Political Story: विश्वगुरु का खिताब हमारे नाम

Political Story: कांग्रेसी चमचा और संघी देशभक्त जब भी आमनेसामने जाते तो उन में वैचारिक भिड़ंत उतनी ही स्वाभाविक होती जितनी आपस में टकराने वाले सांडों की भिड़ंत. उन में एकदूसरे को बरदाश्त करने की ताकत साल 1925 से ही ऐसी गायब हो गई थी जैसे गधे के सिर से सींग.


यह अद्भुत भिड़ंत आज भी जारी है और अनुमान ही नहीं समुद्र के खारे पानी की तरह पूरा विश्वास है कि जब तक सूरजचांद रहेगा, कांग्रेसी और संघी भिड़ंत का कोई तोड़ नहीं रहेगा. हाई वोल्टेज करंट की तरह ज्वलंत और किसी सुपर बल्ब की तरह यह भिड़ंत अनंतकाल तक जगमगाती रहेगी और आम पब्लिक गोलगप्पों की तरह चटकारे लेले कर इस का मजा लेती रहेगी. बंधुओ, इस में छटांक भर की भी कमी जाए तो कसम इस लेखनी की जो कभी फिर इसे लिखने के लिए उठा लूं.


एक संघी देशभक्त सुबह की शाखा से ऐसे ही खुश हो कर लौट रहा था, जैसे तरोताजा घोड़ा हष्टपुष्ट घास चरने और धूल में लोटने के बाद बिलकुल मस्त दिखाई देता है, लेकिन उसे क्या पता था कि अगले ही मोड़ पर उसे वह मनहूस सूरत दिखाई दे जाएगी, जिसे वह सपने में भी देख कर बिदक जाता है. अंदाजा लगाइए कि कौन मनहूस होगा वह? बिलकुल सटीक अंदाजा है आप का, वह था कांग्रेसी चमचा जो उस संघी के लिए किसी देशद्रोही से कम था. एकदूसरे को देखते ही वे दोनों ऐसे ताव खा गए जैसे सांप और नेवला अचानक से एकदूसरे के सामने जाएं और जब ही गए और नूरा कुश्ती हो, यह तो नामुमकिन ही है. एकदूसरे को देख कर दोनों गरम रेत में भुनते चने की तरह तड़तड़ भुनक गए.


‘‘और संघी देशभक्त, शाखा में जा कर अपना ब्रेनवाश मतलब मन मैला कर आए…’’ चमचे ने कुटिल मुसकान से कटाक्ष की कटार भोंकते हुए कहा. ‘‘ चमचे देशद्रोही, जबान संभाल कर चलाया कर. हमारी शाखा हमारा मन मैला नहीं करती, बल्कि हमें संस्कृति, संस्कार, अनुशासन और देशभक्ति का पाठ पढ़ाती है, तुम्हारी तरह बदमिजाजी का नहीं,’’ देशभक्त ने दशकों से रटारटाया भाषण ?ाड़ दिया. ‘‘ओहो, बड़े अनुशासन और संस्कार की बातें करते हो संघीफिर यह लाठी ले कर शाखा में क्यों जाते
हो, जरा बताओ तो अनुशासित संघी सिपाही?’’


‘‘अबे चमचे, ध्यान से सुन. यह लाठी नहीं, हमारादंडहै. यह किसी पर हमला या आत्मरक्षा के लिए नहीं, बल्कि शारीरिक अभ्यास के लिए होता है. अगर यह लाठी होती, तो अब तक तुम्हारे सिर पर पटक दी होती. ‘‘इतिहास गवाह है कि 1925 से आज तक किसी संघी ने अपने दंड को लाठी की तरह इस्तेमाल नहीं किया. आज तक किसी संघी पर लाठी चलाने के जुर्म में हिंदुस्तान के किसी भी थाने में एक
भी एफआईआर दर्ज नहीं है. उम्मीद है कि अब तुम्हारी दंड और लाठी को ले कर भ्रांति दूर हो गई होगी.’’
चमचे को संघी देशभक्त की बात का कोई जवाब नहीं सू? रहा था. अभी भी वहदंडऔरलाठीके भेद के पेंच में फंसा हुआ था, लेकिन अगर वह अपने घोर वैचारिक शत्रु के सामने इतनी आसानी से हाथ डाल दे, तो वह अपनी जमात को क्या मुंह दिखलाएगा.


वह तो इस बार वैसे भी चुनावी टिकट की घुड़दौड़ में शामिल है. उसे तो अपने ही इस हार को ले कर अजगर की तरह लपेट लेंगे. संघी से तो वह निबट भी लेगा लेकिन अजगरों और ऐनाकोंडाओं से कैसे निबटेगा? लेकिन फिलहाल तो उसे सामने वाले घाघ शत्रु से निबटना है. यहां जीत गया तो अपनों में वाहवाही अपनेआप हो जाएगी. वह तपाक से संघी का मखौल उड़ाते हुए बोला, ‘‘अरे देशभक्त, यह तो बताओ, भारत को विश्वगुरु की पदवी पर कब बैठा रहे हो? अब तो तुम्हारी सरकार को सत्ता शासन संभाले हुए भी 11 बरस हो गए हैं. रोज तुम्हारे नेता विश्वगुरु होने का दंभ भरते रहते हैं.’’


यह बात देशभक्त को तिलमिलाने के लिए काफी थी. वह बोला, ‘‘चमचे, तुम अंधे होने के साथसाथ बहरे भी हो. हम तो विश्वगुरु के पायदान पर ही खड़े हैं. देखते नहीं कि आज भारत के प्रधानमंत्री विश्व के अंतर्राष्ट्रीय नेता बन चुके है. दुनिया चीखचीख कर कह रही है कि भारत विश्वगुरु है, लेकिन तुम्हें सुनाई नहीं पड़ता.’’
देशभक्त की यह बात चमचे को हजम नहीं हुई. वह बोला, ‘‘अरे देशभक्त, अपने मुंह इतने मियां मिट्ठू भी मत बनो कि कोई तुम्हारी बात पर यकीन ही करे. ऐसे अंतर्राष्ट्रीय नेता होने का भी क्या फायदा जब तुम्हारी दखल कहीं भी हो. 2 देशों के बीच आज भी युद्ध रुकवाने का ठेका दुनिया के डौन अमेरिका के पास ही है. छोटेछोटे देश भी हमें आंखें दिखाने से नहीं हिचकते, पावरफुल तो हमारी सुनते ही नहीं. संयुक्त राष्ट्र संघ में भी हमें स्थायी सीट नहीं मिली, वीटो पावर मिलना तो दूर की कौड़ी है.’’


देशभक्त ने सोचा कि चमचा तो उस की ही नहीं, बल्कि उस के नेता की भी किरकिरी कर रहा है, नहले पर दहला जड़ रहा है. उस ने अपनी काली टोपी को ठीक करते हुए कहा, ‘‘चमचे, लगता है तुम्हें और तुम्हारे नेताओं को अंतर्राष्ट्रीय मामलों की रत्तीभर सम? नहीं. इन मामलों में समय लगता है. तुम्हारा नेता तो विदेशों में अनापशनाप देश विरोधी बातें कह कर देश की फजीहत कराता है, जबकि हमारे नेता तुरुप चाल चलते हैं, जिन को सम?ाना हर किसी की बात नहीं.’’ देशभक्त की यह बात सुन कर चमचा ठठा लगा कर खूब जोर से हंसा और फिर बोला, ‘‘यार, तुम कैसे देशभक्त हो? अगर हमारा नेता देशद्रोह कर रहा है, तो शोर क्यों मचा रहे हो? हिम्मत है तो उस के देशद्रोही होने पर मुकदमा चलाओ. साबित होने पर अदालत खुद उसे जेल भेजेगी. शोर मचाने से तो कुछ होने वाला नहीं. या फिर तुम्हारी सरकार में दम नहीं. तुरुप चाल की बात तो छोड़ ही दो.’’


देशभक्त ने सोचा कि चमचे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर से खींच कर राष्ट्रीय स्तर पर लाता हूं. वहां बाजी विकास के मामले में अपने हाथ में रहेगी. उस ने कहा, ‘‘चमचे, अंतर्राष्ट्रीय स्तर के तुम हो नहीं. तुम राष्ट्रीय स्तर की बात करो. राष्ट्र में विकास की गंगा बह रही है, उस ओर देखो.’’ चमचे ने शुतुरमुर्ग की तरह गरदन को इधरउधर घुमा कर देखा मानो वह विकास की बहती गंगा को देखने की कोशिश कर रहा हो और वह उसे कहीं दिखाई दे रही हो, ‘‘अरे भाई, कहां है वह विकास की गंगा? हम ने तो अभी तक भगीरथ की गंगा सुनी थी, यह विकास की गंगा कब से बहने लगी?’’ चमचे की नौटंकी पर देशभक्त को गुस्सा तो बहुत आया, फिर भी उस ने शाखा पर सब्र का पाठ सीखा था. उस ने सब्र से काम लिया और कहा, ‘‘तुम सच में अंधे हो चमचे. सारी दुनिया में भारत के विकास का डंका बज रहा है और तुम्हें रौकेट की तेज रफ्तार से होता विकास दिखाई नहीं देता.’’


‘‘सचमुच देशभक्त, देश तरक्की कर रहा है. देश का राजा 90 करोड़ लोगों को अपने हाथों से राशनपानी बांट रहा है. किसानों की जेब में हर साल 6-6 हजार का चुग्गा डाल रहा है. सही है 90 करोड़ लोगों के पास दानापानी नहीं और किसान की कीमत मात्र 6 हजार. वाह रे देश के राजा,’’ चमचे में ताने का जहरबु? तीर छोड़ा. इस से हमारा देशभक्त हत्थे से उखड़ गया. वह तमतमाता हुआ बोला, ‘‘तुम कांग्रेसियों ने अपने 60 साल के राज में देश को ऐसा बदहाल कर के छोड़ा, उस की वजह से देश की यह हालत हुई.’’
‘‘लेकिन देशभक्त, 6साल पहले और 11 साल अब, कुलमिला कर 17 साल तो तुम्हारी साल भी रही. फिर देशभक्त, जनता को तुम से सवाल करने का भी हक बनता है कि तुम ने क्या किया? तुम 90 करोड़ लोगों को इतना भी आत्मनिर्भर नहीं बना पाए कि वे अपने राशनपानी का इंतजाम खुद कर सकते? इस का मतलब तो यही है कि तुम बेरोजगारों को रोजगार नहीं दे सके, उन्हें आत्मनिर्भर नहीं बना सके.’’


देशभक्त को लगा कि वह अपने ही जाल में फंस रहा है. शाखा में उस नेदंड युद्धमें पैंतरा बदलने में महारथ हासिल की थी. उस ने पैंतरा बदलते हुए कहा, ‘‘चमचे, देखते नहीं कि तरक्की का आलम यह है कि कुछ ही सालों में हिंदुस्तान में सैकड़ों की तादाद में अरबपति हो गए हैं. ‘‘मर्सिडीज बैंज हुरुन इंडिया वैल्थ रिपोर्ट के मुताबिक इस समय भारत में 358 अरबपति हैं. अरबपतियों की तादाद में हम अमेरिका, चीन और जापान के बाद विश्व में हम चौथे नंबर पर पहुंच गए हैं. इसी से पता चलता है कि हम ने तरक्की की कितनी ऊंची छलांग लगाई है.’’


यह सुन कर चमचा जोर से हंसा, फिर बोला, ‘‘हां भाई देशभक्त, तरक्की मापने का तुम्हारा पैमाना वाकई जोरदार है. इतना तो मु? भी मालूम है कि इन अरबपतियों की कुल संपत्ति भारत की जीडीपी के आधे के बराबर है. मतलब यह कि गिनती के कुछ अरबपति भारत की बहुत बड़ी संपत्ति पर कुंडली मार कर बैठे हैं और गरीब जनताहायहायकर रही है. तभी तो तुम्हारी सरकार को पूंजीपतियों की सरकार कहा जाता है.’’ देशभक्त हमेशा की तरहपूंजीपतिशब्द सुनते ही भिनक गया. उस ने देखा कि चमचा किसी भी तरह से काबू में नहीं रहा है, दे दनादन वार पर वार कर रहा है. तब उस ने कहा, ‘‘अरे, हमारी सरकार ने देशभर में सड़कों का जाल बिछा दिया है. ऐसी तरक्की कभी देखी है क्या?’’


‘‘बेशक, सरकार ने सड़कों का जाल बिछा दिया है और साथ ही बेमियादी टोल टैक्स के टालें भी जगहजगह पर खड़े कर दिए हैं. हाईवे पर पहुंचते ही आदमी को जेब खाली होने का डर सताने लगता है. बसों के किराए में बेतरतीब बढ़ोतरी हो जाती है. टोल टैक्स के टालों पर बैठे गुंडे आएदिन आम आदमी से मारपीट करते हैं और उन सड़कों का क्या देशभक्त, जिन में गड्ढे ही गड्ढे हैं? सड़कें बनती बाद में हैं टूट पहले जाती हैं,’’ चमचे ने ताना कसा. ‘‘अरे, सड़कों के इस तरह टूटने के लिए तो भ्रष्ट ठेकेदार, इंजीनियर और अफसर जिम्मेदार हैं,’’ देशभक्त के मुंह से हकीकत सांप की मौसी की तरह बाहर गई.
‘‘मतलब देशभक्त, आखिर तुम ने यह भी मान ही लिया कि भ्रष्टाचार का बोलबाला अब भी चरम पर है. तुम्हारी सरकार का भ्रष्टाचार खत्म करने का वादा वैसा ही खोखला साबित हुआ, जैसे स्विस बैंक से काला धन वापस लाने का वादा टांयटांय फिस हो गया.’’


अब देशभक्त क्या बोले? अपनी ही सरकार के खिलाफ कैसे बोले? कुछ देर वह चुप रहा. उसे चुप देख कर चमचा जोश में गया. दंड तो देशभक्त के पास था, लेकिन शब्दों कादंड प्रहारकिया चमचे ने, ‘‘अरे देशभक्त, एक बात और बता दूं कि जो विश्वगुरु बनने की तुम बात करते हो, उस के तो तुम अभी पासिंग भी नहीं हो. ‘‘शिक्षा मंत्रालय की ताजातरीन रिपोर्ट के अनुसार देशभर में 1,04,125 प्राइमरी स्कूल ऐसे हैं जिन में महज एक ही टीचर है. इन स्कूलों में 33,76,769 छात्र पढ़ाई कर रहे हैं. ऐसी शिक्षा व्यवस्था से क्या तुम विश्वगुरु बन सकते हो देशभक्त?’’ ‘‘अरे चमचे, क्या तुम्हें पता नहीं कि भारत ने विश्व को तक्षशिला और नालंदा जैसे महान विश्वविद्यालय दिए हैं,’’ देशभक्त ने ज्ञान पेला. ‘‘बेशक, लेकिन वह युगों पुरानी बात है.

क्या भारत उसी युग में जीने के लिए मजबूर है? क्या हम उस युग से बाहर नहीं निकलेंगे? अपनी जनता
को वही पुरानी घुट्टी पिलाते रहेंगे. वे विश्वविद्यालय तो हमारी शिक्षा व्यवस्था की तरह खंडहर बन चुके हैं.
‘‘आज टाइम्स हाईयर एजूकेशन वर्ल्ड एजूकेशन रैंकिंग-2026 की रिपोर्ट के अनुसार हमारा एक भी विश्वविद्यालय दुनिया के टौप के 100 विश्वविद्यालयों में नहीं है. यह है हमारी शिक्षा का लैवल. तब की बात मत करो जब दुनिया का 45 फीसदी व्यापार हमारे हाथों में था. आज हमारे हाथों में दुनिया का 2 फीसदी व्यापार भी नहीं है.’’


