Mother’s Day Special- बहू-बेटी: भाग 3

रात को गैस के तंदूर पर रश्मि ने बढि़या स्वादिष्ठ मुर्गा और नान बनाए. इस बार बहू अपने मायके से तंदूर ले कर आई थी, पर वह वैसा का वैसा ही बंद पड़ा था. उस पर खाना बनाने का अवकाश किसे था. सास को आदत न थी और बहू को समय न था. तंदूर का खाना इतना अच्छा लगा कि विजय ने रश्मि से कहा, ‘‘कल हम भी एक तंदूर खरीद लेंगे.’’

दयावती के मुंह से निकल गया, ‘‘क्यों पैसे खराब करोगे? यही ले जाना. यहां किस काम आ रहा है.’’

कमलनाथ ने कहा, ‘‘ठीक तो है, बेटा. तुम यही ले जाओ. हमें जरूरत पड़ेगी तो और ले लेंगे.’’

बहू चुप. उस के दिल पर तो जैसे किसी ने हथौड़ा मार दिया हो. उस ने अपने पति की ओर देखा. बेटे ने मुंह फेर लिया. एक ही इलाज था. कल ही बहन के लिए एक नया तंदूर खरीद कर ले आए. लेकिन इस के लिए पैसे और समय दोनों की आवश्यकता थी.

बेटी को अपना माहौल याद आया. एक बार तंदूर ले गई तो उस के ससुर व पति दोनों जीवन भर उसे तंदूर पर ही बैठा देंगे. दोनों को खाने का बहुत शौक था. इस के अलावा उसे याद था कि जब मां का दिया हुआ शाल सास ने उस की ननद को बिना पूछे पकड़ा दिया था तो उसे कितना मानसिक कष्ट हुआ था. आंखों में आंसू आ गए थे. भाभी की हालत भी वही होगी.

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बात बिगड़ने से पहले ही उस ने कहा, ‘‘नहीं मां, यह तंदूर भाभी का है, मैं नहीं ले जाऊंगी. मेरे पड़ोस में एक मेजर रहते हैं. उन्होंने मुझे सस्ते दामों

पर फौजी कैंटीन से तंदूर लाने के

लिए कहा है. 2-2 तंदूर ले कर मैं

क्या करूंगी?’’

बेटी ने तंदूर के लिए मांग नहीं की थी, परंतु उस ने ससुराल लौटते ही मेजर साहब से तंदूर के लिए कहने का इरादा कर लिया था.

अगले दिन बेटी और दामाद चले गए. घर सूनासूना लगने लगा. चहलपहल मानो समाप्त हो गई थी. इस सूनेपन को तोड़ने वाली केवल एक आवाज थी और वह थी बच्ची के रोने की आवाज. वातावरण सामान्य होने में कुछ समय लगा. मां के मुंह से हर समय बेटी का नाम निकलता था. वह क्याक्या करती थी…क्या कर रही होगी…बच्चा ठीक से हो जाए…तुरंत बुला लूंगी. 3 महीने से पहले वापस नहीं भेजूंगी. बहू सोच रही थी, उसे तो पीछे पड़ कर 1 महीने बाद ही बुला लिया था.

दयावती की बहन की लड़की किसी रिश्तेदार के यहां विवाह में आई थी, समय निकाल कर वह मौसी से मिलने भी आ गई.

‘‘क्या हो रहा है, मौसी?’’

‘‘अरे, तू कब आई?’’ दयावती ने चकित हो कर कहा, ‘‘कुछ खबर भी नहीं?’’

‘‘लो, जब खुद ही चली आई तो खबर क्या भेजनी? आई तो कल ही हूं. शादी है एक. कल वापस भी जाना है, पर अपनी प्यारी मौसी से मिले बिना कैसे जा सकती हूं? भाभी कहां हैं? सुना है, छुटकी बड़ी प्यारी है. बस, उसे देखने भर आई हूं.’’

‘‘अरे, बैठ तो सही. सब देखसुन लेना. देख कढ़ी बना रही हूं. खा कर जाना.’’

‘‘ओहो…बस, मौसी, तुम और तुम्हारी कढ़ी. हमेशा चूल्हाचौका. अब भाभी भी तो है, कुछ तो आराम से बैठा करो.’’

दयावती ने गहरी सांस ले कर कहा, ‘‘क्या आराम करना. काम तो जिंदगी की अंतिम सांस तक करना ही करना है.’’

‘‘हाय, दीदी, तुम्हारा कितना काम करती थी. सच, तुम्हें रश्मि दीदी की बहुत याद आती होगी, मौसी?’’

‘‘अब फर्क तो होता ही है बहू और बेटी में,’’ दयावती ने फिर गहरी सांस ली.

जया सुन रही थी. उस के दिल पर चोट लगी. क्यों फर्क होता है बहू और बेटी में? एक को तीर तो दूसरे को तमगा. जब सास की बहन की लड़की चली गई तो जया सोचने लगी कि इस स्थिति में बदलाव आना जरूरी है. सास और बहू के बीच औपचारिकता क्यों? वह सास से साफसाफ कह सकती है कि बारबार बेटी की रट न लगाएं. पर ऐसा कहने से सास को अच्छा न लगेगा. अब उसे ही बेटी की भूमिका अदा करनी पड़ेगी. न सास रहेगी, न बहू. हर घर में बस, मांबेटी ही होनी चाहिए.

वह मुसकराई. उसे एक तरकीब सूझी. परिणाम बुरा भी हो सकता था, परंतु उस ने खतरा उठाने का निर्णय ले ही लिया. अगले सप्ताह होली का त्योहार था. अगर कुछ बुरा भी लगा तो होली के माहौल में ढक जाएगा. उस ने छुटकी को उठा कर चूम लिया.

प्रात: जब वह कमरे से निकली तो जींस पहने हुए थी और ऊपर से चैक का कुरता डाल रखा था. हाथ में गुलाल था.

‘‘होली मुबारक हो, मांजी,’’ कहते हुए जया ने ननद की नकल करते हुए सास के गालों पर चुंबन जड़ दिए और मुंह पर गुलाल मल दिया. दयावती की तो जैसे बोलती ही बंद हो गई. इस से पहले कि सास संभलती, जया ने खिलखिला कर ‘होली है…होली है’ कहते हुए सास को पकड़ कर नाचना शुरू कर दिया. होहल्ला सुन कर कमलनाथ भी बाहर आ गए और यह दृश्य देख कर हंसे बिना न रह सके.

‘‘यह क्या हो रहा है, बहू?’’ कमलनाथ ने हंसते हुए कहा.

‘‘होली है, पिताजी, और सुनिए, आज से मैं बहू नहीं हूं, बेटी हूं…सौ फीसदी बेटी,’’ यह कहते हुए उस ने ससुर के मुंह पर भी गुलाल पोत दिया.

इस से पहले कि कुछ और हंगामा खड़ा होता, पासपड़ोस के लोग मिलने आने लगे. स्त्रियां तो घर में ही घुस आईं. इसी बीच छुटकी रोने लगी. जया ने दौड़ कर छुटकी को उठा लिया और उस के कपड़े बदल कर सास की गोदी में बैठा दिया.

‘‘मांजी, आप मिलने वालों से निबटिए, मैं चायनाश्ता लगा रही हूं.’’

‘‘पर, बहू…’’

‘‘बहू नहीं, बेटी, मांजी. अब मैं बेटी हूं. देखिए मैं कितनी फुरती से काम निबटाती हूं.’’

लोग आ रहे थे और जा रहे थे. जया फुरती से नाश्ता लगालगा कर दे रही थी. रसोई का काम भी संभाल रही थी. गरमागरम पकौडि़यां बना रही थी, जूठे बरतन इकट्ठा नहीं होने दे रही थी. साथ ही साथ धो कर रखती जाती थी. सास को 2 बार रसोई से बाहर किया. उस का काम केवल छुटकी को रखना और मिलने वालों से बात करना था. सास को मजबूरन 2 बार छुटकी के कपड़े बदलने पड़े. सब से बड़ी बात तो यह थी कि दादी की गोद में छुटकी आज चुप थी, रोने का नाम नहीं. लगता था कि वह भी षडयंत्र में शामिल थी.

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जब मेहमानों से छुट्टी मिली तो दयावती ने महसूस किया कि छुटकी कुछ बदल गई है. रोई क्यों नहीं आज? बल्कि शैतान हंस ही रही थी.

कमलनाथ ने आवाज दी, ‘‘बहू, जरा एक दहीबड़ा और दे जाना, बहुत अच्छे बने हैं.’’

रसोई से आवाज आई, ‘‘यहां कोई बहूवहू नहीं है, पिताजी.’’

‘‘बड़ी भूल हो गई बेटी,’’ कमलनाथ ने हंसते हुए कहा, ‘‘अब तो मिलेगा न?’’

‘‘और हां बेटी,’’ सास ने शरमाते हुए कहा, ‘‘अपनी मां का भी ध्यान रखना.’’

सास के गले में बांहें डालते हुए जया ने कहा, ‘‘क्योें नहीं, मां, आप लोगों को पा कर मैं कितनी धन्य हूं.’’

रमेश ने जो यह नाटक देख रहा था, गंभीरता से कहा, ‘‘इन हालात में मेरी क्या स्थिति है?’’ और सब हंस पड़े.

Serial Story: जड़ों से जुड़ा जीवन- भाग 5

लेखक-  वीना टहिल्यानी

‘‘कौन? फरीदा बेग? अरे, वह 4-5 साल पहले तक यहीं थी. उस की नजर कमजोर हो गई थी. मोतियाबिंद का आपरेशन भी हुआ पर अधिक उम्र होने के कारण वह काम नहीं कर पाती थी, लेकिन रहती यहीं थी. फिर एक दिन उस का बेटा सेना से स्वैच्छिक अवकाश ले कर आ गया और वह अपने साथ फरीदा को भी ले गया,’’ मुखर्जी ने पूरी जानकारी एकसाथ दे दी.

