सुंदरता में नियाग्रा फौल को पीछे छोड़ देते हैं बिहार यूपी के वाटर फौल

दुनिया में कुछ देखने के लिए खूबसूरत है तो वो है झरने. भारत में कई ऐसे वाटर फौल हैं जिन्हें देखने के लिए विदेश से भी लोग आते हैं. बिहार, यूपी और झारखंड में भी बहुत ही खूबसूरत वाटर फौल हैं. जिनकी लिस्ट आपको देंगे और इनके बारें में कुछ खास बातें बताएंगे.

वाटर फौल पर कई लोग रील्स और फोटोज क्लिक करने के लिए जाते हैं और ज्यादा एक्साइटमेंट के चक्कर में कभीकभी अपनी जान गंवा बैठते हैं. लेकिन बात करें दुनिया के सबसे खूबसूरत वाटर फौल की तो, वो है नियाग्रा फौल जिसकी खूबसूरती के चर्चे हर जगह मशहूर है. ये अमेरिका और कनाडा की सीमा पर बना हुआ है. इसकी ऊंचाई 167 फ़ीट है.

 

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यूपी के खूबसूरत वाटर फौल्स

  • राजदारी, देवदारी वाटर फौल – यूपी के चंदौली जिले में राजदारी और देवदारी वाटर फौल करीब 65 मीटर की ऊंचाई से गिरते हैं. साफ जल के ये झरने ना सिर्फ आपके तनाव को दूर कर देते हैं बल्कि यहां पास की वाइल्ड लाइफ सेंक्चुरी आपको घूमने का अलग मजा भी देता है.
  • लखनिया वाटर फौल – यूपी के मिर्जापुर जिले में मौजूद इस झरने को खास पिकनिक स्पौट में गिना जाता है. अहरौरा के पास मौजूद लखनिया वाटर फौल 100 मीटर की ऊंचाई से गिरता है. इस झरने की झलक मिर्जापुर वेब सीरीज में दिखाई गई है.
  • मुक्खा वाटर फौल – यूपी के सोनभद्र जिले में मौजूद ये झरना मौनसून के वक्त अपने शबाब पर रहता है. मुक्खा फौल पर गरमियों के सीजन में भारी संख्या में टूरिस्ट पहुंचते हैं. फैमिली, फ्रेंड्स या फिर पार्टनर के साथ अच्छा वक्त बिताने के लिए ये बेस्ट जगह है.

झारखंड के ऊंची हाइट के वाटर फौल्स

  • लोध फौल – लोध वाटर फौल झारखंड के लातेहार जिले में पलामू प्रमंडल के महुआडॉंड़ के जंगल के बीच में स्थित है. जसकी ऊंचाई 469 फीट है. ये झारखंड का सबसे ऊंचा झरना और भारत का 21 वां सबसे ऊंचा झरना है.
  • हुंडरू वाटर फौल – हुंडरू वाटर  फौल रांची शहर के सबसे मशूहर पर्यटनों में से एक है. हुंडरू जलप्रपात रांची सुवर्णरेखा नदी के दौरान बनाई गई है. जहां 320 फीट की ऊंचाई से गिरती है यह राज्य का दूसरा सबसे ऊंचा वाटर  फौल है.
  • दशम वाटर फौल – दशम फौल रांची-टाटा के रास्ते पर तैमारा गांव के पास है. यह रांची शहर से 34 किमी दूर है. इस झरने का खास जल स्रोत कचनी नदी है, जो यहां 144 फीट की ऊंचाई से आता है. इस झरने की गिरावट की अनूठी खासियत है कि जब झरना देखा जाता है, तो 10 पानी की धाराएं भी गिरती दिखाई देती हैं.

बिहार के खास झरने

  • काकोलत वाटर फौल – ककोलत फौल शहर की गरमी से बचने के लिए एक मशहूर जगह है और इसे प्रकृति के शक्तिशाली प्रतीक के रूप में देखा जाता है. ये बिहार के सबसे अच्छे झरनों में से एक है, जो 150 और 160 फीट के बीच गिरता है और आधार पर एक जलाशय बनाता है.
  • करकट वाटर फौल – यह बेसाल्ट चट्टानों के बीच छिटपुट इंद्रधनुषों और नवोदित मेपल के पेड़ों के बीच बसा एक भव्य झरना है. कैमूर पहाड़ियों के करीब होने के कारण आप अपने दोस्तों और परिवार के साथ वहां पिकनिक स्पौट मना जाता हैं. यहा कई जानेमाने ब्रिटिश राजनेता हेनरी रामसे ने एक बार आश्चर्यजनक रूप से हरेभरे परिवेश की वजह से कर्कट जलप्रपात को सबसे भव्य झरनों में से एक के रूप में संदर्भित किया था.
  • तेलहर वाटर फौल – तेलहर वाटर  फौल, जिसे तेलहर कुंड के नाम से भी जाना जाता है, बिहार का सबसे फेमस वाटर  फौल है. यह प्राचीन प्राकृतिक दृश्यों, एक नाटकीय चट्टान की स्थापना और एक अद्भूत इंद्रधनुष से घिरा हुआ है.

ये 4 बातें अपनी गर्लफ्रेंड से सुनना पसंद करते हैं लड़के

लड़कियां अपने पार्टनर से अपनी तारीफ सुनना पसंद करती हैं चाहती है कि उनका बौयफ्रेंड या पति वही बातें बोले जो वह सुनना चाहती है. लेकिन ऐसा ही सेम लड़को के साथ भी वह अपनी पार्टनर से भी कुछ खास बातें सुनना पसंद करते है. हालांकि बहुत कम ही लड़कों को अपने लिए तारीफ सुनने को मिलता है.

अगर आप किसी लड़के को इम्प्रेस करना चाहती हैं या अपने बौयफ्रेंड व पति को खुश करना चाहती हैं तो उन्हें स्पेशल महसूस कराने के लिए जानें कि लड़कों को लड़कियों के मुंह से क्या सुनना पसंद है.

लुक्स की करें तारीफ

लड़के हमेशा अपनी पार्टनर से ये सुनना पसंद करते हैं कि वे उनकी तारीफ करें. उनके लुक्स के बारे में बोले. अगर कोई लड़की कहे कि ‘आपकी आंखें, लुक्स या लिप्स अच्छे हैं’ तो लड़के को ये बातें बहुत पसंद आती हैं.

विश्वास जताने वाली

हर कोई चाहता है कि उसके जीवन में कोई ऐसा व्यक्ति हो जो उसे बेहतर बनने के लिए प्रेरित करे. अपने साथी के मुंह से यह शब्द सुनना कि, ‘मुझे तुम पर पूरा भरोसा है कि तुम यें कर लोगों’. ये बात कहने वाली लड़की हर लड़के को पसंद होती है.

इज्जत से करें बात

लड़कियां ये चाहती हैं कि लड़का उसकी रिस्पेक्ट करें, लेकिन लड़का भी यही आशा करता है अपने पार्टनर से. वह चाहते हैं कि उनकी पार्टनर सम्मान दें और उनसे इज्जत से बात करें.

विश्वास जताएं

जब लड़की, लड़के को ये जताती है कि वे उनपर बहुत भरोसा करती है, तो ये बात लड़को को बहुत पसंद आती है. क्योकि लड़कियां जब अपने पार्टनर को अपनी लाइफ का सुपरहीरो मानती हैं.तो इस पर लड़के गर्व महसूस करते है. लड़के अपने पार्टनर के मुंह से ये सुनना पसंद करते है कि ‘मुझे आप पर विश्वास है’.

मेरे बेटे आपस में बहुत लड़ते हैं, मैं क्या करूं?

सवाल

मैं 40 साल का हूं. मेरी शादी को 12 साल हो गए हैं. मेरे 2 बेटे हैं. उन दोनों में बिलकुल नहीं बनती है. वे एकदम कुत्तेबिल्ली की तरह लड़ते हैं. हालांकि अभी वे बच्चे ही हैं, पर बहुत ज्यादा उग्र हैं. कभीकभार तो लड़ाई में एकदूसरे का खून तक निकाल देते हैं.

मेरी पत्नी उन के गुस्से से खौफ खाती है. वे दोनों मेरी भी कम ही सुनते हैं. इस बात से हम बहुत ज्यादा परेशान हैं. मैं क्या करूं?

