Satyakatha: पति बदलने वाली मनप्रीत कौर को मिली ऐसी सजा- भाग 3

सौजन्य- सत्यकथा

सुखवीर द्वारा बेटी को साथ ले जाते ही मनप्रीत ने काशीपुर में ही एक किराए का कमरा ले लिया था. कमरा लेते ही मनप्रीत ने ऊंची उड़ान भरनी शुरू कर दी थी. उसी दौरान उस ने फोन के जरिए नफीस से संपर्क बढ़ा लिए थे.

नफीस उत्तर प्रदेश के जिला बिजनौर के थाना अफजलगढ़ के गांव मानियोवाला गढ़ी का रहने वाला था. वह पहले से ही शादीशुदा और 2 बच्चों का बाप था. उस का अपना ट्रक था, जिस के सहारे वह अपने परिवार का पालनपोषण करता था.

नफीस के साथ दोस्ती का हाथ बढ़ाते ही उस ने उसे अपने कमरे पर भी बुलाना शुरू कर दिया था. फिर उस के बाद उस ने अपने पति और अपनी बच्ची की ओर मुड़ कर भी नहीं देखा था. नफीस और मनप्रीत कौर पतिपत्नी की तरह ही रहने लगे.

नफीस का काम ही ऐसा था. वह अकसर ट्रक चलाने के कारण बाहर ही रहता था. इसी कारण उस की बीवी उस के कर्मों से अनजान बनी हुई थी.

कभीकभी तो नफीस अपनी पत्नी से काम का बहाना बना कर ट्रक ले कर जसपुर मनप्रीत कौर के पास ही चला जाता था, जहां पर वह सारी रात मौजमस्ती करने के बाद फिर सुबह ही अपने घर चला जाता था.

जब मनप्रीत कौर को लगने लगा कि नफीस उसे जीजान से चाहने लगा है तो उस ने भी उस का नाजायज फायदा उठाना शुरू कर दिया था. वह उस पर अपना पूरा अधिकार जमाने लगी थी, जिस के कारण वह उस की बीवीबच्चों से भी चिढ़ने लगी थी.

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उस ने नफीस से कई बार कहा कि अगर उसे उस के साथ रहना है तो वह अपने बीवीबच्चों को भूल जाए. मनप्रीत कौर उस पर बीवी को तलाक देने की बात करते हुए अपने साथ रहने का दबाव बनाने लगी थी, जिसे नफीस बरदाश्त नहीं कर पा रहा था.

लेकिन मनप्रीत कौर भी उस की एक बहुत बड़ी कमजोरी थी. वह उसे किसी भी कीमत पर छोड़ने को तैयार नहीं था.

गांव कादराबाद में नफीस का एक दोस्त रहता था. उस के साथ उस की बहुत पुरानी दोस्ती थी. किसी कारणवश कुछ समय पहले ही उस की बीवी खत्म हो गई थी. वह कई बार अपने दोस्त को साथ ले कर मनप्रीत के पास भी आया था. जब मनप्रीत नफीस पर शादी के लिए ज्यादा ही दबाव बनाने लगी तो उस के दिमाग में एक आइडिया आया.

उस ने सोचा क्यों न वह मनप्रीत की शादी अपने दोस्त के साथ करा दे. जिस के बाद उसे उस से मिलने में किसी तरह की अड़चन भी नहीं आएगी. वह जब चाहे उस के पास जा कर अपनी हसरतें भी पूरी कर सकता है.

नफीस के मन में यह विचार आया तो उस ने अपने दोस्त के सामने मनप्रीत के साथ शादी करने वाली बात रखी. मनप्रीत कौर के साथ शादी करने वाली बात सामने आते ही उस ने तुरंत ही अपनी सहमति दे दी. उस के बाद उस ने मनप्रीत के मन की बात लेते हुए अपने दोस्त को उस से मिलवा दिया.

पहले तो मनप्रीत कौर ने उस के साथ शादी करने से साफ ही मना कर दिया. लेकिन जब उसे पता चला कि उस के पास काफी जमीनजायदाद भी है. बाद में उस ने जमीनजायदाद के लालच में उस के साथ शादी करने की हामी भर ली.

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इस शादी से दोनों के मकसद पूरे होने के सपने साकार होते देख मनप्रीत जसपुर से काम छोड़ कर कादराबाद चली गई. उस के बाद वह उस के दोस्त के साथ उस की बीवी के तौर पर रहने लगी.

लेकिन नफीस का दोस्त उस के मन को नहीं भाया. वह मात्र 10 दिन उस के घर में रह कर एक रात अचानक ही वहां से गायब हो गई. उस के गायब होने से उस के दोस्त को तो ज्यादा परेशानी नहीं हुई, लेकिन नफीस उस के लिए परेशान हो उठा था. वह दिनरात उस की तलाश में जुट गया.

नफीस ने जैसेतैसे कर के उस का पता लगा ही लिया. वह हरियाणा के एक गांव में मिल गई. नफीस फिर उसे अपने साथ ले आया. वह फिर से वहीं जसपुर में आ कर रहने लगी थी.

उस के बाद उस का सारा खर्चा नफीस खुद ही उठाने लगा था. लेकिन इस के बाद भी मनप्रीत कौर उस के साथ शादी करने का दबाव बनाने लगी थी. जिस के कारण नफीस उस से तंग आ चुका था.

लौकडाउन के चलते नफीस के ट्रक के पहिए रुके तो वह भी आर्थिक तंगी से गुजरने लगा था. जिस के कारण उसे अपनी घरगृहस्थी भी चलानी मुश्किल पड़ रही थी. वहीं मनप्रीत कौर उस पर शादी करने का दबाव बना रही थी.

उसी दौरान मनप्रीत ने एक दिन नफीस से साफ शब्दों में कहा कि अगर उस ने उस के साथ शादी नहीं की तो वह उसे बलात्कार के केस में फंसा कर जेल भिजवा देगी.

मनप्रीत की धमकी सुन नफीस को दिन में ही तारे नजर आ गए. उस ने उसी दिन प्रण किया कि उसे अपनी इज्जत बचाने के लिए उस से किसी भी तरह से पीछा छुड़ाना ही होगा.

नफीस ने मनप्रीत की धमकी सुन कर भी एक साजिश के तहत उस का साथ नहीं छोड़ा था. उस के बाद वह उस से पूरी तरह से सतर्क हो गया. फिर उस के साथ पहले जैसा प्यार दिखाते हुए उस ने मनप्रीत पर पूरा विश्वास बनाए रखा. साथ ही वह उस से छुटकारा पाने के लिए हर पल नई योजनाओं को साकार रूप देने के लिए रूपरेखा भी तैयार करने लगा था.

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Crime Story- तनु की त्रासदी: जिस्म की चाहत का असर

24 साल की तनु का रंग हालांकि बहुत साफ नहीं था, लेकिन कुदरत ने उसे कुछ इस तरह गढ़ा था कि जो भी उसे देखता, एक ठंडी आह भरने से खुद को रोक नहीं पाता था. सांवले सौंदर्य की मालकिन तनु के जिस्म की कसावट और फिगर देख मनचले गहरी सांसें लेते हुए फिकरे कसते थे तो खुद को शरीफजादा कहलाने और दिखलाने वाले भी उस की खिलती जवानी का नेत्रपान चोरीछिपी ही सही, करते जरूर थे.

किसी भी लड़की की छवि ऐसी जैसी कि ऊपर बताई गई है, यूं ही नहीं मन जाती, बल्कि इस में खुद उस के स्वभाव का भी बड़ा हाथ होता है. तनु खुले स्वभाव की लगभग उच्छृंखल युवती थी, जो किसी बंधन में नहीं बंधतीं. लेकिन एक ऐसे मजबूत सहारे की जरूरत उसे हमेशा महसूस होती रहती थी, जो उसे दुनियाजहान की दुश्वारियों से महफूज रखे.

आमतौर पर तनु जैसी महत्त्वाकांक्षी युवतियां जो सपने देखती हैं, उन्हें किसी भी शर्त पर या कोई भी जोखिम उठा कर पूरे करना भी जानती हैं. पर इस के लिए जो कीमत उन्हें चुकानी पड़ती है, वह कभीकभी इतनी भारी पड़ जाती है कि सौदा अंतत: उनके लिए घाटे का साबित होता है. तब उन के पास हाथ मलने और अपनी नादानियों पर पछताने के सिवाय कुछ भी नहीं रह जाता. जिंदगी को कुछ इसी तरह हलके में लेने की कीमत तनु ने कैसे चुकाई, यह जानने से पहले तनु के बारे में जान लेना जरूरी है.

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इंदौर के गोयलनगर स्थित अड़ोसपड़ोस अपार्टमेंट में रहने वाली तनु राजौरिया की उम्र तब महज 11 साल थी, जब उस की मां का निधन हो गया था. इस उम्र में लड़कियां शारीरिक और मानसिक बदलावों के दौर से गुजरते हुए तनाव में रहती हैं. ऐसे में मां की कमी उन्हें और असुरक्षित बना देती है. यही तनु के साथ भी हुआ.

तनु के पिता श्याम सिंह राठौर ने दूसरी शादी नहीं की. लेकिन इस बात का अंदाजा उन्हें था कि इस उम्र की बेटी की परवरिश कर पाना उन के लिए आसान नहीं है. लिहाजा उन्होंने उसे अपनी साली यानी तनु की मौसी अनीता के पास भेज दिया. अनीता श्याम सिंह की इस उम्मीद पर खरी उतरीं कि सौतेली मां से बेहतर सगी मौसी होती है.

तनु को पालनेपोसने में अनीता ने न कोई कसर रखी, न भेदभाव किया. लेकिन तनु जैसेजैसे बड़ी होती गई, वैसेवैसे अपनी मरजी की मालकिन होती गई. अनीता ने तो अपनी तरफ से पूरी कोशिश की थी कि अपनी दिवंगत बहन की बेटी को बेहतर संस्कार दें, पर जवान होती तनु के सपने आम लड़कियों से कुछ हट कर थे. मौसी के घर कौशल्यापुरी में तनु ने जवानी में कदम रखा तो उस के इर्दगिर्द लड़कों की भीड़ जमा होने लगी.

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तनु हर किसी को भले घास नहीं डालती थी, लेकिन उस की खूबसूरती के चर्चे हर कहीं होने लगे थे. वजह थी एक छरहरी युवती का भरे मांसल बदन का होना, उस की लंबी नाक और बड़ीबड़ी आंखें और पतले होंठों पर पसरी एक शोख मुसकराहट किसी का भी दिल धड़का देने के लिए काफी थी.

हालत यह थी कि मोहल्ले का हर लड़का तनु की नजदीकियां पाने को बेताब रहने लगा. लेकिन कोई भी तनु के तयशुदा पैमानों पर खरा नहीं उतर रहा था. उसे जो बातें अपने सपने के हीरो में चाहिए थीं, वे आखिरकार उसे दिखीं चंदन राजौरिया में.

चंदन कांग्रेस का छोटामोटा नेता और पेशे से प्रौपर्टी ब्रोकर था. वह दबंग भी था, जिस से दूसरे लड़के उस से खौफ खाते थे. 2-4 मुलाकातों में ही तनु ने उसे और उस ने तनु को दिल दे दिया. आजकल की लड़कियों को जैसे लड़के भाते हैं, चंदन ठीक वैसा ही था. माशूका का खयाल रखने वाला, उस पर पैसे लुटाने वाला और सजसंवर कर रहने वाला. लच्छेदार बातों और वादों में भी वह माहिर था.

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तनु अब हवा में उड़ने लगी थी, पर उस की शुरू होती प्रेमकथा के किस्से शायद उड़तेउड़ते पिता श्याम सिंह के कानों तक पहुंच गए थे, इसलिए उन्होंने बेटी की शादी अहमदाबाद के एक तेल, गुड़ व्यापारी से न केवल तय कर दी, बल्कि कर भी दी. तनु और चंदन प्यार के रास्ते पर अभी इतने दूर नहीं पहुंचे थे कि वापस न लौट पाएं. तनु शादी कर के अहमदाबाद चली गई तो चंदन अपनी नेतागिरी और प्रौपर्टी डीलिंग के छोटेमोटे कामों में लग गया. पर दोनों ही एकदूसरे को भूल नहीं पाए.

ससुराल में तनु का मन नहीं लगा. वजह जैसी जिंदगी और पति उसे चाहिए था, वह उसे नहीं मिला. दुकानदार पति सुबह दुकान पर चला जाता तो देर रात को लौटता था. अकेली वह खीझ उठती. तनु के लिए शादीशुदा जिंदगी के मायने होटलिंग, शौपिंग और मौजमस्ती भर थे, जो पूरे नहीं हुए तो वह पति से बातबात पर कलह करने लगी. इस से जल्दी ही दांपत्य टूटने की कगार पर आ पहुंचा. यही वह चाहती भी थी, लेकिन इस की वजह कुछ और थी.

