Hindi Social Story : धनदौलत नहीं काबिलीयत जरूरी

Hindi Social Story:  कैलाश अग्रवाल एक बहुत बड़े कारोबारी का बेटा था. उस ने निर्मला नाम की एक गरीब दलित लड़की को काम पर रखा, फिर उस के प्यार में पड़ गया. उन दोनों ने शादी कर ली, पर क्या निर्मला उस की उम्मीदों पर खरी उतर पाई?

सौम्या ने ड्राइवर को फोन कर गाड़ी निकालने को कहा और ड्रैसिंग रूम से बाहर निकल अपने रूम को लौक करते हुए लिफ्ट की ओर निकल गई.

त्रिवेणी सोसाइटी में सौम्या और उस के पति आकाश अग्रवाल का चारमंजिला मकान था. इस मकान को मकान कहना भी ठीक नहीं. त्रिवेणी सोसाइटी में आलीशान विलाज की कम्युनिटी थी. शानदार पार्क, जिम, स्पोर्ट्स क्लब और कई तरह की सुविधाओं से लैस यह सोसाइटी अमीरों की अलग दुनिया थी.

.आकाश के पिता दिवाकर अग्रवाल ने इस सोसाइटी में 2 मकान लिए हुए थे. एक में आकाश अपनी पत्नी सौम्या और 9 साल की बेटी तृषा के साथ रहता था और दूसरे मकान में उन का दूसरा बेटा कैलाश मांबाप के साथ रहता था. दोनों भाइयों के मकान आसपास ही थे.

आकाश अग्रवाल के छोटे भाई कैलाश अग्रवाल की शादी नहीं हुई थी. कैलाश ने जेएनयू से सोशियोलौजी की पढ़ाई की थी और शायद इसीलिए वह अग्रवाल समाज के दूसरे नौजवानों से बिलकुल अलग था.

जहां दूसरे नौजवान बिजनैस, गलफ्रैंड, पूजापाठ, तीर्थों और लग्जरी लाइफ को प्राथमिकता देते थे, वहीं कैलाश को किताबों का शौक था. हालांकि वह बिजनैस में भी पूरी दिलचस्पी रखता था, लेकिन खाली समय में ज्यादातर वह किताबों में खोया रहता था.

दिल्ली के चांदनी चौक में आकाश और कैलाश के पिता दिवाकर अग्रवाल की मशहूर ज्वैलरी शौप थी. दिवाकर अग्रवाल पिछले 5 साल से अपने बिजनैस का सारा जिम्मा दोनों बेटों के कंधों पर डाल कर लगभग रिटायरमैंट की जिंदगी जी रहे थे. दोनों बेटों ने पिता के बिजनैस को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया था और चांदनी चौक के अलावा करोलबाग में भी ‘दिवाकर ज्वैलर्स’ की ब्रांच खोल ली थी.

दिवाकर अग्रवाल के बिजनैस में अभी तक कोई बंटवारा नहीं हुआ था. मकान अलगअलग जरूर थे, लेकिन बाकी सभी चीजें सा?ा थीं. दोनों भाइयों के पास अलगअलग कारें थीं और मांबाप की जिम्मेदारियां भी बंटी हुई थीं. बूढ़े मांबाप कुंआरे बेटे कैलाश के घर में रहते थे. कैलाश अपने मांबाप का बहुत खयाल रखता था.

दोनों भाइयों में कभी बिजनैस को ले कर कोई मनमुटाव नहीं हुआ था. चांदनी चौक और करोलबाग दोनों जगह अच्छीखासी सेल होती थी. चांदनी चौक वाली शौप पर बड़ा भाई आकाश बैठता था और कैलाश ज्यादातर समय करोलबाग वाली ब्रांच पर रहता था.

हालांकि कभीकभी जब आकाश बिजनैस के काम से बाहर होता तो कैलाश चांदनी चौक वाली शाखा पर भी बैठता था. स्टाफ से मिलता, उन की समस्याओं को सुनता, जरूरी इंस्ट्रक्शन देता और जरूरी होने पर अपने एम्प्लौयी की मदद भी करता.

इसी वजह से दोनों जगह के ज्यादातर वर्कर्स, सेल्स गर्ल्स और टीम के लोग कैलाश को बेहद पसंद करते थे. स्टाफ की नजर में बड़ा भाई आकाश मालिक था, लेकिन कैलाश मालिक से कहीं बढ़ कर था.

आकाश की पत्नी सौम्या बेहद खर्चीली थी. शौपिंग करना तो उस के डेली रूटीन का हिस्सा था. आएदिन घर में पार्टी रखती और अपनी अमीर फीमेल फ्रैंड्स को पार्टी में इनवाइट करती. देर रात तक शोरशराबे के बाद देर रात जा कर घर में शांति कायम हो पाती.

सौम्या की 9 साल की बेटी तृषा तो डिस्टर्ब होती ही आकाश भी रोजरोज के हंगामे से तंग आ चुका था. आकाश सौम्या को सम?ाने की कोशिश करता, लेकिन उसे कोई फर्क नहीं पड़ता.

एक दिन आकाश ने सौम्या से कहा, ‘‘देखो सौम्या, रात को मैं तो जैसेतैसे अपने कमरे में कान पर तकिया रख कर सो जाता हूं, लेकिन तृषा के बारे में तो सोचो. अगर तुम्हें रोज पार्टी कर के घर को नरक बनाना ही है तो तृषा को बोर्डिंग में भेज दो.’’

सौम्या ने आकाश की बात का जवाब देते हुए कहा, ‘‘तृषा मेरी बेटी है, उसे हाई क्लास में रहने की आदत बचपन से ही डालनी जरूरी है, लेकिन अब मैं भी नहीं चाहती कि वह इस घर में रहे, क्योंकि जब मैं घर पर नहीं रहती तो तृषा अपने दादादादी के पास चली जाती है जो कि मु?ो बिलकुल पसंद नहीं. अच्छा रहेगा कि वह बोर्डिंग में ही रहे.’’

सौम्या तो पहले से ही और आजादी चाहती थी. उस की आजादी में तृषा पहले से ही रुकावट बन रही थी. सौम्या को अपने सासससुर बिलकुल पसंद नहीं थे. एक ही सोसाइटी में रहने के कारण वे लोग सौम्या की जिंदगी में दखल डालते थे. घर आनाजाना होता था और कई बार उसे मुफ्त की सलाह दी जाती थी. यह मुफ्त की सलाह सौम्या को फूटी कौड़ी नहीं सुहाती थी.

जल्द ही तृषा एक महंगे बोर्डिंग स्कूल में पढ़ने चली गई. अब सौम्या बिलकुल आजाद थी. अब वह तृषा को स्कूल से लाने ले जाने और उस का खयाल रखने की जिम्मेदारी से छूट गई थी. पूरे दिन शौपिंग, पार्टी और मौजमस्ती के बाद जब शाम को सौम्या घर आती तब उसे खाना तैयार मिलता. घर में 3 नौकर थे जो गार्डन से ले कर किचन तक का सारा काम करते थे, फिर भी सौम्या अपने किसी नौकर से कभी खुश नहीं रहती थी और महीने 2 महीने पर नौकरों को बदलती रहती थी. कैलाश को अपनी भाभी की इन्हीं आदतों से चिढ़ थी, लेकिन वह कहता कुछ नहीं था, बस दूरी बना कर रखता था.

मांबाप और बड़ा भाई आकाश चाहते थे कि जल्द कैलाश को कोई लड़की पसंद आए और वह शादी कर ले. सौम्या ने अपने पति आकाश से कई बार अपनी अमीर सहेली प्रीति की बेटी सोनाक्षी से कैलाश की शादी की बात की, लेकिन हर बार आकाश ने साफ मना कर दिया. एक तो आकाश को सौम्या की कोई भी सहेली पसंद नहीं थी. जितने को वह जानता था सभी घमंडी और संवेदनहीन थीं. दूसरी बात यह कि आकाश अरेंज मैरिज के खिलाफ था. वह चाहता था कि उस का भाई अपनी पसंद से शादी करे.

कैलाश को कोई लड़की भाती ही नहीं थी. वह अमीर होने के बावजूद अमीरों के कल्चर से दूरी बना कर रखता था. अपने औफिस जा कर स्टाफ के साथ बैठ कर लंच कर लेता और वीकएंड पर किसी नाइट क्लब में जाने के बजाय अपने किसी दोस्त के साथ पहाड़ों पर घूमने निकल जाता.

कैलाश के ज्यादातर दोस्त तो उस के अपने वर्कर्स या मैनेजर्स ही थे. उस में ऊंचनीच का भाव बहुत कम था जो उस की सोशियोलौजी की पढ़ाई का नतीजा था.

कुछ दिनों से करोलबाग वाली ब्रांच पर एक लड़की की जरूरत थी. कैलाश ने क्वालिफिकेशन के साथ अखबार में विज्ञापन दिया. शनिवार को उस ने इंटरव्यू की तारीख रखी. काफी लड़कियां आई हुई थीं. खूबसूरत, बिंदास और एजुकेटेड. सभी इंटरव्यू के लिए ऐसे आई थीं जैसे किसी फंक्शन में पहुंची हो.

इन्हीं में से एक थी निर्मला. साधारण से सूटसलवार में वह अलग ही लग रही थी. उस ने नपेतुले शब्दों में हर सवाल का जबाब दिया. उस के 12वीं और बीए में मार्क्स बहुत अच्छे थे. आगे वह और पढ़ना चाहती थी, लेकिन घर के हालात ठीक नहीं थे, इसलिए उसे नौकरी की सख्त जरूरत थी.

कैलाश को निर्मला में न जाने क्या दिखा कि उस ने इंटरव्यू के बाद ही निर्मला को जौइनिंग लैटर थमा दिया और बोला, ‘‘निर्मला, तुम मंडे से जौइन  र लेना.’’

निर्मला को तो यकीन ही नहीं हो रहा था. वह हैरान थी कि बीसियों लड़कियों में वह कैसे सिलैक्ट हो गई? उस ने कैलाश को ‘थैंक्स’ कहा और अपनी फाइल टेबल से उठाते हुए औफिस से बाहर निकल गई.

निर्मला के जाने के बाद काफी देर तक कैलाश निर्मला के डौक्यूमैंट्स पर नजरें गड़ाए बैठा रहा. वैसे तो निर्मला एससी परिवार से थी लेकिन कौन्फिडैंस, एजुकेशन और बरताव में काफी ऊपर के क्लास की थी. इंटरव्यू के लिए आई बाकी लड़कियों में नौकरी की जरूरत सब से ज्यादा निर्मला को ही थी, इसलिए कैलाश ने उसे चुना. बाकी लड़कियां तो बस शोरूम में बनठन कर स्मार्ट सेल्स गर्ल की नौकरी करना चाहती थीं.

निर्मला ने इंटरव्यू में आने से पहले ही न केवल कैलाश के शोरूम की जानकारी ले ली थी, उस ने गोल्ड की कैमिस्ट्री के बारे में भी पढ़ लिया था. कैलाश तभी इंप्रैस हुआ था कि निर्मला को तो कैरेट ही नहीं, गोल्ड में डाले जाने वाले कैमिकल्स के बारे में भी पता था.

कुछ ही दिनों में निर्मला ने करोलबाग ब्रांच में अपनी मेहनत, गोल्ड की समझ और बरताव की बदौलत अच्छी जगह बना ली. वह अकसर कैलाश से इजाजत ले कर कारीगरों की भट्ठी के सामने बैठने भी चली जाती. जब भी कैलाश औफिस आता, वह निर्मला से गोल्ड बिजनैस के साथ दूसरे विषयों पर भी ढेरों बातें करता. लंच के समय अकसर कैलाश का टिफिन पास के रैस्टोरैंट से असलम ले कर आता, जिसे कैलाश अपने केबिन में बैठ कर खाता.

एक दिन असलम टाइम पर लंच ले कर नहीं आया तो कैलाश औफिस से बाहर निकला. उस ने देखा कि निर्मला अपना लंच खोल कर बैठ चुकी थी. उस की मेज पर कैमिस्ट्री औफ गोल्ड और हिस्ट्री औफ गोल्ड की 2 मोटी किताबें भी रखी थीं.

कैलाश उन किताबों को देखने के लिए रुक गया और फिर कैलाश ने निर्मला की इजाजत के बिना ही उस के लंच बौक्स से एक रोटी उठाई और सब्जी के साथ खाना शुरू कर दिया.

असल में कैलाश को भूख तो लग रही थी और सब्जी की खुशबू इतनी जबरदस्त थी कि वह खुद को रोक नहीं पाया. यह निर्मला के लिए बेहद हैरान कर देने वाला पल था. सबकुछ अचानक हुआ था. उस ने कैलाश को आते हुए भी नहीं देखा था. वह अकेले ही खाना खाती थी. बाकी स्टाफ पीछे के कमरे में खाना खाता था.

निर्मला को ऐसा लगा जैसे निवाला उस के हलक में ही अटक गया हो. वह कुछ कह पाती इस से पहले ही कैलाश ने कहा, ‘‘वाह, क्या सब्जी है? तुम ने बनाई?’’

निर्मला ने कहा, ‘‘नहीं सर, मुझे  सब्जी बनाने नहीं आती. घर में मेरा छोटा भाई है, फिलहाल खाना तो वही बनाता है.’’

कैलाश ने हैरानी जाहिर करते हुए कहा, ‘‘आप के भाई तो बेहतरीन शैफ हैं यार. इतनी अच्छी सब्जी बनाना उन्होंने कहां से सीखा?’’

निर्मला ने हलक में अटके हुए निवाले को पानी के गिलास के साथ निगल लिया और फिर गहरी सांस लेते हुए बोली, ‘‘सर, मेरे भाई को बचपन से ही कुकिंग का शौक है, उस ने ग्रेजुएशन कर लिया है, अब वह किसी इंस्टिट्यूट से कुकिंग का कोर्स करना चाहता है.

‘‘उसे शैफ बनना है, लेकिन वह अभी जानता नहीं है कि वह जिस कम्युनिटी से आता है, उस समाज के लोग शैफ नहीं बन सकते.’’

कैलाश ने कहा, ‘‘निर्मला, यह तुम से किस ने कह दिया कि दलित समाज के लोग शैफ नहीं बन सकते? जब एससी का बेटा देश का राष्ट्रपति बन सकता है, तो शैफ क्यों नहीं बन सकता? मैं जानता हूं कि समाज में हर लैवल पर जातिवाद होता है, लेकिन जातिवाद किसी के स्किल को नहीं हरा सकता.’’

कैलाश जाति व्यवस्था के सच को बेहद गहराई से समझता था. उसे पढ़ने का बेहद शौक था और जेएनयू की व्यवस्था ऐसी ही थी जिस के कारण वह समाज की इस कड़वी सच्चाई को बखूबी जानने लगा था. जाति व्यवस्था पर उस ने कई किताबें पढ़ी थीं और जेएनयू जैसे संस्थान में पढ़ने के दौरान कैलाश के करीबी दोस्तों में कई दलित और वामपंथी भी थे.

निर्मला की बात सुन कर कैलाश को समझते देर नहीं लगी. उस ने निर्मला से कहा, ‘‘अपने भाई से कहना कि इस शनिवार को वह मुझ से इसी औफिस में आ कर मिलें.’’

कैलाश ने निर्मला के छोटे भाई नवीन का एडमिशन हयात रैजिडैंसी में करवा दिया. 3 साल के कोर्स का सारा खर्च उस ने पहले ही इंस्टिट्यूट को अदा कर दिया. यह निर्मला और उस के भाई नवीन के लिए किसी सपने के पूरा होने जैसा था.

निर्मला की नजर में अब कैलाश सिर्फ बौस नहीं रह गया था. वह निर्मला के दिल में कहीं गहरी जगह बना चुका था.

धीरेधीरे एक साल बीत गया. इस बीच निर्मला ने जहांगीरपुरी की झुग्गियों को छोड़ कर करोलबाग के नजदीक की एक कालोनी में किराए पर फ्लैट ले लिया था. निर्मला के बूढ़े मांबाप अपनी बेटी की कामयाबी से बेहद खुश थे और निर्मला भी ‘दिवाकर ज्वैलर्स’ को ही अपनी जिंदगी मान बैठी थी.

