आज भी कायम है छुआछूत

हाल ही में 3 अक्तूबर, 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने जेलों में जाति पर आधारित भेदभाव रोकने के लिए दायर जनहित याचिका पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया.

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि जेल नियमावली जाति के आधार पर कामों का बंटवारा कर के सीधे भेदभाव करती है. सफाई का काम सिर्फ निचली जाति के कैदियों को देना और खाना बनाने का काम ऊंची जाति वालों को देना आर्टिकल 15 का उल्लंघन है.

सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को जेल मैन्युअल के उन प्रावधानों को बदलने का निर्देश दिया है, जो जेलों में जातिगत भेदभाव को बढ़ावा देते हैं.

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला यह तो साफतौर पर जाहिर करता है कि आजादी के 77 साल बाद भी छुआछूत समाज में ही नहीं, बल्कि सरकारी सिस्टम पर भी बुरी तरह हावी है.

जेलों के अंदर जातिगत भेदभाव आम बात है. जेल में कैदियों की जाति के आधार पर उन्हें काम सौंपा जाता है, जहां दलितों को अकसर साफसफाई जैसे काम करने के लिए मजबूर किया जाता है.

समाज में जातिगत भेदभाव कोई नई बात नहीं है. आएदिन देश के अलगअलग इलाकों में दलितों से छुआछूत रखने और उन पर जोरजुल्म करने की घटनाएं होती रहती हैं.

आज भी गांवकसबों के सामाजिक ढांचे में ऊंची जाति के दबंगों के रसूख और गुंडागर्दी के चलते दलित और पिछड़े तबके के लोग जिल्लतभरी जिंदगी जी रहे हैं.

गांवों में होने वाली शादी में दलितों व पिछडे़ तबके को खुले मैदान में बैठ कर खाना खिलाया जाता है और खाने के बाद अपनी पत्तलें उन्हें खुद उठा कर फेंकनी पड़ती हैं.

टीचर मानकलाल अहिरवार बताते हैं कि गांवों में मजदूरी का काम दलित और कम पढ़ेलिखे पिछड़ों को करना पड़ता है. दबंग परिवार के लोग अपने घर के दीगर कामों के अलावा अनाज बोने से ले कर फसल काटने तक के सारे काम करवाते हैं और बाकी मौकों पर छुआछूत रखते हैं. छुआछूत बनाए रखने में पंडेपुजारी धर्म का डर दिखाते हैं.

25 साल की होनहार लड़की काव्या यों तो गांव में पलीबढ़ी, पर अपनी पढ़ाई के बलबूते वह बैंक में क्लर्क सिलैक्ट हो गई और उस की पोस्टिंग इंदौर में हो गई.

इंदौर में नौकरी करते वह अपने साथ बैंक में काम करने वाले हमउम्र लड़के की तरफ आकर्षित हुई. वह लड़का भी उसे चाहता था.

काव्या ने घर में बिना बताए उस लड़के से शादी कर ली. वह जानती थी कि उस के मातापिता शादी करने की इजाजत हरगिज नहीं देंगे, क्योंकि वह लड़का दलित जाति का था.

देरसवेर इस बात की जानकारी गांव में रहने वाले मातापिता को लग ही गई. इस बात को ले कर वे काफी आगबबूला हो गए और इंदौर पहुंच कर तुरंत ही काव्या को गांव ले आए.

घर में काव्या को दलित लड़के से शादी करने की बात को ले कर इतना टौर्चर किया गया कि उस ने फांसी लगा कर खुदकुशी कर ली.

साल 2024 के मार्च महीने में मध्य प्रदेश के नरसिंहपुर जिले से आई इस खबर ने साबित कर दिया है कि समाज में छुआछूत आज भी बदस्तूर जारी है. किस तरह पढ़ेलिखे गांव के मातापिता ने अपने ?ाठे मानसम्मान के लिए अपनी बेटी की खुशियां ही छीन लीं.

गांवकसबों और छोटे शहरों में आज भी लड़की को यह हक नहीं है कि वह अपनी मरजी और पसंद के लड़के से शादी कर सके. दूसरी जाति और धर्म में शादी करने पर परिवार और समाज के बहिष्कार का सामना करना पड़ता है और कई बार तो जान से हाथ भी धोना पड़ता है.

गांवकसबों में छुआछूत का आलम यह है कि दलितों के महल्ले, बसावट अलग हैं. इन के पानी पीने के नल और मंदिर तक अलग हैं. भूल से भी इन्हें ऊंची जाति के लोगों के नल को छूने और उन के मंदिर में घुसने की इजाजत नहीं है.

अपने चुनावी फायदे के लिए केंद्र और राज्य सरकारें दलितों को साधने के लिए भले ही करोड़ों रुपए खर्च कर संत रविदास का मंदिर बनवा रहे हों, लेकिन देश के ग्रामीण अंचलों में आज भी दलितों को छुआछूत का सामना करना पड़ रहा है.

मध्य प्रदेश सरकार गांवकसबों में छुआछूत मिटाने के लिए भले ही ‘स्नेह यात्राएं’ निकाले, गांधी जयंती पर ‘समरसता’ भोज कराए, मगर गरीब और दलितों के लिए सामाजिक समरसता का सपना अभी भी अधूरा है, क्योंकि तमाम कोशिशों के बाद भी आज लोग अपनी छोटी सोच से बाहर नहीं आ पाए हैं.

छुआछूत का एक मामला मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले में दलित औरतों के साथ सरकारी नल पर पानी भरने को ले कर पिछले साल सामने आया था.

17 अगस्त, 2023 को छतरपुर जिले के गांव पहरा के गौरिहार थाना क्षेत्र के पहरा चौकी की रहने वाली 2 औरतें गांव में पानी की कमी के चलते एक सरकारी नल पर पानी भरने गई हुई थीं.

यह नल गांव के यादव परिवार के घर के सामने लगा हुआ था. जैसे ही इन उन औरतों ने पानी भरने के लिए बरतन हैंडपंप के नीचे रखा और नल चलाना शुरू किया, तभी वहां मंगल यादव, दंगल यादव और देशराज यादव आ गए और उन के बरतन फेंकते हुए कहा, ‘तुम दलित जाति की हो, तुम ने हमारे इलाके के इस नल को कैसे छुआ? तुम्हारे छूने से नल अशुद्ध हो गया.’

सरकारी नल पर पानी भरने गई दलित औरतों संदीपा और अभिलाषा ने जब उन से मिन्नतें करते हुए कहा, ‘हमारे घर में पानी नहीं है. पानी के बिना खाना भी नहीं बना है, बच्चे भूख से बेचैन हैं.’

इस बात पर हमदर्दी दिखाने के बजाय इन दबंगों ने मारपीट शुरू कर दी. अपने साथ हुई मारपीट की शिकायत करने पुलिस थाना पहुंची इन दोनों औरतों को पुलिस ने भी दुत्कार दिया.

छुआछूत से जुड़ी यह कोई अकेली घटना नहीं है. मध्य प्रदेश के अलगअलग इलाकों में इस तरह की घटनाएं आएदिन होती रहती हैं. कभी स्कूलों में दलित बच्चों के जूठे बरतन धोने से मना किया जाता है, तो कभी उन्हें धर्मस्थलों पर घुसने नहीं दिया जाता.

छुआछूत से जूझते हैं लोग

60 साल की उम्र पार कर चले लोगों की पीढ़ी ने छुआछूत का जो रूप समाज में देखा था, उसे उन्होंने उस समय के हालात के लिहाज से सहज तरीके से अपना लिया था, मगर मौजूदा दौर की नौजवान पीढ़ी को यह नागवार गुजरता है.

72 वसंत देख चुके डोभी गांव के सालक राम अहिरवार बताते हैं कि आजादी मिलने के बाद देश से अंगरेज भले ही चले गए थे, मगर गांव में रहने वाले ऊंची जाति के जमींदारों का जुल्म कम नहीं हुआ था. दलित तबके का कोई भी इन जमींदारों की हवेली के सामने से गुजरता था, तो अपने पैर के जूतों को सिर पर रख कर निकलता था.

दलितों के बेटों को शादी में घोड़ी पर चढ़ने की मनाही थी. गांव के ऊंची जाति के लोग उन्हें शादीब्याह में बुलाते तो थे, मगर भोजन उन्हें जमीन पर बैठ कर करना होता था और अपनी पत्तल खुद ही फेंकनी पड़ती थी. पीने के लिए घर से पानी भर कर ले जाना पड़ता था.

उस दौर की पीढ़ी को यह बुरा भी नहीं लगता था. वक्त बदलने के साथ जब आज की नौजवान पीढ़ी पढ़लिख कर  पुराने रिवाजों को नहीं मानती, तो टकराव के हालात बनते हैं और दलितों को जोरजुल्म का सामना करना पड़ता है.

मध्य प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में हर साल दलितों के घुड़चढ़ी करने और बरात में डीजे बजाने पर ?ागड़ा होता है.

पढ़ीलिखी नई पीढ़ी इन दकियानूसी रिवाजों को नहीं मानती. गांवकसबों में आज शादियों में बफे सिस्टम तो लागू हो गया है, मगर दलित समुदाय के लिए अलग काउंटर बनाए जाते हैं, उन्हें ऊंची जाति के लोगों के साथ दावत करने की आजादी आज भी नहीं है.

ऐसा नहीं है कि दलितों से छुआछूत बिना पढ़ेलिखे लोगों या गांवकसबों तक सीमित है, बल्कि पढ़ेलिखे लोग भी इसे बदस्तूर अपना रहे हैं.

2 साल पहले मध्य प्रदेश के एक मंत्री, जो दलित समुदाय से आते थे, भी ऊंची जाति के लोगों से छुआछूत के शिकार हुए थे.

