Crime Story: राज की चाहत में- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

आखिरकार मनीषा इस निर्णय पर पहुंच गई कि वह राज की मदद से अरविंद को रास्ते से हटा देगी. उस का सोचना था कि पति की मौत के बाद उस की सरकारी नौकरी उसे अनुकंपा नियुक्ति के रूप में मिल जाएगी और वह राज के संग अपनी जिंदगी खुशी से बिता सकेगी.

बातचीत के बाद पहले अरविंद की हत्या के लिए उन्होंने पूजा के प्रसाद में जहर मिलाने की योजना बनाई, पर विक्की पंडा ने यह कह कर इस योजना को निरस्त कर दिया कि प्रसाद और भी लोग मांग सकते हैं. बाद में अरविंद को शराब पिला कर हत्या करने की योजना बनाई गई.

प्रदीप उर्फ विक्की पंडा अरविंद की हत्या की योजना में इसलिए शामिल हो गया क्योंकि वह चाहता था कि मनीषा और अरविंद से लिए गए 33 हजार रुपए के कर्ज से उसे मुक्ति मिल जाएगी. योजना के मुताबिक मनीषा ने राज को पूरी योजना समझाई और उस का बांदा से जबलपुर आने जाने का रिजर्वेशन करवा दिया. 21 जनवरी, 2021 की सुबह राज जबलपुर आ गया. दोपहर में टैगोर गार्डन में मनीषा राज और विक्की पंडा ने काफी देर बैठ कर अरविंद की हत्या की योजना को अंतिम रूप दिया. तय हुआ कि पहले अरविंद को शराब पिलाई जाए और फिर उस की किसी तरह हत्या कर दी जाए.

योजना बनने के बाद विक्की अपने घर चला गया. जबकि मनीषा और राज आटो रिक्शा ले कर रेलवे स्टेशन आ गए. कुछ दिनों पहले अरविंद ने जबलपुर की एक मोबाइल शौप से किस्तों में राज को एक महंगा मोबाइल फोन दिलवाया था, जिस की किस्त वह हर महीने आ कर दे जाता था.

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रेलवे स्टेशन से ही मनीषा ने अरविंद के औफिस में फोन कर के कहा कि राज मोबाइल की किस्त देने जबलपुर आया है. वह रात की ट्रेन से निकल जाएगा, उस से जबलपुर स्टेशन जा कर मिल लो.

जब अरविंद को राज के जबलपुर आने की खबर मिली, तब वह अधारताल जोनल औफिस में था. उस ने औफिस जा कर जल्दी से डाक वितरण का काम निपटाया और 5 बजे रेलवे स्टेशन पहुंच गया.

रेलवे स्टेशन पर उस की मुलाकात राज से हो गई. राज ने उसे बताया कि वह रात 9 बजे चित्रकूट एक्सप्रैस से वापस चला जाएगा. तब राज ने अरविंद के सामने प्रस्ताव रखा कि कहीं बैठ कर शराब पीते हैं फिर खाना खाने के बाद उसे स्टेशन छोड़ कर घर चले जाना.

शराब पीने की बात पर अरविंद राजी हो गया. दोनों पैदल ही रेलवे स्टेशन से सदर की ओर आ गए. तब तक अंधेरा होने लगा था. एक वाइन शौप से राज ने शराब की बोतल खरीदी. पास की दुकान से पानी की बोतल, डिस्पोजल गिलास, चखना के पाऊच ले कर दोनों पैट्रोल पंप के पीछे मुर्गी मैदान में सुनसान जगह पर शराब पीने बैठ गए. तभी विक्की पंडा भी पहुंच गया.

सीधेसादे अरविंद को यह भान नहीं था कि जिस नौकरी को पाने के लिए उस ने जी तोड़ मेहनत की थी और कितने ही साल बेरोजगारी में काटे थे, वही नौकरी उस की जान की दुश्मन बन जाएगी. राज और विक्की चालाकी से इस तरह पैग बना रहे थे कि अरविंद ज्यादा से ज्यादा पी सके.

शराब पीतेपीते लगभग साढ़े 7 का समय हो गया. इस बीच अरविंद का नशा पूरे शबाब पर पहुंच गया था, तभी राज ने पास में पड़े एक बड़े से पत्थर से अरविंद के सिर पर हमला कर दिया. उस के सिर से खून की धारा बहने लगी और थोड़ी देर तड़फड़ाने के बाद वह ढेर हो गया. जब दोनों को तसल्ली हो गई कि अरविंद मर चुका है तो राज और विक्की वहां से भाग निकले.

राज जल्दी से रेलवे स्टेशन आ गया. प्लेटफार्म पर चित्रकूट एक्सप्रैस लग चुकी थी. वह ट्रेन में सवार हो गया. रात 9 बजे ट्रेन जबलपुर स्टेशन से रवाना हो गई.

29 जनवरी, 2021 को जबलपुर के एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा ने प्रैस कौन्फ्रैंस कर अरविंद की हत्या का खुलासा कर दिया. प्रैस कौन्फ्रैंस में बताया गया कि अरविंद की हत्या मनीषा के इशारे पर विक्की की मदद से राज यादव ने की थी.

एसपी ने अरविंद की हत्या के मुख्य आरोपी राज यादव को जल्द गिरफ्तार करने का आश्वासन दिया. इस के बाद कैंट थाना पुलिस ने मनीषा और विक्की पंडा को न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

मनीषा और विक्की को जेल भेजने के बाद जबलपुर पुलिस राज की तलाश में जुट गई. राज के घर से जब्त उस के मोबाइल की जांच की तो मोबाइल में मनीषा और उस के आपत्तिजनक हालत में फोटो मिले, जो उन के नाजायज संबंधों की कहानी बयां कर रहे थे.

पुलिस टीम राज के पिता से सूरत में रहने वाले उस के बड़े बेटे का मोबाइल नंबर ले कर आई थी. पुलिस ने जब राज के भाई से बात की तो पहले तो उस ने राज के सूरत में न होने की जानकारी दी. जब पुलिस ने डर दिखाया तो उस ने पुलिस को भरोसा दिलाया कि वह जल्द ही राज को ले कर जबलपुर आएगा.

राज और उस का बड़ा भाई 3-4 दिनों तक पुलिस टीम को गुमराह करते रहे. इस पर जबलपुर पुलिस की टीम ने सूरत जा कर छापामारी की तो राज यादव पुलिस की गिरफ्त में आ गया.

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पुलिस ने राज से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने अरविंद की हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता दी.

पुलिस ने अरविंद की हत्या के आरोपी खेमचंद यादव उर्फ राज पर आईपीसी की धारा 302,120 के तहत मामाला दर्ज कर उसे जेल भेज दिया. अरविंद और मनीषा के दोनों बच्चों को जबलपुर के ग्वारीघाट में रहने वाली उस की नानी के सुपुर्द कर दिया गया.

नौकरी की चाहत में अपने पति की हत्या करने वाली मनीषा का नौकरी पाने का सपना धरा का धरा रह गया.

क्षणिक शारीरिक सुख और सोशल मीडिया की चकाचौंध में अपने मासूम बच्चों को बेसहारा करने वाली मनीषा अपने प्रेमी खेमचंद और भाई प्रदीप उर्फ विक्की पंडा के साथ जेल में है.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Crime Story: राज की चाहत में- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

घटनास्थल पर शराब की बोतल और पानी के पाउच के साथ चखना के खाली पैक पड़े थे. डैडबौडी के पास ही एक बड़ा सा पत्थर पड़ा मिला, जिस पर खून के निशान थे. शायद इसी पत्थर से सिर पर वार कर युवक की हत्या की गई थी.

घटनास्थल पर अब तक लोगों की काफी भीड़ जमा थी, लेकिन कोई भी मृतक को नहीं पहचान सका. एसआई कन्हैया चतुर्वेदी ने मृतक के कपड़ों की तलाशी ली तो उन्हें मृतक की पैंट की जेब में नगर निगम की डाकबुक मिली. डाकबुक को उलटपलट कर देखा गया तो परची पर एक मोबाइल नंबर लिखा था.

परची में लिखे मोबाइल नंबर पर टीआई विजय तिवारी ने फोन लगाया तो फोन रिसीव करने वाले ने अपना नाम मलखान और पता ग्वारघाट बताया. टीआई तिवारी ने जब उसे बताया कि मुर्गी मैदान पर एक डैडबौडी मिली है. उसी के कपड़ों की जांच में नगर निगम की डाकबुक और यह मोबाइल नंबर मिला है. तब मलखान ने पुलिस को बताया कि उस का जीजा अरविंद राजपूत नगर निगम में डाक लाने ले जाने का काम करता था.

मलखान ने जब मनीषा को फोन लगा कर बातचीत की तो उस ने बताया कि वह कल अरविंद को बता कर बच्चों के साथ एक गमी के कार्यक्रम में वेहिकल फैक्ट्री इलाके में आई है.

मलखान ने मनीषा से अरविंद के साथ किसी अनहोनी की आशंका व्यक्त की तो वह फोन पर रोने लगी. मलखान ने उसे समझाते हुए उस के साथ तत्काल मुर्गी मैदान चलने को कहा. मलखान कुछ ही देर में मनीषा और एक रिश्तेदार को आटो में बिठा कर सदर के मुर्गी मैदान पहुंच गया. वहां पहुंच कर मनीषा ने पति अरविंद को पहचान लिया.

लाश की पहचान होने पर पुलिस टीम ने शव पोस्टमार्टम के लिए मैडिकल कालेज भेज दिया और आगे की काररवाई में जुट गई. स्थिति के मद्देनजर पुलिस मनीषा के बयान नहीं ले सकी.

घटना को बीते 3 दिन हो चुके थे. इसी दौरान मनीषा ने एक बार घर पर आत्महत्या करने का प्रयास किया, जिस की जानकारी कैंट पुलिस को मिल गई थी. पुलिस सहानुभूति की वजह से उस के बयान नहीं ले पा रही थी.

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एसपी सिद्धार्थ बहुगुणा के निर्देश पर नगर की सीएसपी भावना मरावी ने हत्या का राज जानने के लिए कैंट थाना पुलिस की एक टीम तैयार की.

कैंट पुलिस थाना के टीआई विजय तिवारी ने जब मनीषा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई तो 2 मोबाइल नंबर संदिग्ध पाए गए. इन मोबाइल नंबरों की लोकेशन सर्च करने पर पुलिस को एक नंबर आकाश विनोदिया, सिविल लाइंस, जबलपुर का और दूसरा नंबर खेमचंद यादव, बांदा, उत्तर प्रदेश का था.

कैंट पुलिस ने सब से पहले राज यादव के मोबाइल को सर्विलांस पर लगाया तो घटना वाले दिन 21 जनवरी को उस की लोकेशन सुबह के 6 बजे से रात के 9 बजे तक जबलपुर की मिली. पुलिस की टीम जब खेमचंद की खोजबीन के लिए बांदा पहुंची, तब तक वह अपने गांव बेनीपुर पहुंच चुका था.

पुलिस ने उस की लोकेशन ट्रेस कर उस के घर पर मुंहअंधेरे दबिश तो यह पिछले दरवाजे से भाग निकला. आसपास के इलाकों में दिन भर उस की तलाश की गई, मगर राज नहीं मिला. उस के पिता ने बताया कि वह अपने बड़े भाई के पास सूरत जा सकता है.

पिता को राज और मनीषा के प्रेम संबंधों की पूरी जानकारी थी. पता चला कि मनीषा जून, 2020 में आंखों का इलाज करवाने के बहाने चित्रकूट आई थी और दोनों 5 दिनों तक एक होटल में रुके थे. तब उस ने मनीषा को समझाया था कि अपना वैवाहिक जीवन बरबाद न करे. मगर वह राज के प्यार में पागल हो गई थी.

राज अपना मोबाइल घर पर छोड़ गया था, ऐसे में राज को खोजना पुलिस के लिए टेढ़ी खीर साबित हो रहा था. पुलिस उस का मोबाइल जब्त कर खाली हाथ लौट आई.

कैंट पुलिस पर जब पुलिस अधिकारियों का दबाव पड़ा तो आकाश विनोदिया की मोबाइल लोकेशन पर पहुंच गई. जबलपुर के सिविल लाइंस जा कर पता चला वह नंबर एक रिटायर्ड मैडिकल नर्स का है जो काफी बूढ़ी हो गई थीं.

उन्होंने खुद को इलाके की भजन मंडली का अध्यक्ष बताते हुए मनीषा और अरविंद से किसी तरह की जानपहचान होने से इनकार किया. उन्होंने यह भी बताया कि यह सिमकार्ड उस के भतीजे आकाश ने ला कर दिया था, लेकिन इस सिमकार्ड का उपयोग आकाश कभी नहीं करता.

पुलिस की समझ नहीं आ रहा था कि आखिर अरविंद के मर्डर से नर्स का क्या कनेक्शन हो सकता है. पुलिस ने जब उन से पूछा, ‘‘आप के मोबाइल से कोई और शख्स बात तो नहीं करता?’’

उन्होंने बताया, ‘‘हां उन की भजन मंडली में ढोलक बजाने वाला विक्की पंडा अकसर उन के फोन से बात करता है. कभीकभी तो वह घंटे भर के लिए मोबाइल मांग कर ले जाता है.’’

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पुलिस ने जब विक्की पंडा के बारे में पता किया तो शाम के समय विक्की पंडा देवी मंदिर की आरती के कार्यक्रम में मिल गया.

उस ने मनीषा को अपनी ममेरी बहन बताया. पुलिस को अब दोनों पर अरविंद की हत्या का पूरा यकीन हो गया. पुलिस टीम ने विक्की पंडा और मनीषा को थाने बुला कर पूछताछ की तो पहले तो वे अनजान बने रहे.

जब पुलिस टीम ने उन से अलगअलग कमरे में ले जा कर सख्ती से पूछताछ की तो उन्होंने सारा सच उगल दिया. मनीषा और विक्की के बताए अनुसार अरविंद की हत्या छतरपुर जिले के खेमचंद यादव उर्फ राज ने की थी.

घटना वाले दिन शाम को अरविंद को औफिस में फोन कर के मनीषा ने बुलाया था और विक्की पंडा हत्या के समय राज के साथ था. दोनों से पूछताछ में जो कहानी सामने आई, वह मानवीय रिश्तों को शर्मसार कर देने वाली थी. खेमचंद गुड़गांव की एक कंपनी में नौकरी करता था.

मनीषा की बुआ का लड़का प्रदीप ठाकुर उर्फ विक्की पंडा सिविल लाइंस के उपहार अपार्टमेंट में रहता था. वह अपने आप को देवी का भक्त बताता था. धार्मिक कर्मकांड और तंत्रमंत्र का झांसा दे कर लोगों से पैसे ऐंठ कर वह घर का खर्च चलाता था. वह स्थानीय भजन मंडली में ढोलक बजाता था.

विक्की पंडा अपनी ममेरी बहन मनीषा से 20 हजार रुपए और जीजा अरविंद से 13 हजार रुपए उधार ले चुका था, मगर लौटाने का नाम ही नहीं ले रहा था. जब भी अरविंद और मनीषा उस से पैसे वापस मांगते, वह अपनी तंगहाली का बहाना बना देता था.

मनीषा और खेमचंद के नाजायज संबंधों की भनक विक्की को थी. एक बार तो उस ने मनीषा को चेतावनी भी दी थी कि यदि उस से पैसे मांगे तो वह उस के और राज के संबंधों की पूरी सच्चाई जीजा को बता देगा. इस डर से मनीषा उस से पैसा मांगने में संकोच करने लगी थी.

अब मनीषा राज के साथ विक्की पंडा से मिलनेजुलने लगी थी. मनीषा और राज विक्की से शादी करने की बात बताते रहते थे. एक दिन विक्की पंडा ने मंदिर में पूरे विधिविधान से राज से मनीषा की मांग में सिंदूर भरवा कर शादी करा दी .

मनीषा और राज प्रेम में इस कदर अंधे हो चुके थे कि देह सुख के लिए किसी भी हद तक जाने तैयार थे. कभीकभी उन के मन में विचार आता कि दोनों घर से भाग जाएं, लेकिन मनीषा सोचती कि राज बेरोजगार है. आखिर उसे कितने दिनों तक बैठा कर खिलाएगा.

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मनीषा को अरविंद से ज्यादा अपने बच्चों की भी चिंता थी. वह जानती थी कि यदि वह बच्चों को छोड़ कर राज के साथ भाग गई तो अरविंद बच्चों का खयाल नहीं रख पाएगा और उस के बच्चे अनाथ हो जाएंगे. मनीषा के मन में कई बार अरविंद की हत्या करने का विचार आता, मगर अगले ही पल वह डर जाती.

अगले भाग में पढ़ें-  राज  ने अरविंद की हत्या की पूरी कहानी पुलिस को बता दी

Crime Story: राज की चाहत में- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

अरविंद राजपूत का घर मध्य प्रदेश के जबलपुर शहर के घमापुर इलाके में सरकारी कुआं के पास था. 49 साल का अरविंद राजपूत जबलपुर नगर निगम के आधारताल जोन में बतौर डाक रनर काम करता था.

उस के परिवार में 30 साल की पत्नी मनीषा, 7 साल की बेटी और 5 साल का एक बेटा था. करीब 10 साल पहले जब अरविंद के मातापिता जीवित थे तो घर की माली हालत अच्छी नहीं थी.

घर अरविंद के बड़े भाई की कमाई से चलता था. जब बड़े भाई की शादी हो गई तो वह अपनी पत्नी के साथ अलग रहने लगा. हायर सेकेंडरी तक पढ़े अरविंद की उम्र बढ़ती जा रही थी, पर न ही उसे कहीं कामधंधा मिल रहा था और न ही उस की शादी हो पा रही थी.

आखिरकार 2012 में अरविंद को जबलपुर नगर निगम में दैनिक वेतन पर काम मिल गया.

अरविंद जब  40 साल का था तो सन 2012 में उस की शादी मनीषा ठाकुर से हो गई, जिसे बबली भी कहते थे. उस की उम्र 21 साल थी.

मनीषा की मां का बचपन में ही निधन हो गया था. उस के पिता ने उस की सगी मौसी से शादी कर ली थी, जिसे उस ने सगी बेटी की तरह पाला था.

मैट्रिक तक पढ़ी मनीषा सुडौल काया और सुंदर आंखों की वजह से बहुत सुंदर लगती थी. मनीषा के 2 भाई थे. छोटा ग्वारीघाट में रेस्टोरेंट चलाता था, जबकि बड़े भाई ने दूसरी जाति की लड़की से लव मैरिज कर ली थी. वह परिवार से अलग रहता था.

अरविंद मनीषा का बहुत खयाल रखता. मनीषा चंचल और खुले विचारों वाली लड़की थी उसे सजनासंवरना और घूमनाफिरना पसंद था. लेकिन अपने से दोगुनी उम्र के पुराने खयालात के सादगी पसंद पति अरविंद के साथ वह मन मार कर दिन काट रही थी.

सन 2016 में नगर निगम ने अरविंद की डाक रनर की नौकरी स्थाई कर दी. वक्त के साथ अरविंद के परिवार में एक बेटी और एक बेटा आ गया. जब तक घर में अरविंद के मातापिता जीवित रहे, मनीषा उन की देखरेख में लगी रही.

अरविंद टिफिन ले कर सुबह औफिस निकल जाता तो शाम को ही लौटता. मनीषा का जब भी मन होता अपने बच्चों को ले कर अपने रिश्तेदारों और परिचितों के यहां चली जाती. जब वह लोगों को स्मार्टफोन पर फेसबुक, यूट्यूब चलाते देखती तो उस का मन भी करता कि उस के पास भी स्मार्टफोन होता तो कितना अच्छा होता.

एक दिन उस ने अरविंद से स्मार्टफोन की डिमांड रख दी. अरविंद के पास कोई सेलफोन नहीं था, न ही ऐसी हैसियत थी कि महंगा स्मार्टफोन खरीद सके. इस के बावजूद उस ने पत्नी को खुश रखने के लिए स्मार्टफोन ला कर दे दिया.

अरविंद ने मनीषा को औफिस के अपनेएकदो साथियों के नंबर भी दे दिए .जब भी मनीषा को अरविंद से बात करनी होती वह उस के दोस्तों के फोन पर काल कर के पति से बात कर लेती. मनीषा की अंगुलियां पूरे दिन स्मार्टफोन पर घूमती रहतीं.

उस ने फेसबुक पर अपना एकाउंट बनाया और प्रोफाइल में अपनी खूबसूरत अदाओं वाली तसवीरें अपलोड कर दीं. उसे बहुत सारे लाइक और कमेंट्स मिलने लगे.

उस ने बहुत सारे लोगों की फ्रैंड रिक्वेस्ट भी स्वीकार कर ली थी. अरविंद थकाहारा जब काम से लौटता तो घर पर मनीषा को बच्चों के साथ मोबाइल में बिजी देख कर खुश हो जाता.

अरविंद 49 साल की उम्र पार कर चुका था, जबकि मनीषा अभी 29 साल की जवान औरत थी. बढ़ती उम्र, शराब की लत और नौकरी के बोझ ने अरविंद को जिस्मानी तौर पर  कमजोर बना दिया था. उसे महसूस होने लगा था कि अब वह मनीषा को शारीरिक रूप से संतुष्ट नहीं कर पा रहा है.

औरत की शारीरिक जरूरतें पति पूरी करने में सक्षम न हो तो कई बार औरत के कदम बहक जाते हैं.

ऐसा ही मनीषा के साथ हुआ. मनीषा फेसबुक की दुनिया में इस तरह खो गई थी कि वह बिना जांचपड़ताल के किसी भी लड़के को अपना फ्रैंड बना लेती थी. फेसबुक पर नएनए दोस्त बनाना और सोशल मीडिया पर चैटिंग करना उस का शगल बन गया था.

2019 के मार्च महीने में एक दिन मनीषा दोपहर में घर के कामकाज से निपट कर बिस्तर पर लेटी थी. तभी उस के मोबाइल की घंटी बजी. उस ने जैसे ही हैलो बोला दूसरी तरफ से किसी लड़के की आवाज आई, ‘‘हाय मनीषा, मैं राज बोल रहां हूं.’’

‘‘कौन राज?’’ मनीषा ने आश्चर्य से पूछा.

‘‘मनीषा, मैं राज यादव हूं. फेसबुक पर तुम्हें फ्रैंड रिक्वेस्ट भेजी थी, जिसे तुम ने स्वीकार कर लिया था.’’

‘‘पर तुम्हें मेरा मोबाइल नंबर किस ने दिया?’’ मनीषा ने हैरानी से पूछा .

‘‘हम जिसे दिल से चाहते हैं, उस का मोबाइल नंबर तो क्या उस की पूरी खोजखबर रखते हैं.’’ राज ने दीवानगी के साथ जवाब दिया.

मनीषा को किसी अपरिचित लड़के का इस तरह बात करना अच्छा नहीं लगा. उस ने थोड़ी सी बात कर के फोन काट दिया.

फिर उसे याद आया कि कुछ दिन पहले उस ने राज यादव नाम के लड़के की फ्रैंड रिक्वेस्ट एक्सेप्ट की थी. उसे यह उम्मीद कतई नहीं थी कि कोई फेसबुक फ्रैंड उसे फोन मिला कर इस तरह बातचीत करेगा .

मनीषा की फेसबुक की यह दोस्ती धीरेधीरे मनोरंजन का साधन बन गई. पति अरविंद दिन भर औफिस में रहता और मनीषा का समय सोशल मीडिया पर बीतता. उस ने उस दिन भले ही फोन डिसकनेक्ट कर के राज से तौबा कर ली थी, लेकिन वह हाथ धो कर उस के पीछे पड़ गया था.

वह रोज ही किसी न किसी बहाने उसे फोन करने लगा. वह मनीषा के फेसबुक मैसेंजर पर कभी प्यारभरी शेरोशायरी भेजता तो कभी उस की पोस्ट पर कमेंट कर के प्यार जताता. धीरेधीरे मनीषा को भी राज से फोन पर बातचीत करने में मजा आने लगा.

फोन पर शुरू हुआ बातचीत का यह सिलसिला कब प्यार में बदल गया, मनीषा को पता ही नहीं चला. अब वह रोज राज के फोन का इंतजार करती. कभी राज फोन करना भूल जाता तो मनीषा उसे काल कर के उस से प्यार भरी बातें करती. कभीकभी दोनों वीडियो काल के जरिए भी एकदूजे का दीदार करके मस्तीभरी बातें कर लेते थे.

राज और मनीषा का प्यार परवान चढ़ा तो एक दिन वह मनीषा से मिलने जबलपुर आ गया. उस समय अरविंद काम पर गया हुआ था और उस के दोनों बच्चे अरविंद के बड़े भाई के घर गए हुए थे.

मनीषा ने 25 साल के गोरेचिट्टे गबरू जवान राज को देखा तो पलभर के लिए तो वह सपनों की दुनिया में खो गई. राज ने बताया कि उस का नाम खेमचंद यादव है, लेकिन उसे घर वाले राज कहते हैं.

राज ने मनीषा से फेसबुक मैसेंजर और वीडियो काल के जरिए तो कई बार बातें की थी, लेकिन खूबसूरत मनीषा को पहली बार नजरों के सामने देखा तो अपना आपा खो बैठा.

मनीषा कब से उस से मिलने के सपने संजोए थी, उसे मौका मिला तो उस ने भी राज का पूरे मन से साथ दिया.

शाम को जब अरविंद काम से घर लौटा तो घर में नए मेहमान को देख मनीषा से पूछा, ‘‘अरे मनीषा, मेहमान कहां से आए हैं?’’

मनीषा ने खेमचंद का परिचय कराते हुए कहा, ‘‘ये मेरी बचपन की सहेली के जीजा हैं. नाम है राज यादव. यूपी के बांदा से किसी काम के सिलसिले में जबलपुर आए हैं.’’ अरविंद ने गर्मजोशी से राज का स्वागत किया और उस की खूब मेहमाननवाजी भी की. दूसरे दिन अरविंद उसे भेड़ाघाट घुमाने ले गया और वहां का धुआंधार जलप्रपात दिखाया. शाम को बैठ कर दोनों ने जाम छलकाए.

राज यादव महीने दो महीने में काम का बहाना बना कर मनीषा से मिलने जबलपुर आने लगा. जब वह जबलपुर आता तो अरविंद के साथ  बैठ कर खूब शराब पीता और मनीषा के बच्चों पर पैसे खर्च करता.

लेकिन मनीषा और राज की प्रेम कहानी समाज की नजरों से ज्यादा दिनों तक न छिप सकी. जब अरविंद के बड़े भाई को इस बात का पता चला तो उस ने राज के इस तरह मनीषा से मिलनेजुलने पर आपत्ति उठाई.

अरविंद के मन में भी शक का कीड़ा कुलबुलाता था, लेकिन वह यह सोच कर तसल्ली कर लेता कि मनीषा उसे और उस के बच्चों को कितना प्यार करती है.

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22 जनवरी, 2021 सुबह के 9 बजे थे. कैंट पुलिस थाने में फोन द्वारा सूचना मिली कि सदर इलाके के मुर्गी मैदान पर कोई युवक नशे में बेसुध पड़ा है. कैंट थाने में इस तरह की सूचनाएं आए दिन मिलती रहती थीं, इसलिए ड्यूटी पर मौजूद एसआई कन्हैया चतुर्वेदी अपने एक साथी पुलिसकर्मी के साथ मुर्गी मैदान की ओर रवाना हो गए.

वह मुर्गी मैदान पहुंचे तो उन्होंने देखा कि 24-25 साल का एक युवक औंधे मुंह जमीन पर पड़ा है. पुलिस टीम ने पास जा कर जैसे ही उसे सीधा किया तो युवक का चेहरा और सिर खून से सना हुआ है. वह मर चुका था.

स्थिति को समझ कर कन्हैया चतुर्वेदी ने तत्काल टीआई विजय तिवारी समेत पुलिस के आला अधिकारियों को सूचना दी और आसपास के लोगों से पूछताछ करने लगे. कुछ ही देर में फोरैंसिक टीम के साथ टीआई विजय तिवारी घटनास्थल पहुंच गए.

अगले भाग में पढ़ें- टीआई विजय तिवारी ने  मनीषा के फोन की काल डिटेल्स निकलवाई

Serial Story: निकम्मा बाप- भाग 1

लेखक- हेमंत कुमार

जसदेव जब भी अपने गांव के बाकी दोस्तों को दूसरे शहर में जा कर नौकरी कर के ज्यादा पैसे कमाते हुए देखता तो उस के मन में भी ऐसा करने की इच्छा होती.

एक दिन जसदेव और शांता ने फैसला कर ही लिया कि वे दोनों शहर जा कर खूब मेहनत करेंगे और वापस अपने गांव आ कर अपने लिए एक पक्का घर बनवाएंगे.

शांता और जसदेव अभी कुछ ही महीने पहले शादी के बंधन में बंधे थे. जसदेव लंबीचौड़ी कदकाठी वाला, गोरे रंग का मेहनती लड़का था. खानदानी जायदाद तो थी नहीं, पर जसदेव की पैसा कमाने के लिए मेहनत और लगन देख कर शांता के घर वालों ने उस का हाथ जसदेव को दे दिया था.

शांता भी थोड़े दबे रंग की भरे जिस्म वाली आकर्षक लड़की थी.

अपने गांव से कुछ दूर छोटे से शहर में पहुंच कर सब से पहले तो जसदेव के दोस्तों ने उसे किराए पर एक कमरा दिलवा दिया और अपने ही मालिक ठेकेदार लखपत चौधरी से बात कर मजदूरी पर भी रखवा लिया. अब जसदेव और शांता अपनी नई जिंदगी की शुरुआत कर चुके थे.

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थोड़े ही दिनों में शांता ने अपनी पहली बेटी को जन्म दिया. दोनों ने बड़े प्यार से उस का नाम रवीना रखा.

मेहनतमजदूरी कर के अपना भविष्य बनाने की चाह में छोटे गांवकसबों से आए हुए जसदेव जैसे मजदूरों को लूटने वालों की कोई कमी नहीं थी.

ठेकेदार लखपत चौधरी का एक बिगड़ैल बेटा भी था महेश. पिता की गैरहाजिरी में बेकार बैठा महेश साइट पर आ कर मजदूरों के सिर पर बैठ जाता था.

सारे मजदूर महेश से दब कर रहते थे और ‘महेश बाबू’ के नाम से बुलाया करते थे, शायद इसलिए क्योंकि महेश एक निकम्मा इनसान था, जिस की नजर हमेशा दूसरे मजदूरों के पैसे और औरतों पर रहती थी.

जसदेव की अपने काम के प्रति मेहनत और लगन को देख कर महेश ने अब उसे अपना अगला शिकार बनाने की ठानी. महेश ने उसे अपने साथ बैठा कर शराब और जुए की ऐसी लत लगवाई कि पूछो ही मत. जसदेव भी अब शहर की चमकधमक में रंग चुका था.

महेश ने धोखे से 1-2 बार जसदेव को जुए में जितवा दिया, ताकि लालच  में आ कर वह और ज्यादा पैसे दांव पर लगाए.

महेश अब जसदेव को साइट पर मजदूरी नहीं करने देता था, बल्कि अपने साथ कार में घुमाने लगा था.

शराब और जुए के अलावा अब एक और चीज थी, जिस की लत महेश जसदेव को लगवाना चाहता था ‘धंधे वालियों के साथ जिस्मफरोशी की लत’, जिस के लिए वह फिर शुरुआत में अपने रुपए खर्च करने को तैयार था.

महेश जसदेव को अपने साथ एक ऐसी जगह पर ले कर गया, जहां कई सारी धंधे वालियां जसदेव को अपनेअपने कमरों में खींचने को तैयार थीं, पर जसदेव के अंदर का आदर्श पति अभी बाकी था और शायद इसी वजह से उस ने इस तोहफे को ठुकरा दिया.

महेश को चिंता थी कि कहीं नया शिकार उस के हाथ से निकल न जाए, यही सोच कर उस ने भी जसदेव पर ज्यादा दबाव नहीं डाला.

उस रात घर जा कर जसदेव अपने साथ सोई शांता को दबोचने की कोशिश करने लगा कि तभी शांता ने उसे खुद से अलग करते हुए कहा, ‘‘आप भूल गए हैं क्या? मैं ने बताया था न कि मैं फिर पेट से हूं और डाक्टर ने अभी ऐसा कुछ भी करने को मना ही किया है.’’

जसदेव गुस्से में कंबल ताने सो गया.

अगले दिन जसदेव फिर महेश बाबू के पास पहुंचा और कल वाली जगह पर चलने को कहा.

महेश मन ही मन खुश था. एक बार धंधे वाली का स्वाद चखने के बाद जसदेव को अब इस की लत लग चुकी थी. इस बीच महेश बिचौलिया बन कर मुनाफा कमा रहा था.

जसदेव की तकरीबन ज्यादातर कमाई अपनी इस काम वासना में खर्च हो जाती थी और बाकी रहीसही जुए और शराब में.

जसदेव के दोस्तों को महेश बाबू की आदतों के बारे में अच्छी तरह से मालूम था. उन्होंने जसदेव को कई बार सचेत भी किया, पर महेश बाबू की मीठीमीठी बातों ने जसदेव का विश्वास बहुत अच्छी तरह से जीत रखा था.

पैसों की कमी में जसदेव और शांता के बीच रोजाना झगड़े होने लगे थे. शांता को अब अपना घर चलाना था, अपने बच्चों का पालनपोषण भी करना था.

10वीं जमात में पढ़ने वाली रवीना के स्कूल की फीस भी कई महीनों से नहीं भरी गई थी, जिस के लिए उसे अब जसदेव पर निर्भर रहने के बजाय खुद के पैरों पर खड़ा होना ही पड़ा.

शांता ने अपनी चांदी की पायल बेच कर एक छोटी सी सिलाई मशीन खरीद ली और अपने कमरे में ही एक छोटा सा सिलाई सैंटर खोल दिया. आसपड़ोस की औरतें अकसर उस से कुछ न कुछ सिलवा लिया करती थीं, जिस के चलते शांता और उस के परिवार की दालरोटी फिर से चल पड़ी.

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जसदेव की आंखों में शांता का काम करना खटकने लगा. वह शांता के बटुए से पैसे निकाल कर ऐयाशी करने लगा और कभी शांता के पैसे न देने पर उसे पीटपीट कर अधमरा भी कर दिया करता था.

शांता इतना कुछ सिर्फ अपनी बेटी रवीना की पढ़ाई पूरी करवाने के लिए सह रही थी, क्योंकि शांता नहीं चाहती थी कि उस की बेटी को भी कोई ऐसा पति मिल जाए जैसा उसे मिला है.

बेटी रवीना के स्कूल की फीस पिछले 10 महीनों से जमा नहीं की गई थी, जिस के चलते उस का नाम स्कूल से काट दिया गया.

स्कूल छूटने के गम और जसदेव और शांता के बीच रोजरोज के झगड़े से उकताई रवीना ने सोच लिया कि अब वह अपनी मां को अपने बापू के साथ रहने नहीं देगी.

अभी जसदेव घर पर नहीं आया था. रवीना ने अपनी मां शांता से अपने बापू को तलाक देने की बात कही, पर गांव की पलीबढ़ी शांता को छोटी बच्ची रवीना के मुंह से ऐसी बातें अच्छी  नहीं लगीं.

शांता ने रवीना को समझाया, ‘‘तू अभी पाप की इन बातों पर ध्यान मत दे. वह सब मैं देख लूंगी. भला मुझे कौन सा इस शहर में जिंदगीभर रहना है. एक बार तू पढ़लिख कर नौकरी ले ले, फिर तो तू ही पालेगी न अपनी बूढ़ी मां को…’’

‘‘मैं अब कैसे पढ़ूंगी मां? स्कूल वालों ने तो मेरा नाम भी काट दिया है. भला काटे भी क्यों न, उन्हें भी तो फीस चाहिए,’’ रवीना की इस बात ने शांता का दिल झकझोर दिया.

रात के 11 बजे के आसपास अभी शांता की आंख लगी ही थी कि किसी ने कमरे के दरवाजे को पकड़ कर जोरजोर से हिलाना शुरू कर, ‘‘शांता, खोल दरवाजा. जल्दी खोल शांता… आज नहीं छोड़ेंगे मुझे ये लोग शांता…’’

दरवाजे पर जसदेव था. शांता घबरा गई कि भला इस वक्त क्या हो गया और कौन मार देगा.

शांता ने दरवाजे की सांकल हटाई और जसदेव ने फौरन घर में घुस कर अंदर से दरवाजे पर सांकल चढ़ा दी और घर की कई सारी भारीभरकम चीजें दरवाजे के सामने रखने लगा.

जसदेव के चेहरे की हवाइयां उड़ी हुई थीं. वह ऊपर से नीचे तक पसीने में तरबतर था. जबान लड़खड़ा रही थी, मुंह सूख गया था.

‘‘क्या हुआ? क्या कर दिया? किस की जेब काटी? किस के गले में झपट्टा मारा?’’ शांता ने एक के बाद एक कई सवाल दागने शुरू कर दिए.

जसदेव पर शांता के सवालों का कोई असर ही नहीं हो रहा था, वह तो सिर्फ अपनी गरदन किसी कबूतर की तरह इधर से उधर घुमाए जा रहा था, मानो चारदीवारी में से बाहर निकलने के लिए कोई सुरंग ढूंढ़ रहा हो.

‘‘क्या हुआ? बताओ तो सही? और कौन मार देगा?’’ शांता ने चिंता भरी आवाज में पूछा.

जसदेव ने शांता के मुंह पर अपना हाथ रख कर उसे चुप रहने को कहा.

Serial Story: लव ऐट ट्रैफिक सिगनल- भाग 3

वह चाय और स्नैक्स ले कर आई तो तीनों साथ बैठे थे. मां ने मेरा पूरा नाम और परिवार के बारे में पूछा तो मैं ने कहा कि मेरा नाम अमित रजक है और मेरे मातापिता नहीं हैं. उन्होंने अपना नाम मनोरमा पांडे बताया और कहा कि शोभना के पिता तो बचपन में ही गुजर गए थे. उन्होंने अकेले ही बेटी का पालनपोषण किया है. फिर अचानक पूछ बैठीं, ‘‘तुम्हारे पूर्वज क्या धोबी का काम करते थे?’’

उन का यह प्रश्न तो मुझे बेतुका लगा ही था, मैं ने शोभना की ओर देखा तो वह भी नाराज दिखी थी. खैर, मैं ने कहा, ‘‘आंटी, जहां तक मुझे याद है मेरे दादा तक ने तो ऐसा काम नहीं किया है. दादाजी और पिताजी दोनों ही सरकारी दफ्तर में चपरासी थे और मेरे लिए इस में शर्म की कोई बात नहीं है. और आंटी…’’

शोभना ने मेरी बात बीच में काटते हुए मां से कहा, ‘‘हम ब्राह्मण हैं तो हमारे भी दादापरदादा जजमानों के यहां सत्यानारायण पूजा बांचते होंगे न, मां?  और मैं तो ब्राह्मण हो कर भी मांसाहारी हूं?’’

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मैं मां को नमस्कार कर वहां से चल पड़ा. शोभना नीचे तक छोड़ने आई थी. उस ने मुझ से मां के व्यवहार के लिए माफी मांगी. मैं अपने फ्लैट में वापस आ गया था. दूसरे दिन शोभना ने फोन कर शाम को हुसैन सागर लेक पर मिलने को कहा. हुसैन सागर हैदराबाद की आनबानशान है. वहां शाम को अच्छी रौनक और चहलपहल रहती है. एक तरफ एक लाइन से खेलकूद, बोटिंग का इंतजाम है तो दूसरी ओर खानेपीने के स्टौल्स. और इस बड़ी लेक के बीच में गौतम बुद्घ की विशाल मूर्ति खड़ी है.

शोभना इस बार भी पहले पहुंच गई थी. हम दोनों भीड़ से थोड़ा अलग लेक के किनारे जा बैठे थे. शोभना ने कहा कि उसे मां से ऐसे व्यवहार की आशा नहीं थी.

मैं ने जब पूछा कि मां को जातपात की बात क्यों सूझी, तो उस ने कहा, ‘‘अमित, सच कहूं तो मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं. मैं ने मां को बता दिया है कि मैं तुम से शादी करना चाहती हूं. पर दुख की बात यह है कि सिर्फ जातपात के अंधविश्वास के चलते उन्हें यह स्वीकार नहीं है. मैं तो तुम्हारा पूरा नाम तुम्हारे गले में लटके आईडी पर बारबार पढ़ चुकी हूं.’’

इतना कह उस ने मेरा हाथ पकड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘मैं दोराहे पर खड़ी हूं, तुम्हें चुनूं या मां को. मां ने साफ कहा है कि किसी एक को चुनो. बचपन में ही पिताजी की मौत के बाद मां ने अकेले दम पर मुझे पालपोस कर बड़ा किया, पढ़ायालिखाया. अब बुढ़ापे में उन्हें अकेले भी नहीं छोड़ सकती. तुम ही कुछ सुझाव दो.’’

मैं ने कहा, ‘‘शोभना, प्यार तो मैं भी तुम से करता हूं, यह अलग बात है कि मैं पहल नहीं कर सका. तुम्हें मां का साथ देना चाहिए. हर प्यार की मंजिल शादी पर आ कर खत्म हो, यह जरूरी नहीं. जिंदगी में प्यार से भी जरूरी कई काम हैं. तुम निसंकोच मां के साथ रहो. तुम भरोसा करो मुझ पर, मुझे इस बात का कोई दुख न होगा.’’

‘‘जितना प्यार और सुकून थोड़ी देर के लिए ही सही, दुबई में मुझे तुम से मिला है उस की बराबरी आजीवन कोई न कर सकेगा.’’

इतना कह वह मेरे सीने से लग कर रोने लगी और बोली, ‘‘बस, आखिरी बार सीने से लगा रही हूं अपने पहले प्यार को.’’ मैं ने उसे समझाया और अलग करते हुए कहा, ‘‘बस, इतना समझ लेना हमारा प्यार उसी रैड सिगनल पर रुका रहा. उसे ग्रीन सिगनल नहीं मिला.’’ और दोनों जुदा हो गए.

Crime Story: माया के लिए किया गुनाह

Serial Story: लव ऐट ट्रैफिक सिगनल- भाग 1

आज फिर वही लड़की साइबर टावर के ट्रैफिक सिगनल पर मुझे मिली. हैदराबाद में माधापुर के पास फ्लाईओवर से दाहिने मुड़ने के ठीक पहले यह सिगनल पड़ता है. एक तरफ मशहूर शिल्पा रामम कलाभवन है. इधर लगातार 3 दिनों से सुबह साढ़े 9 बजे मेरी खटारा कार सिगनल पर रुकती, ठीक उसी समय उस की चमचमाती हुई नई कार बगल में रुकती है. मेरी कार में तो एसी नहीं है, इसलिए खिड़की खुली रखता हूं. पर उस की कार में एसी है. फिर भी रेड सिगनल पर मेरे रुकते ही बगल में उस की कार रुकती है, और वह शीशा गिरा देती है. वह अपना रंगीन चश्मा आंखों से ऊपर उठा कर अपने बालों के बीच सिर पर ले जाती है, फिर मुसकरा कर मेरी तरफ देखती है. उस के डीवीडी प्लेयर से एब्बा का फेमस गीत ‘आई हैव अ ड्रीम…’ की सुरीली आवाज सुननेको मिलती है.

सिगनल ग्रीन होते ही वह शीशा चढ़ा कर भीड़ में किधर गुम हो जाती है, मैं ने भी जानने की कोशिश नहीं की. पता नहीं इस लड़की की घड़ी, मेरी घड़ी और मेरी खटारा और उस की नई कार सभी में इतना तालमेल कैसे है कि ठीक एक ही समय पर हम दोनों यहां होते हैं.

खैर, मुझे उस लड़की की इतनी परवा नहीं है जितनी समय पर अपने दफ्तर पहुंचने की. आजकल हैदराबाद में भी ट्रैफिक जाम होने लगा है. गनीमत यही है कि इस सिगनल से दाहिने मुड़ने के बाद दफ्तर के रास्ते में कोई खास बाधा नहीं है. मैं 10 बजे के पहले अपनी आईटी कंपनी में होता हूं. अपने क्लाइंट्स से मीटिंग्स और कौल्स ज्यादातर उसी समय होते हैं.

मेरी कंपनी का अधिकतर बिजनैस दुबई, शारजाह, कुवैत, आबूधाबी, ओमान आदि मध्यपूर्व देशों से है. कंपनी नई है. स्टार्टअप शुरू किया था 2 साल पहले. सिर्फ 2 दोस्तों ने इस स्टार्टअप की शुरुआत अपनी कार के गैराज से की थी जो अब देखतेदेखते काफी अच्छी स्थिति में है. 50 से ज्यादा सौफ्टवेयर इंजीनियर हैं इस कंपनी में. बीचबीच में मुझे दुबई का टूर भी मिल जाता है.

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वैसे तो आमतौर पर शाम 6 बजे तक मैं वापस अपने फ्लैट में होता हूं. इधर 2-4 दिनों से काम ज्यादा होने से लौटने में देर हो रही थी, पर सुबह जाने का टाइम वही है. आज वह लड़की मुझे सिगनल पर नहीं मिली है.

न जाने क्यों मेरा मन पूछ रहा है कि आज वह क्यों नहीं मिली. मैं ने एकदो बार बाएंदाएं देखा, फिर कार के रियर व्यू मिरर में भी देख कर तसल्ली कर ली थी कि मेरे  पीछे भी नहीं है. खैर, सिगनल ग्रीन हुआ तो फिर मैं आगे बढ़ गया. जब तक काम में व्यस्त था, मुझे उस लड़की के बारे में कुछ सोचने की फुरसत न थी, पर लंचब्रैक में उस की याद आ ही गई.

शाम को लौटते समय मैं केएफसी रैस्टोरैंट में रुका था अपना और्डर पिक करने, और्डर मैं ने औफिस से निकलने के पहले ही फोन पर दे दिया था. वहां वह लड़की मुझे फिर मिल गई. वह भी अपना और्डर पिक करने आई थी. वह अपना पैकेट ले कर जैसे ही मुड़ी, मैं उस के पीछे ही खड़ा था. वह मुसकरा कर ‘हाय’ बोली और कहा, ‘‘आप भी यहां. एक खूबसूरत संयोग. आज सिगनल पर नहीं मिली क्योंकि मुझे आज औफिस जल्दी पहुंचना था. मुंबई से डायरैक्टर आए हैं, तो थोड़ी तैयारी करनी थी.’’

वह मेरे पैकेट मिलने तक बगल में ही खड़ी रही थी. मेरी समझ में नहीं आया कि यह सब मुझे क्यों बता रही है क्योंकि मैं तो उसे ढंग से जानता भी नहीं हूं, यहां तक कि उस का नाम तक नहीं मालूम.

‘‘मैं शोभना हूं’’, बोल कर उस ने अपना नाम तो बता दिया. दरअसल, हम दोनों कार पार्किंग तक साथसाथ चल रहे थे. मैं ने  अपना नाम अमित बताया. फिर दोनों अपनीअपनी कार में गुडनाइट कह कर बैठ गए. परंतु वह चलतेचलते ‘सी यू सून’ बोल गई है. जहां एक ओर मुझे खुशी भी हो रही है तो दूसरी ओर सोच रहा था कि यह मुझे से क्यों मिलना चाहती है.

अगले 3-4 दिनों तक फिर शोभना उस सिगनल पर नहीं मिली. एक दिन शाम को मैं शिल्पा रामम में लगी एक प्रदर्शनी में गया तो मेरी नजर शोभना पर पड़ी. गेहुंआ रंग, अच्छे नैननक्श वाली शोभना स्ट्रेचेबल स्किनफिट जींस और टौप में थी. इस बार मैं ही उस के पास गया और बोला, ‘‘हाय शोभना, तुम यहां?’’

उस ने भी मुड़ कर मुझे देखा और उसी परिचित मुसकान के साथ ‘हाय’ कहा. फिर उस ने 4 फोल्ंिडग कुरसियां खरीदीं. मैं ने उस से 2 कुरसियां ले कर कार तक पहुंचा दी थी. कार के पास ही खड़खड़े बातें करने लगे थे हम दोनों. शोभना ने कहा, ‘‘मैं कोंडापुर के शिल्पा पार्क एरिया में रघु रेजीडैंसी में नई आई हूं. 2 रूम का फ्लैट एक और लड़की के साथ शेयर करती हूं और आप अमित?’’

‘‘अरे, मैं भी आप के सामने वाले शिल्पा प्राइड में एक रूम के फ्लैट में रहता हूं. वैसे तुम मुझे तुम बोलोगी तो ज्यादा अपनापन लगेगा. तुम में मैं ज्यादा कंफर्टेबल रहूंगा.’’

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शोभना हंसते हुए बोली, ‘‘मुझे पता है. मैं ने अपनी खिड़की से कभीकभी तुम को देखा है. बल्कि मेरे साथ वाली लड़की तो आईने से सूर्य की किरणों को तुम्हारे चेहरे पर चमकाती थी.’’

मैं ने कहा ‘‘मैं कैसे मान लूं कि इस शरारत में तुम शामिल नहीं थीं?’’

‘‘तुम्हारी मरजी, मानो न मानो.’’

दोनों हंस पड़े और ‘बाय’ कह कर विदा हुए.

अगले दिन उसी सिगनल पर फिर हम दोनों मिले, पर सिगनल ग्रीन होने के पहले तय हुआ कि शाम को कौफी शौप में मिलते हैं. शाम को कौफी शौप में मैं ने शोभना से कहा कि एक ब्रेकिंग न्यूज है. शोभना के पूछने पर मैं ने कहा, ‘‘कल सुबह की फ्लाइट से मैं दुबई जा रहा हूं. कंपनी ने दुबई में एक इंटरनैशनल सैमिनार रखा है. उस में कई देशों के प्रतिनिधि आ रहे हैं. उन के सामने प्रैजेंटेशन देना है.’’

‘‘ग्रेट न्यूज, कितने दिनों का प्रोग्राम है?’’ शोभना ने पूछा.

मैं ने उसे बता दिया कि प्रोग्राम तो 2 दिनों का है, पर अगले दिन शाम की फ्लाइट से हैदराबाद लौटना है. तब तक कौफी खत्म कर मैं चलने लगा तो उस ने उठ कर हाथ मिलाया और ‘बाय’ कह कर चली गई.

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Crime Story: माया के लिए किया गुनाह- भाग 3

सौजन्य-  सत्यकथा

इस के लिए उस ने शालिनी के प्रति एक खतरनाक साजिश रच डाली. इस साजिश में उस ने अपने पुराने कर्मचारी सिक्योरिटी गार्ड और ट्रक ड्राइवर मोहम्मद नईम उर्फ पप्पू को भी शामिल कर लिया.

उस ने शालिनी की 30 लाख की जीवन बीमा पौलिसी तो पहले से ही करवा रखी थी. इस के बाद उस ने अपने कारोबार के लिए नवंबर में शालिनी के नाम पर 33 लाख का एक डंपर खरीद लिया. उस डंपर का भी उस ने बीमा करा लिया था.

बीमा की पौलिसी के अनुसार अगर डंपर मालिक की किसी दुर्घटना में मौत हो जाती तो डंपर का पूरा पैसा माफ हो जाता. इस तरह योजना को अंजाम देने पर अनुज को 63 लाख रुपए का फायदा होता.

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साजिश को दिया अंजाम

इस साजिश को सफल बनाने के लिए अनुज ने पहले शालिनी और उस के ससुराल के लोगों के प्रति अपना व्यवहार ठीक किया. फिर घटना के 15 दिन पहले से अनुज शालिनी को साथ ले कर मौर्निंग वाक के लिए कुमारियां गांव के सर्विस रोड पर जाने लगा.

अपनी तरफ धीरेधीरे बढ़ती हुई मौत से अनभिज्ञ शालिनी अपने पति अनुज का साथ देने लगी. इस साजिश में शामिल मोहम्मद नईम को अनुज ने ढाई लाख रुपए देने का वादा किया था. मोहम्मद नईम की अपनी मजबूरी थी. उसे अपनी बेटी की शादी करनी थी. इसलिए वह राजी हो गया था.

साजिश के तहत घटना के दिन मोहम्मद नईम ने घटना से 5 घंटे पहले बालू भरी अपनी ट्रक ला कर घटनास्थल से कुछ दूरी पर खड़ी कर दी.

अपने तय समय के अनुसार सुबह साढ़े 4 बजे जब अनुज अपनी पत्नी शालिनी के साथ उस सर्विस रोड पर आया तो मोहम्मद नईम सावधान हो गया. अनुज और शालिनी आपस में बातें करते हुए जब रघुवीर सैलियम मार्केट के पास आए, उसी समय अनुज ने सुनसान माहौल देख कर शालिनी का कस कर गला दबा दिया.

