अपाहिज: पढ़ीलिखी लड़की शहनाज

शहनाज पलंग पर लेटी दिखावे के लिए किताब पढ़ रही थी, पर उस के कान बैठक से उठने वाली आवाजों पर लगे हुए थे.

बैठक में अम्मी, अब्बा, अकबर भैया, सायरा बाजी और अकरम भाईजान बैठे शहनाज की जिंदगी के बारे में फैसला कर रहे थे.

‘‘मेरा तो यही मशवरा है…’’ सायरा बाजी कह रही थीं, ‘‘अगर शहनाज की जिंदगी बरबाद होने से बचानी है, तो यह रिश्ता तोड़ दिया जाए. अनवर किसी भी तरह से शहनाज के काबिल नहीं है.’’

‘‘मेरा भी यही खयाल है…’’ अकरम भाईजान कह रहे थे, ‘‘2 साल में उस ने मांबाप की सारी कमाई लुटा दी है. पता नहीं, किस तरह उस का घर चलता होगा. अगर ऐसे में शहनाज की शादी उस के साथ हो गई, तो वह उस को ठीक तरह से दो वक्त की रोटी भी खाने के लिए नहीं दे पाएगा.’’

‘‘अब्बा, आप आखिर कब तक अपने उस दोस्त की दोस्ती निभाएंगे, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं? क्या उस दोस्ती को निभाने की खातिर अपनी बेटी की जिंदगी बरबाद करना चाहते हैं?’’ अकबर भैया पूछ रहे थे.

‘‘अकबर के अब्बा, मैं तो कहती हूं, बस हो गई आप की यह दोस्ती… इसे अब यहीं खत्म कीजिए. अपनी दोस्ती की सलीब पर मेरी बेटी की जिंदगी मत टांगिए. सवेरे जा कर अनवर की मां से साफसाफ कह दीजिए कि हम रिश्ता तोड़ रहे हैं. वे अनवर के लिए कोई दूसरी लड़की ढूंढ़ लें,’’ अम्मी कह रही थीं.

‘‘ठीक है…’’ अब्बा ठंडी सांस ले कर बोले, ‘‘अगर सब लोगों का यही फैसला है, तो भला मैं किस तरह से खिलाफत कर सकता हूं. पर मेरी एक गुजारिश है, इस मामले को इतनी जल्दी उतावलेपन में खत्म न किया जाए. इतने दिनों तक हम ने राह देखी… कुछ दिन और सही. अगर फिर भी वैसी ही हालत रही, तो मैं खुद यह रिश्ता तोड़ दूंगा.’’

‘‘अब्बा, हम 3 साल तो बेकार कर चुके हैं…’’ अकबर भैया बोले, ‘‘और 3-4 महीने और बेकार कर के क्या फायदा?’’

‘‘बेटे, भला 3-4 महीने और राह देखने में क्या बुराई है? हो सकता है, अनवर के दिन बदल जाएं.’’

‘‘अनवर के दिन तो बदलने से रहे, पर शहनाज की जिंदगी जरूर बिगड़ जाएगी…’’ सायरा बाजी बड़बड़ाईं, ‘‘इस बीच पता नहीं कितने ही अच्छे रिश्ते हाथ से निकल जाएंगे.’’

‘‘कोई रिश्ताविश्ता हाथ से नहीं निकलेगा…’’ अब्बा बोले, ‘‘सारी दुनिया जानती है, शहनाज की मंगनी हो चुकी है. फिर भला कौन उस के लिए रिश्ता ले कर आएगा? मैं कह रहा हूं कि अगर 2-3 महीनों में अनवर नहीं बदला, तो मैं खुद यह रिश्ता तोड़ दूंगा.’’

‘‘ठीक है…’’ अकरम भाईजान बोले, ‘‘अगर यह बात है तो 2-3 महीने और इंतजार करने में कोई बुराई नहीं है.’’ फिर शायद बैठक खत्म हो गई, क्योंकि आवाजें आनी बंद हो गई थीं.

उस बातचीत को सुन कर शहनाज परेशान हो गई. वह सोचने लगी, ‘तो क्या घर वाले मेरा और अनवर का रिश्ता तोड़ देंगे? इन की बातों से तो ऐसा ही लग रहा है. आखिर मांबाप अपनी बेटी की भलाई ही तो चाहते हैं.

‘अनवर की जो हालत है, उसे देखते हुए तो यह रिश्ता बहुत पहले ही टूट जाना चाहिए था. इस तरह का फैसला करना कोई गलत भी नहीं है.’

पर शहनाज खुद बड़ी उलझन में थी. वह न तो खुल कर घर वालों की मुखालफत कर सकती थी, न ही इस फैसले को मान सकती थी. पिछले 3 सालों से उस ने अनवर को अपने होने वाले शौहर के रूप में देखते हुए सपनों के हजारों महल तराशे थे. इस बीच अनवर से बहुत लगाव और प्यार हो गया था. वह इतनी जल्दी और आसानी से उस से दूर नहीं हो सकती थी.

शहनाज की नींद उड़ गई थी. लाख कोशिश कर के भी वह घर वालों के फैसले को कबूल नहीं कर पा रही थी. उस ने पक्का फैसला कर लिया कि वह शादी करेगी तो सिर्फ अनवर से ही, वरना किसी से भी नहीं.

पर जैसेजैसे शहनाज अनवर की हालत के बारे में सोचती, उसे महसूस होता कि वह ऐसे हालात में उस के साथ सुखी नहीं रह सकती.

आखिर में एक ही बात दिल से उठी कि उसे सिर्फ अनवर से ही शादी करनी है, चाहे इस के लिए उसे अपने घर वालों से ही रिश्ता क्यों न तोड़ना पड़े. इस बारे में उस का अनवर से मिलना बहुत जरूरी था. उस ने तय कर लिया कि वह 2-3 दिन में अनवर से मिल कर उसे सारी बातें बता देगी.

अनवर के साथ शहनाज की मंगनी हुए 3 साल बीत चुके थे. वह उस के अब्बा के एक दोस्त का बेटा था. दोनों ही परिवारों के बीच बड़े ही गहरे ताल्लुकात थे. वह अकसर उन के घर आताजाता था और अम्मी के साथ वह भी कभीकभी अनवर के घर चली जाती थी. अनवर तब एमए का इम्तिहान दे रहा था, जब शहनाज की उस के साथ मंगनी हुई थी.

अब्बा को अनवर बहुत पसंद था. घर के सभी लोगों ने भी उन की पसंद को सराहा था. शहनाज के लिए तो इस से बढ़ कर खुशी की बात और क्या हो सकती थी कि उसे अनवर जैसा लड़का जीवनसाथी के रूप में मिले.

शहनाज के घर वालों का खयाल था कि पढ़ाई खत्म करते ही अनवर को कोई अच्छी सी नौकरी मिल जाएगी. नौकरी मिलते ही वे उस का निकाह कर देंगे और उन दोनों की आराम से गुजरेगी.

पढ़ाई पूरी करने के बाद अनवर ने नौकरी की खोज शुरू कर दी, पर 6-7 महीने बाद भी उसे कोई नौकरी नहीं मिल सकी. बेकारी का अजगर उस के गले से लिपटा रहा.

इन 6-7 महीनों में अनवर इतने धक्के खा चुका था कि एकदम नाउम्मीद सा हो गया था. उसे लगने लगा था कि अब उसे नौकरी नहीं मिल सकेगी. किसी ने मशवरा दिया कि जब तक नौकरी नहीं मिल जाती, कोई कारोबार शुरू कर दे. कामधंधा करता रहेगा तो नौकरी न मिलने के चलते जो नाउम्मीदी उसे घेरे रहती है, उस से छुटकारा पा जाएगा.

चौक में अनवर की एक पुरानी दुकान थी, जो किराए पर चढ़ी हुई थी. कुछ पैसे दे कर अनवर ने दुकान खाली करवाई और उस में कपड़े का कारोबार शुरू कर दिया. दुकान खोलने के लिए उस के अब्बा की मौत के बाद बीमा कंपनी से जो पैसा मिला था, वह उस में लगाना पड़ा. साथ ही, एक पुराना मकान भी बेचना पड़ा.

पर वह दुकान नहीं चल सकी. एक तो उस इलाके में कपड़े की पहले से ही कई दुकानें थीं, जो काफी बड़ी थीं. उन से मुकाबला करना मुश्किल था. लोगों की पसंद के बारे में ज्यादा जानकारी न होने की वजह से अनवर सही माल नहीं खरीद सका. उस की दुकान घाटे में चलने लगी.

देखते ही देखते आधी दुकान खाली हो गई, पर एक पैसा भी हाथ में नहीं था और दुकान तो चलती ही नहीं थी. आखिर में उस ने दुकान बंद करने का फैसला ले लिया. सारा माल कम दामों में बेचना पड़ा और हजारों का नुकसान उठाना पड़ा.

कपड़े की दुकान बंद करने के बाद अनवर ने वहां पर साइकिल के पुरजों की दुकान खोली. यह भी उस का एक गलत फैसला था. आसपास साइकिल के पुरजों की कई दुकानें थीं. इस तरह वह भी ठीक तरह से नहीं चल सकी और बंद करनी पड़ी.