दरअसल, वे मंत्री ठाकुरों के परिवार में मातमपुरसी के लिए गए थे. वहां और भी ऊंची जाति के नेता मौजूद थे. जब खानेपीने की बारी आई, तो ऊंची जाति के दूसरे लोगों को स्टील की थाली में खाना परोसा गया और दलित समुदाय से आने वाले मंत्री को डिस्पोजल थाली परोसी गई थी.

समाज में छुआछूत के लिए धर्म और मनुवादी व्यवस्था भी जिम्मेदार है. मनुवादियों ने अपने फायदे के लिए वर्ण व्यवस्था लागू की. ब्राह्मणों ने अपने को श्रेष्ठ साबित कर समाज को 4 वर्णों में बांटा और शूद्रों को उन के मौलिक अधिकारों से दूर रखा. उन्हें शिक्षा का अधिकार नहीं दिया गया. इस के पीछे की वजह भी यही थी कि ये लोग पढ़लिख कर काबिल न बन सकें. यही वजह रही कि दलितों ने धर्म परिवर्तन का रास्ता अपनाया.

स्कूलकालेज भी नहीं अछूते

राष्ट्र निर्माण की शिक्षा देने वाले सरकारी संस्थान भी छुआछूत को खत्म नहीं कर पा रहे हैं. ‘ऐजूकेशन मौल’ कहे जाने वाले इंगलिश मीडियम प्राइवेट स्कूलों में सरकारी अफसरों और ऊंची जाति के पैसे वाले लोगों के बच्चे पढ़ रहे हैं और सरकारी स्कूलों में गरीब, मजदूर, दलितपिछड़े तबके के बच्चे पढ़ रहे हैं.

सरकारी स्कूलों में दिए जाने वाले मिड डे मील में भी दलित और ऊंची जाति के छात्रछात्राओं के बीच गुटबाजी देखने को मिलती है.

स्कूल में ऊंची जाति के बच्चे दलित और पिछड़ी जाति के बच्चों के साथ भोजन करना पसंद नहीं करते. उन्हें यह सीख अपने घर से तो मिलती ही है, टीचर भी इस खाई को नहीं पाट रहे.

अगर कोई दलित जाति की महिला भोजन बना कर परोसती है, तब भी ऊंची जाति के बच्चे वह भोजन नहीं करते. अगर कोई ऊंची जाति की रसोइया खाना बनाती है, तो वह दलित बच्चों के जूठे बरतन नहीं धोती.

साल 2022 में मध्य प्रदेश के जबलपुर जिले से 50 किलोमीटर दूर चरगवां थाना क्षेत्र से सटे गांव सूखा में दलित बच्चों से सरकारी स्कूल में खाने के बरतन धुलवाए जाने का मामला सामने आया था.

इसी साल गुजरात के मोरबी जिले के एक गांव में प्राइमरी स्कूल में मिड डे मील का खाना पिछड़े समुदाय के छात्रों ने इसलिए नहीं खाया, क्योंकि यह दलित औरत द्वारा बनाया गया था

मिड डे मील बनाने वाली दलित महिला गरमी की छुट्टियों के बाद जब स्कूल पहुंची, तो प्रिंसिपल ने 100 बच्चों के लिए खाना बनाने के लिए कहा, लेकिन एससी जाति के केवल 7 बच्चे ही भोजन के लिए पहुंचे. दूसरे दिन प्रिंसिपल ने 50 बच्चों के लिए खाना बनाने को कहा, जिसे सिर्फ दलित बच्चों ने ही खाया.

साल 2023 में कर्नाटक के तुमकुरु जिले से बेहद ही हैरान कर देने वाला मामला सामने आया था. सिरा तालुका के नरगोंडानहल्ली सरकारी स्कूल में कुछ बच्चों ने मिड डे मील के भोजन का बहिष्कार कर दिया था, जिस की वजह भी एक दलित महिला द्वारा भोजन पकाया जाना थी.

छुआछूत की समस्या स्कूलों में नासमझ बच्चों के बीच ही नहीं, बल्कि भविष्य गढ़ने वाले टीचरों के बीच भी है. लंच टाइम में ऊंची जाति के टीचर भी दलित जाति के टीचरों के साथ लंच बौक्स शेयर करना पसंद नहीं करते. स्कूल के अलावा दूसरे दफ्तरों में भी उन के साथ जातिगत भेदभाव किया जाता है.

दलित जाति के चपरासी से दफ्तरों में झाड़ू लगाने और शौचालय साफ करने का काम करवाया जाता है, मगर उन के हाथ से खानेपीने की चीज और पानी नहीं मंगाया जाता.

जातियों में बंट गए देवीदेवता

जिस तरह समाज जातियों में बंटा हुआ है, उसी तरह उन्होंने देवीदेवता को भी बांट लिया है. पंडितों ने परशुराम को, कायस्थों ने चित्रगुप्त को, तो यादवों ने कृष्ण को ले लिया. कुशवाहा ने कुश से संबंध जोड़ लिया, कुर्मियों ने लव को पकड़ लिया, तो कहारों ने जरासंध को अपना पूर्वज बता दिया. लोहारों ने विश्वकर्मा के साथ संबंध जोड़ लिया.

दलितों की एक जाति ने वाल्मीकि से अपना नाता जोड़ा, तो एक तबका रैदास को भगवान मानने लगा. कुम्हारों ने अपना संबंध ब्रह्मा से बता दिया. तमाम जातियों को कोई न कोई देवता या कुलदेवता या ऋषि पूर्वज के तौर पर मिल गए.

ऊंची जाति के लोगों से हुई बेइज्जती से छुटकारा पाने का ये इन जातियों का अपना तरीका था. शूद्र और अतिशूद्र होने की बेइज्जती से छुटकारा पाने के लिए उन्होंने देवीदेवताओं का ढाल बना लिया. यह जाति व्यवस्था से विद्रोह भी था और ऊंची जातियों की तरह बनने की लालसा भी थी.

अमीर ऊंची जाति वालों की होड़ में दलितों ने भी अपनेअपने देवीदेवताओं के मंदिर बना लिए, मगर पुजारी की कुरसी उन की जेब ढीली करने वाले पंडितों के हाथ में ही रही.

‘गुलामगिरी’ किताब से सबक लें सरकार हिंदूमुसलिम का भेद करा कर कट्टरवादी हिंदुत्व की हिमायती तो बनती है, पर हिंदुओं के बीच ही जातिवाद की दीवार तोड़ने और दलितपिछड़े तबके के लोगों पर दबंग हिंदुओं के द्वारा किए जाने वाले जोरजुल्म पर चुप्पी साधे रहती है.

मध्य प्रदेश के होशंगाबाद जिले के पेशे से वकील मनीष अहिरवार कहते हैं कि एक इनसान का दूसरे इनसान के साथ गुलामों सरीखा बरताव करना सभ्यता के सब से शर्मनाक अध्यायों में से एक है. लेकिन अफसोस है कि यह शर्मनाक अध्याय दुनियाभर की तकरीबन सभी सभ्यताओं के इतिहास में दर्ज है. भारत में जाति प्रथा के चलते पैदा हुआ भेदभाव आज तक बना हुआ है.

वे आगे कहते हैं कि एक बार ज्योतिबा फुले की किताब ‘गुलामगिरी’ पढ़ लें, तो उन की आंखों के चश्मे पर पड़ी धूल साफ हो जाएगी. साल 1873 में लिखी गई इस किताब का मकसद दलितपिछड़ों को तार्किक तरीके से ब्राह्मण तबके की उच्चता के ?ाठे दंभ से परिचित कराना था.

इस किताब के जरीए ज्योतिबा फुले ने दलितों को हीनताबोध से बाहर निकल कर इज्जत से जीने के लिए भी प्रेरित किया था. इस माने में यह किताब काफी खास है कि यहां इनसानों में भेद पैदा करने वाली आस्था को तार्किक तरीके से कठघरे में खड़ा किया गया है.

दलितपिछड़ों की हमदर्द बनने का ढोंग करने वाली सरकारें पीडि़त लोगों को केवल मुआवजे का झनझना हाथों में थमा देती हैं. सामाजिक, मानसिक, शारीरिक और आर्थिक रूप से दलितों का उत्पीड़न कर बाद में केवल मुआवजा दे कर उन के जख्म नहीं भर सकते. ऐसे में किस तरह यह उम्मीद की जा सकती है कि आजादी के

77 साल बाद भी अंबेडकर के संविधान की दुहाई देने वाला भारत छुआछूत से मुक्त हो पाएगा?

जिस तरह किसान आंदोलन ने सरकार की गलत नीतियों का विरोध कर के सरकार को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया था, उसी तरह दलितपिछड़ों को भी अपने हक की लड़ाई लड़ने के लिए एकजुट होना होगा.

राह से भटकते नौजवान

बेरोजगारी से तंग आकर अक्षत ने खुदकुशी करने की कोशिश की. यह बात जब अक्षत के दोस्त समीर को पता चली, तो वह हैरान रह गया, क्योंकि दोनों साथ में ही सरकारी नौकरी के इम्तिहान की तैयारी कर रहे थे.

समय रहते समीर ने अपना रास्ता बदल लिया और अपने पापा के बिजनैस में लग गया. लेकिन अक्षत सरकारी नौकरी के पीछे पागल था, क्योंकि सरकारी नौकरी का मतलब परमानैंट नौकरी, अच्छी तनख्वाह वगैरह, इसलिए वह जीतोड़ मेहनत भी कर रहा था, मगर हर बार वह कुछ नंबरों से रह जाता था.

33 साल के हो चुके अक्षत को लगने लगा कि अब उस के पास कोई रास्ता नहीं बचा, सिवा खुदकुशी करने के.