जवाब

इस उम्र में बच्चों का उग्र होना आम बात है. लौकडाउन के बाद तो यह समस्या और बढ़ गई है. आप बच्चों को अपना समय दें. उन के साथ खेलें. उन्हें कुछ देर बिजी रखें और दोनों को अलगअलग जिम्मेदारी वाले काम सौंपें.

उन दोनों को समझाएं कि इस तरह के हिंसक बरताव में कभी भी कोई अनहोनी हो सकती है. अगर कोई रिश्तेदार तैयार हो तो किसी एक को कुछ दिन के लिए वहां भेज कर देखें. अगर वे दोनों लड़ते हैं, तो एकदूसरे को प्यार भी करते होंगे, जो आप को नहीं दिखता. उन्हें बाहर खेलने जाने दें, अच्छी किताबें व मैगजीन पढ़ने को दें.

अगर आपकी भी ऐसी ही कोई समस्या है तो हमें इस ईमेल आईडी पर भेजें- submit.rachna@delhipress.biz
 
सब्जेक्ट में लिखे…  सरस सलिल- व्यक्तिगत समस्याएं/ Personal Problem

कैसे करें अपनी लेडी लव को खुश, ये रहे खास टिप्स

आज कल काफी कपल मिल जाएंगे जो लिव इन में रहते है आज कल रिलेशनशिप में होना आम बात हो चुकी है और रिलेशनशिप में ज़रुरी है कि आप खुश रहे और अपनी गर्लफ्रेंड को भी खुश रखें. तो इसके लिए ज़रुरी है कि आप कुछ खास टिप्स को अपनाएं और अपनी लेडी लव को खुश करें, ताकि आपके रिलेशन में कभी भी ब्रेकअप ना हो सकें.

 

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डेट नाइट पर जाएं- जब आप लंबे समय से रिलेशनशिप में होते है तो जरूरी है कि आप एक बार डेट नाइट पर ज़रुर जाएं. इसके अलावा जब  आप अपनी प्रेमिका को बाहर ले जाते है.तो इससे उसे खुशी होगी और आपका रिलेशन हेल्दी रहेगा. अपनी गर्लफ्रेंड को ओर खुश करने के लिए आप उन्हे उनकी बेस्ट प्लेस पर ले जाएं.

मूवी नाइट करें प्लान – पार्टनर के साथ मूवी नाइट प्लान करना ज़रुरी है. किसी अच्छी मूवी को देखने के बाद आप बाकि दिनभर आराम कर सकते है. बस इस तरह आपकी पार्टनर को आपके साथ रहने में खुशी मिलेगी और शांति महसूस होगी. जिससे आपका चल रहा लंबा रिश्ता चलता रहेगा.

मालिश करें – गर्लफ्रेंड को मालिश के लिए लेकर जाएं. इससे वह अपना थकान दूर कर सकेंगी और खुद में खुशी महसूस करेंगी.

गानें भेजे – प्यार में गाने ना हो ऐसा तो हो नहीं सकता है अपनी गर्लफ्रेंड को प्यार भरे गाने भेजे और उसे खुश रखे. वह ज़रुर इस बात से आपसे खुश होगी और प्यार करने भी लगेगी.

मेरा बाबू: एक मां की दर्द भरी कहानी

जून, 1993 की बात है. मुंबई में बंगलादेशियों की धरपकड़ जारी  थी. पुलिस उन्हें पकड़पकड़ कर ट्रेनों में ठूंस रही थी.   कुछ तो चले गए, कुछ कल्याण स्टेशन से वापस मुड़ गए. किसी का बाप पकड़ा गया और टे्रेन में बुक कर दिया गया तो बीवीबच्चे छूट गए. किसी की मां पकड़ी गई तो छोटेछोटे बच्चे इधर ही भीख मांगने के लिए छूट गए. पुलिस को किसी का फैमिली डिटेल मालूम नहीं था, बस, जो मिला, धर दबोचा और किसी भी ट्रेन में चढ़ा दिया. सब के चेहरे आंसुओं से भीग गए थे.

यह धरपकड़ करवाने वाले दलाल इन्हीं में से बंगाली मुसलमान थे. रात के अंधेरे में सोए हुए लोगों पर पुलिस का कहर नाजिल होता था, क्योंकि इन्हें दिन में पकड़ना मुश्किल था. कभी तो कोई मामला लेदे कर बराबर हो जाता और कभी किसी को जबरदस्ती ट्रेन में ठूंस दिया जाता. इन की सुरक्षा के लिए कोई आगे नहीं आया, न ही बंगलादेश की सरकार और न ही मानवाधिकार आयोग.

उन दिनों मेरे पास कुछ औरतों का काम था. सब की सब सफाई पर लगा दी गई थीं. कुछ को मैं ने कब्रिस्तान में घास की सफाई पर लगा रखा था. ज्यादातर औरतें बच्चों के साथ थीं. उन के साथ जो मर्द थे, उन के पति थे या भाई, मालूम नहीं. ये भेड़बकरियों की तरह झुंड बना कर निकलती थीं और झुंड ही की शक्ल में रोड के ब्रिज के नीचे अपने प्लास्टिक के झोपड़ों में लौट जाती थीं.

उन्हीं में एक थी फरजाना. देखने में लगता था कि वह 17 या 18 साल की होगी. मुझे तब ज्यादा आश्चर्य हुआ जब उस ने बताया कि वह विधवा है और एक बच्चे की मां है. उस का 2 साल का बच्चा जमालपुर (बंगलादेश) में है.

इस धरपकड़ के दौरान एक दिन वह मेरे पास आई और बोली, ‘‘साहब, मैं यहां से वापस बंगलादेश नहीं जाना चाहती.’’

‘‘क्यों? चली जाओ. यहां अकेले क्या करोगी?’’

‘‘साहब, मेरा मर्द एक्सीडेंट में मर गया. मेरा एक लड़का है जावेद, मेरा बाबू, मैं अपनी भाभी और भाई के पास उसे छोड़ कर आई हूं. मैं अपने बाबू के लिए ढेर सारा पैसा कमाना चाहती हूं ताकि उसे अच्छे स्कूल में अच्छी शिक्षा दिला सकूं और बड़ा आदमी बना सकूं.’’

फरजाना को पुकारते समय मैं उसे ‘बेटा’ कहता था और इसी एक शब्द की गहराई ने उस को मेरे बहुत करीब कर दिया था. न जाने क्यों, जब वह मेरे पास आती तो मेरे इतने करीब आ जाती जैसे किसी बाप के पास बेटी आती है. वह मुझे ‘रे रोड’ के प्लास्टिक के झोंपड़ों की सारी दास्तान सुनाती.

उस की कई बार इज्जत खतरे में पड़ी, लेकिन वह भाग कर या तो रे रोड के रेलवे स्टेशन पर आ गई या रोड पर आ कर चिल्लाने लगी. ये इज्जत लूटने वाले या उन्हें जिस्मफरोशी के बाजार में बेचने वाले बंगलादेशी ही थे. पहले वह यहां के दलालों से मिलते थे. रात के समय औरतों को दिखाते थे और फिर सौदा पक्का हो जाता था. कितनी ही औरतें फकलैंड रोड, पीली कोठी और कमाठीपुरा में धंधा करने लगीं और कुछ तंग आ कर मुंबई से भाग गईं.

फरजाना ने एक दिन मुझे बताया कि वह बंगाली नहीं है. बंटवारे के समय उस के पिता याकूब खां जिला गाजीपुर (उत्तर प्रदेश) से पूर्वी पाकिस्तान गए थे. उस के बाद 1971 के गृहयुद्ध में वह मुक्ति वाहिनी के हाथों मारे गए. इस के बाद उस के भाई ने उस की शादी कर दी. उस का पति एक्सीडेंट में मर गया. जब उस का पति मरा तो वह पेट से थी. अब यह खानदान पूरी तरह उजड़ गया था. बंगलादेश से जब बिहारी मुसलमानों  ने उर्दू भाषी पाकिस्तान की तरफ कूच करना शुरू किया तो वहां की सरकार ने उन्हें लेने से इनकार कर दिया. इधर बंगलादेश सरकार भी उन्हें अपने पास रखना नहीं चाहती थी, क्योंकि इस गृहयुद्ध में इन की सारी वफादारी पाकिस्तान के साथ थी. यहां तक कि इन्होंने मुक्ति वाहिनी से लड़ने के लिए अपनी रजाकार सेना बनाई थी.

