बदनाम गली : राजू क्यों गया था वेश्या के पास

‘‘हर माल 10 रुपए… हर माल की कीमत 10 रुपए… ले लो… ले लो… बिंदी, काजल, पाउडर, नेल पौलिश, लिपस्टिक…’ जोर से आवाज लगाते हुए राजू अपने ठेले को धकेल कर एक गली में घुमा दिया और आगे बढ़ने लगा. वह एक बदनाम गली थी.

कई लड़कियां व औरतें खिड़की, दरवाजों और बालकनी में सजसंवर कर खड़ी थीं. कुछ लड़कियां खिलखिलाते हुए राजू के पास आईं और ठेले में रखे सामान को उलटपुलट कर देखने लगीं.

‘वह वाली बिंदी निकालो… यह कौन से रंग की लिपस्टिक है… बड़ी डब्बी वाला पाउडर नहीं है क्या…’ एकसाथ कई सवाल होने लगे.

राजू जल्दीजल्दी उन सब की फरमाइशों के मुताबिक सामान दिखाने लगा.

जब राजू कोई सामान निकाल कर उन्हें देता तो वे सब उसे आंख मार देतीं और कहतीं, ‘पैसा भी चाहिए क्या?’

‘‘बिना पैसे के कोई सामान नहीं मिलता,’’ राजू जवाब देता.

‘‘तू पैसा ही ले लेना. और कुछ चाहिए तो वह भी तुझे दे दूंगी,’’ तभी किसी लड़की ने ऐसा कहा तो बाकी सब लड़कियां भी खिलखिला कर हंस पड़ीं.

राजू ने उन लड़कियों के ग्रुप के पीछे थोड़ी दूरी पर एक दरवाजे पर खड़ी एक लड़की को देखा.

घनी काली जुल्फें, दमकता हुआ गोरा रंग, पतली आकर्षक देह. राजू को लगा कि उस ने कहीं इस लड़की को देखा है.

राजू सामान बेचता रहा, पर लगातार उस लड़की के बारे में सोचता रहा. वह बारबार उसे अच्छी तरह देखने की कोशिश करता रहा, लेकिन सामान खरीदने वाली लड़कियों के सामने रहने की वजह से अच्छी तरह देख नहीं पा रहा था.

तभी राजू ने देखा कि एक बड़ीबड़ी मूंछों वाला अधेड़ आदमी आया और उस लड़की को ले कर मकान के अंदर चला गया. शायद वह आदमी ग्राहक था.

थोड़ी देर बाद राजू सामान बेच कर आगे बढ़ गया, लेकिन वह लड़की उस के ध्यान से हट ही नहीं रही थी.

धीरेधीरे शाम होने को आई. जब वह घर के करीब एक दुकान के पास से गुजरा तो उस ने देखा कि दुकान पर रामू चाचा के बजाय उन की 10 साला बेटी काजल बैठी थी और ग्राहकों को सामान दे रही थी. यह देख उसे कुछ याद आया.

आधी रात हो गई थी. राजू अब फिर उस बदनाम गली में था. उस की आंखें उसी लड़की को ढूंढ़ रही थीं. वहां कई लड़कियां सजसंवर कर ग्राहकों के आने का इंतजार कर रही थीं. राजू को देख कर वे उस से नैनमटक्का करने लगीं.

‘‘क्या रे, तू फिर आ गया… रात को भी सामान बेचेगा क्या?’’ एक लड़की मुसकरा कर बोली.

‘‘नहीं, अब मैं ग्राहक बन कर आया हूं,’’ राजू ने कहा.

‘‘अच्छा तो यह बात है. फिर बता, तुझे कौन सी वाली पसंद है?’’ एक लड़की ने पूछा.

राजू ने जवाब दिया, ‘‘मुझे तो सब पसंद हैं, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या…? चल मेरे साथ. मुझे सब रंगीली बुलाते हैं,’’ एक लड़की ने आगे आ कर राजू का हाथ पकड़ लिया.

‘‘आज रहने दे रंगीली. मु झे तो वह पसंद है…’’ राजू ने अपना हाथ छुड़ाते हुए दिन में जिस लड़की को देखा था, उस के बारे में पूछा.

‘‘बहुत पूछ रहा है उसे. नई है न…’’ रंगीली बोली, ‘‘एक आशिक उसे ले कर कमरे में गया है. वह उस का रोज का ग्राहक है. खूब पसंद करता है उसे. तु झे चाहिए तो थोड़ी देर ठहर. वह उसे निबटा कर आ जाएगी यहीं.’’

राजू बेचैनी से उस लड़की के बाहर आने का इंतजार करने लगा.

तकरीबन आधा घंटे बाद एक ग्राहक कमरे से बाहर निकल कर एक तरफ चला गया.

कुछ देर बाद उस कमरे से एक लड़की बाहर आई और दरवाजे पर खड़ी हो गई.

राजू ने उसे देखा तो पहचान गया. वह वही लड़की थी, जिस की तलाश में वह आया था.

‘‘जा मस्ती कर. तेरी महबूबा आ गई,’’ रंगीली ने कहा.

राजू उस लड़की के पास जा कर बोला, ‘‘जब से तुम्हें देखा है, तब से मैं तुम्हारा दीवाना हो गया हूं इसीलिए अभी आया हूं.’’

‘‘तो चलो,’’ वह लड़की राजू का हाथ पकड़ कर कमरे में ले जाने लगी.

‘पुलिस… पुलिस… भागो… भागो…’ तभी जोरदार शोर हुआ और चारों तरफ भगदड़ मच गई. सभी लड़कियां, ग्राहक और दलाल इधरउधर भाग कर छिपने की कोशिश करने लगे.

थोड़ी देर में ही पुलिस ने कोठेवाली, दलाल और कई ग्राहकों को गिरफ्तार कर लिया और थाने ले गई. कई लड़कियों को पुलिस ने आजाद करा कर नारी निकेतन भेज दिया.

राजू को भी पुलिस ने उस लड़की के साथ गिरफ्तार कर लिया था, पर उस लड़की को नारी निकेतन नहीं भेजा गया. वह डर से थरथर कांप रही थी.

‘‘डरो नहीं खुशबू, अब तुम आजाद हो,’’ थाने पहुंच कर राजू ने उस लड़की से कहा.

‘‘तुम मेरा नाम कैसे जानते हो?’’ उस लड़की ने चौंक कर पूछा.

‘‘खुशबू, मेरी बेटी. कहांथी तू अब तक,’’ राजू के कुछ कहने से पहले वहां एक अधेड़ औरत आई और उस लड़की को अपने गले से लगा कर फफकफफक कर रोने लगी.

‘‘मां, मुझे बचा लो. मैं उस नरक में अब नहीं जाऊंगी,’’ खुशबू भी उस औरत से लिपट कर रोने लगी और अपनी आपबीती सुनाने लगी कि कैसे 6 महीने पहले कुछ गुंडों ने उस की दुकान के आगे से रात 9 बजे उठा लिया था और कुछ दिन उस की इज्जत से खेलने के बाद चकलाघर में बेच दिया था.

‘‘अब आप के साथ कुछ गलत नहीं होगा. सारे बदमाशों को गिरफ्तार कर मैं ने जेल भेज दिया है…’’ तभी थानेदार ने कहा, ‘‘बस आप लोगों को कोर्ट आना होगा मुकदमे की कार्यवाही को आगे बढ़ाने के लिए.’’

‘‘मैं कोर्ट जाऊंगी. उन सभी बदमाशों को सजा दिलवा कर रहूंगी जिन्होंने मेरी बेटी की जिंदगी खराब की है…’’ वह औरत आंसू पोंछते हुए बोली.

‘‘अब मेरी बेटी से कौन ब्याह करेगा?’’ खुशबू की मां ने कहा.

‘‘अब आप लोग घर जा सकते हैं. जाने से पहले इन कागजात पर दस्तखत कर दें,’’ थानेदार ने कहा तो खुशबू, उस की मां और राजू ने दस्तखत कर दिए.

‘‘पर, आप लोगों को मेरे बारे में कैसे पता चला?’’ थाने से बाहर निकल कर खुशबू ने पूछा.

‘‘यह सब राजू के चलते मुमकिन हुआ. इसी ने मुझे बताया कि तुम्हें एक कोठे पर देखा है…

‘‘फिर मैं राजू के साथ पुलिस स्टेशन गई. जहां तुझे छुड़ाने की योजना बनी,’’  खुशबू की मां बोली.

‘‘राजू मुझे कैसे जानता है?’’ खुशबू ने हैरानी से पूछा.

‘‘तुम्हारी मां की परचून की दुकान पर मैं अकसर सौदा लेने जाता था वहीं तुम्हें देखा था. तब से ही मैं तुम्हें पहचानता था. जब तुम गायब हो गईं तो तुम्हारी मां दुकान पर हमेशा रोती रहती थीं. कहती थीं कि तुम्हारे बाबा जिंदा होते तो तुम्हें ढूंढ़ लाते. लेकिन वह अकेली कहां ढूंढ़ती फिरेंगी.

‘‘आज जब मैं अपना ठेला ले कर सामान बेचने गया तो कोठे पर तुम्हें देख कर तुम्हारी मां को सब बता दिया,’’ राजू बोल पड़ा.

‘‘आप का यह एहसान मैं कभी नहीं भूलूंगी,’’ खुशबू ने रुंधे गले से शुक्रिया अदा करते हुए कहा.

तभी राजू  झिझकते हुए खुशबू की मां से बोला, ‘‘आप एक एहसान मुझ पर भी कर दीजिए.’’

‘‘कहो बेटा, मैं क्या कर सकती हूं तुम्हारे लिए?’’ खुशबू की मां ने पूछा.

‘‘मुझे खुशबू का हाथ दे दीजिए,’’ राजू अटकअटक कर बोला.

राजू की मांग सुन कर दोनों मांबेटी की आंखों में आंसू आ गए. खुशबू ने आगे बढ़ कर राजू के पैर छू लिए.

‘‘तेरे जैसा बेटा पा कर मैं धन्य हो गई. पर यह तो बता कि तुझे जातपांत का वहम तो नहीं.’’

‘‘नहीं जी, हम गरीबों की क्या जाति. हमें तो दूसरों के लिए हड्डी तोड़नी ही है. फिर यह जाति का दंभ क्यों पालें. खुशबू जो भी हो, मुझे पसंद है,’’ राजू तमक कर बोला.

नई सुबह के इंतजार में उन तीनों के कदम घर की ओर तेजी से बढ़ने लगे.

खतरा यहां भी है: महामारी का कहर

‘‘मम्मीमम्मी, आप जा रही हो? पापा को यहां कौन देखेगा?’’ राजू अपनी मम्मी को तैयार होते देख कर बोला, ‘‘पापा अकेले परेशान नहीं हो जाएंगे…’’

‘‘नहीं बेटा, वे बिलकुल परेशान नहीं होंगे,’’ मम्मी पैंट की बैल्ट कसते हुए बोलीं, ‘‘उन्हें पता है कि इस समय हमारी ड्यूटी कितनी जरूरी है. फिर तुम हो, तुम्हारी दीदी सुहानी हैं. तुम लोग उन का ध्यान रखोगे ही. खाना बना ही दिया है. तुम लोग मिलजुल कर खा लेना.

‘‘पापा होम आइसोलेशन में हैं. तुम्हें तो पता ही है कि जब तक वे पूरी तरह ठीक नहीं हो जाते, उन से दूरी बना कर रखना है, इसलिए तुम उन के कमरे में नहीं जाना. अपनी पढ़ाई करना और मन न लगे तो टैलीविजन देख लेना.’’

