Satyakatha: दोस्त की दगाबाजी

सौजन्य- सत्यकथा

दगाबाजी में दोस्त समेत 3 निर्दोषों की भी मौत हो गई

राजस्थान के शहर हनुमानगढ़ में राष्ट्रीय समाचार पत्र के ब्यूरो प्रमुख और स्थानीय संवाददाता एक सप्ताह पहले नहर में इनोवा कार गिरने की घटना को साधारण दुर्घटना मानने को तैयार नहीं थे. उस हादसे में 4 लोगों की नहर में डूब कर मौत हो गई थी, 3 एक ही परिवार के सदस्यों में पतिपत्नी और उन की बेटी के अलावा एक लिफ्ट ले कर कर सफर कर रही अपरिचित महिला थी.

ब्यूरो प्रमुख ने स्थानीय संवाददाता से इस बारे में अपना तर्क देते हुए कहा, ‘‘माना कि इंदिरा गांधी मेन कैनाल में अकसर गाडि़यों के गिरने की दर्दनाक घटनाएं होती रहती हैं. परंतु यह भी उतनी ही कड़वा सच है कि वैसी घटनाओं को ले कर पुलिस भी ज्यादा छानबीन नहीं करती. महज एक हादसा बता कर आगे की जांच बंद कर देती है. 8 फरवरी की रात को हुई इस घटना को एक हादसा कह कर नजरंदाज करना ठीक नहीं होगा.’’

‘‘आप बिलकुल ठीक कह रहे हैं सर. एक तो इनोवा. भारीभरकम कार. ऊपर से उस में बैठे 4 लोग. तो फिर अचानक कैसे खिसक जाएगी?’’ स्थानीय संवाददाता बोला.

‘‘और हां, कार तो सड़क के किनारे उबड़खाबड़ पटरी पर खड़ी की गई थी.’’ ब्यूरो प्रमुख बोले.

‘‘ऐसा करते हैं कि हम लोग घटनास्थल पर वैसी ही एक कार ले कर चलते हैं और उसे पटरी पर लगा कर देखते हैं कि वह अपने आप कैसे खिसक सकती है? कितनी दूरी तक जा सकती है..?’’ संवाददाता ने सुझाव दिया.

‘‘एक इनोवा किराए पर लो और कल ही वहां चलने का प्रोग्राम बनाओ. हमें पुलिस प्रशासन को सचेत करना होगा, वरना आगे भी दुर्घटनाएं होती रहेंगी और वे फाइलों में बंद होती रहेंगी.’’

ब्यूरो प्रमुख के इस निर्णय का संवाददाता ने एक आदेश की तरह पालन किया और फिर दोनों अगले ही रोज इनोवा कार ले कर घटनास्थल पर पहुंच गए.

उन्होंने सुरक्षा के लिए कार को पीछे से एक रस्से के सहारे बांध रखा था. रस्से को ढीला कर इनोवा को अपने आप खिसकने के लिए छोड़ दिया, लेकिन यह क्या कार टस से मस नहीं हुई. यहां तक कि उसे हलका सा धक्का भी दिया गया और कई एंगल से हिलाडुला कर देखा गया. कार वहीं रुकी रही.

2 पत्रकारों द्वारा किए गए इस प्रयोग की खबर अगले दिन समाचार पत्र में प्रमुखता से मुख्य पृष्ठ पर छपी. उस में एक हफ्ते पहले हुई इनोवा कार हादसे को एक सुनियोजित घटना बताया गया.

यह भी कहा गया कि किसी साजिश के तहत कार को कैनाल में ढकेला गया होगा. आशंका जताई गई कि कार में सवार से किसी के साथ दुश्मनी हो. कारण कार ड्राइव करने वाला व्यक्ति भी हादसे के बारे में साफ जानकारी नहीं दे पाया था.

खबर पढ़ कर लोग चौंक गए. वे तरहतरह की चर्चा करने लगे. किसी ने उस जगह को पूरी तरह से सुरक्षित बनाने का तर्क दिया, तो किसी ने पुलिस पर निकम्मेपन का दोष मढ़ दिया.

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दूसरी ओर पुलिस प्रशासन पर भी इस खबर का असर हुआ. वैसे पुलिस के आला अधिकारी पहले से ही इस घटना को शंका की निगाह से देख रहे थे.

घटना के 8 दिन बाद मृतक रेणु के भाई रमेश प्रसाद विजय नगर में हनुमानगढ़ पुलिस थाना गया. वह सिडाना निवासी जगदीश प्रसाद का बेटा था, उस ने इनोवा कार ड्राइवर रमेश स्वामी के खिलाफ लापरवाही से कार चलाने की शिकायत दर्ज की.

शिकायत में रमेश प्रसाद ने लिखा कि कार चालक की लापरवाही की वजह से ही उस की बहन रेणु, बहनोई विनोद और भांजी इशिका समेत एक अन्य महिला सुनीता भाटी की मौत हुई.

उस ने चालक पर जानबूझ कर हत्या करने का मुकदमा दर्ज करने की गुहार लगाई. चालक को मृतक व्यक्ति का दोस्त और एक ही औफिस में साथसाथ काम करने वाला बताया.

इस आरोप के आधार पर भादंसं की धारा 304 के तहत एक मामला दर्ज कर लिया गया. मामले को एसपी प्रीति जैन ने गंभीरता से लेते हुए जांच की जिम्मेदारी रणवीर सिंह मीणा को सौंप दी.

साथ ही हनुमानगढ़ के डीएसपी प्रशांत कौशिक और साइबर सेल के हैडकांस्टेबल वाहेगुरु सिंह, रिछपाल सिंह को सहयोगी के तौर पर उन के साथ लगा दिया.

उस के बाद पुलिस मुस्तैदी से जांच करने लगी. साइबर सेल टीम ने कार चालक रमेश स्वामी के मोबाइल नंबर की डिटेल्स निकलवाई.

पिछले 10 दिनों के भीतर मोबाइल पर हुई उस की तमाम बातचीत की स्टडी की. उसी सिलसिले में रमेश की कुछ संदिग्ध काल की भी जानकारी मिली. साइबर सेल टीम चौंक गई कि इनोवा कार विनोद की ही थी. तब रमेश ने उस बारे में रामलाल नायक नाम के व्यक्ति से क्यों बातें की थी? रामलाल के मोबइल नंबर की लोकेशन लखुपाली की थी.

पुलिस ने रामलाल को उस के मोबाइल लोकेशन के आधार पर थाने बुला लिया. पूछताछ में उस ने बताया कि वह पिछले कई सालों से रमेश स्वामी  के खेत बंटाई पर जोता करता था.

रमेश स्वामी पहले ही हिरासत में लिया जा चुका था. उस ने भी रामलाल की बातों की पुष्टि कर दी. उस के बाद आगे की जांच के लिए रामलाल को भी हिरासत में ले लिया गया.

पुलिस ने जब रामलाल पर उस की रमेश के साथ फोन पर हुई बातचीत को विस्तार से जानने के लिए सख्ती की, तब उस ने बताया कि उस ने एक सहयोग मांगा था. उस के लिए वह तैयार भी हो गया था. रमेश के कहने पर घटना के दिन रामलाल शाम ढलते ही इंदिरा गांधी मेन कैनाल पर पहुंच गया था.

रमेश स्वामी ने जब गाड़ी पटरी पर खड़ी की तब रामलाल वहीं पास में अंधेरे में खड़ा था. रमेश कार में बैठे लोगों को क्या कह कर उतरा था रामलाल को नहीं मालूम, लेकिन रमेश ने रामलाल के पास आ कर कार को पीछे धक्का देने के लिए कहा.

उस ने धक्का देने के बारे में कुछ भी जानने की जरूरत नहीं समझी. उस के कहे अनुसार उस ने जोर से धक्का लगा दिया. बताया कि कार के थोड़ा हिलने के बाद रमेश स्वामी ने उसे वहां से चले जाने को कहा और खुद कार की दूसरी ओर चला गया.

उस के बाद रमेश स्वामी और रामलाल कहां गए इस का खुलासा नहीं हो पाया था

इस मामले में पुलिस के सामने यह सवाल खड़ा था कि आखिर कार को रमेश और रामलाल ने जानबूझकर क्यों पीछे से धकेला? कार के हिलने के बाद रमेश वहां से थोड़े समय के लिए क्यों चला गया? उस ने रामलाल को धक्का देने के तुरंत बाद क्यों चले जाने को कहा? रामलाल ने कार के धक्का देने के बारे में उस से कुछ भी क्यों नहीं पूछा? इन सवालों के कुछ जवाब से पुलिस के सामने एक और सच्चाई सामने आई. उस सच में एक दोस्त की दगाबाजी भी उजागर हो गई.

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जांच की दूसरी कड़ी के तौर पर शिकायतकर्ता रमेश प्रसाद से कुछ अन्य जानकारियां जुटाई जाने लगी. उस के बहनोई की मौत परिवार समेत हो गई थी. प्रसाद ने बताया कि उस के बहनोई विनोद कुमार पिछले कुछ महीने से काफी मानसिक तनाव में थे.

4 बीघा खेती की जमीन खरीदने की बात करते रहते थे, जिस के लिए उन्होंने अपने एक बहुत ही खास दोस्त रमेश को 15 लाख रुपए एडवांस भी दिए थे. यह बात बीते साल 2020 के अगस्त माह में कोरोना का असर कम होने के समय की थी. बताते हैं कि उस की रजिस्ट्री नहीं हो पाने से वह बहुत परेशान चल रहे थे.

प्रसाद की इस जानकारी के आधार पर पुलिस ने विनोद कुमार के दोस्त रमेश स्वामी को भी संदिग्ध मानते हुए अपनी गिरफ्त में ले लिया था.

पुलिस के सामने अब कुछ तसवीर साफ होती नजर आने लगी थी. रमेश से जमीन की खरीदबिक्री संबंधी सवाल पूछे गए, जिस में जमीन से ले कर उस के लिए पैसे के लेनदेन की भी बातें थीं.