जबपाकिस्तान हार गया और एक नए देश, बंगलादेश, का जन्म हो गया तो ये सारे लोग बीच में लटक गए. न बंगलादेश के रहे न पाकिस्तान के. फरजाना उन्हीं में से एक थी. वह भोजपुरी के साथ बहुत साफ बंगला बोलती थी. एक दिन तो हद हो गई, जब वह टूटेफूटे बरतनों में मेरे लिए मछली और चावल पका कर लाई.

मैं ने अपने दिल के अंदर कई बार झांक कर देखा कि फरजाना कहां है? हर बार वही हुआ. फरजाना ठीक मेरी लड़की की तरह मेरे दिल में रही. अब वह मुझे बाबा कह कर पुकारती थी. दिल यही कहता था कि उसे इन सारे झमेलों से उठा कर क्यों न अपने घर ले जाऊं, ज्यादा से ज्यादा यही होगा कि मेरी 3 के बजाय 4 लड़कियां हो जाएंगी. लेकिन उस के बाबू जावेद का क्या होगा, जिस को वह जमालपुर (बंगलादेश) में छोड़ कर आई थी और फिर मैं ने उसे इधरउधर के काम से हटा कर अपने पास, अपने दफ्तर में रख लिया. काम क्या था, बस, दफ्तर की सफाई, मुझे बारबार चाय पिलाना और कफन के कपड़ों की सफाई.

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मुंबई एक ऐसा शहर है जहां ढेर सारे ट्रस्ट, खैराती महकमे हैं, बुरे लोगों से ज्यादा अच्छे लोग भी हैं और जिस विभाग का मैं मैनेजर था वह भी एक चैरेटी विभाग था. मसजिदों की सफाई, इमामों, मोअज्जिनों की भरती, पैसों का हिसाब- किताब लेकिन इस के अलावा सब से बड़ा काम था लावारिस मुर्दों को कब्रिस्तान में दफन करना. जो भी मुसलिम लाशें अस्पताल से मिलती थीं, उन का वारिस हमारा महकमा था. हमारा काम था कि उन को नहला कर नए कपड़ों में लपेट कर उन्हें कब्रिस्तान में सुला दिया जाए.

मुंबई में कब्रिस्तानों का तो यह आलम है कि चाहे जहां भी किसी के लिए कब्र खोदी जाए, वहां 2-4 मुर्दों की हड्डियां जरूर मिलती हैं. मतलब इस से पहले यहां कई और लोग दफन हो चुके हैं, और फिर इन हड्डियों को इकट्ठा कर के वहीं दफन कर दिया जाता है. यहां कब्रिस्तानों में कब्र के लिए जमीन बिकती है और यह दो गज जमीन का टुकड़ा वही खरीद पाते हैं जिन के वारिस होते हैं.

सोनापुर के इलाके में ज्यादातर कब्रें इसलिए पुख्ता कर दी गई हैं ताकि दोबारा यहां कोई और मुर्दा दफन न हो सके. मुंबई में मुर्दों की भी भीड़ है, इन के लिए दो गज जमीन का टुकड़ा कौन खरीदे? इसलिए हमारा विभाग यह काम करता है. हमारे विभाग ने लावारिस लाशों के लिए एक जगह मुकर्रर कर रखी है. यह संस्था कफनदफन का सारा खर्च बरदाश्त करती है. बाकायदा एक मौलाना और कुछ मुसलमान इस काम पर लगा दिए गए हैें कि जब कोई लावारिस लाश आए उसे नहलाएं, कफन पहनाएं और नमाजेजनाजा पढ़ कर कब्र में उतारें. शायद ऐसा विभाग हिंदुस्तान के किसी शहर में नहीं है, लेकिन मुंबई में है और यह चैरेटी इस काम को खुशीखुशी करती है. वैसे इस दफ्तर का मुंबई की भाषा में एक दूसरा नाम भी है, ‘कफन आफिस.’

एक दिन फरजाना ने आ कर मुझे एक मुड़ीतुड़ी तसवीर दिखाई, ‘‘बाबा, यह मेरा बाबू है, ठीक अपने बाप पर गया है,’’ और फिर उस ने किसी कीमती चीज की तरह उसे अपने ब्लाउज में रख लिया. बच्चे की तसवीर बड़ी प्यारी थी. बड़ीबड़ी आंखें, उस में ढेर सारा काजल, माथे पर काजल का टीका, बाबासूट पहने फरजाना की गोद में बैठा हुआ है. मैं ने पूछा, ‘‘फरजाना, यह छोटा बच्चा तुम्हारे बगैर कैसे रहता होगा?’’

‘‘मैं वहां उसे भैयाभाभी के पास छोड़ कर आई हूं. उन के अपने 2 बच्चे हैं. यह तीसरा मेरा है. बड़े आराम से रह रहा होगा बाबा. आखिर, इस का बाप नहीं, दादा नहीं, चाचा नहीं, फिर इस के लिए कौन कमाएगा? इस को कौन बड़ा आदमी बनाएगा? मैं अपने सीने पर पत्थर रख कर आई हूं. जब किसी का बच्चा रोता है तो मेरा बाबू याद आता है. मैं अकेले में चुपके- चुपके रोती हूं. लेकिन मैं चाहती हूं, थोड़ा- बहुत पैसा कमा लूं तो वहां जाऊं, अपनेबाबू का अच्छे स्कूल में नाम लिखाऊं और फिर बड़ा हो कर मेरा बाबू कुछ बन जाए.’’

कुछ दिनों के बाद पुलिस ने इन की धरपकड़ बंद कर दी. लेकिन मैं ने उन सारी औरतों को काम से हटा दिया. वह कहां गईं, किधर से आईं, किधर चली गईं, मैं इस फिक्र से आजाद हो गया क्योंकि इन में कुछ रेडलाइट एरिया का चक्कर भी काटती थीं. मैं अपनेआप को इन तमाम झंझटों से दूर रखना चाहता था.

एक दिन जब दफ्तर की सफाई करते समय एक थैला मिला. खोल कर देखा तो उस में छोटे बच्चे के लिए नएनए कपड़े थे. मुझे यह समझने में देर नहीं लगी कि यह सारे कपड़े फरजाना ने अपने बाबू के लिए खरीदे होंगे और जल्दबाजी या पुलिस की धरपकड़ के दौरान वह इन्हें भूल गई होगी. अब ऐसे खानाबदोश लोगों का न घर है न टेलीफोन नंबर. फिर इन कपड़ों का क्या किया जाए?

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मैं ने एकएक कपड़े को गौर से देखा. बाबासूट, जींस की पैंट, जूता, मोजा और एक छोटी सी टोपी. मैं ने भी उन्हें वहीं संभाल कर रख दिया. शहर में फरजाना को तलाश करना मुश्किल था.

एक दिन अखबार पर सरसरी निगाह डालते हुए मैं ने देखा कि कुछ औरतें सोनापुर (भानडूप) के रेडलाइट एरिया से पकड़ी गई हैं और पुलिस की हिरासत में हैं. इन में फरजाना का भी नाम था. इन सारी औरतों को कमरे के नीचे तहखाने में रखा गया था. दिन में केवल एक बार खाना दिया जाता था और जबरदस्ती उन से देह व्यापार का धंधा कराया जाता था.

उस का नाम पढ़ते ही मेरा दिल जोरजोर से धड़कने लगा. उस का बारबार मुझे बाबा कह के पुकारना याद आने लगा. दिल नहीं माना और मैं उस की तलाश में निकल पड़़ा.

उसे ढूंढ़ने में अधिक परेशानी नहीं हुई. वह भांडूप पुलिस स्टेशन में थी और वहां की पुलिस उसे बंगलादेश भेज रही थी. मैं थोड़ी देर के लिए उस से मिला लेकिन अब वह बिलकुल बदल चुकी थी. वह मुझे टकटकी लगा कर देख रही थी. उस के चेहरे की सारी मुसकराहट गुम हो चुकी थी. मुझे मालूम था कि उस की इज्जत भी लुट चुकी है. औरत की जब इज्जत लुट जाती है तो उस का चेहरा हारे हुए जुआरी की तरह हो जाता है, जो अपना सबकुछ गंवा चुका होता है. मैं ने वह प्लास्टिक का थैला उस के हाथ में दे दिया. उस ने उसे देखा और रोते हुए बोली, ‘‘बाबा, अब इस की जरूरत नहीं.’’

‘‘क्यों?’’

‘‘बाबा, मेरा बाबू मर गया.’’

‘‘क्या बात कर रही हो. यह कैसे हो सकता है?’’