वजह था उस का पूर्व प्रेमी चंदन राजौरिया. शादी के बाद पहली बार विदा हो कर तनु मायके इंदौर आई तो चंदन से सामना होने पर दबा प्यार जाग उठा. कहां वह बोर दुकानदार पति और कहां यह बिंदास चंदन.

चालाक चंदन ने जल्दी ही तनु की इस कशमकश भांप ली और उस की गदराई जवानी हासिल करने का उसे यह सुनहरा मौका लगा. लिहाजा पहले तो उस ने तनु की ख्वाहिशों को हवा दी और फिर उन्हें पूरा करने के लिए शादी की पेशकश कर डाली.

तनु के लिए तो यह अंधा क्या चाहे, दो आंखें जैसी बात थी. पर चंदन से शादी करने के लिए जरूरी था पति से तलाक हो, जो आजकल खासतौर से नई पत्नियों के लिए मुश्किल काम नहीं है. तनु दोबारा अहमदाबाद गई तो चंदन के प्यार में महक रही थी. उस ने पति से की जाने वाली कलह की तादाद बढ़ा दी. फलस्वरूप तलाक मांगा तो पति को भी मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई. क्योंकि वह तनु की बेहूदा हरकतों और रोजरोज की कलह से आजिज आ चुका था.

तलाक के बाबत तनु ने पति से 5 लाख रुपए मांगे तो उस ने खुशीखुशी दे कर पत्नी से छुटकारा पा लिया. तनु इंदौर वापस आई तो चंदन और उस की मां शादी के लिए तैयार बैठे थे. पति से लिए 5 लाख रुपए उस ने चंदन को दे दिए. कुछ दिनों बाद चंदन ने वादा निभाते हुए उस से शादी कर ली. चंदन की मां राजकुमारी से उस की अच्छी पटरी बैठती थी.

चंदन से शादी के बाद उस के 2 साल अच्छे से गुजरे, ठीक वैसे ही जिस तरह से वह पहली शादी के पहले सपने देखा करती थी. पर यह शादी नहीं एक सौदा था, जिस के तहत तनु ने अपने पहले पति से गुजारे के लिए लिए गए 5 लाख रुपए बतौर दहेज चंदन को दे रखे थे.

लेकिन यहां भी दोनों के बीच वादविवाद और झगड़े होने लगे. चंदन का मकसद तनु की जवानी और खूबसूरती भोगना था, जो पूरा हो गया था. एक साल बाद ही इन के यहां एक बेटी हुई, जिस का नाम विनी रखा गया. चंदन का बदलता बर्ताव और बेरुखी देख कर तनु को समझ आने लगा कि इस से अच्छा तो वह दुकानदार पति ही था, जो उस का पूरा ध्यान रखता था.

झगड़े इतने बढ़ गए कि दोनों का साथ रहना दूभर हो गया. ऐसे में सास राजकुमारी ने तनु की परेशानी हल की. उस ने उसे समझाया कि जब चंदन से नहीं पट रही है तो उसे तलाक दे दो और एवज में 10 हजार रुपए हर महीने लेती रहो.

तनु के मायके वालों का जी उस की हरकतों के चलते पहले ही उचट चुका था, लिहाजा उन्होंने उस की दूसरी शादी के विवाद में न कोई दखल दिया और न ही दिलचस्पी दिखाई. चंदन को तलाक दे कर तनु अलग गोयलनगर के अपार्टमेंट अड़ोसपड़ोस के फ्लैट नंबर 103 में बेटी के साथ रहने लगी.

रिश्तों की ऐसी सौदेबाजी टीवी धारावाहिकों में ही देखने को मिलती है. तनु ने पहले पति से एकमुश्त 5 लाख रुपए लिए थे और दूसरे से 10 हजार रुपए महीना ले रही थी. एक तरह से यह देह की या यौनसुख की कीमत वसूलने जैसी बात थी, जिस का कोई अफसोस या ग्लानि उसे नहीं थी.

अब तनु आजाद थी, पर जल्दी ही यह आजादी उसे खलने लगी. इंदौर जैसे औद्योगिक शहर में एक अकेली लड़की का बिना किसी सहारे के रहना नामुमकिन नहीं तो मुश्किल जरूर है. गोयलनगर में शिफ्ट होने के बाद भी चंदन उस से मिलने आया करता था.

न जाने किस जादू के जोर से दोनों के बीच के विवाद सुलझ गए थे. अड़ोसपड़ोस अपार्टमेंट के अड़ोसियोंपड़ोसियों से तनु ने चंदन का परिचय पति के रूप में ही कराया था. लिहाजा सभी यह सोचते थे कि दोनों पतिपत्नी हैं और चंदन अकसर काम के सिलसिले में बाहर रहता है.

तन की भूख फिर से दूसरे पति से बुझने लगी तो तनु चंदन के पांवों में बिछने लगी और इस तरह बिछने लगी कि जब चंदन ने अपनी दूसरी शादी की बात उसे बताई तो उस के चेहरे पर शिकन तक नहीं आई. शिकन तो दूर की बात, सन 2015 की इस अनूठी शादी में विचित्र किंतु सत्य जैसी बात यह हुई थी कि आमंत्रण पत्र में तनु का नाम बतौर चंदन की बहन छपा था.

जाने क्या खिचड़ी तनु, चंदन और राजकुमारी के बीच पकी, जो तनु अपने दूसरे पति की दूसरी शादी में बहन की हैसियत से शामिल हुई और बारात में जम कर नाची भी. इतना ही नहीं, चंदन की सुहाग की सेज भी उस ने अपने हाथों से सजाई. किसी भी तरह के साहित्य में शायद ही ऐसी किसी घटना का वर्णन देखने को मिले, जो इंदौर की इस शादी में घटित हुआ था.

शादी के बाद भी चंदन गोयलनगर में तनु के पास आताजाता रहा और तनु की हर तरह की जरूरत भी पूरी करता रहा. 10 हजार रुपए महीने तो वह उसे दे ही रहा था. तनु अपनी तनहाई से समझौता कर के संतुष्ट हो चली थी. लेकिन चंदन के मन में उसे ले कर कुछ और ही चल रहा था, जो अब तक उस की रगरग से वाकिफ हो चुका था. चंदन का असली धंधा क्या था, इस का अंदाजा तनु को नहीं था. वह तो उसे प्रौपर्टी ब्रोकर समझती रही थी, जिस के एक बड़े कांग्रेसी नेता से अच्छे संबंध थे.

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चंदन का एक दोस्त था महिम शर्मा. वह पेशे से वैसा ही पत्रकार था, जैसा कि चंदन नेता यानी कहने भर के लिए. फिर भी दोनों में अपनेअपने धंधे की ठसक भी थी और पैसा भी अच्छाखासा था. दरअसल, चंदन और महिम दोनों मिल कर एक गिरोह चलाते थे, जिस का काम लोगों को, खासतौर से व्यापारियों को फांस कर उन्हें ब्लैकमेल करना था. इस के लिए कई खूबसूरत लड़कियां इन दोनों ने पाल रखी थीं, जिन का काम सोशल मीडिया के जरिए व्यापारियों को फंसाना होता था.

शिकार जब जाल में फंस जाता था तो ये लड़कियां किसी लौज, होटल या फ्लैट में उसे बुलाती थीं और उस के साथ वैसी ही वैरायटी वाली सैक्सी हरकतें करती थीं, जैसी ब्लू फिल्मों में दिखाई जाती हैं. नई तकनीकों से अंजान व्यापारी इन लड़कियों के साथ सैक्स का लुत्फ तो उठाते थे, पर इस बात का अहसास उन्हें नहीं होता था कि उन की हरकतें कैमरे में कैद हो रही हैं, जो एक बार अगर दुनिया के सामने आ जाएं तो उन की इज्जत धूल में मिल जाना तय थी.

इसी से बचने के लिए कितने ही व्यापारी चंदन और महिम को पैसा दे चुके थे, इस का ठीकठाक हिसाबकिताब शायद ही कोई दे पाए, क्योंकि अधिकांश क्या, सभी व्यापारी अपनी ब्लू फिल्में देख कर पसीनेपसीने हो उठते थे और डरते भी थे कि अगर ये वायरल हो गईं तो वे कहीं के नहीं रहेंगे. घरगृहस्थी तो चौपट होगी ही, समाज और रिश्तेदारारी में भी छीछालेदर होगी. इसलिए वे चुपचाप इन दोनों को मुंहमांगा पैसा दे देते थे.

इस काम में एकलौती दिक्कत इन दोनों को यह थी कि जिस लड़की को ये चारे के रूप में इस्तेमाल करते थे, उसे खासी रकम देनी पड़ती थी और एक नया राजदार भी बनाना पड़ता था,जो एक तरह का खतरा ही था. चंदन और महिम ब्लैकमेलिंग के इस धंधे के खासे विशेषज्ञ हो चुके थे और मन ही मन उन अधेड़, जवान और बूढ़ों की हालत पर हंसते भी थे, जो कमसिन लड़कियों के जिस्म की चाहत में आ कर गाढ़ी कमाई उन्हें दे जाते थे.

चंदन का ध्यान जब इस तरफ गया कि अगर तनु उन के गिरोह में शामिल हो कर काम करने को तैयार हो जाए तो बात सोने पे सुहागा वाली होगी. उस पर बुरी तरह मरने वाली तनु न केवल भरोसेमंद थी, बल्कि उस का मांसल सैक्सी जिस्म उस की दूसरी खूबी थी, जिस की ब्लैकमेलिंग के धंधे में खासी अहमियत होती है.

चंदन को यह तो समझ में आ गया था कि पैसों के बाबत तनु ज्यादा मुंह नहीं फाड़ेगी, लेकिन अपनी पूर्वपत्नी को इतना तो वह जानने ही लगा था कि वह इस काम के लिए कभी तैयार नहीं होगी. वह जैसी भी थी, पर उस के अपने कुछ उसूल थे, जिन से ब्लैकमेलिंग की बात मेल नहीं खाती थी. बिस्तर में चंदन के मुताबिक कुलाटियां खाने वाली तनु इस काम के लिए आसानी से तैयार होगी, इस में उसे शक था.

इस के बाद भी उसे कोशिश करने में हर्ज महसूस नहीं हुआ. उस के खुराफाती दिमाग में आइडिया यह आया कि तनु को एक मर्द की जरूरत तो है ही, इसलिए क्यों न महिम का चक्कर उस से चलवा दिया जाए. इस से होगा यह कि अगर महिम और तनु के बीच जिस्मानी ताल्लुक कायम हो गए तो आसानी से तनु को शीशे में उतारा जा सकता है. इस बाबत उस ने पहले महिम का परिचय तनु से करवाया और फिर खुद धीरेधीरे उस से किनारा करने लगा.

अब अड़ोसपड़ोस अपार्टमेंट के फ्लैट नंबर 103 में महिम लगभग रोज आने लगा. वह सधा हुआ खिलाड़ी था, जिस से उसे देख कर औरों की तरह जीभ लपलपाने के बजाय मुकम्मल सब्र से काम लेते हुए उसे फंसाया. चंदन का अंदाजा सही निकला, जल्दी ही तनु और महिम में शारीरिक संबंध बन गए. तनु की मर्द की जरूरत अब महिम पूरी करने लगा.

जब इन दोनों को यकीन हो गया कि तनु अब न नहीं करेगी तो एक दिन उन्होंने उस के सामने अपना ब्लैकमेलिंग वाला राज खोल कर उसे भी इस धंधे में शामिल होने का न्यौता दिया. इस पर तनु भड़क उठी और सीधेसीधे मना कर दिया. जोशजोश में दोनों ने अपने सारे राज उस पर खोल दिए थे कि वे कैसे शिकार को फंसा कर उसे ब्लैकमेल करते हैं.

चूंकि तनु से न की उम्मीद नहीं थी, इसलिए दोनों दिक्कत में पड़ गए. डर इस बात का था कि कहीं ऐसा न हो कि यह नादान लड़की कभी उन का राज दुनिया के सामने उजागर कर दे. फिर भी हिम्मत न हारते हुए चंदन और महिम उसे पटाने की कोशिशें करते रहे और ढेर सारी दौलत का सब्जबाग दिखाते रहे.