एक साल में 2 बार निर्मला की सैलरी बढ़ी थी, क्योंकि वह पूरे करोलबाग की शौप पर सब से अच्छा काम कर रही थी. उस ने कारीगरों को नई मशीनें भी ले कर देने के लिए कैलाश को तैयार कर लिया. अब वे 8 कैरेट सोने के आभूषण बनाने लगे थे, जो सस्ते तो थे, मगर चमक असली जैसी ही थी. इस से करोलबाग शोरूम की सेल पहले से दोगुना हो गई थी.

निर्मला के टेबल पर आने वाले ज्यादातर ग्राहक कुछ न कुछ खरीद कर ही जाते थे. यह निर्मला की स्किल थी या उस के बरताव में ही ऐसा कुछ था कि कोई भी उस के आकर्षण से बच नहीं पाता था.

निर्मला के इस आकर्षण से ब्रांच का मालिक कैलाश ही नहीं बच पाया, तो ग्राहकों की बात ही क्या थी. वह हर ग्राहक को सोने की बारीकियों को बताती और ग्राहक सिर्फ जानकारी के कारण सही फैसले लेते.

करोलबाग शौप के मैनेजर समेत बाकी स्टाफ के लोग कही न कही निर्मला से जलन रखते थे, लेकिन वे लोग अपने बौस कैलाश से बेहद प्यार करते थे. स्टाफ को लगता था कि निर्मला जानबूझ  कर कैलाश पर डोरे डाल रही है, लेकिन सच तो यह था कि कैलाश खुद ही निर्मला पर मरने लगा था.

रविवार की एक सुबह सौम्या ने अपने पति आकाश से कहा, ‘‘आकाश, आज मेरी सहेली प्रीति अपनी बेटी सोनाक्षी के साथ घर आ रही हैं. मैं चाहती हूं कि तुम मम्मीपापा को बुला लो और कैलाश को भी फोन कर दो, क्योंकि उस का आना ज्यादा जरूरी है.’’

आकाश को सौम्या की बात समझते देर नहीं लगी. वह सौम्या को अचरज से देखते हुए बोला, ‘‘सौम्या, तुम्हें पता है न कि कैलाश पर मैं शादी के लिए किसी तरह का दबाव नहीं बना सकता. तुम्हें प्रीति को इनवाइट करने से पहले एक बार मुझ  से सलाह तो लेनी चाहिए थी न?’’

सौम्या ने कहा, ‘‘आकाश, तुम्हारा भाई कही न कहीं तो शादी करेगा ही न, अगर वह एक बार सोनाक्षी को देख लेगा तो झट शादी के लिए राजी हो जाएगा, यह मेरी गारंटी है.’’ न चाहते हुए भी आकाश को वह सब करना पड़ा जो वह कभी नहीं चाहता था.

दोपहर तक सौम्या के घर में कैलाश और उस के मम्मीपापा आ चुके थे. साथ ही प्रीति और उस के पति के साथ उन की बेटी सोनाक्षी भी आ चुकी थी. सभी ने साथ में लंच किया और काफी देर गपशप के बाद आखिरकार प्रीति के घर के लोग चले गए.

इस बीच कैलाश और सोनाक्षी के बीच कोई खास बातचीत नहीं हुई. कैलाश ने ही कोई इंट्रस्ट नहीं दिखाया और सोनाक्षी को देख कर भी ऐसा लगा जैसे वह भी बेमन से ही यहां आई हो.

प्रीति के परिवार के जाते ही सौम्या ने कैलाश से कहा, ‘‘कैलाश, कैसी लगी सोनाक्षी?’’

कैलाश ने अपनी भाभी की ओर मुसकराते हुए देखा और बोला, ‘‘बेहद अच्छी लड़की है वह भाभी. लेकिन शायद मैं सोनाक्षी के लायक नहीं हूं, इसलिए आप अब मेरी टैंशन लेना छोड़ दीजिए, क्योंकि मैं ने अपने लिए लड़की पसंद कर ली है.’’

कैलाश की यह बात सुन कर सौम्या के चेहरे की खुशी गायब हो गई. उस के सपने चकनाचूर हो गए. उस ने कैलाश से पूछा, ‘‘कौन है वह लड़की? क्या वह सोनाक्षी से ज्यादा खूबसूरत है?’’

कैलाश ने जवाब दिया, ‘‘भाभी, दुनिया का हर इनसान अलग होता है. किसी से किसी की तुलना नहीं हो सकती. सोनाक्षी अपनी जगह है. मैं ने जो लड़की पसंद की है, वह मेरी नजर में मेरे लिए सब से खूबसूरत है.’’

कैलाश के मुंह से इतना सुनते ही सौम्या का मूड पूरी तरह औफ हो गया. कैलाश के जाते ही उस ने सारा गुस्सा आकाश पर उतारा और पार्किंग से गाड़ी ले कर घर से निकल गई.

बहुत ज्यादा हंगामे और हफ्तों तक रूठारूठी के बाद दिवाकर अग्रवाल ने बिलकुल सादा माहौल में कैलाश ने निर्मला से शादी कर दी. हर तरफ इस शादी की चर्चा थी. कई लोगों का तो यह कहना था कि कैलाश ने करोड़ों के दहेज पर लात मार दी. किसी ऊंचे घर से लड़की लाया होता, तो वह कैलाश के स्टेटस पर फिट बैठती. ऐसे लोगों में ज्यादातर सौम्या के करीबी लोग थे.

सौम्या ने रिश्तेदारों और जानने वालों में कैलाश और निर्मला की शादी को ले कर तमाम तरह की अफवाहें फैलाई थीं, लेकिन इस से कैलाश को कोई फर्क नहीं पड़ा था.

सौम्या को निर्मला की जाति से दिक्कत थी और उस की जाति को ले कर भी उस ने रिश्तेदारों को भड़काया था, लेकिन असल में कैलाश के मम्मीपापा अपने बेटे के फैसले के साथ थे, चाहे मरे मन से ही, क्योंकि निर्मला अब तक एससी वाला रंगरूप छोड़ चुकी थी. वह इंटरव्यू के बाद से बिलकुल अलग लगती थी, लंबी, मसल्स वाली, सम?ादार, सैल्फ कौन्फिडैंट.

सौम्या की जलन बढ़ती चली गई. आखिरकार नौबत बंटवारे तक पहुंची. वैसे तो दोनों भाइयों के मकान और शौप अलगअलग थे. यह व्यवस्था दोनों के पिता दिवाकर अग्रवाल ने 5 साल पहले ही कर दी थी, लेकिन बिजनैस के बहुत से कामों में अभी भी दोनों की साझेदारी थी.

सौम्या ने इसी साझेदारी को खत्म करने के लिए घर में इतना ड्रामा शुरू किया कि आखिरकार दोनों भाइयों को कोर्ट में हलफनामा दे कर अपने अपने बिजनैस को अलगअलग करना पड़ा. अब चांदनी चौक की शौप पूरी तरह आकाश की थी और करोलबाग का शोरूम कैलाश के हिस्से में था.

इस बंटवारे से सौम्या बेहद खुश थी, क्योंकि चांदनी चौक की शौप दिवाकरजी की पुश्तैनी जमीन पर थी, जिस से उस शौप की कीमत करोड़ों में थी, वहीं करोलबाग का शोरूम किराए पर था. फिर भी इस बंटवारे के खिलाफ कैलाश और उस की पत्नी निर्मला ने कोई एतराज नहीं जताया. दोनों खुश थे और बंटवारे के बाद अपने बिजनैस की ग्रोथ में जीजान से जुट गए थे.

आकाश मन ही मन इस बंटवारे से खुश नहीं था, लेकिन सौम्या की वजह से उसे यह करना पड़ा. बंटवारे के बाद सौम्या के खर्चे भी बढ़ते जा रहे थे. बंटवारे के तुरंत बाद ही सौम्या ने नई गाड़ी खरीद ली, जिस की कीमत 50 लाख थी. हालांकि आकाश का बजट गड़बड़ा गया था, लेकिन वह घर में शांति बनाए रखने के नाम पर सौम्या की हर बात मानने को मजबूर था.

मई, 2026 में अचानक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जनता से अपील की कि सोनाचांदी न खरीदें. इस अपील के बाद से दोनों भाइयों की सेल पर असर पड़ा. आकाश तो पहले से ही मुश्किलों में घिरा हुआ था, प्रधानमंत्री की इस अपील के बाद उसे गहरा धक्का लगा. चांदनी चौक की शौप से उस ने स्टाफ की छंटनी शुरू कर दी. 9 लोगों को नौकरी से निकाल दिया.

इधर करोलबाग में भी प्रधानमंत्री की अपील का गहरा असर पड़ा. ग्राहकों की तादाद 90 फीसदी तक घट गई. कैलाश को समझ  नहीं आ रहा था कि ऐसे हालात का मुकाबला कैसे करें? घर पर कैलाश के पिता कि तबीयत भी बिगड़ने लगी. इस वजह से कैलाश को पूरे दिन हौस्पिटल के चक्कर काटने पड़ते, इसलिए उस ने शोरूम पर जाना कम कर दिया.

निर्मला अपनी कार से शोरूम जाती और पूरे दिन काम करने के बाद घर आती. यह कार उसे कैलाश ने ही शादी पर गिफ्ट की थी. निर्मला ने जल्द ही इस घाटे से निबटने का हल निकाल लिया.

निर्मला ने अपनी कार बेच दी और इन पैसों से कई तरह की नई स्कीमें निकालीं. पुराने कस्टमर्स से कौन्टैक्ट कर उन्हें नई स्कीमों के बारे में और नई टैक्नोलौजी के इस्तेमाल को समझा ने के लिए स्टाफ की कई लड़कियों को काम पर लगाया.

निर्मला ने अपने बिजनैस के प्रचार के लिए सोशल मीडिया का जम कर इस्तेमाल किया. स्टाफ के बाकी लोगों को भी उस ने शोरूम के प्रचार और नई स्कीमों को समझाने में लगा दिया. वह 16-16 घंटे शोरूम में या कारीगरों के पास रहती.

रिजल्ट सामने था. धीरेधीरे हालात बदलने लगे. ग्राहकों का भरोसा पहले से कहीं ज्यादा बढ़ चुका था. इस में पूरी मेहनत निर्मला की थी. बिजनैस की गाड़ी पटरी पर आना शुरू हो गई. कैलाश बेहद खुश था. उसे निर्मला पर गर्व था और यह गर्व मुसीबत के समय निर्मला के जूनून को देख कर कई गुना बढ़ गया था. निर्मला की यह लगन देख कर वे तमाम रिश्तेदार सदमे में पहुंच गए थे जो कभी निर्मला के बारे में गलत सोच रखते थे.

इधर आकाश का बिजनैस पूरी तरह चौपट हो चुका था. घर में क्लेश बढ़ चुके थे. आकाश अपनी बेटी तृषा के बोर्डिंग की फीस तक नहीं भर पा रहा था. निर्मला को अपने जेठ और जेठानी के हालात का पता था. उस ने तृषा का एडमिशन नजदीक के सब से अच्छे प्राइवेट स्कूल में करवा दिया और उस की फीस की जिम्मेदारी उठा ली.

सौम्या का सारा घमंड टूट चुका था. बिजनैस घाटे में था. कर्ज का भार बढ़ रहा था जिस की वजह से आकाश को अपनी तीनों कारें बेचनी पड़ी थीं. अब सौम्या की शौपिंग के लिए भागदौड़ भी खत्म हो चुकी थी.

यह निर्मला जैसी गरीब घर की लड़की की काबिलीयत थी जो उस ने बुरे समय में भी समझदारी से काम लिया और यह कैलाश की समझदारी थी जो उस ने निर्मला पर भरोसा किया. कैलाश की किताबों से दोस्ती के चलते ही उस ने निर्मला को पहचानने में देर नहीं की और एक निचली जाति की लड़की को अपना लाइफ पार्टनर बनाया जो अब अपने स्किल और हुनर की बदौलत कैलाश की बिजनैस पार्टनर भी बन चुकी थी. Hindi Social Story

Youth Guidance : सच्ची सलाह – शिक्षा और रोजगार से जुड़े आपके सवाल

Youth Guidance: अगर आप भी अपनी समस्या भेजना चाहते हैं, तो इस लेख को अंत तक जरूर पढ़ें.

सवाल –

मैं 25 साल की हूं और उत्तर प्रदेश के एक गांव में रहती हूं. मुझे अभी शादी नहीं करनी है, क्योंकि मैं कोई बड़ा कैरियरकर के अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती हूं, पर मेरे परिवार वाले खासकर मेरी मां नहीं चाहती हैं कि मैं कोई काम करूं. उन के मन में यह बात घुसी हुई है कि लड़की अगर घर से बाहर जाएगी तो बिगड़ जाएगी. वे मेरी हर उस बात को काट देती हैं, जिस में मेरे कमाने का कोई प्लान होता है.

मेरा छोटा भाई मेरे हक में रहता है और चाहता है कि मैं काम करूं, पर घर में सब से छोटा होने की वजह से उस की कोई नहीं सुनता है. इस बात से मुझे तनाव रहने लगा है. मैं क्या करूं?

जवाब : दरअसल, आप की परेशानी अपनी जिंदगी के बारे में अपनी मरजी और भविष्य के लिहाज से सख्ती से फैसला न ले पाना है. यह परेशानी हर दूसरे घर की है कि लड़कियों को धार्मिक बंदिशों में रखने की कोशिश की जाती है.

लेकिन अब जमाना बदल रहा है. हर लड़की का अपने पैरों पर खड़े होना समय की मांग है, इसलिए आप अपने प्लान के मुताबिक काम करें, दुनिया जहान की परवाह न करें. रही बात बननेबिगड़ने की तो उस के कोई माने नहीं.

हर बालिग को अपने मुताबिक फैसले लेने का हक है. ये बातें कभी प्यार से तो कभी सख्ती से मां को समझाएं. छोटे भाई के सपोर्ट का फायदा उठाएं, जो एक समझदारी की बात कर रहा है.

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सवाल –

मैं 18 साल की लड़की हूं और मध्य प्रदेश के भोपाल शहर में रहती हूं. मैं डिजिटल मीडिया में अपना कैरियर बनाना चाहती हूं पर मुझे इस की ज्यादा जानकारी नहीं है. मुझे  क्या करना चाहिए?

जवाब : डिजिटल मीडिया का भविष्य मुश्किल डगर हो सकता है, क्योंकि इस में होड़ इतनी है कि अपनी जगह बना पाना मुश्किल है. ज्यादा जानकारी के लिए आप भोपाल के माखनलाल पत्रकारिता महाविद्यालय या जागरण लेक सिटी यूनिवर्सिटी में संपर्क करें. लेकिन हमारा मशवरा यह है कि पहले लिखनापढ़ना जारी रखें, अच्छी पत्रिकाएं और अखबार पढ़ें. इस के बाद कंप्यूटर और इंटरनैट में डिगरी या डिप्लोमा कोर्स करें.

अगर आप का मकसद या इच्छा फालतू की रील बना कर कैरियर बनाने की है तो वह बेकार का काम है. लाखों नौजवान इस में समय, पैसा और जिंदगी बरबाद कर रहे हैं.

सच्ची सलाह के लिए कैसी भी परेशानी टैक्स्ट या वौइस मैसेज से भेजें. मोबाइल नंबर : 08826099608

Hindi Story – तरकीब : झुमरी की जवानी हासिल कर पाया रतन

Hindi Story. रतन सिंह की निगाहें पिछले कई दिनों से झुमरी पर लगी हुई थीं. वह जब भी उसे देखता, उस के मुंह से एक आह निकल जाती. झुमरी की खिलती जवानी ने उस के तनमन में एक हलचल सी मचा दी थी और वह उसे हासिल करने को बेताब हो उठा था.

वैसे भी रतन सिंह के लिए ऐसा करना कोई बड़ी बात न थी. वह गांव के दबंग गगन सिंह का एकलौता और बिगड़ैल बेटा था. कई जरूरतमंद लड़कियों को अपनी हवस का शिकार उस ने बनाया था. झुमरी तो वैसे भी निचली जाति की थी.

झुमरी 20वां वसंत पार कर चुकी एक खूबसूरत लड़की थी. गरीबी में पलीबढ़ी होने के बावजूद जवानी ने उस के रूप को यों निखारा था कि देखने वालों की निगाहें बरबस ही उस पर टिक जाती थीं. गोरा रंग, भरापूरा बदन, बड़ीबड़ी कजरारी आंखें और हिरनी सी मदमस्त चाल.

इस सब के बावजूद झुमरी में एक कमी थी. वह बोल नहीं सकती थी, पर उसे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता था. वह अपनेआप में मस्त रहने वाली लड़की थी.

झुमरी घर के कामों में अपनी मां की मदद करती और खेत के काम में अपने बापू की. उस के बापू तिलक के पास जमीन का एक छोटा सा टुकड़ा था, जिस के सहारे वह अपने परिवार को पालता था. वैसे भी उस का परिवार छोटा था. परिवार में पतिपत्नी और 2 बच्चे, झुमरी और शंकर थे. अपनी खेती से समय मिलने पर तिलक दूसरों के खेतों में भी मजदूरी का काम कर लिया करता था.

गरीबी में भी तिलक का परिवार खुश था. परंतु कभीकभी पतिपत्नी यह सोच कर चिंतित हो उठते थे कि उन की गूंगी बेटी को कौन अपनाएगा?

झुमरी इन सब बातों से बेखबर मजे में अपनी जिंदगी जी रही थी. वह दिमागी रूप से तेज थी और गांव के स्कूल से 10 वीं जमात तक पढ़ाई कर चुकी थी. उसे खेतखलिहान, बागबगीचों से प्यार था.

गांव के दक्षिणी छोर की अमराई में झुमरी अकसर शाम को आ बैठती और पेड़ों के झुरमुट में बैठे पक्षियों की आवाज सुना करती. कोयल की आवाज सुन कर उस का भी जी चाहता कि वह उस के सुर में सुर मिलाए, पर वह बोल नहीं सकती थी.

झुमरी की इस कमी को रतन सिंह ने अपनी ताकत समझा. उस ने पहले तो झुमरी को तरहतरह के लालच दे कर अपने प्रेमजाल में फांसना चाहा और जब इस में कामयाब न हुआ, तो जबरदस्ती उसे हासिल करने का मन बना लिया.

रात घिर आई थी. चारों तरफ अंधेरा हो चुका था. आज झुमरी को खेत से लौटने में देर हो गई थी. पिछले कई दिनों से उस की ताक में लगे रतन सिंह की नजर जब उस पर पड़ी, तो उस की आंखों में एक तेज चमक जाग उठी.

मौका अच्छा जान कर रतन सिंह उस के पीछे लग गया. एक तो अंधेरा, ऊपर से घर लौटने की जल्दी. झुमरी को इस बात का एहसास ही नहीं हुआ कि कोई उस के पीछे लगा हुआ है. वह चौंकी तब, जब अमराई में घुसते ही रतन सिंह उस का रास्ता रोक कर खड़ा हो गया.

‘‘मैं ने तुम्हारा प्यार पाने की बहुत कोशिश की…’’ रतन सिंह कामुक निगाहों से झुमरी के उभारों को घूरता हुआ बोला, ‘‘तुम्हें तरहतरह से रिझाया. तुम से प्रेम निवेदन किया, पर तू न मानी. आज अच्छा मौका है. आज मैं छक कर तेरी जवानी का रसपान करूंगा.’’

रतन सिंह का खतरनाक इरादा देख झुमरी के सारे तनबदन में डर की सिहरन दौड़ गई. उस ने रतन सिंह से बच कर निकल जाना चाहा, पर रतन सिंह ने उसे ऐसा नहीं करने दिया. उस ने झपट कर झुमरी को अपनी बांहों में भर लिया.

झुमरी ने चिल्लाना चाहा, पर उस के होंठों से शब्द न फूटे. झुमरी को रतन सिंह की आंखों में वासना की भूख नजर आई. रतन सिंह झुमरी को खींचता हुआ अमराई के बीचोंबीच ले आया और जबरदस्ती जमीन पर लिटा दिया. इस के पहले कि झुमरी उठे, वह उस पर सवार हो गया.

झुमरी उस के चंगुल से छूटने के लिए छटपटाने लगी. दूसरी ओर वासना में अंधा रतन सिंह उस के कपड़े नोचने लगा. उस ने अपने बदन का पूरा भार झुमरी के नाजुक बदन पर डाल दिया, फिर किसी भूखे भेडि़ए की तरह उसे रौंदने लगा.

झुमरी रो रही थी, तड़प रही थी, आंखों ही आंखों में फरियाद कर रही थी, लेकिन रतन सिंह ने उस की एक न सुनी और उसे तभी छोड़ा, जब अपनी वासना की आग बुझा ली.

ऐसा होते ही रतन सिंह उस के ऊपर से उठ गया. उस ने एक उचटती नजर झुमरी पर डाली. जब उस की निगाहें झुमरी की निगाहों से टकराईं, तो उस को एक झटका सा लगा.

झुमरी की आंखों में गुस्से की चिनगारियां फूट रही थीं, पर अभीअभी उस ने झुमरी के जवान जिस्म से लिपट कर जवानी का जो जाम चखा था, इसलिए उस ने झुमरी के गुस्से और नफरत की कोई परवाह नहीं की और उठ कर एक ओर चल पड़ा.

इस घटना ने झुमरी को झकझोर कर रख दिया था. वह 2 दिन तक अपने कमरे में पड़ी रही थी. झुमरी के मांबाप ने जब उस से इस की वजह पूछी, तो उस ने तबीयत खराब होने का बहाना बना दिया था.

कई बार झुमरी के दिमाग में यह बात आई थी कि वह इस के बारे में उन्हें बतला दे, पर यह सोच कर वह चुप रह गई थी कि उन से कहने से कोई फायदा नहीं. वे चाह कर भी रतन सिंह का कुछ बिगाड़ नहीं पाएंगे, उलटा रतन सिंह उन की जिंदगी को नरक बना देगा.

इस मामले में जो करना था, उसे ही करना था. रतन सिंह ने उस की इज्जत लूट ली थी और उसे इस के किए की सजा मिलनी ही चाहिए थी. पर कैसे? झुमरी ने इस बात को गहराई से सोचा, फिर उस के दिमाग में एक तरकीब आ गई.

रात आधी बीत चुकी थी. सारा गांव सो चुका था, पर झुमरी जाग रही थी. वह इस समय अमराई से थोड़ी दूर बांसवारी यानी बांसों के झुरमुट में खड़ी हाथों में कुदाल लिए एक गड्ढा खोद रही थी.

तकरीबन 2 घंटे तक वह गड्ढा खोदती रही, फिर हाथ में कटार लिए बांस के पेड़ों के पास पहुंची. उस ने कटार की मदद से बांस की पतलीपतली अनेक डालियां काटीं, फिर उन्हें गड्ढे के करीब ले आई.

डालियों को चिकना कर उन्हें बीच से चीर कर उन की कमाची बनाईं, फिर उन की चटाई बुनने लगी. अपनी इच्छानुसार चटाई बुनने में उसे तकरीबन 3 घंटे लग गए.

चटाई तैयार कर झुमरी ने उसे गड्ढे के मुंह पर रखा. चटाई ने तकरीबन एक मीटर दायरे के गड्ढे के मुंह को पूरी तरह ढक लिया. यह चटाई किसी आदमी का भार हरगिज सहन नहीं कर सकती थी.

सुबह होने में अभी चंद घंटे बचे थे. हालांकि बांसों के इस झुरमुट की ओर गांव वाले कम ही आते थे और दिन में यह सुनसान ही रहता था, फिर भी झुमरी कोई खतरा मोल लेना नहीं चाहती थी. उस ने जमीन पर बिखरे बांस के सूखे पत्तों को इकट्ठा कर उन का ढेर लगा दिया.

इस काम से निबट कर झुमरी ने बांस की चटाई से गड्ढे का मुंह ढका, पर उस पर पत्तों को इस तरह डाल दिया, ताकि चटाई पूरी तरह ढक जाए और किसी को वहां गड्ढा होने का एहसास न हो. गड्ढे से निकली मिट्टी को उस ने अपने साथ लाई टोकरी में भर कर गड्ढे से थोड़ी दूर डाल दिया.

काम खत्म कर झुमरी ने एक निगाह अपने अब तक के काम पर डाली, फिर अपने साथ लाए बड़े से थैले में अपना सारा सामान भरा और थैला कंधे पर लाद कर घर की ओर चल पड़ी.

7 दिनों तक झुमरी का यह काम चलता रहा. इतने दिन में उस ने 7 फुट गहरा गड्ढा तैयार कर लिया था. गड्ढे में उतरने और चढ़ने के लिए वह अपने साथ घर से लाई सीढ़ी का इस्तेमाल करती थी. काम पूरा कर उस ने पत्ते डाले, फिर अपने अगले काम को अंजाम देने के बारे में सोचती.

रतन सिंह ने झुमरी की इज्जत लूट तो ली थी, परंतु अब वह इस बात से डरा हुआ था कि कहीं झुमरी इस बात का जिक्र अपने मांबाप से न कर दे और कोई हंगामा न खड़ा हो जाए. परंतु जब 10 दिन से ज्यादा हो गए और कुछ नहीं हुआ, तो उस ने राहत की सांस ली. अब उसे रात की तनहाई में वो पल याद आते, जब उस ने झुमरी के जवान जिस्म से अपनी वासना की आग बुझाई थी. जब भी ऐसा होता, उस का बदन कामना की आग में झुलसने लगता था.

इस बीच रतन सिंह ने 1-2 बार झुमरी को अपने खेत की ओर जाते या आते देखा था, परंतु उस के सामने जाने की उस की हिम्मत न हुई थी. पर उस दिन अचानक रतन सिंह का सामना झुमरी से हो गया. वह विचारों में खोया अमराई की ओर जा रहा था कि झुमरी उस के सामने आ खड़ी हुई. उसे यों अपने सामने देख एकबारगी तो रतन सिंह बौखला गया था और झुमरी को देखने लगा था.

झुमरी कुछ देर तक खामोशी से उसे देखती रही, फिर उस के होंठों पर एक दिलकश मुसकान उभर उठी. उसे इस तरह मुसकराते देख रतन सिंह ने राहत की सांस ली और एकटक झुमरी के खूबसूरत चेहरे और भरेभरे बदन को देखने लगा.

इस के बावजूद जब झुमरी मुसकराती रही, तो रतन सिंह बोला, ‘‘झुमरी, उस दिन जो हुआ, उस का तुम ने बुरा तो नहीं माना?’’ झुमरी ने न में सिर हिलाया.

‘‘सच…’’ कहते हुए रतन सिंह ने उस की हथेली कस कर थाम ली, ‘‘इस का मतलब यह है कि तू फिर वह सब करना चाहती है?’’ बदले में झुमरी खुल कर मुसकराई, फिर हौले से अपना हाथ छुड़ा कर एक ओर भाग गई.

उस की इस हरकत पर रतन सिंह के तनमन में एक हलचल मच गई और उस की आंखों के सामने वो पल उभर आए, जब उस ने झुमरी की खिलती जवानी का रसपान किया था. झुमरी को फिर से पाने की लालसा में रतन सिंह उस के इर्दगिर्द मंडराने लगा. झुमरी भी अपनी मनमोहक  अदाओं से उस की कामनाओं को हवा दे रही थी.

झुमरी ने एक दिन इशारोंइशारों में रतन सिंह से यह वादा कर लिया कि वह पूरे चांद की आधी रात को उस से अमराई में मिलेगी. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. उस की चांदनी चारों ओर बिखरी हुई थी. ऐसे में रतन सिंह बड़ी बेकरारी से एक पेड़ के तने पर बैठा झुमरी का इंतजार कर रहा था.

झुमरी ने आधी रात को यहीं पर उस से मिलने का वादा किया था, परंतु वह अब तक नहीं आई थी. जैसेजैसे समय बीत रहा था, वैसेवैसे रतन सिंह की बेकरारी बढ़ रही थी. अचानक रतन सिंह को अपने पीछे किसी के खड़े होने की आहट मिली. उस ने पलट कर देखा, तो उस का दिल धक से रह गया. वह झटके से उठ खड़ा हुआ. उस के सामने झुमरी खड़ी थी. उस ने भड़कीले कपड़े पहन रखे थे, जिस से उस की जवानी फटी पड़ रही थी.

जब झुमरी ने रतन सिंह को आंखें फाड़े अपनी ओर देखा पाया, तो उत्तेजक ढंग से अपने होंठों पर जीभ फेरी. उस की इस अदा ने रतन सिंह को और भी बेताब कर दिया.

रतन सिंह ने झटपट झुमरी को अपनी बांहों में समेट लेना चाहा, लेकिन झुमरी छिटक कर दूर हो गई. ‘‘झुमरी, मेरे पास आओ. मेरे तनबदन में आग लगी है, इसे अपने प्यार की बरसात से शांत कर दो,’’ रतन सिंह बेचैन होते हुए बोला.

झुमरी ने इशारे से रतन सिंह को खुद को पकड़ लेने की चुनौती दी. रतन सिंह उस की ओर दौड़ा, तो झुमरी ने भी दौड़ लगा दी. अगले पल हालत यह थी कि झुमरी किसी मस्त हिरनी की तरह भाग रही थी और रतन सिंह उसे पकड़ने के लिए उस के पीछे दौड़ रहा था.

झुमरी अमराई से निकली, फिर बांस के झुरमुट की ओर भागी. वह उस गड्ढे की ओर भाग रही थी, जिसे उस ने कई दिनों की कड़ी मेहनत से तैयार किया था. वह जैसे ही गड्ढे के नजदीक आई, एक लंबी छलांग भरी और गड्ढे की ओर पहुंच गई.

झुमरी के हुस्न में पागल, गड्ढे से अनजान रतन सिंह अचानक गड्ढे में गिर गया. उस के मुंह से घुटीघुटी सी चीख निकली. कुछ देर तक तो रतन सिंह कुछ समझ ही नहीं पाया कि क्या हो गया है. वह बौखलाया हुआ गड्ढे में गिरा इधरउधर झांक रहा था, पर जैसे ही उस के होशोहवास दुरुस्त हुए, वह जोरजोर से झुमरी को मदद के लिए पुकारने लगा. परंतु उधर से कोई मदद नहीं आई.

झुमरी की ओर से निराश रतन सिंह खुद ही गड्ढे से बाहर निकलने की कोशिश करने लगा. उस ने अपने दोनों हाथ ऊपर उठा कर गड्ढे के किनारे को पकड़ना चाहा, परंतु वह उस की पहुंच से दूर था.

रतन सिंह ने उछल कर बाहर निकलने की 2-4 बार नाकाम कोशिश की. आखिरकार वह गड्ढे का छोर पकड़ने में कामयाब हो गया. उस ने अपने बदन को सिकोड़ कर अपना सिर ऊपर उठाया. उस का सिर थोड़ा ऊपर आया, तभी उस की नजर झुमरी पर पड़ी. उस के हाथों में कुदाल थी और उस की आंखों से नफरत की चिनगारियां फूट रही थीं.

इस के पहले कि रतन सिंह कुछ समझता, झुमरी ने कुदाल का भरपूर वार उस के सिर पर किया. रतन सिंह की दिल दहलाने वाली चीख से वह सुनसान इलाका दहल उठा. उस का सिर फट गया था और खून की धारा फूट पड़ी थी. गड्ढे का किनारा रतन सिंह के हाथ से छूट गया और वह गिर पड़ा था.

गड्ढे में गिरते ही रतन सिंह ने अपना सिर थाम लिया. उस की आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा था और उस पर बेहोशी छाने लगी थी. उस के दिमाग में एक विचार बिजली की तरह कौंधा कि यह झुमरी का फैलाया हुआ जाल था, जिस में फंसा कर वह उसे मार डालना चाहती है.

