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Satyakatha: दो नावों की सवारी- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

धीरेधीरे समय बीतता रहा. पूजा गर्भवती हो गई. वह बच्चे को ले कर बेहद संजीदा थी. पूजा ने एक दिन रात में पति को फोन पर किसी औरत से बात करते सुन लिया. जब उस ने पति से पूछा कि इतनी देर रात को किस से बात कर रहे हो तो उस की बात सुन कर वह एकदम से हड़बड़ा गया और उस के माथे पर पसीने छूट गए थे. फिर वह बातें बनाते हुए औफिशियल बात कह कर टाल कर चुपचाप सो गया.

न जाने क्यों पूजा को जितेंद्र पर संदेह हो गया था कि वह उस से कुछ छिपा रहा है. उस दिन के बाद से पूजा पति पर नजर रखने लगी. आखिरकार पूजा के सामने जितेंद्र की सच्चाई खुल कर आ ही गई.

पूजा को पता चल गया कि जितेंद्र की जिंदगी में कोई दूसरी औरत है. वह औरत कोई और नहीं, उस की पहली बीवी है. यानी जितेंद्र पहले से शादीशुदा था और उस ने इतनी बड़ी बात उस से छिपा कर रखी थी.

उस के प्यार और विश्वास के साथ उस ने इतना बड़ा धोखा किया. पूजा को ऐसा लगा जैसे काटो तो खून नहीं. वह सिर पकड़ कर धम्म से गिर गई और कोख के ऊपर हाथ फेरते हुए सुबकने लगी थी.

उस की आंखों के सामने जैसे अंधेरा छा गया था. पलभर के लिए जैसे सोच नहीं पा रही थी कि वह करे तो क्या करे, कहां जाए, किस के कंधे पर सिर रख कर रो ले, ताकि उस का दुख थोड़ा कम हो जाए.

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पूजा इतनी आसानी से जितेंद्र को छोड़ने वाली नहीं थी. क्योंकि उस ने उसे धोखे में रख कर उस की जिंदगी बरबाद की थी. औरत सब कुछ बरदाश्त कर सकती है, लेकिन अपने सुहाग को हिस्सों में बंटता कभी नहीं देख सकती. पहली औरत यानी सौतन को ले कर पूजा और जितेंद्र के बीच खूब झगड़ा हुआ.

उस ने जितेंद्र से सवाल किया कि मेरी जिंदगी को क्यों बरबाद किया, जब पहले से शादीशुदा थे, तो धोखा क्यों दिया? बताया क्यों नहीं उस के बच्चे भी हैं, जो कहीं और रहते हैं.

पूजा चुप बैठने वालों में से नहीं थी. एक दिन उस ने पति की पहली पत्नी अन्नू को फोन कर के सारी असलियत बता दी. पति की सच्चाई जान कर अन्नू बिफर गई और सौतन को ले कर दोनों में खूब झगड़ा हुआ. अन्नू ने पति को धमकी दी कि अगर उस ने सौतन पूजा से संबंध नहीं तोड़ा तो वह बच्चों के साथ आत्महत्या कर लेगी.

पत्नी की आत्महत्या कर लेने की धमकी से जितेंद्र बुरी तरह डर गया और अगले दिन धार पत्नी के पास पहुंच गया. जितेंद्र ने जो गलती की थी, उस का तो परिणाम यही होना था.

2 नावों पर सवार जितेंद्र अस्के की जिंदगी अब डगमगाने लगी थी. वह किसे छोड़े और किसे अपनाए, इसी ऊहापोह में डूबा हुआ था. दोनों पत्नियों के बीच जितेंद्र पिस कर रह गया था. मंझधार में अटका जितेंद्र किनारे की तलाश में भटक रहा था, लेकिन उसे वह किनारा मिल नहीं रहा था.

बात 22 अप्रैल, 2021 की है. जितेंद्र धार में पहली पत्नी अन्नू के साथ था. दोनों पत्नियों को ले कर महीनों से घर में महाभारत छिड़ी थी. बात नातेरिश्तेदारों तक पहुंच गई थी. चारों ओर जितेंद्र की थूथू हो रही थी.

अब पानी सिर के ऊपर से बहने लगा था. 2 दिन पहले ही जितेंद्र का छोटा भाई राहुल अस्के, जो मध्य प्रदेश पुलिस में एसआई था. उस की तैनाती छिंदवाड़ा में थी. उस समय वह घर आया था. राहुल की मौसी का बेटा नवीन भी वहां आया था.

उसी दौरान दोपहर के समय अन्नू के मोबाइल पर पूजा का फोन आया. पति के सामने फोन पर दोनों सौतनों के बीच खूब झगड़ा हुआ. पूजा ने पति को भी खूब खरीखोटी सुनाई.

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बड़े भाई का अपमान राहुल देख नहीं पाया. उस के तनबदन में आग लग गई थी. उसी वक्त राहुल और नवीन ने जितेंद्र के सामने उस की सहमति से पूजा की हत्या की बात कही तो जितेंद्र ने अपनी ओर से उसे हरी झंडी दे दी. क्योंकि पूजा के रोजरोज के झगड़े से वह ऊब चुका था.

भाई की ओर से हरी झंडी मिलने के बाद 23 अप्रैल की शाम राहुल और नवीन इंदौर के लिए रवाना हो गए. 24 अप्रैल को दोपहर में दोनों इंदौर के मल्हारगंज स्थित रामदुलारी अपार्टमेंट पहुंच गए. देवरों को देख कर पूजा खुश हुई थी. उसे क्या पता था कि जिन्हें देख कर वह खुश हो रही है, वह मेहमान के रूप में साक्षात यमदूत हैं, राहुल और नवीन को आते पड़ोसन सीमा ने देख लिया था.

खैर, पूजा देवरों को अंदर लाई और उन्हें कमरे में बिठाया और खुद उन के लिए चाय बनाने किचन में चली गई. थोड़ी देर बाद 3 प्याली में चाय और एक प्लेट में नमकीन ले कर आई. तीनों ने एक साथ बैठ कर चाय पी.

जैसे ही पूजा खाली प्याली समेट कर किचन की ओर बढ़ी, तभी पीछे से राहुल और नवीन उस पर टूट पड़े. नवीन ने भाभी पूजा के दोनों पैर पकड़ लिए और राहुल ने गला घोंट कर उसे मार डाला. उस के बाद दोनों ने उस की लाश ले जा कर ऐसे सुला दी, जैसे वह बिस्तर पर सो रही हो. फिर दोनों फरार हो गए. तीनों से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उन्हें न्यायालय में पेश किया, जहां से उन्हें जेल भेज दिया गया.

कथा लिखे जाने तक पूजा अस्के उर्फ जाह्नवी के तीनों हत्यारोपी कंपनी कमांडर जितेंद्र अस्के, एसआई राहुल अस्के और नवीन अस्के जेल की सलाखों के पीछे कैद थे. पूजा की मौत का जितेंद्र को जरा भी गम नहीं था. द्य

—कथा में सीमा परिवर्तित नाम है. कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित.

Satyakatha: नफरत की विषबेल- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

साल 2003 से 2009 तक हैदराबाद के विभिन्न थानाक्षेत्रों तुरपान, रायदुर्गम, संगारेड्डी, डुंडीगल, नरसापुर, साइबराबाद और कोकाटपल्ली में करीब 7 औरतों की हत्या कर के पुलिस को उस ने सकते में डाल दिया था.

सातों महिलाओं की एक ही तरीके से साड़ी के पल्लू से गला घोंट कर हत्या की गई थी. पुलिस की जांच में यह बात सामने आई कि हत्यारा कोई एक है और वह भी सिरफिरा, जो सिर्फ महिलाओं को ही अपना शिकार बनाता है.

पुलिस ने पहली बार नरसंगी और कोकटपल्ली इलाकों में सन 2009 में हुई अलगअलग जगहों पर हुई हत्याओं को गंभीरता से लिया था. कोकाटपल्ली के इंसपेक्टर राधाकृष्ण राव ने अपने 3 काबिल सिपाहियों की मदद से 20-25 दिनों की कड़ी मेहनत से हत्या की कड़ी सुलझा ली थी और आरोपी माइना रामुलु को गिरफ्तार करने में सफलता हासिल की.

पुलिस ने पहली बार शातिर माइना रामुलु के खिलाफ न्यायालय में चार्जशीट दाखिल की थी. 2 साल बाद 2011 के फरवरी में अदालत ने आरोपी माइना रामुलु को दोषी ठहराया और उसे आजीवन कारावास की सजा सुनाई. साथ ही 50 हजार रुपए का जुरमाना भी भरने के आदेश दिए थे. जुरमाना न भरने की दशा में 6 महीने की अतिरिक्त सजा भी सुनाई.

कुछ दिनों तक तो शातिर माइना रामुलु सलाखों के पीछे कैद रहा. इसी दौरान उस ने पूरी जिंदगी सलाखों के पीछे बिताने से बचने के लिए फिल्मी अंदाज में एक बेहद शार्प योजना बनाई. उस ने मानसिक रोगी की तरह कैदियों से व्यवहार करना शुरू कर दिया. जुर्म की दुनिया के माहिर खिलाड़ी रामुलु ने ऐसा अभिनय किया कि लोगों को लगा कि वह वाकई में बीमार है. इस के बाद उसे जेल से निकाल कर एर्रागड्डा मेंटल हास्पिटल में भरती करा दिया गया. यह नवंबर, 2011 की बात है.

एक महीने तक वहां रहने के बाद माइना रामुलु 30 दिसंबर, 2011 की रात पुलिस को चकमा दे कर अस्पताल से भाग गया. यही नहीं, अपने साथ वह 5 अन्य कैदियों को भी भगा ले गया, जो मानसिक बीमारी का इलाज करा रहे थे.

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उस के दुस्साहसिक कारनामों से पुलिस महकमे के होश उड़ गए. इस सिलसिले में एसआर नगर पुलिस स्टेशन में माइना रामुलु के खिलाफ मामला दर्ज किया गया.