फिर अनवर ने स्टेशनरी की दुकान खोली, पर तजरबा न होने की वजह से उस में भी घाटा उठाना पड़ा.

अब दुकान बंद करने के सिवा और कोई रास्ता नहीं था. इन कोशिशों में अनवर अपने पास की सारी पूंजी भी गंवा चुका था.

दुकान दोबारा किराए पर दे कर फिर से अनवर बेकारी के जंगल में भटकने के लिए निकल पड़ा. कई दिनों तक वह भटकता रहा, उस के बाद उसे एक मामूली सी नौकरी मिली. तनख्वाह सिर्फ 8,000 रुपए महीना मिलती थी.

शहनाज घर वालों से एक सहेली से मिलने का बहाना कर के अनवर से मिलने वहीं पहुंच गई, जहां वह काम करता था.

‘‘शहनाज, तुम और यहां,’’ उसे देख कर अनवर चौंक पड़ा.

‘‘हां, आप से बहुत जरूरी बात करनी है,’’ शहनाज बोली.

वे दोनों पास के एक होटल के केबिन में जा बैठे. शहनाज ने सारी बातें अनवर को बता दीं, जिन्हें सुन कर उस का चेहरा उतर आया.

अनवर दुखभरी आवाज में बोला, ‘‘तुम्हारे घर वालों ने जो फैसला लिया है, बिलकुल सही है शहनाज. सचमुच, मैं किसी काबिल नहीं हूं. मैं तुम्हें कोई सुख नहीं दे सकता. अगर हमारी शादी हुई तो तुम्हारी जिंदगी बरबाद हो जाएगी, क्योंकि मैं एक के पीछे एक मिलने वाली नाकामियों से बुरी तरह टूट चुका हूं.

‘‘मैं जिंदगी में कभी भी कामयाब नहीं हो सकता. लगता है, अब यह नौकरी भी छोड़नी पड़ेगी, क्योंकि मालिक से मेरी नहीं बन रही है. अगर तुम्हारे घर वाले यह रिश्ता तोड़ते हैं, तो मुझे कोई एतराज नहीं होगा…’’

‘‘आप इतने दुखी मत होइए. कोई और काम करने की सोचिए,’’ शहनाज ने उसे धीरज बंधाया.

‘‘नहीं, अब मुझ से कुछ नहीं हो सकता,’’ अनवर भरे गले से बोला, ‘‘मुझ में अब हिम्मत नहीं रही… नाकामियों ने मुझे अपाहिज बना दिया है. अब सारी उम्र मुझे एक अपाहिज की तरह ही रहना है. जो अपना बोझ नहीं उठा सकता, वह दूसरों को सहारा क्या देगा?’’

‘‘आप नाउम्मीद क्यों होते हैं? इस तरह हिम्मत हारने से कोई भी काम नहीं होगा. जीने के लिए तो इस से ज्यादा तकलीफें झेलनी पड़ती हैं. कोई और नया काम शुरू कर दीजिए.’’

‘‘अब तुम ही बताओ, मैं कौन सा काम करूं?’’

‘‘आप ठेकेदार के साथ काम कर रहे हैं, इसलिए आप को इस काम की पूरी जानकारी तो हो गई होगी. आप भी छोटेमोटे ठेके लेने शुरू कर दीजिए. इस नौकरी का तजरबा आप के बहुत काम आएगा?’’

‘‘हां, यह हो सकता है,’’ शहनाज की बात सुन कर अनवर की आंखें चमकने लगीं.

‘‘ठीक है, आप मुझे मिलते रहिए और बताते रहिए कि क्या कर रहे हैं. अब मैं जाती हूं,’’ कहते हुए शहनाज घर चली आई.

3-4 दिन बाद जब शहनाज अनवर से मिली, तो उस ने बताया कि वह नौकरी छोड़ चुका है और अब ठेकेदारी का काम शुरू करने के लिए कोशिश कर रहा है.

फिर जल्दी ही अनवर को नालियां बनाने का छोटा सा ठेका मिल गया. वह बड़े जोश से काम कर रहा था. उस के मजदूर और मिस्तरी भी उस का पूरा साथ दे रहे थे. यह सब देख कर शहनाज बहुत खुश हुई.

शहनाज के घर वालों को भी पता चल गया कि अनवर ने एक नया काम शुरू किया है, पर वे उस का मजाक उड़ाने लगे कि वह इस काम में भी मुंह की खाएगा.

काम खत्म होने के बाद अनवर जब शहनाज से मिला, तो बहुत दुखी और बुझा हुआ था. वह बोला, ‘‘इतनी मेहनत कर के भी कोई फायदा नहीं हुआ. इस ठेके में 15,000 रुपए का घाटा हुआ है. मैं तुम से पहले ही कह चुका था कि मैं जिंदगी में कभी कामयाब नहीं हो सकता.’’

‘‘पर, घाटा किस तरह हुआ?’’

‘‘अंदाजे से ज्यादा माल लगने की वजह से ही घाटा हुआ?’’

‘‘पर अब तो आप को अंदाजा हो गया है कि फलां काम में कितना माल लगता है. अब आप से अंदाजा लगाने में गलती नहीं हो सकती… इसलिए घाटे का कोई सवाल ही नहीं उठता. आप कोई दूसरा ठेका लेने की कोशिश कीजिए.’’

शहनाज के बहुत समझाने पर अनवर इस के लिए राजी हुआ.

एक हफ्ते बाद वह मिला तो बताने लगा कि उसे नगरपालिका की तरफ से कुछ गटर बनाने का ठेका मिला है.

यह काम जब पूरा हुआ तो वह बहुत खुश था. बताने लगा, ‘‘शहनाज, तुम्हें यकीन नहीं होगा… मुझे इस काम में पूरे 25,000 रुपए का मुनाफा हुआ है.’’

कुछ दिनों बाद अनवर को एक और नया ठेका मिल गया. जब वह काम खत्म हुआ तो अनवर बताने लगा कि उसे इस काम में 50,000 रुपए का मुनाफा मिला है और उसे नगरपालिका की ओर से ही एक स्कूल की इमारत बनाने का ठेका भी मिल गया है.

स्कूल की इमारत का काम शुरू हो गया था. उस काम के बाद कई छोटेछोटे दूसरे काम भी अनवर को मिल गए.

पहली बार मिली नाकामी की वजह से अनवर का दिल टूट गया था और वह अपाहिज बन गया था, पर अब उस का हौसला मजबूत था. उसे अपनी कामयाबी पर यकीन होने लगा था.

एक दिन अनवर बोला, ‘‘शहनाज, मैं तो टूट चुका था. अपाहिजों जैसी जिंदगी जी रहा था, पर तुम्हारे दिए गए हौसले ने मुझ अपाहिज के लिए बैसाखी का काम किया.’’

शहनाज के घर में अनवर की कामयाबी की बातें होने लगी थीं:

‘अनवर तो बहुत बड़ा ठेकेदार बन गया है.’

‘उसे कई ठेके मिल रहे हैं.’

‘वह इन ठेकों में खूब पैसा कमा रहा है.’

‘अब देर किस बात की है? वह अच्छाखासा कमा रहा है… जल्द से जल्द कोई तारीख पक्की कर के शहनाज का निकाह कर देना चाहिए.’ ये सब बातें सुन कर शहनाज बहुत खुश थी.

बेबसी : पूनम का ब्याह

अचानक पूनम की आंख खुल गई थी. उस ने करवट बदल कर सोने की कोशिश की, पर आंख नहीं लग सकी. वह उठी और किसी तरह रेंग कर पलंग के नीचे से बाहर निकली, फिर एक गिलास पानी पी कर गहरीगहरी सांसें लेने लगी.

पूनम कुछ देर यों ही बैठी रही, फिर दोबारा रेंगती हुई पलंग के नीचे चली गई. पलंग पर उस की सास और ननद बेखबर सो रही थीं. पूनम और उस का पति मनोज पलंग के नीचे सोते थे. थोड़े फासले पर जमीन पर उस के ससुर लालू और देवर सो रहे थे.

पलंग के नीचे बिस्तर पर पहुंच कर पूनम ने अपनी आंखों पर हाथ रख लिया और सोने की कोशिश करने लगी. पर नींद तो उचट चुकी थी.

अचानक मनोज ने करवट बदली और नींद में ही एक तरह से उसे अपनी बांहों में ले लिया.

पूनम ने खुद को मनोज की गिरफ्त से छुड़ाने की कोशिश की, पर उस की जकड़ काफी मजबूत थी. इस कोशिश में अगर वह कामयाब होती तो पलंग के नीचे से बाहर निकल जाती, इसलिए चुपचाप लेटी रही.

मनोज की गरमगरम सांसें पूनम के गालों से टकरा रही थीं और उस के भीतर तरंगें सी उठ रही थीं.

अचानक उसी समय मनोज की भी आंख खुल गई. पहले उस ने पत्नी की ओर घूर कर देखा, फिर हौले से पूछा, ‘‘तुम सोई नहीं?’’

‘‘नींद उचट गई है,’’ पूनम ने भी हौले से जवाब दिया.

मनोज ने पूनम को और करीब खींच लिया. वह भी उस की बांहों में सिमटती चली गई. मनोज ने अपने चेहरे को उस के जलते होंठों पर रख दिया.