अम्मां चली गई हैं, यह जानते ही मिली का चेहरा सफेद पड़ गया. उस के निरीह चेहरे को देख कर जौन ने एक और प्रयत्न किया, ‘‘आप के पास उन का कोई पता तो होगा ही मिस्टर मुखर्जी?’’

‘‘हां…हां, क्यों नहीं. आप उन से मिलने जाएंगे? खूब खुश होंगी वह अपनी पुरानी बच्ची से मिल कर.’’ मुखर्जी बाबू आनंदित हो उठे. मिली की जाती जान जैसे वापस लौट आई.

पुराने खातों की खोज हुई. कोलकाता के उपनगर दमदम से भी आगे, नागेर बाजार के किसी पुराने इलाके का पता लिखा था.

अगले दिन, संचालक ने उन के जाने के लिए टूरिस्ट कार की व्यवस्था कर दी.

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अम्मां के लिए फलफूल लिए गए. चौडे़ पाड़ वाली बंगाली धोती खरीदी गई. मिली बहुत खुश थी. आखिर दूरियां नापतेनापते जब वे दिए गए पते पर पहुंचे तो पता चला कि वहां तो कोई और परिवार रहता है. पड़ोसियों से पूछताछ की लेकिन पक्के तौर पर कोई कुछ कह न सका. शायद वे अपने गांव उड़ीसा चले गए थे, जहां उन की जमीन थी. पर वहां का पता किसी को मालूम न था.

मिली की तो जैसे सुननेसमझने की शक्ति ही जाती रही. फिर रुलाई का ऐसा आवेग उमड़ा कि उस की हिचकियां बंध गईं. जौन ने उसे संभाल लिया. बांहों में उसे बांध कर उस का सिर सहलाया. स्नेह से समझाया पर मिली तो जैसे कुछ सुननेसमझने के लिए तैयार ही न थी.

उस का कातर कं्रदन जारी रहा तो जौन घबरा उठा. कंधे झकझोर कर उस ने मिली को जोर से डांटा, ‘‘मिली, बहुत हुआ…अंब बंद करो यह नादानी.’’

‘‘यहां आना तो बेकार ही हो गया न जौन,’’ मिली रोंआसे स्वर से बोली.

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‘‘यह तो बेवकूफों वाली बात हुई,’’ जौन फिर नाराज हुआ, ‘‘अरे, अपने भाई के साथ तुम वापस अपने देश आई हो. मैं तो पहली बार ही इंडिया देख रहा हूं और इसे तुम बेकार कहती हो. असल में मिली, तुम्हारी अपेक्षाएं ही गलत हैं. तुम ने सोचा, तुम जो जैसा जहां छोड़ गई हो वह वैसा का वैसा वहीं पाओगी. बीच के समय का तुम्हें जरा भी विचार नहीं…तुम्हें तुम्हारा पुराना भवन न दिखा तो तुम निराश हो गईं. फरीदा अम्मां न मिलीं तो तुम हताश हो उठीं. तनिक यह भी सोचो कि बिल्ंिडग कितनी सुविधामयी है. फरीदा अम्मां अपने परिवार के साथ सुख से हैं. यह    दुख की बात है कि तुम उन से नहीं मिल पाईं पर इस बात को दिल से तो न लगाओ. जिन को चाहती हो, प्यार करती हो उन को अपना आदर्श बनाओ. जुझारू, बहादुर और सेवामयी बनो, फरीदा अम्मां जैसे.’’

भाई की बातों को ध्यान से सुनती मिली एकाएक ही बोल पड़ी, ‘‘जौन, मैं तो अभी कितनी छोटी हूं…मैं भला क्या कर सकती हूं.’’

‘‘तुम क्याक्या कर सकती हो, समय आने पर सब समझ जाओगी. फिलहाल तो तुम इस संस्था को कुछ दान दो जिस ने तुम्हें पाला, पोसा, बड़ा किया, प्यार दिया. मौम तुम्हें कितना सारा पैसा दे कर गई हैं…आओ, मैं तुम्हें चेक भरना बताऊं.’’

दोनों भाईबहनों ने ‘भारती बाल आश्रम’ के नाम एक चेक बनाया जिसे चुपचाप गलियारे में रखे दानपात्र में डाल दिया.

‘‘कोलकाता घूम कर शांतिनिकेतन चलेंगे फिर नालंदा और बोधगया देखेंगे. उस के बाद आगरा का ताज देख कर दिल्ली पहुंचेंगे और दिल्ली दर्शन के बाद वापस लंदन लौट चलेंगे. इस ट्रिप में तो बस, इतना ही घूमा जा सकता है.’’

आंख खुली तो मिली ने देखा एक सितारा अभी भी अपनी पूरी निष्ठा से दमक रहा था. मिली इस सितारे को पहचानती है यह भोर का तारा है.

फरीदा अम्मां कहती थीं, भोर का यह तारा भूलेभटकों को राह दिखाता है, दिशाहारों की उम्मीद जगाता है. बड़ा ही हठीला है पूरब दिशा का यह सितारा. किरणें उसे लाख समझाएं पर जबतक सूरज खुद नहीं आ जाता यह जिद्दी तारा जाने का नाम ही नहीं लेता. इसी हठी सितारे के आकर्षण में बंधी मिली बिस्तर से उठ खड़ी हुई.

पिछवाड़े की बालकनी खोल मिली ने बाहर कदम रखा ही था कि सहसा ठिठक गई. सामने जटाजूटधारी बरगद खड़ा था. वही वैभवशाली वटवृक्ष. पहले से कहीं ऊंचा, उन्नत, विराट और विशाल.

मिली ने हाथ आगे बढ़ा कर हौले से पेड़ के पत्तों को सहलाया, धीरे से उस की डालों को छुआ, मानो पूछ रही हो कि  पहचाना मुझे? मैं मिली हूं जो कभी तुम्हारी छांव में खेलती थी, तुम्हारी जटाओं पर झूलती थी. और इस तरह एक बार फिर मिली बचपन में भटकने लगी थी.

अचानक मसजिद से अजान की आवाज उभरी तो किसी मंदिर के घंटे घनघना उठे. और यह सब सुनते ही मिली को अभिमान हो आया कि कैसी विशाल, विराट, भव्य और उदार है उस की मातृभूमि.

मौम सच कहती थीं, हर जीवन अपनी जड़ों से जुड़ा होता है. मनुष्य अपनी माटी से अनायास ही आकर्षित होता है. अपनी जमीन और अपनी मिट्टी ही देती है व्यक्ति को असीम ऊर्जा और अलौकिक आनंद.

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दिन चढ़ने लगा था. कोलकाता शहर के विहंगम विस्तार पर सूरज दमक रहा था. सड़कों पर गलियों में धूप पसर रही थी. सूरज की किरणों के साथ ही जैसे संपूर्ण शहर जाग उठा था.

मिली को अचानक ही लंदन की याद हो आई. शांत, सौम्य लंदन. लंदन उस का अपना नगर, अपना शहर, जहां बर्फ भी गिरती है तो चुपचाप बेआवाज. सर्द मौसम में, पेड़ों की फुनगियों पर, घरों की छतों पर, सड़कों और गलियों में. यहां से वहां तक बस चांदी ही चांदी, बर्फ की चांदी. मिली के मन में जैसे बर्फ की चांदी बिखर गई. मिली अकुला उठी. उसे अपना घर याद हो आया. भोर का सितारा तो न जाने कब, कहां निकल गया था. अब तो उसे भी जाना था, वापस अपने घर.

Crime Story: रोहतक का खूनी अखाड़ा- भाग 1

सौजन्य-  मनोहर कहानियां

एक पुरानी कहावत है कि हर जुर्म की पृष्ठभूमि में जर, जोरू और जमीन मूल कारण होता है. हरियाणा के रोहतक स्थित जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में उस रात जो कुछ हुआ, उस की जड़ में कोई एक नहीं, बल्कि ये तीनों ही कारण छिपे थे.

12 फरवरी, 2021 की रात के करीब 9 बजे जाट कालेज का पूरा प्रांगण सैकड़ों लोगों की भीड़ से खचाखच भरा था. चारों तरफ चीखपुकार मची थी. महिलाओं की मर्मांतक चीखों से पूरा माहौल गमगीन था. कालेज के बाहर पुलिस और प्रशासन की गाडि़यों का हुजूम जमा था. सायरन बजाती पुलिस की गाडि़यों और एंबुलैंस से पूरा इलाका किसी बड़े हादसे की ओर इशारा कर रहा था.

करीब 2 घंटे पहले मेहर सिंह अखाड़े में जो खूनी खेला गया था, उस के बाद वहां सिर्फ तबाही और मौत के निशान बचे थे.

जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में जो हादसा हुआ था, उस की शुरुआत शाम करीब साढ़े 6 बजे हुई थी.

मनोज कुमार मलिक, जो जाट कालेज रोहतक में डीपीई थे, अपनी पत्नी साक्षी मलिक व अपने 3 साल के बेटे सरताज के साथ अखाड़े में मौजूद थे. साक्षी मलिक एथलीट कोटे से रेलवे में कार्यरत थी. मनोज जाट कालेज के मेहर सिंह अखाड़े में हर शाम कुश्ती के खिलाडि़यों को प्रशिक्षण देने आते थे.

उस शाम मनोज करीब 6 बजे खिलाडि़यों को अभ्यास कराने के लिए अपनी पत्नी साक्षी व बेटे सरताज को साथ ले कर जाट कालेज के अखाड़े आए थे. साक्षी मैदान में जा कर अपने गेम की प्रैक्टिस कर रही थीं, बेटा सरताज भी उन के साथ था.