पुलिस कस्टडी से फरार रामुलु फिर अपने शिकार में जुट गया था. सन 2012 में चंदानगर में 2 और 2013 में बोवेनपल्ली के डुंडीगल में 3 महिलाओं की हत्याएं कीं. पांचों महिलाओं की हत्याएं एक ही तरीके साड़ी के पल्लू से गला घोंट कर की गई थीं. पोस्टमार्टम रिपोर्ट में महिलाओं की हत्या से पहले दुष्कर्म किए जाने की बात भी सामने आई थी.

पुलिस जांच में महिलाओं की हत्या एक ही तरीके से की गई थी. यह तरीका शातिर किलर माइना रामुलु का था. पुलिस को समझते देर न लगी कि इन हत्याओं के पीछे माइना रामुलु का हाथ है. पुलिस ने इन हत्याआें पर फिर से ध्यान देना शुरू किया. आखिरकार 13 मई, 2013 में बोवेनपल्ली पुलिस रामुलु को गिरफ्तार करने में कामयाब हो गई.

जुर्म के साथसाथ सचमुच माइना रामुलु कानून का एक माहिर खिलाड़ी था. उस के पास एक अच्छा वकील था या फिर उस के सिर पर किसी और ताकतवर व्यक्ति का हाथ, यह बात पुलिस के लिए भी पहेली बनी हुई है.

5 साल बाद उस ने तेलंगाना हाईकोर्ट में अपनी सजा कम कराने के संबंध में अपील की. वह अपनी सजा को कम करवाने में कामयाब रहा. 2018 के अक्तूबर में माइना रामुलु के पक्ष में फैसला आया और उसे जेल से रिहा कर दिया गया. एक बार फिर उस ने कानून के मुंह पर तमाचा मार दिया था.

जेल से रिहा होने के बाद रामुलु कुछ दिन शांत रहा और पत्थर काटने का काम करने लगा, ताकि लोगों को यकीन हो जाए कि वह सुधर गया है. यह उस का एक छलावा था. काम करना तो एक बहाना था, इस के पीछे उस की मंशा शिकार की तलाश करना था.

यह शिकार उसे यूसुफगुडा की 50 वर्षीया कमला बैंकटम्मा के रूप में मिली. बैकटम्मा से रामुलु की मुलाकात दिसंबर, 2020 में एक शराब की भट्ठी पर हुई थी. सम्मोहन कला से उस ने बैंकटम्मा को अपनी ओर खींच लिया था. बस शिकार को अंतिम रूप देना शेष था.

30 दिसंबर, 2020 की शाम थी. यूसुफगुडा के अहाते में कुछ लोग ताड़ी पी रहे थे. बैंकटम्मा और रामुलु ने भी ताड़ी पी. दोनों पर जब हलका सुरूर चढ़ा तो रामुलु के जिस्म में वासना की आग धधक उठी और वह बैंकटम्मा को अपनी आगोश में लेने के लिए बेताब हो उठा. लेकिन वहां लोग थे, इसलिए वह अपने मकसद में कामयाब नहीं हुआ.

इस बीच सूरज डूबने लगा था और रात की काली चादर फैला चुकी थी. रामुलु बैंकटम्मा को ले कर कंपाउंड से बाहर निकल गया. वे दोनों शहर के बाहरी इलाके में किसी सुनसान जगह की तलाश में चल पड़े. यूसुफगुडा से ये दोनों घाटकेश्वर इलाके के अंकुशापुर पहुंचे.  यह एक सुनसान जगह थी. दोनों ने यहां पहुंच कर थोड़ी और ताड़ी पी.

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इस के बाद रामुलु पूरी तरह बहक गया और बैंकटम्मा को अपनी हवस का शिकार बना डाला. फिर उस की साड़ी के पल्लू से गला घोंट कर उस की हत्या कर दी और लाश रेलवे लाइन के पास ठिकाने लगा कर फरार हो गया.

हैदराबाद की तेजतर्रार पुलिस शातिर माइना रामुलु को वैज्ञानिक तथ्यों के आधार पर गिरफ्तार करने में कामयाब हो ही गई. शातिर दिमाग वाला माइना रामुलु शायद यह भूल गया था कि उसे जनम देने वाली भी तो एक औरत ही है.

अगर उस की पत्नी ने उस के साथ धोखा किया था, तो सजा उसे मिलनी चाहिए थी न कि बेकसूर उन 18 महिलाओं को, जिन का न तो कोई दोष था और न ही उन्होंने उस का कोई अहित किया था.

रामुलु ने जो किया उस के किए की सजा सलाखों के पीछे काट रहा है. समाज के ऐसे दरिंदों की यही सजा होनी चाहिए. कथा लिखे जाने तक पुलिस ने उस के खिलाफ अदालत में आरोप पत्र दाखिल कर दिया था.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

Romantic Story: रुह का स्पंदन- भाग 3

घर वालों की सहमति पर सुदेश और दक्षा ने मिल कर बातें करने का निश्चय किया. सुदेश सुबह ही मिलना चाहता था, लेकिन दक्षा ने ब्रेकफास्ट कर के मिलने की बात कही. क्योंकि वह पूजापाठ कर के ही ब्रेकफास्ट करती थी. सुदेश में दक्षा से मिलने के लिए गजब का उत्साह था. दक्षा की बातों और उस के स्वभाव ने आकर्षण तो पैदा कर ही दिया था. इस के अलावा दक्षा ने अपने जीवन की कुछ महत्त्वपूर्ण बातें मिल कर बताने को कहा था. वो बातें कौन सी थीं, सुदेश उन बातों को भी जानना चाहता था.

निश्चित की गई जगह पर सुदेश पहले ही पहुंच गया था. वहां पहुंच कर वह बेचैनी से दक्षा की राह देख रहा था. वह काले रंग की शर्ट और औफ वाइट कार्गो पैंट पहन कर गया था. रेस्टोरेंट में बैठ कर वह हैडफोन से गाने सुनने में मशगूल हो गया. दक्षा ने काला टौप पहना था, जिस के लिए उस की मम्मी ने टोका भी था कि पहली बार मिलने जा रही है तो जींस टौप, वह भी काला.

तब दक्षा ने आदत के अनुसार लौजिकल जवाब दिया था, ‘‘अगर मैं सलवारसूट पहन कर जाती हूं और बाद में उसे पता चलता है कि मैं जींस टौप भी पहनती हूं तो यह धोखा देने वाली बात होगी. और मम्मी इंसान के इरादे नेक हों तो रंग से कोई फर्क नहीं पड़ता.’’

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तर्क करने में तो दक्षा वकील थी. बातों में उस से जीतना आसान नहीं था. वह घर से निकली और तय जगह पर पहुंच गई. सढि़यां चढ़ कर दरवाजा खोला और रेस्टोरेंट में अंदर घुसी. फोटो की अपेक्षा रियल में वह ज्यादा सुंदर और मस्ती में गाने के साथ सिर हिलाती हुई कुछ अलग ही लग रही थी.

अचानक सुदेश की नजर दक्षा पर पड़ी तो दोनों की नजरें मिलीं. ऐसा लगा, दोनों एकदूसरे को सालों से जानते हों और अचानक मिले हों. दोनों के चेहरों पर खुशी छलक उठी थी.

खातेपीते दोनों के बीच तमाम बातें हुईं. अब वह घड़ी आ गई, जब दक्षा अपने जीवन से जुड़ी महत्त्वपूर्ण बातें उस से कहने जा रही थी. वहां से उठ कर दोनों एक पार्क में आ गए थे, जहां दोनों कोने में पेड़ों की आड़ में रखी एक बेंच पर बैठ गए. दक्षा ने बात शुरू की, ‘‘मेरे पापा नहीं हैं, सुदेश. ज्यादातर लोगों से मैं यही कहती हूं कि अब वह इस दुनिया में नहीं है, पर यह सच नहीं है. हकीकत कुछ और ही है.’’

इतना कह कर दक्षा रुकी. सुदेश अपलक उसे ही ताक रहा था. उस के मन में हकीकत जानने की उत्सुकता भी थी. लंबी सांस ले कर दक्षा ने आगे कहा, ‘‘जब मैं मम्मी के पेट में थी, तब मेरे पापा किसी और औरत के लिए मेरी मम्मी को छोड़ कर उस के साथ रहने के लिए चले गए थे.

‘‘लेकिन अभी तक मम्मीपापा के बीच डिवोर्स नहीं हुआ है. घर वालों ने मम्मी से यह कह कर उन्हें अबार्शन कराने की सलाह दी थी कि उस आदमी का खून भी उसी जैसा होगा. इस से अच्छा यही होगा कि इस से छुटकारा पा कर दूसरी शादी कर लो.’’

दक्षा के यह कहते ही सुदेश ने उस की तरफ गौर से देखा तो वह चुप हो गई. पर अभी उस की बात पूरी नहीं हुई थी, इसलिए उस ने नजरें झुका कर आगे कहा, ‘‘पर मम्मी ने सभी का विरोध करते हुए कहा कि जो कुछ भी हुआ, उस में पेट में पल रहे इस बच्चे का क्या दोष है. यानी उन्होंने गर्भपात नहीं कराया. मेरे पैदा होने के बाद शुरू में कुछ ही लोगों ने मम्मी का साथ दिया. मैं जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे सब शांत होता गया.

‘‘मेरा पालनपोषण एक बेटे की तरह हुआ. अगलबगल की परिस्थितियां, जिन का अकेले मैं ने सामना किया है, उस का मेरी वाणी और व्यवहार में खासा प्रभाव है. मैं ने सही और गलत का खुद निर्णय लेना सीखा है. ठोकर खा कर गिरी हूं तो खुद खड़ी होना सीखा है.’’

अपनी पलकों को झपकाते हुए दक्षा आगे बोली, ‘‘संक्षेप में अपनी यह इमोशनल कहानी सुना कर मैं आप से किसी तरह की सांत्वना नहीं पाना चाहती, पर कोई भी फैसला लेने से पहले मैं ने यह सब बता देना जरूरी समझा.