बढ़ती बेरोजगारी से न सिर्फ देशभर के नौजवान परेशान हैं, बल्कि विदेशों में पढ़ेलिखे नौजवान भी इस की चपेट में हैं. बेरोजगारी से जुड़ा एक काफी पेचीदा मामला है. औक्सफोर्ड जैसी एक नामचीन यूनिवर्सिटी से पढ़े एक 41 साल के शख्स ने बेरोजगारी से तंग आ कर अपने मातापिता पर ही केस ठोंक दिया. यह बेरोजगार शख्स जिंदगीभर के लिए हर्जाने की मांग कर बैठा.

मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक, आतिश (बदला हुआ नाम) ने औक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से पढ़ाई की है. साथ ही, वह वकालत की ट्रेनिंग ले चुका है. इस के बावजूद वह बेरोजगार है.

आतिश का कहना है कि अगर उस के मांबाप उस की मदद नहीं करेंगे, तो उस के मानवाधिकार का उल्लंघन होगा.

आतिश के पिता की उम्र 71 साल है और उस की मां 69 साल की हैं. इतने उम्रदराज होने के बावजूद वे अपने बेटे को हर महीने 1,000 पाउंड भेजते हैं. इतना ही नहीं, वे अपने बेटे के दूसरे कई खर्च भी उठा रहे हैं यानी वह अपने सभी खर्चों के लिए अपने मातापिता पर ही निर्भर है.

लेकिन, अब मांबाप अपने बेटे की मांगों से तंग आ चुके हैं और छुटकारा चाहते हैं, पर कैसे? यह उन्हें समझ नहीं आ रहा है.

अच्छी पढ़ाईलिखाई होने के बावजूद भी कई नौजवान बेरोजगार हैं, तो यह बड़े हैरत की बात है. हाल ही में इंस्टीट्यूट फौर ह्यूमन डवलपमैंट ऐंड इंटरनैशनल लेबर और्गनाइजेशन ने इंडिया इंप्लायमैंट रिपोर्ट, 2024 जारी की है. यह रिपोर्ट भी भारत में रोजगार के हालात को बहुत गंभीर रूप में पेश करती है. रिपोर्ट में कहा गया है कि जो बेरोजगार कार्यबल में हैं, उन में तकरीबन 83 फीसदी नौजवान हैं.

यह कहना गलत नहीं होगा कि आज की नौजवान पीढ़ी बेरोजगारी से जू?ा रही है. कई नौजवान नौकरियों के लिए मौके तलाश रहे हैं. 15-20 हजार रुपए महीने की नौकरी पाने के लिए हजारोंलाखों बेरोजगार नौजवान अर्जी देते हैं और जब इस में भी उन्हें कामयाबी नहीं मिल पाती है, तो वे बुरी तरह हताश और निराश हो जाते हैं.

सरकारी नौकरी नहीं लग पा रही है, तो इस का यह मतलब नहीं है कि आप कोई गलत कदम उठा लें या फिर अपने मांबाप पर बो?ा बन जाएं और उन से अपने खर्चे उठवाएं और उन्हें परेशान करें, तब, जब उन की उम्र हो चुकी है और वे खुद अपनी पैंशन पर गुजरबसर कर रहे हैं.

टैक्नोलौजी के इस जमाने में नौजवान पीढ़ी को अब अपनी सोच बदलनी होगी. उसे अब नौकरी ढूंढ़ने के बजाय नौकरी देने वाला बनने पर ध्यान देना चाहिए.

नौजवानों को अपने रोजगार और आजीविका के लिए अपने मातापिता का मुंह देखने के बजाय अपने रास्ते खुद तलाशने होंगे. इस में कोई दोराय नहीं है कि नौजवानों के पास भरपूर क्षमता और कौशल है और इसे साबित करने के लिए मौके भी खूब हैं. उन्हें केवल अपने टारगेट को पहचानने की जरूरत है.

मौडर्न टैक्नोलौजी इस काम में बहुत मददगार साबित हो सकती है. इस की वजह से न केवल नौजवान पीढ़ी रोजगार पा सकती है, बल्कि कइयों को रोजगार दे भी सकती है.

नौजवानों के पास आगे बढ़ने के कई मौके हैं. लेकिन मुद्दा यह है कि सही दिशा में कदम किस तरह उठाया जाए, जिस से कि परिवार, समाज और देश को फायदा पहुंचे?

इस के लिए नौजवानों के साथसाथ सरकार को भी आगे आना होगा. यह कहना भी गलत नहीं होगा कि आज बुनियादी जरूरतों की कमी के चलते कई नौजवान टैलेंटेड होते हुए भी पीछे रह जाते हैं.

24 साल के एक नौजवान का कहना है कि वह अच्छा क्रिकेट खेलता है. लेकिन उस के पास क्रिकेट खेल को बेहतर बनाने के लिए कोई सुविधाएं नहीं हैं. अगर उसे सुविधाएं मुहैया कराई जाएं, तो वह क्रिकेट में बेहतर प्रदर्शन कर सकता है.

भारत में नौजवानों (15-29 साल की उम्र) में बेरोजगारी की दर सामान्य आबादी की तुलना में काफी ज्यादा है. साल 2022 में शहरी नौजवानों के लिए बेरोजगारी की दर 17.2 फीसदी थी, जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में यह दर तकरीबन 10.6 फीसदी थी.

देश में बढ़ती बेरोजगारी के और भी कई कारण हैं, जैसे बढ़ती आबादी, उचित पढ़ाईलिखाई की कमी, कौशल विकास की कमी, नौकरियों के मौकों की कमी वगैरह.

सरकार की जिम्मेदारी केवल टैक्स कलैक्शन तक ही सीमित नहीं होनी चाहिए, बल्कि देश का पूरा विकास हो, नौजवानों को रोजगार मिले, यह भी सरकार की ही जिम्मेदारी है.

Yogi Government : यूपी सरकार का बुलडोजर न्याय और आम आदमी

 

Buldozer Sarkar : इन दोनों देश भर में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सरकार की तर्ज पर बुलडोजर न्याय चल पड़ा है. देश के अनेक राज्यों में बुलडोजर चला करके आनन-फानन में विकास और न्याय करने का ढोंग किया जा रहा है.

यह बुलडोजर न्याय उत्तर प्रदेश से प्रारंभ हुआ है जहां एक वर्ग विशेष के लोग अगर किसी अपराध में पाए जाते हैं तो उनके घर मकान को जमीदोज कर दिया जाता है. ऐसा लगता है कि अब सरकार सत्ता के साथ न्यायाधीश भी बन गई है जैसे कभी राजा महाराजा हुआ करते थे इस शैली में न्याय करने का प्रयास किया जा रहा है जिसकी कम से कम लोकतंत्र में कहीं भी जगह नहीं है.

यही कारण है कि उच्चतम न्यायालय ने 6 नवंबर 2024 दिन बुधवार को 2019 में अवैध तरीके से ढांचों को गिराने को लेकर उत्तर प्रदेश सरकार से नाखुशी जताई और कहा, आप ऐसा नहीं कर सकते कि बुलडोजर लेकर आएं और रातों रात भवनों को गिरा दें…! कोर्ट ने साथ ही सड़कें चौड़ी करने एवं अतिक्रमण हटाने के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया पर सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों को निर्देश जारी किए. देश के सबसे बड़े अदालत के प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति जेबी पारदीवाला तथा न्यायमूर्ति मनोज मिश्रा की पीठ ने उत्तर प्रदेश को निर्देश दिया -” उस व्यक्ति को 25 लाख रुपए का मुआवजा दिया जाए जिसका घर 2019 में सड़क चौड़ी करने की एक परियोजना के लिए गिरा दिया गया था.”

पीठ ने उत्तर प्रदेश सरकार के वकील से कहा, -” आप ऐसा नहीं कर सकते कि बुलडोजर लेकर आएं और रातों रात भवनों को गिरा दें. आप परिवार को घर खाली करने के लिए समय नहीं देते. घर में रखे घरेलू सामान का क्या ? शीर्ष अदालत की पीठ ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव से कहा कि महाराजगंज जिले में मकान गिराने से संबंधित मामले में जांच कराई जाए और उचित कार्रवाई की जाए.

बिना सूचना ढहा दी हास्पिटल

देश में इन दिनों फोर लेन और सिक्स लेन का काम बड़े जोरों से चल रहा है, समयबद्ध तरीके से सड़के बनाने के निर्देश और दबाव के बीच कई तरह की घटनाएं सामने आ रही है. ऐसे में ही एक घटना छत्तीसगढ़ के जिला कोरबा में घटित हुई जहां कोरबा चांपा मार्ग के सरगबुंदिया गांव में प्रतिष्ठित डॉक्टर देवनाथ एम डी के अक्षय हॉस्पिटल को बिना किसी सूचना दिए रातोंरात ढहा दिया गया. जबकि डॉक्टर के पास जमीन के सभी दस्तावेज मौजूद है इसके बावजूद ना कोई मुआवजा दिया गया है और ना ही कुछ सुनवाई हो रही है. डॉक्टर देवनाथ मामले को लेकर के उच्च न्यायालय बिलासपुर पहुंचे हैं. ऐसी ही कुछ और घटनाएं भी देश में घटित हुई है. इस परिपेक्ष में कहा जा सकता है कि उच्चतम अदालत ने राज्यों से कहा – अभिलेखों या मानचित्रों के आधार पर सड़क की मौजूदा चौड़ाई का पता लगाएं तथा सर्वेक्षण करें, जिससे सड़क पर यदि कोई अतिक्रमण है तो उसका पता चल सके.

