गरीब बच्चों को क्यों नहीं पढ़ने देते?

गरीब और अनपढ़ लोगों से जब उन के बच्चों को स्कूल भेजने और पढ़ाने की बात कही जाती है, तो उन का यही जवाब होता है, ‘इन को कौन सा पढ़लिख कर कलक्टर बाबू बनना है. पढ़ाईलिखाई बड़े और पैसे वालों के लिए होती है. स्कूल जा कर समय खराब करने से अच्छा है कि मेहनतमजदूरी कर के दो पैसे कमाए जाएं. इस से घरपरिवार की मदद हो सकेगी. लड़की को दूसरे घर जाना है. पढ़ालिखा कर क्या फायदा?’

गरीब अनपढ़ लोगों को अपने हकों का पता नहीं होता है. पौराणिक किताबों और कहानियों में यह बारबार कहा गया कि दलित तबके के लिए पढ़ाईलिखाई नहीं है.

इस का असर यह है कि गरीब अनपढ़ अपने बच्चों को पढ़ने नहीं देते. बच्चे पढ़ सकें, इस के लिए जरूरी है कि मांबाप भी सजग हों और वे बच्चों को स्कूल भेजें, पर पौराणिक कहानियों ने हमारे दिमाग पर ऐसा असर किया है कि मांबाप जागरूक ही नहीं होना चाहते हैं.

आज भी एससी और एसटी तबके में लड़कों की पढ़ाईलिखाई तो खराब है ही, लड़कियों की पढ़ाईलिखाई और भी ज्यादा खराब हालत में है. 5वीं जमात के बाद स्कूल छोड़ने वाली लड़कियों में

यह तादाद सब से ज्यादा है. तकरीबन 42 फीसदी लड़कियां 5वीं जमात के बाद, 67 फीसदी लड़कियां 8वीं जमात के बाद और 77 फीसदी लड़कियां 10वीं जमात के बाद पढ़ाई छोड़ देती हैं.

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ऊंची तालीम में भी दलित तबके की लड़कियों की तादाद सब से कम है. आदिवासी और दलित तबके में लड़कियों की पढ़ाईलिखाई की हालत बहुत बुरी है. इस की सब से बड़ी वजह है कि 8वीं जमात के बाद लड़कियों को घर के कामकाज में ?ांक दिया जाता है, वहीं 10वीं जमात तक आतेआते ज्यादातर लड़कियों की शादी हो जाती है. यह भी देखा गया है कि जब लड़कियां पढ़लिख लेती हैं, तो वे घरपरिवार और समाज को मदद करने के लायक हो जाती हैं.

तालीम से दूर बड़ी आबादी

जब गरीब और अनपढ़ लोगों की बात होती है, तो उस में सब से बड़ा हिस्सा एससी और एसटी तबके का है. इन्हें दलित या अछूत कहा जाता है. ये लोग भारत की कुल आबादी का 18 से 20 फीसदी हैं.

साल 1850 से साल 1936 तक ब्रिटिश साम्राज्यवादी सरकार इन्हें दबेकुचले तबके के नाम से देखती थी. इन की कुल आबादी 32 करोड़ के करीब मानी जाती है. यह भारत की आबादी का एकचौथाई हिस्सा है.

पौराणिक जमाने से आज तक दबेकुचले तबके के साथ भेदभाव होता आ रहा है. इन को सब से ज्यादा पढ़ाईलिखाई के हक से दूर रखा जाता है. सदियों से इस तबके के मन में एक बात अंदर तक बैठ गई है कि पढ़ाईलिखाई पर इन लोगों का हक नहीं है.

सरकार ने संविधान के मुताबिक तालीम देने का इंतजाम तो कर दिया, लेकिन सरकारी तालीम का बुरा हाल कर दिया, जिस की वजह से सरकारी स्कूल में पढ़ने के बाद भी ये लोग सामान्य वर्ग का मुकाबला करने में बहुत पीछे हो जा रहे हैं.

1931-32 में गोलमेज सम्मेलन के बाद जब ब्रिटिश शासकों ने ऐसे लोगों के लिए अलग सूची बनाई, जिस से उन के लिए अलग सरकारी योजनाओं को चला कर उस का फायदा उन को दिया जा सके.

आजादी के बाद संवैधानिक (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 जारी किया गया, जिस में भारत के 29 राज्यों की 1,108 जातियों के नाम शामिल किए गए थे. ऊंचनीच के हिसाब से यह समाज तमाम बिरादरी और जातियों में बंटा है.

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तकरीबन 2000 साल से चली आ रही जातीय व्यवस्था को आजादी के 70 सालों के बाद भी खत्म नहीं किया जा सका है. किसी न किसी रूप में यह कायम है. इन को कमजोर करने के लिए जातीय व्यवस्था के भीतर जातियों का बंटवारा किया जा रहा है, जिस से राजनीतिक दबाव को कम किया जा सके.

कमजोर पड़ते दलित मुद्दे

डाक्टर भीमराव अंबेडकर जैसे नेताओं ने पढ़ाईलिखाई को पूरी अहमियत दी थी. दलित आंदोलन को शुरू कर के उन को हक और पहचान दिलाने के लिए काम किया. 20वीं सदी की शुरुआत में दलितों की सामाजिक, तालीम और माली तौर पर हालत बेहद खराब थी. डाक्टर भीमराव अंबेडकर की अगुआई में दलित आंदोलन से दलितों को कुछ फायदे हुए.

आजादी मिलने के बाद यह आंदोलन राजनीतिक सत्ता पाने में लग गया, जिस के चलते दलित जातियां तमाम बिरादरी में बंट कर कमजोर हो गई हैं, जिस से उन का दबाव कम हो गया है. इस वजह से आरक्षण का विरोध करने वाले लोग अब आरक्षण को खत्म करने की मांग करने लगे हैं.

शासन व्यवस्था के हर दर्जे में कुछ सीटें दलितों के लिए आरक्षित होती हैं. इस का फायदा अब दलितों के एक वर्ग में ही बांटा जा रहा है. सरकारी मदद से चलने वाले शैक्षिक संस्थानों और सरकारी नौकरियों में भी दलितों के लिए आरक्षण होता है.

आजादी के बाद बने भारत के संविधान में दलित हितों के संरक्षण के लिए ये व्यवस्थाएं की गई हैं. 70 साल के बाद भी ये आधीअधूरी ही हैं. दलितों के एक खास तबके तक ही फायदा पहुंच पा रहा है.

अहमियत को नहीं समझ रहे

यह सही है कि दलितों का एक तबका पढ़लिख कर आगे बढ़ गया है. इस ने अपने रोजगार भी शुरू कर लिए हैं. दलित इंडियन चैंबर औफ कौमर्स ऐंड इंडस्ट्री भी बन गई है. इस के बाद अभी भी दलितों का एक तबका बहुत पीछे है.

आरक्षण की नीति उन्हीं को फायदा पहुंचाती आ रही है, जो इस का फायदा ले कर आगे बढ़ चुके हैं. दलितों में एक छोटा तबका ऐसा तैयार हो गया है, जो अमीर है. यह दलितों की आबादी का महज 10 फीसदी है.

दलितों का यह तबका सामाजिक तौर पर खुद को ऊंचे दर्जे का सम?ाने लगा है. इस का बाकी दलित आबादी से कोई सरोकार नहीं रह गया है.

शहरों की बात छोड़ दें, तो गांव में एक बड़ा तबका ऐसा है, जो अभी भी पढ़ाईलिखाई के चलते तरक्की से कोसों दूर है. गांव के ऐसे लोग केवल मजदूर बने हुए हैं, क्योकि दलित भूमिहीन हैं. ऐसे में नौकरी और खेती उन के पास नहीं हैं. वे केवल सरकारी सुविधाओं पर आश्रित हो गए हैं. वे खुद कुछ करना नहीं चाहते, जिस की वजह से उन की तरक्की नहीं हो पा रही है.

वे ‘वोटबैंक’ राजनीति का शिकार हो गए हैं. जमीन के मालिक न होने के बावजूद दलित भूमिहीन मजदूर और सीमांत किसान की तरह नजर आता है. दलितों के पास जो थोड़ीबहुत जमीन है, गरीबी के चलते वह भी बिकती जा रही है.

काम नहीं आ रहे संविधान के हक

सरकारी स्कूलों में आज दलितों की तादाद दूसरी जातियों के मुकाबले ज्यादा है, लेकिन जैसेजैसे पढ़ाई आगे बढ़ती है, यह तादाद कम होती जा रही है. ये लोग सरकारी स्कूलों में पढ़ते हैं, जहां पढ़ाई का लैवल ज्यादा अच्छा नहीं होता.

इस वजह से इन को रोजगार भी घटिया दर्जे का ही मिलता है. जैसेजैसे आरक्षित नौकरियां और रोजगार के दूसरे मौके कम हो रहे हैं, वैसेवैसे इस तबके की निराशा और भी ज्यादा बढ़ती जा रही है.

साल 1997 से साल 2021 के बीच सरकारी नौकरियों में लाखों की कमी आई है, जिस की वजह से दलितों में भी रोजगार घटा है.