‘‘मन नहीं करता टैलीविजन देखने का…’’ राजू मुंह बना कर बोला, ‘‘सब चैनल में एक ही बात ‘कोरोनाकोरोना’. ऊब गया हूं यह सब सुनतेदेखते.’’

‘‘इसी से समझ लो कि कैसी परेशानी बढ़ी हुई है…’’ मम्मी राजू को समझाते हुए बोलीं, ‘‘इसलिए तो लोग बाहर नहीं निकल रहे. और तुम लोग भी घर से बाहर नहीं निकलना. घर में जो किताबें और पत्रिकाएं तुम लोगों के लिए लाई हूं, उन्हें पढ़नादेखना.’’

‘‘रचना मैडमजी, चलिए देर हो रही है…’’ ड्राइवर मोहसिन खान ने बाहर से हांक लगाई, ‘‘हम समय से थाने नहीं पहुंचे, तो इंस्पैक्टर साहब नाराज होने लगेंगे. उन की नसीहतें तो आप जानती ही हैं. बेमतलब शुरू हो जाएंगे.’’

‘‘नहीं जी, वे बेमतलब नहीं बोलते हैं…’’ रचना जीप में बैठ कर हंसते हुए बोलीं, ‘‘जब हम ही समय का खयाल नहीं रखेंगे, तो पब्लिक क्यों खयाल रखेगी, इसलिए वे बोलते हैं. हमें तो समय का, अनुशासन का सब से पहले खयाल रखना होता है.’’

जीप एक झटके के साथ आगे बढ़ी, तो रचना ने बच्चों को दूर से ही हाथ हिला कर ‘बाय’ कहा. पति रमाशंकर अपने कमरे की खिड़की से उन्हें एकटक देखे जा रहे थे.

जीप जैसे ही थाने पहुंची, रचना  उस से तकरीबन कूद कर थाने के अंदर आ गईं.

‘‘आप आ गईं… अच्छा हुआ…’’ इंस्पैक्टर हेमंत रचना को देख कर बोले, ‘‘अभी रमाशंकरजी कैसे हैं?’’

‘‘वे ठीक हैं सर,’’ रचना उन का अभिवादन करते हुए बोलीं, ‘‘होम आइसोलेशन में हैं. उन्हें समझा दिया है कि कमरे से बिलकुल बाहर न निकलें और बच्चों को दूर से ही दिशानिर्देश देते रहें. वैसे, मेरे बच्चे समझदार हैं.’’

‘‘जिन की आप जैसी मां हों, वे बच्चे समझदार होंगे ही मैडम रचनाजी…’’ इंस्पैक्टर हेमंत हंसते हुए बोले, ‘‘क्या कहें, हमारी ड्यूटी ही ऐसी है. सरकार ने ऐन वक्त पर हम पुलिस वालों की छुट्टियां कैंसिल कर दीं, जिस से मजबूरन आप को आने के लिए कहना पड़ा, वरना आप को घर पर होना चाहिए था. औरतें तो घर की ही शान होती हैं.’’

‘‘वह समय कब का गया सर,’’ रचना हंसते हुए बोलीं, ‘‘अब तो औरतें भी घर के बाहर फर्राटा भर रही हैं. तभी तो हम लोगों को भी पुलिस में नौकरी मिलने लगी है.’’

‘‘ठीक कहती हैं आप,’’ इंस्पैक्टर हेमंत जोर से हंसे, फिर बोले, ‘‘देखिए, 10 बजने वाले हैं. आप गश्ती दल के साथ सब्जी बाजार की ओर चली जाइए. वहां की भीड़ को चेतावनी देने के साथ उसे तितरबितर कराइए. मैं दूसरी गाड़ी से बड़े बाजार की ओर निकल रहा हूं.’’

‘‘ठीक है सर,’’ बोलते हुए रचना उठने को हुईं, तो वे फिर बोले, ‘‘लोगों के मास्क पर खास नजर रखिएगा. और हां, आप भी लोगों से सोशल डिस्टैंसिंग बना कर रखिएगा.’’

‘‘जरूर सर…’’ रचना बाहर निकलते हुए बोलीं, ‘‘आप भी अपना खयाल रखिएगा.’’

‘‘किधर धावा मारना है?’’ मोहसिन उठते हुए बोला, ‘‘हम चैन से बैठ भी नहीं पाते कि बाहर निकलना पड़ जाता है.’’

‘‘क्या करें, हमारी नौकरी ही ऐसी है…’’ वे बोलीं, ‘‘हमारे साथ 3 और कांस्टेबल जाएंगे.’’

तभी थाने परिसर में बनी छावनी से 2 कांस्टेबल हाथ में राइफल और डंडा उठाए आते दिखाई दिए.

‘‘क्यों हरिनारायण, ठीक तो हो न?’’ रचना उन से मुखातिब हुईं, ‘‘और रामजी, क्या हाल है तुम्हारा?’’

‘‘अब थाने की चाकरी कर रहे हैं, तो ठीक तो होना ही है,’’ रामजी हंस कर बोला, ‘‘इस लौकडाउन की वजह से बेवजह हमारा काम बढ़ गया, तो भागादौड़ी लगी ही रहती है. चलिए, किधर जाना है?’’

‘‘अरे, तुम 2 ही लोग साथ जाओगे?’’ रचना बोली ही थीं कि इंस्पैक्टर हेमंत बाहर निकल कर बोले, ‘‘अभी इन दोनों के साथ ही जाइए मैडम. आप तो जानती ही हैं कि एरिया कितना बड़ा है हमारा और कांस्टेबल कितने कम हैं. स्टेशन के पास के बाजार में ज्यादा कांस्टेबल भेजने पड़ गए, क्योंकि वह संवेदनशील इलाका ठहरा. आप तो समझ ही रही हैं. वैसे, आप ने अपना रिवाल्वर चैक कर लिया है न?’’

‘‘उस की जरूरत नहीं पड़ेगी सर…’’ वह अपने बगल में लटके रिवाल्वर पर हाथ धर कर हंसते हुए बोलीं, ‘‘यह वरदी ही काफी है भीड़ को कंट्रोल करने के लिए.’’

अपने गश्ती दल के साथ रचना बाजार की ओर बढ़ रही थीं. उन की गाड़ी देखते ही लोग अलगअलग हो कर दूरी बना लेते थे, मगर उन के आगे बढ़ते ही दोबारा वही हालत बन जाती थी.

रचना तिराहेचौराहे पर कभीकभी गाड़ी रुकवा लेतीं और अपने साथियों के साथ उतर कर सभी से एक दूरी बनाने की हिदायत देती फिरतीं. समयसीमा खत्म होने के साथ ही दुकानें बंद और सड़कें सुनसान होने लगी थीं. अब कुछ ही लोग बाहर नजर आ रहे थे, जिन्हें उन्होंने अनदेखा सा किया. वे सब थक चुके थे शायद.

थाना लौटने के पहले ही रचना का मोबाइल फोन बजने लगा था. उन्होंने फोन रिसीव किया. फोन की दूसरी तरफ से जिले के पुलिस अधीक्षक मोहन वर्मा थे, ‘आप सबइंस्पैक्टर रचना हैं न?’

‘‘जी सर, जय हिंद सर…’’ रचना सतर्क हो कर बोलीं, ‘‘क्या आदेश  है सर?’’

‘अरे, जरा तुम उधर से ही गांधी पार्क वाले चौराहे पर चली जाना,’ मोहन वर्मा रचना को बताने लगे, ‘कुछ पत्रकार बता रहे थे कि उधर लौकडाउन का पालन नहीं हो रहा है. आतेजाते लोगों और गाडि़यों पर नजर रखना और कानून व्यवस्था को दुरुस्त रखना.

‘जरूरत के हिसाब से थोड़ा सख्त हो जाना. जिन के पास उचित कागजात हों, उन्हें छोड़ कर सभी के साथ सख्ती करना. कितनी और कैसी सख्ती करनी है, यह तुम्हें समझाने की जरूरत तो  है नहीं.’

रचना की गाड़ी अब थाने के बजाय गांधी पार्क की ओर मुड़ चुकी थी. वहां भी सन्नाटा ही पसरा था. मगर कुछ गाडि़यां तेजी से आजा रही थीं.

रचना ने वहां एक साइड में रखे बैरिकेडिंग को सड़क पर ठीक कराया और हर आतीजाती गाडि़यों की खोजखबर लेने लगी थीं.

पुलिस को देखते ही एक बाइक पर सवार 2 नौजवान हड़बड़ा से गए. रचना ने उन्हें रोक कर पूछा, ‘‘कहां चल दिए? पता नहीं है क्या कि लौकडाउन लगा हुआ है?’’

‘‘सदर अस्पताल से आ रहा हूं मैडम…’’ एक नौजवान हकलाते हुए बोला, ‘‘दवा लेने गया था.’’

‘‘जरा डाक्टर का परचा तो दिखाना कि किस चीज की दवा लेने गए थे?’’

‘‘वह घर पर ही छूट गया है मैडम…’’ दूसरा नौजवान घिघियाया, ‘‘हम जल्दी में थे मैडम. हमें माफ कर दीजिए. हमें जाने दीजिए.’’

‘‘जब तुम गलत नहीं थे, तो हमें देख कर कन्नी कटाने की कोशिश क्यों की?’’ रचना सख्त हो कर बोलीं, ‘‘तुम दोनों के मास्क गले में लटके हुए थे. हमें देख कर तुम ने अभी उन्हें ठीक किया है. अपने साथ दूसरों को भी क्यों खतरे में डालते हो. अच्छा, बाइक के कागज तो होंगे ही न तुम्हारे पास?’’

‘‘सौरी मैडम, हम हड़बड़ी में कागज रख नहीं पाए थे…

‘‘और कितना झूठ बोलोगे?’’

‘‘सच कहता हूं, दोबारा ऐसी गलती नहीं होगी. कान पकड़ता हूं,’’ उस ने हरिनारायण की ओर मुसकरा कर देखा. वह उस का इशारा समझ गया और उन्हें घुड़कता हुआ बोला, ‘‘एक तो गलती करोगे और झूठ पर झूठ बोलते जाओगे. जैसे कि हम समझते ही नहीं. चलो सड़क किनारे और इसी तरह कान पकड़े सौ बार उठकबैठक करो, ताकि आगे से याद रहे.’’

अब वे दोनों नौजवान सड़क किनारे कान पकड़े उठकबैठक करने लग गए थे.

अचानक रचना ने तेजी से गुजरती कार रुकवाई, तो उस का चालक बोला, ‘‘जरूरी काम से सदर होस्पिटल गए थे मैडम. आप डाक्टर का लिखा परचा देख लें, तो आप को यकीन हो जाएगा. हमें जाने दें.’’

‘‘वह तो हम देखेंगे ही. मगर पीछे की सीट पर जिन सज्जन को आप बिठाए हुए हैं, उन के पास तो मास्क ही नहीं है. आप लोग हौस्पिटल से आ रहे हैं, तो आप को तो खास सावधानी बरतनी चाहिए. वे कोरोना पौजिटिव हैं कि नहीं हैं, यह कैसे पता चलेगा? अगर वे कोरोना पौजिटिव हुए, तो आप भी हो जाएंगे. बाद में हमारे जैसे कई लोग हो जाएंगे. आप पढ़ेलिखे लोग इतनी सी बात को समझते क्यों नहीं हैं?’’