‘‘कल कोई दूसरा आप से यह कहे कि लड़की बिना बाप के पलीबढ़ी है, तब कम से कम आप को यह तो नहीं लगेगा कि आप के साथ धोखा हुआ है. मैं ने आप से जो कहा है, इस के बारे में आप आराम से घर में चर्चा कर लें. फिर सोचसमझ कर जवाब दीजिएगा.’’

सुदेश दक्षा की खुद्दारी देखता रह गया. कोई मन का इतना साफ कैसे हो सकता है, उस की समझ में नहीं आ रहा था. अब तक दोनों को भूख लग आई थी. सुदेश दक्षा को साथ ले कर नजदीक की एक कौफी शौप में गया. कौफी का और्डर दे कर दोनों बातें करने लगे तभी अचानक दक्षा ने पूछा था, ‘‘डू यू बिलीव इन वाइब्स?’’

सुदेश क्षण भर के लिए स्थिर हो गया. ऐसी किसी बात की उस ने अपेक्षा नहीं की थी. खासकर इस बारे में, जिस में वह पूरी तरह से भरोसा करता हो. वाइब्स अलौकिक अनुभव होता है, जिस में घड़ी के छठें भाग में आप के मन को अच्छेबुरे का अनुभव होता है. किस से बात की जाए, कहां जाया जाए, बिना किसी वजह के आनंद न आए और इस का उलटा एकदम अंजान व्यक्ति या जगह की ओर मन आकर्षित हो तो यह आप के मन का वाइब्स है.

यह कभी गलत नहीं होता. आप का अंत:करण आप को हमेशा सच्चा रास्ता सुझाता है. दक्षा के सवाल को सुन कर सुदेश ने जीवन में एक चांस लेने का निश्चय किया. वह जो दांव फेंकने जा रहा था, अगर उलटा पड़ जाता तो दक्षा तुरंत मना कर के जा सकती थी. क्योंकि अब तक की बातचीत से यह जाहिर हो गया था. पर अगर सब ठीक हो गया तो सुदेश का बेड़ा पार हो जाएगा.

सुदेश ने बेहिचक दक्षा से उस का हाथ पकड़ने की अनुमति मांगी. दक्षा के हावभाव बदल गए. सुदेश की आंखों में झांकते हुए वह यह जानने की कोशिश करने लगी कि क्या सोच कर उस ने ऐसा करने का साहस किया है. पर उस की आंखो में भोलेपन के अलावा कुछ दिखाई नहीं दिया. अपने स्वभाव के विरुद्ध उस ने सुदेश को अपना हाथ पकड़ने की अनुमति दे दी.

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दोनों के हाथ मिलते ही उन के रोमरोम में इस तरह का भाव पैदा हो गया, जैसे वे एकदूसरे को जन्मजन्मांतर से जानते हों. दोनों अनिमेष नजरों से एकदूसरे को देखते रहे. लगभग 5 मिनट बाद निर्मल हंसी के साथ दोनों ने एकदूसरे का हाथ छोड़ा. दोनों जो बात शब्दों में नहीं कह सके, वह स्पर्श से व्यक्त हो गई.

जाने से पहले सुदेश सिर्फ इतना ही कह सका, ‘‘तुम जो भी हो, जैसी भी हो, किसी भी प्रकार के बदलाव की अपेक्षा किए बगैर मुझे स्वीकार हो. रही बात तुम्हारे पिछले जीवन के बारे में तो वह इस से भी बुरा होता तब भी मुझ पर कोई फर्क नहीं पड़ता. बाकी अपने घर वालों को मैं जानता हूं. वे लोग तुम्हें मुझ से भी अधिक प्यार करेंगे. मैं वचन देता हूं कि बचपन से ले कर अब तक अधूरे रह गए सपनों को मैं हकीकत का रंग देने की कोशिश करूंगा.’’

सुदेश और दक्षा के वाइब्स ने एकदूसरे से संबंध जोड़ने की मंजूरी दे दी थी.

पुनर्मरण- भाग 1: शुचि खुद को क्यों अपराधी समझती थी?

कुछ सजा ऐसी भी होती है जो बगैर किसी अपराध के ही तय कर दी जाती है. उस दिन अपने परिवार के सामने मैं भी बिना किसी किए अपराध की सजा के रूप में अपराधिनी बनी खड़ी थी. हर किसी की जलती निगाहें मुझे घूर रही थीं, मानो मुझ से बहुत बड़ा अपराध हो गया हो.

मांजी की चलती तो शायद मुझे घर से निकाल दिया होता. मेरे दोनों बेटे त्रिशंक और आदित्य आंगन में अपनी दादी के साथ खड़े थे. पंडितजी कुरसी पर बैठे थे और मांजी को समझा रहे थे कि जो हुआ अच्छा नहीं हुआ. अब विभु की आत्मा की शांति के लिए उन्हें हवन- पूजा करनी होगी.. भारी दान देना होगा, क्योंकि आप की बहू के हाथों भारी पाप हो गया है.

मेरा अपना बड़ा बेटा त्रिशंक मुझे हिकारत से देखते हुए क्रोध में बोला, ‘‘मेरा अधिकार आप का कैसे हो गया, मां? यह आप ने अच्छा नहीं किया.’’

‘‘परिस्थितियां ऐसी थीं जिन में एक के अधिकार के लिए दूसरे के शरीर की दुर्गति तो मैं नहीं कर सकती थी, बेटे,’’ भीगी आंखों से बेटे को देखते हुए मैं ने कहा.

‘‘मजबूरी का नाम दे कर अपनी गलती पर परदा मत डालिए, मां.’’

तभी मांजी गरजीं, ‘‘बड़ी आंदोलनकारी बनती है. अरे, इस से पूछ त्रिशंक कि विभु के कुछ अवशेष भी साथ लाई है या सब वहीं गंगा में बहा आई.’’

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‘‘बोलो न मां, चुप क्यों हो? दो जवाब दादी की बातों का.’’

‘‘कैसी बातें कर रहे हो भैया, आखिर पापा पर पहला हक तो मां का ही था न?’’

‘‘चुप बेसऊर,’’ मांजी फिर गरजीं, ‘‘पति की मौत पर पत्नी को होश ही कहां होता है जो वह उस का अंतिम संस्कार करे, इसे तो कोई दुख ही न हुआ होगा, आजाद जो हो गई. अब करेगी समाज सेवा जम कर.’’

‘‘चुप रहिए,’’ मेरी सहनशक्ति जवाब दे गई और मैं गरज पड़ी, ‘‘मेरा कुसूर क्या है? किस बात की सजा दे रहे हैं आप सब मुझे. यही न कि मैं ने अपने पति का उन की मौत के बाद अंतिम संस्कार क्यों कर दिया, तो सुनिए, वह मेरी मजबूरी थी. क्षतविक्षत खून से सनी लाश को मैं 2 दिन तक कैसे संभालती. कटरा से कोलकाता की दूरी कितनी है, क्या आप सब नहीं जानते? मेरे पास कोई साधन नहीं था. कैसे ले कर आती उन्हें यहां तक? फिर अपने पति का, जो मेरे जीवनसाथी थे, हर दुखसुख के भागीदार थे, अंतिम संस्कार कर के मैं ने क्या गलत कर दिया?’’

मेरी आवाज भर्रा गई और मैं ऊपर अपने कमरे में आ गई. मेरी दोनों बहुएं रेवती और रौबिंका भी मेरे पीछेपीछे ऊपर आ गईं. मेरी छोटी बहू रशियन थी. उस की समझ में जब कुछ नहीं आया तो वह अंगरेजी में बस यही कहती रही, ‘‘पापा की आत्मा के लिए प्रार्थना करो, वही ज्यादा जरूरी है, यह कलह क्यों हो रही है.’’

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मैं उसे क्या समझाती कि यहां हर धार्मिक अनुष्ठान शोरगुल और चिल्लाहट से ही शुरू होता है. कहीं पढ़ा था कि झूठ को जोर से बोलो तो वह सच बन जाता है. यही पूजापाठ का मंत्र भी है, जो पुजारी जितनी जोर से मंत्र पढे़गा, वह उतना ही बड़ा पंडित माना जाएगा.

मेरी आंखों में आंसू आ गए जो मेरे गालों पर बह निकले. विभु की मौत हो गई है. मेरा सबकुछ चला गया, मैं इस का शोक भी शांति से नहीं मना पा रही हूं. कमरे की खिड़की का परदा जरा सा खिसका हुआ था. दूर गगन में देखते हुए मैं अतीत में चली गई.

तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं: भाग 4

‘‘इस तरह एक साल गुजर गया. उस दिन भी हाईकोर्ट में विभाग के विरुद्ध एक मुकदमे में मैं भी मौजूद था. विभाग के विरुद्ध वादी के वकील के कुछ हास्यास्पद से तर्क सुन कर जज साहब व्यंग्य से मुसकराए थे और उसी तरह मुसकराते हुए प्रतिवादी के वकील हमारी वकील साहिबा की ओर देख कर बोले, ‘हां वकील साहिबा, अब आप क्या कहेंगी.’

‘‘जज साहब के मुसकराने से अचानक पता नहीं वकील साहिबा पर क्या प्रतिक्रिया हुई. वे फाइल को जज साहब की तरफ फेंक कर बोलीं, ‘हां, अब तुम भी कहो, मैं, जवान हूं, सुंदर हूं, चढ़ाओ मुझे चने की झाड़ पर,’ कहते हुए वे बड़े आक्रोश में जज साहब के डायस की तरफ बढ़ीं तो इस बेतुकी और अप्रासंगिक बात पर जज साहब एकदम भड़क गए और इस गुस्ताखी के लिए वकील साहिबा को बरखास्त कर उन्हें सजा भी दे सकते थे पर गुस्से को शांत करते हुए जज साहब संयत स्वर में बोले, ‘वकील साहिबा, आप की तबीयत ठीक नहीं लगती, आप घर जा कर आराम करिए. मैं मुकदमा 2 सप्ताह बाद की तारीख के लिए मुल्तवी करता हूं.’

