स्मोक पान से मजे मजे में लेने के देने पड़ गए, हो जाइए सावधान

दरअसल, किसी छोटे सी सनसनीखेज बात से कभीकभार जान पर बन जाती है और कई दफा तो जान तक चली जाती है. ऐसे ही आजकल ‘स्मोक पान’ के चलते देशभर में हादसे हो रहे हैं.

दरअसल, पलभर के जोश या लीक से हट कर दिखने के चक्कर में जान पर खेलने का काम हो रहा है. अगर आप के आसपास भी शादीब्याह, किसी समारोह में कुछ ऐसा हो, तो दूसरे लोगों को सावधान करें और खुद भी सावधान हो जाएं.

लिक्विड नाइट्रोजन यानी ‘स्मोक पान’ खाने के बाद एक 12 साल की बच्ची के पेट में दर्द शुरू हो गया. दर्द बहुत ज्यादा होने पर उसे अस्पताल ले जाने पर पता चला कि उस के पेट में छेद है. यह सब हुआ सिर्फ थोड़े से मजे के लिए, मगर जान सांसत में पड़ गई.

ऐसी अनेक घटनाएं हमारे आसपास घट रही हैं, मगर हम अनदेखी कर के आगे बढ़ जाते हैं और खुद अपने परिवार या अपने आसपास के लोगों को जोखिम में डाल देते हैं. समाज में फैल रही अनदेखी के चलते इस तरह की घटनाएं घट रही हैं और लोगों की जिंदगी जोखिम में पड़ जाती है.

पहली घटना

झारखंड के रांची में हुए एक समारोह में पान में आग लगा कर खिलाया जा रहा था. एक शख्स ने जैसे ही जलता हुआ पान मुंह में लिया, उसे उलटी होने लगी और उसे डाक्टर के पास ले जाना पड़ा.

दूसरी घटना

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के अशोका रत्न क्षेत्र में एक पारिवारिक कार्यक्रम में एक बच्चे ने जलता हुआ पान खाया और बीमार पड़ गया.

तीसरी घटना

छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में एक समारोह में जलता हुआ पान खाने के बाद एक महिला दहशत में आ गई और बेहोश हो कर गिर पड़ी. काफी इलाज के बाद ही वह ठीक हो पाई.

इस तरह की अनेक घटनाएं हमारे आसपास घट रही हैं. बहुत सारी घटनाएं तो खबरों में नहीं आ पाती हैं और बहुत सी घटनाओं को लोग गंभीरता से नहीं लेते हैं, तो उन पर चर्चा भी नहीं हो पाती है.

करना पड़ा आपरेशन

कर्नाटक के बैंगलुरु में ‘स्मोक पान’ खाने से 12 साल की एक लड़की के पेट में छेद होने के चलते उस का आपरेशन किया गया. वहां के नारायण मल्टीस्पैशलिटी अस्पताल में उस लड़की का आपरेशन किया गया.

अस्पताल के मुताबिक, बैंगलुरु के एक शादी समारोह में एक लड़की ने ‘स्मोक पान’ खाया और उस के बाद उस की हालत बिगड़ती चली गई. अस्पताल ने मरीज की पहचान का खुलासा नहीं किया.

अस्पताल ने एक बयान में कहा, ‘लड़की के पेट में एक छेद का पता चला था. आगे के जोखिमों को रोकने के लिए तुरंत आपरेशन करने की जरूरत थी. मरीज के गंभीर हालात को देखते हुए तत्काल उस की आधुनिक तकनीक से सर्जरी की गई.’

उस लड़की का आपरेशन करने वाले डाक्टरों की टीम के हैड डाक्टर विजय एचएस ने कहा, “एक ‘इंट्राआपरेटिव ओजीडी स्कोपी’ तकनीक के जरीए सर्जरी की गई.”

अस्पताल ने कहा कि सर्जरी के बाद लड़की को 2-3 दिन आईसीयू में रखा गया और 6 दिन बाद उसे घर जाने दिया गया.

इस सिलसिले में डाक्टरों ने बताया कि खानेपीने की कई चीजों को आकर्षक बनाने के लिए लिक्विड नाइट्रोजन का इस्तेमाल किया जा रहा है, जबकि जरा सी असावधानी आप के लिए समस्या पैदा कर सकती है.

एक रिपोर्ट में कर्नाटक स्वास्थ्य आयुक्त ने कहा कि खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम, 2006 के मुताबिक, भोजन तैयार करने में तरल नाइट्रोजन का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए. हालांकि, कई मामलों में इन नियमों की अनदेखी की जा रही है, जिस का सेहत पर बुरा असर पड़ सकता है.

याद रहे कि लिक्विड नाइट्रोजन एक तरल है, जिस का बौयलिंग पौइंट काफी कम होता है और यह कमरे के तापमान पर गैस के रूप में मौजूद होती है.

मां जल्दी आना: विनीता अपनी मां को क्यों साथ रखना चाहती थी?

औफिस से आ कर जैसे ही मैं ने घर में प्रवेश किया एक सोंधी सी महक मेरे पूरे तनमन में फैल गई. बैग को सोफे पर पटक हाथमुंह धो कर मैं सीधे किचन में जा घुसी. कड़ाही में सिक रहे समोसों को देख कर पीछे से मां के गले में बांहें डाल कर बोली, ‘‘अरे वाह मां, आज तो आप ने समोसे बना कर मोगैंबो को खुश कर दिया. बोलिए आप को क्या चाहिए.’’

‘‘तू खुद मां बन गई है पर अभी भी बचपना नहीं गया तेरा, ले जल्दी से खा कर बता कैसे बने हैं.’’ प्लेट में 2 समोसे और धनिया की चटनी डाल कर देते हुए मां ने हलकी सी चपत मेरे गाल पर लगा दी.

‘‘मां बन गई तो क्या मैं आप की बच्ची नहीं रही,’’ कहते हुए मैं समोसे खाने लगी. सर्दियों में मां के हाथ के समोसों के हम सब दीवाने थे. मुझे याद है मां किलोकिलो मैदा के समोसे बनातीं पर हम भाईबहन खाने में प्रतियोगिता सी करते और सारे समोसों को चट कर जाते थे. मां को कुकिंग का बहुत शौक था इसीलिए शायद हम भाईबहन बहुत चटोरे हो गए थे. मैं बचपन की सुनहरी यादों में कुछ और खोती उस से पहले मेरे पतिदेव अमन ने घर में प्रवेश किया और आते ही फरमान जारी किया.

‘‘विनू, जल्दी से कड़क चाय पिला दो सिर में तेज दर्द हो रहा है.’’

‘‘बेटा तुम हाथमुंह धो कर आ जाओ मैं ने तुम्हारी पसंद के पनीर के समोसे बनाए हैं और कड़क चाय बस तैयार होने ही वाली है.’’

‘‘अरे मां, आप क्यों परेशान होती हो इतनी बार आप से कहा है कि आप बस आराम किया करिए पर नहीं आप मान नहीं सकतीं.’’

‘‘बेटा हाथपैर चलते रहेंगे तो बुढ़ापा आराम से कट जाएगा पर अगर जाम हो गए तो मेरे साथसाथ तुम लोग भी परेशान हो जाओगे. इसलिए हलकाफुलका काम तो करने ही देते रहो… जिंदगीभर तो काम में कोल्हू के बैल की तरह जुते रहे और अब तुम आराम करने को कह रहे हो तो बताओ कैसे हो पाएगा…’’ मां ने मुसकराते हुए कहा तो अमन निशब्द से हो गए.

हमें खिला कर मां अपनी प्लेट लगा कर ले आईं और टीवी देखते हुए स्वयं भी खाने लगीं. मां की शुरू से आदत है कि जब तक घर के एकएक सदस्य को खिला नहीं लेंगी तब तक स्वयं नहीं खाएंगी.

मैं चेंज कर के कुछ देर आराम करने के उद्देश्य से बिस्तर पर लेट गई. लेटते ही मन आज से 2 वर्ष पूर्व जा पहुंचा जब एक दिन सुबहसुबह मेरे भाई अनंत का मेरे पास फोन आया. मां और बाबूजी उस समय अनंत के ही पास थे. मेरे फोन उठाते ही वह बोला, ‘‘मैं तो परेशान हो गया हूं इन दोनों से, जब भी घर में आओ तो लगता है मानो 2 जासूस बैठे हैं घर में, हमारा इन के साथ एडजस्ट करना बहुत मुश्किल हो रहा है. दीदी आप ही कोई तरीका बताओ जिस से ये दोनों यहां से चले जाएं,’’ अनंत की बातें सुन कर मेरा दिमाग सुन्न पड़ गया था.

उस से उम्र में 10 वर्ष बड़ी होने के बावजूद समझ नहीं पाई कि उस के प्रश्न का क्या जवाब दूं. जिस बेटे के जन्म के लिए मांबाबूजी ने न जाने कितनी मन्नतें मांगी, कितने मंदिर मस्जिद के दरवाजे खटखटाए और जिस के जन्म होने पर लगा मानो उन के जीवन के समस्त दुखों का हरण हो गया हो वही बेटा आज उन्हें जासूस कह रहा था. अपनी संतान की प्रगति से खुश होने वाले मातापिता अपने ही बेटे के घर में जासूस कैसे हो सकते हैं. भारतीय संस्कृति में पुत्र को मोक्ष के द्वार तक पहुंचाने वाला कहा गया है.

हमारे धर्मरक्षकों ने इस पर और चाशनी चढ़ाई कि मरणोपरांत पुत्र के द्वारा दी गई मुखाग्नि से ही स्वर्ग की प्राप्ति होती है अन्यथा तो मानव बस नरक में ही जाता है बस इसी मानसिकता के शिकार धर्मभीरू मांबाबूजी इस कमर तोड़ती महंगाई में भी एक के बाद एक तीन बेटियों की कतार लगाते गए. इस बीच मां के गर्भ में पल रहीं कुछ बेटियों को तो जन्म ही नहीं लेने दिया गया. खैर इंतजार का फल मीठा होता है यह कहावत हमारे घर में भी चरितार्थ हुई और अंत में जब बेटा हुआ तो लगा मानो साक्षात स्वर्ग के द्वार खुल गए हों.

मांबाबूजी को उन का वह अनमोल हीरा मिल गया था जो उन की वृद्धावस्था को तारने वाला था. अपने हीरेमोती जैसे भाई को पा कर हम बहनों की खुशी का भी कोई ठिकाना नहीं था क्योंकि हर रक्षाबंधन और भाईदूज पर हमें ताऊजी के बेटों की राह देखनी पड़ती थी. अब वह औपचारिकता समाप्त हो गई थी. समय अपनी गति से बढ़ रहा था. हम तीनों बहनों की शादियां हो गईं. दोनों बड़ी बहनें अपने परिवार के साथ विदेश जा बसीं थी सो सालदोसाल में एक बार ही आ पातीं थी. न केवल भाई अनंत बल्कि हम बहनों को पढ़ाने लिखाने में भी मांबाबूजी ने कोई कसर नहीं छोड़ी थी. अब तक अनंत भी इंजीनियरिंग कर के दिल्ली में एक मल्टीनैशनल कंपनी में अच्छे पैकेज पर नौकरी करने लगा था. मैं भी यहां मुंबई में एक बैंक में कार्यरत थी.

भारतीय समाज में लड़केकी नौकरी लगते ही उस की बोली लगनी प्रारंभ हो जाती है सो अनंत के लिए भी रिश्तों की लाइन लगी थी. जब भी किसी लड़की का फोटो आता तो मांबाबूजी की खुशी देखते ही बनती थी. अपने बुढ़ापे का सुखमय होने का सपना देख रहे मांबाबूजी को उस समय तगड़ा झटका लगा जब एक बार अनंत छुट्टियों में घर आया और मांबाबूजी की लड़की देखने की तैयारी देख कर घोषणा की.

‘‘मां मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और उसी से विवाह करूंगा. आप लोग

नाहक परेशान न हों.’’ अनंत एक वाक्य में अपनी बात कह कर घर से बाहर निकल गया.

‘‘मांबाबूजी को काटो तो खून नहीं. मां कभी उस दरवाजे को देखतीं जहां से अभी अनंत निकल कर गया था और कभी बाबूजी को. अपने कानों सुनी बात पर वे भरोसा ही नहीं कर पा रहीं थीं. अचानक किए गए अनंत के इस विस्फोट से वे बुरी तरह घबरा गईं और फूटफूट कर रोने लगीं और बोली,’’ इसी दिन के लिए पैदा किया था इसे. इसे पता भी है कि कितने बलिदानों के बाद हम ने इसे पाया है. क्याक्या सपने संजोए थे बहू को ले कर, इस ने एक बार भी नहीं सोचा हमारे बारे में. बाबूजी शायद मामले की गंभीरता को भांप नहीं पाए थे या अपने बेटे पर अतिविश्वास को सो वे मां को दिलासा देते हुए बोले, ‘‘मैं समझाऊंगा उसे, बच्चा है, समझ जाएगा. सब ठीक हो जाएगा. यह सब क्षणिक आवेश है. मेरा बेटा है अपने पिता की बात अवश्य मानेगा.’’

मां को भी बाबूजी की बातों पर और उस से भी ज्यादा अपने बेटे पर भरोसा था. सो बोलीं, ‘‘हां तुम सही कह रहे हो मुझे लगता है मजाक कर रहा होगा. ऐसा नहीं कर सकता वह. हमारे अरमानों पर पानी नहीं फेरेगा हमारा बेटा.’’

चूंकि अगले दिन अनंत वापस दिल्ली चला गया था सो बात आईगई हो गई पर अगली बार जब अनंत आया तो बाबूजी ने एक लड़की वाले को भी आने का समय दे दिया. अनंत ने उन के सामने बड़ा ही रूखा और तटस्थ व्यवहार किया और लड़की वालों के जाते ही मांबाबूजी पर बिफर पड़ा.

‘‘ये क्या तमाशा लगा रखा है आप लोगों ने, जब मैं ने आप को बता दिया कि मैं एक लड़की से प्यार करता हूं और शादी भी उसी से करूंगा फिर इन लोगों को क्यों बुलाया. वह मेरे साथ मेरे ही औफिस में काम करती है. और यह रही उस की फोटो,’’ कहते हुए अनंत ने एक पोस्टकार्ड साइज की फोटो टेबल पर पटक दी.

अपने बेटे की बातों को किंकर्त्तव्यविमूढ़ सी सुन रहीं मां ने लपक कर टेबल से फोटो उठा ली. सामान्य से नैननक्श और सांवले रंग की लड़की को देख कर उन की त्यौरियां चढ़ गईं और बोलीं, ‘‘बेटा ये तो हमारे घर में पैबंद जैसी लगेगी. तुझे इस में क्या दिखा जो लट्टू हो गया.’’

‘‘मां मेरे लिए नैननक्श और रंग नहीं बल्कि गुण और योग्यता मायने रखते हैं और यामिनी बहुत योग्य है. हां एक बात और बता दूं कि यामिनी हमारी जाति की नहीं है,’’ अनंत ने कुछ सहमते हुए कहा.

‘‘अपनी जाति की नहीं है मतलब???’’ बाबूजी गरजते स्वर में बोले.

‘‘मतलब वह जाति से वर्मा हैं’’ अनंत ने दबे से स्वर में कहा.