‘‘अरे मैडम, मेरे पास मास्क है न…’’ पीछे बैठे सज्जन ने मास्क निकाल कर उसे मुंह पर लगाया और बोले, ‘‘हमारे मरीज की हालत सीरियस है. हमें जल्दी है, प्लीज जाने दें.’’

‘‘वह तो हम जाने ही देंगे…’’ रचना उन के दिए डाक्टर के परचे को देखते हुए बोलीं, ‘‘मगर, आप को फाइन देना ही होगा, ताकि आप को पता तो चले कि आप ने गलती की है.’’

धूप तीखी हो चली थी और रचना पसीने से तरबतर थीं. उन्होंने देखा कि साथी कांस्टेबल भी गरमी से बेहाल हो थक चुके थे. उन्होंने ड्राइवर मोहसिन को आवाज दी और वापस थाना चलने का संकेत दिया.

थाने आ कर रचना ने अच्छे से हाथमुंह धोया और खुद को सैनेटाइज किया, फिर एक कांस्टेबल को भेज कर गरम पानी मंगवा कर पीने लगीं. इस के बाद वे अपनी टेबल पर रखी फाइलों और कागजात के निबटान में लग गईं.

शाम के 6 बज चुके थे. तब तक इंस्पैक्टर हेमंत आ चुके थे. आते ही वे बोले, ‘‘अरे रचना मैडम, आप क्या  कर रही हैं. अभी तक यहीं हैं, घर  नहीं गईं?’’

‘‘कैसे चली जाती…’’ वे बोलीं, ‘‘आप भी तो नहीं थे.’’

‘‘ठीक है, ठीक  है. अब मैं आ गया हूं, अब आप घर जाइए. घर में आप के पति बीमार हैं. छोटेछोटे बच्चे हैं. आप घर जाइए,’’ इतना कह कर वे मोहसिन को आवाज देने लगे, ‘‘मोहसिन भाई, कहां हैं आप? जरा, मैडम को घर  छोड़ आइए.’’

‘‘मैडम को कहा तो था…’’ मोहसिन बोला, ‘‘मगर, आप तो जानते ही हैं कि वे अपनी ड्यूटी की कितनी पक्की हैं.’’

‘‘ठीक है, अब तो पहुंचा दो यार…’’

साढ़े 6 बजे जब रचना घर पहुंचीं, तो राजू लपक कर बाहर निकल आया था. वह उन से चिपकना ही चाहता था कि वे बोलीं, ‘‘अभी नहीं, अभी दूर ही रहो मुझ से. दीदी को बोलो कि वे सैनेटाइज की बोतल ले कर आएं. सैनेटाइज होने के बाद सीधे बाथरूम जाना है मुझे.’’

पूरे शरीर को सैनेटाइज करने के बाद रचना बाहर ही अपने भारीभरकम जूते खोल कर घर में घुसीं, गीजर औन करने के बाद वे अपनी ड्रैस उतारने लगीं.

अच्छी तरह स्नान करने के बाद हलके कपड़े पहन कर रचना बाहर निकलीं और सीधी रसोईघर में आ गईं. दूध गरम कर कुछ नाश्ते के साथ बच्चों को दिया. फिर गैस पर चाय के लिए पानी चढ़ा कर पति के लिए कुछ खाने का सामान निकालने लगीं.

चाय पीते हुए रचना ने रिमोट ले समाचार चैनल लगाया, जिस में कोरोना संबंधी खबरें आ रही थीं. थोड़ी देर बाद उन्होंने टैलीविजन बंद किया, फिर बच्चों की ओर मुखातिब हुईं.

सुहानी पहले की तरह चुप थी. शायद समय की नजाकत ने उस 12 साल की बच्ची को गंभीर बना दिया था. मगर राजू उन्हें दुनियाजहान की बातें बताने में लगा था और वे चुपचाप सुनती रही थीं.

रचना का सारा शरीर थकान से टूट रहा था और उन्हें अभी भोजन भी बनाना था. जल्दी खाना नहीं बना, तो रात में सोने में देर हो जाएगी.

भोजन बनाने और सब को खिलानेपिलाने में रात के 10 बज गए थे. राजू को समझाबुझा कर बहन के कमरे में ही सुला कर वे बाहर अपने कमरे में आईं और अपने पलंग पर लेट गईं. थकान उन पर हावी हो रही थी. मगर अब अतीत उन के सामने दृश्यमान होने लगा था.

कितना संघर्ष किया है रजनी ने यहां तक आने के लिए, मगर कभी उफ तक नहीं की. देखतेदेखते इतना समय बीत गया. दोनों बच्चे बड़े हो गए, मगर ऐसा खराब समय नहीं देखा कि लोग  अपनों के सामने हो कर भी उन के लिए तरस जाएं.

घर में एक नौकर था, वह इस महामारी में अपने गांव क्या भागा, पीछे पलट कर देखने की जरूरत भी नहीं समझी. कामवाली महरी भी कब का किनारा कर चुकी है. ऐसे में उन्हें ही घरबाहर सब देखना पड़ रहा है.

यह सब अपनी जगह ठीक था, मगर जब रचना के शिक्षक पति बीमार पड़े, तो वे घबरा गई थीं. पहले वे छिटपुट काम कर लेते थे, बच्चों को संभाल भी लेते थे. इधर उन का स्कूल भी बंद था, जिस से वे निश्चिंत भी थीं, मगर एक दिन किसी शादी में क्या गए, वहीं कहीं पति कोरोना संक्रमित हो गए.

शुरू के कुछ दिन तो जांच और भागदौड़ में बीता, मगर बाद में पता चला कि पति कोरोना पौजिटिव हैं, तो मुश्किलें बढ़ गईं. घर पर ही रह कर इलाज शुरू हुआ था. मगर सांस लेने में तकलीफ और औक्सीजन के घटते लैवल को देख कर उन्हें अस्पताल में भरती कराना पड़ा. उफ, क्या मुसीबत भरे दिन थे वे. सारे अस्पताल कोरोना मरीजों से भरे पड़े थे. एकएक बिस्तर के लिए मारामारी थी. अगर बिस्तर मिल गया, तो दवाएं नहीं थीं या औक्सीजन सिलैंडर नहीं मिलते थे.

ऐसे में एसपी मोहन वर्मा ने अपने रसूख का इस्तेमाल करते हुए उन्हें बिस्तर दिलवाया था और औक्सीजन का इंतजाम कराया था. रचना उन के इस अहसान को हमेशा याद रखेगी.

उन दिनों रचना एक आम घरेलू औरत की तरह रोने लगती थी, तब वे ही उन्हें हिम्मत बंधाते थे. उन्होंने खुद आगे बढ़ कर रचना की छुट्टी मंजूर की और उन्हें हर तरह से मदद की…

अचानक राजू के रोने की आवाज से रचना की तंद्रा टूटी. राजू उन के पलंग के पास आ कर रोता हुआ कह रहा था, ‘‘मुझे डर लग रहा है मम्मी. मैं आप के साथ ही रहूंगा, कहीं नहीं जाऊंगा…’’

रचना ने उसे समझाबुझा कर चुप कराया, फिर वापस उसे अपने कमरे  में पलंग पर लिटा कर थपकियां देदे  कर सुलाया.

इस कोरोना काल में कैसेकैसे लोगों के साथ मिलनाजुलना होता है. क्या पता कि कोरोना वायरस उन के शरीर में ही घुसा बैठा हो. ऐसे में वे अपने परिवार के साथ खुद को कैसे खतरे में डाल सकती हैं… अपने कमरे में जाते हुए सबइंस्पैक्टर रचना यही सोच रही थीं.

आलिया भट्ट ने लो नेकलाउन ब्लाउज में मचाया कहर, करण जौहर ने की तारीफ

बौलीवुड स्टार आलिया भट्ट अपने स्टाइल और एक्टिंग के लिए बखूभी जानी जाती है. आलिया अक्सर सोशल मीडिया पर छाई रहती है. इन दिनों ऐसी ही एक तस्वीर को लेकर एक्ट्रेस आलिसा भट्ट सोशल मीडिया पर ट्रेंड कर रही है. दरअसल, उन्होंने फोटो में साड़ी कैरी की है. जिसे लेकर वो सुर्खियों में आ गई है. जिस देख करण जौहर ने भी आलिया की तारीफ की है.

 

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आपको बता दें, कि एक्ट्रेस आलिया भट्ट की ये तस्वीरें इंस्टाग्राम पर आते ही छाने लगीं है. जिस पर लोगों ने भी जमकर कमेंट्स किए है. अदाकारा आलिया भट्ट की ये तस्वीरें एक इवेंट के दौरान की हैं. जब एक्ट्रेस ने इवेंट से पहले ही ये बेहद खूबसूरत फोटोशूट करवाया. इन फोटो पर करण जौहर ने भी मजेदार कमेंट किया है. इस फोटो की खास बात ये है कि आलिया ने इसमें लो नेकलाउन ब्लाउज कैरी किया है. एक्ट्रेस अपने ब्लाउज का बैकलेस लुक फ्लॉन्ट करती दिखीं. जिसमें वो बला की खूबसूरत लग रही है.

 

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एक्ट्रेस आलिया भट्ट ने इस दौरान लो-नेकलाइन वाला ब्लाउज कैरी किया था. जिसमें एक्ट्रेस बेहद खूबसूरत लग रही थी. आलिया की ये तस्वीरें आते ही सोशल मीडिया पर छाने लगी है. सामने आईं इस फोटो में अदाकारा आलिया भट्ट बेहद खूबसूरत लग रही थीं. यही वजह है कि एक्ट्रेस की इन तस्वीरों पर फैंस ने जमकर कमेंट्स किए है. वही, आलिया भट्ट की इन फोटोज पर करण जौहर ने कमेंट करते हुए लिखा है, ‘गॉर्जियस’ साथ ही फिल्ममेकर ने 3 रेड हार्ट इमोजी भी शेयर किए हैं.

What The Hell Navya Episode 2 : श्र्वेता नंदा पर गुस्साई जया बच्चन, शो के बीच में लगाई फटकार

व्हाट द हेल नव्या एपिसोड़ 2 काफी चर्चा में चल रहा है इस शो को बच्चन परिवार मिलकर होस्ट करता है. शो में जया बच्चन, नव्या नवेली और श्र्वेता नंदा तीनों जनरेशन को लेकर बातचीत करती नजर आती है. इस बार लेकिन शो में कुछ ओर ही देखने को मिला, जब जया बच्चन, श्र्वेता नंदा पर भड़ गई. जिस वजह से शो इन दिनों सुर्खियो में चल रहा है.

 

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आपको बता दें कि नव्या नवेली अपनी नानी जया बच्चन और मां श्र्वेता नंदा के साथ आनलाइन कल्चर पर बात कर रही थी. जब जया इंटरनेट और सोशल मीडिया पर अपनी बात रख रही थी. तब श्र्वेता बीच में बोल पड़ी. इतना ही नहीं, उन्होंने पूरे एपिसोड़ के दौरान कई बार अपनी मां को टोका. ऐसे में जया परेशान हो गई और श्र्वेता पर चिल्लाने लगी.