उसी वक्त ऊपर लेटी पूनम की सास खांसने लगीं और ननद ने कसमसा कर करवट बदली. घबरा कर मनोज ने उस के जिस्म के इर्दगिर्द से अपनी बांहें निकालीं, फिर उस ने एक गहरी सांस ले कर दूसरी ओर करवट ले ली.

थोड़ी देर तक वे दोनों चुपचाप पड़े रहे. फिर पूनम ने अपने जिस्म पर मनोज के जिस्म का बोझ महसूस किया.

उसी समय उस के ससुर ने कराहते हुए करवट बदली.

‘‘क्या फायदा… कोई जाग जाएगा,’’ कहते हुए पूनम ने मनोज का हाथ अपने शरीर से परे हटा दिया.

‘‘हां, पर कल इतवार है,’’ एक गहरी सांस लेते हुए मनोज ने भी अपना हाथ खींच लिया.

पता नहीं, कितनी देर तक वे दोनों करवटें बदलते रहे. यह तय था कि वे अपने भीतर के तूफान पर काबू पाने की भरपूर कोशिश कर रहे थे.

सवेरे पूनम जल्दी ही जाग गई. मनोज के जागने के पहले ही उस ने घर का सारा कामकाज कर डाला. नाश्ता तैयार कर लिया और खुद भी तैयार हो गई. 9 बजे तक नाश्ता कर मनोज भी तैयार हो गया था. वे दोनों जल्दी ही घर से बाहर निकल पड़े.

‘‘जल्दी लौट आना, ज्यादा रात न होने पाए,’’ सास ने ताकीद की.

स्टेशन पर आ कर उन्होंने पटना के लिए रेलगाड़ी पकड़ी. तकरीबन एक घंटे बाद पटना स्टेशन पर उतर कर उन्होंने ईरिकशा किया और अपनी मंजिल पर पहुंच गए.

पिछले 7-8 महीनों से हर रविवार को वे वहां जाते थे. वहां ठहरने के लिए सस्ते कमरे मिल जाते थे. एक कमरा किराए पर ले कर वे दोनों शाम तक उस में कैद हो जाते थे. दोनों एक ही गाना गाते थे, ‘हवा सर्द है, खिड़की बंद कर लो, बंद कमरे में चाहत बुलंद कर लो.’

इतवार को ही उन्हें एहसास होता था कि जिस्मानी सुख क्या है, वरना 6 दिनों तक तो बात करने को भी तरस जाते थे.

8 महीने पहले जब पूनम का ब्याह होने वाला था, तो उस की एक सहेली ने बड़ा चुभता हुआ सवाल किया था, ‘‘पूनम, तुम्हारा मनोज से ब्याह हो रहा है, यह तो बड़ी खुशी की बात है. पर यह तो बता, शादी के बाद तुम लोग रहोगे कहां?

‘‘जहां तक मेरी जानकारी है, मनोज का अहरी महल्ले में एक छोटा सा कमरा है, जिस में उस के घर के सभी लोग रहते हैं. तुम्हें भी वहीं रहना पड़ेगा. उस एक छोटे से कमरे में किस तरह रह सकोगी? फिर मनोज की इतनी आमदनी भी तो नहीं कि वह दूसरा कमरा किराए पर ले सके.’’

सहेली के इस सवाल ने पूनम को उलझन में डाल दिया था, फिर भी उस ने सोचा कि मनोज ने तो कोई न कोई इंतजाम जरूर किया ही होगा.

पर सहेली की बात सच साबित हुई. जिस खयाल से पूनम ने अपने दिल को बहला रखा था, वह गलत साबित हुआ.

ब्याह के बाद कुछ दिनों तक तो रात को वे दोनों ही उस कमरे में सोए, उस का देवर, सास, ससुर और ननद बाहर कहीं जा कर सोते थे, लेकिन ऐसा कितने दिनों तक चलता. कुछ ही दिनों बाद घर के सभी जने कमरे में ही सोने लगे. यह देख कर पूनम मायूस हो गई.

मनोज ने बताया कि वह बरसों से पलंग के नीचे सो रहा है. पलंग थोड़ा ऊंचा था, जिस से उस के नीचे आदमी आराम से सो सकते थे. नीचे गरमी बहुत होती थी, इसलिए वे सिरहाने पंखा लगा लेते थे.

पर फिर भी परेशानियां ही परेशानियां थीं. वे एक ही बिस्तर पर सोते जरूर थे, लेकिन औरतमर्द की तरह नहीं, क्योंकि कभी सास खांसतीं, तो कभी ससुर. दिन निकलता तो मुन्नी स्कूल चली जाती, मुन्ना कालेज में आवारागर्दी करता, पति दफ्तर, तो ससुर भी फैक्टरी चले जाते. पूनम को घर काटने को दौड़ता था.

जब कभी मौका मिलता, वे दोनों किसी कुंआरे दोस्त के कमरे में चले जाते और मजा लूटते.

पर एक दिन पूनम मनोज पर बरस पड़ी, ‘‘जब तुम्हें मालूम था कि हमारे पास एक ही कमरा है, तो फिर शादी ही क्यों की?’’

मनोज ने जवाब दिया, ‘‘मैं ने शादी थोड़े ही की… यह तो तुम्हारे मांबाप की जिद थी. उन्होंने हम से कहा, ‘बेटे, इस तरह जीने वालों की गिनती लाखों में है…’ तब मैं क्या जवाब देता?’’

अब इसी तरह बस हर इतवार को ही उन की जिंदगी में मौजमस्ती के कुछ पल आते और गुजर जाते. शायद 10 साल बाद भी वे इन्हीं परेशानियों से जूझते रहेंगे.

शहरों ने इनसान को खाने के लिए दो वक्त की रोटी तो दी है, पर उन्हें इतनी परेशानियों में उलझा दिया है कि तमाम जिंदगी समझौते करते हुए बेबसी में ही गुजारनी पड़ती है.

Holi 2024: सतरंगी रंग

Story in Hindi

बिन बोले हर पत्नी अपने पति से चाहती हैं ये 5 चीजें, आप भी जान लें

पति पत्नी का रिश्ता बहुत ही मजबूत माना जाता है. जिसकी नींव होती है केवल विश्वास, जहां दोनों के बीच विश्वास कायम है तो दोनों को रिश्ता उतना ही मजबूत बनेंगा, लेकिन ये रिश्ता बेहद नाजुक भी होता है, इस रिश्ते पत्नियां अपने पति से कई तरह की अपेक्षाएं रखती है जो कि समय रहते पति को जरुर पूरी करनी होती है. अगर ऐसा नहीं होता है तो कहीं न कहीं आपका रिश्ता बिगड़ने लगता है वो विश्वास और मजबूती खत्म होने लगती है. तो इसलिए जरुरी है कि आप अपनी पत्नी की उन बातों को पूरा करें. जिससे वे आपके ओर करीब आने लगें और आपसे ज्यादा जुड़ सकें.

पतियों को ये समझना जरूरी है कि महिलाएं उनसे क्या चाहती है. उनकी जरूरतों को समझना और उन्हें पूरा करना बहुत जरूरी होता है. कुछ बातें ऐसी होती हैं जिन्हें हर पति को एक खुशहाल और सफल विवाहित जीवन जीने के लिए ध्यान में रखना चाहिए. इसलिए आज हम आपको ऐसे 5 जरूरी बिंदुओं के बारे में बताएंगे, जिन्हें पूरा कर कोई भी पति अपनी पत्नी को खुस रख सकता है और अपने रिश्ते में एक मजबूत डोर कायम कर सकता है.

बेहद जरुरी है प्यार और सपोर्ट

पति पत्नी के रिश्तें में सबसे पहले और सबसे ज्यादा जरुरी है कि उनमें प्यार और एक दूसरे को लेकर सपोर्ट हो. महिलाओं के केस में ये सबसे ज्यादा मायने रखता है कि उनका पति उन्हे भरपूर प्यार करें और सपोर्ट करें. उनके हर कदम पर उनका जीवनसाथी साथ निभाएं. प्यार का इजहार करना भी उन्हें खुशी देता है और वो रिश्ते के गहरे बॉन्ड को बेहतर तरीके से महसूस कर पाती हैं. ये चीज शादीशुदा जीवन में नयापन बरकरार रखने में भी मदद करता है.

पति करे पत्नी की केयर

पति पत्नी के रिश्ते में ये जरुरी है कि पति अपनी पत्नी की केयर करें, क्योकि प्यार जताने का ये एक तरीका है जिससे आप दिखा सकते है कि आप उनसे कितना प्यार करते है. अगर पत्नी घर का काम करती है तो पति को उसमें हाथ बटाना चाहिए, मूड खराब हो तो उनके चेहरे पर मुस्कान लाने के सभी तरीकें पता हों. उनकी पसंद का खाना बनाकर खिलाएं या या ऑर्डर करके खिलाएं. ये छोटी छोटी बातें आपके रिश्ते को मजबूत बना सकती हैं.

