⚲

Romantic Story in Hindi- बात एक रात की: भाग 3

लेखक : श्री प्रकाश

तपन चित्रा को विदा करने स्टेशन गया. चलते समय चित्रा ने कहा, ‘‘आगे जब कोलकाता आएं तो मुझ से जरूर मिलना. फिलहाल मेरे साल्ट लेक फ्लैट में ही मेरी कंपनी है,’’ और फिर अपना कार्ड तपन को दे दिया.

‘‘श्योर,’’ कह तपन ने भी अपना कार्ड चित्रा को दे दिया.

चित्रा कोलकाता लौट गई. अब वे अकसर फोन पर बातें करते थे. तपन ज्यादातर चित्रा के काम और स्वास्थ्य के बारे में पूछता, तो चित्रा तपन और उस की मां के बारे में. कभी चित्रा मां से बात करती तो हर बार मां यही पूछतीं कि उस ने अपने भविष्य के बारे में क्या फैसला लिया है? चित्रा भी हर बार यही कहती कि अभी कोई फैसला नहीं लिया.

एक बार जब चित्रा का फोन आया तो मां ने उस से पूछा, ‘‘मेरा तपन तुम्हें कैसा लगता है?’’

चित्रा इस सवाल के लिए तैयार नहीं थी, फिर भी उस ने कहा, ‘‘तपन तो बहुत ही अच्छे इनसान हैं.’’

‘‘वह हमेशा तुम्हारी तारीफ करता रहता है. कहता है कि बहुत मेहनती लड़की है. खूब तरक्की करेगी,’’ मां बोलीं.

‘‘यही तो उन का बड़प्पन है.’’

कुछ दिनों के बाद तपन को कोलकाता जाना पड़ा. वह चित्रा से मिला. चित्रा ने उसे अपने हाथों से खाना खिलाया. दोनों ने काफी देर तक बातें कीं, पर केवल काम से संबंधित. चलते समय चित्रा ने उसे फिर आने को कहा और हाथ मिला कर विदा किया. यह तपन और चित्रा का दूसरा दैहिक स्पर्श था. पहला स्पर्श रिकशे पर हुआ था. इधर चित्रा का प्रोजैक्ट पूरा होने जा रहा था. उस का टैस्ट चल रहा था, जिस के बाद प्रोजैक्ट को अमेरिकन कंपनी को बेचा जाना था. इधर तपन की मां की तबीयत काफी खराब थी. चित्रा भी सुन कर आई थी. बोकारो में बड़े अस्पताल नहीं थे, तो चित्रा ने तपन को उन्हें कोलकाता ले चलने को कहा. वह स्वयं टैक्सी बुक कर मां और तपन के साथ कोलकाता आई. मां को बड़े अस्पताल में भरती कराया गया. 2 हफ्ते में तपन की मां को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. इस बीच तपन चित्रा के फ्लैट में रहा. चित्रा और तपन अब थोड़ा करीब आ चुके थे. दोनों एकदूसरे को बेहतर समझ रहे थे.

तपन की मां को अस्पताल से छुट्टी मिली तो चित्रा उन्हें भी अपने घर ले आई थी और कहा था कि यहां कुछ दिन आराम करने के बाद ही लौटना. 1 हफ्ते तक वे चित्रा के फ्लैट में ही रहे.

1 सप्ताह बाद तपन मां के साथ बोकारो लौट रहा था. पर चलते समय मां ने चित्रा से फिर कहा, ‘‘बेटी, तुम ने तो अपनी बेटी से भी बढ़ कर मेरा खयाल रखा है. कुदरत तुम्हारी हर मनोकामना पूरी करे… पर मेरी बात पर भी सोचना.’’

ये भी पढ़ें- Family Story: दो टकिया दी नौकरी

‘‘कौन सी बात मां?’’ चित्रा ने पूछा.

‘‘अपने और तपन के बारे में.’’

आप के आशीर्वाद से मेरा प्रोजैक्ट पूरा हो गया है. 2 हफ्तों के अंदर ही इस के

अच्छे परिणाम मिलने की आशा है. फिर आप की बात भी मान लूंगी.

तपन और मां दोनों चित्रा की ओर देखने लगे. चित्रा की तरफ से पहला पौजिटिव संकेत मिला था.

इधर चित्रा के मातापिता भी उस के लिए चिंतित रहते थे. चित्रा ने तपन की चर्चा उन से कर रखी थी. उस ने कहा था कि बोकारो जाने वाली एक रात की बात ने चित्रा को काफी इंप्रैस किया है. इतना ही नहीं, चित्रा के पिता ने एक बार चुपके से बोकारो आ कर तपन के बारे में जानकारी भी ले ली थी. वे तपन से संतुष्ट थे. उन्होंने अपनी सहमति चित्रा को बता दी थी.

इस के 1 महीने के अंदर ही चित्रा ने तपन को फोन पर बताया कि उस का प्रोडक्ट अमेरिका की कंपनी ने अच्छी कीमत दे कर खरीद लिया है. उस की कंपनी के चारों पार्टनर्स को 5-5 करोड़ रुपए का फायदा हुआ है.

तपन की मां ने चित्रा से फोन पर कहा, ‘‘तुम्हारी सफलता पर बहुतबहुत बधाई. देखा तपन ने ठीक ही कहा था कि तुम बहुत मेहनती लड़की हो और जल्द ही तुम्हें तरक्की मिलेगी.’’

‘‘सब आप लोगों के आशीर्वाद से है.’’

‘‘अब तो तेरा प्रोजैक्ट भी पूरा हो गया तो बता तपन के बारे में क्या सोचा है?’’

ये भी पढ़ें- Crime Story: जिस्म के सौदागर

‘‘मैं ने कहा था न कि तपन बहुत अच्छे इनसान हैं. मुझे भी अच्छे लगते हैं. इस के आगे मैं क्या बोलूं? हां, एक और सरप्राइज है, मेरी कंपनी को अमेरिका से बहुत बड़ा और्डर मिला है.’’

मां ने जब यह बात तपन को बताई तो उस ने फोन मां के हाथ से ले कर चित्रा से कहा, ‘‘बहुतबहुत बधाई इस दूसरी कामयाबी पर और एक सरप्राइज मेरी ओर से भी है. मुझे प्रमोशन दे कर कंपनी ने कोलकाता औफिस में पोस्टिंग की है. 1 हफ्ते के अंदर जौइन करना होगा.’’

फिर मां ने चित्रा से कहा, ‘‘अब तो और इंतजार नहीं कराना है?’’

‘‘नो मोर इंतजार मांजी. अब आगे आप की मरजी का इंतजार है. आप जो कहेंगी वैसा ही करूंगी,’’ और हंसते हुए फोन काट दिया.

इधर मां की आंखों में भी खुशी के आंसू छलक आए थे.

ये भी पढ़ें- Romantic Story- कायरता का प्रायश्चित्त

कायरता का प्रायश्चित्त: भाग 1

लेखक-  शुचिता श्रीवास्तव

डा. मिहिर ने जैसे ही अपने चेहरे के सामने से किताब हटाई और सामने बैठे मरीज की तरफ देखा तो वह चौंक गए.

चौंकी तो मिताली भी थी पर उस ने अपनेआप को संयत कर लिया था.

‘‘अरे मिहिर, आप?’’ मिताली बोली, ‘‘मैं ने तो सोचा भी नहीं था कि आप यहां हो सकते हैं.’’

‘‘कहो, मिताली, कैसी हो और क्या हुआ तुम्हें जो एक डाक्टर की जरूरत पड़ गई?’’ डा. मिहिर सामान्य स्वर में बोले.

‘‘मिहिर, मैं तो ठीक हूं पर यहां मैं अपने पति नवीन को दिखाने आई हूं,’’ मिताली बोली, ‘‘पिछले 3-4 माह से उन की तबीयत कुछकुछ खराब रहती थी पर इधर कुछ दिनों से काफी अधिक अस्वस्थ रहने लगे हैं,’’ कह कर मिताली ने

डा. मिहिर का परिचय नवीन से करवाया, ‘‘नवीन, डा. मिहिर का घर कानपुर में मेरी बूआ के घर के बगल में है. मेरे फूफाजी और मिहिर के डैडी बचपन के दोस्त हैं.’’

डा. मिहिर ने नवीन का चेकअप किया व कुछ टेस्ट करवाने का परामर्श दिया जिस की रिपोर्ट ले कर अगले दिन आने को कहा.

मिताली व नवीन चले गए पर

डा. मिहिर का मन उचट गया. एक बार उन के मन में आया कि वह घर लौट जाएं लेकिन जब अपने मरीजों का ध्यान आया जो कई दिन पहले नंबर लगवा चुके थे और काफी दूरदूर से आए थे तो उन्होंने अपनेआप को संभाल लिया और चपरासी से मरीजों को अंदर भेजने के लिए कह दिया.

ये भी पढ़ें- शुभलाभ

शाम के समय मिहिर को किसी दोस्त के घर पार्टी में जाना था पर वह वहां न जा कर सीधे घर आ कर चुपचाप बिस्तर पर लेट गए.

डा. मिहिर को बारबार एक ही बात चुभ रही थी कि जिस मिताली के कारण अपना घर, डैडी का अच्छाखासा नर्सिंग होम छोड़ कर उसे इस अनजान शहर में आ कर अपनी प्रैक्टिस जमानी पड़ी वही मिताली उन के शांत जीवन में कंकड़ फेंकने के लिए यहां भी आ गई.