‘‘बाबा, वह मर गया. मैं अपने भाई और भाभी को पैसा भेजती रही और वह मेरे बाबू की मौत मुझसे छिपाए रहे. वह  उसे कमरे के बाहर सुला देते थे. रात भर वह नन्हा फरिश्ता बारिश और ठंड में पड़ा रहता था. उसे सर्दी लगी और वह मर गया. भाभी और भाई ने उस की मौत को मुझ से छिपाए रखा ताकि उन को हमेशा पैसा भेजती रहूं. वह तो एक औरत वहां से आई थी और उस ने रोरो कर मेरे बाबू की दास्तान सुनाई. अब मेरा जिस्म बाकी है. अब मुझे जिंदगी से कोई दिलचस्पी नहीं.’’

फिर वह दहाड़ मार कर रोने लगी.

उस के इस तरह रोने से पुलिस स्टेशन में हड़बड़ी मच गई. सभी अपना काम छोड़ कर उस की तरफ दौड़ पड़े. उसे पानी वगैरह पिला कर चुप कराया गया. पुलिस अपनी काररवाई कर रही थी लेकिन मुझे यकीन था कि अब वह बंगलादेश नहीं जाएगी, अलीगंज या किशनगंज से दोबारा भाग आएगी. अब वहां उस का था भी कौन? एक बच्चा था वह भी मर गया. मैं उसे पुलिस स्टेशन में छोड़ कर आ गया और अपने कफन आफिस के कामों में लग गया. रोज एक नया मुर्दा और उस का कफनदफन.

एक दिन अस्पताल से फोन आने पर वहां गया. एक लाश की पहचान नहीं हो पा रही थी. लाश लोकल ट्रेन से कट गई थी. दोनों जांघों की हड्डियां कट गई थीं. पेट की आंतें बाहर थीं. यह एक औरत की लाश थी. ब्लाउज के अंदर एक छोटे बच्चे की तसवीर खून में डूबी हुई थी. तसवीर को पानी से साफ किया. अब सबकुछ साफ था. यह फरजाना की लाश थी. उस का बाबू अपनी तसवीर में हंस रहा था. न जाने अपनी मौत पर, या अपनी मां की मौत पर या फिर इस मुल्क के बंटवारे पर. मैं उस लाश को उठा कर ले आया और तसवीर के साथ उसे कब्र में दफन कर दिया.

Psychology Sign जो बताएंगे आपका पार्टनर है कितना ‘लौयल’

एक रिलेशनशिप में ये बहुत जरूरी बात है कि आपका पार्टनर कितना सच्चा है. कितना ट्रस्ट करता है. हर कोई यही चाहता है कि उसका पार्टनर “लौयल” हो. लेकिन ये लौयल्टी कैसी दिखती है, इसे हम कैसे पहचानें? साइकोलौजी कुछ ऐसे लक्षण बताती है जिन्हें देखकर आप अंदाजा लगा सकते हैं कि आपका साथी कितना लौयल है. ये वो Signs हैं जो किसी भी रिश्ते को सुपर स्ट्रौंग बनाते हैं.

 

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1. वो Sacrifices करता है

एक लौयल पार्टनर कभी भी आपके ऊपर खुद को अहमियत नहीं देगा. आपकी खुशी के लिए वो अपनी कुछ चीजों को दांव पर लगाने से भी पीछे नहीं हटेगा. ये हर बार नहीं होगा, रिश्ते में तो Give and Take होना ही चाहिए, लेकिन जब भी जरूरत पड़े वो आपके लिए खड़ा होगा.

2. वो Consistent है

एक लौयल पार्टनर वो होता है जो अपने एक्शन और जुबान में हमेशा Consistent रहता है. उस पर आप आंख बंद करके भरोसा कर सकती हैं. चाहे कोई भी सिचुएशन हो, वो हमेशा एक समान ही रहेगा.

3. वो अपनी गलतियों को एसेप्ट करता है

कोई भी Perfect नहीं होता और गलतियां होना तो Human Nature है. लेकिन एक लॉयल पार्टनर अपनी गलतियों को Accept करने से नहीं घबराता. वो सीखता है और आगे उन गलतियों को दोहराता नहीं. साथ ही, माफी मांगने में भी वो पीछे नहीं रहता.

4. आपके सपनों को Support करता है

प्यार सिर्फ एक फीलींग नहीं है, बल्कि वो एक ऐसा स्पोर्ट सिस्टम भी है जो आपको आपके सपनों को पाने में मदद करता है. एक लौयल पार्टनर आपके सपनों को इज्जत देता है.

5. वह आपको प्रेरित करता है

एक लौयल पार्टनर आपको हमेशा कंफर्ट जोन में नहीं रहने देता. वह आपको आपके कम्फर्ट जोन से बाहर निकालकर तरक्की करने के लिए आगे पुश करता है. वह आपकी कमियों को बताता है ताकि आप खुद को और बेहतर बना सकें.

इन नेताओं की वाइफ है जरा हटके, कोई बीकौम तो कोई पढ़ी है डीपीएस से

नेताओं की लाइफ और वाइफ कैसी है ये जानने के लिए सभी उतवाले रहते हैं, जाहिर सी बात है कि जो राजनेता हमेशा सुर्खियों में रहते हैं उनकी वाइफ तो कमाल और हटकर की ही होगी. भले ही वे कितनी भी मौर्डन क्यों न हो पारंपरिक तरीके से रहती हैं. तो आइएं जानते हैं किस नेता की पत्नी कैसी और क्या है.

 

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अनुराग ठाकुर की पत्नी शेफाली ठाकुर

अनुराग ठाकुर जानेमाने नेता हैं उनकी पत्नी का नाम शेफाली ठाकुर है. शेफाली भी राजनैतिक परिवार से तालुक रखती हैं. उनके पिता गुलाब सिंह ठाकुर हिमाचल प्रदेश के पब्लिक वर्क डिपार्टमेंट में मंत्री रह चुके हैं. शेफाली काफी स्टाइलिश और खूबसूरत है. अनुराग कई बार उनके साथ सोशल मीडिया पर फोटोज शेयर करते है.

अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव

डिम्पल यादव एक भारतीय राजनेत्री हैं. वह समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष, उत्तर प्रदेश विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष व उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की धर्मपत्नी हैं. स्कूल की पढ़ाई पूरी करने के बाद डिंपल यादव ने लखनऊ यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया जहां से उन्होंने कौमर्स में स्नातक की डिग्री ली. वे एक संस्कारी बहू भी हैं इन्हे ज्यादात्तर वक्त सिर पर चुन्नी रखे देखा गया है. राजनीति में होते हुए भी विवादों से बचती हैं, फैमिली फंक्शन्स में बड़े उत्साह से भाग लेती हैं.

तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री यादव

बिहार के पूर्व डिप्टी सीएम तेजस्वी यादव की वाइफ राजश्री भी काफी चर्चा में रहती हैं. उन्हें पौलिटिक्स में सभी जानते हैं. तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री यादव का असली नाम रेचल है. तेजस्वी यादव और राजश्री यादव ने नई दिल्ली के आरके पुरम में डीपीएस स्कूल से एकसाथ पढ़ाई की है. शादी के बाद रेचल ने अपना नाम बदलकर राजश्री कर लिया था. राजश्री यादव पहले एक एयर होस्टेस रह चुकी है. मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक तेजस्वी यादव की पत्नी राजश्री यादव ग्रेजुएशन कर चुकी है. राजश्री शादी से पहले एक एयरलाइंस में केबिन क्रु के तौर पर काम करती थी. कुछ दिन पहले उनकी एक वीडयो वायरल हुई थी जिसमें वह अपनी सासु मां राबड़ी देवी के साथ चक्की चलाती दिखी थीं.

टीवी की ये टौप एक्ट्रेसैस लाइमलाइट से हैं दूर, कोई इंफ्लूएंसर तो कोई हाउसवाइफ

टीवी की दुनिया में कई ऐसी एक्ट्रेसैस आई हैं, जो रातोंरात स्टार बनीं. लेकिन उनमें से कई आज के समय में किसी न किसी वजह से लाइमलाइट से दूर हैं और अपने कैरियर से दूर कहीं और है बिजी. इनके फैंस जानना चाहते हैं कि ये कहां हैं और क्या कर रही हैं. इन्होंने कैरियर के पीक पर आकर ग्लैमर वर्ल्ड को अलविदा क्यों कह दिया.