यह सुन कर देशभक्त चौंक गया. उस का मन हुआ कि शाखा के दंड को आज लाठी बना ही लिया जाए और एक ही वार में चमचे के तरबूज के बीज बिखेर दिए जाएं, लेकिन तभी उसे याद आया कि वह तो संघ के अनुशासन में बंधा है. नागपुर के नागपाश में कस कर बंधा है. जबतक वहां से आज्ञा नहीं होगी, वह अपनी हिफाजत में भी दंड को लाठी नहीं बना सकता नहीं, तो वह संघी नहीं रहेगा, इसलिए वह चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता. लेकिन तभी संघी देशभक्त को याद आया कि इस चमचे का बरातघर सरकारी जमीन कब्जा कर के बना है. उस ने अक्ल से काम लेते हुए कहा, ‘‘देशद्रोही चमचे, सुना है तुम्हारा बरातघर सरकारी जमीन पर बना है, बुलडोजर…’’


बुलडोजर का नाम सुनते ही चमचा देशभक्त का वाक्य पूरा होने से पहले तो गुस्सा हो गया, पर फिर बोला, ‘‘पर देशभक्त, यह तो बता कि सरकारी सड़कों पर बने शहर के 30-40 मंदिरों की आमदनी किस की जेब में जाती है?’’ अब देशभक्त अपनी सत्ता की हनक के बावजूद और चमचा 60 साल तक के राज के रोब के बावजूद मुंह लटका कर आगे निकल गए. एक यह सोचता हुआ कि एक दिन विश्वगुरु का खिताब भी हमारे नाम हो जाएगा और दूसरा यह सोचता हुआ कि किसी दिन सत्ता सुख फिर मिलेगा.  Political Story

Politics: गहरी पैठ

Politics: दिल्ली की सरकार ने बड़ी दरियादली दिखाते हुए रियायत दी है कि बिजली की गाडि़यों को निजी ड्राइवर शेयर टैक्सी की तरह चला सकते हैं. यह तो हमेशा समझ से परे है कि जब सड़कें सब की सा? हैं, गाडि़यां लोगों की अपनी हैं, ड्राइवर अपना है तो उस में कौन बैठेगाकौन नहीं, इस में सरकार बीच में कहां आती है.


जिसे हम इजाजत देंगे वही किराए पर गाड़ी चला सकता है, यह कानून अपनेआप में राजेरजवाड़ों के युग की धौंस है और सारे देश में लागू है. किसान ट्रैक्टरट्रौली में अपना भूसा ले जा सकता है, बराबर वाले का नहीं, ट्रैक्टरट्रौली पर सवारियां नहीं ले जा सकते. मोटरसाइकिल पर पीछे बैठा वाला किराए पर नहीं चल सकता. अपनी मोटरसाइकिल किसी और को किराए पर नहीं दे सकते. अपनी बस खरीद ली तो उसे जहां डिमांड वहां नहीं चला सकते. हर तरह के कामकी परमिशन लो. यह परमिशन ऐसी है मानो कोई दया दिखाई जा रहा हो.


देश के सारे सरकारी दफ्तर इस तरह की परमिशन देने वालों से भरे हैं. ये लोग एक तरह से टैक्स देने वालों से जमा पैसे से सरकार से वेतन लेते हैं और फिर वहां परमिशन देने के लिए घूस लेते हैं जहां इन के दखल की कोई जरूरत ही नहीं. कानून की किताबें जनता के लिए नहीं बनी हैं, सिर्फ सरकारी परमिशनों के लिए बनती हैं.


एक जमाने में अंगरेजों को कोसा गया था कि उन्होंने बिहार, ओडिशा के किसानों को मजबूर किया था कि वे नील की खेती करें क्योंकि नील की जरूरत इंगलैंड की मिलों को थी. आज भी वैसा ही अंगरेजी राज है कि चाहे बाइक, कार, ट्रक, बस या हवाईजहाज के मालिक, जनता का कोई आदमी हो, परमिशन तो सरकारी बाबू ही देगा.


कहने को कहा जाता है कि इस से सेफ्टी बढ़ती है, वाह. ऐसा लगता है कि मानो जो काम सरकार करती है वहां भगवान खुद मौजूद हो जाते हैं और सेफ्टी की गारंटी दे देते हैं. या फिर सरकार को यह गलतफहमी है कि वह जो काम करेगी वह अपनेआप जै रामजी की कृपा से ठीक ही होगा.


सरकार से तो अपने दफ्तर नहीं चलते. ऐसे दफ्तर जहां पब्लिक नहीं आती भी देख लें, वहीं कुरसी टेढ़ी पड़ी होगी, वहीं टूटी टेबलें होंगी. दफ्तरों की दीवारों के कोनों पर पान के थूकने के निशान भरे होंगे और फाइलें बेतरतीब होंगी. यह भी नहीं कहा जा सकता कि उज्जड़गंवार पब्लिक गंद फैला जाती है.


असल में सरकार में जो भी होता है वह राज करने के बहाने ढूंढ़ता है काम करने के मौके नहीं. वह सरकार में वोटों से चुन कर आए या इम्तिहान पास कर के आए, असल में हाकिम होता है, बेरहम हाकिम. वह अगर किसी के भले की सोचता है तो अपने जैसों की और अगर शेयर टैक्सी जैसे फैसले को लिया गया है तो जनता के भले के लिए नहीं, अपनी निकम्मी बस सेवा की कमी को छिपाने के लिए. सरकारी बसें तो सड़कों पर खराब खड़ी ही दिखती हैं.

बंगलादेश के क्रिकेट खिलाड़ी मुस्तफिजूर रहमान को भगवा ट्रौलर्स से शाहरुख खान की क्रिकेट टीम केकेआर से निकलवा कर चाहे भगवा गैंग खुश हो रहा हो पर असल में आने वाले दिनों के लिए वे देश के एक कोने में खतरा पैदा कर रहे हैं. बंगलादेश का पाकिस्तानीकरण तेजी से हो रहा है और भारत के लोगों को चाहिए था कि जो लोग इसलाम अपना चुके थे, अपना देश बनवा चुके थे, उन्हें अपने से अलग करें, अपने पास रखें.


1947 में बंटवारे के बाद भी बंगलादेश, जो तब पूर्वी पाकिस्तान था, बंगला भाषा ही बोलता रहा और वहां का पहनावा पश्चिम बंगाल की तरह का ही रहा, इसलिए जब वोटों से बहुमत पाने के बाद भी 1970 में पश्चिमी पाकिस्तान ने पूर्वी पाकिस्तान के शेख मुजीबुर रहमान को प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया और उन्हें पकड़ने की कोशिश की तो इंदिरा गांधी ने उन्हें और उन के लाखों समर्थकों को भारत में आने दिया.


जब मामला ज्यादा उलझा गया तो इंदिरा गांधी ने दुनियाभर के लोगों की नाराजगी के बावजूद बंगलादेश में सेना भेज कर उसे पश्चिमी पाकिस्तान से अलग करा दिया और बंगलादेश बन गया जो भारत का मित्र बन गया था, क्योंकि बंगलादेश के गरीब हिंदूमुसलिम भारत में काम करने के लिए आते रहे, फिर भी धीरेधीरे बंगलादेश पश्चिमी पाकिस्तान के मुकाबले ज्यादा तरक्की करता रहा.


यह अफसोस की बात रही कि भारत का भगवा गैंग इन्हें वोटों के लिए इस्तेमाल करता रहा और घुसपैठियों का नाम लेले कर भाजपा ने असम और त्रिपुरा के चुनाव जीत लिए. इन बंगलादेशी लोगों के खिलाफ नफरत का बीज भारत में ज्यादा बोया गया बजाय बंगलादेश में, पर अब पासा पलट गया.


भारत विरोधी गुट बंगलादेश में और ज्यादा कट्टर होने लगा और उस ने शेख हसीना को भी हटा दिया जो अब भारत में रह रही हैं. बंगलादेश में अब गलीगली में भारत के खिलाफ नारे लग रहे हैं जहां पश्चिमी पाकिस्तान से बचाने वाले भारतीय सैनिकों के लिए फूलों के गुलदस्ते 1971 के बाद दिए गए थे.


भगवा ट्रौलर्स ने कोलकाता नाइट राइडर्स टीम में मुस्तफिजूर रहमान को आईपीएल में खेलने पर हल्ला मचा कर भारत और बंगलादेश के बीच बने एक और पुल को नष्ट कर दिया. भारतके लोग यह भूलें कि जहां बंगलादेश में प्रति व्यक्ति आय 2,800 डौलर है उस से सटे पश्चिम बंगाल की प्रति व्यक्ति आय सिर्फ 1,800 डौलर है. पिछले 30 सालों में बंगलादेश ने भारत से भी ज्यादा छलांग लगाई और अपने से आगे पश्चिम बंगाल को तो कहीं पीछे छोड़ दिया.


भगवा ट्रौलर्स को कुछ तो पता होना चाहिए था कि इस तरह क्रिकेटर को निशाने पर लेने का नतीजा और बुरा हो सकता है. अब बंगलादेश ने कह डाला है कि वह भारत में टी 20 वर्ल्ड कप का मैच खेलेगा ही नहीं. अपने को व्हाट्सएपीय ज्ञानी और लाखों की तादाद में मौजूद पंडेपुजारियों की बकवास सुनसुन कर भारत के ट्रौलर्स एक दम उज्जड़गंवार हो गए हैं जिन्हें नाक से आगे कुछ दिखाई नहीं देता. बंगलादेश अगर पाकिस्तान की शह पर सड़ने वाला है तो भारत अपने ही भगवा गैंगों से उसी राह पर चल रहा है.  Politics.                   

   

Social Story: औनर किलिंग -भाई ने बहन को दी आजादी की सजा

Social Story: तलाक के बाद माया किसी और के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी थी. यह बात उस के भाई को नागवार गुजरी और उस ने माया को मौत की सजा का तोहफा दे दिया.
मामला हरियाणा के रोहतक का है, जहां माया एक ब्यूटीपार्लर चलाती थी. 10 साल पहले उस की शादी लुधियाना, पंजाब के रहने वाले रमन के साथ हुई थी, पर यह शादी तकरार में तबदील होती गई और फिर मामला कोर्ट तक जा पहुंचा. 5 महीने पहले रमन और माया का तलाक हो गया और वह अपने मायके रोहतक गई.
इस के बाद माया रोहतक की कबीर कालोनी में ही किराए के मकान में एक नौजवान के साथ लिवइन रिलेशनशिप में रहने लगी थी. मायके वालों को इस बात पर गुस्सा आया खासकर माया के भाई ज्वाला प्रसाद को यह बात कतई पसंद नहीं थी.
पुलिस की जांच में सामने आया कि ज्वाला प्रसाद ने कई बार माया को टोका था, पर चूंकि माया अपने ब्यूटीपार्लर से अच्छाखासा कमा रही थी, तो उसे अपने परिवार की ज्यादा परवाह नहीं थी.
इसी बीच ज्वाला प्रसाद को माया के किरदार पर शक होने लगा था. कई लोग ब्यूटीपार्लर को ले कर भी सवाल उठाते थे. लिहाजा, भाई ने अपनी बहन की हत्या करने की ठान ली.
वीरवार, 25 दिसंबर, 2025 की सुबह माया ने माता दरवाजा चौक पर बना अपना ब्यूटीपार्लर खोला. सुबह धुंध ठंड की वजह से ज्यादा कस्टमर भी नहीं थे. इसी बीच ज्वाला प्रसाद चाकू ले कर ब्यूटीपार्लर में घुसा और माया के गले पर सामने की तरफ से बेरहमी से वार किया. माया छटपटाई, लेकिन भाई की पकड़ से छूट नहीं पाई.
इस केस में माया के साथ काम करने वाली लक्ष्मी एकलौती चश्मदीद गवाह है. उस की गवाही खास रहेगी.                              – सुनील शर्मा द्य
  अंधविश्वास में ली मासूम की जान

हरियाणा में अंधविश्वास का दिल दहला देने वाला मामला. वहां के यमुनानगर में तांत्रिक सिद्धि के लिए एक 4 साल के मासूम की बलि दे दी गई. आरोपी बच्चे का चचेरा बहनोई और बहन है. इन लोगों ने पहले बच्चे को किडनैप कर घर में रखा और फिर रात को श्मशान घाट में ले जा कर तंत्रमंत्र के बाद उस का गला घोंट कर मौत के घाट उतार दिया. 30 जुलाई को एक मासूम के लापता होने की सूचना पुलिस को मिली थी. जांच के दौरान पुलिस को इस मासूम की लाश खेतों में बने ट्यूबवैल के पास पड़ी हुई मिली.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट में यह साफ हुआ कि मासूम की हत्या उस का गला घोंट कर गरदन तोड़ने से हुई. पुलिस ने बताया कि दोनों पतिपत्नी अपनेआप को ताकतवर बनाने के लिए मासूम पर पहले तंत्र विद्या की थी और इसी तंत्र विद्या की सिद्धि पाने की खातिर इस मासूम की हत्या कर दी. फिलहाल दोनों को गिरफ्तार कर लिया है. बच्चे को उस के जन्मदिन पर अगवा किया गया था. Social Story

Hindi Story: बाथरूम

Hindi Story: सरपंच सोहन ठाकुर को पराई औरतों को ताड़ने की गंदी आदत थी. वे एक दलित औरत बलुई को अपनी छत से नहाते हुए देखते और उसे पाने की तरकीब लगाने लगे. क्या सोहन ठाकुर बलुई को पा सके?

सो  हन ठाकुर की उम्र 48 साल की हो गई थी, पर उन के अंदर अब भी जवानों के जैसा जोश बरकरार था. वे जम कर खाते और दंड पेलते थे. उन का अच्छाखासा शरीर था. सोहन ठाकुर को देख कर कोई यह नहीं कह सकता था कि उन का 20 साल का एक बेटा भी है. सोहन ठाकुर की एक खूबसूरत पत्नी भी थी, जिसे वे प्यार से रूपमती कहा करते थे. गांव का सरपंच होने के नाते उन की खूब इज्जत भी थी.
गांव में सोहन ठाकुर का दोमंजिला मकान बना हुआ था, जिस के अंदर रूपमती के लिए एक खूबसूरत सी रसोई भी बड़े मन से बनवाई गई थी.


पंचायत में भी सोहन ठाकुर की बात को मान दिया जाता था. जब भी पंचायत लगती तो सोहन ठाकुर कोई भी फैसला देने से पहले एक अलग अंदाज में अपनी मूंछ पर ताव देते और फिर फैसला सुनाते और फैसला सुनाते समय उन के चेहरे पर गजब की चमक आती थी. 48 साल की उम्र होने के बाद और गांव में इतना रसूख होने के बाद भी सोहन ठाकुर का एक और पहलू था, जिसे सिर्फ वे ही जानते थे. वह पहलू यह था कि उन की आंखें किसी भी औरत का नंगा जिस्म देखने को हमेशा आतुर रहती थीं. गांव में खेतों के बीच काम करते समय मजदूर औरतों की छाती पर सोहन ठाकुर की नजरें बरबस ही जम जाती थीं.
सुबह के तकरीबन 10 बजे सोहन ठाकुर गांव के तालाब की तरफ टहलने चले जाते और वहां पर कोई कोई औरत कपड़े धोते दिख जाती, तो उस के खुले अंगों पर किसी गिद्ध की तरह उन की नजरें टिक जाती थीं.