 

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जया बच्चन ने शो के बीच में कहा कि श्र्वेता में कुछ कहना चाहती हूं. इस कमरे में सिर्फ तुम ही हो जो अपनी राय दिए जा रही हो. इस पर श्र्वेता जवाब देती है कि यही तो इस पॉडकास्ट का मकसद है. हमे अपनी राय देनी है. जया बोली वो तो सही बात है. लेकिन मैं, मैं और मैं नहीं करना चाहिए. इसके बाद जया ने नव्या से कहा कि मुझे लगता है हर इंवेशन के दो पहलू होते है. जैसे श्र्वेता ने कहा कि जो अच्छे तरीके से देखते है वो अच्छे तरीके से ही देखते है. जो बुरे तरीके से देखते है वो बुरे तरीके से देखते है. इसी बीच नव्या ने दोनों को शांत करने की कोशिश की. नव्या ने कहा कि श्र्वेता आप भी सही है और जया बच्चन आप भी सही है. इसके बाद तीनों हंसने लगे और श्र्वेता ने इस बात को पूरा ध्यान रखा कि वो अपनी मां की बात को बीच में न कांटे और उन्हे बोलने को पूरा समय दें.

अच्छा अफसर: ढलती उम्र में क्यों बदल गए नारायणदास

‘‘सर, पिताजी को शहर जा कर हार्ट स्पैशलिस्ट को दिखाना है,’’ एक मुलाजिम ने अपने बड़े अफसर नारायणदास को अर्जी दे कर कहा.

‘‘ठीक है जाओ,’’ अर्जी पर मंजूरी देते हुए नारायणदास ने कहा.

‘‘थैंक्स सर,’’ उस मुलाजिम ने दिल से शुक्रिया अदा करते हुए कहा.

‘‘सर, मेरी यह भविष्य निधि से पैसा निकालने की अर्जी है. बेटी का पहला बच्चा हुआ है,’’ चपरासी रामावतार ने नारायणदास से कहा.

‘‘कितने पैसे चाहिए?’’ नारायणदास ने रामावतार के भविष्य निधि अकाउंट में बैलेंस देखते हुए पूछा.

‘‘10,000 रुपए.’’

‘‘ठीक है, मैं पैसे वापस भरने की शर्त पर मंजूर करता हूं. मैं कैशियर से कह देता हूं, तुम्हें अगले हफ्ते पैसे मिल जाएंगे. हां, बेटी का प्रसूति प्रमाणपत्र दफ्तर में जमा करा देना,’’ नारायणदास ने अर्जी पर दस्तखत करते हुए कहा.

जिला कक्षा के अफसर नारायणदास के पास कोई भी मुलाजिम अपना काम ले कर आता तो वे कर देते या फिर भरोसा देते कि वे कोशिश करेंगे. सारे मुलाजिम उन के काम और बरताव से बहुत ही खुश थे और उन्हें गर्व होता था कि उन के ऐसे अफसर हैं. इस वजह से वे उन्हें दिल से मान देते थे.

पर इन्हीं नारायणदास को किसी ने एक साल पहले देखा होता तो किसी को भी यकीन नहीं होता कि कोई इनसान इस उम्र में भी इतना बदल सकता है.

नारायणदास के इस बदलाव की वजह सिर्फ 2 ही लोग जानते हैं. एक खुद नारायणदास और दूसरे उन के रिटायर्ड दोस्त मोहन राणा.

तकरीबन एक साल पहले की बात है. रिटायर्ड अफसर मोहन राणा अपने बेटे की शादी का कार्ड देने नारायणदास के औफिस आए थे.

मोहन राणा नारायणदास के कालेज के समय के दोस्त थे और उन के ही गांव से थे. हालांकि वे उम्र में नारायणदास से 2 साल बड़े थे, पर उन की दोस्ती अब तक बरकरार रही.

‘‘सर, 3 दिन की छुट्टी चाहिए. मां बीमार हैं,’’ तकरीबन गिड़गिड़ाने की आवाज में नारायणदास के मुलाजिम ने अर्जी देते हुए कहा था.

‘‘अभी पिछले महीने ही तो गए थे. वैसे, यह बहाना कब तक चलेगा?’’ फाइल में ही नजरें गड़ाते हुए नारायणदास ने पूछा था.

‘‘सर, यह बहाना नहीं हकीकत है. मैं ने मां की बीमारी का मैडिकल सर्टिफिकेट भी दिखाया था. उन्हें पिछले 2 साल से हार्ट की बीमारी है. मैं उन का एकलौता बेटा हूं, इसलिए सारी जवाबदारी मेरी ही बनती है,’’ उस मुलाजिम ने बेबसी से कहा था.

‘‘तो यहां के काम का कौन ध्यान रखेगा? पता है न कि क्वार्टर ऐंडिंग है. और कितनी सारी रिपोर्ट बिना देरी किए हैडक्वार्टर भेजनी होती हैं. इस तरह बारबार छुट्टी लोगे तो तुम्हारी सालाना गुप्त रिपोर्ट में नोटिंग होगी. और तुम्हारी प्रमोशन बाकी ही है,’’ नारायणदास ने उसे सालाना गुप्त रिपोर्ट बिगड़ने की धमकी दी.

वह मुलाजिम मन मसोस कर रह गया. मां की बीमारी के दर्द की बेचैनी उस के चेहरे पर पढ़ी जा सकती थी.

मोहन राणा अपने दोस्त नारायणदास को जानते थे कि उन का अपने नीचे काम करने वाले मुलाजिमों के साथ रिश्ता गुलाम और राजा जैसा था. इस बात को नारायणदास दोस्तों और रिश्तेदारों में गर्व से कहते भी थे.

औफिस का समय पूरा हो चुका था. नारायणदास अपने दोस्त मोहन राणा को इज्जत के साथ सरकारी गाड़ी में सरकारी बंगले में ले कर आए.

‘‘राणा, रिटायरमैंट जिंदगी कैसी चल रही है? बड़े ठसके और आराम से चल रही होगी?’’ नारायणदास ने जैसे जलन के भाव से पूछा.

‘‘सच बताऊं नारायण, बहुत ही बुरी तरह से कट रही है. हम रिटायरमैंट का बेसब्री से इंतजार करते हैं. जैसे हम सोचते हैं कि रिटायरमैंट के बाद कोई जवाबदारी नहीं, कोई भागमभाग नहीं. बस सब से मिलो, पुरानी बातें याद करो और मस्ती से जिंदगी का मजा लो. पर मेरे साथ ऐसा कुछ भी नहीं है,’’ मोहन राणा ने बेहद हताशा, दुख और अफसोसजनक शब्दों से कहा.

‘‘क्या मतलब राणा?’’ नारायणदास ने हैरानी से पूछा. वे तो यही सोच रहे थे कि पैंशन के साथ आराम, कोई जवाबदारी नहीं. जिंदगी में कोई किचकिच नहीं. मैं खुद भी अपनी रिटायरमैंट का बेसब्री से इंतजार कर रहा हूं.’’

‘‘मेरे ही काम मुझ पर भारी पड़ गए. अपने हकों का हद से ज्यादा भोगना और अपनेआप को बहुत बड़ा समझना ही, आज मुझे बहुत छोटा कर रहा है,’’ मोहन राणा ने कचौड़ी का टुकड़ा हाथ में लेते हुए कहा.

‘‘मैं समझा नहीं…’’ नारायणदास ने उन के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा.

‘‘नारायण, मैं भी तुम्हारी तरह कड़क और अपने हकों को पूरा भोगने वाला अफसर था. अपने नीचे काम करने वाले किसी भी मुलाजिम की छोटी सी गलती निकालने के लिए बेसब्र रहता था. गलतियां निकाल कर और बाद में सब के सामने उसे बेइज्जत करना मेरा एक तरह से शौक या यों कहो कि जुनून हो गया था.

‘‘वे हमारे नीचे काम करने वाले मुलाजिम थे. उन की छुट्टियां, उन की सालाना गुप्त रिपोर्ट, जिस की वजह से उन की प्रमोशन होती है, हमारे हाथ में था. मतलब कि हमारा एक गलत शब्द भी उन के भविष्य के लिए काला धब्बा बन सकता है. ये सब बातें वे लोग समझते हैं, इसलिए हमारे घटिया बरताव को कड़वा घूंट पी कर चुपचाप सहन कर जाते हैं.

‘‘उन की छुट्टियां, जो सरकार ने दी हुई थीं, जो उन का हक था, उन्हें मैं किसी न किसी वजह से रद्द कर देता था.

‘‘उन की ही पगार से काटी गई भविष्य निधि की रकम उन्हीं को देने से मना कर देता था, जैसे कि वह मेरा पैसा हो और मैं दान देने से मना कर रहा हूं.’’

नारायणदास मन ही मन सोच रहे थे कि वे भी तो पूरी जिंदगी यही करते रहे हैं.

मोहन राणा ने आगे कहा, ‘‘इस वजह से मेरे किसी भी मुलाजिम के साथ अच्छे संबंध नहीं रहे. पर हैरानी तो यह कि मुझे इस बात का गर्व होता था.

‘‘इतना ही नहीं, पूरे दिन औफिस की साहबी घर जा कर भी नहीं मिटती थी. वहां भी मैं जिला अफसर ही था. घर पर सरकारी चपरासी और दूसरे नौकरों के साथसाथ मेरी साहबी अपने घर वालों पर भी निकलती थी.

‘‘बच्चे रविवार की छुट्टी से डरते थे, क्योंकि मैं उस दिन पूरा समय घर पर ही रहता था. मेरी टोकाटोकी और रोब के चलते वे ऐक्स्ट्रा क्लास या ट्यूशन के नाम से घर के बाहर रहना पसंद करते थे. पत्नी के बनाए खाने में मीनमेख निकालना तो जैसे मेरा रोज का नियम हो गया था.

‘‘मैं अपने बड़े पद के घमंड के चलते दोस्तों व रिश्तेदारों के यहां जाना जैसे अपनी बेइज्जती समझता था, जबकि बड़ा अफसर होने के चलते वे मुझे गर्व से बुलाते थे और अपने पहचान वालों से मिलवाते थे.

‘‘वह तो ठीक है राणा, पर इन सब बातों का हमारी रिटायरमैंट से क्या लेनादेना?’’ नारायणदास को समझ में नहीं आया कि उन का दोस्त क्यों अपनी पर्सनल बातें उन्हें बता रहा है.

‘‘क्योंकि, इन्हीं बातों के चलते मेरी जिंदगी नरक जैसी हो गई है.’’

‘‘मतलब…?’’ नारायणदास चौंके.

‘‘रिटायरमैंट के कुछ समय बाद मैं अपनी पैंशन के सिलसिले में अपने पुराने औफिस गया था, जहां मेरा कभी एकछत्र राज चलता था. जहां मेरी इजाजत के बिना एक पत्ता भी नहीं हिलता था. वहां गेट पर खड़े चौकीदार न सिर्फ सावधान हो जाते थे, बल्कि जोर से मुझे सैल्यूट भी मारते थे.

‘‘पर, उस दिन उस चौकीदार ने सलामी तो क्या दी, बल्कि वह अपनी कुरसी से उठा तक नहीं. औफिस के अंदर चपरासी और दूसरे मुलाजिमों ने मुझे देख कर भी अनदेखा कर दिया. यह देख कर मैं खुद को बेइज्जत और दुखी महसूस कर रहा था.

‘‘मैं अपना काम पूरा कर के निकल ही रहा था कि गैलरी की खिड़की से किसी की धीरे से आवाज आ रही थी. अपना नाम सुन कर मैं ठिठक गया.

‘‘कोई बोल रहा था, ‘राणा आया है. बहुत परेशान किया था इस ने पूरे 3 साल तक…’

‘‘यह शायद कार्तिक की आवाज थी, जो अकाउंट क्लर्क था. उस के बेटे को पढ़ने के लिए बाहर जाना था, पर मैं ने अड़ंगा लगा दिया था.