अखाड़े वाले मैदान में ऊंची आवाज में स्टीरियो पर वार्मअप म्यूजिक बज रहा था. मनोज मलिक जिस वक्त अखाडे़ में पहुंचे वहां कोच प्रदीप मलिक, सतीश दलाल पहले से ही खिलाडि़यों को प्रशिक्षण दे रहे थे, महिला खिलाड़ी पूजा अखाडे़ में दावपेंच आजमा रही थी. साक्षी मैदान में अपनी एथलीट की प्रैक्टिस करने लगीं. बेटा सरताज उन के पास ही था.

कोच सतीश दलाल खिलाड़ी पूजा से कुश्ती के दावपेंच को ले कर बात कर रहे थे. मनोज व प्रदीप मलिक आपस में बात करने लगे. इस के बाद प्रदीप जिम्नेजियम के ऊपर बने रेस्टहाउस में चले गए, जहां एक कमरे में पहले से ही कोच सुखविंदर मौजूद था.

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प्रदीप मलिक ने सुखविंदर के कमरे में जा कर उस से बातचीत शुरू कर दी. जिम्नेजियम में भी ऊंची आवाज में म्यूजिक बज रहा था, जहां कई युवा पहलवान वार्मअप कर रहे थे.

सुखविंदर से बातचीत के दौरान अचानक प्रदीप मलिक का फोन आ गया. फोन ले कर वह जैसे ही उठे, तभी अचानक सुखविंदर ने उन के सिर में गोली मार दी. गोली लगते ही प्रदीप लहरा कर जमीन पर गिर पड़े. सुखविंदर ने प्रदीप के शव को दरवाजे के सामने से हटा कर एक तरफ डाल दिया.

गोली जरूर चली थी, लेकिन मैदान में चल रहे स्टीरियो साउंड के कारण किसी को पता नहीं चला कि गोली कहां चली और किस ने चलाई. सुखविंदर ने जिम्नेजियम की छत से आवाज दे कर मुख्य कोच मनोज मलिक को, जो नीचे मैदान में थे, को भी उसी कमरे में बुलाया, जिस में उस ने प्रदीप को गोली मारी थी.

जैसे ही मनोज मलिक कमरे में घुसे, सुखविंदर ने बिना कोई बात किए सीधे उन के सिर में गोली मार दी. उन की भी मौके पर ही मौत हो गई. सुखविंदर ने उन के शव को भी कमरे में एक तरफ डाल दिया.

2 लोगों को गोली मारने के बाद सुखविंदर ने जिम्नेजियम की बालकनी में जा कर कोच सतीश दलाल को बात करने के लिए आवाज दे कर उसी कमरे में बुला लिया. सतीश दलाल के कमरे में एंट्री करते ही उस ने उन्हें भी गोली मार दी. कुछ ही मिनटों में तीनों की हत्या के बाद भी सुखविंदर का जुनून कम नहीं हुआ. उस कमरे में शवों को छिपाने के लिए और जगह नहीं बची थी, इसलिए उस ने उस कमरे में ताला लगा दिया.

अगला निशाना थी पूजा

सुखविंदर का अगला निशाना थी अखाड़े में पहलवानी कर रही महिला पहलवान पूजा. सुखविंदर ने पूजा को फोन किया कि मनोज मलिक और दूसरे कोच कुछ बात करने के लिए उसे जिम्नेजियम में बने कमरे में आने के लिए कह रहे हैं. जिस कमरे में उस ने पूजा को बुलाया, वह दूसरा कमरा था.

पूजा जैसे ही उस कमरे में पहुंची सुखविंदर ने उसे भी गोली मार दी. गोली लगते ही उस की भी मौके पर ही मौत हो गई.

मनोज मलिक व पूजा की हत्या के बाद सुखविंदर के टारगेट पर थीं साक्षी मलिक, जो उस वक्त नीचे मैदान में प्रैक्टिस कर रही थी. सुखविंदर ने बालकनी से उन्हें भी आवाज दे कर बुलाया कि मनोज बुला रहे हैं. ऊपर आ जाओ आप से कुछ सलाह लेनी है.

उस ने साक्षी को भी उसी कमरे में बुलाया, जिस में पूजा की हत्या कर उस की लाश रखी थी. साक्षी के कमरे में एंट्री करते ही बिना कोई सवालजवाब किए सुखविंदर ने सीधे सिर में गोली मार कर उन की भी हत्या कर दी.

सुखविंदर के सिर पर मनोज मलिक के लिए नफरत का जुनून इस कदर हावी था कि वह मनोज के पूरे वंश को मिटाना चाहता था. दरअसल, सुखविंदर ने एक बार अखबार में खबर पढ़ी थी कि बेटे ने अपने पिता की हत्या के 20 साल बाद जवान हो कर हत्यारे को मौत के घाट उतार कर बदला लिया था. इसलिए सुखविंदर मनोज के बेटे को

जिंदा छोड़ना नहीं चाहता था, जिस से बाद में वह अपने पिता की मौत का बदला ले सके.

साक्षी की हत्या के बाद वह नीचे गया और मैदान में खेल रहे सरताज को यह कहते हुए उठा लिया कि उस की मम्मी ऊपर बुला रही है. ऊपर लाने के बाद सुखविंदर ने सरताज को भी गोली मार दी. सरताज को मृत समझ कर सुखविंदर ने उस कमरे में भी ताला लगा दिया. दोनों कमरों का ताला लगाने के बाद वह मेनगेट पर तीसरा ताला लगा कर अखाड़े के मैदान में आ गया.

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अखाड़े में मौजूद सभी लोगों की हत्या के बाद सुखविंदर नीचे आ कर अपनी गाड़ी में बैठ गया. उस समय नीचे कोई नहीं था. वहां से वह सीधे जाट कालेज के सामने पहुंचा, जहां पर मेहर सिंह अखाड़े का एक दूसरा कोच अमरजीत भी पहुंच चुका था. अमरजीत को उस ने अखाड़े के संबंध में बात करने के लिए बुलाया था.

अगले भाग में पढ़ें- पहलवानों को हुआ शक

Crime Story: रोहतक का खूनी अखाड़ा- भाग 2

सौजन्य-  मनोहर कहानियां

अमरजीत के कार से बाहर निकलते ही सुखविंदर ने सीधे उस के सिर में गोली मारनी चाही, लेकिन गोली चेहरे पर जा लगी. गोली लगते ही अमरजीत लहूलुहान हालत में मैडिकल मोड़ की तरफ भागा.

सुखविंदर को लगा कि अब अगर वह वहां रुका तो पकड़ा जाएगा, इसलिए अमरजीत का पीछा करने के बजाय उस ने अपनी गाड़ी का रुख दिल्ली की ओर कर दिया. नफरत व जुनून के बाद अब उस के चेहरे पर सुकून साफ नजर आ रहा था.

पहलवानों को हुआ शक

जिस समय ये वारदात हुई थी, अखाड़े तथा जिम्नेजियम हाल में कई पहलवान प्रैक्टिस कर रहे थे. अखाड़े के मुख्य कोच मनोज के चाचा का लड़का टोनी, मामा का लड़का विशाल, उस की 5 साल की बेटी फ्रांसी भी उस वक्त वहां प्रैक्टिस कर रहे थे.

उन के साथ अन्य पहलवानों ने देखा कि प्रदीप मलिक के अलावा मनोज, सतीश, साक्षी, पूजा और सरताज ऊपर सुखविंदर के कमरे में गए थे, लेकिन काफी देर बाद भी नीचे नहीं आए.

यही सोच कर कुछ लोग जब ऊपर गए तो उन्हें एक कमरे से कोच मनोज के बेटे सरताज के रोने की आवाज सुनाई दी. कुछ पहलवानों को बुला कर जब सब ने कमरे का ताला तोड़ा तो अखाड़े में हुए इस भीषण नरसंहार कर पता चला.

रेस्टरूम के दोनों तालाबंद कमरों के दरवाजे तोड़ने के बाद वहां एक के बाद एक कई लोग लहुलूहान मिले. सुखविंदर का कहीं नामोनिशान नहीं था. माजरा समझ में आते ही कुछ लोगों ने पुलिस को खबर कर दी.

चंद मिनटों में पुलिस मौके पर पहुंच गई. पुलिस के आने से पहले ही साक्षी, पूजा, प्रदीप की मौत हो चुकी थी. मनोज, अमरजीत, सरताज और सतीश दलाल की सांसें चल रही थीं. उन्हें तत्काल अस्पताल ले जाया गया, जहां कुछ देर बाद मनोज और सतीश को भी डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया.

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हरियाणा के रोहतक स्थित इस प्रसिद्ध अखाड़े में हुई गोलीबारी की वारदात की खबर तब तक जंगल की आग की तरह फैल गई थी. इस गोलीबारी में 7 लोगों को गोली लगी थी, जिस में 5 लोगों की मौत हो गई, जबकि अमरजीत व मासूम सरताज गंभीर रूप से घायल थे.

पुलिस काररवाई

घटना की जानकारी मिलते ही पीजीआईएमएस थाने के एसएचओ राजू सिंधू  पुलिस टीम के साथ मौके पर पहुंच गए थे. वारदात इतनी संगीन थी कि एसपी (रोहतक) राहुल शर्मा भी खबर मिलते ही फोरैंसिक टीम व दूसरे अधिकारियों को ले कर मौके पर पहुंच गए.

मनोज मलिक के बडे़ भाई प्रमोज कुमार व दूसरे परिजन भी अपने परिचितों के साथ खूनी अखाड़े के बाहर जमा हो गए थे. रात के 9 बजतेबजते सभी मरने वालों के परिजन घटनास्थल पर भारी हुजूम के साथ मौजूद थे.