पत्नी को दें पूरा सम्मान

हर लड़की या पत्नी की सबसे पहली इच्छा अपने पार्टनर से यही होती है कि वे उसका पार्टनर उसे पूरा सम्मान दें. प्यार से पहले वो उसे सम्मान दें. क्योकि किसी भी रिश्ते की नींव सम्मान पर टिकी होती है. पति अगर उन्हे बराबरी का दर्जा देता है, तो पत्नियां महसूस कर पाती हैं कि उनका बेटर हाफ उनका कितना सम्मान करता है.

रिश्ते में हो सच्चाई

ये जरुरी है कि पति पत्नी आपस में हर मुद्दे पर खुलकर बात करें. पत्नी चाहती है कि उनके पति उनसे हर बात शेयर करें, और उनकी बातों को भी बिना जज किए ध्यान से सुनें. रिश्ते में सच्चाई और एक-दूसरे पर विश्वास होना बेहद जरूरी है.

पति जो समझे दिल की बात

पति-पत्नी के रिश्ते में आपसी समझ सबसे ज्यादा जरूरी होती है. ज्यादातर महिलाओं को अपने पति से इस बात की शिकायत रहती है कि वो उन्हें समझते नहीं हैं या समझना नहीं चाहते हैं. ऐसे में पति को अपनी पत्नी को उनकी पसंद और रुचियों को जानने की कोशिश करना चाहिए.

Shahid Kapoor ने स्टेज पर विजय देवराकोंडा को किया Kiss, हैरान रह गए साउथ सुपर स्टार

सेलिब्रिटीज की यूं तो कई मस्ती मजाक की वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल होती रहती है. जिन्हे देख फैंस भी खूब मजे लेते है. ऐसा ही इन दिनों एक्टर शाहिद कपूर का एक वीडियो वायरल हो रहा हैं जिसमे वे एक्टर विजय देवरकोंडा की पहले जमकर तारीफ करते है और उसके बाद उन्हे सबके सामने किस कर देते है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Manav Manglani (@manav.manglani)


आपको बता दें कि 19 मार्च को ओटीटी प्लेटफॉर्म ने अपने आने वाले कई वेब सीरीज और फिल्मों का ऐलान किया. जहां प्राइम वीडियो ने #AreYouReady  इवेंट का आयोजन मुंबई में किया था. जहां शाहिद और देवरकोंडा एकदूसरे से मिले और मुलाकात के दौरान किस किया. जिसका वीडियो फैंस को खूब पसंद आ रहा है और इसे देखने वाले धड़ल्ले से शेयर कर रहे है.

दरअसल, सामने आए वीडियो में दिखाया गया है कि शाहिद-विजय के कंधे पर अपना सिर रखकर उनकी जमकर तारीफ करते हैं. इस दौरान शाहिद कहते हैं कि – अगर विजय देवराकोंडा नहीं होते तो कभी ‘अर्जुन रेड्डी’ फिल्म का रीमेक नहीं बनता और विजय देवराकोंडा नहीं होते तो कभी ‘कबीर सिंह’ नहीं बनती. ‘मैं तुमसे बहुत प्यार करता हूं. तुम मुझे बहुत पसंद हो.’ जिसके बाद शाहिद विजय देवरकोंडा को गाल पर किस कर देते है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Manav Manglani (@manav.manglani)


शाहिद के करियर की बात करें तो उनकी आने वाली फिल्म ‘अश्वत्थामा’ है. इस फिल्म में वह गुरु द्रोणाचार्य के पुत्र ‘अश्वत्थामा’ का किरदार निभाते नजर आएंगे. इसके अलावा शाहिद ‘देवा’  में नजर आएंगे. रोशन एंड्रयूज के निर्देशन में बन रही ‘देवा’ में शाहिद कपूर पहली बार साउथ की हसीना पूजा हेगड़े के साथ दिखेंगे. इस फिल्म में एक्टर का एक्शन अवतार देखने को मिलेगा. बता दें कि ये फिल्म इसी साल 11 अक्टूबर 2024 को सिनेमाघरों में रिलीज होगी. इसके अलावा शाहिद कपूर अपनी हिट सीरीज ‘फर्जी’ के सीजन 2 में नजर आएंगे.

वन मंथ एनिवर्सरी की फोटो शेयर कर सुर्खियों में आई टीवी की पार्वती – देखे फोटो

‘देवों के देव’ महादेव फेम एक्ट्रेस सोनारिका भदौरिया इन दिनों अपनी वन मंथ एनीवर्सरी को लेकर सुर्खियों में बनीं हुई है. सोनारिका ने पिछले महीने ही अपने लॉन्ग टाइम बौयफ्रेंड से शादी की थी. अब एक्ट्रेस हनीमून एन्जॉय करती दिख रही हैं. शादी के बाद सोनारिका अपने पति के साथ संमदर किनारे नजर आ रही है.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sonarika Bhadoria (@bsonarika)


आपको बता दें कि सोनारिका ने अपने करियर की शुरुआत महादेव टीवी सीरियल से की थी. जहां वे पार्वती बन घर घर में मशूहर हो गई थी. अब इन दिनों वे अपनी हनीमून फोटो को लेकर चर्चा में बनीं हुई है. बता दें कि सोनारिका ने बिजनेसमैन विकास पराशर (Vikas Parashar) के साथ धूमधाम से शादी की थी. इनकी शादी को एक महीना पूरा हो चुका है इसलिए एक्ट्रेस सोशल मीडिया पर वन मंथ एनीवर्सरी सेलिब्रेट कर रही है शादी और हनीमून से जुड़ी फोटो लोगों के साथ शेयर कर रही हैं.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sonarika Bhadoria (@bsonarika)


सोनारिका भदौरिया इन दिनों पति विकास के साथ बीच वेकेशन एन्जॉय कर रही हैं. अभिनेत्री ने इंस्टाग्राम स्टोरी पर अपनी हनीमून ट्रिप की तस्वीरें शेयर की हैं. कुछ तस्वीरों में वह समंदर किनारे फूल और गिरगिट की झलकियां दिखा रही हैं. सोनारिका ने एक रोमांटिक फोटो शेयर की है. 18 मार्च को शादी की वन मंथ एनिवर्सरी पर सोनारिका ने पति के साथ फोटो शेयर करते हुए कैप्शन में लिखा, “पति और पत्नी बने हुए एक महीने हो गए.”

बता दें कि दोनों ने साल 2022 में सगाई की थी और फिर 18 फरवरी 2024 को राजस्थान के रणथंभौर में सात फेरे लिए थे. कपल अपनी शादी में एक रॉयल दूल्हा-दुल्हन की तरह सजा था.

 

View this post on Instagram

 

A post shared by Sonarika Bhadoria (@bsonarika)


सोनारिका के वर्क फ्रंट की बात करें तो आखिरी बार उन्हे ‘हिंदुत्व’ में देखा गया था. इसके अलावा वे ‘इश्क में मरजावां’, ‘दास्तान-ए-मोहब्बत सलीम अनारकली’ और ‘देवों के देव… महादेव’ जैसे टीवी शोज में काम कर चुकी है. वह हिंदी के अलावा तमिल और तेलुगु फिल्मों में भी अपना रंग जमा चुकी हैं.

मेरी सास चाहती है कि मैं नौकरी न करूं, क्या यह सही है?

सवाल

मैं 30 साल की औरत हूं. मेरे 2 बच्चे हैं. मैं एक प्राइवेट स्कूल में टीचर हूं. मेरी सास चाहती हैं कि मैं यह नौकरी छोड़ दूं. उन का मानना है कि इस नौकरी के चलते मैं घर के दूसरे काम नहीं कर पा रही हूं. मैं ने उन से कहा कि मैं कामवाली बाई लगवा देती हूं, तो वे बोलती हैं कि मैं उन्हें पैसे का रोब दिखा रही हूं.

मेरे पति भी अपनी मां की हां में हां मिला देते हैं, जबकि दिल्ली जैसे शहर में एक आदमी की तनख्वाह में काम नहीं चल पाता है. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं अपनी सास को कैसे समझाऊं. इस बात से मैं बहुत तनाव में रहती हूं. मैं क्या करूं?

जवाब

आप अपनी जगह सही हैं, इसलिए जैसे भी हो सास को मैनेज करें और पति को भी समझाएं कि बच्चों के भविष्य के मद्देनजर आप की नौकरी कितनी जरूरी है. ऐसा लगता है कि आप के पति की पगार से घरखर्च आराम से चल जाता है, इसलिए भी यह समस्या उठ खड़ी हो रही है. आप की सास को यह डर भी हो सकता है कि जिस दिन नौकरानी नहीं आएगी, उस दिन उन्हें काम करना पड़ेगा.

पुराने खयालों की औरतें सोचती हैं कि बहू घर में चूल्हाचौका और झाड़ूपोंछा करते हुए गुलामों की तरह रहें. अगर बेटा और सास आप की बात सीधे न समझें, तो अपनी बात पर अड़ जाएं, क्योंकि सास आज हैं, कल नहीं.

Holi 2024: होली के रंगों को साफ करने के लिए अपनाएं ये टिप्स

होली पर्व का नाम सुनते ही मन रंगरंगीली उमंगों से भर उठता है. होली रंगों का त्योहार है. इसे एकदूसरे पर गुलाल लगा कर मनाया जाता है परंतु आजकल गुलाल के साथसाथ लोग रंगों का भी प्रयोग करते हैं. अकसर घरों में एकदूसरे को रंग लगाते समय या रंग से बचने के प्रयास में रंग यहांवहां गिर जाता है. प्राकृतिक रंगों के दागधब्बे जहां आसानी से निकल जाते हैं, वहीं आजकल बाजार में उपलब्ध रासायनिक रंगों के दागधब्बों को साफ करना बड़ी चुनौती होती है.