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संविधान ने दलितों को जो हक दिए हैं, वे उतने काम नहीं आ रहे जितना उम्मीद की जा रही थी. मिसाल के रूप में छुआछूत को असंवैधानिक करार दिए जाने के बावजूद यह आज तक कायम है. तमाम योजनाएं बनाई गई हैं, लेकिन उन का फायदा नहीं मिल रहा.

इस की सब से बड़ी वजह यह है कि दलित संगठन अब समाज में जागरूकता का काम करने की जगह राजनीति के जरीए सत्ता पाने में लग गए हैं.

वोट पाने के लिए अलगअलग तबके के लोगों को भी साथ लेना पड़ता है, जिस के चलते केवल दलित जागरूकता पर काम करना मुश्किल हो जाता है. इस की वजह से दलित मुद्दे कम होते जा रहे हैं. दलितों के लिए काम करने वाले दलों को भी दलित समाज की जगह सर्वसमाज की बात करनी पड़ रही है.

आज जरूरत इस बात की है कि गरीब और अनपढ़ लोग खुद सजग हों. अपने बच्चों को पढ़ने भेजें. जब वे पढ़लिख कर सम?ादार हो जाएंगे, तो अपना अच्छाबुरा सम?ाने लगेंगे.

जो लड़कियां स्कूल जाती हैं, वे कम उम्र में शादी नहीं करना चाहती हैं. वे अनपढ़ लोगों से बेहतर सोचती हैं. अपना और परिवार दोनों का भला करती हैं. इस वजह से गरीब और अनपढ़ लोगों को यह भूल जाना चाहिए कि पढ़लिख कर कौन सा कलक्टर बनना है. पढ़लिख कर ही अपने हक पता चल सकते हैं. वह जिंदगी में तरक्की का रास्ता है. अनपढ़ रह कर मजदूरी करने से अच्छा है कि पढ़लिख कर कोई हुनरमंद काम करें. इसी से जिंदगी में इज्जत मिलेगी.

ओमिक्रान और हमारी  निठल्ली सरकार!

पहली सुर्खी-

-अमेरिका, ब्रिटेन, चीन कई देशों में ओमिक्रान वायरस फैलता चला जा रहा है.

दूसरी सुर्खी-

भारत में भी कहीं-कहीं ओमिक्रान वायरस फैल रहा है अलर्ट जारी.

तीसरी सुर्खी – भारत में भी स्वास्थ्य विभाग ओमिक्रान

वायरस पर पैनी निगाह रखे हुए हैं रात का कर्फ्यू का राज्यों को सुझाव.

कोरोना की दो लहरें  हमारे देश और सारी दुनिया ने देखी हैं. जिसका डर था अपना स्वरूप बदल कर के कोरोना ने  के रूप में दुनिया को हलाकान शुरू कर दिया है. सारी दुनिया के चेहरे पर चिंता की  लकीरें स्पष्ट देखी जा सकती है. ऐसे में भारत में सब कुछ वैसा ही चल रहा है जैसा कि सामान्य दिनों में. हाल ही में विवाह उत्सव संपन्न हुए हैं उनमें ना तो किसी प्रोटोकॉल का पालन किया  गया और नहीं कहीं समझदारी दिखाई दी. यही नहीं केंद्र और राज्य सरकारें भी पूरी तरीके से आंख मूंदे हुए दिखाई दी. लोगों में जो एक जागरूकता मास्क को लेकर की होनी चाहिए वह भी कहीं दिखाई नहीं दी. यहां तक कि हमारे राजनेता सरकार में बैठे हुए नुमाइंदे प्रशासन में बैठे हुए अधिकारियों से जो सूझबूझ और जागरूकता की अपेक्षा थी वह भी कहीं नजर नहीं आई. ऐसे में यह सवाल आज फिर उठ खड़ा हुआ है कि कोरोना की भयंकर विभीषिका देखने के बाद भी अगर हमारे राजनेता सत्ता में बैठे हुए लोग अगर उदासीन हैं तो फिर दोषी कौन है.

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आज हम इस रिपोर्ट में यह महत्वपूर्ण मसला आपके समक्ष रख रहे हैं केंद्र हो या राज्य सरकारें कोरोना के मामले में क्या आप उन्हें समझदारी का परिचय देते हुए देखते हैं. क्या आपको एहसास है की सरकारी आखिर क्यों कुंभकरण निद्रा में सोए हुए हैं. और अगर कोरोना का यह दूसरा रूप ओमिक्रान

क्या गुल खिलाने जा रहा है और अगर अब इससे जन हानि होती है तो क्या  सरकार राज्य सरकारें और हमारे नेता जो निठल्ले बैठे हुए हैं दोषी नहीं माने जाएंगे.

देखते हुए भी आंखें बंद

आपको याद होगा कि जब कोरोना की पहली लहर आई थी प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने सब कुछ अपने हाथों में ले लिया और एक छत्र निर्णय लिया करते थे. सबसे पहले उन्होंने ही टेलीविजन पर आकर के अचानक ही लॉकडाउन का धमाका कर दिया था और सारे देश में हंगामा  बरपा हो गया था. दूसरी दफा जब आए तो खूब तालियां बजवाई दिए जलवाए. मगर उसके बाद जो हाहाकार मचा वह इतिहास में दर्ज हो चुका है.

हमारे देश में यही सबसे बड़ी खामी है कि हम लोग सब कुछ ईश्वर को छोड़ देते हैं, भाग्य पर छोड़ देते हैं और शुतुरमुर्ग की तरह अपना सर छुपा लेते हैं. हकीकत को नजरअंदाज करने के कारण भारत ने हमेशा बहुत ही तकलीफ है और कष्ट झेले हैं. आज लोकतांत्रिक सरकार होने के बावजूद आज के आधुनिक युग में भी विज्ञान और जागरूकता को दरकिनार करते हुए हम शुतुरमुर्ग ही बने हुए हैं . कोरोना का बहु रुप ओमिक्रान धीरे-धीरे पूरी दुनिया में फैलता  चला जा रहा है. भारत की तैयारियों की बात करें तो देखते हैं कि सिर्फ बयानबाजी हो रही है. हम नजर रखे हुए हैं, हम राज्यों को सलाह दे रहे हैं, हम नाइट कर्फ्यू की बात कर रहे हैं. हम जमीनी हकीकत से बहुत दूर है हमें अपनी हॉस्पिटलों को जिस तरीके से तैयार करना चाहिए नहीं कर रहे हैं. देश की राजधानी दिल्ली से लेकर के किसी तहसील और गांव स्तर पर देखें तो कहीं भी कोई तैयारी हमें दिखाई नहीं देती. सिर्फ लोग इंतजार कर रहे हैं कि  ओमिक्रान चला आए और तब हम जागेंगे तब लोगों का इलाज करने का असफल प्रयास करेंगे और बाद में कहेंगे कि हमने बहुत कुछ किया.

दरअसल, सरकार में बैठे हुए हमारे निठल्ले नेता सिर्फ उद्घाटन और भूमि पूजन करने में पारंगत हैं. आज स्वास्थ्य सेवाओं को जिस तरीके से चुस्त-दुरुस्त करने का समय है उससे मुंह मोड़ा जा रहा है रात का कर्फ्यू लगा करके हमारे नेता हमारी सरकार क्या दिखाना चाहती है?

क्या ओमिक्रान वायरस रात को निकलता है? सरकार की सारी कवायद हंसी का पात्र है लोग अपने इन दिग्गदर्शक नेताओं पर हंसते हैं. कहते हैं धन्य हैं हमारे भाग्य विधाता!

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स्वास्थ्य इमरजेंसी अलर्ट क्यों नहीं

सीधी सी बात है- जब दुनिया भर में इस नए वायरस के आतंक से लोग परेशान हैं, लोग मर रहे हैं चर्चा का विषय बना हुआ है तो हमारे देश की सरकारी आंखें आंखें बंद करके क्यों सोई हुई है. क्यों नहीं देश में स्वास्थ्य हेल्थ इमरजेंसी अलर्ट कर दिया जाता. जिस तरीके से युद्ध के समय में देशभर में एक अलर्ट जारी कर दिया जाता है पूरी व्यवस्था देश की सुरक्षा में लग जाती है ऐसे में सब देखते समझते हुए भी स्वास्थ्य अलर्ट जारी नहीं करना अपने आप में एक गंभीर सवाल खड़ा करता है.  चाहिए कि देश का हर एक हॉस्पिटल इसके लिए तैयार किया जाए वहां बेड हो, गैस हो, वहां इस वायरस से मुकाबला करने के लिए सब कुछ सामान मेडिकल का उपलब्ध रहे. ताकि किसी की भी मृत्यु ना हो उसे इलाज मिल जाए. हमारे यहां नेता और सरकार प्रशासनिक अमला जानबूझकर के मानो अनदेखी कर रहा है और जब गांव गांव में घर घर में यह वायरस अपना आतंक दिखाना शुरू करेगा तब हक्का-बक्का यह शासन सिर्फ मीडिया में विज्ञापन जारी करना और बयान देने का काम करेगा.