‘‘साहब, चाय लेंगे या कौफी?’’ हरिया ने अंदर आ कर पूछा.

‘‘नहीं, मैं कुछ नहीं लूंगा,’’ मिहिर ने छोटा सा जवाब दिया तो वह चला गया.

उस के जाते ही मिहिर का मन अतीत के सागर में गोते लगाने लगा.

मिताली को पहली बार मिहिर ने रस्तोगी अंकल की बेटी रानी के जन्मदिन की पार्टी में देखा था. यों तो वह रानी के घर वालों के मुंह से मिताली की सुंदरता की चर्चा पहले भी सुन चुका था पर उस दिन जो देखा तो बस देखता ही रह गया था.

हालांकि मिहिर भी कम सुंदर न था. उस पर संपन्न परिवार का इकलौता लड़का, साथ में डाक्टरी की पढ़ाई. पार्टी में आई तमाम लड़कियों की नजरें उस पर टिकी थीं और वे उस से बातें करने को आतुर थीं. पर मिहिर जिस से बात करना चाहता था वह अपनी सहेलियों से बातें करने में व्यस्त थी.

काफी देर बाद मिहिर को मिताली से बात करने का मौका मिला.

‘आप का नाम मिताली है?’ बातचीत शुरू करने के उद्देश्य से मिहिर ने पूछा.

‘हां, पर आप को मेरा नाम कैसे पता चला?’ मिताली ने उसे आश्चर्य से देखते हुए प्रतिप्रश्न किया.

‘सिर्फ नाम ही नहीं, मैं तो आप के बारे में और भी बहुत कुछ जानता हूं,’ मिहिर ने कहा तो मिताली की आंखें आश्चर्य से फैल गईं.

‘अच्छा, और क्याक्या जानते हैं आप मेरे बारे में?’ उस ने पूछा.

‘यही कि आप रानी के मामा की बेटी हैं और एम.बी.ए. की छात्रा हैं. संगीत सुनना, बैडमिंटन खेलना, कविताएं लिखना आप की हौबी है,’ मिहिर बोला.

ये भी पढ़ें- स्पर्श दंश

‘हां, आप कह तो सच रहे हैं पर मेरे बारे में इतना सबकुछ आप कैसे जानते हैं? क्या मैं आप का परिचय जान सकती हूं?’ मिताली ने कहा.

‘मैं रानी का पड़ोसी हूं. मेरा नाम मिहिर है. मैं मेडिकल अंतिम वर्ष का छात्र हूं. आजकल छुट्टियों में घर आया हूं,’ मिहिर ने अपना परिचय दिया.

तभी मिताली को किसी ने पुकारा और वह वहां से चली गई. मिहिर भी घर लौट आया. उस की आंखों की नींद व मन का चैन उड़ चुका था. दिनरात, सोते- जागते, उठतेबैठते बस उसे मिताली ही नजर आती थी.

उस दिन मिहिर अपनी छोटी बहन रूपाली के साथ शापिंग करने गया था. रूपाली बुटीक में अपने लिए कपड़े पसंद कर रही थी. मिहिर बोर होने लगा तो वह बाहर आ गया. अचानक उस की नजर सामने की गिफ्ट शाप की तरफ गई तो वह चौंक पड़ा. वहां मिताली कुछ खरीद रही थी. मिहिर उस ओर बढ़ चला.

‘हाय, मिताली, कैसी हो और यहां कैसे?’ मिताली के करीब जा कर मिहिर ने पूछा.

‘अरे मिहिर, आप और यहां. दरअसल आज मेरी एक फैं्रड का जन्मदिन है. मैं उसी के लिए गिफ्ट खरीदने आई हूं, और आप?’ मिताली ने उस से कहा.

‘मैं अपनी बहन रूपाली के साथ आया हूं. वह सामने की दुकान से कपड़े खरीद रही है. बोर होने लगा तो अंदर से बाहर आ गया और तुम यहां दिख गईर्ं.’

मिताली ने एक टेबल लैंप पैक करवा लिया. वह पैसे देने के लिए मुड़ी तो मिहिर ने उसे फिर शो केसों की तरफ बुला लिया और एक सफेद संगमरमर से बने ताजमहल की तरफ इशारा करते हुए बोला, ‘मिताली, देखो तो जरा यह कैसा लग रहा है?’

‘बहुत खूबसूरत है,’ मिताली बोली.

मिहिर ने सोचा, क्यों न वह अपने प्यार का इजहार मिताली को यह सुंदर उपहार दे कर करे? यह सोच कर उस ने वह ताजमहल और साथ में एक खूबसूरत पत्थर का बना कीमती ब्रेसलेट भी खरीद लिया.

तभी मिहिर को ढूंढ़ते हुए वहां रूपाली भी आ गई और मिताली को देख कर उस से बातें करने लगी.

मिहिर मन ही मन खुश हुआ कि चलो वह सफाई देने से बच गया वरना न जाने कितनी देर तक उस की छोटी बहन उस से सिर्फ इसलिए लड़ती कि वह उसे बिना बताए क्यों चला आया.

ये भी पढ़ें- उस मोड़ पर

‘अच्छा अब मैं चलती हूं,’ घड़ी की तरफ नजर डालते हुए मिताली बोली.

‘मिताली, हमारे साथ ही चलो न, मुझे मेरी दोस्त के घर छोड़ कर मिहिर भैया तुम्हें तुम्हारे घर छोड़ देंगे.’

Satyakatha: मकान में दफन 3 लाशें- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

पवन ने 2018 में हरियाणा के शहर पानीपत की शिवनगर कालोनी में 5 लाख रुपए में एक मकान खरीदा था. इस से पहले वह अपने परिवार के साथ पानीपत की ही शुगर मिल कालोनी के क्वार्टर में किराए पर रहता था.

पवन ने यह मकान ढाई साल पहले खरीदा था, लेकिन उस में उस ने वहां कोई मरम्मत का काम नहीं करवाया था.

मकान के बाहरी हिस्से में स्थित दालान के एक कोने में छोटी लाल चींटियों ने फर्श में सुराख बना दिए थे. उन्हीं सुराखों के रास्ते बहुत दिनों से फर्श के भीतर बड़ी तादाद में चींटियों का आनाजाना लगा था. यह देख कर पवन और उस की पत्नी बबीता को कुछ अजीब सा लगता था, लेकिन दोनों उस पर ज्यादा माथापच्ची नहीं करते थे.

बात यहीं पर खत्म हो गई, ऐसा नहीं था. दालान वाले फर्श पर जब कभी भी कोई वजनदार चीज गिरती थी तो छन्न की आवाज होती थी. पता नहीं क्यों दोनों को ऐसा लगता था जैसे फर्श के नीचे खोखला हो. एक दिन बबीता पति से बोली, ‘‘देखो जी, चींटियों का सिलसिला तो खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा है. पता नहीं कहां से आती हैं और कहां जाती हैं.’’

‘‘कह तो तुम ठीक रही हो बबीता. मैं भी कई दिनों से चींटियों का नजारा देख रहा हूं. इन की लाइन टूटने का नाम ही नहीं ले रही है.’’ पवन ने कहा.

‘‘सच कह रहे हो आप. मैं तो कहती हूं कि किसी राजमिस्त्री को बुला कर फर्श दिखा देते हैं कि ऐसा क्यों होता है.’’ पत्नी ने सुझाव दिया.

‘‘तुम ठीक कहती हो, कल ही किसी राजमिस्त्री को बुला कर दिखाता हूं. पता तो चले कि ऐसा क्यों हो रहा है.’’ पवन ने सहमति जताई.

अगले दिन पवन एक राजमिस्त्री को बुला कर ले आया और फर्श दिखाया. हथौड़े से फर्श के ऊपर मिस्त्री ने चोट की तो सचमुच छन्न की आवाज आ रही थी. फिर उस ने कमरे के फर्श पर चोट की तो वहां ऐसी कोई आवाज नहीं हुई.

राजमिस्त्री को कुछ आशंका हुई. उस ने हथौड़े से फर्श पर छेनी से लगातार 3-4 चोट कीं. इतने से ही फर्श में गहरा छेद बन गया और उस के हाथ से छेनी छूट कर उस छेद में जा गिरी. यह देख कर राजमिस्त्री दंग रह गया था.

उत्सुकतावश मिस्त्री फर्श तोड़ता गया. तो फर्श के भीतर एक गहरा गड्ढा बना मिला, जिस के ऊपर सीमेंट की एक मोटी परत भर चढ़ाई गई थी. यह देख कर सभी दंग रह गए.

इस के बाद राजमिस्त्री ने हथौड़े से पूरे फर्श को तोड़ दिया. 4×6 लंबाई और चौड़ाई तथा 7 फीट गहरे फर्श के नीचे एक गड्ढा मिला. शक होने पर पवन ने गड्ढे से मिट्टी निकलवाई तो अंदर का दिल दहला देने वाला दृश्य देख कर सभी के होश उड़ गए थे. गड्ढे के अंदर बड़ी मात्रा में कंकाल पड़े थे.

पवन को जब कुछ समझ में नहीं आया तो उस ने पुलिस कंट्रोलरूम के 100 नंबर पर फोन कर के घटना की जानकारी दे दी. मामला वाकई चौंकाने वाला था.

ये भी पढ़ें- Satyakatha: नफरत की विषबेल

सूचना मिलते ही कंट्रोलरूम ने किला थाने के सीआईए-1 प्रभारी राजपाल अहलावत को घटना की जानकारी दी और उन्हें वहां पहुंचने के निर्देश दिए.