‘‘वर्मा!!! मतलब!! सुनार!!! यही दिन और देखने को रह गया था. ब्राह्मण परिवार में एक सुनार की बेटी बहू बन कर आएगी… वाहवाह इसी दिन के लिए तो पैदा किया था तुझे. यह सब देखने से पहले मैं मर क्यों न गया. मुझे यह शादी कतई मंजूर नहीं,’’ बाबूजी आवेश और क्रोध से कांपने लगे थे. किसी तरह मां ने उन्हें संभाला.

‘‘तो ठीक है यह नहीं तो कोई नहीं. मैं आप लोगों की खुशी के लिए आजीवन कुंआरा रहूंगा.’’ अनंत अपना फैसला सुना कर घर से बाहर चला गया था. उस दिन न घर में खाना बना और न ही किसी ने कुछ खाया. प्रतिपल हंसीखुशी से गुंजायमान रहने वाले हमारे घर में ऐसी मनहूसियत छाई कि सब के जीवन से उल्लास और खुशी ने मानो अपना मुंह ही फेर लिया हो. विवाहित होने के बावजूद हम बहनों को भी इस घटना ने कुछ कम प्रभावित नहीं किया. मांबाबूजी का दुख हम से देखा नहीं जाता था और भाई अपने पर अटल था पर शायद समय सब से बड़ा मरहम होता है. कुछ ही माह में पुत्रमोह में डूबे मांबाबूजी को समझ आ गया था कि अब उन के पास बेटे की बात मानने के अलावा कोई चारा नहीं है. जिस घर की बेटियों को उन की मर्जी पूछे बगैर ससुराल के लिए विदा कर दिया गया था उस घर में बेटे की इच्छा का मान रखते हुए अंतर्जातीय विवाह के लिए भी जोरशोर से तैयारियां की गईं.

अनंत मांबाबूजी की कमजोर नस थी सो उन के पास और कोई चारा भी तो नहीं था. खैर गाजेबाजे के साथ हम सब यामिनी को हमारे घर की बहू बना कर ले आए थे. सांवली रंगत और बेहद साधारण नैननक्श वाली यामिनी गोरेचिट्टे, लंबे कदकाठी और बेहद सुंदर व्यक्तित्व के स्वामी अनंत के आसपास जरा भी नहीं ठहरती थी पर कहते हैं न कि ‘‘दिल आया गधी पे तो परी क्या चीज है?’’

एक तो बड़ा जैनरेशन गैप दूसरे प्रेम विवाह तीसरे मांबाबूजी की बहू से आवश्यकता से अधिक अपेक्षा, इन सब के कारण परिवार के समीकरण धीरेधीरे गड़बड़ाने लगे थे. बहू के आते ही जब मांबाबूजी ने ही अपनी जिंदगी से अपनी ही पेटजायी बेटियों को दूध की मक्खी की तरह निकाल फेंका था तो बेटेबहू के लिए तो वे स्वत: ही महत्वहीन हो गई थी. कुछ ही समय में बहू ने अपने तेवर दिखाने शुरू कर दिए थे.

अनंत और उस की पत्नी यामिनी को परिवार के किसी भी सदस्य से कोई मतलब नहीं था. कुछ समय पूर्व ही यामिनी की डिलीवरी होने वाली थी तब मांबाबूजी गए थे अनंत के पास. नवजात पोते के मोह में बड़ी मुश्किल से एक माह तक रहे थे दोनों तभी अनंत ने मुझ से उन्हें वापस भोपाल आने का उपाय पूछा था. मैं ने भी येनकेन प्रकारेण उन्हें दिल्ली से भोपाल वापस आने के लिए राजी कर लिया था.

अभी उन्हें आए कुछ माह ही हुए थे कि अचानक एक दिन बाबूजी को दिल का दौरा पड़ा और वे इस दुनिया से ही कूच कर गए पीछे रह गई मां अकेली. लोकलाज निभाते हुए अनंत मां को अपने साथ ले तो गया परंतु वहां के दमघोंटू वातावरण और यामिनी के कटु व्यवहार के कारण वे वापस भोपाल आ गईं और अब तो पुन: दिल्ली जाने से साफ इंकार कर दिया. सोने पे सुहागा यह कि अनंत और यामिनी ने भी मां को अपने साथ ले जाने में कोई रुचि नहीं दिखाई. मनुष्य का जीवन ही ऐसा होता है कि एक समस्या का अंत होता है तो दूसरी उठ खड़ी होती है.

अचानक एक दिन मां बाथरूम में गिर गईं और अपना हाथ तोड़ बैठीं. अनंत ने इतनी छोटी सी बात के लिए भोपाल आना उचित नहीं समझा बस फोन पर ही हालचाल पूछ कर अपने कर्त्तव्य की इतिश्री कर ली. दोनों बड़ी बहनें तो विदेश में होने के कारण यूं भी सारी जिम्मेदारियों से मुक्त थीं. बची मैं सो अनंत का रुख देख कर मेरे अंदर बेटी का कर्त्तव्य भाव जाग उठा. फ्रैक्चर के बाद जब मां को देखने गई तो उन्हें अकेला एक नौकरानी के भरोसे छोड़ कर आने की मेरी अंतआर्त्मा ने गवाही नहीं दी और मैं मां को अपने साथ मुंबई ले कर आ गई. मैं कुछ और आगे की यादों में विचरण कर पाती तभी मेरे कानों में अमन का स्वर गूंजा.

‘‘कहां हो भाई खानावाना मिलेगा… 9 बजने जा रहे हैं.’’ मैं ने अपने खुले बालों का जूड़ा बनाया और फटाफट किचन में जा पहुंची. देखा तो मां ने रात के डिनर की पूरी तैयारी कर ही दी थी बस केवल परांठे बनाने शेष थे. मैं ने फुर्ती से गैस जलाई और सब को गरमागरम परांठे खिलाए. सारे काम समाप्त कर के मैं अपने बैडरूम में आ गई. अमन तो लेटते ही खर्राटे लेने लगे थे पर मैं तो अभी अपने विगत से ही बाहर नहीं आ पाई थी. आज भी वह दिन मुझे याद है जब मां को देखने गई मैं वापस मां को अपने साथ ले कर लौटी थी. मुझे एअरपोर्ट पर लेने आए अमन ने मां के आने पर उत्साह नहीं दिखाया था बल्कि घर आ कर तल्ख स्वर में बोले,’’ ये सब क्या है विनू मुझ से बिना पूछे इतना बड़ा निर्णय तुम ने कैसे ले लिया.

‘‘कैसे मतलब… अपनी मां को अपने साथ लाने के लिए मुझे तुम से परमीशन लेनी पड़ेगी.’’ मैं ने भी कुछ व्यंग्यात्मक स्वर में उतर दिया था.

‘‘क्यों अब क्यों नहीं ले गया इन का सगा बेटा इन्हें अपने साथ जिस के लिए इन्होंने बेटी तो क्या दामादों तक को सदैव नजरंदाज किया.’’

‘‘अमन आखिर वे मेरी मां हैं… वह नहीं ले गया तभी तो मैं ले कर आई हूं. मां हैं वो मेरी ऐसे ही तो नहीं छोड़ दूंगी.’’ मेरी बात सुन कर अमन चुप तो हो गए पर कहीं न कहीं अपनी बातों से मुझे जता गए कि मां का यहां लाना उन्हें जंचा नहीं. इस के बाद मेरी असली परीक्षा प्रारंभ हो गई थी. अपने 20 साल के वैवाहिक जीवन में मैं ने अमन का जो रूप आज तक नहीं देखा था वह अब मेरे सामने आ रहा था.

घर आ कर सब से बड़ा यक्षप्रश्न था हमारे 2 बैडरूम के घर में मां को ठहराने का. 10 वर्षीय बेटी अवनि के रूम में मां का सामान रखा तो अवनि एकदम बिदक गई. अपने कमरे में साम्राज्ञी की भांति अब तक एकछत्र राज करती आई अवनि नानी के साथ कमरा शेयर करने को तैयार नहीं थी. बड़ी मुश्किल से मैं ने उसे समझाया तब कहीं मानी पर रात को तो अपना तकिया और चादर ले कर उस ने हमारे बैड पर ही अपने पैर पसार लिए कि ‘‘आज तो मैं आप लोगों के साथ सोउंगी भले ही कल से नानी के साथ सो जाउंगी.’’

पर जैसे ही अमन सोने के लिए कमरे में आए तो अवनि को बैडरूम में देख कर चौंक गए.

‘‘लो अब प्राइवेसी भी नहीं रही.’’

‘‘आज के लिए थोड़ा एडजस्ट कर लो कल से तो अवनि नानी के साथ ही सोएगी.’’ मैं ने दबी आवाज में कहा कि कहीं मां न सुन लें.

‘‘एडजस्ट ही तो करना है, और कर भी क्या सकते हैं.’’ अमन ने कुछ इस अंदाज में कहा मानो जो हो रहा है वह उन्हें लेशमात्र भी पसंद नहीं आ रहा पर उन्हें इग्नोर करने के अलावा मेरे पास कोई चारा भी नहीं था. मां को सुबह जल्दी उठने की आदत रही है सो सुबह 5 बजे उठ कर उन्होंने किचन में बर्तन खड़खड़ाने प्रारंभ कर दिए थे. मैं मुंह के ऊपर से चादर तान कर सब कुछ अनसुना करने का प्रयास करने लगी. अभी मेरी फिर से आंख लगी ही थी कि अमन की आवाज मेरे कानों में पड़ी.

‘‘विनू ये मम्मी की घंटी की आवाज बंद कराओ मैं सो नहीं पा रहा हूं.’’ मैं ने लपक कर मुंह से चादर हटाई तो मां की मंदिर की घंटी की आवाज मेरे कानों में भी शोर मचाने लगी. सुबह के सर्दी भरे दिनों में भी मैं रजाई में से बाहर आई और किसी तरह मां की घंटी की आवाज को शांत किया. जब से मां आईं मेरे लिए हर दिन एक नई चुनौती ले कर आता. 2 दिन बाद रात को जैसे ही मैं सोने की तैयारी कर रही थी कि अवनि ने पिनपिनाते हुए बैडरूम में प्रवेश किया.

‘‘मम्मी मैं नानी के पास तो नहीं सो सकती, वे इतने खर्राटे लेती हैं कि मैं सो ही नहीं पाती.’’ और वह रजाई तान कर सो गई. अमन का रात का कुछ प्लान था जो पूरी तरह चौपट हो गया था और वे मुझे घूरते हुए करवट ले कर सो गए थे बस मेरी आंखों में नींद नहीं थी. अगले दिन अमन को जल्दी औफिस जाना था पर जैसे ही वे सुबह उठे तो बाथरूम पर मां का कब्जा था उन्हें सुबह जल्दी नहाने का आदत जो थी. बाथरूम बंद देख कर अमन अपना आपा खो बैठे.

‘‘विनू मैं लेट हो जाऊंगा मम्मी से कहो हमारे औफिस जाने के बाद नहाया करें उन्हें कौन सा औफिस जाना है.’’

‘‘अरे औफिस नहीं जाना है तो क्या हुआ बेटा चाय तो पीनी है न और तुम जानते हो कि मैं बिना नहाए चाय भी नहीं पीती.’’ मां ने बाथरूम से बाहर निकल कर सफाई देते हुए कहा. जिंदगीभर अपनी शर्तों पर जीतीं आईं मां के लिए स्वयं को बदलना बहुत मुश्किल था और अमन मेरे साथ कोऔपरेट करने को तैयार नहीं थे. इस सब के बीच मैं खुद को तो भूल ही गई थी. किसी तरह तैयार हो कर लेटलतीफ बैंक पहुंचती और शाम को बैंक से निकलते समय दिमाग में बस घर की समस्याएं ही घूमतीं. इस से मेरा काम भी प्रभावित होने लगा था. मेरी हालत ज्यादा दिनों तक बैंक मैनेजर से छुपी नहीं रह सकी और एक दिन मैनेजर ने मुझे अपने केबिन में बुला ही भेजा.

‘‘बैठो विनीता क्या बात है पिछले कुछ दिनों से देख रही हूं तुम कुछ परेशान सी लग रही हो. यदि कोई ऐसी समस्या है जिस में मैं तुम्हारी मदद कर सकती हूं तो बताओ. अपने काम में सदैव परफैक्शन को इंपोर्टैंस देने वाली विनीता के काम में अब खामियां आ रही हैं इसीलिए मैं ने तुम्हें बुलाया.’’

‘‘नहीं मैम ऐसी कोई बात नहीं है बस कुछ दिनों से तबियत ठीक नहीं चल रही है. सौरी अब मैं आगे से ध्यान रखूंगी.’’ कह कर मैं मैडम के केबिन से बाहर आ गई. क्या कहूं मैडम से कि बेटियां कितनी भी पढ़ लिख लें, आत्मनिर्भर हो जाएं पर अपने मातापिता को अपने साथ रखने या उन की जिम्मेदारी उठाने के लिए पति का मुंह ही देखना पड़ता है.

एक पति अपनी पत्नी से अपने मातापिता की सेवा करवाना तो पसंद करता है परंतु सासससुर की सेवा करने में अपनी हेठी समझता है. समाज की इस दोहरी मानसिकता से अमन भी अछूता नहीं था. यदि वह चाहता तो मां के साथ भलीभांति तालमेल बैठा कर नित नई उत्पन्न होने वाली समस्याओं को काफी हद तक कम कर सकता था. यों भी हम दोनों मिल कर अब तक के जीवन में आई प्रत्येक समस्या का सामना करते ही आए थे परंतु जब से मां आई हैं अमन ने उसे अकेला कर दिया. बीती यादों को सोचतेसोचते कब उस की आंख लग गई उसे पता ही नहीं चला.

सुबह बैड के बगल की खिड़की के झीने परदों से आती सूरज की मद्धिम रोशनी और चिडि़यों की चहचहाहट से उस की नींद खुल गई. तभी अमन ने चाय की ट्रे के साथ कमरे में प्रवेश किया, ‘‘उठिए मैडम मेरे हाथों की चाय से अपने संडे का आगाज कीजिए.’’

‘‘ओह क्या बात है आज तो मेरा संडे बन गया,’’ मैं फ्रैश हो कर चाय का कप ले कर अमन के बगल में बैठ गई.

‘‘तो आज संडे का क्या प्लान है मैडम, मम्मी और अवनि भी आते ही होंगे.’’

‘‘मम्मा आज हम लोग वंडरेला पार्क चलेंगे फोर होल डे इंजौयमैंट. चलोगे न मम्मा और नानी भी हमारे साथ चलेंगी.’’ मां के साथ वाक करके  लौटी अवनि ने हमारी बातें सुन कर संडे का अपना प्लान बताया.