यहां प्रस्तुत हैं, कुछ ऐसे उपाय जिन से घर की दीवारों, फर्श आदि पर लगे रंगों के दागधब्बों को आसानी से साफ किया जा सकता है :

दीवारें

– ध्यान रखें कि केवल उन्हीं दीवारों को साफ किया जा सकता है जिन पर वाशेबल डिस्टैंपर किया गया हो.

औयल बाउंड डिस्टैंपर वाली दीवारों की सफाई खुद करने का प्रयास न करें.

– वाशेबल पेंट की दीवारों को साफ करने के लिए पानी और साबुन का घोल बना कर गीले कपड़े और स्पंज से साफ करें.

– ब्रैंडेड पेंट को दीवारों से कैसे साफ किया जाए, इस की जानकारी कंपनी की वैबसाइट पर दी होती है. उसे पढ़ कर भी दीवारों को साफ किया जा सकता है.

– पानी प्रतिरोधी रंगों से रंगी दीवारों को साफ करने के लिए स्टेन ब्लागर की भी मदद ले सकती हैं. इस से दीवारों पर दागधब्बे नहीं लगते.

– यदि सादे पानी के प्रयोग से दीवारें साफ न हों तो टचअप का प्रयोग करें.

हलका सा टचअप कर के आप अपनी दीवारों को नया लुक दे सकती हैं. इस से आप की दीवारें बिलकुल नई सी लगने लगेंगी.

– टचअप करने का प्रयास आप स्वयं न करें. इस के लिए प्रोफैशनल की मदद लें अन्यथा शेड का हलका सा डिफरैंस भी दीवारों का लुक खराब कर देगा.

– दीवारों पर पड़े धब्बों को कभी बेकिंग पाउडर या ब्लीच से साफ करने का प्रयास न करें अन्यथा उन का रंग हलका पड़ जाएगा.

फर्श

– जहां तक संभव हो फर्श पर गिरे रंग को तुरंत साफ करने का प्रयास करें और यदि ऐसा करना संभव न हो तो उस पर थोड़ा सा पानी डाल दें ताकि रंग का धब्बा न पड़ने पाए.

– हलकेफुलके धब्बों को साबुन के पानी से एक नायलौन ब्रश से हलके हाथ से रगड़ कर साफ करें ताकि फर्श पर स्क्रैच न हो.

– अधिक पक्के धब्बों को साफ करने के लिए 2 बड़े चम्मच बेकिंग पाउडर में 1 छोटा चम्मच पानी मिला कर पेस्ट बनाएं और उसे धब्बों पर लगा कर आधे घंटे के लिए छोड़ दें. फिर साफ कपड़े से पोंछ दें. यदि धब्बे फिर भी न छूटें तो इस प्रक्रिया को 2-3 बार दोहराएं.

– पक्के धब्बों को साफ करने के लिए हाइड्रोजन पैराक्साइड को स्पंज पर लगा कर फर्श पर रगड़ें.

– यदि आप का फर्श सफेद संगमरमर का है, तो उस पर तरल ब्लीच का प्रयोग करें.

परंतु रंगीन और लैमिनेटेड फर्श पर ब्लीच का प्रयोग न करें अन्यथा यह उस का रंग फीका कर देगा.

– लकड़ी के फर्श पर गिरे सूखे रंग को तुरंत पोंछ कर साफ करें. यदि गीला रंग गिरा है तो साफ सूती कपड़े को ऐसिटोन में भिगो कर हलके हाथ से रगड़ते हुए साफ करें. ध्यान रखें कि कई बार इस से नाजुक फर्नीचर की पौलिश भी निकल जाती है. ऐसे में धब्बे हटाने के बाद पुन: पौलिश करवा लें जहां तक संभव हो रंग और पानी की व्यवस्था घर से बाहर ही करें और एक बार रंग या गुलाल लग जाने पर आप स्वयं भी बारबार अंदरबाहर न आएंजाएं. इस से आप व्यर्थ की परेशानियों से बच जाएंगी.

सैक्स एंजाइटी ठीक नहीं

अकसर सैक्स करने के बाद कुछ जोड़े चिंतित हो जाते हैं. खासकर तब जब शादी से पहले का समय हो या शादी की शुरुआत का हो. इस की कई वजहें हैं, जिन से बचने की सख्त जरूरत तो है ही, साथ ही साथ समाधानों को अपनाने की भी जरूरत है. सैक्स के बाद बरताव सैक्स के बाद बरताव कैसा हो, यह समझना किसी जोड़े के लिए सब से ज्यादा जरूरी है. उन के बीच मजा भले सैक्स दे,

लेकिन सैक्स के बाद एकदूसरे के साथ किया गया बरताव ही संबंधों को मजबूत बनाता है. अकसर मर्द जब सैक्स के बाद ढीला पड़ने लगता है, तो वह झट से अपनी पार्टनर से दूरी बनाने लगता है. कपड़े तुरंत पहन लेता है और बिस्तर से उठ जाता है या अपनी पार्टनर की तरफ पीठ कर के सोने लगता है. मर्द का यह बरताव उस की पार्टनर को निराशा दे सकता है. उसे लग सकता है कि सिर्फ सैक्स के लिए ही मर्द साथी उस के करीब आया है. ऐसे में जरूरी है कि सैक्स पूरा हो जाने के बाद एकदूसरे से रोमांटिक बातें करते रहें. किसी ऐसी बात के जिक्र से बचें, जो गंभीर हो और जो आप के पार्टनर का मूड खराब कर दे.

ज्यादा बढ़िया है कि सैक्स के बाद अपनी पार्टनर की पोजिशन, सैक्सी बौडी, मूव्स और सैक्स के दौरान किस तरह का मजा आप को आया है, उसे शेयर करें. अकसर औरतें भी सैक्स के बाद ‘तुम कंफर्टेबल हो या नहीं?’ जैसी बातें कई बार पूछती हैं और अगर मर्द पार्टनर पलट कर जवाब दे, तो ‘तुम बड़े बेशर्म हो’ जैसी मूड औफ वाली बातें कह देती हैं. ध्यान रहे कि सैक्स से पहले ‘फोरप्ले’ होता है और उस के बाद ‘आफ्टर प्ले’. जितना जरूरी ‘फोरप्ले’ है, उतना ही जरूरी ‘आफ्टर प्ले’ भी है.

यह नहीं कि आप का सैक्स हो गया और मुंह फेर कर बेतुके सवाल पूछने लगीं. अगर आप सैक्स को मजेदार बनाना चाहती हैं तो देखना होगा कि उस का पूरा होना भी अच्छा हो, इसलिए लंबी बातें करें, पर ऐसी बातों से बचें, जो पार्टनर को चुभ सकती हैं. बेहतर है कि सैक्स के बाद भी एकदूसरे के साथ इंटीमेट बात करते रहें या एकदूसरे को सहलाते रहें. अगर मूड नहीं है तो कम से कम अपने मर्द पार्टनर से चिपक कर रह सकती हैं. चरमसुख का सवाल चरमसुख यानी सैक्स के बाद मिलने वाला मजा. जब आंखों की पुतलियां खुली की खुली रह जाती हैं और शरीर में लंबी सिहरन दौड़ पड़ती है. इस में कोई शक नहीं कि मर्दों के मुकाबले औरतें बिस्तर पर ज्यादा देर तक टिकी रहती हैं, लेकिन अगर मर्द को सैक्स की तकनीक में महारत हासिल है, तो उस के लिए यह फुजूल बात है.

अकसर मर्द चरमसुख को ले कर यह गलती हमेशा करते हैं कि वे अपनी पार्टनर से बातबात पर उन के चरमसुख के बारे में पूछते रहते हैं, जिस से औरतें परेशान होती हैं. आमतौर पर ऐसा मर्द इसलिए नहीं करते हैं कि उन्हें औरतों के चरमसुख की चिंता रहती है, बल्कि वे इसलिए पूछते हैं ताकि वे अपनी मर्दानगी पर ताव दे सकें, क्योंकि बिस्तर पर जो अपनी पार्टनर को खुश न कर सका, उसे इस मामले में ढीला माना जाता है. पहली बात, जरूरी नहीं कि हर औरत को चरमसुख मिले. हर औरत की शारीरिक बनावट अलगअलग होती है, इसलिए अपनी पार्टनर से बारबार चरमसुख के बारे में पूछना ठीक नहीं. जरूरत इस बात को ध्यान में रखने की है कि सैक्स के दौरान आप पार्टनर को कैसे चरमसुख दे सकें.

इस के लिए जरूरी है कि आप की पार्टनर आप की बातों और बिस्तर पर बिताए आप के हर पल, चाहे वह ‘फोरप्ले’ हो या सैक्स, आप किस तरह निभाते हैं. अंडरवियर पहनें या नहीं इस पर बहुत कम लोग ही ध्यान देते हैं. वैसे, सैक्स में अंडरवियर की अपनी ही अलग इंटीमेसी होती है. आजकल तो बाजारों में मर्दों और औरतों के लिए सैक्सी अंडरगारमैंट आ गए हैं, जो जोश में लाने के लिए काफी होते हैं. सैक्स में अंडरगारमैंट का अपना ही अलग मजा होता है.