सूचना मिलते ही सीआईए-1 थाने के प्रभारी राजपाल अहलावत पुलिस टीम के साथ शिवनगर कालोनी पहुंच गए, जहां का यह मामला था. मौके पर पहुंच कर उन्होंने छानबीन शुरू कर दी.

बांस की सीढ़ी के सहारे उन्होंने कांस्टेबल लखन यादव को गड्ढे में उतारा. कांस्टेबल को वहां 3 मानव खोपडि़यां दिखीं. इस का मतलब साफ था कि गड्ढे में हत्या कर के 3 लाशें दफनाई गई थीं. इंसपेक्टर राजपाल ने मकान मालिक पवन से पूछा, ‘‘कब से रह रहे हो यहां?’’

‘‘करीब ढाई साल से.’’ पवन ने सपाट लहजे में जबाव दिया.

‘‘किस की लाशें हैं ये? तुम ने किस की हत्या की और उसे दफना दिया?’’ इंसपेक्टर राजपाल ने पूछा.

‘‘सर, मैं ने किसी की हत्या नहीं की, सर. मैं कुछ नहीं जानता हूं.’’ पवन बोला.

‘‘तुम नहीं जानते तो और कौन जानता है?’’ इंसपेक्टर ने सवाल किया.

‘‘सर, ढाई साल पहले मैं ने इस मकान को अहसान सैफी से 5 लाख रुपए में खरीदा था.’’ पवन ने बताया.

‘‘अहसान सैफी इस समय कहां है? क्या मकान खरीदते समय इस की छानबीन की थी तुम ने?’’ इंसपेक्टर ने अगला सवाल किया.

‘‘नहीं सर, नहीं की थी. मालिक वही था. चाहें तो आप पूछ सकते हैं. उस ने बताया था बीवी और बच्चों के साथ वह जगदीश नगर में किराए का कमरा ले कर रहता है. फिर जब से मैं ने मकान खरीदा है, तब से मैं ने यहां कोई नया काम नहीं कराया.’’

‘‘क्या…?’’ पवन की बात सुन कर राजपाल अहलावत ऐसे चौंके जैसे कोई अजूबा देख लिया हो, ‘‘तुम ने इतने दिनों में कोई काम नहीं कराया?’’

‘‘हां सर, मैं सच कहता हूं, मैं ने कोई काम नहीं कराया. चाहे तो आप पड़ोसियों से पूछ सकते हैं.’’ पवन ने सफाई दी.

‘‘वो तो मैं पूछ ही लूंगा, पहले तुम अहसान सैफी के घर ले चलो. बाकी तो मैं बाद में देखता हूं.’’

इंसपेक्टर राजपाल अहलावत ने पूछताछ करते हुए ही घटना की जानकारी डीएसपी सतीश वत्स, डौग स्क्वायड और फोरैंसिक टीम को दे दी थी. सूचना मिलने के कुछ देर बाद जांच टीम मौके पर आ चुकी थीं. छानबीन के दौरान फोरैंसिक टीम ने मौके से जो 3 खोपडि़यां बरामद की थीं, उस में एक औरत और 2 बच्चों की थीं. हड्डियों के ढांचे के आधार पर एक बच्चे की उम्र करीब 10 साल और दूसरे की 14 साल के आसपास आंकी गई थी.

इंसपेक्टर राजपाल अहलावत ने कंकालों को पोस्टमार्टम के लिए पीजीआई रोहतक भेजवा दिया और तीनों कंकालों से डीएनए टेस्ट के लिए सैंपल लिए और जांच के लिए फोरैंसिक लैब भेजवा दिए.

यह सब करतेकरते दोपहर के 3 बज गए थे. कागजी काररवाई पूरी करने के बाद इंसपेक्टर अहलावत थाने वापस लौट आए और 2 कांस्टेबलों के साथ पवन को जगदीश नगर अहसान सैफी का पता लगाने के लिए भेज दिया. इधर पुलिस ने अज्ञात के खिलाफ भादंवि की धारा 302, 201, 120बी के तहत मुकदमा दर्ज कर लिया था. यह बात मार्च, 2021 के पहले सप्ताह की है.

अहसान सैफी ने पवन को अपना जो पता बताया था, वहां पूछताछ करने पर मालूम हुआ कि अहसान सैफी नाम का कोई आदमी अपने परिवार के साथ यहां कभी रहा ही नहीं. यह सुन कर सभी दंग रह गए. इस का मतलब साफ था कि अहसान सैफी ने पवन से झूठ बोला था.

दोनों कांस्टेबलों ने इंसपेक्टर राजपाल को फोन कर के पूरी बात बता दी. जिस बात की आशंका उन्हें पहले से थी, आखिरकार वही सच हुआ. इंसपेक्टर अहलावत की नजरों में अहसान सैफी संदिग्ध रूप से चढ़ गया था.

उन्हें शक था कि अहसान ने अपनी बीवी और दोनों बच्चों की हत्या कर के उसे जमींदोज कर के फरार हो गया होगा. तसवीर उस के पकड़े जाने पर साफ होगी, इसलिए पुलिस अहसान सैफी की तलाश में जुट गई.

अहसान सैफी तक पहुंचने के लिए पुलिस ने अपने मुखबिर तंत्र का जाल फैला दिया, जिस का परिणाम सुखद निकला. मुखबिर के जरिए पुलिस को पता चला कि मरने वालों में अहसान सैफी की दूसरी पत्नी नाजनीन और उस के बेटे सोहिल और साजिद थे.

ये भी पढ़ें- Satyakatha: दो नावों की सवारी

नाजनीन अमीर घराने के मुन्ना शेख की शादीशुदा बेटी थी. वह मुंबई की कल्याणी घाट की रहने वाली थी. मुखबिर के जरिए पुलिस को मुन्ना शेख का मोबाइल नंबर मिल गया. पुलिस ने फोन कर के उसे सारी बात बताई और पानीपत के किला थाना बुलवाया.

3 दिनों बाद मुन्ना शेख पानीपत के किला थाने पहुंचा और इंसपेक्टर राजपाल अहलावत से मिला. मामले को ले कर मुन्ना शेख से उन्होंंने विस्तार से पूछताछ की तो पता चला अहसान सैफी से उस की तलाकशुदा बेटी नाजनीन शेख की नजदीकियां शादी डौटकौम के जरिए बढ़ी थीं.

उस के बाद दोनों ने निकाह कर लिया. निकाह के बाद मुंबई से यहां (पानीपत) आ गई और दोनों साथ रहने लगे. बीचबीच में फोन के जरिए बातचीत हो जाया करती थी.

‘‘कब से आप दोनों की बातें नहीं हुईं?’’ राजपाल अहलावत ने पूछा.

‘‘सर, यही कोई 4 साल से.’’

‘‘4 साल से?’’ थानाप्रभारी बुरी तरह चौंके, ‘‘4 सालों से आप दोनों के बीच में बातचीत नहीं हुई तो क्या आप ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि बेटी और नाती कहां हैं, किस हाल में हैं?’’

‘‘की थी सर. बेटी और नातियों के बारे में पता लगाने की बहुत बार कोशिश की थी, लेकिन दामाद कोई न कोई बहाना बना कर टाल दिया करता था. तो मैं भी थकहार कर बैठ गया.’’ मुन्ना शेख ने बताया.

‘‘थाने में कोई सूचना नहीं दी थी?’’

‘‘नहीं सर.’’

‘‘ओह नो! कैसे बाप हो तुम. जिस की बेटी और 2-2 नाती गायब हों, वह शख्स भला हाथ पर हाथ धरे कैसे बैठा रह सकता है. हद कर दी तुम ने तो.’’ कुछ सोचते हुए उन्होंने आगे पूछा, ‘‘क्या तुम्हारे पास अहसान का कोई फोन नंबर है?’’

‘‘एक नंबर है साहब, जिस से अकसर बातें हुआ करती थीं कभी.’’ मुन्ना बोला.

उस के बाद मुन्ना शेख ने अहसान सैफी का मोबाइल नंबर उन्हें दे दिया और यह भी बता दिया था कि अहसान उत्तर प्रदेश के भदोही शहर में कहीं रह रहा है. इंसपेक्टर राजपाल ने उस नंबर को सर्विलांस पर लगवा दिया. उस नंबर की लोकेशन भदोही की ही आ रही थी. 24 मार्च, 2021 को एक पुलिस टीम तुरंत भदोही भेज दी.

इत्तफाक से अहसास भदोही में ही मिल गया, जहां वह अपनी तीसरी पत्नी के साथ मजे से रह रहा था.

अहसान सैफी को भदोही से गिरफ्तार कर इंसपेक्टर राजपाल अहलावत ट्रांजिट रिमांड पर पानीपत ले आए और पूछताछ के लिए अदालत में पेश कर 10 दिनों की रिमांड पर उसे ले लिया.

पूछताछ में अहसान सैफी ने पुलिस के सामने कबूल कर लिया कि उसी ने अपनी दूसरी पत्नी नाजनीन और उस के दोनों बेटों सोहेल और साजिद को खाने में नींद की दवा खिला कर मौत के घाट उतार दिया था और राज छिपाने के लिए तीनों की लाशें दालान में गड्ढा खुदवा कर दफना दीं, ताकि किसी को कुछ पता न चले. उस के बाद उस ने पूरी कहानी से परदा उठा दिया.