 

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दीपिका कक्कड़

टीवी एक्ट्रैस दीपिका कक्कड़ ने ‘ससुराल सिमर का’ सीरियल से सभी के दिलों पर राज किया और अपनी एक पहचान बनाई थी. लेकिन एक्ट्रेस दीपिका कक्कड़ पर्दे से लंबे समय से गायब रही. दीपिका ने फिर बिग बौस में एंट्री मारी और शो की ट्रौफी अपने नाम भी की. उन्होंने कोएक्टर शोएब इब्राहिम से शादी की. उनसे उन्हे एक बेटा हुआ. दीपिका अब अपना यूट्यूब चैनल चलाती है. और अपने परिवार को समय देती है.

दिशा वकानी

फेमस टीवी शो ‘तारक मेहता का उल्टा चश्मा’ में दया की भूमिका निभा चुकी दिशा वकानी की फैन फौलोइंग काफी तगड़ी है. एक्ट्रेस ने तकरीबन 9 साल तक इस शो में काम किया है. दिशा ने मां बनने के बाद इस सीरियल को छोड़ दिया और वह एक्टिंग की दुनिया से भी दूर हो गई हैं. अब वह अपना सारा समय बच्चे और परिवार को दे रही हैं.

सौम्य टंडन

इस लिस्ट में तीसरा नाम आता है सौम्या टंडन का. टीवी एक्ट्रेस सौम्या ने सीरियल ‘भाभी जी घर पर है’ से दर्शकों के दिलों में जगह बनाई थी. इस शो ने उन्हें घर-घर में अलग पहचान दिलाई. कई साल तक उन्होंने फैंस का एंटरटेंमेंट भी किया, लेकिन अपने करियर के पीक पर एक्ट्रेस ने इंडस्ट्री को अलविदा कह दिया. सौम्या ने अपने बेटे के जन्म के बाद इस शो को छोड़ दिया था, जिसके बाद से ही वह लाइमलाइट से दूर हैं. कभीकभार रील्स बनाती हुई नजर आ जाती हैं

रहिमन पानी राखिए, बिन पानी मचे घमासान, कहीं हो सिरफुटौव्वल, कहीं गोली खाए जवान

नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री के रूप में एक बड़ी योजना ‘जल जीवन मिशन’ शुरू की है, जिस के तहत अरबों रुपए के बजट के तहत गांवगांव में पानी की टंकियां बनाई जा रही हैं. दूसरी तरफ पानी को ले कर होने वाले झगड़े देशभर में अब अपनी सीमाओं को लांघ रहे हैं. कहीं पानी के लिए मारामारी मची हुई है, तो कहीं लाठी और गोली चल रही है.

नरेंद्र मोदी की ‘जल जीवन मिशन’ योजना में पलीता लग चुका है… किस तरह और कैसे हम आप को आगे बताएंगे, अभी तो यह समझना चाहिए कि पानी की कमी सरकार के लिए एक सामान्य घटना हो सकती है, मगर यह सरकार की नाकामी ही कही जाएगी.

हम यहां कुछ घटनाओं का ब्योरा दे रहे हैं, जो बताती हैं कि पानी के चलते किस तरह के हालात पैदा हो रहे हैं :

-छत्तीसगढ़ के बिलासपुर में पानी को ले कर 2 औरतों में तकरार हुई. एक औरत ने दूसरी औरत पर हमला कर दिया और मामला पुलिस तक जा पहुंचा.

-छत्तीसगढ़ के दुर्ग जिले के अरजुनी गांव में एक आदमी ने पानी के झगड़े के चलते दूसरे आदमी पर डंडा चला दिया, जिस से उस का सिर फट गया.

यही हालात रहे तो किसी दिन देश और समाज दोनों को ही इस के लिए कोई बड़ा खमियाजा भुगतना पड़ सकता है. दरअसल, यह कल्पना करना भी मुश्किल है कि सिर्फ पानी के लिए कोई किसी के सिर पर लाठी मार दे या गोली चला दे. मगर ऐसी वारदातें अब आएदिन हो रही हैं, जो बताती हैं कि सरकार पानी की समस्या को ले कर गंभीर नहीं है.

भीषण गरमी के मौसम में पानी को ले कर मारामारी की खबरें अखबारों में सुर्खियां बनती रहती हैं, मगर इस के लिए गोली भी चल सकती है, क्या आप को मालूम है? यह वारदात बताती है कि पानी की समस्या कितनी गंभीर हो चुकी है.

गाजियाबाद जिले के निवाड़ी थाना क्षेत्र में पानी के झगड़े के चलते एक आदमी और उस के बेटे की गोली मार कर हत्या कर दी गई. यही नहीं, हमले में मृतक का दूसरा बेटा घायल हो गया. पुलिस को जब इस की जानकारी मिली तो मौका ए वारदात पर पहुंच कर उस ने हालात को शांत कराया और आरोपियों को हिरासत में ले लिया.

निवाड़ी इलाके के खिंदौड़ाधौलड़ी रजवाहा के रास्ते पर एक रात कुछ लोगों ने आम के बाग के ठेकेदार और धौलड़ी गांव के रहने वाले 55 साल के पप्पू और उन के 2 बेटों 26 साल के राजा और 22 साल के चांद पर ताबड़तोड़ गोलियां चला दीं. इस की वजह सिर्फ एक थी, पानी.

इस हमले में पप्पू और राजा की मौके पर मौत हो गई, जबकि कंधे और हाथ में कई गोलियां लगने के बावजूद चांद किसी तरह वहां से बच कर भाग गया.

पुलिस उपायुक्त ग्रामीण विवेकचंद यादव के मुताबिक, जलस्रोत से सिंचाई के लिए पानी की सप्लाई लेने के मुद्दे पर 2 पक्षों में विवाद हुआ. पप्पू और उन के बेटे मोटरसाइकिल से आम के एक बगीचे से दूसरे बगीचे में जा रहे थे, जिसे उन्होंने वेद प्रकाश त्यागी से ठेके पर लिया था.

पुलिस की शुरुआती जांच के मुताबिक, इन तीनों की शुक्रवार, 21 जून, 2024 की शाम को बगल के बगीचे के मालिक के साथ तीखी नोकझोंक हुई, फिर रात को बाग में पहले से ही मौजूद हमलावरों के एक गुट ने उन पर गोलियां चला दीं. मौके से पुलिस को 5 खाली कारतूस मिले हैं.

पुलिस ने शनिवार, 22 जून, 2024 की सुबह पप्पू और राजा के शवों को नहर से बरामद कर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया. दूसरी ओर चांद के गुस्साए परिवार ने शनिवार, 22 जून, 2024 को निवाड़ी रोड पर यातायात जाम कर शासन से इंसाफ की फरियाद की. पप्पू के परिवार की तहरीर के आधार पर 7 नामजद लोगों के खिलाफ पुलिस ने मामला दर्ज किया है.

पुलिस उपायुक्त के मुताबिक, 3 मुख्य आरोपियों बिट्टू त्यागी, उस के भाई दीपक त्यागी और पिता सुधीर त्यागी को गिरफ्तार कर लिया गया है, जबकि बाकी आरोपियों को पकड़ने की कोशिश कर रही है.

दरअसल, देशभर में पानी की कमी की खबरें और उसे ले कर खूनी लड़ाई की वारदातें हो रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ‘जल जीवन मिशन’ योजना के तहत अरबों रुपए खर्च कर के गांवगांव में पानी की टंकियां बनवा रहे हैं. हम जानते हैं कि उन के पहले कार्यकाल में जब उन्होंने स्वच्छता अभियान चला कर घरघर में शौचालय बनवाए थे, तो आज उन की हालत देखने लायक है. पानी नहीं होने के चलते ज्यादातर शौचालय अब खंडहर बन चुके हैं. अब वे पानी की टंकियां बनवा रहे हैं, वे भी आने वाले समय में खंडहर बन जाएंगी और गांव वालों को पानी मिल ही नहीं पाएगा, क्योंकि इस योजना में खामियां ही खामियां हैं.

अच्छा हो कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी समय निकाल कर कभी किसी पानी टंकी के बनने की जगह पर जा कर हालात का जायजा ले आएं, तो शायद कुछ ठोस बदलाव आ जाए.