उसी रात पीजीआईएमएस थाने में मनोज मलिक के भाई प्रमोज की शिकायत पर सुखविंदर के खिलाफ हत्या का मुकदमा दर्ज कर लिया गया. अमरजीत ने पुलिस को अपना बयान दिया कि उस पर सुखविंदर ने गोली चलाई है. पुलिस की टीमों ने पूरे शहर की घेराबंदी कर दी. लेकिन सुखविंदर पुलिस के हाथ नहीं लगा.

एसपी राहुल शर्मा ने उसी रात जाट कालेज स्थित जिम्नेजियम हाल में चल रहे अखाड़े में हुए गोलीकांड में आरोपी सुखविंदर को पकड़ने के लिए डीएसपी नरेंद्र कादयान व डीएसपी विनोद कुमार के नेतृत्व में विशेष जांच टीम (एसआईटी) का गठन किया, जिस में पीजीआईएमएस थाना, सीआईए यूनिट, एवीटी स्टाफ और साइबर सेल को शामिल किया गया.

हरियाणा के डीजीपी मनोज यादव और एडीशनल डीजीपी व रोहतक रेंज के आईजी संदीप खिरवार ने केस की मौनिटरिंग का काम अपने हाथ में ले लिया. इतना ही नहीं सुखविंदर की गिरफ्तारी पर डीजीपी ने उसी रात एक लाख रुपए के ईनाम की घोषणा भी कर दी.

साइबर सेल को सुखविंदर के मोबाइल फोन की सर्विलांस से पता चला कि वह भाग कर दिल्ली पहुंच गया है. उस की तलाश में टीमों को दिल्ली रवाना कर दिया गया.

अगली सुबह सभी पांचों मृतकों का पोस्टमार्टम हो गया. मृतकों की पोस्टमार्टम रिपोर्ट से खुलासा हुआ कि सभी को करीब 20-25 फीट की दूरी से गोली मारी गई थी. गोली सभी के सिरों में लगी जरूर थीं, लेकिन पार नहीं हुई थीं.

पोस्टमार्टम में साक्षी के सिर से 2 और बाकी चारों के सिर से एकएक गोली मिली. घायल अमरजीत और सरताज को एकएक गोली लगी थी, जो आरपार हो गई थी. फोरैंसिकटीम ने बताया कि सुखविंदर ने वारदात को .32 बोर की रिवौल्वर से अंजाम दिया था. मृतकों के शरीर में 9 एमएम की गोलियां मिली थीं.

चूंकि मासूम सरताज की हालत बेहद  गंभीर थी, इसलिए उसे रोहतक पीजीआई से पंडित भगवत दयाल शर्मा स्नातकोत्तर स्वास्थ्य संस्थान में रेफर कर वेंटिलेटर पर शिफ्ट कर दिया गया.

उस की आंखों के बीच में गोली लगी थी जो सिर के पार निकल गई थी. उस का इलाज करने में डाक्टरों की एक विशेष टीम जुट गई थी.

शुरुआती जांच में एक बात साफ हो गई कि अखाडे़ में कई लोगों की मौजूदगी के बावजूद किसी को भी सुखविंदर के कमरे में चलने वाली गोलियों की आवाज इसलिए सुनाई नहीं दी, क्योंकि प्रैक्टिस के समय तेज आवाज में म्यूजिक चल रहा था.

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हालांकि हल्के धमाके का अंदाजा तो सब को हुआ था, लेकिन उन्हें यही लगा कि किसी शादी में पटाखे बज रहे होंगे. किसी को इस का रत्ती भर भी अंदाजा नहीं था कि सुखविंदर ने ऊपर कमरे में 5 लोगों की हत्या कर दी है.

अखाड़े में मौजूद चश्मदीदों से पूछताछ व शुरुआती जांच में यह भी पता कि सुखविंदर का अखाड़े के दूसरे कोचों के साथ कोई विवाद था, जिस के कारण उस ने पूरी वारदात को अंजाम दिया.

जिद्दी और गुस्सैल था सुखविंदर

सुखविंदर के बारे में पुलिस ने ज्यादा जानकारियां जुटाईं तो पता चला कि वह मूलरूप से सोनीपत के बरौदा गांव का रहने वाला है. पुलिस की एक टीम तत्काल उस के घर पहुंची. वहां उस के परिजनों से पूछताछ हुई तो पता चला कि उस के पिता मेहर सिंह सेना से रिटायर्ड हैं. सुखविंदर शादीशुदा है. 6 साल पहले उस की शादी उत्तर प्रदेश की तनु के साथ हुई थी और उस का 4 साल का एक बेटा है.

सुखविंदर जिद्दी और गुस्सैल स्वभाव का था, इसलिए बेटा होने के बाद पत्नी से उस का झगड़ा होने लगा और 4 साल पहले वह पत्नी को उस के मायके छोड़ आया. तभी से वह मायके में है. जबकि उस का बेटा अपने दादादादी के पास है.

सुखविंदर की मां सरोजनी देवी ने बताया कि पिता मेहर सिंह ने उस की हरकतों के कारण उसे अपनी जायदाद से बेदखल कर दिया था. जिस के बाद से वह कभीकभार ही बेटे से मिलने के लिए घर आता था.

पुलिस ने सुखविंदर को गिरफ्तार करने के लिए अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी. लेकिन संयोग से वारदात के अगले ही दिन 13 फरवरी को दिल्ली पुलिस ने समयपुर बादली इलाके में संदिग्ध अवस्था में कार में घूमते हुए एक व्यक्ति को गिरफ्तार किया था. उस के कब्जे से एक अवैध पिस्तौल तथा 5 कारतूस भी बरामद हुए थे.

उस से पूछताछ करने पर समयपुर बादली पुलिस को पता चला कि सुखविंदर नाम के उस शख्स ने एक दिन पहले रोहतक के मेहर सिंह अखाडे़ में 5 पहलवानों की नृशंस हत्या को अंजाम दिया है तो पुलिस ने उस के खिलाफ शस्त्र अधिनियम का मामला दर्ज कर तत्काल इस की सूचना रोहतक पुलिस को दी. सूचना मिलते ही रोहतक पुलिस दिल्ली पहुंच गई.

पीजीआईएमएस थाना पुलिस ने दिल्ली  की अदालत में अरजी दे कर सुखविंदर का ट्रांजिट रिमांड हासिल किया और उसे रोहतक ला कर अदालत में पेश किया. पुलिस ने अदालत से उस का 4 दिन का रिमांड ले लिया.

इस दौरान एसआईटी ने उसे साथ ले जा कर पूरे घटनाक्रम का सीन रिक्रिएट किया. पुलिस ने सुखविंदर के खिलाफ सभी साक्ष्य एकत्र किए और यह पता लगाया कि आखिर उस ने इस जघन्य हत्याकांड को क्यों अंजाम दिया था.

उस से पूछताछ के बाद पता चला कि उस ने जर, जोरू और जमीन के लिए एक नहीं, बल्कि 6 हत्याओं को अंजाम दिया था. क्योंकि तब तक मनोज व साक्षी के 3 वर्षीय बेटे सरताज की भी अस्पताल में इलाज के दौरान मौत हो गई थी.

सुखविंदर की पिछले कुछ दिनों से मनोज मलिक से एक खास वजह से रंजिश चल रही थी. मनोज मलिक व उन की पत्नी साक्षी नामचीन खिलाड़ी थे. मनोज अपने जमाने के जानेमाने राष्ट्रीय स्तर के पहलवान रहे थे. उन्होंने कई प्रतियोगिताएं जीती थीं. बाद में रोहतक के जाट कालेज में उन्हें सहायक शिक्षक यानी डीपीई की नौकरी मिल गई.

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जाट कालेज के पास ही उन्हें रोहतक के सब से प्रतिष्ठित मेहर सिंह अखाडे़ में कोच की नौकरी भी मिल गई. इस अखाडे़ में मनोज मलिक के अलावा कई अन्य कोच थे. उन्हीं में सुखविंदर भी एक था. वे सभी अखाडे़ में कुश्ती के लिए नए पहलवान तैयार करते थे.

मनोज मलिक (39) मूलरूप से गांव सरगथल जिला सोनीपत के रहने वाले थे. मनोज मलिक और साक्षी 14 फरवरी, 2013 को शादी के बंधन में बंधे थे. शादी की 8वीं सालगिरह से 2 दिन पहले ही दोनों ने एक साथ इस दुनिया को छोड़ दिया था.

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Crime Story: रोहतक का खूनी अखाड़ा- भाग 3

सौजन्य-  मनोहर कहानियां

राष्ट्रीय स्तर की एथलीट थी साक्षी

साक्षी एथलीट की राष्ट्रीय स्तर की खिलाड़ी थी. बाद में उन्हें भी रेलवे में स्पोर्ट्स कोटे से नौकरी मिल गई थी. मनोज मलिक पिछले कई सालों से अपनी पत्नी साक्षी मलिक व 3 साल के बेटे सरताज के साथ रोहतक में जाट कालेज व अखाड़े के पास देव कालोनी में रहते थे.

मनोज मलिक और उन की पत्नी साक्षी चूंकि दोनों ही अच्छे खिलाड़ी थे. इसलिए वे अपने मासूम बेटे सरताज को भी कुश्ती का खिलाड़ी बनाना चाहते थे.

ट्रैक और कुश्ती मैट पर अठखेलियां करता सरताज मांबाप के साथ अखाडे़ में जाता था. वह नए पहलवानों की आंखों का तारा बन गया था. कुल मिला कर उन दोनों का वैवाहिक जीवन सुखमय था.

