईं. लूणकरणजी की पहली रानी सोढ़ीजी ने उमरकोट अपने भाइयों से भारमली को ले जाने के लिए कहा लेकिन उमरकोट के सोढ़ों ने रावल लूणकरणजी से शत्रुता लेना ठीक नहीं समझा.

तब लूणकरणजी की दूसरी रानी जो जोधपुर के मालानी परगने के कोटड़े के शासक बाघजी राठौड़ की बहन थी, ने अपने भाई बाघजी को बुलाया. बहन का दुख मिटाने के लिए बाघजी शीघ्र आए और रानियों के कथनानुसार भारमली को ऊंट पर बैठा कर मौका मिलते ही जैसलमेर से छिप कर भाग गए.

लूणकरणजी कोटड़े पर हमला तो कर नहीं सकते थे क्योंकि पहली बात तो ससुराल पर हमला करने में उन की प्रतिष्ठा घटती और दूसरी बात राव मालदेव जैसा शक्तिशाली शासक मालानी का संरक्षक था. अत: रावल लूणकरणजी ने जोधपुर के ही आशानंद कवि को कोटडे़ भेजा कि बाघजी को समझा कर भारमली को वापस जैसलमेर ले आएं.

दोनों रानियों ने बाघजी को पहले ही संदेश भेज कर सूचित कर दिया कि वे बारहठजी आशानंद की बातों में न आएं. जब आशानंदजी कोटड़ा पहुंचे तो बाघजी ने उन का बड़ा स्वागतसत्कार किया और उन की इतनी खातिरदारी की कि वह अपने आने का उद्देश्य ही भूल गए.

एक दिन बाघजी शिकार पर गए. बारहठजी व भारमली भी साथ थे. भारमली व बाघजी में असीम प्रेम था. अत: वह भी बाघजी को छोड़ कर किसी भी हालत में जैसलमेर नहीं जाना चाहती थी.

शिकार के बाद भारमली ने विश्रामस्थल पर सूले सेंक कर खुद आशानंदजी को दिए. शराब भी पिलाई. इस से खुश हो कर बाघजी व भारमली के बीच प्रेम देख कर आशानंद जी चारण का भावुक कवि हृदय बोल उठे—

जहं गिरवर तहं मोरिया, जहं सरवर तहं हंस

जहं बाघा तहं भारमली, जहं दारू तहं मंस.

यानी जहां पहाड़ होते हैं वहां मोर होते हैं, जहां सरोवर होता है वहां हंस होते हैं. इसी प्रकार जहां बाघजी हैं, वहीं भारमली होगी. ठीक उसी तरह से जहां दारू होती है वहां मांस भी होता है.

कवि आशानंद की यह बात सुन बाघजी ने झठ से कह दिया, ‘‘बारहठजी, आप बड़े हैं और बड़े आदमी दी हुई वस्तु को वापस नहीं लेते. अत: अब भारमली को मुझ से न मांगना.’’

आशानंद जी पर जैसे वज्रपात हो गया. लेकिन बाघजी ने बात संभालते हुए कहा कि आप से एक प्रार्थना और है आप भी मेरे यहीं रहिए.

और इस तरह से बाघजी ने कवि आशानंदजी बारहठ को मना कर भारमली को जैसलमेर ले जाने से रोक लिया. आशानंदजी भी कोटड़ा गांव में रहे और उन की व बाघजी की इतनी घनिष्ठ दोस्ती हुई कि वे जिंदगी भर उन्हें भुला नहीं पाए.

एक दिन अचानक बाघजी का निधन हो गया. भारमली ने भी बाघजी के शव के साथ प्राण त्याग दिए. आशानंदजी अपने मित्र बाघजी की याद में जिंदगी भर बेचैन रहे. उन्होंने बाघजी की स्मृति में अपने उद्गारों के पिछोले बनाए.

बाघजी और आशानंदजी के बीच इतनी घनिष्ठ मित्रता हुई कि आशानंद जी उठतेबैठे, सोतेजागते उन्हीं का नाम लेते थे. एक बार उदयपुर के महाराणा ने कवि आशानंदजी की परीक्षा लेने के लिए कहा कि वे सिर्फ एक रात बाघजी का नाम लिए बिना निकाल दें तो वे उन्हें 4 लाख रुपए देंगे. आशानंद के पुत्र ने भी यही आग्रह किया.

कवि आशानंद ने भरपूर कोशिश की कि वह अपने कविपुत्र का कहा मान कर कम से कम एक रात बाघजी का नाम न लें, मगर कवि मन कहां चुप रहने वाला था. आशानंदजी की जुबान पर तो बाघजी का ही नाम आता था.

रूठी रानी उमादे ने प्रण कर लिया था कि वह आजीवन राव मालदेव का मुंह नहीं देखेगी. बहुत समझानेबुझाने के बाद भी रूठी रानी जोधपुर दुर्ग की तलहटी में बने एक महल में कुछ दिन ही रही और फिर उन्होंने अजमेर के तारागढ़ दुर्ग के निकट महल में रहना शुरू किया. बाद में यह इतिहास में रूठी रानी के नाम से प्रसिद्ध हुई.

राव मालदेव ने रूठी रानी के लिए तारागढ़ दुर्ग में पैर से चलने वाली रहट का निर्माण करवाया. जब अजमेर पर अफगान बादशाह शेरशाह सूरी के आक्रमण की संभावना थी, तब रूठी रानी कोसाना चली गई, जहां कुछ समय रुकने के बाद वह गूंदोज चली गई. गूंदोज से काफी समय बाद रूठी रानी ने मेवाड़ में केलवा में निवास किया.

जब शेरशाह सूरी ने मारवाड़ पर आक्रमण किया तो रानी उमादे से बहुत प्रेम करने वाले राव मालदेव ने युद्ध में प्रस्थान करने से पहले एक बार रूठी रानी से मिलने का अनुरोध किया.

एक बार मिलने को तैयार होने के बाद रानी उमादे ने ऐन वक्त पर मिलने से इनकार कर दिया.

रूठी रानी के मिलने से इनकार करने का राव मालदेव पर बहुत बुरा प्रभाव पड़ा और वह अपने जीवन में पहली बार कोई युद्ध हारे.

वर्ष 1562 में राव मालदेव के निधन का समाचार मिलने पर रानी उमादे को अपनी भूल का अहसास हुआ और कष्ट भी पहुंचा. उमादे ने प्रायश्चित के रूप में उन की पगड़ी के साथ स्वयं को अग्नि को सौंप दिया.

ऐसी थी जैसलमेर की भटियाणी उमादे रूठी रानी. वह संसार में रूठी रानी के नाम से अमर हो गईं.

कढ़ा हुआ रूमाल: प्रोफेसर महेश की दास्तां

तिनसुखिया मेल के एसी कोच में बैठे प्रोफैसर महेश एक पुस्तक पढ़ने में मशगूल थे. वे एक सैमिनार में भाग लेने गुवाहाटी जा रहे थे.

पास की एक सीट पर बैठी प्रौढ़ महिला बारबार प्रोफैसर महेश को देख रही थी. वह शायद उन्हें पहचानने का प्रयास कर रही थी. जब वह पूरी तरह आश्वस्त हो गई तो उठ कर उन की सीट के पास गई और शिष्टतापूर्वक पूछा, ‘‘सर, क्या आप प्रोफैसर महेश हैं?’’

यह अप्रत्याशित सा प्रश्न सुन कर प्रोफैसर महेश असमंजस में पड़ गए. उन्होंने महिला की ओर देखते हुए कहा, ‘‘मैं ने आप को पहचाना नहीं, मैडम.’’

‘‘मेरा नाम माधवी है. मैं लखनऊ यूनिवर्सिटी में प्रोफैसर हूं. मेरी एक सहेली थी प्रोफैसर शिवानी,’’ वह महिला बोली.

‘‘थी… से आप का क्या मतलब है?’’ प्रोफैसर महेश ने उस की ओर देखते हुए पूछा.

‘‘वह अब इस दुनिया में नहीं है. उस ने किसी को अपनी किडनी डोनेट की थी. उसी दौरान शरीर में सैप्टिक फैल जाने के कारण उस की मृत्यु हो गई थी,’’ महिला ने कहा.

‘‘क्या?’’ प्रोफैसर महेश का मुंह आश्चर्य से खुला रह गया था.

‘‘जी सर. उसे शायद अपनी मृत्यु का एहसास पहले ही हो गया था. मरने से 2 दिन पहले उस ने मुझे यह रूमाल और एक पत्र आप को देने के लिए कहा था. उस के द्वारा दिए पते पर मैं आप से मिलने दिल्ली कई बार गई. मगर आप शायद वहां से कहीं और शिफ्ट हो गए थे.’’ यह कह कर उस महिला ने वह रूमाल और पत्र प्रोफैसर को दे दिया.

वह महिला जा कर अपनी सीट पर बैठ गई. प्रोफैसर महेश बुत बने अपनी सीट पर बैठे थे.

तिनसुखिया मेल अपनी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी और उस से भी तेज रफ्तार से अतीत की स्मृतियां प्रोफैसर महेश के मानसपटल पर दौड़ रही थीं.

आज से 25 वर्ष पूर्व उन की तैनाती एक कसबे के डिग्री कालेज में प्रोफैसर के रूप में हुई थी. कालेज कसबे से दोढाई किलोमीटर दूर था. कालेज में छात्रछात्राएं दोनों पढ़ते थे. कालेज का अधिकांश स्टाफ कसबे में ही रहता था.