पूछताछ में उस ने यह भी बताया कि उस की पहली पत्नी नूरजहां और बेटा शाकिर ने हत्या का राज छिपाने और मृतका के कीमती सामानों को रख लेने में उस की मदद की थी. इस आधार पर पुलिस ने मुजफ्फरनगर के जाग्गाहेड़ी से आरोपी अहसान सैफी की पहली पत्नी नूरजहां और बेटे शाकिर को भी गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

सवा 4 साल से रहस्यमय ढंग से गायब नाजनीन और उस के बेटों सोहेल और साजिद की हत्या की दिल दहला देने वाली कहानी ऐसे सामने आई—

अहसान सैफी मूलरूप से उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरनगर के जाग्गाहेड़ी का रहने वाला था. मध्यमवर्गीय परिवार के अहसान सैफी के परिवार में पत्नी नूरजहां और 2 बेटे साहिल और शाकिर थे. पेशे से अहसान सैफी बढ़ई था.

बढ़ई के काम से इतनी कमाई नहीं होती थी कि घर खर्च के बाद भविष्य के लिए 2 पैसे बचा पाएं. जो भी वह कमाता था सारा पैसा परिवार के खर्च में निकल जाता था. यह देख कर अहसान हमेशा परेशान रहता था कि ऐसा क्या करे, जिस से गरीबी से छुटकारा भी मिल जाए और दौलतमंद भी हो जाए.

पत्नी से सलाहमशविरा कर के अहसान सैफी मुजफ्फरनगर से पानीपत किस्मत आजमाने चला आया था. किस्मत ने साथ दिया तो उस के दिन पलट गए. बढ़ई के काम से यहां उसे अच्छे पैसे मिलने लगे थे. परिवार के खर्च के लिए आधा पैसा भेज देता था और आधा अपने पास खर्चे के लिए रखता था.

अगले भाग में पढ़ें- पति की बेईमान शराफत पर नाजनीन ने आंख बंद कर कर लिया यकीन 

Manohar Kahaniya: शैली का बिगड़ैल राजकुमार- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

आज के समय में सोशल मीडिया का बुखार लोगों के सिर चढ़ कर बोल रहा है. अपनी फोटो, अपनी दिनचर्या, अपनी खुशी अपना गम, सब कुछ इस आभासी दुनिया में शेयर करते हैं. यहां तक कि सच्चे दोस्त और हमसफर की तलाश भी इसी आभासी दुनिया की भीड़ में हो  रही है.

शैली भी फेसबुक पर अपने लिए हमसफर की तलाश कर रही थी. इसी तलाश में उस की दोस्ती राजकुमार उर्फ राज वर्मा से हुई, जिस ने फेसबुक पर अपनी आईडी राज वर्मा नाम से बना रखी थी.

दोस्ती हुई तो उन के बीच बातें होने लगीं. बातों ही बातों में पता चला कि राजकुमार शैली से करीब 14 साल छोटा है. फिर भी उन के बीच दोस्ती बरकरार रही, जो धीरेधीरे प्यार का रूप ले रही थी. शैली को भी पति की मौत के बाद एक सहारे की जरूरत थी. राजकुमार काफी स्मार्ट था और व्यवहार व बातें करने में भी काफी अच्छा था.

समय के साथ दोनों काफी नजदीक आने लगे, एकदूसरे से रूबरू मिलने की इच्छा हुई तो बात कर के मिलने को तैयार हो गए.

शैली हरियाणा के करनाल शहर की थी, राजकुमार भी करनाल का था. लेकिन वह गुड़गांव में प्राइवेट जौब कर रहा था. कहां मिलना है, कितने बजे मिलना है, यह सब उन दोनों ने तय कर लिया था.

फिर निश्चित तिथि पर शाम 6 बजे करनाल के एक पार्क में शैली पहुंच गई. शैली वहां जिस राज वर्मा नाम के युवक से मिलने आई थी, उसे पहले उस ने कभी नहीं देखा था. फेसबुक पर दोनों ने एकदूसरे के फोटो देखे थे, वीडियो कालिंग भी उन में होती थी. इसी के आधार पर दोनों को यकीन था कि सैकड़ों की भीड़ में वे अपने दिलबर को पहचान लेंगे.

शैली पार्क में होने वाली भीड़ से थोड़ा अलग खड़ी हो गई. वहां खड़े हो कर वह राज वर्मा की तलाश में चारों ओर नजरें दौड़ाने लगी. तभी एक युवक अचानक उस के सामने आ खड़ा हुआ, ‘‘हैलो शैली!’’

शैली ने चौंक कर उसे देखा. मन में बसी हुई राज वर्मा की तसवीर से उस के चेहरे का मिलान किया तो सुखद आश्चर्य से चीख पड़ी, ‘‘राज, तुम.’’

‘‘हां मैं,’’ राज वर्मा मुसकराया,‘‘शैली, मैं कहता था न कि मैं सैकड़ों में भी तुम्हें पहचान लूंगा. देखो पहचान लिया न.’’

‘‘हां, मैं भी तो तुम्हें पहचान गई,’’ राज से मिलने का उत्साह और उल्लास शैली के चेहरे से छलक रहा था, ‘‘तुम तो समय से पहले आ गए.’’

‘‘तुम भी तो आधे घंटा पहले आई हो.’’

‘‘दिल जिसे चाहता हो, पहली बार उस से रूबरू मिलने का जोश ही अलग होता है.’’ शैली बोली.

‘‘शैली, सही कहा तुम ने,’’ राज की मुसकान खिली, ‘‘समय पास करना मुश्किल हो रहा था. एकएक लम्हा सदियों की तरह बीत रहा था. इसीलिए मैं 40 मिनट पहले ही पार्क में आ गया.’’

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya: सेक्स रैकेट और बॉलीवुड हसीनाएं

‘‘इसी को कहते हैं दोनों तरफ बराबर आग लगी होना,’’ शैली हंसती हुई बोली, ‘‘हम कब तक यहां खड़े हो कर बात करेंगे. चलो, कहीं सुकून से बैठ कर बातें करें.’’

‘‘मैं जानता था कि जब हम पहली बार मिलेंगे तो बातें खत्म होने का नाम नहीं लेंगी. किसी तरह का डिस्टरबेंस भी हमें मंजूर नहीं होगा.’’ राज चहक कर बोला, ‘‘इसीलिए मैं ने ऐसी जगह का बंदोबस्त कर लिया है, जहां बेफिक्र हो कर बातें करें.’’

‘‘राज, यह काम तुम ने बहुत सही किया,’’ शैली ने खुशी जाहिर की.

राजकुमार के कदम बढ़े तो शैली भी उस के साथ कदम मिलाने लगी.

एक के बाद एक परेशानियों ने घेरा शैली को हरियाणा के करनाल जिले के गांव असम की रहने वाली थी शैली. शैली सुशिक्षित व संस्कारी युवती थी. शैली के पिता का नाम खैरातीलाल बल्ला और मां का नाम उषा रानी था. शैली के पिता खैरातीलाल का बैटरियां बेचने का कामधंधा था. उन का यह काम बहुत अच्छा चलता था. जिस वजह से वह आर्थिक रूप से काफी सुदृढ़ थे.

शैली की एक बहन मोनिका और एक भाई करन था. करन जब 13 साल का था, तभी पेट का संक्रमण होने के कारण उस की मृत्यु हो गई थी. वर्ष 1997 में शैली का विवाह दिल्ली निवासी अनिल वर्मा से कर दिया. कालांतर में शैली ने एक बेटी को जन्म दिया, जिस का नाम उन्होंने तान्या रखा.

समय का पहिया घूमता रहा. एक समय वह आया जब अनिल को अपने बिजनैस में काफी घाटा हुआ तो वह परेशान हो गया. वह तनाव में रहने लगा. शैली भी पति को परेशान देख कर दुखी रहने लगी. शैली ने अपने पिता को बात बताई तो उन्होंने दोनों को अपने पास आ कर रहने को कहा.

शैली ने अपने पति अनिल से बात की तो मजबूर अनिल को अपनी ससुराल में रहने के लिए हां कहना पड़ा. शैली पति अनिल और बेटी तान्या के साथ अपने पिता के घर शिफ्ट हो गई.

खैरातीलाल ने दामाद अनिल को अपने बैटरी के बिजनैस में जोड़ लिया. वैसे भी उन का एक ही बेटा था, जोकि अब इस दुनिया में नहीं था. दामाद भी एक तरह से बेटा ही होता है, यही सोच कर खैरातीलाल ने यह कदम उठाया था.

एक बार फिर से शैली की जिंदगी में सब अच्छा चलने लगा. साल दर साल गुजरने लगे. फिर अचानक समय ने अपना रुख बदला. 2014 में शैली की मां का देहांत हो गया. मां की मौत से वह उबर पाती कि 2016 में पति अनिल की भी बीमारी के कारण मौत हो गई.

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya- पाक का नया पैंतरा: भाग 1

शैली की राज से बनीं नजदीकियां

पति के बिना जिंदगी गुजारना बहुत कठिन होता है. शैली के आगे अभी पूरी जिंदगी पड़ी थी और उस के सिर पर बेटी तान्या की भी जिम्मेदारी थी. ऐसे में शैली ने दूसरी शादी करने का फैसला कर लिया. उस ने तमाम माध्यमों से अपने नए हमसफर की तलाश करनी शुरू कर दी.

