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Manohar Kahaniya: जब उतरा प्यार का नशा- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

मिली जानकारी के अनुसार सुरेंद्र सिंह नेमावर में एक अच्छे धमकदार परिवार का था. उस के दादा होकम सिंह के अलावा उस के पिता लक्ष्मण सिंह भी नामदार रहे हैं. कुछ साल पहले इस परिवार की जमीन हाइवे निर्माण के लिए शासन ने अधिग्रहीत कर ली थी. बदले में परिवार को मुआवजे की मोटी रकम मिली थी.

पैसा आने पर सुरेंद्र और उस के छोटे भाई वीरेंद्र का समाज में रौबरुतबा बढ़ गया था. दोनों भाई शराब की लत के लिए भी चर्चित हो गए थे.

पुलिस सुरेंद्र के बारे में हर स्तर की जानकारियां जुटाने में लगी हुई थी, जबकि लापता रूपाली, ममता, दिव्या, पवन और पूजा का डेढ़ महीने से अधिक समय गुजर जाने के बावजूद कुछ नहीं पता चल पाया था.

इंस्टाग्राम की पोस्ट ने बढ़ाया शक

एक दिन सुरेंद्र के बारे में एक नई जानकारी मिली. वह जानकारी सोशल मीडिया की तरफ से मिली थी. इंस्टाग्राम पर सुरेंद्र की मंगेतर को ले कर एक पोस्ट किया गया था. उस के जरिए रूपाली द्वारा आपत्ति जताई गई थी.

यह पोस्ट सुरेंद्र की शादी नसरूलागंज निवासी एक युवती के साथ तय होने के जवाब के तौर पर की गई थी. इस से स्पष्ट था कि सुरेंद्र के रूपाली से संबंध टूट गए थे.

इस जानकारी के आधार पर इंसपेक्टर शिवमुराद यादव ने रूपाली के लापता होने के मामले को सुरेंद्र की सगाई से जोड़ कर देखा. उन्होंने अपने सहकर्मियों को पता लगाने के लिए कहा कि जिस रोज रूपाली और उस के परिवार के दूसरे 4 सदस्य लापता हुए, उस रोज सुरेंद्र कहां था?

संयोग से उसी दौरान एक ऐसी घटना घटी, जिस से मामले में पूरी तरह से सुरेंद्र का हाथ होने का शक और मजबूत हो गया.

पुलिस ने पाया कि भारती और संतोष के मोबाइल पर बारबार रूपाली के मोबाइल से आने वाले मैसेज जांच की दिशा भटकाने के लिए किए जा रहे थे. 40 दिन बाद आए मैसेज को टारगेट कर इंसपेक्टर यादव ने मोबाइल की लोकेशन मालूम की, जो चोरल डैम के इलाके की थी.

चोरल डैम नेमावर से बहुत नजदीक नहीं तो बहुत दूर भी नहीं है. लोग वहां घूमने जाते हैं. पुलिस ने अब पूरा मामला एक बड़ी साजिश में उलझा हुआ महसूस किया. उस दिशा में नेमावर पुलिस ने अपनी जांच और भी तेज कर दी.

कुछ दिनों बाद ही पुलिस को एक ढाबे पर कुछ लोगों के द्वारा रूपाली के परिवार के गायब होने की बात करने की जानकारी मिली. उन में 2 लोग सुरेंद्र के खेत पर काम करते थे.

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पुलिस संदेह के आधार पर उन्हें थाने लाई. उन से पूछताछ के क्रम में सुरेंद्र के 2 करीबी दोस्तों विवेक तिवारी और राकेश के बारे में भी जानकारी मिली. उन्हें भी थाने बुलवा लिया गया. आखिर में पुलिस सुरेंद्र और उस के भाई वीरेंद्र को भी पूछताछ के लिए थाने ले आई.

इंसपेक्टर यादव ने दोनों भाइयों से अलगअलग पूछताछ की और उन के दोस्तों के बयान के साथ तार जोड़ा, तब यह समझते देर नहीं लगी कि लापता परिवार के पीछे इन्हीं लोगों का हाथ है.

उन पर जब सख्ती बरती गई और सच छिपाने एवं झूठे बयान देने की भी सजा का डर दिखाया गया, तब वे टूट गए.

उन से मिली अहम जानकारियों के आधार पर पुलिस के आला अधिकारी जेसीबी मशीन ले कर सुरेंद्र के खेत पर जा पहुंचे. तब तक गांव वालों की काफी भीड़ वहां जमा हो गई थी. कुछ ही देर में खेत की खुदाई शुरू की गई.

जैसेजैसे बड़े गड्ढे से मिट्टी निकलती गई, वैसेवैसे अपराधियों का कृत्य सामने आता चला गया. कुछ देर में ही जो मंजर सामने आया, सब की रूह कांप उठी. खेत में से एक के बाद एक कर सड़ेगले 5 लाशों के कंकाल निकाले गए.

उन की पहचान ममता, रूपाली, दिव्या, पूजा और पवन के रूप में हुई. पुलिस को हैरत हुई कि जिस के मोबाइल से लगातार मैसेज आ रहे थे, उस की मौत हो चुकी थी.

इस नृशंस हत्याकांड को ले कर पूरे मध्य प्रदेश में सनसनी फैल गई. सामाजिक कार्यकर्ताओं और राजनीतिक दलों ने इसे दलित अत्याचार का रंग देने की कोशिश की.

हालांकि मामला कैसे अलग तरह का था, इस का खुलासा आरोपियों ने गहन पूछताछ के बाद किया. इस दिल दहला देने वाले सनसनीखेज हत्याकांड की कहानी इस प्रकार सामने आई—

रूपाली के पिता मूलरूप से खंडवा स्थित खलावा के रहने वाले थे. लेकिन पूरा परिवार काम की तलाश में देवास जिले के नेमावर के वार्ड नंबर 10 में आ कर बस गया था.

रूपाली के घर के बिलकुल नजदीक सुरेंद्र सिंह का मकान था. रूपाली के भाई संतोष से उस की दोस्ती थी. दोनों एक ही उम्र के थे. दोस्ती होने के कारण सुरेंद्र का रूपाली के घर आनाजाना लगा रहता था.

रूपाली किशोरावस्था की उम्र लांघ चुकी थी. वह काफी आकर्षक और सुंदर दिखने लगी थी. उस की सुंदरता को देख कर सुरेंद्र दंग था. मन ही मन वह उसे अपना दिल दे बैठा था. किसी न किसी बहाने से वह संतोष के घर जाने लगा था.

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कुछ समय बाद रूपाली की बड़ी बहन भारती, पिता और संतोष खराब आर्थिक स्थिति के चलते रोजगार के सिलसिले में पीथमपुर जा कर रहने लगे. जबकि रूपाली अपनी मां और बहन के साथ वहीं नेमावर में ही रहती थी.

सुरेंद्र के साथ लिवइन में रहने लगी रूपाली

संतोष के जाने के बाद सुरेंद्र ही एक तरह से उन की देखभाल करने वाला बन गया था. वह छोटीमोटी मदद भी कर दिया करता था

रूपाली भी सुरेंद्र के हावभाव को समझ गई थी. ऊपर से वह पैसे वाला संपन्न परिवार से था. रूपाली ने महसूस किया कि उस की मनमांगी मुराद पूरी होने वाली है.

अगले भाग में पढ़ें- सुरेंद्र को बदनाम करने लगी  रूपाली 

जरूरी हैं दूरियां पास आने के लिए- भाग 3: क्यों मिशिका को भूलना चाहता था विहान

लेखिका- डा. मंजरी अमित चतुर्वेदी

‘‘जानती हो, जब हम साथ पढ़ाई करते थे तब भी मैं टौपिक समझ न आने के बहाने से देर तक बैठा रहता. तुम मुझे बारबार समझतीं. पर, मैं नादान बना बैठा रहता सिर्फ तुम्हारा साथ पाने की चाह में. जब छुट्टियों में बच्चे बाहर अलगअलग ऐक्टिविटी करते तब भी मैं तुम्हारी पसंद के हिसाब से काम करता था ताकि तुम्हारा साथ रहे.’’

‘‘विहान…’’ मिशी ने अचरज से कहा.

‘‘अभी तुम बस सुनो मुझे और मेरे दिल की आवाज को. याद है मिशी, जब हम 12वीं में थे, तुम मुझ से कहतीं, ‘क्यों विहान, गर्लफ्रैंड नहीं बनाई, मेरी तो सब सहेलियों के बौयफ्रैंड हैं?’ मैं पूछता कि तुम्हारा भी है तो तुम हंस देतीं, ‘हट पागल, मुझे तो पढ़ाई करनी है एमबीए की, फिर मस्त जौब. पर विहान,  तुम्हारी गर्लफ्रैंड होनी चाहिए’ इतना  कह कर तुम मुझे अपनी कुछ सहेलियों की खूबियां गिनवाने लगतीं. मेरा मन करता कि तुम्हें  झकझर कर कहूं कि तुम हो तो, पर नहीं कह सका.

‘‘और तुम्हें जो अपने हर बर्थडे पर  जिस सरप्राइज का सब से ज्यादा इंतजार होता, वह देने वाला मैं ही था. बचपन में जब तुम को तुम्हारी फेवरेट टौफी तुम्हारे पैंसिल बौक्स में मिली, तुम बेहद खुश हुई थीं. अगली बार भी जब मैं ने तुम को सरप्राइज किया, तब तुम ने कहा था, ‘विहान, पता नहीं कौन है, मौम, डैड, दी या मेरी कोई फ्रैंड, पर मेरी इच्छा है कि मुझे हमेशा यह सरप्राइज गिफ्ट  मिले.’ तुम ने सब के नाम लिए, पर मेरा नहीं,’’ कहतेकहते विहान की आवाज लड़खड़ा सी गई, फिर भर आए गले को साफ कर वह आगे बोला, ‘‘तब से हर बार मैं यह करता गया. पहले पैंसिल बौक्स था, फिर बैग, फिर तुम्हारा पर्स और अब कूरियर.’’

सच जान कर मिशी जैसे सुन्न हो गई. वह हर बात विहान से शेयर करती थी. पर कभी यह नहीं सोचा कि विहान भी तो वह शख्स हो सकता है. उसे खुद पर बहुत गुस्सा आ रहा था.

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रात गहरा चुकी थी. चांद स्याह रात के माथे पर बिंदी बन कर चमक रहा था. तेज हवा और लहरों के शोर में मिशी के जोर से धड़कते दिल की आवाज भी मिल रही थी. विहान आज वर्षों से छिपे प्रेम की परतें खोल  रहा था.

वह आगे बोला, ‘‘मिशी, उस दिन तो जैसे मैं हार गया जब मैं ने तुम से कहा कि मुझे एक लड़की पसंद है. मैं ने बहुत हिम्मत कर अपने प्यार का इजहार करने के लिए यह प्लान बनाया था. मैं ने धड़कते दिल से तुम से कहा, दिखाऊं फोटो, तुम ने झट से मेरा मोबाइल छीना और जैसे ही फोटो देखा, तुम्हारा रिऐक्शन देख, मैं ठगा सा रह गया. मुझे लगा, यहां मेरा कुछ नहीं होने वाला. पगली से प्यार कर बैठा,’’ इतना कह कर उस ने मिशी से पूछा, ‘‘क्या तुम्हें याद है, उस दिन तुम ने क्या किया था?’’

‘‘हां, तुम्हारे मोबाइल में मुझे अपना फोटो दिखा तो मैं ने कहा, ‘वाओ, कब लिया यह फोटो, बहुत प्यारा है, सैंड करो’ और मैं उस पिक में खो गई, सोशल मीडिया पर शेयर करने लगी. तुम्हारी गर्लफ्रैंड वाली बात तो मेरे दिमाग से गायब ही हो गई थी.’’

‘‘जी, मैडमजी, मैं तुम्हारी लाइफ में  इस हद तक जुड़ा रहा कि तुम मुझे कभी अलग से फील कर ही नहीं पाईं. ऐसा कितनी बार हुआ, पर तुम अपनेआप में थीं, अपने सपनों में, किसी और बात के लिए शायद तुम्हारे पास टाइम ही नहीं था, यहां तक कि अपने जज्बातों को समझने के लिए भी नहीं,’’ विहान कहता जा रहा था. मिशी जोर से अपनी मुट्ठियां भींचती हुई अपनी बेवकूफियों का हिसाब लगा रही थी.

इस तरह विहान न जाने कितनी छोटीबड़ी बातें बताता रहा और मिशी सिर झकाए सुनती रही. मिशी का गला रुंध गया, ‘‘विहान, इतना प्यार कोई किसी से कैसे कर सकता है. और तब तो बिलकुल नहीं जब उसे कोई समझने वाला ही न हो. कितना कुछ दबा रखा है तुम ने. मेरे साथ की छोटी से छोटी बात कितनी शिद्दत से सहेज कर रखी है तुम ने.’’

‘‘अरे, पागल रोते नहीं. और यह किस ने कहा कि तुम मुझे समझती नहीं थीं. मैं तो हमेशा तुम्हारा सब से करीबी रहा. इसलिए प्यार का एहसास कहीं गुम हो गया था. और इस हकीकत को सामने लाने के लिए मैं ने खुद को तुम से दूर करने का फैसला किया. कई बार दूरियां नजदीकियों के लिए बहुत जरूरी हो जाती हैं. मुझे लगा कि मेरा प्यार सच्चा होगा, तो तुम तक मेरी सदा जरूर पहुंचेगी. नहीं तो, मुझे आगे बढ़ना होगा तुम को छोड़ कर.’’

‘‘मैं कितनी मतलबी थी.’’

‘‘न बाबा, तुम बहुत प्यारी तब भी थीं और अब भी हो.’’

मिशी के रोते चेहरे पर हलकी सी मुसकान आ गई. वह धीरे से विहान के कंधों पर अपना सिर टिकाने को बढ़ ही रही थी कि अचानक उसे कुछ याद आया. वह एकदम उठ खड़ी हुई.

‘‘क्या हुआ, मिशी?’’

‘‘यह सब गलत है.’’

‘‘क्यों गलत है?’’

‘‘तुम और पूजा दी…’’

‘‘मैं और पूजा….’’ कह कर विहान हंस पड़ा.

‘‘तुम हंस क्यों रहे हो?’’

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‘‘मिशी, मेरी प्यारी मिशी, मुझे जैसे ही पूजा और मेरी शादी की बात पता चली तो मैं पूजा से मिला और तुम्हारे बारे में बताया. सुन कर पूजा भी खुश हुई. उस का कहना था कि विहान हो या कोई और, उसे ज्यादा फर्क नहीं पड़ता. मांपापा जहां चाहेंगे, वह खुशीखुशी वहां शादी कर लेगी. फिर हम दोनों ने सारी बात घर पर बता दी. किसी को कोई प्रौब्लम नहीं है. अब इंतजार है तो तुम्हारे जवाब का.’’

इतना सुनते ही मिशी को तो जैसे अपने कानों पर यकीन ही नहीं हुआ. उस के चेहरे पर मुसकराहट तैर गई. अब न कोई शिकायत बची थी, न सवाल.

‘‘बोलो मिशी, मैं तुम्हारे जवाब का इंतजार कर रहा हूं,’’ विहान ने बेचैनी से कहा.

‘‘मेरे चेहरे पर बिखरी खुशी देखने के बाद भी तुम को जवाब चाहिए,’’ मिशी ने नजरें झका कर भोलेपन से कहा.

‘‘नहीं मिशी, जवाब तो मुझे उसी दिन मिल गया था जब मैं 10 महीने बाद  तुम्हारे घर आया था. पहले वाली मिशी होती तो बोलबोल कर, सवाल पूछपूछ कर, झगड़ा कर के मुझे भूखा ही भगा देती,’’ कह कर विहान जोर से हंस पड़ा.

‘‘अच्छा जी, मैं इतनी बकबक करती हूं,’’ मिशी ने मुंह बनाते हुए कहा.

‘‘हांजी, पर न तुम झगड़ीं, न कुछ बोलीं, बस देखती रहीं मुझे. ख्वाब बुनती रहीं. उसी दिन मैं समझ गया था कि जिस मिशी को पाने के लिए मैं ने उसे खोने का गम सहा, यह वही है, मेरी मिशी, सिर्फ मेरी मिशी,’’ विहान ने मिशी का हाथ पकड़ते हुए कहा.

मिशी ने भी विहान का हाथ कस कर थाम लिया हमेशा के लिए. वे हाथों में हाथ लिए चल दिए. जिंदगी के नए सफर पर साथसाथ कभी जुदा न होने के लिए. आसमां, चांदतारे, चांदनी और लहलहाता समुद्र उन के प्रेम के साक्षी बन गए थे.

कहीं दूर से हवा में संगीत की धुन उन के प्रेम की दास्तां बयां कर रही थी,  ‘मेरे हमसफर… मेरे हमसफर… हमें साथ चलना है उम्र भर…’

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आखिरी मुलाकात- भाग 2: क्यों सुमेधा ने समीर से शादी नहीं की?

Writer- Shivi Goswami

मैं उस का चेहरा देखे जा रहा था. वह मेरा बहुत अच्छा दोस्त बन गया था. शायद अब वह मेरे दिल की बात भी पढ़ने लगा था.

‘देखो, मैं ने जानबूझ कर हां बोला है और मैं कोई बहाना बना कर कल नहीं आऊंगा. तुम दोनों मूवी देखने अकेले जाना. इस से तुम्हें एकसाथ वक्त बिताने का मौका मिलेगा और अपने दिल की बात कहने का भी.’

‘लेकिन…’

‘लेकिनवेकिन कुछ नहीं, तुम्हें अपने दिल की बात कल उस से कहनी ही होगी. वह आ कर तो यह बात बोलेगी नहीं.’

मैं ने नीलेश को गले लगा लिया,

‘धन्यवाद नीलेश…’

‘ओह रहने दे, तेरी शादी में भांगड़ा करना है बस इसलिए ऐसा कर रहा हूं,’ यह कह कर नीलेश हंसने लगा.

आज रविवार था और नीलेश का प्लान कामयाब हो चुका था. उस ने सुमेधा को फोन कर के कह दिया था कि उस की मौसी बिना बताए उस को सरप्राइज देने के लिए पूना से यहां उस से मिलने आई हैं. इसलिए वह मूवी देखने नहीं आ सकता. लेकिन हम उस की वजह से अपना प्लान और मूड खराब न करें. इस से उस को अच्छा नहीं लगेगा.

सुमेधा मान गई और न मानने का तो कोई सवाल ही नहीं था. मैं मन ही मन नीलेश के दिमाग की दाद दे रहा था.

मौल के बाहर मैं सुमेधा का इंतजार कर रहा था. सुमेधा जैसे ही औटो से उतरी मैं ने उस को देख लिया था. सफेद सूट में वह बहुत खूबसूरत लग रही थी. मैं उस को बस देखे जा रहा था. उस ने मेरी तरफ आ कर मुझ से हाथ मिलाया और कहा, ‘ज्यादा इंतजार तो नहीं करना पड़ा?

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‘नहीं, मैं बस 20 मिनट पहले आया था,’

मैं ने उस की तरफ देखते हुए कहा.

‘ओह, आई एम सौरी. ट्रैफिक बहुत है आज, रविवार है न इसलिए,’ उस ने हंसते हुए कहा.

हम दोनों ने मूवी साथ देखी. लेकिन मूवी बस वह देख रही थी. मेरा ध्यान मूवी पर कम और उस पर ज्यादा था.

मूवी के बाद हम दोनों वहीं मौल के एक रेस्तरां में बैठ गए. सुमेधा मूवी के बारे में ही बात कर रही थी.

‘मुझे तुम से कुछ कहना है सुमेधा,’ मैं ने सुमेधा की बात बीच में ही काटते हुए कहा.

‘हां, बोलो समीर…,’ सुमेधा ने कहा.

‘देखो, मैं ने सुना है कि लड़कियों का सिक्स सैंस लड़कों से कुछ ज्यादा होता है, लेकिन फिर भी मैं तुम से कुछ कहना चाहता हूं. अगर तुम को मेरी बात पसंद न आए तो तुम मुझ से साफसाफ बोल देना. और हां, इस से हमारी दोस्ती में कोई फर्क नहीं आना चाहिए.’

‘लेकिन बात क्या है, बोलो तो पहले,’ सुमेधा ने मेरी तरफ देखते हुए कहा.

‘मुझे डर था कि कहीं अपने दिल की बात बोल कर मैं अपने प्यार और दोस्ती दोनों को ही न खो दूं. फिर नीलेश की बात याद आई कि कम से कम एक बार बोलना जरूरी है, जिस से सचाई का पता चल सके. मैं ने सुमेधा की तरफ देखते हुए अपनी पूरी हिम्मत जुटाते हुए कहा, ‘आई…आई लव यू सुमेधा. तुम मुझे बहुत अच्छी लगती हो.’

मेरी बात सुन कर सुमेधा एकदम अवाक रह गई. उस के चेहरे के भाव एकदम बदल गए.

‘सुमेधा, कुछ तो बोलो… देखो, अगर तुम्हें बुरा लगा हो तो मैं माफी चाहूंगा. जो मेरे मन में था और जो मैं तुम्हारे लिए महसूस करता हूं वह मैं ने तुम से कह दिया और यकीन मानो आज तक यह बात न तो मैं ने कभी किसी से कही है और न ही कहने का दिल किया कभी.’

सुमेधा मुझे देखे जा रही थी और मेरी घबराहट उस की नजरों को देख कर बढ़ती जा रही थी. वह धीमी आवाज में बोली, ‘मैं तुम से नाराज हूं…’

मैं उस की तरफ एकटक देखे जा रहा था.

‘मैं तुम से नाराज हूं इसलिए क्योंकि तुम ने यह बात कहने में इतना समय लगा दिया और मुझे लगता था कि मुझे ही प्रपोज करना पड़ेगा.’

उस की बात को सुन कर मुझे लगा कि कहीं मेरे कानों ने कुछ गलत तो नहीं सुन लिया था. कहीं यह सपना तो नहीं? लेकिन वह कोई सपना नहीं हकीकत थी.

मैं ने लंबी सांस लेते हुए कहा, ‘तुम ने मुझे डरा दिया था सुमेधा. मुझे लगा कहीं प्यार की बात बोल कर मैं अपनी दोस्ती न खो दूं.’

‘अच्छा… और अगर न बताते तो शायद अपने प्यार को खो देते,’ सुमेधा ने कहा.

उस दिन से ज्यादा खुश शायद मैं पहले कभी नहीं हुआ था. जब एम.ए. में फर्स्ट क्लास आया था तब भी और जब नौकरी मिली थी तब भी. एक अजीब सी खुशी थी उस दिन.

सुमेधा और मैं घंटों मोबाइल पर बात किया करते थे और मौका मिलते ही एकदूसरे के साथ वक्त बिताते थे.

उस दिन के बाद एक दिन सुमेधा ने मुझे बहुत खूबसूरत सा हार दिखाते हुए बाजार में कहा, ‘देखो समीर, कितना प्यारा लग रहा है.’

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मैं ने कहा, ‘तुम से ज्यादा नहीं.’

वह बोली, ‘जनाब, यह मेरी खूबसूरती को और बढ़ा सकता है.’

उस वक्त मन तो था कि मैं उस को वह हार दिलवा कर उस की खूबसूरती में चार चांद लगा दूं, लेकिन मेरी सैलरी इतनी नहीं थी कि उस को वह हार दिलवा सकता.

सुमेधा समझ गई थी. उस ने मेरी तरफ देखते हुए कहा, ‘इतना भी खूबसूरत नहीं है कि इस हार की इतनी कीमत दी जाए. लगता है अपने शोरूम के पैसे भी जोड़ दिए हैं. चलो समीर चाय पीते हैं.’

मुझे सुमेधा की वह बात अच्छी लगी. वह खूबसूरत तो थी ही, समझदार भी थी.

वक्त बीतता गया. सुमेधा चाहती थी कि मैं शादी से पहले अपने पैरों पर अच्छे से खड़ा हो जाऊं ताकि शादी के बाद बढ़ती हुई जिम्मेदारियों से कोई परेशानी न आए. बात भी सही थी. अभी मेरी सैलरी इतनी नहीं थी कि मैं शादी जैसी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी को निभा सकूं.

हमारे प्यार को 1 साल से ज्यादा हो गया था. वक्त कैसे बीत गया पता ही नहीं चला.

आज सुमेधा औफिस नहीं आई थी. मैं ने सुमेधा को फोन किया, लेकिन पूरी रिंग जाने के बाद भी उस ने मोबाइल नहीं उठाया.

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हो सकता है वह व्यस्त हो किसी काम में. क्या हुआ होगा, जो सुमेधा ने मुझे नहीं बताया कि आज वह छुट्टी पर है. पूरा दिन बीत गया लेकिन सुमेधा का कोई फोन नहीं आया. मुझे बहुत अजीब लग रहा था. क्या आज वह इतनी व्यस्त है कि एक बार भी फोन या मैसेज करना जरूरी नहीं समझा?

दूसरा विवाह- भाग 1: क्या सोनाक्षी से विशाल प्यार करता था?

सोनाक्षी ‘बाय’ बोल कर औफिस जाने लगी, तभी उस की भाभी लीना ने उसे रोका और खाने का डब्बा थमा दिया, जिसे वह आज भी भूल कर जा रही थी. मगर वह कहने लगी कि रहने दो, आज वह औफिस की कैंटीन में खा लेगी.

‘‘कोई जरूरत नहीं, ले कर जाओ. रोजरोज बाहर का खाना सेहत के लिए ठीक नहीं होता,  झूठमूठ का गुस्सा दिखाती हुई लीना बोली, ‘‘मां को बताऊं क्या?’’

‘‘अच्छाअच्छा, ठीक है, लाओ, पर मां को कुछ मत बताना, वरना उन का भाषण शुरू हो जाएगा.’’ उस की बात पर लीना मुसकरा पड़ी और खाने का डब्बा उसे थमा दिया.

सोनाक्षी और लीना थीं तो ननदभाभी लेकिन दोनों सखियों जैसी थीं जिन्हें हर बात बे िझ झक बताई जा सकती है. ‘‘प्लीज भाभी, मां को मत बताना कि कभीकभार मैं कैंटीन में खा लेती हूं, वरना वह गुस्सा करेंगी,’ सोनाक्षी बोल ही रही थी कि विशाल उस के पीछे आ कर खड़ा हो गया.

लीना जानती थी वह कुछ न कुछ बोलेगी ही विशाल के बारे में और फिर दोनों के बीच बहसबाजी शुरू हो जाएगी. और वही हुआ भी. सोनाक्षी कहने लगी, ‘‘अब मैं निकलती हूं, वरना विशाल, गला फाड़ कर सोनाक्षीसोनाक्षी चिल्लाने लगेगा. अजीब इंसान है, कितनी बार कहा है नीचे से आवाज मत लगाया करो, सब सुनते हैं, पर नहीं, अक्ल से दिवालिया जो ठहरा, सम झता ही नहीं है.’’

‘‘अच्छा, तो अक्ल से दिवालिया इंसान हूं मैं, और तुम ज्ञान की पोटली,

‘‘ओहो… ओहो…’’ पीछे से विशाल की आवाज सुन सोनाक्षी ने दांतों तले अपनी जीभ दबा ली कि यह क्या बोल गई वह. अब तो यह विशाल का बच्चा छोड़ेगा नहीं उसे. ‘‘बोलो, चुप क्यों हो गईं? वैसे, मु झे लगता है दिमागी इलाज की तुम्हें जरूरत है क्योंकि आज औफिस बंद है. पता नहीं, शायद, आज ईद है?’’ बोल कर विशाल हंसा, तो लीना को भी हंसी आ गई.

दोनों को खुद पर हंसते देख सोनाक्षी को पहले तो बहुत गुस्सा आया, लेकिन फिर दांत निपोरती हुई बोली, ‘‘हां भई, पता है मु झे, वह तो मैं तुम्हारा टैस्ट ले रही थी.’’

‘‘टैस्ट… ले रही थी या अपने दिमाग का टैस्ट दे रही थी?’’ जोर का ठहाका लगाते विशाल बोला, तो लीना हंसी रोक न पाई.

‘‘वैसे, एक बात बताओ, क्या सच में तुम्हें पता नहीं था कि आज औफिस बंद है या मु झ से मिलने की बेताबी थी?’’ उस की आंखों में  झांकते हुए विशाल बोला, तो शरमा कर सोनाक्षी ने अपनी नजरें नीची कर लीं.

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सच बात तो यही है कि उसे सच में पता नहीं था कि आज औफिस की छुट्टी है. वह तो विशाल से मिलने को इतना आतुर रहती है कि औफिस जाने के लिए रोज वक्त से पहले ही तैयार हो कर उस की राह देखने लगती है और आज भी उस ने वही किया. जरा भी भान नहीं रहा उसे कि आज औफिस की छुट्टी है. वह तैयार हो कर विशाल की राह देखने लगी. विशाल के साथ बातें करना, उस के साथ वक्त गुजारना सोनाक्षी को बहुत अच्छा लगता है.

दरअसल, मन ही मन वह उस से प्यार करने लगी है और यह बात लीना भी जानती है कि सोनाक्षी विशाल को पसंद करती है. लेकिन घर में सब को यही लगता है कि दोनों सिर्फ अच्छे दोस्त हैं और कुछ नहीं. विशाल और सोनाक्षी एक ही औफिस में काम करते हैं और दोनों एकदूसरे को 2 सालों से जानते हैं. चूंकि दोनों एक ही औफिस में काम करते हैं इसलिए सोनाक्षी विशाल के साथ उस की ही गाड़ी में औफिस जातीआती है.

दोनों बातों में लगे थे. तब तक लीना सब के लिए चाय बना लाई. वह अपनी चाय ले कर सोफे  पर बैठ गई और उन की बातों में शामिल हो गई. लीना के हाथों की बनी चाय पी कर विशाल कहने से खुद को रोक नहीं पाया कि लीना के हाथों में तो जादू है. उस के हाथों की बनी चाय पी कर मूड फ्रैश हो जाता है.

सच में, लीना चाय बहुत अच्छी बनाती है, यह सब कहते हैं और सिर्फ चाय ही नहीं, बल्कि उस का हर काम फरफैक्ट होता है और यही बात विशाल को बहुत पसंद है. उसे गैरजिम्मेदार और कामों के प्रति लापरवाह इंसान जरा भी पसंद नहीं है. वह खुद भी अपनी जिम्मेदारी बखूबी निभाता है. लड़का है तो क्या हुआ? अपने घर के सारे काम वह खुद करता है और यह बात लीना को बहुत अच्छी लगती है.

लीना की बढ़ाई सुन कर मुंह बनाती हुई सोनाक्षी कहने लगी कि चाय वह भी अच्छी बना लेती है. तो चुटकी लेते हुए विशाल बोला, ‘‘हां, पी है तुम्हारे हाथों की बनी चाय भी, बिलकुल गटर के पानी जैसी,’’ उस की बात पर सब हंस पड़े और सोनाक्षी मुंह बनाते हुए विशाल पर मुक्का बरसाने लगी कि वह उस का मजाक क्यों बनाता है हमेशा?

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कुछ देर और बैठ कर विशाल वहां से जाने को उठा ही था कि लीना ने उसे रोक लिया, यह बोल कर कि वह खाना खा कर ही जाए. लीना के इतने प्यार से आग्रह पर विशाल ‘न’ नहीं कह पाया. वैसे, विशाल यहां यह बताने आया था कि आज बुकफेयर का अंतिम दिन है, इसलिए वहां चलना चाहिए, लेकिन सोनाक्षी मूवी देखने के मूड में थी.

‘‘मूवी? नहींनहीं, बेकार में 3 घंटे पकने से अच्छा है बुकफेयर चलना चाहिए,’’ सोनाक्षी की बात को काटते हुए विशाल बोला. कब से विशाल बुकफेयर जाने की सोच रहा था पर औफिस के कारण जा नहीं पा रहा था. आज छुट्टी है, तो सोचा वहां चला जाए.

सोनाक्षी का तो बिलकुल वहां जाने का मन नहीं था पर लीना बुकफेयर का नाम सुन कर ही चहक उठी. उसे किताबें पढ़ना बहुत अच्छा लगता है. कोई कहे कि पूरे दिन बैठ कर किताबें पढ़ती रहो, तो उकताएगी नहीं वह, इतना उसे किताब पढ़ना अच्छा लगता है. तभी तो वह जब भी मार्केट जाती है, बुकस्टौल से अपने लिए दोचार अच्छीअच्छी किताबें खरीद लाती है.

नश्तर- भाग 2: पति के प्यार के लिए वो जिंदगी भर क्यों तरसी थी?

तब स्कूल में बराबर की अध्यापिकाओं में उन का मन रम गया था. कभी स्कूल से ही पास के बाजार में चाट खाने का कार्यक्रम बन जाता तो कभी फिल्म देखने का. उधर विजयजी ने भी चैन की सांस ली थी कि वे उन पर अपनी खीझ नहीं उतारतीं, अपनी सहेलियों में मस्त हैं.

एक दिन एक अध्यापिका के पिता की मृत्यु के कारण स्कूल 11 बजे ही बंद हो गया. सो, वे जल्दी घर आ गईं. 5 मिनट तक वे दरवाजा खटखटाती रहीं, तब कहीं आया ने खोला. वह कुछ हकलाते हुए बोली, ‘बच्चों को स्कूल छोड़ आईर् थी. स…स…साहब जल्दी घर आ गए हैं…’

‘क्यों?’

‘उन को दर्द हो रहा है?’

‘कहां?’

‘कमर में…न…नहीं सिर में…’

उस की हकलाहट पर उन्हें आश्चर्य हुआ. उन्होंने उसे घूर कर देखा था. यह देख उन्हें कुछ ज्यादा ही आश्चर्य हुआ कि यह तो बड़े सलीके से साड़ी बांधा करती है, पर इस समय वह बेतरतीब सी क्यों  नजर आ रही है? माला का पेंडेंट सदा बीच में रहता है, वह कंधे पर क्यों पड़ा हुआ है? बाल भी बेतरतीब हो रहे हैं. उन्हें कुछ अजीब सा लगा, लेकिन वे सीधे अंदर घुसती चली गईं. कमरे में देखा, पति कुरसी पर बैठे उलटा अखबार पढ़ रहे हैं. उन्हें हंसी आ गई, ‘क्या सिर में इतना दर्द हो रहा है कि उलटे अक्षर समझ में आ रहे हैं?’

‘किस के सिर में दर्द हो रहा है?’

‘आप के और किस के?’

‘मेरे तो नहीं हो रहा,’ खिसिया कर उन्होंने उलटा अखबार सीधा कर लिया.

‘कपिला तो ऐसा ही कह रही थी.’

‘पहले सिर में दर्द हो रहा था, लेकिन कपिला ने चाय बना दी. चाय के साथ दवा लेने से आराम है?’

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उन्होंने कपड़े बदलने के लिए जैसे ही सोने के कमरे में कदम रखा, बिस्तर की सिलवटें देख कर तो जैसे उन का रक्त ही जम गया. एक झटके में कपिला की बेतरतीब बंधी साड़ी, उस का हकलाना, विजयजी का उलटा अखबार पढ़ना और बिस्तर की सिलवटें जैसे उन्हें सबकुछ समझा गई थीं. वे उसी कमरे में कपड़े बदलते हुए जारजार रो उठी थीं. उन्हें अपनेआप पर ही आश्चर्य हो रहा था कि वे कपिता के बाल पकड़ कर उसे घसीट कर घर से बाहर क्यों नहीं कर देतीं या विजयजी से लड़ कर घर में हंगामा क्यों नहीं खड़ा कर देतीं? लेकिन वे खामोश ही रहीं.

बाद में उन्होंने अचानक स्कूल से कई बार आ कर देखा, लेकिन कभी कुछ सुराग हाथ नहीं लगा.

हां, जब भी पति घर में होते, उन की आंखें हमेशा जिस ढंग से कपिला का पीछा करती रहतीं, इस से उस के प्रति उन का आकर्षण छिपा न रहता. उन दिनों वे समझ गईर् थीं कि जो पुरुष अपने मन की गांठ के कारण अपनी सुसंस्कृत पत्नी को भरपूर प्यार नहीं कर पाते, वे अपने तनमन की प्यास बुझाने के लिए अकसर भटक जाते हैं.

उस दिन को याद कर के जैसे आज भी नुकीला नश्तर उन के दिल में चुभता रहता है. जब वे कभी कपिला को टोकतीं तो वह उत्तर देती, ‘जल्दी क्या है बाईजी, अभी सारा काम हो जाएगा.’

एक बार कपिला ने एक दिन की छुट्टी मांगी, लेकिन 3 दिनों बाद काम पर लौट कर आई. वे तो मौका ही ढूंढ़ रही थीं. जानबूझ कर आगबबूला हो गईं, ‘तुझे पता नहीं है, मैं बाहर काम करती हूं?’

‘मैं ने गीता मेम की बाई को बोला तो था कि मेरे पीछे आप का काम कर ले.’

‘सिर्फ एक दिन आई थी. आज तू अपना हिसाब कर और चलती बन.’

‘पहले साहब से तो पूछ कर देख लो, मुझे निकालना पसंद करेंगे कि नहीं?’ कह कर वह कुटिलता से मुसकराई.

‘साहब कौन होते हैं घर के मामले में दखल देने वाले?’ कहते हुए उन का चेहरा तमतमा गया.

‘लो बोलो, वे तो घर के मालिक हैं…किस औरत को अपने घर में रखना है और किसे नहीं, वे ही तो सोचेंगे. मैं जब आईर् थी तो कैसे उदास रहते थे. अब कैसे खुश रहते हैं. उन की खुशी के वास्ते ही अपने घर में रख लो.’

‘तू बहुत बदतमीज औरत है.’

‘देखो, गाली मत निकालना. गाली देना हम को भी आता है,’ कपिला चिल्लाई.

उन्होंने बिना बोल मेज पर रखे पर्स में से रुपए निकाल कर उस का हिसाब चुकता कर दिया. वह बकती हुई चली गई. लेकिन क्या आज भी उन के जीवन से वह जा पाई है? उन के नारीत्व की खिल्ली उड़ाती उस की कुटिल मुसकान क्या अभी भी उन का पीछा छोड़ पाई है?

अब बुढ़ापे में यह अर्चना आ मरी है. वह अकसर अपने बचपन के किस्से सुनाती है, ‘भाभी, जब हम अपनी मौसी के यहां, यानी कि भैया की चाची के यहां गरमी की छुट्टियों में जाते थे तो जानती हो, तब ये बिलकुल जोकर लगते थे. ये किताब ले कर छत पर पढ़ने चले जाते थे. मैं पीछे से इन्हें धक्का दे कर ‘हो’ कर के डरा देती थी.’

तब हमेशा चुप रहने वाले विजयजी भी चहकते, ‘और जानती हो, इस ने मुझे भी शैतान बना दिया था. एक बार यह कुरसी पर बैठी तकिए का गिलाफ काढ़ रही थी. मैं ने इस की चोटी का रिबन कुरसी से बांध दिया था. जब यह कुरसी से उठी तो धड़ाम से ऐसे गिरी…’ विजयजी ने कुरसी पर से उठ कर गिरने का ऐसा अभिनय किया कि सीधे अर्चना की गोद में जा गिरे और दोनों देर तक खिलखिलाते, हंसते रहे.

वे क्रोध से कसमसा उठीं कि 64 वर्ष की उम्र में इस बुढ़ऊ को क्या हो गया है. फसाद की जड़ यह अर्चना ही है. इस के पति अकसर दौरे पर रहते हैं. बच्चे होस्टल में रह रहे हैं, इसलिए जबतब उन के घर आ टपकती है. बड़े अधिकार से आते ही घोषणा कर देती है, ‘आज तो हम यहीं खाना खाएंगे.’

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विजयजी अवकाशप्राप्त हैं. इस उम्र में यदि कोई चुहल करने वाला मिल जाए तो फिर तो चांदी ही चांदी है. पत्नी से वे कभी ठीक से जुड़ नहीं पाए. अर्चना से मिल रहे इस खुलेदिल के प्यारदुलार से जैसे उन के चेहरे पर रंगत आ गई है.

वे मन ही मन कुढ़ती रहती हैं. वैसे पति ऐसा कुछ नहीं करते कि उन से लड़झगड़ सकें. दोनों के रिश्तों के ऊपर भाईबहन का बोर्ड लगा है. वे कहें भी तो क्या? वैसे उन के दिल के दौरे का कारण भी तो अर्चना ही थीं.

उस दिन दोपहर में खाना बन चुका था. खाना लगाने के लिए अर्चना की सहायता लेने वे कमरे में जा रही थीं. अचानक दरवाजे के परदे के पीछे ही वे अर्चना की आवाज सुन कर रुक गईं.

‘छोडि़ए भैया…’

‘तुम मुझे भैया क्यों कहती हो?’ विजयजी का अधीर स्वर सुनाई दिया था.

‘जब हम युवा थे तो मैं ने आप को भैया कहने से इनकार किया था. खुद आगे बढ़ कर आप का प्यार मांगा था, लेकिन तब आप ने मेरा प्यार ठुकरा दिया था.’

Crime Story: नई दुल्हन का खूनी खेल

लेखक- अशोक शर्मा

थाणे जिले का एक प्रमुख रेलवे जंक्शन है कल्याण. उत्तर और दक्षिण को जाने वाली सभी रेलगाडि़यां यहां हो कर आतीजाती

हैं. कल्याण का एक उपनगर है विट्ठलवाड़ी, जिस के परिसर में दुर्गा का मंदिर है. मंदिर के ठीक सामने यशवंत अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 9 में जगदीश सालुंखे अपने बड़े भाई कांचन सांलुखे के परिवार के साथ रहता था.

जगदीश अंबरनाथ की एक फार्मास्युटिकल कंपनी में नौकरी करता था. उस की शादी एक चंचल शोख हसीना और महत्त्वाकांक्षी युवती वृशाली ठाकरे से हुई थी. शादी के बाद जगदीश सालुंखे ने अपने भाई का घर छोड़ दिया और उसी सोसायटी में किराए का एक फ्लैट ले कर पत्नी के साथ रहने लगा.

जगदीश सालुंखे और वृशाली की शादी को अभी 3 महीने भी नहीं हुए थे कि जगदीश की मौत हो गई. 6 मार्च, 2019 को रात के लगभग 11 बजे वृशाली ने वहीं पास में रहने वाले जगदीश सालुंखे के मामा नंदलाल सौदाणे को फोन किया. वह घबराई हुई लग रही थी.

फोन नई बहू वृशाली ने किया था, फोन सुन कर नंदलाल के होश उड़ गए. वृशाली उन से मदद मांगते हुए कह रही थी कि मामाजी यहां घर में बहुत बड़ी चोरी हुई है. चोरों ने जगदीश को मार दिया है. प्लीज मामाजी, आप जल्दी घर पर आ जाएं.

यह सारी बातें वृशाली ने रोते हुए एक ही सांस में नंदलाल को बता दी थीं. नंदलाल ने वृशाली को धीरज बंधाते हुए कहा कि वह तुरंत उस के घर पहुंच रहे हैं. जगदीश के घर के पास ही उस का बड़ा भांजा यानी जगदीश का बड़ा भाई कांचन सालुंखे रहता था. नंदलाल ने यह जानकारी कांचन को भी दे दी. वह भी अपने मामा के साथ तत्काल घटनास्थल पहुंच गया.

थोड़ी सी देर में यह खबर जंगल की आग की तरह पूरे इलाके में फैल गई. आसपड़ोस के लोगों के साथसाथ जगदीश सालुंखे के जानपहचान वालों और नातेरिश्तेदारों की भीड़ एकत्र हो गई.

उन की नजर घर के अंदर गई तो उन्होंने देखा कि जगदीश सालुंखे बैड पर पड़ा था. घर का सारा सामान इधरउधर बिखरा हुआ था. जगदीश सालुंखे की पत्नी वृशाली पति के शरीर से लिपट कर रो रही थी.

जगदीश सालुंखे के घर पहुंच कर उस के भाई कांचन सालुंखे और मामा नंदलाल सौदाणे ने पड़ोसियों की मदद से वृशाली को जगदीश से अलग किया और एक आटो की मदद से पास ही गुलाबराव पाटिल के दवाखाने ले कर गए, जहां से उन्हें किसी दूसरे अस्पताल में ले जाने के लिए कहा गया.

इस पर वे जगदीश सालुंखे को डा. भुजबल के अस्पताल ले कर गए. लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी. वहां डाक्टरों ने जगदीश सालुंखे की स्थिति देख कर उसे रुक्मिणी बाई अस्पताल रैफर कर दिया. वहां के डाक्टरों ने जगदीश को देखते ही मृत घोषित कर दिया. इस के साथ ही साथ अस्पताल की ओर से इस मामले की जानकारी स्थानीय पुलिस थाने के साथसाथ पुलिस कंट्रोल रूम को भी दे दी गई.

जिला अस्पताल से सूचना मिलते ही थाना कोलसेवाड़ी में रात्रि ड्यूटी पर मौजूद एसआई एस.एस. तड़वी 2 कांस्टेबलों के साथ जिला अस्पताल पहुंच गए. इस की जानकारी उन्होंने सीनियर पीआई शाहूराजे सालवे को दे दी थी.

अस्पताल पहुंच कर वह अभी मृतक के परिवार से पूछताछ कर ही रहे थे कि उसी समय थाणे के डीसीपी संजय शिंदे, एसीपी पवार, सीनियर पीआई शाहूराजे सालवे, पीआई मधुकर भोंगे, एपीआई सुनीता राजपूत, एसआई नलावड़े, हेडकांस्टेबल हनुमंत शिर्के, अभिनाश काले, प्रकाश मुंडे के साथ अस्पताल पहुंच गए.

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मामला चोरी का नहीं था

डाक्टरों से बात करने के बाद पुलिस अधिकारियों ने सरसरी निगाह से मृतक जगदीश सालुंखे के शव का निरीक्षण किया. वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के चले जाने के बाद सीनियर पीआई शाहूराजे सावले ने अस्पताल की सारी औपचारिकताएं पूरी कर जगदीश सालुंखे का शव पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया.

इस के बाद वह सीधे घटनास्थल पर गए. घटनास्थल का बारीकी से निरीक्षण करने के बाद वह थाने लौट गए.

थाने लौट कर जब उन्होंने अपने सहायकों  के साथ इस मामले पर गंभीरता से विचार किया तो उन्हें चोरी और जगदीश सालुंखे की हत्या की कडि़यों में कई पेंच नजर आए. मामला वैसा नहीं था जैसा कि बताया जा रहा था. मामले की तह में जाने के लिए जगदीश सालुंखे की पत्नी वृशाली का बयान जरूरी था.

लेकिन उस समय वृशाली बयान देने की स्थिति में नहीं थी. इसलिए सीनियर पीआई शाहूराजे ने पूछताछ करने के लिए वृशाली को दूसरे दिन थाने बुलाया और मामले की तफ्तीश पीआई मधुकर भोंगे और एपीआई सुनीता राजपूत को सौंप दी.

वृशाली ने अपने बयान में बताया कि घर में सागसब्जी नहीं थी. उस ने पति जगदीश सालुंखे को फोन पर इस बात की जानकारी दी. लेकिन वह काम से लौटते समय खाली हाथ आ गए. इस पर वह सीधे बाजार चली गई. बाजार से लौट कर जब वह घर आई तो घर की स्थित देख कर उस के होश उड़ गए. भाग कर जब वह पति जगदीश के पास पहुंची तो वह बेहोश पड़े थे.

यह देख कर वह बुरी तरह डर गई. उस की शादी के सारे जेवर चोर ले गए थे. उस की समझ में कुछ नहीं आया तो उस ने पति के मामा नंदलाल सौदाणे को फोन पर सारी जानकारी दे दी.

हालांकि पुलिस ने वृशाली सालुंखे के बयान पर भादंवि की धारा 174 के तहत अज्ञात के खिलाफ मामला दर्ज कर तफ्तीश शुरू कर दी. लेकिन जब पोस्टमार्टम रिपोर्ट आई तो पुलिस का शक वृशाली पर गया. वह सीधेसीधे पुलिस के राडार पर आ गई. जगदीश सालुंखे के परिवार वालों ने उस की मौत को गहरी साजिश बताया था.

परिवार वालों के बयान के अनुसार वृशाली जगदीश के साथ हुई अपनी शादी से खुश नहीं थी. शादी के पहले वह 2 बार जगदीश सालुंखे से शादी करने के लिए मना कर चुकी थी. यह शादी उसे उस के घर वालों के भारी दबाव के कारण करनी पड़ी थी.

पुलिस टीम ने जब इन सब बातों की सच्चाई जानने के लिए वृशाली से पूछताछ की तो पहले तो उस ने पुलिस को घुमाने की कोशिश की. लेकिन पुलिस के सवालों के चक्रव्यूह में वह कुछ इस तरह फंसी कि उस ने अपना अपराध स्वीकार कर लिया.

23 वर्षीय जगदीश सालुंखे सुंदर स्वस्थ युवक था. वह मूलरूप से जनपद जलगांव के तालुका रावेर का रहने वाला था. उस के पिता गोकुल सालुंखे सीधेसादे व्यक्ति थे. गांव में उन की थोड़ीबहुत काश्तकारी थी. इस के अलावा रावेर में उन की हेयरकटिंग की दुकान भी थी. परिवार में उन की पत्नी के अलावा सिर्फ 2 बेटे थे. बडे बेटे कांचन सालुंखे की शादी हो चुकी थी. वह अपनी पत्नी के साथ कल्याण के उपनगर कोलसेवाड़ी में रहता था.

जबकि छोटा बेटा जगदीश सालुंखे पढ़ाई कर रहा था. गोकुल सालुंखे अपनी काश्तकारी और दुकान से परिवार की गाड़ी पूरी जिम्मेदारी से चला रहे थे. जगदीश को ले कर मातापिता का सपना था कि उन का छोटा बेटा उन के साथ रह कर घर की पूरी जिम्मेदारियां संभाले. लेकिन ऐसा हुआ नहीं.

पढ़ाई पूरी करने के बाद जगदीश का मन गांव में नहीं लगा तो उस ने शहर की राह पकड़ ली. शहर आ कर वह अपने बड़े भाई कांचन सालुंखे और भाभी के साथ रहने लगा. जल्दी ही उसे अंबरनाथ स्थित एक फार्मास्युटिकल कंपनी में नौकरी मिल गई. जगदीश सालुंखे जब नौकरी करने लगा तो परिवार वाले उस की शादी की सोचने लगे.

गोकुल सालुंखे ने जब बेटे की शादी की बात अपने नातेरिश्तेदारों और जानपहचान वालों के बीच चलाई तो जगदीश के लिए मलाड के रहने वाले ठाकरे परिवार की वृशाली ठाकरे का रिश्ता आया.

22 वर्षीय वृशाली ठाकरे अपने परिवार की इकलौती बेटी थी. उस के पिता की मृत्यु हो चुकी थी. घर में एक भाई सतीश ठाकरे और मां थी. घर की पूरी जिम्मेदारी सतीश ठाकरे के कंधों पर थी. इसलिए उस ने अभी तक शादी नहीं की थी. वृशाली जितनी सुंदर थी उतनी ही वह चंचल और हंसमुख भी थी. जगदीश सालुंखे को वह पहली नजर में भा गई.

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वृशाली ने घर वालों को यह रिश्ता बहुत पसंद आया. ऊपर से उन का पुराना पारिवारिक रिश्ता भी निकल आया. इसलिए ठाकरे परिवार वृशाली की शादी जल्द से जल्द कर देना चाहता था. जगदीश सालुंखे और वृशाली के देखादेखी के बाद दोनों परिवार और उन के नातेरिश्तेदारों ने मिल कर वृशाली और जगदीश सालुंखे की सगाई कर दी और साथ ही शादी की तारीख भी तय हो गई.

आज के जमाने में लोग सगाई को आधी शादी मानते हैं. और अपने बच्चों को खुली छूट दे देते हैं. लड़का और लड़की दोनों बातचीत के साथसाथ मिलनेजुलने और घूमनेफिरने लगते हैं. ऐसा ही कुछ वृशाली और जगदीश सालुंखे के साथ भी हुआ था.

वृशाली और जगदीश सालुंखे भी एकदूसरे से मिलनेजुलने और बातचीत करने लगे थे. उन का यह सिलसिला लगभग 6 महीने तक चलता रहा. जगदीश सालुंखे वृशाली से शादी तय होने से खुश था. दूसरी तरफ आधुनिक विचारों वाली वृशाली 6 महीने में ही जगदीश सालुंखे से बोर हो गई थी.

सीधेसादे नहीं, हीरो या मौडल

जैसे पति की दरकार

वृशाली को एक सीधासादा नहीं हीरो, मौडल जैसा स्मार्ट पति चाहिए था, जो उस के इशारों पर चले और उस की सारी इच्छाएं पूरी करे. शादी के 20 दिन पहले वृशाली ने जगदीश सालुंखे को फोन कर मुंबई के दादर रेलवे स्टेशन पर बुलाया और बुझे मन से कहा कि वह उस के साथ शादी जैसे पवित्र बंधन में नहीं बंधना चाहती. क्योंकि दोनों के आचारविचार एकदूसरे से नहीं मिलते. अगर दोनों की शादी हो गई तो वह खुश नहीं रह पाएगी. इस से अच्छा है कि वह शादी से इनकार कर दे.

वृशाली ठाकरे की इस बात से जगदीश सालुंखे के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. वजह यह कि उस के घर वालों ने शादी की पूरी तैयारी कर ली थी. सारे नातेरिश्तेदारों को शादी के कार्ड भी भेज दिए गए थे. जगदीश ने जब यह बात वृशाली को समझाने की कोशिश की. लेकिन उस ने स्पष्ट शब्दों में कह दिया कि अगर उस की शादी जबरन की गई तो वह जहर खा कर आत्महत्या कर लेगी. तब उस का क्या अंजाम होगा, वह सोच ले. वृशाली की इस धमकी से जगदीश सालुंखे बुरी तरह डर गया. उस ने वृशाली की सारी बातें अपने परिवार वालों को बता दीं.

इस बात की खबर जब वृशाली के घर वालों को लगी तो वे भी सकते में आ गए. उन्होंने वृशाली को आड़े हाथों लिया. अपने परिवार के दबाव में वृशाली ने अपनी गलती मानी और जगदीश से शादी करने के लिए तैयार हो गई. लेकिन जगदीश सालुंखे के परिवार वालों को वृशाली की बातों पर यकीन नहीं था.

वह वृशाली के परिवार वालों की विनती पर शादी के लिए तैयार हो गए. लेकिन उन्होंने साफ कह दिया कि अगर भविष्य में वृशाली ने कोई गलत कदम उठाया तो जिम्मेदारी उन की नहीं होगी, इस के लिए उन्होंने अलग से गारंटी और माफी पत्र लिखवा कर अपने पास रख लिया. इस के बाद वह शादी की तैयारी में जुट गए.

घर परिवार वालों के दबाव में आ कर आखिर वृशाली जगदीश सालुंखे से शादी के लिए तैयार हो गई. लेकिन उस के मन में जगदीश सालुंखे को ले कर असमंजस की स्थिति थी. जगदीश सालुंखे को वह पति के रूप में स्वीकार नहीं कर पा रही थी. यही कारण था कि वह अपनी शादी के लिए टालमटोल कर रही थी.

शादी के सप्ताह भर पहले वृशाली ने जगदीश सालुंखे को एक होटल में बुलाया और वही पुरानी बातें दोहराते हुए कहा कि वह इतनी जल्दी शादी नहीं करना चाहती. उसे ब्यूटीशियन का कोर्स करना है. कोर्स कर के पहले अपना कैरियर बनाएगी. फिर शादीविवाह के बारे में सोचेगी. तब तक के लिए वह शादी की तारीखों को आगे बढ़वा दे. जब कैरियर बन जाएगा तो शादीविवाह तो कभी भी कर सकते हैं.

इस बार जगदीश सालुंखे ने वृशाली को समझाने की कोशिश नहीं की. बल्कि उस ने सख्त लहजे में कहा, ‘‘यह बात तुम अपने परिवार वालों से क्यों नहीं कहती हो. मुझ से यह सब नहीं होगा.’’ इतना कह कर जगदीश सालुंखे गुस्से में वहां से उठ कर चला गया.

जगदीश सालुंखे के इस रवैये से वृशाली जलभुन गई थी. इस समस्या से निपटने के लिए अब उसे ही कुछ करना था. वह सोचने लगी कि ऐसा क्या करे कि सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे.

घर जाने के बाद वह सारी रात अपनी समस्या को ले कर सोचती रही, करवटें बदलती रही. और सुबह तक उस ने समस्या का जो हल निकला, वह काफी खतरनाक था. दूसरी ओर दोनों परिवार वृशाली और जगदीश सालुंखे की शादी को ले कर उत्साहित थे.

वृशाली का पहला अटैक

वृशाली की शादी हो रही थी. इस बात को ले कर उस की सहेलियों और दोस्तों में खुशी की लहर थी. वह सब वृशाली से शादी की बैचलर पार्टी की मांग कर रहे थे. जिसे वृशाली आजकल कह कर टाल रही थी. वृशाली ने शादी के 2-4 दिन पहले अपने घर में छोटी सी पार्टी रखी और इस से खासतौर पर जगदीश को भी बुलाया था.

वृशाली के बुलाने पर जगदीश पार्टी में आया तो जरूर था पर उस ने पार्टी में एंजौय नहीं किया. घर लौटते समय वृशाली ने बड़े प्यार से जगदीश के लिए खाने का टिफिन तैयार किया और उसे घर पहुंच कर खाने के लिए कह दिया.

लेकिन जगदीश ने टीफिन का खाना नहीं खाया. घर जाने के बाद उस ने टिफिन खोला तो उस में से एक अजीब सी गंध आई, जिस की वजह से जगदीश ने खाना फेंक दिया. उस खाने में वृशाली ने बड़ी चालाकी से जहर डाला था.

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अंतत: 29 दिसंबर, 2018 को बड़ी धूमधाम से वृशाली ठाकरे और जगदीश सालुंखे की शादी हो गई. शादी के बाद वे दोनों घूमने के लिए हिल स्टेशन चले गए. इस शादी से जगदीश सालुंखे तो बहुत खुश था और वृशाली के सारे गिलेशिकवे भूल गया था. लेकिन वृशाली शादी से खुश नहीं थी.

शादी के नाम पर उस ने सिर्फ एक समझौता किया था. जैसेजैसे समय बीत रहा था वैसेवैसे वृशाली के व्यवहार में परिवर्तन आता जा रहा था. वह बातबात पर जगदीश और उस के परिवार वालों से लड़ाई करने लगी थी. इस से तंग आ कर जगदीश सालुंखे के परिवार वालों ने उसे कहीं अलग रहने की सलाह दी. अंतत: जगदीश उसी परिसर में किराए का एक फ्लैट ले कर वृशाली के साथ रहने लगा.

वृशाली को घरगृहस्थी नहीं चाहिए थी

वृशाली यही चाहती भी थी कि कोई उसे रोकनेटोकने वाला न हो. नए घर में आने के बाद वह पूरी तरह से आजाद हो गई. वह सारासारा दिन मोबाइल फोन से चिपकी रहती थी. जगदीश जब इस पर ऐतराज करता, तो वह उस से उलझ जाती थी. बात आगे न बढ़े इस के लिए जगदीश सालुंखे खुद ही चुप हो जाता था.

लोग शादी के बाद अपने दांपत्य जीवन की गाड़ी हंसीखुशी के साथ चलाते हैं. लेकिन जिस दांपत्य जीवन की नींव रेत पर खड़ी हो वह भला कितने दिनों तक चल सकता है. और यही जगदीश सालुंखे के साथ भी हुआ. उस की शादी को अभी 3 महीने भी पूरे नहीं हुए थे कि अपनी आजादी के लिए वृशाली सालुंखे ने जो रास्ता चुना, वह सीधा जेल में जा कर खुलता था.

घटना के दिन वृशाली काफी खुश थी. उस ने काम से लौट कर आए जगदीश सालुंखे से प्यार भरी बातें कीं और अपनी योजना के अनुसार उस के खाने में चूहे मारने की दवा मिला दी.

खाना खाने के बाद जगदीश जब सोने के लिए अपने बैड पर गया तो उस का मन व्याकुल होने लगा. इस के पहले कि वह उठ कर बाथरूम में जाता, वृशाली ने उस के गले में नायलोन की रस्सी डाल कर पूरी ताकत से उस का गला घोंट दिया. वृशाली को जब इस बात का पूरा यकीन हो गया कि पति मर गया है. तब उस ने ड्रामा करते हुए जगदीश के मामा नंदलाल सौदाणे को फोन कर दिया.

वृशाली ने परिवार वालों और पुलिस को गुमराह करने की काफी कोशिश की. लेकिन वह सफल नहीं हो पाई. शादी से आजादी पाने के चक्कर में वह एक ऐसी खाई में जा गिरी, जहां से उस का निकलना संभव नहीं था.

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पीआई मधुकर भोंगे और उन की टीम ने वृशाली सालुंखे से विस्तृत पूछताछ करने के बाद उसे भादंवि की धारा 302 के तहत गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया गया. कथा लिखे जाने तक वृशाली सालुंखे जेल में थी. पीआई मधुकर भोंगे और उन की टीम इस बात का पता लगाने की कोशिश कर रही है कि मामला सिर्फ पति के न पसंद होने का था या फिर हकीकत कुछ और थी.द्य

— कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

मन का मीत- भाग 3: कैसे हर्ष के मोहपाश में बंधती गई तान्या

मुझे हर्ष से यह उम्मीद नहीं थी, पर उस के मुंह से सुन कर मुझे बहुत अच्छा लगा और मन को अजीब सी शांति मिली. मुझे लगा समीर के लिए तो मैं टेकन फौर ग्रांटेड थी. उस ने मुझे कभी मिस किया हो उस की बातों से कभी मुझे प्रतीत नहीं हुआ. खैर, 2 महीने बाद मैं ने औफिस जाना शुरू किया. मेरी सास घर में रहती थीं और डे टाइम के लिए एक आया भी थी. इसलिए मैं आदि को उन के पास छोड़ कर औफिस जाने लगी. पर हर्ष से सीधे कोई बात नहीं होती थी, बस फोन पर मैसेज आदानप्रदान हो रहे थे और एकदूसरे को देखना होता था. लंच में मैं थोड़ी देर के लिए घर आ जाती थी बेटे आदि के पास. मेरा मन हर्ष से बात करने को तैयार था पर मेरे लिए बेटे को भी देखना जरूरी था.

एक बार औफिशियल मीटिंग में हम दोनों बगल में बैठे थे. उस ने धीरे से मेरे कान में कहा, ‘‘मुझ से बात करने से कतराती हो क्या?’’

मैं ने सिर्फ न में सिर हिला दिया. फिर बोला, ‘‘कभी शाम को साथ कौफी पीते हैं.’’

‘‘बाद में बात करते हैं,’’ मैं ने कहा.

मैं उस से मिल सकती हूं, मुझे भी अच्छा लगेगा, पर वह मुझ से क्या चाहता है या मुझ में क्या ढूंढ़ रहा है मैं समझ नहीं पा रही हूं.

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एक बार कंपनी को बड़ा और्डर मिलने की खुशी में पार्टी थी, सिर्फ औफिस के लोगों के लिए. इत्तफाक से उस दिन भी मैं और हर्ष एक ही टेबल पर बैठे थे.

उस ने कहा, ‘‘शुक्र है आज तुम्हारे साथ बैठ कर बातें करने का मौका मिल गया. बहुत अच्छा लग रहा है तुम्हारा सामीप्य.’’

‘‘अच्छा तो मुझे भी लगता है तुम से मिलना, पर क्यों मैं नहीं जानती… बस इट

हैपंस सो. पर तुम्हें इस से क्या मिलता है?’’ मैं ने पूछा. ‘‘बस वही जो तुम्हें मिलता है यानी खुशी,’’ कह कर उस ने मेरे हाथ पर अपना हाथ रख दिया.

उस का स्पर्श अच्छा लगा. उस दिन हम दोनों के लिए और सरप्राइज था. चिट ड्रा द्वारा मुझे हर्ष के साथ फ्लोर पर डांस करना था. हम दोनों ने कुछ देर एकसाथ डांस किया. मेरे दिल की धड़कनें तेज हो गई थीं. मुझे ‘माई हार्ट इज बीटिंग…’ गाना याद आ गया.

डांस के बाद टेबल पर बैठते हुए उस ने बताया कि उस का एच 1 बी वीजा मंजूर हो गया है. मैं ने उसे हाथ मिला कर बधाई दी.

वह बोला, ‘‘मुझे इंडिया जाना होगा, पासपोर्ट पर वीजा स्टैंप के लिए, पर आजकल डर लगता है स्टैंपिंग में भी.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘पहले तो यह एक औपचारिकता थी पर आजकल नए प्रशासन में सुना है

कि कौंसुलेट इंटरव्यू होता है. ये लोग अनावश्यक पूछताछ और अमेरिका से क्लीयरैंस आदि लेने में काफी वक्त लगा देते हैं.’’

‘‘कब जा रहे हो?’’

‘‘नैक्स्ट वीक जाऊंगा. तुम्हें बहुत मिस करूंगा. क्या तुम भी मुझे मिस करोगी?’’

‘‘हां भी नहीं भी,’’ कह कर मैं टाल गई और आगे बोली, ‘‘पर क्या तुम मेरे पापा से बात कर सकते हो… मैं उन का फोन नंबर दे देती हूं.’’

‘‘अगर थोड़ा संकोच करोगी तब मैं यही समझूंगा कि तुम्हारी नजर में मैं अजनबी हूं. फोन क्या बोकारो से रांची तो बस 120 किलोमीटर है. मैं खुद भी जा सकता हूं.’’

हर्ष इंडिया चला गया. मैं हमेशा उस के खाली कैबिन की ओर बारबार देखती और उस के लौटने की प्रतीक्षा करती.

हर्ष से इंडिया में फोन पर या कभी वीडियो चैटिंग होती थी. वह परेशान था. उस के वीजा स्टैंपिंग पर कौंसुलेट काफी समय लगा रहा था. हर्ष लगभग 2 महीने बाद अमेरिका आया. तब तक मैं ने दूसरी कंपनी में जौइन कर ली थी.

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उस ने फोन पर कहा, ‘‘मुझे तुम से मिलना होगा. तुम्हारे पापा बोकारो आए थे. तुम्हारे मम्मीपापा ने तुम लोगों के लिए कुछ सामान भेजा है.’’

हम दोनों शाम को एक कौफी कैफे में मिले. वह बोला, ‘‘तुम ने जौब मुझ से पीछा छुड़ाने के लिए चेंज की है न?’’

मैं ने उसे समझाते हुए कहा, ‘‘तुम मेरे बारे में ऐसा सोचोगे तो मुझे दुख होगा. यह कंपनी मेरे घर के बहुत पास है. इस से मैं बेटे आदि के लिए कुछ समय दे पा रही हूं.’’

सच तो यही था कि मैं भी उसे मिस कर रही थी पर मुझे तो मां का फर्ज भी निभाना था.

एक शाम मैं हर्ष से मिली तो वह बहुत उदास था. मेरे पूछने पर नम आंखों से बोला, ‘‘मेरा औफिस में मन नहीं लग रहा है. आंखें तुम्हारे कैबिन की ओर बारबार देखती हैं. तुम

जब थीं तुम्हें देखने मात्र से एक अजीब सा सुकून मिलता था. अब मन करता है वापस इंडिया चला जाऊं.’’

‘‘ऐसी बेवकूफी मत करना. इतनी कठिनाई के बाद तो वीजा मिला है. कम से कम 6 साल तो पूरे कर लो. शायद इस बीच कंपनी तुम्हारा ग्रीन कार्ड स्पौंसर कर दे.’’

‘‘इस की उम्मीद बहुत कम है, खासकर भारतीय कंपनियां तो हमारी मजबूरी का फायदा उठाती हैं.’’

2-3 सप्ताह में 1 बार उस से समय निकाल कर मिल लेती थी. कुछ दिन बाद मेरी कंपनी में भी ओपनिंग थी. मैं ने पूछा, ‘‘तुम यहां आना चाहोगे? अगर वास्तव में रुचि हो तो बताना.

मैं रैफर कर दूंगी. तुम तो जानते हो बिना रैफर के यहां जौब नहीं मिलती और फिर रैफर करने वाले यानी मुझे भी 2-3 हजार डौलर इनाम मिल जाएगा.’’

1 महीने के नोटिस के बाद अब हर्ष मेरी कंपनी में आ गया. हमारे कैबिन आमनेसामने तो नहीं थे, फिर भी हम दोनों एकदूसरे को आसानी से देख सकते थे.

एक दिन जब शाम को दोनों मिले तो उस ने कहा, ‘‘तुम से मिल कर क्यों इतना अच्छा लगता है? मेरा बस चले तो तुम्हें देखता ही रहूं.’’

‘‘एक बात पूछूं? सचसच बताना. अब तो तुम सैटल हो. अपने लिए कोई अच्छी लड़की खोज कर शादी क्यों नहीं कर लेते हो?’’

‘‘अपनी ट्रू कौपी खोज कर लाओ. मैं शादी कर लूंगा.’’

‘‘मुझ में ऐसी क्या बात है?’’

‘‘सच बोलूं मैं ने क्या देखा है तुम में…

तो सुनो, बड़े कमल की पंखुडि़यों के नीचे कालीकाली नशीली आंखें, बारीकी से तराशी गई पतली और लंबी भौंहें, नाक में चमकती हीरे की कनी और गुलाबीरसीले होंठ और जब मुसकराती तो गोरेगोरे गालों में पड़ते डिंपल्स और…’’

‘‘बस करो. तुम जानते हो मैं एक पत्नी ही नहीं एक मां भी हूं. ज्यादा फ्लर्ट करने से भी तुम्हें कुछ मिलने से रहा.’’

‘‘मैं ने कब कहा है कि तुम पत्नी और मां नहीं हो. मैं तो बस तुम्हें देख कर अपना मन खुश कर लेता हूं.’’

उस की बातें मेरे दिल को स्पंदित कर रही थीं. मैं शरमा कर बोली, ‘‘मुझ से बेहतर यहीं सैकड़ों मिल जाएंगी.’’

‘‘मैं ने कहा न कि तुम्हारी ट्रू कौपी चाहिए. तुम से अच्छी भी नहीं चाहिए.’’

‘‘सच कहूं तो जब तक तुम शादी नहीं कर लेते मेरा मन तुम्हारे लिए भटकता रहेगा और तुम भी मृगतृष्णा में भटकते फिरोगे. मैं ऐसा नहीं चाहती.’’

‘‘ठीक है, मुझे कुछ समय दो सोचने का.’’

मैं ने सोचा हर्ष सोचे या न सोचे, मैं ने सोच लिया है. हर्ष से मिलना, बातें करना मुझे भी अच्छा लगता है पर अपनी खुशी के लिए मैं उसे अब और नहीं भटकने दूंगी.

2 सप्ताह के बाद मैं फिर हर्ष से मिली. उस का हाथ अपने हाथ में ले कर मैं ने कहा, ‘‘शादी के बारे में क्या सोचा है?’’

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‘‘मेरी शादी से तुम्हें क्या मिलेगा? मुझे तो बस तुम से मिल कर ही काफी खुशी होती है.’’

‘‘मिल कर मैं भी खुश होती हूं. तुम मेरे दिल में हमेशा रहोगे, भरोसा दिलाती हूं मेरा कहा मान लो और जल्दी शादी कर लो.’’

थोड़ी देर के लिए दोनों के बीच एक खामोशी पसर गई. वह उदास लग रहा था. उदास तो अंदर से मैं भी रहूंगी उस से दूर हो कर, पर जिस रिश्ते की कोई मंजिल न हो उसे कब तक ढोया जा सकता है.

मैं ने उसे समझाया, ‘‘यकीन करो, तुम मेरी यादों में रहोगे. मैं तुम से मिलती भी रहूंगी, पर इस तरह नहीं, अपनी बीवी के साथ मिलना. हां, पर कहीं ऐसा न होने देना कि उस समय भी तुम्हारी नजरें मुझ में कुछ ढूंढ़ने लगें. हम मिलेंगे, बातें करेंगे बस मैं इतने से ही संतुष्ट हो जाऊंगी और तुम से भी यही आशा करूंगी. हम अपने रिश्ते का गलत अर्थ निकालने का मौका किसी को नहीं देंगे.’’

‘‘एक शर्त पर? एक बार जी भर के गले मिल लूं तुम से,’’ उस ने कहा और फिर अपनी दोनों बांहें फैला दीं. मैं बिना संकोच उस की बांहों में सिमट गई.

उस ने कहा, ‘‘मैं इस पल को सदा याद रखूंगा. और अगर मैं तुम्हें अपनी गिरफ्त से आजाद न करूं तो?’’

‘‘और यदि मुझे आदि बुला रहा हो तो?’’

हर्ष ने तुरंत अपनी पकड़ ढीली कर दी. मैं उस से अलग हो गई. फिर मैं ने अपनी दोनों बांहें फैला दीं. हर्ष मेरी बांहों में था. मैं ने कहा, ‘‘मैं भी इस पल को नहीं भूल सकती.’’

मैं ने दिल से कामना की कि हर्ष की पत्नी उसे इतना प्यार दे कि उसे मेरे कैबिन की ओर देखने की जरूरत न पड़े. मैं ने भी अपने मन को समझा लिया था कि अब हर्ष को सिर्फ यादों में ही रखना है.

अचानक डोरबैल की आवाज सुन कर मैं चौंक उठी और खयालों की दुनिया से निकल कर वर्तमान में आ गई. दरवाजा खोला तो सामने नरेश खड़ा था. मैं ने उसे अंदर आने को कहा.

नरेश ने निम्मो से कहा, ‘‘जल्दी चलो, मैं वकील से टाइम ले कर आया हूं. हमारे तलाक के पेपर तैयार हैं. चल कर साइन कर दो.’’

मैं यह सुन कर अवाक रह गई. मैं ने डांटते हुए कहा, ‘‘नरेश, क्या छोटीछोटी बातों को तूल दे कर तलाक लिया जाता है?’’

‘‘तुम्हारी सहेली ने ही तलाक लेने को कहा था.’’

तभी निम्मो रोती हुई बोली, ‘‘मैं ने तो बस मजाक में कह दिया था.’’

‘‘तो मैं ने भी कहां सीरियसली कहा है… चलो घर चलते हैं,’’ नरेश बोला.

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निम्मो दौड़ कर नरेश से लिपट गई. दोनों अपने घर चले गए.

कुछ देर बाद समीर आया. उस ने कहा, ‘‘तुम्हारे बेटे का ऐडमिशन तुम जिस स्कूल में चाहती थी, हो गया है.’’

मैं ने मन में सोचा कि क्या बेटा सिर्फ मेरा ही है. हमारा बेटा भी तो कह सकता था समीर. वह स्कूल इस शहर का सर्वोत्तम स्कूल था. मारे खुशी के मैं दौड़ कर समीर से जा लिपटी. पर उस की प्रतिक्रिया में वही पुरानी उदासीनता थी. मैं ने व्यर्थ ही कुछ देर तक इंतजार किया कि शायद वह भी मुझे आगोश में लेगा.

फिर मैं भी सहज हो कर धीरे से उस से अलग हुई और वापस अपनी दुनिया में आ गई कि समीर से इस से ज्यादा अपेक्षा नहीं करनी चाहिए मुझे.मन का मीत- भाग 1: कैसे हर्ष के मोहपाश मेंबंधती गई तान्या

अब मैं समझ गई हूं- भाग 2: रिमू का परिवार इतना अंधविश्वासी क्यों था

जब मैं ने उन्हें अपने पड़ोसी की याद दिलाई तो वे बोलीं, ‘‘अच्छा, वह गुप्ता परिवार की बात कर रहे हो. तुम उन की बड़ी बेटी को… मैं ने देखा है क्या… उस के परिवार वाले तैयार हैं?’’

‘‘अपने परिवार वालों को रिमू स्वयं संभालेगी मां. आप तो अपनी बात कीजिए.’’

‘‘तुम्हें तो पता है कि तुम्हारे पापा और मेरे लिए केवल तुम्हारी पसंद ही माने रखती है. इस के अलावा और कुछ नहीं. हमें तुम पर पूरा भरोसा है कि तुम्हारा चयन गलत नहीं होगा?’’ मां की बातें सुन कर मैं प्यार से अभिभूत हो उन के गले लग गया था.

अगले दिन सुबहसुबह ही मेरे सपनों की रानी रिमू का फोन आ गया. उस ने जो कहा उस से मेरी खुशी दोगुनी हो गई,

‘‘अमन, मैं ने मां को अपने बारे में बताया था तो उन्होंने कुंडली मिलान की बात की है. और कहा है कि तुम अपनी जन्मपत्रिका का फोटो व्हाट्सऐप पर भेज दो. वे कल ही हमारे पंडितजी के पास जा कर मिलवा लाएंगी. बस, फिर हमारी शादी,’’ कहतेकहते रीमा फोन पर ही शरमा गई.

रिमू की बात सुन कर मैं भी कुछ आश्वस्त सा हो गया कि कुछ गुण तो मिल ही जाएंगे अर्थात अब हमारे विवाह में कोई व्यवधान नहीं था. मन ही मन मैं अपने और रिमू के सुनहरे भविष्य के सुनहरे सपने बुनने लगा.

2-3 दिन यों ही खयालों में निकल गए. एक दिन जब मैं शाम को औफिस से निकल रहा था तो रिमू का फोन आया. वह फोन पर जोरजोर से रो रही थी. मैं उस का रोना सुन कर घबरा सा गया और बोला, ‘‘क्या हुआ, कुछ बताओगी भी, क्यों इतनी जोरजोर से रो रही हो?’’

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‘‘अमन, कल मां गई थीं हमारे पंडितजी से कुंडली मिलवाने. पर उन्होंने कहा है कि दोनों की कुंडली में लेशमात्र भी मिलान नहीं है.  इन दोनों का विवाह किसी भी हालत में संभव नहीं है और यदि किया गया तो लड़की का वैधव्य सुनिश्चित है. इसलिए मांपिताजी ने इस विवाह के लिए साफ मना कर दिया है. अब क्या होगा?’’ कह कर फिर वह जोर से रोने लगी और फोन काट दिया.

रिमू के मातापिता की ऐसी रूढि़वादी सोच ने मु?ो हैरत में डाल दिया क्योंकि स्वयं को अति आधुनिक बताने वाला परिवार इतना अंधविश्वासी और दकियानूसी हो सकता है, यह तो मैं ने सपने में भी नहीं सोचा था.

रिमू का भाई यूएस से एमबीए कर रहा था. पूरा परिवार प्रतिदिन अपने बेटे से स्काइप पर बातचीत करता था. घर के प्रत्येक सदस्य के पास अपना अलग लैपटौप और आधुनिक तकनीक के समस्त साधन मौजूद थे. घर की एकएक वस्तु आधुनिकता का बखान करती सी प्रतीत होती थी.

बातबात में अपनी आधुनिकता का प्रदर्शन करने वाले परिवार का इतना अंधविश्वासी होना मेरे लिए किसी आश्चर्य से कम नहीं था. जन्मपत्रिका और कुंडली को इतना अधिक महत्त्व देने वाले ये तथाकथित आधुनिक परिवेश के जनमानस क्यों नहीं सम?ा पाते कि विवाह किसी कुंडलीवुंडली से नहीं, बल्कि 2 लोगों की परस्पर सम?ादारी से सफल और असफल होते हैं.

क्या जन्मकुंडली में सभी गुण मिला कर किए विवाह असफल नहीं होते, जबकि वास्तविकता तो यह है कि विवाह की सफलता और असफलता तो पतिपत्नी की परस्पर सम?ा, त्याग और समर्पण की भावना पर निर्भर करता है.

खैर, इस समय तो मु?ो अपनी इस समस्या का ही कोई उपाय तलाशना था, सो शांतमन से किसी हल पर विचार करने लगा. इस के बाद दोएक अवसरों पर मैं ने स्वयं रिमू के मातापिता को कुंडली की निरर्थकता के बारे में सम?ाने का काफी प्रयास किया परंतु उन का एक ही जवाब था.

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‘‘हम जानबू?ा कर अपनी बेटी को विधवा होते नहीं देख सकते.’’

उन से बात कर के मु?ो भी सम?ा आ गया था कि उन के मन में कुंडली के बीजों की पैठ बहुत गहरी है. सो, उन के आगे बोलना भैंस के आगे बीन बजाने जैसा है. कुछ दिनों बाद मु?ो अपने एक मित्र के विवाह में भोपाल जाना पड़ा. मित्र ने बिना किसी ताम?ाम के कोर्ट में रजिस्टर्ड मैरिज की थी, जिस में महज उस के परिवार वाले ही शामिल थे.

लड़की के मातापिता ही नदारद थे. पूछने पर पता चला कि लड़की के मातापिता किसी भी स्थिति में इस अंतर्जातीय विवाह के लिए तैयार नहीं थे, इसलिए दोनों ने बिना मातापिता के ही रजिस्टर्ड विवाह करने का फैसला लिया था.

वापस आते समय मैं भी रजिस्टर्ड विवाह के बारे में सोचने लगा कि अब शायद मेरे लिए भी यही चारा है क्योंकि आज 2 वर्ष हो गए पर रिमू के मातापिता सबकुछ सहीसलामत होते हुए भी कुंडली के साथ सम?ाता करने को तैयार नहीं थे. न जाने कैसे और क्यों उन के मस्तिष्क में इस जन्मकुंडली ने भी सर्प की भांति की कुंडली मार ली थी.

एक दिन बातों ही बातों में मैं ने फोन पर रिमू से मातापिता की अनुमति के बगैर रजिस्टर्ड विवाह करने की बात कही. इस पर रिमू बोली, ‘‘अमन, विवाह के बाद अगर कुछ ऐसावैसा हो गया तो क्योंकि पंडितजी ने कहा है…’’

‘‘कुछ नहीं होता रिमू, मैं ऐसे किसी भी अंधविश्वास में विश्वास नहीं करता. मैं ने ऐसे कितने ही जोड़े देखे हैं जो पूरी तरह कुंडली मिलने के बाद भी ताउम्र लड़ते?ागड़ते और एकदूसरे से असंतुष्ट ही रहते हैं. और मेरे ही परिचित कितने ऐसे जोड़े हैं जो अंतर्जातीय विवाह कर के भी आज खुशहाल जीवन जी रहे हैं.

‘‘हम दोनों मिल कर अपने गृहस्थ जीवन को खूबसूरत बनाएंगे. क्या तुम मांपापा को छोड़ कर मेरी खातिर आ सकती हो? कहते हैं न युवावस्था का प्यार अंधा होता है जिस में सिर्फ और सिर्फ प्यार को पाने की चाहत होती है. सो, सुनिश्चित दिन पर रीमा अपने मातापिता की अनुमति के बगैर घर से आ गई और मेरे मातापिता की मौजूदगी में मैं ने रिमू से कोर्ट मैरिज कर ली.

हमारे विवाह के बाद रिमू के मातापिता ने प्रारंभ में तो कुछ नाराजगी प्रदर्शित की परंतु बाद में धीरेधीरे सब सामान्य हो गया. विवाह के बाद रिमू को ले कर मैं अपने पोस्ंिटग स्थल रीवां आ गया था. कुछ शादी की व्यस्तता और मौसम के बदलाव ने ऐसा असर दिखाया कि आते ही मैं चिकनगुनिया नामक बीमारी से ग्रस्त हो कर एक माह तक बिस्तर पर ही रहा.

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एक दिन रीमा मेरे पास आ कर बैठी और मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर बोली, ‘‘अमन, मु?ो लगता है हमारी बेमेल कुंडली ने अपना असर दिखाना शुरू कर दिया है.’’

‘‘तुम्हारा दिमाग खराब है, मैं तुम से बारबार कहता हूं इस प्रकार का कोई वहम अपने मन में मत पालो. ये सब बेकार की बातें हैं,’’ कह कर मैं ने रीमा को चुप करा दिया.

मु?ो पूरी तरह ठीक होतेहोते ही लगभग 6 माह लग गए. सबकुछ सामान्य हुए अभी कुछ ही दिन हुए थे कि एक दिन अचानक मेरे बड़े भाई को हार्टअटैक हो गया और जब तक उन्हें अस्पताल ले जाया गया, उन्होंने दम तोड़ दिया. अब तो रीमा के अंधविश्वासी मन का वहम और भी मजबूत हो गया. जब हम लोग भैया का क्रियाक्रम कर के वापस आ रहे थे तो रीमा कहने लगी.

‘‘अमन, तुम मानो या न मानो, हमारे बड़ेबुजुर्ग जन्मकुंडली मिला कर विवाह करने की बात सही ही कहते थे. देखो, हम अपने विवाह के बाद चैन से रह तक नहीं पा रहे हैं. एक के बाद एक विपत्तियां आए ही जा रही हैं. गृहस्थ जीवन को तो हम महसूस तक नहीं कर पाए.’’

‘‘तो फिर क्यों तुम चली आईं अपने मातापिता को छोड़ कर मेरे साथ. जिस से जन्मकुंडली मिलती उसी से शादी करतीं.’’

Manohar Kahaniya: जुर्म की दुनिया की लेडी डॉन- भाग 2

सौजन्य- मनोहर कहानियां

किडनैपिंग क्वीन अर्चना शर्मा

अनुराधा जुर्म की दुनिया की छोटी मछली थी, जिस का हल्ला मीडिया ने ज्यादा मचाया क्योंकि आमतौर पर औरतों के बहुत ज्यादा क्रूर होने की उम्मीद कोई नहीं करता. लेकिन वक्तवक्त पर महिलाएं जुर्म की दुनिया में आ कर लोगों का ध्यान अपनी तरफ खींचती रही हैं. ऐसा ही एक नाम अर्चना शर्मा का है, जिसे किडनैपिंग क्वीन के खिताब से नवाज दिया गया.

अर्चना की कहानी एकदम फिल्मों सरीखी है. उज्जैन में एक मामूली पुलिस कांस्टेबल बालमुकुंद शर्मा के यहां जन्मी अर्चना भी अनुराधा की तरह पढ़ाईलिखाई में तेज थी, इसलिए सैंट्रल स्कूल के स्टाफ की चहेती भी थी.

4 भाईबहनों में सब से बड़ी अर्चना पेंटिंग की शौकीन थी और सांस्कृतिक कार्यक्रमों में भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. रामलीला में सीता का रोल निभाना उसे बहुत भाता था. सभी लोगों को उम्मीद थी कि महत्त्वाकांक्षी और बहुमुखी प्रतिभा की धनी यह लड़की एक दिन नाम करेगी.

अर्चना ने नाम किया, लेकिन जुर्म की दुनिया में. जिसे जान कर हर कोई दांतों तले अंगुली दबा लेता है. एक दिन अचानक उस ने पढ़ाई छोड़ देने का ऐलान कर दिया, जिस से घर वाले हैरान रह गए, उन्होंने उसे समझाया लेकिन वह टस से मस नहीं हुई.

असल में वह पिता की तरह पुलिस विभाग में नौकरी करना चाहती थी, जो उस ने कर भी ली. लेकिन जल्द ही वह इस नौकरी से ऊब गई और नौकरी छोड़ भी दी, जिस से गुस्साए घर वालों ने उस से नाता तोड़ लिया.

पुलिस की छोटे ओहदे की नौकरी में मेहनत के मुकाबले पगार कम मिलती थी, जबकि अर्चना का सोचना था कि वह इस से ज्यादा डिजर्व करती है. कुछ कर गुजरने की चाह लिए वह उज्जैन से भोपाल आ गई और वहां एक छोटी नौकरी कर ली.

यहीं से उस के जुर्म की दुनिया में दाखिले के द्वार खुले. अब अर्चना घरेलू बंदिशों से आजाद थी. लिहाजा बेरोकटोक अपनी जिंदगी खुद जीने लगी और उसे एक छोटे नेता से प्यार हो गया. लेकिन यह परवान नहीं चढ़ पाया, क्योंकि इस नेता की मंशा केवल एक खूबसूरत लड़की के साथ टाइम पास करने की थी.

पहले ही प्यार में धोखा खाई अर्चना को समझ आ गया कि न तो छोटी नौकरी से उस के सपने पूरे होने वाले और न ही रोमांटिक ख्वावों से जिंदगी का मकसद पूरा होने वाला. लिहाजा वह भोपाल छोड़ कर मुंबई चली गई.

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लेकिन जिंदगी का मकसद क्या है, यह वह खुद भी तय नहीं कर पा रही थी. मुंबई में उस ने बाबा सहगल का आर्केस्ट्रा ग्रुप जौइन कर लिया और प्रोग्राम देने खाड़ी देशों

तक गई और जल्द ही ऐक्ट्रेस बनने के सपने देखने लगी.

लेकिन उसे यह भी समझ आ गया कि मुंबई में जम पाना कोई हंसीखेल नहीं है. इसी दौरान अर्चना को अहमदाबाद के एक कारोबारी से प्यार हो गया, लेकिन यहां भी उसे नाकामी मिली.

उस कारोबारी ने प्यार नहीं, बल्कि कारोबार ही किया था और खुद अर्चना की भी मंशा किसी पैसे वाले को फांस कर सेटल हो जाने की थी, जोकि पूरी नहीं हुई.

देखा जाए तो अर्चना एक भटकाव का शिकार हो चुकी थी. एक दिन यही भटकाव उसे यूं ही दुबई ले गया, जहां उस की मुलाकात अंडरवर्ल्ड के सरगनाओं से हुई, इन में से एक नाम अपने दौर के चर्चित अपराधी बबलू श्रीवास्तव का भी था.

बहुत जल्द अर्चना को तीसरी बार प्यार हुआ. बबलू श्रीवास्तव भी उस पर जान छिड़कने लगा था. लेकिन कुख्यात बबलू को यह पसंद नहीं था कि अर्चना किसी से हंसेबोले इस को ले कर अपने ही साथियों से कई बार उस का झगड़ा भी हुआ.

आजाद जिंदगी जीने की आदी हो चली अर्चना को प्यार का यह तरीका और बबलू का पजेसिव नेचर नागवार गुजरने लगा. कुछ दिनों बाद बबलू उसे ले कर नेपाल चला आया. यहां अर्चना को चौथी बार प्यार हुआ राष्ट्रीय प्रजातंत्र पार्टी के नेता दिलशाद बेग से.

अब तक अर्चना किस्मकिस्म के मर्दों से मिल चुकी थी और उन की कमजोरियां भी समझने लगी थी. दिलशाद पर उस ने अपने हुस्न और प्यार का जादू चलाया तो वह भी बबलू की तरह उस पर मरने लगा.

असल में अर्चना की मंशा दिलशाद को मोहरा बना कर बबलू से छुटकारा पाने की थी. दोनों को वह मैनेज करती रही.

साल 1994 में बबलू गिरफ्तार हुआ तो अर्चना भारत वापस चली आई और बबलू का गिरोह संभालने लगी.

अब वह एक पेशेवर मुजरिम बन चुकी थी और जुर्म की दुनिया में लेडी डौन का खिताब हासिल कर चुकी थी.

कई उद्योगपतियों को अगवा कर उस ने मोटी फिरौती वसूली. इस काम की वह स्पैशलिस्ट हो गई थी.

धीरेधीरे बबलू और उस का साथ छूट गया और अर्चना देश के कई गिरोहों के संपर्क में आई, जिन में गैंगस्टर हिंदू सिंह यादव का नाम भी शामिल था.

आए दिन अर्चना पुलिस से आंखमिचौली खेलने लगी और मध्य प्रदेश को अपना गढ़ बनाने की कोशिश करने लगी, पर बना नहीं पाई. क्योंकि पुलिस उस के पीछे थी.

अब अर्चना कहां है, यह किसी को नहीं मालूम क्योंकि उस की गतिविधियां बंद हैं और अफवाह यह भी उड़ी थी कि वह तो साल 2010 में बांग्लादेश में मारी गई. अर्चना को ले कर पुलिस कितनी परेशान थी, इस का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि एक वक्त में पुलिस ने उस की बाबत 40 देशों को अलर्ट जारी किया था.

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जेनाबाई, जिस के इशारे पर अंडरवर्ल्ड डौन भी नाचते थे. अनुराधा और अर्चना तो अभी सुर्खियों में हैं, क्योंकि उन के मामले ताजेताजे हैं लेकिन देश में लेडी डौन की लिस्ट काफी लंबी है, जिन के कारनामे भी हैरतंगेज हैं और दिलचस्प भी. इस लिस्ट को देख कर लगता है कि औरतों का अंडरवर्ल्ड से पुराना नाता है और वे समयसमय पर जुर्म की दुनिया में अपनी हाजिरी दर्ज कराती रही हैं.

माफिया क्वीन जेनाबाई दारू वाली आज जिंदा होती तो उस की उम्र 100 साल होती, जिस का नाम आज भी एक मिसाल के तौर पर लिया जाता है. जेनाबाई दूसरी महिला डौनों की तरह किसी जरायमपेशा के इशारों पर कभी नहीं नाची, बल्कि उस ने कई नामी अपराधियों को इशारों पर नचाते लंबे वक्त तक राज किया.

सांप्रदायिक हिंसा और दीगर अपराधों के लिए जाने जाने वाले मुंबई के बदनाम डोंगरी इलाके, जहां की एक चाल में उस का परिवार रहता था, से शराब की तसकरी करने वाली यह लेडी डौन आला दिमाग की मालकिन और चालाक थी.

दाऊद इब्राहिम, हाजी मस्तान और करीम लाला जैसे मुंबइया डौन जिन के नाम और खौफ के सिक्के चलते थे. वे महारथी अगर किसी के इशारे पर नाचते थे तो वह जेनाबाई दारू वाली थी, जिस के दरबार में मुंबई क्राइम ब्रांच के छोटेबड़े अफसर भी सिर नवा कर दाखिल होते थे.

जेना थी तो एक दुस्साहसी और असाधारण महिला, जो आजादी की लड़ाई में भी शरीक हुई थी. उस का पति उसे छोड़ कर पाकिस्तान चला गया था, लेकिन 5 बच्चों की जिम्मेदारी जेना पर छोड़ गया था.

गरीब जेना ने पहले चावल और फिर शराब की तसकरी शुरू कर दी. कई बार वह पकड़ी गई, लेकिन छूट भी गई. इस परेशानी से बचने के लिए जेना पुलिस की मुखबिर बन गई.

उस का एक बेटा गैंगवार में मारा गया तो जुर्म से उस का जी उचट गया और वह धर्मकर्म करने लगी और 1994 में उस की मौत हो गई.

अगले भाग में पढ़ें– खतरनाक सायनाइड किलर केमपंमा

Crime Story: कातिल बहन की आशिकी

इस साल गणतंत्र दिवस की बात है. अन्य शहरों की तरह इस मौके पर उत्तर प्रदेश के इटावा शहर में भी स्कूल, कालेज, व्यापारिक प्रतिष्ठान व मुख्य चौराहों पर राष्ट्रीय ध्वज फहराया जा रहा था. शहर का ही सराय एसर निवासी श्याम सिंह यादव भी अपने स्कूल में मौजूद था
और बच्चों के रंगारंग कार्यक्रम को तन्मयता से देख रहा था. श्याम सिंह यादव एक प्राइवेट स्कूल में वैन चालक था. वैन द्वारा सुबह के समय बच्चों को स्कूल लाना फिर छुट्टी होने के बाद उन्हें उन के घर छोड़ना उस का रोजाना का काम था.
स्कूल में चल रहे सांस्कृतिक कार्यक्रम समाप्त होने के बाद श्याम सिंह ने स्कूल के बच्चों को घर छोड़ा, फिर वैन को स्कूल में खड़ा कर के वह दोपहर बाद अपने घर पहुंचा. घर में उस ने इधरउधर नजर दौड़ाई तो उसे बड़ी बेटी पूजा तो दिखाई पड़ी, लेकिन छोटी बेटी दीपांशु उर्फ रचना दिखाई नहीं दी. रचना को घर में न देख कर श्याम सिंह ने पूजा से पूछा, ‘‘पूजा, रचना घर में नहीं दिख रही है. कहीं गई है क्या?’’
‘‘पापा, रचना कुछ देर पहले स्कूल से आई थी, फिर सहेली के घर चली गई. थोड़ी देर में आ जाएगी.’’ पूजा ने बताया.

श्याम सिंह ने बेटी की बात पर यकीन कर लिया और चारपाई पर जा कर लेट गया. लगभग एक घंटे बाद उस की नींद टूटी तो उसे फिर बेटी की याद आ गई. उस ने पूजा से पूछा, ‘‘बेटा, रचना आ गई क्या?’’
‘‘नहीं पापा, अभी तक नहीं आई.’’ पूजा ने जवाब दिया.
‘‘कहां चली गई जो अभी नहीं आई.’’ श्याम सिंह ने चिंता जताते हुए कहा.
इस के बाद वह घर से निकला और पासपड़ोस के घरों में रचना के बारे में पूछा. लेकिन रचना का पता नहीं चला. फिर उस ने रचना के साथ पढ़ने वाली लड़कियों से उस के बारे में जानकारी जुटाई तो पता चला कि रचना आज स्कूल गई ही नहीं थी.

श्याम सिंह का माथा ठनका. क्योंकि पूजा कह रही थी कि रचना स्कूल से वापस आई थी. श्याम सिंह के माथे पर चिंता की लकीरें खिंचने लगीं. उस के मन में तरहतरह के विचार आने लगे. श्याम सिंह की पत्नी सर्वेश कुमारी अपने बेटे विवेक के साथ कहीं रिश्तेदारी में गई हुई थी. श्याम सिंह ने रचना के गुम होने की जानकारी पत्नी को दी और तुरंत घर वापस आने को कहा.
शाम होतेहोते 17 वर्षीय दीपांशी उर्फ रचना के गुम होने की खबर पूरे मोहल्ले में फैल गई. कई हमदर्द लोग श्याम सिंह के साथ रचना की खोज में जुट गए. जब कोई जवान लड़की घर से गायब हो जाती है तो तमाम लोग तरहतरह की कानाफूसी करने लगते हैं. श्याम सिंह के पड़ोस की महिलाएं भी कानाफूसी करने लगीं.

श्याम सिंह ने लोगों के साथ तमाम संभावित जगहों पर बेटी को तलाशा, लेकिन उस का कुछ पता नहीं चला. इटावा के रेलवे स्टेशन, रोडवेज व प्राइवेट बसअड्डे पर भी रचना को ढूंढा गया. लेकिन उस का कहीं कोई पता नहीं लगा.
जब रचना का कुछ भी पता नहीं चला, तब श्याम सिंह थाना सिविल लाइंस पहुंचा. उस ने वहां मौजूद ड्यूटी अफसर आर.पी. सिंह को अपनी बेटी दीपांशी उर्फ रचना के गुम होने की जानकारी दी. थानाप्रभारी ने दीपांशु उर्फ रचना की गुमशुदगी दर्ज कर ली. इस के बाद उन्होंने इटावा जिले के सभी थानों में रचना के गुम होने की सूचना हुलिया तथा उम्र के साथ प्रसारित करा दी.

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बड़ी बेटी पर हुआ शक

रात 10 बजे तक श्याम सिंह की पत्नी सर्वेश कुमारी बेटे के साथ अपने घर पहुंच गई. पतिपत्नी ने सिर से सिर जोड़ कर परामर्श किया तो उन्हें बड़ी बेटी पूजा पर शक हुआ. उन्हें लग रहा था कि रचना के गुम होने का रहस्य पूजा के पेट में छिपा है. इसलिए श्याम सिंह ने पूजा से बड़े प्यार से रचना के बारे में पूछा.
लेकिन जब पूजा ने कुछ नहीं बताया तो श्याम सिंह ने उस की पिटाई की. इस के बाद भी पूजा ने अपनी जुबान नहीं खोली. रात भर श्याम सिंह व सर्वेश कुमारी परेशान होते रहे. उन की समझ में नहीं आ रहा था कि आखिर रचना कहां गुम हो गई.

अगले दिन 27 जनवरी की सुबह गांव के कुछ लोग तालाब की तरफ गए तो उन्होंने तालाब के किनारे पानी में एक बोरी पड़ी देखी. बोरी को कुत्ते पानी से बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे. बोरी को देखने से लग रहा था कि उस में किसी की लाश है.

यह तालाब श्याम सिंह के घर के पिछवाड़े था, इसलिए बहुत जल्द उसे भी तालाब में संदिग्ध बोरी पड़ी होने की जानकारी मिल गई. खबर पाते ही वह तालाब किनारे पहुंच गया. उस ने बोरी पर एक नजर डाली फिर तमाम आशंकाओं के बीच बदहवास हालत में थाना सिविल लाइंस पहुंचा. थानाप्रभारी जे.के. शर्मा को उस ने तालाब किनारे मुंह बंद बोरी पड़ी होने की सूचना दी और आशंका जताई कि उस में कोई लाश हो सकती है.

सूचना मिलने पर थानाप्रभारी जे.के. शर्मा पुलिस टीम के साथ सराय एसर गांव के उस तालाब के किनारे पहुंचे, जहां संदिग्ध बोरी पड़ी थी. उन्होंने 2 सिपाहियों की मदद से बोरी को तालाब से बाहर निकलवाया. बोरी का मुंह खुलवा कर देखा गया तो उस में एक लड़की की लाश निकली.

लाश बोरी से निकाली गई तो उसे देखते ही श्याम सिंह फफक कर रो पड़ा. लाश उस की 17 वर्षीय बेटी दीपांशी उर्फ रचना की थी. रचना की लाश मिलने की खबर पाते ही उस की मां सर्वेश कुमारी रोतीबिलखती तालाब किनारे पहुंच गई.

इधर थानाप्रभारी जे.के. शर्मा ने रचना की लाश मिलने की सूचना पुलिस अधिकारियों को दी तो कुछ देर में एसएसपी अशोक कुमार त्रिपाठी तथा एडीशनल एसपी डा. रामयश सिंह घटनास्थल पर आ गए. पुलिस अधिकारियों ने घटनास्थल का निरीक्षण किया और मृतका के पिता श्याम सिंह से इस बारे में पूछताछ की.

श्याम सिंह ने पुलिस अधिकारियों को बताया कि रचना की हत्या का राज उन की बड़ी बेटी पूजा के पेट में छिपा है जो इस समय घर में मौजूद है. अगर उस से सख्ती से पूछताछ की जाए तो सारी सच्चाई सामने आ जाएगी.

अपनी ही बेटी पर छोटी बेटी की हत्या का आरोप लगाने की बात सुन कर एसएसपी त्रिपाठी भी चौंके. उन्होंने पूछा, ‘‘बड़ी बहन अपनी छोटी बहन की हत्या आखिर क्यों कराएगी?’

’
‘‘साहब, मेरी बड़ी बेटी के लक्षण ठीक नहीं हैं. हो सकता है इस हत्या में पड़ोस का अनिल और उस का दोस्त अवध पाल भी शामिल रहे हों.’’ श्याम सिंह ने बताया.

श्याम सिंह की बातों से एसएसपी को मामला प्रेम प्रसंग का लगा. अत: उन्होंने थानाप्रभारी को निर्देश दिया कि वह डेडबौडी को पोस्टमार्टम हाउस भिजवाने के बाद आरोपियों को हिरासत में ले कर उन से पूछताछ करें. इस के बाद थानाप्रभारी जे.के. शर्मा ने मौके की काररवाई पूरी करने के बाद रचना का शव पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया.

फिर उन्होंने महिला पुलिस के सहयोग से मृतका की बड़ी बहन पूजा यादव को हिरासत में ले लिया. इस के अलावा आरोपी अनिल व उस के दोस्त अवध पाल को भी सरैया चुंगी के पास से पकड़ लिया गया.

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थाने में एडीशनल एसपी डा. रामयश सिंह की मौजूदगी में पुलिस ने सब से पहले श्याम सिंह की बड़ी बेटी पूजा यादव से पूछजाछ शुरू की. शुरू में तो पूजा अपनी बहन की हत्या से इनकार करती रही लेकिन जब थोड़ी सख्ती की गई तो उस ने बताया कि छोटी बहन रचना से उस का झगड़ा हुआ था. झगडे़ के बाद उस ने कमरा बंद कर फांसी लगा ली थी. इस से वह बुरी तरह डर गई. इसलिए शव को उस ने बोरी में भरा और साइकिल पर लाद कर घर से थोड़ी दूर स्थित तालाब में फेंक आई.

थानाप्रभारी जे.के. शर्मा ने अवध पाल से पूछताछ की तो उस ने पूजा से प्रेम संबंधों को तो स्वीकार कर लिया, पर हत्या व लाश ठिकाने लगाने में शामिल होने से साफ मना कर दिया. अनिल ने भी वारदात में शामिल होने से इनकार किया. उस ने कहा कि अवध पाल उस का दोस्त है. अवध पाल व पूजा की दोस्ती को मजबूत करने में उस ने बिचौलिए की भूमिका निभाई थी. लेकिन रचना की हत्या के बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है.

पूजा के इस कथन पर पुलिस को यकीन तो नहीं हुआ, फिर भी जांच करने के लिए पुलिस पूजा के घर पहुंची. पुलिस ने कमरे में लगे पंखे को देखा, उस पर धूल जमी थी और उस के ब्लेड जैसे के तैसे थे. रस्सी या दुपट्टा भी नहीं मिला. कमरे में पुलिस को कोई ऐसा सबूत नहीं था, जिस से साबित होता कि रचना ने फांसी लगाई थी.

पुलिस को लगा कि पूजा बेहद शातिर है. वह पुलिस से झूठ बोल रही है. लिहाजा महिला पुलिसकर्मियों ने पूजा से सख्ती से पूछताछ की तो जल्द ही उस ने सच्चाई उगल दी. उस ने स्वीकार कर लिया कि उस ने ही अपनी बहन रचना की हत्या कर डेडबौडी खुद ही तालाब में फेंकी थी. पूजा से पूछताछ के बाद उस की छोटी बहन की हत्या की जो कहानी सामने आई, चौंकाने वाली निकली—

उत्तर प्रदेश के इटावा शहर के सिविल लाइंस थाना क्षेत्र में एक गांव है सराय एसर. शहर से नजदीक बसे इसी गांव में श्याम सिंह यादव अपने परिवार के साथ रहता था. उस के परिवार में पत्नी सर्वेश कुमारी के अलावा एक बेटा था विवेक तथा 2 बेटियां थीं पूजा और दीपांशी उर्फ रचना. श्याम सिंह यादव शहर के एक प्राइवेट स्कूल में वैन चलाता था. स्कूल से मिलने वाले वेतन से उस के परिवार का भरणपोषण हो रहा था.
श्याम सिंह के बच्चों में पूजा सब से बड़ी थी. चेहरेमोहरे से वह काफी सुंदर थी. पूजा जैसेजैसे सयानी होने लगी, उस के रूपलावण्य में निखार आता गया. उस के हुस्न ने बहुतों को दीवाना बना दिया था. अवध पाल भी पूजा का दीवाना था.

अवध पाल ने पूजा पर डाले डोरे

अवध पाल यादव, सरैया चुंगी पर रहता था. उस के भाई वीरपाल की दूध डेयरी थी. अवध पाल भी भाई के साथ दूध डेयरी पर काम करता था. अवध पाल का एक दोस्त अनिल यादव था जो सराय एसर में रहता था. अनिल, पूजा के परिवार का था और पूजा के घर के पास ही रहता था. अवध पाल का अनिल के घर आनाजाना था. उस के यहां आतेजाते ही अवध पाल की नजर पूजा पर पड़ी थी. वह उसे मन ही मन चाहने लगा था.

अवध पाल भाई के साथ खूब कमाता था, इसलिए वह खूब बनठन कर रहता था. अवध पाल जिस चाहत के साथ पूजा को देखता था, उसे पूजा भी समझती थी. उस की नजरों से ही वह उस के मन की बात भांप चुकी थी. धीरेधीरे पूजा भी उस की दीवानी होने लगी. उस के मन में भी अवध पाल के प्रति आकर्षण पैदा हो गया.

पूजा पंचशील इंटर कालेज में पढ़ती थी. इसी कालेज में उस की छोटी बहन दीपांशी उर्फ रचना भी पढ़ती थी. पूजा इंटरमीडिएट की छात्रा थी जबकि दीपांशी 10वीं में पढ़ रही थी. पूजा घर से पैदल ही स्कूल जाती थी.

अवध पाल ने जब से पूजा को देखा था, तब से उस ने उसे अपने दिल में बसा लिया था. पूजा के स्कूल आनेजाने के समय वह उस के पीछेपीछे स्कूल तक जाता था. पूजा भी उसे कनखियों से देखती रहती थी.
पूजा की इस अदा से अवध पाल समझ गया कि पूजा भी उसे चाहने लगी है. दोनों के दिलों में प्यार की हिलोरें उमड़ने लगीं. प्यार के समंदर को भला कौन बांध कर रख सका है. वैसे भी कहते हैं कि जहां चाह होती है, वहां राह निकल ही आती है.

अवध पाल को पीछे आते देख कर एक दिन पूजा ठिठक कर रुक गई. उस का दिल जोरों से धड़क रहा था. पूजा के अचानक रुकने से अवध पाल भी चौंक कर ठिठक गया. आखिर उस से रहा नहीं गया और वह लंबेलंबे डग भरता हुआ पूजा के सामने जा कर खड़ा हो गया.
‘‘तुम आजकल मेरे पीछे क्यों पड़े हो?’’ पूजा ने माथे पर त्यौरियां चढ़ा कर अवध पाल से पूछा.
‘‘तुम से एक बात कहनी थी पूजा.’’ अवध पाल ने झिझकते हुए कहा.

‘‘बताओ, क्या कहना चाहते हो?’’ पूजा ने उस की आंखों में देखते हुए पूछा.
तभी अवध पाल ने अपनी जेब से कागज की एक परची निकाली और पूजा को थमा कर बोला, ‘‘घर जा कर इसे पढ़ लेना, सब समझ में आ जाएगा.’’
मन ही मन मुसकराते हुए पूजा ने वह कागज ले लिया और बिना कुछ बोले अपने घर चली गई. हालांकि पूजा को इस बात का अहसास था कि उस परची में क्या लिखा होगा, फिर भी वह उसे पढ़ कर अपने दिल की तसल्ली कर लेना चाहती थी. घर पहुंच कर पूजा ने अपने कमरे में जा कर अवध पाल का दिया हुआ कागज निकाल कर पढ़ा. उस पर लिखा था, ‘मेरी प्यारी पूजा, आई लव यू. मैं तुम से बहुत प्यार करता हूं. तुम्हें देखे बगैर मुझे चैन नहीं मिलता. इसीलिए अकसर स्कूल तक तुम्हारे पीछे आता हूं. तुम अगर मुझे न मिली तो मैं जिंदा नहीं रह पाऊंगा. तुम्हारा और सिर्फ तुम्हारा अवध पाल सिंह.’

पत्र पढ़ कर पूजा के दिल के तार झनझना उठे. उस की आकांक्षाओं को पंख लग गए. उस दिन पूजा ने उस पत्र को कई बार पढ़ा. पूजा के मन में सतरंगी सपने तैरने लगे थे. उसी दिन रात को पूजा ने अवध पाल के नाम एक पत्र लिखा.
पत्र में उस ने सारी भावनाएं उड़ेल दीं, ‘प्रिय अवध पाल, मैं भी तुम से इतना प्यार करती हूं जितना कभी किसी ने नहीं किया होगा. कह इसलिए नहीं सकी कि कहीं तुम बुरा न मान जाओ. तुम्हारे बिना मैं भी जीना नहीं चाहती. मैं तो चाहती हूं कि हर समय तुम्हारी बांहों के घेरे में बंधी रहूं. तुम्हारी पूजा.’
उस दिन मारे खुशी के पूजा को नींद नहीं आई. अगली सुबह वह कालेज जाने के लिए घर से निकली तो अवध पाल उसे पीछेपीछे आता दिखाई दिया. दोनों की नजरें मिलीं तो वे मुसकरा दिए. पूजा बेहद खुश नजर आ रही थी. सावधानी से पूजा ने अपना लिखा खत जमीन पर गिरा दिया और आगे चली गई.
पीछेपीछे चल रहे अवध पाल ने इधरउधर देखा और उस पत्र को उठा कर दूसरी तरफ चला गया. एकांत में जा कर उस ने पूजा का पत्र पढ़ा तो खुशी से झूम उठा. जो हाल पूजा के दिल का था, वही अवध पाल का भी था. पूजा ने पत्र का जवाब दे कर उस का प्यार स्वीकार कर लिया था.

शुरू हो गई प्रेम कहानी

दोपहर बाद जब कालेज की छुट्टी हुई तो पूजा ने गेट पर अवध पाल को इंतजार करते पाया. एकदूसरे को देख कर दोनों के दिल मचल उठे. वे दोनों एक पार्क में जा पहुंचे.
पार्क के सुनसान कोने में बैठ कर दोनों ने अपने दिल का हाल एकदूसरे को कह सुनाया. पार्क में कुछ देर प्यार की अठखेलियां कर के दोनों घर लौट आए. दोनों के बीच प्यार का इजहार हुआ तो मानो उन की दुनिया ही बदल गई. फिर दोनों अकसर मिलने लगे.
पूजा और अवध पाल के दिलोदिमाग पर प्यार का ऐसा जादू चढ़ा कि उन्हें एकदूजे के बिना सब कुछ सूनासूना लगने लगा. जब भी मौका मिलता, दोनों एकांत में साथ बैठ कर अपने ख्वाबों की दुनिया में खो जाते. इसी प्यार के चलते दोनों ने साथसाथ जीनेमरने की कसमें भी खा लीं. एक बार मन से मन मिले तो फिर तन मिलने में भी देर नहीं लगी.
पूजा और अवध पाल ने लाख कोशिश की कि उन के प्रेम संबंधों का पता किसी को न चले. लेकिन प्यार की महक को भला कोई रोक सका है. एक दिन पूजा की छोटी बहन दीपांशी उर्फ रचना ने पूजा और अवध पाल को रास्ते में हंसीठिठोली करते देख लिया. रास्ते में तो उस ने कुछ नहीं कहा, लेकिन घर आ कर उस ने पापा और मम्मी के कान भर दिए.
कुछ देर बाद पूजा कालेज से घर आई तो मांबाप की त्यौरियां चढ़ी हुई थीं. श्याम सिंह ने गुस्से में उस से पूछा, ‘‘रास्ते में किस के साथ हंसीठिठोली कर रही थी? कौन है वह, जो हमारी इज्जत को नीलाम करना चाहता है? सचसच बता वरना…’’

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पिता का गुस्सा देख कर पूजा सहम गई. वह जान गई कि उस के प्यार का भांडा फूट गया है, इसलिए झूठ बोलने से कुछ नहीं होगा. अत: वह सिर झुका कर बोली, ‘‘पापा, वह लड़का है अवध पाल. सरैया चुंगी में रहता है. वह अपने बड़े भाई वीरपाल के साथ डेयरी चलाता है. हम दोनों एकदूसरे से प्यार करते हैं और शादी करना चाहते हैं.’’
पूजा की बात सुनते ही श्याम सिंह का गुस्सा सीमा लांघ गया. उस ने पूजा की जम कर पिटाई की और उसे हिदायत दी कि आइंदा वह अवध पाल से न मिले. पूजा की मां सर्वेश कुमारी ने भी उसे खूब समझाया. पूजा पर लगाम कसने के लिए सर्वेश ने उस का कालेज जाना बंद करा दिया, साथ ही उस पर निगरानी भी रखने लगी. पूजा पर निगाह रखने के लिए श्याम सिंह और उस की पत्नी ने छोटी बेटी रचना को भी लगा दिया. पूजा जब भी कालेज जाने की बात कहती तो रचना उस के साथ होती और उस की हर गतिविधि पर नजर रखती.
पाबंदी लगी तो पूजा व अवध पाल का मिलनाजुलना बंद हो गया. इस से दोनों परेशान रहने लगे. अवध पाल ने अपनी परेशानी अपने दोस्त अनिल को बताई और इस मामले में मदद मांगी. अनिल रचना का नातेदार था और पास में ही रहता था. वह दोनों के प्यार से वाकिफ था, सो मदद करने को राजी हो गया.
इस के बाद अवध पाल ने अनिल को एक मोबाइल फोन दे कर कहा, ‘‘दोस्त, तुम पूजा के पड़ोसी हो. पूजा तुम्हारे परिवार की है. तुम उस के घर वालों पर नजर रखो और जब भी पूजा घर में अकेली हो तो उसे फोन दे कर मेरी बात करा दिया करना.’’
इस के बाद अनिल पूजा और अवध पाल के प्यार का राजदार बन गया. पूजा जब भी घर में अकेली होती तो अनिल उसे मोबाइल दे कर अवध पाल से बात करा देता. प्यार भरी बातें करने के बाद पूजा अनिल को मोबाइल वापस कर देती. कभीकभी पूजा बहाना कर के अनिल के घर चली जाती और मोबाइल से देर तक प्रेमी अवध पाल से बतिया कर वापस आ जाती.

परंतु पूजा और अवध पाल का मोबाइल पर बतियाना ज्यादा समय तक राज न रह सका. एक रोज रचना ने पूजा को बतियाते सुन लिया. यही नहीं, उस ने अनिल को मोबाइल वापस करते भी देख लिया. इस की जानकारी उस ने मांबाप को दी तो पूजा की पिटाई हुई.
इस के बाद तो यह सिलसिला बन गया. रचना जब भी पूजा को बतियाते हुए देख लेती तो मांबाप को बता देती. फिर उस की पिटाई होती. पूजा अब रचना को अपने प्यार का दुश्मन समझने लगी थी. वह प्रतिशोध की आग में जल रही थी.
24 जनवरी, 2019 को श्याम सिंह की पत्नी बेटे विवेक के साथ किसी काम से चरुआभानी, मैनपुरी रिश्तेदारी में चली गई. इस की जानकारी अनिल को हुई तो वह पूजा और अवध पाल का मिलाप कराने का प्रयास करने लगा, लेकिन रचना की कड़ी निगरानी की वजह से वह मिलाप न करा सका.
गुस्सा बना रचना की मौत की वजह

26 जनवरी, 2019 को गणतंत्र दिवस था. लगभग साढ़े 7 बजे श्याम सिंह यादव अपनी ड्यूटी चला गया. श्याम सिंह के जाने के बाद अनिल पूजा के घर पहुंच गया और उसे मोबाइल दे गया. कुछ देर बाद रचना भी किसी काम से पड़ोसी के घर चली गई. इसी बीच पूजा को मौका मिल गया और वह मोबाइल पर प्रेमी अवध पाल से बतियाने लगी.
पूजा, प्रेमी से रसभरी बातें कर ही रही थी कि रचना आ गई. उस ने मोबाइल पर बहन द्वारा बात करने का विरोध किया और धमकी देते हुए कहा कि आने दो पापा को तुम्हारे प्यार का भूत न उतरवाया तो मेरा नाम रचना नहीं.
रचना की धमकी से पूजा का गुस्सा सातवें आसमान पर जा पहुंचा और दोनों में कहासुनी होने लगी. इसी कहासुनी के बीच रचना ने पूजा के हाथ से मोबाइल छीन कर जमीन पर पटक दिया, जिस से वह टूट गया. इस के अलावा उस ने ऐसे गंदे शब्दों का प्रयोग किया, जिस से पूजा का गुस्सा और बढ़ गया. वह नफरत की आग में जल उठी.
पूजा ने लपक कर रचना के गले में पड़ा स्कार्फ दोनों हाथों से पकड़ा और पूरी ताकत से उसे खींचने लगी. नफरत की आग में जल रही पूजा भूल गई कि जिस का वह गला कस रही है, वह उस की छोटी बहन है. पूजा के हाथ तभी ढीले हुए जब रचना की आंखें फट गईं और वह जमीन पर गिर पड़ी.
पूजा को यकीन नहीं हो रहा था कि उस की छोटी बहन की सांसें थम गई हैं. वह उसे हिलानेडुलाने लगी. नाम ले कर पुकारने लगी, ‘‘उठो रचना, उठो. मुझे माफ कर दो.’’
लेकिन रचना कैसे उठती. उस की तो दम घुटने से मौत हो चुकी थी. पूजा कुछ देर तक लाश के पास बैठी पछताती रही. फिर पकड़े जाने के डर से वह घबरा गई. पुलिस से बचने के लिए उस ने गले में लिपटा स्कार्फ निकाला और बक्से में छिपा दिया. फिर रचना के शव को प्लास्टिक की बोरी में तोड़मरोड़ कर भरा और बोरी का मुंह बंद कर दिया.

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घर के पिछवाड़े कुछ ही कदम की दूरी पर तालाब था. घर के कमरे का एक दरवाजा इसी तालाब की ओर खुलता था. पूजा ने दरवाजा खोला, आवाजाही की टोह ली और फिर शव को साइकिल पर लाद कर तालाब किनारे फेंक दिया. फिर दरवाजा बंद कर साइकिल जहां की तहां खड़ी कर दी. टूटे मोबाइल को उस ने कबाड़ में फेंक दिया और घर साफसुथरा कर दिया.
दोपहर बाद जब श्याम सिंह घर आया तो उसे रचना नहीं दिखी. तब उस ने पूजा से पूछा. पूजा ने उसे गुमराह कर दिया. श्याम सिंह देर रात तक रचना की खोज में जुटा रहा. जब वह नहीं मिली तब वह वह थाना सिविल लाइंस चला गया और पुलिस जांच के बाद प्यार में बाधक बनी छोटी बहन की बड़ी बहन द्वारा हत्या किए जाने की सनसनीखेज घटना सामने आई.
पूजा से पूछताछ के बाद पुलिस ने 28 जनवरी, 2019 को उसे इटावा की अदालत में रिमांड मजिस्ट्रैट के समक्ष पेश किया, जहां से उसे जिला कारागार भेज दिया गया. अनिल व अवध पाल के खिलाफ पुलिस को कोई साक्ष्य नहीं मिला, जिस से उन्हें छोड़ दिया गया.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

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