प्रोफैसर महेश का व्यक्तित्व बड़ा आकर्षक था और उन के पढ़ाने का ढंग बहुत प्रभावी. इसलिए छात्रछात्राएं उन का बड़ा सम्मान करते थे. वे बड़े मिलनसार और सहयोगी स्वभाव के थे. इसलिए स्टाफ में भी उन के सब से बड़े मधुर संबंध थे.

एक दिन वे क्लास में पढ़ा रहे थे, तभी चपरासी उन के पास आया और बोला, ‘सर, प्रिंसिपल सर आप को अपने औफिस में बुला रहे हैं.’

प्रोफैसर महेश सोच में पड़ गए. फिर वे प्रिंसिपल रूम की ओर चल दिए.

उन्हें देख कर प्रिंसिपल साहब बोले, ‘प्रोफैसर महेश, बीए सैकंड ईयर की छात्रा शिवानी अचानक क्लास में बेहोश हो गई है. उसे किसी तरह होश तो आ गया है मगर अभी उस की तबीयत पूरी तरह ठीक नहीं है. आप ऐसा करिए, उसे अपने स्कूटर से उस के घर छोड़ आइए.’

उस समय स्टाफ के 2-3 लोगों के पास ही स्कूटर था. शायद इसी कारण प्राचार्यजी ने उन्हें यह कार्य सौंपा था.

वे शिवानी को स्कूटर पर बैठा कर कसबे की ओर चल दिए. वे कसबे में पहुंचने ही वाले थे कि सड़क के किनारे खड़े बरगद के पेड़ के पास शिवानी ने कहा, ‘सर, स्कूटर रोक दीजिए.’

प्रोफैसर महेश ने स्कूटर रोक दिया और शिवानी से पूछा, ‘‘क्या बात है शिवानी, क्या तुम्हें फिर चक्कर आ रहा है?’

‘मुझे कुछ नहीं हुआ सर, मैं तो आप से एकांत में बात करना चाहती थी, इसलिए मैं ने कालेज में बेहोश होने का नाटक किया था,’ उस ने बड़े भोलेपन से कहा.

‘क्या?’ प्रोफैसर ने हैरानी से उस की ओर देखा. फिर पूछा, ‘आखिर, तुम ने ऐसा क्यों किया और तुम मुझ से क्या बात करना चाहती हो?’

‘सर, मैं आप से प्यार करती हूं और आप को यही बात बताने के लिए मैं ने यह नाटक किया था,’ वह प्रोफैसर की ओर देख कर मुसकरा रही थी.

प्रोफैसर हतप्रभ खड़े थे. उन्हें समझ में ही नहीं आ रहा था कि वे उस से क्या कहें. काफी देर तक वे चुप रहे. फिर बोले, ‘यह तुम्हारी पढ़ने की उम्र है, प्यार करने की नहीं. अभी तो तुम प्यार का मतलब भी नहीं जानतीं.’

‘आप ठीक कह रहे हैं, सर. मगर मैं अपने इस दिल का क्या करूं, यह तो आप से प्यार कर बैठा है,’ वह प्रोफैसर की ओर देख कर मुसकराते हुए बोली.

‘तुम्हें मालूम है कि मैं शादीशुदा हूं और मेरे 2 बच्चे हैं. और मेरी तथा तुम्हारी उम्र में कम से कम 20 साल का अंतर है,’ प्रोफैसर ने उसे सम?ाते हुए कहा.

‘मुझे इन बातों से कोई फर्क नहीं पड़ता, सर. मैं तो केवल एक ही बात जानती हूं कि मैं आप से प्यार करती हूं, बेपनाह प्यार,’ वह दार्शनिक अंदाज में बोली.

प्रोफैसर ने उसे समझने का हरसंभव प्रयास किया. मगर उस पर कोई असर नहीं हुआ. तो उन्होंने यह कह कर कि, अब तुम ठीक हो इसलिए यहां से अपने घर पैदल चली जाना, वे कालेज लौट गए.

प्रोफैसर महेश ने इस बात को उस का बचपना समझ और गंभीरता से नहीं लिया. शिवानी किसी न किसी बहाने से उन के करीब आने और उन से बात करने का प्रयास करती रहती. परंतु वह उन के जितना करीब आने का प्रयास करती, वे उतना ही उस से दूर भागते. वे नहीं चाहते थे कि कालेज में यह बात चर्चा का विषय बने.

कसबे में छोटे बच्चों का कोई कौन्वैंट स्कूल नहीं था, इसलिए वे यहां अकेले ही किराए के मकान में रहते थे. उन की पत्नी और बच्चे उन के मम्मीपापा के साथ रहते थे.

एक दिन शाम का समय था. प्रोफैसर कमरे में अकेले बैठे एक किताब पढ़ रहे थे. तभी दरवाजे पर खटखट हुई. उन्होंने दरवाजा खोला. सामने शिवानी खड़ी थी. उसे इस प्रकार अकेले अपने घर पर देख वे असमंजस में पड़ गए.

इस से पहले कि वे कुछ कहते, वह कमरे में आ कर एक कुरसी पर बैठ गई. आज पहली बार प्रोफैसर ने शिवानी को ध्यान से देखा. 20-21 वर्ष की उम्र, लंबा व छरहरा बदन, गोराचिट्टा रंग और आकर्षक नैननक्श. उस के लंबे घने बाल उस की कमर को छू रहे थे. सादे कपड़ों में भी वह बेहद सुंदर लग रही थी.

कमरे के एकांत में एक बेहद सुंदर नवयुवती प्रोफैसर के सामने बैठी थी और वह उन से प्यार करती है, यह सोच कर प्रोफैसर के मन में गुदगुदी सी होने लगी. उन्होंने अपने मन को संयत करने का बहुत प्रयास किया मगर वे अपनी भावनाओं पर नियंत्रण रखने में असफल रहे. उन के मन में तरहतरह की हसीन कल्पनाएं उठने लगीं, चेहरे का रंग पलपल बदलने लगा.

इस सब से बेखबर शिवानी कुरसी पर शांत और निश्चल बैठी थी. उस के एक हाथ में सफेद रंग का रूमाल था. प्रोफैसर उठ कर उस के पास गए और उस के गालों को थपथपाते हुए पूछा, ‘शिवानी, तुम यहां अकेले क्या करने आई हो?’

उस ने प्रोफैसर की आंखों में झांक कर देखा, पता नहीं उसे उन की आंखों में क्या दिखाई दिया, वह झटके के साथ कुरसी से उठ कर खड़ी हो गई. उस के चेहरे के भाव एकाएक बदल गए थे. प्रोफैसर के हाथों को अपने गालों से ?ाटके के साथ हटाते हुए वह बोली, ‘प्लीज, डोंट टच मी. आई डोंट लाइक दिस.’

प्रोफैसर के ऊपर पड़ा बुद्धिजीवी का लबादा फट कर तारतार हो चुका था. शिवानी का यह व्यवहार उन के लिए अप्रत्याशित था. उन्हें समझ ही नहीं आ रहा था कि वे उस से क्या कहें.

‘तुम तो कहती हो कि तुम मुझ से बहुत प्यार करती हो,’ प्रोफैसर महेश ने शिवानी की ओर देखते हुए कहा.

‘हां सर, मैं आप को बहुत प्यार करती हूं. मगर मेरा प्यार गंगाजल की तरह निर्मल और कंचन की तरह खरा है,’ उस ने दृढ़ स्वर में कहा.

‘ये सब फिल्मी डायलौग हैं,’ प्रोफैसर ने खिसियानी हंसी हंसते हुए कहा.

‘सर, जरूरत पड़ने पर मैं यह सबित कर दूंगी कि आप के प्रति मेरा प्यार कितना गहरा है,’ यह कह कर वह कमरे से चली गई थी. काफी देर तक प्रोफैसर अवाक खड़े रहे थे, फिर अपने काम में लग गए थे.

इस के बाद शिवानी ने उन से बात करने या मिलने का प्रयास नहीं किया. वे भी धीरेधीरे उसे भूल गए. कुछ समय बाद उन का उस कालेज से स्थानांतरण हो गया. सरकारी सेवा होने के कारण कई जगह स्थानांतरण हुए और आखिर में वे दिल्ली में सैटल्ड हो गए.

2 साल पहले प्रोफैसर को किडनी प्रौब्लम हो गई. कई महीने तक तो डाइलिसिस पर रहे, फिर डाक्टरों ने कहा कि अब किडनी ट्रांसप्लांट के अलावा कोई चारा नहीं है. तब प्रोफैसर ने अपने परिवार में इस संबंध में सब से बातचीत की. उन की पत्नी, दोनों बेटों और बेटी ने राय दी कि पहले किडनी के लिए विज्ञापन देना चाहिए. हो सकता है कि कोई जरूरतमंद पैसे के लिए अपनी किडनी डोनेट करने के लिए तैयार हो जाए. अगर 2-3 बार विज्ञापन देने के बाद भी कोई डोनर नहीं मिलता है तो हम लोग फिर इस बारे में बातचीत करेंगे.

बेटे ने राजधानी के सभी अखबारों में किडनी डोनेट करने वाले को 20 लाख रुपए देने का विज्ञापन छपवाया. विज्ञापन में प्रोफैसर का नाम, पूरा पता दिया गया. विज्ञापन दिए एक महीना हो गया था. जिस अस्पताल में प्रोफैसर महेश का इलाज चल रहा था. एक दिन वहां से फोन आया.