तभी रतन सिंह के सिर पर ढेर सारी मिट्टी आ गिरी. उस ने अपनी बंद होती आंखें उठा कर ऊपर की ओर देखा, तो झुमरी टोकरी लिए वहां खड़ी थी. अगले ही पल वह बेहोशी के अंधेरों में गुम होता चला गया.

झुमरी ने मिट्टी से पूरा गड्ढा भर दिया, फिर उस पर पत्तियां डाल कर उठ खड़ी हुई. उस ने सिर उठा कर ऊपर देखा. आकाश में पूर्णिमा का चांद हंस रहा था. थोड़ी देर बाद झुमरी कंधे पर थैला लादे अपने घर को लौट रही थी. Hindi Story

Hindi Story: डायन का कलंक – दीपक ने की बसंती की मदद

Hindi Story. आज पूरे 3 साल बाद दीपक अपने गांव पहुंचा था, लेकिन कुछ भी तो नहीं बदला था उस के गांव में. पहले अकसर गरमियों की छुट्टियों में वह अपने मातापिता और अपनी छोटी बहन प्रतिभा के साथ गांव आता था, लेकिन 3 साल पहले उसे पत्रकारिता पढ़ने के लिए देश के एक नामी संस्थान में दाखिला मिल गया था और कोर्स पूरा होने के बाद एक बड़े मीडिया समूह में नौकरी भी.

दीपक की बहन प्रतिभा को मैडिकल कालेज में एमबीबीएस के लिए दाखिला मिल गया था. इस वजह से उन का गांव में आना नहीं हो पाया था. पिताजी और माताजी भी काफी खुश थे, क्योंकि पूरे 3 साल बाद उन्हें गांव आने का मौका मिला था.

दीपक का गांव शहर से तकरीबन 15 किलोमीटर की दूरी पर बड़ी सड़क के किनारे बसा हुआ था, लेकिन सड़क से गांव में जाने के लिए कोई भी रास्ता नहीं था. गरमी के दिनों में तो लोग पंडितजी के बगीचे से हो कर आतेजाते थे, मगर बरसात हो जाने पर किसी तरह खेतों से गुजर कर सड़क पर आते थे.

जब वे गांव पहुंचे, तो ताऊ और ताई ने उन का खूब स्वागत किया. ताऊ तो घूमघूम कर कहते फिरे, ‘‘मेरा भतीजा तो बड़ा पत्रकार हो गया है. अब पुलिस भी हमारा कुछ नहीं बिगाड़ पाएगी.’’ दीपक के ताऊ की एक ही बेटी थी, जिस का नाम कुमुद था.

ताऊजी नजदीक के एक गांव में प्राथमिक पाठशाला में प्रधानाध्यापक थे. आराम की नौकरी. जब मन किया पढ़ाने गए, जब मन किया नहीं गए. वे इस इलाके में ‘बड़का पांडे’ के नाम से मशहूर थे. वे जिस गांव में पढ़ाते थे, वहां ज्यादातर दलित जाति के लोग रहते थे, जो किसी तरह मेहनतमजदूरी कर के अपना पेट पालते थे.

उन बेचारों की क्या मजाल, जो इलाके के ‘बड़का पांडे’ के खिलाफ कहीं शिकायत करते. शायद इसी का नतीजा था कि उन की बेटी कुमुद 10वीं जमात में 5 बार फेल हुई थी, पर ताऊ ने नकल कराने वाले एक स्कूल में पैसे दे कर उसे 10वीं जमात पास कराई थी.

दीपक का सारा दिन लोगों से मिलनेजुलने में बीत गया. अगले दिन शाम को वह अपने एक चचेरे भाई रमेश के साथ गांव में घूमने निकला. उस ने कहा कि चलो, अपने बगीचे की तरफ चलते हैं, तो रमेश ने कहा कि नहीं, शाम के समय वहां कोई नहीं जाता, क्योंकि वहां बसंती डायन रहती है.

दीपक को यह सुन कर थोड़ा गुस्सा आया कि आज विज्ञान कहां से कहां पहुच गया है, लेकिन ये लोग अभी भी भूतप्रेतों और डायन जैसे अंधविश्वासों में उलझे हुए हैं.

दीपक ने रमेश से पूछा ‘‘यह बसंती कौन है?’’

उस ने बताया, ‘‘अपने घर पर जो चीखुर नाम का आदमी काम करता था, यह उसी की पत्नी है.’’

चीखुर का नाम सुन कर दीपक को झटका सा लगा. दरअसल, चीखुर दीपक के खेतों में काम करता था और ट्रैक्टर भी चलाता था. उस की पत्नी बसंती बहुत सुंदर थी. हंसमुख स्वभाव और बड़ी मिलनसार. लोगों की मदद करने वाली. गांव के पंडितों के लड़के हमेशा उस के आगेपीछे घूमते थे.

दीपक ने रमेश से पूछा, ‘‘बसंती डायन कैसे बनी?’’ उस ने बताया, ‘‘उस के कोई औलाद तो थी नहीं, इसलिए वह दूसरे के बच्चों पर जादूटोना कर देती थी. वह हमारे गांव के कई बच्चों की अपने जादूटोने से जान ले चुकी है.’’

बसंती के बारे सुन कर दीपक थोड़ा दुखी हो गया, लेकिन उस ने मन ही मन ठान लिया कि उसे डायन के बारे में पता लगाना होगा.

जब थोड़ी रात हुई, तो दीपक शौच के बहाने लोटा ले कर घर से निकला और अपने बगीचे की तरफ चल पड़ा. बगीचे के पास एक कच्ची दीवार और उस के ऊपर गन्ने के पत्तों का छप्पर पड़ा था, जिस में एक टूटाफूटा दरवाजा भी था.

दीपक ने बाहर से आवाज लगाई, ‘‘कोई है?’’

अंदर से किसी औरत की आवाज आई, ‘‘भाग जाओ यहां से. मैं डायन हूं. तुम्हें भी जादू से मार डालूंगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘दरवाजा खोलो. मैं दीपक हूं.’’

वह औरत बोली, ‘‘कौन दीपक?’’

दीपक ने कहा, ‘‘मैं रामकृपाल का बेटा दीपक हूं.’’

वह औरत रोते हुए बोली, ‘‘दीपक बाबू, आप यहां से चले जाइए. मैं डायन हूं. आप को भी मेरी मनहूस छाया पड़ जाएगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘तुम बाहर आओ, वरना मैं दरवाजा तोड़ कर अंदर आ जाऊंगा.’’

तब वह औरत बाहर आई. वह एकदम कंकाल लग रही थी. फटी हुई मैलीकुचैली साड़ी, आंखें धंसी हुईं. उस के भरेभरे गाल कहीं गायब हो गए थे. उन की जगह अब गड्ढे हो गए थे.

उस औरत ने बाहर निकलते ही दीपक से कहा, ‘‘बाबू, आप यहां क्यों आए हैं? अगर आप की बिरादरी के लोगों ने आप को मेरे साथ देख लिया, तो मेरे ऊपर शामत आ जाएगी.’’

दीपक ने कहा, ‘‘तुम्हें कुछ नहीं होगा. लेकिन तुम्हारा यह हाल कैसे हुआ?’’

वह औरत रोने लगी और बोली, ‘‘क्या करोगे बाबू यह जान कर?’’

दीपक ने उसे बहुत समझाया, तो उस औरत ने बताया, ‘‘तकरीबन 2 साल पहले मेरे पति की तबीयत खराब हुई थी. जब मैं ने अपने पति को डाक्टर को दिखाया, तो उन्होंने कहा कि इस के दोनों गुरदे खराब हो गए हैं. इस का आपरेशन कर के गुरदे बदलने पड़ेंगे, लेकिन पैसे न होने के चलते मैं उस का आपरेशन नहीं करा पाई और उस की मौत हो गई.

‘‘पति की दवादारू में मेरे गहने बिक गए थे और हमारी एक बीघा जमीन जगनारायण पंडित के यहां गिरवी हो गई. अपने पति का क्रियाकर्म करने में जो पैसा लगाया था, वह सारा जगनारायण पंडित से लिया था. उन पैसों के बदले उस ने हमारी जमीन अपने नाम लिखवा ली, पर मुझे तो यह करना ही था, वरना गांव के लोग मुझे जीने नहीं देते. पति तो परलोक चला गया था. सोचा कि मैं किसी तह मेहनतमजदूरी कर के अपना पेट भर लूंगी.

‘‘फिर मैं आप के खेतों में काम करने लगी, लेकिन जगनारायण पंडित मुझे अकसर आतेजाते घूर कर देखता रहता था. पर मैं उस की तरफ कोई ध्यान नहीं देती थी.

‘‘एक दिन मैं खेतों से लौट रही थी. थोड़ा अंधेरा हो चुका था. तभी खेतों के किनारे मुझे जगनारायण पंडित आता दिखाई दिया. वह मेरी तरफ ही आ रहा था.

‘‘मैं उस से बच कर निकल जाना चाहती थी, लेकिन पास आ कर उस ने मेरा हाथ पकड़ लिया और बोला, ‘कहां इतना सुंदर शरीर ले कर तू दूसरों के खेतों में मजदूरी करती है. मेरी बात मान, मैं तुझे रानी बना दूंगा. आखिर तू भी तो जवान है. तू मेरी जरूरत पूरी कर दे, मैं तेरी जरूरत पूरी करूंगा.’

‘‘मैं ने उस से अपना हाथ छुड़ाया और उसे एक तमाचा जड़ दिया. मैं अपने घर की तरफ दौड़ पड़ी. पीछे से उस की आवाज आई, ‘तू ने मेरी बात नहीं मानी है न, इस थप्पड़ का मैं तुझ से जरूर बदला लूंगा.’

‘‘कुछ महीनों के बाद रामजतन का बेटा और मंगरू की बेटी बीमार पड़ गई. शहर के डाक्टर ने बताया कि उन्हें दिमागी बुखार हो गया है, लेकिन जगनारायण पंडित और उस के चमचे कल्लू ने गांव में यह बात फैला दी कि यह सब किसी डायन का कियाधरा है.

‘‘उन बच्चों को अस्पताल से निकाल कर घर लाया गया और एक तांत्रिक को बुला कर झाड़फूंक होने लगी. लेकिन अगले दिन ही दोनों बच्चों की मौत हो गई, तो जगनारायण पंडित ने उस तांत्रिक से कहा कि बाबा उस डायन का नाम बताओ, जो हमारे बच्चों को खा रही है.

‘‘उस तांत्रिक ने मेरा नाम बताया, तो भीड़ मेरे घर पर टूट पड़ी. मेरा घर जला दिया गया. मुझे मारापीटा गया. मेरे कपड़े फाड़ दिए गए और सिर मुंड़वा कर पूरे गांव में घुमाया गया.

‘‘इतने से भी उन का मन नहीं भरा और उन लोगों ने मुझे गांव से बाहर निकाल दिया. तब से मैं यहीं झोंपड़ी बना कर और आसपास के गांवों से कुछ मांग कर किसी तरह जी रही हूं’’.

उस औरत की बातें सुन कर दीपक की आंखें भर आईं. उस ने कहा, ‘‘मैं जैसा कहता हूं, वैसा करना. मैं तुम्हारे माथे से डायन का यह कलंक हमेशा के लिए मिटा दूंगा.’’

दीपक ने उसे धीमी आवाज में समझाया, तो वह राजी हो गई. दीपक ने गांव में यह बात फैला दी कि बसंती को कहीं से सोने के 10 सिक्के मिल गए हैं. पूरा गांव तो डायन से डरता था, लेकिन एक दिन जगनारायण पंडित उस के घर पहुंचा और बोला, ‘‘क्यों री बसंती, सुना है कि तुझे सोने के सिक्के मिले हैं. ला, सोने के सिक्के मुझे दे दे, नहीं तो तू जानती है कि मैं क्या कर सकता हूं.

‘‘जब पिछली बार तू ने मेरी बात नहीं मानी थी, तो मैं ने तेरा क्या हाल किया था, भूली तो नहीं होगी?

‘‘मेरी वजह से ही तू आज डायन बनी फिर रही है. अगर इस बार तू ने मेरी बात नहीं मानी, तो मैं तेरा पिछली बार से भी बुरा हाल करूंगा.’’

वह बसंती को मारने ही वाला था कि दीपक गांव के कुछ लोगों के साथ वहां पहुंच गया. इतने लोगों को वहां देख कर जगनारायण पंडित की घिग्घी बंध गई. वह बड़बड़ाने लगा. इतने में बसंती ने अपने छप्पर में छिपा कैमरा निकाल कर दीपक को दे दिया.

जगनारायण पंडित ने कहा, ‘‘यह सब क्या?है?’’

दीपक ने कहा, ‘‘मेरा यह प्लान था कि डायन के डर से गांव का कोई आदमी यहां नहीं आएगा, लेकिन तुझे सारी हकीकत मालूम है और तू सोने के सिक्कों की बात सुन कर यहां जरूर आएगा, इसलिए मैं ने बसंती को कैमरा दे कर सिखा दिया था कि इसे कैसे चलाना है.

‘‘जब तू दरवाजे पर आ कर चिल्लाया, तभी बसंती ने कैमरा चला कर छिपा दिया था और जब तू इधर आ रहा था, मैं ने तुझे देख लिया था. अब तू सीधा जेल जाएगा.’’

यह बात जब गांव वालों को पता चली, तो वे बसंती से माफी मांगने लगे. जगनारायण पंडित को उस के किए की सजा मिली. पुलिस ने उसे गिरफ्तार कर लिया. भीड़ से घिरी बसंती दीपक को देख रही थी, मानो उस की आंखें कह रही हों, ‘मेरे सिर से डायन का कलंक उतर गया दीपक बाबू.’

दीपक ने अपने नाम की तरह अंधविश्वास के अंधेरे में खो चुकी बसंती की जिंदगी में उजाला कर दिया था. Hindi Story

Family Story : आखिर क्यों ?

Family Story. जैसे ही खाला ने अम्मी के कान भरे वे अपने बेटे की दूसरी शादी कराने पर आमादा हो गईं. इस राह में सब से बड़ा रोड़ा इन की बहू थी. मांबेटे ने एक प्लान बनाया. क्या वे दोनों कामयाब रहे?

‘‘फूफी जान… फूफी जान… अम्मी नहीं आईं क्या?’’ बुखार से तपते सुहेल ने फरजाना से पूछा. ‘‘अम्मी आ जाएंगी… मैं तो हूं न…’’ फरजाना सुहेल के माथे पर पानी से भीगा कपड़ा रखते हुए बोली.

‘‘फूफी जान, अम्मी कहां गई हैं? बताओ न? क्या मेरी अम्मी भी नीशू की अम्मी के जैसे अब कभी लौट कर नहीं आएंगी?’’ मासूम सुहेल ने धीरे से अपनी आंखें खोलते हुए फरजाना से दोबारा पूछा.

सुहेल की बात सुन कर फरजाना खामोश हो गई. आयशा उस के पड़ोस में ही रहती थी. वह उसे ‘अप्पी कहती थी. आयशा खूबसूरत ही नहीं, जहीन भी थी. सिलाईकढ़ाई हो या घर का काम, सभी में माहिर थी वह. उस की ग्रेजुएशन भी पूरी हो चुकी थी और स्वभाव ऐसा कि कुछ ही वक्त में किसी को भी अपना बना ले.

फरजाना को याद है कि आयशा के रिश्ते के लिए उस के परिवार को ज्यादा कोशिश भी नहीं करनी पड़ी थी. जल्द ही उस के लिए एक बेहतर रिश्ता आ गया था. लड़का समीर एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी कर रहा था और परिवार भी पढ़ालिखा था. और फिर धूमधाम और हंसीखुशी के साथ आयशा अप्पी का निकाह समीर से हो गया.

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आयशा के पापा को यकीन था कि उन की पढ़ीलिखी और कामकाजी बेटी को बहू के रूप में पा कर ससुराल वाले बहुत ही खुश होंगे, लेकिन फिर भी उन्होंने आयशा को भरपूर दहेज दिया था.

लेकिन निकाह के कुछ दिनों के बाद ही आयशा अप्पी को दहेज के लिए परेशान किया जाने लगा. शादी के 2 साल बीत गए थे और आयशा अप्पी की गोद में नीशू आ गया, लेकिन उस के बावजूद अभी तक आयशा अप्पी की ससुराल वालों ने उन्हें नहीं अपनाया था.

एक दिन रहमान चाचा बता रहे थे कि आयशा का रिश्ता उन्होंने पढ़ालिखा घरबार देख कर किया था कि पढ़ीलिखी और सलीकेमंद बहू पा कर वे लोग खुश होंगे, लेकिन वहां तो सबकुछ पैसा ही अहमियत रखता है. आज फिर फोन आया है कि 2 लाख रुपए उन को भेजें, लेकिन उन के पास तो अब कुछ बचा भी नहीं है.

फरजाना को यकीन था कि नीशू के आ जाने के बाद अब जल्द ही आयशा अप्पी को उस की ससुराल वाले अपना लेंगे, लेकिन कुछ दिनों के बाद ही आयशा की ससुराल से फोन आया कि सिलैंडर लीक होने की वजह से उस के कपड़ो में आग लग गई, जिस से वह गंभीर रूप से ?ालस गई और फिर अस्पताल में उस की मौत हो गई. यह सुन कर वह अंदर तक कांप गई थी.

लेकिन जब फरजाना को पता चला कि आयशा अप्पी ने मरने से पहले बयान दिया था कि उस के कपड़ों में आग लगने की वजह से ही वह जल गई थी, क्योंकि अप्पी को सम?ा दिया गया था कि अगर उस ने बता दिया कि तुम्हारे साथ हम ने ऐसा किया है और हम लोग जेल चले गए, तो उस के मासूम नीशू को कौन संभालेगा?

ममता के मोह में बेचारी आयशा अपने हत्यारों के खिलाफ मुंह भी न खोल सकी थी और उस के हत्यारे जेल जाने से बच गए थे.

यह जान कर फरजाना का खून खौल उठा था. वह सोच रही थी कि आयशा अप्पी के हत्यारों को सजा जरूर मिलनी चाहिए थी.

मासूम नीशू को उस के नानानानी घर ले आए और उन को किसी ने रोकने की कोशिश भी नहीं की थी. फिर कुछ दिनों के बाद ही समीर के घर वालों ने उस का दूसरा निकाह भी करवा दिया.

यह देख कर फरजाना समझ गई कि वे लोग आयशा अप्पी की मौत का इंतजार ही कर रहे थे कि वह मरे तो वे अपने बेटे का दूसरा निकाह कर दें.

फरजाना हैरान थी कि आज भी लोग लड़कियों को बो?ा ही सम?ाते हैं. सब को पता है कि वे लोग आयशा अप्पी के हत्यारे हैं, लेकिन उस के बावजूद लोग अपनी बेटियों का निकाह ऐसे लोगों के घर में कर देते हैं.

‘‘फूफी जान, अम्मी आ जाएंगी?’’ सुहेल की आवाज सुनते ही फरजाना खयालों से फारिग हो कर एक बार फिर हकीकत में आ गई. ‘‘हां, बिलकुल आ जाएंगी. अपने प्यारे बेटे को छोड़ कर वे कहीं जा सकती हैं भला,’’ बहुत ही प्यार से सुहेल को समझाते  हुए फरजाना बोली.

‘‘फरजाना, अब सुहेल की तबीयत कैसी है?’’ अम्मी ने कमरे में आते हुए पूछा. ‘‘दवा पिला दी है, लेकिन बुखार अभी तेज है,’’ फरजाना धीरे से बोली. ‘‘दादी, अम्मी कब आएंगी?’’ बहुत ही मासूमियत से सुहेल ने दादी से पूछा. ‘‘अरे, आ जाएंगी अम्मी, पहले तुम ठीक तो हो जाओ,’’ फरजाना ने एक बार फिर प्यार से समझाते हुए धीरे से सुहेल से कहा.

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फरजाना को मालूम था कि सुहेल के इस सवाल पर अम्मी भाभी के लिए जरूर उलटासीधा बोलना शूरू कर देंगी, जो सुहेल के कोमल मन पर गलत असर ही डालेगा.

‘‘इस लड़के ने तो नाक में दम कर के रखा हुआ है. हर वक्त अम्मीअम्मी की रट लगाए रहता है,’’ अम्मी झुन्झला  कर बोलीं.

‘‘चुप रहो अम्मा… क्यों तुम इस मासूम की जान लेने पर तुली हो. अगर इस से इतनी ही परेशानी है तो इसे रोका क्यों, इसे भी भाभी के साथ भेज देतीं,’’ फरजाना कुछ तीखे लहजे में बोली.

‘‘तू बहुत ही हमदर्द बन रही है अपनी भाभी की. ऐसा लग रहा है कि हम कुछ नहीं, सबकुछ वह करमजली ही है,’’ गुस्से से बड़बड़ाती हुई अम्मी कमरे से बाहर चली गईं.

फरजाना कुछ नहीं बोली, चुपचाप सुहेल के माथे पर पानी से पट्टी करती रही. कितनी हैरानी की बात है कि कहां वह आयशा अप्पी की ससुराल वालों के बारे सोच रही थी कि कैसे लोग हैं वे, लेकिन यहां तो उस के घर वाले भी दहेज के लोभी बन चुके हैं.

पहले कितना सुकून था घर में. चारों ओर खुशियां ही खुशियां थीं. घर पर केवल अम्मी, वह और भाईभाभी थे. भाईजान सुबह दुकान चले जाते और वह कालेज. घर पर केवल भाभी और अम्मी रह जातीं. भाभी घर का काम करती रहतीं और अम्मी सुहेल को बाहर घुमाने चली जातीं.

भाभी फरजाना के लिए भाभी कम बड़ी बहन ज्यादा थीं. वह कालेज से आ कर खाली समय में भाभी की घर के कामों में मदद करती और बाकी समय में वह भाभी से कुछ न कुछ सीखती रहती. उन्हीं की बदौलत वह सिलाईकढ़ाई से ले कर बेहतर खाना बनाना भी सीख गई थी.

लेकिन जब से फरजाना की खाला घर पर आने लगी थी, तभी से उस के घर का सुकून छिन गया था. एक दिन वह घर पर अम्मी के साथ बैठी हुई थी, तभी घर पर खाला आ गई.

‘‘रुखसाना, तुम्हें पता है कि तरीकुन के लड़के जुबेर की शादी में लड़की वालों ने बहुत ज्यादा दहेज दिया है कि उन के घर में भी नहीं आ पा रहा है और बाइक के साथसाथ कार भी मिली है. लेकिन रुखसाना, तुम तो ठग गई. बताओ, मेरे भांजे को तुम ने सस्ते में ही निबटा दिया. बहू तो एक बाइक तक नहीं ला पाई,’’ कह कर खाला चली गई, लेकिन उस ने यह सब कह कर जैसे शांत अपनी में कंकड़ मार दिया था और घर का सुकून कहीं खो गया था.

उस के बाद से फरजाना की अम्मी के मन में यह बैठ गया था कि रेहान भाईजान के निकाह में वे ठगी गई हैं और वे बिलकुल बदल गईं. वे अब भाभी को बातबात पर बेइज्जत करने लगी थीं. दिनभर भाभी की तारीफ करते न थकने वाली अम्मी अब बातबात पर भाभी के काम में कमी निकालने लगी थीं.

फरजाना को बहुत हैरानी हो रही थी कि हर रिश्ता अब पैसों से तोला जाने लगा है. यह वही खाला थी जिस ने भाईजान के बीमार हो जाने पर हजार रुपए देने से साफ इनकार कर दिया था, जबकि उस के खालू का इतना अच्छा बिजनैस चल रहा है. तब अब्बू के दोस्त लक्ष्मी अंकल ने अम्मी को भाईजान के इलाज के लिए रुपए दिए थे.

लक्ष्मी अंकल अब्बू के बहुत ही पुराने दोस्त थे. पहले अब्बू और अंकल एकसाथ मिल कर ही मेलों में दुकानें लगाते थे, जिस से उन में आपस में दोस्ती बढ़ती गई. अब्बू के इंतकाल के बाद लक्ष्मी अंकल को काफी सदमा पहुंचा था.

थोड़ी सी खेती की जमीन थी जिस से खाने भर का अनाज पैदा हो जाता था और अम्मी घर पर ही सिलाई करने लगी थीं, जिस से दूसरे खर्चे निकल जाते थे. उन के घर के हालात खराब होते ही सभी नातेरिश्तेदार न जाने कहां गायब हो गए थे.

रेहान भाईजान पढ़ाई में अच्छे थे, लेकिन आमदनी का कोई नजरिया न होने पर उन्होंने कपड़े की एक दुकान कर ली. पैसे कम पड़े तो अम्मी ने बचीखुची जमीन बेच दी थी. भाईजान की दुकान होते ही काम अच्छा चलने लगा, जिस से सबकुछ सही हो गया. घर के हालात सही होते ही सभी रिश्तेदारी दोबारा जुड़ने लगे थे.

कुछ दिनों के बाद ही भाईजान की शादी कर दी गई और शबनम के रूप में भाभी फरजाना के घर आ गईं. शबनम भाभी के अब्बू ने अपनी हैसियत से बहुत ज्यादा दहेज दिया था. पहले तो अम्मी को दहेज के कम ज्यादा से कोई मतलब नहीं था, लेकिन जब से खाला आने लगी थी तभी से अम्मी के मन में जहर का बीज पलने लगा था.

‘‘रेहान, तुम्हारे ससुर ने तो तुम से कहा था कि वह तुम को बाइक देंगे, लेकिन अभी तक उन्होंने बाइक नहीं दी. तुम अब उन से कहो कि वे बाइक के बदले एक लाख रुपए दे दें,’’ अम्मी रेहान से बोलीं.

‘‘लेकिन अम्मी, शादी में तो अब्बू ने अपनी औकात से ज्यादा ही उस को दहेज दिया था, जिस के चलते उन्हें घर की कुछ जमीन भी बेचना पड़ी थी. अब वे कहां से लाएंगे इतने रुपए,’’ शबनम भाभी ने हैरानी से धीरे से अम्मी से कहा. ‘‘तो हम क्या करें. हम ने क्या ठेका ले रखा है कि वे कहां से रुपए देंगे,’’ अम्मी गुस्से से बोलीं.

अम्मी की बात सुन कर भाभी खामोश हो गई. उस दिन के बाद से भाईजान के दिमाग पर एक लाख रुपए या फिर बाइक की बात दिमाग में बैठ गई. अब वे आएदिन भाभी से कहने लगे थे कि वह अपने अब्बू से कह कर रुपए मंगवाए, जिस के बाद से जैसे भाभी की जिंदगी जहन्नुम बन गई.

‘‘अम्मी, क्यों भाभी को परेशान करती हो…’’ फरजाना ने अम्मी से कहा था. ‘‘तुम्हें कुछ नहीं मालूम. यह सब चलता रहता है,’’ अम्मी ने फरजाना को समझाया था. ‘‘रेहान, शबनम को रुपए लाने के लिए उस के मायके भेज दो,’’ एक दिन अम्मी ने भाईजान से कहा और दूसरे दिन भाईजान ने भाभी को घर जा कर रुपए लाने के लिए बोल दिया.

मजबूरी में भाभी अपने घर जाने लगीं. तब अम्मी ने सुहेल को गोद में यह कह कर ले लिया कि वह सुहेल को नहीं जाने देंगी… तुम पहले पैसे ले कर आओ.

सुहेल अपनी अम्मी के लिए बिलखता रहा था. आज 2 दिन हो गए थे, लेकिन भाभी अभी तक नहीं आईं. इस वजह से सुहेल को बुखार आ रहा था. तभी बाहर उसे खाला की आवाज सुनाई दी. खाला की आवाज सुन कर फरजाना एक बार फिर यादों के भंवर से बाहर आ गई. उस ने सुहेल को छू कर देखा, बुखार थोड़ा हलका हो गया था.

फरजाना कमरे से बाहर आई. उस ने देखा कि खाला अम्मी के पास बैठी हुई थी. उसे मालूम था कि आज फिर खाला अम्मी के दिमाग में कुछ जहर बोने आई होगी. ‘‘बताओ… रेहान के लिए कितना अच्छा रिश्ता है.चारपहिया गाड़ी देने की बात कर रहे थे, लेकिन अफसोस मुझे उन्हें मना करना पड़ा. अगर बहू न होती तो…’’ खाला जानबूझ  कर बात अधूरी छोड़ कर वहां से चली गई.

‘‘इस से तो छुटकरा पाना ही होगा. अब रेहान का निकाह बड़े घर में करेंगे,’’ फरजाना ने कुछ ही देर में अम्मी को भाईजान से कहते सुना. ‘‘अम्मी, क्या तुम भाभी को मार दोगी?’’ फरजाना ने अम्मी के पास जा कर डर से सिहरते हुए पूछा.

‘‘देख, अब रेहान का दूसरा निकाह तो करना ही है. वैसे भी आजकल बहुओं की जल कर बहुत मौतें हो रही हैं,’’ अम्मी ने फरजाना से कहा. ‘‘क्या तुम पैसों के लिए भाभी की हत्या करोगी?’’ डर से सिहरते हुए फरजाना अम्मी से बोली. ‘‘आजकल पैसों से सारे गुनाह धुल जाते हैं,’’ अम्मी दो टूक उस से बोलीं और वहां से चली गईं. ‘‘तभी बाहर दरवाजे की डोरबैल बजी. फरजाना ने दरवाजा खोला. सामने भाभी खड़ी थीं.

भाभी फरजाना से बोले बिना चुपचाप अंदर आ कर सुहेल के पास चली गईं. भाभी को खाली हाथ देख कर फरजाना समझ  गई कि रुपयों का इंतजाम नहीं हो सका था. उस ने एक झलक अम्मी को देखा, जिन की आंखें गुस्से से लाल हो रही थीं. तभी उन्होंने भाईजान को बुलाया और उन से धीरेधीरे कुछ बात करने लगीं.

अम्मी को बातें करते देख कर अचानक फरजाना का दिल तेज धड़कने लगा. ‘‘भाभी, आज आप सुहेल को ले कर मेरे कमरे में सो जाना. मुझे  देर तक पढ़ाई करनी है और मेरे कमरे की लाइट कम लग रही है,’’ फरजाना ने कमरे में जा कर भाभी से कहा. ‘‘ठीक है जैसे तुम कहो,’’ भाभी धीरे से फरजाना से बोलीं और सुहेल को ले कर उस के कमरे में चली गईं.

फरजाना ने देखा कि भाभी के चेहरे की रंगत उड़ गई थी. हंसताखिलखिलाता हुआ चेहरा पूरी तरह से कुम्हला चुका था. यह देख कर अनायास ही उस की आंखो में आंसू आ गए.

फरजाना ने कमरे की लाइट बंद की और वह निढाल हो कर बिस्तर पर लेट गई. आज उस का दिल किसी अनहोनी के डर से घिरा हुआ था.आज उस की आंखो से नींद कोसों दूर थी. वह सोच रही थी कि अगर खाला ने उस की अम्मी के मन में जहर का बीज नहीं बोया होता तो आज भी उस का पूरा परिवार हंसीखुशी रह रहा होता.

तभी अचानक फरजाना पर पानी जैसा कुछ पड़ा. वह चौंक गई. उस के नथुनों में अजीब सी गंध समाई. फरजाना ने देखा कि सामने अम्मी और भाईजान थे. भाईजान के हाथ में बड़ी प्लास्टिक की बोतल थी. वह कुछ समझती उस से पहले ही उस पर जलती हुई कोई चीज गिरी और फिर आग भड़क उठी.

तेज जलन की वजह से फरजाना चीखनेचिल्लाने लगी. उस की आवाज सुन कर अम्मी और भाईजान चौंक गए. तेज आग की रोशनी होते ही सामने बहू की जगह फरजाना को जलता देख कर वे दोनों घबरा गए और आग बुझाने की कोशिश करने लगे.  फरजाना की चीखपुकार सुन कर भाभी भी वहां आ गईं और वहां का नजारा देख कर वे कांप गईं.