शीर्ष अदालत ने कहा कि यदि सड़क पर अतिक्रमण का पता चलता है तो राज्य को इसे हटाने से पहले अतिक्रमण करने वाले को नोटिस जारी करना होगा और यदि नोटिस की सत्यता और वैधता पर आपत्ति जताई जाती है तो राज्य प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए ‘स्पीकिंग ऑर्डर’ (कारण सहित 1 आदेश) जारी करेगा।

पीठ ने कहा कि यदि आपत्ति को खारिज कर दिया जाता है तो संबंधित व्यक्ति को अतिक्रमण हटाने के लिए एक तर्कसंगत नोटिस दिया जाएगा.पीठ ने कहा कि यदि संबंधित व्यक्ति इसका अनुपालन – नहीं करता, तो सक्षम प्राधिकारी अतिक्रमण हटाने के लिए कदम उठाएंगे, जब तक कि सक्षम प्राधिकारी या अदालत के आदेश से रोक न लगाई जाए.

पीठ ने कहा – ऐसे मामले में जहां सड़क की मौजूदा चौड़ाई, जिसमें उससे सटी राज्य की भूमि भी शामिल है, सड़क चौड़ीकरण के लिए पर्याप्त नहीं है, तो राज्य इस कार्रवाई को शुरू करने से पहले कानून के अनुसार अपनी भूमि का अधिग्रहण करने के लिए कदम उठाएगा. इस मामले में याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता सिद्धार्थ भटनागर और अधिवक्ता शुभम कुलश्रेष्ठ पक्ष रख रहे थे।

अदालत ने उनका पक्ष सुनते हुए कहा, यह स्पष्ट है कि मकान गिराने की प्रक्रिया पूरी तरह मनमानी थी और कानून का पालन किए बिना इसे अंजाम दिया गया. सुनवाई के दौरान पीठ को संबंधित क्षेत्र में 123 ढांचों को गिराए जाने के बारे में सूचित किया गया. पीठ ने कहा अदालत के रेकार्ड के अनुसार मकान को गिराने से पहले कोई नोटिस जारी नहीं किया गया.

आप कह रहे हैं कि आपने केवल मुनादी की थी. शीर्ष अदालत ने राज्य सरकार के वकील से यह भी पूछा कि किस आधार पर निर्माण कार्य को अनधिकृत बताया गया है. जब राज्य के वकील ने पीठ को सड़क चौड़ी करने की परियोजना के बारे में बताया तो उन्होंने कहा, सड़क चौड़ी करना बस एक बहाना है। यह पूरी कवायद के लिए उचित कारण नहीं लगता.

पीठ ने निर्देश दिया, उत्तर प्रदेश राज्य याचिकाकर्ता को 25 लाख रुपए का मुआवजा देगा. पीठ ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को निर्देश दिया कि वह उसके आदेश की एक प्रति सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के मुख्य सचिवों को भेजें ताकि सड़क चौड़ीकरण के उद्देश्य से प्रक्रिया पर जारी निर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित किया जा सके. जिस तरह उच्चतम न्यायालय ने इस संदर्भ में संज्ञान लिया है और राज्य सरकार को 25 लाख रुपए मुआवजा देने का निर्देश दिया है वह एक सकारात्मक संदेश है कि देश में अन्याय नहीं हो सकता.

डाक्टर साहब, आप क्यों ठगी का शिकार हो रहे हैं

आम आदमी ठगी का शिकार हो जाए तो कहा जाता है कि यह तो पोंगा पंडित है, दुनियादारी नहीं जानता, मगर आज बड़ीबड़ी हस्तियां ठगी का शिकार हो रही हैं. जब डाक्टर भी लालच में आ कर ठगी का शिकार हो रहे हैं, तो फिर आम आदमी की बिसात ही क्या. दरअसल, देश का ऐसा कोई शहर नहीं है, जहां लोग ठगी का शिकार नहीं हो रहे हैं. इस की सिर्फ एक ही वजह है इनसान का लालच. अगर हम इसे कंट्रोल कर लें तो हमें कोई नहीं ठग सकता.

छत्तीसगढ़ के रायपुर जिले में एक डाक्टर के साथ औनलाइन ठगी का मामला सामने आया है, जिस में आरोपियों ने डाक्टर से 89 लाख रुपए की ठगी की है. यह ठगी गेमिंग कंपनी में इन्वैस्ट करने के नाम पर की गई है, जहां आरोपियों ने 40 फीसदी मुनाफा देने का झांसा दिया था.

डाक्टर अशित कुमार ने बताया कि वे टैलीग्राम चैनल के जरीए आरोपियों के संपर्क में आए थे, जिन्होंने औनलाइन रौयल गेमिंग कंपनी में पैसा लगाने पर बड़ा मुनाफा देने की बात कही थी. आरोपियों ने कम इन्वैस्टमैंट करने पर ज्यादा मुनाफा दिलाने का लालच दिया था, जिस पर डाक्टर ने उन के बताए खातों में पैसे ट्रांसफर कर दिए.
आरोपियों ने 40 से ज्यादा किस्तों में डाक्टर से पैसे लिए और फिर उस की मूल रकम भी नहीं लौटाई.

जब डाक्टर ने पैसे मांगे, तो आरोपियों ने और इन्वैस्टमैंट करने के लिए कहा. डाक्टर ने आरोपियों की बात नहीं मानी, तो आरोपियों ने उन का फोन उठाना बंद कर दिया.

इस मामले में डाक्टर ने खम्हारडीह थाने में शिकायत दर्ज कराई है, जिस में पुलिस आरोपियों की तलाश कर रही है. यह मामला औनलाइन ठगी का एक और मामला है, जिस में लोगों को बड़े मुनाफे के लालच में ठगा जा रहा है.

इससे पहले भी रायपुर में मई, 2024 में एक डाक्टर के साथ 2 करोड़, 92 लाख रुपए की औनलाइन ठगी हुई थी, जिस में डाक्टर ने फेसबुक पर विज्ञापन देख कर बड़े मुनाफे के लालच में एप के जरीए इन्वैस्ट किया था. शातिर ठगों ने वर्चुअली मोटी रकम दिखा कर कमीशन के नाम पर 25 से 30 बार में रुपए वसूल लिए थे.

औनलाइन ठगी के मामले में लोगों को सावधानी बरतनी चाहिए और किसी भी अनजान आदमी या कंपनी में पैसा लगाने से पहले पूरी जांचपड़ताल करनी चाहिए.

औनलाइन ठगी के मामले में पुलिस और साइबर सैल को भी सख्त ऐक्शन लेना चाहिए और आरोपियों को जल्द से जल्द गिरफ्तार करना चाहिए. साथ ही, लोगों को जागरूक करना चाहिए कि वे औनलाइन ठगी के मामले में सावधानी बरतें और किसी भी अनजान आदमी के पास या कंपनी में पैसा लगाने से पहले पूरी जांचपड़ताल करें.

देश में औनलाइन ठगी की कई वारदातें हुई हैं, जिन में लोगों को बड़े पैमाने पर ठगा गया है. कुछ प्रमुख घटनाएं इस तरह हैं :

-पंजाब में एक आदमी को औनलाइन ठगी का शिकार होने के बाद डेढ़ करोड़ रुपए का नुकसान हुआ.

-मुंबई में एक आदमी को औनलाइन ठगी का शिकार होने के बाद 50 लाख रुपए का नुकसान हुआ.

-दिल्ली में एक आदमी को औनलाइन ठगी का शिकार होने के बाद 20 लाख रुपए का नुकसान हुआ.

-बैंगलुरु में एक आदमी को औनलाइन ठगी का शिकार होने के बाद 10 लाख रुपए का नुकसान हुआ.

-हैदराबाद में एक आदमी को औनलाइन ठगी का शिकार होने के बाद 5 लाख रुपए का नुकसान हुआ.

औनलाइन ठगी से ऐसे बचें

-दरअसल, जो जागरूक नहीं हैं, अपढ़ हैं, उन के साथसाथ पढ़ेलिखे और जागरूक लोगों को भी अनजान लिंक्स पर क्लिक नहीं करना चाहिए.

-अज्ञात स्रोतों से आए हुए लिंक्स पर क्लिक न करें, क्योंकि वे आप के डिवाइस में मेलवेयर डाउनलोड कर सकते हैं. साथ ही, अपनी निजी जानकारी जैसे पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड नंबर और अन्य संवेदनशील जानकारी किसी भी अज्ञात आदमी या वैबसाइट के साथ साझा न करें.

-सुनिश्चित करें कि आप जिस वैबसाइट पर जा रहे हैं, वह सुरक्षित है. इस के लिए वैबसाइट के ‘URL’ में ‘https’ देखें और एक लौक का चिह्न देखें.

-अपने औनलाइन अकाउंट्स के लिए मजबूत और अनोखे पासवर्ड का उपयोग करें और उन्हें नियमित रूप से बदलें.

-अपने औपरेटिंग सिस्टम, ब्राउजर, और अन्य सौफ्टवेयर को नियमित रूप से अपडेट रखें, ताकि सुरक्षा में सुधार हो सके.

-अज्ञात ईमेल्स को सावधानी से खोलें और अज्ञात अटैचमैंट्स या लिंक्स पर क्लिक न करें. साथ ही, औनलाइन लेनदेन करते समय सावधानी बरतें और सुनिश्चित करें कि आप एक सुरक्षित और विश्वसनीय वैबसाइट पर हैं.

सास और बहू की शानदार दोस्ती

दीपा की शादी जब प्रताप के साथ हुई थी, तब वह बीएड की पढ़ाई कर रही थी. शादी के बाद दीपा ने टीचर की नौकरी के लिए कई बार इम्तिहान दिया, लेकिन उसे कामयाबी नहीं मिली. इस बात से दीपा का हौसला टूट रहा था. उस ने नौकरी की उम्मीद छोड़ कर इवैंट मैनेंजमैंट का काम शुरू कर दिया.