‘‘इतने में कोई और बोला, ‘यह तो कुछ भी नहीं है मेरी तकलीफ के सामने. मेरे पिताजी अंतिम समय में थे. इस राणा से खूब गुजारिश की, पर इस ने ‘मंत्रीजी आ रहे हैं’ के नाम पर छुट्टी नहीं दी, तो नहीं ही दी. मैं पिता के अंतिम दर्शन पर ही पहुंच सका था…’

‘‘फिर किसी तीसरे ने कहा, ‘मेरी खुद की भविष्य निधि के पैसे से घर की जरूरी मरम्मत करनी थी, क्योंकि बारिश सिर पर खड़ी थी, पर इस राणा के बच्चे ने आधी रकम ही मंजूर की और मुझे पहली बार किसी से पैसे उधार लेने पड़े थे…’

‘‘फिर किसी की इस बात ने मुझे चौंका दिया, ‘और एक तरफ हमारे नए साहब हैं, जो हमारी समस्या सुन कर उसे हल करते हैं… और नहीं तो कम से कम कोशिश तो करते हैं कि हमारी समस्या को हल कर सकें. मैं ने तो सर को कह दिया कि कभी रविवार या छुट्टी के दिन भी जरूरत पड़े तो हमें बुला लिया करें…’

‘‘उन तकरीबन सभी के पास मेरे दिए कुछ जख्म थे और नए अफसर के लिए अपनापन था. मैं ज्यादा न सुन सका, क्योंकि मैं इतने में ही समझ गया था कि मैं ने अपनी ताकत का बेजा इस्तेमाल किया था.’’

‘‘यही हालत मेरे घर, दोस्तों और समाज में हो गई है. अब मेरा बेटा खुद कमाने लगा है. वह मुझे खुल कर जवाब देता है. अब कोई रिश्तेदार मुझे अपने यहां नहीं बुलाता है. मैं ने हर जगह अपनी इज्जत खो दी है,’’ नारायणदास ने कहा.

‘‘नारायण, मैं तुम्हें यह सब इसलिए कह रहा हूं कि मैं ने आज तुम्हारे औफिस में वही सब देखा, जो मैं करता था. मैं उस वक्त वापस जा कर खुद को अच्छा अफसर साबित नहीं कर सकता, पर तुम्हारे पास अभी भी 2 साल से ज्यादा का समय है,’’ कहते हुए मोहन राणा चाय पीने लगे.

नारायणदास ने अपने दोस्त मोहन राणा के जाने के बाद बहुत सोचा और पाया कि उन की कहानी भी उन के दोस्त मोहन राणा से अलग नहीं है. वे अपनी रिटायर्ड जिंदगी बरबाद नहीं करना चाहते थे. अगले दिन ही वे मीठा बोलने वाले और अच्छा अफसर बनने में लग गए थे.

शौक : अखिलेश क्या अपना शौक पूरा कर पाया

‘‘यह नया पंछी कहां से आया है?’’ जैम की शीशियां गत्ते के बड़े डब्बे में पैक करते हुए सुरेश ने सामने कुरसी पर बैठे अखिलेश की तरफ देखते हुए अपने साथी रमेश से पूछा.

‘‘उत्तर प्रदेश का है,’’ रमेश ने कहा.

‘‘शहर?’’ सुरेश ने फिर पूछा.

‘‘पता नहीं,’’ रमेश ने जवाब दिया.

‘‘शक्ल से तो मास्टरजी लगता है,’’ अखिलेश की आंखों पर चश्मे को देख हलकी हंसी हंसते हुए सुरेश ने कहा.

‘‘खाताबही बनाना मास्टरजी का ही काम होता है,’’ रमेश बोला.

फलोें और सब्जियों को प्रोसैस कर के जूस, अचारमुरब्बा और जैम बनाने की इस फैक्टरी में दर्जनों मुलाजिम काम करते थे.

सुरेश, रमेश और कई दूसरे पुराने लोग धीरेधीरे काम सीखतेसीखते अब ट्रेंड लेबर में गिने जाते थे. फैक्टरी में सामान्य शिफ्ट के साथ दोहरी शिफ्ट में भी काम होता था, जिस के लिए ओवर टाइम मिलता था. इस का लेखाजोखा अकाउंटैंट रखता था.

अखिलेश एमए पास था. वह इस फैक्टरी में अकाउंटैंट और क्लर्क भरती हुआ था. मुलाजिमों के कामकाज के घंटे और दूसरे मामलों का हिसाबकिताब दर्ज करना और बिल पास करना इस के हाथ में था.

अपने फायदे के लिए फैक्टरी के सभी मुलाजिम अकाउंटैंट से मेलजोल बना कर रखते थे.

‘‘पहले वाला बाबू कहां गया?’’ रामचरण ने पूछा.

‘‘उस का तबादला कंपनी की दूसरी ब्रांच में हो गया है.’’

‘‘ये सब बाबू लोग ऊपर से सीधेसादे होते हैं, पर अंदर से पूरे चसकेबाज होते हैं,’’ रमेश ने धीमी आवाज में कहा.

‘‘इन का चसकेबाज होने में अपना फायदा है. सारे बिल फटाफट पास हो जाते हैं.’’

शाम को शिफ्ट खत्म हुई. दूसरे सब चले गए, पर सुरेश, रमेश और रामचरण एक तरफ खड़े हो गए.

अखिलेश उन को देख कर चौंका.

‘‘सलाम बाबूजी,’’ सुरेश ने कहा.

‘‘सलाम, क्या बात है?’’ अखिलेश ने पूछा.

‘‘कुछ नहीं, आप से दुआसलाम करनी थी. आप कहां से हो?’’

अखिलेश ने गांव के बारे में बताया.

‘‘साहब, एकएक कप चाय हो जाए?’’ रमेश ने जोर दिया.

अखिलेश उन के साथ फैक्टरी की कैंटीन में चला आया. चाय के दौरान हलकीफुलकी बातें हुईं. कुछ दिनों तक यह सिलसिला चला, फिर धीरेधीरे मेलजोल बढ़ता गया.

‘‘साहब, आज कुछ अलग हो जाए…’’ एक शाम सुरेश ने मुसकराते हुए अखिलेश से कहा.

‘‘अलग… मतलब?’’ अखिलेश ने हैरानी से पूछा.

सुरेश ने अंगूठा मोड़ कर मुंह की तरफ शराब पीने का इशारा किया.

‘‘नहीं भाई, मैं शराब नहीं पीता,’’ अखिलेश ने कहा.

‘‘साहब, थोड़ी चख कर तो देखो.’’

उस शाम सुरेश के कमरे में शराब का दौर चला. नया पंछी धीरेधीरे लाइन पर आ रहा था.

कुछ दिन के बाद सुरेश ने अखिलेश से पूछा, ‘‘साहब, आप ने सवारी की है?’’

‘‘सवारी…?’’

‘‘मतलब, कभी सैक्स किया है?’’

‘‘नहीं भाई, अभी तो मैं कुंआरा हूं. मेरी पिछले महीने ही मंगनी हुई है,’’ अखिलेश ने कहा.

‘‘सुहागरात को अगर आप चुक गए, तो सारी उम्र आप की बीवी आप का रोब नहीं मानेगी,’’ रामचरण बोला.

इस पर अखिलेश सोच में पड़ गया. वह 25 साल का था, लेकिन अभी तक किसी लड़की से सैक्स नहीं किया था.

‘‘साहब, आज आप को जन्नत की सैर कराते हैं,’’ सुरेश ने कहा.

इस सोच के साथ कि सुहागरात को वह ‘अनाड़ी’ या ‘नामर्द’ साबित न हो जाए, अखिलेश सहमत हो कर उन के साथ चल पड़ा.

वे चारों एक सुनसान दिखती गली में पहुंचे. गली के मुहाने पर ही एक पान वाले की दुकान थी.

‘‘4 पलंगतोड़ पान बनाना,’’ एक सौ रुपए का नोट थमाते हुए सुरेश ने कहा. पान बंधवा कर वे सब आगे चले.

‘‘यह पलंगतोड़ पान क्या होता है?’’ अखिलेश ने पूछा.

‘‘साहब, यह बदन में जोश भर देता है. औरत भी ‘हायहाय’ करने लगती है. अभी आप भी आजमाना,’’ रामशरण ने समझाते हुए कहा.

एक दोमंजिला मकान के बाहर रुक कर सुरेश ने कालबैल बजाई. एक औरत ने खिड़की से बाहर झांका. अपने पक्के ग्राहकों को देख कर उस औरत ने राहत की सांस ली.

दरवाजा खुला. सभी अंदर चले गए. एक बड़े से कमरे में 3-4 पलंग बिछे थे. कई छोटीबड़ी उम्र की लड़कियां, जिन में से कई नेपाली लगती थीं, मुंह पर पाउडर पोते, होंठों पर लिपस्टिक लगाए बैठी थीं.

‘‘सोफिया नजर नहीं आ रही?’’ अपनी पसंदीदा लड़की को न देख सुरेश कोठे की आंटी से पूछ बैठा.

‘‘बाहर गई है वह.’’

‘‘इस को सब से ज्यादा ‘मस्त’ वही नजर आती है,’’ रामचरण बोला.

‘‘नए साहब आए हैं. इन को खुश करो,’’ आंटी ने लड़कियों की तरफ देखते हुए कहा.

सभी लड़कियां एक कतार में खड़ी हो गईं. कइयों ने अपनेअपने उभारों को यों तान दिया, जैसे फौज में आया जवान अपनी छाती फुला कर दिखाता है.

‘‘साहब, आप को कौन सी जंच रही है?’’ रामचरण ने अखिलेश से पूछा.

अखिलेश के लिए यह नया तजरबा था. सैक्स के लिए उस को एक लड़की छांटनी थी, जबकि उस को तो ठेले पर सब्जी छांटनी नहीं आती थी. आंटी तजरबेकार थी. वह समझ गई थी कि नया चश्माधारी बाबू अनाड़ी है. उस ने लड़कियों की कतार में खड़ी मीनाक्षी की तरफ इशारा किया.

मीनाक्षी अखिलेश की कमर में बांहें डाल कर बोली, ‘‘आओ, अंदर चलें.’’

इस के बाद वह अखिलेश को एक छोटे केबिननुमा कमरे में ले गई.

बाकी तीनों भी अपनीअपनी पसंद की लड़की के साथ अलगअलग केबिनों में चले गए. कमरे की सिटकिनी बंद कर लड़की ने अपने नए ग्राहक की तरफ देखा. अखिलेश ने भी उसे देखा. नेपाली मूल की उस लड़की का कद औसत से छोटा था. उस के मुंह पर ढेरों पाउडर पुता था. होंठों पर गहरे रंग की लिपस्टिक थी.

लड़की ने एकएक कर के सारे कपड़े उतार दिए, फिर अखिलेश के पास आ कर खड़ी हो गई.

अखिलेश ने चश्मे में से ही उस की तरफ देखा. उस के उभार ब्लाउज उतर जाने के बाद ढीलेढाले से लटके थे. उभारों, बांहों, जांघों पर दांतों के काटने के निशान थे.

उसे देख कर अखिलेश को जोश की जगह तरस आने लगा था.

‘‘अरे बाबू, क्या हुआ? सैक्स नहीं करोगे?’’ उस लड़की ने पूछा.