पहले तो रमेश दोस्त की आकस्मिक मौत का मातम मनाते हुए खुद को निर्दोष बताता रहा. काफी समय तक एक दोस्त खोने का रोना रोता रहा. लेकिन जब पुलिस ने खेती की जमीन के लिए एडवांस और रजिस्ट्री नहीं होने की बात सख्ती से पूछी तो वह टूट गया.

उस ने बताया कि वह  जमीन विनोद के नाम रजिस्ट्री नहीं कर सकता था, क्योंकि जमीन उस के पिता के नाम थी.

उस ने यह भी बताया कि जमीन का सौदा 25 लाख रुपये में हुआ था. उसे एडवांस में 15 लाख मिले थे. एडवांस की एक कच्ची रसीद बनाई गई थी. बाकी पैसे रजिस्ट्री के समय मिलने थे.

रमेश से पूछताछ के सिलसिले में जमीन के भारत माला प्रोजेक्ट के तहत राष्ट्रीय राजमार्ग में चिन्हित होने की भी बात सामने आई. बताते हैं कि इस कारण जमीन की कीमत एक झटके में कई गुना बढ़ गई थी.

इस आधार पर पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि रमेश के मन में अधिक मुनाफे का लालच आ गया होगा और रजिस्ट्री नहीं होने की बहानेबाजी पर उतर आया होगा.

रमेश और विनोद एक शिक्षण संस्थान एसकेएम में नौकरी करते थे. वहां विनोद कुमार अकाउंटेंट थे, जबकि रमेश स्वामी क्लर्क के पद पर तैनात था. विनोद एकदम शांत स्वभाव के थे तो वहीं स्वामी का स्वभाव उन के उलट था, लेकिन उन की दोस्ती की सभी मिसाल देते थे.

विनोद कुमार के साले प्रसाद ने पुलिस को उन की परेशानी में कही हुई एक और बात बताई. बहनोईं ने एक बार कहा था कि उस के दोस्त ने उस के पीठ में खंजर घोंपा है, वह पैसा वापस नहीं कर रहा है. केवल बहाने बनाता है.

एडवांस की रकम वापसी नहीं किए जाने को ले कर भी पुलिस ने रमेश से पूछताछ की. इस पर रमेश ने बताया कि उस ने दिसंबर 2020 के अंत में पैसा लौटाने का वादा किया था, लेकिन उस की नीयत में खोट आ गई थी. पैसा लौटाने के बजाय उस ने विनोद के मुंह को हमेशा के लिए बंद करने की खतरनाक योजना बना ली थी.

ऐसा निर्णय लेने के बारे में उस ने बताया कि बारबार पैसा मांगने से वह तंग आ गया था. उसे ले कर औफिस के सभी लोग तरहतरह की बातें किया करते थे. पीठ पीछे उस की बुराई करते थे, जबकि विनोद को ईमानदार बताते थे.

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रमेश के अनुसार पैसे वापसी को ले कर उस की आखिरी खुशनुमा मुलाकात औफिस में ही हुई थी. रमेश ने माफी मांगते हुए मात्र 3 दिनों में ही पैसा लौटाने का आश्वासन दिया था.

उस दिन दोनों ने कई महीने बाद औफिस में एक साथ बैठ कर नाश्ता किया और चाय पी. उन के बीच महीनों से चले आ रहे गिलेशिकवे दूर हो गए थे.

विनोद खुश हो गए थे कि उन का पैसा मिलने वाला है. मिलने वाले पैसे को ले कर उन्होंने मन ही मन कुछ योजनाएं भी बना ली थीं.

इस से अलग रमेश के मन में कुछ और ही खिचड़ी पक रही थी. उस ने रकम लौटाने का वादा तो कर लिया था, लेकिन सच तो यह था कि रकम उस के पास थी ही नहीं.

पलक झपकते ही 2 दिन गुजर गए. रमेश के हाथ खाली ही थे. उस ने नया बहाना बनाया. चौथे दिन विनोद के घर पहुंच गया, विनोद ने प्यार से उसे बिठाया और पत्नी को उस के लिए चायनाश्ता लाने के लिए कहा.

लेकिन रमेश मना करता हुआ मायूसी से बोला, ‘‘दोस्त, मैं अपने वायदे पर खरा नहीं उतर पाया हूं. मैं ने अपने सभी बकाएदारों के यहां तकादा कर लिया. सब ने हाथ खड़े कर दिए हैं. उन में 3 तो अनाज के व्यापारी हैं. उन्होंने मार्च के बाद ही रकम लौटाने की बात कही है. भैया, चलो मुझे पुलिस के हवाले कर दो, जो चाहे सजा दिलवा दो’’

‘‘ऐसी बात क्यों करते हो, मुझे तुम पर भरोसा है. मैं थानापुलिस के झमेले में नहीं पड़ना चाहता.’’ विनोद बोला.

‘‘नहींनहीं भाई, मैं तुम्हारा और ज्यादा नुकसान नहीं होने दूंगा. अब मैं सारी रकम का ब्याज भी दूंगा. ब्याज के साथ मूल रकम अप्रैल 2021 तक मिल जाएगी.’’ रमेश ने एक और आश्वासन दिया.

रमेश की बातें सुन कर विनोद को मन मारना पड़ा. उन के पास न तो कोई मजबूत कागजात थे. और न वह किसी कानूनी विवाद में पड़ना चाहते थे. उन्होंने कहा कि उन्हें मूल रकम ही मिल जाए वही काफी है. वह यह भी जानते थे कि अगर रमेश पर ज्यादा दबाव बनाया तो वह मूल रकम से भी मुकर सकता है.

विनोद का मन एक बड़ी रकम के फंस जाने से दुखी था, जबकि रमेश स्वामी के दिमाग में कुछ और ही खुराफात चल रही थी. वह खुश था कि विनोद उस के जाल में फंस गया है.

हालांकि इस के अलावा एक और सच्चाई थी, जिसे रमेश ने पुलिस के सामने कबूल कर ली थी. उस ने तय कर लिया था विनोद को इस दुनिया से ही चलता कर देगा. इस के लिए वह उधेड़बुन करता रहा कि कैसे विनोद की मौत को स्वाभाविक मौत में बदला जाए.

उसे अचानक एशिया की सब से लंबी नहर इंदिरा गांधी मेन कैनाल के बारे में मालूम था, जिस में कई वाहनों की जल समाधि हो चुकी थी.

उस हादसे की पुलिस विशेष जांच नहीं करती थी और वैसे हादसों की फाइल पर ‘मर्ग’ दर्ज कर मामले को हमेशा के लिए दफन कर दिया जाता था. इसी तरह की रमेश ने योजना बनाई.

नए साल 2021 की शुरुआत हो चुकी थी. विनोद अपनी बड़ी बेटी रिया को सीकर ले जाना चाहता था. वहां उसे एक कोचिंग संस्थान में दाखिला करवाना था. हालांकि उस के पास खुद की इनोवा कार थी, लेकिन उस से वह दूर की यात्रा के लिए खुद ड्राइव नहीं करता था. उसे रमेश के बारे में पता था कि वह कार अच्छी तरह ड्राइव कर लेता है. उस के साथ वह पहले भी सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा कर चुका था.

इस बारे में विनोद ने रमेश से बात की. वह झट तैयार हो गया. उसे मानो मुंहमांगी मुराद मिल गई थी. तय प्रोग्राम के अनुसार विनोद अपनी पत्नी रेणुका, बड़ी बेटी रिया, छोटी बेटी इशिका के साथ 8 फरवरी को इनोवा से सीकर के लिए निकल पड़े.

कार रमेश स्वामी ने ड्राइव की. वे साढ़े 3 घंटे में सीकर पहुंच गए. वहां रिया का दाखिला हो गया. अब उन के लौटने की बारी थी.

इसी बीच विनोद कुमार के एक जानकार संदीप भाटी ने फोन कर बताया कि उस की पत्नी सुनीता भाटी इन दिनों सीकर में है, सो उसे भी वह अपनी गाड़ी में साथ लेते आएं. उन्होंने सुनीता के मिलने की जगह भी बता दिया.

शाम होने से करीब एक घंटा पहले विनोद सीकर से वापस लौट पड़े. इस बार कार में बेटी रिया की जगह सुनीता थी. थोड़ी देर गाड़ी ड्राइव करने के बाद रमेश स्वामी ने चायनाश्ता करने की इच्छा जताई. सभी एक ढाबे के पास रुके. उस दौरान रमेश उन से दूर जा कर फोन पर किसी से बातें करता रहा.

रात के 10 बज चुके थे. विनोद की कार लखुवाली गांव से गुजरते हुए नहर के पुल पर पहुंच गई. नहर करीब 35 फीट गहरी है. पुल से करीब एक किलोमीटर आगे मेन रगुलेटर बना हुआ है. उस से अन्य नहरों में पानी बहा दिया जाता है.

रमेश ने कार को मेन सड़क से हटा कर कैनाल की पटरी पर खड़ा कर दिया. वह नीचे उतर गया. बाकी लोग नींद में कार में ही बैठे रहे.

विनोद ने सोचा कि वह शायद पेशाब वगैरह के लिए उतरा होगा. वह भी नींद में था. थकावट भी महसूस कर रहा था. कुछ मिनट में ही कार खिसकने लगी. देखते ही देखते कार नहर में जा गिरी. खिसकती कार से सुनीता ने अपने पति संदीप को फोन किया था. अनहोनी की आशंका के साथ जब वे कैनाल के पास पहुंचे, तब तक वहां तो अनहोनी हो चुकी थी.

लोगों की भीड़ जुट चुकी थी. उन्हीं में से किसी ने दुर्घटना की सूचना पुलिस को दे दी थी. रात होने और काफी अंधेरा होने के कारण पुलिस कुछ नहीं कर सकी थी. घना कोहरा भी छा गया था.

अगले रोज 9 फरवरी, 2021 को पुलिस ने गोताखोरों और क्रेन की मदद से इनोवा कार बाहर निकाली. उस में चारों सवार भी थे. उन की मौत हो चुकी थी. पुलिस ने उसे सीधेसीधे हादसा करार देते हुए फाइल तैयार की और मीडिया को इस की जानकारी दे दी.

कुछ दिनों बाद कोरोना संक्रमण के फैलने के कारण इलाके में कोरोना कर्फ्यू लग गया. भारी संख्या में पुलिस बल व्यस्त हो गए. नतीजतन इस मामले की जांचपड़ताल थम गई.

लौकडाउन में ढील दिए जाने के बाद इस मामले की सुनवाई जून महीने से दोबारा शुरू की गई. तमाम तरह की पूछताछ के बाद रामलाल और रमेश स्वामी को 12 जुलाई, 2021 को अदालत में पेश किया गया. बाद में उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया था.

मुहरे- भाग 1: विपिन के लिए रश्मि ने कैसा पैंतरा अपनाया

मैं शाम की सैर से घर लौटी ही थी. पसीने से तरबतर थी. तभी डोरबैल बजी. विपिन औफिस से आ गए थे. मुझे देखते ही बोले, ‘‘रश्मि, क्या हुआ?’’

मैं ने रूमाल से पसीना पोंछते हुए कहा, ‘‘कुछ नहीं, बस अभीअभी सैर से लौटी हूं.’’ ‘‘हूं,’’ कहते हुए विपिन बैग रख फ्रैश होने चले गए.

मैं 10 मिनट फैन के नीचे खड़ी रही. फिर मैं विपिन के लिए चाय चढ़ा कर थोड़ा लेटी ही थी कि विपिन ने पूछा, ‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘आज गरमी में हालत खराब हो गई. अजीब सी थकान हो रही है.’’

विपिन छेड़छाड़ के मूड में आ गए थे. मुसकराते हुए बोले, ‘‘हां, उम्र भी तो हो रही है.’’ एक तो गरमी से परेशान ऊपर से विपिन की बात से मैं और तप गई.

तुनक कर बोली, ‘‘कौन सी उम्र हो रही है? अभी 50 की भी नहीं हुई हूं. हर समय उम्र का राग अलापते रहते हो.’’ विपिन ने और छेड़ा, ‘‘सच बहुत कड़वा होता है रश्मि.’’

मैं ने जलतेकुढ़ते उन्हें चाय का कप पकड़ाया. मैं इस समय चाय नहीं पीती हूं. फिर शीशे में जा कर खुद पर नजर डाली, ‘‘हुंह, कहते हैं उम्र हो रही है… सभी कौंप्लिमैंट देते हैं… इतनी फिट हूं… और विपिन कुछ भी हो जाए उम्र की बात करेंगे… सब से बड़ी बात यह कि जब मैं खुद को यंग महसूस करती हूं तो यह जरूरी है क्या कि कभी कुछ हो जाए तो उम्र ही कारण होगी? हुंह, कुछ भी बोलते रहते हैं. इन की बातों पर कौन ध्यान दे. गुस्सा अपनी ही हैल्थ के लिए ठीक नहीं है… बोलने दो इन्हें.

थोड़ी देर में हमारे बच्चे वान्या और शाश्वत भी कोचिंग से आ गए. सब अपने रूटीन में व्यस्त थे. डिनर करते हुए अचानक मुझे कुछ याद आया, तो मैं अपने माथे पर हाथ रखते हुए बोली, ‘‘उफ, गरमी लग रही थी तो सैर से सीधी घर आ गई. कल सुबह के लिए सब्जी लाना ही भूल गई.’’ विपिन को फिर मौका मिला तो फिर अपना तीर छोड़ा, ‘‘होता है, उम्र के साथ याद्दाश्त कमजोर होती ही है.’’

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एक तो सुबह क्या बनेगा, इस की टैंशन, ऊपर से फिर उम्र का व्यंग्यबाण, मैं सचमुच नाराज हो गई. मुंह से तो कुछ नहीं बोला पर विपिन को जलती नजरों से घूरा तो बच्चे समझ गए कि मुझे गुस्सा आया है, पर हैं तो ऐसी शरारतों में अपने पापा के चमचे ही न, अत: शाश्वत ने कहा, ‘‘मम्मी, आप सच ऐक्सैप्ट क्यों नहीं कर पा रहीं? कभी भी आप का बैक पेन बढ़ जाता है, कभी भी कुछ भूल जाती हो, मान लो मम्मी उम्र हो रही है.’’ वान्या को लगा कि कहीं मेरा गुस्सा न

बढ़ जाए. अत: फौरन बात संभाली, ‘‘चुप रहो शाश्वत मम्मी, सब्जी नहीं है तो कोई बात नहीं, हम तीनों कैंटीन में खा लेंगे. आप बस अपना खाना बना लेना.’’ मैं ने जल्दी से अपना खाना खत्म किया और फिर पर्स उठा, कर बोली, ‘‘देखती हूं पनीर मिल जाए तो ले आती हूं.’’

विपिन ने भी कहा, ‘‘अरे छोड़ो, कैंटीन में खा लेंगे सब.’’ जानती हूं विपिन को घर का खाना ही ले जाना पसंद है. उम्र बढ़ने की बात से मुझे गुस्सा तो आता है, चिढ़ती भी बहुत हूं पर प्यार भी तो करती हूं न उन्हें. अत: मैं उन्हें देख कर मुंह फुलाए हुए अपनी नाराजगी प्रकट करते घर से निकलने लगी, तो विपिन मुसकरा उठे. वे भी जानते हैं कि मेरा गुस्सा क्षणिक ही होता है.

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हम तीसरी मंजिल पर रहते हैं. मैं सीढि़यों से ही उतरती हूं. ज्यादा सामान होता है तभी लिफ्ट में आती हूं. पनीर ले कर लौट रही थी तो देखा लिफ्ट नीचे ही थी. कोई लिफ्ट में जा रहा था. मैं भी यों ही लिफ्ट में आ गई. साथ खड़े लड़के ने लिफ्ट में 7वीं मंजिल का बटन दबाया. मैं पता नहीं किन खयालों में थी कि तीसरी मंजिल का बटन दबाना ही भूल गई. दिमाग में विपिन की उम्र की बातें ही चल रही थीं न. जब अचानक लगा कि ऊपर जा रही हूं तो हड़बड़ा कर स्टौप का बटन दबा दिया. लिफ्ट रुक गई. आजकल कुछ गड़बड़ चल रही थी.

साथ खड़ा लड़का शालीनता से बोला, ‘‘क्या हुआ मैम?’’ मैं झेंप गई. कहा, ‘‘सौरी, गलती से कर दिया. मुझे तीसरी मंजिल पर जाना था.’’

शैतान भाग 2 : अरलान ने रानिया के साथ कौन सा खेल खेला

वह ड्राइंगरूम में पहुंची तो वहां सोनिया की सहेली कंजा सोफे पर अरसलान से सटी बैठी थी. रानिया को उस का यह अंदाज बड़ा बुरा लगा. वहीं पर सोनिया के वकील भी मौजूद थे. वकील ने कहा, ‘‘मिस रानिया, आप कल 11 बजे यहां हाजिर रहिएगा.’’

‘‘मैं तो यहीं रहती हूं साहब, जब आप कहेंगी, आ जाऊंगी.’’

‘‘मुझे बताया गया था कि आज आप अपने घर चली जाएंगी.’’ वकील साहब ने कहा.

कंजा बीच में बोल पड़ी, ‘‘दरअसल, मैं ने और अरसलान ने सोचा कि फिजा को जेहनी सुकून के लिए मेरे घर मेरे बच्चे और उस की ट्रेंड आया के पास छोड़ दिया जाए. क्योंकि फिजा के दिलोदिमाग में सोनिया की मौत का असर पड़ सकता है. जब फिजा हमारे यहां चली जाएगी तो रानिया की यहां क्या जरूरत रहेगी.’’

उस की इस बात पर रानिया को गुस्सा आ गया. उस ने तीखे स्वर में कहा, ‘‘मेरे खयाल से अभी घर में फिजा के बड़े मौजूद हैं, वे इस बारे में फैसला लेंगे. आप का ताल्लुक सिर्फ इतना है कि आप सोनिया मैम की सहेली हैं.’’

‘‘मैं तो सोनिया की सहेली हूं, लेकिन तुम तो मुलाजिम के अलावा कुछ नहीं हो.’’

रानिया ने तड़प कर अरसलान की ओर देखा कि वह उस का कुछ सपोर्ट करेगा. पर वह चुप बैठा था. वहां मौजूद सोनिया की खाला ने कहा, ‘‘मैं फिजा को अपने घर भेज देती हूं, वहां मेरी बेटियां उसे संभाल लेंगी.’’

वकील ने कहा, ‘‘आप लोग बेकार की बहस कर रहे हैं. सोनिया की वसीयत के मुताबिक वसीयत खोलते वक्त सिर्फ 3 लोग मौजूद रहेंगे. इन में एक हैं मिस रानिया, इसलिए इन का यहां रहना जरूरी है, इसलिए यही बेहतर होगा कि फिजा उन्हीं के पास रहे. इतने दिनों से वही उस की देखभाल कर रही हैं और इस वक्त इन्हीं की जरूरत भी है. क्यों अरसलान साहब, यह बात सही है न?’’

अरसलान ने अनमने ढंग से कहा, ‘‘आप ठीक कह रहे हैं वकील साहब.’’

कंजा ने बेकरार हो कर उस की तरफ देखा तो अरसलान ने धीरे से उस का हाथ दबा दिया. रानिया ने उठ कर कहा, ‘‘क्या अब मैं फिजा के पास जाऊं?’’

‘‘हां, आप जाएं और आप यहीं रुकेंगी. बच्ची के पास.’’ वकील ने मजबूत लहजे में कहा.

इस के बाद रानिया फिजा के पास लेट गई. अरसलान की बेरुखा और दोगला बर्ताव देख कर वह बहुत दुखी थी. उस की आंखों से आंसू बहने लगे. उसे याद आया कि एक बार सोनिया ने उस से कहा था, ‘‘मेरी कंजा से कोई खास दोस्ती नहीं है. पता नहीं यह तलाकशुदा महिला क्यों बारबार मेरे घर चली आती है?’’