अपने हुए पराए : लोग क्यों खून के रिश्तों के लिए रोते है

‘‘अजय, हम साधारण इनसान हैं. हमारा शरीर हाड़मांस का बना है. कोई नुकीली चीज चुभ जाए तो खून निकलना लाजिम है. सर्दी गरमी का हमारे शरीर पर असर जरूर होता है. हम लोहे के नहीं बने कि कोई पत्थर मारता रहे और हम खड़े मुसकराते रहें.

‘‘अपने को सर्वश्रेष्ठ समझने की भूल करेंगे तो शायद सामने वाले का सम्मान ही न कर पाएं. हम प्रकृति के विरुद्ध न ही जाएं तो बेहतर होगा. इनसानी कमजोरी से ओतप्रोत हम मात्र मानव हैं, महामानव न ही बनें तो शायद हमारे लिए उचित है.’’

बड़ी सादगी से श्वेता ने समझाने का प्रयास किया. मैं उस का चेहरा पढ़ता रहा. कुछ चेहरे होते हैं न किताब जैसे जिन पर ऐसा लगता है मानो सब लिखा रहता है. किताबी चेहरा है श्वेता का. रंग सांवला है, इतना सांवला कि काले की संज्ञा दी जा सकती है…और बड़ीबड़ी आंखें हैं जिन में जराजरा पानी हर पल भरा रहता है.

अकसर ऐसा होता है न जीवन में जब कोई ऐसा मिलता है जो इस तरह का चरित्र और हावभाव लिए होता है कि उस का एक ही आचरण, मात्र एक ही व्यवहार उस के भीतरबाहर को दिखा जाता है. लगता है कुछ भी छिपा सा नहीं है, सब सामने है. नजर आ तो रहा है सब, समझाने को है ही क्या, समझापरखा सब नजर आ तो रहा है. बस, देखने वाले के पास देखने वाली नजर होनी चाहिए.

‘‘तुम इतनी गहराई से सब कैसे समझा पाती हो, श्वेता. हैरान हूं मैं,’’ स्टाफरूम में बस हम दोनों ही थे सो खुल कर बात कर पा रहे थे.

‘‘तारीफ कर रहे हो या टांग खींच रहे हो?’’

श्वेता के चेहरे पर एक सपाट सा प्रश्न उभरा और होंठों पर भी. चेहरे पर तीखा सा भाव. मानो मेरा तारीफ करना उसे अच्छा नहीं लगा हो.

‘‘नहीं तो श्वेता, टांग क्यों खींचूंगा मैं.’’

‘‘मेरी वह उम्र नहीं रही अब जब तारीफ के दो बोल कानों में शहद की तरह घुलते हैं और ऐसा कुछ खास भी नहीं समझा दिया मैं ने जो तुम्हें स्वयं पता न हो. मेरी उम्र के ही हो तुम अजय, ऐसा भी नहीं कि तुम्हारा तजरबा मुझ से कम हो.’’

अचानक श्वेता का मूड ऐसा हो जाएगा, मैं ने नहीं सोचा था…और ऐसी बात जिस पर उसे लगा मैं उस की चापलूसी कर रहा हूं. अगर उस की उम्र अब वह नहीं जिस में प्रशंसा के दो बोल शहद जैसे लगें तो क्या मेरी उम्र अब वह है जिस में मैं चापलूसी करता अच्छा लगूं? और फिर मुझे उस से क्या स्वार्थ सिद्ध करना है जो मैं उस की चापलूसी करूंगा. अपमान सा लगा मुझे उस के शब्दों में, पता नहीं उस ने कहां का गुस्सा कहां निकाल दिया होगा.

‘‘अच्छा, बताओ, चाय लोगे या कौफी…सर्दी से पीठ अकड़ रही है. कुछ गरम पीने को दिल कर रहा है. क्या बनाऊं? आज सर्दी बहुत ज्यादा है न.’’

‘‘मेरा मन कुछ भी पीने को नहीं है.’’

‘‘नाराज हो गए हो क्या? तुम्हारा मन पीने को क्यों नहीं, मैं समझ सकती हूं. लेकिन…’’

‘‘लेकिन का क्या अर्थ है श्वेता, मेरी जरा सी बात का तुम ने अफसाना ही बना दिया.’’

‘‘अफसाना कहां बना दिया. अफसाना तो तब बनता जब तुम्हारी तारीफ पर मैं इतराने लगती और बात कहीं से कहीं ले जाते तुम. मुझे बिना वजह की तारीफ अच्छी नहीं लगती…’’

‘‘बिना वजह तारीफ नहीं की थी मैं ने, श्वेता. तुम वास्तव में किसी भी बात को बहुत अच्छी तरह समझा लेती हो और बिना किसी हेरफेर के भी.’’

‘‘वह शायद इसलिए भी हो सकता है क्योंकि तुम्हारा दृष्टिकोण भी वही होगा जो मेरा है. तुम इसीलिए मेरी बात समझ पाए क्योंकि मैं ने जो कहा तुम उस से सहमत थे. सहमत न होते तो अपनी बात कह कर मेरी बात झुठला सकते थे. मैं अपनेआप गलत प्रमाणित हो जाती.’’

‘‘तो क्या यह मेरा कुसूर हो गया, जो तुम्हारे विचारों से मेरे विचार मेल खा गए.’’

‘‘फैशन है न आजकल सामने वाले की तारीफ करना. आजकल की तहजीब है यह. कोई मिले तो उस की जम कर तारीफ करो. उस के बालों से…रंग से…शुरू हो जाओ, पैर के अंगूठे तक चलते जाओ. कितने पड़ाव आते हैं रास्ते में. आंखें हैं, मुसकान है, सुराहीदार गरदन है, हाथों की उंगलियां भी आकर्षक हो सकती हैं. अरे, भई क्या नहीं है. और नहीं तो जूते, चप्पल या पर्स तो है ही. आज की यही भाषा है. अपनी बात मनवानी हो या न भी मनवानी हो…बस, सामने वाले के सामने ऐसा दिखावा करो कि उसे लगे वही संसार का सब से समझदार इनसान है. जैसे ही पीठ पलटो अपनी ही पीठ थपथपाओ कि हम ने कितना अच्छा नाटक कर लिया…हम बहुत बड़े अभिनेता होते जा रहे हैं…क्या तुम्हें नहीं लगता, अजय?’’

‘‘हो सकता है श्वेता, संसार में हर तरह के लोग रहते हैं…जितने लोग उतने ही प्रकार का उन का व्यवहार भी होगा.’’

‘‘अच्छा, जरा मेरी बात का उत्तर देना. मैं कितनी सुंदर हूं तुम देख सकते हो न. मेरा रंग गोरा नहीं है और मैं अच्छेखासे काले लोगों की श्रेणी में आती हूं. अब अगर कोई मुझ से मिल कर यह कहना शुरू कर दे कि मैं संसार की सब से सुंदर औरत हूं तो क्या मैं जानबूझ कर बेवकूफ बन जाऊंगी? क्या मैं इतनी सुंदर हूं कि सामने वाले को प्रभावित कर सकूं?’’

‘‘तुम बहुत सुंदर हो, श्वेता. तुम से किस ने कह दिया कि तुम सुंदर नहीं हो.’’

सहसा मेरे होंठों से भी निकल गया और मैं कहीं भी कोई दिखावा या झूठ नहीं बोल रहा था. अवाक् सी मेरा मुंह ताकने लगी श्वेता. इतनी स्तब्ध रह गई मानो मैं ने जो कहा वह कोरा झूठ हो और मैं एक मंझा हुआ अभिनेता हूं जिसे अभिनय के लिए पद्मश्री सम्मान मिल चुका हो.

‘‘श्वेता, तुम्हारा व्यक्तित्व दूर से प्रभावित करता है. सुंदरता का अर्थ क्या है तुम्हारी नजर में, क्या समझा पाओगी मुझे?’’

मैं ने स्थिति को सहज रूप में संभाल लिया. उस पर जरा सा संतोष भी हुआ मुझे. फीकी सी मुसकान उभर आई थी श्वेता के चेहरे पर.

‘‘हम 40 पार कर चुके हैं. तुम सही कह रही थीं कि अब हमारी उम्र वह नहीं रही जब तारीफ के झूठे बोल हमारी समझ में न आएं. कम से कम सच्ची और ईमानदार तारीफ तो हमारी समझ में आनी चाहिए न. मैं तुम्हारी झूठी तारीफ क्यों करूंगा…जरा समझाओ मुझे. मेरा कोई रिश्तेदार तुम्हारा विद्यार्थी नहीं है जिसे पास कराना मेरी जरूरत हो और न ही मेरे बालबच्चे ही उस उम्र के हैं जिन के नंबरों के लिए मैं तुम्हारे आगे हाथ जोड़ूं. 2 बच्चियों का पिता हूं मैं और चाहूंगा कि मेरी बेटियां बड़ी हो कर तुम जैसी बनें.