‘सर, आप के लिए गुड न्यूज है. आप को किडनी देने के लिए एक डोनर मिल गई है. उस की उम्र 45 साल के करीब है और वह आप को किडनी डोनेट करने के लिए तैयार है. मगर उस की एक शर्त है कि, किडनी ट्रांसप्लांट होने से पहले उस का नाम व पता किसी को न बताया जाए.’

मुझे यह जान कर हैरानी हुई कि डोनर अपना नाम, पता क्यों नहीं बताना चाहती. फिर हम सब ने सोचा कि शायद उस की कोई मजबूरी होगी.

ट्रांसप्लांट की सारी फौर्मैलिटीज पूरी कर ली गईं और नियत तारीख पर उन की किडनी का ट्रांसप्लांटेशन हो गया, जो पूरी तरह से सफल रहा.

इस के कई दिनों बाद जब प्रोफैसर महेश अपने को काफी सहज अनुभव करने लगे तो उन्होंने एक दिन डाक्टर साहब से पूछा कि ‘डाक्टर साहब, वे लेडी कैसी हैं जिन्होंने उन्हें अपनी किडनी डोनेट की थी.’

कुछ देर तक डाक्टर साहब खामोश रहे, फिर बोले कि वह लेडी तो परसों बिना किसी को कुछ बताए अस्पताल से चली गई. हैरानी की बात यह है कि वह अपनी डोनेशन फीस भी नहीं ले गई.

‘क्या..?’ प्रोफैसर का मुंह विस्मय से खुला का खुला रह गया था. जब उन्होंने यह बात अपने परिवार के लोगों को बताई तो उन सब को बड़ी हैरानी हुई. सभी को यह बात सम?ा ही नहीं आ रही थी कि आज के इस आपाधापी के दौर में 20 लाख रुपए ठुकरा देने वाली यह लेडी आखिर कौन थी. काफी दिनों तक प्रोफैसर इसी उधेड़बुन में रहे. उन्होंने उस लेडी का पता लगाने की हरसंभव कोशिश की, मगर इस के बारे में कुछ पता नहीं चला.

‘‘आप को कहां तक जाना है, सर,’’ अचानक टीटीई ने आ कर प्रोफैसर महेश की तंद्रा को भंग कर दिया. वे अतीत से वर्तमान में लौट आए. टिकट चैक करने के बाद टीटीई चला गया.

प्रोफैसर महेश ने वह रूमाल उठाया जो शिवानी ने उन्हें देने के लिए प्रोफैसर माधवी को दिया था. उन्होंने रूमाल को पहचानने की कोशिश की. यह शायद वही कढ़ा हुआ रूमाल था जो शिवानी उन्हें देने उन के कमरे पर आई थी. सफेद रंग के उस रूमाल के एक कोने में सुनहरे रंग से इंग्लिश का अक्षर एस कढ़ा हुआ था. एस यानी शिवानी के नाम का पहला अक्षर.

अब प्रोफैसर महेश को डोनर की सारी पहेली समझ में आ गई थी. उन्होंने रूमाल में रखे हुए मुड़ेतुड़े पत्र को खोल कर पढ़ा, लिखा था-

‘‘प्रोफैसर साहब,

‘‘आप का जीवन मेरे लिए बहुत बहुमूल्य है, इसलिए मैं ने अपने जीवन को संकट में डाल कर आप की जान को बचाया. मगर मैं ने ऐसा कर के आप पर कोई एहसान नहीं किया. मुझे तो इस बात की खुशी है कि मैं जिसे हृदय की गहराइयों से प्यार करती थी, उस के किसी काम आ सकी.

‘‘आप की शिवानी.’’

पत्र पढ़ कर प्रोफैसर महेश का मन गहरी वेदना से भर उठा. शिवानी का यह निस्वार्थ प्यार देख कर उन की आंखों से आंसू बहने लगे. उन्होंने शिवानी का दिया हुआ रूमाल उठाया और उस से अपने आंसुओं को पोंछने लगे. ऐसा कर के शायद उन्होंने शिवानी के सच्चे अमर प्रेम को स्वीकार कर लिया था.

नोटों की बारिश: झूठ और ठगी

हमारे आसपास बहुत से लोग सज्जन और भोले भाले होते हैं जो किसी की भी बातों में आ जाते हैं और तरीका शिकार हो जाते हैं. हाल ही में ऐसी अनेक घटनाएं घटित हुई है. इस रिपोर्ट में हम बताने जा रहे हैं कि किस तरह जागरुक होकर के आप से ठगी से बच सकते हैं और दूसरों को भी बचा सकते हैं.
पहली घटना -छत्तीसगढ़ के रतनपुर जिला बिलासपुर में लड़कियों को दैवीय शक्ति से पैसों की बारीश होने का झाॅंसा देकर पूजा पाठ करने के नाम पर ठगी हो गई.
दुसरी घटना – चांदी लेकर आओ उसे हम सोना बना देंगे.  कह कर जिला कोरबा के पाली थाना क्षेत्र में दो लोगों ने कई महिलाओं को ठग लिया.
तीसरी घटना -छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के कटोरा तालाब थाना क्षेत्र अंतर्गत रूपयों को दुगना बनाने का झांसा दे कर ठगी  कर ली गई.
यह कुछ घटनाएं यह बताती है कि आज के शिक्षित समाज में भी लगातार ठगी की घटनाएं हो रही है. इसका सीधा सा मतलब यह है कि आज 21वीं शताब्दी में भी वही हालत है जो पहले हुआ करते थे आखिर इसके पीछे का कारण क्या है और इसे कैसे रोका जा सकता है यह हम आपको बताने जा रहे हैं.

लालच और  रूपए की बरसात

दो नाबालिक लड़कियों को दैवीय शक्ति से पैसों की बारीश होने का झाॅंसा देकर पूजा पाठ करने और फिर  अनाचार करने वाले चार आरोपियों को पुलिस ने गिरफ्तार कर जेल की सींखचों के पीछे भेज दिया है.
 पुलिस की अपील है कि ऐसे झांसा देने वाले लोगों से सभी को सावधान रहना चाहिए जिससे भविष्य में ऐसी घटना की पुनरावृत्ति न हो .
 दरअसल,  हुआ यह कि छत्तीसगढ के रतनपुर थाना परिक्षेत्र अंतर्गत14 फरवरी 2024 को  पीडिता के परिजनो के द्वारा रिपोर्ट की गई कि उनके गांव के दो व्यक्तियों द्वारा उन्हे बताया गया की एक ठाकुर बाबा है जो कुमारी कन्याओं की पूजापाठ करता है, जिससे पैसा बरसने लगता है, जिस झांसे में वे लोग रतनपुर के मदनपुर में एक घर में आये एवं वहा पूजापाठ के बाद बाबा द्वारा उन बच्चियों को अकेले कमरे मे ले जाकर पूजापाठ के बहाने  दैहिक शोषण किया गया.  वापस अपने घर  जाने पर बालिकाओं ने यह बात अपने परिजनों को बताई , जिस पर परिजनों द्वारा थाना मे रिपोर्ट दर्ज कराई गई.
लड़कियों की रिपोर्ट पर थाना रतनपुर में तत्काल अपराध कायम कर विवेचना में लिया गया.  थाना रतनपुर में टीम गठित कर संदेहियों को लोकल मुखबिर के आधार पर आरोपियों की पतासाजी कर गिरफ्तारी हेतु तीन अलग-अलग टीमें बनाई गई, और चार आरोपियों को बालपुर, भाठागांव थाना सरसींवा जिला सारंगढ़-बिलाईगढ़ व लिगिंयाडीह व मदनपुर जिला बिलासपुर से गिरफ्तार किया गया.  जबकि प्रकरण का एक आरोपी यह आलेख लिखे जाने वक्त तक फरार है.
इस रिपोर्ट को तैयार कर किए जाने वक़्त जब पुलिस अधिकारियों से चर्चा हुई तो जानकारी मिली सारंगढ़ बिलाईगढ़ जिले निवासी धनिया बंजारे और हुलसी रात्रे  करीबन दो माह पूर्व से  दो अलग-अलग स्थान की नाबालिक बच्चियों एवं उनके माता पिता को कुंवारी लड़की का पूजा कराकर एवं उसके ऊपर दैवीय शक्ति बैठाने से लाखों-करोड़ों रूपये की बारिश होती है कहकर अपने विश्वास में लिया गया. 11 फरवरी 2024 को उन्होंने दो नाबालिक बच्चियों को उनके परिजनों के साथ बिलासपुर बस स्टैण्ड लेकर गये और वहाॅं पूजा करने वाले पंडित कुलेश्वर राजपूत उर्फ पंडित ठाकुर एवं उनका साथी कन्हैया से मिलवाकर उनके द्वारा ही पूजापाठ कराकर पैसा बरसाना बताकर मुलाकात कराई .
जहाॅं से वे लोग दोनों नाबालिक बच्चियों को मदनपुर रानीगाॅंव चैक के पास गणेश साहू के मकान में लेकर गये. जहाॅं सभी गणेश साहू के घर खाना खाये, पंडित कुलेश्वर ठाकुर दोनों नाबालिक बच्चियों में से एक बच्ची को मकान के अंदर कमरे में ले गया, एवं पूजा के बहाने उनके परिजन और सभी लोगों को कमरे से बाहर कर दिया तथा अंदर कमरे में लड़की के साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाया एवं उक्त घटना के बारे में किसी को बताने पर जान से मारने की धमकी देते हुये कमरे के बाहर छोड़ दिया.
इसी प्रकार दुसरी नाबालिक लड़की को भी पूजा कराने के बहाने अंदर कमरे में ले जाकर जबरदस्ती बलात्कार किया. उक्त घटना कारित  करने के पश्चात पंडित कुलेश्वर ठाकुर द्वारा उनके परिजन को बताया कि पूजा से मात्र दो चार  हजार रूपये की ही बारिश हो पाई है कहकर पैसे दे दिया, दोनों नाबालिक बच्चियाॅं घटना से इतने डरे सहमें थे कि वे उक्त घटना के संबंध में परिजन को जानकारी नहीं बता पाये. बिलासपुर बस स्टैण्ड से वापस अपने घर जाते समय उक्त घटना के संबंध में दोनों नाबालिक लडकियों ने अपने परिजन को बताई. रिपोर्ट के आधार पर पुलिस ने भारतीय दंड विधान की धाराओं के तहत मामला बनाकर  आरोपियों को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया है

Mirror Selfie में किलर पोज देती दिखीं अक्षरा सिंह, लोगों की बनी नेशनल क्रश

भोजपुरी फिल्मों की जानी-मानी एक्ट्रेस अक्षरा सिंह हमेशा ही चर्चाओं में बनीं रहती है, उनके सोशल मीडिया पोस्ट उन्हे वायरल कर देते है. उनके आए दिन कोई ना कोई नया पोस्ट सामने आता रहता है. जिसे फैंस काफी पसंद करते है. ऐसा ही एक पोस्ट इन दिनों खूब वायरल हो रहा है. जिसे देख फैंस का दिल गदगद हो गया है.

 

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आपको बता दें कि खूबसूरती में बौलीवुड की तमाम एक्ट्रेसेस को टक्कर देने वाली अक्षरा सिंह इंटरनेट पर छाई रहती हैं. अक्षरा सिंह की हर एक अदा पर यूपी-बिहार के लाखों लोग अपनी जान छिड़कते हैं. इस बीच भोजपुरी एक्ट्रेस अक्षरा सिंह की कुछ फोटोज सामने आई हैं, जिन्हें देखने के बाद हर कोई उनका फैन हो गया है.

भोजपुरी इंडस्ट्री की क्वीन अक्षरा सिंह ने अपने फैंस को विजुअल ट्रीट दिया है. अक्षरा सिंह ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट को अपडेट करते हुए कुछ तस्वीरें शेयर की हैं, जिसमें वो किसी हसीना से कम नहीं लग रही हैं. सामने आई तस्वीरों में अक्षरा सिंह रेड कोट में नजर आ रही हैं. इन फोटोज में एक्ट्रेस मिरर के सामने किलर पोज दे रही हैं. अक्षरा सिंह की इन फोटोज पर लोग जमकर प्यार बरसा रहे हैं. जहां एक यूजर ने अक्षरा सिंह को लेकर कहा, ‘नेशनल क्रश बन गई हो तुम’.

 

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बता दें कि सिर्फ यूपी-बिहार ही नहीं बल्कि अब उन्हें पूरा भारत पसंद करता है. इंस्टाग्राम पर अक्षरा सिंह को 6 मिलियन से ज्यादा लोग फॉलो करते हैं. अक्षरा सिंह सोशल मीडिया पर काफी एक्टिव रहती हैं और अक्सर अपने फैंस के साथ तस्वीरें और वीडियोज शेयर करती रहती हैं. उनकी तस्वीरें और वीडियोज इंटरनेट पर पलभर में छा जाती है.

रेव पार्टी विवाद में फंसे Big Boss फेम एल्विश यादव, FSL को भेजे गए सैंपल में मिला सांप का जहर

बिग बौस ओटीट 2 की विनर एल्विश यादव चर्चाओं में बने रहते है. इन दिनों वे विवादों से फंसते नजर आ रहे है. कुछ समय पहले एल्विश यादव का मारपीट का एक वीडियो खूब वायरल हुआ था. जिसके बाद वे एक ओर विवाद में फंसते नजर आए थे. जी हां, कुछ महीनों पहले एल्विश यादव पर आरोप लगा था कि उनकी रेव पार्टियों में सांपों का जहर सप्लाई किया जाता है. इस मामले की जांच नोएडा पुलिस कर रही थी. अब इस केस में एक नया अपडेट सामने आया है. एफएसएल की रिपोर्ट सामने आ गई है, जिसमें सांपों का जहर पाया गया है.

 

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सलमान खान के शो बिग बॉस ओटीटी से धमाल मचाने वाले एल्विश यादव इन दिनों विवादों में बने हुए हैं. अभी हाल ही जयपुर में युवक को मारा थप्पड़ मारा था. जिसके बाद से एल्विश यादव चर्चा में बने हुए हैं. इसी बीच एल्विश यादव की रेव पार्टियों से जुड़ा केस एक पर फिर सुर्खियों में आ गया है. इस केस में अभी हाल ही में एक नया अपडेट सामने आया है. पार्टी से कुछ सैंपल जयपुर एफएसएल को जांच के लिए भेजे गए थे. जिस रिपोर्ट में पाया गया है कि पार्टी में कोबरा करैत प्रजाति के सांपों का जहर इस्तेमाल किया जा रहा थ. आपको बता दें नोएडा के सेक्टर 49 के पुलिस थामे में एल्विश यादव के खिलाफ मुकदमा दर्ज करवाया गया था.

 

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एल्विश यादव का नाम उस समय ज्यादा चर्चा में आ गया था जब बिग बॉस फेस स्टार पर रेव पार्टी करने के आरोप लगे थे. पीएफए की शिकायत के बाद नोएडा पुलिस ने रेव पार्टी की जगह पर छापेमारी भी थी. वहां से पुलिस को कुछ सांप मिले थे. इस मामले में पुलिस ने अब तक 5 लोगों गिरफ्तार किया है. एल्विश यादव से जुड़े इस केस को लेकर आपकी क्या राय है, कमेंट कर के हमें जरूर बताएं.

इन 7 वजहों से लड़कियों को दी जानी चाहिए यौन शिक्षा

अमेरिका के सेंटर फौर डिसीज कंट्रोल के अनुसार हाल ही वर्षों में शेमिडिया, गोनोरिया और शिफलिस के मामलों में काफी बढ़ोतरी हुई है. STD (यौन रोग) से सबसे ज़्यादा युवतियां प्रभावित होती हैं.

स्थिति कितनी गंभीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि चार में से एक युवती यौन रोग से प्रभावित है. युवतियों में बढ़ते यौन रोग का प्रमुख कारण है यौन शिक्षा का अभाव. आज भी कई ऐसे देश हैं जहां स्कूल के पाठ्यक्रम में यौन शिक्षा विषय नहीं है.

यौन शिक्षा के अभाव में 13 से 19 साल की युवतियां प्रभावित हो रही हैं. यहां हम आपको बताने जा रहे हैं 7 ऐसे कारण जिसकी वजह से युवतियों के लिये यौन शिक्षा जरूरी है.

  1. युवा महिलाओं में यौन रोग होने की अधिक संभावना

एक अध्ययन नो द फैक्ट्स के अनुसार पुरुष की तुलना में युवतियों के शरीर चूंकि कुछ कमजोर रहते हैं, इसलिये उन्हें यौन रोग लगने की ज्यादा संभावना रहती है. इस बारे में कई युवतियों को खबर भी नहीं रहती. इस समय 15 से 24 साल की उम्र के ग्रुप में 51 प्रतिशत युवतियां यौन रोग की शिकार हैं. पुरुषों के मामले में ये प्रतिशत 49 है.

  1. 19 की होने तक 60 फीसद युवतियां सेक्स कर चुकी होती हैं

नो द फैक्ट्स के अनुसार 15 साल पूरे करने तक 13 फीसद युवतियां सेक्स का अनुभव करने लगती हैं और 19 की होते तक 68 फीसद युवतियां पूरी तरह सेक्स करने लगती हैं. इस संख्या को देखकर ही यौन शिक्षा की जरुरत महसूस होती है.

  1. यौन रोग से अनजान रहती हैं युवतियां

ज्यादातर युवतियों को पता ही नहीं होता कि यौन रोग कैसे होता है. इनमें से कई युवतियों को लगता है कि टॉयलेट की सीट पर बैठने से यौन रोग हो जाता है.

  1. तीस लाख से ज्यादा युवतियां यौन रोग से ग्रस्त हैं

एक अध्ययन के अनुसार तीस लाख से ज्यादा युवतिया शेमिडिया, हरपीस और ट्रिख जैसे यौन रोग से ग्रस्त हैं. ये संख्या और अधिक हो सकती है क्योंकि अध्ययन में सिफलिस, HIV, गोनोरिया जैसे रोग को शामिल नहीं किया गया है.

  1. महिलाओं को अधिक होते हैं यौन रोग

पुरुष की तुलना में महिलाओं को यौन रोग होने का सबसे ज्यादा खतरा रहता है. महिलाओं में यौन रोग का इलाज न करने पर सरवाइकल कैंसर भी हो सकता है और गर्भधारण करने में भी मुश्किल हो सकती है.

  1. 10 फीसद से ज्यादा युवतियों को एक से ज्यादा यौन रोग होते हैं

कंडोम का प्रयोग न करने या ठीक से प्रयोग न करने से एक से ज्यादा यौन रोग हो सकते हैं. सेंटर फॉर डिसीज कंट्रोल के अनुसार 14 से 19 साल के बीच की 15 फीसद युवतियों को एक से ज्यादा यौन रोग होते हैं.

  1. तीन या इससे अधिक पुरुषों से संबंध बनाने वाली आधी से ज्यादा युवतियों को होता है यौन रोग

हालंकि अगर आप कंडोम इस्तेमाल करते हैं तो यौन रोग होने की संभावना कम ही रहती है भले ही आप कितनों के भी साथ शारीरिक संबंध बनाए, लेकिन सेंटर फौर डिसीज कंट्रोल के अनुसार युवतियों के मामले में ऐसा नहीं है. 50 फीसद से ज्यादा युवतियों में, जिन्होंने तीन या इससे अधिक पुरुषों के साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं, यौन रोग पाए गए हैं.

चसका पराई औरत का

नंदू का अपने गांव की विधवा कमला से जिस्मानी संबंध अब लोगों में चर्चा की बात बन चुका है. नंदू की बीवी तारा इस वजह से अपने बच्चों को ले कर 2 महीने से मायके में बैठी हुई है.

सारा समाज नंदू की इस हरकत पर थूथू कर रहा है, लेकिन नंदू है कि विधवा कमला से अपने जिस्मानी संबंध तोड़ने को तैयार नहीं है.

मायके जाने से पहले नंदू की बीवी तारा भी कमला को समझाने और पति नंदू से जिस्मानी रिश्ता तोड़ लेने की गुहार लगाने कमला के पास गई थी, लेकिन कमला ने उस की एक नहीं सुनी और कहा, ‘‘तू अपने मर्द को बांध कर रख ले. मैं उस के पास नहीं जाती, वही मेरे पास आता है.’’

शबनम की शादीशुदा जिंदगी भी बुरी तरह गुजर रही है. वजह, शबनम का शौहर शब्बीर अपने चाचा की बीवी तनाज की जवानी में खोया रहता है. शब्बीर अपने घर न रह कर अकसर चाचा के घर ही पड़ा रहता है और वहां तनाज के जिस्मानी रूप का जाम पीता रहता है. चाचा की रोकटोक नहीं होने और तनाज की हामी के चलते शब्बीर की ये करतूतें मजे से चल रही हैं.

शब्बीर ने अपनी सारी दौलत तनाज को खुश करने में लुटा रखी है. तनाज की अदाओं के सामने शब्बीर अपनी बीवी को भी भुला बैठा है.

शब्बीर ने समाज के बंधनों को भी ताक पर रख दिया. बस, तनाज और उस के जिस्मानी रिश्तों को वह अपनी जिंदगी मानने लगा है और तनाज है कि शब्बीर को बेवकूफ बना कर उसे दोनों हाथों से लूट रही है.

दूसरे की औरत सभी मर्दों को अच्छी लगती है. पराई बीवी में मर्द को जवानी और जोश का सैलाब दिखता है. पराई औरत को भोगने की इच्छा तकरीबन सभी मर्दों में पाई जाती है. इस के लिए वे इज्जत को ताक पर रख जिस्मानी मजा लेने के लिए उतावले हो जाते हैं.

कुछ मर्दों को दूसरे की बीवी के ब्लाउज से झाकते उभार पसंद आते हैं, तो किसी को उस के हिलते हुए कूल्हे. कोई गैर की बीवी के कसे हुए जिस्म पर मरता है, तो कोई उस की नशीली अदाओं का शिकार हो जाता है.

ऐसा दर्शन पा कर उस पर लट्टू मर्द को अपनी बीवी बेकार लगने लगती है. उसे तब अपनी बीवी में न जवानी दिखती है और न ही सैक्सी अदाएं नजर आती हैं.

बदमाश किस्म की औरतें ऐसे मर्दों की तलाश में रहती हैं, जो उन के हुस्न पर पैसा लुटाए और जरूरत पड़ने पर उन की जिस्मानी प्यास को भी बुझाए.

इन औरतों का अपना कोई दीनईमान नहीं होता है. जब तक उन्हें पराए मर्द से पैसा मिलता है, तब तक वे उन के करीब रहती हैं. कंगाल मर्द को वे दूध में पड़ी मक्खी की तरह निकाल कर बाहर फेंक देती हैं.

सच यही है कि दूसरे की बीवी के चक्कर में पड़ने के बाद वह अपनी बीवी और समाज की नजर में गिर जाता है. बीवी भी अपने मर्द को दिल से माफ नहीं कर पाती है.

पराई औरत से जिस्मानी रिश्तों के चक्कर में ऐसे मर्दों को आखिर में बदनामी ही मिलती है. उन्हें हमेशा गलत नजर से देखने की जो आदत पड़ जाती है, वह भी आसानी से नहीं छूटती है.

दूसरे की बीवी से जिस्मानी रिश्ता बनाने के चलते मर्दों को कई अंदरूनी बीमारियों का शिकार होते भी देखा गया है. अनजाने में उस मर्द की बीवी भी शिकार हो जाती है. बीमारी के बढ़ने पर ही पता चलता है, लेकिन तब तक देर हो चुकी होती है.

गैर की बीवी गैर की ही होती है. सबकुछ लुटा देने के बाद भी वह गैर की रहती है. ऐसे में उस के लिए अपना घरपरिवार और जिंदगी बरबाद करना समझदारी वाली बात नहीं है. जो सुख पराई बीवी देती है, उस से कहीं ज्यादा मजा खुद की बीवी दे सकती है, फिर क्यों घर से बाहर दूसरे की बीवी में जिस्मानी सुख तलाशा जाए?

अच्छी बात तो यह होगी कि दूसरे की बीवी को अपनी बांहों में भरने की गलत आदत को छोड़ें. अपनी बीवी को प्यार करें, ताकि बीवी तो खुश रहे ही, घरपरिवार में भी सुख बना रहे.

जिस्मानी रिश्तों को अपनी जिंदगी से ज्यादा अहमियत न दें. दूसरे की बीवी अगर गलत इरादे से करीब आना चाहे, तो उस से दूरी बना कर रखें.

सपना और सचाई : एक नौकरानी और मालिक की प्रेम कहानी

रविवार होने की वजह से रमन घर में बिस्तर पर लेटा शांता के साथ मौजमस्ती कर रहा था. इस की एक वजह तो यह थी कि अपनी कंपनी के झंझंटों से उसे छुट्टी के दिन कुछ राहत मिल जाती और वह अपने ढंग से खापी सकता था, लेकिन इस की दूसरी और ज्यादा अहम वजह यह भी थी कि उसे शांता के साथ सारा दिन गुजारने का सुनहरा मौका जो मिल जाता था.

कोई दूसरा शख्स रमन और शांता के इस नाजायज संबंध को देखता, तो हैरान होने के अलावा रमन की बेवकूफी पर भी उसे कोसता.

शांता कोई मौडर्न या पढ़ीलिखी औरत नहीं थी, बल्कि रमन के घर में काम करने वाली एक नौकरानी थी. दूसरी ओर रमन एक मल्टीनैशनल कंपनी में असिस्टैंट मैनेजर था.

रमन की कंपनी के अपने रिहायशी फ्लैट थे, जिन में कंपनी के दूसरे मुलाजिम भी रहते थे. उन में से ज्यादातर शादीशुदा थे और अपनेअपने परिवारों के साथ रहते थे.

रमन की तरह केवल 1-2 मुलाजिम ऐसे थे, जो अभी कुंआरे थे और उन को घर की देखभाल के लिए नौकर की जरूरत पड़ना लाजिम था.

शांता नेपाल की रहने वाली थी. उस का पति उसे अपने साथ कोलकाता ले आया था, जहां पर वह एक कारखाने में बतौर चपरासी नौकरी करता था. उस का नाम जंग बहादुर था.

जंग बहादुर वैसे तो शांता से बहुत प्यार करता था, लेकिन उस को रोजाना शराब पीने की लत पड़ चुकी थी, जिस से उस का हाथ हमेशा तंग ही रहता था.

पैसे की कमी के चलते शांता और जंग बहादुर का अकसर झगड़ा होता था, इसलिए शांता ने शहर की इस अफसर कालोनी के कुछ घरों में बतौर नौकरानी काम करना शुरू कर दिया था.

शांता खूबसूरत तो थी ही, उस का मिजाज भी बहुत अच्छा था, इसलिए रमन की कालोनी के सभी लोग उस को अपने परिवार के एक सदस्य की तरह ही समझाते थे.

रमन के साथ शांता के रिश्ते मालिक और नौकरानी के न रह कर पतिपत्नी जैसे कैसे बन गए, इस की भी एक अलग ही कहानी है.

दरअसल, जब शांता ने रमन के फ्लैट पर काम करना शुरू किया था, तो शुरूशुरू में तो उन के संबंध मालिक और नौकरानी जैसे ही थे, लेकिन शांता के खूबसूरत चेहरे में पता नहीं रमन को क्या नजर आया कि जब वह उस के घर में काम कर रही होती, तो वह चोरी से उस के अंगों को देखा करता था.

शांता भी रमन के इस झकाव से बेखबर नहीं थी. कई बार जब वह रमन को कनखियों से उसे ताड़ते हुए देखती, तो वह धीरे से मुसकरा देती. इस का नतीजा यह निकला कि उन दोनों में अकसर हंसीमजाक होता रहता.

रमन ने अपने फ्लैट की डुप्लीकेट चाबियां तक शांता को सौंप दी थीं. वह अपनी मरजी और समय के मुताबिक आती और घर का काम कर के चली जाती थी.

बात यहां तक रहती तो ठीक थी, लेकिन चक्कर कुछ ऐसा चला कि उन दोनों की दूरियां और ज्यादा मिटती गईं और वे एक नाजायज रिश्ते में बंध कर रह गए.

इस नाजायज रिश्ते का कोई नाम नहीं था, पर वे दोनों इस से दूर भागने के बजाय अपनी जिंदगी का अहम हिस्सा समझने लगे थे.

इस रिश्ते की बुनियाद उस दिन से शुरू हुई, जब शांता ने रमन से उधार लिए 5 सौ रुपए वापस करने चाहे.

माली तंगी और जंग बहादुर की फुजूलखर्ची की वजह से शांता अकसर अपने कुछ मालिकों से पैसे एडवांस में मांग लिया करती थी और फिर धीरेधीरे अपनी तनख्वाह में से उस रकम को चुकता कर दिया करती थी.

रमन से भी उस ने कई बार पहले भी पैसे उधार लिए थे और अपनी सुविधा के मुताबिक लौटा दिए थे. लेकिन इस बार जब शांता ने पैसे लौटाने चाहे, तो रमन ने उसे मना कर दिया.

ऐसा करते हुए रमन के होंठों पर कुटिल मुसकराहट तैर रही थी और आंखों में वासना की ?ालक साफ दिखाई दे रही थी.

शांता ने भी उस की भावनाओं को पढ़ लिया था. इस सचाई के बावजूद उस ने रमन को पैसे लौटाने की जिद नहीं की. रमन को यही रजामंदी ही तो चाहिए थी.

‘देखो शांता, आगे से तुम मुझ से पैसे वापस करने की बात मत करना. मेरेतुम्हारे पैसे अलग थोड़े ही हैं? मेरा पर्स मेज पर पड़ा रहता है. तुम जब चाहो, इस पर्स में से अपनी जरूरत के मुताबिक पैसे निकाल सकती हो,’ रमन ने शांता को अपने प्यार का मीठा जहर पिलाते हुए कहा था.

शांता तो यही चाहती थी. उस ने सिर हिला कर हामी भर दी थी.

खुशी से पगलाए रमन ने शांता को अपनी बांहों में भर लिया और उस के खिलेखिले चेहरे पर चुंबनों की बरसात कर डाली थी. फिर उस ने शांता को अपनी बांहों में कस कर भींच लिया और ड्राइंगरूम की ओर बढ़ गया था.

तब से दोनों के बीच यह जिस्मानी संबंधों वाला सिलसिला चल रहा था. रमन और शांता की जिंदगी में एक अजीब सा नशा छाया हुआ था. शांता तो यह भूल ही चली थी कि जंग बहादुर उस का पति है.

दूसरी ओर रमन ने भी कुछ महीने पहले अपनी ही कंपनी की दिल्ली में काम कर रही एक मुलाजिम निशा से अपनी मां की मरजी से सगाई की थी.

सगाई होने के कुछ दिन बाद तक तो रमन का निशा के प्रति झुकाव ठीकठाक रहा, लेकिन अब वह कई महीनों से निशा से बिलकुल कट गया था.

निशा ने उस से कई बार फोन पर इस बदलाव की शिकायत भी की थी और शादी की तारीख तय करने के लिए कई बार कह चकी थी, लेकिन रमन पर निशा की शिकायतों का कोई असर नहीं था. वह तो शांता के संगमरमरी जिस्म की जंजीरों में पूरी तरह से कैद हो चुका था.

आज छुट्टी थी, इसलिए तय कार्यक्रम के मुताबिक शांता सुबह से ही उस के फ्लैट पर आ गई थी.

आते ही शांता रमन के बिस्तर में घुस गई. दोनों एकदूसरे की आंखों में आंखें डाले सुख तलाशते रहे.

तकरीबन एक घंटा बीत चुका था. इस दौरान शांता सिर्फ एक बार रमन के बिस्तर से उठी थी और चाय बना कर लाई थी.

अब दोनों एक ही कप से बारीबारी से चाय की चुसकियां ले रहे थे. उन के कपड़े अभी भी नीचे फर्श पर ही पड़े थे.

अचानक बाहर के दरवाजे से किसी के अंदर आने की आहट हुई. शायद, शांता ने अंदर आते समय बाहर का दरवाजा ठीक से बंद नहीं किया था.

इस से पहले कि रमन और शांता कुछ समझ पाते, एक बूढ़ी औरत के साथ एक लड़की अंदर आ गई. वे निशा और उस की मां थीं. उन को देख कर रमन के चेहरे से हवाइयां उड़ने लगीं और चाय का कप छूट कर नीचे गिर गया. अपने कपड़ों की तलाश में वह नीचे फर्श पर हाथ मारने लगा. शर्मिंदगी से उस के मुंह से शब्द नहीं निकल पा रहे थे.

दूसरी ओर शांता का हाल तो रमन से भी ज्यादा बुरा था. उसे जैसे पहली बार अपनी जिंदगी की कड़वी सचाई से सामना करना पड़ा था. लिहाजा, वह एक ही पल में अर्श से फर्श पर आ गिरी थी.

शांता अपने जिस्म को अपनी बांहों से किसी न किसी तरह ढकते हुए उठी और फर्श पर पड़े अपने कपड़े उठा कर तेजी से बगल वाले कमरे की ओर भाग गई.

निशा तब तक पूरे मामले को समझ चुकी थी, इसलिए वह बोली, ‘‘रमन, अब मैं तुम्हारी सारी असलियत जान गई हूं. तुम से शादी कर के मैं कैसे जिंदा रह सकती हूं? यह तो अच्छा हुआ कि मां के ज्यादा कहने पर मैं तुम्हारा हाल पूछने और शादी से आनाकानी करने की वजह जानने के लिए अचानक यहां आ गई. अब मैं अपनी सगाई तोड़ने का फैसला तुम्हें सुनाती हूं.’’

यह कह कर निशा अपनी मां के साथ कमरे से बाहर चली गई.

रमन बौखलाया सा अकेला अपने बिस्तर पर लेटा यह जानने की कोशिश कर रहा था कि जो कुछ उस के साथ हुआ, वह वाकई कोई सचाई थी या एक बुरा सपना.

सही सजा : मठ की जायदाद

पुरेनवा गांव में एक पुराना मठ था. जब उस मठ के महंत की मौत हुई, तो एक बहुत बड़ी उलझन खड़ी हो गई. महंत ने ऐसा कोई वारिस नहीं चुना था, जो उन के मरने के बाद मठ की गद्दी संभालता.

मठ के पास खूब जायदाद थी. कहते हैं कि यह जायदाद मठ को पूजापाठ के लिए तब के रजवाड़े द्वारा मिली थी.

मठ के मैनेजर श्रद्धानंद की नजर बहुत दिनों से मठ की जायदाद पर लगी हुई थी, पर महंत की सूझबूझ के चलते उन की दाल नहीं गल रही थी.

महंत की मौत से श्रद्धानंद का चेहरा खिल उठा. वे महंत की गद्दी संभालने के लिए ऐसे आदमी की तलाश में जुट गए, जो उन का कहा माने. नया महंत जितना बेअक्ल होता, भविष्य में उन्हें उतना ही फायदा मिलने वाला था.

उन दिनों महंत के एक दूर के रिश्तेदारी का एक लड़का रामाया गिरि मठ की गायभैंस चराया करता था. वह पढ़ालिखा था, लेकिन घनघोर गरीबी ने उसे मजदूर बना दिया था.

मठ की गद्दी संभालने के लिए श्रद्धानंद को रामाया गिरि सब से सही आदमी लगा. उसे आसानी से उंगलियों पर नचाया जा सकता था. यह सोच कर श्रद्धानंद शतरंज की बिसात बिछाने लगे.

मैनेजर श्रद्धानंद ने गांव के लोगों की मीटिंग बुलाई और नए महंत के लिए रामाया गिरि का नाम सु?ाया. वह महंत का रिश्तेदार था, इसलिए गांव वाले आसानी से मान गए.

रामाया गिरि के महंत बनने से श्रद्धानंद के मन की मुराद पूरी हो गई. उन्होंने धीरेधीरे मठ की बाहरी जमीन बेचनी शुरू कर दी. कुछ जमीन उन्होंने तिकड़म लगा कर अपने बेटेबेटियों के नाम करा ली. पहले मठ के खर्च का हिसाब बही पर लिखा जाता था, अब वे मुंहजबानी निबटाने लगे. इस तरह थोड़े दिनों में उन्होंने अपने नाम काफी जायदाद बना ली.

रामाया गिरि सबकुछ जानते हुए भी अनजान बना रहा. वह शुरू में श्रद्धानंद के एहसान तले दबा रहा, पर यह हालत ज्यादा दिन तक नहीं रही.

जब रामाया गिरि को उम्दा भोजन और तन को आराम मिला, तो उस के दिमाग पर छाई धुंध हटने लगी. उस के गाल निकल आए, पेट पर चरबी चढ़ने लगी. वह केसरिया रंग के सिल्क के कपड़े पहनने लगा. जब वह माथे और दोनों बाजुओं पर भारीभरकम त्रिपुंड चंदन लगा कर कहीं बाहर निकलता, तो बिलकुल शंकराचार्य सा दिखता.