शैली ने फेसबुक पर अपना एकाउंट बना रखा था. फेसबुक पर वह रोज नए लोगों से मिलती, उन की फ्रैंड रिक्वेस्ट को स्वीकार करती. इन में से ही एक युवक था राजकुमार वर्मा उर्फ राज.

राज करनाल के गांव निगदू का निवासी था. उस के परिवार में मातापिता और एक भाई व 3 बहनें थीं. राज की उम्र शैली से करीब 14 साल कम थी. फेसबुक पर शैली के मित्रों की सूची में उस ने भी जगह बना ली.

राज शैली के मित्रों की सूची में जुड़ने वाला सिर्फ एक नाम बन कर नहीं जुड़ने आया था, वह तो शैली के दिल तक अपनी पहुंच बना कर उसे अपना बनाने आया था. उस ने शैली को मैसेज पर मैसेज करने शुरू कर दिए.

पहले तो वह जानपहचान बढ़ाने के उद्देश्य से शैली को मैसेज कर रहा था. शैली जब उस से मैसेंजर पर बातें करने लगी तो वह एक  सच्चा दोस्त बन कर उस से दोस्ती की बातें करने लगा. शैली को भी उस की बातों में मजा आता था.

अगले भाग में पढ़ें- शादी तक पहुंचा प्यार

Family Story in Hindi: विश्वास- भाग 2: क्या अंजलि अपनी बिखरती हुई गृहस्थी को समेट पाई?

अंजलि ने शिखा के गाल पर थप्पड़ मारने के लिए उठे अपने हाथ को बड़ी कठिनाई से रोका और गहरीगहरी सांसें ले कर अपने क्रोध को कम करने के प्रयास में लग गई. दूसरी तरफ तनी हुई शिखा आंखें फाड़ कर चुनौती भरे अंदाज में उसे घूरती रहीं.

कुछ सहज हो कर अंजलि ने उस से पूछा, ‘‘वंदना के घर मेरे जाने की खबर तुम्हें उन के घर के सामने रहने वाली रितु से मिलती है न?’’

‘‘हां, रितु मुझ से झूठ नहीं बोलती है,’’ शिखा ने एकएक शब्द पर जरूरत से ज्यादा जोर दिया.

‘‘यह अंदाजा उस ने या तुम ने किस आधार पर लगाया कि मैं वंदना की गैर- मौजूदगी में कमल से मिलने जाती हूं?’’

‘‘आप कल सुबह उन के घर गई थीं और परसों ही वंदना आंटी ने मेरे सामने कहा था कि वह अपनी बड़ी बहन को डाक्टर के यहां दिखाने जाएंगी, फिर आप उन के घर क्यों गईं?’’

‘‘ऐसा हुआ जरूर है, पर मुझे याद नहीं रहा था,’’ कुछ पल सोचने के बाद अंजलि ने गंभीर स्वर में जवाब दिया.

‘‘मुझे लगता है कि वह गंदा आदमी आप को फोन कर के अपने पास ऐसे मौकों पर बुलाता है और आप चली जाती हो.’’

‘‘शिखा, तुम्हें अपनी मम्मी के चरित्र पर यों कीचड़ उछालते हुए शर्म नहीं आ रही है,’’ अंजलि का अपमान के कारण चेहरा लाल हो उठा, ‘‘वंदना मेरी बहुत भरोसे की सहेली है. उस के साथ मैं कैसे विश्वासघात करूंगी? मेरे दिल में सिर्फ तुम्हारे पापा बसते हैं, और कोई नहीं.’’

ये भी पढ़ें- Romantic Story: अंधेरे से उजाले की ओर

‘‘तब आप उन के पास लौट क्यों नहीं चलती हो? क्यों कमल अंकल के भड़काने में आ रही हो?’’ शिखा ने चुभते लहजे में पूछा.

‘‘बेटी, तेरे पापा के और मेरे बीच में एक औरत के कारण गहरी अनबन चल रही है, उस समस्या के हल होते ही मैं उन के पास लौट जाऊंगी,’’ शिखा को यों स्पष्टीकरण देते हुए अंजलि ने खुद को शर्म के मारे जमीन मेें गड़ता महसूस किया.

‘‘मुझे यह सब बेकार के बहाने लगते हैं. आप कमल अंकल के कारण पापा के पास लौटना नहीं चाहती हो,’’ शिखा अपनी बात पर अड़ी रही.

‘‘तुम जबरदस्त गलतफहमी का शिकार हो, शिखा. वंदना और कमल मेरे शुभचिंतक हैं. उन दोनों का बहुत सहारा है मुझे. दोस्ती के पवित्र संबंध की सीमाएं तोड़ कर कुछ गलत न मैं कर रही हूं न कमल अंकल. मेरे कहे पर विश्वास कर बेटी,’’ अंजलि बहुत भावुक हो उठी.

‘‘मेरे मन की सुखशांति की खातिर आप अंकल से और जरूरी हो तो वंदना आंटी से भी अपने संबंध पूरी तरह तोड़ लो, मम्मी. मुझे डर है कि ऐसा न करने पर आप पापा से सदा के लिए दूर हो जाओगी,’’ शिखा ने आंखों में आंसू ला कर विनती की.

इस घटना के बाद मांबेटी के संबंधों में आया खिंचाव

‘‘तुम्हारे नासमझी भरे व्यवहार से मैं बहुत निराश हूं,’’ ऐसा कह कर अंजलि उठ कर अपने कमरे में चली आई.

इस घटना के बाद मांबेटी के संबंधों में बहुत खिंचाव आ गया. आपस में बातचीत बस, बेहद जरूरी बातों को ले कर होती. अपने दिल पर लगे घावों को दोनों नाराजगी भरी खामोशी के साथ एकदूसरे को दिखा रही थीं.

शिखा की चुप्पी व नाराजगी वंदना और कमल ने भी नोट की. अंजलि उन के किसी सवाल का जवाब नहीं दे सकी. वह कैसे कहती कि शिखा ने कमल और उस के बीच नाजायज संबंध होने का शक अपने मन में बिठा रखा था.

करीब 4 दिन बाद रात को शिखा ने मां के कमरे में आ कर अपने मन की बातें कहीं.

‘‘आप अंदाजा भी नहीं लगा सकतीं कि मेरी सहेली रितु ने अन्य सहेलियों को सब बातें बता कर मेरे लिए इज्जत से सिर उठा कर चलना ही मुश्किल कर दिया है. अपनी ये सब परेशानियां मैं आप के नहीं, तो किस के सामने रखूं?’’

मुझ से ज्यादा तुम्हें अपनी सहेली पर विश्वास क्यों है

‘‘मुझे तुम्हारी सहेलियों से नहीं सिर्फ तुम से मतलब है, शिखा,’’ अंजलि ने शुष्क स्वर में जवाब दिया, ‘‘तुम ने मुझे चरित्रहीन क्यों मान लिया? मुझ से ज्यादा तुम्हें अपनी सहेली पर विश्वास क्यों है?’’

‘‘मम्मी, बात विश्वास करने या न करने की नहीं है. हमें समाज में मानसम्मान से रहना है तो लोगों को ऊटपटांग बातें करने का मसाला नहीं दिया जा सकता.’’

ये भी पढ़ें- Romantic Story in Hindi- तेरा मेरा साथ

‘‘तब क्या दूसरों को खुश करने के लिए तुम अपनी मां को चरित्रहीन करार दे दोगी? उन की झूठी बातों पर विश्वास कर के अपनी मां को उस की सब से प्यारी सहेली से दूर करने की जिद पकड़ोगी?’’

‘‘मुझ पर क्या गुजर रही है, इस की आप को भी कहां चिंता है, मम्मी,’’ शिखा चिढ़ कर गुस्सा हो उठी, ‘‘मैं आप की सहेली नहीं बल्कि सहेली के चालाक पति से आप को दूर देखना चाहती हूं. अपनी बेटी की सुखशांति से ज्यादा क्या कमल अंकल के साथ जुडे़ रहना आप के लिए जरूरी है?’’

‘‘कमल अंकल मेरे लिए तुम से ज्यादा महत्त्वपूर्ण कैसे हो सकते हैं, शिखा? मुझे तो अफसोस और दुख इस बात का है कि मेरी बेटी को मुझ पर विश्वास नहीं रहा. मैं पूछती हूं कि तुम ही मुझ पर विश्वास क्यों नहीं कर रही हो?  अपनी सहेलियों की बकवास पर ध्यान न दे कर मेरा साथ क्यों नहीं दे रही हो? मेरे मन में खोट नहीं है, इस बात को मेरे कई बार दोहराने के बावजूद तुम ने उस पर विश्वास न कर के मेरे दिल को जितनी पीड़ा पहुंचाई है, क्या उस का तुम्हें अंदाजा है?’’ बोलते हुए अंजलि का चेहरा गुस्से से लाल हो गया.

‘‘यों चीखचिल्ला कर आप मुझे चुप नहीं कर सकोगी,’’ गुस्से से भरी शिखा उठ कर खड़ी हो गई, ‘‘चित भी मेरी और पट भी मेरी का चालाकी भरा खेल मेरे साथ न खेलो.’’

‘‘क्या मतलब?’’ अंजलि फौरन उलझन का शिकार बन गई.

‘‘मतलब यह कि पापा ने अपनी बिजनेस पार्टनर सीमा आंटी को ले कर आप को सफाई दे दी तब तो आप ने उन की एक नहीं सुनी और यहां भाग आईं, और जब मैं आप से कमल अंकल के साथ संबंध तोड़ लेने की मांग कर रही हूं तो किस आधार पर आप मुझे गलत और खुद को सही ठहरा रही हो?’’

Romantic Story- साहब: आखिर शादी के बाद दिपाली अपने पति को साहब जी क्यों कहती थी

साहब- भाग 1: आखिर शादी के बाद दिपाली अपने पति को साहब जी क्यों कहती थी

महरू कामवाली बाई थी. बहुत ही ईमानदार. कपड़े इतने सलीके से पहनती थी कि अगर पोंछा या झाड़ू लगाने के लिए झुके तो मजाल है शरीर का कोई नाजुक हिस्सा दिख जाए. वह कई घरों में काम करती थी. उम्र होगी तकरीबन 42 साल.

रमेश अकेले रहते थे. उन्होंने शादी नहीं की थी और न करने की इच्छा थी. पिछले 4 सालों में महरू रमेश के बारे में और वे महरू के बारे में बहुतकुछ जान चुके थे.

अनपढ़ महरू ने जाति के बाहर शादी की थी. उस का पति शादी के पहले तो ठीक था, पर बाद में शराब पीने की लत लग गई थी. उस ने काम करना छोड़ दिया था. दिनरात शराब में डूबा रहता.

इस बीच महरू के एक बेटी हो गई. घर चलाने के लिए महरू को काम करना पड़ा. उस ने लोगों के घरों में झाड़ूपोंछा लगाने और बरतन धोने का काम शुरू कर दिया. उसे जो मजदूरी मिलती थी, पति छीन कर शराब पी जाता था.

शराब के नशे में बहकते कदमों के चलते एक दिन महरू का पति सड़क हादसे में मारा गया. अब महरू को अपनी बेटी के लिए जीना था.

ये भी पढ़ें- Social Story- मेरा कुसूर क्या है

महरू जब रमेश के घर काम मांगने आई तो वे उस की सादगी से प्रभावित हुए थे. उन्होंने उस से साफ शब्दों में कहा था कि वे अकेले रहते हैं. घर पर कोई औरत नहीं है. खाना बाहर खाते हैं तो बरतन तो धोने के लिए निकलते नहीं. अब बचा झाड़ूपोंछा, चाहो तो कर सकती हो.

पहले महरू को कुछ डर हुआ, फिर पड़ोस की एक औरत ने उसे रमेश के अच्छे चरित्र के बारे में बताया. उसे काम की जरूरत भी थी. लिहाजा, वह काम करने को तैयार हो गई.

शुरूशुरू में जब महरू काम करने आती और रमेश उस के सामने पड़ते तो उस के चेहरे पर डर सा तैर जाता. अकेले होने की वजह से कुछ संकोच रमेश को भी होता और कभीकभार यह खयाल भी आता कि पता नहीं रुपएपैसे ऐंठने के चक्कर में महरू उन पर कौन सा आरोप लगा दे. महरू जिस कमरे में होती, रमेश दूसरे कमरे में चले जाते.

ये भी पढ़ें- Romantic Story- नवंबर का महीना: सोनाली किसी और की हो गई

आज होटल के भोजन में न जाने क्या था कि रमेश का सिर चकराने लगा. बुखार आ गया. उलटियां भी होने लगीं. वे रातभर बिस्तर पर पड़े रहे. घर के मैडिकल किट में बुखार और पेटदर्द की जो दवाएं थीं, वे खा चुके थे, लेकिन उन की हालत में कोई फर्क नहीं आया.

सुबह महरू ने जब दरवाजे की डोर बैल बजाई, तब रमेश ने बड़ी मुश्किल से दरवाजा खोला. महरू ने जब उन की हालत देखी तो वह घबरा गई. पूरा घर गंदा पड़ा था.

महरू ने सब से पहले गंदगी साफ की. रमेश के सिर पर हाथ रखा और देखा कि तेज बुखार था. उस ने अपने सस्ते से मोबाइल से फोन लगा कर अपनी बेटी को बुलाया.

जब तक महरू की बेटी वहां नहीं पहुंची, तब तक वह साफसफाई करती रही और रमेश को सुना कर बड़बड़ाती रही, ‘‘अकेले कब तक जिएंगे. कोई तो साथ चाहिए. शादी कर के घर बसा लेते तो एक देखभाल करने वाली होती. मैं नहीं आती तो पड़े रहते, पता भी नहीं चलता किसी को.’’

इस के बाद महरू ने रमेश को सहारा दे कर उठाया. उन के हाथमुंह धुलवाए. कपड़े बदलवाए और डाक्टर के पास ले जाने के लिए तैयार कर लिया.

तभी एक आटोरिकशा आ कर रुका. महरू की बेटी उस में से उतरी. बिलकुल फूल सी. गोरी दूध सी.

उम्र 15-16 साल.

महरू ने उस से कहा, ‘‘तू यहीं रहना. मैं आती हूं साहब को डाक्टर से दिखा कर.’’

‘‘क्या हो गया?’’ रमेश की हालत देख कर बेटी ने अपनी मां से पूछा.

‘‘कुछ नहीं. अभी आती हूं. तू घर देखना,’’ महरू ने कुछ तेज आवाज में कहा. फिर बेटी ने कुछ न पूछा.

महरू ने रमेश को सहारा दे कर आटोरिकशा में बिठाया और डाक्टर के पास ले गई. इलाज करवाया. घर वापस लाई. जब तक वे ठीक नहीं हुए तब तक वह उन की देखरेख करती रही. वह अपने घर से दलिया बना कर लाती. समय से दवा देती.

अब महरू रमेश के लिए महज औरत शरीर न रही और न रमेश उस के लिए मर्द शरीर. यह फर्क मिट चुका था. संकोच खत्म हो चुका था. अब वे दोनों एकदूसरे के लिए इनसान थे, मर्दऔरत होने से पहले. भरोसा था एकदूसरे पर.

Family Story in Hindi- अपना अपना रास्ता: भाग 3

उन्होंने समझ लिया था कि उन का और इंद्रा का निबाह होना कठिन था. इंद्रा की बड़ीबड़ी महत्त्वाकांक्षाएं थीं, ऊंचेऊंचे सपने थे, जो उन के छोटे से घर की दीवारों से टकरा कर चूरचूर हो गए थे.

उन का छोटा सा घर, छोटा सा ओहदा, छोटीछोटी इच्छाएं और आवश्यकताएं, कोई भी चीज इंद्रा को पसंद नहीं आई थी. दिनदिनभर पड़ोसिनों के साथ फिल्में देखना और मौल्स के चक्कर लगाना अथवा किसी के घर में किट्टी पार्टियों के साथ नएनए फैशन की साडि़यों व गहनों की चर्चा करना, यही थी उस की कुछ चिरसंचित अभिलाषाएं जो मातापिता के कठोर नियंत्रण से मुक्त हो कर अब स्वच्छंद आकाश में पंख पसार कर उड़ना चाहती थीं.

दिनभर के थकेहारे सुरेंद्र घर लौट कर आते तो दरवाजे पर झूलते ताले को देख उन का तनमन सुलग उठता. ‘क्या तुम अपना घूमनाफिरना 5 बजे तक नहीं निबटा सकतीं, इंद्रा?’

‘ओहो, कौन सा आसमान टूट पड़ा, जो जरा सी देर इंतजार करना पड़ गया. ताश की बाजी चल रही थी, कैसे बीच से उठ कर आ जाती, बोलो?’ उस का स्वर सुरेंद्र को आरपार चीरता चला जाता. ‘खुद तो दिनभर दोस्तों के साथ मटरगश्ती करते फिरते हैं, मैं कहीं जाऊं तो जवाबतलबी होती है.’

‘नहीं, इंद्रा, मुझे गलत मत समझो. मेरी तरफ से तुम्हें पूरी आजादी है. कहीं जाओ, कहीं घूमो. बस, मेरे आने तक घर लौट आया करो. तुम्हारी खिलीखिली सी मुसकान मेरी दिनभर की थकान हर लेती है.’

सुरेंद्र पत्नी की जिह्वा का हलाहल कंठ में उतार वाणी में मिठास सी घोल देते.

‘ओफ, इच्छाएं तो देखो, मीठीमीठी मुसकान चाहिए इन्हें. करते हैं क्लर्की और ख्वाब देखते हैं महलों के?हुंह, ऐसी ही पलकपांवड़े बिछाने वाली का शौक था तो ले आए होते कोई देहातिन. मेरी जिंदगी क्यों बरबाद की?’

इंद्रा का तीखा स्वर सुरेंद्र के कानों में लावा सा पिघलाता उतर जाता. अंदर ही अंदर तिलमिला कर वे जबान पर नियंत्रण कर लेते. जितना बोलेंगे, बात बढ़ेगी, अड़ोसीपड़ोसी तमाशा देखेंगे. अभी नईनई शादी हुई है, और अभी से…

ये भी पढ़ें- Romantic Story: अंधेरे से उजाले की ओर

चुपचाप कपड़े बदल कर वे बिस्तर पर पड़ जाते. वे सोचते, ‘क्या विवाह का यही अर्थ है? दिनभर के बाद घर आओ तो पत्नी नदारद. फिर ऊपर से जलीकटी सुनो? क्या शिक्षा का यही अर्थ है कि पति को हर क्षण नीचा दिखाया जाए?’

कैसे खिंचेगी जीवन की यह गाड़ी, जहां पगपग पर आलोचना और अपमान की बड़ीबड़ी शिलाएं हैं. कहां तक ठेल सकेंगे अकेले इस गाड़ी को, जहां दूसरा पहिया साथ देने से ही इनकार कर दे? क्या इन कठोर शिलाखंडों से टकरा कर एक दिन सबकुछ अस्तव्यस्त नहीं हो जाएगा?

जीवन को हतोत्साहित करने वाले इन निराशावादी विचारों को धकेलते हुए मन में आशा की किरण भी झिलमिला जाती कि अभी इंद्रा ने जीवन में देखा ही क्या है? सिर्फ मातापिता का स्नेह, बहनभाइयों का प्यारदुलार. गृहस्थी की जिम्मेदारियां बढ़ेंगी तो स्वयं रास्ते पर आ जाएगी. अभी नादान है. 20-22 की भी कोई आयु होती है.

लेकिन इंद्रा ने तो जैसे पति की हर झिलमिलाती आशा को पांवों तले रौंद कर चूरचूर कर देने का फैसला कर लिया था. 2-2 वर्षों के अंतराल से विनोद, प्रमोद और अचला आते गए. उन के साथ आई उन की नन्हींनन्हीं समस्याएं, उन के नाजुककोमल बंधन, उन के नन्हेनन्हे सुखदुख.

लेकिन इंद्रा को उन के वे भोलेभाले चेहरे, उन की मीठीतुतली वाणी, उन के स्नेहसिक्तकोमल बंधन भी बांध कर न रख सके. नौकरों के सहारे बच्चे छोड़ वह अपने महिला क्लब की गतिविधियों में दिनबदिन उलझती चली गई. वक्तबेवक्त आंधी की तरह घर में आती और तूफान की तरह निकल जाती.

हर दिन एक नया आयोजन, जहां पति और बच्चों का कोई अस्तित्व नहीं था. कोई आवश्यकता भी नहीं थी. शायद इंद्रा गृहस्थी के संकुचित दायरे में बंध कर जीने के लिए बनी ही नहीं थी. उस का अपना अस्तित्व था. अपना रास्ता था. जहां मान था, आदर था, यश और प्रशंसा की फूलमालाएं थीं. जहां से उसे वापस लौटा लाने का हर प्रयत्न सुरेंद्र को पहले से और अधिक तोड़ता चला गया था.

जबजब वे उसे गृहस्थी के दायित्वों के प्रति सजग रहने की सलाह देते, वह कु्रद्ध बाघिन सी भन्ना उठती, ‘तुम चाहते क्या हो? क्या मैं दिनभर अनपढ़गंवार औरतों की तरह बच्चों और चूल्हेचौके में सिर खपाया करूं? क्या मांबाप ने मुझे इसलिए कालेज में पढ़ाया था?’

‘नहीं तो क्या इसलिए पढ़ाया था कि अपनी जिम्मेदारियां नौकरों और पड़ोसियों पर छोड़ कर तुम दिनदिनभर सड़कों की धूल फांकती फिरो. जानती हो तुम्हारा यह घूमनाफिरना, यह सोशल लाइफ इन नन्हेनन्हे बच्चों का भविष्य बरबाद कर रहा है, इन्हें असभ्य और लावारिस बना रहा है. अनाथाश्रम में जा करतुम उन बिन मांबाप के बच्चों को सभ्य और सुशिक्षित बनाने की शिक्षा दिया करती हो, पर यह क्यों नहीं सोचतीं कि तुम्हारी अनुपस्थिति में तुम्हारे इन 3 बच्चों का क्या होगा?

ये भी पढ़ें- Romantic Story in Hindi- तेरा मेरा साथ

‘जानती हो, इंदु, भूख लगने पर इन्हें क्या मिलता है? नौकरों की झिड़कियां, थप्पड़. बीमारी में तुम्हारे स्नेहभरे संरक्षण की जगह मिलती है उपेक्षा, अवहेलना, तिरस्कार. सच, इंदु, क्या तुम्हें इन अनाथों पर तनिक भी दया नहीं आती?’

किंतु इंद्रा पर सुरेंद्र के इन तमाम उपदेशों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता था.

पत्नी से उपेक्षित सुरेंद्र देरदेर तक दफ्तर में बैठे कंप्यूटर में दिमाग खपाया करते. पर वहां का वातावरण भी धीरेधीरे असहनीय होने लगा. आतेजाते फब्तियां कसी जातीं, ‘अरे भई, इस बार तरक्की मिलेगी तो मिस्टर सुरेंद्र को. पत्नी शहर की प्रसिद्ध समाजसेविका, बड़ेबड़े लोगों के साथ उठनाबैठना, अच्छेअच्छे आदमियों का पटरा बैठ जाएगा, देख लेना.’

Satyakatha- कहानी खूनी प्यार की: भाग 2

सौजन्य- सत्यकथा

यह सुन कर उस ने डरतेडरते कहा, ‘‘सर, लगभग एक महीने से एक लूडो गेम में खेलते हुए कृष्णा से मेरा परिचय हुआ था. इस के बाद हमारी अकसर मोबाइल पर ही बात होती थी. मैं कभी उस से आमनेसामने नहीं मिला हूं. मगर हां, बीती रात उस का यह मैसेज आया था.’’ कह कर उस ने अपना मोबाइल अविनाश सिंह के समक्ष रख दिया.

थानाप्रभारी अविनाश सिंह ने देखा, मैसेज जैसा संजय चौहान के मोबाइल में था, ठीक वैसा ही नेवेंद्र के मोबाइल में भी आया था. सब कुछ साफ था. अब तो अविनाश सिंह के सामने पूरा चित्र स्पष्ट था कि हत्या औनर किलिंग में दिगपाल और उस के बेटे ने ही की है.

उन्होंने नेवेंद्र का पूरा बयान रिकौर्ड किया. उच्च अधिकारियों को सारी जानकारी से अवगत कराते हुए बताया कि मामला लगभग स्पष्ट हो चुका है हत्या बाप और बेटे ने ही की है.

दिगपाल और राजेश को कृष्णा कुमारी के हत्या के आरोप में पुलिस न्यायालय में पेश करने की तैयारी कर रही थी कि इस बीच अविनाश सिंह के दिमाग में एक आइडिया कौंध गया.

उन्होंने दिगपाल और राजेश को फिर से अपने कक्ष में बुलाया और सामने बैठा कर के पानी और चाय पिलवाई और फिर धीरे से कहा, ‘‘देखो दिगपाल, तुम जिन परिस्थितियों में थे, वैसे में कोई भी बेटी की करतूत को बरदाश्त नहीं कर सकता. मैं जानता हूं, गलती तुम से हो गई है. यह मैं भलीभांति समझ रहा हूं. अच्छा है कि पुलिस को सहयोग करो और सारी परिस्थितियों को हमारे सामने साझा करो, ताकि मैं तुम्हारी ज्यादा से ज्यादा मदद कर सकूं.’’

यह एक पुलिसिया पासा था. मगर इस के बाद भी दिगपाल ने भीगी पलकों से कहा, ‘‘साहब, मैं अपनी बेटियों की कसम खा कर कहता हूं कि मैं ने कृष्णा को नहीं मारा है. अगर यह काम मुझ से हुआ होता तो मैं अवश्य आप को बता देता.’’

कृष्णा कुमारी के भाई राजेश से भी अलग से पूछताछ की गई. उस ने भी साफसाफ यही कहा कि उस ने कृष्णा को नहीं मारा है. अब अविनाश सिंह के सामने एक ऐसा मोड़ था, जहां से रास्ता दिखाई नहीं दे रहा था.

उन्हें बापबेटे की बातों में सच्चाई का एहसास हो रहा था. मगर लाख टके का सवाल यह था कि आखिर जब इन लोगों ने हत्या नहीं की तो फिर हत्यारा कौन है?

ये भी पढ़ें- Satyakatha- जब इश्क बना जुनून: भाग 1

कृष्णा की हत्या में सारे साक्ष्य साफ कह रहे थे कि हत्या पिता और पुत्र ने ही की है. वह कुछ समय तक अपने कक्ष में सिर पर हाथ रख कर आंख मूंद कर बैठ गए और सोचते रहे कि आखिर क्या हो सकता है, आखिर कृष्णा की हत्या कौन कर सकता है?

जांच अधिकारी के दिमाग में अब एक ही संदिग्ध सामने था और वह था कृष्णा का प्रेमी संजय चौहान. अगर कोई हत्या कर सकता था तो वह संजय हो सकता था.

मगर उस के खिलाफ कोई भी सबूत पुलिस के पास नहीं था. इस के बावजूद संजय चौहान को उन्होंने तलब किया और उस से एक बार फिर पूछताछ शुरू की गई.

23 वर्षीय संजय चौहान ने बताया कि लगभग 8 साल से उस के कृष्णा के साथ शारीरिक संबंध हैं. लेकिन अलगअलग जाति के होने के कारण उन का विवाह नहीं हो पाया था.

मगर जल्द ही वे आर्यसमाज मंदिर, बिलासपुर में विवाह भी करने वाले थे. उस ने जोर दे कर यह भी कहा कि हमारे विवाह में सब से बड़ी बाधा कृष्णा के पिता दिगपाल वैष्णव थे, जो उस का विवाह कहीं दूसरी जगह करने के लिए अकसर कृष्णा पर दबाव डालते थे, उस से झगड़ा करते थे.

पुलिस के सामने एक बार फिर यह तथ्य भी सामने आ गए कि हत्या दिगपाल और उस के भाई राजेश ने ही की है.

अविनाश सिंह के समक्ष दिगपाल का मासूम चेहरा घूम रहा था, जो बड़े ही दुख के साथ यह कह रहा था कि उस ने हत्या नहीं की है. अविनाश सिंह ने अंतिम जांच प्रक्रिया के तहत मनोवैज्ञानिक तरीके से संजय चौहान से पूछताछ करने का निर्णय किया और 3 अलगअलग अधीनस्थ अधिकारियों को कहा कि इस से थोड़ीथोड़ी देर में मिलना है और इस के बयान लेना है. हमें देखना है यह बयान में क्या कहता है.

संजय चौहान ने एक एसआई से जांच के दौरान कहा, ‘‘कृष्णा और उस का बहुत पुराना प्रेम संबंध है.’’

एसआई ने जब उस से पूछा कि उस ने घटना के दिन अपना फोन बंद क्यों रखा था. इस के जवाब में उस ने कहा, ‘‘सर, मेरी उस रात तबीयत ठीक नहीं थी.’’

ये भी पढ़ें- Satyakatha: 4 करोड़ की चोरी का राज

एक एएसआई से जब संजय का अलग से सामना हुआ तो बातोंबातों में उस ने कहा, ‘‘साहब, उस दिन मोबाइल की बैटरी लो हो गई थी. इसलिए मोबाइल बंद हो गया था.’’

जबकि तीसरे अधिकारी को उस ने अपने बयान में कहा, ‘‘सर, मोहल्ले में झगड़ा होने के कारण मैं ने अपना मोबाइल बंद कर दिया था.’’

तीनों अधिकारियों ने संजय के तीनों अलगअलग बयानों के बारे में बताया तो वह खुशी से उछल पड़े और बोले कि अब बहुत कुछ स्पष्ट हो चुका है. कृष्णा की हत्या किसी और ने नहीं, बल्कि संजय ने ही की है.

ये भी पढ़ें- Satyakatha: मकान में दफन 3 लाशें

उन्होंने संजय को बुला कर बातचीत की तो उन्होंने यह नोट किया कि बात करते समय वह उन से आंखें चुरा लेता. जांच अधिकारी अविनाश सिंह ने उस से पूछा, ‘‘मैं ने गौर किया कि जब तुम सुबह घटनास्थल पर आए थे तो तुम्हारी आंखें लाल थीं. इस का क्या कारण है?’’

इस पर संजय ने कहा, ‘‘साहब मेरी तबीयत ठीक नहीं थी. रात को मैं सो भी नहीं पाया था.’’

अगले भाग में पढ़ें-  सीरियल देख कर उस ने प्रेमिका कृष्णा की हत्या कर पिता को फंसाने की योजना बनाई

यह कैसा प्यार- भाग 2

‘अंकल, आप कैसी बातें कर रहे हैं? आप की इज्जत मेरी इज्जत. रमा मेरी पत्नी बने, मेरे लिए गर्व की बात होगी.’’

विजय की बात सुन कर रमा के मन में फिर से एक बार कंपन हुई. इस कंपन में प्यार के साथ सम्मान भी था और आभार भी. विजय ने अपने घर में दोटूक उत्तर दिया, ‘‘मैं रमा से ही शादी करूंगा. यह मेरा पहला और आखिरी फैसला है. आप मना करेंगे तो भी मैं शादी करूंगा, चाहे कोर्ट में ही क्यों न करनी पडे़?’’

विजय के परिवार के लोग भी सहमत हो गए. शादी की तैयारियां शुरू हो गईं. रमा खुश थी, बहुत खुश. उसे बचपन से जवानी तक देखाभला युवक पति के रूप में मिल रहा था. रही विजय के बेरोजगार होने की बात, तो रमा के पिता ने स्पष्ट कह दिया कि ऐसे नेक लड़के के रोजगार लगने की प्रतीक्षा की जा सकती है. यदि नौकरी नहीं मिली तो अपनी जमा पूंजी से विजय के लिए रोजगार की व्यवस्था मैं करूंगा.

रमा के मोबाइल की रिंगटोन बजी. रमा ने मोबाइल उठा कर पूछा ‘‘हैलो कौन?’’

‘‘आप का शुभचिंतक.’’

‘‘नाम बताइए.’’

‘‘मैं बंगाली बाबा. आप को वशीभूत करने के लिए एक व्यक्ति ने मुझे रुपए दिए थे. यदि आप नाम जानना चाहें तो 10 हजार रुपए मेरे अकाउंट में जमा करवा दीजिए.’’

‘‘मुझे नहीं जानना.’’

‘‘हो सकता है जो तंत्रमंत्र के द्वारा आप का वशीकरण चाहता हो, कल आप को दूसरे तरीके से भी नुकसान पहुंचा दे.’’

‘‘कौन है वह?’’

‘‘पहले अकाउंट में रुपए.’’

‘‘आप सच कह रहे हैं, इस का क्या सुबूत है?’’

‘‘मेरे पास आप का फोटो, घर का पता, मातापिता का नाम, सारी जानकारी है आप की.’’

रमा का माथा ठनका. पिछले दिनों जो कुछ उस के साथ हुआ कहीं ये सब उसी व्यक्ति का कियाधरा तो नहीं है. रमा ने उस के अकाउंट में रुपए जमा करवा कर नाम पूछा. नाम सुन कर रमा भौचक्की रह गई. रमा सीधे पुलिसस्टेशन पहुंची. थाना इंचार्ज सीमा तिवारी से मिली. अपनी बदनामी और उन पत्रों की जानकारी दे कर बाबा द्वारा बताया गया नाम भी बताया.

ये भी पढ़ें- गांठ खुल गई: भाग 1

‘‘आप चिंता मत करिए. मैं बारीकी से जांच कर के अपराधी को कड़ी से कड़ी सजा दिलवाऊंगी.’’

पुलिस ने अपनी जांच शुरू की. रमा की शादी जिस लड़के से होने वाली थी उस लड़के और उस के परिवार वालों को थाने बुला कर पूछताछ की. लड़के को जिस नंबर से फोन पर जान से मारने की धमकी मिली थी, उस नंबर की जांच के साथ उन तमाम पत्रों की भी जांच की गई जो रमा के विरुद्ध महल्ले, कालेज में और लड़के वालों के घर भेजे गए थे. जांच का परिणाम यह निकला कि सबकुछ विजय द्वारा किया गया था. पुलिस की थर्ड डिगरी के आरंभिक दौर में ही विजय ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया. रमा ने गुस्से में आ कर कई थप्पड़ विजय को जड़ दिए.

‘‘क्यों किया तुम ने ऐसा?’’

‘‘मैं तुम से प्यार करता हूं. तुम्हें पाने के लिए, तुम से शादी करने के लिए किया सब.’’

‘‘शर्म आनी चाहिए तुम्हें. जिस से प्यार करते हो उसी को सारे शहर में बदनाम कर दिया. यह कैसा प्यार है? यह प्यार है तो नफरत किसे कहते हो? कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं छोड़ा. मैं तुम्हें अपना दोस्त समझती रही. तुम पर भरोसा करती रही और तुम ने भरोसा तोड़ा, मेरी शादी तुड़वाई. गिर चुके हो तुम मेरी नजरों से. मैं चाहूं तो जेल भिजवा सकती हूं अभी लेकिन फिर तुम्हारी बहन की शादी कैसे होगी? तुम्हारे मातापिता कैसे जी पाएंगे?’’

रमा ने थाना प्रभारी सीमा तिवारी से निवेदन किया, ‘‘मैडम, आप का बहुतबहुत धन्यवाद. मैं इस व्यक्ति के खिलाफ कोई कानूनी कार्यवाही नहीं करना चाहती. इसे क्षमा करना ही इस की सब से बड़ी सजा होगी.’’

विजय नजरें झुकाएं हवालात में खड़ा था. रमा की डांट से, थप्पड़ से वह अंदर ही अंदर टूट चुका था. रमा थाने के बाहर आई. सामने शादी तोड़ने वाला परिवार खड़ा था. रमा से माफी मांग कर लड़के ने कहा, ‘‘दूसरे के बहकावे में आ कर मैं ने बहुत बड़ी गलती कर दी. मैं शादी करने को तैयार हूं.’’

‘‘लेकिन मैं तैयार नहीं हूं. किसी के बहकावे में आ कर शादी तोड़ने वालों पर विश्वास नहीं कर सकती. शादी के बाद यदि यही बातें तुम तक पहुंचतीं तब क्या करते, तलाक दे देते? विवाह के लिए भरोसा जरूरी है. पहले विश्वास करना सीखिए.’’

रमा ने अपनी स्कूटी उठाई और घर की ओर चल दी. धीरेधीरे यह बात सब जगह पहुंच गई कि रमा को बदनाम करने में विजय का हाथ था. वह तो रमा भली लड़की है जिस ने विजय के परिवार को ध्यान में रख कर उस पर कोई केस नहीं किया.

ये भी पढ़ें- हास्य कहानी: पत्र बम!

रमा अब सरकारी नौकरी करती है. इसी शहर में उस का विवाह हो चुका है एक डाक्टर से. रमा के 2 बच्चे हैं. वह खुशहाल भरापूरा जीवन जी रही है. पुलिस थाने से निकलने के बाद विजय न घर आया न किसी ने उसे देखा. विजय की गुमशुदगी की रिपोर्ट थाने में दर्ज है.

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें