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क्षितिज के उस पार: भाग -3

‘‘क्या हुआ, क्या हुआ?’’ 2-3 साइकिल सवार उतर कर पूछने लगे थे. ट्रक ड्राइवर भी आ गया था, ‘‘बाबूजी, क्या मरने का इरादा है? भला ऐसे गाड़ी चलाई जाती है…मैं ट्रक न रोक पाता तो… वह तो अच्छा हुआ कि गाड़ी पत्थर से ही टकरा कर रुक गई, मामूली ही नुकसान हुआ है.’’

मैं ने अचेत से पड़े अभय को संभालना चाहा था, डर के मारे दिल अभी तक धड़क रहा था.

‘‘अभय, तुम ठीक तो हो न…?’’ मेरा स्वर भीगने लगा था.

‘‘यह तो अच्छा हुआ बहनजी…आप ने इन्हें खींच लिया वरना स्टियरिंग पेट में घुस जाता तो…’’ ट्रक ड्राइवर कह रहा था. अभय ने मेरी तरफ देखा तो मैं ने आंखें झुका ली थीं.

‘‘बाबूजी, इस समय गाड़ी चलाना ठीक नहीं है, आगे की पुलिया भी टूटी हुई है. आप पास के डाकबंगले में रुक जाइए, सुबह जाना ठीक होगा…गाड़ी की मरम्मत भी हो जाएगी,’’ ड्राइवर ने राय दी.

‘‘हां…हां, यही ठीक है…’’ मैं सचमुच अब तक डरी हुई थी.

डाकबंगला पास ही था. मैं तो निढाल सी बाहर बरामदे में पड़ी कुरसी पर ही बैठ गई थी. अभय शायद चौकीदार से कमरा खोलने के लिए कह रहे थे.

‘‘बाबूजी, खाना खाना चाहें तो अभी पास के ढाबे से मिल जाएगा…फिर तो वह भी बंद हो जाएगा,’’ चौकीदार ने कहा था.

‘‘रितु, तुम अंदर कमरे में बैठो, मैं खाना ले कर आता हूं,’’ कहते हुए अभय बाहर चले गए थे.

साधारण सा ही कमरा था. एक पलंग बिछा था. कुछ सोच कर मैं ने बैग से चादर, कंबल निकाल कर बिछा दिए थे. फिर मुंह धो कर गाउन पहन लिया. अभय को बड़ी देर हो गई थी खाना लाने में. सोचने लगी कि पल भर में ही क्या हो जाता है.

एकाएक मेरा ध्यान भंग हुआ था. अभय शायद खाना ले कर लौट आए थे. अभय ने साथ आए लड़के से प्लेटें मेज पर रखने को कहा था. खाना खाने के बाद अभय ने एक के बाद दूसरी और फिर तीसरी सिगरेट सुलगानी चाही थी.

‘‘बहुत सिगरेट पीने लगे हो…’’ मैं ने धीरे से उन के हाथ से लाइटर ले लिया था और पास ही बैठ गई थी, ‘‘इतनी सिगरेट क्यों पीने लगे हो?’’

‘‘दूर रहोगी तो कुछ तो करूंगा ही…’’ पहली बार अभय का स्वर मुझे स्वाभाविक लगा था, ‘‘थक गया हूं रितु, ठीक है तुम नौकरी मत छोड़ना, मैं ही समय से पहले सेवानिवृत्त हो जाऊंगा, बस, अब तो खुश हो,’’ उन्होंने और सहज होने का प्रयास किया था…और मुझे पास खींच लिया था. फिर धीरे से मेरे उस गाल को सहला दिया था जहां शाम को थप्पड़ लगा था.

‘‘नहीं अभय, मैं नौकरी छोड़ दूंगी… आखिर मेरी सब से बड़ी जरूरत तो तुम्हीं हो,’’ कहते हुए मेरा गला रुंध गया था.

‘‘सच…क्या सच कह रही हो रितु?’’ अभय ने मेरी आंखों में झांका.

‘‘हां सच, बिलकुल सच,’’ मैं ने धीरे से कहते हुए अपना सिर अभय के कंधे पर टिका दिया था.

साक्षी के बाद: भाग 2

‘बसबस, तुम्हें इस हाल में टैंशन नहीं लेनी है, साक्षी. मम्मीजी भी जल्द ही बदल जाएंगी. तुम इतनी प्यारी हो कि कोई भी तुम से ज्यादा दिन नाराज नहीं रह सकता.’

साक्षी को बेटी हुई. परियों सी प्यारी, गुलाबी, गोलमटोल. बिलकुल साक्षी की तरह. मां को पोते की चाह थी शिद्दत से, लेकिन आई पोती. साक्षी डर रही थी कि न जाने उसे क्याक्या सुनना पड़ेगा, लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. मम्मीजी ने नवजात कन्या को झट से उठा कर सीने से लगा लिया. खुशी से उन की पलकें भीग गईं, ‘मेरी सोनीसुहानी बच्ची,’ वे बोलीं और बस, उसी दिन से बच्ची का नाम ‘सुहानी’ हो गया.

अच्छी जिंदगी गुजर रही थी साक्षी की. वह न के बराबर ही मायके जाती थी. 4 बरस की थी सुहानी, जब फिर से साक्षी गर्भवती हुई पर इस बार वह बेटा चाहती थी.

‘पूर्वा भाभी, मैं सोनोग्राफी करवाऊंगी, अगर लड़का हुआ तो रखूंगी, नहीं तो…’

‘नहीं तो क्या?’

साक्षी ने खामोशी से सिर झुका लिया.

‘इतनी पढ़ीलिखी हो कर कैसी सोच है तुम्हारी साक्षी? मुझे तुम से यह उम्मीद नहीं थी. ऐसा कभी सोचना भी नहीं, समझीं?’

‘भाभी, लड़कियों के साथ कितने झंझट हैं, आप क्या जानें. आप की तो कोई बहन नहीं, बेटी नहीं, आप के पास तो बेटा है भाभी, इसीलिए आप ऐसा कह रही हैं.’

‘मैं भी लड़की चाहती थी साक्षी, सूर्य आया तो इस में मेरा क्या कुसूर? रही बात बेटी की तो क्या सुहानी मेरी बेटी नहीं?’

‘वह तो है भाभी, फिर भी…’

‘जाने दो न. कौन जाने बेटा ही हो तुम्हें.’

बात आईगई हो गई. अभी तो कुछ ही दिन चढ़े थे साक्षी को.

‘‘पूर्वा, लो चाय लो.’’

पूर्वा जैसे गहरी बेहोशी से बाहर आई. अरुण कब लौटे, कब ताला खोल कर भीतर आए और कब चाय भी बना लाए, वह जान ही नहीं पाई.

‘‘पी लो पूर्वा, थोड़ा आराम मिलेगा, फिर हमें चलना भी है. साक्षी घर आ गई है.’’

पूर्वा के पेट में जैसे एक गोला सा उठा. दर्द की एक तीखी लहर पोरपोर दुखा गई. नहीं भर सकी वह चाय का 1 घूंट भी.

वह दिसंबर की एक सुबह थी. हड्डियां कंपा देने वाली ठंड पड़ रही थी, लेकिन पूर्वा पर जैसे कोई असर नहीं कर रही थी ठंड. जब अरुण का हाथ थामे वह साक्षी के घर पहुंची, तो उस का कलेजा मुंह को आ गया यह देख कर कि उस हाड़ कंपा देने वाली ठंड में बर्फीले संगमरमर के फर्श पर मात्र एक चटाई पर साक्षी की निष्प्राण देह पड़ी थी.

साक्षी की सास बिलख रही थीं. अब तक रुके पूर्वा के आंसू जैसे बांध तोड़ कर बह निकले. साक्षी से लिपट कर चीखचीख कर रोने लगी वह. इसी ड्राइंगरूम में ही तो 6 साल पहले, पहला पग धरा था साक्षी ने. यहीं, इसी जगह बिछे कालीन पर बैठ कर ही तो कंगना खुलवाया था संदीप से साक्षी ने. सहसा पीठ पर एक स्नेहिल स्पर्श का आभास हुआ और किसी ने सुबकते हुए उसे बांहों में बांध लिया. वह सुनंदा दीदी थीं.

साक्षी की मां सूना मन और भरी आंखें लिए उस के सिरहाने बैठी थीं मौन भाव से, एकटक बेटी को निहारती. एक आंसू भी नहीं टपका उन की आंखों से.

साक्षी की बहन स्वाति कंबल में लिपटी सोई हुई सुहानी को कस कर सीने से लगाए एक कोने में बैठी थी… खामोश… बस आंखों से आंसुओं की धारा बह रही थी.

हाय, कितनी बार मना किया बिटिया को पर एक न सुनी इस ने… कहते हुए साक्षी की सास फिर से रोने लगीं.

पूर्वा का जी चाहा कि चीख कर कहे कि नहीं मम्मीजी, झूठ न बोलिए. आप ने बिलकुल मना नहीं किया साक्षी को, बल्कि उस से ज्यादा तो आप चाहती थीं कि दूसरी बेटी न आए.

उसे याद आया, उस के आगरा जाने से 1 दिन पहले की ही तो बात है. संदीप और सुहानी को दफ्तरस्कूल भेज कर सुबह 9 बजे ही आ गई थी साक्षी. चेहरे का रंग उड़ा हुआ था. बोली, ‘पूर्वा भाभी, वही हुआ जिस का मुझे डर था.’

‘क्या हुआ साक्षी?’

‘सोनोग्राफी रिपोर्ट आ गई है, पूर्वा भाभी. लड़की ही है. मुझे अबौर्शन करवाना ही होगा.’

‘एक मां हो कर अपने ही बच्चे को मारोगी साक्षी, तो क्या चैन से जी पाओगी?’

‘मुझे नहीं चाहिए लड़की बस,’ दोटूक फैसला सुना दिया दृढ़ स्वर में साक्षी ने.

‘क्यों नहीं चाहिए? क्या संदीप भाई नहीं चाहते?’

‘नहीं, ऐसा होता तो प्रौब्लम ही क्या थी. संदीप को तो बहुत पसंद हैं बेटियां, भाभी.’

‘तो क्या मम्मीजी नहीं चाहतीं?’

‘पूर्वा भाभी, बहुत सहा है लड़की बन कर मैं ने, मेरी मां ने औैर बहन स्वाति ने भी. जानती हैं भाभी, हम 3 बहनें थीं. पापा जब गए तब मैं सिर्फ 10 साल की थी, स्वाति 6 साल की और सब से छोटी सिमरन, जो बेटे की आस में हुई थी, सिर्फ सवा साल की थी. पापा के गम में डूबी मां उस की ठीक से देखभाल नहीं कर पाईं और उसे डायरिया हो गया.

इलाज के लिए पैसे नहीं थे मां के पास…उस का डायरिया बिगड़ता गया और वह मर गई. मैं ने, मां और स्वाति ने बहुत तकलीफें उठाई हैं. मैं तो निकल आई पर वे दोनों अब भी… उन के दर्द की आंच हर पल झुलसाती है मुझे, पूर्वा भाभी. संघर्षों की आग में झोंकने के लिए एक और लड़की को मैं दुनिया में नहीं ला सकती.’

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सत्यकथा: प्रेमी का जोश, उड़ गया होश

—दिनेश बैजल ‘राज’  

सुबह करीब साढ़े 5 बजे मोबाइल की घंटी बजने पर सोनू की नींद खुल गई. उस ने फोन उठाया. दूसरी ओर से आगरा के नगला कली में रहने वाले बड़े भाई नरेश की पत्नी प्रमिता की आवाज सुनाई दी. उन की आवाज भर्राई हुई थी. रात को तुम्हारे घर भैया आए थे?

इस पर सोनू ने कहा, ‘‘भाभी मेरे यहां तो नहीं आए, पापा के पास आए हों तो पूछ कर बताता हूं.’’

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तभी सोनू ने अपने पिता सुरेशचंद्र को फोन कर भाई नरेश के रात को आने के बारे में पूछा. सुरेशचंद्र ने मना करते हुए कहा, ‘‘नरेश रात में यहां क्यों आएगा? वह यहां नहीं आया.’’

यह बात सोनू ने भाभी प्रमिता को बता दी कि भैया रात को पापा के यहां नहीं गए. इस पर प्रमिता ने सोनू को बताया, ‘‘तुम्हारे भैया ने रात को 2 रोटी खाईं, उन्होंने कहा कि सब्जी अच्छी बनाई है 2 रोटी और सेंक लो, तब तक मैं टहल कर आता हूं. यह कह कर वह रात साढ़े 10 बजे चले गए. सारी रात उन का इंतजार करती रही, लौट कर नहीं आए हैं. रात से उन का मोबाइल भी नहीं मिल रहा है. मुझे बहुत डर लग रहा है.’’

संजय ने भाभी को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘भाभी परेशान मत हो हम लोग आ रहे हैं.’’

सोनू ने यह बात पिता सुरेशचंद्र को बताई. इस के साथ ही भाई नरेश का मोबाइल नंबर मिलाया, लेकिन वह स्विच्ड औफ मिला. यह बात 8 जून, 2021 की है.

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रात से नरेश के घर नहीं लौटने की जानकारी होने पर घर के सभी लोग चिंतित हो गए. गोबर चौक निवासी सुरेशचंद्र अपनी पत्नी, बेटे सोनू व 2 पड़ोसियों को साथ ले कर वहां से 7 किलोमीटर दूर आगरा के नगला कली स्थित पुष्पांजलि होम्स, नरेश के घर जहां वह किराए पर रहता है, पहुंच गए.

सभी ने मिल कर आसपास नरेश की तलाश शुरू कर दी. वे उसे काफी देर तक इधरउधर खोजते रहे. लेकिन उस का कोई पता नहीं चला.

 

8 जून की सुबह साढ़े 7 बजे एनआरआई सिटी के खाली प्लौट से हो कर निकल रहे लोगों ने वहां एक बोरी पड़ी देखी. बोरी पर खून लगा था और उस के ऊपर मक्खियां भिनभिना रही थीं.  बोरी में लाश की आशंका होने पर किसी ने थाना ताजगंज पुलिस को सूचना दी.

कुछ ही देर में थानाप्रभारी उमेशचंद्र त्रिपाठी पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए.  उन्होंने बोरी को खुलवाया. बोरी खुलते ही उस में से एक युवक की लहूलुहान लाश निकली. लाश देखते ही सभी के होश उड़ गए.

युवक की उम्र लगभग 30-35 साल के बीच थी. लाश से लगभग 200 मीटर की दूरी पर दूसरी बोरी पड़ी थी, उस में खून से सनी चादर, तकिया व अन्य कपड़े मिले. लाश मिलने की खबर फैलते ही वहां भीड़ जुट गई.

पुलिस ने लाश का निरीक्षण किया तो पता चला कि सिर पर किसी भारी चीज से वार किया गया था. इस के अलावा शरीर पर भी कई जख्म थे. वहां मौजूद कई लोगों ने मृतक की पहचान जूता कारखाना मालिक नरेश कुमार, निवासी नगला कली स्थित पुष्पांजलि होम्स के रूप में की.

पुलिस ने सूचना नरेश के घर भिजवाई तो रोतेबिलखते उस के घर वाले प्लौट पर पहुंच गए. मृतक के पिता सुरेशचंद्र ने उस की शिनाख्त अपने 35 वर्षीय बेटे नरेश कुमार के रूप में की. मृतक के बच्चों को बुला कर पुलिस ने कपड़े दिखाए तो उन्होंने बताया कि चादर और तकिए उन्हीं के घर के हैं.

थानाप्रभारी ने घटना की गंभीरता को देखते हुए अपने अधिकारियों को सूचना दी. सूचना मिलने पर एसएसपी मुनिराज, एसपी (सिटी) रोहन प्रमोद बोत्रे और सीओ (सदर) राजीव कुमार भी वहां आ गए. उन्होंने गहनता से घटनास्थल का निरीक्षण किया. इस बीच फोरैंसिक टीम को बुला लिया गया.

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टीम ने घटनास्थल से साक्ष्य एकत्र किए. पुलिस ने घटनास्थल से चादर व अन्य कपड़े बरामद किए. जांचपड़ताल के बाद पुलिस ने शव को पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दिया.

पुलिस अधिकारियों ने मृतक के पिता व भाइयों से इस संबंध में पूछताछ की. नरेश की हत्या किन कारणों से की गई? पिता ने बताया कि नरेश की किसी से कोई रंजिश नहीं थी, नरेश का गोबर चौक में पार्टनरशिप में जूता कारखाना है. उस का काम भी अच्छा चल रहा था.

उस के परिवार में पत्नी प्रमिता, 12 वर्षीय बेटा सौम्या, 8 वर्षीय बेटी लाडो और 6 वर्षीय बेटा नन्हे है. नरेश परिवार के साथ किराए पर रहता है. पिता सुरेशचंद्र नरेश गोबर चौक में पुराने घर में रहते हैं. इस संबंध में पिता सुरेशचंद्र ने अज्ञात के खिलाफ बेटे की हत्या की रिपोर्ट थाना ताजगंज में भादंवि की धारा 302, 201 के अंतर्गत दर्ज कराई.

एसएसपी मुनिराज जी. ने घटना के खुलासे के लिए एसपी (सिटी) रोहन प्रमोद बोत्रे के नेतृत्व में गठित पुलिस टीम को लगाया. पुलिस टीम में थानाप्रभारी उमेशचंद्र त्रिपाठी, इंसपेक्टर नरेंद्र सिंह (प्रभारी सर्विलांस), एसआई मोहित सिंह, शैलेंद्र सिंह, महिला एसआई पूजा शर्मा, हैडकांस्टेबल विनीत व आदेश त्रिपाठी शामिल थे.

एनआरआई सिटी के खाली प्लौट जहां बोरी में नरेश का शव मिला था, वह स्थान मृतक के मकान के ठीक पीछे ही है. इस पर पुलिस व फोरैंसिक टीम जांच में जुट गई. मृतक के पुष्पांजलि होम्स स्थित घर जा कर जांच की. जांच के दौरान घर की छत पर खून मिला, वहां से भी साक्ष्य जुटाए गए.

पति की हत्या पर पत्नी प्रमिता का रोरो कर बुरा हाल था. पुलिस ने किसी तरह समझाबुझा कर उसे शांत कराया. पुलिस नरेश की हत्या में किसी करीबी व्यक्ति का हाथ होने की आशंका जता रही थी. पुलिस ने प्रमिता से पूरे घटनाक्रम की जानकारी ली.

प्रमिता ने पुलिस को बताया, 7 जून की रात लगभग 10 बजे उस ने पति नरेश को फोन कर घर आने को कहा था, उस ने बताया कि वह रोज ही उन्हें फोन करती थी. क्योंकि वह देर से घर आते थे. वह कारखाने से रात साढ़े 10 बजे घर आए थे. वह हमेशा की तरह खाना खा कर घर के बाहर टहलने चले गए थे.

वह शराब पीते थे. देर लगने पर सोचा सड़क तक टहलने निकल गए होंगे. घर में तीनों बच्चे व स्वयं थी. हम लोग कमरे में एसी चला कर टीवी देखते रहे. जब वह देर रात तक नहीं लौटे तो वाचमैन व बड़े बेटे सौम्या को साथ ले कर उन्हें इधरउधर तलाश किया. उन के न मिलने पर बाद में गोबर चौक स्थित ससुराल व सदर भट्टी स्थित मायके वालों को फोन कर बुलाया.

जांच के दौरान प्रमिता ने थानाप्रभारी उमेश चंद्र त्रिपाठी को बताया, ‘‘सर उन पर बहुत केस चल रहे हैं और उन के बहुत दुश्मन हैं.’’

खून घर की छत पर मिलने की बात पर उस ने कहा, ‘‘सर, इस बारे में मुझे कुछ नहीं पता, क्योंकि कमरे में एसी चल रहा था और दरवाजा बंद था.’’

पुलिस को प्रमिता की बातें गले नहीं उतर रही थीं. शव भी घर के पीछे दीवार के सहारे पड़ा मिला था. ऐसे में मृतक के घर वालों से पुलिस ने पूछताछ की. घटना के जल्द खुलासे के लिए नरेश की काल डिटेल्स भी निकालने की बात पुलिस ने कही. घर में सोमवार को कौनकौन आया, इस बारे में पत्नी और बच्चों से भी जानकारी ली गई.

घर की छत पर खून मिलने व लाश वाली बोरी घर के ठीक पीछे मिलने से साफ हो गया था कि नरेश की हत्या करने के बाद उस के शव को बोरी में भर कर छत से ही पीछे प्लौट में फेंका गया था. पुलिस को घटना के बाद से प्रमिता पर ही शक था.

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पोस्टमार्टम के बाद शव मृतक के पिता को सौंप दिया गया. शाम को ही नरेश की अंत्येष्टि कर दी गई.  इस सब से बेफिक्र पत्नी प्रमिता को अंत्येष्टि के बाद पुलिस ने आखिर मंगलवार की शाम को ही हिरासत में ले लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ शुरू की गई. वह रटीरटाई कहानी दोहराने लगी.

पुलिस ने जब प्रमिता को बताया, ‘‘हमें एक सीसीटीवी फुटेज मिली है, जिस में एक व्यक्ति दिखाई दे रहा है, जो रात में तुम्हारे घर पर आया था. वह कौन था? फिर छत पर खून कैसे आया और किस का है? चादर, तकिया तो तुम्हारे घर के ही हैं. जिन्हें तुम्हारे बच्चे ने पहचान लिया है.’’

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यह सुनते ही प्रमिता के होश उड़ गए. आवाज कंपकपाने लगी. पुलिस के आगे हथियार डालते हुए उस ने पति की हत्या का जुर्म कुबूल करते हुए पुलिस को बताया कि उसी ने अपने पति की हत्या की थी.

इस सनसनीखेज हत्याकांड के पीछे जो कहानी बताई, वह चौंकाने वाली थी—

सुरेशचंद्र के 6 बेटेबेटियों में नरेश दूसरे नंबर का था. नरेश से छोटे संजय व सोनू हैं. उत्तर प्रदेश की प्रेमनगरी के नाम से मशहूर शहर आगरा के गोबर चौक में नरेश के पिता व 2 भाई व एक अविवाहित बहन रहते हैं. 2008 में नरेश की शादी आगरा के मंटोला थाना के सदर भट्टी की रहने वाली प्रमिता के साथ हुई थी.

शादी से पहले नरेश भी गोबर चौक में रहता था. शादी के 6 माह बाद ही प्रमिता अपने पति के साथ अलग रहने लगी. घटना के समय नरेश का परिवार पुष्पांजलि होम्स में किराए पर रह रहा था.

2 साल पहले नरेश कुमार का विवाद मोहल्ले के ही एक व्यक्ति से हो गया था. उस दौरान थाना शिकोहाबाद के नगला केवल निवासी रविकांत राजपूत, जो आरएसएस का महानगर प्रचारक था, के एक परिचित ने इस मामले में नरेश की मदद कराई थी. रविकांत ने नरेश कुमार की मदद की. इसी के चलते रविकांत की नरेश से जानपहचान हो गई.

घर आनेजाने के दौरान नरेश की पत्नी प्रमिता और रविकांत का मिलनाजुलना शुरू हो गया, दोनों के बीच बातचीत भी होने लगी. हमउम्र होने से दोनों एकदूसरे के प्रति आकर्षित हो गए.

30 वर्षीय रविकांत अविवाहित था. घनिष्ठता बढ़ने पर दोनों के बीच दोस्ती हो गई और प्रेम संबंध हो गए. धीरेधीरे प्रमिता भी रविकांत के घर नगला केवल जाने लगी.

रविकांत ने अपने घर पर प्रमिता को मुंहबोली बहन बताया था. इस के चलते घर वाले भी प्रमिता के आनेजाने पर गौर नहीं करते थे. दोनों के बीच क्या खिचड़ी पक रही है, इस का पता रविकांत के घर वालों को नहीं चला. इस बीच दोनों एकदूसरे के काफी करीब आ गए.

नरेश को घटना से कुछ दिन पहले जब दोनों के प्रेम संबंधों की जानकारी हुई तो वह विरोध करने लगा. इसी बात को ले कर नरेश और प्रमिता के बीच झगड़ा होने लगा. वह बच्चों के सामने प्रमिता की बेइज्जती करने लगा.

इस पर प्रमिता ने ठान लिया कि वह प्रेमी रविकांत के साथ ही रहेगी. दोनों के प्यार के बीच पति रोड़ा बन रहा था. इसलिए उसे रास्ते से हटाने का तानाबाना प्रमिता ने बुना. उस ने प्रेमी रविकांत के साथ पति के कत्ल की खूनी साजिश रची.

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7 जून को रविकांत अपने गांव में था. योजना के अनुसार वह बाइक से आगरा के लिए शाम को अपने छोटे भाई शशिकांत के साथ निकला. अपने घर वालों को बताया कि दोस्त की बर्थडे पार्टी में जा रहे हैं, रात में वापस आ जाएंगे.

दोनों भाई योजना के अनुसार आगरा पहुंचे. नरेश के मकान के पास ही एक मकान अधबना खाली पड़ा था. दोनों भाइयों ने अपनी बाइक उस में खड़ी कर दी. इस के बाद दोनों भाई उस मकान से नरेश के मकान की छत पर आ गए. रविकांत ने अपना मोबाइल स्विच्ड औफ कर लिया. उस समय रात के साढ़े 10 बजे का समय था. नरेश खाना खा कर दूसरे कमरे में सोने चला गया था.

इस बीच प्रमिता ने तीनों बच्चों को कोल्ड डिं्रक दी और मोबाइल दिया. कमरे का टीवी चला दिया, बच्चे खुश हो गए. कमरे की बाहर से कुंडी लगा दी. पति ने शराब पी रखी थी, वह गहरी नींद में सो चुका था.

 

जब प्रमिता ने अच्छी तरह परख लिया कि पति गहरी नींद में हैं, तब उस ने शशिकांत के मोबाइल पर ओके का मैसेज भेजा. दोनों भाई मकान में नीचे आ गए. सो रहे नरेश के सिर पर ईंटों से तीनों ने ताबड़तोड़ प्रहार किए.

बिस्तर पर खून बिखर गया. सिर से बह रहे खून को देख कर प्रमिता ने सिर पर पौलीथिन की थैली लगा दी, जिस से खून न गिरे.

सिर पर किए गए प्रहार से नरेश ने पल भर में दम तोड़ दिया. इस के बाद तीनों ने मिल कर शव को बोरे में बंद किया. कमरे के फर्श पर बिखरे खून को चादर से प्रमिता ने पोंछने के बाद धो दिया.

शशिकांत की पैंट पर हत्या के दौरान मृतक का खून लग गया था. उस ने अपनी पैंट उतारने के बाद कमरे में टंगी नरेश की पैंट पहन ली. इस के बाद बोरे को उठा कर छत पर ले गए और पीछे प्लौट में फेंक दिया. खून से सने सभी कपड़े दूसरी बोरी में भर कर लाश से लगभग 200 मीटर दूर उसी प्लौट में फेंक दिए.

हत्या करने के बाद रविकांत और शशिकांत रात साढ़े 12 बजे ही चले गए. अंधेरा होने की वजह से छत पर पड़ा खून दिखाई नहीं दिया.

 

पति की हत्या से प्रमिता घबरा गई थी, जिस के कारण वह छत पर पड़े खून को साफ नहीं कर सकी थी. प्रमिता के मोबाइल में चैटिंग थी, हत्या के बाद उस ने सारी चैट डिलीट कर दी, जिस से पुलिस मोबाइल देखे तो पता नहीं चल सके.

रविकांत ने भी ऐसा ही किया. पुलिस ने हत्या में पुख्ता सबूत के लिए चैट को फोरैंसिक एक्सपर्ट की मदद से रिकवर कराने के लिए भेज दिया है.

प्रमिता से पूछताछ के बाद पुलिस टीम ने शेष हत्यारोपियों की गिरफ्तारी के लिए कई स्थानों पर दबिश डाली. मुखबिर की सूचना पर थानाप्रभारी उमेशचंद्र त्रिपाठी ने आरोपी प्रेमी रविकांत को आगरा में टीडीआई माल के पास से घटना में प्रयुक्त मोटरसाइकिल के साथ उसी दिन गिरफ्तार कर लिया. आरोपी की निशानदेही पर पुलिस ने आला कत्ल खून से सनी ईंटें भी बरामद कर लीं.

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9 जून को एसएसपी मुनिराज ने प्रैस कौन्फ्रैंस में घटना में शामिल 2 अभियुक्तों की गिरफ्तारी की जानकारी देते हुए सनसनीखेज घटना का खुलासा कर दिया.

पुलिस ने 9 जून, 2021 को दोनों को न्यायालय में पेश कर जेल भेज दिया. इस के बाद पुलिस ने हत्याकांड में शामिल तीसरे हत्यारोपी शशिकांत को भी 10 जून की रात को गिरफ्तार कर दूसरे दिन जेल भेज दिया.

प्रमिता ने 12 साल पहले जिस नरेश कुमार के साथ सात फेरे लिए, उसे ही अपने प्रेमी व उस के भाई के साथ मिल कर खूनी साजिश के तहत मौत की नींद सुला दिया. एक सीधासादा पति अपनी बेवफा पत्नी के अवैध संबंधों की भेंट चढ़ गया.

प्रमिता ने अपना बसाबसाया घर भी उजाड़ लिया. अब बच्चों को मांबाप का प्यार नहीं मिल सकेगा. फिलहाल तीनों बच्चों को दादादादी अपने साथ ले गए.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित

नया ठिकाना- भाग 3: क्या मेनका और रवि की शादी हुई?

रवि बोलने लगा, ‘‘आप लोग चिंता मत कीजिए. हम आप को 6,000 रुपए महीना भेजते रहेंगे. किसी तरह वहां का घरजमीन बेच कर मामा के गांव में ही जमीन ले लीजिए. अगर दिक्कत होगी, तो आप दोनो को यहां शहर भी ला सकते हैं.’’

‘नहीं बेटा, हम लोग यहीं रहेंगे. शहर में नहीं आएंगे.’

रवि 12,000 रुपए महीने पर सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करने लगा था. मेनका एक ब्यूटीपार्लर में रिसैप्शन पर 8,000 रुपए महीना पर काम करने लगी थी. दोनों के दिन खुशीखुशी बीत रहे थे.

इसी बीच कोरोना बीमारी की चर्चा होने लगी. आज प्रधानमंत्री का भाषण टैलीविजन पर आने वाला था. प्रधानमंत्री ने सभी लोगों को एक दिन के ‘जनता कर्फ्यू’ की कह कर घर पर बिठा दिया. 21 मार्च को शाम 5 बजे 5 मिनट तक अपने घर की छत से थाली और ताली बजाने को कहा गया.

देशभर के लोगों ने थाली और ताली, घंटी और शंख तक बजा दिए. प्रधानमंत्री सम झ गए कि वे जो बोलेंगे, जनता मानेगी. इस के बाद उन्होंने टैलीविजन पर बड़ा फैसला सुनाया कि अब देश में 21 दिन का लौकडाउन होगा और जो जहां है, वहीं रहेगा. सभी गाडि़यां, बस, ट्रेन और हवाईजहाज तक बंद रहेंगे. सिर्फ राशन और दवा की दुकानें खुली रहेंगी.

दूसरे दिन से हर जगह पर पुलिस प्रशासन मुस्तैद हो गया. किसी तरह बंद कमरे में 21 दिन बिताए, पर फिर 19 दिन का और लौकडाउन बढ़ा दिया गया. अब जितने भी काम करने वाले लोग थे, वे हर हाल में घर जाने का मन बनाने लगे. कंपनी के मालिक ने पैसा देना बंद कर दिया.

रवि और मेनका के अगलबगल के सारे लोग अपनेअपने घर के लिए निकल पड़े. संजय ने भी 1,200 रुपए में एक पुरानी साइकिल खरीद कर चलने का मन बना लिया.

रवि ने अपने मामा के पास फोन किया, तो मामा ने कहा, ‘यहां भूल कर भी मत आना. अगर लड़की वालों को मालूम हो गया तो तुम्हारे साथसाथ हम लोग भी मुश्किल में पड़ जाएंगे.’

आखिर मेनका और रवि जाएं तो जाएं कहां? मेनका पेट से थी. संजय दूसरे दिन साइकिल ले कर निकल गया था. पूरे मकान में सिर्फ रवि और मेनका ही बच गए थे. कोरोना के मरीज हर रोज बढ़ रहे थे. कुछ हो गया, तो कोई साथ नहीं देगा.

रवि ने भी एक साइकिल खरीद ली और मेनका को बोला, ‘‘चलो, हम लोग भी निकल चलें. चाहे जो भी हो, एक दिन तो सब को मरना ही है.’’

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रवि अपना सारा सामान मकान मालिक को 15,000 रुपए में बेच कर निकल पड़ा. रास्ते के लिए कुछ खाना बना लिया. 4 बजे भोर में रवि मेनका को साइकिल की पीछे वाली सीट पर बैठा कर चल पड़ा.

धीरेधीरे शाम हो गई थी. रवि को तेज प्यास लगी थी. सड़क के किनारे एक आलीशान मकान था. गेट के पास एक नल था. रवि रुक कर बोतल में पानी भर रहा था.

उस आलीशान मकान से गेट तक एक बुढि़या आई और पूछने लगी, ‘‘बेटा, तुम लोग कहां से आ रहे हो?’’

‘‘माताजी, हम लोग दिल्ली से आ रहे हैं और बिहार जाएंगे.’’

‘‘अरे, साइकिल से तुम लोग इतनी दूर जाओगे?’’

‘‘हां माताजी, क्या करें. जिस कंपनी में काम करते थे, वह बंद हो गई. मकान मालिक किराया मांगने लगा, तो सभी किराएदार निकल गए. हम लोग क्या करते?’’

‘‘अब रात में तुम लोग कहां रुकोगे?’’

‘‘माताजी, कहीं भी रुक जाएंगे.’’

‘‘अरे, तुम दोनों यहीं रुक जाओ. यहां मेरे घर में कोई नहीं रहता. एक हम हैं और एक खाना बनाने वाली नौकरानी. तुम लोग चिंता मत करो. तुम लोग जैसे मेरे भी बेटाबहू हैं, जो अमेरिका में रहते हैं. वहां दोनों डाक्टर हैं.’’

रवि ने हां कर दी. वह औरत उन  दोनों को घर में ले गई और नौकरानी को बोली, ‘‘2 लोगों का और खाना बना देना.’’

रवि बोला, ‘‘माताजी, हम लोगों के पास खाना है. आप ने रुकने के लिए जगह दे दी, यही बहुत है.’’

‘‘कोई बात नहीं. वह खाना तुम लोगों को रास्ते में काम आएगा.’’

‘‘अच्छा, ठीक है माताजी.’’

इस के बाद वे दोनों फ्रैश हुए. उस के बाद मेनका और बूढ़ी माताजी आपस में बातें करने लगीं.

बूढ़ी माताजी कहने लगीं, ‘‘मेरा भी एक ही बेटा है. वह अमेरिका में डाक्टर है. वहीं उस ने शादी कर ली. 10 साल के बाद पिछले साल जब वह यहां आया था, तब उस के पिताजी इस दुनिया में नहीं रहे थे.

‘‘मेरे पति आईएएस अफसर थे. बहुत अरमान से बेटे को डाक्टरी पढ़ाई थी. मु झे पैसे की कोई कमी नहीं है. 40,000 रुपए पैंशन मिलती है. जमीनजायदाद से साल में 5 लाख रुपए की आमदनी हो जाती है.’’

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खाना खा कर बात करतेकरते काफी रात बीत गई. सुबह जब रवि और मेनका उठे, तो दिन के 8 बज गए थे. नहानाधोना करतेकरते 9 बज गए थे. जब दोनों निकलने की तैयारी करने लगे, तो बूढ़ी माता ने कहा, ‘‘धूप बहुत हो गई है. अब तुम दोनों कल सुबह जल्दी निकलना.’’

दोनों आज भी वहीं रुक गए थे. मेनका नौकरानी के साथ खाना बनाने में मदद करने लगी थी.

बूढ़ी माता रात को अपना दुखदर्द सुनाते हुए रोने लगीं, ‘‘सिर्फ पैसे से ही खुशी नहीं मिलती. मेरे बेटे को शादी किए 10 साल हो गए हैं. मैं ने आज तक अपनी बहू को देखा तक नहीं. एक पोता भी हुआ है, पर उसे भी आज तक देखने का मौका नहीं मिला.’’

मेनका को लगा जैसे उसे नई मां मिल गई है. रात को उस ने बूढ़ी माताजी के पैर दबाए और तेल लगाया. बूढ़ी माताजी को आज असली सुख का एहसास होने लगा था.

सुबह जब रवि ने निकलने के लिए बोला, तो बूढ़ी माता जिद पर अड़ गईं, ‘‘तुम लोग हमेशा यहीं रहो न…’’

रवि और मेनका को भी नया ठिकाना मिल गया था और वे खुशीखुशी यहीं रहने लगे.

नया ठिकाना: क्या मेनका और रवि की शादी हुई?

नया ठिकाना- भाग 2: क्या मेनका और रवि की शादी हुई?

‘‘अरे बेटा, हमारी जिंदगी का कोई ठिकाना नहीं है. लड़की वाले भी बढि़या हैं. तुम्हारे मामा जब शादी के लिए लड़की वाले को ले कर आए हैं, तो उन की बात भी माननी चाहिए. बता रहे थे कि लड़की भी सुंदर और सुशील है. उस के मातापिता भी बहुत अच्छे हैं. इस तरह का परिवार दोबारा नहीं मिलेगा. लड़की भी मैट्रिक पास है. शादी में अच्छा पैसा भी देने के लिए तैयार हैं… और क्या चाहिए?’’

रवि उदास हो गया. उसे सम झ में नहीं आ रहा था कि पिताजी को क्या जवाब दे. वह उल झन में पड़ गया. एक तरफ मातापिता और दूसरी तरफ दिलोजान से चाहने वाली मेनका.

रवि मेनका के फोन का इंतजार करने लगा. अब तो मेनका ही कुछ उपाय निकाल सकती है.

रात 11 बजे मोबाइल की घंटी बजी. हैलोहाय होने के बाद मेनका ने पूछा, ‘आज गुमटी नहीं खोले थी?’

रवि बोला, ‘‘अरे, बहुत गड़बड़ हो गई है.’’

‘क्या हुआ?’

‘‘कुछ रिश्तेदार घर आए थे.’’

‘तुम्हारी शादी के लिए आए थे क्या?’

‘अरे हां, उसी के लिए आए थे. तुम्हें कैसे मालूम हुआ?’

‘मैं तुम्हारी एकएक चीज का पता करती रहती हूं.’

‘‘अच्छा छोड़ो, मु झे उपाय बताओ. इस से छुटकारा कैसे मिलेगा? मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकता हूं. मांबाबूजी शादी करने के लिए अड़े हुए हैं. सम झ में नहीं आ रहा है कि क्या करूं? तुम्हीं कुछ उपाय निकालो.’’

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मेनका बोली, ‘एक ही उपाय है. हम लोग यहां से दूसरी जगह किसी शहर में निकल जाएं.’

‘‘गुमटी का क्या करें?’’

‘बेच दो.’

‘‘बाहर क्या करेंगे?’’

‘वहां तुम कोई नौकरी ढूंढ़ लेना. मेरे लायक कुछ काम होगा, तो मैं भी कर लूंगी.’

‘‘लेकिन, यहां मांबाबूजी का क्या होगा?’’

‘रवि, तुम्हें हम दोनों में से एक को छोड़ना ही पड़ेगा. मांबाबूजी को छोड़ो या फिर मु झे.’

‘‘क्यों?’’

‘इसलिए कि मेरे मांपिताजी किसी भी शर्त पर तुम्हारे साथ मेरी शादी नहीं होने देंगे. इस की 2 वजहें हैं, पहली हम लोग अलगअलग जाति के हैं. दूसरी, मेरे मांपिताजी नौकरी करने वाले लड़के से मेरी शादी करना चाहते हैं.’

रवि बोलने लगा, ‘‘मेरे सामने तो सांपछछूंदर वाला हाल हो गया है. मांबाबूजी को भी छोड़ना मुश्किल लग रहा है और तुम्हारे बिना मैं जिंदा नहीं रह सकता.’’

मेनका बोली, ‘सभी लड़के तो बाहर जा कर काम कर ही रहे हैं. उन्होंने क्या अपने मांबाप को छोड़ दिया है? वहां से तुम अपने मांबाप के पास पैसे भेजते रहना. जब यह गुमटी बेचना तो कुछ पैसे मांबाबूजी को भी दे देना. मांबाबूजी को पहले से ही सम झा देना.’

‘‘अच्छा, ठीक है. इस पर विचार करते हैं,’’ रवि ने कहा.

रवि का एक दोस्त संजय दिल्ली में काम करता था. उस से मोबाइल पर बराबर बातें होती थीं. रवि और संजय दोनों पहली क्लास से मैट्रिक क्लास तक एकसाथ पढ़े थे. संजय मैट्रिक के बाद दिल्ली चला गया था और रवि ने पान की गुमटी खोल ली थी.

संजय की शादी भी हो गई थी. उस की पत्नी गांव में ही रहती थी. संजय साल में 1 या 2 बार गांव आता था.

अगले दिन रवि ने संजय को फोन किया, ‘‘यार संजय, मेरे लिए भी काम दिल्ली में खोज कर रखना. एक कमरा भी देख लेना.’’

संजय बोला, ‘मजाक मत कर.’

‘‘नहीं यार, मैं सीरियसली बोल रहा हूं. अब गुमटी भी पहले जैसी नहीं चल रही है. बहुत दिक्कत हो गई है. घर का खर्चा चलाना मुश्किल हो गया है. तुम मेरे लंगोटिया यार हो. मैं अपना दुखदर्द किस से कहूंगा?’’

संजय बोला, ‘मैं यहां एक कंपनी में सिक्योरिटी गार्ड की नौकरी करता हूं. तुम चाहोगे तो मैं तु झे ऐसी ही गार्ड की नौकरी दिलवा सकता हूं. हर महीने 10,000 रुपए मिलेंगे. ओवरटाइम करोगे, तो 12,000 रुपए तक हर महीने कमा लोगे.’

‘‘ठीक है. एक कमरा भी खोज लेना.’’

‘ठीक है, जब मन करे तब आ जाना,’ संजय ने कहा.

रवि गांव से शहर जाने का मन बनाने लगा. वह अपने मांबाबूजी से बोला, ‘‘मु झे शहर में अच्छा काम मिलने वाला है. एक साल कमाऊंगा तो यहां नया घर बना लूंगा. उस के बाद शादी करूंगा.’’

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यह सुन कर रवि के बाबूजी बोलने लगे, ‘‘हम लोग यहां तुम्हारे बिना कैसे रहेंगे?’’

‘‘मैं सब इंतजाम कर के जाऊंगा. वहां से पैसा भेजता रहूंगा. संजय बाहर रहता है, तो उस के मांबाबूजी यहां कौन सी दिक्कत में हैं? सब पैसा कमाते हैं. पैसा है तो सबकुछ है, नहीं तो कुछ भी नहीं है.’’

‘‘हां बेटा, वह तो है. तुम जो ठीक सम झो.’’

रवि ने 70,000 रुपए में सामान समेत गुमटी बेच दी और उन में से 30,000 रुपए अपने मांबाबूजी को दे दिए. बाकी अपने पास रख लिए. अब वह यहां से निकलने की प्लानिंग करने लगा.

उस ने मेनका को फोन किया. मेनका बोली, ‘आज मेरे पापा मामा के यहां जाने वाले हैं. मैं स्कूल जाने के बहाने घर से निकलूंगी और ठीक 10 बजे बसस्टैंड पर रहूंगी.’

दूसरे दिन दोनों ठीक 10 बजे बसस्टैंड पहुंच गए. बस से दोनों गया रेलवे स्टेशन पहुंचे और वहां से ट्रेन पकड़ कर दिल्ली पहुंच गए.

वहां रवि ने संजय को फोन किया. वह स्टेशन आ गया. रवि के साथ एक लड़की को देख कर संजय हैरान रह गया, पर कुछ पूछ नहीं सका.

वह उन दोनों को अपने कमरे पर ले गया. उस के बाद दोनों को फ्रैश होने के लिए बोला.

जब मेनका नहाने के लिए गई, तो संजय ने पूछा, ‘‘यह साथ में किस को ले कर आ गए हो? मु झे पहले कुछ बताया भी नहीं.’’

रवि ने सारी बात बता दी. संजय जहां पर रहता था, उसी मकान में एक कमरा था, जो हाल में ही खाली हुआ था. उसे रवि को  दिलवा दिया.

रवि और संजय दोनों बाजार से जा कर बिस्तर, गैस, चावल और जरूरत का दूसरा सामान खरीद कर ले आए. इस के बाद रवि और मेनका दोनों साथसाथ रहने लगे.

संजय ने जब अपने घर फोन किया तो उस की मां ने बताया कि रवि एक लड़की को ले कर भाग गया है. पंचायत ने रवि के मातापिता को गांव से निकल जाने का फैसला सुनाया है. मालूम हुआ है कि वे दोनों रवि के मामा के यहां चले गए हैं. रवि को ऐसा नहीं करना चाहिए था, लेकिन संजय ने अपनी मां को नहीं बताया कि रवि उसी के पास आया हुआ है.

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संजय ने रवि को सारी बातें बता दीं. रवि ने जब अपने मामा के यहां फोन किया, तो उस के मामा ने उसे बहुत भलाबुरा कहा.

रवि के पिताजी ने कहा, ‘अब हम लोग गांव में मुंह दिखाने लायक नहीं रहे. हम ने कभी सपने में भी नहीं  सोचा था कि तुम इस तरह का काम करोगे. लेकिन एक बात बता रहे हैं कि कभी भूल कर भी तुम लोग गांव नहीं लौटना, नहीं तो लड़की के मातापिता तुम दोनों की हत्या तक कर देंगे.’

नया ठिकाना- भाग 1: क्या मेनका और रवि की शादी हुई?

गुमटी चलाने वाले रवि की उम्र भी तकरीबन 20 साल होगी. वह भी गोरा, लंबा और हैंडसम था. इस के अलावा वह बहुत हंसमुख लड़का था. किसी भी ग्राहक से मुसकराते हुए बातें करता था. उस की दुकान अच्छी चलती थी.

हर उम्र के लोग रवि की गुमटी पर दिखते थे. बच्चे चौकलेट और चिप्स के लिए, बुजुर्ग पान के लिए, तो नौजवान बीड़ीसिगरेट के लिए, तो औरतें साबुन और शैंपू के लिए.

रवि की गुमटी एक बड़ी बस्ती में थी, जहां कई गांवों के लोग खरीदारी करने के लिए आते थे. इस बस्ती में एक हाईस्कूल था, जहां आसपास के कई गांवों के लड़केलड़कियां पढ़ने के लिए आते थे. इस स्कूल में इंटर क्लास तक की पढ़ाई होती थी. इस बस्ती में जरूरत की तकरीबन हर चीज मिल जाती थी.

रवि के पिता दमा की बीमारी से परेशान रहते थे. घर का सारा काम रवि की मां करती थीं. इस परिवार का सहारा यही गुमटी थी. सुबह 7 बजे से ले कर रात 9 बजे तक रवि इसी गुमटी में बैठ कर सामान बेचा करता था. उसे खाने और नाश्ता करने तक के लिए फुरसत नहीं मिलती थी.

रवि खुशमिजाज होने के साथसाथ दिलदार भी था. किसी के पास अगर पैसे नहीं होते थे तो वह उसे उधार सामान दे दिया करता था. ग्राहकों को चाचा, भैया, दीदी, चाची से ही संबोधित करता था.

स्कूल में सालाना जलसा मनाया जा रहा था. आज भी वह लड़की जींसटौप पहने रवि की गुमटी पर चिप्स और चौकलेट लेने आई थी. आज वह बला की खूबसूरत लग रही थी.

रवि ने मुसकराते हुए पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

लड़की ने हंसते हुए कहा, ‘‘नाम जान कर क्या करेंगे?’’

रवि ने कहा, ‘‘ऐसे ही पूछ लिया. माफ करना.’’

लड़की बोली, ‘‘इस में माफी मांगने की क्या बात है? मेरा नाम मेनका है. वैसे, आज हमारे स्कूल में कार्यक्रम है. आप भी देखने आइएगा.’’

‘‘तुम भी हिस्सा लोगी क्या?’’ रवि ने पूछा.

मेनका बोली, ‘‘हां, मैं भी डांस करूंगी.’’

रवि बोला, ‘‘कितने बजे से कार्यक्रम शुरू होगा?’’

‘‘यही तकरीबन 11 बजे से.’’

रवि बोला, ‘‘कोशिश करूंगा.’’

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मेनका बोली, ‘‘कोशिश नहीं जरूर आइएगा. नाटक, गीतसंगीत और डांस… एक से बढ़ कर एक कार्यक्रम होगा. पहली बार इस तरह का बड़ा कार्यक्रम रखा गया है. उद्घाटन करने के लिए विधायकजी आने वाले हैं.’’

‘‘अच्छा, ठीक है. जरूर आऊंगा.’’

रवि स्कूल में 10 बजे ही पहुंच गया. मंच पर परदा लगाने और दूसरे कामों में मदद करने लगा. रवि भी इसी स्कूल से मैट्रिक पास हुआ था. वह भी पढ़ने में होशियार था. मजबूरी में उस ने यह गुमटी खोली थी.

विधायकजी मंच पर आए. फूलमाला और बुके दे कर उन्हें सम्मानित किया गया. उन्होंने दीया जला कर मंच का उद्घाटन किया. अपने विधायक फंड से स्कूल के चारों तरफ से चारदीवारी बनवाने का आश्वासन दिया.

स्वागत गीत, नाटक, सामूहिक लोकगीत यानी एक से बढ़ कर एक रंगारंग सांस्कृतिक कार्यक्रम पेश किए गए. सब से आखिर में मेनका के डांस का ऐलान हुआ.

लहंगाचुनरी पहने जब मेनका ‘मैं नाचूं आज छमछम…’ गीत पर डांस करने लगी, तो वहां मौजूद लोग देखते रह गए. रवि तो उस का डांस देख कर बहुत ज्यादा खुश हो गया.

मेनका को डांस प्रतियोगिता में पहला पुरस्कार मिला. रवि के दिलोदिमाग पर मेनका का डांस घर कर गया था. उसे रातभर नींद नहीं आई.

दूसरे दिन सुबह 10 बजे मेनका फिर गुमटी पर चिप्स और चौकलेट लेने आई. रवि तो मन ही मन उस का इंतजार ही कर रहा था.

मेनका को देखते ही रवि बोलने लगा, ‘‘तुम ने क्या गजब का डांस किया. लोग तो तुम्हारी तारीफ करते नहीं थक रहे हैं. जिधर सुनो, उधर तुम्हारी ही चर्चा.’’

जब मेनका चिप्स और चौकलेट के पैसे देने लगी, तो रवि ने कहा, ‘‘यह मेरी तरफ से गिफ्ट है. हम गरीब आदमी और दे ही क्या सकते हैं?’’

मेनका कुछ नहीं बोली और चिप्स व चौकलेट इसलिए ले ली कि रवि के दिल को ठेस न पहुंचे.

वैसे, मेनका भी रवि के विचारों से प्रभावित हो गई थी. उस ने एक दिन रवि से उस का मोबाइल नंबर मांगा. रवि तो इस का इंतजार ही कर रहा था, लेकिन खुद मोबाइल नंबर मांगने में संकोच कर रहा था.

आज रवि बेहद खुश था. वह मेनका के फोन का इंतजार कर रहा था. जब भी उस का मोबाइल बजता तो दिल धड़कने लगता. पर जब देखता कि किसी दूसरे का फोन है तो उस का मन खीज उठता.

रवि रात का खाना खा कर अपने बिस्तर पर करवटें बदल रहा था. उसे नींद नहीं आ रही थी. ठीक रात 11 बजे उस का फोन बजा. उस ने जल्दी से फोन रिसीव किया, तो उधर से सुरीली आवाज आई, ‘सो गए क्या?’

रवि बोला, ‘‘तुम ने तो मेरी नींद ही गायब कर दी है. जिस दिन से मैं ने तुम्हारा डांस देखा है, उस दिन से मेरे दिमाग में वही घूमता रहता है. रात में नींद ही नहीं आती है.’’

यह सुन कर मेनका एक गाना गाने लगी, ‘मु झे नींद न आए, मु झे चैन न आए, कोई जाए जरा ढूंढ़ के लाए, न जाने कहां दिल खो गया…’

‘‘अरे मेनका, तुम तो गजब का गीत गाती हो. मैं तो सम झा था कि तुम सिर्फ डांस ही करती हो. कोयल से भी सुरीली आवाज है. इस तरह की सुरीली आवाज कम लोगों को ही मिलती है…’’

वे दोनों काफी समय तक इधरउधर की बहुत सारी बातें करते रहे. रवि को मेनका से यह भी जानकारी मिली कि उस के पिता सरकारी अस्पताल में कंपाउंडर हैं और मां सरकारी स्कूल में टीचर हैं. बातें करतेकरते पता ही नहीं चला और भोर के 4 बजे गए.

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मेनका बोली, ‘अब कल रात को बात करेंगे.’

रवि ने हां बोला और सुबह की सैर के लिए बाहर चला गया.

चायनाश्ता कर के रवि समय पर अपनी गुमटी पर हाजिर हो गया. उस के दिमाग से अब मेनका का चेहरा उतर ही नहीं रहा था.

ठीक 10 बजे मेनका आई और मुसकराते हुए चिप्स और चौकलेट ली. आंखों से इशारा किया, पैसे दिए और चलने लगी.

रवि पैसे नहीं लेना चाहता था, लेकिन वहां कई लोग खड़े थे, इसलिए वह पैसे लेने से इनकार नहीं कर सका.

मेनका अब हर रात रवि को फोन करती थी. छुट्टी का दिन छोड़ कर वह जब भी स्कूल आती, गुमटी पर जरूर आती. चिप्स और चौकलेट के बहाने रवि को नजर भर देखती और चली जाती.

रवि की शादी का रिश्ता आया था. रवि के पिताजी ने उस से कहा, ‘‘मेरी तबीयत ठीक नहीं रहती है. तुम्हारी मां भी काम करतेकरते परेशान हो जाती है. जीतेजी अगर अपनी बहू देख लेते तो…’’

‘‘पिताजी, इस गुमटी से 3 लोगों का ही पेट पालना मुश्किल होता है. किसी तरह घर में 2 कमरे बन जाते, तब शादी कर लेता,’’ रवि ने कहा.