दीपा का पति एक मल्टीनैशनल कंपनी में काम करता था. घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, क्योंकि प्रताप के मातापिता यानी दीपा के सासससुर भी सरकारी नौकरी में थे.

दीपा की सास रंजना लखनऊ के एक महिला कालेज में नौकरी करती थीं, जबकि ससुर रमेश बैंक में नौकरी करते थे. दीपा उन की एकलौती बहू थी.

दीपा की सास चाहती थीं कि बहू खुश रहे और वह भी नौकरी करे. उन्होंने दीपा को नैट के इम्तिहान की तैयारी करने को कहा. उन के अपने अनुभव और मार्गदर्शन के चलते दीपा ने नैट क्वालिफाई कर लिया.

इस के एक साल के बाद इंटर कालेज में वेकैंसी निकली, तो दीपा ने भी नौकरी का फार्म भरा. इस बार उसे कामयाबी हाथ लग गई.

दीपा भी सरकारी कालेज में टीचर की नौकरी करने लगी. इस बीच दीपा को बेटा हुआ. दीपा की सास जैसे अपने स्कूल के बच्चों और स्टाफ को मैनेज करती थीं, वैसे ही घर को भी मैनेज करती थीं. दीपा भी सास के साथ मिल कर अपना घर और नौकरी संभाल रही थी.

दीपा जैसी कहानी रेखा की भी है. रेखा शादी के बाद ससुराल आई, तो उस की सास भी बैंक में नौकरी करती थीं. रेखा का पति बाहर नौकरी करता था.

रेखा की सास ने उसे टीचर बनने के लिए कहना शुरू किया. उन का सोचना था कि टीचर बन कर बहू अपने घर पर रहेगी और फिर बेटा भी वापस घर आ जाएगा.

सास की कोशिश ने रेखा को आगे बढ़ने के लिए तैयार किया. उसे भी स्कूल टीचर की नौकरी मिल गई. रेखा के ससुर भी टीचर थे. सास बैंक में थीं और बेटा प्राइवेट दवा कंपनी में मुंबई में नौकरी करता था.

रेखा की सास कहती हैं, ‘‘बेटा बाहर नौकरी करने जाता है, तो वह वापस घर आ जाता है. जब बहू साथ जाती है, तो उन के घर वापस लौटने की उम्मीद कम हो जाती है. इस वजह से मैं सोचती थी कि जैसे मैं अपने शहर में रह कर नौकरी करती हूं, वैसे ही मेरी बहू भी करे.’’

सासबहू में झिझिक नहीं जब घर की औरतें अपने पैरों पर खड़ी होती हैं, तो उन के बीच आपस में कई तरह के झगड़े नहीं होते हैं. घर के फैसले मिलबांट कर ले लिए जाते हैं.

दीपा कहती है, ‘‘मेरे घर के फैसले लेने में मेरे पति या ससुर अपनी राय देते हैं. बाकी वे कह देते हैं कि जैसा करना है, तुम दोनों सोच लो.

‘‘जब मैं जिस जिम में जाती हूं,

तो अपनी सास को भी ले जाती हूं. हम दोनों ब्यूटीपार्लर भी साथ जाती हैं और कोशिश करती हैं कि एक के साथ एक मुफ्त वाला कोई औफर मिल जाए.

‘‘बाहर कोई भी हमें देख कर यह समझ ही नहीं पाता कि हम सासबहू हैं. कई बार हम दोस्तों की तरह हंसीमजाक करने में भी कोई परहेज नहीं करती हैं.

‘‘मेरे लिए मेरी सास गाइड भी हैं और मेरी ताकत भी हैं. मुझे लगता है कि जिस तरह से सासबहू के रिश्ते बदल रहे हैं, वह समाज के लिए एक शानदार पहल है.’’

सुखदुख की साथी

रेखा कहती है, ‘‘मेरी सास को छाती में गांठ थी. एक दिन उन्होंने मु?ो वह गांठ दिखाई. उस में दर्द नहीं था. इस वजह से उन्हें कोई चिंता नहीं थी.

‘‘मैं ने जब देखा तो उन्हें सम?ाया कि हम लोग माहिर डाक्टर से मिल लेते हैं, तो पहले तो वे तैयार नहीं हो रही थीं, फिर मैं ने उन्हें डाक्टर के ब्रैस्ट केयर को ले कर कुछ वीडियो दिखाए, तब जा कर वे तैयार हुईं.

‘‘डाक्टर ने देखा, कुछ जांचें कराईं, तो पता चला कि वह कैंसर वाली गांठ थी. हम लोग बिना देरी किए उन्हें मुंबई के टाटा अस्पताल ले गए. 3 महीने का समय लगा. हम ने छुट्टी ले ली थी. वहां इलाज चला. वे अब पूरी तरह से ठीक हैं. हम समयसमय पर चैकअप के लिए जाते हैं.

‘‘डाक्टर ने मेरी सास से कहा कि अगर आप 2-3 महीने की और देर करतीं, तो आप की ब्रैस्ट निकाल देनी पड़ती. जल्दी आने से केवल छोटा सा आपरेशन कर के काम चल गया.

‘‘मेरी सास ने तारीफ करते हुए कहा कि यह मेरी बहू की वजह से हुआ. मुझे तो तब तक नहीं पता चलता, जब तक दर्द नहीं शुरू होता. ऐसे में मुझे दिक्कत हो जाती.

‘‘इस तरह केवल मैं ही नहीं, बल्कि वे भी मेरा खयाल रखती हैं. मेरा बच्चा देर से हुआ तो मेरी सास ही डाक्टर के पास ले गई थीं. डाक्टर की 3 महीने तक दवा चली, तब मेरे पेट में बच्चा आया.’’

साथ जाती हैं घूमने

कविता और टीना सासबहू हैं. टीना कहती है, ‘‘हम दोनों को छुट्टियों में दूसरे शहर देखना ज्यादा पसंद है. हमें या तो ऐतिहासिक इमारतों वाले शहर देखने पसंद हैं या फिर पहाड़ी शहर. कई बार हमारे पति साथ नहीं जाते, वे टालमटोल करते हैं. ऐसे में हम सासबहू अकेले ही चल देती हैं. वहां मेरी सास मेरे से ज्यादा फैशनेबल बन कर रहती हैं.

‘‘मैं तो शौर्ट कपड़े पहनने से बचती हूं, लेकिन मेरी सास मौडर्न स्टाइल वाले कपड़े पहनती हैं. वे मुझे भी कहती हैं कि पहनो तो मैं थोड़ा परहेज करती हूं. एक बार हम लोगों के फोटो ससुरजी ने देखे तो वे बोले कि जिस को पूरे कपड़े पहनने चाहिए, वह आधे पहने हुए है.

‘‘मैं फ्लाइट या ट्रेन के टिकट बुक कराने, होटल, पैकेज, शहर वाला सारा काम कर लेती हूं. सारा खर्च मेरी सास खुद उठाती हैं. हम लोगों के बीच कभी भी पैसे को लेकर कोई विवाद नहीं हुआ.

‘‘नौकरी करने वाली सास न केवल कामकाजी बहू की दिक्कतों को समझाती हैं, बल्कि उस की मदद भी करती हैं. मुझे लगता है कि यह सास की नौकरी से ज्यादा उन के बरताव के चलते होता है. जहां अच्छा बरताव है, वहां रिश्ते बेहतर होते हैं.’’

मामी ने अपनी भांजी से की शादी, तो एक लड़की ने लड़की पर लुटाया प्यार

कहते प्यार दीवाना, अंधा और परवाना होता है. जो ना समाज देखता है न घर न परिवार जिस पर दिल हार बैठे उसी से जिंदगी भर के लिए जुड़ गए. लेकिन जब प्यार लड़के और लड़की के बीच हो तो दुनिया सब्र करके बैठती है. कि दो प्यार करने वाले मिल गए. लेकिन जब बात आए कि एक लड़की ने लड़की से ब्याह रचा लिया. तो सबके मुंह खुले के खुले रह जाते है और ऐसा ही एक चौंका देने वाली शादी बिहार में हुई है. जहां एक मामी ने अपनी ही भांजी के साथ साथ फेरे ले लिए.

 

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बिहार के गोपालगंज में एक मामी व भांजी का प्यार इस कदर परवान चढ़ा कि दोनों ने एक साथ जीने व मरने की कसमें खा लीं. मामी और भांजी ने एक दूसरे के साथ शादी मंदिर में की. अनोखी शादी की चर्चा हर तरफ हो रही है. मामी-भांजी की शादी की खबर मिलते ही काफी संख्या में लोगों की भीड़ उमड़ पड़ी. मामी और भांजी ने एक दूसरे को माला पहनाई और फिर सात फेरे लेने के बाद एक दूसरे के साथ जीने मरने की कसमें भी खाईं.

बता दें, कि दोनों महिला पहले से शादीशुदा हैं. बताया जा रहा है कि शोभा कुमारी और उनकी भांजी सुमन कुमारी दोनों शादीशुदा हैं. पिछले तीन साल से दोनों महिलाओं के बीच प्यार चल रहा था. सोमवार को घर से भागकर दोनों ने रीति रिवाजों के साथ शादी कर ली. शादी करनेवाली लड़की की मामी शोभा कुमारी ने बताया कि उनका अपनी ही भांजी के साथ पिछले तीन साल से अफेयर चल रहा था. इसके बाद उन लोगों ने आज एक दूसरे के साथ शादी करने का फैसला किया. बता दें इस अनोखी शादी का वीडियो बहुत वायरल हो रहा है. लेकिन इस शादी ने सबको चौंका कर रख दिया है, क्योंकि अबतक एक लड़की ने लड़की से शादी कर ली ये देखा जाता था, लेकिन एक मामी ने ही अपनी भांजी को जीवन भर का हमसफर चुन लिया. ये चौंका देने वाला था.