गरीबगुरबे लोग रामाया गिरि के पैर छू कर आदर जताने लगे. इज्जत और पैसा पा कर उसे अपनी हैसियत समझ में आने लगी.

रामाया गिरि ने श्रद्धानंद को आदर के साथ बहुत समझाया, लेकिन उलटे वे उसी को धौंस दिखाने लगे.

श्रद्धानंद मठ के मैनेजर थे. उन्हें मठ की बहुत सारी गुप्त बातों की जानकारी थी. उन बातों का खुलासा कर देने की धमकी दे कर वे रामाया गिरि को चुप रहने पर मजबूर कर देते थे. इस से रामाया गिरि परेशान रहने लगा.

एक दिन श्रद्धानंद मठ के बरामदे में बैठे चाय पी रहे थे. चाय खत्म हुई कि वे कुरसी से लुढ़क गए. किसी ने पुलिस को खबर कर दी. पुलिस श्रद्धानंद की लाश को पोस्टमार्टम के लिए ले जाना चाहती थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट से भेद खुलने का डर था, इसलिए रामाया गिरि थानेदार को मठ के अंदर ले गया और लेदे कर मामले को रफादफा करा दिया.

श्रद्धानंद को रास्ते से हटा कर रामाया गिरि बहुत खुश हुआ. यह उस की जिंदगी की पहली जीत थी. उस में हौसला आ चुका था. अब उसे किसी सहारे की जरूरत नहीं थी.

रामाया गिरि नौजवान था. उस के दिल में भी आम नौजवानों की तरह तमाम तरह की हसरतें भरी पड़ी थीं. खूबसूरत औरतें उसे पसंद थीं. सो, वह पूजापाठ का दिखावा करते हुए औरत पाने का सपना संजोने लगा.

उन दिनों मठ की रसोई बनाने के लिए रामप्यारी नईनई आई थी. उस की एक जवान बेटी कमली भी थी. इस के बावजूद उस की खूबसूरती देखते ही बनती थी. गालों को चूमती जुल्फें, कंटीली आंखें और गदराया बदन.

एक रात रामप्यारी को घर लौटने में देर हो गई. मठ के दूसरे नौकर छुट्टी पर थे, इसलिए कई दिनों से बरतन भी उसे ही साफ करने पड़ रहे थे.

रामाया गिरि खाना खा कर अपने कमरे में सोने चला गया था, लेकिन उसे नींद नहीं आ रही थी. चारों ओर खामोशी थी. आंगन में बरतन मांजने की आवाज के साथ चूडि़यों की खनक साफसाफ सुनाई दे रही थी.

रामाया गिरि की आंखों में रामप्यारी की मस्त जवानी तैरने लगी. शायद उसे पाने का इस से अच्छा मौका नहीं मिलने वाला था. उस ने आवाज दी, ‘‘रामप्यारी, जरा इधर आना.’’

रामाया गिरि की आवाज सुन कर रामप्यारी सिहर उठी. वह अनसुनी करते हुए फिर से बरतन मांजने लगी.

रामाया गिरि खीज उठा. उस ने बहाना बनाते हुए फिर उसे पुकारा, ‘‘रामप्यारी, जरा जल्दी आना. दर्द से सिर फटा जा रहा है.’’

अब की बार रामप्यारी अनसुनी नहीं कर पाई. वह हाथ धो कर सकुचाती हुई रामाया गिरि के कमरे में पहुंच गई.

रामाया गिरि बिछावन पर लेटा हुआ था. उस ने रामप्यारी को देख कर अपने सूखे होंठों पर जीभ फिराई, फिर टेबिल पर रखी बाम की शीशी की ओर इशारा करते हुए बोला, ‘‘जरा, मेरे माथे पर बाम लगा दो…’’

मजबूरन रामप्यारी बाम ले कर रामाया गिरि के माथे पर मलने लगी. कोमल हाथों की छुअन से रामाया गिरि का पूरा बदन झनझना गया. उस ने सुख से अपनी आंखें बंद कर लीं.

रामाया गिरि को इस तरह पड़ा देख कर रामप्यारी का डर कुछ कम हो चला था. रामाया गिरि उसी का हमउम्र था, सो रामप्यारी को मजाक सूझाने लगा.

वह हंसती हुई बोली, ‘‘जब तुम्हें औरत के हाथों ही बाम लगवानी थी, तो कंठीमाला के झमेले में क्यों फंस गए? डंका बजा कर अपना ब्याह रचाते. अपनी घरवाली लाते, फिर उस से जी भर कर बाम लगवाते रहते…’’

वह उठ बैठा और हंसते हुए कहने लगा, ‘‘रामप्यारी, तू मुझ से मजाक करने लगी? वैसे, सुना है कि तुम्हारे पति को सिक्किम गए 10 साल से ऊपर हो गए. वह आज तक नहीं लौटा. मुझे नहीं समझ आ रहा कि उस के बिना तुम अपनी जवान बेटी की शादी कैसे करोगी?’’

रामाया गिरि की बातों ने रामप्यारी के जख्म हरे कर दिए. उस की आंखें भर उठीं. वह आंचल से आंसू पोंछने लगी.

रामाया गिरि हमदर्दी जताते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, रोने से कुछ नहीं होगा. मेरे पास एक रास्ता है. अगर तुम मान गई, तो हम दोनों की परेशानी हल हो सकती है.’’

‘‘सो कैसे?’’ रामप्यारी पूछ बैठी.

‘‘अगर तुम चाहो, तो मैं तेरे लिए पक्का मकान बनवा दूंगा. तेरी बेटी की शादी मेरे पैसों से होगी. तुझे इतना पैसा दूंगा कि तू राज करेगी…’’

रामप्यारी उतावली हो कर बोली, ‘‘उस के बदले में मुझे क्या करना होगा?’’

रामाया गिरि उस की बांह को थामते हुए बोला, ‘‘रामप्यारी, सचमुच तुम बहुत भोली हो. अरी, तुम्हारे पास अनमोल जवानी है. वह मुझे दे दो. मैं किसी को खबर नहीं लगने दूंगा.’’

रामाया गिरि का इरादा जान कर रामप्यारी का चेहरा फीका पड़ गया. वह उस से अपना हाथ छुड़ाते हुए बोली, ‘‘मुझ से भारी भूल हो गई. मैं सम?ाती थी कि तुम गरीबी में पले हो, इसलिए गरीबों का दुखदर्द समझाते होगे. लेकिन तुम तो जिस्म के सौदागर निकले…’’

इन बातों का रामाया गिरि पर कोई असर नहीं पड़ा. वासना से उस का बदन ऐंठ रहा था. इस समय उसे उपदेश के बदले देह की जरूरत थी.

रामप्यारी कमरे से बाहर निकलने वाली थी कि रामाया गिरि ने झपट कर उस का आंचल पकड़ लिया.

रामप्यारी धक से रह गई. वह गुस्से से पलटी और रामाया गिरि के गाल पर एक जोरदार तमाचा जड़ दिया.

रात के सन्नाटे में तमाचे की आवाज गूंज उठी. रामाया गिरि हक्काबक्का हो कर अपना गाल सहलाने लगा.

रामप्यारी बिफरती हुई बोली, ‘‘रामाया, ऐसी गलती फिर कभी किसी गरीब औरत के साथ नहीं करना. वैसे मैं पहले से मठमंदिरों के अंदरूनी किस्से जानती हूं. बेचारी कुसुमी तुम्हारे गुरु महाराज की सेवा करते हुए अचानक गायब हो गई. उस का आज तक पता नहीं चल पाया.

‘‘मैं थूकती हूं तुम्हारी महंती और तुम्हारे पैसों पर. मैं गरीब हूं तो क्या हुआ, मुझे इज्जत के साथ सिर उठा कर जीना आता है.’’

इस घटना को कई महीने बीत गए, लेकिन रामाया गिरि रामप्यारी के चांटे को भूल नहीं पाया.

एक रात उस ने अपने खास आदमी खड्ग सिंह के हाथों रामप्यारी की बेटी कमली को उठवा लिया. कमली नीबू की तरह निचुड़ी हुई लस्तपस्त हालत में सुबह घर पहुंची. कमली से सारा हाल जान कर रामप्यारी ने माथा पीट लिया.

समय के साथ रामाया गिरि की मनमानी बढ़ती गई. उस ने अपने विरोधियों को दबाने के लिए कचहरी में दर्जनों मुकदमे दायर कर दिए. मठ के घंटेघडि़याल बजने बंद हो गए. अब मठ पर थानाकचहरी के लोग जुटने लगे.

रामाया गिरि ने अपनी हिफाजत के लिए बंदूक खरीद ली. उस की दबंगई के चलते इलाके के लोगों से उस का रिश्ता टूटता चला गया.

रामाया गिरि कमली वाली घटना भूल सा गया. लेकिन रामप्यारी और कमली के लिए अपनी इज्जत बहुत माने रखती थी.

एक दिन रामप्यारी और कमली धान की कटाई कर रही थीं, तभी रामप्यारी ने सड़क से रामाया गिरि को मोटरसाइकिल से आते देखा.

बदला चुकाने की आग में जल रही दोनों मांबेटी ने एकदूसरे को इशारा किया. फिर दोनों मांबेटी हाथ में हंसिया लिए रामाया गिरि को पकड़ने के लिए दौड़ पड़ीं.

रामाया गिरि सारा माजरा समझ गया. उस ने मोटरसाइकिल को और तेज चला कर निकल जाना चाहा, पर हड़बड़ी में मोटरसाइकिल उलट गई.