‘‘हांहां हम सब चलेंगे. चलो जल्दी से ब्रेकफास्ट कर के सब तैयार हो जाओ.’’ मेरे बोलने से पहले ही अमन ने घोषणा कर दी. पूरे दिन के इंजौयमैंट के बाद लेटनाइट जब घर लौटे तो सब थक कर चूर हो चुके थे सो नींद के आगोश में चले गए. मुझे लेटते ही वह दिन याद आ गया जब मां के आने के बाद एक दिन यूएस से अमन की मां ने फोन कर के बताया कि अगले हफ्ते वे इंडिया वापस आ रहीं हैं. 4 साल पहले अमन के पिता का एक बीमारी के चलते देहांत हो गया था. उस के बाद से उन की मां ने ही अपने दोनों बच्चों को पालपोस कर बड़ा किया. अमन 2 ही भाई बहन हैं जिन में दीदी की शादी एक एनआरआई से हुई तो वे विवाह के बाद से ही अमेरिका जा बसीं थी. पिछले दिनों उन की डिलीवरी के समय मम्मीजी वहां गई थीं और अब उन का वापसी का समय हो गया था सो आ रही थीं. दोनों बच्चे अपनी मां से बहुत अटैच्ड हैं. उस दिन मैं बैंक से वापस आई तो अमन का मुंह फूला हुआ था. जैसे ही मां सोसाइटी के मंदिर में गईं थी वे फट पड़े.

‘‘अब बताओ मेरी मां कहां रहेंगी? क्या सोचेंगी वे कि मेरे बेटे के घर में तो मेरे लिए जगह तक नहीं है. आखिर इंडिया में है ही कौन मेरे अलावा जो उन्हें पूछेगा. तुम्हारे तो और भाईबहन भी हैं मैं तो एक ही हूं न मेरी मां के लिए.’’

‘‘अमन थोड़ी शांति तो रखो, आने दो मम्मीजी को सब हो जाएगा. मैं ने कहां मना किया है उन की जिम्मेदारी उठाने से पर अपनी मां की जिम्मेदारी भी है मेरे ऊपर. यह कह कर कि और भाईबहन उन्हें रखेंगे अपने पास मैं कैसे अकेला छोड़ दूं उन्हें. आखिर मेरा भी पालनपोषण उन्होंने ही किया है.’’

मेरी इतनी दलीलों में से एक भी शायद अमन को पसंद नहीं आई थी और वे अपने फूले मुंह के साथ बैडरूम में जा कर टीवी देखने लगे थे. एक सप्ताह बाद जब सासू मां आईं तो मैं बहुत डरी हुई थी कि अब न जाने किन नई समस्याओं का सामना करना पड़ेगा. यद्यपि मैं अपनी सास की समझदारी की शुरू से ही कायल रही हूं. परंतु मेरी मां को यहां देख कर उन की प्रतिक्रिया से तो अंजान ही थी.

मैं ने सासूमां के रहने का इंतजाम भी मां के कमरे में ही कर दिया था जो अमन को पसंद तो नहीं आया था परंतु 2 बैडरूम में फ्लैट में और कोई इंतजाम होना संभव भी नहीं था. मेरी मां की अपेक्षा सासू मां कुछ अधिक यंग, खुशमिजाज समझदार और सकारात्मक विचारधारा की थीं. मेरी भी उन से अच्छी पटती थी. इसीलिए तो उन के आने के दूसरे दिन अवसर देख कर अपनी सारी परेशानियां बयां करते हुए रो पड़ी थी मैं.

उन्होंने मुझे गले लगाया और बोलीं, ‘‘तू चिंता मत कर मैं कोई समाधान निकालती हूं. सब ठीक हो जाएगा.’’ उन की अपेक्षा मेरी मां का जीवन के प्रति उदासीन और नकारात्मक होना स्वाभाविक भी था क्योंकि पहले बेटे की चाह में बेटियों की कतार फिर बेटेबहू की उपेक्षा आखिर इंसान की सहने की भी सीमा होती है. परिस्थितियों ने उन्हें एकदम शांत, निरुत्साही बना दिया था. वहीं सासूमां के 2 बच्चे और दोनों ही वैल सैटल्ड.

दोचार दिन सब औब्जर्व करने के बाद उन्होंने अपने साथ मां को भी मौर्निंग वाक पर ले जाना प्रारंभ कर दिया था. वापस आ कर दोनों एकसाथ पेपर पढ़ते हुए चाय पीतीं थी जिस से अमन और मुझे अपने पर्सनल काम करने का अवसर प्राप्त हो जाता था. दोनों किचन में आ कर मेड की मदद करतीं जिस से मेरा काम बहुत आसान हो जाता. जब तक मैं और अमन तैयार होते मां और सासूमां मेड के साथ मिल कर नाश्ता टेबल पर लगा लेते. हम चारों साथसाथ नाश्ता करते और औफिस के लिए निकल जाते. अपनी मां को यों खुश देख कर अमन भी खुश होते. कुल मिला कर सासूमां के आने से मेरी कई समस्याओं का अंत होने लगा था. सासूमां को देख कर मेरी मां भी पौजिटिव होने लगीं थी. एक दिन जब हम सुबह नाश्ता कर रहे थे तो सासूमां बोलीं, ‘‘विनीता आज से अवनि अपनी दादीनानी के साथ सोएगी. कितनी किस्मत वाली है कि दादीनानी दोनों का प्यार एक साथ लेगी क्यों अवनि.’’

‘‘हां मां, अब से मैं आप दोनों के नहीं बल्कि दादीनानी के बीच में सोऊंगी. उन्होंने मुझे रोज एक नई कहानी सुनाने का प्रौमिस किया है.’’ अवनि ने भी चहकते हुए कहा.

इस बात से अमन भी बहुत खुश थे क्योंकि उन्हें उन का पर्सनल स्पेस वापस जो मिल गया था. सासूमां के आने के बाद मैं ने भी चैन की सांस ली थी. और बैंक पर वापस ध्यान केंद्रित कर लिया था. अब 3 माह तक हमारे बीच रह कर सासूमां वापस कुछ दिनों के लिए दिल्ली चलीं गई थीं. पर इन 3 महीनों में उन्होंने मेरे लिए जो किया वह मैं ताउम्र नहीं भूल सकती. सच में इंसान अपनी सकारात्मक सोच और समझदारी से बड़ी से बड़ी समस्याओं को भी चुटकियों में हल कर सकता है जैसा कि मेरी सासूमां ने किया था. मां के मेरे साथ रहने पर भी उन्होंने खुशी व्यक्त करते हुए कहा था.

‘‘जब मेरी बेटी मेरा ध्यान रख सकती है तो मेरी बहू अपनी मां का ध्यान क्यों नहीं रख सकती और मुझे फक्र है अपनी बहू पर कि अपने 3 अन्य भाईबहनों के होते हुए भी उस ने अपनी जिम्मेदारी को समझा और निभाया.’’ तभी तो उन के जाने के समय मैं फफकफफक कर रो पड़ी थी और उन के गले लग के बोली थी, ‘‘मां जल्दी आना.’’

कैंसर का कहर, जिंदगी पर पड़ता बुरा असर

26 साल की नाइजीरिया की एक औरत जौन काल्जी को जब यह पता चला कि उसे ब्रैस्ट कैंसर है और उसे ठीक करने के लिए बच्चा गिराना पड़ेगा, तो वह सहम उठी, क्योंकि वह 6 महीने के पेट से थी और यह उस का पहला बच्चा था.

डाक्टर ने उसे बताया कि उस के दाएं स्तन में कैंसर है, जिस का आपरेशन बच्चे को बिना निकाले करना मुमकिन है.

कैंसर का नाम सुन कर ही ज्यादातर लोग डर जाते हैं. ऐसे में जौन काल्जी की 6 महीने की प्रैग्नैंसी थी, इसलिए ऐसी दशा में डाक्टरों ने उसे कैंसर के ट्यूमर का पहले आपरेशन करने की सलाह दी. उसे यह भी कहा गया कि आपरेशन के दौरान उस के बच्चे का भी ध्यान रखा जाएगा. एक अस्पताल में पूरी टीम ने आपरेशन पर काम किया और 9 महीने बाद उस ने एक सेहतमंद बच्चे को जन्म दिया.

आजकल औरतों में ब्रैस्ट कैंसर सब से ऊपर है. उस के बाद सर्विक्स का कैंसर पाया जाता है. ब्रैस्ट कैंसर का बढ़ना आज की मौडर्न लाइफस्टाइल का हिस्सा है. भारत में 14 औरतों में से एक औरत ब्रैस्ट कैंसर से पीडि़त है, जबकि पश्चिमी देशों में 8 औरतों में से एक औरत ब्रैस्ट कैंसर से पीडि़त है.

पहले भारत में 20 औरतों में से एक औरत को ही ब्रैस्ट कैंसर होता था. शहरों में इस की तादाद ज्यादा है, जबकि गांवों में कम. इस की वजह यह है कि आज शहरी औरतें अपने कैरियर को  ज्यादा तवज्जुह देती हैं. इस के चलते ज्यादा उम्र में शादी होती है. 30 साल की उम्र के बाद बच्चा पैदा होता है और बहुत सी तो बच्चे को अपना दूध भी नहीं पिलाती हैं.

इस बीमारी के होने पर औरतें मानसिक रूप से बहुत प्रभावित होती हैं. ब्रैस्ट हटाने के बाद उन्हें लगता है कि सब उन्हें देख रहे हैं. वे अपने कंधों को झुका कर चलती हैं. इस से स्पाइनल कौर्ड कई बार टेढ़ी हो जाती है, इसलिए मरीज की काउंसलिंग कर के उस के आत्मविश्वास को बढ़ाया जाता है.

ब्रैस्ट कैंसर में मरीज के परिवार और दोस्तों का जबरदस्त जुड़ाव होना चाहिए. कई बार पति से उस पीडि़त औरत को सताने की खबरें आती हैं, जबकि औरत सैक्सुअली पूरी तरह से फिट होती है. ऐसे में औरत अपनेआप को असुरक्षित महसूस करने लगती है.

डाक्टर किसी की लाइफस्टाइल को तो बदल नहीं सकते, इसलिए उसे प्लास्टिक सर्जरी के द्वारा कृत्रिम स्तन लगाने की सलाह देते हैं.

कैंसर कभी भी किसी को हो सकता है. इस के लिए वंशानुक्रम कोई माने नहीं रखता. शुरुआती जांच में अगर इस का पता लगा लिया जाता है, तो इलाज मुमकिन है.

आपरेशन के बाद मरीज को पहले 3 महीने, फिर 6 महीने और फिर एक साल बाद जांच के लिए आना पड़ता है. 5 साल तक अगर मरीज ठीक रहता है, तो कैंसर के दोबारा होने की संभावना बहुत कम हो जाती है. लिहाजा, कहीं भी किसी तरह की गांठ स्तन में होने पर तुरंत डाक्टर की सलाह लेनी चाहिए.

इस के बाद अगला कैंसर सर्विक्स का होता है, जो ज्यादातर एचपी वायरस की वजह से हो रहा है. इसे होने का डर मल्टीपल सैक्स करने वाली औरतों में ज्यादा है, इसलिए जो औरतें मल्टीपल पार्टनर के पास जाती हैं, उन्हें अपने पार्टनर को कंडोम का इस्तेमाल करने की सलाह देनी चाहिए, ताकि वे इस बीमारी से बच सकें. इस के इंजैक्शन भी बाजार में मिलते हैं. इस की 3 सूई अलगअलग समय के अंतराल पर लगा दी जाती हैं. फ्रांस में इसे 12 साल की उम्र में हर लड़की को लगा दिया जाता है, जबकि भारत में ऐसी जागरूकता की कमी है.

हमारे यहां नैतिकता का मतलब अब बदल चुका है. सर्विक्स का कैंसर लोअर और अपर क्लास के लोगों में ज्यादा है. औरतों को साल में एक बार पूरा चैकअप कराना चाहिए, ताकि वे किसी तरह की बीमारी से अपनेआप को बचा सकें.

मर्दों में हैड ऐंड नैक (सिर और गले) का कैंसर सब से ऊपर है. इस के बाद फेफड़े का कैंसर और फिर आंतड़ियों का कैंसर ज्यादा पाया जा रहा है. शरीर के किसी भाग में अगर कोई समस्या हो, तो डाक्टर की सलाह जरूर लेनी चाहिए. एक 26 साल के नौजवान को 18 किलोग्राम का ट्यूमर था, जिसे वह अपनी छाती में ले कर घूम रहा था.

लिहाजा, सभी तरह के तंबाकू, गुटका और पान पर पूरी तरह से पाबंदी होनी चाहिए. लेकिन राजनीतिक दबाव में आ कर कंपनी बंद हो कर भी खुल जाती हैं. डाक्टर कहते हैं कि तंबाकू और गुटके का सेवन जहर के बराबर है, जिसे हम पैसे दे कर बाजार से खरीदते हैं.

हैड ऐंड नैक कैंसर ज्यादातर 35 से 40 साल की उम्र के लोगों को हो रहा है, जो चिंता की बात है. इस के अलावा आंतड़ियों का कैंसर आज आम है, क्योंकि लोग घर का खाना कम खाते हैं. जंक फूड खाने से लोगों को कब्ज की शिकायत होने पर यह कैंसर हो सकता है, इसलिए खाने में रेशेदार चीजों और सब्जियों का इस्तेमाल करना बहुत जरूरी है.

मैं अपनी पत्नी को सारी खुशियां देना चाहता हूं, इसके लिए टिप्स बताएं

सवाल

मेरी उम्र 35 साल की हो चुकी है. कुछ हालात ऐसे रहे कि शादी पहले नहीं कर पाया. अब मेरी शादी तय हो गई है और लड़की की उम्र 26 साल है. मैं बहुत खुश हूं और चाहता हूं कि अपनी पार्टनर को भरपूर सुख दूं. मेरे मन में एक उलझन है कि रात में कितनी बार सैक्स करना चाहिए कि पार्टनर संतुष्ट हो?

आप का सवाल ऐसा है जो बहुत से लोगों के मन में आता है लेकिन वे खुल कर इस विषय पर बात नहीं कर पाते.

जवाब

यह सच है कि सैक्स एक ऐसी क्रिया है जो जरूरी होती है. शारीरिक संबंध बनाना भी एक तरह की ऐक्सरसाइज मानी जाती है. सैक्स शारीरिक और मानसिक रूप से अच्छा होता हैपर यह आप की सेहत पर निर्भर करता है क्योंकि हर किसी का स्वास्थ्य एक तरह का नहीं होता. किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य बहुत अच्छा होता हैतो किसी व्यक्ति का स्वास्थ्य उतना अच्छा नहीं होता. कई बार ऐसा भी होता है कि पुरुष एक बार सैक्स करने पर ही बहुत थक जाते हैं. ऐसे में उन्हें दूसरी बार सैक्स नहीं करना चाहिए क्योंकि इस से वे बहुत ज्यादा थक सकते हैं और उन के स्वास्थ्य पर असर पड़ सकता है.

कई महिलाएं एक बार सैक्स करने पर संतुष्ट नहीं हो पातींतो वे दोतीन बार शारीरिक संबंध बनाने की इच्छा रखती हैं. उस समय पुरुष सोचते हैं कि हमें रात में कितनी बार सैक्स करना चाहिए ताकि उन की पार्टनर संतुष्ट हो जाए. ऐसा कहीं नहीं लिखा कि एक रात में पुरुष कितनी बार सैक्स करेंहांजरूरी यह है कि आप उसे एंजौय करें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

मजबूरी: समीर को फर्ज निभाने का क्या इनाम मिला?