‘‘हमारे विभाग में तुम्हारा कितना नाम है. क्या तुम्हें नहीं पता. तुम्हारी लिखी किताबें कितनी सीधी सरल हैं, तुम जानती हो न. हर बच्चा उन्हीं को खरीदना चाहता है क्योंकि वे जितनी व्यापक हैं उतनी ही सरल भी हैं. अपने विषय की तुम जीनियस हो.’’

इतना सब कह कर मैं ने मुसकराने का प्रयास किया लेकिन चेहरे की मांसपेशियां मुझे इतनी सख्त लगीं जैसे वे मेरे शरीर का हिस्सा ही न हों.

श्वेता एकटक निहारती रही मुझे. सहयोगी हैं हम. अकसर हमारा सामना होता रहता है. श्वेता का रंग सांवला है, लेकिन गोरे रंग को अंगूठा दिखाता उस का गरिमापूर्ण व्यक्तित्व इतना अच्छा है कि मैं अकसर सोचता हूं कि सुंदरता हो तो श्वेता जैसी. फीकेफीके रंगों की उस की साडि़यां बहुत सुंदर होती हैं. अकसर मैं अपनी पत्नी से श्वेता की बातें करता हूं. जैसी सौम्यता, जैसी सहजता मैं श्वेता में देखता हूं वैसी अकसर दिखाई नहीं देती. गरिमा से भरा व्यक्तित्व समझदारी अपने साथ ले कर आता है, यह भी साक्षात श्वेता में देखता हूं मैं.

‘‘अजय, कम से कम तुम तो ऐसी बात न करो,’’ सहसा अपने होंठ खोले श्वेता ने, ‘‘अच्छा नहीं लगता मुझे.’’

‘‘क्यों अच्छा नहीं लगता, श्वेता? अपने को कम क्यों समझती हो तुम?’’

‘‘न कम समझती हूं मैं और न ही ज्यादा… जितनी हूं कम से कम उतने में ही रहने दो मुझे.’’

‘‘तुम एक बहुत अच्छी इनसान हो.’’

अपने शब्दों पर जोर दिया मैं ने क्योंकि मैं चाहता हूं मेरे शब्दों की सचाई पर श्वेता ध्यान दे. सुंदरता किसे कहा जाता है, यह तो कहने वाले की सोच और उस की नजरों में होती है न, जो सुंदरता को देखता है और जिस के मन में वह जैसी छाप छोड़ती है. खूबसूरती तो सदा देखने वाले की नजर में होती है न कि उस में जिसे देखा जाए.

‘‘तुम चाय पिओगे कि नहीं, हां या ना…जल्दी से कहो. मेरे पास बेकार बातों के लिए समय नहीं है.’’

‘‘श्वेता, अकसर बेकार बातें ही बड़े काम की होती हैं, जिन बातों को हम जीवन भर बेकार की समझते रहते हैं वही बातें वास्तव में जीवन को जीवन बनाने वाली होती हैं. बड़ीबड़ी घटनाएं जीवन में बहुत कम होती हैं और हम पागल हैं, जो अपना जीवन उन की दिशा के साथ मोड़तेजोड़ते रहते हैं. हम आधी उम्र यही सोचते रहते हैं कि लोग हमारे बारे में क्या सोचते होंगे, तीनचौथाई उम्र यही सोचने में गुजार देते हैं कि वह कहीं हमारे बारे में बुरा तो नहीं सोचते होंगे.’’

धीरे से मुसकराने लगी श्वेता और फिर हंस कर बोली, ‘‘और उम्र के आखिरी हिस्से में आ कर हमें पता चलता है कि लोगों ने तो हमारे बारे में अच्छा या बुरा कभी सोचा ही नहीं था. लोग तो मात्र अपनी सुविधा और अपने सुख के बारे में सोचते हैं, हम से तो उन्हें कभी कुछ लेनादेना था ही नहीं.’’

जीवन का इतना बड़ा सत्य इतनी सरलता से कहने लगी श्वेता. मैं भी अपनी बात पूरी होते देख हंस पड़ा.

‘‘वह सब तो मैं पहले से ही समझती हूं. हालात और दुनिया ने सब समझाया है मुझे. बचपन से अपनी सूरत के बारे में इतना सुन चुकी हूं कि…’’

‘‘कि अपने अस्तित्व की सौम्यता भूल ही गई हो तुम. भीड़ में खड़ी अलग ही नजर आती हो और वह इसलिए नहीं कि तुम्हारा रंग काला है, वह इसलिए कि तुम गोरी मेकअप से लिपीपुती महिलाओं में खड़ी अलग ही नजर आती हो और समझा जाती हो कि सुंदरता किसी मेकअप की मोहताज नहीं है.

‘‘मैं पुरुष हूं और पुरुषों की नजर सुंदरता भांपने में कभी धोखा नहीं खाती. जिस तरह औरत पुरुष की नजर पहचानने में भूल नहीं करती… झट से पहचान जाती है कि नजरें साफ हैं या नहीं.’’

‘‘नजरें तो तुम्हारी साफ हैं, अजय, इस में कोई दो राय नहीं है,’’ उठ कर चाय बनाने लगी श्वेता.

‘‘धन्यवाद,’’ तनिक रुक गया मैं. नजरें उठा कर मुझे देखा श्वेता ने. कुछ पल को विषय थम सा गया. सांवले चेहरे पर सुनहरा चश्मा और कंधे पर गुलाबी रंग की कश्मीरी शाल, पारदर्शी, सम्मोहित सा करता श्वेता का व्यवहार.

‘‘अजय ऐसा नहीं है कि मैं खुश रहना नहीं चाहती. भाईबहन, रिश्तेदार, अपनों का प्यार किसे अच्छा नहीं लगता और फिर अकेली औरत को तो भाईबहन का ही सहारा होता है न. यह अलग बात है, वह सब की बूआ, सब की मौसी तो होती है लेकिन उस का कोई नहीं होता. ऐसा कोई नहीं होता जिस पर वह अधिकार से हाथ रख कर यह कह सके कि वह उस का है.’’

चाय बना लाई श्वेता और पास में बैठ कर बताने लगी:

‘‘मेरी छोटी बहन के पति मेरी जम कर तारीफ करते हैं और इस में बहन भी उन का साथ देती है. लेकिन वह जब भी जाते हैं, मेरा बैंक अकाउंट कुछ कम कर के जाते हैं. बच्चों की महंगी फीस का रोना कभी बहन रोती है और कभी भाभी. घर पर पड़ी नापसंद की गई साडि़यां मुझे उपहार में दे कर वे समझते हैं, मुझ पर एहसान कर रहे हैं. उन्हें क्या लगता है, मैं समझती नहीं हूं. अजय, मेरी बहन का पति वही इनसान है जो रिश्ते के लिए मुझे देखने आया था, मैं काली लगी सो छोटी को पसंद कर गया. तब मैं काली थी और आज मैं उस के लिए संसार की सब से सुंदर औरत हूं.’’

अवाक् रह गया था मैं.

‘‘मेरी तारीफ का अर्थ है मुझे लूटना.’’

‘‘तुम समझती हो तो लुटती क्यों हो?’’

‘‘जिस दिन लुटने से मना कर दिया उसी दिन शीशा दिख जाएगा मुझे…जिस दिन मैं ने अपने स्वाभिमान की रक्षा की, उसी दिन उन का अपमान हो जाएगा. मैं अकेली जान…भला मेरी क्या जरूरतें, जो मैं ने उन की मदद करने से मना कर दिया. मुझे कुछ हो गया तो मेरा घर, मेरा रुपयापैसा भला किस काम आएगा.’’

‘‘तुम्हें कुछ हो गया…इस का क्या मतलब? तुम्हें क्या होने वाला है, मैं समझा नहीं…’’

‘‘मेरी 40 साल की उम्र है. अब मेरी शादी करने की उम्र तो रही नहीं. किस के लिए है, जो सब मैं कमाती हूं. मैं जब मरूंगी तो सब उन का ही होगा न.’’