‘‘अम्मी, जो तुम भाभी के साथ करना चाहती थीं वहीं कल मेरे साथ भी होना था, क्योंकि जो बच्चों के मांबाप करते हैं वही बच्चों को भुगतना ही पड़ता है. इस से बेहतर था कि मैं भाभी की जान बचा लूं.” ‘‘आप लोगों ने यह भी नहीं सोचा कि आप की भी बेटी और बहन है, जिस को भी अपनी सुसराल जाना है और जैसा आप किसी दूसरे की बेटी के साथ कर रहे हैं अगर आप की बेटी के साथ भी वही हुआ तो क्या गुजरेगी आप लोगों पर, कभी सोचा है? आखिर क्यों नहीं सोचते आप लोग कि बहू भी बेटी है? आखिर क्यों?’’ फरजाना तेज जलन और दर्द से तड़पते हुए बोली और फिर धीरेधीरे उस की आंखें बंद होती चली गईं. Family Story

लेखक : फारूख हुसैन

Editorial: गहरी पैठ-औरतों को हुनर सिखाने से दूर रखा ताकि गुलाम बनी रहे

Editorial. दिल्ली में एक बस ड्राइवर और उस के साथी पर एक औरत के लगाए रेप चार्ज पर पुलिस को खासी मशक्कत करनी पड़ेगी. 2012 के केस की याद दिलाते हुए इस औरत का कहना है कि बस 7 किलोमीटर तक चलाई गई जब एकएक कर के 2 जनों ने उस से रेप किया.

इस मामले में पेंच यह है कि यह औरत सैक्स वर्कर का काम कर रही है और रात के 12 बजे के करीब बस में बैठाई गई थी. औरत ने शायद पुलिस रिपोर्ट में लिखाया है कि तय 3,000 रुपए कुछ देर के लिए तय हुए थे पर बस में चढ़ने के बाद बस में सवार 3 लोगों ने रातभर सैक्स करने की मांग 1,500 रुपए में रखी. जब झगड़ा हुआ तो पुलिस थाने में शिकायत की गई.

2012 के मामले में रेप की शिकार स्टूडैंट थी जो अपने साथी के साथ देर शामको जा रही थी जब खाली बस में सवार लोगों ने उन्हें सिर्फ लिफ्ट दी थी पर बाद में लड़के को बाहर फेंक दिया और लड़की को बुरी तरह रौंदा और उस के प्राइवेट पार्ट में रौड तक सिर्फ मजे के लिए डाली.

इस मामले में औरत 4 बच्चों की मां है, उस का आदमी निठल्ला टीबी का मरीज है और पैसा कमाने के लिए वह औरत रात को सैक्स से कमाई के लिए निकली. अपने घरों से दूर रह रहे सैक्स के प्यासों से अकेले, बिना दलाल के बदन बेचना गुनाह नहीं कानून में इसलिए रेप का मामला तो लेनदेन को सुलटाने के लिए नहीं बनाया गया, यह पुलिस को देखना होगा. अगर सुलह पहले से न हो तो अदालतों को सिर खपाना पड़ेगा कि क्या करें.

असल समस्या तो यह है कि औरतों को यह क्यों आज भी कहा जा रहा है कि वे बदन किराए पर दे कर पैसे कमा सकती हैं और मर्दों को यह पाठ क्यों पढ़ाया जा रहा है कि आज भी औरत का सैक्स खरीदा जा सकता है और उस से फिर जबरदस्ती की जाती है.

गरीब औरतों को आज इतना हुनर क्यों नहीं सिखाया जा रहा कि वे बिना बदन बेचे भी अच्छा पैसा कमा लें. अभी तक बदन बेचने में ज्यादा स्किल की जरूरत नहीं होती पर दूसरे कामों में खासी स्किल सीखनी होती है. पर आफतें तो इस धंधे में भी होती हैं, क्योंकि न मालूम कौन सा ग्राहक कौन सी बीमारी ले कर चल रहा है, कितना मैला और बदबूदार है, कितना खतरनाक है और मारपीट तक को सैक्स का आनंद समझता है.

सदियों से औरतों को जानबूझ कर हुनर नहीं सिखाए गए ताकि उन्हें मनमरजी से पुरुष की सेवा में लगा कर रखा जाए. अब जब गोरों से नहीं, राजाओं, जमींदारों, सेठों, पुजारियों के आतंक से भी 1947 में आजादी मिली तो 2026 में एक 30 साला औरत को क्यों बदन का सहारा लेना पड़े. मनमरजी से सैक्स करने का उसे हक है चाहे पति से, चाहे किसी दूसरे से, पर पैसे के लिए क्यों करना पड़ रहा है. यह सरकार, समाज और धर्म निकम्मापन दिखाता है जो दावा करते हैं कि हम ही तो बचाते हैं. Editorial

Women’s Empowerment Story : अस्तित्व

Women’s Empowerment Story.

चैप्टर 1 : कांच की दीवारें

माया के लिए सुबह का मतलब सूरज की पहली किरण नहीं, बल्कि किचन में बजने वाली बरतनों की आवाज थी. 32 साल की माया, जो कभी अपने कालेज में ‘बैस्ट डिबेटर’ हुआ करती थी, अब एक आदर्श बहू, पत्नी और मां के सांचे में पूरी तरह ढल चुकी थी.

शहर के एक मिडिल क्लास परिवार में माया की शादी विवेक से हुई थी. विवेक बुरा इनसान नहीं था, लेकिन वह उन मर्दों में से था, जिन्हें लगता है कि घर के कामों में हाथ बंटाना उन की ‘मर्दानगी’ के खिलाफ है और पत्नी का सपना सिर्फ एक अच्छी ‘हौबी’ तक सीमित होना चाहिए.

‘‘माया, मेरी नीली शर्ट कहां है?’’ विवेक ने बैडरूम से आवाज लगाई. ‘‘अलमारी के दाहिने कोने में टंगी है,’’ माया ने रोटी बेलते हुए जवाब दिया. ‘‘मिल नहीं रही, तुम ही आ कर देख लो.’’

माया ने गैस धीमी की और बैडरूम की तरफ भागी. यही उस की जिंदगी का सार था, अपनी गति छोड़ कर दूसरों की सुविधा के लिए दौड़ना. शर्ट विवेक के सामने ही थी, बस उस ने उठाने की जहमत नहीं की थी.

उस दिन दोपहर में, जब घर के सब लोग काम पर और बच्चे स्कूल जा चुके थे, माया ने पुराने स्टोररूम की सफाई करने की सोची. वहां धूल भरी किताबों के बीच उसे अपनी पुरानी पेंटिंग किट और एक अधूरी डायरी मिली.

डायरी का पहला पन्ना खुला, जिस पर लिखा था, ‘मैं उड़ना चाहती हूं, उस आसमान में, जहां मेरी अपनी पहचान हो.’

माया की आंखों में आंसू आ गए. वह पहचान कहीं खो गई थी.

चैप्टर 2 : पुरानी यादें,नई कसक

उस शाम माया की सहेली अदिति का फोन आया. अदिति अब एक कामयाब आर्किटैक्ट थी.

‘‘माया, अगले महीने हमारे कालेज का रीयूनियन है. तुझे आना ही होगा,’’ अदिति ने उत्साह से कहा. माया हिचकिचाई, ‘‘अदिति, घर पर कैसे… विवेक और मम्मीजी शायद नहीं मानेंगे.’’ ‘‘कब तक दूसरों की मरजी से जिएगी माया? तू क्या थी और क्या बन गई है, कभी आईने में खुद को देखा है?’’ अदिति के इन शब्दों ने माया के दिल पर चोट लगी.

उस रात डिनर टेबल पर माया ने दबी आवाज में विवेक से कहा, ‘‘विवेक, अगले महीने कालेज का रीयूनियन प्रोग्राम है. मैं दिल्ली जाना चाहती हूं, 2 दिन के लिए.’’ पूरे कमरे में सन्नाटा छा गया. विवेक की मां ने चश्मा ठीक करते हुए कहा, ‘‘2 दिन? घरगृहस्थी वाली औरतों को बाहर जाना शोभा नहीं देता. और बच्चों का क्या?’’ विवेक ने बिना सिर उठाए कहा, ‘‘छोड़ो न माया, क्या करोगी वहां जा कर? घर पर सब ठीक तो है.’’

माया को उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि वह इस घर का हिस्सा तो है, लेकिन उस की अपनी कोई इच्छा, कोई वजूद नहीं है. वह बस एक मशीन है, जिसे रिमोट से चलाया जाता है.

चैप्टर 3 : विद्रोह की पहली किरण

अगले कुछ दिन माया बहुत शांत रही. वह अपना काम करती, लेकिन उस की आंखों में एक नई चमक थी. एक फैसला. उस ने स्टोररूम से अपनी पेंटिंग किट निकाली और उसे साफ किया. उस ने तय किया कि वह अपनी अधूरी पेंटिंग पूरी करेगी.

एक दोपहर, जब उस की सास सो रही थी, माया ने कैनवास पर रंग बिखेरना शुरू किया. उस ने एक पिंजरे का चित्र बनाया, जिस का दरवाजा खुला था, लेकिन पंछी अभी भी अंदर बैठा था, शायद बाहर की दुनिया के डर से.

अचानक आवाज आई, ‘‘यह क्या कूड़ा फैला रखा है?’’ सासू मां दरवाजे पर खड़ी थीं, ‘‘माया, यह सब करने की उम्र है तुम्हारी? जाओ, शाम की चाय की तैयारी करो.’’ माया ने इस बार नजरें नीची नहीं कीं. उस ने शांत स्वर में कहा, ‘‘मांजी, यह कूड़ा नहीं है. यह मेरा शौक है और चाय 10 मिनट बाद बन जाएगी, तब तक मैं यह रंग सुखाना चाहती हूं.’’

सासू मां अवाक रह गईं. माया के लहजे में बदतमीजी नहीं थी, पर एक ऐसी मजबूती थी जो उन्होंने पहले कभी नहीं देखी थी. उस रात माया ने डायरी में लिखा, ‘पिंजरा खुला है, बस पंखों को फड़फड़ाने की आदत डालनी है.’’

चैप्टर 4 : सपनों की उड़ान

दिल्ली जाने की तारीख नजदीक आ रही थी. घर में तनाव का माहौल साफ महसूस किया जा सकता था. विवेक ने माया से बात करना लगभग बंद कर दिया था और सासू मां हर बात पर ताना मार रही थीं. लेकिन इस बार माया के भीतर कुछ बदल गया था. उसे अब अपराधी जैसा महसूस नहीं हो रहा था.

रीयूनियन वाली सुबह, माया ने अपनी साड़ी पहनी, हलका मेकअप किया और अपना बैग उठाया. विवेक ड्राइंगरूम में बैठा अखबार पढ़ रहा था. ‘‘मैं निकल रही हूं,’’ माया ने शांति से कहा.

विवेक ने अखबार नीचे किया. उस की आंखों में गुस्सा और हैरानी थी, ‘‘तुम सच में जा रही हो? घर और बच्चों को इस हाल में छोड़ कर?’’ ‘‘बच्चे अब बड़े हो गए हैं विवेक, और मम्मी जी भी यहां हैं. मैं ने फ्रिज में 2 दिन का खाना बना कर रख दिया है. बस 2 दिन की ही तो बात है,’’ माया ने सूझ बूझ के साथ जवाब दिया.

जब माया टैक्सी में बैठी, तो उस के हाथ कांप रहे थे, लेकिन दिल में एक अजीब सी शांति थी. जैसे ही ट्रेन ने स्टेशन छोड़ा, उसे लगा कि उस के ऊपर से बरसों पुराना कोई बोझ उतर गया है. वह दिल्ली सिर्फ अपनी सहेलियों से मिलने नहीं, बल्कि अपनी खुद से ही मिलने जा रही थी.

चैप्टर 5 : दिल्ली की वह शाम

दिल्ली के एक आलीशान होटल में पुरानी सहेलियों का जमघट लगा था. कोई जज बन चुकी थी, कोई बड़ी कंपनी की मालकिन. जब माया वहां पहुंची, तो सब उसे देख कर खुशी से झूम उठीं.

बातोंबातों में अदिति ने माया की पेंटिंग वाली बात छेड़ दी, ‘‘तुम्हें पता है, माया कालेज में सब से अच्छी पेंटर थी. माया, तुम ने वह पिंजरे वाली पेंटिंग पूरी की?’’ माया ने झिझकते हुए अपने फोन में वह अधूरी पेंटिंग की फोटो दिखाई.

वहां मौजूद एक महिला, जो आर्ट गैलरी चलाती थीं, पेंटिंग देख कर दंग रह गईं और बोलीं, ‘‘माया, इस पेंटिंग में जो दर्द और जो उम्मीद है, वह कमाल की है. क्या तुम इसे मेरी एग्जीबिशन के लिए पूरा कर सकती हो?’’ माया की आंखों में चमक आ गई. सालों बाद किसी ने उसे उस के काम के लिए सराहा था.

उस रात, होटल के कमरे में बैठ कर माया ने महसूस किया कि वह सिर्फ एक ‘मशीन’ नहीं है. उस के पास एक हुनर है, जिसे दुनिया देखना चाहती है.

माया ने अदिति से कहा, ‘‘मैं वापस जा कर अपनी जिंदगी को फिर से पेंट करूंगी.’’

चैप्टर 6 : वापसी और टकराव

2 दिन बाद जब माया घर लौटी, तो घर का नजारा बदला हुआ था. सिंक में जूठे बरतन पड़े थे, ड्राइंगरूम में सामान बिखरा था और विवेक चिड़चिड़ाया हुआ था. ‘‘आ गईं तुम? देख लिया अपना रीयूनियन प्रोग्राम? यहां देखो क्या हाल हो रखा है,’’ विवेक चिल्लाया.

माया ने चुपचाप अपना बैग रखा और रसोई में जाने के बजाय सोफे पर बैठ गई और बोली, ‘‘विवेक, 2 दिन में अगर घर बिखर गया, तो सोचो मैं पिछले 10 सालों से इसे कैसे संभाल रही हूं और अब से चीजें ऐसी नहीं रहेंगी.’’ ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’ सासू मां कमरे से बाहर आते हुए बोलीं.

‘‘मतलब यह कि अब मैं अपनी पेंटिंग को समय दूंगी. मुझे एक गैलरी से औफर मिला है. मैं घर के काम करूंगी, लेकिन अब मैं खुद को नहीं मारूंगी.’’ विवेक हंसने लगा, ‘‘पेंटिंग? उस से घर चलेगा? यह पागलपन छोड़ो और चाय बनाओ.’’

माया उठी, लेकिन रसोई की तरफ नहीं, बल्कि अपने स्टोररूम की तरफ गई. उस ने मुड़ कर कहा, ‘‘चाय खुद बना लीजिए विवेकजी, मुझे अपना कैनवास तैयार करना है.’’

विवेक और उस की मां अवाक रह गए. यह वह माया नहीं थी, जो हर बात पर ‘जी’ कहती थी. यह वह औरत थी, जिस ने अपने अस्तित्व को पहचान लिया था.

चैप्टर 7 : खामोश जंग

अगले कुछ हफ्ते घर में एक ‘कोल्ड वार’ जैसा माहौल रहा. विवेक ने माया से दूरी बना ली थी और सासू मां हर छोटे काम के लिए उसे ताना मारती रहतीं. लेकिन माया ने एक बात गांठ बांध ली थी कि वह अब सफाई नहीं देगी, बल्कि कर के दिखाएगी.

माया सुबह जल्दी उठ कर घर का सारा काम निबटाती, बच्चों को स्कूल भेजती और फिर दोपहर के 2 घंटे अपनी पेंटिंग के लिए सुरक्षित रखती. उन 2 घंटों में वह दुनिया को भूल जाती. उस ने उस ‘खुले पिंजरे’ वाली पेंटिंग को पूरा किया और उस का नाम रखा, ‘रिहाई’.

अदिति को फोन पर पेंटिंग का पूरा हो जाने का खबर दे दी गई और इस पेंटिंग को अदिति का ठिकानों में पोस्ट के जरीए भेज दिया.

एक दिन अदिति का फोन आया, ‘‘माया, तुम्हारी पेंटिंग मैं ने गैलरी के मालिक को दिखाई थी. उन्होंने अगले हफ्ते एक आर्ट फेयर में तुम्हारी पेंटिंग के लिए जगह बुक की है. तुम्हें जरूर आना होगा.’’

माया का दिल जोर से धड़का. यह सिर्फ एक पेंटिंग नहीं थी, यह उस की 10 सालों की खामोश चीख थी. उस ने धीरे से कहा, ‘‘मैं आऊंगी अदिति, चाहे कुछ भी हो जाए.’’

चैप्टर 8 : सफलता की पहली दस्तक

आर्ट फेयर का दिन आ गया. माया ने अपनी सब से सुंदर नीली साड़ी पहनी. जब वह हाल में पहुंची, तो अपनी पेंटिंग को एक खूबसूरत फ्रेम में दीवार पर टंगा देख उस की आंखों में आंसू आ गए.

लोग वहां आ रहे थे, पेंटिंग देख रहे थे और माया के बारे में चर्चा कर रहे थे. तभी एक बुजुर्ग आदमी, जो खुद एक मशहूर पेंटर थे, माया के पास आए और कहा, ‘‘बेटी, इस पेंटिंग में जो रंगों का तालमेल है, वह तो अच्छा है ही, लेकिन जो भाव है, वह दर्द और आजादी की कशमकश, वह दिल को छू लेती है. बहुत खूब… बहुत खूब…’’

शाम होतेहोते खबर मिली कि माया की पेंटिंग एक बड़े बिजनैसमैन ने ऊंचे दाम पर खरीद ली है. उसे एक चैक मिला, जिस पर लिखी रकम विवेक की 5 साल की सैलरी के बराबर थी. माया को उस कागज के टुकड़े से ज्यादा उस सम्मान की खुशी थी, जो उसे वहां मिल रहा था.

जब माया घर लौटी, तो विवेक सोफे पर बैठा इंतजार कर रहा था, ‘‘कहां थी इतनी देर? घर की कोई फिक्र है या नहीं?’’  माया ने शांति से वह चैक विवेक के सामने टेबल पर रख दिया. ‘‘यह क्या है?’’ विवेक ने हैरानी से पूछा. ‘‘यह मेरी मेहनत की कमाई है विवेक. उसी ‘कूड़े’ से मिली है, जिसे तुम ‘पागलपन’ कह रहे थे.’’

विवेक चैक देख कर सन्न रह गया. उसे यकीन नहीं हो रहा था कि माया, जो कल तक एकएक रुपए के लिए उस से पूछती थी, आज खुद कमा रही है.

चैप्टर 9 : दीवारें ढहने लगीं

चैक की रकम ने घर का माहौल बदल दिया, लेकिन माया का मकसद पैसा नहीं था. सासू मां, जो अब तक बातबात पर टोकती थीं, अचानक शांत हो गई थीं. शायद पैसे की ताकत ने उन्हें चुप करा दिया था, लेकिन माया को बुरा लग रहा था कि उस का सम्मान उस की कला से ज्यादा उस चैक से जुड़ा था.

एक रात विवेक बिस्तर पर लेटा हुआ था. उस ने अचानक कहा, ‘‘माया, मुझे माफ कर दो. मुझे लगा था कि तुम बस बोरियत मिटाने के लिए यह सब कर रही हो. मुझे नहीं पता था कि तुम इतनी काबिल हो.’’

माया ने खिड़की के बाहर चांद को देखते हुए कहा, ‘‘विवेक, मुझे तुम्हारे माफी की जरूरत नहीं है, सिर्फ साथ की जरूरत थी. काबिल मैं हमेशा से थी, बस तुम ने कभी मुझे एक इनसान की तरह देखा ही नहीं. तुम ने मुझे सिर्फ एक ‘पत्नी’ और ‘बहू’ के सांचे में देखा.’’

विवेक खामोश रहा. उस रात उसे पहली बार एहसास हुआ कि उस ने अपनी पत्नी के सपनों का गला घोंट कर अपनी सुखसुविधाओं की दीवार खड़ी की थी.

अगले दिन विवेक खुद बाजार से माया के लिए नए ब्रशेस और रंगों का सैट ले कर आया. उस ने उन्हें टेबल पर रखते हुए कहा, ‘‘तुम्हारी अगली एग्जीबिशन में हम सब साथ चलेंगे.’’

माया की आंखों में उम्मीद की एक नई किरण थी. उस ने समझ लिया था कि बदलाव रातोंरात नहीं आता, लेकिन अगर आप खुद को न बदलें, तो दुनिया कभी नहीं बदलेगी.

चैप्टर 10 : सपनों की कार्यशाला

विवेक के बरताव में आया बदलाव माया के लिए किसी चमत्कार से कम नहीं था. लेकिन माया जानती थी कि यह सिर्फ शुरुआत है. उस ने तय किया कि वह अब घर के उस अंधेरे स्टोररूम में नहीं, बल्कि एक ऐसी जगह पेंटिंग करेगी जहां रोशनी और उम्मीद दोनों हों.

माया ने घर के पास ही एक छोटा सा कमरा किराए पर लिया और उसे अपना ‘स्टूडियो’ बनाया. उस का नाम रखा, ‘अस्तित्व आर्ट स्टूडियो’. शुरुआत में महल्ले के लोगों ने तरहतरह की बातें कीं, ‘‘देखो, 2 बच्चों की मां अब दुकान खोल कर बैठेगी.’’ ‘‘घर के काम कौन करेगा?’’

लेकिन माया ने इन बातों पर ध्यान देना छोड़ दिया था. अब उस के बच्चे स्कूल से आ कर सीधा उस के स्टूडियो पहुंचते और अपनी मां को रंगों से खेलते देख गर्व महसूस करते.

एक दिन माया ने अपनी सासू मां को स्टूडियो आने का न्योता दिया. सासू मां हिचकिचाते हुए आईं, लेकिन जब उन्होंने वहां माया का बनाया हुआ उन का खुद का एक पोट्रेट (चित्र) देखा, तो उन की आंखें भर आईं. उस पेंटिंग में माया ने उन की ?ार्रियों को कमजोरी नहीं, बल्कि अनुभव की सुंदरता के रूप में दिखाया था.

उस दिन पहली बार सासू मां ने माया का हाथ पकड़ कर कहा, ‘‘बहू, मैं ने तुझे कभी समझा ही नहीं.’’

चैप्टर 11 : समाज और सवाल

जैसेजैसे माया का नाम बढ़ने लगा, चुनौतियां भी बढ़ती गईं. शहर की एक बड़ी आर्ट काउंसिल ने उसे ‘वुमन औफ द ईयर’ के पुरस्कार के लिए चुना. यह खबर अखबारों में छपी, तो विवेक के कुछ रिश्तेदारों ने नाकभौं सिकोड़ना शुरू कर दिया.

एक पारिवारिक समारोह में विवेक के चाचाजी ने तंज कसा, ‘‘विवेक, अब तो तुम्हारी पत्नी सैलिब्रिटी बन गई है. सुना है, अब वह घर पर खाना भी नहीं बनाती?’’

विवेक गुस्से से लाल हो गया, लेकिन उस से पहले ही माया ने मुसकराते हुए जवाब दिया, ‘‘चाचाजी, खाना तो मैं अभी भी बनाती हूं, बस अब उस खाने में और मेरी जिंदगी में स्वाद बढ़ गया है, क्योंकि अब मैं खुश हूं. और क्या खुशी बांटना गलत है?’’

उस दिन माया को समझ आया कि समाज को एक सफल औरत से उतनी दिक्कत नहीं होती, जितनी एक ‘आजाद’ और ‘आत्मविश्वासी’ औरत से होती है. उस ने तय किया कि वह अपनी कला के जरीए उन औरतों की आवाज बनेगी, जो अभी भी बंद दरवाजों के पीछे अपने सपनों को दम तोड़ते देख रही हैं.

चैप्टर 12 : अस्तित्व की गूंज

माया के स्टूडियो में अब सिर्फ पेंटिंग्स नहीं बनती थीं, बल्कि वहां आसपास की महिलाएं भी आने लगी थीं. कोई सिलाईकढ़ाई में माहिर थी, तो किसी को लिखने का शौक था. माया ने अपने स्टूडियो का एक हिस्सा उन महिलाओं के लिए खोल दिया.

एक दिन एक कम उम्र की लड़की, रश्मि, माया के पास आई. उस की आंखों में वही डर और बेबसी थी, जो सालों पहले माया की आंखों में हुआ करती थी. रश्मि ने कहा, ‘‘दीदी, मुझे पढ़ना है, लेकिन मेरी ससुराल वाले कहते हैं कि पढ़ाई सिर्फ लड़कियों की शादी तक के लिए होती है.’’

माया ने रश्मि का हाथ थामा और उसे अपनी वही ‘रिहाई’ वाली पेंटिंग दिखाई और कहा, ‘‘रश्मि, पिंजरा कभी बाहर से बंद नहीं होता, वह हमारे मन के अंदर बंद होता है. अगर तुम ठान लो, तो कोई तुम्हें नहीं रोक सकता.’’

माया ने रश्मि की पढ़ाई का जिम्मा उठाया और उसे अपने पास पार्टटाइम काम दिया. धीरेधीरे, माया का वह छोटा सा स्टूडियो एक आंदोलन बन गया. अब वह सिर्फ एक पेंटर नहीं थी, वह एक ‘उम्मीद’ बन चुकी थी.

विवेक अब गर्व से लोगों को बताता, ‘‘मैं माया का पति हूं,’’ उस के शब्दों में अब अधिकार नहीं, बल्कि सम्मान था.

चैप्टर 13 : क्षितिज के पार

समय का पहिया तेजी से घूम रहा था. माया की पेंटिंग्स अब सिर्फ स्थानीय गलियारों तक सीमित नहीं थीं. एक सुबह उसे एक ईमेल मिला, जिस ने उस की दुनिया बदल दी. लंदन की एक मशहूर आर्ट गैलरी ने उसे अपनी ‘इंटरनैशनल विमेन आर्टिस्ट्स’ प्रदर्शनी के लिए मुख्य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया था.

यह माया के लिए एक सपना जैसा था. लेकिन इस बार वह डरी हुई नहीं थी. जब उस ने यह खबर विवेक और अपनी सासू मां को सुनाई, तो घर में उत्सव का माहौल हो गया.

‘‘तुम्हें जाना चाहिए माया, यह तुम्हारा हक है,’’ विवेक ने गर्मजोशी से कहा. ‘‘लेकिन विवेक, घर और बच्चे?’’ माया ने मुसकराते हुए पूछा, जैसे वह उस की पुरानी यादों को कुरेद रही हो.

विवेक ने माया का हाथ थामते हुए कहा, ‘‘घर हम संभाल लेंगे. तुम ने 10 साल हमें संभाला है, क्या हम 10 दिन तुम्हें अपनी उड़ान भरने के लिए नहीं दे सकते?’’

जब माया लंदन के उस विशाल हाल में खड़ी थी, जहां दुनियाभर के दिग्गज कलाकार मौजूद थे, उसे अपना वह छोटा सा किचन और वह धूल भरा स्टोररूम याद आया. उस ने महसूस किया कि ‘अस्तित्व’ की तलाश में सब से बड़ा कदम घर की दहलीज पार करना नहीं, बल्कि अपने मन के डर को पार करना था.

चैप्टर 14 : विरासत

लंदन से लौटने के बाद माया सिर्फ एक कलाकार नहीं, बल्कि एक प्रतीक बन चुकी थी. उस के स्टूडियो में अब सैकड़ों लड़कियां और महिलाएं अपनी कला और अपने सपनों के साथ आती थीं.

एक दिन माया ने देखा कि उस की 12 साल की बेटी, जो पहले सिर्फ पढ़ाई और मोबाइल में बिजी रहती थी, कोने में बैठ कर एक कैनवास पर कुछ उकेर रही थी.

माया चुपचाप उस के पीछे जा कर खड़ी हो गई. बेटी ने एक मजबूत पेड़ बनाया था, जिस की जड़ें जमीन में गहरी थीं, लेकिन उस की टहनियां आसमान को छू रही थीं.

‘‘यह क्या है बेटा?’’ माया ने पूछा. ‘‘मम्मी, यह आप हो. आप घर को भी संभालती हो और आसमान को भी छूती हो. मैं भी बड़ी हो कर आप के जैसा बनना चाहती हूं,’’ बेटी ने गर्व से कहा.

माया की आंखों में खुशी के आंसू आ गए. उसे सम?ा आया कि उस की सफलता सिर्फ पुरस्कारों और पैसों में नहीं थी, बल्कि उस आत्मविश्वास में थी जो उस ने अपनी अगली पीढ़ी को विरासत में दिया था. उस ने एक ऐसी राह बना दी थी, जिस पर उस की बेटी को कभी अपनी पहचान के लिए समझोता नहीं करना पड़ेगा.

चैप्टर 15 : नया सवेरा

कहानी वहीं पहुंच गई थी जहां से शुरू हुई थी. एक सुबह की पहली किरण. लेकिन आज किचन में बरतनों की आवाज के साथसाथ एक मधुर संगीत भी बज रहा था. विवेक आज खुद चाय बना रहा था और बच्चे अपना नाश्ता खुद तैयार कर रहे थे.

माया बालकनी में खड़ी उगते हुए सूरज को देख रही थी. उस के हाथ में वही पुरानी डायरी थी. उस ने डायरी का वह आखिरी पन्ना खोला, जो खाली था और उस पर लिखा, ‘अस्तित्व किसी और की दी हुई पहचान नहीं है, यह वह आग है जो हमारे भीतर जलती है. हम औरतें त्याग की मूरत नहीं, बल्कि असीम संभावनाओं का सागर हैं. पिंजरा अब नहीं है, क्योंकि मैं ने उड़ना सीख लिया है.’

आज माया के चेहरे पर वह उदासी नहीं थी, जो कांच की दीवारों के पीछे कैद औरतों के चेहरे पर होती है. आज उस के पास उस की अपनी दुनिया थी, अपना नाम था और अपना सम्मान था. वह अब सिर्फ ‘विवेक की पत्नी’ या ‘बच्चों की मां’ नहीं थी, वह ‘माया’ थी, एक पूर्ण, सशक्त और स्वतंत्र स्त्री.

सूरज की रोशनी माया के चेहरे पर पड़ रही थी और वह मुसकरा रही थी. एक नए सफर की शुरुआत के लिए.  Women’s Empowerment Story

लेखक : अशोक नंदन

Story : बसंती

Story. गांव का एकलौता पुरोहित भोला इस बात से पूरी तरह वाकिफ था कि मरने से पहले बसंती की मां बेटी के पास कुछ चांदी के सिक्के व जेवरात छोड़ गई है, जिसे किसी बहाने से हासिल कर के वह कुछ दिनों के लिए अपनी बदहाली तो दूर कर ही सकता है.

थोड़ी देर में ही पूजा का काम खत्म कर उस ने एक गहरी नजर से बीमार सुमन की ओर देखा. फिर बसंती की ओर मुखातिब हो कर बोला, तेरी बेटी को कोई प्रेतात्मा परेशान कर रही है. अब इसे बचाना बड़ा मुश्किल है. अच्छा होगा कि तू इस मनहूस बच्ची का मोह छोड़ कर फिर से गोद भरने की कोशिश करे.

पुरोहित से ऐसा जवाब सुन कर बसंती दुखी आवाज में बोली, बाबा, अगर मेरी एकलौती बेटी मर गई, तो फिर मैं अपनी सूनी गोद ले कर यह पहाड़ सी जिंदगी कैसे काट पाऊंगी? बसंती की इस कमजोरी से पुरोहित को अपने अंधविश्वास का तीर सही निशाने पर लगने का एहसास हुआ. उस ने सहज ही यह जान लिया कि अब देरसवेर वह उस की झोली  में जरूर आ गिरेगी.