सोहन ठाकुर के मकान के पीछे 2-3 घर दलित जाति के लोगों के थे. इन्हीं घरों में बलुई रहती थी. बलुई की उम्र 40 साल के आसपास होगी. बलुई का शरीर लंबा और मांसल पर गठा हुआ था. सांवले रंग की बलुई ब्लाउज के नीचे कुछ नहीं पहनती थी, फिर भी उस की छाती तनी ही रहती थी. बलुई अपनी पतली कमर पर साड़ी को काफी नीचे बांधती थी, इसलिए उस की गहरी नाभि साफ दिखाई देती थी. अकसर ही सोहन ठाकुर की नजरें बलुई के जिस्म का भरपूर मुआयना करती थीं. सोहन ठाकुर एक बार अपनी छत पर खड़े हो कर चारों तरफ देख रहे थे कि तभी उन के कानों में नल चलने और पानी गिरने की आवाज आई, तो उत्सुकतावश वे छत के कोने में गए और नीचे   झांकनें लगे. सोहन ठाकुर की आंखें खुशी और हैरत से फैल गईं. उन्होंने देखा कि नीचे बलुई अपने घर के कोने में लगे नल पर नहा रही थी. वजह, गांव के गरीब और दलित घरों में बंद बाथरूम नहीं होते, इसलिए औरतें खुले में ही नहाने को मजबूर होती हैं.


सोहन ठाकुर वैसे भी बहुत दिन से बलुई को घूरा करता थे, पर बलुई के तेज स्वभाव के चलते उन्होंने कभी बलुई को छूने की कोशिश नहीं की थी, पर वे बलुई के मांसल और गठीले शरीर के दीवाने तो थे ही, इसलिए रात में अपनी पत्नी रूपमती के साथ सैक्स करते, तब भी उन के खयालों में बलुई ही रहती थी.
बलुई आज सोहन ठाकुर के सामने बिना कपड़ों के नहा रही थी. वे  झ से थोड़ा सा पीछे हो गए, पर अपनी नजरें बलुई के जिस्म पर ही गड़ाए रखी थीं. बलुई अपने सांवले जिस्म को बारबार साबुन लगा कर मसल रही है, तो सोहन ठाकुर के समूचे जिस्म में हवस दौड़ गई और जब बलुई ने अपने हाथ उठा कर अपनी पीठ को रगड़ा, तब तो बलुई की जवानी खिल कर सामने ही गई.


सोहन ठाकुर जम कर बलुई के रूप के दर्शन कर रहे थे. जब बलुई नहा चुकी और कपड़े पहनने लगी, तो सोहन ठाकुर धीरे से पीछे हट गए और नीचे गए. उस दिन से रोज ही सोहन ठाकुर ने धीरेधीरे यह अंदाजा लगा लिया था कि बलुई दिन में दोपहर के तकरीबन 2 बजे नहाती है. शायद इस समय तक वह
खेतों और घर का सारा काम निबटा भी लेती होगी. अब सोहन ठाकुर बलुई को नहाते हुए घूरने का मौका तलाशते रहते कि बलुई कब नहाए और कब वे उसे घूर कर अपनी आंखों को मजा देते रहें. पर एक दिन नहाते समय अचानक बलुई की नजर ऊपर खड़े सोहन ठाकुर पर पड़ ही गई. उस दिन तो बलुई ने झाट से अपने हाथों से कैंची बनाई और अपने खुले सीने को ढक लिया और कमरे में भाग गई, पर संकोच के चलते कुछ कह सकी.


पर एक दिन बाद जब फिर से बलुई नहा रही थी, तो सोहन ठाकुर छिप कर उस के रूप के मजे ले रहे थे. तभी बलुई ने सोहन ठाकुर को देख लिया, पर इस बार बलुई डरी नहीं और सकुचाई भी नहीं. उस ने पहले तो कपड़ों से सीने को ढका और फिर तेज आवाज में सोहन ठाकुर से कहा, ‘‘अरे, ठाकुर साहब,
हमें छिप कर क्या देखते होअगर रस चखना है, तो कभी बाहर कर मिलो…’’
बलुई की आवाज सुन कर सोहन ठाकुर फौरन नीचे भाग गए कि कहीं ऐसा हो कि यह बात उन का बेटा और रूपमती जान जाएं. वे तुरंत अपने कमरे में जा कर लेट कर सोने का बहाना करने लगे, पर बलुई की कहीं गई बात उन के कानों में अब भी गूंज रही थी और मन ही मन में वे रोमांचित भी हो रहे थे.


बलुई जाति से दलित जरूर थी, पर अपने पति किसना के साथ अच्छी तरह से जिंदगी काट रही थी. उसे बस यह दुख था कि शादी के 10 साल बाद भी उन दोनों के कोई औलाद नहीं थी. हालांकि, अब तो उस ने औलाद के बारे में सोचना भी छोड़ दिया था और अपने काम पर ही पूरा ध्यान रखे हुए थी. किसना गांव के बाहर कसबे की ओर जाने वाली सड़क के किनारे पानपुडि़या और चिप्स, पानी की बोतल, कोल्डड्रिंक का खोखा लगाता था और आतेजाते लोग उस के कस्टमर होते थे. गुजारे लायक कमाई तो हो जाती थी, पर बलुई के अंदर आगे बढ़ने की और कुछ ज्यादा पैसे कमाने की मंशा भी थी, जिस से कि वह अपने पति के लिए सड़क के किनारे एक पक्की दुकान बनवा सके.


गांव में नई उम्र के लड़केलड़कियां मोबाइल चलाते, तो बलुई को भी शौक चढ़ता था कि वह भी मोबाइल पर अपनी वीडियो बनाए. बलुई को तो सुनने में यह भी आया था कि नाचगाने की रील बना कर पैसा भी कमाया जा सकता है. बलुई भी तो नाच सकती है और दूसरे लोगों से बेहतर नाच सकती है, पर इन सब चीजों के लिए उसे अच्छा मोबाइल चाहिए और मोबाइल लेने के लिए पैसा चाहिए, जो फिलहाल तो बलुई और उस के मरद के पास नहीं था. उस दिन शाम ढले बलुई जब पास के बाजार से वापस रही थी, तब रास्ते में उसे सोहन ठाकुर मिल गए. वे बलुई को सामने देख कर थोड़ा डर गए, पर बलुई उन्हें देख कर मुसकरा दी, तो सोहन ठाकुर का साहस बंध गया और वे उस के तराशे बदन को ऊपर से नीचे देखने लगे.
‘‘देखने के भी पैसे लगेंगे ठाकुर साहब,’’ बलुई ने इठलाते हुए कहा तो सोहन ठाकुर को ग्रीन सिगनल मिल गया. उन्होंने ?ाट से 100 का नोट निकाल कर बलुई की तरफ बढ़ाया, तो बलुई ने लेने से मना कर दिया और बोली, ‘‘इतने में तो हमारे पैर ही देख पाओगे ठाकुर साहब…’’


सोहन ठाकुर सम? गए थे कि बलुई ज्यादा पैसे चाहती है और पैसों के बदले उस के हुस्न का मजा भी लिया जा सकता है, इसलिए उन्होंने 500 रुपए निकाले और बलुई को दे दिए, पर बलुई इतने में भी नहीं मानी, तो उन्होंने उसे 1,000 रुपए देने का वादा किया. सोहन ठाकुर की बात मान कर बलुई एक गन्ने के खेत की तरफ बढ़ गई और सोहन उस से दूरी बना कर पीछे चल दिए. गन्ने के खेत में जा कर सोहन ठाकुर ने बलुई के जिस्म से जरूरी कपड़े हटाए और उस खूबसूरत औरत के जिस्म को जम कर भोगा.
बलुई ने देखा कि सोहन ठाकुर उस के जिस्म को किसी कुत्ते की तरह चाट रहे थे. वह सोच रही थी, ‘हम को नीच जात का कह कर हमारे हाथ से पानी तक नहीं पीते हैं और इस समय अपनी जीभ भी हमारे अंदर डालने से इन्हें परहेज नहीं…’


सोहन ठाकुर और बलुई का यह सिलसिला शुरू हुआ, तो फिर आगे आने वाले दिनों में भी जारी रहा. बलुई पैसों के बदले खुद को ठाकुर को सौंप देती और ठाकुर को बलुई जैसी नमकीन औरत के जिस्म का मजा मिल जाता, पर बलुई इतनी बेवकूफ नहीं थी और है वह चरित्रहीन थी. उस ने अपने पति से धोखा किया था, पर वह तो सोहन ठाकुर को अपना जिस्म सौंप कर कुछ पैसे इकट्ठे कर लेना चाहती थी, जिस से वह अपने नहाने के लिए एक छत वाली जगह बनवा सके, ताकि सोहन ठाकुर उसे और घूर सकें.


एक दिन खेत में जब सोहन ठाकुर बलुई के जिस्म में घुसने की तैयारी कर रहे थे, तभी बलुई ने उन से एक एंड्राइड मोबाइल की मांग कर डाली. ठाकुर पहले तो हिचके, क्योंकि मोबाइल थोड़ा महंगा आता है, पर बलुई ने अपने अंगों को सिकोड़ लिया और संबंध मनाने से मना कर दिया, तो सोहन ठाकुर ने मोबाइल देने के लिए मजबूरन हां कर दी और बाद में उन को बलुई के लिए एक मोबाइल खरीदना ही पड़ा.


मोबाइल पा कर बलुई बहुत खुश हो गई थी और हाई स्कूल में पढ़ने वाली एक लड़की की मदद से उस ने फेसबुक और रील्स बनाना भी सीख लिया था. इस बीच गांव में पंचायत के चुनाव की तारीख निकट आने लगी थी और सोहन ठाकुर एक बार फिर से सरपंच बनने की जुगत में लग गए थे और घरघर जा कर हाथ जोड़ कर उन्हें ही सरपंच चुनने की विनती करने लगे थे. सरपंच के बेटे मोहित सिंह को अपने पिता के कामकाज से कोई मतलब नहीं था. वह तो अपने दोस्तों की मंडली में नशे की लत में पड़ चुका था. दोस्तों को ले कर सुबह से शाम तक इधरउधर घूमता, गांजे का दम भरता और औरतों पर बुरी निगाह रखता.
उस दिन बलुई अपने घर से निकल कर खेत में काम करने जा रही थी कि तभी मोहित सिंह ने बलुई का रास्ता रोक लिया. उस की आंखों में नशा था और चेहरे से हवस टपक रही थी.


बलुई तो मोहित सिंह से उम्र में काफी बड़ी थी, पर जब इनसान के सिर पर हवस चढ़ कर बोल रही हो, तो उसे कुछ नहीं दिखता. मोहित सिंह ने बलुई को अपनी मजबूत बांहों में जकड़ लिया और खेत में ले जा कर उस का रेप कर दिया. बलुई ने चीखना चाहा, पर मोहित सिंह ने अपना गमछा उस के मुंह में ठूंस दिया और अपनी मनमानी कर ली. बलुई को अपने साथ यह जबरन गलत काम बिलकुल नहीं भाया. वह सिसकती रही और घर कर नल के पानी से नहाने लगी. बलुई के मन में तूफान चल रहा था कि अगर वह आज नाइंसाफी सह गई, तो आगे आने वाले समय में जाने कितनी बार ये ऊंची जाति वाले उस के साथ रेप करेंगे. हो सकता है कि कई लोग मिल कर एकसाथ उस के साथ गलत काम करें.


ऐसा बलुई इसलिए भी सोच रही थी कि उस ने अपने बचपन में इस तरह के कई कांड होते हुए देखेसुने थे. अच्छा यही होगा कि वह अपने साथ हुए इस गलत काम के प्रति आवाज उठाए. लिहाजा, बलुई ने अपनी शिकायत को पंचायत में उठाने की बात सोची और अपने पति किसना से अपने साथ हुई वारदात को बताया. किसना दुखी हुआ और गुस्से से भर गया, पर वह जानता था कि सरपंच के लड़के पर ऐसा आरोप लगाने से कोई फायदा नहीं होगा और उस ने यह बात बलुई को सम?ाई पर बदले की भावना से भरी हुई बलुई नहीं मानी और पंचायत में जा कर अपनी शिकायत दर्ज कराई.


सरपंच सोहन ठाकुर अपने लड़के की यह करतूत सुन कर गुस्सा होने की बजाय मन ही मन खुश हो गए.
मेरे बेटे ने भी बलुई का मजा ले लिया. वाह, हमारी पसंद तो काफी मिलतीजुलती है और इस का मतलब है कि मेरा बेटा भी जवान हो गया है,’ सोहन ठाकुर ने सोचा. सरपंच के अलावा पंचायत के दूसरे सदस्यों ने बलुई के साथ हुए गलत काम पर अफसोस जताया और बलुई को भरोसा दिलाया कि उसे इंसाफ मिलेगा और इस के लिए इस हफ्ते की 8 तारीख को दोनों पक्षों की सुनवाई के लिए पंचायत को बुलाए जाने का तय हुआ.


सोहन ठाकुर के सामने दिक्कत यह थी कि अगर वे फैसला बलुई के पक्ष में देते हैं, तो बेटे को सजा सुनानी पड़ेगी और अगर बेटे के पक्ष में फैसला सुनाते हैं, तो हो सकता है कि गांव वाले आने वाले चुनाव में उन्हें वोट दें और वे हार भी सकते हैं. तय दिन और समय पर पंचायत लगी और पहले बलुई ने अपनी शिकायत रखी जिस में बलुई ने अपने साथ हुए रेप की बात बताई और इंसाफ मांगा. इस के बाद मोहित सिंह को बोलने का मौका दिया गया.


मोहित अपने कांड से साफ मुकर गया. उलटा उस ने कहा कि बलुई उस पर ?ाठा आरोप लगा रही है.
दोनों लोगों की बात पर फैसला देना था और यह फैसला सरपंच सोहन ठाकुर ने यह कह कर सुना दिया, ‘‘बलुई अपने साथ हुए रेप का कोई सुबूत नहीं ला सकी है. अगर वह अपने निजी अंगों को सब के सामने दिखा सके तभी तो हम जानेंगे कि रेप हुआ या नहीं. ‘‘लिहाजा, सुबूतों की कमी में मोहित ठाकुर को बरी किया जाता है और बलुई को सख्त हिदायत दी जाती है कि बिना सुबूत किसी शरीफ आदमी पर ऐसे आरोप लगाए.’’ बलुई का मन किया कि सोहन ठाकुर के मुंह पर जा कर थूक दे, पर उस ने अपनेआप को संभाला और बेइज्जती का घूंट पी लिया.


रात में जब किसना ने उसे दिलासा देने के लिए अपने गले लगाया, तो बलुई की रुलाई फूट पड़ी थी, पर इन बहते आंसुओ में बदले लेने की भावना अब भी बलवती हो रही थी. सरपंच सोहन ठाकुर को अपने फैसले पर पछतावा तो हो रहा था, पर पुत्र मोह के चलते उन्हें ऐसा फैसला करना पड़ा, जिस ने बलुई को उन से नाराज कर दिया था. बलुई सरपंच सोहन ठाकुर को सामने देख कर अपना रास्ता बदल लेती या तो उन्हें नफरतभरी निगाह से घूरती रहती थी. सोहन ठाकुर बस बलुई को देखते रह जाते थे. तकरीबन 2 महीने हो चले थे और सोहन ठाकुर को बलुई के जिस्म का मजा नहीं मिला था. अपने मन को शांत करने के लिए बलुई के नहाने के समय पर सोहन ठाकुर छत पर चले गए और हर बार की तरह इस बार भी बलुई को नहाते हुए देखने लगे.