शक की सुई और हत्या

जिस तरह अपराध की जड़ -“जर जोरू और जमीन” को माना गया है उसी तरह पति पत्नी के बीच हत्या का एक महत्वपूर्ण कारक शक भी है जिसके कारण जाने कितने लोगों की जान चली जाती है.

आमतौर पर महिलाएं ही पति के शक्की स्वभाव के कारण मार डाली जाती है, और शायद इसीलिए कहा भी गया है कि शक का इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीं है. मगर यह भी सच है कि सत्य कारण अपने खून रंगे हाथों के साथ पति जेल की चक्की पिसता है और जिंदगी भर पछताना पड़ता  है.

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ऐसा ही एक घटनाक्रम छत्तीसगढ़ के जांजगीर चांपा जिले में घटित हुआ जहां एक पति ने पत्नी को से इसलिए मौत के घाट उतरवा दिया क्योंकि उसे शक था कि पत्नी के किसी से अवैध संबंध है.  बलौदा थाना क्षेत्र के छाता जंगल में विगत 15 जून की रात नाटकीय घटनाक्रम घटित हुआ था, कथित रूप से लुटेरों ने कार में सवार एक जोड़े को लूट कर महिला की हत्या कर दी. जैसे-जैसे जांच आगे बढ़ी तो सच्चाई सामने आती चली गई अब‌ पुलिस का खुलासा है कि इस मामले में मृतका का पति मुख्य आरोपी है. मृतक दीप्ति सोनी के पति देवेंद्र सोनी ने दो अन्य साथियों के साथ मिलकर  अपनी पत्नी को लूटकर मारने की घटना को अंजाम दिया था.

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चरित्र संशय से जिंदगी तबाह

पति देवेंद्र को जब पत्नी  दीप्ति यह  शक हुआ कि उसके किसी गैर मर्द से संबंध है तो नित्य प्रतिदिन घर में वाद विवाद होने लगा परिस्थिति इस मोड़ पर आ पहुंची की एक दिन दीप्ति की हत्या अपने घरेलू नौकर के साथ मिलकर करवा दी.

घटना कारित करने के पश्चात पति ने थाने में रिपोर्ट दर्ज करायी थी कि उसकी पत्नी को लुटेरों ने लूट कर मार डाला है.

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दरअसल, बिलासपुर की रहने वाली दीप्ति सोनी का विवाह  बिलासपुर के देवेंद्र सोनी से हुआ था. जिले  की महिला पुलिस अधीक्षक पारुल माथुर ने हमारे संवाददाता को बताया कि विवाह के कुछ साल बाद चरित्र संशय को लेकर दोनों के बीच पारिवारिक झगड़ा शुरू हो गया था. इसके बाद दीप्ति सोनी के पति देवेंद्र सोनी ने  दीप्ति की मां को आने-जाने से रोक दिया था और पत्नी पर शक के चलते देवेंद्र सोनी ने उनकी पत्नी की हत्या की साजिश रचकर उनकी हत्या करा दी. उसने दो लोगों को पैसा का लालच देकर  सहयोगी  बनाया.

कुल जमा आरोपी पति ने अपनी पत्नी के चरित्र पर शक की आग में जलकर अपनी पत्नी की हत्या कर खुद को और अपने दो साथियों को हत्यारा बना लिया . बलौदा पुलिस टीम ने इस पूर्व नियोजित लूट व हत्या के मास्टरमाइंड आरोपी पति देवेंद्र सोनी, उसके साथी प्रदीप सोनी व उसकी पत्नी शालू सोनी को गिरफ्तार कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया है.

एक बार फिर से : लॉकडाउन के बाद कैसे एक बार फिर क़रीब आए प्रिया और प्रकाश

“हैलो कैसी हो प्रिया ?”

मेरी आवाज में बीते दिनों की कसैली यादों से उपजी नाराजगी के साथसाथ प्रिया के लिए फिक्र भी झलक रही थी. सालों तक खुद को रोकने के बाद आज आखिर मैं ने प्रिया को फोन कर ही लिया था.

दूसरी तरफ से प्रिया ने सिर्फ इतना ही कहा,” ठीक ही हूं प्रकाश.”

हमेशा की तरह हमदोनों के बीच एक अनकही खामोशी पसर गई. मैं ने ही बात आगे बढ़ाई, “सब कैसा चल रहा है ?”

” बस ठीक ही चल रहा है .”

एक बार फिर से खामोशी पसर गई थी.

“तुम मुझ से बात करना नहीं चाहती हो तो बता दो?”

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“ऐसा मैं ने कब कहा? तुम ने फोन किया है तो तुम बात करो. मैं जवाब दे रही हूं न .”

“हां जवाब दे कर अहसान तो कर ही रही हो मुझ पर.” मेरा धैर्य जवाब देने लगा था.

“हां प्रकाश, अहसान ही कर रही हूं. वरना जिस तरह तुम ने मुझे बीच रास्ते छोड़ दिया था उस के बाद तो तुम्हारी आवाज से भी चिढ़ हो जाना स्वाभाविक ही है .”

“चिढ़ तो मुझे भी तुम्हारी बहुत सी बातों से है प्रिया, मगर मैं कह नहीं रहा. और हां, यह जो तुम मुझ पर इल्जाम लगा रही हो न कि मैं ने तुम्हें बीच रास्ते छोड़ दिया तो याद रखना, पहले इल्जाम तुमने लगाए थे मुझ पर. तुम ने कहा था कि मैं अपनी ऑफिस कुलीग के साथ…. जब कि तुम जानती हो यह सच नहीं था. ”

“सच क्या है और झूठ क्या इन बातों की चर्चा न ही करो तो अच्छा है. वरना तुम्हारे ऐसेऐसे चिट्ठे खोल सकती हूं जिन्हें मैं ने कभी कोर्ट में भी नहीं कहा.”

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“कैसे चिट्ठों की बात कर रही हो? कहना क्या चाहती हो?”

“वही जो शायद तुम्हें याद भी न हो. याद करो वह रात जब मुझे अधूरा छोड़ कर तुम अपनी प्रेयसी के एक फोन पर दौड़े चले गए थे. यह भी परवाह नहीं की कि इस तरह मेरे प्यार का तिरस्कार कर तुम्हारा जाना मुझे कितना तोड़ देगा.”

“मैं गया था यह सच है मगर अपनी प्रेयसी के फोन पर नहीं बल्कि उस की मां की कॉल पर. तुम्हें मालूम भी है कि उस दिन अनु की तबीयत खराब थी. उस का भाई भी शहर में नहीं था. तभी तो उस की मां ने मुझे बुला लिया. जानकारी के लिए बता दूं कि मैं वहां मस्ती करने नहीं गया था. अनु को तुरंत अस्पताल ले कर भागा था.”

“हां पूरी दुनिया में अनु के लिए एक तुम ही तो थे. यदि उस का भाई नहीं था तो मैं पूछती हूं ऑफिस के बाकी लोग मर गए थे क्या ? उस के पड़ोस में कोई नहीं था क्या?

“ये बेकार की बातें जिन पर हजारों बार बहस हो चुकी है इन्हें फिर से क्यों निकाल रही हो? तुम जानती हो न वह मेरी दोस्त है .”

“मिस्टर प्रकाश बात दरअसल प्राथमिकता की होती है. तुम्हारी जिंदगी में अपनी बीवी से ज्यादा अहमियत दोस्त की है. बीवी को तो कभी अहमियत दी ही नहीं तुम ने. कभी तुम्हारी मां तुम्हारी प्राथमिकता बन जाती हैं, कभी दोस्त और कभी तुम्हारी बहन जिस ने खुद तो शादी की नहीं लेकिन मेरी गृहस्थी में आग लगाने जरूर आ जाती है.”

“खबरदार प्रिया जो फिर से मेरी बहन को ताने देने शुरू किए तो. तुम्हें पता है न कि वह एक डॉक्टर है और डॉक्टर का दायित्व बहुत अच्छी तरह निभा रही है. शादी करे न करे तुम्हें कमेंट करने का कोई हक नहीं.”

“हां हां मुझे कभी कोई हक दिया ही कहां था तुम ने. न कभी पत्नी का हक दिया और न बहू का. बस घर के काम करते रहो और घुटघुट कर जीते रहो. मेरी जिंदगी की कैसी दुर्गति बना दी तुम ने…”

कहतेकहते प्रिया रोने लगी थी. एक बार फिर से दोनों के बीच खामोशी पसर गई थी.

“प्रिया रो कर क्या जताना चाहती हो? तुम्हें दर्द मिले हैं तो क्या मैं खुश हूं? देख लो इतने बड़े घर में अकेला बैठा हुआ हूं. तुम्हारे पास तो हमारी दोनों बच्चियां हैं मगर मेरे पास वे भी नहीं हैं.” मेरी आवाज में दर्द उभर आया था.

“लेकिन मैं ने तुम्हें कभी बच्चों से मिलने से  रोका तो नहीं न.” प्रिया ने सफाई दी.

“हां तुम ने कभी रोका नहीं और दोनों मुझ से मिलने आ भी जाती थीं. मगर अब लॉकडाउन के चक्कर में उन का चेहरा देखे भी कितने दिन बीत गए.”

चाय बनाते हुए मैं ने माहौल को हल्का करने के गरज से प्रिया को सुनाया, “कामवाली भी नहीं आ रही. बर्तनकपड़े धोना, झाड़ूपोछा लगाना यह सब तो आराम से कर लेता हूं. मगर खाना बनाना मुश्किल हो जाता है. तुम जानती हो न खाना बनाना नहीं जानता मैं. एक चाय और मैगी के सिवा कुछ भी बनाना नहीं आता मुझे. तभी तो ख़ाना बनाने वाली रखी हुई थी. अब हालात ये हैं कि एक तरफ पतीले में चावल चढ़ाता हूं और दूसरी तरफ अपनी गुड़िया से फोन पर सीखसीख कर दाल चढ़ा लेता हूं. सुबह मैगी, दोपहर में दालचावल और रात में फिर से मैगी. यही खुराक खा कर गुजारा कर रहा हूं. ऊपर से आलम यह है कि कभी चावल जल जाते हैं तो कभी दाल कच्ची रह जाती है. ऐसे में तीनों वक्त मेगी का ही सहारा रह जाता है.”

मेरी बातें सुन कर अचानक ही प्रिया खिलखिला कर हंस पड़ी.

“कितनी दफा कहा था तुम्हें कि कुछ किचन का काम भी सीख लो पर नहीं. उस वक्त तो मियां जी के भाव ही अलग थे. अब भोगो. मुझे क्या सुना रहे हो?”

मैं ने अपनी बात जारी रखी,” लॉकडाउन से पहले तो गुड़िया और मिनी को मुझ पर तरस आ जाता था. मेरे पीछे से डुप्लीकेट चाबी से घर में घुस कर हलवा, खीर, कढ़ी जैसी स्वादिष्ट चीजें रख जाया करती थीं. मगर अब केवल व्हाट्सएप पर ही इन चीजों का दर्शन कराती हैं.”

“वैसे तुम्हें बता दूं कि तुम्हारे घर हलवापूरी, खीर वगैरह मैं ही भिजवाती थी. तरस मुझे भी आता है तुम पर.”

“सच प्रिया?”

एक बार फिर हमारे बीच खामोशी की पतली चादर बिछ गई .दोनों की आंखें नम हो रही थीं.

“वैसे सोचने बैठती हूं तो कभीकभी तुम्हारी बहुत सी बातें याद भी आती हैं. तुम्हारा सरप्राइज़ देने का अंदाज, तुम्हारा बच्चों की तरह जिद करना, मचलना, तुम्हारा रात में देर से आना और अपनी बाहों में भर कर सॉरी कहना, तुम्हारा वह मदमस्त सा प्यार, तुम्हारा मुस्कुराना… पर क्या फायदा ? सब खत्म हो गया. तुम ने सब खत्म कर दिया.”

“खत्म मैं ने नहीं तुम ने किया है प्रिया. मैं तो सब कुछ सहेजना चाहता था मगर तुम्हारी शक की कोई दवा नहीं थी. मेरे साथ हर बात पर झगड़ने लगी थी तुम.” मैं ने अपनी बात रखी.

“झगड़े और शक की बात छोड़ो, जिस तरह छोटीछोटी बातों पर तुम मेरे घर वालों तक पहुंच जाते थे, उन की इज्जत की धज्जियां उड़ा देते थे, क्या वह सही था? कोर्ट में भी जिस तरह के आरोप तुम ने मुझ पर लगाए, क्या वे सब सही थे ?”

“सहीगलत सोच कर क्या करना है? बस अपना ख्याल रखो. कहीं न कहीं अभी मैं तुम्हारी खुशियों और सुंदर भविष्य की कामना करता हूं क्यों कि मेरे बच्चों की जिंदगी तुम से जुड़ी हुई है और फिर देखो न तुम से मिले हुए इतने साल हो गए . तलाक के लिए कोर्टकचहरी के चक्कर लगाने में भी हम ने बहुत समय लगाया. मगर आजकल मुझे अजीब सी बेचैनी होने लगी है . तलाक के उन सालों का समय इतना बड़ा नहीं लगा था जितने बड़े लॉकडाउन के ये कुछ दिन लग रहे हैं. दिल कर रहा है कि लौकडाउन के बाद सब से पहले तुम्हें देखूं. पता नहीं क्यों सब कुछ खत्म होने के बाद भी दिल में ऐसी इच्छा क्यों हो रही है.” मैं ने कहा तो प्रिया ने भी अपने दिल का हाल सुनाया.

“कुछ ऐसी ही हालत मेरी भी है प्रकाश. हम दोनों ने कोर्ट में एकदूसरे के खिलाफ कितने जहर उगले. कितने इल्जाम लगाए. मगर कहीं न कहीं मेरा दिल भी तुम से उसी तरह मिलने की आस लगाए बैठा है जैसा झगड़ों के पहले मिला करते थे.”

“मेरा वश चलता तो अपनी जिंदगी की किताब से पुराने झगड़े वाले, तलाक वाले और नोटिस मिलने से ले कर कोर्ट की चक्करबाजी वाले दिन पूरी तरह मिटा देता. केवल वे ही खूबसूरत दिन हमारी जिंदगी में होते जब दोनों बच्चियों के जन्म के बाद हमारे दामन में दुनिया की सारी खुशियां सिमट आई थी.”

“प्रकाश मैं कोशिश करूंगी एक बार फिर से तुम्हारा यह सपना पूरा हो जाए और हम एकदूसरे को देख कर मुंह फेरने के बजाए गले लग जाएं. चलो मैं फोन रखती हूं. तब तक तुम अपनी मैगी बना कर खा लो.”

प्रिया की यह बात सुन कर मैं हंस पड़ा था. दिल में आशा की एक नई किरण चमकी थी. फोन रख कर मैं सुकून से प्रिया की मीठी यादों में खो गया.

सत्यकथा: पैसे वालों का खेल, पत्नियों की अदला बदली

कोट्टायम (केरल)

नए साल में दूसरे रविवार का दिन था. तारीख थी 9 जनवरी. कोट्टायम जिले के करुक्चल थाने में करीब 30 वर्षीया रमन्ना (बदला हुआ नाम) सुबहसुबह अपने पति के खिलाफ शिकायत दर्ज करवाने आई थी.

उस ने थानाप्रभारी से कहा, ‘‘साहब, मुझे पति के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज करानी है.’’ यह सुनते ही चाय पीते हुए थानाप्रभारी झल्ला गए.

उन्होंने समझा कि कोई घरेलू हिंसा या दहेज आदि का मसला होगा. महिला की आगे की बातें सुनने के बजाय उन्होंने उसे डपट दिया, ‘‘जाओ, घर जाओ और पति या घर के किसी सदस्य को साथ ले कर आना. सुबहसुबह पति से झगड़ कर आ गई हो. समझा दूंगा उसे…’’

रमन्ना वहीं खड़ीखड़ी थानाप्रभारी को चाय पीते देखती रही. थानाप्रभारी फिर बोले, ‘‘समझदार दिखती हो. पढ़ीलिखी भी लगती हो. घरेलू झगड़े को क्यों बाजार में लाना चाहती हो?’’

‘‘साहबजी, आप जो समझ रहे हैं, बात वह नहीं है. किसी लेडी पुलिस से मेरी शिकायत लिखवा दीजिए. ‘भार्या माट्टल’ की शिकायत है.’’

रमन्ना की गंभीरता भरी बातों के साथ मलयाली शब्द भार्या माट्टल सुन कर थानाप्रभारी चौंक गए. इन शब्दों का अर्थ था बीवियों की अदलाबदली. दरअसल, ये 2 शब्द पुलिस के लिए अपराध की गतिविधियों में शामिल थे. भार्या माट्टल यानी वाइफ स्वैपिंग या बीवियों की अदलाबदली.

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उन्होंने महिला को सामने की कुरसी पर बैठने को कहा. उस के बैठने पर पूछा, ‘‘चाय पियोगी, मंगवाऊं?’’

‘‘हां,’’ कहते हुए सिर हिला दिया.

थानाप्रभारी ने कांस्टेबल को आवाज लगाई, ‘‘अरे, सुनो जरा एक कप चाय और लाना. और हां, एसआई मैडम को भी डायरी ले कर बुला लाना.’’

थोड़ी देर में एक लेडी पुलिस सबइंसपेक्टर थानाप्रभारी के पास आ चुकी थीं. चाय की एक प्याली भी महिला के सामने रखी थी. थानाप्रभारी ने उसे पीने के लिए इशारा किया और लेडी एसआई को उस की शिकायत लिखने को कहा. फिर वह कुरसी से उठ खड़े हुए. जातेजाते पूछा, ‘‘तुम्हारा नाम क्या है?’’

‘‘रमन्ना.’’

‘‘टाइटल क्या है?’’

‘‘नायर…रमन्ना नायर.’’

‘‘ठीक है, तुम आराम से चाय पियो और मैडम को पूरी बात बताओ,’’ यह कह कर थानाप्रभारी वहां से चले गए.

थोड़ी देर बाद थानाप्रभारी, लेडी एसआई और दूसरे पुलिसकर्मियों की मीटिंग हुई. तब तक रमन्ना थाने में ही ठहरी रही.

रमन्ना ने जो बात महिला एसआई को बताई थी, वह बड़ी गंभीर थी. सुन कर थानाप्रभारी भी आश्चर्यचकित हो गए थे कि क्या एक पति ऐसा भी कर सकता है.

उन्होंने यह जानकारी डीएसपी (कांगनचेरी) आर. श्रीकुमार को दी तो डीएसपी ने इस मामले में उचित काररवाई करने के निर्देश दिए. थानाप्रभारी ने आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए एक पुलिस टीम बनाई. आरोपियों की गिरफ्तारियां भी जरूरी थी, ताकि मामले की तह तक पहुंचा जा सके.

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मामला बेहद संवेदनशील था. संभ्रांत व्यक्तियों के चरित्र हनन, निजी संबंधों के साथसाथ पार्टनर एक्सचेंज रैकेट के अलावा अननेचुरल सैक्स से भी जुड़ा हुआ था. इसी शिकायत में मैरिटल रेप भी शामिल था.

उल्लेखनीय है कि इस से पहले केरल के कायमकुलम में भी साल 2019 में ऐसा ही मामला सामने आ चुका था. उन दिनों कायमकुलम से 4 लोगों की गिरफ्तारी भी हुई थी. उस वक्त भी गिरफ्तार लोगों में से एक की पत्नी ने ही शिकायत दर्ज करवाई थी कि उसे पति ने ही 2 लोगों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर किया था. पति ने उसे दूसरे अजनबियों के साथ सोने के लिए दबाव बनाया था.

रमन्ना द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत भी काफी चौंकाने वाली थी. उस ने पति के खिलाफ शिकायत लिखवाई थी कि वह पति के दबाव में आ कर दूसरे मर्दों के साथ सोने को विवश हो गई थी, जबकि पति के साथ प्रेम विवाह हुआ था.

शिकायत में यह भी कहा कि उस के साथ अप्राकृतिक सैक्स भी किया गया. एक समय में 3 मर्दों के साथ हमबिस्तर होना पड़ा. इसे अनैतिक यौनाचार की भाषा में गु्रप सैक्स कहना ज्यादा सही होगा.

इस तरह से वह पति के अतिरिक्त कुल 9 अलगअलग मर्दों के सैक्स की सामग्री बन चुकी थी. वे सारे मर्द उस के पति के दोस्त थे. रमन्ना ने साफ लहजे में कहा कि पति को इस के बदले में पैसे मिले थे.

कोट्टायम जिले की पुलिस ने मामले को काफी गंभीरता से लेते हुए तुरंत छापेमारी की योजना बनाई और देखते ही देखते 7 लोगों को धर दबोचा. उस के बाद जो बड़े पैमाने पर सैक्स रैकेट का भंडाफोड़ हुआ, वह काफी सनसनीखेज और चौंकाने वाला था. उस की पूरे देश में चर्चा होने लगी.

एक के बाद एक हुई गिरफ्तारियों के बाद एक बड़े सैक्स रैकेट का परदाफाश हुआ, जो सोशल साइट के विभिन्न प्लेटफार्मों के जरिए पतियों के ग्रुप द्वारा चलाए जा रहे थे.

रिपोर्ट के मुताबिक करुक्चल में 7 लोगों को बीवियों की अदलाबदली के आरोप में 9 जनवरी को गिरफ्तार कर लिया गया था. उन में रमन्ना का पति भी था. गिरफ्तार किए गए लोग केरल के अलाप्पुझा, कोट्टायम और एर्नाकुलम के रहने वाले हैं.

रिपोर्ट के मुताबिक इस रैकेट में बाकायदा वाट्सऐप पर ग्रुप बनाए गए थे, जिस से सैकड़ों लोग जुड़े हुए थे. इसी ग्रुप में आगे की योजना बनाई जाती थी. हैरानी की बात यह भी थी कि इस ग्रुप में केरल के एलीट क्लास के कई लोग भी शामिल थे.

इस पूरे मामले की तहकीकात के बाद चांगनचेरी के डिप्टी एसपी आर. श्रीकुमार ने बताया कि पहले तो वे इन ग्रुप्स में शामिल हो कर एकदूसरे से मिलते थे. बाद में निर्धारित ठिकाने पर सैक्स के लिए जुटते थे. इस के पीछे एक बड़ा रैकेट है. इस में कई और दूसरे लोगों की तलाश भी की जा रही है.

पुलिस के अनुसार महिलाओं सहित भले ही कुछ समान विचारधारा वाले हों, लेकिन कुछ महिलाओं को उन के पतियों ने इस में जबरदस्ती शामिल कर रखा था. गिरफ्तार लोगों ने पूछताछ में बताया कि वे पहले टेलीग्राम और दूसरे मैसेंजर ग्रुप्स में शामिल होते हैं, और फिर 2 या 3 कपल आपस में मुलाकात करते हैं. इस के बाद महिलाओं की अदलाबदली होती है.

इन गिरफ्तारियों के बाद पुलिस ने ‘पार्टनर एक्सचेंज रैकट’ की तह में जा कर पता लगाया. पुलिस ने तहकीकात की तो पता चला कि ‘पार्टनर एक्सचेंज रैकेट’ के नेटवर्क का मुख्य आधार टेलीग्राम और मैसेंजर ऐप था, जिस में एक गिरोह के 1000 से अधिक कपल बताए जा रहे हैं. उन के द्वारा सैक्स के लिए बड़े स्तर पर महिलाओं की अदलाबदली की जा रही थी.

इस रैकेट में पैसों का भी औनलाइन लेनदेन होता है. कई लोग पैसों के लिए अपनी पत्नियों को सिंगल पुरुषों के साथ यौन संबंध बनाने के लिए मजबूर करते हैं, जबकि इस सैक्स में 2-3 पुरुष ही होते हैं.

पुलिस को जांच में पता चला कि इस रैकेट में राज्य के हर हिस्से के लोग शामिल थे, जिन में अधिकतर सदस्य धनवान और सुखीसंपन्न थे.

सवाल सामान्य लोगों के जेहन में उठता रहता है कि पत्नियों की अदलाबदली क्यों और कैसे? वाइफ स्वैपिंग का एक पुराना इतिहास बहुपत्नी प्रथा के जमाने से रहा है. किंतु इस ने नए रूपरंग में 80-90 के दशक में एक यौन आनंद के तौर पर पैर पसारना शुरू कर दिया था.

हालांकि इस में संभ्रांत किस्म के कपल ही शामिल हुए. इस के लिए उन्होंने बाकायदा पार्टियों का सहारा लिया. केरल का मामला भी बीवियों की अदलाबदली का ही है, लेकिन इसे पतियों ने कमाई का धंधा बना दिया, जिस में बीवी के नाम पर दूसरी सैक्स वर्कर को भी शामिल कर लिया गया था.

केरल की शिकायतकर्ता महिला रमन्ना की लव मैरिज हुई थी. खुशहाल जिंदगी गुजर रही थी. 2 बच्चे भी हुए. सब कुछ अच्छा चल रहा था. इस बीच पति की गल्फ में नौकरी लगी और वह विदेश चला गया. वहां पति को वाइफ स्वैपिंग के बारे में पता लगा.

जब वापस केरल लौटा तब उस ने इस बारे में अपनी पत्नी को बताया. पत्नी ने इनकार कर दिया, लेकिन पति नहीं माना. उस ने काफी मना किया कि वह किसी और के साथ सैक्स नहीं करेगी, लेकिन पति के दबाव में आ कर ऐसा करने को राजी हो गई. पति द्वारा खुद को मारने की धमकी के इमोशनल ब्लैकमेलिंग के चलते न चाहते हुए भी मान गई.

उस के बाद से पति के दोस्तों के साथ सैक्स करने का सिलसिला शुरू हो गया. इस खेल के शुरू होते ही पति ने उसे डराधमका कर इसे कारोबार बना लिया. विरोध करने पर पति दूसरों के साथ किए गए उस के सैक्स वीडियो परिवार को दिखाने की धमकी दे दी.

एक रोज पानी सिर से ऊपर तब चला गया, जब पति ने एक साथ 3 पुरुषों के साथ सैक्स करने के लिए भेज दिया. अप्राकृतिक सैक्स की पीड़ा से उस का शरीर जितना जख्मी हुआ, उस से कहीं अधिक उस का अंतरमन पीडि़त हो गया. और उस ने पति के खिलाफ पुलिस में शिकायत दर्ज करवा दी.

रमन्ना ने यह भी बताया कि उस जैसी कई पत्नियों को उन की इच्छा के विरुद्ध ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया, जो आत्महत्या कर सकती हैं. यहां तक कि उन पर ऐसा करने के लिए जबरन दबाव बनाया जाता है.

इस स्तर पर जांच में पुलिस ने भी पाया कि डाक्टरों और वकीलों के अलावा कई पेशेवर इन सोशल मीडिया ग्रुप में शामिल थे और उन्होंने अपनी फरजी पहचान बना रखी थी.

इन में से कई ग्रुप में 5,000 से अधिक सदस्य शामिल थे, जहां से ग्राहक मिलते थे. सभी फेक अकाउंट के साथ जुड़े हुए थे. इन में सिंगल लोगों को दूसरे सदस्यों की पत्नियों को शेयर करने के लिए मोटी रकम देनी पड़ती थी.

केरल के लिए वाइफ स्वैपिंग का मामला कोई नया नहीं है. इस के पहले भी साल 2013 में नेवी अफसरों की पत्नियों की अदलाबदली के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सीबीआई जांच के आदेश दिए थे.

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यह घटना साल 2012 की है, जब एक लेफ्टिनेंट की पत्नी ने पति और सीनियर अफसर पर सैक्सुअल-मेंटल हैरेसमेंट और वाइफ स्वैपिंग के गंभीर आरोप लगाए थे. हालांकि बाद में कोई पुख्ता सबूत नहीं मिलने की वजह से मामला शांत पड़ गया था.

दरअसल अपने पति को बचाने के लिए कोई भी महिला किसी और के खिलाफ मुंह नहीं खोल पाती है. लेकिन इस बार के नए मामले में पूरी तरह से एक बड़ा गिरोह सक्रिय हो चुका था. केरल में यह सब पिछले 3 सालों से चल रहा था.

  एक नजर वाइफ स्वैपिंग पर

वाइफ स्वैपिंग ही बीवियों की अदलाबदली है, जो पतिपत्नी की रजामंदी से होता है. सैक्स के दौरान बीवियां बदलने का चलन गैरकानूनी और गैर सामाजिक हो कर भी छिपे रूप में बना हुआ है.

अब लोगों ने इसे पैसा कमाने का एक जरिया भी बना लिया है. इस में सैक्शुअल रिलेशनशिप बनाने के लिए बीवियों को एक रात या फिर कुछ रातों के लिए अदलाबदली कर लिए जाते हैं.

इसे अपनाने के कई तरीके अपनाए जाते हैं, जिस में लकी ड्रा महत्त्वपूर्ण होता है. इस के लिए कपल एक ही जगह पर जुटते हैं और अपनीअपनी गाडि़यों की चाबी एक जगह डाल देते हैं. फिर अंधेरे में सब एकएक कर चाबी उठाते हैं. ऐसे में हर किसी के हाथ में किसी और की चाबी आ जाती है.

जिसे जो चाबी हाथ लगती है वह उस की बीवी के साथ सैक्स करने के लिए आजाद होता है. इसी तरह से हर व्यक्ति दूसरे की बीवी को ले कर अलगअलग कमरों में चले जाते हैं. कुछ मामले में यह खेल एक ही हाल में एक साथ ग्रुप सैक्स के रूप में भी होता है. मजे की बात यह है इस के लिए बीवियां भी पहले से मन बनाए होती हैं.

इस से जुड़े लोगों का तर्क होता है कि ऐसा कर वे एकदूसरे की सैक्शुअल डिजायर को पूरी करते हैं. कुछ कपल्स का मानना है कि इस से उन के वैवाहिक जीवन की नीरसता में ताजगी वापस आ जाता है. दोनों में इस बात का कोई मलाल नहीं होता है कि दूसरे की पार्टनर के साथ सैक्स कर चुके हैं. इसे वे प्यार के नजरिए से नहीं, बल्कि सैक्स की अनुभूति के रूप में लेते हैं. इसे वैसे लोगों के लिए वरदान कहा जाता है, जो कभी एक वक्त में एक रिलेशन में नहीं रह पाते हैं.

बताया जाता है कि वाइफ स्वैपिंग की शुरुआत 16वीं सदी से बताई जाती है. सब से पहले जौन डी और एडवर्ज केल ने वाइफ स्वैपिंग की थी. ये दोनों ही ब्लैक मैजिक करते थे या कहें खुद को सेल्फ डिक्लेयर्ड स्पिरिट मीडियम बताते थे.

इस स्वैपिंग में जौन की पत्नी जेन प्रेगनेंट भी हो गई थी. अधिकतर पश्चिमी देशों में यह आम बात हो चुकी है. भारत में इसे यौन अपराध की श्रेणी में रखा गया है. खासकर  भारतीय समाज में तो यह किसी भी सूरत में स्वीकार्य नहीं है. चाहे आपसी रजामंदी हो या नहीं.

वाइफ स्वैपिंग को यदि एक शादीशुदा महिला की इच्छा के बगैर कराया जाए और एक से अधिक लोगों के साथ संबंध बनाने पर मजबूर किया जाए तो मजबूर कराने वाले लोगों पर आईपीसी की धारा 323, 328, 376, 506 के तहत केस दर्ज किया जाता है.

यदि उत्पीडि़त महिला की आपबीती पुलिस नहीं सुने, तो 156 (3) सीआरपीसी में जुडीशियल मजिस्ट्रैट के सामने एप्लिकेशन दे कर ऊपर दी गई धाराओं में एफआईआर दर्ज कराने के आदेश दिए जा सकते हैं.

इस मामले में पति पर रेप की धारा (376 आईपीसी) छोड़ कर बाकी सभी धाराओं में काररवाई की जा सकती है. सारे अपराध गैरजमानती होते हैं और इन अपराधों में महिला के सिर्फ यह कहने पर कि उस के साथ बिना सहमति के जोरजबरदस्ती से संबंध बनाए गए हैं, उस की गिरफ्तारी की जा सकती है.

ऐसे अधिकतर मामलों में यह एक ट्रायल का विषय होता है, जिस में गवाही और क्रौस एग्जामिनेशन के बाद अदालत आरोपियों को सजा दे सकती है, या फिर सजा दे कर बरी भी कर सकती है.

उदाहरण के लिए यदि स्वेच्छा से चोट पहुंचाने के लिए दंड के संबंध में 328 आईपीसी का इस्तेमाल होता है, जिस में नशीले पेय की मदद से महिला से शारीरिक संबंध स्थापित किया गया हो तो अधिकतम 10 साल तक की सजा और जुरमाना किया जा सकता है.

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इसी तरह से 376डी आईपीसी में गैंगरेप के मामलों में सजा मिलती है. इस कृत्य में शामिल हर व्यक्ति को न्यूनतम 20 साल तक की सजा मिल सकती है.

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