मेरा कुसूर क्या है: भाग 1

लेखक- एस भाग्यम शर्मा

मेरा नाम आकांक्षा है. अब बड़ी होने के बाद अकसर सोचती हूं कि मेरा यह नाम क्यों पड़ा.

सभी कहते थे कि तुम्हारा नाम बहुत प्यारा है. मम्मी कहती थीं, ‘मैं ने तो पंडितजी से पूछा था. उन्होंने कहा था कि इस का नाम आकांक्षा रखना ताकि इस लड़की की सारी इच्छाएं पूरी हों.’

सारी इच्छाएं तो जाने दें, यहां तो जरूरी इच्छाएं भी पूरी नहीं हुईं. आप सोच रहे होंगे कि यह मैं कैसी पहेली बु झा रही हूं.  मगर यह पहेली नहीं, मेरी जिंदगी का सत्य है.

मेरे मम्मीपापा पढ़ेलिखे और नौकरी करने वाले थे. मेरी मां एमए पास थीं. उन्होंने मुझे इंग्लिश मीडियम स्कूल में पढ़ाया. आजकल तो गलीगली में इंग्लिश मीडियम के स्कूल हैं. उस समय तो एक ही स्कूल था. जानेमाने स्कूल में मेरा दाखिला करवाया था. मम्मीपापा दोनों ही बड़े खुले विचारों व आधुनिक सोच वाले थे.

मैं पढ़ने में तेज और औलराउंडर थी. पढ़ने के साथ ऐक्ंिटग व संगीत में भी मैं माहिर थी. मम्मी को गाने का बहुत शौक था, इसलिए उन्होंने स्कूल के बाद गायन क्लास में भी ऐडमिशन दिलवाया.

पापा मेरी किसी भी बात को मना नहीं करते थे. उन से मैं ने बहुतकुछ सीखा. तब स्कूल के सभी प्रोग्राम्स में मैं भाग लेती थी. क्या नाटक, क्या वादविवाद प्रतियोगिता और क्या गानाबजाना, सभी में मैं ने पुरस्कार प्राप्त किए थे. मैं टीचर्स की फेवरेट स्टूडैंट्स में से थी.

स्कूल के बाद मैं कालेज में आई. मैं ने नाटकों और लगभग सभी ऐक्टिविटीज में भाग लिया. कालेज के शिक्षकों ने भी मु झे बहुत प्रोत्साहित किया.

मेरी मम्मी आकाशवाणी में प्रोग्राम देती थीं. मैं भी उन के साथ बच्चों के प्रोग्राम में भाग लेती थी. बड़ी होने पर वहां पर मु झे दूसरे प्रोग्राम में लेने लगे. मैं कंपेयरिंग करने लगी.

थोड़े दिनों बाद तो जयपुर शहर में दूरदर्शन भी खुल गया था. मु झे वहां भी जाने का अवसर प्राप्त हुआ. आकाशवाणी में न्यूजरीडर और ड्रामा विभाग में मेरा सलैक्शन हो गया था.

मैं ने पढ़ाई के साथसाथ दूरदर्शन में न्यूजरीडर और ड्रामा आर्टिस्ट के लिए इंटरव्यू दिया. दोनों ही में मेरा सलैक्शन हो गया. मम्मीपापा बड़े खुश हुए. मैं तो खुश  थी ही क्योंकि मेरी मनोकामनाएं जो पूरी हो गई थीं.

सब ठीकठाक चल रहा था. मम्मी को मेरी शादी की चिंता होने लगी. इसी समय मेरे पापा का ऐक्सिडैंट हो गया. उन को आंखों से कम दिखाई देने लगा. जब मोतियाबिंद का औपरेशन कराया तो वह बिगड़ गया. पापा डिप्रैशन में आ गए थे. सो, उन का बाहर आनाजाना कम हो गया.

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अब तो मम्मी को मेरी बहुत चिंता सताने लगी कि बेटी की शादी कैसे होगी? जैसे ही मेरे एमए प्रीवियस का रिजल्ट आया और मैं अच्छे नंबरों से पास हो गई तो अब मेरी मम्मी ज्यादा ही शोर मचाने लगीं, ‘अभी से देखना शुरू करेंगे, तभी लड़का मिलेगा. ढूंढ़ने में भी 2 साल लगेंगे,’ ऐसा वे हरेक से कहती रहतीं.

पता नहीं पापा के डिप्रैशन से उन्हें भी डिप्रैशन हो गया, जिसे मैं पहचान नहीं पाई. मु झ में कोई कमी तो थी नहीं. शक्लसूरत भी मेरी अच्छी थी. पढ़ाई के साथ लगभग हर ऐक्टिविटी में भी आगे थी ही, इस के अलावा मम्मी ने मु झे घर के कामों में भी निपुण बना दिया था.

ननिहाल वालों ने एक लड़का बताया जो लैक्चरार था. पर उन की फैमिली बहुत बैकवर्ड थी. पापा उसे बड़े परेशान हो कर देखने गए. उन्हें बिलकुल पसंद नहीं आया.

मम्मी को यह बात अच्छी नहीं लगी. वे कहने लगीं, ‘शादी के बाद सब ठीक  हो जाएगा. कालेज में लैक्चरार है और  क्या चाहिए?’

वे कई दिनों तक नाराज रहीं.

पापा बोले, ‘लड़का इंग्लिश मीडियम का पढ़ा हुआ नहीं है, छोटीछोटी जगहों पर उस की पोस्ंिटग होगी. बेटी आकांक्षा को तकलीफ होगी.’

खैर, मेरे तक तो बात पहुंची नहीं, वहीं समाप्त हो गई. अब किसी ने मम्मी को बता दिया एक लड़का सरकारी कालेज में लैक्चरार है. पापामम्मी दोनों देखने गए. लड़का सचमुच अच्छा था, देखने में भी और योग्यता में भी, पर वे लोग बहुत ही पारंपरिक, अंधविश्वासी और पूजापाठ करने वाले थे. मेरे पापा तो आर्यसमाजी थे. उन को ये सब बातें पसंद नहीं आईं. पर मेरी मम्मी तो पीछे ही पड़ गईं. लड़का पढ़ालिखा है, बाहर जा कर तेज हो जाएगा. उदाहरण दे कर सम झाने लगीं.

पापा बोले, ‘ठीक है, शादी कर लेते हैं पर लड़की को एमए पास कर लेने दो.’

लड़के के पापा अड़ गए, ‘नहीं, एक महीने के अंदर ही शादी होगी. नहीं तो यह शादी नहीं होगी?’

पापा तो हरगिज तैयार नहीं थे. उन को लगा दाल में कुछ काला है, पर मम्मी तो पीछे पड़ गईं, ‘लड़के वाले हैं, उन की बात तो माननी ही पड़ेगी. वे कह रहे हैं कि हम उसे पढ़ने के लिए नहीं रोकेंगे, फिर क्या बात है.’

मु झे भी लड़का पसंद तो आया था पर घरपरिवार से मैं संतुष्ट नहीं थी. मम्मी ने अपने पीहर वालों को भी इस बारे में बताया. मामाजी और नानीजी भी आ गए.

लड़का देख कर मामाजी ने कहा, ‘यह तो हीरा है. ऐसे लड़के को हाथ से जाने नहीं देना चाहिए.’

पापा बोले, ‘देखिए, वे लोग कर्मकांडी लोग हैं. हमारी बिटिया आकांक्षा आधुनिक विचारों की है. कर्मकांड और अंधविश्वास उसे पसंद नहीं.’

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मम्मी बोलीं, ‘अरे लड़का नामी कालेज में पढ़ा हुआ है. अभी तो मांबाप के कहे पर है पर वह बाद में अंधविश्वास, कर्मकांड में विश्वास नहीं करेगा. आप भी तो गांव के थे, अब कैसे बदल गए?’

मेरे घर में सभी खुले विचारों के थे, ‘आप की बहन के घर में तो ऐसा ही वातावरण था. पर सब बच्चे पढ़लिख कर बड़ीबड़ी पोस्टों पर आ गए और सब बदल गए. राजीव भी बदल जाएगा.’

मामा और नानी के बहुत कहने के बाद पापा ने परेशान हो कर ‘हां’ कह दिया. पर उन्होंने कहा कि एक महीने में मैं तैयारी नहीं कर सकता?

‘अजी हम लोग हैं न. हम कर लेंगे.’

पापा को मजबूरी में मानना पड़ा. शादी की तारीख तय कर दी गई. तैयारियां शुरू हो गईं. मैं बात को ठीक से सम झ नहीं पाई, क्योंकि मैं तब सिर्फ 20 साल की थी. मु झे सोचनेसम झने का समय ही नहीं दिया गया.

एक दिन जब सगाई की अंगूठी के लिए हम बाजार गए तो वे लोग भी आए. जब मेरी बात राजीव से हुई तब मैं सम झ चुकी थी कि घर के सभी लोगों की सोच एकजैसी है और सब के सब अंधविश्वासी व रूढि़वादी हैं. तब तक पापा भी सम झ चुके थे.

वहां से वापस आ कर जब मैं ने शादी के लिए मना किया तो सारे रिश्तेदार, जो घर पर आ चुके थे, ने कहा, ‘इस में तो बचपना है. कार्ड छप चुका है, खानेपीने का ऐडवांस दे चुके हैं. अब कुछ नहीं हो सकता. हमारी बदनामी होगी. यह शादी तो करनी होगी.’

मेरे मन में तो आया कि मैं भाग जाऊं. पर पापा के बारे में सोच कर ऐसा न कर सकी.

2-3 दिनों बाद पता चला कि होने वाले ससुरजी का व्यवहार भी बड़ा अजीब है. पापा से कुछ बात हुई थी और तब वे खासा परेशान हुए थे.

घर के बुजुर्गों ने पापा को सम झा दिया, ‘शादी में ऐसी बातें होती रहती हैं, उस पर ध्यान मत दो.’

मेरा मन बहुत ही आहत हुआ. मैं तो रोने लगी.

‘तू हम से ज्यादा सम झती है क्या? समय आने पर सब ठीक हो जाएगा,’ मामानाना कहने लगे.

मम्मी को अपने पीहर वालों पर बहुत भरोसा था. उन्हें लगा कि वे कह रहे हैं तो सब ठीक ही हो जाएगा.

शादी हो गई. शादी भी लड़के वालों ने अपने घर से नहीं की, एक धर्मशाला से की.

पापा बोले, ‘इस में भी कोई राज है जो वे लोग कुछ छिपा रहे हैं. वरना अपनी बहू का गृहप्रवेश अपने घर में करते हैं, धर्मशाला में नहीं.’

‘आकांक्षा, तुम घूंघट करोगी,’ यह हिदायत पहले ही दिन मैं सुन चुकी थी.

जयपुर शहर की बात है. गलती से भी थोड़ा सिर दिखता, तो ससुरजी देवर से कहते, ‘जा पंकज,  भाभी का घूंघट खींच ले.’

मु झे बहुत बुरा लगता पर मैं खून के घूंट पी कर रह जाती.

एक दिन तो मु झ से रहा नहीं गया, ‘पापाजी, आप तो अंडरवियर पहन कर बहूबेटियों के सामने घूमते हो, मेरे सिर ने ऐसा क्या कर दिया, जो उसे ढंकने की जरूरत है?’

ससुरजी ने इसे अपनी इंसल्ट तो मानी पर मु झे घूंघट पर छूट नहीं दी.

फिर नागपंचमी आई. तब मु झ से पारंपरिक ड्रैस लहंगा पहना कर सिर में बोड़ला लगा कर घूंघट में जहां पर सांपों के बिल थे वहां जा कर पूजा करने और बिल में दूध डालने को कहा गया. इसे मु झे सहन करना बहुत मुश्किल हो रहा था.

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उसी समय इस तमाशे को देखने के लिए मेरे साथ पढ़ने वाली एक सहेली वहां आई. वहां सब औरतें कह रही थीं कि नई बहू है. बहुत सुंदर है. इंग्लिश स्कूल में पढ़ी हुई है. इंग्लिश में एमए कर रही है.

उस लड़की ने उत्सुकतावश मेरा घूंघट हटा कर मु झे देखा, तो हैरान रह गई, ‘अरे आकांक्षा, तेरी शादी कब हुई? तू ने हमें क्यों नहीं बुलाया? तू ने तो बताया भी नहीं? तुम तो कहती थीं  कि तुम्हारी फैमिली बहुत आधुनिक सोच वाली है और पापा दकियानूसी सोच वाले लोगों से शादी नहीं करेंगे? मगर तू यहां कैसे फंस गई? ये लोग तो बहुत ही अंधविश्वासी हैं?’

उस का इतना कहना था कि मेरा रोना फूट पड़ा. मैं ने उसे बड़ी मुश्किल से रोका. वह सहेली मेरे साथ ही मेरी ससुराल भी आ गई. जब उस ने घर की हालत देखी तो बोली, ‘आकांक्षा, तू तो सचमुच में फंस गई?’

उस का इतना कहना था कि मु झे बहुत तेज रोना आया. दूसरे दिन जब मैं अपने पीहर आई तो बुरी तरह रोई.

मम्मी कहने लगीं, ‘बेटी, सहन करो, थोड़े दिन में सब ठीक हो जाएगा.’

मैं ने कहा, ‘मु झे छत पर जाने नहीं देते. सब लोग कपड़े छत पर सुखाते हैं और मु झ से कहते हैं कि अपने देवर को दे दो वह सुखा देगा. मम्मी बताओ अंडरगारमैंट्स अपने जवान देवर को कैसे दूं फैलाने के लिए?’’

मेरे सासससुर कहते हैं कि अब तेरा घर यही है. अब तू पीहर नहीं जाएगी. बहुत रह लिया पीहर में.

मेरी मम्मी सुन कर बहुत रोईं.

मेरे मम्मीपापा मु झे जान से भी ज्यादा चाहते थे. पापा तो मु झे आकांक्षा भी नहीं बुलाते आकांक्षाजी कहते थे. उन्होंने हमेशा मु झे प्रेम, प्यार और इज्जत से रखा.

जब मैं पीहर आती तो मेरे ससुरजी मेरे पर्स की तलाशी लेते और कहते कि हमारे घर से क्या ले जा रही हो? उन के घर में कुछ भी नहीं था जो मैं साथ ले जाती. और ले भी क्यों जाती क्योंकि पीहर में कोई कमी नहीं थी.

एक दिन तो मु झे बहुत तेज गुस्सा आया. जैसे ही उन्होंने कहा कि पर्स दो तो मैं ने कह दिया, ‘पापाजी, आप तो बहू से घूंघट करवाते हो. फिर आप कैसे बहू के पर्स को खोल कर देख सकते हो? हमें अपने पर्स में सैनिटरी पैड्स भी रखना पड़ता है… हम आप को दिखाएं?’

सास अनपढ़ थीं. उन को कुछ सम झ में नहीं आता. वह भी ससुर से उलटा चुगली करती थीं. ससुरजी हमेशा लड़ने को तैयार रहते थे.

इस बीच ऐसा हुआ कि मेरे दूर के मामाजी, जो जयपुर में ही रहते थे, मेरे ससुरजी उन के औफिस में पहुंच गए.

उन से बोले, ‘आप की भांजी देवरों के अंडरवियर नहीं धोती.’

मामाजी भौचक्के रह गए.

मामाजी ने सिर्फ इतना कहा, ‘साहब, छोटी बात को बड़ा मत कीजिए. अभी तो  वह 20 साल की ही है. घर में लाड़प्यार  से पलीबढ़ी बच्ची है. धीरेधीरे सब ठीक  हो जाएगा.’

शाम को मामाजी घर आए. उन्होंने पूछा, ‘बिटिया आकांक्षा कैसी है?’

‘बहुत बढि़या,’ मम्मी बोलीं.

पापा से पूछा. उन का भी यही जवाब था.

तब वे बोले, ‘मेरी तो कुछ सम झ में नहीं आ रहा. मैं तो जब आप से पूछता हूं कि आकांक्षा कैसी है, सब बढि़या कहते हो. आज आकांक्षा के ससुरजी मेरे औफिस आए. वे जो भी कह रहे थे, बहुत हास्यास्पद था. आप क्यों छिपा रहे हो?’

अब फटने की बारी पापा की थी, ‘मैं ने तो पहले ही कहा था ये लोग बेकार आदमी हैं. आप की बहन मानी नहीं और अपनी जिद पर अड़ी रही. आज मेरी लड़की तकलीफ में है. अब हम क्या कर सकते हैं?’

तुमने क्यों कहा मैं सुंदर हूं: भाग 1

सरकारी नौकरियों में लंबे समय तक एकसाथ काम करते और सरकारी घरों में साथ रहते कुछ सहकर्मियों से पारिवारिक रिश्तों से भी ज्यादा गहरे रिश्ते बन जाते हैं, मगर रिटायरमैंट के बाद अपने शहरोंगांवों में वापसी व दूसरे कारणों के चलते मिलनाजुलना कम हो जाता है. फिर भी मिलने की इच्छा तो बनी ही रहती है. उस दिन जैसे ही मेरे एक ऐसे ही सहकर्मी मित्र का उन के पास जल्द पहुंचने का फोन आया तो मैं अपने को रोक नहीं सका.

मित्र स्टेशन पर ही मिल गए. मगर जब उन्होंने औटो वाले को अपना पता बताने की जगह एक गेस्टहाउस का पता बताया तो मैं ने आश्चर्य से उन की ओर देखा. वे मुझे इस विषय पर बात न करने का इशारा कर के दूसरी बातें करने लगे.

गेस्टहाउस पहुंच कर खाने वगैरह से फारिग होने के बाद वे बोले, ‘‘मेरे घर की जगह यहां गेस्टहाउस में रहने की कहानी जानने की तुम्हें उत्सुकता होगी. इस कहानी को सुनाने के लिए और इस का हल करने में तुम्हारी मदद व सुझाव के लिए ही तुम्हें बुलाया है, इसलिए तुम्हें तो यह बतानी ही है.’’ कुछ रुक कर उन्होंने फिर बोलना शुरू किया, ‘‘मित्र, महिलाओं की तरह उन की बीमारियां भी रहस्यपूर्ण होती हैं. हर महिला के जीवन में उम्र के पड़ाव में मीनोपौज यानी प्राकृतिक अंदरूनी शारीरिक बदलाव होता है, जो डाक्टरों के अनुसार भी कोई बीमारी तो नहीं होती, मगर इस का मनोवैज्ञानिक प्रभाव हर महिला पर अलगअलग तरह से होता है. कुछ महिलाएं इस में मनोरोगों से ग्रस्त हो जाती हैं.

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‘‘इसी कारण मेरी पत्नी भी मानसिक अवसाद की शिकार हो गई, तो मेरा जीवन कई कठिनाइयों से भर गया. घरपरिवार की देखभाल में तो उन की दिलचस्पी पहले ही कम थी, अब इस स्थिति में तो उन की देखभाल में मुझे और मेरी दोनों नवयुवा बेटियों को लगे रहना पड़ने लगा जिस का असर बेटियों की पढ़ाई और मेरे सर्विस कैरियर पर पड़ रहा था.

‘‘पत्नी की देखभाल के लिए विभाग में अपने अहम पद की जिम्मेदारी के तनाव से फ्री होने के लिए जब मैं ने विभागाध्यक्ष से मेरी पोस्ंिटग किसी बेहद सामान्य कार्यवाही वाली शाखा में करने की गुजारिश की, तो उन्होंने नियुक्ति ऐसे पद पर कर दी जो सरकारी सुविधाओं को भोगते हुए नाममात्र का काम करने के लिए सृजित की गई लगती थी.’’

‘‘काम के नाम पर यहां 4-6 माह में किसी खास मुकदमे के बारे में सरकार द्वारा कार्यवाही की प्रगति की जानकारी चाहने पर केस के संबंधित पैनल वकीलों से सूचना हासिल कर भिजवा देना होता था.

‘‘मगर मुसीबत कभी अकेले नहीं आती. मेरे इस पद पर जौइन करने के 3 हफ्ते बाद ही उच्चतम न्यायालय ने राज्य सरकार से विभिन्न न्यायालयों में सेवा से जुड़े 10 वर्ष से ज्यादा की अवधि से लंबित मामलों में कार्यवाही की जानकारी मांग ली. मैं ने सही स्थिति जानने के लिए वकीलों से मिलना शुरू किया. विभाग में ऐसे मामले बड़ी तादाद में थे, इसलिए वकील भी कई थे.

‘‘इसी सिलसिले में 3-4 दिनों में कई वकीलों से मिलने के बाद में एक महिला पैनल वकील के दफ्तर में पहुंचा. उन पर नजर डालते ही लगा कि उन्होंने अपने को एक वरिष्ठ और व्यस्त वकील दिखाने के लिए नीली किनारी की मामूली सफेद साड़ी पहन रखी है और बिना किसी साजसज्जा के गंभीरता का मुखौटा लगा रखा है. और 2-3 फाइलों के साथ कानून की कुछ मोटी किताबें सामने रख कर बैठी हुई हैं. मेरे आने का मकसद जानते ही उन्होंने एक वरिष्ठ वकील की तरह बड़े रोब से कहा, ‘देखिए, आप के विभाग के कितने केस किसकिस न्यायाधीश की बैंच में पैडिंग हैं और इस लंबे अरसे में उन में क्या कार्यवाही हुई है, इस की जानकारी आप के विभाग को होनी चाहिए. मैं वकील हूं, आप के विभाग की बाबू नहीं, जो सूचना तैयार कर के दूं.’

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‘‘इस प्रसंग में वकील साहिबा के साथ अपने पूर्व अधिकारियों के व्यवहार को जानते व समझते हुए भी मैं ने उन से पूरे सम्मान के साथ कहा, ‘वकील साहिबा, माफ करें, इन मुकदमों में सरकार आप को एक तय मानदेय दे कर आप की सेवाएं प्राप्त करती है, तो आप से उन में हुई कार्यवाही कर सूचना प्राप्त करने का हक भी रखती है. वैसे, हैडऔफिस का पत्र आप को मिल गया होगा. मामला माननीय उच्चतम न्यायालय द्वारा मांगी गई सूचना का है. यह जिम्मेदारीभरा काम समय पर और व्यवस्था से हो जाए, इसलिए मैं आप लोगों से संपर्क कर रहा हूं, आगे आप की मरजी.’

‘‘मेरी बात सुन कर वकील साहिबा थोड़ी देर चुप रहीं, मानो कोई कानूनी नुस्खा सोच रही हों. फिर बड़े सधे लहजे में बोलीं, ‘देखिए, ज्यादातर केसेज को मेरे सीनियर सर ही देखते थे. उन का हाल  में बार कोटे से न्यायिक सेवा में चयन हो जाने से वे यहां है नहीं, इसलिए मैं फिलहाल आप की कोई मदद नहीं कर सकती.’

‘ठीक है मैडम, मैं चलता हूं और आप का यही जवाब राज्य सरकार को भिजवा दिया जाएगा.’ कह कर मैं चलने के लिए उठ खड़ा हुआ तो वकील साहिबा को कुछ डर सा लगा. सो, वे समझौते जैसे स्वर में बोलीं, ‘आप बैठिए तो, चलिए मैं आप से ही पूछती हूं कि यह काम 3 दिनों में कैसे किया जा सकता है?’

‘‘अब मेरी बारी थी, इसलिए मैं ने उन्हीं के लहजे में जवाब दिया, ‘देखिए, यह न तो मेरा औफिस है, न यहां मेरा स्टाफ काम करता है. ऐसे में मैं क्या कह सकता हूं.’ यह कह कर मैं वैसे ही खड़ा रहा तो अब तक वकील साहिबा शायद कुछ समझौता कर के हल निकालने जैसे मूड में आ गई थीं. वे बोलीं, ‘देखिए, सूचना सुप्रीम कोर्ट को भेजी जानी है, इसलिए सूचना ठोस व सही तो होनी ही चाहिए, और अपनी स्थिति मैं बता चुकी हूं, इसलिए आप कड़वाहट भूल कर कोई रास्ता बताइए.’

‘‘वकील साहिबा के यह कहने पर भी मैं पहले की तरह खड़ा ही रहा. तो वकील साहिबा कुछ ज्यादा सौफ्ट होते हुए बोलीं, ‘देखिए, कभीकभी बातचीत में अचानक कुछ कड़वाहट आ जाती है. आप उम्र में मेरे से बड़े हैं. मेरे फादर जैसे हैं, इसलिए आप ही कुछ रास्ता बताइए ना.’

‘‘देखिए, यह कोई इतना बड़ा काम नहीं है. आप अपने मुंशी से कहिए. वह हमारे विभाग के मामलों की सूची बना कर रिपोर्ट बना देगा.’

‘‘देखिए, आप मेरे फादर जैसे हैं, आप को अनुभव होगा कि मुंशी इस बेगार जैसे काम में कितनी दिलचस्पी लेगा, वैसे भी आजकल उस के भाव बढ़े हुए हैं. सीनियर सर के जाने के बाद कईर् वकील लोग उस को बुलावा भेज चुके हैं,’ कह कर उन्होंने मेरी ओर थोड़ी बेबसी से देखा. मुझे उन का दूसरी बार फादर जैसा कहना अखर चुका था. सो, मैं ने उन्हें टोकते हुए कहा, ‘मैडम वकील साहिबा, बेशक आप अभी युवा ही है और सुंदर भी हैं ही, मगर मेरी व आप की उम्र में 4-5 साल से ज्यादा फर्क नहीं होगा. आप व्यावसायिक व्यस्तता के कारण अपने ऊपर ठीक से ध्यान नहीं दे पाती हैं, नहीं तो आप…

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‘‘महिला का सब से कमजोर पक्ष उस को सुंदर कहा जाना होता है. इसलिए वे मेरी बात काट कर बोलीं, ‘आप कैसे कह रहे हैं कि मेरी व आप की उम्र में सिर्फ 4-5 साल का फर्क है और आप मुझे सुंदर कह कर यों ही क्यों चिढ़ा रहे हैं.’ उन्होंने एक मुसकान के साथ कहा तो मैं ने सहजता से जवाब दिया, ‘वकील साहिबा, मैं आप की तारीफ में ही सही, मगर झूठ क्यों बोलूंगा? और रही बात आप की उम्र की, तो धौलपुर कालेज में आप मेरी पत्नी से एक साल ही जूनियर थीं बीएससी में. उन्होंने आप को बाजार वगैरह में कई बार आमनासामना होने पर पहचान कर मुझे बतलाया था. मगर आप की तरफ से कोई उत्सुकता नहीं होने पर उन्होंने भी परिचय को पुनर्जीवित करने की कोशिश नहीं की.’

‘‘अब तक वकील साहिबा अपने युवा और सुंदर होने का एहसास कराए जाने से काफी खुश हो चुकी थीं. इसलिए बोलीं, ‘अच्छा ठीक है, मगर अब आप बैठ तो जाइए, मैं चाय बना कर लाती हूं, फिर आप ही कुछ बताएं,’ कह कर वे कुरसी के पीछे का दरवाजा खोल कर अंदर चली गईं.

‘‘थोड़ी देर में वे एक ट्रे में 2 कप चाय और नाश्ता ले कर लौटीं और बोलीं, ‘आप अकेले बोर हो रहे होंगे. मगर क्या करूं, मैं तो अकेली रहती हूं, अकेली जान के लिए कौन नौकरचाकर रखे.’ उन की बात सुन कर एकदफा तो लगा कि कह दूं कि सरकारी विभागों के सेवा संबंधी मुदकमों के सहारे वकालत में इतनी आमदनी भी नहीं होती? मगर जनवरी की रात को 9 बजे के समय और गरम चाय ने रोक दिया.

‘‘चाय पीने के बाद तय हुआ कि मैं अपने कार्यालय में संबंधित शाखा के बाबूजी को उन के मुंशी की मदद करने को कह दूंगा और दोनों मिल कर सूची बना लेंगे. फिर उन की फाइलों में अंतिम तारीख को हुई कार्यवाही की फोटोकौपी करवा कर वे सूचना भिजवा देंगी.

‘‘सूचना भिजवा दी गई और कुछ दिन गुजर गए मगर कोई काम नहीं होने की वजह से मैं उन से मिला नहीं. तब उस दिन दोपहर में औफिस में उन का फोन आया. फोन पर उन्होंने मुझे शाम को उन के औफिस में आ कर मिलने की अपील की.

‘‘शाम को मैं उन के औफिस में पहुंचा तो एकाएक तो मैं उन्हें पहचान ही नहीं पाया. आज तो वे 3-4 दिनों पहले की प्रौढ़ावस्था की दहलीज पर खड़ी वरिष्ठ गंभीर वकील लग ही नहीं रही थीं. उन्होंने शायद शाम को ही शैंपू किया होगा जिस से उन के बाल चमक रहे थे, हलका मेकअप किया हुआ था और एक बेहद सुंदर रंगीन साड़ी बड़ी नफासत से पहन रखी थी जिस का आंचल वे बारबार संवार लेती थीं.

‘‘मुझे देखते ही उन के मुंह पर मुसकान फैल गई तो पता नहीं कैसे मेरे मुंह से निकल गया, ‘क्या बात है मैडम, आज तो आप,’ मगर कहतेकहते मैं रुक गया तो वे बोलीं, ‘आप रुक क्यों गए, बोलिए, पूरी बात तो बोलिए.’ अब मैं ने पूरी बात बोलना जरूरी समझते हुए बोल दिया, ‘ऐसा लगता है कि आप या तो किसी समारोह में जाने के लिए तैयार हुई हैं, या कोई विशेष व्यक्ति आने वाला है.’ मेरी बात सुन कर उन के चेहरे पर एक मुसकान उभरी, फिर थोड़ा अटकती हुई सी बोलीं, ‘आप के दोनों अंदाजे गलत हैं, इसलिए आप अपनी बात पूरी करिए.’ तो मैं ने कहा, ‘आज आप और दिनों से अलग ही दिख रही हैं.’

‘‘और दिनों से अलग से क्या मतलब है आप का,’ उन्होंने कुछ शरारत जैसे अंदाज में कहा तो मैं ने भी कह दिया, ‘आज आप पहले दिन से ज्यादा सुंदर लग रही हैं.’

‘‘मेरी बात सुन कर वे नवयुवती की तरह मुसकान के साथ बोलीं, ‘आप यों ही झूठी तारीफ कर के मुझे चने के झाड़ पर चढ़ा रहे हैं.’ तो मैं ने हिम्मत कर के बोल दिया, ‘मैं झूठ क्यों बोलूंगा? वैसे, यह काम तो वकीलों का होता है. पर हकीकत में आज आप एक गंभीर वकील नहीं, किसी कालेज की सुंदर युवा लैक्चरर लग रही हैं?’ यह सुन कर वे बेहद शरमा कर बोली थीं, ‘अच्छा, बहुत हो गई मेरी खूबसूरती की तारीफ, आप थोड़ी देर अकेले बैठिए, मैं चाय बना कर लाती हूं. चाय पी कर कुछ केसेज के बारे में बात करेंगे.’

Manohar Kahaniya- पाक का नया पैंतरा: भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

2और 3 जून, 2021 की दरम्यानी रात की बात है. उस रात ज्येष्ठ महीने के कृष्ण पक्ष की अष्टमी थी. कृष्ण पक्ष होने के कारण घनी अंधियारी रात थी. चारों तरफ घुप अंधेरा था. ऐसे घने अंधेरे में हाथ से हाथ नजर नहीं आ रहा था. उस पर मौसम ने सितम ढहा रखा था. रुकरुक कर तेज आंधी चल रही थी और बीचबीच में बारिश भी  हो रही थी. आंधी से बौर्डर पर रेत के टीले  उड़ रहे थे. उड़ती रेत में कुछ नजर नहीं आ  रहा था.

ऐसे घटाघोप अंधेरे में राजस्थान में बीकानेर श्रीगंगानगर से लगती पाकिस्तान की सीमा पर बीएसएफ के जवान गश्त कर रहे थे. बौर्डर पर तारबंदी है. रात के कोई ढाई बजे के आसपास बीकानेर से सटी सीमा पर बंदली पोस्ट का बीएसएफ जवान बीरबल राम चौकन्नी नजरों से गश्त कर रहा था.

इसी दौरान बौर्डर पर लगी फ्लड लाइटों की रोशनी में उसे तारबंदी पर कुछ हलचल होती नजर आई. रेतीले धोरों के बारबार उड़ने से यह पता नहीं चल पा रहा था कि वे कौन लोग हैं और क्या कर रहे हैं?

उस ने दूरबीन से नजरें गड़ाईं तो उसे 2-3 मानव आकृतियां नजर आईं. इन के चेहरे नजर नहीं आ रहे थे. ये लोग तारबंदी के बीच से एक पाइप भारतीय सीमा में खींच रहे थे. बीएसएफ जवान और उन इंसानों के बीच कोई 300 मीटर का फासला था.

उन लोगों की हरकत देख कर बीरबल राम ने उन्हें ललकारा नहीं, बल्कि दबेपांव आगे बढ़ा. उस ने देखा कि पाइप भारतीय सीमा में खींचने के बाद वे लोग उस में से कोई चीज निकाल रहे थे. यह देखते ही बीरबल ने तुरंत फायरिंग शुरू कर दी.

गोलियों की आवाज होते ही बौर्डर पर सुरक्षा चौकियों में हलचल मच गई. सभी अलर्ट हो गए. कुछ ही मिनटों में बीएसएफ के जवान और अधिकारी वहां पहुंच गए. उन्होंने बीरबल से सारा माजरा पूछा.

इस के बाद अधिकारी उस जगह पहुंचे, जहां पाइप खींचा गया था. करीब 10 फुट लंबे उस पीवीसी पाइप में कपड़े की माला के रूप में 54 पैकेट बंधे हुए थे. इन पैकेटों को चैक किया गया, तो हेरोइन निकली. हेरोइन के ये पैकेट पाकिस्तान से पीवीसी पाइप के जरिए भारतीय सीमा में पहुंचाए गए थे.

यह हेरोइन लेने के लिए भारतीय सीमा में 2-3 तसकर पहुंचे थे. वे फायरिंग होने पर हेरोइन को मौके पर ही छोड़ कर अंधेरे में भाग निकले थे. जवानों को मौके के आसपास 2 जोड़ी जूते भी मिले.

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हेरोइन की तसकरी की बात सामने आने पर बीएसएफ ने रात में ही आसपास के इलाकों में सर्च अभियान चलाया, लेकिन खराब मौसम होने के कारण दृश्यता बहुत कम थी. इस कारण फरार हुए तसकरों का कुछ पता नहीं चला.

बौर्डर पर हेरोइन तसकरी का पता चलने पर अगले दिन 3 जून को बीएसएफ के डीआईजी पुष्पेंद्र सिंह राठौड़, नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के जौइंट डायरेक्टर उगमदान चारण और एसपी प्रीति चंद्रा सहित दूसरे अफसर मौके पर पहुंच गए.

जांचपड़ताल शुरू हो गई. अधिकारियों ने बरामद हुई हेरोइन का वजन कराया. वह 56 किलो 600 ग्राम निकली. इस हेरोइन की अंतरराष्ट्रीय बाजार में कीमत करीब 283 करोड़ रुपए आंकी गई. यह बीकानेर में पाक सीमा पर अब तक पकड़ी गई नशे की सब से बड़ी खेप थी. यह हेरोइन अफगानिस्तान की बनी हुई थी.

2 तसकर चढ़े हत्थे

जांचपड़ताल के लिए बीएसएफ के डीआईजी पुष्पेंद्र सिंह अफसरों व जवानों के साथ बंदली सीमा चौकी पर पहुंचे. उन्होंने तारबंदी के पास जा कर उस जगह का मुआयना किया, जहां पाइप तारों के बीच से निकाला गया था और बाद में उस पाइप के अंदर भर कर हेरोइन भारतीय सीमा में भेजी गई.

अफसरों ने वहां तसकरों के पैरों के निशान के सहारे खोजबीन शुरू की तो सामने ही पाकिस्तानी वाच टावर पर खड़ा जवान बीएसएफ की ओर से हमले की आशंका में कांपने लगा. वह डर कर मदद के लिए चिल्लाने लगा. कुछ ही देर में वहां पाकिस्तानी रेंजर्स आ गए. पूछताछ में उन्होंने तसकरी की जानकारी होने से साफ इनकार कर दिया.

बीएसएफ के अधिकारी अपने ठिकाने पर लौट आए. सब से पहले उन तसकरों की तलाश जरूरी थी, जो मौके से भाग गए थे. इस के लिए बीएसएफ ने सुबह से ही सर्च अभियान शुरू कर दिया. अभियान के दौरान देर रात को कालूवाला के एक खेत में छिपे 2 संदिग्ध युवकों को पकड़ा गया. इन दोनों को पुलिस अपने साथ ले गई.

4 जून को दोनों युवकों से पुलिस, बीएसएफ और गुप्तचर एजेंसियों ने साझा पूछताछ की. इस में पता चला कि दोनों युवक अपने साथियों के साथ पाक से भेजी गई हेरोइन लेने बौर्डर पर आए थे, लेकिन बीएसएफ की ओर से फायरिंग होने पर ये भाग निकले थे और खेतों में छिप गए थे.

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इन युवकों के नाम हरमेश और रूपा थे. इन में 18 साल का हरमेश पंजाब के फाजिल्का और 30 साल का रूपा पंजाब के फिरोजपुर शहर का रहने वाला था. इन दोनों को गिरफ्तार कर लिया गया. बाद में इन्हें नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के हवाले कर दिया गया.

दोनों तसकरों से साझा पूछताछ में पता चला कि पंजाब से कुल 4 लोग कैंपर गाड़ी से बीकानेर के खाजूवाला में भारतपाक बौर्डर पर हेरोइन की डिलीवरी लेने पहुंचे थे. पंजाब का कुख्यात हेरोइन तसकर काला सिंह के साथ बौस इन को ले कर आया था.

बंदली पोस्ट से करीब 2 किलोमीटर दूर बौस ने काला सिंह, रूपा और हरमेश को गाड़ी से उतार दिया था. बौस वहीं रुक गया था. उस ने तीनों को बौर्डर पर पिन पौइंट समझा कर कहा था कि तारबंदी के पास जा कर पत्थर फेंकना. उधर से पाइप में माल आएगा. वहां से माल पाइप से निकाल कर ले आना. काला सिंह पहले रैकी कर चुका था. उसे इस इलाके के चप्पेचप्पे की जानकारी थी. इसलिए रूपा और हरमेश को कोई चिंता नहीं थी.

माला के रूप में मिले पैकेट

गाड़ी से उतारने के बाद बौस वाट्सऐप कालिंग के जरिए काला सिंह, रूपा और हरमेश से जुड़ गया. वाट्सऐप कालिंग से बताई गई लोकेशन के आधार पर वे बौर्डर पर पिन पौइंट पर पहुंच गए और बौर्डर पर पत्थर फेंका.

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Social Story in Hindi: व्रत उपवास- भाग 3: नारायणी के व्रत से घर के सदस्य क्यों घबराते थे?

अभी करवाचौथ बीते 4 दिन भी नहीं हुए थे कि अष्टमी आ पहुंची. इसी- लिए नारायणी को छोड़ कर सब कांप रहे थे. और जैसे ही नारायणी ने चेतावनी दी कि कोई खटपट न करे तो शत्रु दल में भगदड़ मच गई. तनाव के कुछ तार बाकी थे, वे सब एकसाथ झनझना उठे. जैसे ही देवीलाल ने कहा कि खटपट वह शुरू कर रही है तो रोनापीटना शुरू हो गया.

एक दिन पहले ही नारायणी सब बच्चों से पूछ रही थी कि अष्टमी के दिन क्या बनाएं. बच्चों ने बड़े चाव से अपनी- अपनी पसंद बताई थी. काफी तैयारी भी हो चुकी थी. बच्चे बेसब्री से अष्टमी की प्रतीक्षा कर रहे थे. मन ही मन कह भी रहे थे कि चाहे कुछ भी हो वे मां को प्रसन्न रखेंगे.

पर ऐसा न पिछले कई वर्षों से हुआ था और न इस साल होने के आसार दिखाई दे रहे थे. नारायणी तो आंसू टपका कर बिस्तर पर जा गिरी और घर का भार आ पड़ा निर्मला के नन्हेनन्हे नाजुक कंधों पर. उस ने जैसेतैसे चाय बनाई, नाश्ता बनाया और सब को खिलाया. पर उस के गले से कुछ न उतरा.

देवीलाल ने गला खंखारते हुए पूछा, ‘‘बाजार से कुछ लाना है?’’

नारायणी चुप रही.

‘‘अरे, बाजार से कुछ लाना है?’’

नारायणी फिर भी चुप रही.

निर्मला ने मां के पास जा कर कंधा हिलाते हुए कहा, ‘‘अम्मां, बाबूजी बाजार जा रहे हैं, कुछ मंगाना है क्या?’’

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‘‘भाड़ में जाओ सब.’’

‘‘वह तो चले जाएंगे, पर अभी कुछ लाना हो तो बताओ,’’ देवीलाल ने कहा.

‘‘थोड़े मखाने ले आना. खरबूजे के बीज और एक नारियल. खोया मिले तो ले आना. जो सब्जी समझ में आए, ले लेना पर मटर लाना मत भूलना. आज आलूमटर की कचौडि़यां बनाऊंगी. सोनू का बड़ा मन था. मूंगदाल की पीठी ले आना, हलवा बनाना है. दहीबड़े खाने हों तो उड़द की दाल की पीठी और दही ले आना,’’ नारायणी एक सांस में बोल गई.

देवीलाल ने गहरी सांस भर कर कहा, ‘‘एकसाथ इतना सामान कैसे लाऊंगा?’’

‘‘सोनू को साथ ले जाओ.’’

‘‘चल बेटा, सोनू चल. बरतन और थैला उठा ले. पूछ ले अम्मां से घीतेल तो है न? कहीं ऐन मौके पर उस के लिए भी भागना पड़े.’’

‘‘अरे, अभी तो लाए थे करवाचौथ के दिन. सब का सब रखा है. खर्च ही कहां हुआ?’’

करवाचौथ के नाम से फिर एक बार दहशत छा गई. इस से पहले कि कुछ गड़बड़ हो, देवीलाल बाहर सड़क पर आ गए और सोनू की प्रतीक्षा करने लगे.

कुछ देर तक तो शांतिअशांति के उतारचढ़ाव में दिन निकला. पर जहां नारायणी जैसी धार्मिक तथा कट्टर व्रत वाली औरत हो, वहां तूफान न आए यह असंभव था. वह बारीबारी से देवीलाल और बच्चों को आड़े हाथों लेती रही. कभी इसे झिड़कती तो कभी उसे डांटती. देवीलाल को तो एक क्षण चैन नहीं लेने दिया.

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बोली, ‘‘मेरी मां तो सीधी थी, एकदम गऊ. आज उसी की शिक्षा है कि मैं भी इतनी सीधी हूं. मुंह से एक शब्द नहीं निकलता. दूसरी औरतों को देखो, कितनी तेजतर्रार हैं. सारे महल्ले का मुंह बंद कर देती हैं, बस, एक बार बोलना शुरू कर दें.’’

देवीलाल ने बच्चों की ओर देखा. वे मुसकराने का असफल प्रयत्न कर रहे थे. ठंडी सांस भर कर देवीलाल ने कहा, ‘‘सो तो है. तुम्हारे जैसी सीधी तो अंगरेजी कुत्ते की पूंछ भी नहीं होती.’’

नारायणी पहले तो समझी कि उस की प्रशंसा हो रही है, पर जब उस की समझ में आया तो चिढ़ कर बोली, ‘‘तुम मेरी मां की हंसी तो नहीं उड़ा रहे?’’

‘‘तुम्हारी मां तो गऊ थीं. कोई उन की हंसी उड़ाएगा. मैं तो बैल की सोच रहा था.’’

नारायणी ने आंखें तरेर कर कहा, ‘‘क्या कुछ मजाक कर रहे हो?’’

‘‘नहीं तो,’’ देवीलाल ने बात बदल कर कहा, ‘‘बेटी निर्मला, खाली हो तो एक प्याला चाय ही बना दे.’’

कुछ देर शांति रही, पर कब तक? फिर वही शाम और पूजा की तैयारी. फिर वही चांद की प्रतीक्षा. लो कल सप्तमी के दिन तो ऐसी फुरती से निकल आया कि पूछो मत और आज अष्टमी है तो ऐसा गायब जैसे गधे के सिर से सींग. सारा परिवार पागलों की तरह चांद की तलाश में ऊपरनीचे, अंदरबाहर घूम रहा था.

9 बज गए. पिछली बार की तरह फिर एक बार खतरे की घंटी बजी. पर वह चांद न था, केवल उस की परछाईं थी.

‘‘अरे, जा न,’’ नारायणी ने सोनू को डांटा, ‘‘जाता है कि नहीं.’’

‘‘अभी तो देख कर आ कर बैठा हूं,’’ सोनू ने झल्ला कर कहा, ‘‘अब नहीं जाता.’’

‘‘जा, गोलू, तू ही जा. यह तो मेरी जान ले कर छोड़ेगा. मरा, न जाने किस घड़ी में पैदा हुआ था,’’ नारायणी ने कोसा.

‘‘अम्मां, मैं नहीं जाता. मेरी टांगें तो टूट गई हैं ऊपरनीचे होते,’’ गोलू ने घुटने दबाते हुए कहा, ‘‘सोनू को कहो. यह बीच सीढ़ी से ही लौट आता है.’’

‘‘सत्यानास,’’ नारायणी एकदम आपा खो बैठी, ‘‘एक तो तुम्हारे लिए भूखप्यास से तड़प रही हूं और तुम लोगों से इतना सा भी नहीं होता.’’

‘‘छोड़ो, अम्मां,’’ सोनू ने हलके से कहा, ‘‘जा कर पिताजी की चांद देख लो. असली चांद से ज्यादा चमकती है.’’

नारायणी ने चिल्ला कर कहा, ‘‘मर जाओ एकएक कर के. मजाल है कि तुम्हारा मुंह भी देखूं.’’

देवीलाल ने कहा, ‘‘क्या कह रही हो, नारायणी? बच्चों के लिए व्रत रख रही हो और उन्हें ही कोस रही हो? ऐसा व्रत रखने का क्या लाभ है?’’

‘‘करम फूट गए जो ऐसी औलाद पैदा हुई. इस से तो बिना संतान ही भली थी,’’ नारायणी ने क्रोध में कहा. वह तनाव के अंतिम क्षणों में पहुंच गई थी.

इतने में ‘चांद निकल आया’ का शोर आने लगा. नारायणी ने फिर से अपनी गोटे वाली साड़ी को ठीक किया और सजीसजाई पूजा की थाली को ले कर छत की भीड़ में गुम हो गई. सोचती जा रही थी कि बाईं आंख फड़क रही है, कहीं फिर कुछ बदशगुनी न हो जाए.

जब खाना खाने बैठे तो किसी की इच्छा खाना खाने की न हुई. सब थोड़ा- बहुत खापी कर उठ गए. इस तरह मंगल कामना करते हुए बच्चों के लिए अष्टमी का व्रत पूरा हुआ.

दूसरे दिन पड़ोस वाली शीला ने पूछा, ‘‘अरे, नारायणी चाची, कल श्याम चाचा के यहां खाने पर क्यों नहीं आईं?’’

‘‘खाने पर,’’ नारायणी ने पूछा, ‘‘कैसा खाना था श्याम के यहां?’’

‘‘अरे, क्या तुम्हें निमंत्रण नहीं मिला? उन के बेटे की सगाई थी न.’’

‘‘पता नहीं,’’ नारायणी ने मुरझा कर कहा.

सहसा शीला को याद आया, ‘‘पर वैसे भी तुम कहां आतीं. कल तो तुम ने अहोई अष्टमी का व्रत रखा होगा. सच, बड़ा कठिन है. मैं तो एक बार भी व्रत नहीं रख पाई. मुझे तो चक्कर आने लगते हैं.’’

नारायणी ने कहा, ‘‘अगर निमंत्रण आया होता तो मैं अवश्य आती.’’

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‘‘क्यों, क्या व्रत नहीं रखतीं?’’

‘‘व्रत?’’ नारायणी ने क्रोध में कहा, ‘‘ऐसे नासपीटे बच्चों के लिए व्रत रखना तो महान अपराध है.’’

शीला अवाक् हो कर नारायणी का मुंह देख रही थी. उस ने कभी उसे इतना उत्तेजित नहीं देखा था.

सहज हो कर नारायणी ने पूछा, ‘‘क्याक्या बना था दावत में?’’

Satyakatha: शादी से 6 दिन पहले मंगेतर ने दिया खूनी तोहफा

जतिन अपनी मोटरसाइकिल को पश्चिमी उत्तर प्रदेश के डिलारी- मुरादाबाद मार्ग पर सरपट दौड़ाए जा रहा था. उस पर बैठी टीना जतिन की कमर को कस कर पकड़े हुए थी. इसी बीच उसे एक झटका लगा और हल्की सी चीख निकल गई.

‘‘ठीक से चलाओ, मुझे गिरा दोगे क्या?’’ टीना बोली.

‘‘अरे, तुम्हें कैसे गिरा दूंगा, तुम तो मेरी जान हो.’’ कहते हुए जतिन ने मोटरसाइकिल रोक दी.

‘‘अब मोटरसाइकिल क्यों रोक दी. तुम्हें पता नहीं कितनी खरीदारी करनी है और अंधेरा होने से पहले घर भी लौटना है.’’ टीना ने कहा.

‘‘हांहां, सब पता है, लेकिन उधर देखो पुलिस ने अचानक बेरियर गिराकर रास्ता बंद कर दिया. मैं तो तेजी से निकलना चाहता था, लेकिन…’’

‘‘लेकिन क्या? तुम्हें तो बस बहाना चाहिए.’’ टीना अब थोड़ा नाराज हो गई थी. जतिन उस की मुंडी को रास्ता बंद बैरियर की ओर घुमाते हुए बोला, ‘‘ ठीक से देखो न उधर!’’

‘‘तो अब क्या करें?’’ टीना ने सवाल किया.

‘‘करना क्या है, वापस सुरजन नगर चलते हैं. वहीं कुछ देर समय गुजारेंगे.’’

‘‘ और शौपिंग?’’

‘‘अब मुझे क्या पता था कि मुरादाबाद में भी लौकडाउन लगा होगा.’’ जतिन ने सफाई दी.

‘‘तो फिर वहीं से कुछ सामान खरीद लेते हैं.’’

‘‘हांहां, यही ठीक रहेगा. मुझे ध्यान आया मुरादाबाद का लौकडाउन वीकेंड का है, सोमवार को खुल जाएगा.’’

‘‘तो फिर मुरादाबाद सोमवार को चलते हैं. अभी तो हमारी शादी में 6 दिन बचे हैं.’’ टीना बोली.

‘‘ठीक है,’’ कहते हुए जतिन ने सुरजन नगर के लिए मोटरसाइकल

घुमा ली.

‘‘अच्छी तरह बैठ जाओ, वहां का रास्ता ठीक नहीं है.’’ जतिन के कहने पर टीना ने पहले की तरह उस की कमर को कस कर पकड़ लिया. थोड़ी देर में दोनों सुरजन नगर मार्ग पर आ गए थे.

एक जगह पर रुकते हुए जतिन बोला, ‘‘चलो कुछ देर थोड़ी मौजमस्ती भी हो जाए. अभी तो साढ़े 11 ही बजे हैं. एक बजे तक पूरी दुकानें भी खुल जाएंगी’’

‘‘कहां चलेंगे, बैठने की यहां कोई एकांत जगह तुम्हें मालूम है?’’ टीना बोली.

‘‘है न, पास में ही मेरे एक दोस्त का मकान है. वह इन दिनों अपनी फैमिली के साथ दिल्ली में है. वहां उस का नौकर होगा. वही मकान का केयरटेकर है, मुझे अच्छी तरह जानतापहचानता है.’’ जतिन को बताया.

‘‘ठीक है,’’  कहते हुए टीना ने सर हिला दिया.

कुछ मिनटों में ही जतिन और टीना एक मकान के सजेसजाए ड्राइंगरूम में थे. टीना ने फ्रेश होने की इच्छा जताई. जतिन ने बाथरूम की ओर इशारा किया और नौकर से कुछ नाश्ते का इंतजाम करने के लिए पैसे दिए.

टीना बाथरूम से निकलते ही बोली ‘‘मेरे बैग में छोटा तौलिया होगा, निकालना. और पानी की बोतल भी देना…’’

‘‘यह लो तौलिया और पानी की बोतल.’’

‘‘यहां कौनकौन रहता है?’’

‘‘छोड़ो न, यहां जो भी रहता हो, हमें क्या? हमें तो केवल डेढ़दो घंटे बिताने हैं.’’ जतिन बोला.

‘‘फिर भी, तुम तो यहां पहले भी आए होगे?’’ टीना ने सवाल किया.

‘‘तुम्हारी यही आदत मुझे कभीकभी अच्छी नहीं लगती है.’’ जतिन ने शिकायत की.

‘‘मेरी कौन सी आदत खराब है और कौन सी अच्छी, यह तो तुम्हारी सोच पर निर्भर करता है.’’

‘‘अरे छोड़ो भी, क्यों नराज होती हो. मैं ने तुम्हारे लिए यहां का फेवरेट नाश्ता मंगवाया है. खाओगी तो सालोंसाल तक याद रखोगी.’’

‘‘इस का मतलब है तुम यहां हमेशा आते रहे हो!’’ टीना बोली.

‘‘हमेशा आते रहने से तुम्हारा क्या मतलब है, तुम मुझ पर शक कर

रही हो.’’

‘‘मैं ने तो शक की बात नहीं कही. सिर्फ पूछा कि यहां कौनकौन रहता है?’’

‘‘ यह मेरे दोस्त का मकान है. वह अपनी फैमिली के साथ रहता है, इस से अधिक मैं नहीं जानता.’’ जतिन ने बताया.

‘‘… लेकिन बाथरूम में केवल लेडीज अंडरगारमेंट पड़े हैं. वे भी गीले…’’ टीना बोली.

‘‘तो इस में क्या हो गया…किसी ने तुम से पहले बाथरूम यूज किया होगा. यहां की देखभाल नौकर के जिम्मे है. हो सकता है उस की बीवी आई हो, उस के परिवार का कोई सदस्य आया हो…’’

‘‘और…और कमोड में तैरते कंडोम के बारे में तुम क्या कहोगे?’’ टीना अब तीखेपन से बोली.

‘‘क…क…कंडोम! मैं कुछ नहीं जानता?’’ हकबकाता हुआ जतिन बोला.

‘‘…और यह भी सुनो, गीला अंडरगर्मेंट ठीक वैसा ही महंगा वाला ब्रांडेड है, जैसा तुम ने एक सप्ताह पहले मुझे गिफ्ट में दिया था.’’ टीना अब और तल्ख हो गई थी.

‘‘देखो, तुम मुझ पर बेवजह शक कर रही हो, मैं यहां थोड़ा खुशनुमा पल गुजारने के लिए तुम्हें ले कर आया हूं, और तुम हो कि बेकार की बातों में उलझती जा रही हो.’’

जतिन ने सफाई दी और टीना को समझाने की कोशिश की. लेकिन टीना का चेहरा तमतमाया हुआ देख उस ने अपनी आवाज में नरमी बनाए रखी.

‘‘मैं बेकार की बातें कर रही हूं? मैं तो दावे के साथ कह सकती हूं कि तुम यहां कल भी आए थे…और तुम्हारे साथ वह चुडैल भी थी… तुम्हारे चेहरे का उड़ा रंग ही सब बता रहा है.’’ टीना ने अब जतिन पर सीधे आरोप ही लगा दिया था.

‘‘देखो, बहुत हो गया. तुम्हारा कहना एकदम गलत है…और तुम किस की बात कर रही हो?’’

‘‘अरे वही, जिस के बारे में तुम पहले भी बता चुके हो कि वह तुम्हें फोन पर तंग करती रहती है.’’

‘‘टीना, तुम बेकार की बातें कर रही हो, उस से तो मेरा कब का छुटकारा मिल गया. मेरे दिल में तुम्हारे अलावा और कोई नहीं है,’’ जतिन बोला.टीना और जतिन के बीच नोकझोंक बढ़ती ही जा रही थी. दरअसल टीना जतिन को अपना सर्वस्व न्यौछावर कर चुकी थी. इसलिए वह कतई नहीं चाहती थी कि जतिन का किसी और के साथ कोई संबंध बना रहे. इस वजह से वह हमेशा जतिन को शक की निगाह से देखती थी.

‘‘तुम तो हमारे घरवालों के दबाव में आ कर मुझ से शादी कर रहे हो, सच तो यह है कि तुम मुझ से पीछा छुड़ाना चाहते हो.’’ टीना गुस्से में बोली.

‘‘ऐसा कुछ भी नहीं है, टीना.’’ जतिन ने समझाने की कोशिश की.

‘‘ कुछ भी कहो, तुम अपने अपमान का बदला लेना चाहते हो. जबकि मैं अपना सब कुछ लुटा चुकी हूं.’’

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब है कि तुम से मेरा मन भर गया है.’’ जतिन बोला.

‘‘और क्या? सच कड़वा लग रहा है न?’’

‘‘तो तुम कौन सी दूध की धुली हो!’’ अब जतिन भी हमलावर अंदाज में बोला.

‘‘क्या कहा तुम ने? मुझ पर आरोप लगाया.’’ टीना गुस्साई.

‘‘सही तो कहा है मैं ने. तुम्हारा ठाकुरद्वारा में एक लड़के के साथ चक्कर नहीं चल रहा है? तुम ने भी तो पंचायत के दबाव में मुझ से शादी करना स्वीकारा है. मेरी लाइफ खराब करने पर तुली हो.’’ जतिन का इतना कहना था कि टीना और भी भड़क कर आगबबूला हो गई.

गुस्से में लाल टीना ने जतिन को एक जोरदार थप्पड़ जड़ दिया. वह बोली, ‘‘मेरे ऊपर इल्जाम लगाने से पहले तू अपने गिरेहबान में झांक कर देख. तूने मेरा सब कुछ तो ले लिया. एक समय में तेरी खातिर मैं ने अपना घरपरिवार तक छोड़ दिया था. अब मेरे ऊपर ही झूठा इल्जाम लगा रहा है.’’

टीना का थप्पड़ खा कर जतिन तिलमिला गया. उसे नहीं पता था कि छोटीछोटी बातों की उस की नोकझोंक यह रूप ले लेगी. बात यहीं तक खत्म नहीं हुई और बढ़ती चली गई.

उधर शाम को टीना के घरवाले उस के जतिन के साथ लौटने का इंतजार कर रहे थे. टीना की मां सोमवती ने जतिन के पसंद के कई पकवान बनाए थे. शाम के साढ़े 4 बज गए थे, दोनों नहीं लौटे.

तब टीना के घर वालों को उन की चिंता होने लगी. वे इस बात को ले कर चिंतित हो गए कि  शहर में अकसर 6 बजे के बाद लगने वाले कोरोना कर्फ्यू की वजह से वे कहीं फंस सकते हैं.

टीना के पिता मदनपाल सिंह यही सोच कर उन के बारे में मालूम करने के लिए मोटरसाइकिल से निकल पड़े. यह बात 14 जून, 2021 की है.

वह जब मुरादाबाद के थाना ठाकुरद्वारा के अंतर्गत डिलारी-सुरजन नगर मार्ग पर थोड़ी दूर ही बढ़े होंगे कि उन्होंने सड़क के किनारे कुछ लोगों की भीड़ देखी. जिज्ञासावश वह भी उस के पास पहुंच गए. सड़क किनारे गड्ढे में झाडि़यों के बीच एक लाश पड़ी थी, कुछ पुलिसकर्मी उस के इर्दगिर्द मुआयना कर रहे थे.

सड़क पर खड़े लोग तरहतरह की बातें कर रहे थे. उन्हीं में से किसी ने बताया कि लाश यहां दिन में 3 बजे से ही पड़ी है. पुलिस तो अब आई है. उन्हीं लोगों से मालूम हुआ कि लाश किसी युवती की है.

उस समय तक लाश को एक सफेद कपड़े से ढंक दिया गया था, पुलिस वाले उसे एंबुलेंस में ले जाने की तैयारी कर रहे थे. जहां पर लाश गिरी थी वह जगह भीड़भाड़ वाली जगह से करीब 400 मीटर दूर थी.

वहां दिन में ही सन्नाटा रहता था. सड़क थोड़ी मुड़ी होने के कारण वह जगह दूर से छिपी हुई नजर आती थी. वह इलाका पीपलसाना गांव में आता है.

सुरजन नगर पुलिस थाने में इस की सूचना स्थानीय लोगों से मिली थी. गड्ढे में लाश के होने की सूचना देने वाले ने ही बताया था कि युवती की लाश वहां किस स्थिति में पड़ी थी. उस ने क्या पहन रखे थे. दिखने में कैसी लग रही थी. आदिआदि.

इस तरह की कई बातें सुन कर मदनपाल सिंह आशंकित हो गए. वह तुरंत पुलिस वालों के पास जा पहुंचे. उन्होंने लाश का चेहरा दिखाने का अनुरोध किया. जांच कर रहे सुरजन नगर के थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह भी घटनास्थल पर मौजूद थे. मदनपाल सिंह ने उन से ही आग्रह किया था.

थानाप्रभारी ने उन का परिचय पूछा फिर कांस्टेबल को लाश का चेहरा दिखाने को कहा. हालांकि तबतक

लाश का बारीकी से निरीक्षण किया जा चुका था.

उस समय तक मौजूद लोगों में से किसी ने उस की पहचान नहीं की थी. लेकिन जैसे ही मदनपाल ने लाश का चेहरा देखा वह ‘टीना…’ कह कर तेज आवाज में चीख पड़े अगले पल धड़ाम से वहीं गिर गए. उन्हें पुलिसकर्मियों ने सहारा दे कर उठाया. वह बेहोश हो गए थे.

जांच टीम को लाश के बारे में उन के सवाल का जवाब मिल गया था. बेहोश मदनपाल के चेहरे पर पानी के छींटे मार कर होश में लाया गया, उन्हें पानी पिलाया गया. कुछ देर में वह सामान्य हुए. पुलिस को उन्होंने धीमी आवाज में बताया कि लाश उन की बेटी टीना की है. उस की 20 जून को शादी होने वाली थी.

पुलिस को उन्होंने बताया कि वह सुबह 11 बजे अपने मंगेतर के साथ शैपिंग करने के लिए निकली थी, लेकिन वह कहां है पता नहीं?

फफकफफक कर रोते हुए उन्होंने पुलिस को शादी के कार्ड भी दिखाए, जिस पर टीना सिंह और जतिन सिंह नाम के साथ दोनों के स्थायी निवास का पता भी लिखा था.

थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह ने सीओ अनूप सिंह को भी इस की सूचना दे दी थी, वह भी घटनास्थल पर पहुंच गए थे. उन्होंने भी शव का निरीक्षण कर बताया कि निश्चित तौर पर लड़की को मार कर यहां फेंका गया है, जिसे सड़क दुर्घटना बनाने की कोशिश की गई है. सूचना पा कर मदन पाल की पत्नी सोमवती भी वहां पहुंच गई.

सोमवती भी बेटी की मौत पर दहाड़े मारमार कर रोने लगी. थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह व सीओ अनूप सिंह ने मृतक टीना के पिता मदनपाल सिंह और मां  सोमवती को पूछताछ के लिए थाने बुलवा लिया.

मदन पाल तो पहले ही टीना के बारे में बहुत कुछ बता चुके थे. सोमवती ने पुलिस को टीना के घर से बाहर जाने के बारे में जानकारी दी.

सोमवती ने बताया कि 14 जून की सुबह टीना के मंगेतर जतिन का फोन आया था. उस ने कहा था कि मैं आ रहा हूं. टीना की शादी के लिए लहंगासूट और अपने लिए शेरवानी खरीदनी है.

उस ने यह भी बताया था कि इस के लिए वह मुरादाबाद के टाउन हाल से कपड़े खरीदेगा और टीना को साथ ले जाएगा. अपने बताए समय पर वह टीना को पूर्वाह्न 11 बजे घर से ले कर गया था. उस के बाद अब मुझे अपनी बेटी को इस हाल में देखना पड़ रहा है.

पुलिस ने सोमवती और मदन पाल सिंह के बयानों के आधार प्रारंभिक रिपोर्ट तैयार कर ली. उस के बाद सोमवती से जतिन का फोन नंबर ले कर उस पर बात करने के लिए काल की. लेकिन फोन बंद मिला.

टीना का फोन भी गायब था. पुलिस ने टीना का शव मुरादाबाद पोस्टमार्टम हाउस भिजवा दिया. घटना की सूचना पा कर मुरादाबाद के एसपी (देहात) विद्यासागर मिश्रा भी थाना ठाकुरद्वारा पहुंच गए थे.

पूरा मामला समझने के बाद इस घटना से मुरादाबाद के एसएसपी प्रभाकर चौधरी को अवगत करा दिया. उन्होंने भी ठाकुरद्वारा पुलिस को निर्देश दिए कि टीना का हत्यारा चाहे कितना बड़ा क्यों न हो, उस को तुरंत हिरासत में लिया जाए.

इस निर्देश के बाद सीओ अनूप सिंह के नेतृत्व में एक पुलिस जांच टीम का गठन किया गया. उस में थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह, एसआई पंकज कुमार, कांस्टेबल संजीव धामा, मनोज कुमार, कृष्णपाल, शुभम तोमर, विनीत कुमार आदि थे.

सब से पहले 15 जून को टीम ने जतिन के कालागढ़ स्थित घर सी-293 नई कालोनी नूनगढ़ चौराहा पर छापा मारा. वह घर पर नहीं मिला. घर पर उस के पिता राजेंद्र सिंह मिले. थानाप्रभारी ने उन्हें हिदायत दी कि जैसे ही जतिन के बारे में उन्हें पता चले तो वह थाने में सूचना दे दें.

पुलिस वहां से निराश लौट रही थी, तभी मुरादाबाद के सर्विलांस सेल ने थानाप्रभारी सत्येंद्र सिंह को अभियुक्त जतिन के फोन की लोकेशन मिलने की सूचना दी. उस के फोन की लोकेशन सुरजन नगर और स्यौहारा के बीच की मिल रही थी.

इस सूचना पर पुलिस टीम ने तुरंत उसी तरफ अपनी गाड़ी बढ़ा दी. रास्ते में पुल के पास जतिन मोटरसाइकिल सहित गिरफ्तार कर लिया गया उस के पास से एक मोबाइल भी बरामद किया गया. पुलिस अभियुक्त जतिन को ठाकुरद्वारा थाना ले आई.

वहां एसपी (देहात) विद्या सागर मिश्रा व सीओ अनूप सिंह ने पूछताछ की. पूछताछ में जतिन ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपनी मंगेतर टीना की हत्या की है.

हत्या की वजह पूछने पर जतिन ने उस से हुई 3 साल पहले की मुलाकात, प्यार और तकरार की सारी बातें सिलसिलेवार ढंग से बताईं.

उस ने बताया कि उस की टीना से मुलाकात 3 साल पहले चाची के घर पर हुई थी. उस की चाची गांव लालपुर पीपलसाना में रहती है, जहां उस का अकसर आनाजाना होता था. वहीं टीना से दोस्ती हुई.

फिर दोस्ती प्यार में बदल गई. दोनों ने जीनेमरने की कसमें खाईं. उस ने बताया कि वह टीना से बेइंतहा मोहब्बत करने लगा था. टीना भी उसे बहुत चाहती थी.

अपने अफेयर के बारे में बताते हुए जतिन ने बताया कि उस का टीना के घर वालों से 6 महीने पहले विवाद हो गया था. दरअसल वह नहीं चाहते थे कि टीना उस से मिले.

जतिन ने इस बारे में 6 महीने पहले की घटना बताई. उस ने बताया कि करीब 6 माह पहले जनवरी 2021 में वह टीना को ले कर कालागढ़ स्थित अपने घर ले आया था. 4 दिनों तक टीना वहां ठहरी थी. इस का उस के घर वालों ने विरोध जताते हुए उस के खिलाफ थाना ठाकुरद्वारा में लड़की भगाने की रिपोर्ट दर्ज करा दी थी.

उस के बाद टीना को अपने साथ गांव लालपुर पीपलसाना ले आए थे. टीना के पिता मदन पाल सिंह ने थाना ठाकुरद्वारा में जो रिपोर्ट लिखाई थी, उस में कहा था कि मैं टीना से शादी नहीं करना चाहता. जबकि ऐसी कोई बात नहीं थी.

उसी शिकायत के आधार पर टीना भी मुझे बारबार फोन पर धमकी दे रही थी कि अगर मैं ने  उस से शादी नहीं की तो वह मुझे जेल भिजवा देगी. उस के बाद से पुलिस मुझे आए दिन परेशान करने लगी.

उस घटना के 3 माह बाद पंचायत बैठी. टीना ने अपने परिवार वालों से साफसाफ कह दिया था कि उस की शादी होगी तो सिर्फ जतिन से क्योंकि वह जनित को अपना सब कुछ सौंप चुकी है.

पंचायत में दोनों पक्षों के बीच बात चली, सभी पंचों ने एकमत हो कर फैसला सुनाया कि जब इतना सब कुछ हो चुका है तो क्यों न टीना व जतिन की शादी कर दी जाए.  इस फैसले को दोनों पक्षों ने मान लिया.

इस फैसले के बाद टीना के मातापिता ने शादी की तैयारी शुरू कर दी थी. कार्ड छप गए थे. सीमित संख्या में लोग अमंत्रित किए जा रहे थे. सवा महीने पहले टीना के पिता कालागढ़ में जतिन के घर जा कर लगुन का सामान दे आए थे.

गरम सूट, सोने की चेन, अंगूठी कपड़े, शादी के कार्ड, मिठाई, फल वगैरह ले कर गए थे. वहां पर उन की बहुत आवभगत हुई थी. लगुन देने के बाद वह अपने गांव लौट कर शादी की बाकी तैयारी में जुट गए थे.

घर में शादी का सारा सामान आ चुका था. दहेज का सारा सामान टीना के पिता ने खरीद लिया था. अब, बस शादी के 6 दिन रह गए थे.

14 जून, 2021 की सुबह टीना के मोबाइल नंबर पर जतिन का फोन आया था. टीना बहुत खुश थी. जतिन फोन पर बोला, ‘‘तुम्हारे पापा ने लगन में मुझे जो सूट दिया है, वह गरम है और गरमी का मौसम है. आजकल शेरवानी का रिवाज है. मैं तुम्हें भी कपड़े दिलवाना चाहता हूं. बस, 2 ही जगह हैं काशीपुर या मुरादाबाद. मुरादाबाद के टाउनहाल बाजार में शादी का सारा समान कपड़े शेरवानी, जूते, चप्पल सभी मिल जाते हैं. वहीं से सब खरीद लाते हैं. इस के साथ कुछ मौजमस्ती भी करेंगे. कुछ खाएंगे, एंजौय करेंगे. फिर शाम को घर आ जाएंगे.’’

जतिन ने पुलिस को बताया कि टीना से फोन पर बात करने के बाद 14 जून को वह समय पर टीना के घर ठीक 11 बजे पहुंच गया था. वहां होने वाली सास ने खूब खातिरदारी की थी.

सोमवती ने बहुत प्यार से खाना खिलाया था. होने वाले दामाद के व्यवहार से खुश थी. टीना भी अपना मनपसंद जीवनसाथी पा कर बेहद संतुष्ट और खुश थी. टीना और जतिन के मोटरसाइकिल से मुरादाबाद के लिए निकलते समय सोमवती ने बायबाय कर विदाई की थी.

यहां तक सब कुछ सामान्य प्लान के मुताबिक चल रहा था. टीना और जतिन के बीच मामला तब बिगड़ गया जब वे मुरादाबाद जाने के बजाय एक मकान में कुछ समय गुजारने के लिए ठहरे.

उन के बीच बातोंबातों में बहस छिड़ गई जिस ने हिंसा का रूप ले लिया. टीना के हाथों थप्पड़ खा कर जतिन काफी असहज हो गया था. गुस्से में उस ने भी टीना के मुंह पर 2 थप्पड़ जड़ दिए. उन के बीच हाथापाई बढ़ गई.

जतिन उस पर किसी दूसरी लड़की के साथ संबंध बनाने के आरोप में गुस्से में पागल हो गया था. उस ने टीना की गरदन उस के स्टौल से ही घोंट दी. फिर मोटरसाइकिल पर ही अपने पीछे उसे स्टोल से बांध लिया. थोड़ी दूर जा कर सुनसान जगह पर उसे गड्ढे में धकेल कर फरार हो गया.

सुरजन नगर से स्योहारा की तरफ भागने के दौरान वह 15 जून को पकड़ा गया. पुलिस को उस की निशानदेही पर हत्या में इस्तेमाल स्टोल व उस में बंधा टीना का मोबाइल पास के तालाब से बरामद कर लिया था.

बाद में विवेचनाधिकारी सत्येंद्र सिंह ने भादंवि की धारा 302 के तहत जतिन को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश कर दिया. वहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

   (कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित)

Manohar Kahaniya- दुलारी की साजिश: भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

लोक जनशक्ति पार्टी के आदिवासी प्रकोष्ठ के युवा प्रदेश अध्यक्ष 35 वर्षीय अनिल उरांव रोजाना की तरह उस दिन भी नाश्ता कर के क्षेत्र में भ्रमण के लिए तैयार हो कर ड्राइंगरूम में बैठे अपने भतीजे के आने का इंतजार कर रहे थे. तभी उन के मोबाइल फोन की घंटी बजी. अपनी शर्ट की जेब से मोबाइल निकाल कर डिसप्ले पर उभर रहे नंबर पर नजर डाली तो वह नंबर जानापहचाना निकला.

स्क्रीन पर डिसप्ले हो रहे नंबर को देख कर अनिल उरांव का चेहरा खुशियों से खिल उठा था. उन्होंने काल रिसीव करते हुए कहा, ‘‘हैलो!’’

‘‘नेताजी, प्रणाम.’’ दूसरी ओर से एक महिला की मीठी सी आवाज अनिल उरांव के कानों से टकराई.

‘‘प्रणाम…प्रणाम.’’ उन्होंने जबाव दिया, ‘‘कैसी हो प्रियंकाजी?’’ उस महिला का नाम प्रियंका उर्फ दुलारी था.

‘‘ठीक हूं, नेताजी.’’ प्रियंका जबाव देते हुए बोली, ‘‘मैं क्या कह रही थी कि जनता की खैरियत पूछने जब क्षेत्र में निकलिएगा तो मेरे गरीबखाने पर जरूर पधारिएगा. मैं आप की राह तकूंगी.’’

‘‘सुबह….सुबह क्यों मेरी टांग खींच रही हैं प्रियंकाजी. कोई और नहीं मिला था क्या आप को टांग खींचने के लिए? आलीशान और शानदार महल कब से गरीबखाना बन गया?’’ अनिल ने कहा.

‘‘क्या नेताजी? क्यों मजाक उड़ा रहे हैं इस नाचीज का. काहे का शानदार महल. सिर ढंकने के लिए ईंटों की छत ही तो है. बहुत मजाक करते हैं आप मुझ से. अच्छा, अब मजाक छोडि़ए और सीरियस हो जाइए. ये बताइए कि दोपहर तक आ रहे हैं न मेरी कुटिया में, मुझ से मिलने. कुछ जरूरी मशविरा करना है आप से.’’ वह बोली.

‘‘ऐसा कभी हुआ है प्रियंकाजी कि आप बुलाएं और हम न आएं. फिर जब आप इतना प्रेशर मुझ पर बना ही रही हैं तो भला मैं कैसे कह दूं कि मैं आप की कुटिया पर नहीं पधारूंगा, मैं जरूर आऊंगा. मुझे तो सरकार के दरबार में हाजिरी लगानी ही होगी.’’

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नेता अनिल उरांव की दिलचस्प बातें सुन कर प्रियंका खिलखिला कर हंस पड़ी तो वह भी अपनी हंसी रोक नहीं पाए और ठहाका मार कर हंसने लगे. उस के बाद दोनों के बीच कुछ देर तक हंसीमजाक होती रही. फिर प्रियंका ने अपनी ओर से फोन डिसकनेक्ट कर दिया तो अनिल उरांव ने भी मोबाइल वापस अपनी जेब के हवाले किया.

फिर भतीजे राजन के साथ मोटरसाइकिल पर सवार हो कर वह मनिहारी क्षेत्र की ओर निकल पड़े. वह खुद मोटरसाइकिल चला रहे थे और भतीजा पीछे बैठा था. यह 29 अप्रैल, 2021 की सुबह साढ़े 10 बजे की बात है.

अनिल उरांव को क्षेत्र भ्रमण में निकले तकरीबन 10 घंटे बीत चुके थे. वह अभी तक घर वापस नहीं लौटे थे और न ही उन का फोन ही लग रहा था. घर वालों ने साथ गए जब भतीजे से पूछा कि दोनों बाहर साथ निकले थे तो तुम उन्हें कहां छोड़ कर आए?

इस पर उस ने जबाव दिया, ‘‘चाचा को रेलवे लाइन के उस पार छोड़ कर आया था. उन्होंने कहा था कि वह प्रियंका के यहां जा रहे हैं, बुलाया है, मीटिंग करनी है. थोड़ी देर वहां रुक कर वापस घर लौट आऊंगा, तब मैं बाइक ले कर घर लौट आया था.’’

नेताजी अचानक हुए लापता

भतीजे राजन के बताए अनुसार अनिल प्रियंका से मिलने उस के घर गए थे. राजन उस के घर के पास छोड़ कर आया था तो फिर वह कहां चले गए? अनिल के घर वालों ने प्रियंका को फोन कर के अनिल के बारे में पूछा तो उस ने यह कहते हुए अपना पल्ला झाड़ लिया कि नेताजी तो उस के यहां आए ही नहीं.

यह सुन कर सभी के पैरों तले से जमीन खिसक गई थी. वह प्रियंका के यहां नहीं गए तो फिर कहां गए?

लोजपा नेता अनिल उरांव और प्रियंका काफी सालों से एकदूसरे को जानते थे. दोनों के बीच संबंध काफी मधुर थे. यह बात अनिल के घर वाले और प्रियंका के पति राजा भी जानते थे. बावजूद इस के किसी ने कभी कोई विरोध नहीं जताया था.

अनिल को ले कर घर वाले परेशान हो गए थे. उन के परिचितों के पास भी फोन कर के पता लगाया गया, लेकिन उन का कहीं पता नहीं चला. घर वालों को अंदेशा हुआ कि कहीं उन के साथ कोई अनहोनी तो नहीं हो गई.

उसी दिन रात में नेता अनिल उरांव की पत्नी पिंकी कुछ लोगों को साथ ले कर हाट थाने पहुंची और पति की गुमशुदगी की एक तहरीर थानाप्रभारी सुनील कुमार मंडल को सौंप दी. तहरीर लेने के बाद थानाप्रभारी सुनील कुमार ने पिंकी को भरोसा दिलाया कि पुलिस नेताजी को ढूंढने का हरसंभव प्रयास करेगी. आप निश्चिंत हो कर घर जाएं. उस के बाद पिंकी वापस घर लौट आई.

मामला हाईप्रोफाइल था. लोक जनशक्ति पार्टी (लोजपा) के आदिवासी प्रकोष्ठ के प्रदेश अध्यक्ष अनिल उरांव की गुमशुदगी से  जुड़ा हुआ मामला था. उन्होंने अनिल उरांव की गुमशुदगी की सूचना दर्ज कर ली और आवश्यक काररवाई में जुट गए. चूंकि यह मामला राज्य के एक बड़े नेता की गुमशुदगी से जुड़ा हुआ था, इसलिए उन्होंने इस बाबत एसपी दया शंकर को जानकारी दे दी थी.

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वह जानते थे कि अनिल उरांव कोई छोटीमोटी हस्ती नहीं है. उन के गुम होने की जानकारी जैसे ही समर्थकों तक पहुंचेगी, वो कानून को अपने हाथ में लेने से कभी नहीं हिचकिचाएंगे. इस से शहर की कानूनव्यवस्था बिगड़ सकती है, इसलिए किसी भी स्थिति से निबटने के लिए उन्हें मुस्तैद रहना होगा.

इधर पति के घर लौटने की राह देखती पिंकी ने पूरी रात आंखों में काट दी थी. लेकिन अनिल घर नहीं लौटे. पति की चिंता में रोरो कर उस का हाल बुरा था. दोनों बेटे प्रांजल (7 साल) और मोनू (2 साल) भी मां को रोता देख रोते रहे. रोरो कर सभी की आंखें सूज गई थीं.

फिरौती की आई काल

बात अगले दिन यानी 30 अप्रैल की सुबह की है. पति की चिंता में रात भर की जागी पिंकी की आंखें कब लग गईं, उसे पता ही नहीं चला. उस की आंखें तब खुलीं जब उस के फोन की घंटी की आवाज कानों से टकराई.

स्क्रीन पर डिसप्ले हो रहे नंबर को देख कर हड़बड़ा कर वह नींद से उठ कर बैठ गई. क्योंकि वह फोन नंबर उस के पति का ही था. वह जल्दी से फोन रिसीव करते हुए बोली, ‘‘हैलो! कहां हो आप? एक फोन कर के बताना भी जरूरी नहीं समझा और पूरी रात बाहर बिता दी. जानते हो कि हम सब आप को ले कर कितने परेशान थे रात भर. और आप हैं कि…’’

पिंकी पति का नंबर देख कर एक सांस में बोले जा रही थी. तभी बीच में किसी ने उस की बात काट दी और रौबदार आवाज में बोला, ‘‘तू मेरी बात सुन. तेरा पति अनिल मेरे कब्जे में है. मैं ने उस का अपहरण कर लिया है.’’

‘‘अपहरण किया है?’’ चौंक कर पिंकी बोली.

‘‘तूने सुना नहीं, क्या कहा मैं ने? तेरे पति का अपहरण किया है, अपहरण.’’

‘‘तुम कौन हो भाई.’’ बिना घबराए, हिम्मत जुटा कर पिंकी आगे बोली, ‘‘तुम ने ऐसा क्यों किया? मेरे पति से तुम्हारी क्या दुश्मनी है, जो उन का अपहरण किया?’’

अपहर्त्ताओं को दिए 10 लाख रुपए

‘‘ज्यादा सवाल मत कर. जो मैं कहता हूं चुपचाप सुन. फिरौती के 10 लाख रुपयों का बंदोबस्त कर के रखना. मेरे दोबारा फोन का इंतजार करना. मैं दोबारा फोन करूंगा. रुपए कब और कहां पहुंचाने हैं, बताऊंगा. हां, ज्यादा चूंचपड़ करने या होशियारी दिखाने की कोशिश मत करना और न ही पुलिस को बताना. नहीं तो तेरे पति के टुकड़ेटुकड़े कर के कौओं को खिला दूंगा, समझी.’’ फोन करने वाले ने पिंकी को धमकाया.

‘‘नहीं…नहीं उन्हें कुछ मत करना.’’ पिंकी फोन पर गिड़गिड़ाने लगी, ‘‘तुम जो कहोगे, मैं वही करूंगी. मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ती हूं. मैं पुलिस को कुछ नहीं बताऊंगी. प्लीज, उन्हें छोड़ दो. पैसे कहां पहुंचाने हैं, बता दो. तुम्हारे पैसे समय पर पहुंच जाएंगे.

अगले भाग में पढ़ें- अनिल उरांव की मिली लाश

दिल वर्सेस दौलत: भाग 1

लेखिका- रेणु गुप्ता

‘‘किस का फोन था, पापा?’’

‘‘लाली की मम्मी का. उन्होंने कहा कि किसी वजह से तेरा और लाली का रिश्ता नहीं हो पाएगा.’’

‘‘रिश्ता नहीं हो पाएगा? यह क्या मजाक है? मैं और लाली अपने रिश्ते में बहुत आगे बढ़ चुके हैं. नहीं, नहीं, आप को कोई गलतफहमी हुई होगी. लाली मेरे साथ ऐसा कैसे कर सकती है? आप ने ठीक से तो सुना था, पापा?’’

‘‘अरे भाई, मैं गलत क्यों बोलने लगा. लाली की मां ने साफसाफ मु झ से कहा, ‘‘आप अपने बेटे के लिए कोई और लड़की ढूंढ़ लें. हम अबीर से लाली की शादी नहीं करा पाएंगे.’’

पापा की ये बातें सुन अबीर का कलेजा छलनी हो आया. उस का हृदय खून के आंसू रो रहा था. उफ, कितने सपने देखे थे उस ने लाली और अपने रिश्ते को ले कर. कुछ नहीं बचा, एक ही  झटके में सब खत्म हो गया, भरे हृदय के साथ लंबी सांस लेते हुए उस ने यह सोचा.

हृदय में चल रहा भीषण  झं झावात आंखों में आंसू बन उमड़नेघुमड़ने लगा. उस ने अपना लैपटौप खोल लिया कि शायद व्यस्तता उस के इस दर्द का इलाज बन जाए लेकिन लैपटौप की स्क्रीन पर चमक रहे शब्द भी उस की आंखों में घिर आए खारे समंदर में गड्डमड्ड हो आए.  झट से उस ने लैपटौप बंद कर दिया और खुद पलंग पर ढह गया.

लाली उस के कुंआरे मनआंगन में पहले प्यार की प्रथम मधुर अनुभूति बन कर उतरी थी. 30 साल के अपने जीवन में उसे याद नहीं कि किसी लड़की ने उस के हृदय के तारों को इतनी शिद्दत से छुआ हो. लाली उस के जीवन में मात्र 5-6 माह के लिए ही तो आई थी, लेकिन इन चंद महीनों की अवधि में ही उस के संपूर्ण वजूद पर वह अपना कब्जा कर बैठी थी, इस हद तक कि उस के भावुक, संवेदनशील मन ने अपने भावी जीवन के कोरे कैनवास को आद्योपांत उस से सा झा कर लिया. मन ही मन उस ने उसे अपने आगत जीवन के हर क्षण में शामिल कर लिया. लेकिन शायद होनी को यह मंजूर नहीं था. लाली के बारे में सोचतेसोचते कब वह उस के साथ बिताए सुखद दिनों की भूलभुलैया में अटकनेभटकने लगा, उसे तनिक भी एहसास नहीं हुआ.

शुरू से वह एक बेहद पढ़ाकू किस्म का लड़का था जिस की जिंदगी किताबों से शुरू होती और किताबों पर ही खत्म. उस की मां लेखिका थीं. उन की कहानियां विभिन्न पत्रपत्रिकाओं में छपती रहतीं. पिता को भी पढ़नेलिखने का बेहद शौक था. वे एक सरकारी प्रतिष्ठान में वरिष्ठ वैज्ञानिक थे. घर में हर कदम पर किताबें दिखतीं. पुस्तक प्रेम उसे नैसर्गिक विरासत के रूप में मिला. यह शौक उम्र के बढ़तेबढ़ते परवान चढ़ता गया. किशोरावस्था की उम्र में कदम रखतेरखते जब आम किशोर हार्मोंस के प्रभाव में लड़कियों की ओर आकर्षित होते हैं,  उन्हें उन से बातें करना, चैट करना, दोस्ती करना पसंद आता है, तब वह किताबों की मदमाती दुनिया में डूबा रहता.

बचपन से वह बेहद कुशाग्र था. हर कक्षा में प्रथम आता और यह सिलसिला उस की शिक्षा खत्म होने तक कायम रहा. पीएचडी पूरी करने के बाद एक वर्ष उस ने एक प्राइवेट कालेज में नौकरी की. तभी यूनिवर्सिटी में लैक्चरर्स की भरती हुई और उस के विलक्षण अकादमिक रिकौर्ड के चलते उसे वहीं लैक्चरर के पद पर नियुक्ति मिल गई. नौकरी लगने के साथसाथ घर में उस के रिश्ते की बात चलने लगी.

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वह अपने मातापिता की इकलौती संतान था. सो, मां ने उस से उस की ड्रीमगर्ल के बारे में पूछताछ की. जवाब में उस ने जो कहा वह बेहद चौंकाने वाला था.

मां, मु झे कोई प्रोफैशनल लड़की नहीं चाहिए. बस, सीधीसादी, अच्छी पढ़ीलिखी और सम झदार नौनवर्किंग लड़की चाहिए, जिस का मानसिक स्तर मु झ से मिले. जो जिंदगी का एकएक लमहा मेरे साथ शेयर कर सके. शाम को घर आऊं तो उस से बातें कर मेरी थकान दूर हो सके.

मां उस की चाहत के अनुरूप उस के सपनों की शहजादी की तलाश में कमर कस कर जुट गई. शीघ्र ही किसी जानपहचान वाले के माध्यम से ऐसी लड़की मिल भी गई.

उस का नाम था लाली. मनोविज्ञान में पोस्ट ग्रेजुएशन की हुई थी. संदली रंग और बेहद आकर्षक, कंटीले नैननक्श थे उस के. फूलों से लदीफंदी डौलनुमा थी वह. उस की मोहक शख्सियत हर किसी को पहली नजर में भा गई.

उस के मातापिता दोनों शहर के बेहद नामी डाक्टर थे. पूरी जिंदगी अपने काम के चलते बेहद व्यस्त रहे. इकलौती बेटी लाली पर भी पूरा ध्यान नहीं दे पाए. लाली नानी, दादी और आयाओं के भरोसे पलीबढ़ी. ताजिंदगी मातापिता के सान्निध्य के लिए तरसती रही. मां को ताउम्र व्यस्त देखा तो खुद एक गृहिणी के तौर पर पति के साथ अपनी जिंदगी का एकएक लमहा भरपूर एंजौय करना चाहती थी.

विवाह योग्य उम्र होने पर उस के मातापिता उस की इच्छानुसार ऐसे लड़के की तलाश कर रहे थे जो उन की बेटी को अपना पूरापूरा समय दे सके, कंपेनियनशिप दे सके. तभी उन के समक्ष अबीर का प्रस्ताव आया. उसे एक उच्चशिक्षित पर घरेलू लड़की की ख्वाहिश थी. आजकल अधिकतर लड़के वर्किंग गर्ल को प्राथमिकता देने लगे थे. अबीर जैसे नौनवर्किंग गर्ल की चाहत रखने वाले लड़कों की कमी थी. सो, अपने और अबीर के मातापिता के आर्थिक स्तर में बहुत अंतर होने के बावजूद उन्होंने अबीर के साथ लाली के रिश्ते की बात छेड़ दी.

संयोगवश उन्हीं दिनों अबीर के मातापिता और दादी एक घनिष्ठ पारिवारिक मित्र की बेटी के विवाह में शामिल होने लाली के शहर पहुंचे. सो, अबीर और उस के घर वाले एक बार लाली के घर भी हो आए. लाली अबीर और उस के परिवार को बेहद पसंद आई. लाली और उस के परिवार वालों को भी अबीर अच्छा लगा.

दोनों के रिश्ते की बात आगे बढ़ी. अबीर और लाली फोन पर बातचीत करने लगे. फिर कुछ दिन चैटिंग की. अबीर एक बेहद सम झदार, मैच्योर और संवेदनशील लड़का था. लाली को बेहद पसंद आया. दोनों में घनिष्ठता बढ़ी. दोनों को एकदूसरे से बातें करना बेहद अच्छा लगता. फोन पर रात को दोनों घंटों बतियाते. एकदूसरे को अपने अनुकूल पा कर दोनों कभीकभार वीकैंड पर मिलने भी लगे. एकदूसरे को विवाह से पहले अच्छी तरह जाननेसम झने के उद्देश्य से अबीर  शुक्रवार की शाम फ्लाइट से उस के शहर पहुंच जाता. दोनों शहर के टूरिस्ट स्पौट्स की सैर करतेकराते वीकैंड साथसाथ मनाने लगे. एकदूसरे को गिफ्ट्स का आदानप्रदान भी करने लगे.

दिन बीतने के साथ दोनों के मन में एकदूसरे के लिए चाहत का बिरवा फूट चुका था. सो, दोनों की तरफ से ग्रीन सिगनल पा कर लाली के मातापिता अबीर का घरबार देखने व उन के रोके की तारीख तय करने अबीर के घर पहुंचे. अबीर का घर, रहनसहन, जीवनशैली देख कर मानो आसमान से गिरे वे.

अबीर का घर, जीवनस्तर उस के पिता की सरकारी नौकरी के अनुरूप था. लाली के रईस और अतिसंपन्न मातापिता की अमीरी की बू मारते रहनसहन से कहीं बहुत कमतर था. उन के 2 बैडरूम के फ्लैट में ससुराल आने पर उन की बेटी शादी के बाद कहां रहेगी, वे दोनों इस सोच में पड़ गए. एक बैडरूम अबीर के मातापिता का था, दूसरा बैडरूम उस की दादी का था.

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अबीर की दादी की घरभर में तूती बोलती. वे काफी दबंग व्यक्तित्व की थीं. बेटाबहू उन को बेहद मान देते. उन की तुलना में अबीर की मां का व्यक्तित्व उन्हें तनिक दबा हुआ प्रतीत हुआ.

अबीर के घर सुबह से शाम तक एक पूरा दिन बिता कर उन्होंने पाया कि उन के घर में दादी की मरजी के बिना पत्ता तक नहीं हिलता. उन की सीमित आय वाले घर में उन्हें बातबात पर अबीर के मातापिता के मितव्ययी रवैए का परिचय मिला.

अगले दिन लाली के मातापिता ने बेटी को सामने बैठा उस से अबीर के रिश्ते को ले कर अपने खयालात शेयर किए.

लाली के पिता ने लाली से कहा, ‘सब से पहले तो तुम मु झे यह बताओ, अबीर के बारे में तुम्हारी क्या राय है?’

‘पापा, वह एक सीधासादा, बेहद सैंटीमैंटल और सुल झा हुआ लड़का लगा मु झे. यह निश्चित मानिए, वह कभी दुख नहीं देगा मु झे. मेरी हर बात मानता है. बेहद केयरिंग है. दादागीरी, ईगो, गुस्से जैसी कोई नैगेटिव बात मु झे उस में नजर नहीं आई. मु झे यकीन है, उस के साथ हंसीखुशी जिंदगी बीत जाएगी. सो, मु झे इस रिश्ते से कोई आपत्ति नहीं.’

तभी लाली की मां बोल पड़ीं, ‘लेकिन, मु झे औब्जेक्शन है.’

‘यह क्या कह रही हैं मम्मा? हम दोनों अपने रिश्ते में बहुत आगे बढ़ चुके हैं. अब मैं इस रिश्ते से अपने कदम वापस नहीं खींच सकती. आखिर बात क्या है? आप ने ही तो कहा था, मु झे अपना लाइफपार्टनर चुनने की पूरीपूरी आजादी होगी. फिर, अब आप यह क्या कह रही हैं?’

‘लाली, मैं तुम्हारी मां हूं. तुम्हारा भला ही सोचूंगी. मेरे खयाल से तुम्हें यह शादी कतई नहीं करनी चाहिए.’

‘मौम, सीधेसीधे मुद्दे पर आएं, पहेलियां न बु झाएं.’

‘तो सुनो, एक तो उन का स्टेटस, स्टैंडर्ड हम से बहुत कमतर है. पैसे की बहुत खींचातानी लगी मु झे उन के घर में. क्यों जी, आप ने देखा नहीं, शाम को दादी ने अबीर से कहा, एसी बंद कर दे. सुबह से चल रहा है. आज तो सुबह से मीटर भाग रहा होगा. तौबा उन के यहां तो एसी चलाने पर भी रोकटोक है.

‘फिर दूसरी बात, मु झे अबीर की दादी बहुत डौमिनेटिंग लगीं. बातबात पर अपनी बहू पर रोब जमा रही थीं. अबीर की मां बेचारी चुपचाप मुंह सीए हुए उन के हुक्म की तामील में जुटी हुई थी. दादी मेरे सामने ही बहू से फुसफुसाने लगी थीं, बहू मीठे में गाजर का हलवा ही बना लेती. नाहक इतनी महंगी दुकान से इतना महंगी मूंग की दाल का हलवा और काजू की बर्फी मंगवाई. शायद कल हमारे सामने हमें इंप्रैस करने के लिए ही इतनी वैराइटी का खानापीना परोसा था. मु झे नहीं लगता यह उन का असली चेहरा है.’

‘अरे मां, आप भी न, राई का पहाड़ बना देती हैं. ऐसा कुछ नहीं है. खातेपीते लोग हैं. अबीर के पापा ऐसे कोई गएगुजरे भी नहीं. क्लास वन सरकारी अफसर हैं. हां, हम जैसे पैसेवाले नहीं हैं. इस से क्या फर्क पड़ता है?’

Manohar Kahaniya: चित्रकूट जेल साजिश- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

उत्तर प्रदेश के चित्रकूट जिले का नाम वैसे तो दुनियाभर में रामायण काल से ही विख्यात है. क्योंकि अयोध्या के राजा श्रीराम ने अपनी पत्नी सीता और अनुज लक्ष्मण के साथ इसी चित्रकूट में अपने 14 साल के वनवास का अधिकांश समय व्यतीत किया था.

लेकिन इन दिनों यह पौराणिक शहर एक ऐसी घटना के लिए चर्चित हो रहा है, जिस ने पूरी उत्तर प्रदेश सरकार और यहां की कानून व्यवस्था को कठघरे में खड़ा कर दिया है.

14 मई, 2021 की सुबह का वक्त था. उस दिन पूरा देश ईदउलफितर यानी ईद का त्यौहार मना रहा था. चित्रकूट जिले की रगौली जेल के जेलर महेंद्र पाल हमेशा की तरह सुबह साढे़ 5 बजे जेल परिसर के अपने निवास से जेल के भीतर पहुंचे. उन्होंने जेल की हाई सिक्योरिटी समेत सभी बैरकों को खुलवाया था, ताकि बंदी अपने नित्यकर्म कर सकें.

जेल अधीक्षक श्रीप्रकाश त्रिपाठी भी जेल में सुबह 7 बजे आ गए थे. उन के कारागार में पहुंचने पर जेलर महेंद्र पाल ठीक 8 बजे अपने सरकारी आवास में नहानेधोने और नाश्ता करने के लिए चले गए थे. जेल में होने वाली सुबह की गतिविधियां ठीक से संचालित होने लगीं तो जेल अधीक्षक त्रिपाठी भी साढे 9 बजे कारागार से बाहर अपने सरकारी आवास पर नहानेधोने और नाश्ता करने चले गए.

जेल के दोनों जिम्मेदार अधिकारी जेल के बाहर अपने आवास में नित्य कर्म करने में व्यस्त थे, उसी वक्त उन्हें कारागार के भीतर से धांय… धांय गोलियां चलने की आवाजें आने लगीं.

जेल अधीक्षक तत्काल अपने आवास के बाहर आए तो उन्होंने बंगले के बाहर तैनात सुरक्षाकर्मियों से पूछा कि गोलियां कहां और क्यों चल रही हैं.  सुरक्षाकर्मियों ने कुछ देर में जेलर व जेल अधीक्षक को बता दिया था कि जेल के भीतर एक बंदी ताबड़तोड़ गोलियां चला रहा है और उस ने 2 बंदियों को गोलियां मार दी हैं.

जेल अधीक्षक और जेलर के लिए यह सूचना एकदम सिर पर फूटने वाले बम जैसी थी. उन्होंने हड़बड़ी में वरदी डाली और 5 मिनट के भीतर तैयार हो कर कारागार के भीतर पहुंच गए.

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कारागार के भीतर पहुंचते ही त्रिपाठी ने जेल का अलार्म बजवा कर खतरे का संकेत दे दिया. जिस का मतलब था कि जेल के भीतर या तो दंगा हो गया है या कोई सुरक्षा की खतरनाक स्थिति उत्पन्न हो गई. इस का मतलब साफ होता है कि जेल के सभी सुरक्षाकर्मी, जिन के आवास कारागार के आसपास ही होते हैं, यह अलार्म उन के लिए तत्काल कारागार तक पहुंचने की चेतावनी होती है.

जेल अधीक्षक ने जेल मार्ग पर ही बनी पुलिस चौकी के अलावा जिले के डीएम व एसपी को भी जेल में एक बंदी द्वारा गोलियां चलाए जाने की सूचना दे दी.

जेल अधीक्षक त्रिपाठी व जेलर महेंद्र  पाल सुरक्षाकर्मियों को ले कर जेल के भीतर पहुंचे और इस के बाद जेल के भीतर जो नजारा देखने को मिला उस ने चित्रकूट की जेल और जिला प्रशासन को ही नहीं, बल्कि पूरे उत्तर प्रदेश शासन को हिला कर रख दिया.

दरअसल, इस दिन चित्रकूट की रगौली जेल में 90 मिनट तक चले रोमांचक ड्रामे में एक या 2 नहीं, 3 लोगों की मौत हुई थी.

दरअसल, उस सुबह करीब 10 बजे से कुछ मिनट पहले अंशुल दीक्षित अपनी बैरक से निकला. वहां तैनात सुरक्षाकर्मियों से उस ने कहा कि वह पीसीओ जा रहा है, किसी को फोन करना है.

बैरक के बाहर निकलते ही वह उस चक्कर वाले ग्राउंड में पहुंचा, जहां बंदियों को लाइन में खड़ा कर के उन की गिनती हो रही थी. जिस के बाद उन्हें अपनी बैरकों में वापस लौटना था.

अंशुल ने चलाईं गोलियां

परेड ग्रांउड में पहंचने के बाद अंशुल की नजरें तेजी से किसी को खोजने लगीं. अचानक उस की नजरें मेराज पर टिक गईं. उसे देखते ही अंशुल चीख कर बोला, ‘‘अबे ओ मेराज, तुम लोगों ने बहुत आतंक मचा लिया. अब तेरे बाप मुख्तार का खेल खत्म हो चुका है, उस का कोई गुर्गा जिंदा नहीं रहेगा.’’

कुछ बंदी साथियों के साथ खड़ा हो कर बात कर रहा मेराज जब तक कुछ समझ पाता, तब तक अंशुल ने अपनी जींस की बेल्ट में खोंसी हुई पिस्तौल निकाल ली और एक के बाद एक ताबड़तोड़ कई गोलियां मेराज के ऊपर चला दीं. मेराज वहीं लहरा कर जमीन पर गिर गया.

इस दौरान पहली गोली चलते ही और अंशुल के हाथ में पिस्तौल देख वहां आसपास खड़े बंदी सिर पर हाथ रख कर इधरउधर दौड़ते हुए छिपने के लिए जहां जगह मिली उस तरफ भाग निकले.

एक के बाद एक मेराज पर कई गोलियां चलाने के बाद जब अंशुल को इत्मीनान हो गया कि मेराज मर चुका है तो कुछ ही सेकेंड बाद 50 मीटर की दूरी पर स्थित उस अस्थाई बैरक में पहुंचा, जहां पर मुकीम काला बंद था.

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वहां पहुंचते ही अंशुल ने मुकीम से कहा, ‘‘काला मुझे तेरा बहुत दिनों से इंतजार था. मुख्तार का कोई बदमाश जिंदा नहीं रहेगा. खेल खत्म.’’ कहते हुए अंशुल ने अपने हाथ में पकड़े हुए पिस्तौल से कई गोलियां मुकीम पर झोंक दी.

अचानक उस के पिस्तौल की गोलियां खत्म हो गईं तो उस ने जेब में पड़ी एक दूसरी मैग्जीन निकाल कर पिस्तौल में लगाई और एक बार फिर उस का रुख मुकीम काला की तरफ कर ताबड़तोड़ गोलियां चलानी शुरू कर दीं.

चंद मिनटों में ही अंशुल ने मुकीम का शरीर गोलियों से छलनी कर दिया. लहूलुहान मुकीम अस्थाई बैरक में ही लाश बन कर लहराते हुए जमीन पर ढेर हो गया. मुकीम को मारने के बाद अंशुल इत्मीनान से टहलते हुए अपनी बैरक में गया. उस के भीतर कोई डर नहीं दिख रहा था और न ही कोई फिक्र.

अंशुल दीक्षित ने पिस्तौल लहराते हुए बैरक में बंद कुछ अन्य बंदियों को अपने काबू में कर लिया. तब तक जेल के अधिकारी एकत्र होने लगे थे. अंशुल ने उन से कहा कि अगर इन कैदियों को जिंदा बचाना चाहते हो तो मुझे जिंदा जेल से बाहर जाने दो.

जिस वक्त अंशुल रगौली जेल में यह खूनी तांडव कर रहा था. तब इस की खबर पा कर पहले जेल अधीक्षक व जेलर जेल के भीतर पहुंचे. उस के बाद स्थानीय चौकी की पुलिस भी सूचना पा कर जेल के भीतर पहुंच चुकी थी. जेल अधिकारियों व पुलिस ने अंशुल से जब बारबार आत्मसमर्पण के लिए कहना शुरू किया तो उस ने खीझ कर पुलिस पर भी गोलियां चला दीं.

पहले तो पुलिस आत्मरक्षा करने की कोशिश करती रही. लेकिन जब अंशुल की गोलीबारी का सिलसिला जारी रहा तो पुलिस की जवाबी गोलीबारी में अंशुल भी मारा गया.

दरअसल, करीब आधा घंटे तक अंशुल ने पिस्तौल के बल पर कई बंदियों को काबू में कर अपने आगे खड़ा कर लिया था. उस ने बंदियों को मारने की धमकी दे कर खुद को जेल से बाहर निकालने के लिए कहा था.

लेकिन किसी तरह जब उस के आगे खड़े बंदी उसे चकमा दे कर भाग कर बैरकों में चले गए. तो एक तरफ अंशुल और दूसरी तरफ पुलिस फोर्स बची थी. अंशुल ने जैसे ही पोजिशन ले कर पुलिस पर फिर से फायर झोंका तो पुलिस ने जवाबी काररवाई कर उसे मौके पर ही ढेर कर दिया.

इस बीच पुलिस और शार्प शूटर के बीच फायरिंग की सूचना पा कर मंडलायुक्त दिनेश कुमार सिंह, आईजी के. सत्यनारायण, जिलाधिकारी शुभ्रांत कुमार शुक्ल, एसपी अंकित मित्तल भी भारी पुलिस फोर्स के साथ जेल पहुंच गए.

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मुख्यमंत्री ने की रिपोर्ट तलब

जेल के अंदर ताबड़तोड़ फायरिंग की सूचना पूरे जिले में तो जंगल की आग की तरह फैल ही गई थी बल्कि टेलीफोन से मिली सूचना के बाद लखनऊ में सत्ता के गलियारों और नौकरशाही तक में हड़कंप मच गया.

उसी दिन इस घटना का मुकदमा स्थानीय थाने में दर्ज कर लिया गया. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने चित्रकूट जेल में हुए शूटआउट के मामले में डीजी (जेल) आनंद कुमार से रिपोर्ट तलब कर ली.

कमिश्नर डी.के. सिंह, डीआईजी के. सत्यनारायण और एडीजी (जेल) संजीव त्रिपाठी से इस मामले की जांच कर 6 घंटे में पूरी रिपोर्ट देने के लिए कहा गया. डीजी  (जेल) ने घटना की विस्तृत जांच और जेल का जायजा लेने के लिए प्रभारी उप महानिरीक्षक (कारागार) इलाहाबाद रेंज पी.एन. पांडे को चित्रकूट रवाना कर दिया.

दिलचस्प बात थी कि इस शूटआउट में जेल के जो तीनों बंदी मारे गए, उन का किसी न किसी रूप में उत्तर प्रदेश के सब से बड़े डौन मुख्तार अंसारी से करीबी संबंध रहा था.

चित्रकूट जेल शूटआउट की जांच जैसे ही शुरू हुई तो इस में जेल प्रशासन की भूमिका संदिग्ध नजर आने लगी. मामले की जांच कर रहे अफसरों के काररवाई की सूई भी जेलकर्मियों की तरफ घूम गई.

पिस्तौल कैसे पहुंची हमलावर तक

क्योंकि जेल मैनुअल और नियमों के हिसाब से जेल के भीतर कोई भी हथियार लाने पर प्रतिबंध होता है. तब अंशुल दीक्षित के पास पिस्तौल और कारतूसों से मैग्जीन कैसे पहुंचीं. जाहिर था, ये सब जेल के कर्मचारियों और अधिकारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं था.

तत्काल तो वारदात की कडि़यां नहीं जुड़ सकीं, लेकिन यह साफ हो गया कि सुबह करीब साढ़े 9 बजे जेल में ड्यूटी करने वाले बंदी सभी बैरकों में जा कर नाश्ता बांट रहे थे. उसी वक्त कैदियों की गणना भी चल रही थी. ज्यादातर कैदी बैरक से बाहर मैदान में ही थे.

इस की वजह से चारों तरफ जेल के सिपाही नजर गड़ाए मुस्तैद थे. इसी दौरान बाल्टी में कच्चा चना और गुड़ ले कर 2 कैदी अंशुल की बैरक में दाखिल हुए.

वे चना दे कर जैसे ही लौटे चंद मिनट बाद ही अंशुल भी अपनी बैरक से बाहर आया था और उस ने पिस्टल से ताबड़तोड़ फायरिंग कर मेराज और मुकीम काला को मौत के घाट उतार दिया. जांच करने वाले अधिकारियों को शक है कि नाश्ते के साथ ही पिस्तौल भी अंशुल तक पहुंचाई गई थी.

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Social Story in Hindi: डुप्लीकेट- भाग 2: आखिर क्यों दुखी था मनोहर

नीलू भी मजबूर हो गई थी. उस का सब से पहला यौन शोषण मामा ने किया. स्क्रीन टैस्ट के नाम पर कई बार यौन शोषण हुआ, पर उसे किसी फिल्म में काम नहीं मिला.

शूटिंग देखतेदेखते नीलू की दोस्ती निशा से हो गई थी. निशा फिल्मों में डुप्लीकेट का काम करती थी. कभीकभी छोटामोटा रोल भी उसे मिल जाता था.

एक दिन एक फिल्म की शूटिंग चल रही थी. निशा के डुप्लीकेट के रूप में कुछ शौट फिल्माए जाने थे. अचानक निशा की तबीयत खराब हो गई तो उस ने अपना काम नीलू को दिला दिया.

इतने साल हो गए हैं डुप्लीकेट का रोल करतेकरते, पर किसी फिल्म में कोई ढंग का रोल नहीं मिला.

इस के बाद मनोहर व नीलू का मिलनाजुलना बढ़ता रहा. एक दिन वह आया जब उस ने नीलू से शादी कर ली.

शादी के बाद उस ने नीलू को किसी भी फिल्म में डुप्लीकेट का काम करने को बिलकुल मना कर दिया था.

2 साल बाद उन के घर में एक नन्हामुन्ना मेहमान आ गया. बेटे का नाम कमल रखा गया.

एक दिन नीलू ने उस से कहा, ‘मैं तो चाहती हूं कि तुम भी डुप्लीकेट का काम छोड़ दो. जब तुम शूटिंग पर चले जाते हो, मुझे बहुत डर लगता है. अगर तुम्हें कुछ हो गया तो हम दोनों का क्या होगा?’

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‘हां नीलू, तुम ठीक कहती हो. मैं भी यही सोच रहा हूं. मेरा मन भी इस काम से ऊब चुका है. इस काम में इज्जत तो बिलकुल है ही नहीं. कभीकभी तो अपनेआप से ही नफरत होने लगती है.

क्या हम बेइज्जती के ही हकदार हैं, शाबाशी के नहीं?

‘जब कोई मामूली सा डायरैक्टर भी सब के सामने डांट देता है तब लगता है कि क्या हम इतने गिरे हुए हैं जो हमारी इस तरह बेइज्जती कर दी जाती है? क्या हम बेइज्जती के ही हकदार हैं, शाबाशी के नहीं?

‘अब तो यहां मुंबई में रहते हुए मेरा मन ऊब गया है,’ नीलू ने कहा था.

‘तुम ठीक कहती हो. हम जल्द ही यहां से चले जाएंगे किसी छोटे से शहर में या किसी पहाड़ी इलाके में. वहीं पर मैं कोई छोटामोटा काम कर लूंगा. हम अपने बेटे कमल को इस फिल्मी दुनिया से दूर ही रखेंगे.’

नीलू ने मुसकराते हुए उस की ओर देखा था.

एक दिन मनोहर की तबीयत कुछ ज्यादा ही खराब हो गई. इलाज शुरू हुआ. कई डाक्टरों को दिखाया गया, पर बीमारी कम नहीं हो रही थी. जो भी पास में पैसा था, बीमारी की भेंट चढ़ गया.

एक स्पैशलिस्ट डाक्टर को दिखाया गया तो उस ने कुछ जरूरी जांच, दवा, इंजैक्शन वगैरह लिख दिए थे.

मनोहर बिस्तर पर लेटा हुआ कुछ सोच रहा था. उस की आंखों से पता नहीं कब आंसू बह निकले.

नीलू ने उस के आंसू पोंछते हुए कहा था, ‘आप अपना मन दुखी न करो. डाक्टर ने कहा है कि तुम ठीक हो जाओगे.’

‘नीलू, इतने रुपए कहां से आएंगे? तुम रहने दो, जो होगा वह हो जाएगा.’

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‘तुम किसी भी तरह की चिंता मत करो. मैं प्रकाश स्टूडियो जाऊंगी. वहां फिल्म ‘अपना कौन’ की शूटिंग चल रही है. डायरैक्टर प्रशांत राय तुम्हें और मुझे जानता है.’

‘नहीं नीलू, तुम्हें चौथा महीना चल रहा है. तुम दोबारा पेट से हो. ऐसे में तुम्हें मैं कहीं नहीं जाने दूंगा.’

मनोहर  ने मन ही मन यह फैसला किया…

‘तुम्हारी यह नीलू कोई गलत काम कर के पैसे नहीं लाएगी. मुझे जाने दो,’ कह कर नीलू चली गई थी.

मनोहर चुपचाप लेटा रहा. उस ने मन ही मन यह फैसला कर लिया था कि बीमारी ठीक होते ही वह नीलू व बेटे कमल के साथ यहां से चला जाएगा. उसे नींद आने लगी थी.

रात के 3 बज रहे थे. दरवाजे पर खटखटाहट हुई तो उस ने उठ कर दरवाजा खोल दिया. सामने खड़े विजय को देख कर मनोहर बुरी तरह चौंका.

विजय एकदम बोल उठा, ‘मनोहर, जल्दी अस्पताल चलना है. भाभी बहुत सीरियस हैं.’

मनोहर ने घबराई आवाज में पूछा, ‘क्या हुआ नीलू को?’

‘प्रकाश स्टूडियो में ‘अपना कौन’ की शूटिंग चल रही थी. नीलू भाभी ने तुम्हारी बीमारी की बता कर डायरैक्टर प्रशांत राय से काम मांगा. डायरैक्टर ने डुप्लीकेट का काम दे दिया. हीरोइन को सीढि़यों से लुढ़क कर नीचे फर्श पर गिरना था.

‘यही सीन नीलू भाभी पर फिल्माया गया. वे फर्श पर गिरीं तो फिर उठ न सकीं. बेहोश हो गईं. शायद वे पेट से थीं,’ विजय ने बताया था.

यह सुन कर मनोहर सन्न रह गया था. विजय ने एक टैक्सी की और उसे व कमल को साथ ले कर चल दिया.

विजय ने रास्ते में बताया था, ‘जब नीलू भाभी बेहोश हो गईं तो डायरैक्टर प्रशांत राय ने कहा था कि आजकल किसी के साथ हमदर्दी करना भी ठीक नहीं. इस ने हम को बताया नहीं था अपनी प्रैगनैंसी के बारे में. यह सीरियस है. इसे अभी अस्पताल ले जाओ और इस के घर पर खबर कर दो,’ कहते हुए डायरैक्टर ने मुझे कुछ रुपए भी दिए थे.

मनोहर के मुंह से एक शब्द भी नहीं निकल पा रहा था.

अस्पताल पहुंचने पर पता चला कि नीलू आपरेशन थिएटर में है. कुछ देर बाद लेडी डाक्टर ने बाहर आ कर कहा था, ‘सौरी, ज्यादा खून बह जाने के चलते नीलू को नहीं बचाया जा सका. उसे इस हालत में यह काम नहीं करना चाहिए था.’

मनोहर चुपचाप सुनता रहा. वह कुछ भी कहने की हालत में नहीं था.

नीलू ने तो उस से यह डुप्लीकेट का काम न करने का वादा ले लिया था, पर यही काम नीलू को हमेशा के लिए उस से बहुत दूर ले गया था.

फिर उस की जिंदगी में आई निशा. वह निशा को भी कई सालों से जानता था. निशा नीलू की सहेली थी. निशा पड़ोस में ही रहती थी. उसे भी नीलू के इस तरह मरने का बहुत दुख था.

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नादानियां- भाग 1: उम्र की इक दहलीज

प्रथमा की शादी को 3 साल हो गए हैं. कितने अरमानों से उस ने रितेश की जीवनसंगिनी बन कर इस घर में पहला कदम रखा था. रितेश से जब उस की शादी की बात चल रही थी तो वह उस की फोटो पर ही रीझ गई थी. मांपिताजी भी संतुष्ट थे क्योंकि रितेश 2 बहनों का इकलौता भाई था और दोनों बहनें शादी के बाद अपनेअपने घरपरिवार में रचीबसी थीं. सासससुर भी पढ़ेलिखे व सुलझे विचारों के थे.

शादी से पहले जब रितेश उसे फोन करता था तो उन की बातों में उस की मां यानी प्रथमा की होने वाली सास एक अहम हिस्सा होती थी. प्रथमा प्रेमभरी बातें और होने वाले पति के मुंह से खुद की तारीफ सुनने के लिए तरसती रह जाती थी और रितेश था कि बस, मां के ही गुणगान करता रहता. उसी बातचीत के आधार पर प्रथमा ने अनुमान लगा लिया था कि रितेश के जीवन में उस की मां का पहला स्थान है और उसे पति के दिल में जगह बनाने के लिए बहुत मेहनत करनी पड़ेगी.

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शादी के बाद हनीमून की योजना बनाते समय रितेश बारबार हरिद्वार, ऋ षिकेश, मसूरी जाने का प्लान ही बनाता रहा. आखिरी समय तक वह अपनी मम्मीपापा से साथ चलने की जिद करता रहा. प्रथमा इस नई और अनोखी जिद पर हैरान थी क्योंकि उस ने तो यही पढ़ा व सुना था कि हनीमून पर पतिपत्नी इसलिए जाते हैं ताकि वे ज्यादा से ज्यादा वक्त एकदूसरे के साथ बिता सकें और उन की आपसी समझ मजबूत हो. मगर यहां तो उलटी गंगा बह रही है. मां के साथ तीर्थ पर ही जाना था तो इसे हनीमून का नाम देने की क्या जरूरत है. खैर, ससुरजी ने समझदारी दिखाई और उन्हें हनीमून पर अकेले ही भेजा.

स्मार्ट और हैंडसम रितेश का फ्रैंडसर्किल बहुत बड़ा है. शाम को औफिस से घर आते ही जहां प्रथमा की इच्छा होती कि वह पति के साथ बैठ कर आने वाले कल के सपने बुने, उस के साथ घूमनेफिरने जाए, वहीं रितेश अपनी मां के साथ बैठ कर गप मारता और फिर वहां से दोस्तों के पास चला जाता. प्रथमा से जैसे उसे कोई मतलब ही नहीं था. रात लगभग 9 बजे लौटने के बाद खाना खा कर वह सो जाता. हां, हर रात वह सोने से पहले प्रथमा को प्यार जरूर करता था. प्रथमा का कोमल हृदय इस बात से आहत हो उठता, उसे लगता जैसे पति ने उसे सिर्फ अपने बिस्तर में ही जगह दी है, दिल में नहीं. वह केवल उस की आवश्यकतापूर्ति का साधन मात्र है. ऐसा नहीं है कि उस की सास पुरानी फिल्मों वाली ललिता पंवार की भूमिका में है या फिर वह रितेश को उस के पास आने से रोकती है, बल्कि वह तो स्वयं कई बार रितेश से उसे फिल्म, मेले या फिर होटल जाने के लिए कहती. रितेश उसे ले कर भी जाता है मगर उन के साथ उस की मां यानी प्रथमा की सास जरूर होती है. प्रथमा मन मसोस कर रह जाती, मगर सास को मना भी कैसे करे. जब पति खुद चाहता है कि मां उन के साथ रहे तो फिर वह कौन होती है उन्हें टोकने वाली.

कई बार तो उसे लगता कि पति के दिल में उस का एकछत्र राज कभी नहीं हो सकता. वह उस के दिल की रानी सास के रहते तो नहीं बन सकती. उस की टीस तब और भी बढ़ जाती है जब उस की बहन अपने पति के प्यार व दीवानगी के किस्से बढ़ाचढ़ा कर उसे बताती कि कैसे उस के पति अपनी मां को चकमा दे कर और बहाने बना कर उसे फिल्म दिखाने ले जाते हैं, कैसे वे दोनों चांदनी रातों में सड़कों पर आवारगी करते घूमते हैं और चाटपकौड़ी, आइसक्रीम का मजा लेते हैं. प्रथमा सिर्फ आह भर कर रह जाती. हां, उस के ससुर उस के दर्द को समझने लगे थे और कभी बेकार में चाय बनवा कर, पास बैठा कर इधरउधर की बातें करते तो कभी टीवी पर आ रही फिल्म को देखने के लिए उस से अनुरोध करते.

दिन गुजरते रहे, वह सब्र करती रही. लेकिन जब बात सिर से गुजरने लगी तो उस ने एक नया फैसला कर लिया अपनी जीवनशैली को बदलने का. प्रथमा को मालूम था कि राकेश मेहरा यानी उस के ससुरजी को चाय के साथ प्याज के पकौड़े बहुत पसंद हैं, हर रोज वह शाम की चाय के साथ रितेश की पसंद के दूसरे स्नैक्स बनाती रही है और कभीकभी रितेश के कहने पर सासूमां की पसंद के भी. मगर आज उस ने प्याज के पकौड़े बनाए. पकौड़े देखते ही राकेश के चेहरे पर लुभावनी सी मुसकान तैर गई.

प्रथमा ने आज पहली बार गौर से अपने ससुरजी को देखा. राकेश की उम्र लगभग 55 वर्ष थी, मगर दिखने में बहुत ही आकर्षक व्यक्तित्व है उन का. रितेश अपने पापा पर ही गया है, यह सोच कर प्रथमा के दिल में गुदगुदी सी हो गई.

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राकेश ने जीभर कर पकौड़ों की तारीफ की और प्रथमा से बड़े ही नाटकीय अंदाज में कहा, ‘‘मोगाम्बो खुश हुआ. अपनी एक इच्छा बताओ, बच्ची. कहो, क्या चाहती हो?’’ प्रथमा खिल उठी. फिलहाल तो उस ने कुछ नहीं मांगा मगर आगे की रणनीति मन ही मन तय कर ली. 2 दिनों बाद उस ने राकेश से कहा, ‘‘आज यह बच्ची आप से आप का दिया हुआ वादा पूरा करने की गुजारिश करती है. क्या आप मुझे कार चलाना सिखाएंगे?’’

‘‘क्यों नहीं, अवश्य सिखाएंगे बालिके,’’ राकेश ने कहा. जब वे बहुत खुश होते हैं तो इसी तरह नाटकीय अंदाज में बात करते हैं. अब हर शाम औफिस से आ कर चायनाश्ता करने के बाद राकेश प्रथमा को कार चलाना सिखाने लगा. जब राकेश उसे क्लच, गियर, रेस और ब्रेक के बारे में जानकारी देता तो प्रथमा बड़े मनोयोग से सुनती. कभीकभी घुमावदार रास्तों पर कार को टर्न लेते समय स्टीयरिंग पर दोनों के हाथ आपस में टकरा जाते. राकेश ने इसे सामान्य प्रक्रिया समझते हुए कभी इस तरफ ज्यादा ध्यान नहीं दिया मगर प्रथमा के गाल लाल हो उठते थे.

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