अकसर जोड़े सैक्स से पहले अंडरवियर उतार लेते हैं, फिर बाद में उसी अंडरवियर को पहन लेते हैं. सवाल यह कि सैक्स करने के बाद उतारे अंडरवियर को पहनें या नहीं? अब आप कहेंगे कि यह कैसा सवाल हुआ? जब सैक्स करने से पहले अंडरवियर निकाल दिया तो दिक्कत क्या है उसे पहनने में? सैक्स की टाइमिंग ‘फोरप्ले’ पर निर्भर करती है. ‘फोरप्ले’ ही वह बुनियाद है, जो बेहतर संतुष्ट पारी खेलने में मदद करती है. अकसर ‘फोरप्ले’ के दौरान मर्दऔरत दोनों के स्पर्म थोड़ीथोड़ी मात्रा में गिर जाते हैं. ऐसे में उसी अंडरवियर को फिर से पहनना सही नहीं है. कोशिश करें कि अंडरवियर को बदल लें. बच्चा ठहरने का डर सैक्स के दौरान असुरक्षा का डर इस के खुलेपन में खलल पैदा करता है. अकसर मर्दऔरत सैक्स करने के बाद इस डर से जूझने लगते हैं कि कहीं बच्चा ठहर न जाए.

मुमकिन है कि उन्होंने कंडोम का इस्तेमाल किया हो, फिर भी डर बना रहता है. ऐसी चीजों से न सिर्फ सैक्स के दौरान के पलों पर इस का असर पड़ता है, बल्कि सैक्स के बाद भी तनाव का सामना करना पड़ता है, फिर उस जोड़े के आपस के सवालजवाब और परेशान करने लगते हैं. असुरक्षित सैक्स के बाद बाजार में इमर्जैंसी पिल की सुविधा मौजूद है. सैक्स के 72 घंटों तक इसे लिया जा सकता है. खैर, ये तो तब के हालात हैं, जब असुरक्षित सैक्स किया हो. फीलिंग जरूरी है अकसर सैक्स के तुरंत बाद जोड़े में से कोई अपना फोन या लैपटौप चलाने लगता है या किसी और काम में लग जाता है. ऐसा करने से कुछ ऐसा महसूस होता है कि वह बस अपनी शारीरिक भूख मिटाने के मकसद से ही सैक्स कर रहा था. ऐसा करने से बचें. जब तक बहुत जरूरी काम न हो, अपने पार्टनर के साथ बने रहें, क्योंकि आप के ऐसा करने से आप के पार्टनर को बुरा महसूस हो सकता है.

सरकारी अस्पतालों की बदहाली, मध्य प्रदेश में तो बुरा हाल

फरवरी महीने के ठंड और गरमी से मिलेजुले दिनों में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले के एक गांव के सरकारी अस्पताल में सुबह 8 बजे से ही मरीजों की काफी भीड़ जमा हो गई थी. भीड़ में मर्दऔरतों का जमावड़ा तो था ही, अपने छोटेछोटे बच्चों को गोद में लिए कुछ नौजवान औरतें भी अपनी बारी के आने का इंतजार कर रही थीं.

10 रुपए काउंटर पर जमा कर के सभी अपने हाथ में ओपीडी की स्लिप पकड़े हुए डाक्टर के आने की बाट जोह रहे थे. सभी आपस में अपने दुखदर्द सा?ा करते हुए अपनीअपनी बीमारी की चर्चा कर रहे थे. ज्यादातर मरीज मौसमी बुखार और सर्दीखांसी से पीडि़त नजर आ रहे थे.

तकरीबन 9 बजे ड्यूटी पर तैनात डाक्टर ओपीडी में आए, तो घंटों लाइन में लगे मरीजों और उन के साथ आए लोगों के चेहरे पर मुसकान फैल गई. डाक्टर ने बारीबारी से मरीजों को देखना शुरू किया और परचे पर दवाएं लिख दीं.

कुछ ही समय में दवा के काउंटर पर भी भीड़ बढ़ने लगी. काउंटर पर तैनात मुलाजिम कुछ दवाएं दे रहा था और कुछ दवाएं मैडिकल स्टोर से खरीदने का बोल रहा था. मरीज इस बात को ले कर परेशान थे कि उन्हें मैडिकल स्टोर से महंगी दवाएं लेनी पड़ेंगी.

अभी कुछ ही मरीजों का इलाज हुआ था कि सड़क हादसे में घायल हुए एक आदमी को कुछ लोग अस्पताल ले कर आए. उन में से एक आदमी ने डाक्टर से कहा, ‘‘डाक्टर साहब, पहले इसे देख लीजिए. इस के सिर में चोट लगी है और खून भी बह रहा है.’’

तकरीबन 5,000 की आबादी वाले इस गांव में नौकरी कर रहे उस एकलौते डाक्टर ने ओपीडी छोड़ कर घायल आदमी की तरफ रुख करते हुए उसे ले कर आए लोगों से कहा, ‘‘अस्पताल में पट्टी नहीं है. जब तक मैं घाव पर मरहम लगाता हूं, तब तक आप बाहर मैडिकल स्टोर से पट्टियां मंगवा लीजिए.’’

एक नौजवान भागते हुए बाहर से पट्टियां खरीद कर ले आया, तो डाक्टर ने प्राथमिक उपचार कर उसे डिस्ट्रिक्ट हौस्पिटल के लिए रैफर कर दिया.

गांव में मेहनतमजदूरी करने वाले लोगों का सुबह से काम पर न जाने से मजदूरी का नुकसान तो हो ही रहा था, ऊपर से उन्हें जेब से कुछ रुपए भी खर्च करने पड़ रहे थे. कुछ नौजवान सरकार को कोस भी रहे थे कि सरकारी अस्पताल में इलाज के माकूल इंतजाम नहीं हैं और सरकार स्वास्थ्य सुविधाएं मुहैया कराने का ढोल पीट रही है.

सरकारी अस्पतालों में बदइंतजामी का नजारा कोई नई बात नहीं है. गांवकसबों के बहुत से अस्पताल तो डाक्टरों के बिना भी चल रहे हैं. सरकार गरीबों के उपचार के लिए ढेर सारी योजनाएं बना रही है, मगर डाक्टर और स्टाफ की कमी से जू?ाते अस्पताल गरीब और मध्यमवर्गीय परिवारों को इलाज मुहैया कराने में नाकाम हो रहे हैं. सरकारी अस्पतालों का सच जानने के लिए देश के अलगअलग हिस्सों का रुख करते हैं.

मध्य प्रदेश में कटनी जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था कितनी बदहाल है, इस का खुलासा नीति आयोग द्वारा जारी हुई लिस्ट से हुआ है. इस में रीठी स्वास्थ्य केंद्र के हालात काफी खराब बताए गए हैं, जिसे ले कर नीति आयोग ने कटनी सीएमएचओ राजेश आठ्या को चिट्ठी जारी करते हुए उन्हें इंतजाम दुरुस्त करने के निर्देश जारी किए हैं.

कटनी में 6 स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं, जिस के हर केंद्र में 4 से 5 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाए गए हैं, लेकिन तमाम प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में न तो डाक्टर मिलते हैं, न ही बेहतर इलाज. इन सब बातों की जांच के लिए बाहर से आई टीम ने जिले के सभी ब्लौकों में स्वास्थ्य इंतजामों की जांच की, जिस में सब से खराब हालात रीठी स्वास्थ्य केंद्र में मिले थे.

रीठी ब्लौक का ज्यादातर हिस्सा पहाड़ी इलाकों में शामिल है, जहां गरीब तबके के लोग रहते हैं. हालांकि, क्षेत्र में स्वास्थ्य इंतजामों को दुरुस्त करने के लिए शासन ने लाखोंकरोड़ों रुपए खर्च किए हैं, लेकिन जमीनी लैवल पर हालात जस के तस बने हुए हैं.

मध्य प्रदेश के मुरैना जिले के गांवदेहात के इलाकों में नएनए अस्पताल भवन तो बन रहे हैं, लेकिन इन अस्पतालों में न तो डाक्टर हैं और न ही इलाज की जरूरी सुविधाएं हैं. कई अस्पताल ऐसे हैं, जो बंद ही रहते हैं, तो कई अस्पताल कभीकभार खुलते हैं.

गांवदेहात के अस्पतालों की इस बदहाली के चलते मरीज व घायलों को इलाज के लिए ?ालाछाप डाक्टरों के यहां जाना पड़ता है, जहां इलाज कराना न सिर्फ जोखिम भरा है, बल्कि जेब पर भी भारी पड़ता है.

मध्य प्रदेश में गांवकसबों के अस्पताल के अलावा कई शहरों के अस्पताल भी अच्छी हालत में नहीं हैं. शाजापुर का जिला अस्पताल खुद बीमार है. इस अस्पताल में लिफ्ट तो है, लेकिन चलती नहीं. एक्सरे मशीन लगी है, लेकिन रिपोर्ट बनाने के लिए फिल्म नहीं है. मजबूरी में लोग कागज पर एक्सरे की रिपोर्ट निकलवाते हैं और यही रिपोर्ट डाक्टर को दिखा कर अपना इलाज कराते हैं.