इससे पहले यूपी में दो लड़कियों ने आपस में शादी कर ली थी. यूपी के देवरिया में 2 लड़कियों ने आपस में शादी करने फैसला किया जो दोनो सहेलिया थी. देवरिया के चनुकी में स्थित आर्केस्ट्रा में काम करने वाली 2 लड़कियों ने समलैंगिक विवाह किया. ये दोनों लड़कियां 2 साल से एक दूसरे के साथ पति-पत्नी की तरह रहती है. दोनों लड़कियों ने मझौली राज में स्थित भगड़ा भवानी मंदिर में एक दूसरे के साथ शादी रचाई थी.

ऐसा ही एक मामला मध्यप्रदेश का भी सामने आया था. मध्यप्रदेश की एक लड़की राजस्थान के नागौर जिले के कस्बे लांडनू में रहने वाली अपनी दोस्त के घर अचानक पहुंच जाती है. वहां जाकर मध्यप्रदेश की लड़की खूब हल्ला करती है. जब उसने कहा कि वह अपनी दोस्त को मध्यप्रदेश ले जाने के लिए आई है और उससे शादी करेगी तो वहां हर कोई हैरान हो गया. जयपुर वाली लड़की के परिजन सकते में आ गए. मध्यप्रदेश की लड़की ने कहा कि वह उससे प्यार करती है और अब उससे शादी करना चाहती है.

इस मामले में आगे पता चला कि कुछ साल पहले दोनों लड़कियों की दोस्ती सोशल मीडिया पर हुई थी. जिसके बाद दोस्ती प्यार में बदल गई. अब दोनों ने एक दूसरे से शादी कर ली है.

बेटी की माहवारी, पिता दिखाए समझदारी

एक सुबह प्रिया अपने स्कूल की एक पिकनिक ट्रिप के लिए तैयार हो रही थी. 9वीं जमात के दोनों सैक्शन को सूरजकुंड घुमाने का प्रोग्राम था. प्रिया अपने बैग में खानेपीने का सामान रख रही थी. तभी उस ने एक पैकेट उठाया और रसोईघर में जा कर उसे कैंची से काटने लगी. राकेश भी लाड़लाड़ में प्रिया के पीछे जा कर देखने लगा और पूछा, ‘‘क्या काट रही हो?’’ प्रिया ने प्लास्टिक का एक पैकेट दिखाते हुए कहा, ‘‘यह है. और क्या काटूंगी…’’ राकेश ने देखा कि प्रिया उस पैकेट से 2 सैनेटरी पैड निकाल कर अपने बैग में रख रही थी. राकेश ने बड़े प्यार से उस के सिर पर हाथ रखा और ‘ध्यान से रहना’ बोल कर रसोईघर से बाहर चला आया.

एक पिता का अपनी बेटी के लिए ऐसा लगाव यह दिखाता है कि बदलते जमाने में बेटी की माहवारी को ले कर पिता में यह जागरूकता होनी ही चाहिए. न तो प्रिया की तरह कोई बेटी सैनेटरी पैड को ले कर झिझक महसूस करे और न ही राकेश की तरह कोई पिता अपनी बेटी के ‘उन दिनों’ के बारे में जान कर शर्मिंदा हो. यह उदाहरण इस बात को भी सिरे से नकारता है कि सिर्फ मांबेटी में ही गुपचुप तरीके से माहवारी पर बात की जाए, क्योंकि आज भी समाज में यही सोच गहरे तक पैठी है कि औरत ही औरत की इस समस्या को अच्छी तरह से समझ सकती है और मर्दों को परदा रखना चाहिए, जबकि विज्ञान के नजरिए से सोचें तो माहवारी के बारे में जितनी जानकारी औरतों या लड़कियों को होनी चाहिए, उतनी ही मर्दों और लड़कों को भी होनी चाहिए, गरीब और निचली जाति में तो खासकर. माहवारी में सैनेटरी पैड कितना अहम होता है, स्कौटलैंड से इस बात को समझते हैं. माहवारी से जुड़ी गरीबी को मिटाने के लिए यह देश पीरियड प्रोडक्ट्स को बिलकुल मुफ्त बनाने वाला पहला देश बन गया है.

इस सिलसिले में स्कौटलैंड सरकार ने बताया कि वह ‘पीरियड प्रोडक्ट ऐक्ट’ लागू होते ही दुनिया की पहली ऐसी सरकार बन गई है, जो माहवारी संबंधी बने सामान तक मुफ्त पहुंच के हक की कानूनी तौर पर हिफाजत करती है. इस नए कानून के तहत स्कूलों, कालेजों, यूनिवर्सिटी और स्थानीय सरकारी संस्थाओं के लिए यह जरूरी हो गया है कि वे अपने शौचालयों में सैनेटरी पैड समेत माहवारी संबंधी प्रोडक्ट मुहैया कराएं. पर, भारत जैसे देश में सरकारी योजनाओं का ढिंढोरा पीटने के बावजूद हालात उतने अच्छे नहीं हैं. यूनिसेफ के मुताबिक, दक्षिण एशिया की एकतिहाई से ज्यादा लड़कियां अपनी माहवारी के दौरान खासतौर पर स्कूलों में शौचालयों और पैड्स की कमी के चलते स्कूल से छुट्टी कर लेती हैं. माहवारी के चलते होने वाली बीमारियों के बारे में बहुत सी औरतें अनजान ही रहती हैं. अकेले भारत की बात करें, तो यहां 71 फीसदी लड़कियां अपना पहला पीरियड होने से पहले तक माहवारी से अनजान होती हैं. सरकारी एजेंसियों के मुताबिक, भारत में 60 फीसदी किशोरियां माहवारी के चलते स्कूल नहीं जा पाती हैं. तकरीबन 80 फीसदी औरतें अभी भी घर पर बने पैड (कपड़ा) का इस्तेमाल करती हैं.

हालात तब और बुरे हो जाते हैं, जब बेटियां अपने पिता या भाई से अपनी इस कुदरत की देन से होने वाली समस्याओं के बारे में खुल कर नहीं बता पाती हैं, जबकि ज्यादातर बेटियां अपने पिता को ही अपना हीरो मानती हैं. नाजनखरे दिखा कर उन से अपने सारे काम करा लेती हैं, पर जब माहवारी की बात आती है, तो चुप्पी साध लेती हैं. पिता भी तो अपनी लाड़ली पर जान छिड़कते हैं, फिर ऐसी कौन सी खाई है, जो इस मसले पर उन दोनों के बीच आ जाती है?

दरअसल, हमारे समाज में धार्मिक जंजाल के चलते मर्दों का इतना ज्यादा दबदबा है कि वे ऐसी समस्याओं पर बात करना बड़ा ओछा काम समझते हैं. उन के मन में यही खयाल रहता है कि ‘क्या अब ये दिन आ गए, जो मैं अपनी बेटी के ‘उन दिनों’ का भी हिसाबकिताब रखूं? दुकानदार से किस मुंह से सैनेटरी पैड मांगूंगा? पासपड़ोस में पता चल गया तो मेरी नाक कट जाएगी…’

यहीं भारत जैसे देश मार खा जाते हैं. इश्तिहारों में कितना ही ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ का राग अलाप लो, पर जब तक इस देश के मर्द समाज की औरतों के प्रति दकियानूसी सोच में बदलाव नहीं आता है, तब तक कोई ठोस नतीजा नहीं सामने आएगा, फिर वह लड़कियों की माहवारी की समस्या हो या उन की पढ़ाईलिखाई.

इस बदलाव की शुरुआत पिता को अपनी बेटी की माहवारी से ही करनी चाहिए. उन्हें अपनी बच्ची के बदलते शरीर के बारे में पूछताछ के लिए झिझकना नहीं चाहिए. बेटी के जवानी की दहलीज पर जाते ही उस में आ रहे शारीरिक बदलावों के बारे में बात करें. माहवारी शुरू होने से पहले ही बेटी द्वारा अच्छी साफसफाई बनाए रखने की अहमियत के बारे में बताएं. जिस तरह दूसरे कामों में बेटी का हौसला बढ़ाते हैं, वैसे ही माहवारी पर भी उन्हें हिम्मत दें कि यह तो हर बेटी को कुदरत से मिला एक नायाब तोहफा है, जिस से उसे मां बनने का सुख मिलता है और परिवार आगे बढ़ता है. यह छोटी सी पहल समाज में एक बड़ा बदलाव ला सकती है.

20 साल बाद लौट कर घर आया, पुलिस ने यह सपना सच कराया

यह अकसर होता है कि किसी तरह की नाराजगी या कुछ बनने की फितरत या फिर कुछ नया कर गुजरने की लालसा से बहुत से नौजवान अपने घर परिवार को छोड़ कर निकल पड़ते हैं और फिर उन में से कुछ तो बड़ा मुकाम हासिल कर लेते हैं, मगर ज्यादातर आमतौर पर गुमनाम रह जाते हैं.

यही जिंदगी का एक ऐसा फलसफा है जो यह बताता है कि इनसान में कुछ कर गुजरने की चाह उसे ऊंचाइयों पर पहुंचा देती है. मगर कुछ ऐसे होते हैं जो घर ठिकाना छोड़ कर भटकते रह जाते हैं और कभी कोई मुकाम हासिल नहीं कर पाते हैं और फिर जब कभी अपनों के बीच लौटते हैं तो अपने घर आ कर जो खुशी होती है, उसे शब्दों में कहा नहीं जा सकता. आइए, देखें कुछ ऐसी ही घटनाएं :

पहली घटना

एक नौजवान अपने पिता से नाराज हो कर घर परिवार छोड़ कर चला गया. पत्नी बच्चे सभी थे. 20 साल बाद लौटा तो मध्यवर्गीय इस परिवार के हालात बदल चुके थे और लड़का अपने बूते चार्टर्ड अकाउंटैंट बन गया था.