मनोज को कभी सपने में भी गुमान नहीं था कि जिस सुखविंदर को उन्होंने ही 2 साल पहले 15 हजार रुपए महीने पर अखाड़े में कोच की नौकरी पर रखा था, वह अपनी नीच हरकतों के कारण एक दिन न सिर्फ उन की हत्या कर देगा, बल्कि उन के परिवार के खात्मे का सबब बन जाएगा. बाद में खिलाडि़यों की शिकायत पर मनोज ने उसे हटा दिया था. बस इसी बात से गुस्साए सुखविंदर ने इस घटना को अंजाम दिया था.

सामूहिक गोली कांड में मारे गए अखाड़े के एक अन्य कोच सतीश दलाल (28) मूलरूप से गांव माडोठी, जिला झज्जर हाल निवासी सांपला के रहने वाले थे. जानेमाने कुश्ती  खिलाड़ी सतीश दलाल इन दिनों मनोज मलिक के अखाड़े में कुश्ती के कोच का काम संभाल रहे थे.

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इस हादसे में मारे गए महम चौबीसी के गांव मोखरा निवासी प्रदीप मलिक (28) भी थे. रामकुमार मलिक के 3 बेटों में प्रदीप सब से छोटे थे. प्रदीप का बड़ा भाई विक्रम सीआरपीएफ में तथा बीच वाला भाई संदीप बीएसएफ में नौकरी करता है. प्रदीप खेल कोटे से रेलवे में सीटीआई थे.

उन की ड्यूटी रतलाम, मध्य प्रदेश में थी. विवाहित प्रदीप का एक बेटा है अग्निपथ, जो केवल 15 महीने का है. प्रदीप की पत्नी अंजलि गांव मोखरा में ही रहती है. परिवार का मुख्य काम खेतीबाड़ी है.

प्रदीप मलिक गजब के पहलवान थे. वह कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय तथा महर्षि दयानंद विश्वविद्यालय रोहतक के चैंपियन रहे थे. 77 किलोग्राम भार वर्ग में प्रदीप ने आल इंडिया रेलवे चैंपियनशिप भी जीती थी.

प्रदीप ने जाट कालेज रोहतक से बीए पास किया था. उन्हें जालंधर में प्रस्तावित राष्ट्रीय कुश्ती चैंपियनशिप में भाग लेना था, इसी चैंपियनशिप के लिए वह दिल्ली में ट्रेनिंग कैंप में आए हुए थे. वहीं से छुट्टी ले कर रोहतक आए थे ताकि यहां कुश्ती के दावपेंच और अधिक गहरे से सीख सकें.

प्रदीप का सुखविंदर के साथ कोई सीधा झगड़ा नहीं था. बस अखाड़े में उस की हरकतों को ले कर एक बार अखाड़े में जा कर उसे समझाया था तथा 2-4 बार वाट्सऐप पर बात हुई थी और उन्होंने सुखविंदर को अपना व्यवहार ठीक करने की सलाह दी थी. इसी से सुखविंदर प्रदीप से भी रंजिश रखने लगा था.

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पूजा तोमर पर डालता था डोरे

सामूहिक हत्याकांड में मारी गई प्रतिभाशाली युवा महिला पहलवान पूजा तोमर (17) यूपी चैंपियन रह चुकी थीं. पूजा का परिवार मूलरूप से मथुरा के गांव सिहोरा का रहने वाला है, लेकिन फिलहाल वे मथुरा के लक्ष्मीनगर में रहते हैं. पूजा के पिता रामगोपाल और भाई विष्णु कपड़े की दुकान चलाते हैं. पूजा दमदार खिलाड़ी थी और परिवार वालों ने उन्हें करीब डेढ़ साल पहले रोहतक में जाट कालेज के पीछे बने अखाड़े में कोचिंग लेने के लिए भेजा था.

पूजा 2014 से 2020 तक 57 किलो भार वर्ग की प्रतियोगिताओं में यूपी चैंपियन रह चुकी थीं. 2019 और 2020 में पूजा नैशनल चैंपियन भी रहीं.

दरअसल, इस हादसे की असल वजह थी सुखविंदर का महिला पहलवानों से अश्लील व्यवहार तथा उन से संबंध बनाने का दबाव. मेहर सिंह अखाडे़ में कुश्ती सीखने वाली पूजा तोमर ने कुछ दिन पहले अपने परिवार व अखाडे़ के मुख्य कोच मनोज मलिक से सुखविंदर की शिकायत की थी.

पूजा ने अखाडे़ के कोच व अपने परिवार से सुखविंदर की जो शिकायत की थी, उस में बताया था कि सुखविंदर उसे परेशान कर रहा है और उस पर शादी का दबाव बना रहा है.

दरअसल, अपनी पत्नी से दूर हो कर तनहा जीवन जी रहे सुखविंदर में अपोजिट सैक्स के प्रति एक कुंठा भर गई थी. वह किसी भी तरह अखाडे़ पर अपने आधिपत्य के साथ किसी महिला से संबंध बनाना चाहता था.

अखाड़े की महिला पहलवान से संबंध बनाने या शादी करने के उसे 2 फायदे नजर आ रहे थे. एक तो अखाड़े की पहलवान कुश्ती से नाम और पैसा कमा कर कमाई में उस का हाथ बंटाती.

दूसरे उस की जिस्मानी जरूरत पूरी करने के लिए एक हृष्टपुष्ट औरत मिल जाती. पूजा चूंकि कम उम्र की आकर्षक युवती थी, इसलिए सुखविंदर को उस पर डोरे डालना आसान लगा. इस के लिए वह काफी दिनों से पूजा पर दबाव बना रहा था.

जब पानी सिर से ऊपर पहुंच गया तो पूजा ने अपने परिवार से इस बात की शिकायत कर दी. परिवार वालों ने अखाडे़ के मुख्य कोच मनोज मलिक को इस की सूचना दे कर अपनी बेटी को अखाडे़ से हटाने की बात कही तो मनोज मलिक को लगा कि ऐसा हुआ तो अखाड़े की शान और उन के नाम को बड़ा नुकसान और बदनामी होगी.

मनोज ने यह बात साथी कोचों से बताई तो सब ने एक राय से सुखविंदर को अखाडे़ से हटाने का फैसला कर लिया.

इस के लिए उन सभी ने सुखविंदर को बुला कर पहले सामूहिक रूप से जम कर खरीखोटी सुनाई और फिर उस से साफ कह दिया कि वह 14 फरवरी तक अखाड़ा छोड़ दे. साथ ही उसी दिन से सुखविंदर को अखाड़े में आने से मना कर दिया.

अपने हाथ से लड़की और अखाड़े की नौकरी निकलती देख सुखविंदर अपमान की आग में जलने लगा. और तभी उस ने फैसला कर लिया कि जो लोग उस की बरबादी का कारण बने हैं, उन सब की जिंदगी छीन लेगा.

वारदात को अंजाम देने के लिए 4 दिन पहले ही उस ने साजिश रच ली थी. उस ने सोचा कि उस का खुद का घर तो उजड़ चुका है, अब वह उन का भी घर उजाड़ देगा, जिन के प्रति उस के मन में रंजिश थी.

सुखविंदर से पूछताछ में खुलासा हुआ कि पूजा ही नहीं, उस ने एक अन्य महिला पहलवान से भी ऐसी ही हरकत की थी. इन्हीं कारणों से मुख्य कोच मनोज मलिक, सतीश दलाल, प्रदीप मलिक ने सुखविंदर पर प्रतिबंध लगा दिया था.

इस बात को ले कर सुखविंदर की अमरजीत से भी कहासुनी हुई थी. उसे बता दिया गया था कि अब अखाड़े से उस का कोई मतलब नहीं है और न ही उसे यहां से कोई पैसा मिलेगा.

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बस यही बात सुखविंदर को नागवार गुजरी. उस का मानना था कि उस ने अखाड़े के लिए काफी मेहनत की थी, लेकिन अब उसे ही बाहर निकाला जा रहा है. इसी वजह से उस ने करीब 4 दिन पहले हत्याकांड की साजिश रच ली थी. हत्याकांड से साफ था कि आरोपित किसी भी सूरत में मनोज के परिवार को जिंदा नहीं छोड़ना चाहता था.

पहले से रची गई उस की साजिश का पता इस बात से भी चलता है कि सुखविंदर पिछले कई दिनों से प्रैक्टिस के दौरान बारबार कहता था कि कुछ बड़ा करूंगा. कुछ ऐसा करूंगा कि सब मुझे याद करेंगे.

पीजीआईएमएस पुलिस ने आवश्यक पूछताछ के बाद आरोपी सुखविंदर को अदालत में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

लेकिन एक मामूली सी बात पर 6 लोगों की जिंदगी छीन लेने वाले सुखविंदर के कारण उस अखाड़े के दामन पर लगे खून के छींटों को शायद ही मिटाया जा सके, जहां से देश को नामचीन पहलवान मिले थे.

—कथा पुलिस की जांच, पीडि़तों के बयान व अभियुक्त के बयान पर आधारित

वजूद- भाग 3: क्या था शहला की खुशी का राज

‘‘हरसिंगार, तू जानना चाहता है कि अब्बू ने अम्मी से क्या कहा?’’ अब्बू बोले, ‘नुसरत, बेटियां बोझ नहीं हुआ करतीं. वे तो घर की रौनक होती हैं. बोझ होतीं तो कोई हमारे घर के बोझ को यों मांग कर के अपने घर ले जाता. बेटियां तो एक छोड़ 2-2 घर आबाद करती हैं. अब मत कोसना इन्हें.

‘‘‘कल मैं शहर के अस्पताल में नफीसा की आंखों के आपरेशन के लिए बात करने गया था. वहां आधे से ज्यादा तो लेडी डाक्टर थीं और वे भी 25-26 साल की लड़कियां. उन में से 2 तो मुसलिम हैं, डाक्टर जेबा और डाक्टर शबाना. क्या वे किसी की लड़कियां नहीं हैं?

‘‘‘हां, डाक्टर ने उम्मीद दिलाई है कि हमारी नफीसा फिर से देख सकेगी. और हां, तू इन के निकाह की चिंता मत कर. सब ठीक हो जाएगा.

‘‘‘अरे हां नुसरत, तब तक क्यों न शहला को आगे पढ़ने दें? कोई हुनर हाथ में होगा, तो समाजबिरादरी में सिर उठा कर जी सकेगी हमारी शहला.

‘‘‘अब जमाना बदल चुका है. तू भी लड़कियों के लिए अपनी तंगखयाली छोड़ उन के बारे में कुछ बढि़या सोच…’

‘‘और हरसिंगार, अब्बू ने जमाने की ऊंचनीच समझा कर, मेरी भलाई का वास्ता दे कर अम्मी को मना तो लिया, पर मुझे बड़े शहर भेज कर पढ़ाने को वे बिलकुल राजी नहीं हुईं, इसलिए अब्बू ने उन की रजामंदी से यहां कसबे के इस आईटीआई में कटिंगटेलरिंग और ड्रैस डिजाइनिंग कोर्स में मेरा दाखिला भी करा दिया.

‘‘अब मैं हर रोज साइकिल से यहां पढ़ने आने लगी. यहां नए लोग, नया माहौल, नया इल्म तो मिला ही, उस के साथसाथ हरदम व हर मौसम में खिलखिलाने वाले एक प्यारे दोस्त के रूप में तुम भी मिल गए और मेरी जिंदगी के माने ही बदल गए.

‘‘पर अम्मी अभी भी अंदर से घबराई हुईं और परेशान रहती हैं. जबतब मुझे कोसती रहती हैं, ताने मारती हैं और छोटेबड़े काम के लिए मुझे छुट्टी करने पर मजबूर करती हैं.

‘‘इसी बीच पिछले हफ्ते शहर के एक बड़े अस्पताल में अब्बू ने नफीसा की आंखों का आपरेशन करा दिया. उस दिन अम्मी भी हमारे साथ अस्पताल गई थीं और आपरेशन थिएटर के बाहर खड़ी थीं.

‘‘तभी आपरेशन थिएटर का दरवाजा खुला और डाक्टर शबाना ने मुसकराते हुए कहा, ‘आंटीजी, मुबारक हो. आपरेशन बहुत मुश्किल था, इसलिए ज्यादा समय लग गया, पर पूरी तरह से कामयाब रहा.’

‘‘जानता है हरसिंगार, अम्मी हैरत में पड़ी उन्हें बहुत देर तक देखती रहीं, फिर उन से पूछने लगीं, ‘बेटी, यह आपरेशन तुम ने किया है क्या?’

‘‘वे बोलीं, ‘जी हां.’

‘‘अम्मी ने कहा, ‘कुछ नहीं बेटी, मैं तो बस…’

‘‘उस के बाद अम्मी जितना वक्त अस्पताल में रहीं, वहां की लेडी डाक्टरों और नर्सों को एकटक काम करते देखती रहती थीं.

‘‘उस दिन से अम्मी काफी चुपचाप सी रहने लगी थीं. कल नफीसा के घर लौटने के बाद अब्बू से कहने लगीं, ‘शहला के अब्बू, सुनो…’

‘‘अब्बू ने अम्मी से पूछ ही लिया, ‘नुसरत, आज कुछ खास हो गया क्या, जो तुम मुझे जावेद के अब्बू की जगह शहला के अब्बू कह कर बुलाने लगी?’

‘‘अम्मी ने कहा, ‘अरे, तुम ही तो कहते हो कि लड़का और लड़की में कोई फर्क नहीं होता और फिर तुम शहला के बाप न हो क्या?’

‘‘वे आगे कहने लगीं, ‘मैं तो यह कह रही थी कि नफीसा की आंख ठीक हो जाए, तो उसे भी दोबारा स्कूल पढ़ने भेज देंगे. पढ़लिख कर वह भी डाक्टर बन जाए, तो कैसा रहेगा?’

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‘‘यह सुन कर अब्बू ने कहा, ‘अब तुम कह रही हो, तो ठीक ही रहेगा.’

‘‘इतना कह कर अब्बू मेरी तरफ देख कर मुसकराने लगे थे और आज सुबह अम्मी ने मेरे कालेज जाने पर मुहर लगा दी.’’

खुशी में सराबोर शहला खड़ी हो कर फिर से लिपट गई अपने दोस्त से और आसमान की तरफ देख कर कहने लगी, ‘‘देखो न हरसिंगार, आज की सुबह कितनी खुशनुमा है… बेदाग… एकदम सफेद… है न?

‘‘आज तुझ से सब कह कर मैं हलकी हो गई हूं. निकाह के वाकिए को तो मैं एक बुरा सपना समझ कर भूल चुकी हूं. याद है तो मुझे अपनी पहचान, जिस से रूबरू होने के बाद अब जिंदगी मुझे बोझ नहीं, बल्कि एक सुरीला गीत लगती है,’’ कहतेकहते शहला की आंखों में जुगनू झिलमिलाने लगे.

वजूद- भाग 2: क्या था शहला की खुशी का राज

‘‘सबकुछ शांत ढंग से हो रहा था कि अम्मी की मुरादनगर वाली बहन यानी मेरी नसीम खाला रास्ते में जाम लगा होने की वजह से निकाह पढ़े जाने के थोड़ी देर बाद घर पहुंचीं.

‘‘बड़ी दबंग औरत हैं वे. जल्दबाजी में तय किए गए निकाह की वजह से वे अम्मी से नाराज थीं…’’ कहते हुए शहला ने हरसिंगार के तने पर अपनी पीठ को फिर से टिका लिया और आगे बोली, ‘‘इसलिए बिना ज्यादा किसी से बात किए वे दूल्हे को देखनेमिलने की मंसा से जनवासे में चली गईं. उस वक्त बराती खानेपीने में मसरूफ थे. उन्हें खाला की मौजूदगी का एहसास न हो पाया.

‘‘वे जनवासे से लौटीं और अचानक अम्मी पर बरस पड़ीं, ‘आपा, शहला का दूल्हा तो लंगड़ा है. तुम्हें ऐसी भी क्या जल्दी पड़ रही थी कि अपनी शहला के लिए तुम ने टूटाफूटा लड़का ढूंढ़ा?’

‘‘यह जान कर अम्मी, अब्बू और बाकी रिश्तेदार सब सकते में आ गए. मामले की तुरंत जांचपड़ताल से पता चला कि दूल्हा बदल दिया गया था.

‘‘लड़के वालों ने अब्बू के भोलेपन का फायदा उठा कर चालाकी से असली दूल्हे की जगह उस के बड़े भाई से मेरा निकाहनामा पढ़वा दिया था.

‘‘बात खुलते ही बिचौलिया और कुछ बराती दूल्हे को ले कर मौके से फरार हो गए.

‘‘हमारे खानदान व गांव के लोग इस धोखाधड़ी के चलते बहुत गुस्से में थे. सो, गांव की पंचायत व दूसरे लोगों के साथ मिल कर उन्होंने बाकी बरातियों को जनवासे के कमरे में बंद कर दिया.

‘‘अब मरता क्या न करता वाली बात होने पर दूल्हे के गांव की पंचायत और कुछ लोग बंधक बरातियों को छुड़ाने पहुंच गए. दोनों गांवों की पंचायतों और बुजुर्गों ने आपस में बात की. लड़के वाले किसी भी तरह से निकाह को परवान चढ़ाए रखना चाहते थे.

‘‘वे कहने लगे, ‘विकलांग का निकाह कराना कोई जुर्म तो नहीं, जो तुम इतना होहल्ला कर रहे हो. वैसे भी अब तो निकाह हो चुका है. बेहतर यही है कि तुम लड़की की रुखसती कर दो.

‘‘‘तुम लड़की वाले हो और लड़कियां तो सीने का पत्थर हुआ करती हैं. अब तुम ने तो लड़की का निकाह पढ़वा दिया है न. छोटे भाई से नहीं, तो बड़े से सही. क्या फर्क पड़ता है. तुम समझो कि तुम्हारे सिर से तो लड़की का बोझ उतर ही गया.’

‘‘सच कहूं, उस समय मुझे एहसास हुआ कि हम लड़कियां कितनी कमजोर होती हैं. हमारा कोई वजूद ही नहीं है. तभी अब्बू की भर्राई सी आवाज मेरे कानों में पड़ी, ‘मेरी बेटी कोई अल्लाह मियां की गाय नहीं, जो किसी भी खूंटे से बांध दी जाए और न ही वह मेरे ऊपर बोझ है. वह मेरी औलाद है, मेरा खून है. उस का सुख मेरी जिम्मेदारी है, न कि बोझ… अगर वह लड़की है, तो उसे ऐसे ही कैसे मैं किसी के भी हवाले कर दूं.’

‘‘और कुछ देर बाद हौसला कर के उन्होंने पंचायत से तलाकनामा के लिए दरख्वास्त करते हुए कहा, ‘जनाब, यह ठीक है कि विकलांग होना या उस का निकाह कराना कोई जुर्म नहीं, पर दूसरों को अंधेरे में रख कर या दूल्हा बदल कर ऐसा करना तो दगाबाजी हुई न?

‘‘‘मैं दगाबाजी का शिकार हो कर अपनी पढ़ीलिखी, सलीकेदार, जहीन लड़की को इस जाहिल, बेरोजगार और विकलांग के हाथ सौंप दूं, क्या यही पंचायत का इंसाफ है?’