‘‘नहीं, मुझे जोश नहीं आ रहा,’’ अखिलेश ने कहा.

‘‘कपड़े उतार दो, जोश अपनेआप आ जाएगा,’’ वह लड़की बोली.

‘‘मुझ से नहीं होगा.’’

‘‘पनवाड़ी से पान तो लाए होगे?’’

‘‘हां है. तुम खा लो,’’ पान की पुड़िया उसे थमाते हुए अखिलेश ने कहा.

‘‘आप खा लो… गरमी आ जाएगी.’’

‘‘तुम खा लो.’’

लड़की ने पान चबाया. अखिलेश पछता रहा था कि वह यहां क्यों आया.

‘‘तुम्हें कितने पैसे मिलते हैं?’’

‘‘यह आंटी को पता है.’’

‘‘मुझ से क्या लोगी?’’

‘‘यह भी आंटी बताएगी. तुम कुछ करोगे?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘मैं कपड़े पहन लूं?’’

अखिलेश चुप रहा. लड़की ने कपड़े पहने और बाहर चली गई. अखिलेश भी बाहर चला आया.

इतनी जल्दी ग्राहक निबट गया था. आंटी ने टेढ़ी नजरों से उस की तरफ देखा. मीनाक्षी ने भद्दा इशारा किया. पलंग पर बैठी सभी लड़कियां हंस पड़ीं.

आधेपौने घंटे बाद बाकी तीनों भी बाहर आ गए.

अखिलेश को बाहर आया देख वे सभी चौंके.

‘‘क्या बात है साहब?’’ सुरेश बोला.

‘‘मुझ से नहीं हुआ,’’ अखिलेश ने बताया.

‘‘पहली बार आए हो न साहब. धीरेधीरे सीख जाओगे.’’

आंटी को पैसे थमा कर वे सब बाहर चले आए.

अगले कई दिनों तक उन तीनों ने अखिलेश को उकसाने की कोशिश की, मगर उस ने वहां जाने से मना कर दिया. एक शाम मौसम सुहावना था. शराब के 2 पैग पीने के बाद अखिलेश घूमने निकल पड़ा.

अचानक ही अखिलेश के कदम उस गली की तरफ मुड़ गए. चश्माधारी बाबूजी को देख आंटी पहले चौंकी, फिर हंसते हुए बोली, ‘‘आओ बाबूजी.’’

मीनाक्षी भी मुसकराई. वह उस को अपने केबिन में ले गई.

‘‘आप फिर आ गए?’’

‘‘मौसम ले आया.’’

‘‘अकेले?’’

‘‘हां.’’

‘‘मैं अपने कपड़े उतारूं?’’

अखिलेश खामोश रहा. लड़की ने कपड़े उतार दिए. पहले की तरह अखिलेश ने उस के बदन को देखा.

‘‘अब आप भी अपने कपड़े उतारो,’’ लड़की बोली.

अखिलेश ने भी अपने कपड़े उतारे और उस के करीब आया. उसे अपनी बांहों भरा और चूमा, फिर बिस्तर पर खींच लिया. लेकिन बहुत कोशिश करने पर भी अखिलेश में जोश नहीं आया.

आखिरकार तंग आ कर मीनाक्षी ने पूछा, ‘‘क्या तुम ने पहले कभी सैक्स किया है?’’

‘‘नहीं.’’

‘‘फिर तुम यहां क्यों आए हो?’’

‘‘अगले महीने मेरी शादी है. वहां खिलाड़ी साबित करने के लिए मैं यहां आया हूं.’’

यह सुन कर मीनाक्षी खिलखिला कर हंस पड़ी.

‘‘तुम से कुछ नहीं हो सकता. तुम चले जाओ.’’

कपड़े पहन कर अखिलेश बाहर जाने को हुआ, तभी मीनाक्षी बोली, ‘‘अपना पर्स, घड़ी और अंगूठी उतार कर मुझे दे दो,’’

‘‘क्यों?’’ अखिलेश ने पूछा.

तभी एक कद्दावर गुंडे ने वहां आ कर चाकू तान दिया.

अखिलेश ने अपने पर्स की सारी नकदी, अंगूठी और घड़ी उतार कर पलंग पर रख दी और चुपचाप बाहर चला आया. आते वक्त भी मौसम खुशगवार था, लौटते वक्त भी. मगर आते समय अखिलेश शराब के नशे में था, लौटते समय उस का नशा उतर चुका था.

मेरा पति रोज शराब पी कर घर आता है और मुझे मारतापीटता है, क्या करूं?

सवाल

मेरी उम्र 22 साल है. मेरा पति रोज शराब पी कर घर आता है. वह मुझे मारतापीटता है और मेरी 2 साल की बेटी को भी नहीं बख्शता है.

मैं ने कई बार खुदकुशी की बात सोची, लेकिन मासूम बेटी का मुंह देख कर रुक गई कि इस से वह अनाथ हो जाएगी और कौन उसे देखेगा. फिर कभीकभी सोचती हूं कि क्यों न उसे भी साथ ले कर मर जाऊं, लेकिन हिम्मत नहीं पड़ती. आप सलाह दें कि मैं क्या करूं?

जवाब

सब से पहले तो आप मरने का खयाल दिल से निकाल दें, जो इसलिए आ रहा है कि आप पति के जुल्मोसितम का विरोध नहीं कर पा रही हैं. आप ने मन ही मन इसे अपनी किस्मत मान लिया है.

पति अब जब भी मारे, तुरंत नजदीकी थाने में जा कर उस की शिकायत करें. बेहतर होगा कि उस से अलग ही रहने लगें. इस के लिए आप मायके की और भरोसेमंद रिश्तेदारों की मदद ले सकती हैं.

मेहनतमजदूरी कर के इतना तो कमा ही सकती हैं कि अपना और बच्ची का पेट भर सकें, तो फिर क्यों आप शराबी पति के पल्ले बंधी हैं? सारे डर और लिहाज छोड़ कर उस नरक से बाहर निकलें और अपने मुताबिक जिंदगी जिएं. परेशानियों का डट कर मुकाबला करें.

पौरुष की कमी से जूझती युवा पीढ़ी

आरती को शिकायत है कि शादी के 8 सालों के भीतर ही उस की वैवाहिक जिंदगी का सारा चार्म खत्म हो गया है. उस के पति अनुराग को अब शायद उस में कोई दिलचस्पी ही नहीं रह गई है. वह देर रात औफिस से आता है, खाना खाता है और सोने चला जाता है. आरती ने अपनी शादीशुदा जिंदगी में रोमांस पैदा करने के लिए सारे जतन कर के देख लिए. पति को रिझाने के लिए वह शाम से ही बनावशृंगार में जुट जाती. पति की पसंद का भोजन बनाती है. बैडरूम को सुसज्जित करती है. खुद भी सुगंध में डूबी रहती है, तो हलकी सुगंध वाले रूम फ्रैशनर से पूरा घर भी महकाए रखती है. मगर पति की नजदीकियां पाने की उस की सारी कोशिशें बेकार चली जाती हैं.

अनुराग थकाहारा सा दफ्तर से आता है और एक उड़ती सी नजर आरती पर डाल कर अपने काम में व्यस्त हो जाता है. थोड़ी देर अपने 5 साल के बेटे राहुल से खेलता है और फिर खाना खा कर सोने चला जाता है. अब तो आरती को शक होने लगा है कि शायद उस के वैवाहिक जीवन में कोई दूसरी औरत आग लगा रही है. अनुराग का यह व्यवहार उस से अब बरदाश्त नहीं हो रहा है. प्यार और सैक्स के अभाव में दोनों के बीच दूरियां बढ़ गई हैं. कितने दिन हो जाते हैं अनुराग उसे हाथ भी नहीं लगाता. एक कमरे में एक ही बिस्तर पर दोनों अजनबियों की तरह पड़े रहते हैं.

यह समस्या सिर्फ आरती और अनुराग की नहीं, बल्कि हर 10 में से 3 कपल की है. पत्नी समझ ही नहीं पाती कि उस का पति उस से बेरुखी क्यों दिखा रहा है? वह उस से कटाकटा सा क्यों रहने लगा है? वह यह शक भी पाल बैठती है कि हो सकता है इन का कोई ऐक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर चल रहा है. यह सोच पत्नियों  को और ज्यादा तनाव से भर देती है. कुछ पत्नियां सोचती हैं कि शायद उन का रंगरूप पहले की तरह मोहक नहीं रहा. वे सजतीसंवरती हैं कि पति को लुभा सकें. तरहतरह के व्यंजन बनाती हैं कि पति का प्यार पा सकें, मगर पति का दिल फिर भी नहीं पसीजता.

दरअसल, पत्नी के प्रति पति की बेरुखी का कारण हमेशा वह नहीं होता जो पत्नियां सोचसोच कर परेशान होती रहती हैं, बल्कि प्रौब्लम कुछ और होती है. पति की बेरुखी का कारण उन में पौरुष हारमोन की कमी हो सकती है, जिस के चलते पति शारीरिक संबंधों से दूरी बनाने लगते हैं, क्योंकि उन्हें यह डर होता है कि बिस्तर पर वे पत्नी को संतुष्ट नहीं कर पाएंगे. उन पर नामर्दगी का आरोप लगेगा. वे पत्नी की नजरों में गिर जाएंगे. अगर पत्नी को पता चल गया कि वे उसे संतुष्ट करने में अक्षम हैं तो वह किसी दूसरे पुरुष का साथ ढूंढ़ेगी और चोरीछिपे अपनी शारीरिक जरूरत पूरी करने लगेगी. ये तमाम डर पुरुष मन पर हावी हो जाते हैं और पति खामोशी ओढ़ कर पत्नी से दूरी बना लेता है और पत्नी को उस की उधेड़बुन में फंसे रहने देता है. अब पत्नी से कैसे कहे कि वह उसे बिस्तर पर संतुष्टि देने लायक नहीं रहा.

खामोशी है खतरनाक

जीवनसाथी को अपनी कमी को न बता पाने की विवशता अपराधबोध भी पैदा करती है, फिर भी आशंका और बदनामी के भय से मुंह सिले रहते हैं और दांपत्य में दूरियां और गलतफहमियां पैदा होने देते हैं.
पति द्वारा अपनी शारीरिक समस्या पर खामोशी ओढ़े रहना दंपतियों के बीच न सिर्फ दूरी बढ़ा रहा है, बल्कि कहींकहीं तो नौबत तलाक तक जा पहुंची है. पौरुष की कमी की वजह से पुरुष न सिर्फ सैक्स से दूर हो रहे हैं, बल्कि नामर्दगी के डर से उत्पन्न तनाव के कारण कई प्रकार की बीमारियां भी उन में पनप रही हैं.

हाल ही में दिल्ली के सर गंगाराम अस्पताल की एक रिसर्च में यह बात सामने आई है कि 60% मर्द जवानी में ही अपनी मर्दानगी खोने के कगार पर हैं. देश में  40 साल की उम्र तक पहुंचने वाला हर तीसरा पुरुष सैक्सुअल हारमोन की कमी से जूझ रहा है यानी हर तीसरा व्यक्ति टेस्टोस्टेरौन डैफिसिएंसी सिंड्रोम यानी टीडीएस से पीडि़त है. अस्पताल के 745 लोगों पर किए शोध में इस बात के खुलासे से मैडिकल जगत में हलचल मची हुई है.

डाक्टरों का मानना है कि यह परेशानी लगातार बढ़ रही है. अस्पताल ने टीडीएस का पता लगाने के लिए पहले बिना जांच किए सिर्फ लक्षण के आधार पर इस का पता लगाया. इस के लिए शोध में शामिल युवाओं से 10 सवाल पूछे गए. डाक्टर ने बताया कि सैक्स के प्रति रुचि यानी कामेच्छा, क्षमता यानी स्टैमिना और स्ट्रैंथ में कमी जैसे 3 लक्षणों के आधार पर 48.18% लोगों में टेस्टोस्टेरौन हारमोन कम पाया गया. लेकिन जब इन सभी का बायोकैमिकल टैस्ट किया गया तो आंकड़ा बढ़ कर 60.17% हो गया.

टीडीएस का खतरा

सर गंगाराम अस्पताल के यूरोलौजी विभाग के चेयरमैन डाक्टर सुधीर चड्ढा कहते हैं कि इस स्टडी से यह साफ हो रहा है कि हमारी आबादी में हर तीसरा इंसान सैक्स हारमोन की कमी से पीडि़त है. लोग डायबिटीज, हाइपरटैंशन, विटामिन डी की कमी, हार्ट डिजीज जैसे बीमारियों से पीडि़त होते हैं तो उन में टीडीएस यानी टेस्टोस्टेरौन की कमी का खतरा कई गुना बढ़ जाता है.

टेस्टोस्टेरौन हारमोन पुरुषों में यौन क्षमता बनाए रखने वाला महत्त्वपूर्ण हारमोन है. किसी पुरुष में इस की कमी से सैक्स से जुड़ी परेशानियां पैदा होने लगती हैं. 40 साल की उम्र के बाद टेस्टोस्टेरौन में हर साल 0.4 से 2.6 फीसदी की कमी होने लगती है. भारत में 40 साल से अधिक उम्र का हर तीसरा व्यक्ति सैक्सुअल हारमोन की कमी से जूझ रहा है, जिस के चलते पत्नी से शारीरिक संबंध बनाने से बचने के कारण उन के वैवाहिक जीवन में असंतुष्टि, शक, कड़वाहट, तनाव और दूरियां बढ़ रही हैं. 40 साल से अधिक उम्र के वे लोग जो डायबिटीज, हार्ट डिजीज, बीपी, विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं, उन्हें हर साल टीडीएस की जांच जरूर करवानी चाहिए. सैक्स संबंधों में अरुचि का मुख्य कारण तो यह है ही, तनाव, बीपी और हाइपरटैंशन का भी जनक है.

स्टडी में पाया गया कि जिन लोगों को डायबिटीज नहीं थी, उन में टीडीएस का स्तर 52.8% था और डायबिटीज वालों में यह 71.03% था. इसी प्रकार हाई बीपी के मरीजों में टीडीएस का खतरा 72.89% पाया गया और नौनबीपी वालों में यह केवल 54.86% था. कोरोनरी हार्ट डिजीज के 32 मरीज भी इस स्टडी में शामिल हुए थे. इन में से 27 यानी 84.30% में टीडीएस की बीमारी थी. डाक्टरों के मुताबिक, ऐसे लोग जिन की उम्र ज्यादा है और वे डायबिटीज, हार्ट डिजीज, बीपी, विटामिन डी की कमी से जूझ रहे हैं उन्हें हर साल टीडीएस की जांच करानी चाहिए.

क्या है टेस्टोस्टेरौन हारमोन

टेस्टोस्टेरौन हारमोन को पिट्यूटरी ग्रंथि और हाइपोथेलेमस नियंत्रित करते हैं. इस का स्रावण अंडकोष में होता है. सैक्स और शुक्राणुओं की संख्या के लिए यह हारमोन जिम्मेदार है. टेस्टोस्टेरौन हारमोन पुरुष में मर्दानगी के लक्षणों को पैदा करने वाला मुख्य कारक है. सरल भाषा में कहें तो युवावस्था में यह एक लड़के को मर्द बनाता है, जैसे चेहरे पर दाढ़ीमूंछ आना, सीने पर बाल आना, आवाज में भारीपन आना, जननांग का विकसित होना, शरीर का सुडौल होना, ताकतवर मांसपेशियां बनना सब इस हारमोन के कारण ही होता है. शारीरिक और मनोवैज्ञानिक स्वास्थ्य के लिए यह हारमोन पुरुषों के लिए जरूरी है. यह उम्र बढ़ने के साथ कम होने लगता है.

एक अनुमान के मुताबिक 30 से 40 की उम्र के बाद इस में हर साल 2 फीसदी की गिरावट आने लगती है. इस में क्रमिक गिरावट सेहत से जुड़ी कोई समस्या नहीं है, लेकिन जब कुछ खास बीमारियों, इलाज या चोटों के कारण यह सामान्य से कम हो जाता है, परेशानी तब शुरू होती है. अंडकोष में चोट, उस की सर्जरी, क्लाइनफेल्टर सिंड्रोम और आनुवंशिकी गड़बड़ी से पिट्यूटरी ग्रंथि और हाइपोथैलेमस प्रभावित होता है, जिस से हाइपोगोनैडिज्म के हालात पैदा होते हैं.

इन्फैक्शन, लिवर और किडनी में बीमारी, शराब की लत, कीमोथेरैपी या रैडिएशन थेरैपी के कारण भी टेस्टोस्टेरौन हारमोन में कमी आती है. टेस्टोस्टेरौन की कमी वैवाहिक जीवन में कलह का कारण बनती है. इस हारमोन की कमी के चलते पति चाह कर भी पत्नी को शारीरिक सुख नहीं दे पाता.
सोशल टैबू ने जकड़ रखा है भारत में सामाजिक बंधन और शर्मिंदगी की वजह से पुरुष न तो अपनी इस कमी को उजागर करते हैं और न ही इस के इलाज के लिए डाक्टर के पास जाते हैं. इस के विपरीत वे ताकत की दवाएं, झाड़फूंक, योगा या आयुर्वेद जैसी चीजों का सहारा लेने लगते हैं, जो उन की परेशानी को और ज्यादा बढ़ा देते हैं. टेस्टोस्टेरौन की कमी एक प्रकार की बीमारी है, जिस का इलाज ऐलोपैथी में संभव है. औरतों की तरह पुरुषों में भी सैक्स हारमोन रीप्लेसमैंट संभव है. बस जरूरत है सोशल टैबू को भूल कर डाक्टर के पास जाने की.

पत्नी को विश्वास में लें

आप की जीवनसाथी को आप के जीवन पर पूरा अधिकार है. उस से अपनी बीमारी, अपनी कमी, अपनी गलतियां न छिपाएं. उसे विश्वास में लें. उसे बताएं कि आप किस तरह की समस्या का सामना कर रहे हैं. यदि आप ठीक तरीके से अपनी समस्या पत्नी को बताएंगे तो न सिर्फ आप का वैवाहिक जीवन तबाह होने से बचेगा, बल्कि आप के बीच बौंडिंग भी बढ़ेगी. इस के साथ ही जीवनसाथी का साथ और विश्वास पा कर आप में डाक्टर के पास जाने और इलाज करवाने की हिम्मत भी पैदा होगी.

अपनी मंजिल: क्या था सुदीपा का फैसला

मां, मैं आप से बारबार कह चुकी हूं कि अभी शादी नहीं करूंगी. मुझे अभी आगे पढ़ाई करनी है,” सुदीपा ने मां के समीप जा कर बड़े प्यार से कहा.

“सुदीपा बेटा, क्या खराबी है लड़के में? इंजीनियर है, ऊंचे खानदान और रसूख वाला है. तेरे पापा के मित्र का लड़का है और अच्छी आमदनी है उस की. शुक्र मनाओ कि जिस शानदार और आरामदायक जिंदगी जीने के लिए अधिकतर लड़कियां केवल सपने देखती आई हैं, वे सारी खुशियां तुम्हें बिना मांगे ही मिल रहा है. 2 हजार गज में बनी शानदार कोठी है उन की…

“दसियों नौकरचाकर वहां एक आवाज पर हाथ बांधे खडे रहते हैं. इतने योग्य और गुणवान लड़के का रिश्ता खुद चल कर तुम्हारे पास आया है. सारे सुख व ऐश्वर्य हैं उस घर में. और क्या चाहिए तुम्हें…” मां ने नाराजगी जाहिर करते हुए सुदीपा के गाल पर हलकी सी चपत लगाई .

मां के गले से लिपटती सुदीपा बोली,”मेरी प्यारी मां, मुझे आगे बढ़ने के लिए पढ़ाई करनी है अभी. मुझे अभी योग्य शिक्षिका बनना है, जिस से कि अपने भीतर समाए ज्ञान को अन्य को बांट सकूं,” सुदीपा मां को मनाने के लिए हरसंभव प्रयास कर रही थी, क्योंकि मां के इनकार करने पर ही यह रिश्ता टल सकता था.

“सुदीपा, तुम एक बार उस लड़के से मिल कर देख तो लो,” सुदीपा को विचार में डूबा देख कर मां ने उस पर आखिरी बात छोड़ते हुए कहा.

एमए की हुई सुदीपा गोरीचिट्टी, लंबी, छरहरी काया वाली आकर्षक युवती थी. संगीत विशारद में विशेष योगदान हेतु गोल्ड मैडलिस्ट थी. उस के पड़ोसी, परिचित, नातेरिश्तेदार आदि सभी सुदीपा के सुंदर व्यक्तित्व एवं हंसमुख व्यवहार की प्रशंसा किए
बिना नहीं रहते थे. जैसे अधिकतर लोग रूपसौंदर्य और सुगढ़ता को देख कर अनायास ही कह उठते हैं कि कुदरत ने इसे बहुत फुरसत में गढ़ा होगा, ऐसे ही रूपवती सुदीपा जब गजगामिनी चाल की मंथर गति से चलती थी तब अनेक चाहने वाले उसे पाने की तमन्ना रखते थे.

मन ही मन उसे चाहने वाले आहें भरते थे और सुदीपा से मिलने के बहाने ढूंढ़ा करते थे. वह तो अपनेआप में खुश रहने वाली मस्त लड़की थी. सुदीपा की कमर तक लहराते बाल बिजलियां गिराती थीं. पतलीपतली और लंबी उंगलियां जब सितार पर राग छेड़तीं तो उसे देखनेसुनने वाले मंत्रमुग्ध हो जाते.

मां का कहना मान कर एक दिन सुदीपा समीर नाम के उस लड़के से मिली. वह लड़का उसे सुंदर लगा. रूपरंग, व्यक्तित्व के अनुसार वह सुदर्शन नवयुवक था. 2-4 मुलाकातों के बाद सुदीपा को समीर पसंद आ गया था. संयोग से तभी सुदीपा को कालेज में अध्यापिका की नौकरी भी मिल गई थी.

सुदीपा के मम्मीपापा सगाई कर के ही उसे नौकरी पर जाने देने की जिद कर रहे थे. इसलिए मम्मीपापा का दिल रखने के लिए उस ने सगाई की हामी भर दी. नौकरी पर जाने से पहले ही दोनों की धूमधाम से सगाई हो गई थी.

कोमल कुआंरे मन में सुंदर जीवन के अनेक रंगीन सपने सजाए सुदीपा कालेज में पहुंच गई. वह दिल्ली शहर की एक सोसायटी फ्लैट में किराए पर रहने लगी. सगाई हो जाने के कारण समीर काम के सिलसिले में जब दिल्ली आता तो सुदीपा से मिलने चला आता था. दोनों तरफ से रिश्ते की डोर मजबूत हो जाए, एकदूसरे को अच्छी तरह से जानसमझ लें,
इस के लिए वे किसी रेस्तरां में कौफी पीने या कभी डिनर करने चले जाते थे. कभीकभी कोई अच्छी और नई मूवी साथ देखने के लिए मौल भी चले जाते थे.