दूसरी घटना

एक बालक घर परिवार छोड़ कर चला गया, मगर लंबे समय तक दुखों का पहाड़ उठाया. वह जब 25 साल बाद लौटा तो उस के परिवार ने उसे पा कर खुशियां मनाईं और उसे एक नई जिंदगी मिल गई.

तीसरी घटना

एक बालक घर से नाराज हो कर बड़े शहर आ गया. 15 साल बाद जब वह अपने गांव लौटा तो उसे एहसास हुआ उस ने बहुत बड़ी गलती की थी.

पुलिस की अनोखी पहल

आप को बताते हैं एक ऐसे नौजवान की कहानी जो 20 साल बाद घर लौटा और इस में एक पुलिस अधीक्षक ने मददगार बनने का रोल निभाया.

झारखंड के गढ़वा जिले में पुलिस की एक अनोखी पहल देखने को मिली है, जहां पुलिस अधीक्षक दीपक पांडेय ने 20 साल से बिछड़े एक बेटे को उस के मांबाप से मिलाया.

दरअसल, यह मामला गढ़वा जिले के रंका थाना क्षेत्र के पिंडरा गांव का है, जहां 20 साल पहले रामजनम नाम का शख्स काम की तलाश में हरियाणा के पलवल जिले चला गया था. वहां उस की मुलाकात एक परिवार से हुई. परिवार ने उस सीधे सादे लड़के को अपने घर पर रख लिया.

देखते ही देखते 20 साल बीत गए, लेकिन रामजनम घर वापस नहीं लौटा. घर वालों को लगा उस का बेटा अब इस दुनिया में नहीं है. वहीं रामजनम ने भी अपने मां बाप से मिलने की उम्मीद छोड़ दी थी.

अचानक रामजनम को अपने घर की याद आई तो उस ने यह बात अपनी मकान मालकिन को बताई जिस के बाद उस औरत ने गूगल से गढ़वा पुलिस का सरकारी नंबर निकाला और मोबाइल से बात करते हुए रामजनम की तसवीर शेयर की.

पुलिस अधीक्षक दीपक पांडेय ने तत्काल रंका थाना को फोटो गांव में भेज कर पता लगाने का निर्देश दिया, जिस के बाद थाना प्रभारी ने गांव में पहुंच कर फोटो की पहचान उस लड़के के मां बाप से कराई. मां बाप ने भी अपने बेटे को पहचान लिया, जिस के बाद पुलिस ने रंका थाना में मां बाप को ले जा कर उन के बेटे रामजनम से वीडियो काल से बात कराई.

रामजनम और उस के मां बाप वीडियो काल से बात कर के भावुक हो उठे. दोनों की आंखों में आंसू आ गए. इस घटना के बाद गढ़वा पुलिस की इस पहल की चारों तरफ तारीफ हो रही है.

पुलिस अधीक्षक दीपक पांडेय ने कहा, “हरियाणा से एक औरत का मेरे सरकारी नंबर पर फोन आया था. उन्होंने बताया कि एक नौजवान 12 साल से उन के यहां काम कर रहा है, जो गढ़वा जिले के रंका थाने के पिंडरा गांव का रहने वाला है. औरत द्वारा उस नौजवान की तसवीर भी भेजी गई थी. पुलिस के द्वारा उस गांव में जा कर उस की पहचान रामजनम सिंह के रूप में की गई, जो 20 साल पहले कमाने के लिए बाहर गया था और कभी वापस नहीं लौटा. उस के माता पिता को थाने बुला कर पुलिस ने वीडियो काल से बात कराई, जिस में रामजनम और उस के माता पिता दोनों ने एक दूसरे को पहचान लिया. घर और गांव के लोग उसे मरा समझ बैठे थे, लेकिन इस वाकिए ने परिवार के साथ साथ गांव वालों के चेहरे पर भी खुशी ला दी.

कामवालियों पर मालिक की ललचाई नजरें

आज के समय में ज्यादातर शहरी पतिपत्नी कामकाजी होते हैं. ऐसे में घरों में काम करने वाली बाई का रोल अहम हो जाता है. अगर एक दिन भी वह नहीं आती है, तो पूरा घर अस्तव्यस्त हो जाता है. एक ताजा सर्वे के मुताबिक, मुंबई शहर में कामकाजी लोगों के घर उन की कामवाली बाई के भरोसे ही चलते हैं और अगर एक दिन भी वह छुट्टी ले लेती है, तो घर में मानो तूफान आ जाता है. सवाल यह है कि जो इनसान हमारे घर के लिए इतना अहम है, क्या हमारे समाज में उसे वह इज्जत मिल पाती है, जिस का वह हकदार है?

आमतौर पर घरों में काम करने वाली बाइयों के प्रति समाज का नजरिया अच्छा नहीं रहता, क्योंकि अगर घर में से कुछ इधरउधर हो गया, तो इस का सब से पहला शक बाई पर ही जाता है. इस के अलावा घर के मर्दों की भी कामुक निगाहें उन्हें ताड़ती रहती हैं और अगर बाई कम उम्र की है, तो उस की मुसीबतें और ज्यादा बढ़ जाती हैं.

सीमा 34 साल की है. 4 साल पहले उस का पति एक हादसे में मारा गया था. उस की एक 14 साल की बेटी और 10 साल का बेटा है.

एक घर का जिक्र करते हुए सीमा बताती है, ‘‘जिस घर में मैं काम करती थी, उन की बेटी मुझ से एक साल बड़ी थी. एक दिन आंटी बाहर गई थीं. घर में सिर्फ अंकलजी, उन की बीमार मां और बेटी थी. मैं रसोइघर में जा कर बरतन धोने लगी. अंकलजी ने अपनी बेटी को किसी काम से बाहर भेज दिया.

‘‘मैं बरतन धो रही थी और वे अंकल कब मेरे पीछे आ कर खड़े हो गए, मुझे पता ही नहीं चला. जैसे ही मैं बरतन धो कर मुड़ी, तो उन का मुंह मेरे सिर से टकरा गया. मैं घबरा गई और चिल्लाते हुए घर से बाहर आ गई.

‘‘इस के बाद 2 दिन तक मैं उन के यहां काम करने नहीं गई. तीसरे दिन वे अंकल खुद मेरे घर आए और हाथ जोड़ कर बोले, ‘मुझे माफ कर दो. मुझ से गलती हो गई. मेरे घर में किसी को मत बताना और काम भी मत छोड़ना. आज के बाद मैं कभी तुम्हारे सामने नहीं आऊंगा.’

‘‘आप बताइए, उन की बेटी मुझ से बड़ी है और वे मेरे ऊपर गंदी नजर डाल रहे थे. क्या हमारी कोई इज्जत नहीं है?’’ कहते हुए वह रो पड़ी.

नीता 28 साल की है. पति ने उसे छोड़ दिया है. वह बताती है, ‘‘मैं जिस घर में काम करती थी, वहां मालकिन ज्यादातर अपने कमरे में ही रहती थीं. जब मैं काम करती थी, तो मालिक मेरे पीछेपीछे ही घूमता रहता था. मुझे गंदी निगाहों से घूरता रहता था.

‘‘फिर एक दिन हिम्मत कर के मैं ने उस से कहा, ‘बाबूजी, यह पीछेपीछे घूमने का क्या मतलब है, जो कहना है खुल कर कहो? मैडमजी को भी बुला लो. मैं गांव की रहने वाली हूं. मेरी इज्जत जाएगी तो ठीक है, पर आप की भी बचनी नहीं है.’

‘‘मेरे इतना कहते ही वह सकपका गया और उस दिन से उस ने मेरे सामने आना ही बंद कर दिया.’’

इसी तरह 35 साल की कांता बताती है, ‘‘मैं जिस घर में काम करती थी, उन साहब के घर में पत्नी, 2 बेटे और बहुएं थीं. उन के यहां सीढि़यों पर प्याज के छिलके पड़े रहते थे. हर रोज मैं जब भी झाड़ू लगाती, मालिक रोज सीढि़यों पर बैठ कर प्याज छीलना शुरू कर देता और फिर सीढि़यों से ही मुझे आवाज लगाता, ‘कांता, यहां कचरा रह गया है.’

‘‘जब मैं झाड़ती तो मेरे ऊपर के हिस्से को ऐसे देखता, मानो मुझे खा जाएगा. एक महीने तक देखने के बाद मैं ने उस घर का काम ही छोड़ दिया.’’

30 साल की शबनम बताती है, ‘‘पिछले साल मैं जिस घर में काम करती थी, वहां दोनों पतिपत्नी काम पर जाते थे. उन का एक छोटा बेटा था. मैं पूरे दिन उन के घर पर रह कर बेटे को संभालती थी.

‘‘एक दिन मैडम दफ्तर गई थीं और साहब घर पर थे. मैं काम कर रही थी, तभी साहब आए और बोले, ‘शबनम, 2 कप चाय बना लो.’

‘‘मैं जब चाय बना कर उन के पास ले गई, तो वे सोफे पर बैठने का इशारा कर के बोले, ‘आ जाओ, 2 मिनट बैठ कर चाय पी लो, फिर काम कर लेना.’

‘‘मैं उन के गंदे इरादे को भांप गई और न जाने कहां से मुझ में इतनी ताकत आ गई कि मैं ने उन के गाल पर एक चांटा जड़ दिया और अपने घर आ गई. उस दिन के बाद से मैं उन के घर काम पर नहीं गई.’’