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लाख मनाने के बाद भी तनु राजी न हुई तो चंदन और महिम ने उसे हमेशा के लिए रास्ते से हटाने का खतरनाक फैसला न केवल ले डाला, बल्कि उस पर इस तरह अमल भी कर डाला कि अगर अनीता सजगता न दिखातीं तो तनु की मौत हमेशा के लिए एक राज बन कर रह जाती.

इंदौर में होली के पांचवें दिन रंगपंचमी का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाया जाता है. सारे शहर की दुकानें बंद रहती हैं और जगहजगह रंगपंचमी के जुलूस निकलते हैं और लोग तबीयत से रंग का यह त्यौहार मनाते हैं.

17 मार्च को महिम, चंदन और तनु ने रंगपंचमी की पार्टी रखी, जिस में तनु ने छक कर भांग पी. नशा ज्यादा हो जाने से उस की तबीयत बिगड़ने लगी तो चंदन उसे अपने साथ ले गया. अगले 3-4 दिनों तक वह लगातार तनु के फ्लैट पर आता रहा तो एक दिन किसी पड़ोसन ने तनु के बारे में पूछ लिया. चंदन ने उसे बताया कि तनु का इलाज उस के पिता के घर चल रहा है. वह तो यहां दीपक रखने आता है.

सभी की निगाह में चूंकि चंदन तनु का पति था, इसलिए उस की बात पर किसी ने किसी तरह का शक नहीं किया. 25 मार्च को तनु का जन्मदिन था. उस दिन मौसी अनीता उसे बधाई देने के लिए फोन लगाती रहीं, पर उस का फोन लगातार स्विच्ड औफ जा रहा था. लिहाजा उन्होंने खुद उस के घर जा कर उसे बधाई देने का फैसला किया.

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25 मार्च की सुबह जब वह तनु के फ्लैट पर पहुंची तो वहां झूलता ताला देख कर हैरान रह गईं, क्योंकि तनु बगैर बताए गायब थी. इस पर उन्होंने पड़ोस में पूछताछ की तो पता चला कि तनु ने ज्यादा भांग पी ली थी, इसलिए उस का पति चंदन उसे पिता के घर ले गया था.

अनीता ने श्याम सिंह को फोन किया तो जवाब मिला कि तनु तो उन के यहां नहीं आई है. वह किसी अनहोनी की आशंका से घबरा गए, साथ ही अनीता के माथे पर भी बल पड़ गए. उन्होंने चंदन को फोन किया तो उस का भी फोन नहीं लगा.

श्याम सिंह भागेभागे अनीता के पास आए और तनु की खोजबीन की. लेकिन वह कहीं नहीं मिली तो उन्होंने थाना तिलकनगर में उस की गुमशुदगी दर्ज करा दी. तलाक होने के बाद भी चंदन तनु के पास आताजाता रहता था, यही बात पुलिस को चौंकाने वाली भी थी और सुराग देने वाली भी.

इंदौर के डीआईजी हरिनारायणचारी मिश्र ने तनु की खोज के लिए एएसपी अमरेंद्र सिंह को नियुक्त कर दिया. उन्होंने पहले उन दोनों की जन्म कुंडलियां खंगाली तो जल्द ही सारा सच सामने आ गया.

पता चला कि चंदन और महिम अव्वल दरजे के ब्लैकमेलर हैं, पर अभी तक किसी ने उन के खिलाफ रिपोर्ट नहीं दर्ज कराई है. अलबत्ता दोनों अन्नपूर्णा इलाके में सन 2012 में हुई गोलीबारी में भी शामिल थे. इन पर एक और दूसरा आपराधिक मामला इसी साल फरवरी में दर्ज हुआ था.

शक के आधार पर क्राइम ब्रांच ने चंदन और महिम को गिरफ्तार किया, पर पूछताछ में कुछ हासिल नहीं हुआ. दोनों ही पुलिस को गुमराह करने वाले बयान देते रहे. दरअसल, इस में दिक्कत यह थी कि एक पत्रकार था और दूसरा बड़े कांग्रेसी नेता का चेला. ऐसे में अगर इन के साथ जोरजबरदस्ती की जाती तो खासा बवाल मच सकता था.

सब कुछ साफ समझ में आ रहा था, इसलिए अमरेंद्र सिंह ने जोखिम उठाया और चंदन तथा महिम से सख्ती की तो वे टूट गए और सारा सच उगल दिया. सच बड़ा वीभत्स था. दोनों ने 17 मार्च को ही तनु की हत्या उस के फ्लैट में कर दी थी. भांग के नशे में चूर तनु को शायद पता भी नहीं चला था कि उसे किस ने और कैसे मार डाला. चूंकि त्यौहारी सन्नाटा था, इसलिए तनु की हत्या कर उस की लाश ज्यों की त्यों छोड़ कर दोनों अपनेअपने घर चले गए थे.

अगले दिन दोनों फिर फ्लैट पर आए और तनु की लाश के 16 टुकड़े कर उन्हें फ्रिज में ठूंस दिया, जिस से बदबू न आए. 3-4 दिन चंदन अपना डर मिटाने फ्लैट पर आताजाता रहा. चौथे दिन फ्लैट में दाखिल होते ही उसे मांस के टुकड़ों से गंध आती महसूस हुई तो दोनों ने मिल कर लाश के उन टुकड़ों को अलगअलग थैलियों में पैक कर के उन्हें कार में रख कर बड़वाह के जंगल में फेंक आए.

चंदन और महिम के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज करने के लिए जरूरी था कि तनु की लाश का कोई टुकड़ा मिले. इस बाबत पुलिस वाले लगातार भागादौड़ी करते रहे. पुलिस की आधा दर्जन टीमें जंगलों की खाक छानती रहीं, पर तनु की लाश का कोई टुकड़ा उन्हें नहीं मिला. नदियों में भी तलाशी ली गई, पर उस से भी कुछ हासिल नहीं हुआ. बस एक गुदड़ी ही बरामद हो पाई.

इस बिना पर आईपीसी की धाराओं 302 व 201 के तहत हत्या का मामला दर्ज कर पुलिस ने चंदन राजौरिया और पत्रकार महिम शर्मा को अदालत में पेश किया, जहां से दोनों को जेल भेज दिया गया. इन के बयानों से जो कहानी सामने आई, उसे आप ऊपर पढ़ ही चुके हैं.

दोनों मुजरिमों ने अपने बयान में जुर्म जरूर स्वीकार कर लिया है, पर अदालत में उसे साबित कर पाना टेढ़ी खीर होगी, क्योंकि तनु की हत्या का कोई चश्मदीद गवाह नहीं है, उस की लाश भी बरामद नहीं हुई है. इस के अलावा हत्या में प्रयुक्त हथियार भी नहीं मिले हैं. ऐसे में संदेह का लाभ उन्हें मिल सकता है. तय है, बचाव पक्ष का वकील यह दलील भी देगा कि इस से तो यह भी साबित नहीं होता कि वाकई तनु की हत्या हुई है. पुलिस ने जोरजबरदस्ती कर उस के मुवक्किलों से झूठ बुलवा लिया है.

अंजाम कुछ भी हो, पर अपनी इस हालत की एक बड़ी जिम्मेदार तनु खुद भी थी, जो 2 में से एक पति की भी न हुई और एक ऐसे ब्लैकमेलर पर अपना सब कुछ लुटा बैठी, जिस ने अंतत: उस की सांसें छीन लीं. क्योंकि वह गुनाह में उस का साथ देने को तैयार नहीं हो रही थी.

यह कैसी विडंबना- भाग 1: शर्माजी और श्रीमती के झगड़े में ममता क्यों दिलचस्पी लेती थी?

आज सुबहसुबह पता चला कि पड़ोस के शर्माजी चल बसे. रात अच्छेभले सोए थे, सुबह उठे ही नहीं. सुन कर अफसोस हुआ मुझे. अच्छे इनसान थे शर्माजी. उन की जीवन यात्रा समाप्त हो गई उस पर सहज उदासी सी लगी मुझे क्योंकि मौत का सुन कर अकसर खुशी नहीं होती. यह अलग बात है कि मौत मरने वाले के लिए वास्तव में मौत ही थी या वरदान. कोई मरमर कर भी जीता है और निरंतर मौत का इंतजार करता है. भला उस इनसान के लिए कैसा महसूस किया जाना चाहिए जिस के लिए जीना ही सब से बड़ी सजा हो.

6 महीने पहले ही तबादला हो कर हम यहां दिल्ली आए. यही महल्ला हमें पसंद आया क्योंकि 15 साल पहले भी हम इसी महल्ले में रह कर गए थे. पुरानी जानपहचान को 15 साल बाद फिर से जीवित करना ज्यादा आसान लगा हमें बजाय इस के कि हम किसी नई जगह में घर ढूंढ़ते.

इतने सालों में बहुत कुछ बदल जाता है. यहां भी बहुत कुछ बदल गया था, जानपहचान में जो बच्चे थे वे जवान हो चुके हैं और जो जवान थे अब अजीब सी थकावट ओढ़े नजर आने लगे और जो तब बूढ़े थे वे अब या तो बहुत कमजोर हो चुके हैं, लाचार हैं, बीमार हैं या हैं ही नहीं. शर्माजी भी उन्हीं बूढ़ों में थे जिन्हें मैं ने 15 साल पहले भी देखा था और अब भी देखा.

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हमारे घर के ठीक सामने था तब शर्माजी का घर. तब वे बड़े सुंदर और स्मार्ट थे. शर्माजी तो जैसे भी थे सो थे पर उन की श्रीमती बेहद चुस्त थीं. दादीनानी तो वे कब की बन चुकी थीं फिर भी उन का साजशृंगार उन की तीनों बहुओं से बढ़ कर होता था. सुंदर दिखना अच्छी बात है फिर भी अकसर हम इस सत्य से आंखें चुरा लिया करते थे कि श्रीमती शर्मा ने घर और अपने को कैसे सजा रखा है, तो जाहिर है वे मेहनती ही होंगी.

मुझे याद है तब उन की छत पर मरम्मत का काम चल रहा था. ईंट, पत्थर, सीमेंट, रेत में भी उन की गुलाबी साड़ी की झलक मैं इतने साल के बाद भी नहीं भूली. बिना बांह के गुलाबी ब्लाउज में उन का सुंदर रूप मुझे सदा याद रहा. आमतौर पर हम ईंटसीमेंट के काम में अपने पुराने कपड़ों का इस्तेमाल करते हैं जिस पर मैं तब भी हैरान हुई थी और 15 साल बाद जब उन्हें देखा तब भी हैरान रह गई.

15 साल बाद भी, जब उन की उम्र 75 साल के आसपास थी, उन का बनावशृंगार वैसा ही था. फर्क इतना सा था कि चेहरे का मांस लटक चुका था. खुली बांहों की नाइटी में उन की लटकी बांहें थुलथुल करती आंखों को चुभ रही थीं, बूढ़े होंठों पर लाल लिपस्टिक भी अच्छी नहीं लगी थी और बौयकट बाल भी उम्र के साथ सज नहीं रहे थे.

‘‘शर्मा आंटी आज भी वैसी की वैसी हैं. उम्र हो गई है लेकिन बनावशृंगार आज भी वैसा ही है.’’

संयोग से 15 साल पुरानी मेरी पड़ोसिन अब फिर से मेरी पड़ोसिन थीं. वही घर हमें फिर से मिल गया था जिस में हम पहले रहते थे.

‘‘नाजनखरे तो आज भी वही हैं मगर दोनों का झगड़ा बहुत बुरा है. दिनरात कुत्तेबिल्ली की तरह लड़ते हैं दोनों. आ जाएंगी आवाजें तुम्हें भी. अड़ोसपड़ोस सब परेशान हैं.’’

हैरान रह गई थी मैं सरला की बात सुन कर.

‘‘क्या बात कर रही हैं…इतनी पढ़ीलिखी जोड़ी और गालीगलौज.’’

‘‘आंटी कहती हैं अंकल का किसी औरत से चक्कर है…एक लड़की भी है उस से,’’ सरला बोलीं, ‘‘पुराना चक्कर हो तो हम भी समझ लें कि जवानी का कोई शौक होगा. अब तुम्हीं सोचो, एक 80 साल के बूढ़े का किसी जवान औरत के साथ कुछ…चलो, माना रुपएपैसे के लिए किसी औरत ने फंसा भी लिया…पर क्या बच्चा भी हो सकता है, वह भी अभीअभी पैदा हुई है लड़की. जरा सोचो, शर्मा अंकल इस उम्र में बच्चा पैदा कर सकते हैं.’’

अवाक् थी मैं. इतनी सुंदर जोड़ी का अंत ऐसा.