‘‘उस दिन जज साहब की अदालत में मुकदमा मुल्तवी हो गया. मगर इस के बाद लगातार कुछ ऐसी ही घटनाएं और हुईं. एक दिन वह आया जब एक दूसरे जज महोदय की नाराजगी से उन्हें मानसिक चिकित्सालय भिजवा दिया गया. अजीब संयोग था कि ये सभी घटनाएं मेरी मौजूदगी में ही हुईं.

‘‘वकील साहिबा की इस हालत की वजह खुद को मानने के चलते अपनी नैतिक जिम्मेदारी मानते हुए औफिस से ही समय निकाल कर उन का कुशलक्षेम लेने अस्पताल हो आता था. एक दिन वहां की डाक्टर ने मुझ से उन के रिश्ते के बारे पूछ लिया तो मैं ने डाक्टर को पूरी बात विस्तार से बतला दी. डाक्टर ने मेरी परिस्थिति जान कर मुलाकात का समय नहीं होने पर भी मुझे उन की कुशलक्षेम जानने की सुविधा दी. फिर डाक्टर ने सीधे उन के सामने पड़ने से परहेज रखने की मुझे सलाह देते हुए बताया कि वे मुझे देख कर चिंतित सी हो कर बोलती हैं, ‘तुम ने क्यों कहा, मैं सुंदर हूं.’ और मेरे चले आने पर लंबे समय तक उदास रहती हैं.

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‘‘बेटा उच्चशिक्षा के बाद और बड़ी बेटी व दामाद किसी विदेशी बैंकिंग संस्थान में अच्छे वेतन व भविष्य की खातिर विदेश चले गए थे. छोटी बेटी केंद्र की प्रशासनिक सेवा में चयनित हो गई थी. मगर वह औफिसर्स होस्टल में रह रही थी. अब परिवार में मेरे और पत्नी के अलावा कोई नहीं था. उधर पत्नी के मन में मेरे और वकील साहिबा के काल्पनिक अवैध संबंधों को ले कर गहराते शक के कारण उन का ब्लडप्रैशर एकदम बढ़ जाता था, और फिर दवाइयों के असर से कईकई दिनों तक मैमोरीलेप्स जैसी हालत हो जाती थी.

‘‘इसी हालात में उन्हें दूसरा झटका तब लगा जब बेटे ने अपनी एक विदेशी सहकर्मी युवती से शादी करने का समाचार हमें दिया.

‘‘उस दिन मेरे मुंह से अचानक निकल गया, ‘अब मन्नू को तो वकील साहिबा ने नहीं भड़काया.’ मेरी बात सुन कर पत्नी ने कोई विवाद खड़ा नहीं किया तो मुझे थोड़ा संतोष हुआ. मगर उस के बाद पत्नी को हाई ब्लडप्रैशर और बाद में मैमोरीलेप्स के दौरों में निरंतरता बढ़ने लगी तो मुझे चिंता होने लगी.

‘‘कुछ दिनों बाद उन्हें फिर से डिप्रैशन ने घेर लिया. अब पूरी तरह अकेला होने कारण पत्नी की देखभाल के साथ दैनिक जीवन की जरूरतों को पूरा करना बेहद कठिन महसूस होता था. रिटायरमैंट नजदीक था, और प्रमोशन का अवसर भी, इसलिए लंबी छुट्टियां ले कर घर पर बैठ भी नहीं सकता था. क्योंकि प्रमोशन के मौके पर अपने खास ही पीठ में छुरा भोंकने का मौका तलाशते हैं और डाक्टर द्वारा बताई गई दवाइयों के असर से वे ज्यादातर सोई ही रहती थीं. फिर भी अपनी गैरहाजिरी में उन की देखभाल के लिए एक आया रख ली थी.

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‘‘उस दिन आया ने कुछ देर से आने की सूचना फोन पर दी, तो मैं उन्हें दवाइयां, जिन के असर से वे कमसेकम 4 घंटे पूरी तरह सोईर् रहती थीं, दे कर औफिस चला गया था. पता नहीं कैसे उन की नींद बीच में ही टूट गई और मेरी गैरहाजिरी में नींद की गोलियों के साथ हाई ब्लडप्रैशर की दशा में ली जाने वाली गोलियां इतनी अधिक निगल लीं कि आया के फोन पर सूचना पा कर जब मैं घर पहुंचा तो उन की हालत देख कर फौरन उन्हें ले कर अस्पताल को दौड़ा. मगर डाक्टरों की कोशिश के बाद भी उन की जीवन रक्षा नहीं हो सकी.

‘‘पत्नी की मृत्यु पर बेटे ने तो उस की पत्नी के आसन्न प्रसव होने के चलते थोड़ी देर इंटरनैट चैटिंग से शोक प्रकट करते हुए मुझ से संवेदना जाहिर की थी, मगर दोनों बेटियां आईं थी. छोटी बेटी तो एक चुभती हुई खमोशी ओढ़े रही, मगर बड़ी बेटी का बदला हुआ रुख देख कर मैं हैरान रह गया. वकील साहिबा को मौसी कह कर उन के स्नेह से खुश रहने वाली और बैंकसेवा के चयन से ले कर उस के जीवनसाथी के साथ उस का प्रणयबंधन संपन्न कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निबाहने के कारण उन की आजीवन ऋ णी रहने की बात करने वाली मेरी बेटी ने जब कहा, ‘आखिर आप के और उन के अफेयर्स के फ्रस्टेशन ने मम्मी की जान ले ही ली.’ और मां को अपनी मौसी की सेवा की याद दिलाने वाली छोटी बेटी ने भी जब अपनी बहन के ताने पर भी चुप्पी ही ओढ़े रही तो मैं इस में उस का भी मौन समर्थन मान कर बेहद दुखी हुआ था.

हरिराम- भाग 3: शशांक को किसने सही राह दिखाई

दूसरे दिन इमामबाड़ा की भूलभुलैया में दोनों एकदूसरे का हाथ पकड़ कर रास्ता खोजते रहे. शशांक और सरिता को लगा कि उन के कालिज के दिन लौट आए हैं. शाम को गोमती के किनारे बने पार्क में बैठेबैठे सरिता ने शशांक के कंधे पर सिर रख दिया और आंखें बंद कर लीं.

‘‘सरू, तुम्हें पता है, मुझ में आए इस बदलाव का जिम्मेदार कौन है…इस का जिम्मेदार हरिराम है,’’ उस ने सरिता के बालों को सहलाते हुए उस शाम की घटना बता दी. शशांक दूसरे दिन प्रोजेक्ट पर पहुंचा तो वह खुद को बहुत हलका महसूस कर रहा था. उस ने पाया कि उस में कुछ कर दिखाने की इच्छाशक्ति पहले से दोगुनी हो गई है.

इधर सरिता ने हरिराम के कमरे में जा कर कहा, ‘‘काका, आप के कारण मेरी खोई हुई गृहस्थी, मेरा परिवार मुझे वापस मिला है. मैं आप की जिंदगी भर ऋणी रहूंगी. मैं अब आप को काका कह कर बुलाऊंगी.’’

हरिराम ने भावुक हो कर सरिता के सिर पर हाथ फेरा. ‘‘काका, अब मैं यहीं रहूंगी और खाना मैं बनाऊंगी आप आराम करना.’’

‘‘नहीं बिटिया, मेरा काम मत छीनो. हां, अपनेआप को व्यस्त रखो और कुछ नया करना सीखो.’’ सरिता ने चित्रकला सीखनी शुरू कर दी. शशांक के प्रयासों से लखनऊ प्रोजेक्ट में पहले धीमी और फिर तेज प्रगति होने लगी. उत्तर प्रदेश विद्युत निगम ने कंपनी को भुगतान शुरू कर दिया. यही नहीं, उस प्रोजेक्ट के विस्तार का काम भी उस की कंपनी को मिल गया.

1 माह के बाद सरिता ने हरिराम से कहा, ‘‘काका, आप के कारण मुझे अपनी गलतियों का एहसास हो रहा है. मैं दिल्ली में बिलकुल खाली रहती थी. इस कारण मेरा दिमाग गलत विचारों का कारखाना बन गया था. बजाय शशांक की परेशानी समझने के मैं अपने पति पर शक करने लगी थी.’’ हरिराम के लाख मना करने पर भी सरिता ने उस का एक बड़ा चित्र बनाया.

इधर दिल्ली में कंपनी अध्यक्ष मि. सेनगुप्ता के सामने निदेशक मि. उत्पल बनर्जी पसीनापसीना हो रहे थे. ‘‘मि. बनर्जी, आप को पता है कि हरियाणा विद्युत निगम ने कंपनी को फरीदाबाद प्रोजेक्ट के लिए कोर्ट का नोटिस भेजा है?’’

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‘‘सर, शशांक बहुत गड़बड़ कर के गया है. उस ने कोई कागज न गांगुली को और न मुझे दिया है. बिना कागज के तो….’’ ‘‘मि. बनर्जी, आप मुझे क्या बेवकूफ समझते हैं?’’

‘‘नहीं सर, आप तो…’’ ‘‘मि. बनर्जी, सारी गड़बड़ आप के दिमाग में है. आप आदमी का मूल्यांकन उस के काम से नहीं बल्कि उस के बंगाली होने या न होने से करते हैं.’’

‘‘मेरे पास उन फाइलों और रिपोर्टों की पूरी सूची है जो शशांक, जतिन गांगुली को दे कर गया है.’’ ‘‘यस सर.’’

‘‘आप और गांगुली 1 सप्ताह के अंदर फरीदाबाद वाले प्रोजेक्ट को रास्ते पर लाइए या अपना त्यागपत्र दीजिए.’’ ‘‘सर, 1 सप्ताह में…’’

‘‘आप जा सकते हैं.’’ 1 सप्ताह के बाद मि. उत्पल बनर्जी और मि. गांगुली कंपनी से निकाले जा चुके थे. मि. सेनगुप्ता ने शशांक को फोन कर के कंपनी की इज्जत की खातिर फरीदाबाद प्रोजेक्ट का अतिरिक्त भार लेने को कहा.