ऐसे ही उन के बीच प्यार भरी मेलमुलाकातों का सिलसिला जारी था. अब सुदीपा और समीर के बीच घनिष्ठता भरे संबंध पनपने लगे थे. मगर इधर कुछ दिनों से सुदीपा ने एहसास किया था कि समीर में शिष्टाचार और विनम्रता जैसे संस्कारी गुण बहुत कम थे. उस ने कई बार समीर को फोन पर अपनी बात मनवाने के लिए सामने वाले को दबंग टाइप से हड़काते हुए भी सुना था.सुदीपा के साथ होने पर भी लापरवाह सा समीर फोन पर अकसर गालीगलौच कर दिया करता था. सुदीपा आधुनिक और खुले विचारों को दिल में जगह देने वाली संस्कारी और मृदुभाषी लडकी थी.

एक दिन सुदीपा कुछ खरीदारी कर के सोसायटी में प्रवेश कर रही थी. उस के दोनों हाथों में सामान था कि तभी अचानक हाई हील सैंडिल के कारण उस का संतुलन बिगड़ गया और वह डगमगा कर नीचे गिर पड़ी.तभी अचानक एक हाथ ने सहारा दे कर उसे उठाया,”अरे, आप को तो काफी चोटें लगी हैं. मैं आप का सामान समेट देता हूं…” अपने सामने गोरेचिट्टे, लंबे कद के सुंदर नाकनक्श वाले लड़के की आवाज सुन कर वह अचकचा गई.

उस की कुहनियां छिल गई थीं. पैर में मोच आ गई थी. उस लड़के ने अपने कंधे पर उस का हाथ पकड़ कर सहारा दिया,”आइए, मैं आप को कमरे तक छोड़ देता हूं,” वह चुपचाप लगंडाते हुए उस के साथ चल पड़ी.

टेबल पर सामान रख कर लड़के ने कहा,”मैं फस्ट ऐड बौक्स ला कर पट्टी बांध देता हूं,” अब वह लड़का ड्रैसिंग कर रहा था.

वह अब तक स्वयं को काफी संभाल चुकी थी. अकेले कमरे में अनजान लड़के के हाथ में अपना हाथ देख कर सुदीपा के मन को भारतीय संस्कार और परंपराएं घेरने लगीं. लेकिन वह लड़का बड़ी सहजता से उस के हाथ पर दवा लगा कर पट्टी बांध रहा था. उस लड़के के स्पर्श से सुदीपा असहज और रोमांचित हो रही थी,”अब तुम आराम करो मैं चाय बना लाता हूं,” थोड़ी देर में वह ट्रै में चाय और बिस्कुट ले आया.

वे दोनों कुछ देर एकदूसरे के परिवार के बारे में बात करते रहे. चलते समय उस ने एक गहरी नजर डाली और अपना फ्लैट नंबर बता कर बोला,”कोई भी जरूरत हो तो मुझे बता देना. संकोच मत करना…”

जब तक उस के पैर की मोच ठीक नहीं हो गई तब तक वह रोज उस के लिए कभी चाय बना कर लाता, तो कभी सैंडविच ले आता. बाहर से एकसाथ खाना भी और्डर कर देता फिर दोनों साथ ही खाना खाते.

सुदीपा के के मन में प्रेम का पहला एहसास फूटा था. एक अनजान कोमल स्पर्श दिल में तरंगित हो कर रमने लगा था. वह अपने घरसमाज की वर्जनाएं जानती थी. संस्कारित परंपराओं के बंधन में बंधने के बाद भी रूमानियत से भीगा एहसास बंजर मरूस्थल में हरा होने लगा था. समीर का साथ पा कर उस ने कभी ऐसा स्पर्श, स्नेह व अपनेपन का एहसास नहीं जाना था.

सुदीपा के मन की भीतरी परतों में शेखर के प्रति रोमांस का बीज पनपने लगा. शेखर बहुत अपनेपन से उस की देखभाल कर रहा था. उस का साथ मिलने के कारण उसे किसी प्रकार की कोई परेशानी नहीं हुई थी .
अब वह ठीक हो कर कालेज जाने लगी थी.

रात के 8 बज रहे थे. गुलाबी रंग की कैप्री के साथ मैंचिग टौप में लंबी खुली केशराशि के बीच सुदीपा ऐसी लग रही थी जैसे श्यामल घटाओं के बीच दूधिया चांद खिला हो. उस ने मैंचिग ईयर टौप्स के साथ गले में छोटे मोतियों की माला पहनी थी. आज वह बहुत खुश थी. उस का गुलाब की तरह खिला खिला रूप सौंदर्य चित्ताकर्षक था. खुद को आईने में देख कर वह स्वयं ही लजा गई. वह रसोईघर में जा रही थी कि अचानक से बेल बजी. दरवाजा खोल कर देखा तो सामने समीर खडा था,”अरे, समीर तुम?” अकस्मात समीर को सामने देख कर वह अचकचा गई.

“हां मेरी जान, तुम्हारा समीर…” कहतेकहते समीर ने उसे बांहों में उठा कर 3-4 गोल चक्कर से घुमा दिया.

“आज तो तुम बेहद खूबसूरत और रूप की रानी लग रही हो. किस पर बिजली गिराओगी,” समीर ने रोमांटिक अंदाज में कहते हुए खींच कर उसे अपने सीने से लगाना चाहा.

तेज शराब के भभके से सुदीपा का तनमन जलने लगा. वह चिहुंक कर दूर जा खडी हुई. समीर ने आगे बढ़ कर उस की कलाई पकड़ ली. उस ने हाथ छुड़ा कर दूर जाने का प्रयत्न किया, लेकिन समीर की पकड़ से छूट नहीं सकी. समीर जोरजबरदस्ती करने लगा. यों अचानक ऐसे किसी हालात का सामना करना पड़ेगा, उस ने कभी सपने में भी नहीं सोचा था.सुदीपा का दिलदिमाग सुन्न हो गया. समीर की बांहों में कसमसा कर दरवाजा खोलते हुए बोली,”समीर, अभी तुम होश में नहीं हो, जाओ.अभी होटल चले जाओ और कल आना.”

“क्यों, कल क्यों मेरी जान, जो होना है आज ही होने दो न. अब तो हम दोनों की शादी भी होने वाली है. इसलिए तुम तो मेरी हो.”

शादी होने वाली है, हुई तो नहीं है न.
फिलहाल, मैं तुम से कोई बात नहीं करना चाहती. प्लीज, तुम यहां से चले जाओ,” सुदीपा ने संयत स्वर में उसे समझाने की कोशिश की.

मगर अपनी मनमरजी पर उतारू समीर ने उस की एक नहीं सुनी. पुरुषत्व के दर्प में चूर, शराब के नशे में मदहोश, समीर के भीतर का जानवर जनूनी हो गया. अपने मंसूबे पूरे न होते देख अब समीर बदतमीजी पर उतर आया. उस के हाथ में सुदीपा का टौप आ गया. जबरदस्ती खींचते हुए टौप चर्रचर्र… कर फटता चला गया.

“यू ब्लडीफूल, तेरी इतनी हिम्मत. तू मुझे मना करती है… अरे, तेरे जैसी पचासों लड़कियां मेरे आगेपीछे घूमती हैं. तू समझती क्या है अपनेआप को…मैं जिस चीज पर हाथ रख देता हूं, वह मेरी हो जाती है…” नशे में समीर की लड़खड़ाती जबान से अंगार बरसने लगे.

जैसे ही वह सुदीपा को पकड़ने के लिए बढ़ा नशे की झोंक में लहराते हुए पीछे को गिर पड़ा. अपनी अस्मिता पर प्रहार होता देख सुदीपा रणचंडी बन गई. उस में न जाने कहां से इतनी शक्ति आ गई कि त्वरित ताकत से मेज पर रखा चाकू हाथ में ले कर डगमगाते समीर को पूरी शक्ति से बाहर धकेल दिया और बिजली की फुरती से दरवाजा बंद कर लिया. समीर बहुत देर तक दरवाजे पर आवाजें देता रहा, लेकिन उस के कान जैसे बहरे हो चुके थे. वह दरवाजे से लगी फूटफूट कर रोने लगी.

वह स्वयं को संयत कर उठी और कटे पेड़ की भांति पलंग पर गिर पड़ी. बिस्तर पर लेटी तो लगा जैसे समीर की ओछी सोच में लिपटे हाथ लंबे हो कर उस की ओर बढ़ रहे हैं. उस ने घबरा कर आंखे बंद कीं तो समीर की लाल घूरती आंखें देख सूखे पत्तों सी कांपने लगी.

सूरज चढ़ आया था. पूरी रात आंखों में कट गई. वह उस दिन को कोस रही थी जब समीर के साथ उस की सगाई हुई थी. लगाव रूमानियत से भीगे मीठे एहसास का प्रेममयी भाव सोच कर शेखर का चेहरा उस की आंखों के समक्ष तैर उठा. उसे इन दोनों की जेहनी सोचसमझ में जमीनआसमान का फर्क नजर आ रहा था.

मोबाइल की घंटी बजने पर न चाहते हुए भी देखा तो मां का फोन था,”मां खुशी से चहकते हुए बता रही थीं,”बेटा, सुबह तुम्हारे पापा के पास समीर के पापा का फोन आया था. वह इसी महीने शादी करने के लिए जोर डाल रहे हैं. कहते हैं कि अगले माह समीर विदेश जा रहा है. वह जल्दी ही तुम दोनों को विवाह बंधन में बांधना चाहते हैं.”

“नहींनहीं… मां, मैं समीर से शादी नहीं करूंगी. मैं उस की शक्ल भी देखना नहीं चाहती. आप मुझे समीर के साथ विवाह की सूली पर मत टांगना. मैं जी नहीं सकूंगी,” कहतेकहते उस की रुलाई फूट पड़ी.

“क्या बात है बेटा? तुम बहुत परेशान लग रही हो,” मां के स्वर में चिंता झलकने लगी

“हां मां, यहां बहुत कुछ घटा है,” और
उस ने मां को रात की सारी घटना बता दी,”मां, पत्नी का दिल जीतने के लिए पति के मन में भावनात्मक लगाव होता है. पर समीर केवल वासना का लिजलिजा कीडा़ निकला.उसे बस मेरा जिस्म चाहिए था, जिसे वह जबरदस्ती हासिल कर के अपनी मर्दानगी की मुहर लगाना चाहता था. उसे मेरी खुशियों से कोई सरोकार नहीं है…

“मेरी अपनी मंजिल समीर कभी नहीं हो सकता,” कह कर वह बच्चों की तरह बिलखने लगी.

सारी सचाई जान कर मां की आंखों से समीर के गुणी और लायक वर होने का परदा हट चुका था,”अच्छा सुदीपा… बेटा… तू रोना बंद कर और बिलकुल चिंता मत कर. अच्छा ही हुआ कि हमें उस की औकात शादी से पहले पता चल गई,”मां ने बेटी को धीरज बंधाया,” मैं और पापा आज तुम्हारे पास आ रहे हैं. मैं हूं न… तुम्हारी मां अब सब संभाल लेगी…”

सुदीपा ने इत्मीनान की सांस ले कर फोन रख दिया.

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