संतरी मेरी ओर आकर्षित हुआ, ‘‘जी, सर?’’ गेट पर खड़े संतरी की यही ड्यूटी होती है कि यूनिट के अंदरबाहर जाने वाले हर एक से पूछे कि वह कहां जा रहा है, उसे क्या चाहिए. मैं ने उसे अपना आईकार्ड दिखाया और कहा कि मैं टीएसएस, टैक्नीकल स्टोर सैक्शन के अफसर से मिलना चाहता है. संतरी ने मुझे सैल्यूट किया और कहा, ‘‘सर,
1 मिनट रुकिए, मैं पूछता हूं.’’
‘‘वैसे कौन हैं, ओआईसी, टीएसएस?’’
‘‘सर, कैप्टन धवन साहब हैं.’’
‘‘मेरी बात करवा देना.’’
संतरी ने बात की और फोन मेरी ओर बढ़ा दिया, ‘‘मैं कैप्टन धवन, कहिए?’’
‘‘जयहिंद कैप्टन साहब. मैं एक्स ले. कर्नल साहनी बोल रहा हूं. यह मेरी पहली यूनिट है. मैं ने 1963 में ट्रेनिंग के बाद इसे जौइन किया था, जब यह यूनिट बबीना में थी. 65 की लड़ाई के बाद हम यहीं आ गए थे.’’
‘‘सर, आप संतरी को फोन दें.’’ मैं ने उसे फोन दिया और थोड़ी देर बाद मैं कैप्टन धवन साहब के सामने बैठा था. ‘‘सर, आप कहते हैं, यह आप की पहली यूनिट है. आप उन अफसरों के नाम भी सही बता रहे हैं जिन की कमांड में आप ने काम किया था. आप अफसर कब बने?’’
मैं ने धवन साहब को भी आईकार्ड दिखाया, मैं रैंक से अफसर बना था. जब विभाग ने इंवैंटरी कंट्रोल अफसरों की वैकेंसी निकाली थी. मैं मैट्रिक पास कर के सेना में आया था. मेरा ट्रेड स्टोरकीपर सिगनल था. मैं ने अपनी पढ़ाई भी यहीं से शुरू की. तब मेजर पी एम मेनन कमांडिंग अफसर थे. मैं ने प्रैप और फर्स्ट ईयर यहीं से की. सैकंड और फाइनल ईयर दिल्ली रहते हुए किया. एमए हिंदी से तब किया जब अंबाला की एक वर्कशौप में पोस्ट हुआ.
मेरी सारी पढ़ाई ईएमई वर्कशौपों पर रही. इंवैंटरी कंट्रोल अफसरों की वैकेंसी निकली तो मैं अंबाला की आर्ड वर्कशौप में था. मेजर लक्ष्मी नारायण पांडे मेरे औफिसर कमांडिंग थे. वे मेरी पढ़ाई के बारे में जानते थे. एक वर्कशौप में मैं उन के साथ था. उन्होंने मुझे बुलाया और इस के लिए एप्लाई करवाया. कमांड हैडक्वार्टर से उसे क्लियर भी करवाया.
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मेरा एसएसबी तक का रास्ता साफ हो गया. पर मेरी एक मुश्किल थी. मैं अच्छी अंगरेजी लिख तो सकता था परंतु बोलने का प्रवाह अच्छा न था. मेजर साहब ने कहा, इस का प्रबंध भी हो जाएगा. मेजर साहब ने जाने कहांकहां बात की. एसएसबी परीक्षा से 3 महीने पहले मुझे स्टेशन वर्कशौप, दिल्ली में टैंपरेरी ड्यूटी पर भेजा और एस एन दासगुप्ता कालेज में अंगरेजी का प्रवाह बनाने की कोचिंग दिलाई. मजे की बात यह थी कि मैं पहली बार में सैलेक्ट हो गया और अफसर बना.
मेरी पढ़ाई और अफसर बनना सब ईएमई पर निर्भर रहा. मैं आज भी मेजर पी एम मेनन और मेजर लक्ष्मी नारायण पांडे को याद करता हूं. मैं उन को कभी भूल ही नहीं पाया.’’
‘‘हां, सर, आगे बढ़ने वालों की हर कोई मदद करता है. यहां अब भी कईर् जवान अपनी पढ़ाई पूरी कर रहे हैं और उन्हें पूरी सुविधाएं दी जा रही हैं.’’
इतने में एक सूबेदार साहब आए और कैप्टन साहब से बोले, ‘‘सर, लीव पार्टी चली गई है. सब को रात का डिनर और सुबह का नाश्ता साथ में दे दिया गया.’’
‘‘तो यह परंपरा आज भी कायम है. मेजर पी एम मेनन ने इसे शुरू किया था. उन को कहीं से पता चला था कि ट्रेन में जवानों को बेहोश कर के लूट लिया गया है. तब से आदेश दे दिया गया कि छुट्टी जाने वाले जवानों को रास्ते के लिए इतना खाना दे दिया जाए कि उन के घर पहुंचने तक समाप्त न हो,’’ मैं ने खुश हो कर बताया.
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सचमुच इतने समय से चली आ रही यह परंपरा आश्चर्य उत्पन्न करती है. मेरा यहां आना ही एक आश्चर्य था. यदि भाषा विभाग, पंजाब मुझे पुरस्कृत न करता तो मैं 50 वर्षों बाद भी इस शहर में न आ पाता. उस से भी आश्चर्य की बात यह थी कि इतने लंबे अंतराल के बाद भी इस यूनिट का यहां मिलना.
‘‘सर, आप जानते हैं, आज कौन सा दिन है?’’ कैप्टन धवन साहब ने पूछा.
‘‘जी, हां, आज हमारा रेजिंग डे है.’’
‘‘हां, सर, इसी उपलक्ष्य में आज रात को बड़ा खाना है. आप हमारे मुख्य अतिथि होंगे. आप देखेंगे, इतने वर्षों बाद भी भारतीय सेना में वही सद्भावनाएं हैं, वही परंपराएं हैं, वही अनुशासन है, वही बड़े खाने हैं, वही देश के प्रति समर्पण है, एक शाश्वत निर्झर बहने वाले झरने की तरह.’’ रात को बड़े खाने के बाद जब होटल पहुंचा तो मन के भीतर यह बात दृढ़ थी कि आज भी भारतीय सेना हर तरह से विश्व की सर्वश्रेष्ठ सेना है.