‘‘हरिराम, तुम ने ठीक कहा था. ईमानदारी और मेहनत से काम करने पर हर व्यक्ति की प्रतिभा का मूल्यांकन होता है,’’ शशांक दिल्ली के लिए विदा लेते समय बोला. ‘‘काका, आप की बहुत याद आएगी,’’ सरिता बोली.

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1 माह बाद फरीदाबाद प्रोजेक्ट भी ठीक हो गया और शशांक को दोहरा प्रमोशन दे कर कंपनी का जनरल मैनेजर बना दिया गया. उस ने हरिराम को अपने प्रमोशन की खबर देने के लिए फोन किया तो पता चला कि हरिराम नौकरी छोड़ कर कहीं चला गया है.

शाम को शशांक ने हरिराम के बारे में सरिता को बताया तो वह गंभीर हो गई, फिर बोली, ‘‘हरिराम काका शायद अपने बिछुड़े परिवार की तलाश में गए होंगे या शांति की तलाश में.’’ आज 3 साल बाद शशांक कंपनी में निदेशक है. सरिता ने चित्रकला का स्कूल खोला है. उन की बैठक में हरिराम का सरिता द्वारा बनाया हुआ चित्र लगा है.

परख- भाग 3: प्यार व जनून के बीच थी मुग्धा

दोनों की धूमधाम से सगाई हुई और 2 महीने बाद ही विवाह की तिथि निश्चित कर दी गई. सारा परिवार जोश के साथ विवाह की तैयारी में जुटा था कि अचानक प्रसाद ने एकाएक प्रकट हो कर मुग्धा को बुरी तरह झकझोर दिया था. उस ने प्रसाद को पूरी तरह अनदेखा करने का निर्णय लिया पर वह जब भी औफिस से निकलती, प्रसाद उसे वहीं प्रतीक्षारत मिलता. वह प्रतिदिन आग्रह करता कि कहीं बैठ कर उस से बात करना चाहता है, पर मुग्धा कैब चली जाने का बहाना बना कर टाल देती.

पर एक दिन वह अड़ गया कि कैब का बहाना अब नहीं चलने वाला. ‘‘कहा न, मैं तुम्हें छोड़ दूंगा. फिर क्यों भाव खा रही हो. इतने लंबे अंतराल के बाद तुम्हारा प्रेमी लौटा है, मुझे तो लगा तुम फूलमालाओं से मेरा स्वागत करोगी पर तुम्हारे पास तो मेरे लिए समय ही नहीं है.’’

‘‘किस प्रेमी की बात कर रहे हो तुम? प्रेम का अर्थ भी समझते हो. मुझे कोई रुचि नहीं है तुम में. मेरी मंगनी हो चुकी है और अगले माह मेरी शादी है. मैं नहीं चाहती कि तुम्हारी परछाई भी मुझ पर पड़े.’’

‘‘समझ गया, इसीलिए तुम मुझे देख कर प्रसन्न नहीं हुईं. नई दुनिया जो बसा ली है तुम ने. तुम तो सात जन्मों तक मेरी प्रतीक्षा करने वाली थीं, पर तुम तो 7 वर्षों तक भी मेरी प्रतीक्षा नहीं कर सकीं. सुनो मुग्धा, कहीं चल कर बैठते हैं. मुझे तुम से ढेर सारी बातें करनी हैं. अपने बारे में, तुम्हारे बारे में, अपने भविष्य के बारे में.’’

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‘‘पता नहीं प्रसाद, तुम क्या कहना चाह रहे हो. मुझे नहीं याद कि मैं ने तुम्हारी प्रतीक्षा करने का आश्वासन दिया था. आज मुझे मां के साथ शौपिंग करनी है. वैसे भी मैं इतनी व्यस्त हूं कि कब दिन होता है, कब रात, पता ही नहीं चलता,’’ मुग्धा ने अपनी जान छुड़ानी चाही. जब तक प्रसाद कुछ सोच पाता, मुग्धा कैब में बैठ कर उड़नछू हो गई थी.

‘‘क्या हुआ?’’ बदहवास सी मुग्धा को कैब में प्रवेश करते देख सहयात्रियों ने प्रश्न किया.

‘‘पूछो मत किस दुविधा में फंस गई हूं मैं. मेरा पुराना मित्र प्रसाद लौट आया है. रोज यहां खड़े हो कर कहीं चल कर बैठने की जिद करता है. मैं बहुत डर गई हूं. तुम ही बताओ कोई 3 वर्षों के लिए गायब हो जाए और अचानक लौट आए तो उस पर कैसे भरोसा किया जा सकता है.’’

‘‘समझा, ये वही महाशय हैं न जिन्होंने पार्टी में सब के सामने तुम्हें थप्पड़ मारा था,’’ उस के सहकर्मी अनूप ने जानना चाहा था.

‘‘हां. और गुम होने से पहले हमारी बोलचाल तक नहीं थी. पर अब वह ऐसा व्यवहार कर रहा है मानो कुछ हुआ ही नहीं था,’’ मुग्धा की आंखें डबडबा आई थीं, गला भर्रा गया था.

‘‘तुम से वह चाहता क्या है?’’ अनूप ने फिर प्रश्न किया, कैब में बैठे सभी सहकर्मियों के कान ही कान उग गए.

‘‘पता नहीं, पर अब मुझे डर सा लगने लगा है. पता नहीं कब क्या कर बैठे. पता नहीं, ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है?’’

मुग्धा की बात सुन कर सभी सहकर्मियों में सरसरी सी फैल गई. थोड़ी देर विचारविमर्श चलता रहा.

‘‘मुग्धा तुम्हारा डर अकारण नहीं है. ऐसे पागल प्रेमियों से बच कर रहना चाहिए. पता नहीं, कब क्या कर बैठें?’’ सब ने समवेत स्वर में अपना डर प्रकट किया.

‘‘मेरे विचार से तो मुग्धा को इन महाशय से मिल लेना चाहिए,’’ अनूप जो अब तक सोचविचार की मुद्रा में बैठा था, गंभीर स्वर में बोला.

‘‘अनूप, तुम ऐसा कैसे कर सकते हो. बेचारी को शेर की मांद में जाने को बोल रहे हो,’’ मुग्धा की सहेली मीना बोली.

‘‘यह मत भूलो कि 3 वर्षों तक मुग्धा स्वेच्छा से प्रसाद से प्रेम की पींगें बढ़ाती रही है. मैं तो केवल यह कह रहा हूं विवाह से पहले ही इस पचड़े को सुलझाने के लिए प्रसाद से मिलना आवश्यक है. कब तक डर कर दूर भागती रहेगी. फिर यह पता लगाना भी तो आवश्यक है कि प्रसाद बाबू इतने वर्षों तक थे कहां. उसे साफ शब्दों में बता दो कि तुम्हारी शादी होने वाली है और वह तुम्हारे रास्ते से हट जाए.’’

‘‘मैं ने उसे पहले दिन ही बता दिया था ताकि वह यह न समझे कि मैं उस की राह में पलकें बिछाए बैठी हूं,’’ मुग्धा सिसक उठी थी.

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‘‘मैं तो कहती हूं सारी बातें परख को बता दे. जो करना है दोनों मिल कर करेंगे तो उस का असर अलग ही होगा,’’ मीना बोली तो सभी ने स्वीकृति में सिर हिला कर उस का समर्थन किया. मुग्धा को भी उस की बात जंच गई थी.

उस ने घर पहुंचते ही परख को फोन किया. ‘‘क्या बात है? आज अचानक ही हमारी याद कैसे आ गई,’’ परख हंसा.

‘‘याद तो उस की आती है जिसे कभी भुलाया हो. तुम्हारी याद तो साए की तरह सदा मेरे साथ रहती है. पर आज मैं ने बड़ी गंभीर बात बताने के लिए फोन किया है,’’ मुग्धा चिंतित स्वर में बोली.

‘‘अच्छा, तो कह डालो न. किस ने मना किया है.’’

‘‘प्रसाद लौट आया है,’’ मुग्धा ने मानो किसी बड़े रहस्य पर से परदा हटाया.

‘‘कौन प्रसाद? तुम्हारा पूर्व प्रेमी?’’

‘‘हां, वही.’’

‘‘तो क्या अपना पत्ता कट गया?’’ परख हंसा.

‘‘कैसी बातें करते हो? यह क्या गुड्डेगुडि़यों का खेल है? हमारी मंगनी हो चुकी है. वैसे भी मुझे उस में कोई रुचि नहीं है.’’

‘‘यों ही मजाक कर रहा था, आगे बोलो.’’‘‘मैं जब औफिस से निकलती हूं तो राह रोक कर खड़ा हो जाता है, कहता है कि कहीं बैठ कर बातें करते हैं. मैं कैब चली जाने की बात कह कर टालती रही हूं पर अब उस से डर सा लगने लगा है.’’

‘‘पर इस में डरने की क्या बात है? प्रसाद से मिल कर बता दो कि तुम्हारी मंगनी हो चुकी है. 2 महीने बाद विवाह होने वाला है. वह स्वयं समझ जाएगा.’’

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‘‘वही तो समस्या है. वह बातबात पर हिंसक हो उठता है. कह रहा था मुझे उस की प्रतीक्षा करनी चाहिए थी. तुम 2 दिन की छुट्टी ले कर आ जाओ. हम दोनों साथ ही मिल लेंगे प्रसाद से,’’ मुग्धा ने अनुनय की.

‘‘यह कौन सी बड़ी बात है. तुम ने बुलाया, हम चले आए. मैं तुम से मिलने आ रहा हूं. मैं प्रसाद जैसे लोगों की परवा नहीं करता. पर तुम डरी हुई हो तो हम दोनों साथ में उस से मिल लेंगे और सारी स्थिति साफ कर देंगे,’’ परख अपने चिरपरिचित अंदाज में बोला.

मुग्धा परख से बात कर के आश्वस्त हो गई. वैसे भी उस ने परख को अपने बारे में सबकुछ बता दिया था जिस से विवाह के बाद उसे किसी अशोभनीय स्थिति का सामना न करना पड़े.मुग्धा और परख पहले से निश्चित समय पर रविवार को प्रसाद से मिलने पहुंचे. कौफी हाउस में दोनों पक्ष एकदूसरे के सामने बैठे दूसरे पक्ष के बोलने की प्रतीक्षा कर रहे थे.