शायद सोनिया को अंदाजा था कि वह अरसलान के पीछे लगी है. इन 8 महीनों में सोनिया से रानिया की अच्छी दोस्ती हो गई थी. रानिया की यह अच्छी आदत थी कि वह चुपचाप सब सुनती थी, इसलिए सोनिया उस से अपने मन की बातें कर के दिल हलका कर लेती थी.

एक बार उस ने अपनी मोहब्बत की पूरी कहानी बताई थी. उस ने कहा था, ‘‘यह सच है कि मुझे अरसलान से पहली नजर में मोहब्बत हो गई थी. पहली बार जब अरसलान कार्टन सप्लाई के लिए हमारी फैक्टरी में आया था, तब उस का कारोबार बहुत छोटा था. मैं ने उसे पार्टनरशिप का औफर दिया था, ताकि उस का काम बड़े पैमाने पर हो सके और आमदनी भी बढ़े. उस के बाद हम ने साथ मिल कर बिजनैस बढ़ाया.

‘‘उसी दौरान मुझे मालूम हुआ कि अरसलान की मंगनी उस की कजिन रूही से हो चुकी है. मैं पीछे हट गई और अरसलान को भूल जाना चाहा, पर उसी दौरान रूही का किडनैप हो गया. अरसलान ने बताया कि अपहर्त्ताओं ने 50 लाख रुपए मांगे हैं. 50 लाख रुपए उस ने मुझ से इस वादे के साथ मांगे कि रूही के छूट जाने के बाद वह मुझ से शादी कर लेगा.

‘‘मैं ने अरसलान को 50 लाख रुपए दे दिए. मैं ने पुलिस को भी खबर कर दी. जांच करते हुए पुलिस वहां पहुंची तो अपहर्त्ता भाग चुके थे. रूही रस्सियों से बंधी थी. उस की आंखों पर पट्टी बंधी थी. रूही ने बताया कि अपहर्त्ता 3 थे और उन्होंने मास्क पहन रखे थे, इसलिए वह किसी को पहचान नहीं सकी.’’

सोनिया का कहना था कि उसे शक है कि यह किडनैपिंग का प्रोपेगैंडा अरसलान का था. उसी ने सारा खेल खेला था.

‘‘आप अपने शौहर पर इलजाम लगा रही हैं. यह जान लेने के बाद भी आप ने उन से शादी की?’’

‘‘क्योंकि मैं उस वक्त उस के इश्क में अंधी थी.’’

सोनिया ने आगे कहा, ‘‘अरसलान कंजा के साथ मिल कर मेरी मौत का इंतजार कर रहा है. मैं अपनी दौलत इस लालची इंसान और उस बेशर्म औरत के लिए नहीं छोड़ूंगी.’’

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उस वक्त कंजा का नाम सुन कर रानिया मन ही मन हंसी, क्योंकि कंजा खुद को अरसलान की महबूबा समझ रही थी. उसी वक्त सोनिया की खाला उस के कमरे में आ गईं. आते ही उन्होंने कहा, ‘‘अरे, तुम यहां बैठी हो रानिया. तुम परेशान न हो, मैं अरसलान से कहूंगी कि फिजा की सही देखभाल के लिए तुम्हारा यहां रहना जरूरी है.’’

रानिया चुपचाप बैठी रही.

खाला ने आगे कहा, ‘‘कंजा फिजा के मामले में बेकार में टांग अड़ा रही है. पर मैं उस की एक नहीं चलने दूंगी. वह बेवजह अरसलान पर डोरे डाल रही है. एक बार मेरी बेटी शीना इस घर में दुलहन बन कर आ जाए तो मैं कंजा का पत्ता ही काट दूंगी. ऐसा हो गया तो तुम्हारी जौब भी सेफ रहेगी.’’

रानिया समझ गई कि सब लोग अपनीअपनी चाल चल रहे हैं. शीना शादी कर के करोड़ों की मालकिन हो जाएगी.  सोनिया की मौत हो गई. लाश घर में पड़ी थी और सभी लोग अपनाअपना उल्लू सीधा करने में लगे थे.

सोनिया की मौत के गम में रानिया कमरे में बैठी थी, तभी अरसलान की बड़ी बहन कमरे में आ कर बोली, ‘‘मैं चाहती हूं कि अरसलान कम से कम फिजा का खयाल करते हुए उस बेशर्म औरत के चंगुल से निकल जाए. दौलत के पीछे भागना छोड़ कर वह ऐसी लड़की से शादी करे, जो फिजा को दिल से प्यार करे और बिखरा घर संभाले. मैं उस से तुम्हारा जिक्र जरूर करूंगी.’’

उस की बात पर रानिया कुछ नहीं बोली. उस की झुकी आंखों व लाल होते चेहरे से शायद उस की रजामंदी मिल गई थी.

उस ने आगे कहा, ‘‘मैं जानती हूं कि अरसलान दिलफेंक है. कई लड़कियों से अफेयर चला चुका है. मैं उसे बहुत समझाती थी कि सोनिया से बेवफाई न करे, पर वह नहीं माना.’’

इस से रानिया को लगा कि अरसलान ने मोहब्बत का जाल फेंक कर उसे भी बेवकूफ बनाया है. उसी वक्त बाहर से आवाजें आनी लगीं. सब लोग कब्रिस्तान से वापस आ गए थे. वह फिजा के बालों में हाथ फेरती वहीं बैठी रही. दरवाजा खटखटा कर के अरसलान कमरे में आया. फिजा को देख कर बोला, ‘‘फिजा तो अच्छी है न, तुम ने उसे संभाल लिया है न?’’

‘‘जी वह अब ठीक है.’’

इस के बाद अरसलान ने रूखे लहजे में पूछा, ‘‘तुम ने आपा को क्या पढ़ाया है?’’

‘‘मैं ने… मैं ने तो कुछ नहीं कहा.’’ रानिया चौंक कर बोली.

‘‘मैं अच्छी तरह जानता हूं कि तुम ने मेरी आपा के दिमाग में यह बात भरी है कि फिजा के लिए मुझे तुम से ही शादी करनी चाहिए. रानिया, मैं ने रात के अंधेरे में तुम से जो वादे किए थे, उन्हें दिन के उजाले में भूल जाओ. झूठे वादे करना मेरी आदत है, उस पर यकीन न करना.’’ इस के बाद वह कहकहा लगा कर हंस पड़ा.

रानिया उस का असली चेहरा देख कर दंग रह गई. अरसलान ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘मैं ने पहले दिन ही तुम्हारी आंखों में अपने लिए पसंदगी देख ली थी. जो लड़की खुद पसंद करे, उसे फंसाना मेरे लिए बड़ा आसान होता है. 2-3 मोहब्बत भरी मुलाकातों के बाद शादी के झूठे ख्वाब दिखा कर तुम्हारा जिस्म हासिल कर लिया. बस इतना ही मेरा मकसद था.’’

रानिया का चेहरा गुस्से से लाल पड़ गया. वह तीखे स्वर में बोली, ‘‘बिलकुल उसी तरह, जिस तरह तुम ने रूही की नजर पहचानी थी, सोनिया की नजर पहचानी थी. अपने दोस्तों के जरिए रूही को अगवा करवा कर उस की भी इज्जत लूट ली और उस के वापस आने पर ऐसी बेरुखी दिखाई कि उस मासूम ने मजबूर हो कर खुदकशी कर ली.’’

अरसलान की आंखों में हैरत थी. वह गुस्से से चीखा, ‘‘यह क्या बकवास कर रही हो? यह कहानी तुम्हें सोनिया ने ही सुनाई होगी? तुम इस का कोई सबूत नहीं दे सकती. अब चुप हो जाओ और मैं कहता हूं कि तुम यहां रह सकती हो. हमारे रात के अंधेरे का ताल्लुक वैसा ही रहेगा या फिर खामोशी से 5 लाख रुपए ले कर यहां से निकल जाओ. पर अपनी जुबान बंद रखना.’’

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‘‘मैं ने तुम्हें देवता समझा था, तुम तो शैतान निकले. तुम्हारी हर बात मानती रही, यहां तक कि अपनी इज्जत भी गंवा दी और उस का तुम यह बदला दे रहे हो मुझे?’’

‘‘मैं तुम से शादी क्यों करूं? जरा अक्ल से सोचो, तुम्हारे पास देने को अब बचा ही क्या है?’’ यह कह कर वह कमरे से बाहर निकल गया.

रानिया रो पड़ी. एक आवारा आदमी के पीछे उस ने अपना सब कुछ लुटा दिया. उस का दिल चाहा खुदकुशी कर के मर जाए. तभी उस ने सोचा कि अगर वह मर गई तो फिजा एकदम अकेली व बेसहारा हो जाएगी. उसे सही मायनों में फिजा से मोहब्बत हो गई थी. वह कुछ देर सोचती रही, उस के बाद उस ने एक फैसला लिया और बात करने कमरे से बाहर निकली.

जानें आगे क्या हुआ कहानी के अगले भाग में…

New Year 2022: नई जिंदगी की शुरुआत

फूलमनी जवानी की दहलीज पर कदम रखते ही बुतरू के स्टाइल पर फिदा हो गई. प्यार के झांसे में आ कर एक दिन बिना सोचेसमझे वह अपना घर छोड़ उस के साथ शहर भाग आई. शादीशुदा जिंदगी क्या होती है, दोनों ही इस का ककहरा भी नहीं जानते थे. भाग कर शहर तो आ गए, लेकिन बुतरू कोई काम ही नहीं करना चाहता था. वह बस्ती के बगल वाली सड़क पर दिनभर हंडि़या बेचने वाली औरतों के पास निठल्ला बैठा बातें करता और हंडि़या पीता रहता था. इसी तरह दिन महीनों में बीत गए और खाने के लाले पड़ने लगे.

फूलमनी कब तक बुतरू के आसरे बैठे रहती. उस ने अगल बगल की औरतों से दोस्ती गांठी. उन्होंने फूलमनी को ठेकेदारी में रेजा का काम दिलवा दिया. वह काम करने जाने लगी और बुतरू घर संभालने लगा. जल्द ही दोनों का प्यार छूमंतर हो गया.

बुतरू दिनभर घर में अकेला बैठा रहता. शाम को जब फूलमनी काम से घर लौटती, वह उस से सारा पैसा छीन लेता और गालीगलौज पर आमादा हो जाता, ‘‘तू अब आ रही है. दिनभर अपने भरतार के घर गई थी पैसा कमाने… ला दे, कितना पैसा लाई है…’’

फूलमनी दिनभर ठेकेदारी में ईंटबालू ढोतेढोते थक कर चूर हो जाती. घर लौट कर जमीन पर ही बिना हाथमुंह धोए, बिना खाना खाए लेट जाती. ऊपर से शराब के नशे में चूर बुतरू उस के आराम में खलल डालते हुए किसी भी अंग पर बेधड़क हाथ चला देता. वह छटपटा कर रह जाती.

एक तो हाड़तोड़ मेहनत, ऊपर से बुतरू की मार खाखा कर फूलमनी का गदराया बदन गलने लगा था. तरहतरह के खयाल उस के मन में आते रहते. कभी सोचती, ‘कितनी बड़ी गलती की ऐसे शराबी से शादी कर के. वह जवानी के जोश में भाग आई. इस से अच्छा तो वह सुखराम मिस्त्री है. उम्र में बुतरू से थोड़ा बड़ा ही होगा, पर अच्छा आदमी है. कितने प्यार से बात करता है…’

सुखराम फूलमनी के साथ ही ठेकेदारी में मिस्त्री का काम करता था. वह अकेला ही रहता था. पढ़ालिखा तो नहीं था, पर सोचविचार का अच्छा था. सुबहसवेरे नहाधो कर वह काम पर चला आता. शाम को लौट कर जो भी सुबह का पानीभात बचा रहता, उसे प्यार से खापी कर सो जाता.

शनिवार को सुखराम की खूब मौज रहती. उस दिन ठेकेदार हफ्तेभर की मजदूरी देता था. रविवार को सुखराम अपने ही घर में मुरगा पकाता था. मौजमस्ती करने के लिए थोड़ी शराब भी पी लेता और जम कर मुरगा खाता.

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फूलमनी से सुखराम की नईनई जानपहचान हुई थी. एक रविवार को उस ने फूलमनी को भी अपने घर मुरगा खाने के लिए बुलाया, पर वह लाज के मारे नहीं गई.

साइट पर ठेकेदार का मुंशी सुखराम के साथ फूलमनी को ही भेजता था. सुखराम जब बिल्डिंग की दीवारें जोड़ता, तो फूलमनी फुरती दिखाते हुए जल्दीजल्दी उसे जुगाड़ मसलन ईंटबालू देती जाती थी.

सुखराम को बैठने की फुरसत ही नहीं मिलती थी. काम के समय दोनों की जोड़ी अच्छी बैठती थी. काम करते हुए कभीकभी वे मजाक भी कर लिया करते थे. लंच के समय दोनों साथ ही खाना खाते. खाना भी एकदूसरे से साझा करते. आपस में एकदूसरे के सुखदुख के बारे में भी बतियाते थे.

एक दिन मुंशी ने सुखराम के साथ दूसरी रेजा को काम पर जाने के लिए भेजा, तो सुखराम उस से मिन्नतें करने लगा कि उस के साथ फूलमनी को ही भेज दे.

मुंशी ने तिरछी नजरों से सुखराम को देखा और कहा, ‘‘क्या बात है सुखराम, तुम फूलमनी को ही अपने साथ क्यों रखना चाहते हो?’’

सुखराम थोड़ा झेंप सा गया, फिर बोला ‘‘बाबू, बात यह है कि फूलमनी मेरे काम को अच्छी तरह समझती है कि कब मुझे क्या जुगाड़ चाहिए. इस से काम करने में आसानी होती है.’’

‘‘ठीक है, तुम फूलमनी को अपने साथ रखो, मुझे कोई एतराज नहीं है. बस, काम सही से होना चाहिए… लेकिन, आज तो फूलमनी काम पर आई नहीं है. आज तुम इसी नई रेजा से काम चला लो.’’

झक मार कर सुखराम ने उस नई रेजा को अपने साथ रख लिया, मगर उस से उस के काम करने की पटरी नहीं बैठी, तो वह भी लंच में सिरदर्द का बहाना बना कर हाफ डे कर के घर निकल गया. दरअसल, फूलमनी के नहीं आने से उस का मन काम में नहीं लग रहा था.

दूसरे दिन सुखराम ने बस्ती जा कर फूलमनी का पता लगाया, तो मालूम हुआ कि बुतरू ने घर में रखे 20 किलो चावल बेच दिए हैं. फूलमनी से उस का खूब झगड़ा हुआ है. गुस्से में आ कर बुतरू ने उसे इतना मारा कि वह बेहोश हो गई. वह तो उसे मारे ही जा रहा था, पर बस्ती के लोगों ने किसी तरह उस की जान बचाई.

सुखराम ने पड़ोस में पूछा, ‘‘बुतरू अभी कहां है?’’

किसी ने बताया कि वह शराब पी कर बेहोश पड़ा है. सुखराम हिम्मत कर के फूलमनी के घर गया. चौखट पर खड़े हो कर आवाज दी, तो फूलमनी आवाज सुन कर झोंपड़ी से बाहर आई. उस का चेहरा उतरा हुआ था.

सुखराम से उस की हालत देखी न गई. वह परेशान हो गया, लेकिन कर भी क्या सकता था. उस ने बस इतना ही पूछा, ‘‘क्या हुआ, जो 2 दिन से काम पर नहीं आ रही हो?’’

दर्द से कराहती फूलमनी ने कहा, ‘‘अब इस चांडाल के साथ रहा नहीं जाता सुखराम. यह नामर्द न कुछ करता है और न ही मुझे कुछ करने देता है. घर में खाने को चावल का एक दाना तक नहीं छोड़ा. सारे चावल बेच कर शराब पी गया.’’

‘‘जितना सहोगी उतना ही जुल्म होगा तुम पर. अब मैं तुम से क्या कहूं. कल काम पर आ जाना. तुम्हारे बिना मेरा मन नहीं लगता है,’’ इतना कह कर सुखराम वहां से चला आया.

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सुखराम के जाने के बाद बहुत देर तक फूलमनी के मन में यह सवाल उठता रहा कि क्या सचमुच सुखराम उसे चाहता है? फिर वह खुद ही लजा गई. वह भी तो उसे चाहने लगी है. कुछ शब्दों के एक वाक्य ने उस के मन पर इतना गहरा असर किया कि वह अपने सारे दुखदर्द भूल गई. उसे ऐसा लगने लगा, जैसे सुखराम उसे साइकिल के कैरियर पर बैठा कर ऐसी जगह लिए जा रहा है, जहां दोनों का अपना सुखी संसार होगा. वह भी पीछे मुड़ कर देखना नहीं चाह रही थी. बस आगे और आगे खुले आसमान की ओर देख रही थी.

अचानक फूलमनी सपनों के संसार से लौट आई. एक गहरी सांस भरी कि काश, ऐसा बुतरू भी होता. कितना प्यार करती थी वह उस से. उस की खातिर अपने मांबाप को छोड़ कर यहां भाग आई और इस का सिला यह मिल रहा है. आंखों से आंसुओं की बूंदें टपक आईं. बुतरू का नाम आते ही उस का मन फिर कसैला हो गया.

अगले दिन सुबहसवेरे फूलमनी काम पर आई, तो उसे देख कर सुखराम का मन मयूर नाच उठा. काम बांटते समय मुंशी ने कहा, ‘‘सुखराम के साथ फूलमनी जाएगी.’’

साइट पर सुखराम आगेआगे अपने औजार ले कर चल पड़ा, पीछेपीछे फूलमनी पाटा, बेलचा, सीमेंट ढोने वाला तसला ले कर चल रही थी.

सुखराम ने पीछे घूम कर फूलमनी को एक बार फिर देखा. वह भी उसे ही देख रही थी. दोनों चुप थे. तभी सुखराम ने फूलमनी से कहा, ‘‘तुम ऐसे कब तक बुतरू से पिटती रहोगी फूलमनी?’’

‘‘देखें, जब तक मेरी किस्मत में लिखा है,’’ फूलमनी बोली.

‘‘तुम छोड़ क्यों नहीं देती उसे?’’ सुखराम ने सवाल किया.

‘‘फिर मेरा क्या होगा?’’

‘‘मैं जो तुम्हारे साथ हूं.’’

‘‘एक बार तो घर छोड़ चुकी हूं और कितनी बार छोडंू? अब तो उसी के साथ जीना और मरना है.’’

‘‘ऐसे निकम्मे के हाथों पिटतेपिटाते एक दिन तुम्हारी जान चली जाएगी फूलमनी. क्या तुम मेरा कहा मानोगी?’’

‘‘बोलो…’’

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‘‘बुतरू एक जोंक की तरह है, जो तुम्हारे बदन को चूस रहा है. कभी आईने में तुम ने अपनी शक्ल देखी है. एक बार देखो. जब तुम पहली बार आई थीं, कैसी लगती थीं. आज कैसी लग रही हो. तुम एक बार मेरा यकीन कर के मेरे साथ चलो. हमारी अपनी प्यार की दुनिया होगी. हम दोनों इज्जत से कमाएंगेखाएंगे.’’

बातें करतेकरते दोनों उस जगह पहुंच चुके थे, जहां उन्हें काम करना था. आसपास कोई नहीं था. वे दोनों एकदूसरे की आंखों में समा चुके थे.

New Year 2022: नई जिंदगी- भाग 1: क्यों सुमित्रा डरी थी

लेखक-अरुणा त्रिपाठी

कई बार इनसान की मजबूरी उस के मुंह पर ताला लगा देती है और वह चाह कर भी नहीं कह पाता जो कहना चाहता है. सुमित्रा के साथ भी यही था. घर की जरूरतों के अलावा कम उम्र के बच्चों के भरणपोषण का बोझ उन की सोच पर परदा डाले हुए था. वह अपनी शंका का समाधान बेटी से करना चाहती थीं पर मन में कहीं डर था जो बहुत कुछ जानसमझ कर भी उन्हें नासमझ बनाए हुए था.

पति की असामयिक मौत ने उन की कमर ही तोड़ दी थी. 4 छोटे बच्चों व 1 सयानी बेटी का बोझ ले कर वह किस के दरवाजे पर जाएं. उन की बड़ी बेटी कल्पना पर ही घर का सारा बोझ आ पड़ा था. उन्होंने साल भर के अंदर बेटी के हाथ पीले करने का विचार बनाया था क्योंकि बेटी कल्पना को कांस्टेबल की नौकरी मिल गई थी. आज बेटी की नौकरी न होती तो सुमित्रा के सामने भीख मांगने की नौबत आ गई होती.

बच्चे कभी स्कूल फीस के लिए तो कभी यूनीफार्म के लिए झींका करते और सुमित्रा उन पर झुंझलाती रहतीं, ‘‘कहां से लाऊं इतना पैसा कि तुम सब की मांग पूरी करूं. मुझे ही बाजार में ले जाओ और बेच कर सब अपनीअपनी इच्छा पूरी कर लो.’’

कल्पना कितनी बार घर में ऐसे दृश्य देख चुकी थी. आर्थिक तंगी के चलते आएदिन चिकचिक लगी रहती. उस की कमाई से दो वक्त की रोटी छोड़ खर्च के लिए बचता ही क्या था. भाई- बहनों के सहमेसहमे चेहरे उस की नींद उड़ा देते थे और वह घंटों बिस्तर पर पड़ी सोचा करती थी.

कल्पना की ड्यूटी गुवाहाटी रेलवे स्टेशन पर थी. वह रोज देखती कि उस के साथी सिपाही किस प्रकार से सीधेसादे यात्रियों को परेशान कर पैसा ऐंठते थे. ट्रेन से उतरने के बाद सभी को प्लेटफार्म से बाहर जाने की जल्दी रहती है. बस, इसी का वे वरदी वाले पूरा लाभ उठा रहे थे.

‘‘कोई गैरकानूनी चीज तो नहीं है. खोलो अटैची,’’ कह कर हड़काते और सीधेसादे यात्री खोलनेदिखाने और बंद करने की परेशानी से बचने के लिए 10- 20 रुपए का नोट आगे कर देते. सिपाही मुसकरा देते और बिना जांचेदेखे आगे बढ़ जाने देते.

यदि कोई पैसे देने में आनाकानी करता, कानून की बात करता तो वे उस की अटैची, सूटकेस खोल कर सामान इस कदर इधरउधर सीढि़यों पर बिखेर देते कि उसे समेट कर रखने में भी भारी असुविधा होती और दूसरे यात्रियों को एक सबक मिल जाता.

ऐसे ही एक युवक का हाथ एक सिपाही ने पकड़ा जो होस्टल से आ रहा था. सिपाही ने कहा, ‘‘अपना सामान खोलो.’’

लड़का किसी वीआईपी का था, जिसे सी.आई.एस.एफ. की सुरक्षा प्राप्त थी. इस से पहले कि लड़का कुछ बोलता उस के पिता के सुरक्षादल के इंस्पेक्टर ने आगे बढ़ कर कहा, ‘‘अरे, यह मेरे साहब का लड़का है.’’

तुरंत सिपाही के हाथों की पकड़ ढीली हो गई और वह बेशर्मी से हंस पड़ा. एक बुजुर्ग यह कहते हुए निकल गए, ‘‘बरखुरदार, आज रिश्वतखोरी में नौकरी से हाथ धो बैठते.’’

कल्पना यह सबकुछ देख कर चकित रह गई लेकिन उस सिपाही पर इस का कुछ असर नहीं पड़ा था. उस ने वह वैसे ही अपना धंधा चालू रखा था. जाहिर है भ्रष्ट कमाई का जब कुछ हिस्सा अधिकारी की जेब में जाएगा तो मातहत बेखौफ तो काम करेगा ही.

कल्पना का जब भी अपनी मां सुमित्रा से सामना होता, वह नजरें नहीं मिलाती बल्कि हमेशा अपने को व्यस्त दर्शाती. उस के चेहरे की झुंझलाहट मां की प्रश्न भरी नजरों से उस को बचाने में सफल रहती और सुमित्रा चाह कर भी कुछ पूछने का साहस नहीं कर पातीं.

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कमाऊ बेटी ने घर की स्थिति को पटरी पर ला दिया था. रोजरोज की परेशानी और दुकानदार से उधार को ले कर तकरार व कहासुनी से सुमित्रा को राहत मिल गई थी. उसे याद आता कि जब कभी दुकानदार पिछले कर्ज को ले कर पड़ोसियों के सामने फजीहत करता, वह शर्म से पानीपानी हो जाती थीं पर छोटेछोटे बच्चों के लिए तमाम लाजशर्म ताक पर रख उलटे  हंसते हुए कहतीं कि अगली बार उधार जरूर चुकता कर दूंगी. दुकानदार एक हिकारत भरी नजर डाल कर इशारा करता कि जाओ. सुमित्रा तकदीर को कोसते घर पहुंचतीं और बाहर का सारा गुस्सा बच्चों पर उतार देती थीं.

आज उन को इस शर्मिंदगी व झुंझलाहट से नजात मिल गई थी. कल्पना ने घर की काया ही पलट दी थी. उन्हें बेटी पर बड़ा प्यार आता. कुछ समय तक तो उन का ध्यान इस ओर नहीं गया कि परिस्थिति में इतना आश्चर्यजनक बदलाव इतनी जल्दी कैसे और क्यों आ गया किंतु धीरेधीरे उन के मन में कुछ शंका हुई. कई दिनों तक अपने से सवालजवाब करने की हिम्मत बटोरी उन्होंने और से पूछा, ‘‘मेरी समझ में नहीं आता कल्पना बेटी कि तुम दिन की ड्यूटी के बाद फिर रात को क्यों जाती हो…’’

अभी सुमित्रा की बात पूरी भी नहीं हुई थी कि कल्पना ने बीच में ही बात काटते हुए कहा, ‘‘मां, मैं डबल ड्यूटी करती हूं. और कुछ पूछना है?’’

कल्पना ने यह बात इतने रूखे और तल्ख शब्दों में कही कि वह चुप हो गईं. चाह कर भी आगे कुछ न पूछ पाईं और कल्पना अपना पर्स उठा कर घर से निकल गई. हर रोज का यह सिलसिला देख एक दिन सुमित्रा का धैर्य टूट गया. कल्पना आधी रात को लौटी तो वह ऊंचे स्वर में बोलीं, आखिर ऐसी कौन सी ड्यूटी है जो आधी रात बीते घर लौटती हो. मैं दिन भर घर के काम में पिसती हूं, रात तुम्हारी चिंता में चहलकदमी करते बिताती हूं.

मां की बात सुन कर कल्पना का प्रेम उन के प्रति जाग उठा था पर फिर पता नहीं क्या सोच कर पीछे हट गई, मानो मां के निकट जाने का उस में साहस न हो.

‘‘मां, तुम से कितनी बार कहा है कि मेरे लिए मत जागा करो. एक चाबी मेरे पास है न. तुम अंदर से लाक कर के सो जाया करो. मैं जब ड्यूटी से लौटूंगी, खुद ताला खोल कर आ जाया करूंगी.’’

‘‘पहले तुम अपनी शक्ल शीशे में देखो, लगता है सारा तेज किसी ने चूस लिया है,’’ सुमित्रा बेहद कठोर लहजे में बोलीं.

कल्पना के भीतर एक टीस उठी और वह अपनी मां के कहे शब्दों का विरोध न कर सकी.

सुबह का समय था. पक्षियों की चहचहाहट के साथ सूर्य की किरणों ने अपने रंग बिखेरे. सुमित्रा का पूरा परिवार आंगन में बैठा चाय पी रहा था. उन की एक पड़ोसिन भी आ गई थीं. कल्पना को देख वह बोली, ‘‘अरे, बिटिया, तुम तो पुलिस में सिपाही हो, तुम्हारी बड़ी धाक होगी. तुम ने तो अपने घर की काया ही पलट दी. तुम्हें कितनी तनख्वाह मिलती है?’’

कल्पना ऐसे प्रश्नों से बचना चाहती थी. इस से पहले कि वह कुछ बोलती उस की छोटी बहन ने अपनी दीदी की तनख्वाह बढ़ाचढ़ा कर बता दी तो घर के बाकी लोग खिलखिला कर हंस दिए और बात आईगई हो गई.

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सुमित्रा बड़ी बेटी की मेहनत को देख कर एक अजीब कशमकश में जी रही थीं. इस मानसिक तनाव से बचने के लिए सुमित्रा ने सिलाई का काम शुरू कर दिया पर बडे़ घरों की औरतें अपने कपड़े सिलने को न देती थीं और मजदूर घरों से पर्याप्त सिलाई न मिलती इसलिए उन्होंने दरजी की दुकानों से तुरपाई के लिए कपडे़ लाना शुरू कर दिया. शुरुआत में हर काम में थोड़ीबहुत कठिनाई आती है सो उन्हें भी संघर्ष करना पड़ा.

जैसेजैसे सुमित्रा की बाजार में पहचान बनी वैसेवैसे उन का काम भी बढ़ता गया. अब उन्हें घर पर बैठे ही आर्डर मिलने लगे तो उन्होंने अपनी एक टेलरिंग की दुकान खोल ली.

5 सालों के संघर्ष के बाद सुमित्रा को दुकान से अच्छीखासी आय होने लगी. अब उन्हें दम मारने की भी फुरसत नहीं मिलती. कई कारीगर दुकान पर अपना हाथ बंटाने के लिए रख लिए थे.

New Year 2022- नई जिंदगी: क्यों सुमित्रा डरी थी

अपराध: पसंद नहीं आया पति के साथ मोना का सोना

शारदा ने अपने पति को काफी सम?ाया था कि दूसरी औरत के चक्कर में अपना परिवार और बिजनैस चौपट न करे. हर बार बिल्डर राजू अपनी बीवी से माफी मांगता और प्रेमिका से नाता तोड़ लेने के वादे करता. पर असल में वह अपनी प्रेमिका से दूरी बना ही नहीं रहा था.

पिछले दिनों जब शारदा को पता चला कि उस के पति ने अपनी प्रेमिका को जमीन का प्लौट गिफ्ट में दिया है, तो उस के सब्र का बांध टूट गया. उसे अपना घरपरिवार बिखरता नजर आने लगा और आखिरकार उस ने मोना को रास्ते से हटाने की साजिश रच डाली.

दरअसल, बिल्डर राजू का मोना राय उर्फ अनीता देवी नाम की एक मौडल से इश्क चल रहा था. राजू उस के इश्क में इस कदर डूबा हुआ था कि उसे अपने बसेबसाए घरपरिवार की भी चिंता नहीं रही.

मोना का सारा खर्च वही उठाता था, यहां तक कि जिस किराए के मकान में मोना रहती थी, उस का किराया तक राजू ही देता था.

मोना और राजू के प्रेम के किस्से की भनक मोना के पति को भी थी, पर माली तौर पर कमजोर होने की वजह से वह चुप्पी साधे रहता था.

‘मिस ग्लोबल बिहार कौंटैस्ट’ में ‘बेस्ट आई’ यानी ‘सब से सुंदर आंखें’ का अवार्ड जीतने वाली मौडल मोना राय को अपराधियों ने कमर में गोली मार कर घायल कर दिया.

पटना के राजीवनगर महल्ला के रामनगरी सैक्टर-3 में उस के घर के मेन गेट के पास ही गोली मारी गई. वह अपनी बेटी आरोही के साथ पास के ही एक मंदिर से लौटी थी.

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जैसे ही मेन गेट खोल कर वह अपनी स्कूटी अंदर करने लगी, तभी पीछे से अपराधियों ने उस पर गोलियां बरसा दीं. उस के बाद अपराधी मोटरसाइकिल से फरार हो गए.

गोली लगने के बाद मोना चीखती और तड़पती हुई जमीन पर गिर पड़ी, अपनी मां को खून से लथपथ देख उस की बेटी जोरजोर से चिल्लाने लगी, तो मोना के पति सुमन कुमार और परिवार के बाकी लोग घर से बाहर निकले.

लोगों ने पुलिस को सूचना दी. उस के बाद उसे अस्पताल ले जाया गया. पुलिस ने मोना के घर, मोबाइल फोन और लैपटौप की छानबीन की. उस के घर में रखे फ्रिज से शराब की बोतल मिली है.

12 अक्तूबर की रात को उस पर गोलियां दागी गईं. 5 दिनों तक मौत से जंग लड़ने के बाद 17 अक्तूबर को उस की मौत हो गई.

मोना की मौत के बाद कई राज उस के साथ ही दफन हो गए. गोली मोना के कमर में लगी थी और लिवर में जा कर फंस गई थी, जिस से उस का लिवर डैमेज हो गया था.

पुलिस की जांच में भी बिल्डर राजू और मोना की नजदीकियों का खुलासा हुआ. उन दोनों के इश्क के चर्चे उन के परिवार वालों तक पहुंच चुके थे. पुलिस ने राजू को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया.

पहले राजू और मोना फुलवारीशरीफ इलाके में रहते थे और पड़ोसी थे. वहीं दोनों की नजरें मिलीं और उन के बीच प्रेम की खिचड़ी पकने लगी.

इस बात की जानकारी जब राजू की बीवी को हुई, तो उस ने खूब हंगामा मचाया. हंगामे के बाद मोना ने घर बदल लिया और रामनगरी महल्ले में रहने लगी. मोना ने घर भले ही बदल लिया, लेकिन राजू और मोना का इश्क परवान चढ़ता रहा.

पुलिस की जांच में पता चला कि बिल्डर राजू की बीवी शारदा देवी ने ही मोना की हत्या की साजिश रची थी. पुलिस जब उसे पकड़ने गई, तो पता चला कि वह अपने नाबालिग बेटे को ले कर फरार हो गई है. उसे पकड़ने के लिए 10 से ज्यादा ठिकानों पर छापामारी की गई, लेकिन वह पुलिस के हाथ नहीं आ सकी.

इस मामले में आरा जिले के उदवंतनगर के भगवतीपुर गांव से एक अपराधी भीम को पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया है.

भीम ने पुलिस को जानकारी दी कि शारदा ने ही सुदेश, विश्वकर्मा, शंकर और राहुल नाम के शूटरों को मोना की हत्या की सुपारी दी थी. विश्वकर्मा ने ही मोना पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाई थीं.

भीम ने पुलिस को यह भी बताया कि बिल्डर का नाबालिग बेटा भी मोना की हत्या की साजिश में शामिल है. उसी ने मोना का फोटो शूटर्स को दिखाया था. उस के बाद वही शूटरों को ले कर मोना के घर के पास गया था और घर के बाहर खड़ी मोना की ओर इशारा करते हुए बताया कि उसी औरत को मारना है.

फुलवारीशरीफ में रहने वाले बिल्डर राजू से मोना का गहरा रिश्ता था. तकरीबन 3 महीने पहले राजू ने मोना के नाम से जमीन का एक प्लौट खरीदा था, जिस की कीमत तकरीबन 25 लाख रुपए है.

राजू और मोना की नजदीकियों से राजू की बीवी शारदा खफा रहती थी. इस मसले को ले कर दोनों के बीच अकसर तकरार होती रहती थी. जब राजू ने मोना को प्लौट गिफ्ट में दिया, तो शारदा के सब्र का बांध टूट गया और उस ने मोना को ठिकाने लगाने की ठान ली.

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इस के लिए उस ने अपने भतीजे राहुल से कौंट्रैक्ट किलर से बात करने को कहा. राहुल ने शारदा की कोई मदद नहीं की. उस के बाद शारदा ने अपने दूर के रिश्तेदार सुदेश से मोना की हत्या कराने की बात की. 5 लाख रुपए में मोना को मारने की बात तय हुई थी. विश्वकर्मा, शंकर और भीम को सुदेश ने 97,000 रुपए बतौर एडवांस दिए.

अनीता उर्फ मोना बिहार के रोहतास जिले के विक्रम ब्लौक की रहने वाली थी. साल 2006 में उस की शादी सुमन के साथ हुई थी. सुमन एक प्राइवेट कंपनी में सेल्स एक्जीक्यूटिव का काम करता है.

सुमन ने पुलिस को बताया कि अनीता उर्फ मोना पिछले 2-3 सालों से टिकटौक वीडियो बना कर सोशल मीडिया पर डालती थी. उस के फौलोअर की तादाद एक लाख पार कर चुकी थी. उस के बाद वह मौडलिंग करने लगी और अपना नाम बदल कर मोना रख लिया था. वह कई प्रोग्राम में हिस्सा लेती थी और काफी लोगों से उस का मिलनाजुलना होने लगा था. मोना के 2 बच्चे हैं. बेटे का नाम नैतिक और बेटी का नाम आरोही है.

सांझ पड़े घर आना- भाग 1: नीलिमा की बौस क्यों रोने लगी

उसकी मेरे औफिस में नईनई नियुक्ति हुई थी. हमारी कंपनी का हैड औफिस बैंगलुरु में था और मैं यहां की ब्रांच मैनेजर थी. औफिस में कोई और केबिन खाली नहीं था, इसलिए मैं ने उसे अपने कमरे के बाहर वाले केबिन में जगह दे दी. उस का नाम नीलिमा था. क्योंकि उस का केबिन मेरे केबिन के बिलकुल बाहर था, इसलिए मैं उसे आतेजाते देख सकती थी. मैं जब भी अपने औफिस में आती, उसे हमेशा फाइलों या कंप्यूटर में उलझा पाती. उस का औफिस में सब से पहले पहुंचना और देर तक काम करते रहना मुझे और भी हैरान करने लगा. एक दिन मेरे पूछने पर उस ने बताया कि पति और बेटा जल्दी चले जाते हैं, इसलिए वह भी जल्दी चली आती है. फिर सुबहसुबह ट्रैफिक भी ज्यादा नहीं रहता.

वह रिजर्व तो नहीं थी, पर मिलनसार भी नहीं थी. कुछ चेहरे ऐसे होते हैं, जो आंखों को बांध लेते हैं. उस का मेकअप भी एकदम नपातुला होता. वह अधिकतर गोल गले की कुरती ही पहनती. कानों में छोटे बुंदे, मैचिंग बिंदी और नाममात्र का सिंदूर लगाती. इधर मैं कंपनी की ब्रांच मैनेजर होने के नाते स्वयं के प्रति बहुत ही संजीदा थी. दिन में जब तक 3-4 बार वाशरूम में जा कर स्वयं को देख नहीं लेती, मुझे चैन ही नहीं पड़ता. परंतु उस की सादगी के सामने मेरा सारा वजूद कभीकभी फीका सा पड़ने लगता.

लंच ब्रेक में मैं ने अकसर उसे चाय के साथ ब्रैडबटर या और कोई हलका नाश्ता करते पाया. एक दिन मैं ने उस से पूछा तो कहने लगी, ‘‘हम लोग नाश्ता इतना हैवी कर लेते हैं कि लंच की जरूरत ही महसूस नहीं होती. पर कभीकभी मैं लंच भी करती हूं. शायद आप ने ध्यान नहीं दिया होगा. वैसे भी मेरे पति उमेश और बेटे मयंक को तरहतरह के व्यंजन खाने पसंद हैं.’’ ‘‘वाह,’’ कह कर मैं ने उसे बैठने का इशारा किया, ‘‘फिर कभी हमें भी तो खिलाइए कुछ नया.’’ इसी बीच मेरा फोन बज उठा तो मैं अपने केबिन में आ गई.

एक दिन वह सचमुच बड़ा सा टिफिन ले कर आ गई. भरवां कचौरी, आलू की सब्जी और बूंदी का रायता. न केवल मेरे लिए बल्कि सारे स्टाफ के लिए. इतना कुछ देख कर मैं ने कहा, ‘‘लगता है कल शाम से ही इस की तैयारी में लग गई होगी.’’

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वह मुसकराने लगी. फिर बोली, ‘‘मुझे खाना बनाने और खिलाने का बहुत शौक है. यहां तक कि हमारी कालोनी में कोई भी पार्टी होती है तो सारी डिशेज मैं ही बनाती हूं.’’ नीलिमा को हमारी कंपनी में काम करते हुए 6 महीने हो गए थे. न कभी वह लेट हुई और न जाने की जल्दी करती. घर से तरहतरह का खाना या नाश्ता लाने का सिलसिला भी निरंतर चलता रहा. कई बार मैं ने उसे औफिस के बाद भी काम करते देखा. यहां तक कि वह अपने आधीन काम करने वालों की मीटिंग भी शाम 6 बजे के बाद ही करती. उस का मानना था कि औफिस के बाद मन भी थोड़ा शांत रहता है और बाहर से फोन भी नहीं आते.

एक दिन मैं ने उसे दोपहर के बाद अपने केबिन में बुलाया. मेरे लिए फुरसत से बात करने का समय दोपहर के बाद ही होता था. सुबह मैं सब को काम बांट देती थी. हमारी कंपनी बाहर से प्लास्टिक के खिलौने आयात करती और डिस्ट्रीब्यूटर्स को भेज देती थी. हमारी ब्रांच का काम और्डर ले कर हैड औफिस को भेजने तक ही सीमित था. नीलिमा ने बड़ी शालीनता से मेरे केबिन का दरवाजा खटखटा भीतर आने की इजाजत मांगी. मैं कुछ पुरानी फाइलें देख रही थी. उसे बुलाया और सामने वाली कुरसी पर बैठने का इशारा किया. मैं ने फाइलें बंद कीं और चपरासी को बुला कर किसी के अंदर न आने की हिदायत दे दी.

नीलिमा आप को हमारे यहां काम करते हुए 6 महीने से ज्यादा का समय हो गया. कंपनी के नियमानुसार आप का प्रोबेशन पीरियड समाप्त हो चुका है. यहां आप को कोई परेशानी तो नहीं? काम तो आपने ठीक से समझ ही लिया है. स्टाफ से किसी प्रकार की कोई शिकायत हो तो बताओ. ‘‘मैम, न मुझे यहां कोई परेशानी है और न ही किसी से कोई शिकायत. यदि आप को मेरे व्यवहार में कोई कमी लगे तो बता दीजिए. मैं खुद को सुधार लूंगी… मैं आप के जितना पढ़ीलिखी तो नहीं पर इतना जरूर विश्वास दिलाती हूं कि मैं अपने काम के प्रति समर्पित रहूंगी. यदि पिछली कंपनी बंद न हुई होती तो पूरे 10 साल एक ही कंपनी में काम करते हो जाते,’’ कह कर वह खामोश हो गई. उस की बातों में बड़ा ठहराव और विनम्रता थी.

‘‘जो भी हो, तुम्हें अपने परिवार की भी सपोर्ट है. तभी तो मन लगा कर काम कर सकती हो. ऐसा सभी के साथ नहीं होता है.’’ मैं ने थोड़े रोंआसे स्वर में कहा. वह मुझे देखती रही जैसे चेहरे के भाव पढ़ रही हो. मैं ने बात बदल कर कहा, ‘‘अच्छा मैं ने आप को यहां इसलिए बुलाया है कि अगला पूरा हफ्ता मैं छुट्टी पर रहूंगी. हो सकता है 1-2 दिन ज्यादा भी लग जाएं. मुझे उम्मीद है आप को कोई ज्यादा परेशानी नहीं होगी. मेरा मोबाइल चालू रहेगा.’’

‘‘कहीं बाहर जा रही हैं आप?’’ उस ने ऐसे पूछा जैसे मेरी दुखती रग पर हाथ रख दिया हो. मैं ने कहा, ‘‘नहीं, रहूंगी तो यहीं… कोर्ट की आखिरी तारीख है. शायद मेरा तलाक मंजूर हो जाए. फिर मैं कुछ दिन सुकून से रहना चाहती हूं.’’

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‘‘तलाक?’’ कह जैसे वह अपनी सीट से उछली हो. ‘‘हां.’’

‘‘इस उम्र में तलाक?’’ वह कहने लगी, ‘‘सौरी मैम मुझे पूछना तो नहीं चाहिए पर…’’

‘‘तलाक की भी कोई उम्र होती है? सदियों से मैं रिश्ता ढोती आई हूं. बेटी यूके में पढ़ने गई तो वहीं की हो कर रह गई. मेरे पति और मेरी कभी बनी ही नहीं और अब तो बात यहां तक आ गई है कि खाना भी बाहर से ही आता है. मैं थक गई यह सब निभातेनिभाते… और जब से बेटी ने वहीं रहने का निर्णय लिया है, हमारे बीच का वह पुल भी टूट गया,’’ कहतेकहते मेरी आंखों में आंसू आ गए.

Crime- बैंकिंग धोखाधड़ी: कैसे बचें!

दरअसल, हमें यह सच्चाई स्वीकार करनी चाहिए कि ऐसा हमेशा से होता रहा है मानवीय संवेदना जहां मनुष्य की फितरत है वही धोखा देना भी एक ऐसी फितरत है जो हमेशा से रही है. अब सिर्फ एक सवाल है कि हम इससे कैसे बच सकते हैं क्योंकि इसके अलावा हमारे पास कोई रास्ता नहीं है.

हम स्वयं जागरूक होंगे अपना बचाव करेंगे तो अपने कमाए हुए गाड़े धन की रक्षा कर सकते हैं. अगर हम स्वयं आंखें मूंद लेंगे तो धोखाधड़ी का शिकार होने की संभावना बनी रहेगी.

इस आलेख में हम यह प्रयास कर रहे हैं कि आपको कुछ ऐसी टिप्स दें ताकि आप बैंकिंग धोखा घड़ी से बच सके. इसी संदर्भ में आपको यह जानना भी जरूरी है कि हाल मैं बैंकिंग धोखा घड़ी की घटनाएं बढ़ती चली जा रही हैं. जैसे जैसे नियम कायदे कठोर हो रहे हैं प्रचार-प्रसार हो रहा है उसी स्पीड मैं धोखाधड़ी के मामले भी बढ़ते चले जा रहे हैं.

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चालू वित्त वर्ष (2021-22) की पहली छमाही में विभिन्न बैंकिंग कामकाज में धोखाधड़ी के मामले बढ़कर 4,071 हो गए, जबकि एक साल पहले की समान अवधि में यह संख्या 3,499 थी. भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) की बैंकिंग प्रवृत्ति एवं प्रगति के बारे में  जारी रिपोर्ट में बताया गया कि बैंकिंग कामकाज से संबंधित धोखाधड़ी के मामले आश्चर्यजनक रूप से बढ़ गए हैं.

सरकार और अमिताभ बच्चन

इस रिपोर्ट में आपको यह उल्लेख करना भी जरूरी है कि बैंकिंग धोखा घड़ी को ले करके जहां सरकार भारतीय रिजर्व बैंक अलर्ट है और यह प्रयास लगातार जारी है कि लोगों में जागरूकता फैले.

यही कारण है कि भारतीय रिजर्व बैंक ने सदी के महानायक कहे जाने वाले अमिताभ बच्चन को भी बैंकिंग धोखाधड़ी से बचाव के लिए हायर  किया हुआ है.

देश और दुनिया में सबसे ज्यादा देखे जाने वाले -“कौन बनेगा करोड़पति” कार्यक्रम जिसके होस्ट स्वयं अमिताभ  हैं कार्यक्रम में लगातार  बीच-बीच में  बैंकिंग धोखाधड़ी से बचाव के लिए लोगों को अपने अंदाज में जानकारियां देते जाते हैं.

मगर इस सब के बावजूद बैंक में रखे हुए धन में सोशल मीडिया के माध्यम से सेंध लगाए जाने का अपराध बदस्तूर जारी है. इसका यही बचाव है कि हम जागरूक हो और अपने बैंकों के दस्तावेजों आदि की जानकारी शेयर नहीं करें और गोपनीय रखें.

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आंकड़े है चौकानेवाले

हालांकि अप्रैल-सितंबर, 2021 के दौरान हुई धोखाधड़ी में शामिल रकम 36,342 करोड़ रुपए रही, जो एक साल पहले की समान अवधि में 64,261 करोड़ रुपए थी   चालू वित्त वर्ष की पहली छमाही में बैंकों ने 35,060

करोड़ रुपए मूल्य के अग्रिम भुगतान से संबंधित धोखाधड़ी के 1,802 मामले दर्ज किए गए. चिंता का सबब यह है कि इसके अलावा 1,532 मामले कार्ड भुगतान एवं इंटरनेट भुगतान से संबंधित थे, जिनकी कुल राशि 60 करोड़ रुपए थी.

पहली छमाही में जमाओं से संबंधित धोखाधड़ी के 208 मामले सामने आए, जिसमें 362 करोड़ रुपए की राशि का हेरफेर किया गया. बैंकिग धोखाधड़ी के

मामले में एक खास बात यह है कि इसमें आधे से भी अधिक हिस्सा निजी क्षेत्र के बैंकों का है लेकिन मूल्य के संदर्भ में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का हिस्सा इस धोखाधड़ी में अधिक रह है.

वहीं  वर्ष 2020-21 में 1,38, 42 करोड़ रुपए मूल्य के कुल 7,363 धोखाधड़ी मामले दर्ज किए गए थे.यह संख्या व 2019-20 में 8,703थी, जिनमें 1,85, 46: करोड़ रुपए की धोखाधड़ी हुई थी. इस तरह 2020-21 में बैंकिंग धोखाधड़ी के मामले एक साल पहले की तुलना में कम हो गए. रिपो कहती है कि वर्ष 2020-21 में सामने आ कई मामले असल में पहले के थे, लेकिन इस समय उन्हें दर्ज किया गया. इस अवधि में निज बैंकों का अंशदान धोखाधड़ी की मात्रा ए मूल्य दोनों में अधिक रहा. यह रिपोर्ट आंकड़े हमें सूचित करते हैं कि अगर हम स्वयं जागरूक नहीं होंगे तो अभी भी बैंकिंग धोखाधड़ी का शिकार हो सकते हैं.

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