मेरी उड़ान : आहना एक मल्टीनैशनल कंपनी की इंजीनियर

आहना अपने बालों से बड़ी परेशान हो चुकी थी. आयन के जन्म के बाद उस के बाल काफी खराब हो चुके थे, इसलिए आज आहना ने बाल कटवाने के साथसाथ वे कलर और स्मूद भी करवा लिए थे.

जब आहना ब्यूटी पार्लर से बाहर निकली, तो 4 घंटे बीत चुके थे. वंश के 5 मिसकाल थे. उस ने जल्दी से काल बैक किया, तो उधर से वंश झल्लाते हुए बोला, ‘पार्लर में काम करवाने गई थी या खुद का पार्लर खोलने गई थी… आयन ने रोरो कर मम्मी को बड़ा ही परेशान कर रखा है.’

आहना ने कहा, ‘‘अरे, आयन को तो मैं उस की नैनी के पास छोड़ कर आई थी.’’

वंश बोला, ‘आयन की मम्मी कौन है, तुम या नैनी?’

आहना ने बात को बढ़ाए बिना फोन काट दिया.

जैसे ही आहना ने घर में कदम रखा, वंश उस का बदला हुआ रूप देख कर हक्काबक्का रह गया.

‘‘यह क्या हाल बना लिया है तुम ने… बालों की क्या गत बना ली है…’’

आहना बोली, ‘‘क्यों, अच्छी तो लग रही हूं.’’

तभी आहना की सास ताना कसते हुए बोलीं, ‘‘अब देखना कितने बाल झड़ेंगे तुम्हारे.’’

आहना सब की बातों को नजरअंदाज करते हुए आईने में खुद को देख कर मुसकरा रही थी. कितना मन था उस का बालों को स्ट्रेट कराने का और आखिरकार उस ने करा ही लिए.

रात में वंश का मुंह फूला हुआ था. आहना ने उस का मूड ठीक करने की कोशिश भी की, पर उस का मूड ठीक नहीं हुआ.

आहना को पता था कि वंश को उस के बालों से बड़ा प्यार था, पर अब आहना के बाल पहले जैसे नहीं रहे, बल्कि झाड़ू जैसे हो गए थे. और यह कैसा प्यार है, जो बालों पर टिका हुआ है?

आहना 32 साल की एक मौडर्न औरत थी और उस का यह मौडर्न होना केवल कपड़ों तक ही नहीं सिमटा था, बल्कि वह अपनी एक आजाद सोच भी रखती थी.

आहना एक मल्टीनैशनल कंपनी में इंजीनियर के पद पर थी. उस की शादी एक मौडर्न और पढ़ेलिखे परिवार में हुई थी और वे लोग अपने मौडर्न होने का सुबूत भी देते रहते थे.

आहना को वैस्टर्न कपड़े पहनने की इजाजत देना, बच्चा होने के बाद भी नौकरी करने देना, यह सब उन की मौडर्न सोच के दायरे में आता था.

अगली सुबह नाश्ते की टेबल पर वंश बोला, ‘‘आहना, मैं अगले हफ्ते के टिकट बुक करा देता हूं. 2 दिन की छुट्टी है, 2 और ले लेना, हम राजस्थान चलेंगे.’’

आहना बोली, ‘‘वंश, मैं तो छुट्टी नहीं ले पाऊंगी, मेरी प्रैजेंटेशन है.’’

वंश बोला, ‘‘तो क्या हुआ… औफिस में बोल देना कि फैमिली के साथ छुट्टी पर जाना है.’’

आहना बोली, ‘‘अरे, मेरे प्रमोशन के लिए यह जरूरी है.’’

आहना की सास बोलीं, ‘‘आयन के प्रति भी तुम्हारी कोई जिम्मेदारी है या नहीं? मां तो अपने बच्चों के लिए कितने त्याग करती है, घरपरिवार ऐसे ही नहीं चलते हैं. मैं ने तो खुद वंश के पैदा होने के बाद अपनी सरकारी नौकरी छोड़ दी थी.’’

आहना आराम से बोली, ‘‘मम्मी, वह आप की चौइस थी.’’ वंश ने कहा, ‘‘ठीक है, ठीक है. तुम आगे बढ़ो, चाहे इस में परिवार पीछे छूट जाए.’’

आहना को वंश का रवैया सम?ा नहीं आता था. आहना आजाद तो थी, पर उस की आजादी की दीवारें वंश तय करता था. इस के बावजूद वह आहना की उड़ान को चाह कर भी नहीं रोक पा रहा था.

आहना की ससुराल वाले चाहते थे कि आहना नौकरी करे और खाली समय में घर का काम, मगर आहना का नजरिया अलग था. ऐसा नहीं था कि वह अपने परिवार को प्यार नहीं करती थी, पर प्यार के नाम पर वह खुद को कुरबान भी तो नहीं कर सकती थी.

पहले आहना की सास ने उसे रसोई में कैद करना चाहा, तो आहना ने बिना किचकिच किए कुक का इंतजाम कर लिया. अब वंश और उस के परिवार की अलग शिकायत थी कि खाने में कोई स्वाद नहीं है.

एक दिन आहना के मम्मीपापा आए हुए थे. आहना उस दिन दफ्तर से थोड़ा पहले आ गई थी. उस ने जब खाना लगाया, तो आहना की मम्मी ने ऐसे ही बोल दिया, ‘‘आहना, खाने में घीतेल का थोड़ा ध्यान रखा करो.’’

आहना की सास छूटते ही बोलीं, ‘‘आहना ने तो पूरी रसोई कुक के हवाले कर रखी है.’’

आहना थोड़ी सी आहत हो कर बोली, ‘‘मुझे समय नहीं मिल पाता है और फिर मम्मी तो घर पर ही रहती हैं, इतनी देखरेख तो ये भी कर सकती हैं.’’

आहना की मम्मी ने जब आंखें तरेरीं, तो आहना चुप हो गई, पर उस रात आहना के मम्मीपापा के जाने के बाद बहुत हंगामा हुआ. सास ने पूरा सिर घर पर उठा लिया था.

वंश का फिर आहना से अबोला हो गया था. आहना को समझ नहीं आता था कि क्यों वंश उसे समझ नहीं पाता है.

क्या आहना एक इनसान नहीं है? क्या उसे सपने देखने का हक नहीं है? क्यों आहना की उड़ान का रिमोट हमेशा दूसरों के हाथ में होता है? क्यों उस की जिंदगी की रफ्तार पर हमेशा रिश्तों का स्पीड ब्रेकर लग जाता है? कभी बहू, कभी बेटी और अब मां के रिश्ते की दुहाई दे कर आहना का परिवार उस की उड़ान को रोकना क्यों चाहता है?

आज आहना के औफिस में पार्टी थी. सब लोगों को अपने परिवार के साथ आना था. जब आहना ने वंश से कहा, तो वह जानबू?ा कर बोला, ‘‘मेरी आज एक जरूरी मीटिंग है.’’

न जाने क्यों वंश को आहना की अलग पहचान से चिढ़ सी होने लगी थी. आहना से शादी करना वंश का ही फैसला था, पर जिस आहना के अपने पैरों पर खड़े होने वाले जज्बे से वंश को प्यार था, न जाने क्यों अब वंश को वही एकदम से आहना का घमंड लगने लगा था.

आहना पार्टी में अकेले ही गई और वापसी में आतेआते रात के 12 बज गए. वंश आयन को थपथपा रहा था. आहना को देखते ही वह फट पड़ा, ‘‘कैसी मम्मी हो तुम, पूरे दिन में तुम्हारा एक बार भी आयन के साथ रहने का मन नहीं करता है.’’

आहना बात बढ़ाना नहीं चाहती थी, इसलिए शांति से बोली, ‘‘आयन अपने घर में अपने पापा और दादी के साथ महफूज है, इसलिए मैं बेफिक्र रहती हूं.’’

वंश भुनभुनाता हुआ तकिया उठा कर बाहर सोने चला गया और आहना थोड़ी देर के बाद गहरी नींद के आगोश में समा गई.

आहना वंश के बरताव से परेशान हो चुकी थी. उसे इस घुटन से थोड़ी आजादी चाहिए थी, इसलिए वह एक हफ्ते के लिए आयन के साथ अपने घर चली गई.

नानानानी आयन को देख कर बहुत खुश हो गए थे. अहाना ने मन ही मन सोचा कि कुछ दिन तो वह चैन से गुजारेगी, पर वह गलत थी.

शाम को जब आहना दफ्तर से लौटी, तो उस की मम्मी बोलीं, ‘‘आहना, कपड़े बदल कर रसोई में आ जाओ, मैं तुम्हें कोफ्ते बनाना सिखा देती हूं.’’

आहना बोली, ‘‘मगर क्यों…? मैं थकी हुई हूं और थोड़ा आराम करना चाहती हूं. मुझे कल की प्रैजेंटेशन पर काम भी करना है.’’

आहना की मम्मी बोलीं, ‘‘बेटा, शादी के बाद दफ्तर के साथसाथ घर भी देखना जरूरी है. आज तुम्हारी सास का फोन आया था और वे तुम से बेहद नाराज हैं.’’

आहना बोली, ‘‘मम्मी, जब मैं और वंश बराबर की कमाई कर रहे हैं, तो सिर्फ मुझ से यह उम्मीद क्यों?’’

मम्मी बोलीं, ‘‘आहना, शादी के बाद तुम्हारी उड़ान की बागडोर तुम्हारे परिवार के साथ जुड़ी है. ऐसा न हो कि तुम्हारी उड़ान के चलते तुम्हारा परिवार पीछे छूट जाए.’’

आहना ने सपोर्ट के लिए अपने पापा की तरफ देखा, पर वे भी चुप रहे.

आहना को लगा था कि यहां पर वह चैन की सांस लेगी, पर वह गलत थी. उस ने बेमन से खाना खाया और कमरा बंद कर के कल की तैयारी करने लगी.

प्रैजेंटेशन बनातेबनाते आहना खो गई कि अगर यह प्रोजैक्ट कंपनी को मिल गया, तो उसे इस प्रोजैक्ट को लीड करने का मौका मिलेगा.

एक हफ्ते बाद आहना वापस अपने घर चली गई, पर नसीहतों और ढेरों सलाहों के साथ. वंश का मूड अभी भी खराब था, पर अपनी मम्मी की नसीहत के चलते आहना ने ही पहल कर के उस से बात कर ली थी.

रात में आहना रसोई में जा कर कुक को खाना बनाने में मदद भी कर रही थी. वंश और उस की मम्मी आहना के इस बदले रूप से बेहद खुश थे कि चलो, देर से ही सही कम से कम आहना ने अपनी जिम्मेदारी तो सम?ा.

घर में हंसीखुशी का माहौल बना हुआ था. आहना को इस के लिए थोड़ी ज्यादा मेहनत करनी पड़ रही थी, पर फिर भी जिंदगी में थोड़ा सुकून था.

आज रात वंश पूरे परिवार के साथ डिनर पर गया था. डिनर करतेकरते वह बोला, ‘‘आहना, मैं बेहद खुश हूं. तुम ने पूरे परिवार को एक डोर में बांध लिया है. अब घर एक घर की तरह लगने लगा है. मैं वादा करता हूं कि तुम्हारी हर उड़ान में तुम्हारा साथ दूंगा.’’

आहना धीमे से मुसकरा दी. अब उसे दोगुनी मेहनत करनी पड़ती थी, पर उस की उड़ान एक घर को नहीं, बल्कि एक खुले आसमान को चाहती थी. उसे अपने पंखों के सहारे आसमान की ऊंचाइयों को छूना था.

आहना आज जब दफ्तर पहुंची, तो बौस ममता कपूर ने उसे अपने केबिन में बुला लिया. आहना डरतेडरते वहां पहुंची, तो बौस बोलीं, ‘‘आहना, तुम जिस प्रोजैक्ट पर काम कर रही थी, वह कंपनी को मिल गया है. तुम ही उस प्रोजैक्ट को लीड करोगी, तो 4 महीने की ट्रेनिंग के लिए तुम्हें सिंगापुर जाना होगा.’’

आहना कितने दिनों से कोशिश कर रही थी. उस की आंखों में खुशी के आंसू आ गए.

आज शाम को आहना ने सब के लिए फ्रूट कस्टर्ड बनाया. जब उस ने वंश को प्रोजैक्ट वाली बात बताई, तो वंश बोला, ‘‘तुम ने मना कर दिया न?’’

आहना बोली, ‘‘क्यों?’’

वंश चिढ़ते हुए बोला, ‘‘अरे, आयन को कौन देखेगा?’’

‘‘उस की दादी या नैनी उस की देखभाल कर सकती हैं.’’

‘‘पर, आयन की मां तुम हो और उसे अभी तुम्हारी जरूरत है.’’

आहना को गुस्सा आ गया, पर फिर भी खुद पर कंट्रोल करते हुए बोली, ‘‘तुम भी तो आयन के पापा हो… क्या कुछ महीने के लिए तुम मेरी जगह नहीं ले सकते हो?’’

यह सुन कर वंश की मम्मी गुस्से में बोलीं, ‘‘आहना, मां की जगह कोई नहीं ले सकता है, पर तुम्हारी झाली में सारी खुशियां आ गई हैं, तो तुम्हें क्या समझ आएगा.’’

आहना भी बिना रुके बोली, ‘‘मम्मी, घुट कर या दुखी हो कर मैं आयन को क्या सुख दे पाऊंगी?’’

आहना की सास को उस का रवैया समझ नहीं आता था. उन्होंने खुद भी तो वंश के पैदा होने के बाद अपने सपनों को तिलांजलि दे दी थी. ऐसी भी क्या उड़ान कि जो परिवार को ही दिशाहीन कर दे?

आहना ने उस रात अकेले ही मुंह मीठा किया. जब उस ने अपने मम्मीपापा को यह बात बताई, तो उन्होंने भी आहना को एक मां के फर्ज बताने शुरू कर दिए.

बैडरूम में आहना ने वंश से पूछा, ‘‘वंश, अगर मेरी जगह तुम होते तो क्या करते?’’

वंश चिढ़ते हुए बोला, ‘‘आहना, ये नारीवाद की बातें मुझ से मत करो. तुम्हें बात को बढ़ाना है, तो बढ़ाओ. तुम अपनी उड़ान भरो, मैं अपने परिवार को खुद संभाल लूंगा.’’

आहना पूरी रात सोचती रही. उसे लगने लगा था कि वही गलत है. जब पति और परिवार सभी मना कर रहे हैं, तो शायद वही सम?ा नहीं पा रही है.

अगले दिन आहना दफ्तर पहुंची, तो उस के मन से शक के बादल छंट चुके थे. आहना ने अपनी बौस को बताया तो वे प्यार से बोलीं, ‘‘आहना, मैं इस दोराहे से गुजर चुकी हूं. मैं ने भी तुम्हारी तरह अपने बच्चों को चुना था, क्योंकि मां को त्याग और बलिदान करना होता है. पर आहना, मैं गलत थी. एक मां, जिस के पंखों को ममता का नाम दे कर काट दिया जाता है, वह क्या अपने बच्चों को उड़ना सिखाएगी?

एक बार फैसला लेने से पहले यह जरूर सोच लेना कि तुम इस फैसले से खुश हो या नहीं.’’

बौस की बात सुन कर आहना ने अपना फैसला ले लिया था.

आहना जब अपना और आयन का सामान बांध रही थी, तो वंश को कुछ सम?ा नहीं आ रहा था.

वंश ने घबरा कर आहना के मम्मीपापा को बुला लिया था. आहना के मम्मीपापा आ तो गए थे, पर उन्हें खुद सम?ा नहीं आ रहा था कि आहना ऐसा क्यों कर रही है.

वंश की मम्मी बोलीं, ‘‘देखिए आप लोग, आप की बेटी अपना घर तोड़ने पर आमादा है.’’

आहना की मम्मी ने पूछा, ‘‘बेटी, क्यों कर रही है तू ऐसा? क्या हम ने तुझे यह सब सिखाया है?’’

आहना बोली, ‘‘मम्मीपापा, आप लोगों ने मुझे उड़ना सिखाया है और अब आप लोग मेरे पंख काटना चाहते हो. अगर मां और बच्चे का रिश्ता बस इस बात पर टिका हुआ है कि मां को मां होने का हर समय सुबूत देना होता है, तो ठीक है. मैं अपने साथ अपने बेटे को भी ले कर जा रही हूं.

‘‘अगर वंश को ऐसा कोई चांस मिलता तो क्या उस को पिता होने का सुबूत देना पड़ता?’’ सब लोग चुपचाप आहना की बात सुन रहे थे.

आहना आगे बोली, ‘‘मैं आयन को अपनी ताकत बनाना चाहती हूं, कमजोरी नहीं. मैं उस की देखभाल खुद कर लूंगी.’’

तभी अचानक से वंश ने आगे बढ़ कर आयन को गोद में ले लिया और बोला, ‘‘आहना, मैं भी अपने रिश्ते

को तुम्हारी ताकत बनाना चाहता हूं, कमजोरी नहीं. मैं और आयन तुम्हारा इंतजार करेंगे, तुम पूरी लगन से अपना काम करना.’’

अपनी मम्मी की तरफ देखते हुए वंश आगे बोला, ‘‘आहना, मैं नहीं चाहता कि आयन को भी बड़े हो कर यह पता चले कि उस के चलते तुम ने अपने सपनों को भस्म कर दिया था.’’

आहना की सास अपने बेटे के कहे को सम?ा गई थी और वे बालकनी में जा कर खुले आसमान में उड़ते हुए पंक्षियों को देख कर राहत की सांस ले रही थी.

Holi 2024: दाग का सच – क्या था सुनील और ललिया के बीच

पूरे एक हफ्ते बाद आज शाम को सुनील घर लौटा. डरतेडरते डोरबैल बजाई.

बीवी ललिया ने दरवाजा खोला और पूछा, ‘‘हो गई फुरसत तुम्हें?’’

‘‘हां… मुझे दूसरे राज्य में जाना पड़ा था न, सो…’’

‘‘चलिए, मैं चाय बना कर लाती हूं.’’

ललिया के रसोईघर में जाते ही सुनील ने चैन की सांस ली.

पहले तो जब सुनील को लौटने में कुछ दिन लग जाते थे तो ललिया का गुस्सा  देखने लायक होता था मानो कोई समझ ही नहीं कि आखिर ट्रांसपोर्टर का काम ही ऐसा. वह किसी ड्राइवर को रख तो ले, पर क्या भरोसा कि वह कैसे चलाएगा? क्या करेगा?

और कौन सा सुनील बाकी ट्रक वालों की तरह बाहर जा कर धंधे वालियों के अड्डे पर मुंह मारता है.

चाहे जितने दिन हो जाएं, घर से ललिया के होंठों का रस पी कर जो निकलता तो दोबारा फिर घर में ही आ कर रसपान करता, लेकिन कौन समझाए ललिया को. वह तो इधर 2-4 बार से इस की आदत कुछकुछ सुधरी हुई है. तुनकती तो है, लेकिन प्यार दिखाते हुए.

चाय पीते समय भी सुनील को घबराहट हो रही थी. क्या पता, कब माथा सनक उठे.

माहौल को हलका बनाने के लिए सुनील ने पूछा, ‘‘आज खाने में क्या बना रही हो?’’

‘‘लिट्टीचोखा.’’

‘‘अरे वाह, लिट्टीचोखा… बहुत बढि़या तब तो…’’

‘‘हां, तुम्हारा मनपसंद जो है…’’

‘‘अरे हां, लेकिन इस से भी ज्यादा मनपसंद तो…’’ सुनील ने शरारत से ललिया को आंख मारी.

‘‘हांहां, वह तो मेरा भी,’’ ललिया ने भी इठलाते हुए कहा और रसोईघर में चली गई.

खाना खाते समय भी बारबार सुनील की नजर ललिया की छाती पर चली जाती. रहरह कर ललिया के हिस्से से जूठी लिट्टी के टुकड़े उठा लेता जबकि दोनों एक ही थाली में खा रहे थे.

‘‘अरे, तुम्हारी तरफ इतना सारा रखा हुआ है तो मेरा वाला क्यों ले रहे हो?’’

‘‘तुम ने दांतों से काट कर इस को और चटपटा जो बना दिया है.’’

‘‘हटो, खाना खाओ पहले अपना ठीक से. बहुत मेहनत करनी है आगे,’’ ललिया भी पूरे जोश में थी. दोनों ने भरपेट खाना खाया.

ललिया बरतन रखने चली गई और सुनील पिछवाड़े जा कर टहलने लगा. तभी उस ने देखा कि किसी की चप्पलें पड़ी हुई थीं.

‘‘ये कुत्ते भी क्याक्या उठा कर ले आते हैं,’’ सुनील ने झल्ला कर उन्हें लात मार कर दूर किया और घर में घुस कर दरवाजा बंद कर लिया.

सुनील बैडरूम में पहुंचा तो ललिया टैलीविजन देखती मिली. वह मच्छरदानी लगाने लगा.

‘‘दूध पीएंगे?’’ ललिया ने पूछा.

‘‘तो और क्या बिना पीए ही रह जाएंगे,’’ सुनील भी तपाक से बोला.

ललिया ने सुनील का भाव समझ कर उसे एक चपत लगाई और बोली, ‘‘मैं भैंस के दूध की बात कर रही हूं.’’

‘‘न… न, वह नहीं. मेरा पेट लिट्टीचोखा से ही भर गया है,’’ सुनील ने कहा.

‘‘चलो तो फिर सोया जाए.’’

ललिया टैलीविजन बंद कर मच्छरदानी में आ गई. बत्ती तक बुझाने का किसी को होश नहीं रहा. कमरे का दरवाजा भी खुला रह गया जैसे उन को देखदेख कर शरमा रहा था.

वैसे भी घर में उन दोनों के अलावा कोई रहता नहीं था.

सुबह 5 बजे सुनील की आंखें खुलीं तो देखा कि ललिया बिस्तर के पास खड़ी कपड़े पहन रही थी.

‘‘एक बार गले तो लग जाओ,’’ सुनील ने नींद भरी आवाज में कहा.

‘‘बाद में लग लेना, जरा जल्दी है मुझे बाथरूम जाने की…’’ कहते हुए ललिया जैसेतैसे अपने बालों का जूड़ा बांधते हुए वहां से भाग गई.

सुनील ने करवट बदली तो ललिया के अंदरूनी कपड़ों पर हाथ पड़ गया.

ललिया के अंदरूनी कपड़ों की महक सुनील को मदमस्त कर रही थी.

सुनील ललिया के लौटने का इंतजार करने लगा, तभी उस की नजर ललिया की पैंटी पर बने किसी दाग पर गई. उस का माथा अचानक से ठनक उठा.

‘‘यह दाग तो…’’

सुनील की सारी नींद झटके में गायब हो चुकी थी. वह हड़बड़ा कर उठा और ध्यान से देखने लगा. पूरी पैंटी पर कई जगह वैसे निशान थे. ब्रा का मुआयना किया तो उस का भी वही हाल था.

‘‘कल रात तो मैं ने इन का कोई इस्तेमाल नहीं किया. जो भी करना था सब तौलिए से… फिर ये…’’

सुनील का मन खट्टा होने लगा. क्या उस के पीछे ललिया के पास कोई…? क्या यही वजह है कि अब ललिया उस के कई दिनों बाद घर आने पर झगड़ा नहीं करती? नहींनहीं, ऐसे ही अपनी प्यारी बीवी पर शक करना सही नहीं है. पहले जांच करा ली जाए कि ये दाग हैं किस चीज के.

सुनील ने पैंटी को अपने बैग में छिपा दिया, तभी ललिया आ गई, ‘‘आप उठ गए… मुझे देर लग गई थोड़ी.’’

‘‘कोई बात नहीं,’’ कह कर सुनील बाथरूम में चला गया.

जब वह लौटा तो देखा कि ललिया कुछ ढूंढ़ रही थी.

‘‘क्या देख रही हो?’’

‘‘मेरी पैंटी न जाने कहां गायब हो गईं. ब्रा तो पहन ली है मैं ने.’’

‘‘चूहा ले गया होगा. चलो, नाश्ता बनाओ. मुझे आज जल्दी जाना है,’’ सुनील ने उस को टालने के अंदाज में कहा.

ललिया भी मुसकरा उठी. नाश्ता कर सुनील सीधा अपने दोस्त मुकेश के पास पहुंचा. उस की पैथोलौजी की लैब थी.

सुनील ने मुकेश को सारी बात बताई. उस की सांसें घबराहट के मारे तेज होती जा रही थीं.

‘‘अरे, अपना हार्टफेल करा के अब तू मर मत… मैं चैक करता हूं.’’ सुनील ने मुकेश को पैंटी दे दी.

‘‘शाम को आना. बता दूंगा कि दाग किस चीज का है,’’ मुकेश ने कहा.

सुनील ने रजामंदी में सिर हिलाया और वहां से निकल गया.

दिनभर पागलों की तरह घूमतेघूमते शाम हो गई. न खाने का होश, न पीने का. वह धड़कते दिल से मुकेश के पास पहुंचा.

‘‘क्या रिपोर्ट आई?’’

मुकेश ने भरे मन से जवाब दिया, ‘‘यार, दाग तो वही है जो तू सोच रहा है, लेकिन… अब इस से किसी फैसले पर तो…’’

सुनील जस का तस खड़ा रह गया. मुकेश उसे समझाने के लिए कुछकुछ बोले जा रहा था, लेकिन उस का माथा तो जैसे सुन्न हो चुका था.

सुनील घर पहुंचा तो ललिया दरवाजे पर ही खड़ी मिली.

‘‘कहां गायब थे दिनभर?’’ ललिया परेशान होते हुए बोली.

‘‘किसी से कुछ काम था,’’ कहता हुआ सुनील सिर पकड़ कर पलंग पर बैठ गया.

‘‘तबीयत तो ठीक है न आप की?’’ ललिया ने सुनील के पास बैठ कर उस के कंधे पर हाथ रखा.

‘‘सिर में बहुत तेज दर्द हो रहा है.’’

‘‘बैठिए, मैं चाय बना कर लाती हूं,’’ कहते हुए ललिया रसोईघर में चली गई.

सुनील ने ललिया की पैंटी को गद्दे के नीचे दबा दिया.

चाय पी कर वह बिस्तर पर लेट गया.

रात को ललिया खाना ले कर आई और बोली, ‘‘अजी, अब आप मुझे भी मार देंगे. बताओ तो सही, क्या हुआ? ज्यादा दिक्कत है, तो चलो डाक्टर के पास ले चलती हूं.’’

‘‘कुछ बात नहीं, बस एक बहुत बड़े नुकसान का डर सता रहा है,’’ कह कर सुनील खाना खाने लगा.

‘‘अपना खयाल रखो,’’ कहते हुए ललिया सुनील के पास आ कर बैठ गई.

सुनील सोच रहा था कि ललिया का जो रूप अभी उस के सामने है, वह उस की सचाई या जो आज पता चली वह है. खाना खत्म कर वह छत पर चला गया.

ललिया नीचे खाना खाते हुए आंगन में बैठी उस को ही देख रही थी.

सुनील का ध्यान अब कल रात पिछवाड़े में पड़ी चप्पलों पर जा रहा था. वह सोचने लगा, ‘लगता है वे चप्पलें भी इसी के यार की… नहीं, बिलकुल नहीं. ललिया ऐसी नहीं है…’

रात को सुनील ने नींद की एक गोली खा ली, पर नींद की गोली भी कम ताकत वाली निकली.

सुनील को खीज सी होने लगी. पास में देखा तो ललिया सोई हुई थी. यह देख कर सुनील को गुस्सा आने लगा, ‘मैं जान देदे कर इस के सुख के लिए पागलों की तरह मेहनत करता हूं और यह अपना जिस्म किसी और को…’ कह कर वह उस पर चढ़ गया.

ललिया की नींद तब खुली जब उस को अपने बदन के निचले हिस्से पर जोर महसूस होने लगा.

‘‘अरे, जगा देते मुझे,’’ ललिया ने उठते ही उस को सहयोग करना शुरू किया, लेकिन सुनील तो अपनी ही धुन में था. कुछ ही देर में दोनों एकदूसरे के बगल में बेसुध लेटे हुए थे.

ललिया ने अपनी समीज उठा कर ओढ़ ली. सुनील ने जैसे ही उस को ऐसा करते देखा मानो उस पर भूत सा सवार हो गया. वह झटके से उठा और समीज को खींच कर बिस्तर के नीचे फेंक दिया और फिर से उस के ऊपर आ गया.

‘‘ओहहो, सारी टैंशन मुझ पर ही उतारेंगे क्या?’’ ललिया आहें भरते हुए बोली.

सुनील के मन में पल रही नाइंसाफी की भावना ने गुस्से का रूप ले लिया था.

ललिया को छुटकारा तब मिला जब सुनील थक कर चूर हो गया.

गला तो ललिया का भी सूखने लगा था, लेकिन वह जानती थी कि उस का पति किसी बात से परेशान है.

ललिया ने अपनेआप को संभाला और उठ कर थोड़ा पानी पीने के बाद उसी की चिंता करतेकरते कब उस को दोबारा नींद आ गई, कुछ पता न चला.

ऐसे ही कुछ दिन गुजर गए. हंसनेहंसाने वाला सुनील अब बहुत गुमसुम रहने लगा था और रात को तो ललिया की एक न सुनना मानो उस की आदत बनती जा रही थी.

ललिया का दिल किसी अनहोनी बात से कांपने लगा था. वह सोचने लगी थी कि इन के मांपिताजी को बुला लेती हूं. वे ही समझ सकते हैं कुछ.

एक दिन ललिया बाजार गई हुई थी. सुनील छत पर टहल रहा था. शाम होने को थी. बादल घिर आए थे. मन में आया कि फोन लगा कर ललिया से कहे कि जल्दी घर लौट आए, लेकिन फिर मन उचट गया.

थोड़ी देर बाद ही सुनील ने सोचा, ‘कपड़े ही ले आता हूं छत से. सूख गए होंगे.’

सुनील छत पर गया ही था कि देखा पड़ोसी बीरबल बाबू के किराएदार का लड़का रंगवा जो कि 18-19 साल का होगा, दबे पैर उस की छत से ललिया के अंदरूनी कपड़े ले कर अपनी छत पर कूद गया. शायद उसे पता नहीं था कि घर में कोई है, क्योंकि ललिया उस के सामने बाहर गई थी.

यह देख कर सुनील चौंक गया. उस ने पूरी बात का पता लगाने का निश्चय किया. वह भी धीरे से उस की छत पर उतरा और सीढि़यों से नीचे आया. नीचे आते ही उस को एक कमरे से कुछ आवाजें सुनाई दीं.

सुनील ने झांक कर देखा तो रंगवा अपने हमउम्र ही किसी गुंडे से दिखने वाले लड़के से कुछ बातें कर रहा था.

‘‘अबे रंगवा, तेरी पड़ोसन तो बहुत अच्छा माल है रे…’’

‘‘हां, तभी तो उस की ब्रापैंटी के लिए भटकता हूं,’’ कह कर वह हंसने लगा.

इस के बाद सुनील ने जो कुछ  देखा, उसे देख कर उस की आंखें फटी रह गईं. दोनों ने ललिया के अंदरूनी कपड़ों पर अपना जोश निकाला और रंगवा बोला, ‘‘अब मैं वापस उस की छत पर रख आता हूं… वह लौटने वाली होगी.’’

‘‘अबे, कब तक ऐसे ही करते रहेंगे? कभी असली में उस को…’’

‘‘मिलेगीमिलेगी, लेकिन उस पर तो पतिव्रता होने का फुतूर है. वह किसी से बात तक नहीं करती. पति के बाहर जाते ही घर में झाड़ू भी लगाने का होश नहीं रहता उसे, न ही बाल संवारती है वह. कभी दबोचेंगे रात में उसे,’’ रंगवा कहते हुए कमरे के बाहर आने लगा.

सुनील जल्दी से वापस भागा और अपनी छत पर कूद के छिप गया.

रंगवा भी पीछे से आया और उन गंदे किए कपड़ों को वापस तार पर डाल कर भाग गया.

सुनील को अब सारा मामला समझ आ गया था. रंगवा इलाके में आएदिन अपनी घटिया हरकतों के चलते थाने में अंदरबाहर होता रहता था. उस के बुरे संग से उस के मांबाप भी परेशान थे.

सुनील को ऐसा लग रहा था जैसे कोई अंदर से उस के सिर पर बर्फ रगड़ रहा है. उस का मन तेजी से पिछली चिंता से तो हटने लगा, लेकिन ललिया की हिफाजत की नई चुनौती ने फिर से उस के माथे पर बल ला दिया. उस ने तत्काल यह जगह छोड़ने का निश्चय कर लिया.

ललिया भी तब तक लौट आई. आते ही वह बोली, ‘‘सुनिए, आप की मां को फोन कर देती हूं. वे समझाएंगी अब आप को.’’

सुनील ने उस को सीने से कस कर चिपका लिया, ‘‘तुम साथ हो न, सब ठीक है और रहेगा…’’

‘‘अरे, लेकिन आप की यह उदासी मुझ से देखी नहीं जाती है अब…’’

‘‘आज के बाद यह उदासी नहीं दिखेगी… खुश?’’

‘‘मेरी जान ले कर ही मानेंगे आप,’’ बोलतेबोलते ललिया को रोना आ गया.

यह देख कर सुनील की आंखों से भी आंसू छलकने लगे थे. वह सिसकते हुए बोला, ‘‘अब मैं ड्राइवर रख लूंगा और खुद तुम्हारे पास ज्यादा से ज्यादा समय…’’

प्यार उन के चारों ओर मानो नाच करता फिर से मुसकराने लगा था.

धूप के रेशे मुलायम हैं : गुलाब सिंह का गांव

‘‘ब बा, मैं भी ऐसे ही मजबूत कट्टे बनाऊंगा, जैसे तुम बनाते हो. जैसे तुम्हारे बनाए कट्टे फायर करते समय नहीं फटते, ठीक वैसे ही कट्टे मैं भी बनाऊंगा,’’ करमजीत कार के स्टेयरिंग वाले पाइप को काट कर तराशते हुए अपने बाप गुलाब सिंह की तरफ देखते हुए बोला.

हालांकि, गुलाब सिंह करमजीत के सामने ही कट्टे बनाने का काम करता है, लेकिन उस का लड़का बड़ा हो कर कट्टे बनाएगा, यह बात सुन कर गुलाब सिंह के कान खड़े हो गए. उस के सीने में जैसे किसी ने बरछा मार दिया हो.

महज 13 साल के लड़के के मुंह से ऐसी बात सुन कर गुलाब सिंह को बेहद अचरज हुआ था, लेकिन वह सोच रहा था कि जब करमजीत भी कट्टा बनाएगा, तो उसे भी पुलिस दबिश दे कर खोजेगी, उसे भी जंगलों में महीनों तक रह कर दिन बिताने पड़ेंगे.

पाइप मोड़तेमोड़ते गुलाब सिंह के हाथ वहीं रुक गए. वह यादों के धुंधलके में कहीं गहरे उतरता गया.

गुलाब सिंह का गांव पैतनपुर में जन्म हुआ था. वह बचपन से ही इसी माहौल में पलाबढ़ा था. उस के पिताजी भी कट्टे ही बनाते थे. कोई 300-400 लोग रहते थे इस गांव में. सब का यही धंधा था, कट्टा बनाने का. कानूनी तरीके से यहां कुछ नहीं होता था, सबकुछ परदे के पीछे से होता था.

बहुत कम मेहनत और बहुत कम लागत में बन जाता था कट्टा, फिर उसे बाहर ले जा कर बेचने की भी टैंशन नहीं थी. दूरदराज के अपराधी किस्म के लोग अपनी सुविधा के मुताबिक गुलाब सिंह से कट्टे खरीद कर ले जाते थे खासकर छोटेमोटे दूरदराज के इलाकों में कट्टे की बहुत डिमांड रहती थी.

चुनाव के समय तो इन देशी कट्टों की मांग बहुत बढ़ जाती थी. लोकल नेता भी अपने गुरगों की मदद से इस गांव से माल ले जाते थे, चुनावों में दबिश देने के लिए, बूथ कैप्चरिंग के लिए. लेकिन, गांव पैतनपुर से इन नेताओें का केवल चुनाव तक ही नाता रहता था. चुनाव के बाद वे इधर झांकते भी नहीं थे.

इस कट्टे वाले धंधे में नौजवानों के बीच खासा पैशन दिखता था. इतना पैशन कि पूछो ही मत. एक ऐसा पैशन, जिसे गुलाब सिंह ने करमजीत की आंखों में अभीअभी देखा था.

एक ऐसा पैशन, जिस का इस्तेमाल वहां के नेता इन नौजवानों और किशोरों का कार के स्टेयरिंग वाले पाइप की तरह कट्टा बनाने में करते थे. हाथ नौजवानों का जलता था और ये नेता नौजवानों को एक सपना दिखा कर उस में अपना हाथ सेंकते थे. एक क्रूर हिंसक सपना, ऐसा सपना जो कभी पूरा नहीं हो सकता.

नशाखोरी और हिंसा ने गांव पैतनपुर को अपनी गिरफ्त में ऐसे कसा था, जैसे कोई अजगर किसी आदमी को अपने जबड़े में कसता है.

गुलाब सिंह को लगा कि उस के बेटे करमजीत को भी कोई बहका रहा है, कोई ऐसा सब्जबाग दिखा रहा है, जिस में करमजीत कल को उस क्षेत्र का कोई रसूखदार आदमी बन जाएगा या कोई भाईवाई टाइप का आदमी.

लेकिन, करमजीत एक कट्टे बनाने वाले का बेटा है. उस को कोई कैसे सब्जबाग दिखा सकता है? लेकिन ऐसा हो भी तो सकता है. आखिर छोटेछोटे बच्चे ही तो अपराधियों के सौफ्ट टारगेट होते हैं, बिलकुल कार के पाइप की तरह, जिन से कट्टा बनता है. लचीले और नाजुक. उन्हें केवल तपाना भर होता है, फिर अपने हथौड़े से ठोंकपीट कर मनचाहा आकार दे दो.

आखिर जिन राज्यों में शराब बैन है, वहां के अपराधी भी तो बच्चों का सहारा ले कर ही शराब की एक जगह से दूसरी जगह तस्करी करते हैं. पुराना तरीका बदल गया है. आजकल पुलिस भी तो इन तस्करों और अपराधियों की सारी टैक्निक समझ गई है.

थोड़े से पैसों के लालच में नौजवान भटक जाते हैं. यह वही समय होता है, जब ये बच्चे हाथ से निकल जाते हैं. आजकल जो स्मगलिंग होती है, उस में इन नौजवानों को ही तो टारगेट किया जाता है. नशा करने वाला भी नौजवान, नशा बेचने और खरीदने वाले भी नौजवान.

फिर आजकल तो वैब सीरीज का जमाना है. गुलाब सिंह ने कुछ वैब सीरीज देखी हैं. गालियों से नहाते संवाद, फूहड़ पटकथा और घटिया सीन. बातबात में गालीगलौज, छोटीछोटी बात पर ‘ठांय’ से पिस्तौल चलती है और आदमी ढेर हो जाता है. बंदूक का राज हर तरफ दिखाई देता है.

इस देश में ऐसी फिल्में क्यों बन रही हैं और अगर बन भी रही हैं, तो फिर सैंसर बोर्ड का अब क्या काम बचा है, पता नहीं चलता. फिल्मों में अब हीरो केवल बंदूक से बात करता है और उस की बात सुनी भी जा रही है. ठेका नहीं मिलता है, तो बंदूक चल जाती है.

सामाजिक दायरा कितना खराब हो कर सामने आ रहा है इन फिल्मों में. एक ही औरत के 3-3 लोगों से संबंध हैं. ससुर से भी, पति से भी और बेटे से भी. सामाजिक संबंधों की बखिया उधेड़ती आज की ऐसी वैब सीरीजें नौजवानों के अंदर एक जहर भर रही हैं.

बातबात में गालीगलौज, छोटेबड़े को तरजीह न देना. समाज का पूरा तानाबाना बिखर गया है इन वैब सीरीजों से. इन को देख कर ही तो नौजवान ड्रग्स ले रहे हैं, जैसे किसी फिल्म में टुन्ना भैया को ड्रग्स लेते दिखाया गया है और सब से ज्यादा खराब बात यह कि इन वैब सीरीजों में हीरो का विलेन हो जाना है.

किसी भी राह चलती लड़की का दुपट्टा खींच लिया जाना, उसे सरेआम छेड़ा जाना, उस का सामूहिक बलात्कार कर देना और हीरो के रूप में आज का नौजवान अपनेआप को टुन्ना भैया की जगह पाता है. बहुत खुश है आज का नौजवान अपनेआप को उस विलेन के रूप में देख कर. उसे टुन्ना भैया की तरह का बौस बनना है.

पूरा जिला टुन्ना भैया का है. उस के पास पावर है, तो वह सबकुछ हासिल कर सकता है. यहां हीरो किसी अपने पर भी विश्वास नहीं करता, बस उसे गद्दी चाहिए, चाहे जैसे मिले, बाप को मार कर भी.

गिलास के गिरने की आवाज से गुलाब सिंह की तंद्रा टूट गई. उस ने ‘होहो’ की आवाज दी, लेकिन बिल्ली नहीं भागी. ढीठ की तरह खड़ी थी, अब भी खिड़की पर.

गुलाब सिंह उठ कर खिड़की तक गया. इस बार बिल्ली भाग गई. सामने गुरविंदर को देख कर वह चौंक गया. वह किसी लड़के से खड़ा हो कर हंसहंस कर बातें कर रहा था. उस के हाथ में एक पैकेट था, काले रंग की पौलीथिन में.

गुलाब सिंह का दिल फिर से बैठने लगा. गुरविंदर उस के सगे भाई लखविंदर का बेटा था. वह पिछले साल जेल से हो कर आया था, ड्रग्स बेचने के आरोप में. उस पर खालिस्तानी होने का आरोप भी लगा था. पाकिस्तानियों और आतंकवादियों से उस के संबंध हैं, ऐसी चर्चा महल्ले में हो रही थी.

पुलिस कह रही थी कि बाहर देश से ये जो अफीम, कोकीन और हेरोइन आती है, वह हमारे दुश्मन मुल्क पाकिस्तान से आती है. ठीक है, यह बात भी समझ आती है.

गुरविंदर के साथ एक और लड़का पकड़ा गया था. वह माजिद था. एक पाकिस्तनी लड़का. पेशावर से था शायद वह, जैसा कि गुरविंदर बता रहा था. उम्र कोई 20 साल थी. उस का बाप कसाई था रहमत शेख. 2 शादियां कर रखी थीं उस ने. वह माजिद की सगी मां को बहुत मारतापीटता था. माजिद के 8 भाईबहन थे. किसी तरह उस ने 7वीं जमात पास की थी.

एक दिन माजिद का बाप पाकिस्तान में इमरान खान की तहरीर सुनने गया था, फिर उसी रैली में गोली लगने के चलते वह मर गया था. एक तो छोटी उम्र, फिर इतने लोगों की जिम्मेदारियां सिर पर. एक अकेला माजिद भला अकेले क्याक्या करता? लोग महंगाई से उस देश में पहले ही बदहाल थे. सागसब्जी खरीदने के पैसे तो पास में होते नहीं थे, गोश्त कौन खरीदता?

ऐसा नहीं था कि माजिद बेवकूफ था. वह अखबार पढ़ता था. चीजों को समझता था. उस ने अखबारों में ही पढ़ा था कि कुछ साल पहले देश के पूर्व प्रधानमंत्री, जिन पर भ्रष्टाचार के गंभीर मामले थे, देश छोड़ कर अभी लंदन में रह रहे हैं और अब अपने मुल्क में इमरान खान के हटते ही वापसी की तैयारी में हैं.

चुनाव नजदीक आ रहे हैं वहां. ऐसा तो गुलाब सिंह के खुद के देश में भी हो रहा है. यहां के नामचीन भगोड़े बैंकों का पैसा ले कर ब्रिटेन, अमेरिका, यूरोप में अपने कारोबार को जमा रहे हैं.

पड़ोसी देश का भगोड़ा या देशनिकाला प्रधानमंत्री सोने की थाली में मेवों का मजा ले रहा है. वह जो एक भ्रष्टाचारी है.

माजिद जैसे लाखों लोग जो मेहनत करते हैं, सरकार को टैक्स भरते हैं, उन के टैक्स के पैसों से ही ये सरकारें भ्रष्टाचार करती हैं. बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमती हैं. विदेशों में हवाई सफर करती हैं. बावजूद इस के कि वे सब सफेदपोश हैं और माजिद जैसे लोग जरायमपेशा?

जो लोग हथियार या ड्रग्स बेचते हैं, वे इक्केदुक्के होते हैं. सारे काम इन सफेदपोशों और बड़े लोगों की सरपरस्ती के बिना आखिर कैसे हो सकते हैं?

इस को ऐसे समझना चाहिए कि हमारे देश के उन हिस्सों में जहां शराब बैन है, वहां भी शराब बिकती है. लोकल पुलिस को सैट कर लिया जाता है. आबकारी महकमे को उस का हिस्सा जाता है.

इस का एक बड़ा नैटवर्क है. सियासतदां से ले कर अफसरशाह तक सब के सब बिके होते हैं, तभी इतनी तादाद में शराब बनती और बिकती है. कभी जनता की आंखों में धूल झांकने के लिए दीवाली और दशहरे पर दुकानों पर दबिश दी जाती है. छोटेछोटे पौलीथिन और ताड़ी बेचने वालों को पकड़ कर जेल में बंद कर दिया जाता है, अखबार का कौलम भरने के लिए.

कमीशन खाने वाला बड़ा अफसर ही अपने जिले के छोटे अफसरों को डांटताफटकारता है. साल में 10 लोग भी नहीं पकड़े जाते. आखिर जेल मैनुअल और उस की डायरी को मेंटेन भी तो करना होता है. यहां हर बड़ी मछली छोटी मछली को निगल जाती है.

गुलाब सिंह भी थोड़ीबहुत राजनीति समझता है. वह देख रहा है कि इधर कुछ सालों में हमारे देश से कई बड़े कारोबारी गायब हो गए हैं, बैंकों से बड़ाबड़ा कर्जा ले कर. कोई उन का कुछ नहीं बिगाड़ सका.

क्या यह सब बिना मिलीभगत के होता है? क्या बड़ेबड़े सांसद, विधायक, मंत्री से उन की कोई सांठगांठ नहीं है? बिना सांठगांठ के बैंक इन को इतना बड़ा कर्जा दे देता है? ऐसा कैसे हो सकता है?

नहीं, एक बहुत बड़ी लौबी होती है इन की. मंत्रियों से बड़ा करार होता है इन का. बाहर के देशों में ये बड़े कारोबारी इन मंत्रियों के लिए बैंकों में इन के नाम से पैसे जमा करवा देते हैं. उन के बच्चों के लिए शौपिंग माल, जिम, कांप्लैक्स बनवा देते हैं.

इन पैसों से इन मंत्रियों के लिए विदेशों में जनसमर्थन का जुगाड किया और करवाया जाता है, ताकि उन की राजनीति वहां भी चमकाई जा सके. बड़े कारोबारी वहां भी अपनी जमीन ले सकें, कारखाने लगा सकें, अपना कारोबार विदेशों तक फैला सकें. उन के बनाए गए सामान विदेशों में भी जोरशोर से बिकें. उन की आमदनी लगातार बढ़ती जाए, फिर वहां की सरकार में वे एक मुकाम हासिल करें, अपने लोगों के लिए लौबिंग करें.

चुनाव में सरकार को फंड दिए जाते हैं, जो करोड़ों रुपए के रूप में होते हैं. ये पैसे बड़े कारोबारी सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों को बारीबारी से देते हैं. सरकारें आतीजाती रहती हैं, जनता वही रहती है, जो उन के बनाए गए सामान खरीदती है.

गुलाब सिंह का छोटा भाई संतन विकलांग है. उस का एक हाथ नहीं है. घर में बैठेबैठे उस का मन नहीं लगता था. सोचा था कि कोई छोटामोटा कुटीर उद्योग ही लगा ले. इस के लिए कुछ कर्ज बैंक से लेले.

संतन कई बैंकों के चक्कर लगाता रहा, लेकिन हाल वही था. जब तक हाथ पर कुछ रखोगे नहीं, फाइल आगे नहीं बढ़ती. आजकल गुलाब सिंह के बनाए कट्टों पर संतन पौलिश करने का काम करता है.

सरकार इन भगोड़े कारोबारियों के देश में वापस लाने की बात करती है, लेकिन लंदन और दूसरे देशों के कानूनों का मसौदा और उस की पेचीदगियां भी अलगअलग हैं. जो चीज हमारे देश में अपराध है, जरूरी नहीं कि दूसरा देश भी उसे अपराध मान ले.

बैंकों से पैसे ले कर भागे लोग उस देश में जा कर अपने शौपिंग माल खोलते हैं, कारखाने लगाते हैं. वहां लंदन, यूरोप के लोगों के अलावा अमेरिकियों को भी काम मिलता है. अब कोई आदमी बाहर से आ कर उन के देश के लोगों को काम देगा. उस के देश को कमाई देगा. तो ऐसा कौन सा देश है, जो हमारे देश की बात मानेगा और उन भगोड़ों को हमारे सुपुर्द कर देगा? सभी अपनेअपने फायदे से जुड़े हैं.

क्या हमारे देश के लोग नहीं चाहते हैं कि हमारे देश में बड़ीबड़ी कंपनियां लगें, लोगों को रोजगार मिले, बेकारी खत्म हो. दरअसल, दुनिया के सभी मुल्कों में बेरोजगारी एक प्रमुख समस्या के रूप में उभर कर सामने आई है. एक ही देश के 2 राज्यों में बाहरीभीतरी की लड़ाई छिड़ी हुई है.

कुछ साल पहले आस्ट्रेलिया में आईटी के एक छात्र की हत्या हो गई थी. उस देश के लोगों को लगता है कि भारतीय छात्र उन की नौकरियां खाते जा रहे हैं. विदेशों में भारतीय छात्रों पर हाल के सालों में हमले बढ़े हैं. इस की वजह केवल और केवल रोजगार का छिन जाना है.

अपने देश में भी महाराष्ट्र में बिहारियों और उत्तर प्रदेश के लोगों को मारा और भगाया जा रहा है. सब प्राथमिकता सूची में आगे रहना चाहते हैं. अपने लोगों को सब जगह काम मिलना चाहिए, दूसरे लोग हाशिए पर धकेल दिए जाते हैं.

माजिद या गुरविंदर जैसे लोग थोड़ाबहुत हेरफेर कर लेते हैं, तो इन सरकारों का क्या जाता है? ये तो जीने और खाने के लिए हेरफेर करते हैं, लेकिन ये सत्ता में फेरबदल या हेरफेर नहीं करते.

चुनाव के बाद विधायकों और सांसदों को खरीद कर सियासी पार्टी अपनी सरकार बनवाती है. यह लोकतंत्र की हत्या नहीं तो और क्या है? वकील पैसे ले कर अपराधी को बचाता है. बनिया अनाज में कंकड़पत्थर मिलाता है. ग्वाला दूध में पानी मिलाता है.

सब अपनेअपने लैवल पर हेरफेर करते हैं, अपनीअपनी सुविधा के मुताबिक, फिर देश के इस पार और उस पार सियासतदां एक तरफ हमारी कौम को खतरा है, तो दूसरी तरफ हमारी कौम को खतरा है का राग अलापते हैं और पढ़ाईलिखाई, महंगाई, बेरोजगारी के मुद्दे पर चुप्पी साध लेते हैं.

दोनों देशों की सेनाएं और जनता आपस में लड़ती और मरती रहती है. कभी देखा है कि इस पार के या उस पार के किसी नेता के बच्चे या नेता को मरते हुए? उन के लिए तो वीवीआईपी सिक्योरिटी का इंतजाम होता है. किसी हंगामे में सिक्योरिटी फोर्स नेताजी को सुरक्षित बाहर ले कर निकल जाती है. अखबार के पन्ने पर किसानों और मजदूरों के बच्चे जो या तो पुलिस फोर्स में या सेना में होते हैं, मारे जाते हैं. सरहद पर या वीवीआईपी की सिक्योरिटी में जो गोली खाता है, वह मजदूर या किसान का बेटा ही होता है.

‘‘अजी, सुनते हैं. आज शाम का खाना नहीं बनेगा क्या? जाओ, जा कर जंगल से लकडि़यां बीन लाओ,’’ लाड़ो ने हांक लगाई, तो गुलाब सिंह की तंद्रा फिर से एक बार टूटी.

गुलाब सिंह ने पाइप को आग पर गरम करने वाले पंखे को बंद किया और चल पड़ा जंगल की ओर लकडि़यां चुनने. थोड़ी देर बाद वह एक बोरे में थोड़े से पत्ते चुन कर ले आया.

पैतनपुर छोटा सा गांव है, लेकिन वहां के घरों में उज्ज्वला का अब तक कोई कनैक्शन नहीं आया है. राशनकार्ड भी नहीं बना है गुलाब सिंह का.

सिगड़ी में आग सुलग रही थी. गुलाब सिंह ने पतीली चढ़ाई चाय बनाने के लिए. उस आग में उस को अपना भविष्य भी धूधू कर जलता दिखने लगा था. उस में अब उस आग से आंख मिलाने का ताव नहीं बचा था. वह क्या करेगा, जब उस का बच्चा भी अपराधी बन जाएगा?

गुलाब सिंह के दादापरदादा आजादी के आंदोलन में स्वतंत्रता सेनानियों के लिए तलवार, फरसा, गंड़ासा और भाला बनाते थे, अंगरेजों से लड़ाई के लिए, लेकिन उन दिनों दूसरे लोग या विदेशी हमारे दुश्मन थे. अब अपने लोग हैं, जो सत्ता में बराबर की भागीदारी रखते हैं, लेकिन जनता के हक की बात कभी नहीं करते.

फिर कौन अपने और कौन बेगाने लोग? जो अपने हैं, घोटाले कर रहे हैं. हमारे हिस्से का सबकुछ सफेदपोश बन कर हमारे ही सामने खा जा रहे हैं. भेड़ों का शिकार कुछ भेडि़ए कर रहे हैं. भेड़ों का एक भरापूरा झांड है. भेड़िए शेर की तरह भेड़ को नोंच खाना चाहते हैं और भेड़ों का झांड लाचार हो कर एकदूसरे को ताक रहा है.

इस से भले तो अंगरेज थे, कम से कम आजादी के इतने दिनों के बाद भी बने पुलपुलिया साबुत बचे हैं. यहां तो उद्घाटन के चंद दिन बाद ही पुलपुलिया गिर जा रहे हैं. क्या हुआ आजादी के इतने सालों के बाद भी?

विकास गुलाब सिंह के गांव का रास्ता जैसे भटक सा गया है. उस के गांव में आज भी पक्की सड़क नहीं बनी है. चांपाकल तो हैं, लेकिन उन में पानी नहीं आता. सिस्टम की तरह विकास भी अंधा हो गया है.

‘‘बाबा, काम हो गया क्या? कार वाला पाइप समेट कर रख दूं?’’ करमजीत सिगड़ी पर चढ़ी चाय को देखते हुए बोला.

‘‘नहीं बेटा, कार का पाइप बाद में रखना, पहले इधर आ और मेरे पास आ कर बैठ,’’ गुलाब सिंह

ने कहा, तो करमजीत वहीं पास में आ कर जमीन पर बैठ गया.

‘‘बेटा, कोई भी बाप यह नहीं चाहेगा कि उस का बेटा बड़ा हो कर कट्टा बनाए. कल से मैं कट्टा बनाने का काम छोड़ दूंगा. क्या करूंगा तुम्हें अपराधी बना कर. कल बाहर चला जाऊंगा. तुझे और तेरी मां को भी साथ ले चलूंगा, चेन्नई तेरे मामा के पास.

‘‘तेरा मामा वहां पोर्ट पर काम करता है. वहीं कोई काम खोज लेंगे. न तो अब कट्टा बनाऊंगा और न ही बेचूंगा. अब कभी इस गांव में नहीं लौटेंगे हम. तुझे अपने सामने खत्म होते हुए नहीं देख सकता बेटा,’’ कह कर गुलाब सिंह ने बेटे करमजीत को सीने से

लगा लिया. वह लगातार रोए जा रहा था. करमजीत को अब भी यह समझ नहीं आ रहा था कि आखिर हुआ क्या है?

लेकिन क्या इतने भर से यह समस्या खत्म हो जानी थी, जबकि उस गांव में सैकड़ों की तादाद में गुलाब सिंह जैसे लोग थे, सैकड़ों की तादाद में करमजीत सिंह और सरहद के उस पार माजिद जैसे लड़के थे?

Holi 2024: दामाद – कैसे थे अमित के ससुराल वाले

अमित आज शादी के बाद पहली बार अपनी पत्नी को ले कर ससुराल जा रहा था. पढ़ाईलिखाई में अच्छा होने के चलते उसे सरकारी नौकरी मिल गई थी. सरकारी नौकरी लगते ही उसे शादी के रिश्ते आने लगे थे. उस के गरीब मांबाप भी चाहते थे कि अमित की शादी किसी अच्छी जगह हो जाए.

अमित के गांव के एक दलाल ने उस का रिश्ता पास के शहर के एक काफी अमीर घर में करवा दिया. अमित तो गांव की ऐसी लड़की चाहता था जो उस के मांबाप की सेवा कर सके लेकिन पता नहीं उस दलाल ने उस के पिता को क्या घुट्टी पिलाई थी कि उन्होंने तुरंत शादी की हां कर दी.

सगाई होते ही लड़की वाले तुरंत शादी करने की कहने लगे थे और अमित के पिताजी ने तुरंत ही शादी की हां भर दी. शादी से पहले अमित को इतना भी मौका नहीं मिला था कि वह अपनी होने वाली पत्नी से बात कर सके.

अमित की मां ने उस की बात को भांप लिया था और उन्होंने अमित के पिता से कहा भी कि अमित को अपनी होने वाली पत्नी को देख तो लेने दो, लेकिन उस के पिता ने कहा कि शादी के बाद खूब जीभर के देख लेगा.

खैर, शादी हो गई और अमित को दहेज में बहुतकुछ मिला. लड़की वाले तो अमित को कार भी दे रहे थे लेकिन अमित ने मना कर दिया कि वह दहेज लेने के भी खिलाफ है लेकिन उस के पिताजी के कहने पर वह मान गया.

सुहागरात को ही अमित को कुछकुछ समझ में आने लगा था क्योंकि उस की नईनई पत्नी बनी आशा ने न तो उस के मातापिता की ही इज्जत की थी और न ही सुहागरात को उस ने अमित को अपने पास फटकने दिया था.

अमित ने आशा से भी कई बार पूछा भी कि तुम्हारी शादी मुझ से जबरदस्ती तो नहीं की गई है लेकिन आशा ने कोई जवाब नहीं दिया.

शादी के तीसरे दिन अमित अपनी मां और पिताजी के कहने पर एक रस्म के मुताबिक आशा को छोड़ने ससुराल चल दिया.

अमित और आशा ट्रेन से उतर कर पैदल ही चल दिए. अमित की ससुराल रेलवे स्टेशन के पास ही थी. रास्ते में आशा अमित से आगे चलने लगी. अमित ने देखा कि

2 लड़के मोटरसाइकिल पर उन की तरफ आ रहे थे. वे आशा को देख कर रुक गए और आशा भी उन को देख कर काफी खुश हुई.

अमित जब तक आशा के पास पहुंचा तब तक वे दोनों लड़के उस की तरफ देखते हुए चले गए. आशा के चेहरे पर असीम खुशी झलक रही थी.

अमित के पास आने पर आशा ने अमित को उन लड़कों के बारे में कुछ नहीं बताया और अमित ने भी नहीं पूछा.

अमित अपनी ससुराल पहुंचा. वहां पर सब लोग केवल आशा को देख कर खुश हुए और अमित की तरफ किसी ने ध्यान भी नहीं दिया.

आशा की मां उसे ले कर अंदर चली गईं और अमित बाहर बरामदे में खड़ा रहा. अंदर से उस के ससुर और दोनों साले बाहर आए.

अमित के ससुर ने पास ही रखी कुरसी की तरफ इशारा किया और बोले, ‘‘अरे, खड़े क्यों हो, बैठ जाओ.’’

अमित चुपचाप बैठ गया. उसे वहां का माहौल कुछ ठीक नहीं लग रहा था.

अमित के सालों ने तो उस की तरफ ध्यान भी नहीं दिया था. शाम होने को थी और अंधेरा धीरेधीरे बढ़ रहा था.

अमित को फर्स्ट फ्लोर के एक कमरे में ठहरा दिया. अमित थोड़ा लेट गया और उस की आंख लग गई. नीचे से शोर सुन कर अमित की आंख खुली तो उस ने देखा कि अंधेरा हो चुका था और रात के 9 बज चुके थे.

अमित खड़ा हुआ और उस ने मुंह धोया. उस को हैरानी हो रही थी कि किसी ने उस से चाय तक की नहीं

पूछी थी. अमित उसे अपना वहम समझ कर भूलने की कोशिश कर रहा था. लेकिन दिमाग तो उस के पास भी था इसलिए वह अपने ही विचारों में खोया हुआ था.

अब नीचे से जोरजोर से हंसने की आवाज आ रही थी. अमित के ससुर शायद किसी से बात कर रहे थे.

अमित ने नीचे झांका तो पाया कि उस के ससुर और 2-3 लोग बरामदे में महफिल लगाए शराब पी रहे थे. अमित के ससुर बहुत शराब पी चुके थे इसलिए वे अब होश में नहीं थे.

वे बोले, ‘‘देखा मेरी अक्ल का कमाल. मैं ने अपनी बिगड़ैल बेटी की शादी कैसे एक गरीब लड़के से करा दी वरना आप लोग तो कह रहे थे कि इस बिगड़ी लड़की से कौन शादी करेगा,’’ इतना कह कर वे जोर से हंसे और बाकी बैठे दोनों लोगों ने भी उन का साथ दिया और उन की इस बात का समर्थन किया.

अमित के पैरों के नीचे से जैसे जमीन खिसक गई. तभी अमित की सास आईं और उस के ससुर के कान में कुछ बोलीं जिस को सुन कर वे तुरंत अंदर गए.

अब अमित को समझ आ गया था कि उस के ससुर ने ही अपना रोब दिखा कर उस के पिताजी को डराया होगा और उस की शादी आशा से कर दी होगी. तभी उस के पिताजी उस की शादी में उस के सवालों के जवाब नहीं दे रहे थे.

अमित का सिर चकरा रहा था. वह तुरंत नीचे उतरा और अंदर कमरे के दरवाजे पर पहुंचा. अमित ने अंदर देखा कि आशा एक कोने में नीचे ही बैठी है और उस के ससुर उस के पास खड़े उसे डांट रहे हैं. उन्होंने कहा कि अब वह किस के साथ अपना मुंह काला करा आई.

अमित को तो अब बिलकुल भी समझ नहीं आ रहा था, ऐसा लगता था कि उस की शादी किसी बिगड़ैल लड़की से करा दी गई है और उस का परिवार भी सामाजिक नहीं है. तभी उस की सास ने आशा के बाल पकड़े और उस को मारने लगीं.

आशा बिलकुल चुप थी और वह अपनी पिटाई का भी बिलकुल विरोध नहीं कर रही थी. आशा की मां उसे रोते हुए मारे जा रही थीं.

तभी पता नहीं अमित को क्या सूझ कि वह अंदर पहुंचा और अपनी सास से आशा को मारने को मना किया.

अमित को अंदर आया देख सासससुर घबरा गए. ससुर का तो नशा भी उतर गया था. वे समझ चुके थे कि अमित ने सब सुन लिया है.

अमित के ससुर अब कुरसी पर बैठ कर रो रहे थे और उस की सास का भी बुरा हाल था. तभी अमित के ससुर एक झटके से उठे और कमरे से अपनी दोनाली बंदूक ले आए और आशा की तरफ तान कर बोले, ‘‘मैं ने इस की हर गलती को माफ किया है. बड़ी मुश्किल से मैं ने इस की शादी कराई है और अब यह मुंह काला करा कर पता नहीं किस का पाप अपने पेट में ले आई है. मैं इसे नहीं छोड़ूंगा.’’

तभी अमित ने उन के हाथों से बंदूक छीन ली और एक तरफ फेंक दी. वह बोला, ‘‘चलो आशा, मेरे साथ अपने घर.’’

आशा ने झटके से अपना चेहरा ऊपर उठाया. अमित की बात सुन कर उस के सासससुर भी चौंक गए.

अमित के ससुर बोले, ‘‘अमित, तुम आशा की इतनी बड़ी गलती के बावजूद उसे अपने साथ घर ले जाना चाहते हो?’’

अमित बोला, ‘‘आप सब लोगों के लाड़प्यार की गलती आशा ही क्यों भुगते. इस में इस की क्या गलती है. गलती तो आप के परिवार की है जो ऐसे काम को अपनी शान समझाते हैं और उस को छिपाने के लिए मुझ जैसे लड़के से उस की शादी करवा दी.’’

अमित थोड़ी देर रुका और फिर बोला, ‘‘आशा की यही सजा है कि उसे मेरे साथ मेरी पत्नी बन कर रहना पड़ेगा.’’

यह सुन कर उस के ससुर ने उस के पैर पकड़ लिए लेकिन अमित ने उन्हें उठाया और आशा का हाथ पकड़ कर घर से बाहर निकल गया.

आशा अमित के पीछेपीछे हो ली. अमित के ससुर तो हाथ जोड़े खड़े थे.

अमित और आशा पैदल ही जा रहे थे तभी उन्हें वही दोनों लड़के मिले जो उन्हें आते हुए मिले थे. अब की बार वे दोनों पैदल ही थे.

आशा को देख उन में से एक बोला, ‘‘चलो आशा डार्लिंग, हम तुम्हारे पेट में पल रहे बच्चे को गिरवा देते हैं और फिर से मजे करेंगे.’’

इतना कह कर वे दोनों बड़ी बेहूदगी से हंसने लगे. उन में से एक ने आशा का हाथ पकड़ने की कोशिश की तो अमित ने उसे पकड़ कर अच्छीखासी धुनाई कर दी और जब दूसरा लड़का अपने साथी को बचाने आया तो आशा ने उस के बाल पकड़ कर नीचे गिरा दिया और लातों से अधमरा कर दिया. थोड़ी देर में वे दोनों ही वहां से भाग खड़े हुए.

आशा का साथ देना अमित को अच्छा लगा था. अमित ने आशा का हाथ पकड़ा और रेलवे स्टेशन की तरफ चल पड़े.

घर पहुंच कर अमित ने अपने मां और पिताजी को कुछ नहीं बताया. अब आशा ने अमित के घर को इस तरह से संभाल लिया था कि अमित सबकुछ भूल गया. आशा ने जब उस के पेट में पल रहे बच्चे को गिराने की बात कही तो अमित ने कहा, ‘‘इस में इस मासूम की क्या गलती है…’’

आशा अमित के पैरों में गिर पड़ी और रोने लगी. अमित ने उसे उठाया और गले से लगा लिया. वह बोला, ‘‘आशा, तुम्हारे ये पछतावे के आंसू ही तुम्हारी पवित्रता हैं.’’

आशा अमित के गले लग कर रोए जा रही थी. दूर शाम का सूरज नई सुबह में दोबारा आने के लिए डूब रहा था.

मेंटल हेल्थ को रखना चाहते हैं दुरुस्त, तो अपनाएं ये 6 आदतें

एक स्वस्थ शरीर के लिए सबसे जरुरी है आपकी मेंटल हेल्थ, क्योकि जो मेंटली फिट है वो शारीरिक तौर से भी ज्यादा फिट है. जिस व्यक्ति की मेंटल हेल्थ ठीक न हों उसकी सोचने, समझने और महसूस करने की क्षमता प्रभावित होने लगती है. मानसिक तौर से परेशान लोग दिमाग में उठ रहे नकारात्मक सोच से लड़ रहे होते हैं. नेगेटिव एनर्जी के चलते उनके शरीर में कई तरह की बिमारियां घर बना लेती है.

आज के समय का लाइफस्टाइल ही कुछ ऐसा है कि हर दूसरा इंसान मेंटल हेल्थ से जूझ रहा है. लेकिन सबसे बड़ा सवाल ये है कि इस बिमारी से निकला कैसे जाएं. तो आज हम इस आर्टिकल में आपको यहीं बताएंगे कि कैसे मेंटल हेल्थ से निकला जाएं. उसके लिए बस जरुरी है कि आप इन 6 बातों का ध्यान रखा जाएं.

1. मनोचिकित्सक से लें मदद

मेंटल हेल्थ को सुधारने के लिए आपको मनोचिकित्सक की मदद जरूर लें. मनोचिकित्सक से संपर्क कर ये बिल्कुल मत सोचिएगा कि यह बहुत ही गंभीर बीमारी है. यूं समझाएगा कि कुछ गलत हो रहा है जिसके लिए आपको सही दिशा बताने वाले की जरूरत है. उनके द्वारा सुझाई गई दवा और चीजों को जरूर फॉलो करें.

2. सपोर्ट नेटवर्क

अपने आप को परिवार, दोस्तों और ऐसे लोगों के बीच रखें जो आपको समझे, प्रोत्साहन और सहायता करें. विश्वसनीय व्यक्तियों के साथ अपने संघर्षों और अनुभवों को साझा करना अलगाव की भावनाओं को कम कर सकता है और भावनात्मक समर्थन प्रदान कर सकता है.

3. सेल्फ केयर

मेंटल हेल्थ को आप हेल्थ केयर के साथ आसानी से सुधार सकते हैं. दूसरों पर ध्यान देना, उनकी बातों से खुद को दुखी करना बिल्कुल छोड़ दें. बस खुद पर ध्यान दें. खुद को ऐसी एक्टिविटी में व्यस्त रखें. जिन्हें करते वक्त आप अच्छा महसूस करें.

4. एक गोल सेट करें

अपनी लाइफ और खुद के लिए एक गोल सेट करें. जिसे आप पाने में पूरी तरह से खो जाएं. छोटी शुरुआत करें और धीरे-धीरे बड़े लक्ष्यों की ओर बढ़ें. रास्ते में मिल रही तमाम उपलब्धियों को सेलिब्रेट करें, क्योंकि इससे आपका आत्मविश्वास और प्रेरणा बढ़ेगी.

5. फिटनेस

मेंटल हेल्थ को बेहतर बनाने के साथ-साथ आप खुद फिट रखने में भी बिजी करें. पूरी नींद लें, अच्छा खाना खाएं.जिम, स्विमिंग और डांस जैसी चीजें करें. जिससे आपकी बॉडी फिट रहेगी. जो आपको आकर्षित बनाएगी. जिससे आपको खुद को देखने में अच्छा लगेगा.

6. धर्मिक रास्ते पर चलें

कभी-कभी पूजा पाठ, अच्छे भजन सुनकर भी दिल और दिमाग को शांति मिलती है. आप उन वचनों का अर्थ जानिए और अपनी जिंदगी में लाने की कोशिश करें. इससे ईश्वर की ओर भी आपका लगाव बढ़ता जाएगा और आपको बहुत अच्छा महसूस होगा.

पूल में उतरी ‘कांटा लगा’ गर्ल शेफाली जरीवाला, बिकिनी में फ्लॉन्ट किया हॉट फिगर

कांटा लगा गाना तो आपने सुना ही होगा. घर घर में फेम हुआ गाने की लीड एक्ट्रेस को आज भी कोई नहीं भूला है. जिसकी तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हो रही है. जी हां, हम बात कर रहे है टीवी एक्ट्रेस शेफाली जेरीवाला की. जिनकी बोल्ड फोटो इन दिनों इंस्टाग्राम पर खूब धमाल मचा रही है.


आपको बता दें कि शेफाली जेरीवाला ने पिंक फ्लोरल बिकनी में अपने तस्वीरें शेयर की है. जिसमें एक्ट्रेस बेहद बोल्ड नजर आ रही है. ये फोटो इन दिनों इंस्टाग्राम पर तहलका मचा रही है एक्ट्रेस पूल के अंदर नजर आ रही है. जिसे देख हर कोई उनका दीवाना हो रहा है.

शेफाली की फोटोज बाली वेकेशन की है. जहां एक से बढ़कर एक पोज एक्ट्रेस देती दिख रही है. अदाकारा शेफाली जरीवाला की सामने आईं ये तस्वीरें फैंस का ध्यान खींच ले जा रही है. जिसमें एक्ट्रेस बोल्डनेस की हदें पार करती दिख रही है. अदाकारा शेफाली जरीवाला इन दिनों बाली वेकेशन के लिए निकली हैं. अदाकारा ने इस दौरान बिकिनी पहनकर अपना बोल्ड अवतार दिखा फैंस को खुश किया है.


मीडिया खबरों की मानें तो एक्ट्रेस बाली में सोलो ट्रिप पर हैं. शेफाली जरीवाला ने इस दौरान बिकिनी पहनकर कई सारी तस्वीरें खिंचवाई है. एक्ट्रेस की ये तस्वीरें फैंस का भी दिल धड़का गईं. बता दें कि  शेफाली ने इन तस्वीरों में ग्रीन कलर की बिकिनी में परफेक्ट फिगर फ्लॉन्ट किया है.

शेफाली जरीवाला की ये तस्वीरें सोशल मीडिया पर आग की तरह वायरल हो रही हैं. जिस पर लोग जमकर कमेंट्स करते दिख रहे है. शेफाली जरीवाला की तस्वीरों पर फैंस जमकर कमेंट्स कर रहे हैं. एक यूजर ने कमेंट कर लिखा, ‘मार ही डालोगी क्या.’शेफाली जरीवाला की तस्वीरें फैंस के बीच आते ही छाने लगीं.

सेना के फर्जी जवान, ठगी से डाक्टर हलाकान

सेना के फर्जी जवान बन कर खासतौर पर डाक्टरों से ठगी करने वाला गिरोह इन दिनों अनेक लोगों को अपना शिकार बना चुका है. बतौर सावधानी जरूरी है कि अगर आप के पास ऐसा कोई फोन आता है और भुगतान के लिए यूपीआई नंबर की मांग की जाती है, तो सावधान हो जाएं.

दरअसल, डाक्टरों से ठगी करने वाला गिरोह छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश में कांड करता है. ऐसी कुछ घटनाएं पिछले कुछ सालों में भी हुई थीं, जिन में कोई भी अपराधी पुलिस के हत्थे नहीं चढ़ पाया. अब पिछले कुछ समय से गिरोह के सदस्य दोबारा जवानों की जांच कराने के नाम पर किसी भी डाक्टर को फोन करते हैं. जवानों की तादाद बता कर वे फीस के बारे में पूछते हैं और फिर डाक्टर से ठगी करते हैं.

डाक्टर के फीस बताने पर ठग पेटीएम के जरीए एडवांस यूपीआई नंबर मांगते हैं. यूपीआई नंबर बताते ही ठगी का खेला शुरू हो जाता है. अब डाक्टर के खाते में फीस जमा होने के बजाय उस के खाते की रकम ठग के खाते में जाना शुरू हो जाती है.

छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव, दुर्ग और राजधानी रायपुर में डाक्टरों के पास इन दिनों ऐसे फोन आ रहे हैं. ट्रु कौलर पर सेना की वरदी पहने आदमी का फोटो देख कर डाक्टरों को यही महसूस होता है कि फोन करने वाला सेना का कोई अफसर होगा, मगर ऐसा कुछ नहीं होता है और डाक्टर ठगी का शिकार हो जाते हैं.

मार्च, 2024 के पहले हफ्ते में राजनांदगांव के एक संस्थान में ऐसा ही फोन आया. ट्रु कौलर पर सेना के अफसर का फोटो देख कर शहर के एक नामचीन डाक्टर वर्मा (बदला हुआ नाम) ने इज्जत के साथ बातचीत की और बाद में वे खुद ठगी का शिकार हो गए.

ऐसे ही एक और मामले में डाक्टर माखीजा ने फोन रिसीव किया, तो सामने वाले ने खुद को सेना का अफसर बताते हुए कुछ सेना के जवानों की शारीरिक जांच कराने की चर्चा की. जब उस अफसर ने फीस का भुगतान पेटीएम से करने की कह कर यूपीआई नंबर मांगा, तो डाक्टर मखीजा को शक हो गया और उन्होंने तत्काल फोन काट दिया.

इसी तरह स्टेशनरी और टेलरिंग की एक दुकान से भुगतान के लिए यूपीआई नंबर ले लिया गया और बाद में कारोबारी का खाता खाली होता चला गया.

भुगतान करने की कह कर एक कारोबारी के यूपीआई नंबर अकाउंट को आर्मी के खाते से लिंक कराने के एक और मामले में आर्मी के अफसर के नाम से ठगी की कोशिश हुई. उस कारोबारी को किसी ठग ने खुद को आर्मी का अफसर बताते हुए वरदी के और्डर देने की बात कही. ठग ने नियम का हवाला दे कर पेमेंट के लिए यूपीआई नंबर या बैंक अकाउंट नंबर देने की बात कही और ओटीपी आने पर उन्हें वह ओटीपी बताने की बात कही, जिस पर शक होने पर उस कारोबारी ने अपने दोस्त की सलाह ली और किसी भी तरह की जानकारी देने से मना कर दिया और दुकान पर आ कर पेमेंट कैश कर और्डर कंफर्म करने की बात कही. इस पर ठग ने बकवास करते हुए गालीगलौज करना शुरू कर दिया. यह सारा मामला पुलिस की जानकारी में आ चुका है और अभी तक आरोपी पकड़े नहीं गए हैं.

ऐसी ठगी भी होती है

एक मामले में 45 साल के वी. सिंह, जो आम्रपाली सोसाइटी, लालपुर, रायपुर में रहते थे, ठगी का शिकार हो गए. उन के पास सुबह 10 बजे एक फोन आया. फोन करने वाले ने अपना नाम दीपक पवार बताते हुए खुद को आर्मी अफसर बताया. उस ने किराए पर घर लेने की इच्छा जताई. इस के बाद उस ने अपना आधारकार्ड, पैनकार्ड उन्हें ह्वाट्सएप कर दिया. फिर उस ने एडवांस पैसा जमा करने के लिए अकाउंट नंबर मांग लिया.

पीड़ित ने अपनी मां का अकाउंट नंबर दे दिया. इस के बाद उस ने कहा कि यूपीआई ट्रांजेक्शन करना है, इसलिए अकाउंट नंबर कंफर्म करने के लिए एक रुपया भेजने के लिए कहा और उस के बदले में उस ने 2 रुपए भेज दिए.

अब ठग ने कहा कि आर्मी अकाउंट का नियम है है कि आप एक रुपया भेजोगे तो डबल भेजेंगे. उस ने घर किराए की एडवांस रकम 54,000 रुपए प्रार्थी को भेजने के लिए कहा. उस ने वैसा ही कर दिया. पैसे डालने के बाद उस ने कहा कि गलत ट्रांजैक्शन हो गया है, एक रुपया कम कर के भेजना था.

इस के बाद पीड़ित ने 45,999 रुपए भेज दिए. तभी के शिकार हो चुके शख्स ने पुलिस को बताया कि इस के बाद वह फोन करता रहा, लेकिन ठग ने फोन उठाना बंद कर दिया. मगर पीड़ित से कुल 99,999 रुपए ठग लिए गए थे.

Holi 2024: होली पर क्या पहने और क्या नहीं?

होली के त्योहार में हम रंग तो खेलते हैं पर रंगों से न सिर्फ बालों और स्किन को बचाने की जरूरत होती है बल्कि कपड़ों को भी खराब होने से बचाना पड़ता है. कपड़ों से रंग को हटाना मुश्किल तो होता ही है साथ ही रंग में मौजूद केमिकल कपड़ों को खराब कर उन्हें बदनुमा बना देते हैं. ऐसे में जरूरी है होली खेलने के लिए सही कपड़ों का चुनाव किया जाए.

ज्यादातर लोग होली आते ही पुराने कपड़ों की तलाश में लग जाते हैं ताकि उनके नए कपड़े खराब न हों. यह एक अच्छा तरीका है कपड़ों को रंगों से बचाने का, लेकिन आजकल होली पर भी फैशनेबल और स्टाइलिश दिखने का ट्रेंड है. तो आइए जाने होली के दिन क्या पहने क्या न पहने…

क्या पहनें

1- लोग होली के लिए खासतौर पर सफेद रंग के कपड़े पहनते हैं क्योंकि वाइट कलर में अन्य रंग खिलकर आते हैं. लेकिन अगर आप सफेद रंग के कपड़े नही पहन रहे हैं तो होली के रंगों से बचने के लिए पुराने कपड़े पहनें ताकि उनके खराब होने का दुख न हो. कोई भी त्यौहार ट्रैडिशनल या एथनिक लुक में ही अच्छा लगता है. इसलिए इस बार होली पर आप एथनिक थीम रख सकती हैं.

2- आप चाहे तो कुछ वैसा गेटअप ले सकती हैं, जैसा ऐक्ट्रेस रेखा ने ‘रंग बरसे’ गाने में लिया था. चिकनकारी कुर्ते और लैगिंग्स के साथ रंग खेलने का मजा दोगुना हो जाएगा. कुर्ते के साथ स्कार्फ या दुपट्टा भी आप कैरी कर सकती हैं.

3- होली रंगों का त्यौहार तो फिर क्यों न इस मौके पर कपड़ों के साथ भी एक्सपेरिमेंट किया जाए ? होली पर आप चटख रंगों के कपड़े, जैसे सलवार-कुर्ता या फिर वेस्टर्न आउटफिट्स कैरी कर सकती हैं.

4- होली पर कपड़ों के चुनाव के साथ यह जानना भी जरूरी है कि इस त्यौहार के लिए कौन-सा फैब्रिक सही है. कौटन फैब्रिक को होली खेलने के लिए सबसे सही मटीरियल माना जाता है. चाहे कितनी भी तेज धूप या गर्मी हो, कौटन ठंडक का एहसास कराता है. खास बात यह है कि यह फैब्रिक शरीर में चुभता भी नहीं है.

5- स्टाइलिश दिखना चाहती हैं तो फिर आप टौप या कुर्ते को प्लाजो या शार्ट्स के साथ पहन सकती हैं. आजकल कुर्ते के साथ धोती पैंट पहनने का भी खूब चलन है.

6- साड़ी होली पर पहनने वाला सबसे बेहतरीन परिधान है. साड़ी में आप ऐसा महसूस कर सकती हैं, जैसे रंगों से सराबोर कोई फिल्मी नायिका. लेकिन ध्यान रहे कि आपको साड़ी ठीक से और आत्मविश्वास से कैरी करनी होगी क्योंकि एक बार भींगने के बाद यह शरीर से चिपकने लगती है.

क्या न पहनें

होली खेलने के लिए जो कपड़े पहनें ध्यान रहे कि वे ज्यादा टाइट या शरीर से चिपकने वाले न हों. ऐसे में ये आपको भद्दा लुक तो देंगे ही साथ ही इरिटेशन भी पैदा कर देंगे. डीप नेकलाइन पहनने से बचें. हाफ स्लीव्स का कोई भी आउटफिट न पहनें. स्कर्ट पहनने से बचें, नहीं तो परेशानी में फंस सकती हैं.

मेरी पत्नी मर चुकी है और मैं बच्चों के खातिर दूसरी शादी करना चाहता हूं, क्या यह सही है?

सवाल

मैं ओडिशा का रहने वाला हूं. मेरी उम्र 42 साल है. मैं दिल्ली में एक सरकारी दफ्तर में मैनेजर हूं. मेरी पत्नी की मौत हुए 4 साल हो गए हैं. मेरे 2 बच्चे हैं. मैं दोबारा शादी करना चाहता हूं. रिश्ते भी आ रहे हैं, पर मेरे बच्चे इस बात से सहमत नहीं हैं. वे दूसरी मां लाने के पक्ष में नहीं हैं. वे बड़ा ही जिद्दी भरा रवैया अपना रहे हैं. मुझे समझ नहीं आ रहा है कि मैं क्या करूं? सलाह दें कि मुझे क्या करना चाहिए?

जवाब

बच्चों का डर कुदरती है कि नई मां आ कर आप को उन से दूर कर देगी, क्योंकि ज्यादातर मामलों में ऐसा देखने में भी आता है. नई पत्नी भी कुछ सपने और अरमान ले कर आएगी, जिन में बच्चों की जिम्मेदारी शामिल हो यह जरूरी नहीं, इसलिए सोचसमझ कर फैसला लें, क्योंकि मसला बहुत नाजुक है. बच्चों को समझाएं कि आप की कुछ जरूरतें और इच्छाएं हैं. वे न मानें तो शादी कर लें, क्योंकि और बड़े होने के बाद बच्चों को आप से बहुत ज्यादा मतलब नहीं रह जाएगा. आप जिस से भी शादी करने का फैसला लें, उसे भी समझ दें कि उस की ज्यादातर कोशिश बच्चों के साथ एडजस्ट करने की हो.

Holi 2024: कबाड़- कैसी थी विजय की सोच

इस बार दीवाली पर जब घर का सारा सामान धूप लगा कर समेटा तब विजय के होंठों पर एक फीकी सी हंसी चली आई थी. मैं जानती हूं कि वह क्यों मुसकरा रहे हैं.

‘‘तो इस बार दीवाली पर भाई के घर जाओगी? वहां जा कर कितने दिन रहोगी? तुम जानती हो न कि तुम्हारी सूरत देखे बिना मेरी सांस नहीं चलती. जल्दी वापस आना.’’

बस स्टैंड तक छोड़ने आए विजय बारबार मेरे बैग को तोलते हुए बोले, ‘‘कितने कपड़े ले कर जा रही हो? भारी है तुम्हारा बैग. क्या ज्यादा दिन रहने वाली हो?’’

चुप हूं मैं. चुप ही तो हूं मैं, न जाने कब से. अच्छा समय बीता भाई के पास मगर जो नया सा लगा वह था मेरी भतीजी का व्यवहार.

डाक्टरी की पढ़ाई पूरी कर चुकी मिनी के पास नया सामान रखने को जगह ही न थी सो उस ने बचपन का संजोया अपनी जान से भी प्यारा सामान यों खुद से अलग कर दिया मानो वास्तव में उसे संभाल कर रखे रखना कोई मूर्खता हो. खिलौने महरी को उस के बच्चों के लिए थमा दिए थे.

और भी विचित्र तब लगा जब मिनी ने अपने ही प्रिय सामान का मजाक उड़ाना शुरू कर दिया था.

‘‘देखो न बूआ, याद है यह बार्बी डौल, इस के लिए कितना झगड़ा किया था मैं ने भैया से. और यह लकड़ी के खिलौने, यह डब्बा देखो तो…’’

सामने सारा सामान बिखरा पड़ा था.

‘‘बच्चे थे तो कितने बुद्धू थे न हम. जराजरा सी बात पर रोते थे. यह बचकाना सामान हटा दिया. देखो, अब पूरी अलमारी खाली हो गई है…सच्ची, कितनी पागल थी न मैं जो इस कबाड़ से ही जगह भर रखी थी.’’

अच्छा नहीं लगा था मुझे उस का यह व्यवहार. आखिर हमारे जीवन में संवेदना भी तो कोई स्थान रखती है. जो कभी प्यारा था वह सदा प्यारा ही तो रहता है न, चाहे बचपन हो या जवानी. फिर जवानी में बचपन की सारी धरोहर कचरा कह कर कूड़े के डब्बे में फेंकना क्या क्रूरता नहीं है?

‘‘पुरानी चीजें जाएंगी नहीं तो नई चीजों को स्थान कैसे मिलेगा, जया. यह संसार भी तो इसी नियम पर चल रहा है न. यह तो प्रकृति का नियम है. जरा सोचो हमारे पुरखे अगर आज भी जिंदा होते तो क्या होता. कैसी हालत होती उन की?’’

‘‘कैसी निर्दयता भरी बात करते हैं विजय, अपने मांबाप के विषय में ऐसा कहते आप को शरम नहीं आती…’’

‘‘मेरी मां को कैंसर था. दिनरात पीड़ा से तड़पती थीं. मैं बेटा हूं फिर भी अपनी मां की मृत्यु चाहता था क्योंकि उन के लिए मौत वरदान थी. मुझे अपनी मां से प्यार था पर उन की मौत चाही थी मैं ने. जया, न ही जीवन सदा वरदान की श्रेणी में आता है और न ही मौत सदा श्राप होती है.’’

विजय की बातें मेरे गले में फांस जैसी ही अटक गई थीं.

‘‘जया, जीवन टिक कर रहने का नाम नहीं है. जीवन तो पलपल बदलता है, जो आज है वह कल नहीं भी हो सकता है और जीवन हम सब के चाहने से कभी मुड़ता भी नहीं. यह तो हम ही हैं जिन्हें खुद को जीवन की गति के अनुरूप ढालना पड़ता है.’’

मैं उठ कर अपनी क्लास लेने चली गई थी. जीवन का फलसफा सभी की नजर में एक कहां होता है जो मेरा और विजय का भी एक हो जाता.

एक बार विजय ने मेरे जमा किए पीतल के फूलदान, किताबों के ट्रंक, टेपरिकार्डर को कबाड़ कहा था. माना कि आज अगर पति और बेटे इस संसार में नहीं हैं तो उन का सामान क्या सामान नहीं रहा?

‘‘जब इनसान ही नहीं रहा तब उस के सामान को सहेजा क्यों जाए. जो चले गए वे आने वाले तो नहीं, तुम तो दिवंगत नहीं हो न.’’

कैसी कड़वी होती हैं न विजय की बातें, कभी भी कुछ भी कह देते हैं. मैं मानती हूं कि इतनी कड़वी बात सिर्फ वही कर सकता है जिस का मन ज्यादा साफ हो और जो खुद भी उसी हालात से गुजर चुका हो.

मैं उस दुविधा से उबर नहीं पा रही हूं जिस में मेरा खोया परिवार मुझे अकेला छोड़ कर चला गया है. अपने किसी प्रिय की मौत से क्या कोई उबर सकता है?

‘‘क्यों नहीं उबर सकता? क्या मैं उबर कर बाहर नहीं आया तुम्हारे सामने. मेरे पिता तब चले गए थे जब मैं कालिज में पढ़ता था. मां का हाल तुम ने देख ही लिया. पत्नी को मैं ही रास नहीं आया… कोई जीतेजी छोड़ गया और कोई मर कर. तो क्या करूं मैं? मर तो नहीं सकता न. क्योंकि जितनी सांसें मुझे प्रकृति ने दी हैं कम से कम उन पर तो मेरा हक है न. कभी आओ मेरे घर, देखो तो, क्या मेरा घर भी तुम्हारे घर जैसा चिडि़याघर या अजायबघर है जिस में ज्ंिदा लोगों का सामान कम और मरे लोगों का सामान ज्यादा है…’’

विजय की कड़वी बातें ही बहुत थीं मेरी संवेदना को झकझोरने के लिए, उस पर मिनी का व्यवहार भी बहुतकुछ हिलाडुला गया था मेरे अंतर में.

‘‘देखो न बूआ, अलमारी खोलो तो कितना अच्छा लग रहा है. लगता है सांस आ रही है. कैसा बचकाना सामान था न, जिसे इतने साल सहेज कर रखा…’’ मिनी चहकी.

जवानी आतेआते मिनी में नई चेतना, नई सोच चली आई थी जिस ने उस के प्रिय सामान को बचकाने की श्रेणी में ला खड़ा किया था. पता नहीं क्यों यह सब भी विजय के साथ बांट लिया मैं ने. जानती हूं वह मेरा उपहास ही उड़ाएंगे, ऐसा भी कह दिया तो सहसा आंखें भर आईं विजय की.

‘‘मैं इतना भी कू्रर नहीं हूं, जया. पगली, मैं भी तो उसी हालात का मारा हूं जिन की मारी तुम हो. आज 5 साल हो गए दोनों को गए… जया, वे दोनों सदा तुम्हारी यादों में हैं, तुम्हारे मन में हैं… उन्हें इतना तो सस्ता न बनाओ कि उन्हें उन के सामान में ही खोजती रहो. जो मन की गहराई में छिपा है, सुरक्षित है, वह कचरे में क्योंकर होगा…’’ मेरे सिर पर हाथ रखा विजय ने, ‘‘तुम्हारी शादी तुम्हारे पति के साथ हुई थी, इस सामान के साथ तो नहीं. लोग तो ज्ंिदा जीवनसाथी तक बदल लेते हैं, मेरी पत्नी तो मुझ ज्ंिदा को छोड़ गई और तुम यह बेजान सामान भी नहीं बदल सकतीं.’’

सहसा लगा कि विजय की बातों में कुछ गहराई है. उसी पल निश्चय किया, शायद शुरुआत हो पाए.

लौटते ही दूसरे दिन पूरे घर का मुआयना किया. पीतल का कितना ही सामान था जिस का उपयोग मुमकिन न था. उसे एकत्र कर एक बोरी में डाल दिया. महरी को कबाड़ी की दुकान पर भेजा, थोड़ी ही देर में कबाड़ी वाले की गाड़ी आ गई.

शाम को महरी पुराने कपड़ों से बरतन बदलने वाली को पकड़ लाई. मैं ने कभी कपड़ा दे कर बरतन नहीं लिए थे. अच्छा नहीं लगता मुझे.

‘‘बीबीजी, इन की भी तो रोजीरोटी है न. इस में बुरा क्या है जो आप को भी चार बरतन मिल जाएं.’’

‘‘मैं अकेली जान क्या करूंगी बरतन ले कर?’’

‘‘मेरी बेटी की शादी है, मुझे दे देना. इसी तरह साहब का आशीर्वाद मुझे भी मिल जाएगा. कपड़ों का सही उपयोग हो जाएगा न बीबीजी.’’

गरदन हिला दी मैं ने.

2 ही दिन में मेरा घर खाली हो गया. ढेर सारे नए बरतन मेज पर सज गए, जिन्हें महरी ने दुआएं देते हुए उठा लिया.

‘‘बच्ची की गृहस्थी के पूरे बरतन निकल आए साहब के कपड़ों से. बरसों इस्तेमाल करेगी और आप को दुआएं देगी, बीबीजी.’’

पुरानी पीतल और किताबें बेच कर कुछ हजार रुपए हाथ में आ गए.

कालिज आतेजाते अकसर कालीन की दुकान पर बिछे व टंगे सुंदर कालीन नजर आ जाते थे. बहुत इच्छा होती थी कि मेरे घर में भी कालीन हो. पति की भी बहुत इच्छा थी, जब वह जिंदा थे.

शाम होतेहोते मेरे 2 कमरों के घर में नरम कालीन बिछ गए. पूरा घर खुलाखुला, स्वच्छ हो कर नयानया लगने लगा. अलमारी खोलती तो वह भी खुलीखुली लगती. रसोई में जाती तो वहां भी सांस न घुटती.

‘‘जया, क्या बात है 2 दिन से कालिज नहीं आई?’’ सहसा चौंका दिया विजय ने.

मैं घर की सफाई में व्यस्त थी. कालिज से छुट्टी जो ले ली थी.

‘‘अरे वाह, इतना सुंदर हो गया तुम्हारा घर. वह सारा कबाड़ कहां गया? क्या सब निकाल दिया?’’

विजय झट से पूरा घर देख भी आए. भीग उठी थीं विजय की आंखें. कितनी ही देर मेरा चेहरा निहारते रहे फिर मेरे सिर पर हाथ रखा और बोले, ‘‘उम्मीद मरने लगी थी मेरी. लगता था ज्यादा दिन जी नहीं पाओगी इस कबाड़ में. लेकिन अब लगता है अवसाद की काई साफ हो जाएगी. तुम भी मेरी तरह जी लोगी.’’

पहली बार लगा, विजय भी संवेदनशील हैं. उन का दिल भी नरम है. कुछ सोच कर कहने लगे, ‘‘मैं भी तुम जैसा ही था, जया. मां की दर्दनाक मौत का नजारा आंखों से हटता ही नहीं था. जरा सोचो, जिस मां ने मुझे जीवन दिया उसे एक आसान मौत दे पाना भी मेरे हाथ में नहीं था. क्या करता मैं? पत्नी भी ज्यादा दिन साथ नहीं रही. मैं जानता हूं कि इन परिस्थितियों में जीवन ठहर सा जाता है. फिर भी सब भूल कर आगे देखना ही जीवन है.’’

विजय की आंखें झिलमिलाने लगी थीं. मेरे सिर पर अभी भी उन का हाथ था. हाथ उठा कर मैं ने विजय का हाथ पकड़ लिया. हजार अवसर आए थे जब विजय ने सहारा दिया था. सौसौ बार बहलाना भी चाहा था.

यह पहला अवसर था जब वह खुद मेरे सामने कमजोर पड़े थे. सस्नेह थाम लिया मैं ने विजय का हाथ.

‘‘मेरे पति की बड़ी इच्छा थी कि नरम कालीन हों घर में. बस, कभी मौका ही नहीं मिला था…कभी मौका मिला भी तो इतने रुपए नहीं थे हाथ में. बेकार पड़े सामान को निकाला तो उन की इच्छा पूरी हो गई. मैं ने कुछ गलत तो नहीं किया न?’’

जरा सी आत्मग्लानि सिर उठाने लगी तो फिर से उबार लिया विजय ने, यह कह कर कि नहीं तो, जया, सुंदर कालीन में भी तो तुम अपने पति की ही इच्छा देख रही हो  न. सच तो यह है कि जो जीवन की ओर मोड़ पाए वह भला गलत कैसे हो सकता है.

रोतेरोते मुसकराना कैसा लगता है. मैं अकसर रोतीरोती मुसकरा देती हूं तो विजय हाथ हिला दिया करते हैं.

‘‘इस तरह तो तुम जाने वालों को दुख दे रही हो. उन का रास्ता आसान बनाओ, पीछे को मत खींचो उन्हें. जो चले गए उन्हें जाने दो, पगली. खुश रहना सीखो. इस से उन्हें भी खुशी होगी. वह भी तुम्हें खुश ही देखना चाहते हैं न.’’

सहसा हाथ बढ़ा कर विजय ने पास खींच लिया और कहने लगे, ‘‘जीवन के अंतिम छोर तक तुम ने अपने पति का साथ दिया है. तुम किसी के साथ विश्वासघात नहीं कर रही. न अपने पति के साथ, न बेटे के साथ और न ही मेरे साथ. हम सब साथसाथ रह सकते हैं, जया.’’

विजय के हाथों को पिछले 3 साल से हटाने का प्रयास कर रही हूं मैं. विजय ने सदा मेरी इच्छा का सम्मान किया है.

लेकिन इस पल मैं ने जरा सा भी प्रयास नहीं किया. विजय स्तब्ध रह गए. उन की भावनाओं का सम्मान कर मैं पति का अपमान नहीं कर रही. धीरेधीरे विश्वास होने लगा मुझे. अविश्वास आंखों में लिए विजय ने मेरा चेहरा सामने किया. हैरान तो होना ही था उन्हें.

न जाने क्याक्या था जिस के नीचे दबी पड़ी थी मैं. कुछ यादों का बोझ, कुछ अपराधबोध का बोझ और कुछ अनिश्चय का बोझ. पता नहीं कल क्या हो.

शब्दों की आवश्यकता तो कभी नहीं रही मेरे और विजय के बीच. सदा मेरा चेहरा देख कर ही वह सब भांपते रहे हैं. भीगी आंखों में सब था. सम्मान सहित आजीवन साथ निभाने का आश्वासन. मुसकरा पड़े विजय. झुक कर मेरे माथे पर एक प्रगाढ़ चुंबन जड़ दिया. खुश थे विजय. मैं कबाड़ से बाहर जो चली आई थी.

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