‘‘यकीन मानो, मुझे उस दिन पता चला कि मैं कोई बोझ नहीं, बल्कि जीतीजागती इनसान हूं. उस दिन मेरी नजर में अब्बू की इज्जत कई गुना बढ़ गई थी, क्योंकि उन्होंने मेरी खातिर पूरे समाज, पंचायत से खिलाफत करने की ठान ली थी.

‘‘लेकिन, पुरानी रस्मों को एक झटके से तोड़ कर मनचाहा बदलाव ले आना, चाहे वह समाज के भले के लिए ही क्यों न हो, इतना आसान तो नहीं. चारों तरफ खुसुरफुसुर शुरू हो गई थी… दोनों गांवों के लोग और पंचायत अभी भी सुलह कर के निकाह बरकरार रखने की सिफारिश कर रहे थे.

‘‘अब्बू उस समय बेहद अकेले पड़ गए थे. उस बेबसी के आलम में हथियार डालते हुए उन्होंने गुजारिश की, ‘ठीक है जनाब, पंच परमेश्वर होते हैं. मैं ने अपनी बात आप के आगे रखी, फिर भी अगर मेरी बच्ची की खुशियां लूट कर और उसे हलाल करने का गुनाह मुझ से करा कर शरीअत की आन और आप लोगों की आबरू बचती है, तो मैं निकाह को बरकरार रखते हुए अपनी बच्ची की रुखसती कर दूंगा, लेकिन मेरी भी एक शर्त है.

‘‘‘बात यह है कि शहला की छोटी बहन नफीसा बहुत ही खूबसूरत है और जहीन भी, लेकिन एक हादसे में उस की नजर जाती रही. बस, यही एक कमी है उस में.

‘‘‘आप के कहे मुताबिक जब बेटियों को हम बोझ ही समझते हैं और आप सब मेरे खैरख्वाह एक बोझ को उतारने में मेरी इतनी मदद कर रहे हैं. मुझे तो अपने दूसरे बोझ से भी नजात पानी है और फिर किसी शारीरिक कमी वाले शख्स का निकाह कराना कोई गुनाह भी नहीं, तो क्यों न आप नफीसा का निकाह इस लड़के के छोटे भाई यानी जिसे हम ने अपनी शहला के लिए पसंद किया था, उस से करा दें? हिसाबकिताब बराबर हो जाएगा और दोनों बहनें एकसाथ एकदूसरे के सहारे अपनी जिंदगी भी गुजार लेंगी.’

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‘‘बस, फिर क्या था, हमारे गांव की पंचायत व बाकी लोग एक आवाज में अब्बू की बात की हामी भरने लगे, पर दूल्हे वालों को जैसे सांप सूंघ गया.

‘‘हां, उस के बाद जो कुछ भी हुआ, मेरे लिए बेमानी था. मैं उस दिन जान पाई कि मेरा भी कोई वजूद है और मैं भेड़बकरी की तरह कट कर समाज की थाली में परोसे जाने वाली चीज नहीं हूं.

‘‘मेरे अब्बू अपनी बेटी के हक के लिए इस कदर लड़ाई लड़ सकते हैं, मैं सोच भी नहीं सकती थी. फिर तो… दूल्हे वालों ने मुझे तलाक देने में ही अपनी भलाई समझी. मैं तो वैसे भी इस निकाह के हक में नहीं थी, बल्कि आगे पढ़ना चाहती थी.

‘‘हां, उस के बाद कुछ दिन तक घर में चुप्पी का माहौल रहा, फिर परेशानी के आलम में अम्मी अब्बू से कहने लगीं, ‘जावेद के अब्बू, तुम्हीं कहो कि अब इस लड़की का क्या होगा. क्या यह बोझ सारी उम्र यों ही हमारे गले में बंधा रहेगा?’

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पूर्व उपमुख्यमंत्री के यहां, वंशजों के खून की होली!

लगभग 50 वर्ष तक अविभाजित छत्तीसगढ़ मध्यप्रदेश की राजनीति में अहम भूमिका निभाने वाले बड़े आदिवासी नेता, उपमुख्यमंत्री रहे स्व. प्यारेलाल कंवर के वंशजों के खून की होली खेली गई है.  बड़े भाई ने छोटे भाई के परिवार को खत्म करवा दिया और चंद घंटों में ही आरोपियों को पकड़कर पुलिस ने मामले का पटाक्षेप कर दिया.

प्यारेलाल कंवर मुख्यमंत्री श्यामाचरण शुक्ल के मंत्रिमंडल में स्थान प्राप्त करने के पश्चात राजनीति के शिखर पर अपनी पहचान बनाने में कामयाब हुए थे. कांग्रेस की राजनीति के एक महत्वपूर्ण हस्ती के रूप में उन्होंने दिग्विजय सिंह के मुख्यमंत्री समय काल में लंबी पारी खेलने के बाद मढ़ोताल जमीन के बहुचर्चित प्रकरण में विवादित हो कर पद से इस्तीफा दिया था. इस  प्रकरण के लिए प्यारे लाल कंवर का नाम राजनीति के इतिहास में दर्ज हो चुका है.

उप मुख्यमंत्री रहे स्वर्गीय प्यारेलाल कंवर के पुत्र, बहू और पोती की जघन्य हत्या के मामले मे  गिरफ्तार आरोपी मृतक के निकट खून के रिश्तेदार ही निकले हैं. हत्या के मामले में 5 आरोपी गिरफ्तार किए गए हैं जिनमें एक नाबालिग भी शामिल है.हत्या में मृतक का बड़ा भाई हरभजन, उसकी पत्नी, साला परमेश्वर, परमेश्वर का दोस्त राम प्रसाद, परमेश्वर का बड़ा भाई, उसकी नाबालिग बेटी गिरफ्तार की गईं हैं.

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नृशंस हत्या से  सनसनी

21 अप्रैल की सुबह सुबह यह समाचार आग की तरह छत्तीसगढ़ में फैल गया कि  उप मुख्यमंत्री रहे प्यारेलाल कंवर किए छोटे पुत्र हरीश कंवर और उसके परिवार की निर्मम हत्या हो गई है. प्यारेलाल की राजनीतिक विरासत को संभाल रहे वर्तमान में राजस्व मंत्री जयसिंह अग्रवाल सुबह 7 बजे मौके पर पहुंच गए और अधिकारियों को निर्देश दिया कि आरोपी बच ना पाए. प्रथम दृष्टया ही मामला परिवारिक संपत्ति विवाद का जान पड़ रहा था. पुलिस ने जब विवेचना की तो देखते ही देखते प्याज के छिलके की तरह सारा मामला उजागर हो गया.

दरअसल, छत्तीसगढ़ के कोरबा  से 15 किलोमीटर फासले पर ग्राम भैसमा में बुधवार सुबह करीब 4 बजे हरीश कंवर, हरीश की पत्नी सुमित्रा कंवर और उनकी चार साल की बेटी आशी की धारदार हथियार से हमला कर हत्या कर दी गई.पुलिस ने मामले का पटाक्षेप करते हुए देर शाम बताया कि हत्या करने वाला और कोई नहीं हरीश का बड़ा भाई हरभजन कंवर ही है.

आरोपी भाई ने बताया छोटे भाई हरीश ने एक साल से संपत्ति पर कब्जा कर रखा था, इस वजह से उनके बीच विवाद चल रहा था. हरभजन की पत्नी ने अपने भाई के साथ मिलकर साजिश को आगे बढ़ाने में सहायता की. पुलिस अधीक्षक अभिषेक सिंह मीणा ने हमारे संवाददाता को बताया – हरीश कंवर के बड़े भाई हरभजन, उसके साले परमेश्वर तथा उसके दोस्त रामप्रसाद को हिरासत में लेकर पूछताछ की गई तो पूरी कहानी सामने आ गई. प हरभजन की पत्नी धनकंवर और उसके भाई परमेश्वर ने साजिश रची थी. हत्या के लिए 21 अप्रैल का दिन तय हुआ था. जैसे ही परमेश्वर हरीश के घर के पास पहुंचा तो उसने हरभजन की नाबालिग बेटी को एस एम एस करके इसकी सूचना दी.सूचना मिलते ही हरभजन भी घर से निकला और उसके निकलते ही बेटी ने मामा को मैसेज किया.

पुलिस  के अनुसार रामप्रसाद के शरीर पर चोट के निशान पाये गए हैं. सीसीटीवी फुटेज में भी यह दोनों दिखे थे जब पुलिस इनके पास पहुंची तो ये शराब के नशे में  थे. जब इन्होंने तीनों की जान ली तो हरभजन और हरीश की मां वहीं मौजूद थी. उसने अपनी आंखों से सारा कांड देखा, इसके बाद तीनों आरोपी भाग गए.घटना को अंजाम देने के बाद परमेश्वर ने अपने कपड़े जला दिये और पुलिस को चकमा देने के लिए अस्पताल में भर्ती हो गया.  सुबह 4 बजे के आसपास मकान में तीनों आरोपी घटना को अंजाम देने के लिए घुसे, हरीश, उनकी पत्नी और बेटी नींद में थे. हमलावरों ने चाकू और हंसिए से  तीनों पर कई वार किए, हरीश के चेहरे और शरीर के कई हिस्सों पर कटने के निशान हैं. पुलिस ने आरोपियों के इकबालिया बयान लेने के पश्चात मामले को न्यायालय में सुपुर्द कर दिया जहां से सभी को जेल भेज दिया गया.