‘‘आप मुग्धा से विचारविमर्श करना चाहते थे,’’ आखिरकार परख ने ही मौन तोड़ा.

‘‘आप को मुग्धा ने बताया ही होगा कि हम दोनों की मंगनी हो चुकी है और शीघ्र ही हम विवाह के बंधन में बंधने वाले हैं,’’ परख ने समझाया.

‘‘मंगनी होने का मतलब यह तो नहीं है कि मुग्धा आप की गुलाम हो गई और अपनी इच्छा से वह अपने पुराने मित्रों से भी नहीं मिल सकती.’’

‘‘यह निर्णय परख का नहीं, मेरा है, मैं ने ही परख से अपने साथ आने को कहा था,’’ उत्तर मुग्धा ने दिया.

‘‘समझा, अब तुम्हें मुझ से अकेले मिलने में डर लगने लगा है. मुझे तो आश्चर्य होता है कि तुम जैसी तेजतर्रार लड़की इस बुद्धू के झांसे में आ कैसे गई. सुनिए महोदय, जो भी नाम है आप का, मैं लौट आया हूं. मुग्धा को आप ने जो भी सब्जबाग दिखाए हों पर मैं उसे अच्छी तरह जानता हूं. वह तुम्हारे साथ कभी खुश नहीं रह सकती. वैसे भी अभी मंगनी ही तो हुई है. कौन सा विवाह हो गया है. भूल जाओ उसे. कभी अपनी शक्ल देखी है आईने में? चले हैं मुग्धा से विवाह करने, ’’ प्रसाद का अहंकारी स्वर देर तक हवा में तैरता रहा.

‘‘एक शब्द भी और बोला प्रसाद, तो मैं न जाने क्या कर बैठूं, तुम परख का ही नहीं, मेरा भी अपमान कर रहे हो,’’ मुग्धा भड़क पड़ी.

‘‘मेरी बात भी ध्यान से सुनिए प्रसाद बाबू, पता नहीं आप स्वयं को कामदेव का अवतार समझते हैं या कुछ और, पर भविष्य में मुग्धा की राह में रोड़े अटकाए तो मुझ से बुरा कोई नहीं होगा. चलो मुग्धा, यह इस योग्य ही नहीं है कि इस से कोई वार्त्तालाप किया जा सके,’’ परख उठ खड़ा हुआ.

पलक झपकते ही दोनों प्रसाद की आंखों से ओझल हो गए. देर से ही सही, प्रसाद की समझ में आने लगा था कि अपना सब से बड़ा शत्रु वह स्वयं ही था.

बाहर निकलते ही मुग्धा ने परख का हाथ कस कर थाम लिया. उसे पूरा विश्वास हो गया था कि उस ने परख को परखने में कोई भूल नहीं की थी.

Manohar Kahaniya: शैली का बिगड़ैल राजकुमार- भाग 3

सौजन्य- मनोहर कहानियां

मोनिका का पति अमनदीप वासी अमेरिका में जौब करता था और वहां की उसे स्थाई नागरिकता मिली हुई थी. मोनिका कुछ समय के अंतराल पर पति से मिलने अमेरिका जाती रहती थी. मोनिका के 14 साल की एक बेटी और 9 साल का एक बेटा था, जोकि उस के साथ ही रहते थे.

शैली शहर में आ कर रही तो उस ने अपना और अपनी बेटी का खर्चा उठाने के लिए करनाल की मुगल मार्केट में सोलर एनर्जी से जुड़ी एक कंपनी के औफिस में नौकरी कर ली थी.

कुछ दिन में राज भी उस के पास वहां आ कर रहने लगा. राज काम करना चाहता था. उस के पास पैसे नहीं थे. वह शैली से पैसों का इंतजाम करने को कहता था. राज को पता था कि शैली के पास काफी पैसा है और दिल्ली में पहले पति का फ्लैट भी उस के नाम है. राज ने जब काफी जिद की तो शैली ने पिछले साल 10 लाख रुपयों का इंतजाम कर के उसे पैसा कमाने के लिए पुर्तगाल भेजा.

भारती के प्यार ने बदल दी सोच

पुर्तगाल में राज किसी कंपनी में लग गया. इसी दौरान फेसबुक पर राज की मुलाकात 21 वर्षीय भारती से हुई. भारती करनाल के कौल गांव की रहने वाली थी. उस के पिता एक ज्वैलर थे.

भारती से फेसबुक पर दोस्ती हुई तो उन में बातचीत होने लगी. दोनों एकदूसरे को पसंद करने लगे. भारती और राज एकदूसरे के बारे में जानने को उत्सुक थे. राज ने भारती को बताया कि वह शादीशुदा है लेकिन वह अपनी पत्नी से तलाक लेने वाला है.

पत्नी उम्र में बड़ी है और उस की एक बेटी है जिस की उम्र 21 साल है, जितनी उस की (भारती) उम्र है. शैली ने साजिश के तहत उस पर दबाव बना कर उस से शादी की थी. अब वह उस से पीछा छुड़ाना चाहता है.

वैसे भी ऐसे बेमेल रिश्ते का खत्म हो जाना अच्छा है.

राज की बात सुन कर भारती खुश हुई. उस ने राज से बिना सोचेसमझे अपने प्यार का इजहार कर दिया. राज उस की हिम्मत की दाद देने लगा. राज भी यही चाहता था. उसे लगा था कि भारती को लाइन पर लाने में काफी समय लगेगा, लेकिन यहां तो वह खुद ही बिना देर किए उस की गोद में आ गिरी. राज ने भी उस से अपने प्यार का इजहार किया. फिर दोनों का प्यार परवान चढ़ने लगा.

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12 मार्च, 2021 को राज पुर्तगाल से वापस करनाल आ गया. वह भारती से मिला. दोनों मिल कर बहुत खुश हुए. इस के बाद उन की बराबर मुलाकातें होने लगीं. पुर्तगाल से वापस आते ही राज ने अपने रंग दिखाने शुरू कर दिए. वह शैली से दिल्ली वाला फ्लैट बेचने का दबाव बनाने लगा. फ्लैट बेच कर मिलने वाले पैसों से वह अमेरिका जाना चाहता था.

शैली को हटाने की बनाई योजना

शैली ने साफ मना कर दिया. भारती से शादी करने के लिए वह शैली से तलाक देने की बात करने लगा. तलाक की वजह उस ने शैली को बताई कि उस के कोई बच्चा नहीं हो रहा, इसलिए वह तलाक लेना चाहता है.

जबकि शैली ने शादी से पहले ही उस से कह दिया था कि वह बच्चा नहीं चाहती. फिर भी अब राज उस से बच्चा न होने का उलाहना दे कर तलाक चाहता था. राज को शैली से तलाक पाने का यही सही तरीका लगा था. लेकिन शैली तलाक देने को तैयार नहीं हुई.

राज ने भारती को बताया तो भारती ने उस से कहा कि कैसे भी कर के उसे रास्ते से हटाओ, उस की हत्या करनी पड़े तो वह भी करो. शैली ने राज के लिए सारे रास्ते बंद कर रखे थे. इसलिए उस ने भी निश्चय कर लिया कि शैली से हर हाल में छुटकारा पाना है. इस के लिए राज और भारती ने योजना बनाई. योजना ऐसी कि जिस से मामला हत्या का नहीं, हादसे का लगे.

19 मई, 2021 को राज शैली और तान्या को बठिंडा में रहने वाले दादा से मिलवाने के लिए बाइक पर बैठा कर करनाल से चला. किरमिच के पास भाखड़ा नदी में जानबूझ कर उस ने अपनी बाइक गिरा दी. बाइक के साथ ही तीनों नदी में गिर गए. शैली और तान्या को तैरना नहीं आता था. राज यह जानता था, इसीलिए यह योजना बनाई थी.

नदी में गिरने पर राज ने लात मार कर शैली व तान्या को नदी के बीच में कर दिया, जिस से वे डूब कर मर जाएं. जब डूबने से दोनों की मौत हो गई, तब वह तैर कर नदी से बाहर निकला. फिर जेब में पन्नी में लिपटा मोबाइल निकाला और भारती को काल कर के दोनों का काम हो जाने की बात बताई.

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योजना में हुए सफल

बात करने के बाद फोन को नदी में फेंक दिया. वह चिल्ला कर लोगों को हादसा बताने का ड्रामा करने लगा. वहां लोगों से पत्नी और सौतेली बेटी के नदी में गिरने की बात कहने लगा, दोनों को तैरना नहीं आता, ये भी बात बताई.

पास में ही ईंट भट्ठे पर मजदूर काम करते थे. वे दोनों को बचाने के लिए नदी में कूद गए. काफी तलाशने पर शैली मृत अवस्था में मिली, जिसे वे मजदूर नहर से बाहर निकाल लाए. तान्या का कुछ पता नहीं चला. राज ने अपने परिवार वालों को घटनास्थल पर बुलवा लिया. घटनास्थल कुरुक्षेत्र जिले के केयूके थाना क्षेत्र में आता था. पुलिस को घटना की सूचना दे दी गई.

सूचना पा कर केयूके थाने के एसएचओ राकेश राणा अपनी टीम के साथ मौके पर पहुंच गए. राज वर्मा ने उन्हें घटना के बारे में बताया. थानाप्रभारी राणा ने गोताखोरों को नदी में उतार कर तान्या की खोजबीन की, लेकिन तान्या का कुछ पता नहीं चला. इस पर उन्होंने शैली की लाश का निरीक्षण करने के बाद पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया.

राज ने मोनिका को शाम 4 बज कर 20 मिनट पर फोन कर के हादसा होने की जानकारी दी थी. जबकि घटना अपराह्न 3 बजे की थी. राज ने जो बताया, उस से मोनिका समझ गई कि राज ने दोनों को मारने का प्लान बनाया था, जिसे हादसा होना बता रहा है.