रामाया गिरि चारों खाने चित गिरा. रामप्यारी के लिए मौका अच्छा था. वह फुरती से रामाया गिरि के सीने पर चढ़ गई. इधर कमली ने उस के पैरों को मजबूती से जकड़ लिया.

रामप्यारी रामाया गिरि के गले पर हंसिया रखती हुई बोली, ‘‘बोल रामाया, तू ने मेरी बेटी की इज्जत क्यों लूटी?’’

इतने में वहां भारी भीड़ जमा हो गई. रामाया गिरि लोगों की हमदर्दी खो चुका था, सो किसी ने उसे बचाने की कोशिश नहीं की.

रामाया गिरि का चेहरा पीला पड़ चुका था. जान जाने के खौफ से वह हकलाता हुआ बोला, ‘‘रामप्यारी… रामप्यारी, मेरा गला मत रेतना.’’

‘‘नहीं, मैं तुम्हारा गला नहीं रेतूंगी. गला रेत दिया तो तुम झटके से आजाद हो जाओगे. मैं सिर्फ तुम्हारी गंदी आंखों को निकालूंगी. दूसरों की जिंदगी में अंधेरा फैलाने वालों के लिए यही सही सजा है.’’

रामप्यारी बिलकुल चंडी बन चुकी थी. रामाया गिरि के लाख छटपटाने के बाद भी उस ने नहीं छोड़ा. हंसिया के वार से रामाया गिरि की आंखों से खून का फव्वारा उछल पड़ा.

सौतेली मां का इश्क : लालाराम की दूसरी शादी

धरमपुर नामक गांव में लालाराम की पत्नी सुधा ने एक बेटे को जन्म दिया. सुधा को कैंसर था. कुछ दिन बाद वे मर गईं.

लालाराम अपने छोटे से बेटे चंदर को मांबाप दोनों का प्यार दिया करते थे. धीरेधीरे कुछ दिन बीत गए.

लालाराम के बहुत से सगेसंबंधियों के अलावा उन के खास दोस्त रामराज ने कहा, ‘‘लालाराम, तुम्हारे पास सौ एकड़ जमीन है और खुद का ट्यूबवैल है. तुम्हारे यहां इतना अनाज पैदा होता है कि एक साल में 5 लाख रुपए का फायदा होता है और इधर मकान तुम्हारा इतना बड़ा है कि तुम्हारे मकान जैसा पूरे गांव में किसी का मकान नहीं है. तुम बापबेटे इतने बड़े घर में कैसे रहते हो?

‘‘लालाराम, मेरी बात मानो, तो तुम जल्दी से दूसरी शादी कर लो. तुम्हें एक खूबसूरत बीवी मिल जाएगी और तुम्हारे बेटे को मां. तुम दोनों को बनाबनाया खाना मिल जाएगा और तुम्हारे घर की साफसफाई भी हो जाएगी.

‘‘हम लोगों ने एक लड़की देख रखी है. बस, तुम्हें एक बार हां कहनी है.’’

यह सुन कर लालाराम शादी करने को राजी हो गए. शादी हो गई. लड़की की उम्र 18 साल, जबकि लालाराम की उम्र 48 साल थी.

लड़की का नाम सरला था. शादी को तकरीबन 5 साल बीत गए. कुछ दिन बाद लालाराम भी मर गए.

चंदर व उस की मां सरला को काफी झटका लगा.

जब लालाराम की मौत हुई थी, तो चंदर की उम्र 14 साल थी. वह बहुत खूबसूरत था. उस का गोरा रंग व गठीला बदन था. उस की सौतेली मां सरला खाना पकाती, घर की साफसफाई करती और चंदर के कपड़े भी धोती थी.

चंदर धीरेधीरे बड़ा होने लगा.

एक दिन चंदर ने सरला से कहा, ‘‘मां, एक बात बोलूं?’’

सरला बोली, ‘‘बोलो बेटा.’’

चंदर बोला, ‘‘पिताजी इतना पैसा छोड़ कर चले गए. मैं रोज पढ़ाई की वजह से खेतों को सही से देख नहीं पाता. इसलिए सोच रहा हूं कि 2 हजार रुपए महीने पर एक आदमी खेतीबारी का काम संभालने के लिए रख दूं. वह खेतीबारी का काम मजदूरों से करा लेगा और कम से कम साल में 3-4 लाख रुपए का अनाज बेच लिया जाएगा.’’

सरला ने कहा, ‘‘बेटा, तुम ने तो अच्छी तरकीब सोची है. यह काम तुम तुरंत कर लो.’’

चंदर ने इस काम के लिए एक आदमी रख लिया. साल में चंदर 3-4 लाख रुपए का अनाज बेच लिया करता था. जिंदगी अच्छी तरह कट रही थी. मगर सरला दिनरात किसी नौजवान मर्द की तलाश में रहा करती थी, क्योंकि वह अपनी जवानी का मजा पूरी तरह नहीं लूट पाई थी.

एक दिन चंदर बीमार पड़ा. सिर में दर्द था और बहुत जोरों से उस का बदन टूट रहा था.

चंदर खेत से आया था. शाम को 6 बजे आ कर चारपाई पर वह लेट गया. इधर सरला खाना पका कर चंदर को बुलाने गई, तो देखा कि वह दर्द से कराह रहा था.

सरला ने घबरा कर पूछा, ‘‘क्या हुआ चंदर? तुम क्यों कराह रहे हो?’’

चंदर बोला, ‘‘मेरा सारा बदन टूट रहा है.’’

सरला ने पूछा, ‘‘मैं सरसों का कुनकुना तेल ले कर आ रही हूं. तुम्हारी मालिश कर देती हूं. कम से कम तुम्हारा बदन दर्द कम हो जाएगा.’’

चंदर ने कहा, ‘‘ठीक है मां.’’

सरला ने चंदर की मालिश करना शुरू किया. मालिश करतेकरते सरला की नीयत खराब होने लगी, लेकिन तब तक चंदर सो चुका था.

अगले दिन वह सोचने लगी कि कैसे चंदर के करीब जाऊं या चंदर मेरे करीब आए, ताकि मैं दिल की बात कह सकूं.

एक दिन सरला ने सोचा, ‘जैसे मैं ने चंदर की मालिश की थी, उसी तरह चंदर से मैं भी मालिश कराऊं, तो हो सकता है कि बात बन जाए.’

शाम हुई, खाना पका कर सरला चंदर का इंतजार कर रही थी. चंदर की मोटरसाइकिल की आवाज सुनते ही सरला चारपाई पर जा कर लेट गई और कराहने लगी.

चंदर ने घर में जैसे ही कदम रखा, तो देखा कि उस की मां चारपाई पर लेटी कराह रही थी.

चंदर बोला, ‘‘मां, क्या हुआ?’’

सरला बोली, ‘‘कुछ नहीं बेटा. मेरे हाथपैरों में बहुत दर्द है.’’

‘‘मां, जैसे तुम ने मुझे कुनकुने तेल की मालिश की थी, क्या मैं भी कर दूं, ताकि रात में अच्छी तरह नींद आ सके.’’

सरला धीरे से बोली, ‘‘ठीक है, जैसी तुम्हारी मरजी.’’

चंदर ने जब कुनकुने तेल की मालिश करना शुरू किया, तब सरला काफी खुश हुई.

चंदर ने भी सरला के बदन को देखा और छुआ, तो वह भी चढ़ती जवानी के जोश में पागल सा होने लगा.

सरला के सारे बदन की मालिश करने के बाद काफी रात गुजर गई. चंदर को नींद नहीं आ रही थी. उधर सरला की आंखों से नींद गायब थी. दोनों रातभर जागते रहे.

सरला ने कहा, ‘‘चंदर, मुझे डर सा लग रहा है. तुम यहीं आ कर सो जाओ.’’

यह सुन कर चंदर के मन में खुशी की लहर दौड़ गई. उस ने कहा, ‘‘ठीक है मां, तुम्हारी तबीयत ठीक नहीं है. मैं यहीं पर सो जाता हूं.’’

सरला ने धीरेधीरे अपने बदन के कपड़े हटाने शुरू किए.

सरला बोली, ‘‘मुझे बहुत गरमी लग रही है.’’

चंदर सरला की हरकत देख कर पागल हुआ जा रहा था. चंदर सरला के बदन की मालिश दोबारा करने लगा.

सरला ने कोई विरोध नहीं किया.

सरला व चंदर हरकत करतेकरते एकदूसरे में डूब गए. उस रात से ही वे दोनों पतिपत्नी की तरह रहने लगे.

काफी दिनोें के बाद सरला पेट से हो गई. यह देख कर चंदर डर गया, तो सरला भी घबराने लगी कि क्या हो गया. गांव के लोग क्या कहेंगे. वे लोकलाज के बारे में सोचते रहे.

पेट से हुए 5 महीना पूरा हो गया. सरला ने घर के बाहर निकलना बंद कर दिया.

एक दिन लोकलाज के डर से सरला ने जहर खा लिया और उस की मौत हो गई. बाद में चंदर को पता चला कि सरला की मौत का जिम्मेदार वह खुद है. अगर वह समय रहते सरला के पेट में पल रहे बच्चे की सफाई करा देता, तो उस की मौत नहीं होती.

चंदर भी यह सदमा बरदाश्त नहीं कर सका और उस ने भी जहर खा कर मौत को गले लगा लिया.

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