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Serial Story: निकम्मा बाप- भाग 3

लेखक- हेमंत कुमार

जसदेव ने शहर पहुंच कर कुछ मिठाइयां साथ ले लीं. सोचा कि बच्चों और शांता से काफी दिन बाद मिल रहा है, खाली हाथ कैसे जाए और अब तो

वे नन्हा मेहमान भी राह देख रहा होगा उस की.

जसदेव ने अपने दोनों हाथों में मिठाइयों का थैला पकड़े शांता का दरवाजा खटखटाया. कमरे के बाहर नया पेंट और सजावट देख कर उसे लगा कि शांता अब अच्छे पैसे कमाने लगी है शायद.

हलका सा दरवाजा खुला और एक अनजान औरत दरवाजे से मुंह बाहर निकाल कर जसदेव से सवाल करने लगी, ‘‘आप कौन…?’’

‘‘जी, मुझे शांता से मिलना था. वह यहां रहती है न?’’ जसदेव ने पूछा.

‘‘शांता, नहीं तो भाई साहब, यहां तो कोई शांता नहीं रहती. हम तो काफी दिनों से यहां रह रहे हैं,’’ उस औरत ने हैरानी से कहा.

‘‘बहनजी, आप यहां कब आई हैं?’’ जसदेव ने उस औरत से पूछताछ करते हुए पूछा.

‘‘तकरीबन 2 साल पहले.’’

जसदेव वहां से उलटे पैर निकल गया. उस के मन में कई बुरे विचार भी आए, पर अपनेआप को तसल्ली देते हुए खुद से ही कहता रहा कि शायद शांता गांव वापस चली गई होगी. जसदेव शांता की खबर लेने शहर में रह रहे अपने दोस्तों के पास पहुंचा.

पहली नजर में तो जसदेव के बचपन का दोस्त फगुआ भी उसे पहचान नहीं पाया था, पर आवाज और कदकाठी से उसे पहचानने में ज्यादा देर नहीं लगी.

जसदेव ने समय बरबाद करना नहीं चाहा और सीधा मुद्दे पर आ कर फगुआ से शांता के बारे में पूछा, ‘‘मेरी शांता कहां है? मुझे सचसच बता.’’

फगुआ ने उस से नजरें चुराते हुए चुप रहना ही ठीक समझा. पर जसदेव के दवाब डालने पर फगुआ ने उसे अपने साथ आने को कहा. फगुआ अंदर से चप्पल पहन कर आया और जसदेव उस के पीछेपीछे चलने लगा.

कुछ दूरी तक चलने के बाद फगुआ ने जसदेव को देख कर एक घर की  तरफ इशारा किया, फिर फगुआ वापस चलता बना.

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फगुआ ने जिस घर की ओर इशारा किया था, वह वही कोठा था, जहां जसदेव पहले रोज जाया करता था. पर जसदेव को समझ में नहीं आया कि फगुआ उसे यहां ले कर क्यों आया है.

अगले ही पल उस ने जो देखा, उसे देख कर जसदेव के पैरों तले जमीन खिसक गई. कोठे की सीढि़यों से उतरता एक अधेड़ उम्र का आदमी रवीना की बांहों में हाथ डाले उसे अपनी मोटरसाइकिल पर बैठ कर कहीं ले जाने की तैयारी में था. जसदेव भाग कर गया और रवीना को रोका. वह नौजवान मोटरसाइकिल चालू कर उस का इंतजार करने लगा.

रवीना ने पहले तो अपने बापू को इस भेष में पहचाना ही नहीं, पर फिर समझाने पर वह पहचान ही गई.

उस ने अपने बापू से बात करना भी ठीक नहीं समझा. रवीना के दिल में  बापू के प्रति जो गुस्सा और भड़ास थी, उस का ज्वालामुखी रवीना के मुंह से फूट ही गया.

रवीना ने कहा, ‘‘यह सबकुछ आप की ही वजह से हुआ है. उस दिन आप तो भाग गए थे, पर उन लोगों ने मां को नोच खाया, किसी ने छाती पर झपट्टा मारा, किसी ने कपड़े फाड़े और एकएक कर मेरे सामने ही मां के साथ…’’ रवीना की आंखों से आंसू आ गए.

‘‘मां कहां है बेटी?’’ जसदेव ने चिंता भरी आवाज में पूछा.

‘‘मां तो उस दिन ही मर गईं और उन के पेट में पल रहा आप का बच्चा भी…’’ रवीना ने कहा, ‘‘मां ने मुझे भागने को कहा, पर उस से पहले ही आप के महेश बाबू ने मुझे इस कोठे पर बेच दिया.’’

रवीना इतना ही कह पाई थी कि मोटरसाइकिल वाला ग्राहक रवीना को आवाज देने लगा और जल्दी आने को कहने लगा.

रवीना उस की मोटरसाइकिल पर उस से लिपट कर निकल गई और एक बार भी जसदेव को मुड़ कर नहीं देखा.

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जसदेव का पूरा परिवार ही खत्म हो चुका था और यह सब महेश बाबू की योजना के मुताबिक हुआ था, इसे समझने में भी जसदेव को ज्यादा समय नहीं लगा. बीच रोड से अपनी कीमती कार में महेश बाबू को जब उस लड़की के साथ जाते हुए देखा, जिस ने उसे फंसाया था, तब जा कर जसदेव को सारा माजरा समझ में आया कि यह महेश बाबू और इस लड़की की मिलीभगत थी, पर अब बहुत देर हो चुकी थी और कुछ  भी वापस पहले जैसा नहीं किया जा सकता था.

Serial Story: निकम्मा बाप- भाग 2

लेखक- हेमंत कुमार

शांता को इस से पहले कि कुछ समझ में आता, इस बार कई सारे आदमी शांता के दरवाजे को उखाड़ने की कोशिश में लग गए. उन की बातों से यह तो साफ था कि वह जसदेव को अपने साथ उठा ले जाने आए थे या फिर मारने.

दरवाजे की सांकल टूट गई, पर उस के आगे रखे ढेर सारे भारीभरकम सामान ने अभी तक दरवाजे को थामा हुआ था और शायद जसदेव की सांसों को भी.

जसदेव को कुछ समझ में नहीं आया कि शांता से क्या बताए, ऊपर से इतना शोर सुन कर उसे अपना हर एक पल अपना आखिरी पल दिखाई पड़ने लगा.

‘‘अरे, बता न क्या कर के आया है आज? इतने लोग तेरे पीछे क्यों पड़े हैं?’’ अब शांता की आवाज में गुस्सा और चिंता दोनों दिखाई पड़ रही थी, जिस के चलते जसदेव ने अपना मुंह खोला, ‘‘मैं ने कुछ नहीं… मैं ने कुछ नहीं किया शांता, मुझे क्या पता था कि वह…’’ जसदेव फिर चुप हो गया.

अब शांता जसदेव का गरीबान पकड़ कर झकझोरने लगी, ‘‘कौन है वह?’’

शांता पति से बात करने का अब अदब भी भूल चुकी थी.

‘‘आज जब मैं महेश बाबू के यहां जुआ खेलने बैठा था कि एक लड़की मुझे जबरदस्ती शराब पिलाने लगी. मैं नशे में धुत्त था कि इतने में उस लड़की ने मुझे इशारे से अपने पास बुलाया.

‘‘मैं कुछ समझ न पाया और बहाना बना कर जुए के अड्डे से उठ गया और सीधा उस लड़की के पास चला गया.

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‘‘वह मेरा हाथ पकड़ कर अपने कमरे में ले गई और नंगधड़ंग हो कर मुझ से सारे पाप करवा डाले, जिस का अंदाजा तुम लगा सकती हो.’’

‘‘फिर…?’’ शांता ने काफी गुस्से  में पूछा.

‘‘उसी वक्त न जाने कहां से महेश बाबू उस कमरे में आ गए और गेट खटखटाना शुरू कर दिया.

‘‘जल्दी दरवाजा न खुलने की वजह से उन्होंने लातें मारमार कर दरवाजा तोड़ दिया.

‘‘दरवाजा खुलते ही वह लड़की उन से जा लिपटी और मेरे खिलाफ इलजाम लगाने लगी. मैं किसी तरह से अपनी जान बचा कर यहां आ पाया, पर शायद अब नहीं बचूंगा.’’

शांता को अब जसदेव की जान की फिक्र थी. उस ने जसदेव को दिलासा देते हुए कहा, ‘‘तुम पीछे के रास्ते से भाग जाओ और अब यहां दिखना भी मत.’’

‘‘तेरा, रवीना और तेरे पेट में पल रहे इस मासूम बच्चे का क्या…? मैं नहीं मिला, तो वे तुम लोगों को मार डालेंगे,’’ जसदेव को अब अपने बीवीबच्चों की भी फिक्र थी.

शांता ने फिर जसदेव पर गरजते हुए कहा, ‘‘तुम पागल मत बनो. वे मुझ औरत को कितना मारेंगे और मारेंगे भी तो जान से थोड़े ही न मार देंगे. अगर तुम यहां रहोगे, तो हम सब को ले डूबोगे.’’

जसदेव पीछे के दरवाजे से चोरीछिपे भाग निकला. जसदेव भाग कर कहां गया, इस का ठिकाना तो किसी को नहीं पता.

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तकरीबन 2 साल बीत चुके थे. जसदेव को अब अपने बीवीबच्चों की फिक्र सताने लगी थी. उस ने सोचा कि काफी समय हो गया है और अब तक तो मामला शांत भी हो गया होगा और जो रहीसही गलतफहमी होगी, वह महेश बाबू के साथ बैठ कर सुलझा लेगा.

जसदेव ने 2 साल से अपनी दाढ़ी नहीं कटवाई थी और बाल भी काफी लंबे हो चुके थे. जसदेव ने इसे अपना नया भेष सोच कर ऐसे ही अपनी

शांता और रवीना के पास जाने की योजना बनाई.

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