इन उदाहरणों से कामवाली बाइयों के प्रति समाज का नजरिया दिखता है. ऐसे घरों में इन्हें एक औरत के रूप में तो इज्जत मिलती ही नहीं है, साथ ही जिस घर को संवारने में ये अपना पूरा समय देती हैं, वहीं मर्द इन्हें गंदी नजरों से देखते हैं.

क्या करें ऐसे समय में

 ऐसे हालात में आमतौर पर ज्यादातर कामवाली बाई चुप रह जाती हैं या काम छोड़ देती हैं. इस के पीछे उन की सोच यही होती है कि चाहे घर का मर्द कितना ही गलत क्यों न हो, कुसूरवार कामवाली बाई को ही ठहराया जाता है. वे अगर  मुंह खोलेंगी तो और भी लोग उन से काम कराना बंद कर देंगे, इस से उन की रोजीरोटी के लाले पड़ जाएंगे.

कई मामलों में तो कामवाली बाई को पैसे दे कर उस का मुंह भी बंद कर दिया जाता है. पर ऐसा करना मर्दों की गंदी सोच को बढ़ावा देना है, इसलिए अगर ऐसा होता है, तो चुप रहने के बजाय अपनी आवाज उठानी चाहिए.

आजकल तकनीक का जमाना है. अगर मुमकिन हो सके, तो ऐसी छिछोरी बातों को रेकौर्ड करें या वीडियो क्लिप बना लें, ताकि बात खुलने पर सुबूत के तौर पर उसे पेश किया जा सके.

क्या करें पत्नियां

 ऐसे मनचलों की पत्नियां भले ही अपने पति की हरकत को जगजाहिर न करें, पर वे खुद इस से अच्छी तरह परिचित होती हैं.

अच्छी बात यह रहेगी कि बाई के साथ अकेलेपन का माहौल न बनने दें. वे खुद बाई से काम कराएं. अगर पति मनचला है, तो ज्यादा उम्र की बाई को घर पर रखें.

कई बार कामवालियां भी मनचली होती हैं. उन्हें घर की मालकिन के बजाय घर के मालिक से ज्यादा वास्ता रहता है. ऐसे में उन्हें उन की सीमाएं पार न करने की हिदायत दें.

भगत सिंह का लव कन्फैशन

भ गत सिंह लाहौर के नैशनल कालेज के स्टूडैंट थे. तब भारतपाकिस्तान वाली सरहदें न थीं. उम्र कोई 20-21 साल. जवान और बेतहाशा खूबसूरत. औसत ऊंचाई, पतला व लंबा चेहरा, चेहरे पर हलके से चकत्ते, झानी दाढ़ी और छोटी सी मूंछ. उम्र की इस नाजुक दहलीज में विचारों की धार पैनी थी.

उस दौरान एक सुंदर सी लड़की कालेज में उन्हें देख कर मुसकरा दिया करती थी. चर्चा थी कि वह लड़की भगत सिंह को पसंद करती थी और उन्हीं की वजह से वह क्रांतिकारी दल के करीब आ गई थी. वही क्रांतिकारी दल जिस का नाम रूसी क्रांति से प्रेरित हो कर भगत सिंह ने फिरोजशाह कोटला के खंडहरों में हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिक एसोसिएशन कर दिया था.

इस दल के बीच जब असैंबली में बम फेंकने की योजना बन रही थी तो भगत सिंह को दल की जरूरत बता कर साथियों ने उन्हें यह जिम्मेदारी सौंपने से इनकार कर दिया. भगत सिंह के खास दोस्त सुखदेव ने उन्हें ताना मारा कि ‘भगत, तुम मरने से डरते हो और ऐसा उस लड़की की वजह से है.’

इस आरोप से भगत सिंह उदास हो गए और उन्होंने दोबारा दल की मीटिंग बुलाई और असैंबली में बम फेंकने का जिम्मा जोर दे कर अपने नाम करवाया. यह वही परिघटना है जिस पर आगे जा कर वामपंथी विचारकों में बड़ी बहस भी हुई कि भगत सिंह का खुद आगे आ कर बम फेंकने का निर्णय कितना सही था, जबकि बम फेंकने के बाद हश्र क्या होगा, यह सब को मालूम था.

8 अप्रैल, 1929 को असैंबली में बम फेंकने की योजना थी. लेकिन इस से पहले वे प्रेम को ले कर अपनी भावनाओं को अपने प्रिय दोस्त सुखदेव को बता देना चाहते थे. वे बता देना चाहते थे कि प्यार कभी बाधा नहीं बनता, बल्कि वह तो सहयोगी होता है लक्ष्य की प्राप्ति में.

5 अप्रैल को दिल्ली के सीताराम बाजार के एक घर में भगत सिंह ने सुखदेव को पत्र लिखा, जिसे दल के एक अन्य सदस्य शिव वर्मा ने उन तक पहुंचाया. शिव वर्मा, जो आगे जा कर भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी में शामिल हो गए थे.

पत्र 13 अप्रैल को सुखदेव की गिरफ्तारी के वक्त उन के पास से बरामद किया गया और लाहौर षड्यंत्र केस में सुबूत के तौर पर पेश किया गया. भगत सिंह ने इस पत्र में एक हिस्सा प्रेम को ले कर अपनी समझदारी को ले कर कहा.

उन्होंने कहा, ‘‘प्रिय सुखदेव, जैसे ही यह पत्र तुम्हें मिलेगा, मैं जा चुका होऊंगा, दूर एक मंजिल की तरफ. मैं तुम्हें विश्वास दिलाना चाहता हूं कि आज बहुत खुश हूं. हमेशा से ज्यादा. मैं यात्रा के लिए तैयार हूं, अनेकानेक मधुर स्मृतियों के होते और अपने जीवन की सब खुशियों के होते भी. एक बात जो मेरे मन में चुभ रही थी कि, मेरे भाई, मेरे अपने भाई ने मुझे गलत समझ और मुझे पर बहुत ही गंभीर आरोप लगाए कमजोरी के.

‘‘आज मैं पूरी तरह संतुष्ट हूं. पहले से कहीं अधिक. आज मैं महसूस करता हूं कि वह बात कुछ भी नहीं थी, एक गलतफहमी थी. मेरे खुले व्यवहार को मेरा बातूनीपन सम?ा गया और मेरी आत्मस्वीकृति को मेरी कमजोरी. मैं कमजोर नहीं हूं. अपनों में से किसी से भी कमजोर नहीं.’’

वे आगे लिखते हैं, ‘‘किसी व्यक्ति के चरित्र के बारे में बातचीत करते हुए एक बात सोचनी चाहिए कि क्या प्यार कभी किसी मनुष्य के लिए सहायक सिद्ध हुआ है? मैं आज इस प्रश्न का उत्तर देता हूं : हां, यह मेजिनी (इटली के राष्ट्रवादी आंदोलनकारी) था. तुम ने अवश्य ही पढ़ा होगा कि अपनी पहली विद्रोही असफलता, मन को कुचल डालने वाली हार, मरे हुए साथियों की याद वह बरदाश्त नहीं कर सकता था. वह पागल हो जाता या आत्महत्या कर लेता, लेकिन अपनी प्रेमिका के एक ही पत्र से वह मजबूत हो गया, बल्कि सब से अधिक मजबूत हो गया.

‘‘जहां तक प्यार के नैतिक स्तर का संबंध है, मैं यह कह सकता हूं कि यह अपने में कुछ नहीं है सिवा एक आवेग के, लेकिन यह पाशविक वृत्ति नहीं, एक मानवीय अत्यंत मधुर भावना है. प्यार अपनेआप में कभी भी पाशविक वृत्ति नहीं है. प्यार तो हमेशा मनुष्य के चरित्र को ऊपर उठाता है. सच्चा प्यार कभी भी गढ़ा नहीं जा सकता. वह अपने ही मार्ग से आता है, लेकिन कोई नहीं कह सकता कि कब?’’

वे पत्र में आगे कहते हैं, ‘‘हां, मैं यह कह सकता हूं कि एक युवक और एक युवती आपस में प्यार कर सकते हैं और वे अपने प्यार के सहारे अपने आवेगों से ऊपर उठ सकते हैं, अपनी पवित्रता बनाए रख सकते हैं.’’

प्रेम को ले कर इतनी स्पष्टता हैरान करती है कि उस दौरान भगत सिंह महज 21 साल के थे और 2 साल बाद वे 23 साल की उम्र में फांसी पर चढ़ा दिए गए. इतनी गहरी समझ रखने वाले भगत सिंह को आज घंटों इंस्टाग्राम, व्हाट्सऐप और 16 सैकंड की रील्स देखने वाली जेनरेशन कितना समझ पाएगी, यह कहना मुश्किल है, पर अपने समय के वे असल इन्फ्लुएंसर जरूर थे. क्या आज यह उम्मीद लगाई जा सकती है कि युवा इस तरह के पत्र, लिखना तो दूर, लिखने की सोच भी सकता है?

6 इंच के स्क्रीन में फंसा युवा अपनी मानवीय भावनाएं खोता जा रहा है. युवाओं के पास प्रेम का सही अर्थ नहीं है. गर्लफ्रैंड/बौयफ्रैंड तो है पर प्यार नहीं है. युवा कुंठित है. डरा हुआ है. भविष्य निश्चित नहीं. लिखना तक नहीं आता. न अपनी बातों को साफ शब्दों में रखना आता है. जाहिर है, युवा को इस तरह के पत्र लिखने या अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए सब से पहले 6 इंच की आभासी दुनिया से विराम लेने की सख्त जरूरत है, पर क्या वह करेगा? बिलकुल नहीं.

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