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‘‘बहुत दुख होता है हमें कि तीनों लड़के भी बाहर हैं, कोई अमेरिका, कोई जयपुर और कोई कोलकाता. समझ में नहीं आता क्या वजह है. कभी इन के घर के अंदर जा कर देखो…ऐसा लगता है जैसे किसी पांचसितारा होटल में आ गए हों… इतनी सुंदरसुंदर चीजें हैं घर में. बेटे क्याक्या नहीं भेजते. कोई कमी नहीं. बस, एक ही कमी है इस घर में कि शांति नहीं है.’’

बहुत अचंभा हुआ था मुझे जब सरला ने बताया था. तब हमेें इस घर में आए अभी 2 ही दिन हुए थे. मैं तो बड़ी प्रभावित थी शर्मा आंटी से, उन की साफसफाई से, उन के जीने के तरीके से.

बिना कुछ कहे- भाग 3: स्नेहा ने पुनीत को कैसे सदमे से निकाला

Writer- शिवी गोस्वामी 

‘‘वह मेरा दोस्त है जो मुझ से 7 साल बड़ा है. उस की पहले एक गर्लफ्रैंड थी, लेकिन अब नहीं है. उस को गुस्सा भी बहुत जल्दी आता है.

‘‘वह मेरे बारे में क्या सोचता है, पता नहीं, लेकिन जब वह मेरी मदद करता है, तो मुझे बहुत अच्छा लगता है. उस का नाम…‘‘ यह कह कर वह रुक गई.

‘‘उस का नाम,‘‘ स्नेहा ने मेरी आंखों में देखते हुए कहा, ‘‘बहुत मजा आ रहा है न आप को. सबकुछ जानते हुए भी पूछ रहे हो और वैसे भी इतने बेवकूफ आप हो नहीं, जितने बनने की कोशिश कर रहे हो.‘‘

मैं बहुत तेज हंसने लगा.

उस ने कहा, ‘‘अब क्या फिल्मों की तरह प्रपोज करना पड़ेगा?‘‘

मैं ने कहा, ‘‘नहींनहीं, उस की कोई जरूरत नहीं है. यह जानते हुए भी कि मैं उम्र में तुम से 7 साल बड़ा हूं और मेरे जीवन में तुम से पहले कोई और थी, तब भी…‘‘

‘‘हां, और वैसे भी प्यार में उम्र, अतीत ये सबकुछ भी माने नहीं रखते.‘‘

मैं ने उस को गले लगा लिया और कहा, ‘‘हमेशा मुझे ऐसे ही प्यार करना.‘‘

वह खुश हो कर मेरी बांहों में आ गई. अब मेरे जीवन में भी कोई आ गया था जो मेरा बहुत खयाल रखता था. कहने को तो उम्र में मुझ से 7 साल छोटी थी, लेकिन मेरा खयाल वह मेरे से भी ज्यादा रखती थी. हम दोनों आपस में सारी बातें शेयर करते थे. अब मैं खुश रहने लगा था.

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उस शाम मैं और स्नेहा साथ ही थे, जब मेरा फोन बजा. फोन पर दूसरी तरफ से एक बहुत धीमी लेकिन किसी के रोने की आवाज ने मुझे अंदर तक हिला दिया. वह कोई और नहीं बल्कि आरती थी.

वह आरती जिस को मैं अपना अतीत समझ कर भुला चुका था या फिर स्नेहा के प्यार के आगे उस को भूलने की कोशिश कर रहा था.

‘‘हैलो, कौन?‘‘

‘‘मैं आरती बोल रही हूं पुनीत,‘‘ आरती ने कहा.

‘‘आज इतने दिन बाद तुम्हारा फोन…‘‘ इस से आगे मैं और कुछ कहता, वह बोल पड़ी, ‘‘तुम ने तो मेरा हाल भी जानने की कोशिश नहीं की. क्या तुम्हारा अहंकार हमारे प्यार से बहुत ज्यादा बड़ा हो गया था?‘‘

‘‘तुम ने भी तो एक बार फोन नहीं किया, तुम्हें आजादी चाहिए थी. कर तो दिया था मैं ने तुम्हें आजाद. फिर अब क्या हुआ?‘‘

‘‘तुम यही चाहते थे न कि मैं तुम से माफी मांगू. लो, आज मैं तुम से माफी मांगती हूं. लौट आओ पुनीत, मेरे लिए. मुझे अपनी गलती का एहसास हो गया है.‘‘

मैं बस उस की बातों को सुने जा रहा था बिना कुछ कहे और स्नेहा उतनी ही बेचैनी से मुझे देखे जा रही थी.

‘‘मुझे तुम से मिलना है,‘‘ आरती ने कहा और बस, इतना कह कर आरती ने फोन काट दिया.

‘‘क्या हुआ, किस का फोन था?‘‘ स्नेहा ने फोन कट होते ही पूछा.

कुछ देर के लिए तो मुझे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था. स्नेहा के दोबारा पूछने पर मैं ने धीमी आवाज में कहा, ‘‘आरती का फोन था.‘‘

‘‘ओह, तुम्हारी गर्लफ्रैंड का,‘‘ स्नेहा ने कहा.

मैं ने स्नेहा से अब तक कुछ छिपाया नहीं था और अब भी मैं उस से कुछ छिपाना नहीं चाहता था. मैं ने सबकुछ उस को सचसच बता दिया.

सारी बात सुनने के बाद स्नेहा ने कहा, ‘‘मुझे लगता है आप को एक बार आरती से जरूर मिलना चाहिए. आखिर पता तो करना चाहिए कि अब वह क्या चाहती है.‘‘

यह जानते हुए भी कि वह मेरा पहला प्यार थी. स्नेहा ने मुझे उस से मिल कर आने की इजाजत और सलाह दी.

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अगले दिन मैं आरती से मिला और आरती ने मुझे देख कर कहा, ‘‘तुम बिलकुल नहीं बदले, अब भी ऐसे ही लग रहे हो जैसे कालेज में लगा करते थे.‘‘

‘‘आरती अब इन सब बातों का कोई मतलब नहीं है,‘‘ मैं ने जवाब दिया.

‘‘क्यों?‘‘ आरती ने पूछा, ‘‘कोई आ गई है क्या तुम्हारे जीवन में?‘‘

‘‘हां, और उस को सब पता है. उसी के कहने पर मैं यहां तुम से मिलने आया हूं.‘‘

‘‘क्या तुम उसे भी उतना ही प्यार करते हो जितना मुझे करते थे, क्या तुम उस को मेरी जगह दे पाओगे?‘‘

मैं शांत रहा. मैं ने धीरे से कहा, ‘‘हां, वह मुझे बहुत प्यार करती है.‘‘

‘‘ओह, तो इसलिए तुम मुझ से दूर जाना चाहते हो. मुझ से ज्यादा खूबसूरत है क्या वह?‘‘

‘‘आरती,‘‘ मैं गुस्से में वहां से उठ कर चल दिया. मुझे लग रहा था कि अब वह वापस क्यों आई? अब तो सब ठीक होने जा रहा था.

उस रात मुझे नींद नहीं आई. एक तरफ वह थी, जिस को कभी मैं ने बहुत प्यार किया था और दूसरी तरफ वह जो मुझ को बहुत प्यार करती थी.

अगली सुबह मैं स्नेहा के घर गया, तो वह कुछ उदास थी. उस ने मुझ से कहा, ‘‘मुझे लगता है कि हम एकदूसरे के लिए नहीं बने हैं और हमारे रास्ते अलग हैं,‘‘ यह कह कर वह चुपचाप ऊपर अपने कमरे में चली गई.

मुझे अपने कानों पर विश्वास नहीं हो रहा था कि इतना प्यार करने वाली लड़की इस तरह की बातें कैसे कर सकती है.

आरती का फोन आते ही मैं अपने खयालों से बाहर आया. मुझे स्नेहा पर बहुत गुस्सा आ रहा था.

‘‘आरती, इस समय मेरा बात करने का बिलकुल मन नहीं है. मैं तुम से बाद में बात करता हूं,‘‘ मेरे फोन रखने से पहले ही आरती बोली, ‘‘क्यों, क्या हुआ?‘‘

‘‘आरती, मैं स्नेहा को ले कर पहले से ही बहुत परेशान हूं,‘‘ मैं ने कहा.

‘‘वह अभी भी बच्ची है, शायद इन सब बातों का मतलब नहीं जानती, इसलिए कह दिया होगा.‘‘

उस के इतना कहते ही मैं ने फोन रख दिया और उसी समय स्नेहा के घर के लिए निकल गया.

मैं ने स्नेहा के घर के बाहर पहुंच कर स्नेहा से कहा, ‘‘सिर्फ एक बार मेरी खुशी के लिए बाहर आ जाओ,‘‘ स्नेहा ना नहीं कर पाई और मुझे पता था कि वह ना कर भी नहीं सकती, क्योंकि बात मेरी खुशी की जो थी.

स्नेहा की आंखों में आंसू थे. मैं ने स्नेहा को गले लगा लिया और कहा, ‘‘पगली, मेरे लिए इतना बड़ा बलिदान करने जा रही थी.‘‘

स्नेहा ने चौंक कर मेरी तरफ देखा. ‘‘तुम मुझ से झूठ बोलने की कोशिश भी नहीं कर सकती. अब यह तो बताओ कि आरती ने क्या कहा, तुम से मिल कर.‘‘

स्नेहा ने रोते हुए कहा, ‘‘आरती ने कहा कि अगर मैं तुम से प्यार करती हूं और तुम्हारी खुशी चाहती हूं तो…. मैं तुम से कभी न मिलूं, क्योंकि तुम्हारी खुशी उसी के साथ है,‘‘ यह कह कर स्नेहा फूटफूट कर रोने लगी.

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मैं ने उस का हाथ अपने हाथ में लेते हुए कहा, ‘‘ओह, मेरा बच्चा मेरे लिए इतना बड़ा बलिदान करना चाहता था. इतना प्यार करती हो तुम मुझ से.‘‘

उस ने एक छोटे बच्चे की तरह कहा,  ‘‘इस से भी ज्यादा.‘‘

मैं ने उस को हंसाने की कोशिश करते हुए कहा, ‘‘कितना ज्यादा?” वह मुसकरा दी.

‘‘लेकिन तुम्हें कैसे पता चला कि वह मुझ से मिली? क्या उस ने तुम्हें बताया?‘‘

‘‘नहीं,‘‘ मैं ने कहा.

‘‘फिर,‘‘ स्नेहा ने पूछा.

मैं ने जोर से हंसते हुए कहा, ‘‘उस ने तुम्हें बच्ची बोला,‘‘ इसीलिए.

इतने में ही मेरा फोन दोबारा बजा, वह आरती का फोन था. मैं ने अपने फोन को काट कर मोबाइल स्विच औफ कर दिया और स्नेहा को गले लगा लिया. बिना कुछ कहे मेरा फैसला आरती तक पहुंच गया था.

Top 10 Revenge Story In Hindi: बदले की टॉप 10 बेस्ट कहानियां हिंदी में

Top 10 Revenge Story In Hindi: अक्सर सुनने को मिलता है कि किसी ने बदले की भावना में कुछ ऐसा कर दिया जिससे उसकी जिंदगी ही खराब हो गई. लोग एक-दूसरे को नीचा दिखाने के चक्कर में क्या कुछ कर गुजरते हैं. तो इस आर्टिकल में आपके लिए लेकर आए हैं टॉप 10 रिवेंज स्टोरी. इन कहानियों को पढ़कर आप जान पाएंगे कि  ‘बदले की भावना’ सही है या गलत? तो पढ़िए सरस सलिल की टॉप ’10 बदले की कहानियां’ हिंदी में…

  1. मरहम: गुंजन ने अभिनव से क्यों बदला लिया?

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गुंजन जल्दीजल्दी काम निबटा रही थी. दाल और सब्जी बना चुकी थी. बस, फुलके बनाने बाकी थे. तभी अभिनव किचन में दाखिल हुआ और गुंजन के करीब रखे गिलास को उठाने लगा. उस ने जानबूझ कर गुंजन को हौले से स्पर्श करते हुए गिलास उठाया और पानी ले कर बाहर निकल गया.

गुंजन की धड़कनें बढ़ गईं. एक नशा सा उस के बदन को महकाने लगा. उस ने चाहत भरी नजरों से अभिनव की तरफ देखा जो उसे ही निहार रहा था. गुंजन की धड़कनें फिर से ठहर गईं. उसे लगा, जैसे पूरे जहान का प्यार लिए अभिनव ने उसे आगोश में ले लिया हो और वह दुनिया को भूल कर अभिनव में खो गई हो.

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2. देह से परे: मोनिका ने आरव से कैसे बदला लिया?

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लिफ्ट बंद है फिर भी मोनिका उत्साह से पांचवीं मंजिल तक सीढि़यां चढ़ती चली गई. वह आज ही अभी अपने निर्धारित कार्यक्रम से 1 दिन पहले न्यूयार्क से लौटी है. बहुत ज्यादा उत्साह में है, इसीलिए तो उस ने आरव को बताया भी नहीं कि वह लौट रही है. उसे चौंका देगी. वह जानती है कि आरव उसे बांहों में उठा लेगा और गोलगोल चक्कर लगाता चिल्ला उठेगा, ‘इतनी जल्दी आ गईं तुम?’ उस की नीलीभूरी आंखें मारे प्रसन्नता के चमक उठेंगी.

इन्हीं आंखों की चमक में अपनेआप को डुबो देना चाहती है मोनिका और इसीलिए उस ने आरव को बताया नहीं कि वह लौट रही है. उसे मालूम है कि आरव की नाइट शिफ्ट चल रही है, इसलिए वह अभी घर पर ही होगा और इसीलिए वह एयरपोर्ट से सीधे उस के घर ही चली आई है. डुप्लीकेट चाबी उस के पास है ही. एकदम से अंदर जा कर चौंका देगी आरव को. मोनिका के होंठों पर मुसकराहट आ गई.

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3. बदला: सुगंधा ने कैसे लिया रमेश से बदला

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‘‘सुगंधा, तुम बहुत खूबसूरत हो. तुम्हारी खूबसूरती पर मैं एक क्या कई जन्म कुरबान कर सकता हूं.’’ ‘‘चलो हटो, तुम बड़े वो हो. कुछ ही मुलाकातों में मसका लगाना शुरू कर दिया. मुझे तुम्हारी कुरबानी नहीं, बल्कि प्यार चाहिए,’’ फिर अदा से शरमाते हुए सुगंधा ने रमेश के सीने पर अपना सिर टिका दिया.

रमेश ने सुगंधा के बालों में अपनी उंगलियां उलझा दीं और उस के गालों को सहलाते हुए बोला, ‘‘सुगंधा, मैं जल्दी ही तुम से शादी करूंगा. फिर अपना घर होगा, अपने बच्चे होंगे…’’ ‘‘रमेश, तुम शादी के वादे से मुकर तो नहीं जाओगे?’’

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4. यह कैसा बदला

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मृदुल को अब अहसास हो रहा था कि बदले की आग ने उसे ही झुलसा कर रख दिया है… और फिर बदला भी कैसा? उस के साथ किसी और ने अपराध किया और उस ने किसी और से बदला लिया. उसे ऐसा फैसला नहीं लेना चाहिए था.

पुलिस मृदुल के पीछे पड़ी हुई थी और यकीनन उसे पकड़ लेगी. उस के 2 साथियों को पुलिस ने पकड़ भी लिया था. क्या करे क्या न करे, उस की समझ में नहीं आ रहा था.

तकरीबन 3 महीने पहले तक मृदुल की जिंदगी काफी अच्छी चल रही थी. वह एक एयर कंपनी में पायलट था. वह थाईलैंड में रहता था और अच्छी जिंदगी जी रहा था. वैसे तो तकरीबन हर देश में उसे जाना होता था, पर ज्यादातर वह भारत और यूरोप ही जाता था.

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5.धनिया का बदला

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‘‘अरे, आओ रे छंगा… गले लग जाओ हमारे… आज कितने बरसों के बाद तुम से मुलाकात हो रही है… कितने दुबले हो गए हो तुम… खातेवाते नहीं हो क्या?’’ बीरू ने अपने भाई से कहा.

‘‘हां भाई बीरू… तुम तो जानते हो… इस खेतीकिसानी का काम करने के बाद कमबख्त चूल्हाचौका तो होने से रहा हम से… दिनभर की मेहनत के बाद जो भी बन पड़ता है बना लेते हैं और खा कर सो जाते हैं.’’

‘‘कोई बात नहीं छंगा भैया… अब हम आ गए हैं… कामधाम में तुम्हारा हाथ बंटाएंगे और तुम्हारी भाभी तुम को खूब दूधमलाई खिलाएंगी… और ये तुम्हारी 2 भतीजियां हैं, इन के साथ खूब खुश रहोगे तुम भी और हम भी.

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6. मालती का बदला: दिलावर सिंह से मालती ने कैसे बदला लिया

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मालती पुणे शहर में नईनई आई थी. वह भारतीय स्टेट बैंक में एक कैशियर थी. अपने काम के प्रति वह बहुत गंभीर रहती थी. ऐसे में मजाल है कि उस से कोई गलती हो जाए. वह बेहद खूबसूरत थी. जब वह मुसकराती तो लोगों के दिलों पर बिजली सी गिर जाती थी.

एक दिन वह सिर झुका  कर बैंक में बैठी अपना काम निपटा रही थी कि एक बुलंद आवाज ने उस का ध्यान तोड़ दिया. एक मोटेतगड़े आदमी ने कहा, ‘‘ऐ लौंडिया, पहले मेरा काम कर.’’ उस आदमी का नाम दिलावर सिंह था.

मालती ने देखा कि वह आदमी 2 गनमैन के साथ खड़ा था. उसे देख कर बैंक के सारे कर्मचारी खड़े हो गए. मैनेजर खुद बाहर आ कर उस से बोला, ‘‘दिलावर सिंहजी, चलिए मेरे चैंबर में चलिए. मैं खुद आप का काम करवा दूंगा.’’

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7. तमाचा : सानिया ने कैसे लिया अपना बदला

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सानिया की सहेलियों को उस से जलन हो रही थी. किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था कि सानिया का रिश्ता इतने बड़े घर में हो जाएगा.

सानिया के अब्बा एक मामूली से फोटोग्राफर थे, जबकि उस के होने वाले ससुर एक बड़े बिजनेसमैन थे. सानिया को उस की सास ने एक शादी में देखा था और तभी उसे पसंद कर लिया था. फिर जल्दी ही उस का रिश्ता भी तय हो गया.

आज सानिया की शादी थी. लाल जोड़े में उस का हुस्न और निखर आया था. सभी सहेलियां उसे घेर कर बैठी थीं और हंसीमजाक कर रही थीं.

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8. मिशन पूरा हुआ : लक्ष्मी ने कैसे लिया इज्जत का बदला

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‘‘अरे ओ लक्ष्मी…’’ अखबार पढ़ते हुए जब लक्ष्मी ने ध्यान हटा कर अपने पिता मोड़ीराम की तरफ देखा, तब वह बोली, ‘‘क्या है बापू, क्यों चिल्ला रहे हो?’’ ‘‘अखबार की खबरें पढ़ कर सुना न,’’ पास आ कर मोड़ीराम बोले.

‘‘मैं तुम्हें नहीं सुनाऊंगी बापू?’’ चिढ़ाते हुए लक्ष्मी अपने बापू से बोली. ‘‘क्यों नहीं सुनाएगी तू? अरे, मैं अंगूठाछाप हूं न, इसीलिए ज्यादा भाव खा रही है.’’

‘‘जाओ बापू, मैं तुम से नहीं बोलती.’’ ‘‘अरे लक्ष्मी, तू तो नाराज हो गई…’’ मनाते हुए मोड़ीराम बोले, ‘‘तुझे हम ने पढ़ाया, मगर मेरे मांबाप ने मुझे नहीं पढ़ाया और बचपन से ही खेतीबारी में लगा दिया, इसलिए तुझ से कहना पड़ रहा है.’’

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9. अनोखा बदला : राधिका ने कैसे लिया बदला

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‘‘तुम क्या क्या काम कर लेती हो?’’ केदारनाथ की बड़ी बेटी सुषमा ने उस काम वाली लड़की से पूछा. सुषमा ऊधमपुर से अपने बाबूजी का हालचाल जानने के लिए यहां आई थी.

दोनों बेटियों की शादी हो जाने के बाद केदारनाथ अकेले रह गए थे. बीवी सालभर पहले ही गुजर गई थी. बड़ा बेटा जौनपुर में सरकारी अफसर था. बाबूजी की देखभाल के लिए एक ऐसी लड़की की जरूरत थी, जो दिनभर घर पर रह सके और घर के सारे काम निबटा सके.

‘‘जी दीदी, सब काम कर लेती हूं. झाड़ूपोंछा से ले कर खाना पकाने तक का काम कर लेती हूं,’’ लड़की ने आंखें मटकाते हुए कहा. ‘‘किस से बातें कर रही हो सुषमा?’’ केदारनाथ अपनी थुलथुल तोंद पर लटके गीले जनेऊ को हाथों से घुमाते हुए बोले. वे अभीअभी नहा कर निकले थे. उन के अधगंजे सिर से पानी टपक रहा था.

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10. हिम्मती गुलाबो : कैसे लिया गुलाबो ने बदला

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गांव में रह कर राजेंद्र खेतीबारी का काम करता था. उस के परिवार में पत्नी शैलजा, बेटा रोहित व बेटी गुलाबो थी. रोहित गांव के ही प्राइमरी स्कूल में चौथी जमात में पढ़ता था, जबकि उस की बहन गुलाबो इंटरमीडिएट स्कूल में 10वीं जमात की छात्रा थी. परिवार का गुजारा ठीक ढंग से हो जाता था, इसलिए राजेंद्र की इच्छा थी कि उस के दोनों बच्चे अच्छी तरह से पढ़लिख जाएं. गुलाबो अपने नाम के मुताबिक सुंदर व चंचल थी. ऐसा लगता था कि वह संगमरमर की तराशी हुई कोई जीतीजागती मूर्ति हो. वह जब भी साइकिल से स्कूल आतीजाती थी, तो गांव के आवारा, मनचले लड़के उसे देख कर फब्तियां कसते और बेहूदा इशारे करते थे.

गुलाबो इन बातों की जरा भी परवाह नहीं करती थी. वह न केवल हसीन थी, बल्कि पढ़ने में भी हमेशा अव्वल रहती थी. वह स्कूल की सभी सांस्कृतिक व खेलकूद प्रतियोगिताओं में बढ़चढ़ कर हिस्सा लेती थी. वह स्कूल की कबड्डी व जूडोकराटे टीम की भी कप्तान थी.

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Crime Story: लिव इन रिलेशनशिप में मिली मौत

एक – लिव इन रिलेशनशिप में रहते हुए बिलासपुर में रमा को रमेश ने छोड़ दिया 1 साल बाद जब रिश्ता टूट गया तो रमा के जीवन में अंधकार था क्योंकि वह स्वयं को लूटी हुई महसूस कर रही थी परिणाम स्वरूप उसने आत्महत्या कर ली.

दो- रायपुर के निकट सिमगा में राजेश और रजनी लिव इन रिलेशनशिप में लंबे समय तक साथ थे. एक दिन रजनी से प्रताड़ित होकर, एक अंतिम चिट्ठी लिखकर, राजेश ने आत्महत्या कर ली.

तीन- राजनांदगांव में आज के आधुनिक लिव इन रिलेशनशिप के फेरे में पड़कर, सुमित्रा और मोहन कीजिंदगी ऐसे तबाह हुई की एक दिन सुमित्रा कि मोहन ने हत्या कर दी और जेल चला गया.

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लिव इन रिलेशनशिप की ऐसे ही अनेक किस्से आज हमारे आस-पास घटनाक्रम के रूप में सामने हैं. युवा पीढ़ी क्या इससे सबक लेगी या क्षणिक आवेग में अपनी जिंदगी बर्बाद करते रहेंगे. आइए देखिए एक ऐसे ही रिपोर्ट-

छत्तीसगढ़ के रायपुर में लिव-इन रिलेशन में रहने वाली एक युवती की हत्या का मामला सामने आया है. युवती से पीछा छुड़ाने के लिए आरोपी प्रेमी ने दूध में चूहा मारने का दवाई डालकर  मौत की सौगात दे दी.

घटना राजधानी रायपुर के  डीडी नगर थाना क्षेत्र की है. डीडी नगर थाना प्रभारी मंजूलता राठौर ने संवाददाता को  बताया – मृतिका रीना बंसोड़ और आरोपी नीरज सेन लंबे समय से  “लिव-इन रिलेशनशिप” में थे. मृतका रायपुरा स्थित एक निजी अस्पताल में प्राइवेट जॉब करती थी, उससे  आरोपी नीरज सेन का  गहरा सम्बन्ध जांच मे उजागर हुआ है .

6 महीने पहले किसी बात को लेकर दोनों के मध्य विवाद हुआ, जिसकी वजह से आरोपी नीरज ने सुबह  मृतका के दूध में चूहे मारने की दवाई डालकर पिला दी. हालत बिगड़ने पर मृतका को पडोसी ने अस्पताल में भर्ती कराया .  इलाज के दौरान रीना की मौत हो गई.  मृतका ने अपने अंतिम  बयान में बताया था कि आरोपी नीरज  ने उसे दूध में जहर मिला कर  पिला दिया था. पोस्टमार्टम रिपोर्ट आने के बाद 5 फरवरी 2020, बुधवार को आरोपी नीरज सेन की गिरफ्तारी की गई है.

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‘इश्क’ के साइड इफेक्ट!

लिव इन रिलेशनशिप के इस मामले मे  कहानी कुछ इस तरह की है -धमतरी के तरसिंवा निवासी रीना बंसोड़ रायपुर  में नर्सिंग की पढ़ाई कर रही थी. पढ़ाई के साथ ही एक प्राइवेट नर्सिंग होम में वह जाॅब भी करने लगी  थी। इस दरम्यान  रीना  बंसोड का धमतरी कंडेल के रहवासी  नीरज सेन के साथ परिचय  हुआ  धीरे धीरे  संबंध  गहराते  गये .नीरज अपनी प्रेमिका से मिलने उसके घर पहुंच जाता था.18 जून 2019  की  रात भी नीरज अपनी प्रेमिका रीना बंसोड  से मिलने डीडी नगर आया . रीना यहां किराये के मकान में रहा करती थी.  दोनों साथ बैठकर बातें कर रहे थे, इसी बीच विवाद हुआ और विवाद इतना बढ़ा कि नीरज  बेकाबू हो गया. फिर जैसा कि  अक्सर होता है  रीना नीरज का विवाद थोड़े समय पश्चात शांत  हो गया.दोनों  ने रात साथ  बितायी .सुबह मानो  नीरज के दिमाग में मर्डर की सनक सवार हो गयी.

19 जून 2019की सुबह आरोपी नीरज सेन  ने दुध में चुहा मारने दवा मिला कर प्रेमिका रीना  को पिला दी.जहर के सेवन से, रीना को उल्टी होने लगी हालत  बिगड़ गयी उसे  गंभीर अवस्था में  अस्पताल दाखिल किया गया, जहां पर उसकी मौत हो गयी. पुलिस ने अस्पताल में रीना का बयान लिया था, जिसमें उसने कहा था कि घटना वाले दिन प्रेमी ने उसे दुध दिया था. इसी के बाद से उसकी तबियत खराब हुई .

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आठ माह बाद इस मामले में मृतिका की पोस्ट मार्टम  रिपोर्ट सामने आयी, जिसके बाद पुलिस को साक्ष्य मिल गया  कि रीना  की मौत दूध में जहर मिलाकर पिलाने से हुई थी. इस प्रकरण में खास बात यह रही कि पुलिस को आरोपी तक पहुंचने के लिए 8 महीने का लंबा समय लग गया यह बताता है कि  पुलिस किस बेतरतीब तरीके से काम कर रही है.

सजा किसे मिली- भाग 1: आखिर अल्पना अपने माता-पिता से क्यों नफरत करती थी?

लेखिका- सुधा आदेश

अल्पना की आंखें खुलीं तो खुद को अस्पताल के बेड पर पाया. मां फौरन उस के पास आ कर बोलीं, ‘‘कैसी है, बेटी. इतनी बड़ी बात तू ने मुझ से छिपाई… मैं मानती हूं कि अच्छी परवरिश न कर पाने के कारण तू अपने मातापिता को दोषी मानती है पर हैं तो हम तेरे मांबाप ही न…तुझे दुखी देख कर भला हम खुश कैसे रह सकते हैं…’’

‘‘प्लीज, आप इन से ज्यादा बातें मत कीजिए…इन्हें आराम की सख्त जरूरत है,’’ उसी समय राउंड पर आई डाक्टर ने मरीज से बातें करते देख कर कहा तथा नर्स को कुछ जरूरी हिदायत देती हुई चली गई.

अल्पना कुछ कह पाती उस से पहले ही नर्स आ गई तथा उस ने उस के मम्मीपापा से कहा, ‘‘इन की क्लीनिंग करनी है, कृपया थोड़ी देर के लिए आप लोग बाहर चले जाएं.’’

नर्स साफसफाई कर रही थी पर अल्पना के मन में उथलपुथल मची हुई थी. वह समझ नहीं पा रही कि उस से कब और कहां गलती हुई…उसे लगा कि मातापिता को दुख पहुंचाने के लिए ऐसा करतेकरते उस ने खुद के जीवन को दांव पर लगा दिया…अतीत की घटनाओं के खौफनाक मंजर उस की आंखों के सामने से किताब के एकएक पन्ने की तरह आ- जा रहे थे.

वह एक संपन्न परिवार से थी. मातापिता दोनों के नौकरी करने के कारण उसे उन का सुख नहीं मिल पाया था. जब उसे मां के हाथों का पालना चाहिए था तब दादी की गोद में उस ने आंखें खोलीं, बोलना और चलना सीखा. वह डेढ़ साल की थी कि दादी का साया उस के ऊपर से उठ गया. अब उसे ले कर मम्मीपापा में खींचतान चलने लगी, तब एक आया का प्रबंध किया गया.

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एक दिन ममा ने आया को दूध में पानी मिला कर उसे पिलाते तथा बचा दूध स्वयं पीते देख लिया. उस की गलती पर उसे डांटा तो उस ने दूसरे दिन से आना ही बंद कर दिया…अब उस की समस्या उन के सामने फिर मुंहबाए खड़ी थी. दूसरी आया मिली तो वह पहली से भी ज्यादा तेज और चालाक निकली. उसे अकेला छोड़ कर वह अपने प्रेमी के साथ गप लड़ाती रहती…पता लगने पर ममा ने उसे भी निकाल दिया…

वह 2 साल की थी, फिर भी उस के जेहन में आज भी क्रेच की आया का बरताव अंकित है. उस के स्वयं खाना न खा पाने पर डांटना, झल्लाना, यहां तक कि मारना…पता नहीं और भी क्याक्या… दहशत इतनी थी कि जब भी मां उसे क्रेच में छोड़ने के लिए जातीं तो वह पहले से ही रोने लगती थी पर ममा को समय से आफिस पहुंचना होता था अत: उस के रोने की परवा न कर वह उसे आया को सौंप कर चली जाती थीं.

जब वह पढ़ने लायक हुई तब स्कूल में उस का नाम लिखवा दिया गया. स्कूल की छुट्टी होती तो कभी ममा तो कभी पापा उसे स्कूल से ला कर घर छोड़ देते तथा उस से कहते कि उन के अलावा कोई भी आए तो दरवाजा मत खोलना और न ही बाहर निकलना. देखने के लिए दरवाजे में आई पीस लगवा दिया था.

एक दिन वह पड़ोस में रहने वाले सोनू की आवाज सुन कर बाहर चली गई तथा खेलने लगी तभी ममा आ गईं. खुला घर तथा उसे बाहर खेलते देख वह क्रोधित हो गईं…दूसरे दिन से वह उसे बाहर से बंद कर के जाने लगीं…एक दिन उसे न जाने क्या सूझा कि घर की पूरी चीजें जो उस के दायरे में थीं, उस ने नीचे फेंक दीं…उस दिन उस की खूब पिटाई हुई और मम्मीपापा में भी जम कर झगड़ा हुआ.

ममा की परेशानी देख कर सोनू की मम्मी ने स्कूल के बाद उसे अपने घर छोड़ कर जाने के लिए कहा तो वह बहुत खुश हुई…साथ ही मम्मीपापा की समस्या भी हल हो गई. 4 साल ऐसे ही निकल गए. पर तभी सोनू के पापा का तबादला हो गया. फिर वही समस्या.

बड़ी होने के कारण अब उस के स्कूल का समय बढ़ गया था तथा अब वह पहले से भी ज्यादा समझदार हो गई थी. उस ने अपनी स्थिति से समझौता कर लिया था, ममा के आदेशानुसार वह उन के या पापा के आफिस से आने पर उन की आवाज सुन कर ही दरवाजा खोलती, किसी अन्य की आवाज पर नहीं. एकांत की विभीषिका उसे तब भी परेशान करती पर जैसेजैसे बड़ी होती गई उसे पढ़ाने और होमवर्क कराने को ले कर मम्मीपापा में तकरार होने लगी.

अभी वह 10 वर्ष की ही थी कि उसे बोर्डिंग स्कूल में डाल दिया गया. वहां मम्मीपापा हर महीने उस से मिलने जाते, उस के लिए अच्छीअच्छी गिफ्ट लाते, पूरा दिन उस के साथ गुजारते पर शाम को उसे जब होस्टल छोड़ कर जाने लगते तो वह रो पड़ती थी. तब ममा आंखों में आंसू भर कर कहतीं, ‘बेटा, मजबूरी है. जो मैं कर रही हूं वह तेरे भविष्य के लिए ही तो कर रही हूं.’

वह उस समय समझ नहीं पाती थी कि यह कैसी मजबूरी है. सब के बच्चे अपने मम्मीपापा के पास रहते हैं फिर वह क्यों नहीं…पर धीरेधीरे वह अपनी हमउम्र साथियों के साथ घुलनेमिलने लगी क्योंकि सब की

एक सी ही

कहानी थी…वहां अधिकांशत: बच्चों को इसलिए होस्टल में डाला गया था क्योंकि किसी की मां नहीं थी तो किसी के घर का माहौल अच्छा नहीं था, किसी के मातापिता उस के मातापिता की तरह ही कामकाजी थे तो कोई अपने बच्चों के उन्नत भविष्य के लिए उन्हें वहां दाखिल करवा गए थे.

छुट्टी में घर जाती तो मम्मीपापा की व्यस्तता देख उसे लगता था कि इस से तो वह होस्टल में ही अच्छी थी. कम से कम वहां बात करने वाला कोई तो रहता है. धीरेधीरे उस के मन में विद्रोह पैदा होता गया. उसे मम्मीपापा स्वार्थी लगने लगे. जिन्होंने अपने स्वार्थ के लिए उसे पैदा तो कर दिया पर उस की जिम्मेदारी उठाना नहीं चाहते.

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आखिर एक बच्चे को अच्छे कपड़ों, अच्छे खिलौनों के साथसाथ और भी तो कुछ चाहिए, यह साधारण सी बात वह क्यों नहीं समझ पा रहे हैं या जानतेबूझते हुए भी समझना नहीं चाहते हैं. एक बार उस ने पूछ ही लिया, ‘मैं आप की ही बेटी हूं या आप कहीं से मुझे उठा तो नहीं लाए हैं.’

उस की मनोस्थिति समझे बिना ही ममा भड़क कर बोलीं, ‘कैसी बातें कर रही है…कौन तेरे मन में जहर घोल रहा है?’

मम्मा आशंकित मन से पापा की ओर देखने लगीं. पापा भी चुप कहां रहने वाले थे. बोल उठे, ‘शक क्यों नहीं करेगी. कभी प्यार के दो बोल बोले हैं. कभी उस के पास बैठ कर उस की समस्याएं जानने की कोशिश की है…तुम्हें तो बस, हर समय काम ही काम सूझता रहता है.’

‘तो तुम क्यों नहीं उस से समस्याएं पूछते…तुम भी तो उस के पिता हो. क्या बच्चे को पालने की सारी जिम्मेदारी मां को ही निभानी पड़ती है.’

दोनों में तकरार इतनी बढ़ी कि उस दिन घर में खाना ही नहीं बना. ममा गुस्से में चली गईं. लगभग 10 बजे पापा हाथ में दूध तथा ब्रैड ले कर आए और आग्रह से खाने के लिए कहने लगे पर उसे भूख कहां थी. मन की बात जबान पर आ ही गई, ‘पापा, अगर किसी को मेरी आवश्यकता नहीं थी तो मुझे इस दुनिया में ले कर ही क्यों आए? मेरी वजह से आप और ममा में झगड़ा होता है…मुझे कल ही होस्टल छोड़ दीजिए. मेरा यहां मन नहीं लगता.’

पापा ने प्यार से उस के सिर पर हाथ फेरते हुए कहा, ‘ऐसा नहीं कहते बेटा, यह तेरा घर है.’

‘घर, कैसा घर, पापा…मैं पूरे दिन अकेली रहती हूं. आप और ममा आते भी हैं तो सिर्फ अपनीअपनी समस्याएं ले कर. मेरे लिए आप दोनों के पास समय ही नहीं है.’

पापा उदास मन से आफिस चले गए थे पर उस दिन उसे अपने मन में बारबार उमड़ती बात कहने पर बहुत संतोष मिला था…

घर का भूला- भाग 2: कैसे बदलने लगे महेंद्र के रंग

वह रोती हुई अपने कमरे में घुस गई. अमित के समझाने पर भी वह मन का संदेह नहीं दबा पा रही थी. उस का अब पढ़ने में रत्ती भर भी मन नहीं लगता था. उस ने घबरा कर अपनी नानी को खत लिख दिया. नानाजी तो थे नहीं, सोचा, नानी यहां घर पर रह कर सब संभाल लेंगी. तब तक उस की परीक्षा भी निबट जाएगी.

हफ्ते भर के अंदर नानी आ गईं. महेंद्र अचानक उन्हें देख कर चौंके जरूर परंतु ज्यादा कुछ कहा नहीं, ‘‘अरे अम्मांजी, आप…अचानक कैसे आ गईं?’’

‘‘भैया महेंद्र, 6 मास से बच्चों को नहीं देखा था. इसलिए नरेंद्र को ले कर चली आई. यह तो कल लौट जाएगा, मैं रहूंगी.’’

‘‘अच्छा किया आप ने, बच्चों की परीक्षाएं भी पास हैं. आभा को भी कुछ राहत मिलेगी. वैसे मालती बहुत अच्छी औरत हमें मिल गई है. सुबहशाम काम कर के चली जाती है. काम भी सफाई से करती है.’’

‘‘ठीक है  भैया, अब तो अमित का एम.ए. फाइनल होने जा रहा है. आभा भी बी.ए. कर लेगी. अमित के लिए लड़की और आभा के लिए अच्छा घरवर देख कर दोनों को निबटा दो. बहू आने से घर- गृहस्थी की समस्याएं सुलझ जाएंगी.’’

‘‘अम्मांजी, अमित अपने पैरों पर तो खड़ा हो ले, तभी तो कोई अपनी बेटी देगा उसे. आभा के लिए भी अभी देर है. वह एम.ए. करना चाहती है. 2 साल और सही. अभी तो सब काम चल ही रहा है.’’

‘‘ठीक है भैया, जैसा तुम चाहो. पर एक बात पर और ध्यान दो, माया के सब सोनेचांदी के जेवर लाकर में रख दो. घर पर रखना ठीक नहीं है. तुम तीनों घर से बाहर रहते हो, बडे़ नगरों में चोरियां बहुत होती हैं, इसलिए कह रही हूं.’’

‘‘हां, यह ठीक कहा आप ने. अब बैंक में लाकर ले ही लूंगा.’’

बहुत बार कहने पर भी वह लापरवाही बरतते रहे. तब अलमारी के लाकर की चाबी आभा अपने पास रखने लगी थी. जब से उस ने मालती के पैरों में मां की पायल देखी थीं, तभी दोनों भाईबहनों ने बैंक में चुपचाप एक लाकर ले कर सारे जेवर उस में रख दिए थे. पिता से इस की चर्चा नहीं की. सोचा, समय आने पर बता देंगे. बस कुछ नकली जेवर ही उन्होंने घर पर छोड़ रखे थे.

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नानी एकडेढ़ माह के पश्चात चली गईं. आभा ने कम्प्यूटर क्लास ज्वाइन कर ली थी, इस से वह पापा के नानी के साथ जाने के आग्रह को टाल गई. अमित भी कंप्यूटर कोर्स के साथ ही कोचिंग कर रहा था.

उस दिन आभा जल्दी लौट आई थी, क्योंकि सर के किसी निकट संबंधी की मृत्यु हो गई थी. घर आ कर उसे आश्चर्य हुआ क्योंकि मालती घर पर मौजूद थी, जबकि घर की दूसरी चाबी केवल पापा के पास रहती थी.

‘‘अरे, आज तुम समय से पहले कैसे आ गईं?’’ वह पूछ बैठी.

‘‘साहब आ गए हैं न, उन की तबीयत कुछ ठीक नहीं है,’’ वह कुछ घबराहट में अटकअटक कर बोली.

‘‘तो तुम्हें किस ने बतलाया कि उन की तबीयत ठीक नहीं है. क्या पापा तुम्हें लेने गए थे तुम्हारे घर?’’

‘‘अरे नहीं, वह सुबह कह रहे थे. इस से मैं यों ही चली आई.’’

आभा लपक कर पापा के कमरे में घुस गई, देखा वह अपने बेड पर आंखें बंद किए चुपचाप लेटे हैं.

‘‘पापा, आप ने सुबह हम लोगों को क्यों नहीं बतलाया कि आप की तबीयत ठीक नहीं है. मैं आज नहीं जाती,’’ वह उन के माथे पर हाथ रख कर बोली तो उन्होंने पलकें खोलीं, ‘‘अरे, ऐसी खराब नहीं है. थोड़ा सिरदर्द था सुबह से, सोचा ठीक हो जाएगा, इस से आफिस चला गया, पर दर्द कम नहीं हुआ तो लौट आया. सुबह मालती से यों ही कह दिया था तो वह चली आई.’’

परंतु टेबिल पर जूठी पड़ी प्लेटों में समोसेरसगुल्लों के टुकड़े और ही कहानी कह रहे थे. 2 प्लेटें, 2 चाय के मग, क्या यह सब नित्य उन के जाने के बाद होता है? मन के किसी कोने में शंका के अंकुर सबल पौध से सिर उठाने लगे. उस ने देख कर भी अनदेखा कर दिया और कुछ क्षण वहां बैठ कर रसोई की ओर आई तो देखा, मालती गैस के नीचे कोई पालिथीन की थैली छिपा रही है.

‘‘यह गैस के नीचे कचरा क्यों ठूंसा तुम ने?’’ उस ने झपट कर थैली को बाहर घसीटा तो  2 रसगुल्ले, 2 समोसे जमीन पर आ गिरे. मालती का मुंह सफेद पड़ गया.

‘‘अरे, ये कहां से आए?’’

‘‘ये…ये बचे थे, साहब ने कहा कि रख लो, बच्चों को दे देना. इसलिए रख लिए.’’

आभा कुछ भी न बोल पाई. उस का मन किसी भावी आशंका की चेतावनी दे रहा था. शाम को जब अमित घर आया तो आभा ने उसे सब बता दिया. उस के ललाट पर भी चिंता की गहरी रेखाएं खिंच गईं.

जब से उन की मां नहीं रहीं पापा खाना प्राय: अपने कमरे में ही मंगा कर खाते थे. मालती 1-1 फुलके के बहाने कई चक्कर उन के कमरे के लगा लेती थी. यह आभा को बहुत अखर रहा था. एक दिन वह बोली, ‘‘मालती, तुम जल्दी खाना बना कर घर चली जाया करो.’’

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‘‘साहब को गरम फुलके पसंद हैं और आप लोगों को भी तो. देरसवेर की क्या बात है. बना खिला कर चली जाया करूंगी. आप क्यों परेशान हो, मुझे तो आदत है.’’

‘‘नहीं, तुम कल से हम दोनों का खाना कैसरोल में बना कर रख दिया करो और आटा सान कर रख देना, मैं पापा को खुद सेंक कर खिला दूंगी. जैसा मैं ने कहा है वैसा करो, समझी,’’ उस ने जरा सख्त लहजे में कहा तो वह चुप रह गई. परंतु थोड़ी देर पश्चात ही उस की चुप्पी का कारण सामने आ गया. पापा ने आभा को आवाज दी.

‘‘तुम ने मालती को शाम का खाना बनाने से क्यों मना किया?’’

‘‘मना कहां किया, पापा. यह कहा कि हम दोनों का खाना बना कर कैसरोल में रख दे, अगर आप गरम फुलके चाहेंगे तो मैं सेंक कर आप को खिला दूंगी, तो वह आप से शिकायत कर गई?’’ आभा को गुस्सा आ गया.

‘‘शिकायत क्यों, बस कह रही थी कि कल से बेबी आप की रोटियां सेंकेगी. बेकार में तुम क्यों गरमी में मरो, बनाने दो उसे.’’

सूना आसमान- भाग 1: अमिता ने क्यों कुंआरी रहने का फैसला लिया

अमिता जब छोटी थी तो मेरे साथ खेलती थी. मुझे पता नहीं अमिता के पिता क्या काम करते थे, लेकिन उस की मां एक घरेलू महिला थीं और मेरी मां के पास लगभग रोज ही आ कर बैठती थीं. जब दोनों बातों में मशगूल होती थीं तो हम दोनों छोटे बच्चे कभी आंगन में धमाचौकड़ी मचाते तो कभी चुपचाप गुड्डेगुडि़या के खेल में लग जाते थे.

धीरेधीरे परिस्थितियां बदलने लगीं. मेरे पापा ने मुझे शहर के एक बहुत अच्छे पब्लिक स्कूल में डाल दिया और मैं स्कूल जाने लगा. उधर अमिता भी अपने परिवार की हैसियत के मुताबिक स्कूल में जाने लगी थी. रोज स्कूल जाना, स्कूल से आना और फिर होमवर्क में जुट जाना. बस, इतवार को वह अपनी मां के साथ नियमित रूप से मेरे घर आती, तब हम दोनों सारा दिन खेलते और मस्ती करते.

हाईस्कूल के बाद जीवन पूरी तरह से बदल गया. कालेज में मेरे नए दोस्त बन गए, उन में लड़कियां भी थीं. अमिता मेरे जीवन से एक तरह से निकल ही गई थी. बाहर से आने पर जब मैं अमिता को अपनी मां के पास बैठा हुआ देखता तो बस, एक बार मुसकरा कर उसे देख लेता. वह हाथ जोड़ कर नमस्ते करती, तो मुझे वह किसी पौराणिक कथा के पात्र सी लगती. इस युग में अमिता जैसी सलवारकमीज में ढकीछिपी लड़कियों की तरफ किसी का ध्यान नहीं जाता था. अमिता खूबसूरत थी, लेकिन उस की खूबसूरती के प्रति मन में श्रद्धाभाव होते थे, न कि उस के साथ चुहलबाजी और मौजमस्ती करने का मन होता था.

वह जब भी मुझे देखती तो शरमा कर अपना मुंह घुमा लेती और फिर कनखियों से चुपकेचुपके मुसकराते हुए देखती. दिन इसी तरह बीत रहे थे.

फिर मैं ने नोएडा के एक कालेज में बीटैक में दाखिला ले लिया और होस्टल में रहने लगा. केवल लंबी छुट्टियों में ही घर जाना हो पाता था. जब हम घर पर होते थे, तब अमिता कभीकभी हमारे यहां आती थी और दूर से ही शरमा कर नमस्ते कर देती थी, लेकिन उस के साथ बातचीत करने का मुझे कोई मौका नहीं मिलता था. उस से बात करने का मेरे पास कोई कारण भी नहीं था. ज्यादा से ज्यादा, ‘कैसी हो, क्या कर रही हो आजकल?’ पूछ लेता. पता चला कि वह किसी कालेज से बीए कर रही थी. बीए करने के बावजूद वह अभी तक सलवारकमीज में लिपटी हुई एक खूबसूरत गुडि़या की तरह लगती थी. लेकिन मुझे तो जींसटौप में कसे बदन और दिलकश उभारों वाली लड़कियां पसंद थीं. उस की तमाम खूबसूरती के बावजूद, संस्कारों और शालीन चरित्र से मुझे वह प्राचीनकाल की लड़की लगती थी.

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गरमी की एक उमसभरी दोपहर थी. मैं अपने कमरे में एसी की ठंडी हवा लेता हुआ एक उपन्यास पढ़ने में व्यस्त था, तभी दरवाजे पर एक हलकी थाप पड़ी. मैं चौंक गया और लेटेलेटे ही पूछा, ‘‘कौन?’’

‘‘मैं, एक मीठी आवाज कानों में पड़ी. मैं पहचान गया, अमिता की आवाज थी, मैं ने कहा, आ जाओ, दरवाजे की सिटकिनी नहीं लगी है.’’

‘‘हां,’’ उस का सिर झुका हुआ था, आंखें उठा कर उस ने एक बार मेरी तरफ देखा. उस की आंखों में एक अनोखी कशिश थी, जो सामने वाले को अपनी तरफ आकर्षित कर रही थी. उस का चेहरा भी दमक रहा था. वह बहुत ही खूबसूरत लग रही थी. उस के नैननक्श बहुत सुंदर थे. मैं एक पल के लिए देखता ही रह गया और मेरे हृदय में एक कसक सी उठतेउठते रह गई.

‘‘तुम…अचानक…इतनी दोपहर को? कोईर् काम है?’’ मैं उस के सौंदर्य से अभिभूत होता हुआ बिस्तर पर बैठ गया. पहली बार वह मुझे इतनी सुंदर और आकर्षक लगी थी.

वह शरमातीसकुचाती सी थोड़ा आगे बढ़ी और अपने हाथों को आगे बढ़ाती हुई बोली, ‘‘मिठाई लीजिए.’’

‘‘मिठाई?’’

‘‘हां, आज मेरा जन्मदिन है. मां ने मिठाई भिजवाई है,’’ उस ने सिर झुकाए हुए ही कहा.

‘‘अच्छा, बधाई हो,’’ मैं ने उस के हाथों से मिठाई ले ली.

मैं उस वक्त कमरे में अकेला था और एक जवान लड़की मेरे साथ थी. कोई देखता तो क्या समझता. मेरा ध्यान भी उपन्यास में लगा हुआ था. कहानी एक रोचक मोड़ पर पहुंच चुकी थी. ऐसे में अमिता ने आ कर अनावश्यक व्यवधान पैदा कर दिया था. अत: मैं चाहता था कि वह जल्दी से जल्दी मेरे कमरे से चली जाए. लेकिन वह खड़ी ही रही. मैं ने प्रश्नवाचक भाव से उसे देखा.

‘‘क्या मैं बैठ जाऊं?’’ उस ने एक कुरसी की तरफ इशारा करते हुए कहा.

‘‘हां…’’ मेरी हैरानी बढ़ती जा रही थी. मेरे दिल में धुकधुकी पैदा हो गई. क्या अमिता किसी खास मकसद से मेरे कमरे में आई थी? उस की आंखें याचक की भांति मेरी आंखों से टकरा गईं और मैं द्रवित हो उठा. पता नहीं, उस की आंखों में क्या था कि डरने के बावजूद मैं ने उस से कह दिया, ‘‘हांहां, बैठो,’’ मेरी आवाज में अजीब सी बेचैनी थी.

कुरसी पर बैठते हुए उस ने पूछा, ‘‘क्या आप को डर लग रहा है?’’

‘‘नहीं, क्या तुम डर रही हो?’’ मैं ने अपने को काबू में करते हुए कहा.

‘‘मैं क्यों डरूंगी? आप से क्या डरना?’’ उस ने आत्मविश्वास से कहा.

‘‘डरने की बात नहीं है? चारों तरफ सन्नाटा है. दूरदूर तक किसी की आवाज सुनाई नहीं पड़ रही. भरी दोपहर में लोग अपनेअपने घरों में बंद हैं. ऐसे में एक सूने कमरे में एक जवान लड़की किसी लड़के के साथ अकेली हो तो क्या उसे डर नहीं लगेगा?’’

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वह हंसते हुए बोली, ‘‘इस में डरने की क्या बात है? मैं आप को अच्छी तरह जानती हूं. आप भी तो कालेज में लड़कियों के साथ उठतेबैठते हैं, उन के साथ घूमतेफिरते हो. रेस्तरां और पार्क में जाते हो, तो क्या वे लड़कियां आप से डरती हैं?’’

मैं अमिता के इस रहस्योद्घाटन पर हैरान रह गया. कितनी साफगोई से वह यह बात कह रही थी. मैं ने पूछा, ‘‘तुम्हें कैसे मालूम कि हम लोग लड़कियों के साथ घूमतेफिरते हैं और मौजमस्ती करते हैं?’’

‘‘अब मैं इतनी भोली भी नहीं हूं. मैं भी कालेज में पढ़ती हूं. क्या मुझे नहीं पता कि किस प्रकार युवकयुवतियां एकदूसरे के साथ घूमते हैं और आपस में किस प्रकार का व्यवहार करते हैं?’’

‘‘लेकिन वे युवतियां हमारी दोस्त होती हैं और तुम…’’ मैं अचानक चुप हो गया. कहीं अमिता को बुरा न लग जाए. अफसोस हुआ कि मैं ने इस तरह की बात कही. आखिर अमिता मेरे लिए अनजान नहीं थी. बचपन से हम एकदूसरे को जानते हैं. जवानी में भले ही आत्मीयता या निकटता न रही हो, लेकिन इस का मतलब यह नहीं कि वह मुझ से मिल नहीं सकती थी.

Satyakatha: पत्नी की बेवफाई- भाग 1

सौजन्य- सत्यकथा

Writer- मुकेश तिवारी

माना कि शराब की लत बुरी होती है, लेकिन उस से भी बुरा होता है वासना का नशा. अगर पति और पत्नी दोनों इन आदतों के शिकार हो जाएं तब तो उन की जिंदगी की गाड़ी को पटरी से उतरने से कोई नहीं रोक सकता.

ऐसा ही हुआ मालती और उस के पति फेरन के साथ. पति को नशे की लत थी और पत्नी अनैतिकता की मस्ती में ऐसी डूबी कि उस ने पतिपत्नी के रिश्ते को वासना की आग में झोंक दिया था.

एक दिन बाजार से घर के कुछ जरूरी सामान की खरीदारी कर मालती तेज कदमों से अपने घर लौट रही थी. पीछे से साइकिल चला कर आते रामऔतार ने उसे रोका, ‘‘पैदल क्यों चल रही हो, पीछे कैरियर पर बैठ जाओ.’’ रामऔतार उस के गांव का ही रहने वाला युवक था.

‘‘अरे, नहींनहीं, तुम जाओ. गांव वाले देखेंगे तो गलत समझेंगे.’’ मालती ने उस से कहा.

‘‘गलत समझेंगे तो क्या हुआ. हम कौन भला सच्चे हैं.’’ रामऔतार बोला.

‘‘सब की नजरों में तो अच्छे हैं. पति घर आ चुका होगा. 2 हफ्ते बाद काम पर गया है.’’ मालती बोली.

‘‘अच्छा कोई बात नहीं. अपना थैला मुझे दे दो. और हां, अपने पति फेरन को बोलना कि मैं शाम आऊंगा. मैं ने उस के लिए एक बोतल खरीदी है.’’ कहते हुए रामऔतार ने मालती के हाथ से सब्जी और सामान का थैला ले लिया. उसे कैरियर पर एक हाथ से बांधने लगा, क्योंकि एक हाथ से वह विकलांग था.

‘‘तुम एक हाथ से कैसे सब काम कर लेते हो, मुझे देख कर हैरत होती है,’’ देख कर मालती बोली.

‘‘इस में हैरानी की क्या बात है, यह तो तुम्हारा प्यार है, जो तुम्हें देख कर हिम्मत आ जाती है.’’ रामऔतार उस के गाल को छूते हुए बोला.

मालती शरमा गई. वह बोली, ‘‘बसबस, मैं चलती हूं तुम कितना खयाल रखते हो मेरा.’’

‘‘मैं तुम्हारा सामान तुम्हारे घर में दरवाजे की बगल में रख कर टोकरी से ढंक कर रख दूंगा,’’ कह कर रामऔतार वहां से चला गया.

मालती खाली हाथ सड़क किनारे चलती हुई पैडल मारते रामऔतार को देखती रही. निश्चित तौर पर वह रामऔतार के बारे में ही सोचने लगी थी.

मालती उसे पिछले 7 सालों से जानती थी. वह उस के पति फेरन का जिगरी दोस्त था. उस के घर से कुछ मकान छोड़ कर वह दूसरे टोले में रहता था. एक हाथ से विकलांग होने के बावजूद वह खेतीकिसानी से ले कर घर का सारा कामकाज खुद करता था. उस की शादी नहीं हुई थी. परिवार में वह अकेला था.

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उस की दूसरे रिश्तेदारों से जरा भी नहीं पटती थी. यही कारण था कि उस का अपने दोस्त फेरन के घर निर्बाध रूप से आनाजाना था. मालती भी उस के घर बेरोकटोक आतीजाती थी. उस के यहां वह झाड़ू और साफसफाई जैसे घरेलू काम को अपने घर का कामकाज समझ निपटा दिया करती थी.

फेरन को इस का जरा भी बुरा नहीं लगता था. रामऔतार की एक ही लत थी शराब पीने की. कहते हैं कि यह लत फेरन ने ही उसे लगाई थी. हालांकि सालों से शराब का इंतजाम करने का काम रामऔतार ही करता आ रहा था. उस रोज भी वह अपने दोस्त के लिए एक बोतल शराब खरीद लाया था.

मालती अंधेरा होने से पहले अपने घर पहुंच गई थी, उस का पति भी काम से लौट आया था.

‘‘कितने दिनों का काम मिला है?’’ मालती ने सामान का थैला उठाते हुए पति ने पूछा.

‘‘2 हफ्ते का है, लेकिन ठेकेदार पैसे कम दे रहा है. कहता है लौकडाउन में काम कम हो गया है.’’ फेरन ने बताया.

‘‘कोई बात नहीं, घर में कुछ तो आएगा, खाली बैठे रहने से तो अच्छा है.’’ मालती लंबी सांस लेते हुई बोली.

‘‘आज कुछ अच्छा मसालेदार खाना पकाओ.’’ फेरन ने कहा.

‘‘हांहां, क्यों नहीं! तुम्हारा दोस्त भी आने वाला होगा, काम मिलने की खुशी में उस के साथ जश्न मनाना.’’ मालती ने चुटकी ली.

इसी बीच रामऔतार ने दरवाजे पर आवाज दी.

‘‘लो, आ गया तुम्हार यार!’’ मालती कह कर हंसने लगी.

रामऔतार के आने के बाद कुछ देर में ही घर के आंगन में फेरन और रामऔतार की दारू की महफिल सज गई थी. खाने को 3 तरह के नमकीन थे. बड़ी बोतल के साथ रखे 2 गिलासों में शराब खाली होने का नाम ही नहीं ले रहा था.

जैसे ही फेरन का गिलास खाली होता, रामऔतार उस में और शराब डाल देता था. मक्के की मोटी रोटी के एक टुकड़े के साथ चटखारेदार सब्जी का आनंद लेते हुए सहज बोल पड़ता कि मीट होती तो और भी मजा आ जाता.

मालती भी पति रामऔतार के गिलास से ही फेरन की नजर बचा कर एकदो घूंट पी लेती थी. धीरेधीरे दोनों दोस्त नशे में झूमने लगे थे, लेकिन फेरन पर नशा अधिक चढ़ गया था.

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वह एक ओर मुंह नीचे कर बड़बड़ाने लगा, ‘‘रामऔतार तू मेरा बहुत अच्छा यार है, इस कड़की में भी तूने मुझे अच्छी दारू पिलाई. मजा आ गया.’’

‘‘तू पैसे और काम की चिंता मत कर, जब तक तेरा दोस्त है तब तक दारू पिलाएगा. और अच्छीअच्छी विदेशी दारू भी पिलाएगा.’’ रामऔतार ने कहते हुए बगल में खड़ी मालती का हाथ खींच कर बिठा लिया.

मालती के बैठने के धम्म की आवाज सुन कर फेरन बोला, ‘‘कौन, मालती है? जरा मुझे पकड़ कर उठाना, पैर भर गया है. पेशाब करने जाना है.’’

मालती ने बैठेबैठे फेरन को हाथ का सहारा दिया. वह उठ कर कुछ पल खड़ा रह कर बोला, ‘‘अब ठीक है, मैं अभी आया.’’

यह कहता हुआ पेशाब करने के लिए घर से बाहर नाले के पास चला गया. उस के जाते ही रामऔतार ने मालती के कमर में हाथ डाल दिया. इस अंदेशे से बेखबर मालती बोल उठी, ‘‘अरे, क्या करते हो?’’

‘‘कुछ नहीं, थोड़ा प्यार करने का मन हो आया है. ये लो एक घूंट और पी लो.’’ रामऔतार ने कमर से हाथ निकाल कर अपने शराब का गिलास उस की होंठ से लगा दिया.

मालती भी बिना किसी झिझक के घूंट पीने लगी. रामऔतार ने तुरंत उस के गाल को चूम लिया. मालती थोड़ी असहज हो गई.

‘‘इतना बेचैन क्यों हो रहे हो. 2 दिन पहले ही तो तुम ने…’’ मालती की बात पूरी करने से पहले ही फेरन ने आवाज दी. उस ने कहा कि वह सोने जा रहा है, अब और दारू नहीं पिएगा.

उस के बाद फेरन अपने कमरे की ओर चला गया. मालती उठी और बाहर का दरवाजा बंद कर लिया. रामऔतार ने अपने गिलास में कुछ और शराब डाली. मालती भी वहीं आ कर खाने के लिए रोटियां तोड़ने लगी.

अगले भाग में पढ़ें- यह मामला पुलिस के लिए किसी अबूझ पहेली से कम नहीं था

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