पुरोहित भोला मन ही मन मुसकराते हुए मीठी आवाज में बोला, तेरी मां अपने मन में धनदौलत का मोह लिए ही मर गई, इसलिए उस की आत्मा प्रेतलोक में बेचैन भटक रही है. अब वही बेचैन आत्मा प्रेतलोक से लौट कर इस घर में आ बैठी है, जिस के असर से तेरी गोद और सुमन की जिंदगी दोनों खतरे में है.

तो फिर इस प्रेतात्मा से पीछा छुड़ाने का कोई उपाय बताइए बाबा? बसंती ने सहमते हुए पूछा. तुम फौरन अपनी मां के सारे जेवरात और चांदी के सिक्के अपने हाथ से छू कर किसी ब्राह्मण को दान कर दो. उसी दान की बदौलत सुमन को एक नई जिंदगी मिलेगी और तुम्हें मां बनने का सुनहरा मौका.

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पुरोहित की कही बात पर गंवार बसंती ने पूरी तरह यकीन कर लिया. फिर भी वह अपनी लाचारी जाहिर करते हुए बोली, “लेकिन बाबा, मैं तो बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर पहले से ही अपने सारे जेवर बेच चुकी हूं, अब इस हाल में मां के जेवर भी दान में दे दूंगी, तो फिर वक्त पड़ने पर किस के आगे हाथ पसारने जाऊंगी? कौन सहारा देगा मुझे ’’

बसंती की मजबूरी को सुन कर पुरोहित को अपना खेल बिगड़ता नजर आया. लेकिन तुरंत ही लोभ का दूसरा पासा फेंकते हुए वह बोला, ‘‘क्या तेरे मन में बेटा पाने की तनिक भी लालसा नहीं है?’’ ‘‘लालसा तो कब से लगी है…’’ बसंती झेंपते  हुई बोली, ‘‘सिर्फ एक बेटे की कमी से मेरी पूरी जिंदगी बोझ जैसी बन गई है. एक बेटा पाने के लिए मैं कब से तरस रही हूं.’’ ‘‘तो ठीक है, कल सुबह तुम अपनी मां के सारे जेवर मुझे दान में दे देना. फिर देखना, मैं तेरे अंधेरे घर में कितनी जल्दी उजाला कर देता हूं,’’ इतना कहते हुए भोला की नजर बसंती की देह से फिसलती हुई वहां जा कर ठहर गई, जहां लोहे की पुरानी संदूकची पड़ी हुई थी.

अब बसंती को पुरोहित की नीयत समझने में जरा भी देर नहीं हुई, पर घर में अकेली और देह से कमजोर बसंती मन मसोस कर रह गई. ‘‘अब क्या सोचने लगी?’’ भोला ने उसे टोका, ‘‘क्या मेरा सुझाव ठीक नहीं लगा?’’ ‘‘नहीं, बिलकुल नहीं,’’ बसंती ने ऊंची आवाज में नफरत से कहा, ‘‘अपनी गोद दोबारा भरने के लिए मां के कीमती जेवर किसी और के हाथ में देने की हिम्मत मुझ में नहीं है.’’

बसंती के इस रूखे बरताव ने पुरोहित के लहलहाते अरमानों पर ओले बरसा दिए. फिर भी पुरोहित ने हार नहीं मानी और धीमी आवाज में बोला, ‘‘जब बेटी की बीमारी दूर होने की उम्मीद पर तुम ने अपने जेवर बेच दिए, तो दोबारा मां बनने की उम्मीद में तुम अपनी मां के पुराने गहने पुरोहित को दान में नहीं दे सकतीं? जानती नहीं, पुरोहित को दिया हुआ दान लोकपरलोक दोनों को सुधारता है?’’

पुरोहित ने एक बार फिर उस संदूकची की ओर देखा, तो बसंती का रोमरोम एक अनजाने खौफ से सिहर उठा. अभी वह खामोश खड़ी थी कि पुरोहित की पत्नी कमला पति को तलाशती हुई वहां आ पहुंची और तेज आवाज में बोली, ‘‘क्योंजी, यजमानी के इस काम से जो आमदनी होती है, उसे आप शराब और गांजा पीने में उड़ा देते हैं, फिर यह धंधा सिर पर ढोने से क्या फायदा, जब घर में बीवीबच्चे रोटी के लिए तरस रहे हों?’’

‘‘ठीक है, आज का ‘सीधा’ बसंती बहू से ले लो और घर जा कर भोजन बनाओ,’’ पुरोहित ने पत्नी को टालने की नीयत से कहा और जल्दी से पोथीपतरा समेट कर दूसरे यजमान के घर कथा बांचने चला गया.

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भोला के जाते ही ‘सीधा’ लेने के लिए ठहरी कमला बसंती को उदास देख कर संजीदगी से पूछ बैठी, ‘‘इस पूजापाठ के पीछे तेरी क्या मुराद है बहू?’’ ‘‘मासूम बेटी की सलामती, जो अब मुमकिन नहीं लगती.’’ ‘‘ऐसा क्यों?’’ कमला उतावली हो कर पूछ बैठी, ‘‘क्या इस पूजापाठ पर तुझे बिलकुल भरोसा नहीं?’’ ‘‘भरोसा तो है चाची, लेकिन आज के पुरोहित पूजापाठ की ओट में अपने यजमान को उलटा पाठ पढ़ाना शुरू कर दिए हैं. धर्मकर्म के नाम पर अब ये ढोंगी अपने यजमान का धन और धर्म दोनों लूट लेना चाहते हैं.’’

‘‘यह तुम क्या बकने लगी बहू?’’ कमला हैरत से बोली, ‘‘मैं ने क्या पूछा और तू जवाब क्या देने लगी?’’ ‘‘सच कहती हूं चाची…’’ बसंती का गला भर आया, ‘‘बेटी की लंबी बीमारी ने मुझे बुरी तरह से झकझोर दिया है और इसी आफत में पुरोहितजी दोबारा गोद भरने का लालच दे कर मेरा सबकुछ ठग लेना चाहते हैं.’’ बसंती की पीड़ा सुन कर कमला का दिमाग झनझना उठा. उस के हाल पर तरस खा कर वह बोली, ‘‘ठीक है बहू, इस समय मैं खाना बनाने जा रही हूं. लेकिन शाम को इस बारे में तुम से फिर बात करूंगी.’’

शाम को कमला बसंती से मिल कर उस की आपबीती से पूरी तरह वाकिफ हो चुकी थी. दूसरे दिन सुबह पुरोहित जैसे ही कथा बांचने के लिए बसंती के घर पहुंचा, तो उस के पीछेपीछे कमला भी आ गई. पत्नी को इस तरह आया देख पुरोहित अपनी लाल आंखों से उसे घूरते हुए रूखे स्वर में बोला, ‘‘आज सुबह से ही तुम मेरे पीछे क्यों पड़ी हो? क्या चाहती हो तुम?’’ ‘‘बस यही कि अब आप यह यजमानी का पेशा छोड़ दीजिए,’’ कमला ने कहा. ‘‘वह क्यों?’’ भोला ने हैरत से पूछा.

‘‘क्योंकि अब यह पेशा शरीफ ब्राह्मणों का सुकर्म नहीं, बल्कि खातेपीते ब्राह्मणों का कुकर्म बन गया है. अब यह पेशा पुरोहित और यजमान के पाक रिश्ते के बीच एक ऐसी दरार पैदा करता जा रहा है, जो आने वाले दिनों में दोनों की शराफत पर एक सवालिया निशान लगा सकता है,’’ कमला ने पति की ओर देख कर संजीदगी से कहा.

पुरोहित ने जोर से चीख कर कमला को एक जबरदस्त धक्का दिया, जिस से वह सामने की दीवार से जा टकराई और उस का सिर लहूलुहान हो गया. चोट बड़ी गंभीर लगी थी. कमला फूटफूट कर रो पड़ी, लेकिन भोला पर इस का कोई असर नहीं हुआ. वह गुस्से में अपनी पत्नी को और भी भलाबुरा कहने लगा.

पति की घुड़की से बेअसर कमला बरसती आंखों से उसे देखती हुई बोली, ‘‘आज मुझे भी पता चल गया है कि पुरोहित कितना नीच और घटिया इनसान होता है, जो अपने यजमान की मजबूरी पर तरस खाने के बजाय उस की दौलत व इज्जत लूटने को तैयार हो जाता है.

‘‘अब मेरे लिए विधवा की जिंदगी जी लेना आसान है, मगर किसी ढोंगी, लोभी, पाखंडी, ठग और धर्मकर्म का पेशा करने वाले पुरोहित की सुहागन बन कर जी लेना आसान नहीं. ऐसा कभी नहीं होगा.’’ इतना कह कर कमला जैसे ही वहां से चलने को हुई कि अचानक पुरोहित के भीतर का इनसान जाग उठा और कमला के सिर पर हाथ रखते हुए वह भरे गले से बोला, ‘‘तेरी कसम, यह पूजापाठ, हवन, जाप, लोकपरलोक, पुरोहित और यजमान सब बनावटी बातें हैं.”

‘‘अब इस गलत काम को मैं कभी नहीं दोहराऊंगा. ऐसे दकियानूसी विचारों में कोरे अंधविश्वास व दिमागी वहम के सिवा कुछ और नहीं है. तुम आखिरी बार मुझे माफ कर दो.’’  फिर कमला बिना पति की ओर देखे बसंती की बीमार बेटी सुमन को गोद में उठा कर तेज कदमों से डाक्टर के पास चल पड़ी. Story

Exclusive Interview: मैं तीन तलाक को पसंद नहीं करती – स्मृति मिश्रा

Exclusive Interview: मुसलिम औरतों के हक से जुड़े शाहबानो बनाम मोहम्मद अहमद खान के ऐतिहासिक सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर कोर्टरूम ड्रामा फिल्म ‘हक’ को भले ही बौक्स आफिस पर ज्यादा कामयाबी न मिली हो, मगर इस फिल्म में शाजिया बानो के किरदार में यामी गौतम और शाजिया बानो के साथ खड़े रहने वाले नौकरानी उज्मा के किरदार में स्मृति मिश्रा की अदाकारी को काफी सराहा जा रहा है.

रायबरेली से लखनऊ, लखनऊ से दिल्ली और दिल्ली से मुंबई तक का सफर करने वाली हीरोइन स्मृति मिश्रा पिछले 13 सालों से ऐक्टिंग जगत में हैं. वे अब तक ‘सावधान इंडिया’, ‘अधूरी कहानी हमारी’, ‘गुस्ताख दिल’, ‘मंफोर्डगंज की बिनिया’, ‘धर्मपत्नी’ जैसे सीरियलों और ‘अ से अनार’, ‘रेड’, ‘तुम को मेरी कसम’ जैसी फिल्मों के अलावा नैटफ्लिक्स की वैब सीरीज ‘शी2’ में ऐक्टिंग कर चुकी हैं.

पेश हैं, उन से हुई बातचीत के खास अंश :

आप की एक फिल्म ‘हक’ चर्चा में है. इस को ले कर आप क्या कहेंगी?

आप सभी जानते हैं कि यह फिल्म शाहबानो कांड पर आधारित है, जिस में मैं ने उज्मा का किरदार निभाया है. मतलब लोग मु झे उज्मा के किरदार में देख रहे हैं. सभी को पता है कि शाहबानो के संघर्ष में उज्मा चट्टान की तरह खड़ी रह कर उस का साथ देती रही. इस फिल्म मेरे सभी सीन हीरोइन यामी गौतम के साथ ही हैं, क्योंकि उज्मा तलाक के खिलाफ है.

उज्मा का मानना है कि तलाक देना गलत है. इसी वजह से मैं ने इस किरदार को करने के लिए हामी भरी, क्योंकि मैं ने महसूस किया है और लोगों से बातचीत कर के भी मु झे यही पता चला कि छोटे से छोटे तबके के लोग भी तलाक के खिलाफ हैं. वैसे भी औरत कोई चीज नहीं है कि आप ने तीन बार तलाक कह कर उसे तलाक दे दिया.

निजी जिंदगी में आप का साबका कभी उज्मा जैसी किसी औरत से पड़ा है या नहीं और तलाक को ले कर आप की अपनी सोच क्या है?

यह बहुत विवादास्पद विषय है. इस पर ज्यादा बोलना मेरे लिए ठीक नहीं होगा. लेकिन मैं ने जोकुछ पढ़ा है, उस आधार पर मैं तीन तलाक को कभी पसंद नहीं करती. तीन बार तलाक कह कर आप ने एक औरत को छोड़ दिया. इसे जायज कभी नहीं ठहराया जा सकता.

आप ने एक औरत के साथ रहते हुए एक लंबा वक्त गुजारा, आप के बच्चे हुए, पर छोटी सी बात पर बिना किसी सोचविचार के उस औरत को अपनी सफाई में कुछ कहने का मौका दिए बिना, सिर्फ तीन बार तलाक बोला और तलाक दे दिया… मेरी सम झ में नहीं आता कि कैसे लोग इसे कानूनी सही कहते रहे हैं.

13 साल के अपने ऐक्टिंग कैरियर के अनुभव को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

इन 13 सालों में बतौर कलाकार मु झे सीखने को बहुतकुछ मिला. यह मौका किसी दूसरे क्षेत्र में नहीं मिल सकता. हम हर उस किरदार को जीते हैं, जो इस दुनिया में है. हम सिर्फ ऐक्टिंग नहीं करते, हम परदे पर किसी भी किरदार को जीते हुए उसे अंदर से महसूस करते हैं.

फिल्म ‘पवई’ में क्या खास है?

फिल्म ‘पवई’ में मुंबई के इस विकासशील उपनगर पवई में रहने वाली 3 अलगअलग औरतों की कहानियों को दिखाया गया है. इस में मैं ने उषा का किरदार निभाया है. इसी फिल्म में 2 और औरतों की कहानी है. इस फिल्म में इस बात को दिखाया गया है कि औरत चाहे अमीर हो या गरीब हो या फिर कामकाजी हो, सभी को संघर्ष करना पड़ता है, भले ही उन के संघर्ष के तरीके अलग हों.

अपने किरदार उषा को ले कर आप क्या कहना चाहेंगी?

उषा का किरदार एक ऐसी औरत का है, जो अपने पति के साथ बिहार से मुंबई आती है. अब उस का पति नहीं है और वह लोगों के घरों का काम करती है. वह अपनी बेटी की भी परवरिश कर रही है. उस को मुंबई के बारे में कुछ नहीं पता है. वह तो अपने पति के भरोसे यहां आई थी, पर अब पति नहीं है. उस के पति ने जो मकान खरीदा था, उसे भी उस का देवर हड़पने की कोशिश कर रहा है.

इस किरदार के लिए आप ने किस तरह का होमवर्क किया?

मेरे घर में एक कामवाली बाई है. उस की दोस्त के साथ भी ऐसा हादसा हो चुका है. उस का पति उसे गांव से शहर ले कर आया था. पर शहर आते ही कि कुछ समय के बाद उस का पति बीमार हुआ और इस संसार को अलविदा कह गया. उस के बाद उस ने जिस तरह का संघर्ष किया, वह सब उस ने मु झे बताया था, तो इस किरदार को निभाते समय मु झे वह सब याद आया और मैं ने स्क्रिप्ट की भी मदद ली.

किसी भी किरदार को निभाते समय आप अपनी निजी जिंदगी के अनुभवों का कैसे उपयोग करती हैं?

जब किसी किरदार से जुड़ा कोई हादसा मेरे साथ कभी घट चुका होता है, तो मैं उसे याद कर अपने किरदार में डालने की कोशिश करती हूं. अगर वैसा हादसा मेरी जिंदगी में न घटा हो, तो आसपास के लोगों से बात कर के जानने की कोशिश करती हूं.

कलाकार होने के साथसाथ आप पत्नी, बहू और एक बेटे की मां भी हैं. आप इन सारी जिम्मेदारियों को कैसे निभाती हैं?

मैं इन सभी जिम्मेदारियों के बीच तालमेल बिठाने की कोशिश करती हूं और मेरी कोशिश रहती है कि मैं किसी को भी शिकायत करने का मौका न दूं. पर मु झे इन सारी जिम्मेदारियों को निभाते हुए कई बार अपनी दीदी और पति से भी सहयोग लेना पड़ता है. Exclusive Interview

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