‘‘जब मरोगी तब मरोगी न. कौन कब जाने वाला है, इस का समय निश्चित है क्या? कौन पहले जाने वाला है कौन बाद में, इस का भी क्या पता… बुरा मत मानना श्वेता, अगर मैं तुम्हारी मौत की कामना कर तुम्हारी धनसंपदा पर नजर रखूं तो क्या मुझे अपनी मृत्यु का पता है कि वह कब आने वाली है. अपना भी खा सकूंगा इस की भी क्या गारंटी, जो तुम्हारा भी छीन लेने की आस पालूं. तुम्हारे भाई व बहन 100 साल जिएं लेकिन उन्हें तुम्हें लूटने का कोई अधिकार नहीं है.’’

पलकें भीग गईं श्वेता की. कमरे में देर तक सन्नाटा छाया रहा. चश्मा उतार कर आंखें पोंछीं श्वेता ने.

‘‘अजय, वक्त सब सिखा देता है. यह संसार और दुनियादारी बहुत बड़ा स्कूल है, जहां हर पल कुछ नया सीखने को मिलता है. बहुत अच्छा बनने की कोशिश भी इनसान को कहीं का नहीं छोड़ती. मानव से महामानव बनना आसान है लेकिन महामानव से मानव बनना आसान नहीं. किसी को सदा देने वाले हाथ मांगते हुए अच्छे नहीं लगते. मैं सदा देती हूं, जिस दिन इनकार करूंगी…’’

‘‘तुम्हें महामानव होने का प्रमाणपत्र किस ने दिया है? …तुम्हारे भाईबहन ने ही न. वे लोग कितने स्वार्थी हैं क्या तुम्हें दिखता नहीं. इस उम्र में क्या तुम्हारा घर नहीं बस सकता, मरने की बातें करती हो…अभी तुम ने जीवन जिया कहां है… तुम शादी क्यों नहीं कर लेतीं. इस काम में तुम चाहो तो मैं और मेरी पत्नी तुम्हारा साथ देने को तैयार हैं.’’

अवाक् रह गई थी श्वेता. इस तरह हैरान मानो जो सुना वह कभी हो ही नहीं सकता.

‘‘शायद तुम यह नहीं जानतीं कि हमारे घर में तुम्हारी चर्चा इसलिए भी है क्योंकि मेरी पत्नी और दोनों बेटियां भी सांवले रंग की हैं. पलपल स्वयं को दूसरों से कम समझना उन का भी स्वभाव बनता जा रहा है. तुम्हारी चर्चा कर के उन्हें यह समझाना चाहता हूं कि देखो, हमारी श्वेताजी कितनी सुंदर हैं और मैं सदा चाहूंगा कि मेरी दोनों बेटियां तुम जैसी बनें.’’

स्वर भर्रा गया था मेरा. श्वेता के अति व्यक्तिगत पहलू को इस तरह छू लूंगा मैं ने कभी सोचा भी नहीं था. चुप थी श्वेता. आंखें टपकने लगी थीं. पास जा कर कंधा थपथपा दिया मैं ने.

‘‘हम आफिस के सहयोगी हैं… अगर भाई बन कर तुम्हारा घर बसा पाऊं तो मुझे बहुत खुशी होगी. क्या हमारे साथ रिश्ता बांधना चाहोगी? देखो, हमारा खून का रिश्ता तो नहीं होगा लेकिन जैसा भी होगा निस्वार्थ होगा.’’

रोतेरोते हंसने लगी थी श्वेता. देर तक हंसती रही. चुपचाप निहारता रहा मैं. जब सब थमा तब ऐसा लगा मानो नई श्वेता से मिल रहा हूं. मेरा हाथ पकड़ देर तक सहलाती रही श्वेता. सर पर हाथ रखा मैं ने. शायद उसी से कुछ कहने की हिम्मत मिली उसे.

‘‘अजय, क्या पिता बन कर मेरा कन्यादान करोगे? मैं शादी करना चाहती हूं पर यह समझ नहीं पा रही कि सही कर रही हूं या गलत. कोई ऐसा अपना नहीं मिल रहा था जिस से बात कर पाती. ऐसा लग रहा था, कोई पाप कर रही हूं क्योंकि मेरे अपनों ने तो मुझे वहां ला कर खड़ा कर दिया है जहां अपने लिए सोचना भी बचकाना सा लगता है.’’

मैं सहसा चौंक सा गया. मैं तो बस सहज बात कर रहा था और वह बात एक निर्णय पर चली आएगी, शायद श्वेता ने भी नहीं सोचा होगा.

‘‘सच कह रही हो क्या?’’

‘‘हां. मेरे साथ ही पढ़ते थे वह. एम.ए. तक हम साथ थे. 15 साल पहले उन की शादी हो गई थी. मेरे पिताजी के गुजर जाने के बाद मुझ पर परिवार की जिम्मेदारी थी इसलिए मेरी मां ने भी मेरा घर बसा देना जरूरी नहीं समझा. भाईबहनों को ही पालतेब्याहते मैं बड़ी होती गई…ऊपर से मेरा रंग भी काला. सोने पर सुहागा.

‘‘पिछली बार जब मैं दिल्ली में होने वाले सेमिनार में गई थी तब सहायजी से वहां मुलाकात हुई थी.’’

‘‘सहायजी, वही जो दिल्ली विश्वविद्यालय में ही रसायन विभाग में हैं. हां, मैं उन्हें जानता हूं. 2 साल पहले कार एक्सीडेंट में उन की पत्नी और बेटे का देहांत हो गया था. उन की बेटी यहीं लुधियाना में है.’’

‘‘और मैं उस बच्ची की स्थानीय अभिभावक हूं,’’ धीरे से कहा श्वेता ने. एक हलकी सी चमक आ गई उस की नजरों में. मैं समझ सकता हूं उस बच्ची की वजह से श्वेता के मन में ममता का अंकुर फूटा होगा. सहाय भी बहुत अच्छे इनसान हैं. बहुत सम्मान है उन का दिल्ली में.

‘‘क्या सहाय ने खुद तुम्हारा हाथ मांगा है?’’

‘‘वह और उन की बेटी दोनों ही चाहते हैं. मैं कोई निर्णय नहीं ले पा रही हूं. मैं क्या करूं, अजय. कहीं इस में उन का भी कोई स्वार्थ तो नहीं है.’’

‘‘जरा सा स्वार्थी तो हर किसी को होना ही चाहिए न. उन्हें पत्नी चाहिए, तुम्हें पति और बच्ची को मां. श्वेता, 3 अधूरे लोग मिल कर एक सुखी घर की स्थापना कर सकते हैं. जरूरतें इनसानों को जोड़ती हैं और जुड़ने के बाद प्यार भी पनपता है. मुझे 2 दिन का समय दो. मैं अपने तरीके से सहाय के बारे में छानबीन कर के तुम्हें बताता हूं.’’

शायद श्वेता के शब्दों का ही प्रभाव होगा, एक पिता जैसी भावना मन को भिगोने लगी. माथा सहला दिया मैं ने श्वेता का.

‘‘मैं और तुम्हारी भाभी सदा तुम्हारे साथ हैं, श्वेता. तुम अपना घर बसाओ और खुश रहो.’’

श्वेता की आंखों में रुका पानी झिलमिलाने लगा था. पसंद तो मैं उस को सदा से करता था, उस से एक रिश्ता भी बंध जाएगा पता न था. उस का मेरा हाथ अपने माथे से लगा कर सम्मान सहित चूम लेना मैं आज भी भूला नहीं हूं. रिश्ता तो वह होता है न जो मन का हो, रक्त के रिश्ते और उन का सत्य अब सत्य कहां रह गया है. किसी चिंतक ने सही कहा है, जो रक्त पिए वही रक्त का रिश्तेदार.

सहाय, श्वेता और वह बच्ची मृदुला, तीनों आज मेरे परिवार का हिस्सा हैं. श्वेता के भाईबहन उस से मिलतेजुलते नहीं हैं. नाराज हैं, क्या फर्क पड़ता है, आज रूठे हैं, कल मान भी जाएंगे. आज का सत्य यही है कि श्वेता के माथे की सिंदूरी आभा बहुत सुंदर लगती है. अपनी गृहस्थी में वह बहुत खुश है. मेरा घर उस का मायका है. एक प्यारी सी बेटी की तरह वह चली आती है मेरी पत्नी के पास. दोनों का प्यार देख कभीकभी सोचता हूं लोग क्यों खून के रिश्तों के लिए रोते हैं. दाहसंस्कार करने के अलावा भला यह काम कहां आता है.

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