मोनिका ने केयूके थाने जा कर एक तहरीर दी, जिस में उस ने राज की हरकतों का ब्यौरा देते हुए अपनी बहन और उस की बेटी की हत्या का आरोप उस पर लगाया था. उस साजिश में राज के मातापिता, भाई और 3 बहनों पर आरोप लगाया था.

थानाप्रभारी राकेश राणा को पहले ही राज वर्मा की बातों पर शक था. मोनिका की तहरीर के बाद वह शक और भी पुख्ता हो गया. उन्होंने मोनिका को वादी बना कर राज वर्मा और उस के 6 पारिवारिक सदस्यों के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 34, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया.

इस के बाद थानाप्रभारी राणा ने राज वर्मा को गिरफ्तार कर उस से पूछताछ की तो वह गुमराह करता रहा. 21 मई, 2021 को उसे कोर्ट में पेश कर के एक दिन की रिमांड पर लिया गया.

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राज वर्मा के फोन नंबर की काल डिटेल्स की जांच करने के बाद 22 मई को भारती को भी उस के गांव कौल से गिरफ्तार कर लिया गया. 22 मई को नया ऐंगल सामने आने के बाद कोर्ट से राज वर्मा की एक दिन की रिमांड और ली गई.

राज और भारती का आमनासामना करा कर पूछताछ की गई तो सारा भेद खुल कर सामने आ गया. पुलिस ने गोताखोरों की मदद से नदी से राज की बाइक बरामद कर ली. 23 मई, 2021 को जांबा गांव के पास नदी से तान्या की लाश भी बरामद हो गई. 23 मई को राजकुमार वर्मा और भारती को कोर्ट में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया. द्य

—कथा पुलिस सूत्रों और मोनिका से पूछताछ पर आधार

Satyakatha- डॉक्टर दंपति केस: भरतपुर बना बदलापुर- भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

दीपा और शौर्य की भरतपुर की सूर्या सिटी में 7 नवंबर, 2019 को मकान में स्प्रिट से आग लगा कर हत्या कर दी गई थी. दीपा और शौर्य की हत्या का आरोप डा. सुदीप, उस की पत्नी डा. सीमा और मां सुरेखा गुप्ता पर है. इस मामले में उस समय तीनों की ही गिरफ्तारी हुई थी. बाद में पिछले साल यानी 2020 में मई से अगस्त महीने के बीच अलगअलग समय पर जमानत होने पर ये तीनों जेल से बाहर आए थे.

बदला लेने की भावना से डाक्टर दंपति की हत्या किए जाने की आशंका का पता चलने पर पुलिस ने दीपा के भाईबहनों की तलाश शुरू की. इस बीच, पुलिस ने सीसीटीवी फुटेज हासिल कर लिए. इन फुटेज से पता चला कि डाक्टर दंपति को गोलियां मारने वाला युवक अनुज था. अनुज दीपा का भाई था.

अनुज और उस के साथ बाइक पर आए दूसरे युवक का पता लगाने के लिए पुलिस ने दीपा की बहन राधा को हिरासत में ले कर पूछताछ की. राधा ने ही डेढ़ साल पहले बहन दीपा और भांजे शौर्य की हत्या का मुकदमा पुलिस में दर्ज कराया था. राधा को फुटेज दिखाने पर पता चला कि दूसरा युवक उन का रिश्तेदार महेश है. महेश धौलपुर जिले का रहने वाला था.

दोनों हत्यारों की पहचान हो जाने पर पुलिस ने उन की तलाश शुरू कर दी. उन के भरतपुर या धौलपुर जिले के डांग इलाके में भाग जाने की संभावना थी. दोनों की तलाश में सर्च अभियान चला कर पुलिस की कई टीमें विभिन्न इलाकों में छापे मारने में जुट गईं.

भरतपुर रेंज के आईजी ने भरतपुर व धौलपुर सहित आसपास के जिलों में दोनों आरोपियों की फोटो भेज कर उन की तलाश करने के निर्देश पुलिस अधिकारियों को दिए. साइबर सेल को भी सक्रिय कर दिया गया.

भरतपुर शहर में विभिन्न मार्गों पर लगे सीसीटीवी कैमरों की मौनिटरिंग वाले अभय कमांड सेंटर से तमाम कैमरों की फुटेज देखी गई, ताकि हत्यारों के भागने की सही दिशा का पता चल सके. लेकिन पुलिस को इस में कामयाबी नहीं मिली.

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दीपा के भाई अनुज का नाम सामने आने पर पुलिस ने उस की कुंडली खंगाली. पता चला कि वह भरतपुर जिले के रुदावल कस्बे में इसी साल 16 मार्च को हुई फायरिंग की घटना में भी शामिल था.

इस वारदात में बदमाशों ने 15-20 राउंड गोलियां चला कर रुदावल कस्बे मे दहशत फैलाई थी. पुलिस ने इस मामले में कुछ बदमाशों को बाद में पकड़ा था, लेकिन अनुज नहीं पकड़ा गया था. पता चला कि वह राजेश उर्फ लल्लू शूटर की गैंग का बदमाश था. राजेश का गैंग लूट और रंगदारी वसूलने के अपराध करती है. अनुज के धौलपुर के कुछ डकैतों से भी संबंध होने का पता चला.

डाक्टर दंपति की हत्या हो गई थी और उन के निजी अस्पताल में उस समय कई मरीज भरती थे. इस बात का पता चलने पर अधिकारियों ने अस्पताल के कर्मचारियों की मदद से उन सभी मरीजों को दूसरे अस्पतालों में शिफ्ट कराया. डा. सुदीप के बाहर रहने वाले एकदो नजदीकी रिश्तेदारों को फोन से सूचना दी गई.

लौकडाउन के दौरान सरेआम दिनदहाड़े डाक्टर दंपति की हत्या होने से पुलिस और सरकार पर सवाल उठने लगे. सवाल उठने का दूसरा कारण यह भी था कि डाक्टर दंपति की हत्या से करीब 17 घंटे पहले ही भरतपुर सांसद रंजीता कोली की गाड़ी पर आधी रात के समय भरतपुर जिले के हलैना इलाके में हमला किया गया था.

सरकार की किरकरी होने पर दूसरे दिन 29 मई को जयपुर से चिकित्सा राज्यमंत्री डा. सुभाष गर्ग और एडीजी (कानून व्यवस्था) सुनील दत्त भरतपुर पहुंच गए. उन्होंने अधिकारियों की बैठक ली. हालात की समीक्षा कर कानून व्यवस्था की जानकारी ली.

बाद में एसपी देवेंद्र विश्नोई ने डाक्टर दंपति की हत्या के मामले में लापरवाही मानते हुए बीट कांस्टेबल और बीट प्रभारी को लाइन हाजिर कर दिया. वहीं, चिकित्सा राज्यमंत्री सुभाष गर्ग ने सुदीप और सीमा की हत्या को ले कर विवादित बात कही कि हर गलती सजा मांगती है. डाक्टर दंपति ने जो किया, उन्हें उस की सजा मिली. अब इन आरोपियों को भी मिलेगी.

दोपहर बाद पुलिस ने डा. सुदीप और डा. सीमा के शव का पोस्टमार्टम कराने के बाद वह घर वालों को सौंप दिए. डा. सुदीप के दोनों बच्चे नाबालिग होने और मां के कैंसर रोगी होने के कारण बाहर से आई सुदीप की बहन को शव सुपुर्द किए गए. बाद में पुलिस की मौजूदगी में दोनों शवों का एक ही चिता पर सामूहिक अंतिम संस्कार किया गया.

डाक्टर दंपति के परिवार पर मंडराते खतरे को देखते हुए पुलिस ने उन के मकान और कुछ रिश्तेदारों के आवास पर पहरा लगा दिया. इस बीच, लगातार छापे मारने के बावजूद पुलिस को दूसरे दिन भी दोनों हत्यारों का सुराग नहीं मिला. पुलिस इन के रिश्तेदारों और परिचितों से पूछताछ करती रही और उन के मोबाइल ट्रेस करती रही.

तीसरे दिन 30 मई, 2021 को पुलिस ने इस मामले में भरतपुर के रहने वाले दौलत और धौलपुर जिले के रहने वाले निर्भान सिंह को गिरफ्तार कर लिया. इन में दौलत महेश का जीजा है. उसी ने महेश को वह बाइक दी थी, जिससे डाक्टर दंपति की हत्या की वारदात की गई.

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दौलत पहलवानी करता है और जमीनजायदाद या जेवर गिरवी रख कर ब्याज पर रुपए देने का काम करता है. उस के दोनों कान टूटे हुए हैं. दूसरा आरोपी निर्भान सिंह दौलत का दोस्त था.

इन से पूछताछ में पता चला कि डाक्टर दंपति की हत्या की साजिश दौलत के घर पर ही रची गई थी. इस के लिए दौलत ने महेश को कुछ दिन पहले एक बाइक दे दी थी. महेश ने यह बाइक अनुज को दे दी थी. वारदात के वक्त महेश ही बाइक चला रहा था और अनुज पीछे बैठा था.

पुलिस के लिए अनुज और महेश की गिरफ्तारी ज्यादा बड़ी बात नहीं थी. हालांकि वे दोनों बदमाश थे और अपराधियों के सारे दांवपेच के साथ पुलिस से बचने के रास्ते भी जानते थे. मुख्य बात डाक्टर दंपति की हत्या के कारण का पता लगाना था. यह बात तो सामने आ गई थी कि डा. सुदीप और डा. सीमा की हत्या बदला लेने के लिए की गई थी, लेकिन इस में तात्कालिक कारण क्या रहे?

जांचपड़ताल में डाक्टर दंपति की हत्या का कारण जनचर्चाओं के अनुसार यह उभर कर सामने आया कि डा. सुदीप की प्रेमिका दीपा और उस के बेटे शौर्य की हत्या के केस में गवाही नहीं देने या बयान से मुकरने की बात चल रही थी.

दीपा के परिवार वाले डाक्टर से एक करोड़ रुपए मांग रहे थे और डाक्टर करीब 50 लाख रुपए देने को तैयार था. इसी बात पर दोनों पक्षों में बात नहीं बन रही थी.