शालिनी उस का विरोध भी न कर पाई और बेहोश हो गई. उस ने शालिनी को गिरने नहीं दिया, वह उसे पकड़े रहा. शालिनी के बेहोश होते ही अनुज का इशारा पा कर मोहम्मद नईम तेजी से अपनी ट्रक उन के पास से ले कर गुजरा तो अनुज ने शालिनी को ट्रक की तरफ धक्का दिया.

इस के पहले कि शालिनी के चिथड़े उड़ जाते, मोहम्मद नईम का मन बदल गया. वह अपने ट्रक को कट मार कर निकाल ले गया. लेकिन फिर भी ट्रक की टक्कर से शालिनी लहूलुहान हो गई.

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अनुज कुछ दूर जा कर खड़ा हो गया. कुछ देर बाद रोड पर जब हलचल बढ़ी तो वह हरकत में आ गया. उस दिन वह जानबूझ कर अपना फोन घर छोड़ आया था. किसी का फोन मांग कर उस ने फोन कर के एंबुलैंस बुलाई और शालिनी को अस्पताल ले गया. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. इलाज के दौरान उस की मौत हो गई.

पूछताछ में पुलिस को गुमराह करने के लिए अनुज ने शालिनी की मौत की एक मनगढ़ंत कहानी सुना दी थी.

अनुज कुमार यादव उर्फ मोनू से पूछताछ के बाद पुलिस ने शालिनी की हत्या में शामिल ससुर सोहन सिंह यादव, ननद पूजा उर्फ नीरू यादव, गोपाल और गंगाराम यादव को गिरफ्तार कर लिया.

उन की निशानदेही पर फरार ट्रक ड्राइवर मोहम्मद नईम को भी क्राइम ब्रांच के अधिकारियों ने छापा मार कर सूरत के फाल आरटीओ के पास से गिरफ्त में ले लिया और आगे की जांच के लिए सूरत के पुणा थानाप्रभारी को सौंप दिया.

कथा लिखे जाने तक शालिनी के मायके वाले उस की 2 वर्षीय बेटी को अपने संरक्षण में लेने के लिए कानूनी सलाह ले रहे थे. वह अनुज के रिश्तेदारों के पास रह रही थी.

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Crime Story: माया के लिए किया गुनाह- भाग 1

सौजन्य-  सत्यकथा

8जनवरी, 2021 की बात है. सुबह के करीब 5 बजे थे. गुजरात के सूरत जिले के पुणा पुलिस थाने को एक अहम सूचना मिली. सूचना देने वाले व्यक्ति ने इंसपेक्टर वी.यू. गड़रिया को फोन पर बताया कि कुमारियां गांव के सर्विस रोड स्थित रघुवीर सिलियम मार्केट के सामने बुरी तरह जख्मी एक महिला पड़ी है. उस के सिर पर गहरी चोट है. मामला सड़क दुर्घटना का लगता है. आप शीघ्र काररवाई करें.

इस जानकारी को इंसपेक्टर वी.यू. गड़रिया ने गंभीरता से लिया. अपने सहायकों को साथ ले कर वह तत्काल घटनास्थल की ओर रवाना हो गए.

घटनास्थल पुणा पुलिस थाने से लगभग एक किलोमीटर दूर था. पुलिस वहां मुश्किल से 10 मिनट में पहुंच गई. इस बीच घटना की जानकारी पूरे इलाके में फैल चुकी थी और वहां अच्छाखासा मजमा लग गया था.

पुलिस टीम जब वहां पहुंची तो खून ही खून फैला हुआ था. खून के अलावा वहां कुछ नहीं था. पुलिस टीम ने जब वहां मौजूद लोगों से पूछताछ की तो मालूम हुआ कि उन के आने के पहले एक एंबुलैंस आई और उसे उठा कर इलाज के लिए पास ही के स्मीमेर अस्पताल ले गई.

इंसपेक्टर वी.यू. गड़रिया को मामला गंभीर लगा. उन्होंने यह जानकारी अपने उच्चाधिकारियों को दे दी. इस के बाद उन्होंने घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण किया.

निरीक्षण करने के बाद वह सीधे स्मीमेर अस्पताल पहुंचे. वहां पता चला कि उस महिला की उपचार के दौरान ही मौत हो गई थी. महिला को उस की ससुराल के लोग अस्पताल लाए थे. वह भी अस्पताल में ही मौजूद थे. थानाप्रभारी ने उन से पूछताछ की तो मालूम हुआ कि मृतक महिला का नाम शालिनी था. उस की मौत अस्पताल लाने के 20 मिनट बाद हुई थी.

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शालिनी के पति अनुज कुमार यादव उर्फ मोनू ने बताया कि वह अपनी पत्नी शालिनी के साथ सुबह 5 बजे अकसर उस रोड पर मौर्निंग वाक के लिए जाता था. एक घंटे की वाक के बाद वे अपने घर आ जाते थे.

घटना के समय टहलते हुए जब वह अपनी पत्नी से कुछ दूर आगे चल रहा था, तभी अचानक रेत से भरा एक ट्रक तेजी से आया और शालिनी को रौंदता हुआ वड़ोदरा की तरफ निकल गया. घबराहट में जब तक वह कुछ समझ पाता, तब तक ट्रक उस की आंखों से ओझल हो गया था.

सुनसान सड़क होने के कारण उसे जल्दी कोई मदद भी नहीं मिली. वह अपना फोन घर भूल आया था. जिस की वजह से मजबूरन उसे शालिनी को घायलावस्था में वहीं छोड़ कर एंबुलैंस लाने के लिए जाना पड़ा.

अस्पताल के डाक्टरों के बयानों के बाद पुलिस ने शालिनी के शव का बारीकी से मुआयना किया और उसे पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भिजवा दिया.

थानाप्रभारी थाने लौट आए. शुरुआती जांचपड़ताल में जहां एक तरफ मामला हिट ऐंड रन का बन रहा था, वहीं दूसरी तरफ शालिनी की हत्या की साजिश से भी इनकार नहीं किया जा सकता था. बहरहाल, शालिनी के पति अनुज यादव की शिकायत पर पुलिस ने ड्राइवर और ट्रक के खिलाफ मामला दर्ज कर लिया.

दूसरी ओर जब इस हादसे की खबर शालिनी के मायके वालों को मिली तो उन के पैरों तले से जमीन सरक गई. उन की बेटी शालिनी किसी हादसे का शिकार हो गई, यह बात उन के गले नहीं उतर रही थी. उन के पूरे परिवार में बेटी को ले कर कोहराम मच गया. उस की मां, बहनों और भाइयों का रोरो कर बुरा हाल था. शालिनी के पिता धनीराम यादव ने फोन पर इंसपेक्टर वी.यू. गड़रिया से बात की और दूसरे दिन शाम होतेहोते वह आगरा जिले में स्थित अपने गांव से सूरत आ गए.

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साजिश का संदेह

शालिनी के पिता धनीराम यादव ने शालिनी की मौत को एक सोचीसमझी साजिश बता कर उस की ससुराल वालों को संदेह के राडार पर खड़ा कर दिया. मायके वाले शालिनी के शव पर अपना दावा करते हुए उस का दाह संस्कार अपने गांव ले जा कर करना चाहते थे. साथ ही वे शालिनी की 2 वर्षीय बेटी को भी अपने संरक्षण में लेना चाहते थे. लेकिन इस के लिए शालिनी के ससुराल वाले तैयार नहीं थे. ससुराल वाले उस का शव हासिल करने की कोशिश में लगे थे.

जिस प्रकार शालिनी के पिता धनीराम यादव ने उस के पति और ससुराल वालों को शालिनी की मौत का जिम्मेदार ठहरा कर उन पर आरोप लगाया था, उस से मामला उलझ गया था. दोनों तरफ बातों में कितनी सच्चाई है, पुलिस अधिकारी इस का अध्ययन कर अपनी जांच की रूपरेखा तैयार कर ही रहे थे कि सूरत की सीबीसीआईडी के हाथों में चला गया.

पोस्टमार्टम के बाद शालिनी का शव उस के पिता धनीराम यादव को सौंप दिया गया. जो उसे अपने गांव ले गए. अपनी बेटी का दाह संस्कार करने के बाद धनीराम यादव ने सूरत के नए पुलिस कमिश्नर अजय कुमार तोमर से मुलाकात कर बेटी की मौत के मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की.

पुलिस कमिश्नर अजय कुमार तोमर इस मामले पर पहले से ही नजर बनाए हुए थे. उन्होंने शालिनी के केस को गंभीरता से लेते हुए उन्हें इंसाफ दिलाने का भरोसा दिया.

इस के पहले कि पुलिस अधिकारी केस की जांच को ले कर कोई काररवाई करते, शालिनी की मौत को ले कर पूरे शहर में सनसनी फैल गई.

हुआ यह कि शालिनी की मौत को ले कर कई दैनिक अखबारों ने दिलचस्पी लेते हुए उसे हाईलाइट कर दिया. जिस से लोगों में पुलिस के प्रति गुस्सा भर गया. पुलिस अधिकारियों ने किसी तरह लोगों को समझाया.

सीबीसीआईडी के प्रमुख आर.आर. सरवैया मामले की जांच करने में जुट गए. सरवैया काफी सुलझे हुए तेजतर्रार अधिकारी थे. उन की अपनी अलग पहचान थी.

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मामले की जिम्मेदारी लेते ही उन्होंने अपने स्टाफ के इंसपेक्टर प्रदीप सिंह बाला को साथ ले कर केस की जांच शुरू कर दी. उन्होंने अपने स्तर पर अस्पताल और घटनास्थल का दोबारा निरीक्षण किया. उन्होंने वहां लगे सीसीटीवी कैमरों के फुटेज देखने के साथसाथ वहां के निवासियों के बयान लिए.

उन के बयानों का क्राइम ब्रांच अधिकारियों ने जब बारीकी से अध्ययन किया तो उन्हें दाल में कुछ काला नजर आया. जब उन्होंने मामले की जांच की तो पूरी दाल ही काली निकली. सुबहसुबह जिस रोड पर वह वाक करने जाते थे, उस समय वह रोड एकदम सुनसान रहती थी.

अगले भाग में पढ़ें- अनुज ने की परफेक्ट प्लानिंग

Crime Story: माया के लिए किया गुनाह- भाग 2

सौजन्य-  सत्यकथा

फिर इतनी सुबह उन के वहां मौर्निंग वाक पर जाने का क्या मतलब था. इस का मतलब शालिनी के पति अनुज कुमार यादव का बयान संदिग्ध था. जो आरोप शालिनी के पिता ने उस पर लगाया था, वह अपराध की श्रेणी में आता था. इस के साथ पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी रहस्यमय थी.

क्राइम ब्रांच अधिकारियों ने जब इस की तह में जाना शुरू किया तो शालिनी के ससुराल वाले कुछ इस प्रकार उलझे कि उन के हौसले पस्त हो गए और शालिनी हत्याकांड का सच बाहर आ गया. साजिश कितनी गहरी थी, यह जान कर जांच अधिकारी भी सन्न रह गए. पैसों की भूख ने शालिनी के ससुराल वालों को अपराध की दलदल में धकेल दिया था.

25 वर्षीय अनुज कुमार यादव उर्फ मोनू मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला इटावा के रहने वाले सोहन सिंह यादव का एकलौता बेटा था. सोहन सिंह यादव कई साल पहले काम की तलाश में गुजरात के शहर सूरत आए थे और सूरत की एक सिक्योरिटी कंपनी में नौकरी करने लगे. जब वह सारे नियमकायदे जान गए तो उन्होंने खुद की सेवा सिक्योरिटी एजेंसी खोल ली.

थोड़े ही दिनों में उन की सिक्योरिटी एजेंसी अच्छी चल निकली और उन के पास 100-150 गार्ड हो गए. सूरत शहर में उन की कई शाखाएं खुल गईं. अच्छा पैसा आया तो उन्होंने अपने रहने के लिए कुमारियां

गांव स्थित सारथी रेजीडेंसी में अच्छा सा फ्लैट ले लिया.

सूरत में उन की और सिक्योरिटी एजेंसी की प्रतिष्ठा थी. वह सूरत के सम्मानित नागरिक बन गए थे. परिवार में उन की पत्नी और बेटे के अलावा एक बेटी पूजा उर्फ नीरू थी, जिस की शादी बुलंदशहर के सरपंच के बेटे रघुवेश यादव से हो गई थी. शादी के बाद भी पूजा अपनी ससुराल में कम और मायके में ज्यादा रहती थी.

अनुज उर्फ मोनू महत्त्वाकांक्षी था, वह पैसों का लोभी था. पढ़ाई खत्म करने के बाद उस का मन पिता की सिक्योरिटी एजेंसी में नहीं लगा. उस ने अपनी ट्रांसपोर्ट कंपनी खोल ली. उसे यह लुभावना सपना उस के नौकर मोहम्मद नईम उर्फ पप्पू ने दिखाया था, जो 5 साल पहले उस केपिता की सिक्योरिटी एजेंसी में गार्ड की सर्विस करता था. सिक्योरिटी की नौकरी छोड़ कर वह ट्रांसपोर्ट की लाइन में चला गया था.

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लालच की हद

अनुज उर्फ मोनू का ट्रांसपोर्ट का कारोबार जब ठीकठाक चलने लगा तो पिता सोहन सिंह यादव ने दिसंबर, 2017 में उत्तर प्रदेश के आगरा जिले के गांव जाफरापुर निवासी धनीराम यादव की बेटी शालिनी के साथ उस की शादी कर दी. धनीराम यादव गांव के जानेमाने काश्तकार थे. उन्होंने बेटी की शादी में अपनी हैसियत के अनुसार दानदहेज दिया.

शालिनी जिन सपनों को ले कर ससुराल आई थी, उस के उन सपनों की हकीकत जल्दी ही सामने आ गई. शादी के 4 महीने बाद ही ससुराल वाले उस के मायके वालों से 5 लाख रुपयों की मांग करने लगे. कुछ दिनों बाद वह शालिनी को प्रताडि़त भी करने लगे थे.

यह बात शालिनी के मायके वालों को पता लगी तो उन्हें बहुत दुख हुआ. उन्होंने अनुज को बुला कर 2 लाख रुपए दे दिए और बाकी 3 लाख रुपए आलू की फसल बेच कर देने का वादा कर लिया.

इतना करने के बाद भी शालिनी के प्रति जब ससुराल वालों का व्यवहार नहीं बदला तो वह जा कर शालिनी को मायके ले आए. लेकिन एक महीने बाद ही उस की ससुराल वाले उसे वापस अपने घर ले गए.

इस बीच शालिनी मां बनी और एक बच्ची को जन्म दिया. अनुज के परिवार वालों को बेटी पैदा होने की जरा भी खुशी नहीं हुई. शालिनी को बेटी होने की भी प्रताड़ना भी सहनी पड़ती थी. यहां तक कि शालिनी को अपने पास फोन तक रखने की इजाजत नहीं थी.

अनुज तो दहेज को ले कर शालिनी को तरहतरह से प्रताडि़त करता था. उस की बहन पूजा उर्फ नीरू, पिता सोहन सिंह यादव और उस के 2 चचेरे भाई गोपाल और गंगाराम यादव भी इस में पीछे नहीं रहते थे.

पैसों का भूखा अनुज अपने परिवार के साथ शालिनी पर अत्याचार तो करता ही था, उन की योजना बीमा कंपनियों को भी चूना लगाने की थी. ट्रांसपोर्ट के कारोबार में होने के कारण बीमे का फंडा उसे अच्छी तरह मालूम था. इसीलिए उस ने अपने पूरे परिवार के लिए नकली दस्तावेज दे कर जीवन बीमा पौलिसी करा ली थीं. पिता, बहन और पत्नी की पौलिसियों का वह स्वयं नौमिनी था और अपनी पौलिसी का नौमिनी उस ने अपने पिता को बनाया था.

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परफेक्ट प्लानिंग

जीवन बीमा की 3-4 किस्तें के बाद अनुज अपने पिता और बहन का फरजी डेथ सर्टिफिकेट लेने के लिए अपनी बहन के सरपंच ससुर के पास बुलंदशहर गया. मगर वहां पूजा के पति रघुवेश की वजह से वह अपनी योजना में सफल नहीं हुआ. इस पर भाईबहन ने मिल कर रघुवेश यादव को दहेज के आरोप में गिरफ्तार करवा दिया.

समय अपनी गति से चल रहा था. धीरेधीरे  शालिनी की शादी को 2 साल से अधिक समय हो गया. बेटी एक साल की हो गई थी. फिर भी शालिनी के प्रति उस की ससुराल वालों का व्यवहार नहीं बदला. इस से नाराज शालिनी के घर वालों ने सन 2019 में शालिनी के ससुराल वालों पर धावा बोल दिया और उन की अच्छी तरह पिटाई कर दी.

इस के बाद शालिनी का व्यवहार भी बदल गया. उस ने अपनी ससुराल वालों से डरना छोड़ दिया. ससुराल वालों का जबजब सुर बदलता, तबतब शालिनी उन्हें अपने मायके वालों की धमकी दे देती थी. इस का प्रतिकूल असर उस के पति अनुज पर पड़ता था, जिसे अनुज अपना अपमान समझता था.

इस अपमान की आग अनुज के दिल में ऐसी लगी कि उस ने शालिनी का अस्तित्व ही मिटा डालने का फैसला कर लिया. उस ने शालिनी और उस के मायके वालों से एक खौफनाक अंदाज में अपने अपमान का बदला लेने की ठान ली.

अगले भाग में पढ़ें- साजिश को दिया अंजाम

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