बलुई तो पहले से ही सतर्क थी. आज वह अपने पेटीकोट को अपने सीने के ऊपर बांधे हुए थी. बलुई की कनखियों ने देखा कि सोहन ठाकुर छत पर गए हैं. उस ने ?ाट से अपने पैरों के
पास रखे मोबाइल को उठाया और सैल्फी मोड पर किया और इस तरह से अपना वीडियो बनाने लगी, जिस से बलुई का चेहरा भी एक और पीछे से ठाकुर की ?ांकती हुई वीडियो भी जाए.
बलुई ने यह काम बहुत सफाई से किया, ताकि सोहन को शक भी हो और मोबाइल में सुबूत के तौर पर यह वीडयो भी कैद हो जाए और कुछ देर में ही बलुई ने कई छोटेछोटे वीडियो के क्लिप बना लिए थे.
बलुई के सामने मोहित सिंह और उस के दोस्त अकसर पड़ ही जाते थे. आज भी जब बलुई खेत से मजदूरी कर के रही थी तो मोहित सिंह और उस के दोस्त उसे छेड़ने लगे.


‘‘यार मोहित, जवान औरतों से ज्यादा तो बड़ी उम्र की औरतों में मजा है,’’ एक दोस्त ने फिकरा कसा, तो मोहित सिंह भी भद्दी सी हंसी हंसने लगा. बलुई को तो इसी मौके का इंतजार था, ‘‘तुम ने तो बेकार में जबरदस्ती की, मांग लेते तो भी मैं मना थोड़े ही करती, बल्कि गोश्त और दारू का इंतजाम कर के आप लोगों का मन भी बहला देती,’’ बलुई ने दांव खेला, तो मोहित सिंह उस के ?ांसे में गया और तुरंत ही उस ने जेब से 1,000 रुपए निकाले और बलुई को दिए, फिर कहा कि आज शाम को वह दारू ले आए और गोश्त पका कर रखे. वे लोग आज फिर से बलुई के हुस्न का स्वाद चखेंगे.


बलुई ने पूरा जाल बिछा दिया था. उस ने पंचायत चुनाव में सोहन ठाकुर के विरोधी नेता को अपनी सारी कहानी कह सुनाई थी और उस से मदद मांगी थी. वह नेता भी बलुई की मदद के लिए तैयार था, बस अब सुबूत जुटाने की तैयारी थी. शाम को पुराने स्कूल के एक कमरे में बलुई ने दारू मंगवा ली और गोश्त पकाने लगी थी. मोहित सिंह और उस के 2 दोस्त भी गए और गोश्त पकने का इंतजार करने लगे थे.
मोहित सिंह ने पहले से ही दारू पीनी शुरू कर दी थी. थोड़ी देर बाद जब गोश्त पक गया, तब बलुई ने प्लेट में खाना लगाया और सब लोग साथ में खाने लगे.


खाना खाने के बाद मोहित सिंह की आंखों में हवस के डोरे तैर आए थे. उस ने बलुई के सीने पर हाथ रख दिया और दबाव बढ़ाने लगा. बलुई ने विरोध नहीं किया तो उस की हिम्मत बढ़ गई
और उस ने बलुई के जरूरी कपड़े ऊपर कर दिए. बलुई सम? गई कि यही सही समय है और उस ने इतने में उस ने विरोधी पार्टी के नेता को मदद के लिए फोन लगा दिया और वह फोन पर चिल्ला कर मदद मांगने लगी थी.


वह नेता तुरंत ही पुलिस ले कर गया और मौके पर ही नशे में चूर मोहित सिंह और उस के दोस्तों को गिरफ्तार कर लिया. ‘‘दारोगा साहब, सिर्फ यही कुसूरवार नहीं है, बल्कि इस का बाप भी मु? गरीब को रोज नहाते हुए देखता है,’’ बलुई ने कहा तो दारोगा के साथसाथ मोहित सिंह को भी अजीब लगा कि उस के पिता भी बलुई पर बुरी नजर रखते हैं. बलुई ने अपने मोबाइल का वीडियो पुलिस को दे दिया, जो उस ने अपने मोबाइल से शूट किया था, जिस में साफ दिख रहा था कि बलुई को सोहन ठाकुर अपनी छत से घूर रहे हैं.


सोहन ठाकुर को पुलिस ने खरीखोटी सुनाई और चेतावनी दे कर छोड़ दिया, जबकि उन के लड़के को रेप करने की कोशिश मे गिरफ्तार कर लिया गया. पंचायत चुनाव में सरपंच सोहन ठाकुर की जबरदस्त हार हुई. पूरे गांव में इन दोनों की कारिस्तानी की बात फैल गई थी और सब लोग सोहन ठाकुर और उन के लड़के मोहित सिंह के नाम पर थूथू कर रहे थे. सोहन ठाकुर की पत्नी रूपमती को जब यह बात पता चली, तो वे सीधे बलुई के घर पहुंचीं और अपने पति और बेटे की तरफ से माफी मांगी और पूरे 50,000 रुपए बलुई को दिए.


बलुई ने पैसे लेने से मना किया, तो रूपमती ने कहा, ‘‘ये पैसे मैं तुम्हें इसलिए दे रही हूं, ताकि तुम अपने नहाने की जगह एक बाथरूम बनवा सको और तुम्हें खुले आसमान के नीचे नहाना पड़े. जब तुम बाथरूम में नहाओगी, तो तुम्हें कोई भी नहीं घूर सकेगा.’’ रूपमती यह कह कर चुप हो गई थीं, जबकि बलुई सोच रही थी कि सोहन ठाकुर जैसे नीच को कितनी अच्छी पत्नी मिली है. बलुई अब मोबाइल और भी कुशलता से चलाती है और उस ने और किसना ने खूब मेहनत कर के अब और भी पैसे भी जोड़ लिए हैं, पर अभी भी इतने पैसे नहीं इकट्ठा हो पाए हैं कि वे लोग सड़क के किनारे पक्की दुकान बनवा सकें, पर पैसे कमाने की उन की कोशिश जारी है.


विरोधी पार्टी का नेता अब गांव का सरपंच है और उस ने पंचायत के 5 सदस्यों में बलुई को भी शामिल
किया है. बलुई अब गांव वालों की समस्याएं सुनती है और अपना फैसला भी सुनाती है. बलुई और सरपंच की कोशिश से अब हर घर में नहाने की जगह एक बंद छत वाला बाथरूम बन गया है. गांव की कोई औरत अब खुले में नहीं नहाती है.  Hindi Story

Feature Story: ओटीटी की तरफ रुख कर रही हैं खूबसूरत हीरोइनें

Feature Story: आजकल नई और पुरानी हीरोइनें फिल्मों की बजाय वैब सीरीज करने में दिलचस्पी दिखा रही हैं, क्योंकि वैब सीरीज में उन्हें ऐसा एक किरदार करने का मौका मिलता है, जो दिलचस्प और चैलेंजिंग होता है.
इस के अलावा वैब सीरीज में हीरोइन को उसी वक्त आना होता है, जब उस की जरूरत होती है, क्योंकि एक एक्टर के अपने रोल के लिए वैब सीरीज की टाइम लिमिट कम होती है, इसलिए हीरोइन को ज्यादा समय नहीं देना पड़ता.


फिल्मों में जहां हीरोहीरोइन पर पूरी फिल्म की कहानी टिकी होती है, वहीं वैब सीरीज में कहानी के मुताबिक हर किरदार की अपनी अलग जगह होती है. लिहाजा, जब हीरोइन का शूट होता है, तो उसे उतने समय तक ही अपना काम करना होता है. ऐसे में हीरोइन का समय भी बचता है और पैसा भी अच्छा मिलता है. साथ ही अपना मनपसंद किरदार निभाने का मौका भी मिलता है. अब माधुरी दीक्षित को ही देख लें. वे अपने एक्टिंग कैरियर में 2 पीढि़यों के हीरो के साथ काम कर चुकी हैं, जैसे विनोद खन्ना और अक्षय खन्ना, ऋषि कपूर और रणबीर कपूर.


माधुरी दीक्षित ने साल 2002 के बाद फिल्मों में काम करना बहुत कम कर दिया था, लेकिन अब ओटीटी ने उन का ध्यान अपनी और खींचा, जिस के बाद माधुरी फेम गेममें नैगेटिव रोल में नजर आईं.
इस के बाद माधुरी की एक फिल्ममजा माभी ओटीटी पर रिलीज हुई. फिलहाल वे एक नई वैब सीरीजमिसेज देशपांडेको ले कर चर्चा में हैं, क्योंकि उन्होंने इस वैब सीरीज में ऐसा खतरनाक काम किया है, जिसे देखने के बाद दर्शकों की धड़कनें रुक सकती हैं.


रश्मिका मंदाना, जिन्होंनेपुष्पा’, ‘थामा’, औरसिकंदरजैसी फिल्मों में काम कर के अपनी अलग पहचान बनाई है, ने नैटफ्लिक्स पर गर्लफ्रैंडफिल्म के जरीए दस्तक दी है. मिस यूनिवर्सरह चुकी सुष्मिता सेन ने अपने एक्टिंग कैरियर में कई अच्छी फिल्में दी हैं, लेकिन साल 2010 के बाद से उन्होंने हिंदी फिल्मों से दूरी बना ली थी, लेकिन अब पिछले 2 साल से वे ओटीटी प्लेटफार्म पर अपनी अदाकारी के जलवे बिखेर रही हैं, जिस के चलते वे अपनी वेब सीरीजआर्याको ले कर चर्चा में बनी रही हैं


इस सीरीज के अलावा सुष्मिता सेन अपनी एक और वैब सीरीजतालीको ले कर चर्चा में हैं, जिस में उन्होंने किन्नर का किरदार निभाया है. काजोल की वैब सीरीज ट्रायल :प्यार कानून धोखाका पहला भाग बहुत मशहूर हुआ था. इस वैब सीरीज में काजोल ने एक ऐसी वकील का किरदार निभाया है, जो अपने पति के घोटाले के बाद परिवार के लिए बतौर वकील वापस कोर्ट में पहुंचती है. इस का दूसरा सीजन भी रिलीज हुआ है. रवीना टंडन नैटफ्लिक्स पर आई वैब सीरीजअरण्यमैं नजर आई थीं, जिस में उन्होंने एक पुलिस अफसर का किरदार निभाया है.


ईशा देओल ने शादी के बाद फिल्मों से दूरी बना ली थी, लेकिन अब उन्होंने वैब सीरीजरुद्रसे अजय देवगन के साथ ओटीटी पर वापसी की है. अनन्या पांडे फिल्मों के अलावा वैब सीरीजकाल मी बेमें भी एक्टिंग करती नजर आई हैं. इस वैब सीरीज में उन्होंने एक अमीर लड़की का किरदार निभाया है. इस वैब सीरीज का दूसरा भाग भी जल्दी ही आने वाला है. इस के अलावा शिल्पा शेट्टी मशहूर डायरैक्टर रोहित शेट्टी की वैब सीरीजइंडियन पुलिस फोर्समें पुलिस अफसर के किरदार में नजर आई हैं.


करिश्मा कपूरमैंटलहुडवैब सीरीज में मां के किरदार में नजर आईं, जो जी 5 और अटल बालाजी पर रिलीज हुई थी. वैब सीरीजब्राउनमें वे पुलिस अफसर के किरदार में नजर आएंगी. हुमा कुरैशी, जो वैबसीरीजमहारानी 4’ में भी दबंग किरदार में नजर आई थीं, नेदिल्ली क्राइम 3’में भी अपनी बेहतरीन अदाकारी का लोहा मनवाया है.  Feature Story     
लेखक आरती सक्सेना

Hindi Story: अतरंगी बाबाओं का सतरंगी साम्राज्य

Hindi Story: बाबा लोगों का अपना ही क्रेज होता है जनाब. ये किसी क्रिकेट लीग से कम नहीं, बस फर्क इतना है कि यहां टी-20 की जगह टीकाचंदन और चंदे का चौकाछक्का चलता है. सब से पहले मुखातिब होइए टीकाचंदन स्पैशल बाबाजी से. हाथ में छोटा सा सिंगार बौक्स, माथे पर त्रिपुंड और निगाह हमेशा इस खोज में कि कौन सा यजमान आजसेवाकरवाने के मूड में है.

ये एक हीटके में तिलक लगा कर ऐसा आशीर्वाद देते हैं कि यजमान के पर्स का भार मनचाहे आशीर्वाद के बोझ से तत्काल ही हलका हो जाता है. 100-50 की दैनिक आमदनी से ये खुद तो गुजारा करते ही हैं, साथ में भक्ति भावना की जीडीपी भी बढ़ाते रहते हैं. फिर आते हैं गंगा किनारे वाले बाबा, जिन का लाइफस्टाइलआल इनक्लूसिव नशा पैकेजजैसा होता है.

चिताभस्म का कुदरती फेस पैक लगा कर, गांजाभांग की और्गैनिक स्मूदी पी कर ये संसार से विरक्ति की ऐसी परिभाषा गढ़ते हैं कि मार्केटिंग वाले भी सोच में पड़ जाएं. इन का मूल और मस्त मंत्र हैजीवन माया है, बस नशा सच है’. इन बाबाओं के मदमस्त हालात केआगे बौलीवुड केबाबाका नशा भी कम मालूम पड़ता है.


बाबा की एक और प्रजाति भी है. ये हिमालयन साइलैंस मोड बाबा हैं. ये वे लोग हैं, जिन्होंने परिवार, समाज, बिजली बिल, सब से मुक्ति पा रखी है. इन की साधना इतनी स्ट्रौंग है कि नैटवर्क कंपनी वाले भी इन के इलाके में टौवर लगाने की हिम्मत नहीं करते. लेकिन असली खेल शुरू होता है कथावाचक लग्जरी बाबा से. मंच ऐसा कि बौलीवुड स्टार्स का सैट फीका पड़ जाए.

आवाज में ऐसा उतारचढ़ाव कि औडियंस खुद ही नोटों का पुष्पवर्षा करने लगती है. रोज की लाखों की कमाई, विदेश यात्राएं और कम खर्च में भक्ति का हाई प्रोफाइल संस्करणकथा ब्रांड अध्यात्म’.बात जब भौतिक सुख की हो तो योगी के रूप में भोगी बाबाजी की चर्चा लाजिमी है, विलासी श्रेणी के ऐसे बाबा उम्र के बंधन से मुक्त हो कर राम की बजायकाममें लीन होते हैं.


आइए, अब पंडा समुदाय पर भी थोड़ी रोशनी डालते हैं. धार्मिक स्थलों पर इन का अधिकार ऐसा है कि मानो दिव्य भूमि की रजिस्ट्री इन के पूर्वजों के नाम से है. इन की मुसकान, इन का स्वर सब में दैवीय अनुशासन दिखाई देता है, लेकिन इस ईकोसिस्टम का असलीसिक्योरिटी गार्डहै. दूसरे शब्दों में कहें तो बाबाजी समुदाय का बाउंसर. हट्टेकट्टे, चौड़े कंधे और ऐसी पावरफुल शख्सीयत कि यजमान का श्रद्धा लैवल अचानक 200 फीसदी तक बढ़ जाता है.


इन्हें देख कर लगता है कि मंदिर के चारों ओर कोई धार्मिक डब्लूडब्लूएफ की तैयारी चल रही है. इन बाबा का मेन काम है लाइन में लगे भक्तों को आध्यात्मिक रूप सेसीधेरखना और श्रद्धालुओं में अनुशासन बढ़ाना डराधमका कर दक्षिणा वसूली. वर्तमान में लोकतांत्रिक बाबा भी देखने को मिल रहे हैं, जो बियाबान की बजाय विधानमंडल और संसद में जनप्रतिनिधि बन कर मोहमाया के बीच मोक्ष तलाश रहे हैं.


कुलमिला कर बाबाजी का भी अपना नसीब होता है, किसी को मिलता है गंगा घाट, किसी को मिलता है जंगल का ठाट, किसी को लोकतांत्रिक सौगात, किसी को कथा का माइक, जबकि बाहुबली टाइप वाले बाबाजी को  ‘धार्मिक सिक्योरिटीका रूलटाइम ब्रह्मास्त्र. बहरहाल, समयसमय पर इन बाबाजी की हरकत और तबीयत देख कर यजमान के मुंह से बरबस यही बात निकल जाती है, ‘बाबा रे बाबाबच के रहना रे बाबा…’ Hindi Story       
लेखक विनोद कुमार विक्की

 

Hindi Story: कलम का जादूगर

Hindi Story. ‘‘को आदमी अपनी गाड़ी के सामने गया है,’’ अपने पति मोहन की यह बात सुन कर किसी अनहोनी के डर से गीता का कलेजा कांप उठा.


अभी नीचे उतरने के लिए गाड़ी का दरवाजा खोला ही था कि उस आदमी का चेहरा देख कर गीता चौंक गई. उस ने ?ाट से हथेलियों से अपना चेहरा ढक लिया. वह कोई और नहीं, बल्कि गीता का सालों का खोया हुआ प्यार अजय था, लेकिन गाड़ी की टक्कर से उसे चोट नहीं आई आई थी.
‘‘सर, आप ठीक तो हैं ?’’ मोहन ने ?ाट गाड़ी से नीचे उतर कर अजय को संभालते हुए पूछा.
गीता और मोहन अपने एकलौते बेटे को लेने के लिए दिल्ली के रेलवे स्टेशन जा रहे थे, तभी यह हादसा हुआ था.


‘‘हां, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ अजय ने कहा. ‘‘लेकिन सर, आप यहां कैसे? मोहन ने पूछा.‘‘सर, आज ही मेरी बेटी लंदन से अपनी पढ़ाई पूरी कर के घर वापस आई थी. उस के यहां घूमने की जिद के चलते मैं यहां था,’’ अजय ने बताया. ‘‘लेकिन आप की बेटी इस समय आप के साथ नहीं है?’’ मोहन ने पूछा. ‘‘वह कुछ खरीदारी करने गई थी, आती ही होगी,’’ जवाब में अजय ठहाका मार कर हंस पड़ा, तो गीता भी उस के साथ मुसकरा उठी. काफी अरसे बाद वे दोनों साथ हंस रहे थे, लेकिन अजय को इस बात की जानकारी नहीं थी.


देखते ही देखते वहां लोगों की भीड़ जमा होने लगी. सब की आंखें अजय पर टिकी हुई थीं. लेकिन गीता की समझ में कुछ नहीं रहा था. तभी उस भीड़ को चीरती हुई एक बेहद खूबसूरत गाड़ी कर रुकी. उस गाड़ी के सामने गीता की गाड़ी फीकी लग रही थी. उस गाड़ी की ड्राइविंग सीट से एक लड़की उतरी और अजय को देखते हुए बोली, ‘‘पापा, आप यहां क्या कर रहे हैं? सब ठीक तो है ? यहां इतनी भीड़ क्यों जमा है?’’ ‘‘कुछ नहीं बेटाबस ऐसे ही’’ अजय ने कहा. ‘‘तो फिर घर चलें हम?’’ वह लड़की बोली.


‘‘चलता हूं,’’ अजय ने वहां जमा भीड़ की तरफ हाथ जोड़ते हुए कहा और अपनी गाड़ी की तरफ बढ़ गया. उस के बैठते ही गाड़ी सड़क पर दौड़ने लगी. जब अजय की गाड़ी दूर निकल गई और गीता को यह यकीन हो गया कि अब वह भीड़ की तरफ मुड़ कर देखेगा, तो भी उसे नहीं पहचान पाएगा, लिहाजा वह गाड़ी से नीचे उतर गई. ‘‘कौन था यह आदमी?’’ गीता ने अनजान बनते हुए मोहन से पूछा. ‘‘जादूगर,’’ मोहन ने कहा.


‘‘जादूगर?’’ गीता ने मोहन का यह शब्द बड़े ही जबरदस्त अंदाज में दोहराया. ‘‘हां, कलम का जादूगर. दुनियाभर में इस के लिखे उपन्यास खूब बिकते हैं. फुरसत के पलों में मैं भी इस के उपन्यास बड़े ही चाव से पढ़ता हूं,’’ मोहन ने गीता को बताया. उस समय रात के 2 बज रहे थे, लेकिन गीता की आंखों से नींद कोसों दूर गायब थी. आज उसे रहरह कर पुरानी यादें ताजा हो रही थीं.


गीता अजय की सादगी पर मरमिटी थी. वे दोनों एक ही कालेज में पढ़ते थे और प्यार भी करते थे. लेकिन उन दोनों के प्यार को गीता के भैया की नजर लग गई थी.गीता के भैया नहीं चाहते थे कि वह एक गरीब लड़के से प्यार करे, क्योंकि गीता एक अमीर परिवार से थी, इसलिए उस के भैया की नजर में अजय गरीब होने के साथसाथ एक गंवार और जाहिल लड़का भी था. लेकिन प्यार तो प्यार होता है. एक दिन गीता के भैया ने उन दोनों को एकसाथ देख लिया.

उसी दिन भैया ने गीता की शादी अपने दोस्त के बेटे के साथ तय कर दी. भैया, मैं यह शादी नहीं कर सकती,’ गीता ने कहा. क्यों? क्या बुराई है इस रिश्ते में?’ भैया ने पूछा. कुछ नहीं भैया. बुराई तो आप की बहन में है जो किसी से बेपनाह मुहब्बत कर बैठी है.’ किस से? उस अनपढ़, जाहिल, गंवार लड़के से, जिस के पास कोई ठिकाना नहीं है?’ हां भैया.

आप की यह बहन उस के बगैर जिंदा नहीं रह सकती, इसलिए आप मेरा प्यार मेरी झोली  में अपनी तरफ से भीख समझ कर डाल दीजिए,’ यह कहते हुए गीता ने अपना आंचल भाई के आगे फैलाया ही था कि भाई ने गीता के गाल पर एक थप्पड़ रसीद कर दिया. थप्पड़ इतना जोरदार था कि गीताधड़ामसे फर्श पर गिर गई. गीता को इस बात की कतई उम्मीद नहीं थी. आज अपने मांबाप की बहुत कमी खल रही थी कि तभी अजय की आवाज उस के कानों में गूंजी.


देख लीजिए भैया. अजय आज अपने प्यार को छिनते देख कर आप के पास चला आया है.’ मैं इस की हिम्मत का कद्र करता हूं, लेकिन आज यह मेरे हाथों से जिंदा बच कर नहीं जाएगा,’ कहते हुए भैया दीवार पर टंगी हुई म्यान से तलवार खींच कर दरवाजे की तरफ बढ़ गए. नहीं भैया, आप ऐसा नहीं करेंगे. आप जहां चाहेंगे, मैं वहीं शादी करने के लिए तैयार हूं,’ जब गीता ने यह कहा, तो भैया के बढ़ते कदम रुक गए.


तो जा कर उस से कह दो कि तुम इस शादी से खुश हो. साथ ही यह भी बोल देना कि आज के बाद वह
यहां आसपास भी दिखाई दे,’ भैया ने अपना फैसला सुनाते हुए कहा. अजय गली में खड़ा था. गीता के बाहर आते ही उस ने गीता का हाथ कस कर पकड़ कर कहा, ‘यह मैं क्या सुन रहा हूं…’ तुम ने ठीक सुना है…’ गीता की आवाज कड़क थी, ‘आखिर जिस से मेरी शादी हो रही है, उस के पास सबकुछ है. तुम्हारे पास क्या है?’


क्या तुम ने इसलिए मुझसे से प्यार किया था कि आज मेरी हैसियत का मजाक उड़ा सको?’ गीता ने कुछ नहीं सुना और घर के भीतर चली गई. देखते ही देखते जाने कैसे 25 साल गुजर गए, पता ही नहीं चला और अजय की याद दिल के कोने में ही दब गई. लेकिन उस की याद गीता में एक टीस पैदा कर देती थी. ‘‘गीता सुबह हो गई, तुम कहां खोई हो?’’ मोहन के कहने पर वह वर्तमान में आई.


‘‘अभी थोड़ी देर में उठती हूं,’’ कह कर गीता ने मोहन से पीछा छुड़ाया. थोड़ी देर में मोहन नहाने के लिए बाथरूम में चले गए. अब मोहन से क्या कहती गीता कि वह कभी अजय से दिलोजान से मुहब्बत करती थी. उस दिन के बाद जब भी वह उस के लिखे गए उपन्यास को पढ़ती है, तो उसे अजय से हुई आखिरी मुलाकात याद जाती है.


गीता रोते हुए अजय से बोल रही थी, ‘अजय, आज मुझे इस बात की उतनी तकलीफ नहीं है कि कल सवेरे हम दोनों एकदूसरे से हमेशा के लिए अलग हो जाएंगे, जितना मुझे इस बात की तकलीफ है कि मेरे भैया तुम्हें एक अनपढ़, जाहिल, गंवार से ज्यादा कुछ नहीं समझाते हैं, क्योंकि तुम गरीब हो. इसे हमदर्दी मत समझना पर तुम्हें तुम्हारी गरीबी से नजात दिलाने के लिए मैं तुम्हारे लिए एक कलम लाई हूं.

जिस तरह तुम ने मेरे बगैर जीना नहीं सीखा है, उसी तरह तुम इस कलम से सीख लेना और अच्छा लिखना.तुम अपना चेहरा तभी  मुझे दिखाना जब तुम एक कलम का जादूगर बन चुके होगे,’ इतना कह कर अजय की जेब में कलम रख दी और गीता अपने घर की तरफ बढ़ गई. पुलिस से उगाही करने वालों पर लगा मकोका

दिल्ली में पुलिस वालों कोब्लैकमेलकर वसूली करने वाले गैंग को दबोच कर उस पर महाराष्ट्र कंट्रोल औफ और्गैनाइज्ड क्राइम एक्ट लगा दिया गया. क्राइम ब्रांच की एंटी रौबरी एंड स्नैचिंग सैल ने इस मामले में केस दर्ज किया और गिरोह के सरगना राजकुमार उर्फ राजू मीणा को गिरफ्तार कर लिया. उसे दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट में पेश किया, जहां से 7 दिन की रिमांड मिली.

पुलिस अफसरों ने बताया कि यह उगाही गैंग दिल्ली नौर्थईस्ट जिले में साल 2018 से सक्रिय था, जो ज्यादातर ट्रैफिक पुलिस वालों को टारगेट करता था. ट्रैफिक स्टाफ से कथिततौर पररिश्वतलेते हुए का वीडियो होने का दावा किया जाता था. इस के बाद वे एक लाख से ले कर 5 लाख रुपए तक मांगते थे. पैसा नहीं देने पर गैंग मैंबर आला अफसरों के साथसाथ सोशल मीडिया पर वीडियो शेयर कर कैरियर बरबाद करने की धमकी देते थे. कई पुलिस वाले इस गिरोह के जाल में फंसे, जिन्होंने मोटी रकम दे कर अपना पीछा छुड़ाया.  Hindi Story

लेखक – आनंद कुमार नायक

Hindi Stories: हीरोइन

कहानी-शैलेंद्र सागर

Hindi Stories.स्थानांतरण हमारे जीवन का एक अंग बन चुका था किंतु लखनऊ स्थानांतरण के नाम पर मेरी पत्नी सदैव आतंकित रहती थी. पहले तो सरकारी मकान की दिक्कत और दूसरे, घर पर कामकाज करने वालों की किल्लत. घर के बाकी सब काम तो जैसेतैसे हो जाते थे किंतु बरतन साफ करना, झाड़ू-पोंछा करना ऐसे काम थे जिन्हें सुन कर ही पत्नी का तापमान सामान्य से ऊपर पहुंच जाता था. पूरे घर का वातावरण तनावपूर्ण हो जाता था. दिन भर पत्नी मुझ पर, बच्चों पर और खुद पर भी झल्लाती रहती थी. बच्चों के दोचार थप्पड़ भी लग जाना स्वाभाविक ही था. इसलिए लगभग 5 वर्ष पूर्व जब मैं लखनऊ स्थानांतरित हो कर आया था तो इस आशंका से भयंकर रूप से त्रस्त था.

भागदौड़ कर के दारुलशफा (विधायक निवास) के चक्कर काट कर मुझे कालोनी में मकान मिल गया था. वह मेरे लिए कई दृष्टि से महत्त्वपूर्ण था. किराए के मकानों की दशा से कौन परिचित नहीं है. खुशामद और सामर्थ्य से परे किराया और दिनप्रतिदिन की कहासुनी. तनाव का एक छोटा हिस्सा मकान मिलने से अवश्य कम हुआ था किंतु उस का अधिकांश भाग तब तक घर पर मंडराता रहा जब तक चौकाबासन करने वाली महरी की व्यवस्था नहीं हो गई.

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वास्तव में पत्नी से अधिक महरी की चिंता मुझे थी. मैं ने लखनऊ आते ही पूछताछ करनी प्रारंभ कर दी थी. आसपास के घरों में सुबहशाम आतीजाती महरीनुमा औरतों पर निगाह रखना शुरू कर दिया था. 1-2 महरियां दीख पड़ीं, लेकिन उन्होंने बात करते ही ‘खाली नहीं’ की तख्ती दिखा दी. एक सप्ताह बाद पत्नी का धैर्य तेज धूप में कच्ची दीवार सा चटखने लगा. 15 दिन बीततेबीतते उस के चेहरे पर तनाव भी परिलक्षित होना स्वाभाविक ही था.

इतनी बड़ी कालोनी में मेरे ही विभाग के अनेक अधिकारी निवास करते थे. धीरेधीरे मैं ने सभी के सामने महरी की समस्या रखी. अंतत: कमला के बारे में मुझे पता चला किंतु सहयोगी अरविंदजी ने मुझे उस की चर्चा के साथ ही सचेत करते हुए कह दिया था, ‘‘भाई, कालोनी की हीरोइन है कमला, एकदम आधुनिका. बड़ी नखरेबाज. उस की हर किसी के साथ निभ पाना संभव नहीं है.’’ मैं ने पत्नी को आ कर सब बता दिया था और कमला को बुलाने का आग्रह किया था.

कमला आई थी तो उसे देख कर मैं भी पहले दिन ही चकित रह गया था. वह देखने में 30 के आसपास थी. सांवला रंग किंतु तीखे नाकनक्श, सलीके से संवरी हुई आकृति और साफसुथरे कपड़े, अंगूठी से घिरी 2 उंगलियां, कलाई में घड़ी और साधारण एड़ी वाली चप्पलें. उसे देख कर यह विश्वास नहीं हुआ कि वह स्त्री घरों में बरतन मांजने और झाड़ ूपोंछे का काम करती थी.

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प्रारंभिक वार्त्ता के बाद कमला ने कार्य प्रारंभ कर दिया था. बाद में पता चला था कि वह इत्तफाक ही था कि एक अधिकारी के स्थानांतरण के फलस्वरूप कमला अभी हाल में ही खाली हुई थी. वरना उस का नियम था कि वह एक ही समय में 5 से अधिक घरों में काम नहीं करती थी.

कमला का काम जहां एक ओर अति स्वच्छ व व्यवस्थित था वहीं दूसरी ओर उस में स्वयं एक सौम्यता व गंभीरता दीख पड़ती थी. घड़ी की सूइयों के साथ वह प्रात: सवा 8 बजे आती थी और 45 मिनट में सारे कार्यों से निवृत्त हो कर चली जाती थी. सायं ठीक सवा 5 बजे कमला घर में घुसती थी और पौने 6 बजे तक घर से निकल जाती थी. न तो वह अधिक बोलती थी और न ही उसे सुनने की कोई आदत थी.

जैसेजैसे समय बीतता गया, हम कमला के बारे में और अधिक जानते गए. उस का पति बीमा कार्यालय में चपरासी था. 3 बच्चे थे उन के. बड़ा लड़का और 2 लड़कियां. कमला को देख कर हम तो यही सोचते थे कि अभी बच्चे छोटे ही होंगे. किंतु मुझे उस दिन घोर आश्चर्य हुआ जब एक 16-17 वर्षीय लड़के ने घर आ कर पूछा था, ‘‘मां आई थीं?’’

‘‘किस की मां?’’ पत्नी ने सकपका कर पूछा था.

‘‘मेरी मां, कमलाजी.’’

‘‘कमला,’’ पत्नी हतप्रभ सी धीरे से मुसकरा दी. फिर सहजता धारण कर के बोली, ‘‘हमारे यहां तो सवा 5 बजे आती है. अभी तो देर है.’’

वह लड़का अभिवादन कर के लौट गया.

पता नहीं क्यों पत्नी के हृदय में एक कुलबुलाहट सी हुई. उस दिन कमला के आने पर पत्नी ने उस के लड़के के आने के बारे में बताते हुए बातों का सिलसिला शुरू कर दिया.

‘‘जी, बीबीजी,’’ कमला ने बताया, ‘‘घर पर अचानक कुछ मेहमान आ गए थे. जल्दी में थे. इसलिए लड़का ढूंढ़ रहा था.’’

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‘‘मगर तुम्हारा लड़का और इतना बड़ा?’’ पत्नी रोक न सकी अपनी जिज्ञासा को.

कमला ने शरम से मुंह नीचे कर लिया. पहली बार उस के चेहरे पर स्मित की लहरें उभर आईं.

‘‘तुम देखने में तो इतनी बड़ी उम्र की नहीं लगती हो?’’ पत्नी ने धीरे से बात बनाई थी.

कमला हंसने लगी. फिर दबे स्वर में बोली, ‘‘बीबीजी, कुछ तो शादी ही जल्दी हो गई थी. वैसे अब 33 की तो हो ही रही हूं.’’

कमला ने आगे बताया था कि उस के पिता बरेली में एक स्कूल में अध्यापक थे. घर में पढ़नेलिखने का वातावरण भी था. कमला की 2 बहनों ने इंटर पास किया था. उन की शादी हो गई थी. छोटा भाई बी.ए. कर के कचहरी में बाबू हो गया था.

कमला जब केवल 15 वर्ष की ही थी तो पड़ोस में रह रहे नवयुवक के प्रेमजाल में फंस कर वह उस के साथ लखनऊ चली आई थी. उस समय वह 9वीं की परीक्षा दे चुकी थी. नवयुवक यानी उस के पति के मामा ने उन्हें शरण दी थी तथा कचहरी में विवाह कराया था. उस का पति हाईस्कूल पास था. मामा ने ही सिफारिश कर के उस की बीमा दफ्तर में नौकरी लगवा दी थी.

कमला के पिता और घर के अन्य सदस्य उस घटना के बाद इतने अपमानित व क्षुब्ध थे कि उन्होंने कमला से सदा के लिए अपने संबंध विच्छेद कर लिए थे. उधर पति के घर वाले भी उतने ही नाराज थे किंतु धीरेधीरे उन से संबंध सुधर गए थे.

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लगभग 1 वर्ष बाद पुत्र का जन्म हुआ था और बाद में 2 लड़कियों का. अब उन में से एक 15 साल की थी और दूसरी 9 साल की.

हमें लखनऊ में आए लगभग 3 साल बीत चुके थे. अब सब व्यवस्थित हो चला था. कमला से कभीकभार खुल कर बातें भी होने लगी थीं किंतु न तो उस के नित्यक्रम में कोई अंतर आया था और न ही उस में.

कमला की कुछ और भी विशिष्टताएं थीं. वह कभी हमारे घर पर कुछ खातीपीती नहीं थी. और तो और वह कभी चाय भी नहीं लेती थी. घर से खाने का कोई सामान स्वीकार न करना और न ही तीजत्योहार पर किसी अतिरिक्त पैसे, कपड़े या वस्तु की मांग करना. प्रारंभ में हमें लगा कि संभवत: महानगर की ऐसी ही प्रथा हो, किंतु बाद में यह भ्रांति भी दूर हो गई.

उस दिन के बाद कमला का लड़का भी कभी हमारे घर नहीं आया था. पता चला था कि वह हाईस्कूल की परीक्षा में 2 बार फेल हो चुका था. अब तीसरी बार परीक्षा दी थी.

कमला की लड़कियों का हमारे घर पर आने का कोई प्रश्न ही नहीं उठता था.

एक दिन जब पत्नी ने कमला से उस की 2 दिन की अनुपस्थिति में किसी लड़की को काम पर भेजने को कहा था तो पहली बार कमला रोष व खीज भरे स्वर में बोली थी, ‘‘नहीं, बीबीजी, मैं अपनी लड़की को नहीं भेज सकती. जो काम मैं उन बच्चों के लिए करती हूं वह उन को करते नहीं देख सकती हूं.’’

उस वर्ष जब हाईस्कूल बोर्ड का परीक्षाफल आया और कमला का लड़का तीसरी बार अनुत्तीर्ण हुआ तो कमला क्षोभ व यंत्रणा से टूटी सी लगती थी. पत्नी के पूछने पर उस के नेत्र छलछला उठे. फिर सिसकियां ले कर रोने लगी. साथ ही भरभराए स्वर में कहने लगी, ‘‘बीबीजी, सिर्फ इन बच्चों के लिए यह काम करना शुरू किया था, जिस से वे अच्छी तरह रह सकें, अच्छा पहनेंखाएं और पढ़लिख कर लायक बन जाएं.’’

कुछ पल शांत रही कमला. फिर बताने लगी, ‘‘बाबूजी, हमारे पूरे खानदान में यह काम किसी ने नहीं किया था, लेकिन मैं ने सिर्फ बच्चों की खातिर यह धंधा अपनाया था.’’

साड़ी का पल्लू निकाल कर कमला ने आंसू पोंछे. फिर आगे बोली, ‘‘मेरा आदमी मुझ से इस धंधे के पीछे बड़ा नाराज हुआ. दुखी भी हुआ. घर के गुजारे लायक उस को पैसा मिलता था. उस के साथ के चपरासी ऐसे ही रह रहे हैं, लेकिन मैं ने जिद कर के यह काम किया. जानती थी कि उस की आमदनी में काम तो चल जाएगा. लेकिन मैं बच्चों को पढ़ालिखा नहीं सकूंगी. उन्हें ठीक तरह नहीं रख पाऊंगी.

‘‘मैं ने मुन्ना को बड़े चाव से पढ़ाना चाहा था, लेकिन वह पढ़ता ही नहीं है. उस के पापा तो पिछले साल ही पढ़ाई बंद करा रहे थे. उसे कपड़े की दुकान पर लगवा भी दिया था, लेकिन मैं ने जिद कर के वह काम छुड़वाया और पढ़ने भेजा.

‘‘आज सुबह जब नतीजा आया तो मुन्ना को तो डांटाडपटा ही मेरे आदमी ने, मुझे भी बुराभला कहा. फिर आज ही मुन्ना काम पर चला गया उस दुकान पर.’’

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कहतेकहते कमला का स्वर बोझिल हो कर टूट सा गया.

‘‘कैसी दुकान है?’’ कुछ देर शांत रह कर कुछ न सूझते हुए पत्नी ने पूछ लिया.

‘‘कपड़े की, जनपथ में है.’’

‘‘कितना देंगे?’’

‘‘यही करीब 300-350 रुपए. मगर बीबीजी, मुझे पैसे का क्या करना है. मुन्ना पढ़ लेता तो जीवन की आस पूरी हो जाती. मेरा यों दरदर ठोकरें खाना सफल हो जाता,’’ कहते हुए कमला की आंखों में एक गीली परत सी जम गई.

कमला की व्यथा सुन कर मैं भी दुखित हो चला था. सचमुच एक विडंबना ही तो थी यह उस की.

उस घटना के बाद कमला दुखी व परेशान सी रहने लगी थी. ऐसा लगता था जैसे कोई दुख उस के हृदय को लगातार बरमे की तरह सालता था. मानो काले बादलों का साया उस के अंतरंग में घुटन सी पैदा कर रहा था. सब काम नियमित रूप से करते हुए भी कमला स्फूर्तिहीन व निस्पंद सी दीख पड़ती थी. कभीकभी यह आशंका होती थी कि कहीं वह काम करना ही न छोड़ दे. किंतु जब 6 माह बीत गए तो पत्नी आश्वस्त हो गई. कमला भी धीरेधीरे सामान्य हो चली थी.

एक दिन कमला ने एक सप्ताह के अवकाश के संबंध में पत्नी से कहा तो उस का आशंकित हो उठना स्वाभाविक था, ‘‘क्या कामवाम छोड़ने का विचार है?’’ अपने संदेह व आशंका को एक धीमी मुसकान से ढांपते हुए पत्नी ने पूछा था.

‘‘नहीं, बीबीजी, ऐसी कोई बात नहीं है,’’ कमला ने सहजता से उत्तर दिया, ‘‘मेरी लड़की की शादी है.’’

‘‘सचमुच?’’ पत्नी ने अचंभे से कमला को देखा.

‘‘हां, बीबीजी. 17 पूरे कर चली है. लड़का मिल गया है सो शादी पक्की कर डाली है.’’

‘‘ठीक ही तो किया तुम ने.’’

‘‘और करती भी क्या. उस को भी पढ़ाने की लाख कोशिश की, लेकिन 9वीं से आगे नहीं पढ़ सकी. मेरी ही तरह रही,’’ कह कर हंस दी वह, ‘‘मैं ने सोचा कि कुछ और न हो इस से पहले ही उस के हाथ पीले कर दूं और छुट्टी पा लूं.’’

कमला के आग्रह पर हम दोनों विवाह में सम्मिलित हुए थे. पत्नी एक बार पहले भी उस के घर जा चुकी थी. उस ने मुझे कमला के घर के रखरखाव के बारे में बताया था. टीवी, सोफा, खाने की मेजकुरसियां, ड्रेसिंग टेबल, सबकुछ उस के घर में था.

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आज उस का घर देख कर मैं भी चकित रह गया था. शादी का स्तर भी मध्यवर्गीय परिवार जैसा ही था. कहीं कोई कमी नहीं दीख पड़ी. वह सब देख कर जाने क्यों मेरे हृदय में कहीं अंदर अतीव सुख व संतोष की भावना प्रवाहित हो गई थी.

लड़की के विवाह के बाद एक बार फिर हमें ऐसा लगा कि अब कमला अवश्य काम छोड़ देगी, किंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ.

एक दिन पत्नी ने मुझे बताया कि कमला मुझ से कोई बात करना चाहती थी. सुन कर मुझे आश्चर्य हुआ. अगले दिन मैं ने स्वयं कमला से पूछा था, ‘‘कमला, तुम्हें कुछ बात करनी थी?’’

‘‘जी, बाबूजी,’’ हाथ धो कर वह मेरे पास आ कर नीचे जमीन पर बैठ गई, ‘‘कुछ काम था.’’

‘‘बोलो?’’ आत्मीयता भरे स्वर में मैं ने इजाजत दी थी.

‘‘छोटी मुन्नी का किसी अच्छे स्कूल में दाखिला करा दीजिए.’’

‘‘किस क्लास में?’’

‘‘जी, उस ने कानवेंट से 5वीं पास की है. क्लास में दूसरे नंबर पर आई है. अब छठी में जाएगी. उस की अध्यापिका उस की बड़ी तारीफ कर रही थीं. कह रही थीं कि मैं उसे खूब पढ़ाऊं. मैं उसे किसी अच्छे अंगरेजी स्कूल या सेंट्रल स्कूल में डालना चाहती हूं. मेरी हिम्मत नहीं पड़ती थी. इसलिए आप से ही विनती करने आई हूं.’’

मैं स्तंभित सा सुनता रहा.

‘‘क्यों नहीं. आज ही ले आओ उसे. मैं ले कर चला जाऊंगा. दाखिला भी करवा दूंगा,’’ मैं ने कमला को आश्वासन दिया.

कमला मेरे पैरों को छूने लगी, ‘‘मुझ पर बड़ा एहसान होगा आप का. यह लड़की पढ़ लेगी तो जीवनभर आप को याद करूंगी.’’

‘‘लेकिन तुम ने कभी बताया ही नहीं कि तुम्हारी लड़की कानवेंट में है और पढ़ने में इतनी अच्छी है.’’

‘‘बाबूजी, क्या बताती, मेरी तो आखिरी आशा है वह. कभी लगता है उस को दूसरों से ज्यादा मेरी ही नजर न लग जाए.’’

मैं सुन कर हंसने लगा. वातावरण की गंभीरता टूट चुकी थी. इसलिए मैं ने पूछ ही लिया, ‘‘मगर तुम ने उसे दोनों बच्चों के बीच कैसे पाला?’’

‘‘बस, बाबूजी, शुरू से छोटी मुन्नी को एकदम अलग ही रखा दोनों बच्चों से. उस के लिए अध्यापक लगाए, पढ़ाने से ज्यादा उस को अलग रखने के लिए. वह जो मांगती है, उसे देती हूं,’’ कुछ क्षण रुक कर फिर धीमे से कहने लगी कमला, ‘‘उसे आज तक यह नहीं मालूम कि मैं क्या काम करती हूं. बाबूजी, हो सकता है कि वह जान कर अच्छे बच्चों में खुल कर घुलमिल न पाए.’’

कमला की आंखें डबडबा उठी थीं. मेरे दिल के तार भी जैसे झंकृत हो उठे थे.

कमला उठ कर अपने काम में लग गई.

तब से मैं भी यह मानता हूं कि कमला वास्तव में हीरोइन है. उस रूप में नहीं जिस में लोग उसे कहतेसमझते हैं बल्कि एक नए अर्थ में, एक नए संदर्भ में. Hindi Stories

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Hindi Story: बिट्टू

Hindi Story.‘‘आज बिट्टू ने बहुत परेशान किया,’’ शिशुसदन की आया ने कहा.

‘‘क्यों बिट्टू, क्या बात है? क्यों इन्हें परेशान किया?’’ अनिता ने बच्चे को गोद में उठा कर चूम लिया और गोद में लिएलिए ही आगे बढ़ गई.

बिट्टू खामोश और उदास था. चुपचाप मां की गोद में चढ़ा इधरउधर देखता रहा. अनिता ने बच्चे की खामोशी महसूस की. उस का बदन छू कर देखा. फिर स्नेहपूर्वक बोली, ‘‘बेटे, आज आप ने मां को प्यार नहीं किया?’’

‘‘नहीं करूंगा,’’ बिट्टू ने गुस्से में गरदन हिला कर कहा.

‘‘क्यों बेटे, आप हम से नाराज हैं?’’

‘‘हां.’’

‘‘लेकिन क्यों?’’ अनिता ने पूछा और फिर बिट्टू को नीचे उतार कर सब्जी वाले से आलू का भाव पूछा और 1 किलो आलू थैले में डलवाए. कुछ और सब्जी खरीद कर वह बिट्टू की उंगली थामे धीरेधीरे घर की ओर चल दी.

‘‘मां, मैं टाफी लूंगा,’’ बिट्टू ने मचल कर कहा.

‘‘नहीं बेटे, टाफी से दांत खराब हो जाते हैं और खांसी आने लगती है.’’

‘‘फिर बिस्कुट दिला दो.’’

‘‘हां, बिस्कुट ले लो,’’ अनिता ने काजू वाले नमकीन बिस्कुट का पैकेट ले कर  2 बिट्टू को पकड़ा दिए और शेष थैले में डाल लिए.

अनिता बेहद थकी हुई थी. उस की इच्छा हो रही थी कि वह जल्दी से जल्दी घर पहुंच कर बिस्तर पर ढेर हो जाए. पंखे की ठंडी हवा में आंखें मूंदे लेटी रहे और अपने दिलोदिमाग की थकान उतारती रहे. फिर कोई उसे एक प्याला चाय पकड़ा दे और चाय पी कर वह फिर लेट जाए.

लेकिन ऐसा संभव नहीं था. घर जाते ही उसे काम में जुट जाना था. महरी भी 2-3 दिन की छुट्टी पर थी.

यही सब सोचते हुए अनिता घर पहुंची. साड़ी उतार कर एक ओर रख दी और पंखा पूरी गति पर कर के ठंडे फर्श पर लेट गई. बिट्टू ने अपने मोजे और जूते उतारे और उस के ऊपर आ कर बैठ गया.

‘‘मां…’’

‘‘हूं.’’

‘‘कल से मैं वहां नहीं जाऊंगा.’’

‘‘कहां?’’

‘‘वहीं, जहां रोज तुम मुझे छोड़ देती हो. मैं सारा दिन तुम्हारे पास रहूंगा,’’ कहते हुए बिट्टू अपना चेहरा अनिता के गाल से सटा कर लेट गया.

‘‘फिर मैं दफ्तर कैसे जाऊंगी?’’ अनिता ने मुसकराते हुए कहा.

‘‘मत जाइए,’’ बिट्टू ने मुंह फुला लिया.

‘‘फिर मेरी नौकरी नहीं छूट जाएगी?’’

‘‘छूट जाने दीजिए…लेकिन कल मैं वहां नहीं जाऊंगा.’’

‘‘मत जाना,’’ अनिता ने झुंझलाते हुए कह दिया.

‘‘वादा,’’ बिट्टू ने बात की पुष्टि करनी चाही.

‘‘हां…देखूंगी,’’ कह कर अनिता अतीत में खो गई.

नौकरी करने की अनिता की बिलकुल इच्छा नहीं थी. वह तो घर में ही रहना चाहती थी. और घर में रह कर वह ऐसा काम जरूर करना चाहती थी, जिस से कुछ आर्थिक लाभ होता रहे.

शुरू में उस ने अपनी यह इच्छा अजय पर जाहिर की थी. सुन कर वे बेहद खुश हुए थे और वादा कर लिया था कि वे कोशिश करेंगे कि उसे जल्दी ही कोई काम मिल जाए.

बिट्टू डेढ़ साल का ही था, जब एक दिन अजय खुशी से झूमते हुए आए और बोले, ‘आज मैं बहुत खुश हूं.’

‘क्या हुआ?’ अनिता ने आश्चर्य से पूछा.

‘तुम्हें नौकरी मिल गई है.’

‘क्या?’ उस का मुंह खुला रह गया, ‘लेकिन अभी इतनी जल्दी क्या थी.’

‘क्या कहती हो. नौकरी कहीं पेड़ों पर लगती है कि जब चाहो, तोड़ लो. मिलती हुई नौकरी छोड़ना बेवकूफी है,’ अजय अपनी ही खुशी में डूबे, बोले जा रहे थे. उन्होंने अनिता के उतरे हुए चेहरे की तरफ नहीं देखा था.

‘लेकिन अजय, मैं अभी नौकरी नहीं करना चाहती. बिट्टू अभी बहुत छोटा है. जरा सोचो, भला मैं उसे घर में अकेले किस के पास छोड़ कर जाऊंगी.’

‘तुम इस की चिंता मत करो,’ अजय ने अपनी ही रौ में कहा.

‘क्यों न करूं. जब तक बिट्टू बड़ा नहीं हो जाता, मैं घर से बाहर जा कर नौकरी करने के बारे में सोच भी नहीं सकती.’

‘कैसी पागलों जैसी बातें करती हो.’

‘नहीं, अजय, तुम कुछ भी कहो, मैं बिट्टू को अकेले…’

‘मेरी बात तो सुनो, आजकल कितने ही शिशुसदन खुल गए हैं. वहां नौकरीपेशा महिलाएं अपने बच्चों को सुबह छोड़ जाती हैं और शाम को वापस ले जाती हैं,’ अजय ने मुसकराते हुए कहा.

‘नहीं, मैं अपने बच्चे को अजनबी हाथों में नहीं सौपूंगी,’ अनिता ने परेशान से स्वर में कहा.

‘बिट्टू वहां अकेला थोड़े ही होगा. सुनो, वहां तो 3-4 महीने तक के बच्चे महिलाएं छोड़ जाती हैं. क्या उन्हें अपने बच्चों से प्यार नहीं होता?’ अनिता के सामने कुरसी पर बैठा अजय उसे समझाने की कोशिश कर रहा था.

‘लेकिन…’

‘लेकिन क्या?’ अजय ने झुंझला कर कहा.

अनिता अभी भी असमंजस में पड़ी थी. भला डेढ़ साल का बिट्टू उस के बिना सारा दिन अकेला कैसे रहेगा. यही सोचसोच कर वह परेशान हुई जा रही थी.

‘तुम देखना, 4-5 दिन में ही बिट्टू वहां के बच्चों के साथ ऐसा हिलमिल जाएगा कि फिर घर आने को उस का मन ही नहीं करेगा,’ अजय ने कहा.

लेकिन अनिता का मन ऊहापोह में ही डूबा रहा. वह अपने मन को व्यवस्थित नहीं कर पा रही थी. बिट्टू को अपने से सारे दिन के लिए अलग कर देना उसे बड़ा अजीब सा लग रहा था.

जब पहले दिन अनिता बिट्टू को शिशुसदन छोड़ने गई थी तो वह इस तरह बिलखबिलख कर रोया था कि अनिता की आंखें भर आई थीं. अजय उस का हाथ पकड़ कर खींचते हुए वहां से ले गए थे.

दफ्तर में भी सारा दिन उस का मन नहीं लगा था. उस की इच्छा हो रही थी कि वह सब काम छोड़ कर अपने बच्चे के पास दौड़ी जाए और उसे गोद में उठा कर सीने से लगा ले.

कितना वक्त लगा था अनिता को अपनेआप को समझाने में. शुरूशुरू में वह यह देख कर संतुष्ट थी कि बिट्टू जल्दी ही और बच्चों के साथ हिलमिल गया था. लेकिन इधर कई दिनों से वह देख रही थी कि बिट्टू जैसेजैसे बड़ा होता जा रहा था, कुछ गंभीर दिखने लगा था.

वह जब भी दफ्तर से लौटती तो देखती कि बिट्टू सड़क की ओर निगाहें बिछाए उस का इंतजार कर रहा होता. अपने बेटे की आंखों में उदासी और सूनापन देख कर कभीकभी वह सहम सी जाती.

दरवाजे की घंटी बजी तो अनिता की तंद्रा टूटी. बिट्टू उस के चेहरे पर ही अपना चेहरा टिकाए सो गया था. उसे धीरे से उस ने बिस्तर पर लिटाया और जल्दी से गाउन पहन कर दरवाजा खोला तो अजय ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘क्या बात है, आज बड़ी थकीथकी सी लग रही हो?’’

‘‘नहीं, ऐसे ही कुछ…तुम बैठो मैं चाय लाती हूं,’’ अनिता ने कहा और रसोई में आ गई. लेकिन रसोई में घुसते ही वह सिर पकड़ कर बैठ गई. वह भूल ही गई थी कि महरी छुट्टी पर है. सारे बरतन जूठे पड़े थे. उस ने जल्दी से कुछ बरतन धोए और चाय का पानी चढ़ा दिया.

‘‘बिट्टू क्या कर रहा है?’’ चाय का घूंट भरते हुए अजय ने पूछा.

‘‘सो रहा है.’’

‘‘इस समय सो रहा है?’’ सुन कर अजय को आश्चर्य हुआ.

‘‘हां, शायद दोपहर में सोया नहीं होगा,’’ अनिता ने कहा और फिर दो क्षण रुक कर बोली, ‘‘सुनो, आज बिट्टू बहुत परेशान था. उस ने मुझ से ठीक से बात भी नहीं की. बहुत गुमसुम और गंभीर दिखाई दे रहा था.’’

‘‘क्यों?’’ अजय ने हैरानी से पूछा.

‘‘कह रहा था कि मुझे वहां अच्छा नहीं लगता. मैं घर पर ही रहूंगा. दरअसल, वह चाहता है कि मैं सारा दिन उस के पास रहूं,’’ अनिता ने झिझकते हुए कहा.

अजय थोड़ी देर सोचते रहे, फिर बोले, ‘‘तुम खुद ही उस से चिपकी रहना चाहती हो.’’

‘‘क्या कहा तुम ने?’’ अनिता के अंदर जैसे भक्क से आग जल उठी, ‘‘मैं उस की मां हूं, दुश्मन नहीं. फिर तुम्हारी तरह निर्दयी भी नहीं हूं, समझे.’’

‘‘शांत…शांत…गुस्सा मत करो. जरा ठंडे दिमाग से सोचो. इस के अलावा और कोई हल है इस समस्या का?’’

‘‘खैर, छोड़ो इस बात को. तुम जल्दी से तैयार हो जाओ. साहब के लड़के के जन्मदिन पर देने के लिए कोई तोहफा खरीदना है.’’

‘‘तुम चले जाओ, आज मैं नहीं जा पाऊंगी,’’ अनिता उठते हुए बोली.

‘‘तुम्हारी बस यही आदत मुझे अच्छी नहीं लगती. जराजरा सी बात पर मुंह फुला लेती हो. उठो, जल्दी से तैयार हो जाओ.’’

‘‘नहीं, अजय, मुंह फुलाने की बात नहीं है. काम बहुत है. महरी भी छुट्टी पर है. अभी कपड़े भी धोने हैं.’’

‘‘अच्छा फिर रहने दो. मैं ही चला जाता हूं.’’

अनिता चाय के बरतन समेट कर जाने लगी तो अजय ने फिर पुकारा, ‘‘अरे, सुनो.’’

‘‘अब क्या है?’’ उस ने मुड़ कर पूछा.

‘‘जरा देखना, कोई ढंग की कमीज है, पहनने के लिए.’’

‘‘तुम उस की चिंता मत करो,’’ अनिता ने कहा और अंदर चली गई. अजय ने चप्पलें पैरों में डालीं और फिर बिना हाथमुंह धोए ही बाहर निकल गया. अनिता ने बिट्टू को उठा कर नाश्ता कराया और फिर उसे खिलौनों के बीच में बैठा दिया.

घर भर के काम से निबट कर अनिता खड़ी हुई तो देखा, घड़ी 12 बजा रही थी. कमरे में आई तो देखा कि अजय और बिट्टू दोनों फर्श पर गहरी नींद में डूबे हुए हैं. वह भी बत्ती बुझा कर बिट्टू के बगल में लेट गई. शीघ्र ही गहरी नींद ने उसे आ घेरा.

सुबह शिशुसदन जाने के लिए तैयार होते वक्त बिट्टू फिर बिगड़ने लगा, ‘‘मैं वहां नहीं जाऊंगा. मैं घर में ही रहूंगा. बगल वाली चाची को देखो, सारा दिन घर में रहती हैं बबली को वह हमेशा अपने पास रखती हैं. और तुम मुझे हमेशा दूसरों के पास छोड़ देती हो. तुम गंदी मां हो, अच्छी नहीं हो. मैं वहां नहीं जाऊंगा.’’

‘‘हम आप के लिए बहुत सारी चीजें लाएंगे. जिद नहीं करते बिट्टू. फिर तुम अकेले तो वहां नहीं होते. वहां कितने सारे तुम्हारे दोस्त होते हैं. सब के साथ खेलते हो. कितना अच्छा लगता होगा,’’ अनिता ने समझाने के लहजे में कहा.

‘‘नहीं, मुझे अच्छा नहीं लगता. मैं वहां नहीं जाऊंगा. आया डांटती रहती है. कल मेरी निकर खराब हो गई थी. मैं ने जानबूझ कर थोड़े ही खराब की थी.’’

‘‘हम आया को डांट देंगे. चलो, जल्दी उठो. देर हो रही है. जूतेमोजे पहनो.’’

‘‘मैं यहीं लेटा रहूंगा?’’ बिट्टू जमीन पर फैल गया.

अनिता को अब खीझ सी होती जा रही थी, ‘‘बिट्टू, जल्दी से उठ जा, वरना पिताजी बहुत गुस्सा होंगे. दफ्तर को भी देर हो रही है.’’

‘‘होने दो,’’ बिट्टू ने चीख कर कहा और दूसरी तरफ पलट गया. अनिता बारबार घड़ी देख रही थी. उसे गुस्सा आ रहा था, पर वह गुस्से को दबा कर बिट्टू को समझाने की कोशिश कर रही थी.

‘‘अरे भई, क्या बात है, कितनी देर लगाओगी?’’ बाहर से अजय ने पुकारा.

‘‘बस, 2 मिनट में आ रही हूं,’’ अनिता ने चीख कर अंदर से जवाब दिया और बिट्टू से बोली, ‘‘देख, अब जल्दी से उठ जा, नहीं तो मैं तुझे थप्पड़ मार दूंगी.’’

‘‘नहीं उठूंगा,’’ बिट्टू चिल्लाया.

‘‘नहीं उठेगा?’’

‘‘नहीं…नहीं…नहीं जाऊंगा…तुम जाओ…मैं यहीं रहूंगा.’’

‘तड़ाक.’ अनिता ने गुस्से से एक जोरदार तमाचा उस के गाल पर दे मारा, ‘‘अब उठता है कि नहीं, या लगाऊं दोचार और…’’

अनिता का गुस्से से भरा चेहरा देख कर और थप्पड़ खा कर बिट्टू सहम गया.

वह धीरे से उठ कर बैठ गया और डबडबाई आंखों से अनिता की ओर देखने लगा. फिर चुपचाप उठ कर जूतेमोजे पहनने लगा. अनिता उस का हाथ पकड़ कर करीबकरीब घसीटते हुए बाहर आई. दरवाजे पर ताला लगाया और स्कूटर पर पीछे बैठ गई. हमेशा की तरह बिट्टू आगे खड़ा हो गया.

शिशुसदन में छोड़ते वक्त अनिता ने बिट्टू को प्यार किया और अपना गाल उस की तरफ बढ़ा दिया पर बिट्टू ने अपना मुंह दूसरी तरफ घुमा लिया और आगे बढ़ गया.

‘‘अच्छा बिट्टू,’’ अनिता ने हाथ हिलाया पर बिट्टू ने मुड़ कर भी नहीं देखा.

अनिता को आघात लगा, ‘‘बिट्टू,’’ उस ने फिर पुकारा.

‘‘अब चलो भी. पहले ही इतनी देर हो गई है,’’ अजय ने अनिता का हाथ पकड़ कर लगभग घसीटते हुए कहा, ‘‘तुम्हारा कोई भी काम समय से नहीं होता,’’ स्कूटर स्टार्ट करते हुए उस ने अनिता की ओर देखा.

वह अभी भी बिट्टू को जाते हुए देख रही थी.

‘‘अब बैठो न, खड़ीखड़ी क्या देख रही हो. तुम औरतों में तो बस यही खराबी होती है. जराजरा सी बात पर परेशान हो जाती हो,’’ अजय ने झल्लाते हुए कहा.

पर अनिता अब भी वैसे ही खड़ी थी, मानो उस ने अजय की आवाज को सुना ही न हो.

‘‘तुम चलती हो या मैं अकेला चला जाऊं?’’ अजय दांत पीसते हुए बोला.

लेकिन अनिता जैसे वहां हो कर भी नहीं थी. उस की आंखों में बिट्टू का सहमा हुआ चेहरा और उस की निरीह खामोशी तैर रही थी. वह सोच रही थी, बिट्टू छोटा है, हमारे वश में है. क्या इसी लिए हमें यह अधिकार मिल जाता है कि हम उस के जायज हक को भी इस तरह ठुकरा दें.

‘‘सुना नहीं…मैं ने क्या कहा?’’ अजय ने चिल्लाते हुए कहा तो अनिता चौंक गई.

‘‘नहीं…मैं कहीं नहीं जाऊंगी,’’ अनिता ने एकएक शब्द पर जोर देते हुए कहा.

‘‘क्या? तुम्हारा दिमाग तो सही है.’’

‘‘हां, बिलकुल सही है,’’ अनिता ने कोमल स्वर में कहा, ‘‘सुनो, हम ने उसे पैदा कर के उस पर कोई एहसान नहीं किया है. अपने सुख और अपनी खुशियों के लिए उसे जन्म दिया है. क्या हमारा यह फर्ज नहीं बनता कि हम भी उस की खुशियों और उस के सुख का ध्यान रखें?

‘‘अजय, मैं घर पर ही रहूंगी. मैं नहीं चाहती कि अभी से उस के दिल में मांबाप के प्रति नफरत की चिंगारी पैदा हो जाए और फिर मांबाप का प्यार पाना उस का हक है. मैं नहीं चाहती कि उस के कोमल मनमस्तिष्क पर कोई गांठ पड़े. मैं उतने पैसे में ही काम चला लूंगी जितना तुम्हें मिलता है पर बिट्टू को उस के अधिकार मिलने ही चाहिए.’’

‘‘तो तुम्हें नहीं जाना?’’

‘‘नहीं,’’ अनिता ने दृढ़ स्वर में कहा.

अजय ने स्कूटर स्टार्ट किया और तेजी के साथ दूर निकल गया. अनिता धीमे कदमों से वापस लौट गई. उस का मन अब बेहद शांत था. उसे अपने निर्णय पर कोई दुख नहीं था. Hindi Story.

Hindi Story: चुनौती

Hindi Story: गांव की झाडि़यों में मिली एक बच्ची को बांझ कहे जाने वाली मुनिया ने पालने और कुछ बनाने का फैसला किया. गांव वालों ने मुनिया से किनारा सा कर लिया. जब मुनिया की वह गुडि़या 8वीं जमात में थी, तब मुनिया नहीं रही. क्या गुडि़या अपनी मां के सपनों को पूरा कर पाई?


सुबह सुबह महल्ले में एक सनसनी खबर फैल गई कि ?ाडि़यों में एक नवजात बच्ची मिली है. शायद रात में इसे किसी ने फेंका दिया था. बीचबीच में लड़की के रोने की आवाज भी सुनाई दे रही थी. पूरे महल्ले में चर्चा का आज का मुद्दा यह लड़की ही थी.


पहली औरत दूसरी से बोली, ‘‘यह जरूर किसी किसी का पाप है. पता नहीं कौन जात है. बड़ा खराब जमाना गया है. लोग बच्चे कर के यहांवहां फेंक देते हैं.’’

दूसरी ने पहली की हां में हां मिलाई, ‘‘जात छोड़ो, पता नहीं यह किस धरम की है.’’
शादी के 10 साल बाद भी मुनिया के कोई औलाद नहीं थी. पति ने छोड़ दिया था. किसी तरह लोगों के घर का चौकाबरतन कर के वह अपना पेट पालती थी. उसे इस बच्ची पर रहम गया. उस ने ?ाटपट बच्ची को उठा कर गोद में ले लिया.

मुनिया के एक तो औलाद नहीं थी, पति ने भी बां? होने का आरोप लगा कर उसे छोड़ दिया था. इस बात से वह डिप्रैशन में चली गई थी. तलाक होने से पहले मुनिया डाक्टर के पास भी गई थी. तब डाक्टर बोली थी, ‘तेरे अंदर कोई कमी नहीं है, बल्कि कमी तो तेरे मर्द में है. तू उसे ले कर किसी माहिर डाक्टर के पास जा. डाक्टर बताएगा इस का इलाज.’’

इधर, फुलिया ने मुनिया से कहा, ‘‘क्या तू इस पाप को पालेगीपता नहीं किस खानदान की है यह लड़की. किस जातिधरम की है. फेंक दे इसे कचरे में. कचरे की चीज कचरे में ही अच्छी लगती है, उसे लोग घर की शोभा नहीं बनाते.’’

मुनिया का दिल मोम का था. उस ने फुलिया को जवाब दिया, ‘‘देख फुलिया, मैं जातपांत को नहीं मानती. मैं धरम में भी यकीन नहीं करती. मैं इनसानियत को मानती हूं. फिर आदमी जातपांत और धर्म का हो कर भी तो अधर्म करता है. जिस की जैसी परवरिश होती है, वह आदमी भी वैसा ही बनता है.
‘‘मैं इसे अपने घर ले जाऊंगी,

इसे खूब पढ़ाऊंगीलिखाऊंगी और अच्छे संस्कार दूंगी. फिर देखती हूं कि कैसे
यह बेराह चलती है. सारा फल अच्छी परवरिश और अच्छे संस्कारों का
होता है.’’

फुलिया ने ललकारा, ‘‘सोच ले, यह तु? भारी भी पड़ सकता है. कहीं कुछ ऊंचनीच हो गई, तो बाद में मत कहना कि चेताया नहीं था. हम लोगों में से किसी ने इसे नहीं उठाया, लेकिन तेरी हिम्मत की दाद देनी पड़ेगी कि तू ने इस बच्ची को पालने का बीड़ा उठाया है. फिर यह भी तो है कि तू चौकाबरतन कर के कितना कमा लेगी

‘‘नहीं पाल पाएगी तू इस को. फेंक दे इसे वापस कूड़े में. मरती है, तो मरने दे इसे. क्यों किसी के पाप को अपनाने का जोखिम उठा रही है…’’

पर मुनिया बोली, ‘‘मां की ताकत का तु? एहसास नहीं है. गरीब से गरीब मां भी अपने बालबच्चों को रूखासूखा खिला कर पालपोस ही लेती है. फिर मेरे लिए भी तो यह एक चुनौती की तरह है कि मैं किसी और के बच्चे को पाल कर दिखाऊं.’’

फुलिया हवा में हाथ लहराती हुई बोली, ‘‘सोच ले इस से बेवकूफी भरा फैसला कुछ नहीं होगा. लोग हंसेंगे और तेरा जीना हराम कर देंगे.’’

‘‘सोच लिया है. इस समाज को भी तो पता चलना चाहिए कि इनसानियत का रिश्ता जातपांत से ऊपर होता है. समाज के सामने औरत शुरू से ही कमजोर साबित होती रही है, फिर समाज को कैसे पता चलेगा कि औरत चट्टान की तरह मजबूत है. जायज मांग होने पर वह समाज से लोहा भी ले सकती है.


‘‘फिर समाज के डर से किसी को ?ाडि़यों में तो मरने के लिए नहीं छोड़ा जा सकता . इस में इस नन्ही सी गुडि़या की क्या गलती…’’

लेकिन फुलिया और समाज के लोगों को इस बात से कोई मतलब नहीं था. सब मुनिया को भलाबुरा कहते, उस से कतरा कर निकल जाते. मुनिया भी अपने काम से काम रखती थी. उस का मकसद अब बस इतना था कि वह गुडि़या को किसी तरह से पढ़ालिखा कर कुछ बना दे.

धीरेधीरे समय बीतता गया. गुडि़या बड़ी होती गई. अब वह 8वीं क्लास में पढ़ती थी. मुनिया ने गुडि़या को अच्छे संस्कार दिए थे. गुडि़या भी मेधावी और मेहनती लड़की थी. वह मुनिया की कही बातों को हमेशा मानती थी. गुडि़या 8वीं क्लास पास कर गई थी. एक दिन जब वह स्कूल से लौटी तो देखा कि मां की हालत बेहद खराब है. उसे अस्पताल में भरती करवाया गया, लेकिन मुनिया चल बसी.


मुनिया के मरने के बाद तो जैसे गुडि़या की जिंदगी ही उजड़ गई. फुलिया और महल्ले की दूसरी औरतें अब गुडि़या को ताने मारती थीं कि इस की मां तो इसे बड़ा अफसर बनाने चली थी और खुद ही इस दुनिया से चली गई. मुनिया की एक भतीजी थी शीतल, जो शहर में रहती थी और एक बैंक में क्लर्क थी. उस का तलाक उस के काले रंग की वजह से हो गया था. जिस लड़के से उस की शादी हुई थी, वह पियक्कड़ था.
मरने से पहले मुनिया ने शीतल से अपनी बेटी गुडि़या की बाबत फोन पर सब बातें बता रखी थीं. वह कह चुकी थी कि उस के अलावा गुडि़या का इस दुनिया में कोई नहीं है. अगर उसे कुछ हो जाता है, तो वह गुडि़या की देखभाल करे.


शीतल को गांव में आए हफ्ताभर हो गया था. स्कूल का टीसी बनने में समय लग रहा था. 1-2 दिन में टीसी मिल गया था. गुडि़या शीतल के साथ शहर गई थी, लेकिन शहर में आने के बाद भी गुडि़या को अपनी मां का चेहरा नहीं भूलता था. गांव की भी याद आती थी. गुडि़या किसी भी हाल में अपनी मां के सपनों को पूरा करना चाहती थी. इधर शीतल और गुडि़या को फुलिया और  महल्ले की औरतों की बातें रातों को सोने नहीं देती थीं. शीतल ने उस समय फुलिया और महल्ले की औरतों के तंज का कोई जवाब नहीं दिया था. उसे पता था कि उन को जवाब देने से बेहतर है कि सही समय का इंतजार किया जाए.


धीरेधीरे समय बीतने लगा. गुडि़या और जोरशोर से मेहनत करने लगी थी. अब वह यहां शहर में भी वही काम करती. सुबह उठ कर ?ाड़ूबरतन कर के नहाधो कर नाश्ता तैयार कर देती. शीतल दीदी के लिए भी नाश्ता तैयार कर देती. शहर में गैस का कनैक्शन था, लिहाजा चूल्हा जलाने की जरूरत नहीं पड़ती थी. पानी भर कर बाहर से नहीं लाना पड़ता था, इसलिए गुडि़या का बहुत सा समय बच जाता था. अब वह और मन लगा कर पढ़ाई करने लगी थी.

इधर, शीतल को अपने पति से तलाक लेने के बाद खाली घर काटने को दौड़ता था. गुडि़या के चले आने से उस का भी मन लगने लगा. उस ने घर में रखा हुआ नौकर भी हटा दिया था. गुडि़या आसपड़ोस के बच्चों को ट्यूशन भी पढ़ाने लगी थी. 9वीं क्लास में गुडि़या ने पूरे स्कूल में टौप किया था. अब शीतल को भी यकीन हो गया था कि गुडि़या एक एक दिन कुछ बड़ा जरूर करेगी.
10वीं क्लास के इम्तिहान हुए, लेकिन इस बार गुडि़या का नतीजा बहुत बेहतर नहीं था. वह अपने स्कूल में फर्स्ट डिवीजन में पास हुई थी.

गुडि़या घर कर रोने लगी. तब शीतल ने उस को सम?ाया, ‘‘इतनी जल्दी तुम्हें हार मानने की जरूरत नहीं है. तुम पढ़ाई में बहुत अच्छी हो. तुम अगले साल जरूर बहुत अच्छा करोगी.’’


दिन बीतते रहे और गुडि़या दिन दोगुनी और रात चौगुनी रफ्तार से तरक्की करती रही. देखतेदेखते उस ने नीट का इम्तिहान भी पास कर लिया और एक सरकारी कालेज में उसे दाखिला मिल गया. 4-5 साल की कड़ी मेहनत के बाद उस ने एमबीबीएस भी पास कर लिया. अब वह एक डाक्टर बन गई थी. शीतल को भी गुडि़या पर भरोसा था और गुडि़या उस के भरोसे पर खरी उतरी थी. आज शीतल ने अपनी बूआ मुनिया को दिया हुआ वचन पूरा किया था.


शीतल ने इनसानियत के लिए तो गुडि़या की मदद की ही थी, उस का मदद करने के पीछे एक और कारण
था. वह कारण था औरत को कमजोर सम?ाने वाले लोगों को मुंहतोड़ जवाब देना. शीतल को अपने पति को भी जवाब देना था और समाज को भी दिखाना था कि बिना किसी मर्द की मदद के भी औरत आगे बढ़ सकती है. वह अपनी मरजी की खुद मालिक है. तकरीबन 10 साल के बाद एक दिन गुडि़या की पोस्टिंग उस के गांव में हुई थी. उस को प्रमोशन मिल गई थी.


वह अब डाक्टरों की सीनियर थी. अब वह सीएमओ थी. एक दिन गुडि़या अपने केबिन में बैठी परची पर कुछ दवाएं लिख ही रही थी कि नर्स ने अगले मरीज का नाम पुकारा. मरीज का नाम फुलिया
था. नर्स ने जोर से 2 बारफुलियाकह कर पुकारा. थोड़ी देर में गुडि़या के सामने उस के गांव की फुलिया खड़ी थी. गुडि़या को तो एकबारगी अपनी आंखों पर यकीन नहीं हुआ.

गुडि़या ने इशारे से फुलिया को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा, ‘‘बैठिए.’’
फुलिया ने इतने दिनों के बाद

गुडि़या को देखा था. वह रोते हुए बोली, ‘‘बेटी, मु? पहचानामैं फुलिया…’’
गुडि़या की भी आंखें भीगने लगी थीं, ‘‘हां चाची, आप को कैसे नहीं पहचानूंगी. आप को मैं कभी भूल ही नहीं सकती. आप के कारण ही मैं आज यहां पर हूं.’’


‘‘बेटी, मु? माफ कर दे. मुनिया के मुंह से निकली एकएक बात सही थी. पापपुण्य कुछ नहीं होता है, बल्कि इनसानियत से बड़ा कोई धर्म नहीं है. मुनिया भले ही गरीब थी, लेकिन बहुत ही जिद्दी और आत्मविश्वासी औरत थी. मुनिया की परछाईं है बेटी तू तो. जैसा वह चाहती थी, वैसा ही तु? बनाया. आज अगर वह जिंदा होती तो कितना खुश होती.


‘‘मेरा आशीर्वाद है बेटी तु?. मैं फिर से एक बार माफी मांगती हूं बेटी. मु? माफ कर दे. मैं गलत थी, फुलिया ही सही थी. परवरिश, इनसानियत और संस्कार ही सबकुछ होता है बेटी. आज मैं यह अपनी आंखों से देख रही हूं.’’


फुलिया आसमान की तरफ ताकती हुई आगे बोली, ‘‘ मुनिया, आशीर्वाद दे अपनी बेटी को. मैं अपनी गलती मानती हूं. जहां भी तू है री मुनिया, मु? माफ कर
दे बहन.’’ कहां तो गुडि़या फुलिया को मिलने पर उस को और महल्ले की औरतों को खरीखोटी सुनाना चाहती थी और कहां वह भी फुलिया के साथसाथ रोए जा रही थी.  Hindi Story               

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