दीपा और उस के बेटे शौर्य की हत्या के मामले में डा. सुदीप गुप्ता की जमानत 8 मई, 2020 को और डा. सीमा गुप्ता की 5 अगस्त, 2020 को हो गई थी. डाक्टर की मां सुरेखा भी जून 2020 में जमानत होने के बाद जेल से बाहर आ गई थी. तीनों के जमानत पर छूटने के बाद इस मामले में राजीनामे की बात चल रही थी.

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इस मामले में अदालत में ट्रायल चल रहा था. मृतका दीपा की मां ओमवती, बहन राधा उर्फ राधिका और एक कांस्टेबल की गवाही के लिए सब से पहले 8 दिसंबर, 2020 की तारीख तय थी. इस के बाद इस साल जनवरी, फिर फरवरी, मार्च और 12 मई की तारीख की तय हुई थी, लेकिन इन में से किसी भी तारीख पेशी पर तीनों में से किसी की गवाही नहीं हो सकी.

दीपा के परिवार की ओर से लगातार समझौते का दबाव बनाया जा रहा था. डाक्टर दंपति भी इस केस से किसी तरह अपना पीछा छुड़ाना चाहता था. राजीनामे की बात इस पर अटकी हुई थी कि दीपा का भाई एकमुश्त रकम मांग रहा था और डा. सुदीप हर गवाही पर रकम देना चाहता था, ताकि कोई गड़बड़ न हो.

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अटूट प्यार- भाग 2: यामिनी से क्यों दूर हो गया था रोहित

कुछ सोचते हुए मायूस शब्दों में रोहित बोला, ‘‘अभी इस दुनिया में मेरा खुद का ही कोई ठिकाना नहीं है. मैं किस मुंह से तुम्हारे पापा से तुम्हें मांग पाऊंगा. अगर उन्होंने मना कर दिया तो हमारी उम्मीद टूट जाएगी. जब तक मैं अपने पैरों पर खड़ा नहीं हो जाता, तुम्हें धीरज रखना होगा. मेरे किसी योग्य होने तक अपनी शादी को किसी बहाने टलवा लो. मैं जल्दी ही तुम्हारा हाथ मांगने आऊंगा.’’

‘‘काश, मैं ऐसा कर पाती. जीवन की अंतिम सांस तक तुम्हारा इंतजार करूं, पर न जाने क्यों मेरे मम्मीपापा को मेरी शादी की जल्दी पड़ी है? रोहित, मेरे पापा से मेरा हाथ मांग लो. मैं जिंदगी भर तुम्हारा एहसान मानूंगी.’’ यामिनी अपनी रौ में कहती चली गई, ‘‘मैं किसी और से शादी नहीं कर सकती. तुम नहीं मिले तो मैं अपनी जान दे दूंगी.’’

रोहित ने घबरा कर कहा, ‘‘ऐसा गजब नहीं करना. तुम से दूर होने की बात मैं सोच भी नहीं सकता. लेकिन फिलहाल हमें इंतजार करना ही पड़ेगा.’’

यामिनी एक उम्मीद लिए अपने घर लौट आई. रोहित से जिंदगी भर के लिए मिलने के खयाल से उस के दिल की धड़कन बढ़ जाती. उस ने सोचा, क्या हसीन समां होगा जब वह और रोहित हमेशा के लिए साथ होंगे.

लेकिन चंद दिनों बाद ही यामिनी के खयालों की हसीन दुनिया ढहती नजर आई. उन की मां ने बताया कि अगले दिन ही उसे देखने मेहमान आ रहे हैं. यामिनी को काटो तो खून नहीं. उस ने घबरा कर रोहित को फोन किया. पर यह क्या? वह काल पर काल करती गई और उधर रिंग होती रही लेकिन रोहित ने फोन रिसीव नहीं किया. आखिर रोहित को आज हो क्या गया है? फोन क्यों नहीं उठा रहा है? वह काफी परेशान हो गई.

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शायद वह किसी काम में व्यस्त होगा. इसलिए यामिनी ने थोड़ी देर ठहर कर कौल किया. लेकिन फिर भी उस ने फोन नहीं उठाया. ऐसा कभी नहीं हुआ था. वह तो तुरंत कौल रिसीव करता था या मिस्ड होने पर खुद ही कौलबैक करता था. आधी रात हो गई लेकिन यामिनी की आंखों से नींद कोसों दूर थी. वह रोहित को कौल करती रही. अंत में कोई जवाब दिए बिना रोहित का मोबाइल फोन स्विच औफ हो गया तो यामिनी की रुलाई फूट पड़ी.

अगले दिन सुबह पापा के ड्यूटी पर जाने के बाद यामिनी बहाना बना कर घर से निकल गई और रोहित के कमरे पर जा पहुंची, क्योंकि मेहमान शाम को आने वाले थे. पर यह क्या? वहां ताला लगा था. आसपास के लोगों से उस ने पूछा तो पता चला कि रोहित कमरा खाली कर कहीं जा चुका है. वह कहां गया है, यह कोई

नहीं बता पाया. यामिनी की आंखों में आंसू आ गए. अब वह क्या करे? कहां जाए? रोहित बिना कुछ कहे जाने कहां चला गया था. लेकिन रोहित ऐसा कर सकता है, यामिनी को यकीन नहीं हो रहा था.

शाम निकट आती जा रही थी और उस की दिल की धड़कन बढ़ती जा रही थी.

अगर लड़के वालों ने उसे पसंद कर लिया तो क्या होगा? वह कैसे मना कर पाएगी शादी के लिए? उसे कुछ समझ ही नहीं आ रहा था. उस ने सोचा, यह वक्त कहीं ठहर जाए तो कितना अच्छा हो. लेकिन गुजरते वक्त पर किस का अधिकार होता है.

धीरेधीरे शाम आ ही गई. लड़के वाले कई लोगों के साथ यामिनी को देखने आ गए. यामिनी का कलेजा जैसे मुंह को आ गया. जीवन में कभी खुद को उस ने इतना लाचार नहीं महसूस किया था. मां की जिद पर उस ने मन ही मन रोते हुए अपना शृंगार किया. उसे लड़के वालों के सामने ले जाया गया.

उस का दिल रो रहा था. रोहित से वह जुदा नहीं होना चाहती थी. यह सोच कर यामिनी की पीड़ा और बढ़ जाती कि अगर सब रजामंद हो गए तो क्या होगा? इस कठिन घड़ी में रोहित उसे बिना कुछ कहे कहां गायब हो गया था. यामिनी अकेले दम पर कैसे प्यार निभा पाएगी? उस ने क्या सिर्फ मस्ती करने के लिए प्यार किया था? जब निभाने और जिम्मेदारी उठाने की बात आई तो उसे छोड़ कर चुपचाप गायब हो गया. यह कैसा प्यार था उस का?

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लेकिन यामिनी का मन रोहित के अलावा किसी और को स्वीकार करने को तैयार नहीं था. वह मन ही मन कामना कर रही थी कि लड़के वाले उसे नापसंद कर दें. लेकिन उन लोगों ने उसे पसंद कर लिया. अपने प्यार को टूटता देख यामिनी बेसब्र होती जा रही थी. इतनी कठिन घड़ी में वह अपनी भावनाओं के साथ अकेली थी. रोहित तो जाने किस दुनिया में गुम था. आखिर उस ने ऐसा क्यों किया? क्या प्यार उस के लिए मन बहलाने की चीज थी? यामिनी का विकल मन रोने को हो रहा था.

घर में खुशी का माहौल था. उस की मां सभी परिचितों एवं रिश्तेदारों को फोन पर लड़के वालों द्वारा यामिनी को पसंद किए जाने की सूचना दे रही थीं. पापा धूमधाम से शादी करने के लिए जरूरी इंतजाम के बारे में सोच रहे थे. लेकिन यामिनी मन ही मन घुट रही थी. रोहित को वह भूल नहीं पा रही थी. वह सोचती कि काश, उस की यह शादी न हो. उस के दिल में तो सिर्फ रोहित बसा था. वह कैसे किसी और के साथ न्याय कर पाएगी.

कुछ दिन बीते और इसी दौरान एक नई घटना घट गई. जिस बात को ले कर यामिनी घुली जा रही थी वह बिना कोशिश के ही हल हो गई. लड़के वाले शादी को ले कर आनाकानी करने लगे थे. जो शादी में मध्यस्थ का काम कर रहे थे उन्होंने बताया कि लड़के वालों ने ज्यादा दहेज के लालच में दूसरी जगह शादी पक्की कर ली. यह जान कर यामिनी को राहत सी महसूस हुई. कई दिनों के बाद उस की होंठों पर मुसकराहट आई.

शादी की बात टलते ही यामिनी को राहत मिली. पर अफसोस, रोहित अब भी उस के संपर्क में नहीं था. वह रोहित को याद कर हर पल बेचैन रहने लगी. बिना बताए वह कहां चला गया है? उस ने अपना मोबाइल फोन क्यों स्विच औफ कर लिया है? ज्योंज्यों दिन बीत रहे थे उस की बेचैनी बढ़ती जा रही थी. कभीकभी उसे लगता कि रोहित ने उस के साथ धोखा किया है.

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यामिनी हमेशा रोहित के नंबर पर कौल करती. लेकिन मोबाइल फोन हमेशा स्विच औफ मिलता. उस ने फेसबुक पर भी कई मैसेज पोस्ट किए पर कोई जवाब नहीं मिला. एक दिन उस ने देखा कि रोहित ने उसे फेसबुक पर भी ब्लौक कर रखा था. उस की इस हरकत पर यामिनी को बहुत गुस्सा आया. जिस के लिए उस ने अपना सारा चैन खो दिया, वह उस से दूर होने की हर कोशिश कर रहा है.

गुस्से से उस के होंठ कांपने लगे. बिना बताए इस तरह की हरकत? शादी नहीं करनी थी तो पहले बता देता. चोरों की तरह बिना कुछ बताए गायब हो जाना तो उस की कायरता है.

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