समीर एक कोने में चुपचाप बैठा हुआ था. उस की आंखों के आंसू बह कर सूख चुके थे. कुछ ही दूरी पर पड़ोसियों ने सर्दी के सितम को देख कर आग जलाने के लिए लकड़ियों का इंतजाम कर के आग जला दी थी. सामने ही एक टूटी खाट पर समीर की बेटी शाहीन की लाश पड़ी हुई थी, जिस के शरीर पर लिबास के नाम पर जगहजगह से फटापुराना एक सूट ही था.

समीर के पास ही बैठी उस की बीवी रजिया का रोना उस के कलेजे में तीर की तरह चुभ रहा था. घर में पासपड़ोस वालों की भीड़ बढ़ने लगी थी और औरतें लगातार रजिया को दिलासा दे रही थीं. देर रात से रोतीबिलखती रजिया के आंसू भी अब सूख चुके थे.

सुबह सूरज की किरणें धूप के रूप में समीर के आंगन में उतर चुकी थीं और शाहीन की मुरदा देह को न जाने कैसी तपिश देने की कोशिश कर रही थीं. धूप से सर्दी का सितम थोड़ा सा कम हो गया था, पर यह सब हुआ समीर की बेटी शाहीन के जाने के बाद. अगर उस के पास भी पहननेओढ़ने के लिए कुछ होता, तो शायद शाहीन जिंदा होती.

समीर ने लाख कोशिश की कि कहीं से पैसों का इंतजाम कर गरम कपड़े खरीद ले, लेकिन कुछ भी मुमकिन न हो सका. उस की झोंपड़ी भी ऐसी न थी कि ठंड से बचाव हो सके.

समीर अब उस दिन को कोस रहा था जब उस ने एक मासूम बच्चे की जान बचाने का फर्ज निभाया था. कितना खुश था वह अपनी बीवी रजिया और बेटी शाहीन के साथ.

समीर एक ईंटभट्ठे पर मजदूरी करता था. हर रोज उसे मजदूरी में ज्यादा रुपए तो नहीं मिल पाते थे, लेकिन फिर भी वह अपना और अपने परिवार का भरणपोषण किसी तरह सुकून से कर लेता था. उस के मजदूर साथी हमेशा यही कहते थे कि समीर जितना भी परेशान रहता हो, पर हमेशा हंसता ही रहता है, पर उस की खुशियों भरी जिंदगी में ऐसा बवाल मचा कि उस के चेहरे से हंसी हमेशा के लिए गायब हो गई.

समीर उस दिन भी हमेशा की तरह मजदूरी करने ईंटभट्ठे पर जा रहा था कि तभी उस ने देखा सामने की कालोनी से निकल कर एक बच्चा अपनी छोटी सी साइकिल चलाता हुआ सड़क पर आ गया था. शायद उस बच्चे की देखभाल करने वाली आया उसे छोड़ कर अंदर चली गई थी.

इन बड़े लोगों के ठाठ भी बड़े अजीब होते हैं कि अपने खुद के बच्चे को पालने के लिए भी इन्हें किसी और की जरूरत पड़ती है, शायद अपने पैसों का रुतबा दिखाने के लिए ये लोग ऐसा करते हैं.

तभी तेज बजते हौर्न से समीर का ध्यान सड़क की तरफ गया. एक ट्रक तेजी से उस बच्चे की ओर आ रहा था. समीर समझ गया कि उस बच्चे को बचाने के लिए शोर मचाना फुजूल है और वह उसे बचाने के लिए दौड़ पड़ा. जैसे ही वह बच्चे के करीब पहुंचा और उसे उठा कर दौड़ा कि तभी उसे ट्रक की एक जोरदार टक्कर लगी और उस के हाथ से बच्चा उछल कर दूर जा गिरा. समीर चीख पड़ा. उसे कुछ शोर सुनाई दिया और उस के बाद वह बेहोश हो गया.

जब समीर को होश आया तो उस के नथुनों में दवाओं की अजीब सी गंध भर गई. उस ने एक नजर कमरे के चारों ओर डाली और दीवार पर लगे खस्ताहाल कलैंडर से अंदाजा लगा लिया कि वह किसी सरकारी अस्पताल में है. तभी उस ने हिलने की कोशिश की, तो उस के शरीर में एक दर्द की लहर सी दौड़ गई. इस के बाद उसे बच्चे की याद आई.

कुछ ही पलों में कमरे में रजिया शाहीन को ले कर आ गई. रजिया के उलझे बाल और सूजी आंखें देख कर ऐसा लग रहा था कि वह कई रातों से सोई नहीं थी.

समीर को नहीं पता था कि वह कितने दिनों से अस्पताल में था और रजिया ने कैसे उस के इलाज के लिए पैसों का इंतजाम किया होगा. तभी उस के पैर में तेज दर्द उठा. उस ने पैर हिलाने की कोशिश की, तो पाया कि उस का पैर था ही नहीं. यह महसूस होते ही वह अंदर तक सिहर गया.

“मेरा पैर…” समीर के मुंह से बहुत ही मुश्किल से ये 2 शब्द निकले.

“ट्रक की टक्कर से आप का एक पैर कई जगह से फैक्चर हो गया था, जो किसी तरह से भी जुड़ने के हालात में नहीं था, लिहाजा हमें आप का पैर काट कर अलग करना पड़ा वरना शरीर में जहर फैलने की वजह से आप की जान भी जा सकती थी,” अंदर आते हुए एक डाक्टर ने बताया.

कुछ दिनों बाद ही समीर को अस्पताल से छुट्टी दे दी गई. घर के हालात बद से बदतर हो चुके थे. रजिया भी अब आसपड़ोस के घरों में चौकाबरतन करने लगी थी, जिस से जैसेतैसे गुजरबसर हो रही थी.

रजिया ने ही समीर को बताया कि ट्रक ड्राइवर ट्रक ले कर वहां से भाग गया था. उस बच्चे के मातापिता ने यह एहसान कर दिया था कि ऊंची पहुंच के चलते उसे उठा कर सरकारी अस्पताल में भरती करा दिया था, पर उस के बाद उन लोगों ने उस का हालचाल पूछने की भी जरूरत नहीं समझी और नातेरिश्तेदारों ने तो 2-4 दिन के बाद ही आना बंद कर दिया था कि कहीं कुछ देना न पड़ जाए.

समीर अब बैसाखियों के सहारे ही था. रजिया को देख कर उसे ऐसा लग रहा था जैसे उस ने खुद अपने हाथों उस की खुशियों और जवानी दोनों पर ग्रहण लगा दिया था. 26 साल की उम्र में वह 46 साल की लगने लगी थी. उस के शरीर में अब हड्डियों के अलावा कुछ भी नजर नहीं आ रहा था.

घर की हालत कुछ ज्यादा ही खराब हो चुकी थी. रजिया द्वारा कमाए गए रुपयों से जैसेतैसे दो वक्त का खाना ही मिल पा रहा था. इसी बीच समीर को घने अंधकार के बीच रोशनी की एक किरण चमकती दिखाई दी. पता चला कि सरकार की ओर से जरूरतमंदों और गरीबों के लिए कई योजनाएं शुरू कर दी गई हैं, जिस के लिए वह सभासद, चेयरमैन से ले कर विधायक और सरकारी अफसरों की चौखट के चक्कर लगाता रहा, लेकिन हर जगह उसे बस आश्वासन ही दिया गया कि जल्द ही आप को सरकारी सुविधाएं दे दी जाएंगी, पर उसे कुछ नहीं मिल पाया, क्योंकि वह किसी भी जांच अधिकारी को अपनी बेबसी और मजबूरी के अलावा और कुछ न दे सका.

इस बार की सर्दी समीर की परेशानियों को बढ़ाने आई थी. कड़ाके की सर्दी होने के बावजूद उस के पास गरम कपड़े के नाम पर कुछ भी नहीं था. और तो और उस की बेटी शाहीन के लिए भी कुछ नहीं था. रजिया ने बहुत कोशिश की थी कि गरम कपड़ों का इंतजाम हो सके, लेकिन कुछ न हो सका.

सर्दी का कहर सितम पर था. घना कोहरा और चल रही शीतलहर समीर के परिवार पर पूरी तरह से कहर बरपा कर रही थी. इसी बीच शाहीन को सर्दी ने अपने आगोश में ले लिया. रजिया जैसेतैसे पैसों का इंतजाम कर महल्ले के नीमहकीम डाक्टर से दवा ले कर शाहीन को खिला रही थी, लेकिन तबीयत में सुधार न होते देख उस डाक्टर ने भी हाथ खड़े कर दिए और शाहीन को किसी बड़े डाक्टर को दिखाने के लिए कहा, जिस के बाद समीर शाहीन के इलाज के लिए सरकारी अस्पताल भी गया, पर वहां भी सही इलाज न हो पाया, क्योंकि सरकारी डाक्टर बाहर की दवा ही लिख कर देते थे, जिन्हें खरीदने में वह पूरी तरह नाकाम था.

रजिया ने डाक्टर साहब से विनती भी की थी कि उस की बेटी को बाहर की दवा न लिख कर अंदर से ही दवा दे दी जाए, लेकिन डाक्टर ने उस की एक न सुनी.

समीर अपने बचपन के दोस्त शफीक से रुपए उधार लेने गया, लेकिन उस ने भी कामधंधा न चलने का बहाना बना कर उसे टाल दिया. वह बुझे मन से वापस चला आया. उस का मन कर रहा था कि इस से अच्छा तो वह उसी दिन मर गया होता, जब वह सड़क हादसा हुआ था.

आज जब समीर ने घर की चौखट पर कदम रखा तभी रजिया की जोर से रोने की आवाज सुनाई दी. उस ने अंदर जा कर देखा कि शाहीन अपना इलाज होने का इंतजार करतेकरते हमेशा के लिए सो गई थी. यह देख कर वह वहीं जमीन पर बैठ गया. वह खुद को ही शाहीन का कातिल समझ रहा है. उस के पास तो शाहीन के कफनदफन के लिए भी पैसे नहीं थे.

“अरे, यह सब कैसे हो गया… हमें तो पता ही नहीं चला. एक बार कुछ बताया तो होता,” तभी किसी के ऊंचे स्वर में बोलने की आवाज सुन कर समीर की तंद्रा टूटी.

समीर ने देखा कि महल्ले का सभासद किसी बड़े नेता को अपने साथ लाया था. उस नेता के साथ उस के कुछ कार्यकर्ता भी थे, जो रजिया से पूछ रहे थे. दूसरी ओर कुछ लोग मोबाइल फोन से धड़ाधड़ उन के फोटो खींच रहे थे.

“ये लो 5,000 रुपए और बच्ची के कफनदफन का इंतजाम करो,” उस नेता जैसे दिखने वाले आदमी ने पैसे समीर के हाथ में पकड़ा दिए.

‘निकल जाओ यहां से… कोई जरूरत नहीं यह सब दिखावा करने की और ले जाओ अपने ये रुपए…’ समीर का मन जोर से चीखने को कर रहा था, पर सामने पड़ी बेटी की लाश को देख कर उस की चीख न जाने कहां गुम हो गई थी.

प्रेरणा: क्या अंकिता ने अपने सपनों को दोबारा पूरा किया?

‘‘बड़ी मुद्दत हुई तुम्हारा गाना सुने. आज कुछ सुनाओ. कोई भी राग उठा लो,  बागेश्वरी, विहाग या मालकोश, जो इस समय के राग हैं,’’ रात का भोजन करने के बाद मनोहर लाल ने अंकिता से इच्छा व्यक्त की. वे बड़े लंबे समय के बाद अपनी बेटी और दामाद के यहां उन से मिलने आए थे.

इस से पहले कि अंकिता कुछ कहती, उस की 14 साल की बेटी चहक पड़ी, ‘‘सुना तो है कि मां बड़ा अच्छा गाती थीं, संगीत विशारद भी हैं, लेकिन मैं ने तो आज तक इन के मुख से कोई गाना नहीं सुना.’’

‘‘यह मैं क्या सुन रहा हूं? तुम तो इतना बढि़या गाती थीं. कुछ और समय लखनऊ में रहना हो गया होता तो तुम ने संगीत में निपुणता प्राप्त कर ली होती.’’

‘‘अभ्यास छूटे एक युग बीत गया. अब गला ही नहीं चलता. मेरे पास शास्त्रीय संगीत के अनेक कैसेट पड़े हैं, उन में से कोई लगा दूं?’’

‘‘नहीं, वह सब कुछ नहीं. इतने परिश्रम से सीखी हुई विद्या तुम ने गंवा कैसे दी? शाम 4 बजे के बाद कालेज से लौटती थीं तो जल्दीजल्दी कुछ नाश्ता कर रिकशे से भातखंडे कालेज चल देती थीं. वहां से लौटतेलौटते रात के साढ़े 7 बज जाते थे. थक जाने पर भी रियाज करती थीं. जाड़ों में रात जल्दी घिर आती है. तब मैं तुम्हें लेने साइकिल से कालेज पहुंचता था. उस ओर से रिकशे के पैसे बचाने के लिए तुम कितने उत्साह से पैदल ही उछलतीकूदती चली आती थीं. हम लोगों के कैसे कठिन दिन थे वे. वह सारी साधना धूल में मिल गई.’’

‘‘पिताजी, आप तो समझते नहीं. शादी के बाद बराबर तो असम में रहना पड़ा. उस पर नौकरी के आएदिन के तबादले और दौरे. उस अनजाने क्षेत्र में अकेली कलपती मैं क्या अभ्यास करती. मुझे तो हर समय डर लगा रहता था. आप ने देख तो लिया, इतने सालों के बाद आप आए हैं, लेकिन फिर भी इन का दौरे पर जाना जरूरी है.’’

‘‘यह तो नौकरी की विवशता है. इस में तुम दोनों क्या कर सकते हो? अकेलेपन की जो समस्या तुम ने उठाई, उस में तो संगीत या पुस्तकों से उत्तम और कोई साथी होता ही नहीं. अच्छा, यह बताओ कि तुम ने संगीत सीखा क्यों था?’’

‘‘मां और आप को शास्त्रीय संगीत का शौक था. जिस काम से आप लोग प्रसन्न हों उसे करने में हम सभी भाईबहनों को तब आनंद आता था.’’

‘‘यह सही नहीं है. रुचि न होने पर कहीं पुरस्कार जीते जाते हैं? अच्छा, अब कुछ शुरू करो.’’

‘‘पिताजी, घर में तानपूरा तक तो है नहीं.’’

‘‘कोई बात नहीं, बिना तानपूरे के भी चलेगा. किसी संगीत सभा में थोड़े ही गा रही हो?’’

कुछ देर शांत रहने के बाद अंकिता ने गला साफ कर के खांसा. तुहिना किलक उठी, ‘‘आज आईं मां पकड़ में.’’

कुछ गुनगुनाने के बाद अंकिता का स्वर उभरा :

‘कौन करत तोसों विनती पियरवा,

मानो न मानो मोरी बात.’

गाने की इस प्रथम पंक्ति को 3-4 बार दोहराने के बाद अंकिता ने राग के अंतरे को उठाया :

‘जब से गए मोरी सुधि हू न लीनी,

कल न परत दिनरात.’

लेकिन वह खिंच नहीं सका और अंकिता हताशा में सिर झटकते हुए चुप हो गई.

मनोहर लाल, जो आंखें बंद किए बेटी का गायन सुन रहे थे, बोले, ‘‘अगर मुझे ठीक याद है तो बागेश्वरी के इसी गीत पर तुम्हें अंतरविद्यालय संगीत समारोह में पुरस्कार मिला था. आज यह हालत है कि तुम यह भी भूल गईं कि बागेश्वरी में 2 स्वर कोमल लगते हैं. तुम ने तो उन की जगह शुद्ध स्वर लगा दिए. अंतरा भी तुम इसलिए नहीं खींच पाईं क्योंकि अभ्यास छूटा हुआ है.’’

‘‘अब क्या करूं, पिताजी?’’ अंकिता ने झींक कर कहा.

‘‘मेरी बात मानो तो एक तानपूरा खरीद लो. तुहिना अब बड़ी हो गई है. उसे तबला सिखवा दो. मैं सच कहता हूं कि यह जो तुम्हें हर समय बोरियत सी महसूस होती रहती है, सब दूर भाग जाएगी.’’

‘‘कोशिश करूंगी.’’

‘‘कोशिश नहीं, समझ लो कि यह तो करना ही है. लोग इस देश से प्रतिभा पलायन को ले कर हंगामा खड़ा करते हैं. लेकिन यहां तो प्रत्यक्ष प्रतिभा पराभव को देख रहा हूं. यह कहां तक उचित है?’’

अगले दिन अचल भी दौरे से लौट आए. उन्होंने जब तुहिना से अंकिता की छीछालेदर की बात सुनी तो अपने ससुर को सफाई देने लगे, ‘‘पिताजी, मैं ने तो न जाने कितनी बार इन से कहा कि अपने संगीत ज्ञान को नष्ट न होने दें और रुचि बनाए रखें. कैसेट तो घर में दर्जनों आ गए हैं लेकिन गाने के नाम पर हमेशा यही सुनने को मिला कि गला ही साथ नहीं देता. शायद अब आप के कहने का कुछ असर पड़े.’’

मनोहर लाल तो 4 दिन रहने के बाद लौट गए परंतु अपने पीछे बेटी के घर में मोटरकार के पीछे उठे धूल के गुबार जैसा वातावरण छोड़ गए. अंकिता खिसियानी बिल्ली की तरह कई दिनों तक बातबात पर नौकर और तुहिना पर बरसती रही.

अभी इस घटना को बीते एक पखवाड़ा भी नहीं हुआ था कि एक शाम चपरासी ने अंदर आ कर अंकिता को सूचना दी, ‘‘छोटे साहब आए हैं. साथ में उन की पत्नी भी हैं. उन को बैठक में बैठा दिया है.’’

‘‘ठीक किया. हम लोग अभी आते हैं. रसोई में चंदन से कहना कि कुछ खाने की चीजें और 4 गिलास शरबत बैठक में पहुंचा जाए.’’

ठीक है कहता हुआ चपरासी रसोईघर की ओर चला गया.

‘‘अभी नए असिस्टैंट इंजीनियर की नियुक्ति हुई है. शायद वही मिलने आए होंगे,’’ अचल ने अंकिता को बताया.

अचल और अंकिता ने बैठक में जा कर देखा कि एक आकर्षक युवा दंपती बैठे प्रतीक्षा कर रहे हैं. शुरुआती शिष्टाचार के बाद दोनों पुरुषों में तो बातचीत शुरू हो गई लेकिन आगंतुक महिला को चुप देख अंकिता ने उस से पूछा, ‘‘आप कहां की हैं?’’

‘‘मेरी ससुराल तो बरेली में है लेकिन मायका लखनऊ में है.’’

‘‘मैं भी लखनऊ की हूं. इसलिए तुम मुझे ‘दीदी’ कह सकती हो. वैसे तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘जी, सिकता.’’

फिर तो अंकिता ने उस से उस के महल्ले, स्कूल, कालेज आदि सभी के बारे में पूछ डाला. यह भी पता चला कि सिकता ने भी भातखंडे संगीत विद्यालय में संगीत की शिक्षा पाई थी.

‘‘जब भी खाली समय हुआ करे और मन न लगे तो मेरे पास चली आया करो. अब संकोच न करना.’’

‘‘खाली समय तो बहुत रहता है क्योंकि ये तो जब देखो तब दौरे पर जाते रहते हैं और मैं अकेली घर में पड़ी ऊबती रहती हूं. अकेले घर में गाया भी नहीं जा सकता. नौकरचाकर न जाने क्या सोचें?’’

अंकिता के मस्तिष्क में सहसा बिजली सी कौंधी. वह बोली, ‘‘हम लोगों के क्लब में एक महिला समिति भी है, जिस में अफसरों की पत्नियां या तो ताश खेलती रहती हैं या फिर कभी ‘हाउसी’. क्यों न हम दोनों मिल कर कालोनी की लड़कियों के लिए संगीत की कक्षाएं शुरू करें. तुम्हारा तो अभी सबकुछ नया सीखा हुआ है. तुम्हारे सहारे मैं भी अपने पुराने अभ्यास पर धार लगाने का प्रयास करूंगी.’’

‘‘सच दीदी, आप ने तो मेरी बिन मांगी मुराद पूरी कर दी. आप जैसा भी कहेंगी, मैं करती रहूंगी. आप शुरू तो करें,’’ सिकता उत्साह से चहक उठी.

अंकिता ने अपने प्रभाव से क्लब की महिला समिति में एक कमरे में संगीत कक्षाएं चालू करा दीं, लेकिन शुरूशुरू में तथाकथित संभ्रांत महिलाओं ने खूब नाकभौं सिकोड़ी. कुछ ने तो यहां तक कह डाला कि यह 4 दिन की चांदनी है, फिर तो टांयटांय फिस्स होना ही है.

परंतु अंकिता को यह सब सुनने की फुरसत नहीं थी. सिकता और स्वयं के अतिरिक्त उस ने एक अन्य अध्यापक तथा तबलावादक को वेतन दे कर 3 घंटे प्रतिदिन के लिए नियुक्त कर लिया. कालोनी से संगीत सीखने की इच्छुक 10-12 लड़कियां और महिलाएं भी एकत्र हो गईं.

सिकता को तो संगीत सिखाना सहज लगता था लेकिन अंकिता को कुछ कक्षाएं पढ़ाने के लिए पहले घर पर घंटों अभ्यास करना पड़ा. उस पर एक नशा सा छाया हुआ था और वह जीतोड़ परिश्रम में लगी हुई थी. महिला समिति के फंड के अलावा वह अपने पास से भी काफी धन संगीत विद्यालय के लिए खर्च कर चुकी थी.

अंकिता को जैसेजैसे संगीत विद्यालय की आलोचना सुनने को मिलती, वैसेवैसे उस का संकल्प और दृढ़ होता जाता. देखतेदेखते 2 साल के अंदर ही इस संगीत विद्यालय ने अपनी पहचान बनानी आरंभ कर दी. महल्ले में क्या, पूरे शहर में उस की चर्चा होने लगी.

जहां किसी सांस्कृतिक कार्यक्रम का आयोजन होता वहां संगीत विद्यालय की छात्राओं को भेजने के अनुरोध भी अंकिता को प्राप्त होने लगे. उस को इस से काफी आत्मसंतोष मिलता. वह इस तरह के सभी प्रस्तावों का स्वागत करती और हरेक कार्यक्रम को प्रस्तुत करने से पहले भाग लेने वाली छात्राओं को जम कर अभ्यास कराती. अधिकांश कार्यक्रमों का संचालन वह खुद ही करती.

क्लब में होली, तीज, ईद, दीवाली तथा राष्ट्रीय पर्वों पर होने वाले समारोहों में वह संगीत विद्यालय के विशेष कार्यक्रम रखती, जिन की सभी प्रशंसा करते. स्थानीय अखबारों में उन की रिपोर्ट छपती. कभीकभी आकाशवाणी और दूरदर्शन से भी निमंत्रण मिलने लगा.

अचल का जल्द ही होने वाला तबादला अंकिता को अब चिंतित करने लगा था क्योंकि इस स्थान पर उन के 4 साल पूरे हो चुके थे. उसे डर था कि कहीं उस के जाने के बाद विद्यालय बंद न हो जाए, इसलिए अंकिता ने संगीत विद्यालय की संचालन समिति के मुख्य पदों को पदेन रूप से परिवर्तित कर दिया था, जिस से किसी व्यक्ति विशेष के रहने अथवा न रहने से विद्यालय के संचालन पर प्रतिकूल प्रभाव न पड़े. स्थानीय वेतनभोगी अध्यापकों की संख्या भी बढ़ा दी थी. कुछ प्रमुख रुचिसंपन्न महिलाओं को उस ने विद्यालय का संरक्षक भी बना दिया था.

अचल अकसर अंकिता को खिजाते, ‘‘तुम तो अब पूरी तरह संगीत विद्यालय को समर्पित हो गई हो. कहीं ऐसा न हो कि मैं भी काट दिया जाऊं.’’

‘‘कैसी बात करते हैं. आप के ही सहयोग से तो मुझे सार्थक जीवन की ये घडि़यां देखने को मिली हैं.’’

‘‘मेरे कहने की तुम ने कब चिंता की? यह तो पिताजी की झिड़की का प्रभाव है.’’

‘‘सच, हमारे विद्यालय के कार्यक्रमों में बड़ा निखार आ रहा है. डर यही लगता है कि कहीं हमारे तबादले के बाद यह उत्साह ठंडा न पड़ जाए.’’

‘‘तुम ने नींव तो इतनी मजबूत डाली है कि अब उसे चलते रहना चाहिए.’’

‘‘क्यों जी, हम लोगों का तबादला 1-2 साल के लिए रुक नहीं सकता?’’

‘‘इस बार तबादला तरक्की के साथ होगा. उसे रुकवाना हानिकारक होगा. चिंता क्यों करती हो, जिस जगह भी जाएंगे, वहां एक नया विद्यालय शुरू किया जा सकता है.’’

‘‘यहां सब जम गया था. कहांकहां नए गड्ढे खोदें और पौधे रोपें.’’

‘‘तो क्या हुआ? अब तो माली निपुण हो गया है. फिर वहां तुम्हारा स्तर ऊंचा होने का भी तो लाभ मिलेगा. वहां कौन काट सकेगा तुम्हारी बात?’’

‘‘अब जो होगा, देखूंगी. पर जगहजगह तंबू गाड़ना मुझे भाता नहीं.’’

‘‘भई, हम लोग तो गाडि़या लुहार हैं. दिन में सड़क किनारे गाड़ी रोकी, कुदाल, खुरपी, हंसिए बनाए, बेचे और बढ़ चले. इस जीवन का अपना अलग रस है.’’

‘‘हर कोई आप की तरह दार्शनिक नहीं होता.’’

बात पर तो विराम लग गया परंतु अंकिता के मन की चंचलता बनी रही.

वसंतपंचमी के अवसर पर दूरदर्शन के प्रादेशिक प्रसारण में संगीत कार्यक्रम प्रस्तुत करने के प्रस्ताव को अंकिता ने स्वीकार तो कर लिया परंतु उस के लिए 2 गीत तैयार कराने में उसे और छात्राओं को बड़ा परिश्रम करना पड़ा. कार्यक्रम का सफल मंचन हो जाने पर उसे बड़ा संतोष मिला.

अंकिता अभी वसंत के कार्यक्रम की अपनी थकान उतार भी नहीं पाई थी कि उसे अपने पिता का पत्र मिला.

‘‘टीवी के प्रादेशिक कार्यक्रम में तुम्हारे विद्यालय द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम देखा. संचालिका के रूप में तुम्हें पहचान लिया. कार्यक्रम बहुत अच्छा था. मन बहुत प्रसन्न हुआ. लेकिन बेटी, एक बात याद रखना कि विद्या के क्षेत्र में प्रसाद वर्जित है.’’

पत्र पाने के बाद अंकिता आत्मसंतोष से भर उठी.

सैंडल : गुड्डी किशन की अनोखी जोड़ी

अपने बैडरूम के पीछे से किसी बच्ची के जोरजोर से रोने की आवाज सुन कर मैं चौंका. खिड़की से ?ांकने पर पता चला कि किशन की बेटी गुड्डी दहाड़ें मारमार कर रो रही थी.

मैं ने खिड़की से ही पूछा, ‘‘अरी लीला, छोरी क्यों रो रही?है?’’

इस पर गुड्डी की मां ने जवाब दिया, ‘‘क्या बताएं सरकार, छोरी इस दीवाली पर बहूरानी जैसे सैंडल की जिद कर रही है…’’ वह कुछ रुक कर बोली, ‘‘इस गरीबी में मैं इसे सैंडल कहां से ला कर दूं?’’

मैं अपनी ठकुराहट में चुप रहा और खिड़की का परदा गिरा दिया.

मैं ने जब से होश संभाला था, तब से किशन के परिवार को अपने खेतों में मजदूरी करते ही पाया था. जब 10वीं जमात में आया, तब जा कर सम?ा आया कि कुछ नीची जाति के परिवार हमारे यहां बंधुआ मजदूर हैं.

सारा दिन जीतोड़ मेहनत करने के बाद भी मुश्किल से इन्हें दो जून की रोटी व पहनने के लिए ठाकुरों की उतरन ही मिल पाती थी. इस में भी बेहद खुश थे ये लोग.

गुड्डी किशन की सब से बड़ी लड़की थी. भूरीभूरी आंखें, गोल चेहरा, साफ रंग, सुंदर चमकीले दांत, इकहरा बदन. सच मानें तो किसी ‘बार्बी डौल’ से कम न थी. बस कमी थी तो केवल उस की जाति की, जिस पर उस का कोई वश नहीं था. वह चौथी जमात तक ही स्कूल जा सकी थी.

अगले ही साल घर में लड़का पैदा हुआ तो 13 साल की उम्र में स्कूल छुड़वा दिया गया और छोटे भाई कैलाश की जिम्मेदारी उस के मासूम कंधों पर डाल दी गई.

दिनभर कैलाश की देखभाल करना, उसे खिलानापिलाना, नहलानाधुलाना वगैरह सबकुछ गुड्डी के जिम्मे था. कैलाश के जरा सा रोने पर मां कहती, ‘‘अरी गुड्डी, कहां मर गई? एक बच्चे को भी संभाल नहीं सकती.’’

बेचारी गुड्डी फौरन भाग कर कैलाश को उठा लेती और चुप कराने लग जाती. इस काम में जरा सी चूक होने पर लीला उसे बड़ी बेरहमी से पीटती. फिर भी वह सारा दिन चहकती रहती. शायद बेटी होना ही उस का जुर्म था.

मेरी शादी के बाद ‘ऊंची एड़ी के सैंडल’ पहनना गुड्डी का सपना सा बन गया था. गृहप्रवेश की रस्म के समय उस ने मेरी बीवी के पैरों में सैंडल देख लिए थे. बस, फिर क्या था, उस ने मन ही मन ठान लिया था कि अब तो वह सैंडल पहन कर ही दम लेगी.

उस की सोच का दायरा बस सैंडल तक ही सिमट कर रह गया था.

गुड्डी कभीकभार हमारी कोठी में आया करती थी. एक बार की बात है कि वह अपने हाथ में मुड़ातुड़ा अखबार का टुकड़ा लिए इठलाती हुई जा रही थी.

मैं ने पूछ लिया, ‘‘गुड्डी, क्या है तेरे हाथ में?’’

वह चुप रही. मैं ने मांगा तो कागज का टुकड़ा मु?ो थमा दिया. मैं ने अखबार का पन्ना खोल कर देखा तो पाया कि वह सैंडल का इश्तिहार था, जिसे गुड्डी ने सहेज कर अपने पास रखा था.

मैं ने अखबार का टुकड़ा उसे वापस दे दिया. वह लौट गई. इस से पहले भी कमरे में ?ाड़ू लगाते समय मैं ने एक बार उसे अपनी बीवी के सैंडल पहनते हुए देख लिया था.

मेरे कदमों की आहट सुन कर गुड्डी ने फौरन उन्हें उतार कर एक ओर सरका दिया. मैं ने भी बचकानी हरकत जान कर उस से कुछ नहीं कहा.

गुड्डी की जिद को देख कर मन तो मेरा भी बहुत हो रहा था कि उसे एक जोड़ी सैंडल ला दूं. मगर मांबाबूजी के आगे हिम्मत न पड़ती थी, अपने मजदूरों पर एक धेला भी खर्च करने की.

बाबूजी इतने कंजूस थे कि एक बार गांव के कुछ लोग मरघट की चारदीवारी के लिए चंदा मांगने आए थे तो उन्हें यह कह कर लौटा दिया, ‘‘अरे बेवकूफो, ऐसी जगह पर चारदीवारी की क्या जरूरत है, जहां जिंदा आदमी तो जाना नहीं चाहता और मरे हुए उठ कर आ नहीं सकते.’’

बेचारे गांव वाले अपना सा मुंह ले कर लौट गए. गुड्डी को कुछ ला कर देना तो दूर की बात है, हमें उस से बात करने तक की इजाजत नहीं थी.

हमारे घरेलू नौकरों तक को नीची जाति के लोगों से बात करने की मनाही थी. गांव में उन के लिए अलग कुआं, अलग जमीन पर धान, सागसब्जी उगाने का इंतजाम था.

वैसे तो किशन की ?ोंपड़ी हमारी कोठी से कुछ ही दूरी पर थी, मगर उस के परिवार में कितने लोग हैं, इस का मु?ो भी अंदाजा नहीं था.

मैं राजस्थान यूनिवर्सिटी से बीकौम का इम्तिहान पास कर वकालत पढ़ने विलायत चला गया. वहां भी गुड्डी मेरे लिए एक सवाल बनी हुई थी.

देर रात तक नींद न आने पर जब

घर के बारे में सोचता तो गुड्डी के सैंडल की याद ताजा हो उठती. मैं मन ही मन उसे अपने परिवार का सदस्य मान चुका था.

4 साल कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला. मैं ने वकालत की पढ़ाई पूरी कर ली थी. अब बात आगे काम सीखने की थी, जो मैं यहां अपने देश में ही करना चाहता था. इधर पिताजी ने जोधपुर हाईकोर्ट में अपने वकील दोस्त भंडारी

से मेरे बारे में बात कर ली थी इसलिए मैं भारत लौट रहा था.

चंद रोज बाद ही मैं मुंबई एयरपोर्ट पर था. एयरपोर्ट से रेलवे स्टेशन करीब डेढ़ किलोमीटर दूर था. 4 साल तक विदेश में रहने के बावजूद भी मैं मांबाबूजी के खिलाफ जाने की हिम्मत तो नहीं जुटा पाया था, फिर भी किसी तरह उन्हें मनाने का मन बना लिया था.

ट्रेन के आने में अभी 5 घंटे का समय था, इसलिए रिकशे वाले को जूतों की किसी अच्छी सी दुकान पर ले चलने को कहा. वहां से गुड्डी के लिए एक जोड़ी सैंडल खरीदे और रेलवे स्टेशन पहुंच गया.

कुली ने सारा सामान टे्रन में चढ़ा दिया. मैं ने सैंडल वाली थैली अपने हाथ में ही रखी. यह थैली मु?ो अपने मन की पोशाक जान पड़ती थी, जिस के सहारे मैं ऊंचनीच का भेद भुला कर पुण्य का पापड़ सेंकने की फिराक में था.

मेरा गांव रायसिंह नगर मुंबई से तकरीबन 800 किलोमीटर दूर था. आज बड़ी लाइन के जमाने में भी वहां तक पहुंचने में 20 घंटे लग जाते हैं और

3 बार ट्रेन बदलनी पड़ती है.

आजादी से 2 साल पहले तो 3 दिन और 2 रातें सफर में ही गुजर जाती थीं. अगले दिन शाम तकरीबन 5 बजे मैं थकाहारा गांव पहुंचा.

गांव में त्योहार का सा माहौल था. पूरा गांव मेरे विदेश से लौटने पर खुश था. गांवभर में मिठाइयां बांटी जा रही थीं. सभी के मुंह पर एक ही बात थी, ‘‘छोटे सरकार विदेश से वकालत पढ़ कर लौटे हैं.’’

मैं बीकानेर इलाके का पहला वकील था. उस जमाने में वकील को लोग बड़ी इज्जत से देखते थे.

घर पहुंचने पर बग्घी से उतरते ही मैं ने किशन की ?ोंपड़ी की ओर एक नजर डाली, मगर वहां गुड्डी नहीं दिखाई दी.

रात 9 बजे के बाद माहौल कुछ शांत हुआ. पर मेरा पूरा बदन टूटा जा रहा था. खाना खाया और दर्द दूर करने की दवा ले कर सो गया.

अगले दिन सुबह 9 बजे के आसपास मेरी आंख खुली. श्रीमतीजी मेरा सूटकेस व दूसरा सामान टटोल रही थीं. उस ने अपने मतलब की सभी चीजें निकाल ली थीं, जो मैं उस के लिए ही लाया था. यहां तक कि मां की साड़ी, पिताजी के लिए शाल, छोटे भाईबहनों के कपड़े वगैरह सबकुछ मेरे जगने से पहले ही बंट चुके थे. पर सैंडल वाली थैली नदारद थी.

मैं ने सोचा कि सुधा ने अपना सम?ा कर कहीं रख दी होगी.

दोपहर के खाने के बाद मैं ने सोचा कि अब गुड्डी के सैंडल दे आऊं. उसे बड़ी खुशी होगी कि बाबूजी परदेश से मेरे लिए भी कुछ लाए हैं.

मैं ने अपनी बीवी से पूछा, ‘‘सुधा, वह लाल रंग की थैली कहां रख दी, जिस में सैंडल थे?’’

सुधा ने जवाब दिया, ‘‘ऐसी तो कोई थैली नहीं थी आप के सामान में.’’

मैं ने फिर कहा, ‘‘अरे यार, मुंबई

से लाया था. यहींकहीं होगी. जरा गौर

से देखो.’’

सुधा ने सारा सामान उलटपुलट कर दिया, मगर वह लाल रंग की थैली कहीं नहीं मिली.

काफी देर के बाद याद आया कि अजमेर रेलवे स्टेशन पर एक आदमी बड़ी देर से मेरे सामान पर नजर गड़ाए था, शायद वही मौका पा कर ले गया होगा. यह बात मैं ने सुधा को बताई

तो वह बोली, ‘‘चलो अच्छा ही हुआ. किसी जरूरतमंद के काम तो आएगी. वैसे भी मेरे पास तो 6-7 जोड़ी सैंडल पड़े हैं.’’

इस पर मैं ने कहा, ‘‘अरी सुधा, वह मैं तुम्हारे लिए नहीं गुड्डी के लिए

लाया था.’’

गुड्डी का नाम सुनते ही सुधा सिसकने लगी. उस की आंखें भीग गईं. वह बोली, ‘‘किसे पहनाते, गुड्डी को मरे तो 4 महीने हो गए.’’

सुधा की पूरी बात सुन कर मैं भी रो पड़ा. सुधा ने बताया कि मेरे जाने के एक साल बाद ही बेचारी गरीब को एक ऐयाश शराबी के साथ ब्याह दिया गया. उम्र में भी वह काफी बड़ा था. गुड्डी लोगों के घरों में ?ाड़ूपोंछा कर जो भी 2-4 रुपए कमा कर लाती, उसे भी वह मारपीट कर ले जाता.

चौबीसों घंटे वह शराब पी कर पड़ा रहता था. बहुत दुखी थी बेचारी. फिर भी उस ने अपने सपने को ज्यों का त्यों संजो कर रखा था. करीब 4 महीने पहले बड़ी मुश्किल से छिपछिपा कर बेचारी ने 62 रुपए जोड़ लिए थे.

करवाचौथ के दिन गांव में हाट लगा था, जहां से गुड्डी अपना सपना खरीद कर लाई थी. उसे क्या पता था कि यह सपना ही उस के लिए काल बन जाएगा.

गुड्डी ने हाट से वापस आ कर सैंडल ऊपर के आले में रखे थे. एक बार पहन कर देखे तक नहीं कि कहीं मैले न हो जाएं.

शाम को न जाने कहां से उस के पति की नजर सैंडल पर पड़ गई. कहने लगा, ‘‘बता चुड़ैल, कहां से लाई इतने पैसे? किस के साथ गई थी?’’ और लगा उसे जोरजोर से पीटने.

गुड्डी पेट से थी. उस ने एक लात बेचारी के पेट पर दे मारी. वही लात उस के लिए भारी पड़ गई. उस की मौत हो गई. उस का पति आजकल जेल में पड़ा सड़ रहा है.

यही थी गुड्डी की दर्दभरी कहानी, जिसे सुन कर कोई भी रो पड़ता था.

पर अब न गुड्डी थी, न गुड्डी का सपना.

समझौता : क्या जूही ने खुद के साथ समझौता किया?

डाक्टर के हाथ से परचा लेते ही जूही की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा. बेचारी आज बहुत परेशान थी. होती भी क्यों न, मां को कैंसर की बीमारी जो थी. इधर 6 महीने से तो उन की सेहत गिरती ही जा रही थी. वे बेहद कमजोर हो गई थीं.

पिछले महीने मां को अस्पताल में भरती कराना पड़ा. ऐसे में पूरा खर्चा जूही के ऊपर आ गया था. मां का उस के अलावा और कौन था. पिता तो बहुत पहले ही चल बसे थे. तब से मां ने ही जूही और उस के दोनों भाइयों को पालापोसा था.

तभी जूही के कानों में मां की आवाज सुनाई दी, ‘‘बेटी जूही, जरा पानी तो पिला दे. होंठ सूखे जा रहे हैं मेरे.’’

अपने हाथों से पानी पिला कर जूही मां के पैर दबाने लगी. परचा पकड़ते ही वह परेशान हो गई, ‘अब क्या करूं?’

रिश्तेदारों ने भी धीरेधीरे उन से कन्नी काट ली थी. जैसेजैसे वक्त बीतता जा रहा था, खर्चे तो बढ़ते ही जा रहे थे. सबकुछ तो बिक गया था. अब क्या था जूही के पास?

तभी जूही को सुभाष का ध्यान आया. उस की परचून की दुकान थी. वह शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. जूही उस की दुकान की तरफ चल दी.

सुभाष जूही को देख कर चौंका और उस के अचानक इस तरह से आने की वजह पूछी, ‘‘आज मेरी याद कैसे आ गई?’’ कह कर सुभाष उस की कमर पर हाथ फेरने लगा.

जूही ने कहा, ‘‘वह… लालाजी… मां की तबीयत काफी खराब है. मैं आप से मदद मांगने आई हूं. दवा तक के पैसे नहीं हैं मेरे पास,’’ कहते हुए वह हिचकियां ले कर रोने लगी.

जूही की मजबूरी में सुभाष को अपनी जीत नजर आई, ‘‘बोल न क्या चाहती है? मैं तो हर वक्त तैयार हूं. बस, तू मेरी इच्छा पूरी कर दे,’’ बोलते हुए सुभाष ने उस की तरफ ललचाई नजरों से ऐसे देखा, जैसे कोई गिद्ध अपने शिकार को देखता है.

जूही सुभाष की आंखों में तैर रही हवस को पढ़ चुकी थी. वह तो खुद ही समर्पण के लिए आई थी. हालात से हार मान कर वह उस के सामने जमीन पर बैठ गई. आखिर चारा भी क्या था, उस के पास सम?ौते के सिवा. जीत की खुशबू पा कर सुभाष की हवस दोगुनी हो गई थी. उस ने अपने मन की कर डाली.

थोड़ी देर बाद सुभाष ने जूही को रुपए देते हुए कुटिल मुसकराहट के साथ कहा, ‘‘कभी भी, कैसी भी जरूरत हो, मैं तुम्हारी मदद के लिए तैयार हूं. बस, एक रात के लिए तू मेरे पास आ जाना.’’

खुद को ठगा हुआ महसूस करते हुए जूही वापस अस्पताल आ गई. उस ने दवा और अस्पताल के बिल चुकाए. वह मन ही मन सोच रही थी, ‘आज तो मैं ने सम?ौता कर के मां की दवाओं का इंतजाम कर दिया, लेकिन अब आगे क्या होगा?’

यही नहीं, जूही को अपने दोनों भाइयों की पढ़ाई और खानेपीने के खर्च की भी चिंता सताने लगी थी.

अब जब भी पैसों की जरूरत होती, जूही सुभाष के पास चली जाती और कुछ दिन के लिए परेशानी आगे टल जाती. वह अकसर अपने को दलदल में फंसा हुआ महसूस करती, लेकिन जानती थी कि रुपएपैसे के बिना गुजारा नहीं है.

धीरेधीरे मां की सेहत में सुधार होने लगा. भाइयों की पढ़ाई भी पूरी हो गई. नौकरी मिलते ही दोनों भाइयों ने अपनीअपनी पसंद की लड़कियों से शादी कर ली.

मां ने जब भाइयों से घर की जिम्मेदारी लेने को कहा, तो उन्होंने खर्चा देने से मना कर दिया. अपनी जिम्मेदारियों से मुंह मोड़ कर वे अलग हो गए.

घर का खर्च, मां की बीमारी, डाक्टर की फीस व दवाओं का खर्च… इन जिम्मेदारियों को निभाने के लिए जूही को बस एक सहारा दिखता था सुभाष.

लेकिन, जूही अब थक कर टूट चुकी थी. एक दिन मां ने उसे उदास देखा तो वे पूछे बिना न रह सकीं, ‘‘क्या हुआ आज तुझे? तू इतनी चुप क्यों हैं?’’ और उस की पीठ पर प्यार भरा हाथ फेरा.

जूही सिसकसिसक कर रोने लगी. वह मां से लिपट कर बहुत रोई. मां हैरान भी हुईं और परेशान भी, क्योंकि सिर्फ वे ही जानती थीं कि जूही ने इस घर के लिए क्याक्या कुरबानियां दी हैं.

कुछ दिन बाद जूही की मां हमेशा के लिए इस दुनिया से चली गईं. उन के जाने के बाद जूही बहुत अकेली रह गई. इधर सुभाष को भी उस में कोई खास दिलचस्पी नहीं रह गई थी. जिस मकान में जूही रहती थी, वह भी बिक गया. सब सहारे साथ छोड़ कर जा चुके थे.

जूही ने एक कच्ची बस्ती में एक छोटा सा कमरा किराए पर ले लिया और लोगों के घरों में रोटी बनाने लगी. रोज सपने बुनती, जो सुबह उठने तक टूट जाते थे, फिर भी उस ने हिम्मत नहीं हारी. पर शरीर भी कब तक साथ देता.

अब जूही बीमार रहने लगी थी. तेज बुखार होने की वजह से एक दिन सांसें थमीं तो दोबारा चालू ही नहीं हो पाईं. आज उस ने फिर एक नया सम?ौता किया था मौत के साथ. वह मौत के आगोश में हमेशाहमेशा के लिए चली गई थी…

A टू Z: जाने सेक्स के बारे में सबकुछ

सेक्स हमारे जीवन का एक अहम हिस्सा होता है. सेक्स का नाम सुनते ही सभी लोगों का मन रोमांच से भर जाता है. आप पहली बार सेक्स कर रहें हों या इसको कई बार कर चुके हों, परंतु आपके मन में सेक्स को लेकर कई तरह के सवाल होते हैं. कई लोग सेक्स को सुरक्षित बनाने के तरीके खोजते हैं और दूसरी ओर कुछ लोग सेक्स को रोमांचक करने के उपाय जानना चाहते हैं. सेक्स को लेकर लोगों के मन में विभिन्न प्रकार के सवाल उठते हैं, लेकिन सेक्स करने के तरीके को लेकर सबसे अधिक सवाल होते हैं. आपके इसी सवाल के जवाब को नीचे विस्तार पूर्वक बताया जा रहा है.

योनि सेक्स (सेक्सुअल इंटरकोर्स) क्या है     

योनि के माध्यम से की गई संभोग क्रिया को ही योनि सेक्स कहा जाता है. इसमें महिलाओं की योनि को सेक्स के केंद्र में रखा जाता है और पुरुष सेक्स के दौरान अपनी सभी क्रिया को इसी अंग में करता है.

आम तौर से एक पुरुष और महिला के बीच सेक्स को ही “सेक्सुअल इंटरकोर्स” (Sexual Intercourse) कहा जाता है. इसमें पुरुष का उत्तेजित लिंग महिला की योनि में प्रवेश करता है. सेक्सुअल इंटरकोर्स यौन सुख या बच्चा पैदा करने के लिए किये जाता है.

भारत में 18 वर्ष से कम आयु के व्यक्ति के साथ सेक्स (संभोग) करना गैर कानूनी है. चाहे उनकी यौन सहमति हो भी, आप जिनके साथ यौन सम्बन्ध बनाना चाहते हैं, उनकी उम्र 18 से ज्यादा होना कानूनी तौर से अनिवार्य है.

सेक्स करने का तरीका

सेक्स वैसे तो कई तरीकों से किया जा सकता है. लेकिन हम यहां पर सामान्य तरह के सेक्स, यानी एक पुरुष और महिला के बीच लिंग और योनि के मिलन (सेक्सुअल इंटरकोर्स) की बात कर रहें. सेक्सुअल इंटरकोर्स का कोई एक निश्चित तरीका नहीं है, मगर फिर भी आप इसको करने से पहले कई तरह की तैयारियां कर सकते हैं.

इसको करने के लिए सबसे जरूरी बात यह है कि इसमें शामिल होने वाले दोनों ही साथी सेक्स को लेकर उत्साहित हों और साथ ही साथ इस क्रिया में किसी पर कोई दबाव न हो. अगर आप दोनों इस क्रिया का पूरा आनंद लेना चाहते हैं, तो आप दोनों को एक दूसरे की सहमति लेना बेहद जरूरी होता है. इसमें साथी की सहमति व उसके विचार जान लेना बेहद ही जरूरी होता है.

आइये आगे आपको बताएं सेक्स करने का तरीका –

  1. सेक्स करने का तरीका है पहले फोरप्ले करना

फोरप्ले एक ऐसी क्रिया है जिसको सेक्स से पहले किया जाता है. इसमें पुरुष और महिला एक दुसरे के शरीर को सेक्स करने के लिए तैयार करते हैं. इसमें किस करना, प्यार से छूना व महिला के संवेदनशील अंगों को जीभ से छूने की क्रिया को शामिल किया जाता है.

इससे महिलाओं की योनि में प्राकृतिक सेक्स लुब्रिकेंट बनना शुरू हो जाता है, जबकि पुरुष के लिंग में उत्तेजना आ जाती है. इन सभी संकेतों से पता चलता है कि महिला व पुरुष दोनों ही सेक्स के लिए तैयार हो गए हैं. फोरप्ले करने से दोनों जल्द ही यौन संबंध के चरम सुख के एक नए शिखर पर पहुंच जाते हैं. इस तरह सेक्स के दौरान फोरप्ले अहम भूमिका निभाता है.

  1. सेक्स कैसे भी करें लेकिन कंडोम जरूर लगाएं

सेक्स के लिए पुरुषों को कंडोम का इस्तेमाल करना चाहिए. लिंग और योनि के संपर्क में आने से पहले पुरुष को लिंग पर कंडोम लगा लेना चाहिए. इससे दोनों के लिए यौन संचारित रोग होने की संभावना कम हो जाती है. साथ ही, कंडोम का इस्तेमाल एक अच्छा अनचाहा गर्भ रोकने का उपाय है.

पुरुषों को स्खलन से पूर्व व महिला के साथ सेक्स करने से पूर्व कंडोम का उपयोग करना चाहिए. अगर आपकी महिला साथी सेक्स से पूर्व कंडोम का इस्तेमाल चाहती हैं तो उनको करीब आठ घंटे पहले इसका उपयोग करना होगा.

  1. सेक्स करने की सही पोजीशन का चयन करें

सेक्स को करने के लिए कई तरह की सेक्स पोजीशन को अपनाया जा सकता है. लेकिन यह कहना सही नहीं होगा कि कोई निश्चित सेक्स पोजीशन या सेक्स आसन सभी को आनंद प्रदान करने वाला होता है. सामान्यतः सेक्स के दौरान यह देखा जाता है कि महिला नीचे लेट जाती है और पुरुष उनके ऊपर लेटते हुए सेक्स करते हैं. इस पोजीशन को मिशनरी पोजीशन भी कहते हैं. अधिकतर दम्पति इस तरह की पोजीशन को ही अपनाते हैं.

इसके अलावा सेक्स पोजीशन में महिलाओं को पुरुषों के ऊपर आने वाली भी कई तरह की पोजीशन है. इसके अतिरिक्त दोनों साथियों का साथ में एक दूसरे की साइड व आगे-पीछे लेटने वाली आदि कई तरह की पोजीशन होती है. सही पोजीशन या सेक्स आसन को अपनाने के लिए दोनों ही साथियों को अपनी सहजता पर गौर करना होगा, जिसमें आप दोनों ही सहज महसूस करते हों वही पोजीशन आपके लिए सही रहेगी.

सेक्स आसन में अपने साथी को प्यार से छूने व करीब आने के अहसास से आप दोनों को चरम अवस्था तक पहुंचने में आसानी होती है. अगर साथी इस क्रिया में सहज न हो पा रहीं हों तो आप परेशान न हो, क्योंकि कई बार साथी को स्थिति को समझने व अपनाने में थोड़ा समय जरूर लगता है. एक बार आपका साथी आपके साथ सेक्स में सहज हो जाए, तो आप किसी अन्य पोजीशन को अपनाने पर भी विचार कर सकते हैं. सेक्स के रोमांच को बढ़ाने के लिए आप सेक्स टौय, एनल सेक्स व ओरल सेक्स को अपना सकते हैं. ओरल सेक्स को करने के बाद सामान्य (योनि सेक्स) सेक्स को करने से पूर्व आपको सावधानी के रूप में कंडोम को बदलना चाहिए, यदि आप ऐसा नहीं करते हैं तो आपको यौन संचारित रोगों का खतरा बना रहता है.

  1. लिंग को योनि में प्रवेश कराने का तरीका

फोरप्ले के बाद दोनों ही साथी जब सेक्स के लिए तैयार हों, तब पुरुष महिला की सहमति मिलने के बाद उनकी योनि में अपने लिंग को प्रवेश करा सकता है. लिंग को योनि के मुख पर ठीक से पहुँचाने के लिए अगर अपने हाथों की मदद लेनी पड़े, तो ज़रूर लें. यहाँ तक कि महिला को भी इसमें पुरुष की मदद करनी चाहिए. महिला लिंग को अपने हाथ में लेकर योनि के मुख पर रख सकती हैं. उसके बाद पुरुष का काम शुरू होता है.

अब पुरुष को धीरे-धीरे लिंग को योनि के अंदर ले जाएं. फिर इसको थोड़ा सा बाहर निकाले. फिर थोड़ा अंदर ले जाएँ. यह क्रिया कुछ बार दोहराएं. जब यह क्रिया स्वाभाविक हो जाए तो आप दोनों सेक्स का आनंद लेने लगेंगे. इस तरह सेक्स को करते समय आप दोनों ही साथी सहज महसूस करने लगेंगे.

हालांकि, कुछ ऐसी सेक्स पोजीशन भी हैं जिसमें महिला पुरुष के ऊपर होती है और वह खुद ही लिंग को योनि के अंदर प्रवेश करवा देती हैं.

इस दौरान आप या आपका साथी जब भी किसी क्रिया में रुकना चाहे तो आपको रुकना होगा. सेक्स के दौरान कई बार साथी किसी नए तरीके में सहज नहीं हो पाता है, ऐसे में आपको उनकी असहजता का ध्यान रखते हुए तुरंत उस क्रिया को रोक देना होगा.

  1. सेक्स को इस तरह बनाएं खास

यौन संबंध दो लोगों के बीच में होने वाले निजी संबंध होते हैं. इसमें दोनों साथी अपनी-अपनी जिम्मेदारी को समझते हुए एक दूसरे के करीब आते हैं. सेक्स करने वालों के मन में इसकी सही प्रक्रिया को जानने की उत्सुकता होती है, जबकि यह उत्सुकता पहली बार सेक्स करने वालों में अधिक देखने को मिलती है. तो जानते हैं सेक्स क्रिया को करने के सही तरीके व इसको खास बनाने वाले उपायों के बारे में.

साथी के मन को समझें

 सेक्स क्रिया का पूर्ण आनंद लेने के लिए आपको अपने साथी के मन को समझना होगा. यौन संबंध बनाने से पूर्व आपको यह जानने का प्रयास करना होगा कि आपका साथी इसमें शामिल होने का इच्छुक है या नहीं. अगर आप साथी की इच्छा के बिना सेक्स करते हैं तो आपको इसमें आनंद प्राप्त नहीं होगा. जब साथी आपके पास आते हुए आपको बार-बार छूने का प्रयास करें तो यह संकेत उनके मन में उठने वाली उत्तेजनाओं की ओर इशारा करता हैं. लेकिन इसको सिर्फ संकेत कहा जा सकता है, सेक्स के लिए उनकी इच्छा जानने के लिए आपको उनसे सहमति अवश्य लेनी चाहिए.

सही तैयारी करें

 सेक्स कई तरह से आपके स्वास्थ के लिए फायदेमंद होता है. इससे अतिरिक्त सेक्स से कैलोरी व तनाव दूर होता है. वहीं इस क्रिया को सही तैयारी के साथ न किया जाए तो यह आपके लिए कई तरह की समस्या भी खड़ी कर सकती है. इसलिए आप सेक्स को करने से पहले पूरी तैयारी कर लें. गर्भनिरोधक गोलियां व कंडोम को अपने पास जरूर रखें. आप दोनों के रिश्तों को सेक्स नजदीकियों में बदलता है, इसीलिए इसको सुरक्षित तरीके से ही करें. इसके अलावा एक कंडोम को आप बार-बार इस्तेमाल करने से बचें. साथ ही साथ इस बारे में साथी से जरूर बात करें और उनको भी सहज महसूस कराएं.

सही जगह सेक्स के उत्साह को बढ़ा देती है

सेक्स सभी के लिए महत्वपूर्ण होता है. चाहे आप इसको पहली बार कर रहें हों या पहले भी कर चुके हों. महत्वपूर्ण होने के चलते इसके लिए सही जगह चुनना बेहद जरूरी होता है. सेक्स करने के लिए आप ऐसी जगह चुनें जो आप दोनों साथियों को पसंद आए. इसके अलावा आप कमरे में हल्की रोशनी रखें और रोमांटिक गानों को भी लगाएं. इससे सेक्स के समय आप दोनों ही बेहतर महसूस करते हैं.

जोश की जगह होश से काम लें

अधिकतर लोग सेक्स करते समय जोश में आ जाते हैं. जोश में सेक्स करना आपके साथी के मूड को खराब कर सकता है. सेक्स के लिए आपका उत्सुक होना अच्छी बात है, लेकिन आप अपनी इस भावना को सही तरह से उजागर करें. सेक्स के दौरान आपको ऐसा कुछ भी करने से बचना होगा, जिससे आपका साथी परेशान हो या वह असहज महसूस करे.

किस करने का अपना महत्व

साथी के करीब आते ही आप सबसे पहले उसको किस करते हैं और किस के माध्यम से आप अपने मन की भावना साथी के साथ साझां करते हैं. अंतरगता के साथ की गई किस महिलाओं के मूड को सेक्स के लिए बनाने का काम करती है. प्यार से साथी को किस करना, छूना व करीब आते हुए सहलाना साथी में उत्तेजना जाग्रत करता है. ऐसा करने से साथी आपके साथ भावनात्मक रूप से जुड़ाव महसूस करता है. इससे आप दोनों ही बेहतर तरह से सेक्स कर पाते हैं.

फोरप्ले करना जरूरी

सेक्स के लिए आपका साथी खुद अपने उतारे या आप उसके कपड़े उतारे एक ही बात है, लेकिन जब आप प्यार के साथ साथी के कपड़े एक-एक करके उतारते हैं, तो इसमें दोनों ही साथियों को एक अलग ही एहसास होता है. महिला को पुरुष की अपेक्षा चरम अवस्था तक पहुंचने पर अधिक समय लगता है. ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि महिला को उत्तेजित होने में समय लगता है. महिला को सेक्स के लिए तैयार करने की प्रक्रिया को ही फोरप्ले कहा जाता है.

सही समय का चुनाव करें

कई बार साथी किसी विशेष समय पर सेक्स के लिए तैयार नहीं होता है. इसलिए आप ऐसे समय का चुनाव करें जब आपके साथी अपने सभी काम को पूरा कर चुका हो, घर की सभी जिम्मेदारियों को पूरी करने में आप भी उनकी सहायता कर सकते हैं.

साथी से मदद लेना

सेक्स करते समय आपको अपने साथी से मदद लेते हुए शर्माना नहीं चाहिए. कई बार पुरुष महिला साथी से पूछे बिना इस तरह से सेक्स करते हैं कि महिला को दर्द होने लगता है. इस कारण से पुरुष को सेक्स के दौरान सही पोजीशन व आरामदायक स्थिति के बारे में महिला से बात करनी चाहिए. वहीं महिलाओं को भी पुरुषों की सहायता करते हुए बताना चाहिए कि उनको क्या करने में अच्छा लग रहा है.

आखिरी पलों को बनाएं खास

अक्सर पुरुष सेक्स के बाद महिलाओं से दूर जाकर बैठ जाते हैं या चरम अवस्था पर पहुंचते ही सोने चले जाते हैं. जबकि महिलाएं चाहती हैं कि सेक्स के बाद पुरुष उनके साथ बैठें, उनसे बातें करें. सेक्स के आखिर के पलों में पुरुषों को महिलाओं को कपड़े पहनाने में मदद करनी चाहिए. उनके साथ हंसी मजाक करके माहौल को सामान्य बनाना चाहिए. महिलाओं को भी सेक्स का अनुभव पुरुषों के साथ साझां करना चाहिए. जबकि अंत में पुरुषों को इस्तेमाल किए गए कंडोम को सही जगह पर ही फेंकना चाहिए. इसके बाद आप दोनों को संक्रमण से बचने के लिए अपने निजी अंगों की भी सफाई करनी चाहिए.

क्या सेक्स में महिलाओं की योनि से खून आता है

सेक्स को करते समय अधिकतर महिलाओं को उत्तेजित होने में थोड़ा समय जरूर लगता है. वहीं कई महिलाएं पहली बार सेक्स करते समय असहज व दर्द महसूस करती हैं. सामान्यतः यह दर्द ज्यादा तेज नहीं होता, परंतु महिला को यदि तेज दर्द का अनुभव हो तो पुरुष साथी को सेक्स करते समय रूकना होगा. सेक्स के दौरान जल्दबाजी न दिखाएं. महिलाओं को चरम सुख तक पहुंचाने की जिम्मेदारी भी पुरुषों की होती है, इसलिए आप किसी अच्छें ल्युब्रिकेंट का प्रयोग कर सकते हैं, ताकि इस दौरान आप दोनों की त्वचा घर्षण से जख्मी न हो. ध्यान रहें कि तेल युक्त ल्युब्रिकेंट व वैसलीन के इस्तेमाल से कंडोम के खराब हो जाने का खतरा बना रहता है.

अगर महिला पहली बार सेक्स कर रही है तो उनको हल्का रक्त स्त्राव हो सकता है. इससे महिलाओं को घबराने की कोई आवश्यकता नहीं है, क्योंकि अधिकतर महिलाओं में पहली बार सेक्स करते समय रक्त स्त्राव होना आम बात है. अगर किसी महिला को पहली बार सेक्स के दौरान रक्त स्त्राव न हो, तो भी यह एक सामान्य अवस्था ही होती है. ऐसा जरूरी नहीं है कि पहली बार सेक्स करते समय सभी महिलाओं को रक्त स्त्राव हो.

जिन महिलाओं को सेक्स करते समय हर बार रक्त स्त्राव हो रहा हो, उनको किसी स्त्री रोग विशेषज्ञ से मिलकर इस समस्या के सही कारणों का पता लगाकर उसका निदान करना चाहिए.

सेक्स से प्रेग्नेंसी, एचआईवी व यौन संचारित रोग होने का खतरा होता है क्या

कंडोम के बिना सामान्य सेक्स (योनि सेक्स) करने से प्रेग्नेंसी व यौन संचारित रोगों (एसटीडी) के साथ ही एचआईवी होने का भी खतरा बना रहता है. चाहे आप पहली बार ही सेक्स क्यों न कर रहें हो प्रेग्नेंसी व एसटीडी से बचने के लिए आपको कंडोम का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए.

अगर आप असुरक्षित यौन संबंध बना चुके हैं, तो आपको जल्द ही किसी डॉक्टर से इस बारे में सलाह लेनी चाहिए. ऐसे में प्रेग्नेंसी को रोकने के लिए गर्भनिरोधक गोलियां ले सकते हैं. प्रेग्नेंसी से बचने के लिए आपके पास कई विकल्प मौजूद होते हैं, लेकिन यौन संचारित संक्रमण व एचआईवी से बचने के लिए आपको केवल कंडोम का इस्तेमाल करना होता है. साथी के साथ सेक्स से पूर्व सावधानी बरतना आप दोनों को ही सेक्स में सहजता प्रदान करता है. सेक्स करना आप दोनों का ही अपना निजी फैसला होता है, लेकिन इस दौरान सावधानी बरतना बेहद ही जरूरी होता है.

सेक्स करने के तरीके

एक दूसरे की अपेक्षाओं को जानें –

आपको अपने साथी के साथ सेक्स करने से कुछ समय पहले अपनी अपेक्षाओं को समझना होगा. इसके लिए आप एक सप्ताह का समय भी निर्धारित कर सकते हैं. साथी के करीब आने पर पहले कुछ दिनों में केवल आप उनके साथ किस करें व उनके हाथों को प्यार से पकड़ने तक ही सीमित रहें. इसके बाद आगे बढ़े. लेकिन ध्यान रहें कि तुरंत ही सेक्स न करें. आप व साथी दोनों ही सेक्स से क्या अपेक्षाएं रखते हैं, इस बारे में आपस में बात करें.

जब सप्ताह खत्म होने वाला हो तो आपको सेक्स करना चाहिए. सेक्स को करते समय आपको अपनी और साथी की इच्छाओं का मान रखना चाहिए. इस तरह की प्रक्रिया से आप अपने व साथी के अंदर भावनाओं को जगा सकते हैं. साथ ही अपने साथी के साथ के बारे में आप क्या सोचते हैं या प्यार में आप क्या महसूस करते हैं, इन बातों को एक-दूसरे को जरूर बताएं.

अपने साथी को मसाज दें  –

बेहतर सेक्स के तरीकों में मसाज एक बेहद ही कारगर व सरल उपायों में गिनी जाती है. इससे साथी के अंदर काम भावनाएं जागती है. यह सेक्स से पहले किए जाने वाले फोरप्ले का ही एक तरीका है. मसाज आपके साथी को सेक्स के लिए धीरे-धीरे तैयार करने का काम करती है और चरम अवस्था (ऑर्गेज्म) पर पहुंचने के लिए साथी के अंदर उत्तेजना को बढ़ाती है.

साधारण तरह से की गई मसाज न सिर्फ सेक्स को बढ़ाती है बल्कि आपकी सेक्सुअल लाइफ को भी बेहतर करती है. सेक्स के उद्देश्य से न की जाने वाली मसाज से आपको अपने साथी के शरीर के बारे में जानने का मौका मिलता है. इसके अलावा इससे साथी का तनाव कम करते सकते हैं और आप दोनों एक दूसरे के करीब आ सकते हैं.

अगर आप कामोत्तेजना को बढ़ाने के लिए मसाज का सहारा नहीं लेते हो, तो आप अपने साथी के साथ बैठकर दोनों के बीच की गलतफहमियों को दूर करें.

भावनाओं को समझने का प्रयास करें

बिना छुए हुए भी आप अपने साथी को बेहतर महसूस करवा सकते हैं. सुंगधित तेल से मसाज करना, कमरे में हल्की रोशनी के लिए मोमबत्तियों को जलाना व हल्की आवाज में रोमांटिक गानें भी, साथी में सेक्स की भावनाओं को जगाने का काम करते हैं. इसके अलावा साथी के पास होने पर एक दूसरे की सांसों की आवाज को सुनना भी आप दोनों में ही प्यार की भावनाओं को बढ़ाता है.

साथी को किस करते समय मन की भावनाओं पर भी ध्यान दें. अगर आप सेक्स करने जा रहें हैं और इसको मजेदार बनाना चाहते हैं, तो आपको सेक्स करते समय स्ट्रॉबेरी या किसी अन्य रसदार फल को सेक्स क्रिया में शामिल करना चाहिए. लेकिन इस बात का ध्यान रखें कि आप जब भी कंडोम का इस्तेमाल करें, तो उसमें कोई तेल न लगाएं इससे वह खराब हो जाता है.

सेक्स कैसे करते हैं

साथी के कानों में प्यार भरी बातें करें –

जब आप अपने साथी के साथ होते हैं और उनके कानों में कुछ प्यार भरी बातें करते हैं तो इस अहसास से बेहतर और कुछ नहीं होता है. इस तरह का उपाय आप दोनों के बीच की दूरी को कम करता है. आप अपने साथी को प्यार का इजहार करने के लिए फोन कॉल्स या मैसेज भी कर सकते हैं. इससे आप दोनों के ही अंदर एक उत्सुकता आती है.

प्यार का संदेश देने के लिए आप ईमेल या फिर किसी पत्र का भी सहारा ले सकते हैं. लेकिन आप इस बात का ध्यान रखें कि इस संदेश को किसी खास आदमी के द्वारा ही साथी के पास भेंजे.

खुद व साथी द्वारा हस्तमैथुन करें –

खुद व साथी के द्वारा हस्तमैथुन करना आपकी सेक्सुअल जिंदगी को बेहद ही अहम बना देता है. आप अपने शरीर की यौन प्रतिक्रियाओं को जानने के लिए भी इसे अपना सकते हैं. साथ ही आपको इसे करने से कैसा महसूस हुआ, इस बात को साथी के साथ साझा भी कर सकते है.

अपने साथी का हस्तमैथुन करने से आपको इस बारे में पता चलता है कि वह कैसा महसूस करते हैं. आपके सेक्स करने के अनुभव को महसूस करने के लिए भी यह एक विकल्प हो सकता है. इसके बारे में साथी से बात जरूर करें.

सेक्स के किए विशेष खिलौने इस्तेमाल करें –

आज सेक्स के लिए कई तरह के विशेष सेक्स खिलौने (Sex toys) बाजार में उपलब्ध है. अगर आप और आपका साथी इनको इस्तेमाल करने में सहूलियत महसूस करता है, तो आपको अपने चरम आनंद के लिए इस तरह के खिलौनों का प्रयोग करना चाहिए. कई लोग अपनी सेक्सुअल लाइफ में इन सेक्सुअल खिलौनों जैसे वाइब्रेटर (vibrators) आदि का प्रयोग करते हैं. लेकिन अगर आपने इसके इस्तेमाल के बारे में पहले कभी सोचा ही नहीं, तो आप इसके प्रयोग से होने वाली भावनाओं को नहीं समझ पाएंगे.

इन खिलौनों को आप ऑनलाइन भी खरीद सकते है. इसके लिए जरूरी नहीं है कि आप ज्यादा पैसे खर्च करें. आप इसमें छोटे बालों वाला ब्रश भी खरीद सकती है. इस ब्रश के नरम बाल आपके शरीर पर जादू सा उत्पन्न करते है और आप इसका इस्तेमाल कर कोई नया खेल भी आजमा सकते हैं.

सेक्स कैसे करें

सेक्स पर किताबें पढ़ें

आपको बता दें कि ऐसी कई तरह की किताबें मौजूद हैं जो किसी भी उम्र, लिंग और इच्छाओं को जानें बिना आपको सेक्स संतुष्टि के आसनों व विचारों को बताती है. अगर आप ने इस तरह की किताब को खरीदने के बारे में विचार नहीं किया है तो अब अपनी जरूरत के अनुसार इसको लेने पर विचार करें, क्योंकि इन किताबों से भी आपको काफी कुछ सिखने को मिल जाएगा.

अपनी इच्छाओं व कल्पनाओं को एक दुसरे से साझा करें

इस विषय हर आदमी की अपनी अलग इच्छा व कल्पनाएं होती है. आप सेक्स को लेकर जैसा सोचते हैं, उन सभी विचारों को साथी के साथ साझा करें. सिर से पैर तक, बालों से कूल्हों तक व कहीं बाहर घुमने के बारे में, आप क्या सोचत हैं सभी बातों को अपने साथी को बताएं.

अगर आप दोनों ही एक दूसरे की कल्पनाओं को पूरा करते हैं, तो आप साथी को सेक्स में भरपूर आनंद प्रदान कर सकते हैं. इसके अलावा कुछ नए खेल के साथ सेक्स करना भी आपके लिए मजेदार हो सकता है.

खुद को साफ सुथरा रखें –

हम केवल आपकी सामान्य तरह की साफ सफाई के बारे में बात कर रहें हैं. इसका मतलब यह नहीं है कि आप अपने शरीर को ज्यादा ही साफ सुथरा रखने पर जोर देने लगें, थोड़ा बहुत पसीना हर किसी को आता ही है. लेकिन यह ज्यादा ना हो इस बात पर ध्यान दें. अपने साथी को सम्मान दें और शरीर से आने वाले दुर्गंध को खुद से दूर ही रखें.

किसी प्रकार की चिंता न करें –

प्यार करने वाले साथी के साथ सेक्स करना जिंदगी का बेहद ही भावनात्मक और खूबसूरत अनुभव होता है. कभी-कभी सेक्स करते समय ज्यादा उत्सुक होना या ऑर्गेज्म के बारे में चिंता करना आपके लिए खराब हो सकता है. इसलिए आप अपने दिमाग को शांत रखें और प्यार के साथ सेक्स के खुशनूमा पल को महसूस करें.

मैं जिस डौक्टर के पास काउंसलिंग के लिए जाती हूं उसे मुझे प्यार हो गया है, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं पढ़ीलिखी 28 वर्षीया युवती हूं. कुछ सालों पहले कुछ ऐसी स्थितियां रहीं कि मुझे लगने लगा कि मैं डिप्रेशन में जा रही हूं. मैं कुछ नहीं कर सकती लाइफ में. ऐसे में मैं अपनी काउंसलिंग करवाने के लिए डाक्टर के पास जाने लगी. डाक्टर की उम्र 40 साल की होगी. शादीशुदा है, 2 बच्चे हैं उस के. उस की पत्नी भी डाक्टर है. डाक्टर की थेरैपी सेशन से मुझे बहुत फर्क पड़ा. मुझे ऐसा लगने लगा है कि डाक्टर से ज्यादा कोई और मुझे समझ ही नहीं सकता. मुझे डाक्टर से प्यार हो गया है. मैं ने सोच लिया है कि डाक्टर से अपने दिल की बात कह दूंगी. क्या मैं ने जो फैसला लिया है, ठीक है? डाक्टर से अपने प्यार का इजहार कर दूं?

जवाब

डियर, हम यह अकसर कहते हैं कि प्यार कभी भी, किसी से भी, किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन जानतेबूझाते हुए दीवार पर सिर दे मारना या किसी की हंसतीखेलती गृहस्थी में सेंध मारना कहां की समझदारी है?

डाक्टर आप का काउंसलर है. आप का इलाज कर रहा है. आप की समस्या को समझाना, आप को समझाना उस का जौब है, प्रोफैशन है. आप की तरह न जाने और कितने ही पेशेंट उस के पास आते होंगे. अब वह सब के साथ तो प्यार नहीं करेगा न.

वह आप को समझाता है, इसलिए आप उस से प्रभावित हैं. उस की बातें आप को इंप्रैसिव लगती हैं. इसलिए धीरेधीरे आप को डाक्टर से प्यार हो गया है लेकिन इसे इफैचुएशन कहते हैं. आप को अपने दिल को संभालना होगा.

अब आप काफी हद तक संभल चुकी हैं. आप अपनी थिंकिंग पौजिटिव रखिए. शादी के बारे में सोच सकती हैं. शादी नहीं भी करना चाहतीं तो कुछ क्रिएटिव वर्क कीजिए. घूमेंफिरें, यारदोस्तों से मिलिए. डाक्टर का खयाल अपने दिमाग से निकाल देंगी तो सब के लिए अच्छा रहेगा.

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