अजय मिश्रा, राहुल गांधी, नरेंद्र मोदी और इतिहास का कटघरा

किसान आंदोलन के दरमियान अजय मिश्रा केंद्रीय गृह राज्य मंत्री सिर्फ इसलिए चर्चा में आ गए कि उनके सुपुत्र ने किसानों पर जीप चला दी, किसान मर गए लहुलुहान हो गए. और  मामला तूल पकड़ता चला गया. कहां तो नरेंद्र मोदी सरकार ने सोचा था कि किसान उनके दबाव प्रभाव के कारण भाग खड़े होंगे और कहां तो किसान चट्टान बनकर खड़े हो गए.

आज वस्तुत: सारी दुनिया जानती है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी की सरकार किसानों की दृढ़ता के आगे आखिरकार चकनाचूर हो गई है और संसद में अपने तीनों कानून वापस ले लिए हैं. मगर अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या नरेंद्र मोदी ब- हैसियत प्रधानमंत्री अभी भी किसानों के लिए मन में सकारात्मक भाव रखते हैं या फिर नकारात्मक.

आज हम इस रिपोर्ट में इसी पहलू पर दृष्टिपात करते हुए कुछ ऐसे तथ्य प्रकाश में ला रहे हैं जो यह दूध का दूध और पानी का पानी कर देगा की वर्तमान केंद्र सरकार जिसके प्रमुख नरेंद्र दामोदरदास मोदी हैं किसानों के प्रति आखिर उनके मन में क्या है. और आने वाले समय में ऊंट किस करवट बैठ सकता है.
अगर यह कहा जाए कि नरेंद्र मोदी एक दृढ़ निश्चय के शख्स हैं तो यह गलत नहीं होगा. मगर दृढ़ता भी ऐसी होनी चाहिए जो अपने देशवासियों के भले के लिए और उन्हें ताकत देने के लिए हो मगर दुर्भाग्य से नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने  अपने मंत्रिमंडल में जिस अजय मिश्रा को अभी तक “गृह राज्य मंत्री” के पद से नवाजा हुआ है यह तथ्य, यह सच यह बता रहा है कि मोदी सरकार की सोच में कहीं ना कहीं किसानों के प्रति सच्ची हमदर्दी नहीं है.

अगर आप किसानों के प्रति सद्भाव रखते हैं तो आपको सबसे पहले दागी अजय मिश्रा को गृह राज्य मंत्री पद से हटा देना चाहिए. क्योंकि आपके इस केंद्रीय मंत्री पर आक्षेप लग रहे हैं और मामला सीधे-सीधे गंभीर है. लाख टके का सवाल यह है कि अगर  आज केंद्र में कांग्रेस गवर्नमेंट ऐसा कर रही होती तो यह नरेंद्र मोदी और उनकी भाजपा के लोग इस्तीफा नहीं मांगते, राजनीति में दोहरा चरित्र कतई नहीं होना चाहिए.

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मंत्री को जेल जाना होगा..

कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी संसद में अजय मिश्रा के मामले को लेकर के गंभीर दिखाई देते हैं. और किसानों के पक्ष में उन्होंने जैसे बयान दिए हैं और व्यवहार किया है उससे स्पष्ट हो जाता है कि कांग्रेस पार्टी किसानों के सुख दुख में साथ खड़ी है और एक ऐतिहासिक लड़ाई लड़ रही है. इसी तारतम्य में राहुल गांधी ने एक बड़ी बात कही है कि अजय मिश्रा को जेल जाना होगा, चाहे उसके लिए 5 साल लग जाएं 10 साल या 15 साल.

राहुल गांधी का यह उद्घोष नरेंद्र मोदी सरकार के लिए उल्टी गिनती का स्वर बन गया है.
एकतरफ नरेंद्र मोदी देश और दुनिया में जब सामने आते हैं तो बड़ी मीठी मीठी बातें करते हैं ज्ञान की बातें करते हैं, ऐसा महसूस होता है मानो नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री पद पद पाकर के देश की जनता धन्य हो गई है. नरेंद्र मोदी जैसा ज्ञानी, संवेदनशील और काम करने वाला प्रधानमंत्री तो मिल ही नहीं सकता.
मगर दूसरी तरफ व्यवहार में देखें तो यह बिल्कुल उलट मिलता है. नरेंद्र मोदी जो कहते हैं वह करते नहीं है और करते हैं वह कहते नहीं हैं.

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अजय मिश्रा के मामले में जिस तरीके से नरेंद्र मोदी ने हठधर्मिता दिखाई है वह भारतीय राजनीति के इतिहास में  काले अक्षरों में दर्ज हो गई है. अजय मिश्रा गृह राज्य मंत्री होने के बावजूद कानून के शिकंजे में है और निसंदेह वह अपनी सजा तो पाएंगे. मगर नरेंद्र मोदी ने जिस तरीके से अजय मिश्रा को संरक्षण दिया है उसके कारण उन्हें स्वयं भी कभी इतिहास के कटघरे में खड़ा होना होगा, सफाई तो देनी ही होगी.

प्राइम मिनिस्टर का टि्वटर हैक करने का मतलब !

शनिवार 11-12 दिसंबर  की आधी रात प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के ट्विटर को हैक कर लिया गया. बहुत ही कम समय के लिए हैकर्स ने नरेंद्र मोदी के ट्विटर को हैक करके अपना संदेश प्रसारित कर दिया. इस रिपोर्ट में हम प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ट्यूटर हैकर्स पक्ष की बात करेंगे मगर इसके साथ ही यह सवाल खड़ा हो गया है कि अगरचे लंबे समय तक देश और दुनिया के वीवीआइपी पर्सनालिटी के ट्विटर को हैक करके क्या कोई भविष्य में पूरी दुनिया में बवंडर ला सकता है, क्या यह संभव नहीं है?

फेंटेसी की दुनिया में अनेक किस्से कहानियां सच और ख्वाब बन करके जन चर्चा का विषय बनते रहे हैं. और आगे चलकर के कभी-कभी वह सच भी हो जाते हैं. ऐसा अनेक बार हुआ है.

ऐसे में यह बहुत कम समय का हमारे प्रधानमंत्री का ट्विटर हैक, हमें सोचने विचारने के लिए बहुत बड़ा विषय दे गया है कि आने वाले समय में सरकार और हमें सावधान रहना होगा. क्योंकि यह एक ऐसा माध्यम है जो मिनटों में संदेश पूरी दुनिया में फैला देता है और एक गलत संदेश लाखों करोड़ों लोगों की जान माल पर खतरा बन सकता है.

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अब जैसा कि होता है ट्विटर ने अपनी सफाई दे दी है प्रधानमंत्री कार्यालय ने भी ट्विटर पर अपनी बात को रख दिया है मगर यह बात सब जान चुके हैं कि सोशल मीडिया का यह संजाल जितना हमें जानकारी देकर खुश तबियत करता है, उतना ही हमारी गर्दन भी अपने ही हाथों में रखता है.

नरेंद्र मोदी के टि्वटर हैक के पहले भी बड़ी हस्तियों के सोशल हैंडल को हैक किया जा चुका है उल्लेखनीय है कि माइक्रोब्लॉगिंग साइट पर एकसाथ ढेर सारे बड़े सिलेब्स का अकाउंट हैक होने का मामला सामने आया था- ऐपल, एलन मस्क, जेफ बेजोस, जॉन बिडेन, बराक ओबामा, उबर और माइक्रोसॉफ्ट को-फाउंडर बिल गेट्स तक के अकाउंट्स हैक हो गए थे .

पाठकों को याद दिला‌ दें कि हैकर्स ने कई अकाउंट्स से ट्वीट किए था और कहा कि उनकी ओर से भेजे गए बिटकॉइन्स को डबल कर दिया जाएगा.

अकाउंट्स की मदद से सोशल मीडिया यूजर्स से क्रिप्टोकरंसी बिटकॉइन भी उन्हें भेजने को कहा था हैक किए गए अकाउंट्स एक के बाद एक बढ़ते गए और ऐपल, एलन मस्क, जेफ बेजोस के बाद जॉन बिडेन, बराक ओबामा, उबर, माइक्रोसॉफ्ट को-फाउंडर बिल गेट्स और कई बिटकॉइन स्पेशलिटी फर्म्स के अकाउंट हैक हो गए.

सारी दुनिया जानती है की सोशल मीडिया को कभी भी कोई हैकर अपने हिसाब से कुछ समय के लिए हैंडिल कर सकता है मगर इस परिप्रेक्ष्य में कल्पना की जा सकती है कि अगर यह लंबे समय तक हुआ तो क्या होगा. क्या लंबे समय तक अगर कोई फितरती दिमाग कंट्रोल कर लेता है तो सारी दुनिया अस्त व्यस्त नहीं हो जाएगी उसका जवाबदेह कौन होगा.

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यह ट्यूटर हैक एक नमूना हो तो!

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी का ट्विटर हैंडल हैक करने के बाद हैकर्स ने दो ट्वीट किए. पहला ट्वीट- शनिवार देर रात 2 बजकर 11 मिनट पर किया गया. जिसमें कहा गया,- ‘भारत ने आधिकारिक रूप से बिटक्वॉइन को कानूनी मान्यता दे दी है. सरकार ने 500 BTC खरीदे हैं और आम लोगों में बांट रही है. जल्दी करें भारत… भविष्य आज आया है!’

दो मिनट तक यह ट्वीट पीएम मोदी के ट्विटर हैंडल पर रहा. उसके बाद इसे डिलीट कर दिया गया.

इसके 3 मिनट बाद यानी 2 बजकर 14 मिनट पर पीएम मोदी के हैक किए गए ट्विटर हैडल से दूसरा ट्वीट किया गया, जिसमें पहले वाले ट्वीट की बातों को ही दोहराया गया. फिर कुछ ही मिनटों में उसे भी डिलीट कर दिया गया. हालांकि तब तक ट्विटर पर पीएम मोदी के ट्विटर अकाउंट से किए गए इन ट्वीट्स के स्क्रीनशॉट लेकर वायरल हो रहे थे.

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हम इस विशेष रिपोर्ट में सिर्फ यह कहना चाहते हैं की विज्ञान के दो पक्ष होते हैं अच्छा भी और बुरा भी. अच्छा तो सारी दुनिया आज देख रही है और इसमें बुराई भी देख रही है. मगर सोशल मीडिया को अगर कभी किसी ने लंबे समय तक अपने कब्जे में ले लिया और उसमें अपने फितरती दिमाग से संदेश प्रसारित करने लगे तो क्या होगा.

आंदोलन: एक राकेश टिकैत से हारी सरकार

आजादी के लिए किए गए आंदोलन से ले कर बाकी आंदोलनों तक किसान मुख्य धुरी रहा, पर उसे कभी श्रेय नहीं दिया गया. 3 कृषि कानूनों को ले कर पहली बार किसानों की ताकत को स्वीकार किया गया है.

इस से पहले किसानों को तरहतरह से बदनाम करने की जुगत की गई. राकेश टिकैत को सोशल मीडिया पर ‘राकेश डकैत’ लिखा गया. पर एक साल तक लंबी लड़ाई लड़ कर किसानों ने साबित कर दिया कि सही तरह से सरकार का विरोध हो तो कोई भी लड़ाई जीती जा सकती है. ममता बनर्जी की तरह ही राकेश टिकैत ने भाजपा के ‘राजसूय यज्ञ’ को कामयाब होने से रोकने का काम किया.

कृषि कानूनों को वापस लेने की मांग पर जब किसान नेता राकेश टिकैत ने आंदोलन शुरू किया, तो उस समय उन को सब से कमजोर नेता माना जा रहा था. यह पंजाब और हरियाणा के किसानों की लड़ाई मानी जा रही थी. उत्तर प्रदेश में इस को केवल पश्चिमी उत्तर प्रदेश तक ही सीमित माना जा रहा था.

पर, जैसेजैसे किसान आंदोलन आगे बढ़ता गया, वैसेवैसे इस पर किसान नेता चौधरी राकेश टिकैत की पकड़ बढ़ती गई. 26 जनवरी, 2021 में जब किसानों ने ट्रैक्टर रैली की और लालकिले पर  झंडा उतारा गया, उस के बाद लगा कि किसान आंदोलन खत्म हो जाएगा. पर इस घटना के बाद से किसान आंदोलन की कमान पूरी तरह से राकेश टिकैत के हाथ आ गई.

राकेश टिकैत के खिलाफ सरकार ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के भाजपा नेता लामबंद होने लगे. इस से दुखी हो कर राकेश टिकैत की आंखों से आंसू निकल गए. राकेश टिकैत ने खुद को मजबूत करते हुए किसान आंदोलन को जारी रखने का ऐलान किया.

वहां से किसान आंदोलन की कमान राकेश टिकैत के पास आ गई. ऐसा लगा, जैसे पश्चिम उत्तर प्रदेश और हरियाणा के जाट किसानों ने इस को अपनी बेइज्जती माना.

धीरेधीरे यह लड़ाई उत्तर प्रदेश के बाकी हिस्सों में फैलने लगी. भारतीय किसान यूनियन ने दिल्ली के बौर्डर के साथसाथ लखीमपुर खीरी, बाराबंकी, लखनऊ और पूरे उत्तर प्रदेश के किसानों को एकजुट करना शुरू किया. अब उत्तर प्रदेश किसान आंदोलन का अगुआ बन गया था.

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आलोचनाएं दरकिनार

52 साल के राकेश टिकैत भारतीय किसान यूनियन नामक संगठन के राष्ट्रीय प्रवक्ता हैं. वे भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष रह चुके महेंद्र सिंह टिकैत के दूसरे बेटे हैं.

साल 2020 में कृषि कानून के विरोध में गाजीपुर बौर्डर पर धरनाप्रदर्शन को ले कर राकेश टिकैत चर्चा में आए. उन्होंने मेरठ यूनिवर्सिटी से एमए की उपाधि हासिल की और साल 1992 में दिल्ली पुलिस में नौकरी की, लेकिन 1993-94 में लालकिले पर किसानों के विरोध प्रदर्शन के दौरान उन्होंने दिल्ली पुलिस की नौकरी छोड़ दी और भारतीय किसान यूनियन के सदस्य के रूप में विरोध में शामिल हो गए.

इस के बाद से ही राकेश टिकैत की किसान राजनीति तेजी से आगे बढ़ने लगी. उन्होंने साल 2018 में हरिद्वार (उत्तराखंड) से ले कर दिल्ली तक ‘किसान क्रांति’ यात्रा निकाली.

राकेश टिकैत की बढ़ती लोकप्रियता से डरे लोगों ने कभी उन को कांग्रेस का ‘दलाल’ कहा, तो कभी भाजपा का ‘दलाल’. कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ाई तेज करने के बाद भाजपा की आईटी सैल ने राकेश टिकैत का नया नामकरण ‘राकेश डकैत’ कर दिया.

उन के घरपरिवार और बच्चों के साथसाथ उन की जमीनजायदाद पर उंगली उठाई गई. पर राकेश टिकैत अपनी आलोचना से कभी डरे नहीं और कृषि कानूनों के खिलाफ लड़ाई जारी रखी. जब केंद्र सरकार ने तीनों कृषि कानूनों को वापस लेने का काम किया तो भी राकेश टिकैत ने कहा, ‘जब तक एमएसपी की गारंटी नहीं दी जाएगी, तब तक आंदोलन वापस नहीं होगा.’

राकेश टिकैत सम झदार नेता हैं. वे खेतीबारी से जुड़े हैं. उन्हें पता है कि किसान की उपज का लाभ बिचौलिए खा रहे हैं. किसान की पहली परेशानी खेती की उपज का सही दाम नहीं मिलना है. अगर एमएसपी यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य की गारंटी सरकार दे तो ही किसानों को सही मूल्य मिल सकेगा.

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किसान सरकार से सही कीमत के लिए लड़ सकता है. अगर मंडी निजी क्षेत्रों में चली गई, तो किसान वहां अपनी लड़ाई नहीं लड़ पाएगा. ऐसे में एमएसपी पर गांरटी सब से जरूरी है.

किसानों से जुड़ी जनता

राकेश टिकैत नेता नहीं, बल्कि एक किसान हैं. यही वजह है कि वे दूसरे नेताओं जैसे दांवपेंच के माहिर नहीं हैं. वे 2 बार चुनाव लड़े और दोनों ही बार हार गए. इस हार को ले कर उन की आलोचना होती है और उन्हें कभी देश के किसानों का नेता नहीं माना गया.

इस के बाद भी राकेश टिकैत ने कभी इन बातों की परवाह नहीं की. वे किसानों के हित में अपनी आवाज को बुलंद करते रहे. कृषि कानूनों के विरोध में चले आंदोलन में भी उन्हें वजनदार नेता नहीं माना गया था, पर धीरेधीरे वे किसान आंदोलन की धुरी हो गए.

यही वजह है कि किसान आंदोलन में राकेश टिकैत ने किसी भी सियासी पार्टी के नेताओं को आगे नहीं आने दिया. इस में उन्होंने केवल किसानों को ही जोड़ा और आंदोलन को मजबूत बनाया.

साल 2022 में उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव है. किसान आंदोलन के चलते किसान सरकार से नाराज चल रहे थे. केंद्र सरकार की ‘किसान सम्मान निधि’ से भी किसान खुश नहीं थे, जिस की वजह से किसान और गांव के रहने वालों ने उत्तर प्रदेश के पंचायत चुनावों में भाजपा को हराने का काम किया.

राकेश टिकैत की दूसरी बड़ी कामयाबी यह थी कि जब वे जहांजहां जाते थे, तो कृषि कानूनों के साथसाथ बढ़ रही महंगाई, बेरोजगारी पर बात करते थे. वे आंदोलन कर रहे लोगों

का समर्थन करते थे, खुल कर और पूरी बेबाकी से सरकार के खिलाफ बोलते थे, जिस की वजह से किसानों और गांव के लोगों के साथसाथ आम शहरी लोगों का भी समर्थन उन्हें मिलने लगा था.

राकेश टिकैत आम लोगों को किसानों की परेशानियों से जोड़ने लगे, जिस में कृषि कानूनों के अलावा महंगाई, खाद, डीजल, पैट्रोल और छुट्टा जानवरों की परेशानियां थीं. मीडिया में जितना कोई नेता नहीं छप रहा था, उस से कहीं ज्यादा जगह किसान आंदोलन को मिलने लगी.

सरकार की परेशानी की वजह यह थी कि किसान के मुद्दे सुर्खियां बन रह रहे थे. किसान आंदोलन को तमाम कोशिशों के बाद भी खालिस्तानी या देश विरोधी साबित नहीं किया जा सका. इतना ही नहीं, यह किसान आंदोलन धर्म के मुद्दे को भी प्रभावित कर रहा था. इस से यह डर लगने लगा था कि यह एक साल चल गया और इस से ज्यादा चला तो धर्म की राजनीति पिटने लगेगी. लोग धर्म से ज्यादा किसान राजनीति की बात करने लगे थे.

झुके भी पर हटे नहीं

किसान आंदोलन की राह में 2 बड़े मोड़ आए थे, जब लगा कि अब किसान आंदोलन खत्म करने का रास्ता सरकार को मिल गया. राकेश टिकैत ऐसे मुद्दों पर  झुकते दिखे, पर आंदोलन से पीछे नहीं हटे. लालकिले की घटना के बाद सारे किसान नेता आंदोलन छोड़ कर पीछे हट गए, इस के बाद भी राकेश टिकैत डटे रहे.

दूसरी घटना उत्तर प्रदेश के लखीमपुर खीरी में घटी, जहां 4 किसानों को कार से कुचल कर मार दिया गया. राकेश टिकैत ने  झुक कर सरकार और प्रशासन की बात को माना, लेकिन यह साफ कर दिया कि किसान आंदोलन चलता रहेगा.

लोगों को लग रहा था कि सरकार इस की आड़ ले कर किसान आंदोलन को तोड़ देगी. राकेश टिकैत की कामयाबी यह थी कि उन्होंने किसान आंदोलन को हिंसक नहीं होने दिया.

यही वजह है कि किसानों की ताकत के आगे हिंदुत्व की ताकत कमजोर पड़ने लगी. पौराणिक सोच रखने वाले नेताओं को लगा कि किसान आंदोलन कहीं हिंदुत्व के मुद्दे को कमजोर न कर दे. कोई अलग धारा न बन जाए. इस से बेहतर है कि कृषि कानूनों को खत्म किया जाए.

साल 2022 में पंजाब और उत्तर प्रदेश के चुनावों को बहाना बना कर इस काम को किया गया, जिस से जनता को यह चुनावी स्टंट ही सम झ आता रहे. धर्म की हार की बात सामने ही न आ सके.

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राकेश टिकैत ने किसान आंदोलन में मंदिरों की भूमिका पर सवाल उठाए थे. ऐसे में किसान और धर्म आमनेसामने न आ जाएं और धर्म को नुकसान न हो, इस कारण कृषि कानूनों को वापस ले लिया गया. इस का श्रेय किसानों की एकजुटता को जाता है, जो अपने बलबूते लड़ाई लड़ते रहे और जीत हासिल की.

किसान की एक नजर खेती पर और दूसरी राजनीति पर – राकेश टिकैत, किसान नेता कृषि कानूनों के वापस होने के बाद पहली बार राकेश टिकैत उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ आए और इको गार्डन धरना स्थल पहुंच कर अपनी राय रखी. कुछ सवालों के जवाब उन्होंने अपने ही अंदाज में दिए :

कृषि कानूनों के वापस होने के बाद किसान आंदोलन को क्या खत्म माना जा रहा है?

किसान आंदोलन खत्म नहीं हुआ है. हमारा आंदोलन चलता रहेगा. यह आंदोलन अब पूरे देश में चल रहा है. किसानों ने तय किया है कि जब तक एमएसपी पर सरकार कानून बना कर गांरटी नहीं देगी, तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा.

सारे देश के किसानों को एमएसपी के जरीए खेती की उपज की सही कीमत दिलानी है. एमएसपी का फायदा पूरे देश के किसानों को मिलना चाहिए. पहले सरकार यह गांरटी दे.

क्या कृषि कानूनों के वापस लेने के पीछे उत्तर प्रदेश और पंजाब के विधानसभा चुनाव हैं?

किसान देश की सब से बड़ी ताकत है. कृषि कानूनों को वापस ले कर सरकार ने केवल एक मांग मानी है. किसानों के लिए जरूरी है कि उन की दूसरी मांगें भी मानी जाएं. किसान आंदोलन में सैकड़ों किसान शहीद हुए हैं. हम अपने किसान भाइयों के बलिदान को बेकार नहीं जाने देंगे.

किसान के लिए खाद, बीज, सिंचाई, डीजल, पैट्रोल की कीमतें और खेती की उपज की सही कीमत दी जाए, जिस से उन्हें राहत मिले. छुट्टा जानवरों की परेशानी से नजात दिलाई जाए.

इस आंदोलन को तकरीबन एक साल हो गया है. आप ने किसानों को कैसे इस आंदोलन से जोड़ कर रखा?

सरकार किसानों की जमीन बड़ी कंपनियों को देने की तैयारी में थी. यह बात किसान सम झ गया था. किसान कभी भी अपने सम्मान का सौदा नहीं कर सकता. कंपनी का राज आने से किसान ही नहीं, बल्कि दूसरे लोग भी परेशान होते. जनता की रोटी बड़े लोगों की तिजोरी में कैद हो जाती. यह बात किसान सम झ गए हैं. इस के साथ में शहरी लोग भी सम झ गए हैं, तभी पूरे देश में किसान आंदोलन को समर्थन मिलने लगा.

सरकार लोगों को लड़ाने और तोड़ने का काम करती है. इन लोगों ने आंदोलन में शामिल हुए सिख समाज के लोगों को खालिस्तानी बता दिया और मुसलमानों को पाकिस्तानी. उत्तर प्रदेश के किसानों को केवल जाट बता दिया.

इन्होंने उत्तर प्रदेश के भीतर हिंदूमुसलिम दंगे कराए. ये लोग हरियाणा के अंदर गए तो वहां जाट और गैरजाट की राजनीति की. गुजरात के भीतर पटेल और गैरपटेल की राजनीति की.

इस तरह की घटनाओं के पीछे किस तरह के लोगों की सोच आप को दिखती है?

हम तो किसानों को यही सलाह देते हैं कि आरएसएस के लोग बेहद खतरनाक हैं. इन से बच कर रहो. बहुत से लोग सोचते हैं कि उन का बेटा पढ़लिख कर कलक्टर बनेगा. अब ऐसा नहीं होगा.

सरकार ने पिछले दरवाजे से बिना परीक्षा के ही आईएएस बनाने की तैयारी कर ली है. बिना परीक्षा के ही लगभग 40 लोगों को आईएएस बना दिया गया है, अभी 300 के करीब और बनेंगे.

किसानों को सजग रहना चाहिए. अपनी एक आंख दिल्ली पर तो दूसरी आंख खेती पर रखें. उत्तर प्रदेश सरकार गुंडागर्दी कर रही है. जिला पंचायत के चुनाव में सब ने देखा है. अब विधानसभा चुनाव में भी यही हो सकता है.

अखिलेश और जयंत क्या गुल खिलाएंगे!

आगामी 2022 में उत्तर प्रदेश में चुनावी समर कि अब रणभेरी बजने वाली है कि उससे पहले चुनावी बिसात का बिछना शुरू हो गया है. जिसमें सबसे पहले बाजी मारी है समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव और राष्ट्रीय लोक दल पार्टी के जयंत चौधरी ने. इन दोनों युवा नेताओं की युति जैसे ही एक मंच पर आई उत्तर प्रदेश की राजनीति मैं मानो एक भूचाल सा आ गया. प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी उनकी भारतीय जनता पार्टी और दूसरी तरफ अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की नैया पार लगाने के लिए बेताब प्रियंका गांधी बड़े ही गंभीर भाव से इस गठबंधन को लेकर के गंभीर दिखाई दे रहे हैं.

परिणाम स्वरूप उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक ऐसा माहौल बनता दिखाई दे रहा है जिसमें अखिलेश यादव और जयंत चौधरी धीरे धीरे आगे बढ़ते दिखाई दे रहे हैं. क्योंकि उनकी रैली में जिस तरह लोगों की भीड़ उमड़ रही है वह अपने आप में संकेत दे रही है कि कुछ नया गुल खिलने जा रहा है. दूसरी तरफ योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्रित्व काल में उत्तर प्रदेश ने जो नए आयाम गढ़े हैं उनके पक्ष में कहा जा सकता है कि आने वाले चुनाव में जहां योगी आदित्यनाथ का व्यक्तित्व और उनके काम करने की शैली और साथ देश के भविष्य को देखते हुए राजनीति की सत्ता किस करवट बैठेगी यह सब देखने लायक होगा. इस बीच प्रियंका गांधी कांग्रेस के लिए जो राजनीतिक बिसात बिछाई है वह भी कम दिलचस्प नहीं है उन्होंने यह घोषणा करके सभी को चकित कर दिया है कि कांग्रेस अबकी बार अपने दम पर चुनाव लड़ने जाएगी.

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इस रिपोर्ट में हम आपको कुछ ऐसे तथ्य बताने जा रहे हैं जो आपको चकित कर देंगे की उत्तर प्रदेश की राजनीति में क्या कुछ ऐसा भी होने जा रहा है जो किसी ने कभी कुछ सोचा ही नहीं था.

ऐसा भी होगा, किसने सोचा था?

कहते हैं, राजनीति में कभी कोई ना हमेशा के लिए मित्र होता है और ना ही हमेशा के लिए बैरी या शत्रु. यह तथ्य बारंबार भारतीय राजनीति के चरित्रों में भी हमने देखा है.

अखिलेश यादव समाजवादी पार्टी के प्रथम पंक्ति के नेता हैं जो एक समय मुख्यमंत्री रहे हैं और जिनके पास मुलायम सिंह यादव की राजनीतिक थाती है. जब आप मुख्यमंत्री थे उस समय काल को याद करें तो उस दरमियान समाजवादी पार्टी के विशाल कुनबे में जो महाभारत हुआ उसके परिणाम स्वरूप समाजवादी पार्टी का उत्तर प्रदेश से सूपड़ा साफ हो गया.  दूसरी तरफ बहुजन समाज पार्टी की  राष्ट्रीय पहचान मायावती ने एक समय में मुख्यमंत्री के रूप में जिस तरीके से सत्ता का संचालन किया तो जन भावना उनके विपरीत हो गई. फलस्वरूप आप भी राजनीति की मुख्यधारा से हाशिए पर चली गई.

ऐसे में और क्या नया होना था आखिर भाजपा के सामने पूरा मैदान खाली था. प्रदेश में भारी बहुमत के साथ, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और योगी की छवि के बूते  योगी आदित्यनाथ की सरकार आ गई मगर 5 वर्षों के कार्यकाल में योगी आदित्यनाथ की छवि जहां एक  कार्यशील शख्सियत की है वहीं दूसरी तरफ अतिवाद के कारण लोगों में नाराजगी भी देखी जा रही है.

परिवर्तन देश की जनता की फितरत है चाहे कितना ही अच्छा हो जनता सत्ता को ताश के पत्तों की तरह फेंटती रहती है. इन परिस्थितियों के बीच यह कहना आसान नहीं की आगामी चुनाव में उत्तर प्रदेश में क्या होने जा रहा है मगर एक आम वोटर और नागरिक होने के नाते उत्तर प्रदेश का आम मतदाता यह भली-भांति जानता है कि चुनाव में वोट किस करवट बैठने जा रहा है.

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समाजवादी और लोकदल

अखिलेश यादव राजनीति के मैदान में एक मंजे हुए खिलाड़ी के रूप में उत्तर प्रदेश में अब अपना स्थान बना चुके हैं. दरअसल, कोई भी शख्स जब 5 वर्ष तक मुख्यमंत्री रह लेता है तो वह प्रदेश की नब्ज को बहुत कुछ समझने लगता है और जब कोई शख्स 5 साल तक सत्ता में रहने  के बाद सत्ता से बाहर हो जाता है और लोगों के बीच रहता है तो वह कमजोर नहीं होता. अखिलेश यादव के साथ भी कुछ ऐसा ही है इन दिनों प्रदेश में जो राजनीतिक हवाएं चल रही हैं उसमें अखिलेश यादव का हंसमुख चेहरा और जयंत चौधरी की गंभीर मुद्रा नया गुल खिलाने के लिए तैयार है. जिस तरीके से इनकी रैलियों में लाखों लोग जुट रहे हैं और इन नेताओं को सुन रहे हैं उससे भारतीय जनता पार्टी और उनके प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी भी चिंतित है. यही कारण है कि उन्होंने समाजवादी पार्टी की लाल टोपी पर तल्ख टिप्पणी करते हुए उसे प्रदेश के लिए खतरा बताया है. अब देखना यह रोचक होगा  कि “लाल टोपी” भाजपा के लिए खतरा है अथवा योगी आदित्यनाथ के लिए या फिर नरेंद्र दामोदरदास मोदी के लिए.

बोल कि लब “आजाद” हैं तेरे

यह सब इसलिए कि अपनी चिर परिचित शैली से अलग इन दिनों गुलाम नबी आजाद जिन्हें कभी मजाक में काग्रेस का “गुलाम” कहा जाता था अब खुलकर  रेलिया कर रहे हैं और कांग्रेस के खिलाफ अप्रत्यक्ष रूप से व्यंग बाण चला रहे हैं.

परिणाम स्वरूप उनकी रैलियों में भारी भीड़ जुट रही है वही कांग्रेस आलाकमान के लिए यह एक चिंता का सबब बना हुआ है. लेकिन इन सबके बीच देश की सत्ता संभाल रही भारतीय जनता पार्टी और उसका आलाकमान जम्मू कश्मीर में शायद राजनीति की चौपड़ पर एक नया इतिहास लिखने के लिए बेताब है.

वहयह भली भांति जानता है कि भाजपा अकेले दम जम्मू कश्मीर में सत्ता नहीं वरण कर सकती ऐसे में गुलाम नबी आजाद की गलबहियां उसे रास आएंगी.

इधर, कांग्रेस आलाकमान अपने ही पैरों में कुल्हाड़ी मारता हुआ दिखाई दे रहा है जिस तरीके से पंजाब में अमरिंदर सिंह जैसे बड़े कद के राजनीतिक हस्ती को कांग्रेस ने घर बैठे बाहर का रास्ता दिखा करके कांग्रेस को कमजोर किया, जैसा आंध्र प्रदेश में जगन मोहन रेड्डी के साथ और पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस की स्थापना से पहले ममता बनर्जी के साथ शायद वही इतिहास की इबादत दोबारा लिखने के लिए कांग्रेस का भविष्य जम्मू कश्मीर में भी गुलाम नबी आजाद को बाहर का रास्ता दिखाने के लिए लालायित है.

इन सब परिस्थितियों के बाद क्या जम्मू कश्मीर भी कांग्रेस के हाथों से बाहर नहीं निकल जाएगा?

आज हम इस रिपोर्ट में जम्मू कश्मीर की सियासी हलचल को लेकर के आपके समक्ष इस रिपोर्ट में कुछ महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा कर रहे हैं जो यह बताएगा कि क्या गुलाम नबी आजाद के “आजाद लब” जम्मू कश्मीर की राजनीति में कुछ नयी आवाज बुलंद करने जा रहे हैं. आगामी परिसीमन के बाद जब चुनाव होंगे तो क्या मुख्यमंत्री के रूप में गुलाम नबी आजाद शपथ लेंगे.

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गुलाम नबी आजाद की “आजादी”

राजनीतिक जानकार यह अच्छी तरह जानते हैं कि गुलाम नबी आजाद कांग्रेस के एक ऐसे चेहरे हैं जो इंदिरा गांधी, राजीव गांधी के बाद अब सोनिया गांधी और राहुल के साथ भी घुले मिले हुए हैं. इस सब के बावजूद कांग्रेस पार्टी में “जी 123” का जो एक अलग कॉकस सामने आया है इसमें गुलाम नबी आजाद की उपस्थिति यह दर्शाती है कि उनके नाम में आरंभ भले ही गुलाम शब्द से होता है मगर वह हृदय से एक आजाद तबीयत के शख्स है. यही कारण है कि उन्होंने एक कर्तव्यनिष्ठ सच्चा कांग्रेसी होने के नाते कांग्रेस आलाकमान को आगाह किया कि अगर कांग्रेस को देश का नेतृत्व संभालना है तो पार्टी को महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए. मगर कांग्रेस ने इन सब चीजों को नकारा, अब हालात यह है कि जम्मू-कश्मीर में आजाद 4 दिसंबर तक लगातार  रैलियां करते रहे उनमें भारी भीड़ भी जुटती रही.यहां  स्पष्ट दिखाई दिया कि किस तरह गुलाम नबी आजाद को जम्मू कश्मीर की आवाम अपना समर्थन दे रही है. उन्होंने अपने विभिन्न भाषणों में कुछ महत्वपूर्ण बातें कही है और राजनीतिक संकेत भी दिए हैं जिनसे यह स्पष्ट होता है कि जहां वे कांग्रेस के प्रति आक्रामक है वहीं भाजपा के प्रति नरम दिखाई दे रहे हैं . नरेंद्र मोदी  देश की सरकार ने सबसे बड़ी रियासत जम्मू-कश्मीर को दो भागों में बांट दिया और केंद्र शासित राज्य बना दिया. इस पर आजाद अब मौन हैं.

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दूसरी तरफ उनके खासम खास सारे बड़े नेता कांग्रेस को आंख दिखाते हुए पार्टी को लगातार छोड़ रहे हैं जिसका स्पष्ट संकेत यह है कि आने वाले समय में आजाद एक नई पार्टी का आगाज करने वाले हैं.

ममता बनर्जी का “कांग्रेस” उखाड़ो अभियान

पी .के . अर्थात प्रशांत किशोर जिन्हें आज भारतीय राजनीति की शतरंज का बाजीगर या चाणक्य कह सकते हैं- विक्रम और बेताल किस्से की तरह  आज देश की बहुचर्चित महिला नेत्री मुख्यमंत्री पश्चिम बंगाल की पीठ पर बैठकर राजनीतिक सत्ता के प्रश्नों में ममता बनर्जी को कुछ इस तरह उलझाने कहें सुलझाने में लगे हैं कि देश में एक उथल-पुथल का दौर चल पड़ा है.

प्रशांत किशोर के सानिध्य में ममता बनर्जी अब देश की सबसे बड़ी राजनीतिक हस्ती बतौर विपक्ष का केंद्र बनना चाहती हैं. प्रशांत किशोर का सीधा साधा गणित  है कि 2014 के बाद जिस तरह अधिकांश चुनाव में कांग्रेस खेत रही है ऐसे में कांग्रेस का विकल्प आज के समय में तृणमूल कांग्रेस ही है. जिस तरीके से पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी को सत्ता से हटाने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी और गृहमंत्री अमित शाह ने शतरंज की बाजी बतौर राजनीतिक खेल खेला था उसमें ममता बनर्जी का जीतकर के सामने आना अद्भुत चमत्कारी कहानी जैसा है.

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हर कोई यही मान रहा था कि नरेंद्र मोदी के चक्रव्यूह में फंसकर के ममता बनर्जी राजनीति से हाशिए में जाना तय है. भाजपा हर हालात में पश्चिम बंगाल पर अपना  झंडा फहराएगी. ममता बनर्जी के तेवर  कुछ देश के मिजाज के कारण भाजपा तिनके की तरह उखड़ कर उड़ गई.

आज के हालात में आगामी 2024 के संसदीय चुनाव के मद्देनजर ममता बनर्जी कि यह राजनीतिक महत्वाकांक्षा जागृत हो चुकी है की कांग्रेस का विकल्प सिर्फ तृणमूल कांग्रेस है. और भाजपा को सीधी चुनौती सिर्फ और सिर्फ ममता बनर्जी इस देश में दे सकती हैं.

इस महत्वपूर्ण विषय पर आज हम इस रिपोर्ट में कुछ ऐसे प्रश्नों को आपके समक्ष रख रहे हैं जिसकी बिनाह पर आप यह तय कर सकते हैं कि क्या सचमुच ममता बनर्जी नरेंद्र दामोदरदास मोदी और भाजपा के कद को बौना साबित करने में सफल हो सकती है. अथवा ममता बनर्जी की महत्वकांक्षा के कारण एक बार फिर नरेंद्र दामोदर दास मोदी को सफलता मिल जाएगी.

सुब्रमण्यम स्वामी का सर्टिफिकेट!

ममता बनर्जी ने जिस तरीके से अखिल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अध्यक्ष सोनिया गांधी को चुनौती दी है वह अपने आप में प्रासंगिक  है.

यही कारण है कि जहां उन्हें सुब्रमण्यम स्वामी जैसे उथल-पुथल मचाने वाले राष्ट्रीय व्यक्तित्व ने एक तरह से छवि बनाने में मदद की है, वहीं महाराष्ट्र में राजनीति के शरद पवार ने भी साथ खड़ा होने का संकेत दे दिया है.

दरअसल, कांग्रेस आज जिस तरीके से अपने ही मकड़जाल में उलझी हुई है वह एक संक्रमण का समय कहा जा सकता है. कांग्रेस राहुल और सोनिया गांधी के बीच झूल रही है, राहुल गांधी किसी पद पर नहीं होने के बावजूद हर एक मुद्दे पर बोल रहे हैं और अपना डिसीजन दे रहे हैं. प्रियंका गांधी उत्तर प्रदेश में कुछ नया करना चाहती है. दूसरी तरफ कांग्रेस के  बड़े चेहरे कपिल सिब्बल, गुलाम नबी आजाद जैसे 23 नेता अपना एक अलग राग अलाप रहे हैं डफली बजा रहे हैं. परिणाम स्वरूप कांग्रेस की स्थिति लंबे राजनीतिक समय काल में सबसे कमजोर स्थिति में आ चुकी है कांग्रेस कुछ थकी हुई और उलझी हुई दिखाई दे रही है. भाजपा को जिस तरीके से घात प्रतिघात एक विपक्ष के द्वारा दिया जाना चाहिए कांग्रेस उसमें कमतर बनी हुई है.

ऐसे में निसंदेह राजनीतिक महत्वाकांक्षा  जागृत होनी ही है और यह समय की मांग भी कही जा सकती है. ममता बनर्जी ने जिस तरीके से विपक्ष के गठबंधन पर सवाल उठा दिया है और ताल ठोक के भाजपा और नरेंद्र दामोदरदास मोदी के खिलाफ बिगुल बजाया है उससे सबसे ज्यादा सकते में कोई है तो वह कांग्रेस पार्टी ही है. क्योंकि यह सीधे-सीधे उसे चुनौती मिल रही है की सत्ता सिंहासन खाली करो की ममता बनर्जी आ रही है!

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शायद यही कारण है कि कांग्रेस आज मुखर हो करके ममता बनर्जी पर हमला कर रही है. मगर आने वाले समय में अगर कांग्रेस ने अपने आप को अपनी जमीन पर मजबूती से खड़े होकर के अपनी “ताकत” नहीं दिखाई तो उसे उखड़ कर ममता बनर्जी को अथवा अरविंद केजरीवाल को रास्ता देना होगा, यह समय की मांग बन जाएगी.

देश की राजनीति में कई कई बार उथल-पुथल मचाने वाले और एकला होते हुए भी अपने अस्तित्व को एक राष्ट्रीय पार्टी की ताजा प्रदर्शित करने वाले सुब्रमण्यम स्वामी ने एक बड़ी गहरी बात कही है की राजनीतिक इतिहास में उन्होंने – जयप्रकाश नारायण, चंद्रशेखर, राजीव गांधी पीवी नरसिम्हा राव और मोरारजी  भाई देसाई जैसा कथनी और करनी में आज की राजनीति में किसी को पाया है तो वह ममता बनर्जी है.

सुब्रमण्यम स्वामी का यह सर्टिफिकेट ममता बनर्जी के लिए बहुत काम आने वाला है. क्योंकि आज की राजनीति में सबसे बड़ा संकट कथनी और करनी का ही है. ममता बनर्जी जिस तरीके से सादगी पूर्ण जीवन जी रही है वह देश की जनता को अपील करता है और अपनी और आकर्षित करता है उनमें महात्मा गांधी और इंदिरा गांधी जैसे व्यक्तित्व की छाप दिखाई देती है. आने वाले समय में जिस तरीके से तृणमूल कांग्रेस राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पैठ बनाने में लगी हुई है उसका सकारात्मक परिणाम भी आ सकता है कि भारतीय जनता पार्टी केंद्र से उखड़ जाए तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए.

झारखंड का बिहारीकरण: बोली के जरिए तकरार

बिहार और ?ारखंड के बीच एक नया विवाद शुरू हो गया है. इस इलाकाई कार्ड के विवाद की आग को शुरू किया ?ारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन ने और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने उसे हवा दे दी है.

हेमंत सोरेन ने यह कह कर बवाल मचा दिया कि ?ारखंड में रहने वाले मगही और भोजपुरी बोलने वाले दबंग हैं और वे लोग ?ारखंड का बिहारीकरण कर रहे हैं, जिसे किसी भी हाल में बरदाश्त नहीं किया जाएगा.

वहीं नीतीश कुमार ने हेमंत सोरेन पर पलटवार करते हुए कहा कि सियासी फायदा उठाने के लिए ऐसी बयानबाजी से बचना चाहिए. इस के बाद बिहार और ?ारखंड के कई नेताओं ने एकदूसरे के खिलाफ जहर उगलना शुरू कर दिया है.

गौरतलब है कि मार्च, 2018 में उस समय की भाजपा सरकार ने मगही, भोजपुरी, मैथिली और अंगिका को दूसरी भाषा का दर्जा दिया था. अब हेमंत सरकार ने भाजपा की रोजगार नीति को पलट दिया है और ?ारखंड स्टेट सर्विस कमीशन में क्वालिफाइंग के लिए इन चारों भाषाओं को हटा दिया है.

इस मसले पर हेमंत सोरेन कहते हैं कि पहले की सरकार ने ऐसी बहाली नीति बना रखी थी, जिस से लोकल लोगों से ज्यादा बाहरी लोगों को मौका मिलता था. ?ारखंड राज्य आदिवासियों और स्थानीय लोगों की तरक्की के लिए बना था, न कि मगही और भोजपुरी बोलने वालों के लिए. बिहार और भोजपुरी व मगही भाषा के खिलाफ मोरचा खोल कर हेमंत सोरेन ने स्थानीयता का कार्ड खेला है.

हेमंत सोरेन यहीं नहीं रुकते हैं, बल्कि वे भोजपुरी और मगही बोलने वालों पर यह आरोप लगा देते हैं कि जब अलग ?ारखंड राज्य बनाने की लड़ाई चल रही थी, तो भोजपुरी और मगही बोलने वाले आदिवासियों को गंदीगंदी गालियां देते थे और आदिवासी औरतों के साथ गलत बरताव करते थे. इस से उन के मन में भोजपुरी और मगही वालों के खिलाफ काफी गुस्सा है.

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3 करोड़, 30 लाख की आबादी वाले ?ारखंड राज्य में भोजपुरी और मगही बोलने वालों की आबादी तकरीबन साढ़े 6 फीसदी है, वहीं आदिवासियों की तादाद 26 फीसदी है. हिंदी के अलावा बंगला, नागपुरी, खोरठा, पंचपरगनिया, कुट्टमाली, कुडुख, संथाली, मुंडारी, हो वगैरह बोलियां बोली जाती हैं.

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भाषा के इस बवाल के बारे में कहते हैं कि बिहार और ?ारखंड तो भाईभाई हैं. ऐसे मसलों पर सोचसम?ा कर बोलना चाहिए. अगर इस से किसी को सियासी फायदा मिलता है तो ले ले, लेकिन ऐसे मसलों से दूर ही रहना चाहिए.

पिछले दिनों हेमंत सोरेन ने कह दिया कि भोजुपरी और मगही उधर की भाषा है और इसे बोलने वाले लोग ?ारखंड को बिहार बनाना चाहते हैं. ?ारखंड पर कब्जा करना चाहते हैं. स्थानीय भाषा पर ये दोनों बाहरी भाषाएं हावी हैं. अब समय आ गया है कि ?ारखंड की तरक्की के लिए लोकल भाषाओं को बढ़ावा दिया जाए.

ऐसा नहीं करने से आदिवासी राज्य और इलाकाई बोलियों का वजूद ही खत्म हो जाएगा. दिलचस्प बात यह है कि हेमंत सोरेन की पढ़ाई पटना में हुई है और वे खुद अच्छीखासी मगही बोल लेते हैं.

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हेमंत सोरेन से पहले ?ारखंड के मुख्यमंत्री रहे रघुवर दास कहते हैं कि हेमंत सोरेन की नीति ‘बांटो और राज करो’ की रही है. चुनाव से पहले उन्होंने  बढ़चढ़ कर ऐलान किया था कि 5 लाख लोगों को नौकरी दी जाएगी.

मुख्यमंत्री अपने वादे को भूल गए हैं. अब जनता का ध्यान भटकाने के लिए वे ऐसा बचकाना बयान दे रहे हैं. मुख्यमंत्री को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे केवल आदिवासियों के मुख्यमंत्री नहीं हैं, बल्कि ?ारखंड की साढ़े 3 करोड़ जनता के सेवक हैं.

हेमंत सरकार के वित्त मंत्री रामेश्वर उरांव आग में घी डालते हुए कहते हैं कि क्या बिहार में संथाल और उरांव भाषा को मान्यता दी जाएगी? बिहार में रहने वाले संथाल और उरांव जातियों के लोगों की भाषा को सरकारी नौकरियों में मान्यता क्यों नहीं दी जाती है?

गौरतलब है कि बिहार के सहरसा, पूर्णियां, कटिहार, बांका, बेतिया और बगहा जिलों में संथाल और उरांव जातियों की बड़ी आबादी है.

बिहार भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष संजय जायसवाल कहते हैं कि ?ारखंड के मुख्यमंत्री समाज को बांटने की कोशिश में लगे हुए हैं, जो राज्य और जनता के भले के लिए नहीं है.

?ारखंड हाईकोर्ट के वकील अभय सिन्हा कहते हैं कि बिहार के पढ़ेलिखे लोग ?ारखंड सरकार में ऊंचे पदों पर कायम हैं, इसी से हेमंत सोरेन को चिंता हो रही है.

हेमंत सोरेन आदिवासियों की बेहतरीन पढ़ाईलिखाई का इंतजाम करने और उन्हें अपने पैरों पर खड़ा करने के बजाय राजनीति का कार्ड खेल रहे हैं और आदिवासियों को लौलीपौप दिखा कर सिर्फ और सिर्फ वोट बैंक मजबूत करने की फिराक में हैं.

झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन अगर आदिवासियों को पढ़ालिखा कर बाहरी लोगों के बराबर खड़ा करेंगे, तभी आदिवासियों की तरक्की होगी और बाहरी लोगों का दबदबा भी खत्म होगा.

तीन कृषि कानून: प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की गलतियां

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी के व्यक्तित्व को करीब से जानने समझने वाले यह जानते हैं कि वह एक ऐसे राजनेता हैं जो पीछे मुड़कर नहीं देखते. या फिर यह कहें की आप यह भ्रम पैदा करते हैं की उन्होंने जो कदम उठाए हैं वह अंतिम सत्य हैं. और अगर कोई आलोचना करता है या उसमें मीन मेख निकालता है तो वह स्वयं गलत है. और फिर आगे चलकर के उनके समर्थक विरोध करने वालों पर ऐसे ऐसे आरोप लगाते हैं कि मानो नरेंद्र दामोदरदास मोदी का विरोध देश का विरोध है.

यही सब कुछ बहुत ही शिद्दत के साथ 1 साल तक तीन कृषि कानून के संदर्भ में यह प्रहसन भी देश और दुनिया ने देखा है.

पहले पहल तो इन तीन कृषि कानूनों को आनन-फानन में संसद में पास करवा दिया गया. और जब इसका विरोध हुआ तो कहा गया कि नहीं जो भी हुआ है वह सब तो कानून सम्मत है. क्योंकि नरेंद्र दामोदरदास मोदी तो देश के संविधान और कानून से हटकर के कुछ करते ही नहीं है. और फिर जब इन तीन कानूनों का विरोध होने लगा तो यह कहा गया कि जो लोग जो कानून को अपने हाथ में ले  रहे हैं वह लोग तो भोले भाले हैं और विपक्ष के नेताओं का मोहरा बने हुए हैं.

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एक साल के इस लंबे विरोध और रस्साकशी के दृश्य ब दृश्य यह कहा जा सकता है कि नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने प्रधानमंत्री की हैसियत से अपने संपूर्ण कबीना और उनकी भारतीय जनता पार्टी ने हर कदम कदम पर यह सिद्ध करने की कोशिश की कि किसानों के लिए लाया गया यह कानून हर दृष्टि से किसानों के हित में है. क्योंकि यह सरकार किसानों के हित के अलावा कुछ देख ही नहीं रही है. और जो कुछ चुनिंदा लोग विरोध कर रहे हैं वह तो आतंकवादी हैं! वह तो भटके हुए लोग हैं !! बहुसंख्यक किसान तो उनके  साथ हैं ही नहीं. क्योंकि यह कुछ चुनिंदा लोग ही आंदोलन कर रहे हैं इस तरह की भ्रामक बातें हैं. शायद देश के राजनीतिक परिदृश्य में किसानों के संदर्भ में पहली बार सभी ने देखा और नरेंद्र मोदी और भाजपा के कट्टर समर्थक रात दिन यही गीत गाते रहेगी जो लोग सिंघु बॉर्डर पर और अन्य जगहों पर मोर्चा संभाले हुए हैं वे लोग तो देशद्रोही हैं.

प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी की यही गलती बहुत बड़ी गलतियां बन गई है. अब उन्हें न तो खाते बन रहा है ना निगलते. उन्होंने जिस तरीके से आनन-फानन में कृषि कानूनों को वापस लेने की घोषणा की है वह भी उनके गले की फांस बन चुकी है. और अब आने वाले समय में ऊंट किस करवट बैठेगा यह भारत की जनता तय करने वाली है.

गलती दर गलती

3 कृषि कानूनों के संदर्भ में अगर हम विवेचना करें तो देखते हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र दामोदरदास मोदी ने  ऐतिहासिक गलतियां ही गलतियां की हैं. पहली गलती तो किसानों को विश्वास में लिए बगैर कानून बना देना है.

दूसरी गलती विपक्ष को अपने विश्वास में लिए बगैर तीन कृषि कानूनों को संसद में पास करवाना उनका एक ऐसा कारनामा है जो एक बहुत बड़ी गलती है.

और तीसरा- जिस तरीके से उन्होंने अचानक कृषि कानूनों को वापस ले लिया है यह भी एक बहुत बड़ी गलती है. राजनीतिक और सामाजिक प्रेक्षकों का कहना है कि 19 नवंबर गुरु नानक जयंती के पावन अवसर पर जिस तरीके से अचानक सुबह-सुबह प्रधानमंत्री नरेंद्र  दामोदरदास मोदी ने कृषि कानूनों को टीवी पर आ कर के वापस लेने की घोषणा की. उससे अच्छा यह होता कि वह अचानक किसानों के बीच चले जाते और उनसे संवाद करते हुए सौहार्दपूर्ण माहौल में इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर देते.

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अथवा दूसरा पक्ष यह हो सकता था कि किसान नेताओं की एक बैठक आयोजित की जाती और उसमें प्रधानमंत्री जी उन सब की बात को सुनते हुए इन कानूनों को वापस लेने की घोषणा कर सकते थे. तीसरा देश की विपक्षी पार्टियों के नेताओं के साथ बैठक करके भी वे अपनी बात को देश की जनता के सामने रख सकते थे. जिसका निसंदेह सकारात्मक प्रभाव जाता. मगर जिस तरीके से उन्होंने अचानक टीवी पर अवतरण लेकर  घोषणा की है उससे फजीहत ही हो रही है . लोगों को मौका मिल गया है उन्हें चारों तरफ से घेर कर के मानो अभिमन्यु बना चुके हैं. अब देखना यह है कि आज के भारत के महाभारत में आधुनिक अभिमन्यु का  क्या हश्र होने वाला है. नरेंद्र मोदी की सबसे बड़ी गलती यह है कि वह सबको साथ लेकर के चलने में बहुत पीछे रह जाते हैं परिणाम स्वरूप उन्हें जिस तरीके से आलोचना का सामना करना पड़ रहा है वह उनकी छवि, उनके कार्यकाल और भारत की जनता के लिए भी दुर्भाग्य जनक है.

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