जब कोई मरीज काफी पूछताछ करता है, तो रेडियोलौजिस्ट एक ही जवाब देता है कि एक्सरे की फिल्म काफी महंगी आती है और कई साल से सरकार ने इस के लिए बजट ही नहीं दिया है.

सरकारी अस्पताल में सरकार ने जांच के लिए भले ही मशीन लगा दी हो, पर स्टाफ की कमी की वजह से मरीजों को सुविधा कम, परेशानी ज्यादा हो रही है.

राजस्थान के ज्यादातर सरकारी अस्पतालों में मरीजों को सोनोग्राफी कराने के लिए लंबी कतार में लगना पड़ता है. उदयपुर में सोनोग्राफी के लिए मरीजों को एक हफ्ते के बाद आने को कहा जाता है और भीलवाड़ा में 15 से 20 दिन बाद की तारीख मिलती है. अलवर के राजीव गांधी सामान्य अस्पताल में तो मरीजों को सोनोग्राफी जांच के लिए 2 महीने का इंतजार करना पड़ता है.

मजबूरन मरीजों को निजी लैब से सोनोग्राफी करानी पड़ रही है. जब तक परची नहीं कटती, तब तक मरीज को पता नहीं चलता कि उसे सोनोग्राफी की कौन सी तारीख दी जा रही है. प्राइवेट लैब से सोनोग्राफी के लिए 800 से 1,000 रुपए ढीले करने पड़ते हैं.

?ां?ानूं के राजकीय भगवानदास खेतान अस्पताल में सिर्फ एक सोनोग्राफी मशीन है, जिस में रोजाना 40 मरीजों की सोनोग्राफी हो पाती है. बाद में आने वालों को आगे की तारीख दे दी जाती है. यहां पर एक दूसरी सोनोग्राफी मशीन स्टोर में ताले में बंद पड़ी है.

जोधपुर के उम्मेद अस्पताल में इंडोर पेशेंट की इमर्जैंसी के हिसाब से उसी दिन और बाकी की 24 घंटे में सोनोग्राफी होती है और आउटडोर मरीजों को सोनोग्राफी के लिए 20 से 25 दिन का इंतजार करना पड़ता है.

भीलवाड़ा के एमजीएच में 4 सोनोग्राफी मशीन हैं, लेकिन 2 ही डाक्टर होने से 2 मशीन पर ही सोनोग्राफी की जाती है. उदयपुर के आरएनटी मैडिकल कालेज में सोनोग्राफी की तारीख 5 से 7 दिन बाद की मिलती है. गर्भवती महिलाओं और दूसरे मरीजों के लिए अलगअलग व्यवस्था रहती है. गर्भवती महिलाओं को 6 से 7 दिन बाद की तारीख दी जाती है.

शहरी बना रहे हैं नीतियां आज भी देश के ज्यादातर हिस्सों में सरकारी अस्पतालों में इलाज के नाम पर बुनियादी सुविधाएं तक नहीं हैं. एंबुलैंस, शव वाहन, जननी ऐक्सप्रैस जैसे वाहन केवल प्रचार का जरीया बने हुए हैं. ओडिशा के कालाहांडी से ले कर छत्तीसगढ़, झारखंड, बिहार और मध्य प्रदेश में अस्पताल से मृतक के शव को परिजनों द्वारा कंधे, साइकिल और आटोरिकशा पर लाद कर घर ले जाने की तसवीरें केंद्र और राज्य सरकारों की स्वास्थ्य योजनाओं की पोल खोलती नजर आती हैं.

आजादी के बाद कांग्रेस के राज को कोसने वाली इस सरकार के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं है कि 10 सालों में उस ने देश के अंदर स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार में कौन सा बड़ा कदम उठाया है? चौराहों पर लगे बड़ेबड़़े होर्डिंग स्वास्थ्य सुविधाओं का बखान कर देखने में भले ही लोगों का ध्यान खींचते हों, पर जमीनी तौर पर पर इन योजनाओं का असरदार ढंग से पूरा न होने से देश के नागरिकों का हाल बेहाल है. भूखेनंगे गरीबों को इलाज की सुविधा मुहैया नहीं है और आप ऊंचीऊंची मूर्तियों पर पैसा लुटा रहे हैं.

देश में राम मंदिर बनाने से भले ही वोट बटोरे जा सकते हों, पर गरीब के दुखदर्द नहीं मिटाए जा सकते. शायद आप भूल जाते हैं कि देश को मंदिरों की नहीं, बल्कि अस्पतालों की जरूरत ज्यादा है.

जनता अब अच्छी तरह जान गई है कि जुमलों से इनसान के दुखदर्द को दूर करने का झांसा देने वाले धर्म के ठेकेदार कोरोना वायरस के बढ़ते संक्रमण के कारण किस तरह मंदिरों में ताले लगा कर मुंह छिपा कर घरों में कैद हो गए थे.

मगर भारत जैसे विकासशील देश में स्वास्थ्य सेवाओं का ढांचा बेहद कमजोर है. सरकारी अस्पतालों में डाक्टरों की तादाद बेहद कम है, तो निजी अस्पतालों का महंगा इलाज गरीब के बूते के बाहर है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन के मुताबिक, तकरीबन 1,000 की आबादी पर एक डाक्टर होना चाहिए, लेकिन इस पैमाने पर देश की स्वास्थ्य व्यवस्था कहीं नहीं टिकती है. नैशनल हैल्थ प्रोफाइल की रिपोर्ट के मुताबिक, देश में 11,000 से ज्यादा की आबादी पर महज एक सरकारी डाक्टर है.

उत्तर भारत के राज्यों में हालात बद से बदतर हैं. बिहार में एक सरकारी डाक्टर के कंधों पर 28,391 लोगों के इलाज की जिम्मेदारी है. उत्तर प्रदेश में 19,962, झारखंड में 18,518, मध्य प्रदेश में 17,192, महाराष्ट्र में 16,992 और छत्तीसगढ़ में 15,916 लोगों पर महज एक डाक्टर है.

केंद्रीय स्वास्थ्य राज्य मंत्री संसद में बता चुके हैं कि देश में कुल 6 लाख डाक्टरों की कमी है. हाल इतना बुरा है कि देश के 15,700 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र सिर्फ एकएक डाक्टर के भरोसे चल रहे हैं.

इंडियन जर्नल औफ पब्लिक हैल्थ ने अपनी एक स्टडी में कहा है कि अगर भारत को विश्व स्वास्थ्य संगठन के तय मानक पर पहुंचना है, तो उसे साल 2030 तक 27 लाख डाक्टरों की भरती करनी होगी. हालांकि, स्वास्थ्य और शिक्षा के बजाय भगवा रंग में रंगी यह सरकार मंदिर बनाने और मूर्तियां लगाने पर पैसा पानी की तरह बहा देगी, लेकिन गरीब जनता की सेहत से उसे कोई सरोकार नहीं है.

दरअसल, एयरकंडीशनर कमरों में बैठ कर नीतियां बनाने वाले शहरी नीतिनिर्धारक अभी भी यह मानने को तैयार नहीं हैं कि गांव वालों के पास इलाज के लिए पैसे नहीं होते. सच तो यह है कि गांव के लोगों के पास इलाज के लिए पैसे होते तो वे सरकारी अस्पताल के चक्कर काटने के बजाय प्राइवेट अस्पताल में इलाज कराते.

गांवकसबों के लिए सरकारी नीतियां अब विधायक, सांसद नहीं बनाते, बल्कि शहरों के इंगलिश मीडियम स्कूलों में पढ़ने वाले अफसर बनाते हैं. ये अफसर कंप्यूटर पर 50 पेज का पावर पौइंट प्रैजेंटेशन तैयार कर मीटिंग में मंत्रियों को दिखाते हैं, मगर गांव के हालात से उन्हें कोई मतलब नहीं होता.

सरकारी योजनाओं में भ्रष्टाचार कर करोड़ों रुपए की रकम ऐंठने वाले इन अफसरों के गांवकसबों में बड़ेबड़े रिजौर्ट तो बन गए हैं, मगर गांव से इन का कोई सरोकार नहीं है. अफसर और मंत्रियों की काली कमाई से बड़े शहरों में प्राइवेट हौस्पिटल बने हुए हैं, जिन तक गांव के गरीब आदमी की पहुंच ही नहीं है.

स्वास्थ्य सेवाओं में फिसड्डी

मध्य प्रदेश के 51 जिलों में 8,764 प्राथमिक उपस्वास्थ्य केंद्र, 1,157 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, 334 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 63 सिविल अस्पताल, 51 जिला अस्पताल हैं, पर कई जिलों में स्वास्थ्य सेवाएं मानो खुद वैंटिलेटर पर हैं. सरकार रोज नई स्वास्थ्य योजनाएं लागू कर रही है, लेकिन फील्ड पर इस के नतीजे निराशाजनक ही रहे हैं.

ज्यादातर सरकारी अस्पताल डाक्टरों की कमी से जूझ रहे हैं. सरकारी योजनाओं में फैला भ्रष्टाचार भी व्यवस्थाओं को बरबाद करने में अपना अहम रोल निभा रहा है.

भोपाल और इंदौर जैसे बड़े शहरों के बड़ेबड़े सरकारी अस्पताल बदहाल हैं. ऐसे में छोटे जिलों, तहसीलों, कसबों और गांवदेहात के इलाकों में स्वास्थ्य सेवाओं का सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है.

मध्य प्रदेश के गांवदेहात के इलाकों के हालात बद से बदतर हैं. मनकवारा गांव के सुखराम कुशवाहा कहते हैं, ‘‘गांवकसबों में संविदा पर नियुक्त स्वास्थ्य कार्यकर्ता हफ्ते में एक दिन जा कर पंचायत भवन या स्कूल में घंटे 2 घंटे बैठ कर बच्चों को टीका लगा कर मरीजों को नीलीपीली गोलियां बांट कर अपने काम से पल्ला झाड़ लेते हैं.’’

गरीब दलित और पिछड़े परिवारों का एक बड़ा तबका बीमारी में सरकारी अस्पतालों की ओर ही भागता है. रोजाना 250-300 रुपए मजदूरी से कमाने वाला गरीब प्राइवेट डाक्टरों की भारीभरकम फीस और दवाओं का खर्च नहीं उठा पाता.

सरकारी अस्पतालों की बदहाली के शिकार गरीब आदमी बीमार होने पर मन मसोस कर सरकारी अस्पतालों में जाते हैं, जहां उसे रोगी कल्याण समिति के नाम पर 10 रुपए, जांच शुल्क के नाम पर 30 रुपए और भरती होने पर 50 रुपए की रसीद कटवानी पड़ती है. एएनएम और नर्सों द्वारा उन का इलाज किया जाता है.

किसी तरह की अव्यवस्था की शिकायत गरीब डर की वजह से नहीं कर पाता है और कभी उस ने किसी विभागीय टोल फ्री नंबर पर औनलाइन शिकायत कर भी दी, तो विभागीय कर्मचारियों द्वारा शिकायत करने वाले को डरायाधमकाया जाता है. सरकारी पोर्टल पर गोलमोल जवाब डाल कर शिकायत का निबटान कर दिया जाता है.

गरीब के पास वोटरूपी हथियार होता है. कभी व्यवस्था से नाराज हो कर वह सरकार बदलने का कदम उठाता भी है तो अगली सरकार का रवैया भी ढाक के तीन पात के समान ही रहता है. ऐसे में लाचार गरीब सरकारी अस्पतालों में मिल रही आधीअधूरी सुविधाओं से काम चला लेने में ही अपनी भलाई समझाता है.

सरकारी योजनाओं की लूट

मध्य प्रदेश के ज्यादातर प्राइवेट अस्पताल राजनीतिक रसूख रखने वाले डाक्टरों के हैं, जिन में सरकारी योजनाओं के तहत मरीजों का इलाज किया जाता है और सरकार से लाखों रुपए के क्लेम की बंदरबांट की जाती है.

आयुष्मान योजना केंद्र सरकार ने गरीब मरीजों को मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के मकसद से शुरू की थी, लेकिन निजी अस्पतालों के लिए यह योजना पैसा कमाने का जरीया बन गई.

फर्जीवाड़ा कर रहे डाक्टर सामान्य बीमारी वाले मरीजों या स्वस्थ लोगों को गंभीर रोगों से पीडि़त बता कर उन के इलाज के नाम पर सरकारी पैसा लूट रहे हैं. यह रकम थोड़ीबहुत नहीं, बल्कि लाखों रुपए में होती है.

होटल वेगा में भरती मरीजों के बारे में जान कर आप को भी पता चलेगा कि किस तरह आयुष्मान योजना में भ्रष्टाचार किया जाता है.

जबलपुर पुलिस की टीम ने स्वास्थ्य विभाग के साथ मिल कर 26 अगस्त, 2022 को सैंट्रल इंडिया किडनी अस्पताल में छापा मारा था. उस समय अस्पताल के अलावा होटल वेगा में भी छापा मारा गया था.

जांच के दौरान होटल वेगा और अस्पताल में आयुष्मान कार्डधारी मरीज भरती पाए गए थे. अस्पताल संचालक दुहिता पाठक और उन के पति डाक्टर अश्विनी कुमार पाठक ने कई लोगों को फर्जी मरीज बना कर यहां रखा था. होटल के कमरे में 3-3 लोग भरती पाए गए थे. इस के बाद पुलिस ने डाक्टर दंपती के खिलाफ विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज किया था और डाक्टर दंपती को जेल की हवा खानी पड़ी थी.

इस मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया गया था. एसआईटी की जांच में यह खुलासा हुआ था कि आयुष्मान भारत योजना के तहत सैंट्रल इंडिया किडनी हौस्पिटल में पिछले 2 से ढाई साल में तकरीबन 4,000 मरीजों का इलाज हुआ था, जिस के एवज में सरकार द्वारा तकरीबन साढ़े 12 करोड़ रुपए का भुगतान अस्पताल को किया गया था. इस के साथ ही इस बात के भी दस्तावेज मिले हैं कि

दूसरे राज्यों के मरीजों का उपचार भी सैंट्रल इंडिया किडनी अस्पताल में हुआ था, जो गैरकानूनी है.

एसआईटी ने सैंट्रल इंडिया किडनी अस्पताल में काम कर रहे मुलाजिमों से भी पूछताछ की, जिस में कई मुलाजिमों ने बताया कि वे अस्पताल में आयुष्मान हितग्राही को भरती करवाते थे, तो अस्पताल संचालक दुहिता पाठक और उन के पति डाक्टर अश्विनी पाठक बतौर कमीशन 5,000 रुपए देते थे.

कमीशन लेने के लिए मुलाजिमों ने कई बार एक ही परिवार के लोगों को अलगअलग तारीख में भरती किया था. उन के नाम पर अस्पताल द्वारा आयुष्मान योजना के फर्जी बिल लगा कर लाखों रुपए की वसूली की गई थी.

इसी तरह टीला जमालपुरा में बनी हाउसिंग बोर्ड कालोनी में रहने वाले 28 साल के खालिद अली ने नवंबर, 2021 में अपने 3 महीने के बेटे जोहान के सर्दीजुकाम के इलाज के लिए भोपाल के मैक्स केयर अस्पताल में भरती कराया था. बाद में डाक्टरों द्वारा बताया गया कि उस बच्चे को निमोनिया हो गया है.

3 महीने तक मासूम को हौस्पिटल में भरती रखा गया, जिस में कई बार में दवाओं और इलाज के नाम पर 3 लाख से ज्यादा रुपए वसूल लिए गए. खालिद अली जब भी बिल मांगता, अस्पताल मैनेजमैंट उसे टका सा जबाव दे देता कि मरीज के डिस्चार्ज होने के समय पूरे बिल दे दिए जाएंगे, आप चिंता न करें.

जनवरी, 2022 में आखिरकार मासूम जोहान की मौत हो गई और बाद में पता लगा कि अस्पताल की ओर से आयुष्मान कार्ड से भी बच्चे के इलाज के नाम पर रकम सरकारी खजाने से ली गई है, जबकि खालिद अली के परिवार को इस की जानकारी नहीं दी गई थी. सब से पहले इस फर्जीवाड़े की शिकायत पुलिस थाने में की तो सुनवाई नहीं हुई. तब जा कर कोर्ट में परिवाद दायर किया.

खालिद अली ने बताया कि मैक्स केयर हौस्पिटल का संचालक डाक्टर अल्ताफ मसूद सरकारी योजनाओं में जम कर भ्रष्टाचार कर रहे हैं और उन के खिलाफ शिकायतें भी हो रही हैं, मगर अपनी राजनीतिक पहुंच के चलते उन पर कोई कार्यवाही नहीं होती है.

अभी भी मैक्स केयर हौस्पिटल की ओपीडी में डाक्टर अल्ताफ मसूद मरीजों का इलाज कर रहे हैं और पुलिस जांच के नाम पर खानापूरी कर यह बता रही है कि वे हास्पिटल में नहीं हैं.

चिंताजनक बात यह है कि देश के दूरदराज के इलाकों में लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं नहीं मिल पा रही हैं. बड़ेबड़े सरकारी अस्पतालों में एंबुलैंस नहीं हैं और जो हैं उन के अस्थिपंजर ढीले पड़ गए हैं. देश के जनसेवक इन सब पर ध्यान देने के बजाय करोड़ों रुपए खर्च कर हवाईजहाज खरीद रहे हैं और जुमले उछाल कर लोगों का मन बहला रहे हैं.

आजादी के 7 दशकों के बाद भी हम गरीबों के लिए कोई खास सुविधाएं नहीं जुटा पाए हैं. जब देश के रहनुमा कोरोना की जंग लड़ने के लिए जुमलों के साथ ताली और थाली बजाने व दीया जलाने को रोग भगाने का टोटका सम?ाते हों, हौस्पिटल में स्वास्थ्य सुविधाओं को बढ़ाने के बजाय भव्य मंदिर और ऊंचीऊंची मूर्तियों के बनाने को विकास समझते हों, ऐसे शासकों से आखिर क्या उम्मीद की जा सकती है?

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें