सजा- भाग 3: तरन्नुम ने असगर को क्यों सजा दी?

असगर ने तरन्नुम का हाथ दबाया, ‘‘मेरे दोस्त अपने घर में मुझे मेहमान रखने की इजाजत नहीं देंगे.’’

‘‘पर मैं तो मेहमान नहीं, आप की बीवी हूं,’’ तरन्नुम ने मरियल आवाज में दोहराया.

‘‘उन की पहली शर्त ही कुंआरे को रखने की थी और ऐसी जल्दी भी क्या थी. मैं ने लिखा था कि घर मिलते ही बुला लूंगा,’’ असगर का दबा गुस्सा बाहर आया.

‘‘हमारी शादी को 8 महीने हो गए. तब से अभी तक अगर अपना घर नहीं मिला तो क्या किराए का भी नहीं मिल सकता था,’’ तरन्नुम ने खीज कर पूछा. उसे दिल ही दिल में बहुत बुरा लग रहा था कि शादी के चंद महीने बाद ही वह खास औरताना अंदाज में मियांबीवी वाला झगड़ा कर रही थी.

‘‘ठीक है,’’ असगर ने कहा, ‘‘अब तुम दिल्ली आ ही गई हो तो घरों की खोज भी कर लो. तुम्हें खुद ही पता लग जाएगा कि घर ढूंढ़ना कितना आसान है,’’ होटल में आ कर भी तरन्नुम महसूस कर रही थी कहीं कुछ है जो असगर को सामान्य नहीं होने दे रहा.

अगले दिन असगर जब दफ्तर चला गया तब तरन्नुम ने अपनी सहेली रीता अरोड़ा को फोन किया और अपनी घर न मिलने की मुश्किल बताई. रीता ने कहा कि वह शाम को अपने परिचितों, मित्रों से बातचीत कर के कुछ इंतजाम करेगी.

दूसरे दिन रीता अपनी कार ले कर तरन्नुम को लेने आई. रास्ते से उन्होंने एक दलाल को साथ लिया जो विभिन्न स्थानों में उन्हें मकान दिखाता रहा. शाम होने को आई लेकिन अभी तक जैसा घर तरन्नुम चाहती थी वैसा एक भी नहीं मिला. कहीं घर ठीक नहीं लगा तो कहीं पड़ोस तरीके का नहीं. अगर दोनों ठीक मिल गए तो आसपास का माहौल बेतुका. दलाल को छोड़ते हुए रीता ने घर के बारे में पूरी तरह अपनी इच्छा समझाई.

ये भी पढ़ें- पेशी: क्या थी न्यायाधीश के बदले व्यवहार की वजह?

दलाल ने कहा 2-3 दिन के अंदर ही ऐसे कुछ घर खाली होने वाले हैं तब वह खुद ही उन्हें फोन कर के सही घर दिखाएगा.

असगर तरन्नुम से पहले ही होटल आ गया था. थकी, बदहवास तरन्नुम को देख कर उसे बहुत अफसोस हुआ. फोन पर चाय का आदेश दे कर बोला, ‘‘कहां मारीमारी फिर रही हो? यह काम तुम्हारे बस का नहीं है.’’

‘‘वाह, जब शादी की है तो घर भी बसा कर दिखा देंगे. आप हमारे लिए घर नहीं खोज सके तो क्या. हम ही आप को घर ढूंढ़ कर रहने को बुला लेंगे,’’ तरन्नुम खुशी से छलकती हुई बोली.

‘‘चलो, यही सही,’’ असगर ने कहा, ‘‘चायवाय पी कर नहा कर ताजा हो लो फिर घर पर फोन कर देना. अभी अब्बू परेशान हो रहे होंगे. उस के बाद नाटक देखने चलेंगे. और हां, साड़ी की जगह सूट पहनना. तुम पर बहुत फबता है.’’

ये भी पढ़ें- मजबूरी: समीर को फर्ज निभाने का क्या परिणाम मिला?

असगर की इस बात पर तरन्नुम इठलाई, ‘‘अच्छा मियांजी.’’

रात देर से लौटे, दिन भर की थकान थी, इतना तो तरन्नुम कभी नहीं घूमी थी. पर अब रात को भी उसे नींद नहीं आ रही थी. कल देखे जाने वाले घरों के बारे में वह तरहतरह के सपने संजो रही थी. उस का अपना घर, उस का अपना खोजा घर.

नाश्ते के बाद असगर दफ्तर चला गया. तरन्नुम रीता के इंतजार में तैयार हो कर बैठी उपन्यास पढ़ रही थी. उस का मन सुबह से ही किसी भी चीज में नहीं लग रहा था. होटल भला घर हो सकता है कभी? उसे लग रहा था जैसे वह मुसाफिरखाने में अपने सामान के साथ बैठी अपनी मंजिल का इंतजार कर रही है और गाड़ी घंटों नहीं, हफ्तों की देर से आने का सिर्फ ऐलान ही कर रही है और हर पल उस की बेचैनी बढ़ती ही जा रही है.

अचानक फोन की घंटी से जैसे वह गहरी सोच से जाग उठी. रीता ने होटल की लौबी से फोन किया था. रीता की आवाज खुशी से खनक रही थी. तरन्नुम ने झटपट पर्स उठाया और लौबी में आ गई. रीता ने बाहर आतेआते कहा, ‘‘आज ही सुबह बिन्नी दी का फोन आया था. उन के पड़ोस में कोई मुसलिम परिवार है, उन्हीं की कोठी का ऊपरी हिस्सा खाली हुआ था. उस घर की मालकिन बिन्नी दी की खास सहेली हैं. उन्हीं की गारंटी पर तुम्हें घर देने के लिए तैयार हैं. जितना किराया तुम दे सकोगी उन्हें मंजूर होगा.’’

ये भी पढ़ें- रेप के बाद: अखिल ने मानसी के साथ क्या किया

रीता और तरन्नुम पंचशील पार्क की उस कोठी में गए. तरन्नुम को गेट खोलते ही बहुत अच्छा लगा. घर के बाहर छोटा सा लेकिन बहुत खूबसूरत लौन, इस भरी गरमी में भी हराभरा नजर आ रहा था.

Satyakatha- सोनू पंजाबन: गोरी चमड़ी के धंधे की बड़ी खिलाड़ी- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

लेखक- सुनील वर्मा  सोनू

दिल्ली की तिहाड़ जेल के महिला वार्ड के विशेष सेल में बंद गीता अरोड़ा उर्फ सोनू पंजाबन (41) जमीन पर लगे बिस्तर पर लेटी छत की तरफ देखते हुए शून्य में निहार रही थी. रहरह कर अतीत का एकएक घटनाक्रम उस की आंखों के आगे चलचित्र की तरह तैर रहा था.

दिल्ली ही नहीं, देश भर के अय्याश लोगों के दिलों में सोनू पंजाबन रानी की तरह राज करती थी. चाहे किसी पांच सितारा होटल में रात की रंगीनियां बिखेरनी हों या किसी फार्महाउस में प्राइवेट पार्टी करनी हो. अमीरजादों को दिल बहलाने वाली खूबसूरत हसीनाओं की जरूरत होती तो उन्हें एक ही नाम याद आता था सोनू पंजाबन का.

यूं कहे तो गलत न होगा कि सोनू पंजाबन दिल्ली से ले कर मुंबई तक में एक ऐसा नाम रहा है, जिसे जिस्मफरोशी की दुनिया की क्वीन यानी रानी कहा जाता था.

लेकिन प्रीति के साथ उस ने जो भी किया था, उस ने एक झटके में उस की जिंदगी बदल दी. बड़ीबड़ी गाडि़यों में घूमने वाली और नोटों की गड्डियों का बिस्तर बिछा कर सोने वाली सोनू पंजाबन इन दिनों जेल की सलाखों के पीछे पथरीली जमीन पर कंबलों का बिस्तर बिछा कर सोने के लिए मजबूर थी.

22 जुलाई, 2020 को द्वारका कोर्ट के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश प्रीतम सिंह ने सोनू पंजाबन को आईपीसी की धारा 328, 342, 366ए, 372, 373 और 120बी के तहत कुल 24 सालों के कठोर कारावास की सजा सुनाई थी.

इसी मामले में सोनू के साथ संदीप बेदवाल को भी कोर्ट ने 20 सालों तक जेल में रहने की सजा सुनाई थी.

हालांकि गीता अरोड़ा उर्फ सोनू पंजाबन ने अपनी सजा को एक महीने बाद ही दिल्ली हाईकोर्ट में चुनौती दे दी थी. जिस पर जस्टिस मनोज कुमार ओहरी की एकल पीठ ने सोनू पंजाबन की याचिका पर दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर जवाब दाखिल करने के लिए कहा.

सोनू पंजाबन के वकील आर.एम. तुफैल और आस्था की सोनू के खिलाफ दिए गए ट्रायल कोर्ट का फैसले को टालने व उसे जमानत दिए जाने की याचिका पर सुनवाई टलती रही.

सोनू पंजाबन कभी दिल्ली शहर की सब से नामचीन कालगर्ल हुआ करती थी, लेकिन जल्द ही उस ने गोरी चमड़ी बेच कर पैसा कमाने की कला के सारे गुर सीख लिए तो वह बाद में खुद धंधा छोड़ कर दूसरी लड़कियों से धंधा कराने लगी और खुद बन गई कालगर्ल सरगना.

लेकिन सोनू ने आखिर ऐसा कौन सा गुनाह किया था कि जिस्मफरोशी का धंधा करने के गुनाह में अदालत को उस के खिलाफ इतनी बड़ी सजा का ऐलान करना पड़ा, जितनी सजा आज तक इस धंधे के किसी गुनाहगार को नहीं दी थी. इस के लिए सोनू पंजाबन के काले अतीत में झांकना होगा.

हिंदुस्तान के बंटवारे के बाद लाखों रिफ्यूजियों की तरह ही गीता अरोड़ा उर्फ सोनू पंजाबन के दादा अपने परिवार को ले कर पाकिस्तान से भारत चले आए थे. दादा के साथ परिवार के दूसरे लोग तो रोहतक में ही बस गए.

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya: नशा मुक्ति केंद्र में चढ़ा सेक्स का नशा

बाद में ओमप्रकाश अरोड़ा काम की तलाश में अपने परिवार को ले कर दिल्ली आए और यहां गीता कालोनी में किराए के मकान में रहने लगे.

वह आटोरिक्शा चलाने लगे. ओमप्रकाश के परिवार में पत्नी बीना अरोड़ा, 2 बेटे व 2 बेटियां थीं. बड़ी बेटी की शादी उन्होंने दिल्ली के ही रहने वाले सतीश से कर दी.

1981 में जन्म लेने वाली गीता से छोटे उस के 2 भाई थे. गीता परिवार की आर्थिक तंगी के कारण 10वीं कक्षा से ज्यादा नहीं पढ़ सकी.

गीता महत्त्वाकांक्षी और विद्रोही स्वभाव की थी. उस के नाकनक्श अपनी उम्र की दूसरी लड़कियों से ज्यादा आकर्षक और सुंदर थे.

गीता ब्यूटी पार्लर का कोर्स कर के गीता कालोनी के ही एक बड़े पार्लर में नौकरी करने लगी. उन दिनों दिल्ली में ब्यूटीपार्लर की आड़ में चोरीछिपे जिस्मफरोशी का धंधा जोर पकड़ रहा था. गीता जिस पार्लर मे काम करती थी, वहां भी ये काम होता था.

उन्हीं दिनों गीता की जिंदगी में विजय नाम का शख्स आया, जिस के बाद उस के जीवन ने एक नई करवट ली. विजय सिंह हरियाणा के रोहतक का रहने वाला था और पेशे से अपराधी था.

हरियाणा, दिल्ली और यूपी में लूटमार और हफ्तावसूली उस का पेशा था. विजय सिंह जरायम से जुड़े अपने दोस्तों के पास दिल्ली में पनाह ले कर रहता था. यहीं उस की मुलाकात गीता से हुई.

दोनों में पहले प्रेम हुआ फिर गीता अरोड़ा ने परिवार के विरोध के बावजूद विजय से प्रेम विवाह कर लिया. विजय सिंह की कमाई से गीता परिवार की भी मदद करने लगी. गीता की जिंदगी मजे से गुजर रही थी. गीता ने एक बेटे को जन्म दिया.

गीता की हसंतीखेलती जिंदगी अचानक एक दिन तबाह हो गई. दरअसल, यूपी पुलिस की एसटीएफ ने विजय को उस के एक साथी के साथ गढ़मुक्तेश्वर के पास पुलिस मुठभेड़ में मार गिराया. ये 1998 की बात है. गीता पर विजय की मौत वज्रपात बन कर गिरी.

विजय की मौत के कुछ दिन बाद ही बीमारी और सदमे के कारण गीता के पिता ओमप्रकाश अरोड़ा की भी मौत हो गई. गीता के दुखों का पहाड़ और भारी हो गया. गीता ने परिवार की गुजरबसर व पेट पालने के लिए ब्यूटीपार्लर की नौकरी कर ली.

ये भी पढ़ें- Crime Story- गुड़िया रेप-मर्डर केस: भाग 1

कुछ समय बाद निक्कू उस की जिंदगी में सहारा बन कर सामने आया जो उस के पहले पति विजय का दोस्त था और वह उस से पहले से परिचित थी.

निक्कू त्यागी भी दबंग और दिलेर होने के साथ अपराध की दुनिया का जानामाना नाम था. गीता बेटे को अपनी मां और भाइयों के पास छोड़ कर गीता कालोनी में ही निक्कू के साथ कमरा ले कर रखैल के रूप में उस के साथ रहने लगी. निक्कू ज्यादातर दिल्ली से बाहर ही रहता था.

इसी दौरान गीता को दिल्ली के बड़े होटलों और डांस बार में जाने की लत लग गई. वह डिस्को और पब में जाने की आदी हो गई थी.

खूबसूरत वह थी ही अकसर वहां रंगीनमिजाज रईसजादों के साथ रातें गुजारने लगी. बाद में धीरेधीरे जिस्म बेच कर पैसे कमाने का उस का ये शौक पेशे में बदल गया.

अगले भाग में पढ़ें- प्रीति और संदीप की दोस्ती कैसे हुई

ये घर बहुत हसीन है- भाग 4: उस फोन कॉल ने आन्या के मन को क्यों अशांत कर दिया

लेखक- मधु शर्मा कटिहा

अगले दिन सुबह से ही प्रेमा को हिदायतें देते हुए वह सारे बंगले में घूम रही थी. आर्यन मोबाइल में लगा हुआ था. दोस्तों के बधाई संदेशों का जवाब देते हुए कुछ की मांग पर विवाह के फोटो भी भेज रहा था. वान्या को प्रेमा के साथ घुलतामिलता देख उसे एक सुखद एहसास हो रहा था.

इतना विशाल बंगला वान्या ने पहले कभी नहीं देखा था. जब 2 दिन पहले उस ने बंगले में इधरउधर खड़े हो कर खींची अपनी कुछ तसवीरें सहेलियों को भेजी थीं तो वे आश्चर्यचकित रह गईं थीं. उसे ‘किले की महारानी’ संबोधित करते हुए मैसेजेस कर वे रश्क कर रहीं थी. इतने बड़े बंगले का मालिक आर्यन आखिर उस जैसी मध्यवर्गीय से संबंध जोड़ने को क्यों राजी हो गया? और तो और कोरोना के बहाने शादी की जल्दबाजी भी की उस ने.

वान्या का मन बेहद अशांत था. प्रेमा के साथसाथ घर में घूमते हुए लगभग 2 घंटे हो चुके थे. रहस्यमयी निगाहों से वह घर को टटोल रही थी. बैडरूम के पास वाले एक कमरे में चंबा की सुप्रसिद्ध कशीदाकारी ‘नीडल पेंटिंग’ से कढ़ी हुई हीररांका की खूबसूरत वौल हैंगिंग में उसे आर्यन और अपनी सौतन दिख रही थी. पहली बार लौबी में घुसते ही दीवार पर टंगी मौडर्न आर्ट की जिस पेंटिंग के लाल, नारंगी रंग उसे रोमांटिक लग रहे थे, वही अब शंका के फनों में बदल उसे डंक मार रहे थे. बैडरूम में सजी कामिलिप्त युगल की प्रतिमा, जिसे देख परसों वह आर्यन से लिपट गई थी आज आंखों में खटक रही थी. ‘क्या कोई अविवाहित ऐसा सामान सजाने की बात सोच सकता है? शादी तो यों हुई कि चट मंगनी पट ब्याह, ऐसे में भी आर्यन को ऐसी पेंटिंग खरीद कर सजाने के लिए समय मिल गया… हैरत है.’ घर की एकएक वस्तु आज उसे काटने को दौड़ रही थी. ‘कैसा बेकार सा है यह मनहूस घर’ वह बुदबुदा उठी.

लगभग सारे घर की सफाई हो चुकी थी. केवल एक ही कमरा बचा था, जो अन्य कमरों से थोड़ा अलग, ऊंचाई पर बना था. पहाड़ के उस भाग को मकान बनाते समय शायद जानबूझ कर समतल नहीं किया गया होगा. बाहर से ही छत से थोड़ा नीचे और बाकी मकान से ऊपर उस कमरे को देख वान्या बहुत प्रभावित हुई थी. प्रेमा का कहना था कि उस बंद कमरे में कोई आताजाता नहीं इसलिए साफसफाई की कोई आवश्यकता नहीं है, लेकिन वान्या तो आज पूरा घर छान मारना चाहती थी. उस के जोर देने पर प्रेमा झाड़ू, डस्टर और चाबी ले कर कमे की ओर चल दी. लकड़ी की कलात्मक चौड़ी लेकिन कम ऊंचाई वाली सीढ़ी पर चढ़ते हुए वे कमरे तक पहुंच गए. प्रेमा ने दरवाजे पर लटके पीतल के ताले को खोला और दोनों अंदर आ गए.

ये भी पढ़ें- मजाक: म से मछली म से मगरमच्छ

कमरे में अखरोट की लकड़ी से बनी एक टेबल और लैदर की कुरसी रखी थी. काले रंग की वह कुरसी किसी भी दिशा में घूम सकती थी. पास ही ऊंचे पुराने ढंग के लकड़ी के पलंग पर बादामी रंग की याक के फर से बनी बहुत मुलायम चादर बिछी थी. कुछ फासले पर रखी एक आराम कुरसी और कपड़े से ढके प्यानों को देख वान्या को वह कमरा रहस्य से भरा हुआ लगने लगा. दीवार पर घने जंगल की खूबसूरत पेंटिंग लगी थी. वान्या पेंटिंग को देख ही रही थी कि दीवार के रंग का एक दरवाजा दिखाई दिया. ‘कमरे के अंदर एक और कमरा’ उस का दिमाग चकरा गया. तेजी से आगे बढ़ कर उस ने दरवाजे को धक्का दे दिया. चर्र की आवाज करता हुआ दरवाजा खुल गया.

छोटा सा वह कमरा खिलौनों से भरा हुआ था, उन में अधिकतर सौफ्ट टौयज थे.

पास ही आबनूस का बना एक वार्डरोब था, वान्या ने अचंभित हो कर वार्डरोब खोलने का प्रयास किया, लेकिन वह खुल नहीं रहा था. पीतल के हैंडल को कस कर पकड़ जब उस ने अपना पूरा दम लगाया तो वार्डरोब झटके से खुल गया और तेज धक्का लगने के कारण अंदर से कुछ तसवीरें निकल कर गिर गईं. वान्या ने झुक कर एक फोटो उठाया तो सन्न रह गई. आर्यन एक विदेशी लड़की के साथ हाथों में दस्ताने पहने बेहद खुश दिख रहा था. बदहवास सी वह अन्य तसवीरें उठा ही रही थी कि प्रेमा की आवाज सुनाई दी, ‘‘मेम साब, इस कमरे में क्या कर रहीं हैं आप?’’

ये भी पढ़ें- हास्य कहानी: बिटिया और मैं

वान्या ने झटपट सारी तसवीरें वार्डरोब में वापस रख दीं.

‘‘यहां की सफाई करनी होगी. मोबाइल के जमाने में यहां कौन सी फोटो रखी हैं? सामान को निकाल कर इस रैक को साफ कर लेते हैं.’’ अपने को संयत कर वान्या ने वार्डरोब की ओर इशारा कर दिया.

‘‘नहीं, ऐसा मत कीजिए. आप जल्दीजल्दी मेरे साथ अब नीचे चलिए. साहब आ गए तो…’’

‘‘साहब आ गए तो क्या हो जाएगा? घर साफ करना है या नहीं?’’ वान्या बेचैनी और गुस्से से कांपने लगी.

Manohar Kahaniya: नशा मुक्ति केंद्र में चढ़ा सेक्स का नशा- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

कमरे में बैठी प्रिया फोटो एलबम पलट कर उसे बड़े ध्यान से देख रही थीं. एलबम देखतेदेखते उन की नजर एक फोटो पर ठहर गई. वह फैमिली फोटो था, जिस में वह खुद, उन के पति नवीन और इकलौती बेटी निधि थी. निधि का एक हाथ मां के और दूसरा पिता के गले में था.

वह खुल कर मुसकरा रही थी. उसे देख कर प्रिया यादों में कहीं खो सी गईं. उन्हें एहसास ही नहीं हुआ कि उन के पति कब उन के पास आ कर बैठ गए. उन्होंने प्रिया के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, ‘‘क्या सोच रही हो?’’

‘‘सोच रही हूं कि समय कितना बदल जाता है. कभी कितनी अच्छी थी हमारी बेटी, हमें कितना प्यार करती थी और अब लगता है, न जाने कितनी दूर हो गई.’’ प्रिया ने आंखों में उमड़ आए अपने आंसुओं को पल्लू से साफ करते हुए अफसोसजनक लहजे में कहा तो पति ने उन्हें समझाया, ‘‘यूं परेशान होने से भी बात नहीं बनेगी, समय के साथ सब ठीक हो जाएगा. मुझे पक्का भरोसा है कि वह ठीक हो कर ही जल्द घर आएगी.’’

‘‘आप नहीं जानते, मुझे बेटी की बहुत फिक्र रहती है. जवान लड़की को हम ने घर से बाहर छोड़ा हुआ है. मजबूरी न होती तो मैं ऐसा कभी नहीं करती. कहीं वहां उस के साथ कुछ गलत न हो. एक बार उस ने मुझ से कहा था…’’ प्रिया बोलते हुए रुक गईं तो नवीन ने पूछा, ‘‘क्या कहा था?’’

‘‘वह बता रही थी कि वहां सब कुछ ठीक नहीं है.’’

‘‘मुझे तो ऐसा नहीं लगता, क्योंकि वहां और भी लड़कियां रहती हैं और फिर वह लोग इतना बड़ा सेंटर बच्चों के भविष्य को बचाने के लिए ही तो चला रहे हैं. निधि का विश्वास तो मैं कर नहीं सकता, क्योंकि वह नशे के लिए हम से कितना झूठ बोलती रही है, यह तो तुम भी जानती हो.’’ नवीन ने कहा.

‘‘आप की बात भी ठीक है, लेकिन…’’

‘‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं, उस की फिक्र करनी बंद करो, क्या पता निधि वहां से छुटकारा पाने के लिए उल्टीसीधी बातें करती हो,’’ नवीन ने पत्नी को समझाया.

‘‘आप भी सही कहते हैं, हमारा विश्वास तो वह खो चुकी है. अगर वह गलत संगत में न पड़ती, तो ऐसी नौबत ही नहीं आती. हम ने कभी उस के लिए किसी चीज की कमी नहीं छोड़ी, फिर भी हमें बुरे दिन देखने पड़े.’’

‘‘एक बात बताऊं प्रिया,’’ नवीन ने कहा.

‘‘क्या?’’

‘‘हमारी दी गई आजादी का भी उस ने गलत फायदा उठाया, हमें भी उस पर शुरू से ही नजर रखनी चाहिए थी.’’

‘‘सही कहा आप ने.’’ प्रिया बोली.

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya: 10 साल में सुलझी सुहागरात की गुत्थी

किस की हंसतीखेलती जिंदगी में कब क्या हो जाए, इस को कोई नहीं जानता. प्रिया और नवीन के साथ भी ऐसा हुआ था. निधि उन की इकलौती बेटी थी. वह प्राइवेट नौकरी करते थे और जिंदगी में खुशियां थीं.

यह दंपति उत्तराखंड की राजधानी देहरादून में रहता था. हर मातापिता अपने बच्चों के अच्छे भविष्य की कल्पना करते हैं. प्रिया और नवीन के साथ भी ऐसा ही था. निधि राजधानी के ही एक नामी इंस्टीट्यूट से ग्रैजुएशन कर रही थी.

हमारे सभ्य समाज का यह एक कड़वा सच है कि बड़े शहरों में नशे का कारोबार अपनी जड़ें जमा चुका है. युवा बुरी संगत के चलते इस का शिकार हो जाते हैं. शुरू में वे मजे के लिए नशा करते हैं और बाद में इस के आदी हो जाते हैं.

ये भी पढ़ें-  Crime Story: पुलिस वाले की खूनी मोहब्बत

निधि भी ऐसी संगत में पड़ कर नशे की लत का शिकार हो चुकी थी. घर से पौकेटमनी के नाम पर पैसे लेना और नशे में उड़ाना, सहेलियों के साथ घूमनाफिरना, बहाने से उन के घर जाना उस की आदत बन चुकी थी.

मातापिता को पता भी नहीं था कि उन की बेटी किस डगर पर चल रही है. संगत और बुरी आदतों का असर इंसान पर वक्त के साथ दिखने लगता है.

निधि की पैसे की डिमांड बढ़ती गई और वह बारबार तरहतरह के बहानों से घर से ज्यादा बाहर जाने लगी तो मातापिता को शक होने लगा. एक दिन प्रिया ने देर रात निधि को उस के कमरे में ड्रग्स लेते पकड़ा तो उन का शक विश्वास में बदल गया.

अगले भाग में पढ़ें- निधि को लग गई ड्रग की लत

छाया : विनोद पुंडीर

गृहप्रवेश- भाग 1: किसने उज्जवल और अमोदिनी के साथ विश्वासघात किया?

पीड़ा और विश्वासघात या तो पराजित कर देते हैं या एक शक्ति प्रदान करते हैं. और वह शक्ति वेदना को प्रेरणा की दृष्टि प्रदान कर देती है. आज सोचती हूं तो लगता है, किन परिस्थितियों में मैं ने अपने स्वप्नों की मृत्यु को होते देखा और फिर अपनी बु झती जीवनज्योति को फूंकफूंक कर कुछ देर और जीवित रखने की चेष्टा करती रही.

मैं बचपन से ही साहसी रही हूं. मेरे मम्मीपापा मेरा विवाह विनय से करना चाहते थे. शुरू में मु झे भी विवाह से कोई आपत्ति नहीं थी. मेरे एमएड पूरा होने के बाद हमारा विवाह होना तय हुआ. सरल स्वभाव का विनय मेरा अच्छा मित्र था. किंतु हमारे मध्य प्रेम जैसा कुछ नहीं था. उस समय मेरा मानना था कि मित्रता, विवाह के पश्चात प्रेम का रूप खुद ही ले लेगी. परंतु तब मैं कहां जानती थी कि प्रेम एक ऐसी वृष्टि का नाम है जो अबाध्य है. जब उज्जवल नाम का एक बादल मेरे तपते जीवन में ठंडक ले कर आया, मैं पिघलती चली गई थी.

मेरा बंजर हृदय उज्जवल के प्रेम की वर्षा में भीग गया और मम्मीपापा के निर्णय के खिलाफ जा कर मैं ने उज्जवल से विवाह कर लिया था. हमारे विवाह के समय तक मेरी नौकरी एडहौक टीचर के रूप में एक प्राइवेट कालेज में लग गई थी. उज्जवल चार्टर्ड अकाउंटैंट था. थोड़े से विरोध के बाद दोनों परिवारों ने हमारा रिश्ता मंजूर कर लिया. हम प्यार में थे, खुश थे.

ये भी पढ़ें- ओमा: 80 साल की ओमा और लीसा का क्या रिश्ता था

परिवर्तन एक दैनिक प्रक्रिया है. हमारा जीवन भी बदला. विवाह के 12 वर्ष सपनों की नदी पर नंगे पैर चलते हुए पार हो गए.

उज्जवल के नाम और काम दोनों में बढ़ोतरी हुई. उस ने अपना कर्मस्थल लखनऊ से बदल कर इंदौर कर लिया. और मैं? मेरे वर्क प्रोफाइल में भी परिवर्तन आया था. पार्टटाइम शिक्षिका के स्थान पर अब मैं फुलटाइम प्रशिक्षक बन गई थी. मैं मां भी बन गई थी.

स्त्री के भीतर एक मां का जन्म कोई सामान्य घटना नहीं होती. एक बालिका जब एक युवती बनती है और जब यही युवती एक प्रेयसी बनती है, तो उस का हृदय अनेक भावनात्मक परिवर्तनों से हो कर गुजरता है. हृदय और शरीर में संघर्ष होता है, और फिर इन की इच्छाओं व संवेदनाओं का परस्पर मिलन हो जाता है.

किंतु जब प्रेयसी मां बनती है तो परिवर्तनों की एक अथवा दो नहीं, बल्कि अनेक स्याह गुफाओं से हो कर आगे बढ़ती है. गर्भावस्था के प्रथम प्रहर में एक प्रेयसी खुद को मां के रूप में स्वीकार ही नहीं कर पाती. फिर शरीर में आ रहे परिवर्तन उसे एक नवजीवन का खुद के भीतर अनुभव प्रदान करते हैं. मातृत्व की यह भावना शब्दों के परे होती है. मात्र शिशु को जन्म दे देने से कोई महिला मां नहीं बन जाती, खुद के भीतर मातृत्व का जन्म होना आवश्यक है.

मेरे बेटे स्नेह का जन्म हुआ और मु झे लगा, मेरी जीवन की बगिया में वसंत खिल रहा हो. किंतु, मैं अपनी बगिया के अंतिम कोने में छिप कर बैठे पत झड़ को देख ही नहीं पाई, और जब देखा, वसंत जा चुका था.

हर घर की एक गंध होती है. किंतु, इसे वह ही पढ़ सकता है जिस ने घर की दीवारों और वस्तुओं से ले कर, रिश्तों को भी सजाने व संवारने में अपना सौरभ बिखेरा हो. इसलिए, अपने घर में उस अनाधिकार प्रवेश करने वाली अजनबी गंध को मैं ने भांप लिया था.

कुछ दिन इसे अपनी भूल सम झ, मैं ने स्वीकार नहीं किया. लेकिन जब यह जिद्दी गंध अपनी उपस्थिति उज्जवल की कमीज पर छोड़ने लगी, तो मैं चुप न रह सकी.

ये भी पढ़ें- बदला: सुगंधा ने कैसे लिया रमेश से बदला

‘तुम कोई नया परफ्यूम लगा रहे हो?’

‘नहीं तो, क्यों?’

गालों पर शेविंगक्रीम लगी होने के कारण चेहरे के भाव स्पष्ट नहीं थे. अलबता, आंखें कुछ चुगली कर रही थीं. मैं उस की आंखों के संदेश को पढ़ने का प्रयास कर ही रही थी कि उज्जवल अपने गीले चेहरे को मेरे गालों पर मलते हुए बोला, ‘हमारी सांसों में तो आज भी आप महकती हैं. जिस के पास बगीचा हो वह कागज के फूलों में खुशबू क्यों ढूंढ़ेगा?’

मेरा मुखमंडल लज्जा से अरुण हो आया. प्यार से ‘धत’ कह कर मैं ने उसे धकेल दिया और रसोई में नाश्ता बनाने चली गई थी.

अच्छा सिला दिया तूने मेरे प्यार का- भाग 1: जब प्रभा को अपनी बेटी की असलियत पता चली!

‘‘वाह मां, ये झुमके तो बहुत सुंदर हैं, कब खरीदे?’’ रंजो ने अपनी मां प्रभा के कानों में झूलते झुमकों को देख कर कहा.

‘‘पिछले महीने हमारी शादी की सालगिरह थी न, तभी अपर्णा बहू ने मुझे ये झुमके और तुम्हारे पापा को घड़ी दी थी. पता नहीं कब वह यह सब खरीद लाई,’’ प्रभा ने कहा.

अपनी आंखें बड़ी कर रंजो बोली, ‘‘भाभी ने, क्या बात है.’’ फिर आह भरते हुए कहने लगी, ‘‘मुझे तो कभी इस तरह से कुछ नहीं दिया उन्होंने. हां भई, सासससुर को मक्खन लगाया जा रहा है, लगाओ,’ लगाओ, खूब मक्खन लगाओ.’’ उस का ध्यान उन झुमकों पर ही अटका हुआ था, कहने लगी, ‘‘जिस ने भी दिए हों मां, पर मेरा दिल तो इन झुमकों पर आ गया.’’

‘‘हां, तो ले लो न, बेटा. इस में क्या है,’’ कह कर प्रभा ने वे झुमके उतार कर तुरंत अपनी बेटी रंजो को दे दिए. उस ने एक बार यह नहीं सोचा कि अपर्णा को कैसा लगेगा जब वह जानेगी कि उस के दिए उपहारस्वरूप झुमके उस की सास ने अपनी बेटी को दे दिए.

प्रभा के देने भर की देरी थी कि रंजो ने झट से वे झुमके अपने कानों में डाल लिए, फिर बनावटी मुंह बना कर कहने लगी, ‘‘मन नहीं है तो ले लो मां, नहीं तो फिर मेरे पीठपीछे घर वाले, खासकर पापा, कहेंगे कि जब आती है रंजो, कुछ न कुछ ले कर ही जाती है.’’

‘‘कैसी बातें करती हो बेटा, कोई क्यों कुछ कहेगा. और क्या तुम्हारा हक नहीं है इस घर में? तुम्हें पसंद है तो रख लो न, इस में क्या है. तुम पहनो या मैं पहनूं, बात बराबर है.’’

‘‘सच में मां? ओह मां, आप कितनी अच्छी हो,’’ कह कर रंजो अपनी मां के गले लग गई. हमेशा से तो वह यही करती आई है, जो पसंद आया उसे रख लिया, यह कभी न सोचा कि वह चीज किसी के लिए कितना माने रखती है. कितने प्यार से और किस तरह से पैसे जोड़ कर अपर्णा ने अपनी सास के लिए वे झुमके खरीदे थे, पर प्रभा ने बिना सोचेसमझे उठा कर झुमके अपनी बेटी को दे दिए.

ये भी पढ़ें- श्यामली: जब श्यामली ने कुछ कर गुजरने की ठानी

अरे, वह यह तो कह सकती थी कि ये झुमके तुम्हारी भाभी ने बड़े शौक से मुझे खरीद कर दिए हैं, इसलिए मैं तुम्हें दूसरे बनवा कर दे दूंगी. पर नहीं, कभी उस ने बेटी के आगे बहू की भावना को समझा है, जो अब समझेगी?

‘‘मां, देखो तो मेरे ऊपर ये झुमके कैसे लग रहे हैं, अच्छे लग रहे हैं न, बोलो न मां?’’ आईने में खुद को निहारते हुए रंजो कहने लगी, ‘‘वैसे मां, आप से एक शिकायत है.’’

‘‘अब किस बात की शिकायत है?’’ प्रभा ने पूछा.

‘‘मुझे नहीं, बल्कि आप के जमाई को, कह रहे थे आप ने वादा किया था उन से ब्रेसलेट देने का, जो अब तक नहीं दिया.’’

‘‘ओ, हां, याद आया, पर अभी पैसे की थोड़ी तंगी है, बेटा. तुझे तो पता ही है कि तेरे पापा को कितनी कम पैंशन मिलती है. घर तो अपर्णा बहू और मानव की कमाई से ही चलता है,’’ अपनी मजबूरी बताते हुए प्रभा ने कहा.

‘‘वह सब मुझे नहीं पता है मां, वह आप जानो और आप के जमाई. बीच में मुझे मत घसीटो,’’ झुमके अपने पर्स में सहेजते हुए रंजो ने कहा और चलती बनी.

‘‘बहू के दिए झुमके तुम ने रंजो को दे दिए?’’ हैरत से भरत ने अपनी पत्नी प्रभा से पूछा.

‘‘हां, उसे पसंद आ गए तो दे दिए,’’ बस इतना ही कहा प्रभा ने और वहां से जाने लगी, जानती थी वह कि अब भरत चुप नहीं रहने वाले.

‘‘क्या कहा तुम ने, उसे पसंद आ गए? हमारे घर की ऐसी कौन सी चीज है जो उसे पसंद नहीं आती है, बोलो? जब भी आती है कुछ न कुछ उठा कर ले ही जाती है. जरा भी शर्म नहीं है उसे. उस दिन आई तो बहू का पर्स, जो उस की दोस्त ने उसे दिया था, उठा कर ले गई. कोई कुछ नहीं कहता तो इस का मतलब यह नहीं कि वह अपनी मनमरजी करेगी,’’ गुस्से से आगबबूला होते हुए भरत ने कहा.

तिलमिला उठी प्रभा. अपने पति की बातों पर बोली, ‘‘ऐसा कौन सी जायदाद उठा कर ले गई वह, जो तुम इतना सुना रहे हो? अरे एक जोड़ी झुमके ही तो ले गई है. जाने क्यों रंजो, हमेशा तुम्हारी आंखों में खटकती रहती है?’’

ये भी पढ़ें- देह से परे: मोनिका ने आरव से कैसे बदला लिया?

भरत भी चुप नहीं रहे. कहने लगे, ‘‘किस ने मना किया तुम्हें जायदाद देने से, दे दो न जो देना है, पर किसी का प्यार से दिया हुआ उपहार यों ही किसी और को देना, क्या यह सही है? अगर बहू ऐसा करती तो तुम्हें कैसा लगता? कितने अरमानों से वह तुम्हारे लिए झुमके खरीद कर लाई थी और तुम ने एक मिनट भी नहीं लगाया उसे रंजो को देने में.’’

‘‘किसी को नहीं, बेटी को दिए हैं, समझे, बड़े आए बहू के चमचे, हूं…’’

‘‘अरे, तुम्हारी बेटी तुम्हारी ममता का फायदा उठा रही है और कुछ नहीं. किस बात की कमी है उसे? हमारे बेटेबहू से ज्यादा कमाते हैं वे दोनों पतिपत्नी, फिर भी कभी हुआ उसे कि अपने मांबाप के लिए

Manohar Kahaniya: 10 साल में सुलझी सुहागरात की गुत्थी- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

अपने बेटे की तसवीर के सामने खड़े जयभगवान की आखें बारबार डबडबा रही थीं. हाथ में पकड़े रूमाल से आंखों में छलक आए आंसुओं की बूंदों को साफ करते हुए वह बारबार एक ही बात बुदबुदा रहे थे, ‘‘बेटा, आज मेरी लड़ाई पूरी हो गई. तेरे एकएक कातिल को मैं ने सलाखों के पीछे पहुंचा दिया है. तू जहां भी है देखना कि तेरा ये बूढ़ा बाप तेरे कातिलों को उन के किए की सजा दिला कर रहेगा.’’

कहतेकहते जयभगवान अचानक फफकफफक कर रोने लगे. रोतेरोते उन की आंखों के आगे अतीत के वह लम्हे उमड़घुमड़ रहे थे, जिन्होंने उन की हंसतीखेलती जिंदगी को अचानक आंसुओं में बदल दिया था.

बाहरी दिल्ली के समालखा में रहने वाले जयभगवान प्राइवेट नौकरी करते थे. उन के 2 ही बेटे थे. बड़ा बेटा रवि और छोटा डैनी. 10वीं कक्षा तक पढ़े रवि ने 18 साल की उम्र में पिता का सहारा बनने के लिए ग्रामीण सेवा वाले आटो को चलाना शुरू कर दिया था.

3 साल बाद मातापिता को रवि की शादी की चिंता सताने लगी. समालखा की इंद्रा कालोनी में रहने वाला शेर सिंह जयभगवान की ही बिरादरी का था.

शेर सिंह की पत्नी कमलेश राजस्थान के अलवर जिले में टपूकड़ा की रहने वाली थी. उस ने अपनी साली शकुंतला का रिश्ता रवि से करने की सलाह दी थी. जिस के बाद दोनों पक्षों में बातचीत शुरू हुई.

कई दौर की बातचीत के बाद रवि का शेर सिंह की साली  शकुंतला से रिश्ता पक्का हो गया. शकुंतला के पिता पतराम और मां भगवती के 6 बच्चे थे, 3 बेटे और 3 बेटियां. सब से बड़ी बेटी कमलेश की शादी शेरसिंह से हुई थी. शकुंतला 5वें नंबर की थी. उस से छोटा एक और लड़का था, जिस का नाम था राजू.

दोनों परिवारों की पसंद और रजामंदी से 8 फरवरी, 2011 को सामाजिक रीतिरिवाज के साथ रवि और शकुंतला की शादी हो गई. लेकिन शादी की पहली रात को रवि कुछ रस्मों के कारण अपनी दुलहन के साथ सुहागरात नहीं मना सका.

संयोग से अगले दिन कुछ नक्षत्र योग के कारण शकुंतला को पगफेरे की रस्म के लिए अपने मायके जाना पड़ा. नक्षत्रों के फेर के कारण शकुंतला को एक महीने तक मायके में ही रहना पड़ा.

ये भी पढ़ें- Manohar Kahaniya: किसी को न मिले ऐसी मां

किसी तरह एक माह गुजरा और 21 मार्च, 2011 को रवि अपनी पत्नी शकुंतला को अपनी ससुराल अलवर से अपने घर समालखा दिल्ली वापस ले आया.

शकुंतला थकी थी, लिहाजा उस रात भी रवि की पत्नी के साथ सुहागरात की मुराद पूरी नहीं हो सकी. अगली सुबह शकुंतला ने घर में पहली रसोई बना कर पूरे परिवार को खाना खिलाया, जिस के बाद जयभगवान अपनी नौकरी के लिए चले गए.

दोपहर को शकुंतला अपने पति रवि को साथ ले कर इंद्रानगर कालोनी में रहने वाली बड़ी बहन कमलेश से मिलने के लिए उस के घर चली गई. लेकिन शाम के 7 बजे तक जब बेटा और बहू घर नहीं लौटे तो जय भगवान ने बेटे रवि के मोबाइल पर फोन मिलाया. उस का फोन स्विच्ड औफ मिला.

जयभगवान छोटे बेटे को ले कर रवि के साढ़ू शेर सिंह के घर पहुंचे तो शकुंतला ने बताया कि रवि को रास्ते में ग्रामीण सेवा चलाने वाले कुछ दोस्त मिल गए थे. रवि उसे घर के पास छोड़ कर यह कह कर चला गया था कि कुछ ही देर में वापस लौट आएगा. लेकिन उस के बाद से ही वह वापस नहीं लौटा है.

जयभगवान बहू शकुंतला को उस की बहन के घर से अपने साथ घर ले आए. लेकिन पूरी रात बीत जाने पर भी रवि घर नहीं आया.

अगली सुबह 23 मार्च, 2011 को जयभगवान ने कापसहेड़ा थाने में अपने बेटे की गुमशुदगी की सूचना लिखा दी.

रवि के लापता होने की जानकारी मिलने के बाद अगले दिन शकुंतला के घर वाले भी अपने पड़ोसी कमल सिंगला को ले कर हमदर्दी जताने के लिए जयभगवान के घर पहुंचे.

उन सब ने भी जयभगवान के साथ मिल कर रवि की तलाश में इधरउधर भागदौड़ की. कई दिनों तक जब रवि का कोई सुराग नहीं मिला तो 10 दिन बाद मायके वाले शकुंतला को अपने साथ वापस अलवर ले गए.

इसी तरह वक्त तेजी से गुजरने लगा. कापसहेड़ा पुलिस ने लापता लोगों की तलाश के लिए की जाने वाली हर काररवाई की. घर वालों ने जिस पर भी रवि के लापता होने का शक जताया, उन सभी को बुला कर पूछताछ की गई. मगर कोई सुराग नहीं मिला.

ये भी पढ़ें- Crime Story: पुलिस वाले की खूनी मोहब्बत

बेटे का सुराग नहीं मिलता देख जयभगवान ने उच्चाधिकारियों से भी मुलाकात की फिर भी कोई फायदा नहीं हुआ. लिहाजा उन्होंने अदालत का दरवाजा खटखटाते हुए दिल्ली हाईकोर्ट में बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका दायर की. जिस पर दिल्ली पुलिस को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया गया.

कोर्ट के आदेश पर हुई जांच शुरू

नोटिस जारी होते ही दिल्ली पुलिस के उच्चाधिकारियों के कान खड़े हुए और इसी के आधार पर पीडि़त जयभगवान की शिकायत पर 16 अप्रैल, 2011 को रवि की गुमशुदगी के मामले को कापसहेड़ा पुलिस ने अज्ञात लोगों के खिलाफ आईपीसी की धारा 365 (अपहरण) की रिपोर्ट दर्ज कर ली.

जयभगवान से पूछा गया तो उन्होंने पुलिस के सामने शंका जाहिर की कि उन्हें शकुंतला के भाई राजू और उन के पड़ोसी कमल सिंगला पर शक है.

वह कोई ठोस कारण तो नहीं बता सके, लेकिन उन्होंने बताया कि शादी होने से पहले कमल ही शंकुतला के घर वालों के साथ हर बार उन के घर आया, जबकि वह उन का रिश्तेदार भी नहीं है.

हालांकि पुलिस के पास कोई पुख्ता आधार नहीं था, लेकिन इस के बावजूद उन दोनों को बुला कर पूछताछ की गई. मगर ऐसी कोई संदिग्ध बात पता नहीं चल सकी, जिस के आधार पर उन से सख्ती की जाती.

पुलिस ने शकुंतला, उस की बहन कमलेश, जीजा शेर सिंह और भाई राजू के साथ कमल सिंगला के अलावा भी अलवर जा कर कुछ और लोगों से पूछताछ की, लेकिन कोई सुराग पुलिस के हाथ नहीं लगा.

पुलिस को आशंका थी कि कहीं रवि की शादी उस के घर वालों ने बिना उस की मरजी के तो नहीं की थी, जिस से वह पत्नी को छोड़ कर खुद कहीं चला गया हो. इस बिंदु पर भी जांचपड़ताल हुई, लेकिन पुलिस को कोई सिरा नहीं मिला.

रवि के पिता ने कमल सिंगला नाम के जिस युवक पर आरोप लगाया था, वह उस समय 19 साल का भी नहीं हुआ था. इसलिए पुलिस उस के साथ सख्ती से पूछताछ भी नहीं कर सकती थी. वैसे भी पुलिस को कमल के खिलाफ ऐसा कोई आधार नहीं मिल रहा था कि वह रवि के अपहरण का आरोपी ठहराया जा सके.

जांच में यह भी पता चला था कि वारदात वाले दिन कमल अलवर में ही था. रही बात राजू के इस वारदात में शामिल होने की तो वह भला अपनी ही बहन के पति का अपहरण क्यों करेगा, जिस की शादी एक महीना पहले ही हुई है.

दोनों के खिलाफ न तो कोई सबूत मिल रहा था और न ही रवि के अपहरण या हत्या के पीछे पुलिस को कोई आधार दिख रहा था.

पुलिस को साफ लग रहा था कि रवि की लाइफ में ऐसा कुछ जरूर है, जिसे परिवार वाले छिपा रहे हैं और उस के लापता होने का ठीकरा उस की पत्नी व दूसरे लोगों पर फोड़ रहे हैं.

पुलिस को लगा कि या तो शादी से पहले रवि का किसी दूसरी लड़की से संबध था या उस का अपने पेशे से जुड़े ग्रामीण सेवा के किसी ड्राइवर से पुराना विवाद था और शायद इसी वजह से उस की हत्या कर दी गई हो.

कापसहेड़ा पुलिस ने उस इलाके के ग्रामीण सेवा चलाने वाले कई ड्राइवरों और रवि के टैंपो के मालिक से भी कई बार पूछताछ की. उस के चरित्र और दुश्मनी के बारे में भी जानकारी हासिल की गई, लेकिन कहीं से भी ऐसा कोई सुराग हाथ नहीं लगा कि जांच को आगे बढ़ाने का रास्ता मिलता.

ये भी पढ़ें- Crime Story: मसाज पार्लर की आड़ में देह धंधा

इस दौरान हाईकोर्ट में सिंतबर, 2011 में पुलिस को जांच की स्टेटस रिपोर्ट देनी थी तो उस में कोई प्रगति न पा कर हाईकोर्ट ने दिल्ली पुलिस आयुक्त को इस मामले की जांच एक सक्षम एजेंसी को सौंपने के लिए कहा.

अदालत का आदेश आने के बाद पुलिस आयुक्त ने अक्तूबर 2011 में रवि के अपहरण की जांच का जिम्मा एंटी किडनैपिंग यूनिट के सुपुर्द कर दिया. उन दिनों एंटी ह्यूमन ट्रैफिकिंग यूनिट को एंटी किडनैपिंग यूनिट के नाम से जाना जाता था.

बदलते रहे जांच अधिकारी

इस मामले की जांच का काम सब से पहले इस यूनिट के एसआई हरिवंश को सौंपा गया. फाइल हाथ में लेने के बाद उन्होंने इस का गहन अध्ययन किया और उस के बाद नए सिरे से सभी संदिग्धों को बुला कर उन से पूछताछ का काम शुरू किया.

इस काम में 2 महीने का वक्त गुजर गया. इस से पहले कि वह जांच को आगे बढ़ाते अपराध शाखा से उन का तबादला हो गया.

इस के बाद जांच का काम एसआई रजनीकांत को सौंपा गया. रजनीकांत को लगा कि कमल सिंगला जैसे एक अमीर इंसान की एक निम्नमध्यमवर्गीय परिवार से ऐसी घनिष्ठता के पीछे कोई वजह तो जरूर होगी. उन्हें रवि के पिता जयभगवान के आरोपों में कुछ सच्चाई दिखी.

अगले भाग में पढ़ें- टीम ने अलवर में डाला डेरा

मां जल्दी आना- भाग 3: विनीता अपनी मां को क्यों साथ रखना चाहती थी?

एक पति अपनी पत्नी से अपने मातापिता की सेवा करवाना तो पसंद करता है परंतु सासससुर की सेवा करने में अपनी हेठी समझता है. समाज की इस दोहरी मानसिकता से अमन भी अछूता नहीं था. यदि वह चाहता तो मां के साथ भलीभांति तालमेल बैठा कर नित नई उत्पन्न होने वाली समस्याओं को काफी हद तक कम कर सकता था. यों भी हम दोनों मिल कर अब तक के जीवन में आई प्रत्येक समस्या का सामना करते ही आए थे परंतु जब से मां आई हैं अमन ने उसे अकेला कर दिया. बीती यादों को सोचतेसोचते कब उस की आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला.

सुबह बैड के बगल की खिड़की के झीने परदों से आती सूरज की मद्धिम

रोशनी और चिडि़यों की चहचहाहट से उस की नींद खुल गई. तभी अमन ने चाय की ट्रे के साथ कमरे में प्रवेश किया, ‘‘उठिए मैडम मेरे हाथों की चाय से अपने संडे का आगाज कीजिए.’’

‘‘ओह क्या बात है आज तो मेरा संडे बन गया,’’ मैं फ्रैश हो कर चाय का कप ले कर अमन के बगल में बैठ गई.

‘‘तो आज संडे का क्या प्लान है मैडम, मम्मी और अवनि भी आते ही होंगे.’’

‘‘मम्मा आज हम लोग वंडरेला पार्क चलेंगे फोर होल डे इंजौयमैंट. चलोगे न मम्मा और नानी भी हमारे साथ चलेंगी.’’ मां के साथ वाक करके  लौटी अवनि ने हमारी बातें सुन कर संडे का अपना प्लान बताया.

ये भी पढ़ें- कोरोनावायरस: डराने वाली चिट्ठी

‘‘हांहां हम सब चलेंगे. चलो जल्दी से ब्रेकफास्ट कर के सब तैयार हो जाओ.’’ मेरे बोलने से पहले ही अमन ने घोषणा कर दी. पूरे दिन के इंजौयमैंट के बाद लेटनाइट जब घर लौटे तो सब थक कर चूर हो चुके थे सो नींद के आगोश में चले गए. मुझे लेटते ही वह दिन याद आ गया जब मां के आने के बाद एक दिन यूएस से अमन की मां ने फोन कर के बताया कि अगले हफ्ते वे इंडिया वापस आ रहीं हैं. 4 साल पहले अमन के पिता का एक बीमारी के चलते देहांत हो गया था. उस के बाद से उन की मां ने ही अपने दोनों बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया. अमन 2 ही भाई बहन हैं जिन में दीदी की शादी एक एनआरआई से हुई तो वे विवाह के बाद से ही अमेरिका जा बसीं थी. पिछले दिनों उन की डिलीवरी के समय मम्मीजी वहां गई थीं और अब उन का वापसी का समय हो गया था सो आ रही थीं. दोनों बच्चे अपनी मां से बहुत अटैच्ड हैं. उस दिन मैं बैंक से वापस आई तो अमन का मुंह फूला हुआ था. जैसे ही मां सोसाइटी के मंदिर में गईं थी वे फट पड़े.

‘‘अब बताओ मेरी मां कहां रहेंगी? क्या सोचेंगी वे कि मेरे बेटे के घर में तो मेरे लिए जगह तक नहीं है. आखिर इंडिया में है ही

कौन मेरे अलावा जो उन्हें पूछेगा. तुम्हारे तो

और भाईबहन भी हैं मैं तो एक ही हूं न मेरी मां के लिए.’’

‘‘अमन थोड़ी शांति तो रखो, आने दो मम्मीजी को सब हो जाएगा. मैं ने कहां मना किया है उन की जिम्मेदारी उठाने से पर अपनी मां की जिम्मेदारी भी है मेरे ऊपर. यह कह कर कि और भाईबहन उन्हें रखेंगे अपने पास मैं कैसे अकेला छोड़ दूं उन्हें. आखिर मेरा भी पालनपोषण उन्होंने ही किया है.’’

मेरी इतनी दलीलों में से एक भी शायद अमन को पसंद नहीं आई थी और वे अपने

फूले मुंह के साथ बैडरूम में जा कर टीवी देखने लगे थे. एक सप्ताह बाद जब सासू मां आईं तो मैं बहुत डरी हुई थी कि अब न जाने किन नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. यद्यपि मैं अपनी सास की समझदारी की शुरू से ही कायल रही हूं. परंतु मेरी मां को यहां देख कर उन की प्रतिक्रिया से तो अंजान ही थी.

मैं ने सासूमां के रहने का इंतजाम भी मां के कमरे में ही कर दिया था जो अमन को पसंद तो नहीं आया था परंतु 2 बैडरूम में फ्लैट में और कोई इंतजाम होना संभव भी नहीं था. मेरी मां की अपेक्षा सासू मां कुछ अधिक यंग, खुशमिजाज समझदार और सकारात्मक विचारधारा की थीं. मेरी भी उन से अच्छी पटती थी. इसीलिए तो उन के आने के दूसरे दिन अवसर देख कर अपनी सारी परेशानियां बयां करते हुए रो पड़ी थी मैं.

ये भी पढ़ें- मरहम: गुंजन ने अभिनव से क्यों बदला लिया?

उन्होंने मुझे गले लगाया और बोलीं, ‘‘तू चिंता मत कर मैं कोई समाधान निकालती हूं. सब ठीक हो जाएगा.’’ उन की अपेक्षा मेरी मां का जीवन के प्रति उदासीन और नकारात्मक होना स्वाभाविक भी था क्योंकि पहले बेटे की चाह में बेटियों की कतार फिर बेटेबहू की उपेक्षा आखिर इंसान की सहने की भी सीमा होती है. परिस्थितियों ने उन्हें एकदम शांत, निरुत्साही बना दिया था. वहीं सासूमां के 2 बच्चे और दोनों ही वैल सैटल्ड.

दोचार दिन सब औब्जर्व करने के बाद उन्होंने अपने साथ मां को भी

मौर्निंग वाक पर ले जाना प्रारंभ कर दिया था. वापस आ कर दोनों एकसाथ पेपर पढ़ते हुए चाय पीतीं थी जिस से अमन और मुझे अपने पर्सनल काम करने का अवसर प्राप्त हो जाता था. दोनों किचन में आ कर मेड की मदद करतीं जिस से मेरा काम बहुत आसान हो जाता. जब तक मैं और अमन तैयार होते मां और सासूमां मेड के साथ मिल कर नाश्ता टेबल पर लगा लेते. हम चारों साथसाथ नाश्ता करते और औफिस के लिए निकल जाते. अपनी मां को यों खुश देख कर अमन भी खुश होते. कुल मिला कर सासूमां के आने से मेरी कई समस्याओं का अंत होने लगा था. सासूमां को देख कर मेरी मां भी पौजिटिव होने लगीं थी. एक दिन जब हम सुबह नाश्ता कर रहे थे तो सासूमां बोलीं, ‘‘विनीता आज से अवनि अपनी दादीनानी के साथ सोएगी. कितनी किस्मत वाली है कि दादीनानी दोनों का प्यार एक साथ लेगी क्यों अवनि.’’

‘‘हां मां, अब से मैं आप दोनों के नहीं बल्कि दादीनानी के बीच में सोऊंगी. उन्होंने मुझे रोज एक नई कहानी सुनाने का प्रौमिस किया है.’’ अवनि ने भी चहकते हुए कहा.

इस बात से अमन भी बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें उन का पर्सनल स्पेस वापस जो मिल गया था. सासूमां के आने के बाद मैं ने भी चैन की सांस ली थी. और बैंक पर वापस ध्यान केंद्रित कर लिया था. अब 3 माह तक हमारे बीच रह कर सासूमां वापस कुछ दिनों के लिए दिल्ली चलीं गई थीं. पर इन 3 महीनों में उन्होंने मेरे लिए जो किया वह मैं ताउम्र नहीं भूल सकती. सच में इंसान अपनी सकारात्मक सोच और समझदारी से बड़ी से बड़ी समस्याओं को भी चुटकियों में हल कर सकता है जैसा कि मेरी सासूमां ने किया था. मां के मेरे साथ रहने पर भी उन्होंने खुशी व्यक्त करते हुए कहा था.

ये भी पढ़ें- ऑर्डर: क्या अंकलजी ने गुड्डी को अपना फोन दिया?

‘‘जब मेरी बेटी मेरा ध्यान रख सकती है तो मेरी बहू अपनी मां का ध्यान क्यों नहीं रख सकती और मुझे फक्र है अपनी बहू पर कि अपने 3 अन्य भाईबहनों के होते हुए भी उस ने अपनी जिम्मेदारी को समझा और निभाया.’’ तभी तो उन के जाने के समय मैं फफकफफक कर रो पड़ी थी और उन के गले लग के बोली थी, ‘‘मां जल्दी आना.’’

श्यामली- भाग 1: जब श्यामली ने कुछ कर गुजरने की ठानी

‘श्यामली बुटीक’ लखनऊ शहर में किसी परिचय का मुहताज नहीं था. होता भी क्यों, क्योंकि श्यामलीजी के जीवन का मोटो था कि अपने काम में परफैक्शन. इसी लक्ष्य के कारण कुछ वर्षों में ही उन का बुटीक शहर का सब से अच्छा बुटीक बन गया.

श्यामलीजी की मीठी, मधुर आवाज और चेहरे पर खिली मुसकान के साथ कस्टमर की पसंद को समझते हुए समय पर काम पूरा कर के वे उन्हें खुश कर देती थीं.

अब तो उन की बेटी राशि भी फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर के आ गई थी और बुटीक में उन का हाथ बंटा रही थी. बेटा शुभ अमेरिका पढ़ने गया तो वहीं का हो कर रह गया.

सोम उन के बुटीक के मैनेजर बन गए थे. उन के बालों की चांदनी, आंखों में चश्मा और थकती काया उन से रिटायरमैंट का इशारा करती दिखाई देती थी.

रात के 8 बजने वाले थे. श्यामलजी बुटीक बंद करवाने की सोच ही रही थीं कि दौड़तीहांफती वन्या उन के सामने आ कर खड़ी हो गई. फिर बोली, ‘‘मैम, मेरा लहंगा रैडी है?’’

‘हां…हां… आप ट्रायल कर लो, तो मैं फिनिशिंग करवा दूं.’

वन्या ट्रायलरूम में लहंगा पहन कर बाहर आते ही उन से लिपट कर बोली, ‘‘थैंक्यू मैम, आप के हाथ में जादू है.’’

वन्या की मां प्रज्ञा ने अपने बैग से कार्ड निकाला और फिर उन्हें देती हुए बोलीं, ‘‘दी, आप को शादी में जरूर आना है.’’

ये भी पढ़ें- Top 10 Romantic Story in Hindi: टॉप 10 रोमांटिक कहानियां हिंदी में

श्यामलीजी ने कार्ड को खोल कर देखते हुए कहा, ‘‘वैरी नाइस कार्ड.’’

‘‘7 दिसंबर… वाह जरूरी आऊंगी.’’

7 दिसंबर तारीख देखते ही श्यामलीजी अपने अतीत में खो गईं. पुरानी यादें चलचित्र की तरह उन की आंखों के सामने सजीव हो उठीं…

लखनऊ के पास सुलतानपुर एक छोटा सा शहर है. वे वहां रहती थीं. 3 बहनों और 2 भाइयों में वे सब से बड़ी थीं. पढ़ाई से अधिक सिलाईकढ़ाई में रुचि थी. जब वे छोटी थीं, तभी मां के दुपट्टे या साड़ी से अपनी गुडि़या के लिए तरहतरह के डिजाइनर लहंगे और दूसरी पोशाकें बनाया करती थीं.

ये सब देख कर मां कहतीं कि तुम्हें फैशन डिजाइनिंग का कोर्स करवा देंगे. बीए पास करने के बाद फैशन डिजाइनिंग का कोर्स कर लिया. पापा को शादी की फिक्र होने लगी थी. उन के पास दहेज देने के लिए बड़ी रकम तो थी नहीं. वे नैट पर लड़कों का प्रोफाइल देखने में लगे रहते थे.

श्यामली का चेहरा गोल था, रंग गेहुंआ, लेकिन कटीले नैननक्श की वे नाजुक सी आकर्षक लड़की थीं. चचंल चितवन और प्यारी सी मुसकराहट सब को आकर्षित कर लेती. वे खाना बहुत अच्छा बनातीं इसलिए अपने पापा की अन्नपूर्णा थीं.

पापा को सोम का प्रोफाइल पसंद आया था. उन्होंने उन का बायोडाटा और छोटा सा फोटो उन के पिता के पास भेज दिया. सोम के पिता का लखनऊ के अमीनाबाद में खूब चलता हुआ बड़ा सा मैडिकल स्टोर था. अच्छाखासा संपन्न परिवार और साथ में इकलौता बेटा तो सोने में सुहागा जैसा था.

सोम के पिता केशवजी के फोन ने उन के घर में खुशियों की हलचल मचा दी. उन्होंने मेल आईडी मांगी. बस फिर शुरू हो गई थी सोम के साथ चैटिंग. सोम की प्यारभरी मीठीमीठी बातों ने श्यामलीजी के दिल के तार झंकृत कर दिए.

जल्दी ही शादी की शहनाइयां बज उठीं. वे अपने मन में सुनहरे भविष्य के रंगबिरंगे सपने संजो कर सोम का हाथ पकड़ कर उन की बड़ी सी कोठी में प्रवेश कर गईं. वे खुशी से फूली नहीं समा रही थीं.

सोम की बांहों के घेरे में सिमट कर वे विश्वास ही नहीं कर पा रहीं थीं कि उन की दुनिया इतनी हसीन भी हो सकती है.

श्यामली सोम के प्यार में डूबी थीं, लेकिन उन का रवैया कुछ समझ नहीं आ रहा था. 1-2 महीनों में उन्हें थोड़ा बहुत इशारा मिल गया कि सोम दुकान पर केवल पैसा लेने जाते और फिर दोस्तों के साथ सिगरेट, शराब और लड़कियों की संगत में ऐश की लाइफ जीने के शौकीन हैं.

ये भी पढ़ें- मन के बंधन: दिल पर किसी का जोर नहीं चलता!

सोम बातबात पर उन्हें डांट देते थे, इसलिए वे उन से डरने लगी थीं. एक शाम सोम ने उन से क्लब चलने के लिए तैयार होने को कहा. वे अपने कमरे में तैयार हो रही थीं. तभी उन्हें सोम की पापा के साथ जोरजोर की कहासुनी की आवाजें सुनाई देने लगीं.

सोम के चेहरे पर तनाव देख कर उन्होंने उन से पूछा भी था कि क्या बात है? पापा क्यों नाराज हो रहे थे? इस पर सोम का जवाब था कि अपने काम से काम रखा करो.

उस दिन श्यामलीजी बड़े मन से तैयार हुई थीं. ब्लैक साड़ी में बहुत खूबसूरत लग रही थीं.

ट्रैफिक में फंस जाने के कारण वे लोग क्लब काफी देर से पहुंचे. वहां कौकटेल पार्टी चल रही थी. सैक्सी ड्रैसेज पहनी महिलाओं के हाथ में डिं्रक के गिलास थे. श्यामली घबरा कर सोम के पीछे छिपने लगी थीं. उन के लिए वहां का माहौल एकदम से नया और अजीब सा था.

Manohar Kahaniya: किसी को न मिले ऐसी मां- भाग 1

सौजन्य- मनोहर कहानियां

पंजाब के पटियाला जिले की घनौर तहसील के राजपुरा रोड पर बसे गांव खेड़ी गंडियां में रहने वाले दीदार सिंह के लिए शाम जीवन में अंधकार बन कर आई थी. उन के दोनों बेटे 10 साल का जश्नदीप सिंह और 6 साल का हरनदीप सिंह शाम करीब साढे़ 8 बजे घर के पास ही कोल्डड्रिंक लेने के लिए गए थे.

लेकिन जब वे आधे घंटे तक लौट कर घर नहीं आए तो उन की मां मंजीत कौर को चिंता होने लगी. थोड़ी देर बाद करीब 9 बजे मंजीत कौर के पति दीदार सिंह भी अपनी भांजी को गांव के बाहर बसअड्डे छोड़ कर घर लौटे तो उन्हें दोनों बच्चे घर में दिखाई नहीं दिए.

‘‘मंजीते… ओ मंजीते, जश्न… त हरन किधर हैं? भई दिखाई नहीं दे रहे.’’ दीदार सिंह ने बीवी मंजीत कौर से बच्चों के बारे में पूछा.

‘‘बच्चे तो एक घंटा पहले पास की दुकान से कोल्डड्रिंक खरीदने गए थे. बहुत देर से कोल्डड्रिंक पीने की जिद कर रहे थे, इसलिए मैं ने पैसे दे कर लाने के लिए भेज दिया था.’’ मंजीत कौर ने बताया.

मंजीत कौर को भी चिंता हुई. क्योंकि बच्चों को गए तो बहुत देर हो गई थी अब तक तो उन्हें आ जाना चाहिए था.

वह पति से बोली, ‘‘सुनो जी, मुझे भी अब चिंता हो रही है. पता नहीं बच्चे कहीं खेलने के लिए इधरउधर न निकल जाएं, इसलिए आप बाहर जा कर देख आओ. तब तक मैं किचन का काम निबटा लेती हूं. बच्चे आते ही खाना मांगेंगे.’’

दीदार सिंह को बच्चों के प्रति बीवी की लापरवाही पर गुस्सा तो बहुत आया, लेकिन मन मसोस कर बड़बड़़ाता हुआ घर के बाहर निकल गया.

दीदार सिंह ने आसपास के सभी लोगों से पूछा, लेकिन कोई भी हरन व जश्न के बारे में ऐसी जानकारी नहीं दे सका, जिस से उन का कुछ पता चलता.

ये भी पढ़ें- Crime Story- गुड़िया रेप-मर्डर केस: आईजी और एसपी भी हुए गिरफ्तार

जब घर आ कर दीदार सिंह ने बताया कि हरन व जश्न गांव में कहीं नहीं मिले तो मंजीत कौर के पांव तले की जमीन खिसक गई. आखिर एक मां के एक नहीं 2-2 बेटे एक साथ रात के ऐसे वक्त लापता हो जाएं तो उस का कलेजा तो फटना ही था.

घर में रोनापीटना शुरू हो गया. रोनापीटना शुरू हुआ तो आसपड़ोस के लोग जमा हो गए. गांवदेहात में अगर किसी के घर परेशानी हो तो पूरा गांव उस परेशानी को दूर करने में जुट जाता है. लिहाजा आधी रात होतेहोते पूरे गांव में हरन व जश्न के लापता होने की खबर जंगल की आग की तरह फैल गई. यह बात 22 जुलाई, 2019 की थी.

गांव के नौजवान और दीदार सिंह के परिवार के लोग टौर्च और मोबाइल की फ्लैश लाइट जला कर गांव के ऐसे हिस्सों में टोली बना कर ढूंढने के लिए निकल पडे़. कुछ लोग करीब 2 किलोमीटर दूर भाखड़ा नहर की तरफ भी बच्चों की तलाश करने चले गए, जहां  आमतौर पर गांव के बच्चे शाम को घूमने टहलने चले जाया करते थे.

ये भी पढ़ें- Crime Story: पुलिस वाले की खूनी मोहब्बत

सुबह होते ही परिवार के लोग और गांव वाले खेड़ी गंडियां थाने पहुंच गए. उन्होंने थाने में दोनों बच्चों के लापता होने की सूचना दे कर पुलिस से बच्चों की तलाश करने का अनुरोध किया. पुलिस ने उसी दिन गुमशुदगी दर्ज कर ली.

पुलिस ने बच्चों के फोटो ले कर आसपास के इलाकों में उन के पोस्टर चिपकवा दिए. गुमशुदगी के मामलों में पुलिस आमतौर पर इस से ज्यादा कोई काररवाई करती भी नहीं है. इसी तरह 3 दिन बीत गए, लेकिन बच्चों का कहीं पता नहीं चला. अब दीदार सिंह व गांव वालों का धीरज जवाब देने लगा था.

लिहाजा पहले तो पीडि़त परिवार और सभी गांव वालों ने मिल कर खेड़ी गंडियां के बाहर राजपुरा रोड पर प्रदर्शन कर जाम कर दिया. धरनाप्रदर्शन शुरू होते ही जिले के आला अधिकारियों के कान खड़े हो गए. इलाके की सांसद परनीत कौर व कांग्रेस के विधायकों ने एसएसपी के ऊपर इस मामले का जल्द  खुलासा करने का दबाव बनाना शुरू कर दिया था.

अगले भाग में पढ़ें-  एक बच्चे की मिली लाश

अनलिमिटेड कहानियां-आर्टिकल पढ़ने के लिएसब्सक्राइब करें