Funny Hindi Story : असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं

Funny Hindi Story. यह अलग ही तरह का शख्स था. पता नहीं कहां कौन सी साधारण बात इसे खास लगने लगे, किस बात से मोहित हो जाए, कुछ कह नहीं सकते थे. जिन बातों से एक आम आदमी को ऊब होती थी, इस आदमी को उस में मजा आता था. एक अजीब सा आनंद आता था उसे. इस की अभिरुचि बिलकुल अलग ही तरह की थी. वैसे यह मेरा दोस्त है, फिर भी मैं कई बार सोचने को मजबूर हो जाता हूं कि आखिर यह आदमी किस मिट्टी का बना है. मिट्टी सी चीज में अकसर यह सोना देखता है और अकसर सोने पर इस की नजर ही नहीं जाती.

मैं इस के साथ मुंबई घूमने गया था. हम टैक्सी में दक्षिण मुंबई के इलाके में घूम रहे थे. हमारी टैक्सी बारबार सड़क पर लगे जाम के कारण रुक रही थी. जब टैक्सी ऐसे ही एक बार रुकी तो इस का ध्यान सड़क के किनारे बनी एक 25 मंजिली बिल्ंिडग की 15वीं मंजिल पर चला गया, जहां एक कमरा खुला दिख रहा था. मानसून का समय था. आसमान में बादल छाए थे. कमरे की लाइट जल रही थी, पंखा घूमता दिख रहा था. वह बोल उठा, ‘यार, इस को कहते हैं ऐश. देखो, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वो महाशय आराम फरमा रहे हैं, वह भी पंखे की हवा में.’

मैं ने सोचा इस में क्या ऐश की बात है? मैं ने कहा, ‘यार, वह आदमी जो उस कमरे में दिख रहा है, वह क्या कुछ काम नहीं करता होगा? आज कोई कारण होगा कि घर पर है.’

अब वह बोला, ‘यार, अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हैं और वह ऐश कर रहा है. यह तो एक बिल्डिंग के एक माले के एक फ्लैट की बात है, यहां तो हर फ्लैट में लोग मजे कर रहे हैं.’

मैं ने झल्ला कर कहा, ‘हां, हर फ्लैट नहीं, हर फ्लैट के हर कमरे में कहो और अपन यहां ट्रैफिक में फंसे हुए हैं.’

यह तो एक घटना मुंबई की रही. एक दिन शाम को घूमते हुए शहर के रेलवे स्टेशन पर मिल गया. मैं शाने भोपाल ट्रेन से दिल्ली जा रहा था. यह तफरीह करने आया था. चूंकि ट्रेन के लिए समय था, सो हम एक बैंच पर बैठ गए. स्टेशन पर आजा रही ट्रेनों को यह टकटकी लगा कर देखता. बोगी में बैठे लोगों को देखता. यदि किसी एसी बोेगी में कोई यात्री दिख जाता आपस में बतियाते या खाना खाते, लेटे पत्रिका पढ़ते तो यह कहता, ‘यार, देखो इन के क्या ऐश हैं. मस्त एसी में यात्रा कर रहे हैं, खापी रहे हैं, गपशप कर रहे हैं और अपन यहां कुरसी पर बैठे हैं?’

मैं ने कहा, ‘यार, इस में क्या खास बात हो गई? अपन लोग भी जाते हैं तो इसी तरह मौज करते हैं यदि तुम्हारे पैमाने से बात तोली जाए.’ मैं ने आगे कहा, ‘वैसे मैं तो रेलयात्रा को एक बोरिंग चीज मानता हूं.’ अब मेरा मित्र बोल पड़ा, ‘अरे यार, तुम नहीं समझोगे क्या आनंद है यात्रा का. मस्ती में पड़े रहो, सोते ही रहो और यदि घर से परांठेसब्जी लाए हो तो उस का भी मजा अलग ही है. काश, अपन भी ऐसे ही इस समय ट्रेन की ऐसी ही किसी बोगी में बैठे होते तो मजा आ जाता.’

मैं ने कहा, ‘तो चल मेरे साथ? असल जिंदगी जीना, मैं तो खैर बोर होऊंगा तो होते रहूंगा.’ लेकिन इस बात पर यह मौन हो गया.

इसे कौन से साधारण दृश्य अपील कर जाएं, कहना मुश्किल था. एक बार मैं और यह कार से शहर से 80 किलोमीटर दूर स्थित एक प्रसिद्ध पिकनिक स्पौट को जा रहे थे. एक जगह ट्रैफिक कुछ धीमा हो गया था. इस की नजर सड़क के किनारे खड़े ट्रकों व उस के साइड में बैठे ड्राइवरक्लीनरों पर चली गई.

वे अपनी गाडिं़यां खड़ी कर खाना पका रहे थे. ईंटों के बने अस्थायी चूल्हे पर खाना पक रहा था. एक व्यक्ति रोटियां सेंक रहा था, एक सब्जी बना रहा था. बाकी बैठे गपशप कर रहे थे. बस, इतना दृश्य इस के लिए असली जिंदगी वाला इस का जुमला फेंकने और उसे लंबा सेंकने के लिए काफी था.

यह बोल उठा, ‘देखो यार, जिंदगी इस को कहते हैं मस्त, कहीं भी रुक गए, पकायाखाया, फिर सो गए और जब नींद खुली तो फिर चल दिए और अपन, बस चले जा रहे हैं. अभी किसी होटल में ऊटपटांग खाएंगे. ये अपने हाथ का ही बना खाते हैं, इस में  किसी मिलावट व अशुद्धता की गुंजाइश ही नहीं है. ऐसी गरम रोटियां होटल में कहीं मिलती हैं क्या?

मैं ने चिढ़ कर कहा, ‘ऐसा करते हैं अगली बार तुम भी रसोई का सामान ले कर चलना. अपन भी ऐसे ही सड़क के किनारे रुक कर असली जिंदगी का मजा लेंगे. और तुरंत ही मजा लेना है तो चल आगे, किसी शहरकसबे के बाजार से अपना तवा, बेलन और किराने का जरूरी सामान खरीद लेते हैं, इस पर वह मौन हो गया.

मैं एक बार इस के साथ हवाईजहाज से बेंगलुरु से देहरादून गया. फ्लाइट के 2 स्टौप बीच में थे. एयर होस्टैस और दूसरे हौस्पिटैलिटी स्टाफ के काम को यह देखतासुनता रहा. बाद में बोला, ‘यार, असली मजे तो इन्हीं के हैं? 2 घंटे में इधर, तो 2 घंटे में उधर. सुबह उठ कर ड्यूटी पर आए तो दिल्ली में थे, नाश्ता किया था मुंबई में. लंच लिया बेंगलुरु में और डिनर लेने फिर दिल्ली आ गए. करना क्या है, बस, मुसकराहटों को फेंकते चलना है. एक बार हर उड़ान में सैफ्टी निर्देशों का प्रदर्शन करना है, बस, फिर जा कर बैठ जाना है. प्लेन के लैंड करते समय फिर आ जाना है और यात्रियों के जाते समय बायबाय, बायबाय करना है. इसे कहते हैं जिंदगी.’

मैं ने कहा, ‘यार, तुझे हर दूसरे आदमी की जिंदगी अच्छी लगती है, अपनी नहीं.’ मैं ने आगे कहा कि इन की जिंदगी में रिस्क कितना है? अपन तो कभीकभी प्लेन में बैठते हैं तो हर बार सब से पहला खयाल सहीसलामती से गंतव्य पहुंच जाने का ही आता है. अब इस बात पर यह बंदा मौन हो गया, कुछ नहीं बोला. बस, इतना ही दोहरा दिया कि असली ऐश तो ये करते हैं.

एक और दिन की बात है. यह अपने खेल अनुभव के बारे में बता कर दूसरों की जिंदगी में फिर से तमगे पर तमगे लगा रहा था. वनडे क्रिकेट मैच देख आया था नागपुर में, बोला, ‘यार, जिंदगी हो तो खिलाड़ी जैसी. कोई काम नहीं, बस, खेलो, खेलो और जम कर शोहरत व दौलत दोनों हाथों से बटोर लो. जनता भी क्या पगलाती है खिलाडि़यों को देख कर, इतनी भीड़, इतनी भीड़, कि बस, मत पूछो.’

मैं ने कहा, ‘बस कर यार, अभी पिछले सप्ताह प्रसिद्ध गायक सोनू निगम का कार्यक्रम हुआ था, उस में भी तेरा यह कहना था कि अरे बाप रे, क्या भीड़ है. लोग पागलों की तरह दाद दे रहे हैं, झूम रहे हैं. जिंदगी तो ऐसे कलाकारों की होती है’ मैं ने आगे कहा, ‘इस स्तर पर वे क्या ऐसे ही पहुंच गए हैं. न जाने कितने पापड़ बेले हैं, कितना संघर्ष किया है. असली कलाकार तो मैं तुझे मानता हूं जो असली जिंदगी को कहांकहां से निकाल ढूंढ़ता है.’

वह बोला, ‘यार, यह सब ठीक है. पापड़आपड़ तो सब बेलते हैं, लेकिन समय भी कुछ होता है. ये समय के धनी लोग हैं और अपन समय के कंगाल? घिसट कर जी रहे हैं.’ मैं ने कहा, ‘मैं तो तुम्हारी असली जिंदगी जीने की अगली उपमा किस के बारे में होगी, उस का इंतजार कर रहा हूं. तुम्हारा यह चेन स्मोकर की तरह का नशा हो गया है कि हर दूसरे दिन किसी दूसरे की जिंदगी में तुम्हें नूर दिखता है और अपनी जिंदगी कू्रर.’

वह कुछ नहीं बोला. अब उस के मौन हो जाने की बारी थी. उस का मौन देख कर मैं ने भी अब मौन रहना उचित समझा, वरना मैं ने कुछ कहा तो पता नहीं यह फिर किस से तुलना कर के अपने को और मुझे भी नीचा फील करवा दे.

मेरे इस दोस्त का नाम तकी रजा है. महीनेभर बाद पिछले शनिवार को मैं इस से मिलने घर गया था. मैं आजकल इस के ‘असली जिंदगी इन की है’ जुमले से थोड़ा डरने लगा हूं. मुझे लग रहा था कि कहीं यह मेरे पहुंचते ही ‘असली जिंदगी तो इन की है’ कह कर स्वागत न कर दे. मैं इस के घर का गेट खोल कर अंदर दाखिल हुआ. यह लौन में ही बैठा हुआ था.

मेरी ओर इस की नजर गई. लेकिन तकी, जो ऊपर को टकटकी लगाए कुछ देख रहा था, ने तुरंत नजर ऊपर कर ली. मैं उस के सामने पड़ी कुरसी पर जा कर बैठ गया. उस के घुटनों को छू कर मैं ने कहा कि क्या बात है, सब ठीक तो है? वह मेरे यह बोलते ही बोला, ‘क्या ठीक है यार, ऊपर देख? कैसे एक तोता मस्त अमरूद का स्वाद ले रहा है?’

मैं ने ऊपर की तरफ देखा, वाकई एक सुरमी हरे रंग का लेकिन लाल रंग की चोंच, जोकि तोते की होती ही है, वाला तोता अमरूद कुतरकुतर कर खा रहा था और बारीकबारीक अमरूद के कुछ टुकड़े नीचे गिर रहे थे. थोड़ी देर बाद वह फुर्र से टांयटांय करते उड़ गया. फिर एक दूसरा तोता आ गया. उस के पीछे 2-3 तोते और आ गए. वे सब एकएक अमरूद पर बैठ गए.

एक अमरूद पर तो 2 तोते भी बैठ कर उसे 2 छोरों से कुतरने लगे. कौमी एकता का दृश्य था. तकी बोला, ‘यार, असली जिंदगी तो इन की है. जमीन पर आने की जरूरत ही नहीं, हवा में रहते ही नाश्ता, खाना, टौयलेट सब कर लिया.’ और हमारे आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा कि तकी ने जैसे ही यह बोला कि एक तोता, जो उस के सिर के ठीक ऊपर वाली डाल पर था, ने अपना वेस्ट मैटेरियल सीधे तकी के सिर पर ही गिरा दिया.

‘यह भी कोई तरीका है,’ कह कर तकी अंदर की ओर भागा. जब वह वापस आया तो मैं ने कहा, ‘हां यार, वाकई असली जिंदगी ये ही जी रहे हैं.’ तकी ने मुझे खा जाने वाली नजरों से देखा.

मैं ने इस के ‘असली जिंदगी ये जी रहे हैं’ वाले आगामी बेभाव पड़ने वाले डायलौग से बचने के लिए बात को आम भारतीय की तरह महंगाई को कोसने के शाश्वत विषय की ओर मोड़ दिया.

तकी बोला, ‘हां यार, यह महंगाई तो जान ले रही है.’ लेकिन थोड़ी ही देर में असली जिंदगी तो ये जी रहे हैं’ का साजोसामान ले जाती कुछ बैलगाडि़यां सामने से निकल रही थीं. ये गड़रियालुहार थे जोकि खानाबदोश जिंदगी जीते हैं. बैलगाडि़यों पर पलंग, बच्चे और सब सामान लदा दिख रहा था. अब तकी टकटकी लगा कर इन्हें ही देख रहा था. उस की आंखों ने बहुतकुछ देख लिया जो कि उसे बाद में शब्दों में प्रकट कर मेरी ओर शूट करना था. अंतिम बैलगाड़ी जब तक 25 मीटर के लगभग दूर नहीं पहुंच गई, यह उसे टकटकी लगा कर देखता ही रहा. अब वह बोला, ‘यार, जिंदगी तो इन की है?’

मैं ने कहा, ‘खानाबदोश जिंदगी भी कोई जिंदगी है?’

वह बोला, ‘यार, तुम नहीं समझोगे, इसी में जिंदगी का मजा है. एक जगह से दूसरी जगह को ये लोग हमेशा घूमते रहते हैं. कहीं भी रुक लिए और कहीं भी बनाखा लिया, और कहीं भी रात गुजार ली. भविष्य की कोई चिंता नहीं, मस्तमौला, घुमक्कड़ जिंदगी, सब को कहां मिलती है.’

मैं ने सोचा कि इस को भी यह अच्छा कह रहा है. अब तो यहां से रवानगी डालना ही ठीक होगा, वरना ‘असली जिंदगी तो इन की है’ का कोई न कोई नया संस्करण कहीं न कहीं से इस के लिए प्रकट हो जाएगा, जिसे वह मेरे पर शूट करेगा जो कि मुझे आजकल हकीकत की गोली से भी तेज लगने लगा है.

यह भीखूब रही. मेरी शादी के तुरंत बाद की घटना है. पत्नी विदा हो कर ससुराल आ गईर् थी. बहू से मिलने वालों का आनाजाना लगा हुआ था.

उन दिनों हमारे ताऊजी सेवानिवृत्त हो कर उसी शहर में रहते थे. उन के क्रोधी स्वभाव से हम सभी परिचित थे. मेरी पत्नी को जल्द ही ताऊजी के बारेमें इतने किस्से सुनने को मिले कि उस के दिल में एक डर सा समा गया.

शाम का वक्त था. तभी ताऊजी का आगमन हुआ. उन को देखते ही पत्नी घर के अंदर भागी. ताऊजी बहू का नाम पुकारते हुए उस के पीछे जाने लगे तो वह अपने कमरे के अंदर भागी. ताऊजी को दरवाजे की तरफ आता देख उस के होश उड़ गए. कमरे में एक ही दरवाजा था. भागने का कोई उपाय न देख वह पलंग के नीचे छिप गई. ताऊजी कमरे के अंदर झांक कर वापस लौटे. फिर सब को बतलाने लगे कि बहू को अंदर जाते देखा, फिर गायब कहां हो गई.

ताऊजी के जाने के बाद ही पत्नी पलंग के नीचे से बाहर आई. तब तक उस के कपड़ों तथा मेकअप का बुरा हाल हो चुका था. वह शर्म से लाल हो रही थी, जबकि हम सब का हंसते हंसते बुरा हाल था.  विनोद प्रसादशर्माजी कुछ महीनों पहले ही रिटायर हुए. अब उन के पास न तो कोई विशेष काम था और न ही सरकारी नौकर या गाड़ी. वे कोशिश करते घर के कामों में खुद को व्यस्त रखने की, दोस्तों के यहां जाना और उन्हें बुलाना बढ़ गया.

एक दिन हम 5-6 दोस्त शर्माजी के घर गपें मारने के लिए इकट्ठा हुए. थोड़ी देर बाद मिसेज शर्मा बोलीं, ‘‘मैं चाय बना कर ले आती हूं.’’ शर्माजी बोले, ‘‘अरे, रुको, चाय तो आज मैं ही बनाऊंगा.’’ और वे चले चाय बनाने. पत्नी साथ जाने लगीं तो उन्हें यह कह कर रोक दिया कि ‘‘आप यहीं बैठो.’’ पत्नी बुदबुदाई, ‘‘कभी तो चाय बनाई नहीं.’’

थोड़ी देर बाद शर्माजी बिलकुल बैरा स्टाइल में चाय की ट्रे ले कर आ गए. सब ने चाय ले ली. पहली चुस्की लेते ही सब की नाक में हींग की महक तैर गई. सब एकदूसरे का मुंह देखने लगे तो वे बोले, ‘‘है न बढि़या मसाला चाय?’’

सब कहने लगे, ‘‘आप भी लीजिए.’’

शर्माजी ने जैसे ही चाय की चुस्की ली, उन का मुंह देख कर हम सब खिलखिला कर हंस दिए. असल में उन्होने चाय में जीरावन मसाला डाल दिया था जो चाय मसाले के साथ ही रखा था. Funny Hindi Story

Love Story in Hindi : नाम की शादी

Love Story in Hindi. कुलदीप की लाश को फटी आंखों से ताकती तनवीर बुत बनी बैठी थी. जानपहचान वाले घर पर इकट्ठे होते जा रहे थे. अमेरिका का वह इलाका भारत के पंजाबी और सिख तबके का गढ़ था.

तनवीर की हालत देख कर औरतों के आंसू नहीं थम रहे थे. अभी 4 महीने पहले ही तो लाल जोड़े में आई तनवीर की आरती उतार कर उन्होंने प्यार से घर में स्वागत किया था.

बचपन से अनाथ कुलदीप अपने प्यार भरे स्वभाव के चलते किसी का बेटा, किसी का भाई या किसी का देवर बन चुका था. परायों के बीच उसे अपना परिवार मिल गया था.

तनवीर को सतवंत ताई ने गले से लगा कर रोंआसी आवाज में तसल्ली देनी चाही, ‘‘तू चिंता मत कर तन्नी बेटी. हम सब तेरे अपने हैं. खुद को अकेली मत समझ.’’

कुलदीप के साथी टैक्सी ड्राइवर उदास खड़े थे. उन का सब से ज्यादा जिंदादिल साथी उन्हें छोड़ कर जो चला गया था.

हाईवे पर हादसा होना कोई नई बात नहीं थी, पर कुलदीप तो बहुत होशियार ड्राइवर था. पुलिस का कहना है कि हादसा होने के समय वह मोबाइल फोन पर बातें कर रहा था.

दरअसल, सवारी से अच्छे पैसे पा कर कुलदीप की खुशी दोगुनी हो गई थी. उस ने तनवीर को फोन लगाया था. शाम को लोहड़ी में पहनने के लिए उस ने अपनी तन्नी के लिए जामुनी रंग का सलवारसूट खरीदा था, तभी जोर के एक धमाके के साथ सब खत्म हो गया.

5-7 दिन तक बारीबारी से कोई न कोई पड़ोसन तनवीर के पास रही. सतवंत ताई और मनजीत भाभी का मन अपने घर में टिकता ही नहीं था. तन्नी का दुख उन का अपना दुख बन गया था.

सब के सामने एक बड़ा सवाल यह था कि अब तन्नी का क्या होगा? किराए का घर तो छोड़ना ही होगा. सब सोच में पड़ गए कि वह कहां जाएगी?

कुलदीप और तनवीर की कहानी सब जानते थे. कुलदीप ने बताया था कि जब वह भारत में था, तब बचपन में ही उस के मातापिता हैजे के शिकार हो कर चल बसे थे.

लालची चाचाचाची पूरी जायदाद पर कब्जा करना चाहते थे. समझदार हो रहा कुलदीप उन की राह का कांटा बन रहा था.

जवान हो रहे कुलदीप को गांव वालों ने इशारोंइशारों में बताया था, ‘चाचा तुम्हारी जान का दुश्मन बन चुका है. उस के साथ रहने में खतरा है.’

पास के गांव में रहने वाला जगजीत अकसर कुलदीप से मिलता रहता था. वह अमेरिका में टैक्सी चलाता था. कुलदीप की हालत देख कर उस ने सलाह दी थी, ‘यहां रह कर चाचा की चाकरी कर के क्यों बेकार में गालियां खाता है? चल, मेरे साथ. अमेरिका में तेरी जिंदगी बन जाएगी.’

चाचा ने एक चाल चल कर पूरी जायदाद अपने नाम लिखवा ली थी. कुलदीप को अमेरिका की टिकट के पैसे दे कर चाचा ने जैसे उस पर एहसान किया था.

अमेरिका पहुंच कर कुलदीप की दुनिया ही बदल गई. जगजीत को वह अपना भाई मानता था. जगजीत की घरवाली मनजीत भाभी के साथ वह अपना सुखदुख बांटता था.

कुलदीप कहता था, ‘खून के रिश्तों से बड़ा मन का रिश्ता होता है. जगजीत से मेरे मन का रिश्ता है. उस ने मुझे नई जिंदगी दी है.’

जगजीत की बहिन की शादी में कुलदीप भी उस के साथ भारत में उस के गांव गया था. वापसी में तनवीर भी उस के साथ आई थी.

‘क्यों रे कुलदीप, यह परी कहां से उड़ा लाया? तू ने तो हमें अपनी शादी की खबर भी नहीं दी?’ अमेरिका में सतवंत ताई ने उसे मीठा उलाहना दिया था.

‘हां, कुलदीप देवरजी, अब हमें सचसच बताओ कि यह कमाल कैसे हो गया?’ कमलजीत भाभी ने सब के मन की बात कही थी.

‘एक बात जान ले कुलदीप, अगर इन्हें पूरी कहानी नहीं सुनाई, तो ये तुझे  तनवीर से मिलने नहीं देंगी,’ मनजीत भाभी ने चेतावनी दे डाली थी.

20 दिन की बच्ची को ले कर मनजीत अपनी ननद की शादी में भारत नहीं जा पाई थी. कुलदीप की प्रेम कहानी सुनने के लिए वह भी बहुत उतावली थी.

‘अरे भाभी, ऐसी कड़ी सजा मत देना. चलो, मैं सब बताता हूं,’ कुलदीप बोला था.

औरतें चौकन्नी हो कर बैठ गई थीं. सब के मन में कोई फिल्मी कहानी उभर रही थी. कुलदीप ने बताना शुरू किया था, ‘तनवीर की सौतेली मां के जुल्मों ने उस की बुरी हालत कर दी थी. सौतेली मां की 3 और बेटियां हैं, पर घर का सारा काम तनवीर पर मढ़ कर सब मौज करतीं. यह देख कर मैं ने तनवीर से शादी करने का फैसला सुना डाला.

‘अमेरिका में कमाने वाला दूल्हा मिलने की बात से सौतेली मां जल गई. शादी न होने देने के लिए उस ने बहुत अड़ंगे लगाए, पर गांव वालों और जगजीत की मदद से हमारी शादी हो गई.’

कुलदीप की तरह तनवीर भी सब की प्यारी ‘तन्नी’ बन गई.

कुलदीप की मौत के बाद अब तनवीर का क्या होगा? जानपहचान के सभी मर्द इसी सोच में पड़ गए. तनवीर तो टूरिस्ट वीजा पर आई थी. कुलदीप का मानना था कि अमेरिका में रहते हुए ही वह तनवीर का वीजा स्टेटस बदलवा लेगा.

कुलदीप खुद ग्रीन कार्ड पर था. तनवीर कानूनन 6 महीने से ज्यादा वहां नहीं रह सकती थी. भारत वापस जाने का मतलब उसे फिर उसी नरक में झोंक देना था.

बूढ़े सरदार कुलवंत सिंह ने समस्या उठाई, ‘‘अब हमें सोचना है कि तनवीर बेटी की कैसे मदद की जाए?’’

‘‘सच तो यह है ताऊजी कि इधर कुआं है, तो उधर खाई. तन्नी को भारत नहीं भेजा जा सकता. हमारा कुलदीप उसे जिस आग से बचा कर लाया था, हम तन्नी को उसी आग में जलने को नहीं भेज सकते, पर यहां रहने में भी कानूनी अड़चनें हैं,’’ जगजीत ने कुछ सोचते हुए कहा.

यह सुन कर सब सोच में पड़ गए. अचानक हरजीत ने एक चौंकाने वाला प्रस्ताव सब के सामने रख दिया, ‘‘अगर माफी मिले तो जो एक तरीका मेरे दिमाग में आ रहा है, सब को बताऊं?’’

‘‘हां… हां, बेखौफ हो कर बता बेटा. तन्नी बेटी की खुशी हमारे लिए सब से ऊपर है.’’

‘‘अरमिंदर को तो आप जानते हैं न ताऊजी?’’

‘‘अरे, उसे कौन नहीं जानता. वह तो पूरी बिरादरी को बदनाम कर रहा है,’’ यह कह कर सरदार कुलवंत सिंह का चेहरा कठोर हो गया था.

‘‘इस मुश्किल घड़ी में वही हमारी मदद कर सकता?है,’’ हरजीत ने कहा.

‘‘क्या बकवास कर रहा है तू? इसी अरमिंदर ने पहले एक 50 साल की औरत के साथ शादी कर के अमेरिका की नागरिकता ली. उसे तलाक दे कर भारत से सुरजीत को ब्याह कर ले आया. उस से भी तलाक हो गया.

‘‘अब तो उस ने यह धंधा बना लिया है. पैसे ले कर जरूरतमंद लड़कियों से शादी करता है, बाद में उन्हें तलाक दे कर खुला घूमता है. ऐसे नीच इनसान से कौन सी मदद मिलेगी?’’ सरदारजी के चेहरे पर नफरत साफ झलक रही थी.

‘‘कहने को तो वह आटोमोबाइल पार्ट्स की दुकान का मालिक है, पर असल में वह औरतों को परमानैंट वीजा दिला कर पैसे कमाता है. इस के बावजूद वह कहता?है कि वह किसी की मजबूरी का कोई फायदा नहीं उठाता, बल्कि उन की मदद करता है,’’ जगजीत ने नाराजगी से कहा.

‘‘यह सच बात है. दरअसल, अरमिंदर को न जाने क्यों औरत जात से नफरत है. उस के खिलाफ किसी लड़की ने कभी कोई शिकायत नहीं की, बल्कि वे उस की एहसानमंद हैं,’’ हरजीत ने अपनी बात रखी.

‘‘तू कहना क्या चाहता है? साफसाफ बता,’’ सरदारजी ने जानना चाहा.

‘‘तनवीर की शादी अरमिंदर से करानी होगी. उस की बीवी बन कर तनवीर को अमेरिका का परमानैंट वीजा मिल जाएगा. वीजा मिलने के बाद ही तनवीर यहां रह सकती है और काम भी कर सकेगी,’’ हरजीत ने बात साफसाफ कह दी.

‘‘तेरा मतलब है कि हम तन्नी को उस भेडि़ए के हाथ में सौंप दें?’’ जगजीत ने गुस्से से कहा.

‘‘क्या अरमिंदर पर यकीन किया जा सकता है? अगर उस ने तन्नी की मरजी के खिलाफ कोई जबरदस्ती की तो?’’ जगजीत ने सवाल किया.

‘‘अगर उस ने ऐसा करने की गलती की, तो हम सब मिल कर उसे ऐसा सबक सिखाएंगे कि उस की अक्ल ठिकाने आ जाएगी,’’ हरजीत ने मजबूती से अपनी बात कही.

हरजीत की बात में दम था, लेकिन इस का अंजाम खतरनाक भी हो सकता?था.

बहुत सोचनेसमझने के बाद सब का फैसला हरजीत के हक में था. तनवीर को इस नाम की शादी के लिए राजी करने की जिम्मेदारी औरतों को दी गई.

तनवीर को समझ  पाना इतना आसान नहीं था. भारत वापस जाने के नाम पर तनवीर कांप उठती. सौतेली मां ने जाते समय कड़ी चेतावनी दी थी, ‘अमेरिका का लड़का फांस कर हमारा बड़ा नाम किया है. खबरदार, जो पलट कर मुंह दिखाया, तो तेरी खैर नहीं.’

तनवीर को अपनी छाती से लगा कर मनजीत ने समझाया, ‘‘देख तन्नी, तू मेरी छोटी बहिन जैसी?है. तेरी भलाई के लिए ही हम ने यह फैसला लिया?है.

‘‘कुलदीप नहीं चाहता था कि तू कभी वापस भारत जाए. यहां रह कर तू एक नई जिंदगी जी सकती है, पर उस के लिए परमानैंट वीजा चाहिए.’’

सब के समझने से तनवीर का विरोध ज्यादा देर नहीं टिक सका. सब ने उस की सलामती की जिम्मेदारी ली थी.

अरमिंदर से जब बात की गई, तो उस ने सपाट लहजे में कह दिया, ‘‘जरूरतमंद लड़कियों और औरतों को परमानैंट वीजा दिलाना मेरा काम है. पैसे मिलेंगे तो तनवीर तो क्या, मैं किसी से भी शादी करने के लिए तैयार हूं.’’

‘‘पर एक बात समझ  ले अरमिंदर, हमारी तनवीर पैसे देने की हालत में नहीं है. उस की मदद कर दे बस,’’ सरदारजी ने प्यार से कहा.

‘‘तू तनवीर की मदद कर दे. हम सब मिल कर जो भी बनेगा, पैसा इकट्ठा कर के तुझे  दे देंगे,’’ जगजीत ने मिन्नत की.

‘‘वाह, मुझे क्या इतना गयागुजरा समझ  लिया? मुझे  भीख के पैसे नहीं चाहिए,’’ अरमिंदर ने कुछ नाराजगी से कहा.

‘‘माना कि यह शादी बस नाम के लिए होगी, पर पैसों की भरपाई की जगह जब तक तनवीर को परमानैंट वीजा नहीं मिल जाता, वह तेरा घर संभालेगी. तेरे लिए रोटी बनाएगी, साफसफाई करेगी. बोल, यह सौदा मंजूर है?’ सरदारजी ने पूछा.

‘‘ठीक है, परमानैंट वीजा मिलते ही मैं तनवीर को तलाक दे दूंगा. उस वक्त यह शर्त मत रखिएगा कि उसे जिंदगीभर के लिए सहारा दूं.’’

अरमिंदर की ‘हां’ से सभी के चेहरे खिल उठे.

गुरुद्वारे में दोनों की शादी के समय सारी बिरादरी जमा हुई थी. तनवीर के आंसू चुन्नी से पोंछ कर सतवंत ताई ने तसल्ली दी, ‘‘घबरा मत तन्नी, शादी तो नाम के लिए है. कुछ महीने बाद तू यहां रह सकेगी. हम सब तेरे साथ हैं बेटी.’’

‘‘मुझे तो लगता है कि अरमिंदर जैसा बुरा इनसान भी हमारी तन्नी के साथ रह कर अच्छा इनसान बन जाएगा. अगर दोनों के मन मिल गए, तब तो बल्लेबल्ले. क्यों तन्नी?’’ उस गंभीर माहौल को मनजीत ने अपने मजाक से हलका करना चाहा.

आंसू?भरी आंखों के साथ तनवीर उस बदनाम अरमिंदर के घर आ गई. घर पर एक नजर डालते हुए अमरिंदर ने तनवीर से कहा, ‘‘एक बात अच्छी तरह से समझ ले. इस घर को अपना घर समझाने की भूल कभी मत करना. यह कमरा तेरा वेटिंगरूम है. जिस दिन तेरा टिकट मिल गया, अपनी गाड़ी पकड़ कर चलती बनना.’’

‘‘जी…’’ यह सुन कर तनवीर की आंखें भर आईं.

‘‘एक बात और साफ कर दूं. यह मेरा घर है, तू यहां गृहस्थी जमाने की कोशिश मत करना. घर में कुछ बरतन जरूर पडे़ हैं, पर रोटी पकाने का कोई सामान नहीं है. अब कुछ वक्त तु?ो यहां रहना है, तो कुछ इंतजाम करना होगा. आज बाहर से खाना आ जाएगा. मुश्किल में पड़ गया मैं तो,’’ अरमिंदर का गुस्सा फूट पड़ा.

अरमिंदर के जाने के बाद एक लड़का खाने की थाली के साथ आ पहुंचा. वह बोला, ‘‘भाभी, आप के लिए खाना लाया हूं. अरमिंदर भाई ने कहा है कि आप उन का इंतजार मत करना.’’

तनवीर की रुलाई फूट पड़ी. कुलदीप उसे कितने प्यार से खाना खिलाता था, पर अब कुलदीप कहां  था? खाना छूने का भी मन नहीं किया. आंखों से नींद भाग चुकी थी. क्या से क्या हो गया था.

देर रात दरवाजा खुलने की आवाज पर तनवीर डर गई. कमरे की खिड़की से बाहर झंकने पर हाथ में बोतल के साथ डगमगाते कदमों से अरमिंदर आता दिखाई दिया.

नशे में धुत्त अरमिंदर अपने कमरे में चला गया. इस आदमी के साथ तनवीर कैसे रहेगी?

सुबह नहाधोकर तनवीर काम से फारिग हो चुकी थी और सोच रही थी, ‘पता नहीं, वह चाय पीता भी है या नहीं?’

ताई ने समझाया था, ‘समझदारी से कुछ वक्त निकालना होगा तन्नी. अपने को उस से बस दूर रखना. इस बीच उस की और उस के घर की ठीक से देखभाल कर लेना.’

तनवीर की सोच को अरमिंदर की आवाज ने तोड़ा था, ‘‘तू ने कल रात खाना नहीं खाया. थाली वैसे ही रखी हुई थी. क्यों?’’ ‘‘जी… भूख नहीं थी.’’

‘‘एक बात समझ  ले. यहां कोई मानमनौव्वल करने वाला नहीं है. सरदारजी ने कहा है कि तू सारा घर संभालेगी. भूखी रह कर काम कैसे कर पाएगी. तू चाय पीती है?’’

‘‘जी, आप चाय लेंगे?’’ तनवीर ने सहमते हुए पूछा.

‘‘मैं ने कहा न कि अपने काम से काम रख. मेरी जिंदगी में दखल मत दे. कल कुछ सामान आया था. चाय की पत्ती, चीनी वगैरह होगी. दूध फ्रिज में होगा,’’ अपनी बात कह कर अरमिंदर बाहर चला गया जा  तेजाते अरमिंदर कह गया, ‘‘किसी अनजान के लिए दरवाजा मत खोलना. अपने लिए खाना पका लेना.’’

रात की थाली में से एक रोटी गले से उतार कर तनवीर ने पानी पी लिया. इस जिंदगी की तो उसे आदत डालनी ही होगी.

तनवीर ने कमरा ठीक कर दिया. वह समझ  नहीं पा रही थी कि दिन कैसे कटेगा. कुलदीप की यादें उसे कचोट रही थीं. सूना घर उसे काटने को दौड़ रहा था.

रात में तनवीर ने दालसब्जी के साथ रोटियां बना दीं. अगर अरमिंदर आ गया, तो खाना परोस देगी.

रात को बहुत देर तक इंतजार करने के बाद उस ने 2 रोटियां खा लीं. ताई ठीक कहती हैं, ‘कुछ भी हो जाए, यह पापी पेट नहीं मानता. इसे तो भरना ही पड़ता है.’

फिर वही दरवाजा खुलने की आवाज और अरमिंदर का लड़खड़ाते कदमों से घर में आना तनवीर को डरा गया. अगर कभी अरमिंदर ने उस के साथ जबरदस्ती की, तो वह क्या करेगी? कल से अपने बंद दरवाजे के आगे मेज लगा कर सोएगी.

अरमिंदर ने तनवीर को परमानैंट वीजा दिलाने का काम शुरू कर दिया. इतने दिनों में तनवीर काफी सामान्य हो चली थी. अरमिंदर ने कभी कोई गलत हरकत नहीं की, बल्कि उस की जरूरतों के बारे में पूछ कर वह उस का मन हलका कर देता.

एक दिन अरमिंदर काम पर जाने को निकलने ही वाला था कि तनवीर एक डब्बा ले कर आ गई, ‘‘आप के लिए खाना बनाया है…’’

‘‘क्या मैं ने कहा था कि मेरे लिए खाना बना?’’ अरमिंदर ने रूखेपन से कहा.

‘‘आप रोज बाहर का खाना खाते हैं. घर में रोटी बनती है, इसलिए…’’

‘‘देख तनवीर, मैं ने पहले ही कह दिया था कि रोटी का डब्बा थमा कर मेरी घरवाली बनने की कोशिश मत कर… समझ?’’

अरमिंदर की इस सख्त बात पर आंसू भरी आंखों के साथ तनवीर अपने कमरे में चली गई. काफी देर बाद उस ने बाहर आने पर देखा, रोटी का डब्बा नहीं था.

उस शाम अरमिंदर कुछ जल्दी घर आ गया. रोटी वाला डब्बा रसोईघर में रख कर उस ने कहा, ‘‘तेरा डब्बा तो मेरे साथी खाली कर गए. कह रहे थे कि सब्जी अच्छी बनी थी.’’

अरमिंदर की इस बात से तनवीर का चेहरा खुशी से चमक उठा. उस दिन के बाद से तनवीर रोज अरमिंदर को खाने का डब्बा थमाने लगी, पर शाम का वही रूटीन चलता रहा.

सतवंत ताई और मनजीत भाभी अकसर तनवीर के पास आ जाती थीं. साफसुथरा घर देख कर मनजीत के चेहरे पर शरारत छलक आई, ‘‘वाह तन्नी, देखती हूं, तू ने अरमिंदर का घर संवार दिया है. चमक रहा है घर. एक बात बता, क्या तू ने घर के मालिक को भी संभाल लिया है?’’

‘‘चुप कर मनजीत. जो मुंह में आता है, बोल देती है. सहीगलत का तो ध्यान रखा कर. हां तन्नी बेटी, बता अरमिंदर तुझे  परेशान तो नहीं करता?’’ सतवंत ताई ने पूछा.

‘‘नहीं ताई, उन्होंने कभी परेशान नहीं किया. वे मेरी जरूरतों का खयाल रखते हैं,’’ तनवीर के चेहरे पर थोड़ी सी खुशी झलक आई.

‘‘क्या कहा तन्नी? वह तेरी हर जरूरत का खयाल रखता है?’’ मनजीत कान में फुसफुसाई.

तनवीर का चेहरा शर्म से लाल हो आया. ताई ने राहत की सांस ली, ‘‘चल, यह सुन कर तसल्ली हुई. हम सब तो डरते थे कि कहीं वह तेरे साथ कोई बदसुलूकी न करे.’’

तन्नी को आशीर्वाद दे कर वे दोनों चली गईं. रास्ते में मनजीत को चुप देख कर सतवंत ताई ने  पूछा, ‘‘क्या सोच रही है मनजीत?’’

‘‘एक बात का डर लग रहा है ताई. कहीं तन्नी उस अरमिंदर शैतान के जाल में न फंस जाए. वह तो प्यार का मतलब भी नहीं जानता. कहीं हमारी तन्नी धोखा न खा बैठे.’’

‘‘क्या पता, तन्नी के साथ रह कर अरमिंदर ही सुधर जाए.’’

अमेरिका के उस हिस्से में सिख और पंजाबी जोरशोर से बैसाखी मनाते थे. बैसाखी के 2 दिन पहले अरमिंदर ने तनवीर को एक कीमती सलवारसूट दे कर उसे हैरानी में डाल दिया.

उस ने सपाट लहजे में कहा, ‘‘परसों पास के मैदान में बैसाखी का मेला लगेगा. यह सूट पहन कर चली जाना.’’

‘‘आप नहीं चलेंगे?’’

‘‘नहीं. तेरी ताई और भाभी तुझे  ले जाएंगी. ये कुछ पैसे रख ले, जो जी चाहे खरीद लेना.’’

नोटों का एक बड़ा बंडल देख कर तन्नी डर गई, ‘‘नहीं, मुझे  पैसे नहीं चाहिए. मैं मेले में नहीं जाऊंगी.’’

‘‘देख, यह औरतों का मनपसंद मेला है. तू वहां जरूर जाएगी. मैं भाभी को बोल चुका हूं,’’ इतना कह कर अरमिंदर वहां से चला गया.

मनजीत के साथ कई औरतें आई थीं. तन्नी को नया सूट पहने देख कर मनजीत की नजर ठहर गई, ‘‘वाह तन्नी, तू ने तो बड़ा प्यारा सूट पहना है.’’

‘‘वे लाए हैं…’’ शरमाती हुई तन्नी बस इतना ही कह सकी.

‘‘ओए… होए, यह ‘वे’ कौन हैं जी?’’

सब की हंसी ने तन्नी का चेहरा लाल कर दिया. मेले में सब ने खूब मजे किए. उतनी देर के लिए तनवीर अपना दुख भुला बैठी. घर लौटने पर उम्मीद के उलट अरमिंदर घर में ही था.

‘‘कैसा था मेला?’’ अरमिंदर ने पूछा.

‘‘बहुत मजा आया. मनजीत भाभी ने जबरदस्ती चूडि़यां दिलवा दीं…’’ तनवीर ने चहकते हुए बताया.

‘‘ठीक है, बहुत रात हो गई. जा, सो जा,’’ अपने कमरे का दरवाजा बंद कर अरमिंदर ने तन्नी के जोश पर ठंडे पानी के छींटे डाल दिए.

अब तन्नी को जिंदगी मुश्किल नहीं लगती थी. उसे अरमिंदर के आने का इंतजार रहता. उस का मनपसंद खाना बना, उस की तारीफ के दो शब्द सुनने को वह उतावली रहती. समझ नहीं पाती, अरमिंदर को लोग खराब क्यों कहते हैं?

कुलदीप की यादें अब धुंधली होने लगी थीं. अपनी नई जिंदगी से तन्नी ने समझौता कर लिया था.

एक दिन अरमिंदर को शराब पीते देख कर वह बोल उठी, ‘‘आप इतनी शराब न लिया करें, नुकसान करती है.’’

‘‘मेरे फायदेनुकसान से तुझे  क्या लेनादेना है? इस बारे में तो मैं ने कभी सुरजीत का कहा भी नहीं माना,’’ तन्नी की बात बीच में ही काट कर अरमिंदर ने रूखेपन से कहा.

‘‘जी, सुरजीत कौन थीं?’’

‘‘थी नहीं, है. उस की यादें इस दिल में इतनी गहरी बैठी हैं, जिन्हें कोई नहीं मिटा सकता. मेरी सबकुछ है सुरजीत.’’

‘‘अब वे कहां हैं?’’

‘‘मु?ो छोड़ गई. मेरे ही दोस्त के साथ घर बसा लिया उस ने, पर मैं पूरी जिंदगी उस का इंतजार करूंगा. अगर मेरा प्यार सच्चा है, तो वह मेरे पास जरूर आएगी.’’

न जाने क्यों अरमिंदर की इस बात से तनवीर का दिल बैठ गया. कई कहानियां याद हो आईं. प्रेमिका या प्यारी बीवी के न रहने पर लोग देवदास बन जाते हैं, पर सच्ची जीवनसंगिनी मिल जाने पर पुराने घाव भर जाते हैं. क्या तनवीर के साथ ने अरमिंदर पर कोई असर नहीं डाला?

2 दिन बाद हाथ में लिफाफा लिए अरमिंदर ने खुशीखुशी तनवीर से कहा, ‘‘ले, तेरा परमानैंट वीजा आ गया. आज से तेरी छुट्टी. खुशी मना. जहां जी चाहे, जा सकती है.’’

‘‘कहां जाऊं मैं?’’

‘‘अरे, अब तू जो चाहे काम कर सकती है. तलाक होते ही किसी अच्छे लड़के के साथ शादी कर के घर बसा सकती है.’’

‘‘मैं यहां क्यों नहीं रह सकती?’’

‘‘क्या कह रही है? कहीं तू खुद को मेरी घरवाली तो नहीं मान बैठी? देख तन्नी, मैं ने पहले ही कह दिया था कि जिस दिन तेरा टिकट आएगा, तु?ो यहां से जाना होगा. मेरा घर तो तेरे लिए मुफ्त की सराय था. अब तेरा दानापानी यहां से उठ गया.’’

‘‘मैं इस घर के एक कोने में पड़ी रहूंगी. मु?ो यहां रहने दीजिए,’’ तन्नी की आंखों में आंसू थे.

‘‘आंसू बहाना बेकार है. मैं ने तु?ो कोईर् धोखा नहीं दिया है. पहले ही साफसाफ बता दिया था कि तेरामेरा कोई रिश्ता नहीं है. मैं प्यारव्यार में यकीन नहीं रखता… सम?ा?’’

‘‘अगर यह सच है, तो आप सुरजीत को याद क्यों करते हो?’’ अचानक तन्नी तड़प उठी.

‘‘सुरजीत का नाम मत ले. एक सच जान ले कि इस दुनिया में पैसा ही सबकुछ है. अगर उस वक्त मेरे पास इतने पैसे होते, तो सुरजीत क्यों जाती?’’ अरमिंदर की आवाज तल्ख हो आई.

‘‘मुझे पैसों का जरा भी मोह नहीं है. मैं आप का घर देखूंगी…’’

‘‘फिर वही बात. जब तू मुझे छोड़ेगी, तभी तो किसी और के साथ शादी कर पैसे कमाऊंगा. तेरी वजह से अपना धंधा चौपट नहीं कर सकता. मैं तलाक की अर्जी दे रहा हूं.’’

‘‘ठीक है, तो मुझे भी कोईर् पैसे कमाने वाला काम दिला दो. मैं चली जाऊंगी,’’ तन्नी ने आंसू पोंछ दिए.

‘‘तू किसी के साथ शादी कर के आराम की जिंदगी जी सकती है. तू कहे, तो मैं कोईर् अच्छा लड़का देखूं?’’

‘‘नहींनहीं, मुझे शादी नहीं करनी है. शादी का सुख मेरे नसीब में ही नहीं लिखा है.’’

अरमिंदर सोच में पड़ गया. कुछ देर बाद वह बोला, ‘‘तू पढ़ीलिखी तो नहीं है, अंगरेजी जाने बिना कोई ठीक काम मिल नहीं सकता. 5वीं पास औरत क्या कर सकती है?’’

‘‘मैं कोई भी काम कर सकती हूं. किसी के घर रोटी पकाने का काम तो मुझे मिल ही जाएगा न?’’ तन्नी ने कहा.

‘‘एक काम कर सकती है. बुरा न माने तो कहूं.’’ ‘‘कहिए?’’

‘‘मेरे एक चाचा का बेटा हरमिंदर अमेरिका आना चाहता है, लेकिन आजकल वीजा मिलना मुश्किल है. तू उस के साथ शादी कर के मुंहमांगे पैसे पा सकती है. देख, मैं ने मुफ्त में तेरी मदद की है, तू पैसे ले कर मेरा एहसान उतार सकती है.’’

‘‘आप यह क्या कह रहे हो? यह तो पाप है.’’

‘‘हरमिंदर के साथ भी तेरी शादी नाम के लिए होगी. तेरी मरजी के बिना वह मुझे छुएगा भी नहीं.’’

‘‘नहींनहीं, यह नहीं हो सकता…’’

‘‘सोच ले. मैं तो कहता हूं, तेरा परमानैंट वीजा तेरे लिए तुरुप का पत्ता है. मेरी तरह शादी कर के जरूरतमंदों को वीजा दिला कर खूब पैसे बना सकती है. इस बीच अगर किसी से मन मिल जाए, तो घर भी बसा सकती है.’’

‘‘नहीं, मेरे लिए तो यह सुनना भी गलत है,’’ चुन्नी से चेहरा ढक कर तन्नी अपने कमरे में चली गई.

रातभर जागी तन्नी ने सूजी आंखों के साथ सुबह अरमिंदर को फैसला सुना दिया, ‘‘अपने हरमिंदर को बता दो, मैं शादी करने को तैयार हूं.’’

‘‘वाह, यह हुई न बात. मैं अभी भारत फोन लगाता हूं. जब तक हमारा तलाक होता है, तू भारत जा कर चाचा के यहां रह कर सब देखसम?ा लेना.’’ ‘‘जी…’’

‘‘तू जल्दी से अपना सामान पैक कर ले. मैं तेरा टिकट बुक करा देता हूं,’’ कहते हुए अरमिंदर फोन पर टिकट बुक कराने लगा.

तन्नी का भारत जाने का टिकट आ गया. टिकट थामती तन्नी को लगा, जैसे उस की मौत का फरमान आ गया हो.

अरमिंदर ने एक हजार डालर देते हुए समझया, ‘‘इन्हें मुश्किल घड़ी के लिए संभाल कर रखना. चाचा के यहां तुझे एक पैसा भी खर्च नहीं करना होगा. वापसी होने पर हरमिंदर को मैं अपने साथ काम पर लगा लूंगा.’’

‘‘ठीक है, उसे भी परमानैंट वीजा मिलने पर अपनी तरह जरूरतमंदों को वीजा दिलाने के धंधे में लगा लेना,’’ तन्नी की कड़वी आवाज अनचाहे ही निकल गई.

‘‘चुप कर. इस काम से मुझे कोई खुशी नहीं मिलती. सच यही है कि सच्चा प्यार भी पैसा चाहता है.’’

‘‘अब तो तुम पैसे वाले हो, घर क्यों नहीं बसा लेते? कुछ भी कहो, तुम्हें इस काम में मजा आता है.’’

‘‘मैं क्या करता हूं, यह मेरी मरजी है. तू अपने काम से मतलब रख. अपनी जिंदगी में दखलअंदाजी करने का हक मैं ने किसी को भी नहीं दिया है.’’

जगजीत तन्नी को एयरपोर्ट तक छोड़ने के लिए अपनी टैक्सी के साथ आ चुका था.

तन्नी के हाथ से सूटकेस ले कर जगजीत ने पूछा, ‘‘अचानक भारत क्यों जा रही हो? हम तो तेरे परमानैंट वीजा मिलने पर खुशी मना रहे थे. सरदारजी तुझे  कोई काम दिलाने की सोच रहे हैं. अच्छा हुआ, तुझे  अरमिंदर से छुटकारा मिल गया.’’

‘‘हां भैया, मैं जल्दी आऊंगी.’’ ‘‘किसी से मिले बिना क्यों जा रही हो? अभी भी वक्त है, उधर होता चलूं?’’

‘‘नहीं भैया. सीधे एयरपोर्ट चलना है. मैं वापस आ कर उन्हें समझ  दूंगी.’’ ‘‘अरमिंदर कहां है? तुझे  छोड़ने नहीं आएगा?’’

‘‘मैं कौन सी उन की रिश्तेदार लगती हूं? बहुत एहसान कर दिया उन्होंने. अब और नहीं,’’ तनवीर की आवाज में कड़वाहट घुल गई.

एयरपोर्ट पर तन्नी को छोड़ कर जगजीत चला गया. सूटकेस खींचती तनवीर काउंटर की ओर जा ही रही थी कि अचानक अरमिंदर की आवाज कानों में गूंजी, ‘‘वापस चल तन्नी. तू कहीं नहीं जाएगी.’’

‘‘क्या… क्यों?’’ हैरान तन्नी और कुछ नहीं पूछ सकी.

‘‘क्योंकि मैं तेरे बिना नहीं रह सकता. सुरजीत की झूठी यादों के सहारे जीने की कोशिश में खुद को बहुत सजा दे चुका हूं. मेरे कहेसुने को माफ कर दे. चल, मेरा घर तेरा इंतजार कर रहा है.’’

यह सुन कर अरमिंदर की फैली बांहों में वह समा गई. Love Story in Hindi

Hindi Social Story : बदली परिपाटी

Hindi Social Story. लगता है रात में जतिन ने फिर बहू पर हाथ उठाया. मुझ से यह बात बरदाश्त नहीं होती. बहू की सूजी आंखें और शरीर पर पड़े नीले निशान देख कर मेरा दिल कराह उठता है. मैं कसमसा उठता हूं, पर कुछ कर नहीं पाता. काश, पूजा होती और अपने बेटे को समझाती पर पूजा को तो मैं ने अपनी ही गलतियों से खो दिया है.

यह सोचतेसोचते मेरे दिमाग की नसें फटने लगी हैं. मैं अपनेआप से भाग जाना चाहता हूं. लेकिन नहीं भाग सकता, क्योंकि नियति द्वारा मेरे लिए सजा तय की गई है कि मैं पछतावे की आग में धीरेधीरे जलूं.

‘‘अंतरा, मैं बाजार की तरफ जा रहा हूं, कुछ मंगाना तो नहीं.’’

‘‘नहीं पापाजी, आप हो आइए.’’ मैं चल पड़ा यह सोच कर कि कुछ देर बाहर निकलने से शायद मेरा मन थोड़ा बहल जाए. लेकिन बाहर निकलते ही मेरा मन अतीत के गलियारों में भटकने लगा…

‘मुझ से जबान लड़ाती है,’ एक भद्दी सी गाली दे कर मैं ने उस पर अपना क्रोध बरसा दिया.

‘आह…प्लीज मत मारो मुझे, मेरे बच्चे को लग जाएगी, दया करो. मैं ने आखिर किया क्या है?’ उस ने झुक कर अपनी पीठ पर मेरा वार सहन करते हुए कहा.

कोख में पल रहे बच्चे पर वह आंच नहीं आने देना चाहती थी. लेकिन मैं कम क्रूर नहीं था. बालों से पकड़ते हुए उसे घसीट कर हौल में ले आया और अपनी बैल्ट निकाल ली. बैल्ट का पहला वार होते ही जोरों की चीख खामोशी में तबदील होती चली गई. वह बेहोश हो चुकी थी.

‘पागल हो गया क्या, अरे, उस के पेट में तेरी औलाद है. अगर उसे कुछ हो गया तो?’ मां किसी बहाने से उसे मेरे गुस्से से बचाना चाहती थीं.

‘कह देना इस से, भाड़े पर लड़कियां लाऊं या बियर बार जाऊं, यह मेरी अम्मा बनने की कोशिश न करे वरना अगली बार जान से मार दूंगा,’ कहते हुए मैं ने 2 साल के नन्हे जतिन को धक्का दिया, जो अपनी मां को मार खाते देख सहमा हुआ सा एक तरफ खड़ा था. फिर गाड़ी उठाई और निकल पड़ा अपनी आवारगी की राह.

उस पूरी रात मैं नशे में चूर रहा. सुबह के 6 बज रहे होंगे कि पापा के एक कौल ने मेरी शराब का सारा नशा उतार दिया. ‘कहां है तू, कब से फोन लगा रहा हूं. पूजा ने फांसी लगा ली है. तुरंत आ.’ जैसेतैसे घर पहुंचा तो हताश पापा सिर पर हाथ धरे अंदर सीढि़यों पर बैठे थे और मां नन्हे जतिन को चुप कराने की बेहिसाब कोशिशें कर रही थीं.

अपने बैडरूम का नजारा देख मेरी सांसें रुक सी गईं. बेजान पूजा पंखे से लटकी हुई थी. मुझे काटो तो खून नहीं. मांपापा को समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए. पूजा ने अपने साथ अपनी कोख में पल रहे मेरे अंश को भी खत्म कर लिया था. पर इतने खौफनाक माहौल में भी मेरा शातिर दिमाग काम कर रहा था. इधरउधर खूब ढूंढ़ने के बाद भी पूजा की लिखी कोई आखिरी चिट्ठी मुझे नहीं मिली.

पुलिस को देने के लिए हम ने एक ही बयान को बारबार दोहराया कि मां की बीमारी के चलते उसे मायके जाने से मना किया तो जिद व गुस्से में आ कर उस ने आत्महत्या कर ली. वैसे भी मेरी मां का सीधापन पूरी कालोनी में मशहूर था, जिस का फायदा मुझे इस केस में बहुत मिला. कुछ दिन मुझे जरूर लौकअप में रहना पड़ा, लेकिन बाद में सब को देदिला कर इस मामले को खत्म करने में हम ने सफलता पाई, क्योंकि पूजा के मायके में उस की खैरखबर लेने वाला एक शराबी भाई ही था जिसे अपनी बहन को इंसाफ दिलाने में कोई खास रुचि न थी.

थोड़ी परेशानी से ही सही, लेकिन 8-10 महीने में केस रफादफा हो गया पर मेरे जैसा आशिकमिजाज व्यक्ति ऐसे समय में भी कहां चुप बैठने वाला था. इस बीच मेरी रासलीला मेरे एक दोस्त की बहन लिली से शुरू हो गई. लिली का साथ मुझे खूब भाने लगा, क्योंकि वह भी मेरी तरह बिंदास थी. पूजा की मौत के डेढ़ साल के भीतर ही हम ने शादी कर ली. वह तो शादी के बाद पता चला कि मैं सेर, तो वह सवा सेर है. शादी होते ही उस ने मुझे सीधे अपनी अंटी में ले लिया.

बदतमीजी, आवारगी, बदचलनी आदि गुणों में वह मुझ से कहीं बढ़ कर निकली. मेरी परेशानियों की शुरुआत उसी दिन हो गई जिस दिन मैं ने पूजा समझ कर उस पर पहली बार हाथ उठाया. मेरे उठे हाथ को हवा में ही थाम उस ने ऐसा मरोड़ा कि मेरे मुंह से आह निकल गई. उस के बाद मैं कभी उस पर हाथ उठाने की हिम्मत न कर पाया.

घर के बाहर बनी पुलिया पर आसपास के आवारा लड़कों के साथ बैठी वह सिगरेट के कश लगाती जबतब कालोनी के लोगों को नजर आती. अपने दोस्तों के साथ कार में बाहर घूमने जाना उस का प्रिय शगल था. रात को वह शराब के नशे में धुत हो घर आती और सो जाती. मैं ने उसे अपने झांसे में लेने की कई नाकाम कोशिशें कीं, लेकिन हर बार उस ने मेरे वार का ऐसा प्रतिवार किया कि मैं बौखला गया. उस ने साफ शब्दों में मुझे चेतावनी दी कि अगर मैं ने उस से उलझने की कोशिश की तो वह मुझे मरवा देगी या ऐसा फंसाएगी कि मेरी जिंदगी बरबाद हो जाएगी. मैं उस के गदर से तभी तक बचा रहता जब तक कि उस के कामों में हस्तक्षेप न करता.

तो इस तरह प्रकृति के न्याय के तहत मैं ने जल्द ही वह काटा, जो बोया था. घर की पूरी सत्ता पर मेरी जगह वह काबिज हो चुकी थी. शादी के सालभर बाद ही मुझ पर दबाव बना कर उस ने पापा से हमारे घर को भी अपने नाम करवा लिया. और फिर हमारा मकान बेच कर उस ने पौश कालोनी में एक फ्लैट खरीदा और मुझे व जतिन को अपने साथ ले गई. मेरे मम्मीपापा मेरी बहन यानी अपनी बेटी के घर में रहने को मजबूर थे. यह सब मेरी ही कारगुजारियों की अति थी जो आज सबकुछ मेरे हाथ से मुट्ठी से निकली रेत की भांति फिसल चुका था.

अपना मकान बिकने से हैरानपरेशान पापा इस सदमे को न सह पाने के कारण हार्टअटैक के शिकार हो महीनेभर में ही चल बसे. उन के जाने के बाद मेरी मां बिलकुल अकेली हो गईं. प्रकृति मेरे कर्मों की इतनी जल्दी और ऐसी सजा देगी, मुझे मालूम न था.

नए घर में शिफ्ट होने के बाद भी उस के क्रियाकलाप में कोई खास अंतर नहीं आया. इस बीच 5 साल के हो चुके जतिन को उस ने पूरी तरह अपने अधिकार में ले लिया. उस के सान्निध्य में पलताबढ़ता जतिन भी उस के नक्शेकदम पर चल पड़ा. पढ़ाईलिखाई से उस का खास वास्ता था नहीं. जैसेतैसे 12वीं कर उस ने छोटामोटा बिजनैस कर लिया और अपनी जिंदगी पूरी तरह से उसी के हवाले कर दी. उन दोनों के सामने मेरी हैसियत वैसे भी कुछ नहीं थी. किसी समय अपनी मनमरजी का मालिक मैं आजकल उन के हाथ की कठपुतली बन, बस, उन के रहमोकरम पर जिंदा था.

इसी रफ्तार से जिंदगी के कुछ और वर्ष बीत गए. इस बीच लिली एक भयानक बीमारी एड्स की चपेट में आ गई और अपनेआप में गुमसुम पड़ी रहने लगी. अब घर की सत्ता मेरे बेटे जतिन के हाथों में आ गई. हालांकि इस बदलाव का मेरे लिए कोई खास मतलब नहीं था. हां, जतिन की शादी होने पर उस की पत्नी अंतरा के आने से अलबत्ता मुझे कुछ राहत जरूर हो गई, क्योंकि मेरी बहू भी पूजा जैसी ही एक नेकदिल इंसान थी.

वह लिली की सेवा जीजान से करती और जतिन को खुश करने की पूरी कोशिश भी. पर जिस की रगों में मेरे जैसे गिरे इंसान का लहू बह रहा हो, उसे भला किसी की अच्छाई की कीमत का क्या पता चलता. सालभर पहले लिली ने अपनी आखिरी सांस ली. उस वक्त सच में मन से जैसे एक बोझ उतर गया और मेरा जीवन थोड़ा आसान हो गया.

इस बीच, जतिन के अत्याचार अंतरा के प्रति बढ़ते जा रहे थे. लगभग रोज रात में जतिन उसे पीटता और हर सुबह अपने चेहरे व शरीर की सूजन छिपाने की भरसक कोशिश करते हुए वह फिर से अपने काम पर लग जाती. कल रात भी जतिन ने उस पर अपना गुस्सा निकाला था.

मुझे समझ नहीं आता था कि आखिर वह ये सब क्यों सहती है, क्यों नहीं वह जतिन को मुंहतोड़ जवाब देती, आखिर उस की क्या मजबूरी है? तमाम बातें मेरे दिमाग में लगातार चलतीं. मेरा मन उस के लिए इसलिए भी परेशान रहता क्योंकि इतना सबकुछ सह कर भी वह मेरा बहुत ध्यान रखती थी. कभीकभी मैं सोच में पड़ जाता कि आखिर औरत एक ही समय में इतनी मजबूत और मजबूर कैसे हो सकती है?

ऐसे वक्त पर मुझे पूजा की बहुत याद आती. अपने 4 वर्षों के वैवाहिक जीवन में मैं ने एक पल भी उसे सुकून का नहीं दिया. शादी की पहली रात जब सजी हुई वह छुईमुई सी मेरे कमरे में दाखिल हुई थी, तो मैं ने पलभर में उसे बिस्तर पर घसीट कर उस के शरीर से खेलते हुए अपनी कामवासना शांत की थी.

काश, उस वक्त उस के रूपसौंदर्य को प्यारभरी नजरों से कुछ देर निहारा होता, तारीफ के दो बोल बोले होते तो वह खुशी से अपना सर्वस्व मुझे सौंप देती. उस घर में आखिर वह मेरे लिए ही तो आई थी. पर मेरे लिए तो प्यार की परिभाषा शारीरिक भूख से ही हो कर गुजरती थी. उस दौरान निकली उस की दर्दभरी चीखों को मैं ने अपनी जीत समझ कर उस का मुंह अपने हाथों से दबा कर अपनी मनमानी की थी. वह रातों में मेरे दिल बहलाने का साधनमात्र थी. और फिर जब वह गर्भवती हुई तो मैं दूसरों के साथ इश्क लड़ाने लगा, क्योंकि वह मुझे वह सुख नहीं दे पा रही थी. वह मेरे लिए बेकार हो चुकी थी. इसलिए मुझे ऐसा करने का हक था, आखिर मैं मर्द जो था. मेरी इस सोच ने मुझे कभी इंसान नहीं बनने दिया.

हे प्रकृति, मुझे थोड़ी सी तो सद्बुद्धि देती. मैं ने उसे चैन से एक सांस न लेने दी. अपनी गंदी हरकतों से सदा उस का दिल दुखाया. उस की जिंदगी को मैं ने वक्त से पहले खत्म कर दिया.

उस दिन उस ने आत्महत्या भी तो मेरे कारण ही की थी, क्योंकि उसे मेरे नाजायज संबंधों के बारे में पता चल गया था और उस की गलती सिर्फ इतनी थी कि इस बारे में मुझ से पूछ बैठी थी. बदले में मैं ने जीभर कर उस की धुनाई की थी. ये सब पुरानी यादें दिमाग में घूमती रहीं और कब मैं घर लौट आया पता ही नहीं चला.

‘‘पापा, जब आप मार्केट गए थे. उस वक्त बूआजी आई थीं. थोड़ी देर बैठीं, फिर आप के लिए यह लिफाफा दे कर चली गईं.’’ बाजार से आते ही अंतरा ने मुझे एक लिफाफा पकड़ाया.

‘‘ठीक है बेटा,’’ मैं ने लिफाफा खोला. उस में एक छोटी सी चिट और करीने से तह किया हुआ एक पन्ना रखा था. चिट पर लिखा था, ‘‘मां के जाने के सालों बाद आज उन की पुरानी संदूकची खोली तो यह खत उस में मिला. तुम्हारे नाम का है, सो तुम्हें देने आई थी.’’ बहन की लिखावट थी. सालों पहले मुझे यह खत किस ने लिखा होगा, यह सोचते हुए कांपते हाथों से मैं ने खत पढ़ना शुरू किया.

‘‘प्रिय मयंक,

‘‘वैसे तो तुम ने मुझे कई बार मारा है, पर मैं हमेशा यह सोच कर सब सहती चली गई कि जैसे भी हो, तुम मेरे तो हो. पर कल जब तुम्हारे इतने सारे नाजायज संबंधों का पता चला तो मेरे धैर्य का बांध टूट गया. हर रात तुम मेरे शरीर से खेलते रहे, हर दिन मुझ पर हाथ उठाते रहे. लेकिन मन में एक संतोष था कि इस दुखभरी जिंदगी में भी एक रिश्ता तो कम से कम मेरे पास है. लेकिन जब पता चला कि यह रिश्ता, रिश्ता न हो कर एक कलंक है, तो इस कलंक के साथ मैं नहीं जी सकती. सोचती थी, कभी तो तुम्हारे दिल में अपने लिए प्यार जगा लूंगी. लेकिन अब सारी उम्मीदें खत्म हो चुकी हैं. मायके में भी तो कोई नहीं है, जिसे मेरे जीनेमरने से कोई सरोकार हो. मैं अपनी व्यथा न ही किसी से बांट सकती हूं और न ही उसे सह पा रही हूं. तुम्हीं बताओ फिर कैसे जिऊं. मेरे बाद मेरे बच्चों की दुर्दशा न हो, इसलिए अपनी कोख का अंश अपने साथ लिए जा रही हूं. मासूम जतिन को मारने की हिम्मत नहीं जुटा पाई. खुश रहो तुम, कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना. जाने से पहले एक बात तुम से जरूर कहना चाहूंगी. ‘मैं तुम से बहुत प्यार करती हूं.’

‘‘तुम्हारी चाहत के इंतजार में पलपल मरती…तुम्हारी पूजा.’’

पूरा पत्र आंसुओं से गीला हो चुका था, जी चाह रहा था कि मैं चिल्लाचिल्ला कर रो पड़ूं. ओह, पूजा माफ कर दे मुझे. मैं इंसान कहलाने के काबिल नहीं, तेरे प्यार के काबिल भला क्या बनूंगा. हे प्रकृति, मेरी पूजा को लौटा दे मुझे, मैं उस के पैर पकड़ कर अपने गुनाहों की माफी तो मांग लूं उस से. लेकिन अब पछताए होत क्या, जब चिडि़या चुग गई खेत.

भावनाओं का ज्वार थमा तो कुछ हलका महसूस हुआ. शायद मां को पूजा का यह सुसाइड लैटर मिला हो और मुझे बचाने की खातिर यह पत्र उन्होंने अपने पास छिपा कर रख लिया हो. यह उन्हीं के प्यार का साया तो था कि इतना घिनौना जुर्म करने के बाद भी मैं बच गया. उन्होंने मुझे कालकोठरी की सजा से तो बचा लिया, परंतु मेरे कर्मों की सजा तो नियति से मुझे मिलनी ही थी और वह किसी भी बहाने से मुझे मिल कर रही.

पर अब सबकुछ भुला कर पूजा की वही पंक्ति मेरे मन में बारबार आ रही थी, ‘‘कम से कम जतिन को एक बेहतर इंसान बनाना.’’ अंतरा के मायके में भी तो उस की बुजुर्ग मां के अलावा कोई नहीं है. हो सकता है इसलिए वह भी पूजा की तरह मजबूर हो. पर अब मैं मजबूर नहीं बनूंगा…कुछ सोच कर मैं उठ खड़ा हुआ. अंतरा को आवाज दी.

‘‘जी पापा,’’ कहते हुए अंतरा मेरे सामने मौजूद थी. बहुत देर तक मैं उसे सबकुछ समझाता रहा और वह आंखें फाड़फाड़ कर मुझे हैरत से देखती रही. शायद उसे विश्वास ही नहीं हो रहा था कि जतिन का पिता होने के बावजूद मैं उस का दर्द कैसे महसूस कर रहा हूं या उसे यह समझ नहीं आ रहा था कि अचानक मैं यह क्या और क्यों कर रहा हूं, क्योंकि वह मासूम तो मेरी हकीकत से हमेशा अनजान थी.

पास के पुलिसस्टेशन पहुंच कर मैं ने अपनी बहू पर हो रहे अत्याचार की धारा के अंतर्गत बेटे जतिन के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई. मेरे कहने पर अंतरा ने अपने शरीर पर जख्मों के निशान उन्हें दिखाए, जिस से केस पुख्ता हो गया. थोड़ा वक्त लगा, लेकिन हम ने अपना काम कर दिया था. आगे का काम पुलिस करेगी. जतिन को सही राह पर लाने का एक यही तरीका मुझे कारगर लगा, क्योंकि सिर्फ मेरे समझानेभर से बात उस के पल्ले नहीं पड़ेगी. पुलिस, कानून और सजा का खौफ ही अब उसे सही रास्ते पर ला सकता है.

पूजा के चिट्ठी में कहे शब्दों के अनुसार, मैं उसे रिश्तों की इज्जत करना सिखाऊंगा और एक अच्छा इंसान बनाऊंगा, ताकि फिर कोई पूजा किसी मयंक के अत्याचारों से त्रस्त हो कर आत्महत्या करने को मजबूर न हो. औटो में वापसी के समय अंतरा के सिर पर मैं ने स्नेह से हाथ फेरा. उस की आंखों में खौफ की जगह अब सुकून नजर आ रहा था. यह देख मैं ने राहत की सांस ली. Hindi Social Story

Hindi Story : एक बहानेबाज संस्कृति

Hindi Story. बच्चों की छुट्टी हो और अपनी नहीं, तो मुसीबत रहती है. जरा निश्ंिचतता का अनुभव कर के देर से उठी थी, पर यह देख कर मूड बिगड़ गया कि फूलमती ने फिर गोल मारा था. सब काम हड़बड़ी में हुआ. सुबहसुबह रसोईघर से उस के द्वारा बरतनों की उठापटक की मधुर ध्वनि से जरा चैन पड़ता था और उसी ध्वनि के इंतजार में आज देर तक रजाई में पड़ी रही. अब जैसेतैसे तैयार हो कर निकलने को ही थी कि छोटे साहब, जो अब तक बड़े के साथ दूसरे कमरे में हंगामा करने में व्यस्त थे, हाजिर हुए.

‘‘मां, आज तो मेरी परियोजना जरूर तैयार करनी है.’’

‘‘क्यों जी, देखते नहीं, कितनी व्यस्त हूं. ऊपर से फूलमती भी नहीं आई है. कल रविवार है न, कल देखूंगी. अरे, नहींनहीं, कल तो हमारे यहां ही किट्टी पार्टी है. ऐसा करो, परसों शाम को याद दिलाना.’’

‘‘ओफ्फोह, मां, आप ने परसों भी यही कहा था कि दूसरे शनिवार को याद दिलाना. अब सोमवार को अध्यापिका डांटेंगी,’’ अमित का पारा चढ़ता जा रहा था. वैसे वह भी ठीक था अपनी जगह. कब से तो पीछे पड़ा था. मुझे फुरसत नहीं मिल पा रही थी. मोहित को पढ़ाई से ही समय नहीं मिल पाता था. स्कूल वाले भी खूब हैं. जानते भी हैं कि 7-8 साल का बच्चा अकेले पर्वत का माडल नहीं बना सकता. डाल देते हैं मुसीबत मांबाप के सिर पर. स्कूल में ही क्यों नहीं बनवाते यह सब?

‘‘देखो अमित, तुम सोमवार को अध्यापिका से कह देना कि मां की तबीयत खराब थी और पिताजी दौरे पर गए हुए थे. बाजार से सामान कौन लाता? ठीक है? अब जाने दो मुझे.’’

मैं आंख बचाती पर्स संभालने लगी. अमित नाराजगी के अंतिम चरण पर था, ‘‘पिछली बार भी यही बहाना बनाया था कि मां बीमार है. यह भी कोई तरीका है भला.’’

‘‘अच्छा, अच्छा, बस, इस बार और सही…’’ पर्स में से 4 टाफियां निकाल कर उसे थमाती हुई मैं आगे बढ़ी ही थी कि पति महोदय अखबार के पीछे मुंह निकालते हुए बोले, ‘‘अरे, जा रही हो कालिज. भई, वह संजीव अपनी गाड़ी मांग रहा था एक दिन के लिए, भाई की शादी है, क्या कहूं?’’

‘‘मेरी मारुति? उसे दोगे. कतई नहीं. खुद तो महाकंजूस है वह. याद नहीं, पिछली बार मेरी 10 किताबें ले गया था और 10 बार याद दिलाने पर 2 फटी हुई जिल्दें वापस करता कैसा रिरिया रहा था, ‘बहनजी, मेरा साला दिल्ली ले गया था. गाड़ी में कहीं छूट गईं.’ अब भी उस का साला आ गया तो? हरगिज नहीं देनी कार हमें.’’

‘‘तो कह दूं कि…क्या कह दूं? साफ मना करते तो बनेगा नहीं. अफसर का भतीजा है, भई. भुगतना तो हमें पड़ता है न.’’

‘‘अरे, कुछ भी कह दो. कह देना कि सर्विर्सिंग के लिए गई है, ब्रेक ठीक नहीं थे या कुछ भी. ठीक है?’’

फिर एक कदम बढ़ाया कि फोन घनघना उठा. उठाया, ‘‘हैलो, कौन…ओह सरलाजी, कहिए कैसे याद किया? अरे, अपना शनिवार कहां भई. मास्टर लोग ठहरे हम तो. हां, फूलमती को तो मैं भी याद कर रही हूं, सुबह से ही. पहले लोग भगवान का नाम ले कर उठते थे, अब हम उस की बंदी को पुकारते उठते हैं. क्या? नहीं आएगी 3 दिन तक. अरे बाबा, मर जाऊंगी मैं तो. बीमार होगी शायद? क्या, आप को संदेशा भेजा है कि बीमार हूं. और खुद मकान बनाने के काम में लगी है परिवार सहित. अच्छा, धोबी ने बताया है. देखा, ये नीच लोग ऐसे ही बहानों से तो हमें लूटते हैं. ये सब दोहरी कमाई करने के बहाने हैं. इस बार उस के पैसे जरूर काटूंगी. सच बता देती तो क्या पता मैं खुद ही छुट्टी दे देती. गुस्सा भी न आता इतना. अच्छा चलूं, देर हो रही है.’’

मन ही मन कुढ़ती हुई मैं बाहर निकल आई. सच, ईमानदारी व शराफत का तो नाम ही नहीं रहा जैसे आजकल.

10 नंबर बस स्टाप के पास कुछ भीड़ थी. नई लाडली कार थी और नौसिखिया मैं. सो, जरा धीमेधीमे चलाने लगी. एकदम लतिका पर नजर पड़ी. 1-2 और लड़कियां साथ थीं उस के. ‘ग्रांड साड़ी सेल’ के बैनर वाले एक तंबू में सपाटे से घुसी जा रही थीं सब. खीज उठी मैं. उसे तो कल समझाबुझा कर आज के सेमिनार का काम सौंपा था और यह तो यहां साडि़यां खरीदने में लगी है. देख लूंगी उसे भी.

मैं ने ही उसे दया कर के किसी तरह अपने विभाग में एक लंबी अवकाश रिक्ति पर लगवाया था. यह सोच कर कि गरीब घर की लड़की है. वरना यहां तो किसी रिक्ति की सूचना पर लंबी लाइन लग जाती है. अब मेहनत से अपनी जगह बनाने के बजाय सदा काम से कतराती है. मुंह पर तो कुछ नहीं कहती. कह भी कैसे सकती है? पर प्राय: कुछ भी काम या उत्तरदायित्व की बात से किसी न किसी तरह बच निकलती है.

कालिज पहुंचते ही जल्दी से मैं भूगोल विभाग में पहुंची तो सामने मेज पर लतिका का प्रार्थनापत्र पड़ा मुंह चिढ़ा रहा था, ‘‘…अकस्मात अस्वस्थ हो जाने से महाविद्यालय आने में असमर्थ हूं. कृपया एक दिन का आकस्मिक अवकाश दें.’’

गुस्से में मेरे मुंह से कुछ अपशब्द निकलतेनिकलते रह गए. अस्वस्थ है बहानेबाज. वहां सेल पर साडि़यां खरीदी जा रही हैं. कल ही साफसाफ मना कर देती तो आज यह फजीहत तो न होती मेरी. आज रुकना पड़ता, दौड़धूप होती…बस, भाग ली चुपचाप.

खैर, सेमिनार तो होना ही था. विश्वविद्यालय से 2 भूगोलशास्त्री पधारे थे. उन के आवास व भोजन का प्रबंध भी करना था, जो लतिका को सौंपा था. किसी तरह दूसरे विभाग से नए प्राध्यापकों को पकड़ा, सो उचित व्यवस्था हो गई. प्राचार्य ने भी उदार मुसकराहट का आदानप्रदान किया, पर मन खिन्न हो गया था.

कार निकालने लगी तो माखन सामने आ गया, ‘‘मेमसाहब, गाड़ी चमक रही है न?’’

‘‘हां भई, चमक तो खूब रही है. तुम्हारा काम लगता है, धन्यवाद.’’

‘‘मेमसाहब, घरवाली को बोल रखा है, बाई की गाड़ी रोज चमचमाती होनी चाहिए. बस, मेमसाहब, वो साहब को बोल देना, मैं ने दूसरा आवेदनपत्र रोजगार दफ्तर में भिजवा दिया है. वहां के बाबू को भी खुश कर रखा है. अब जैसे ही कारखाने से मांग जाएगी, वह मेरा नाम भेज देगा. अब आगे साहब को देखना है.’’

माखन ने इसी महाविद्यालय से 4-5 साल पहले बी.ए. किया था. जब कहीं नौकरी नहीं मिली तो किसी तरह रसायन विभाग में चपरासी व सहायक के पद पर रखवा दिया था उसे. अब पीछे पड़ा था कि कारखाने में कोई जगह मिल जाए. इसे क्या पता कि साहब ही तो सर्वेसर्वा नहीं थे.

‘‘देखो माखन, मैं ने पहले भी कहा था कि वहां बड़ी लंबी लाइन लगी रहती है. सबकुछ कायदे से होता है. फिर अनुभव भी तो चाहिए.’’

‘‘अरे, मेमसाहब, मालूम है. मैं ने सब मामला तय कर रखा है. पिछड़ी जाति का प्रमाणपत्र बनवा लिया है अपने विधानसभा सदस्य से. पिछले चुनाव में हमीं ने तो जिताया था उन्हें. अब तो है न उम्मीद? सच्ची, बहुत घूम लिए, मेमसाहब.’’

मैं सकपका गई. असली ब्राह्मण परिवार का था वह. उस के चाचा अब भी तीजत्योहारों पर कालोनी में कथा बांचते थे.

‘‘भई, तुम पत्र तो आने दो दफ्तर से, फिर साहब से ही बात करना. मुझे इन बातों का ठीक से कुछ मालूम नहीं.’’

कार चलाई, तो दिमाग भी कहीं घूमने लगा. जा किधर रहे हैं सब लोग? कहां होगी सीमा? क्या सचमुच आज झूठ के बिना गुजारा नहीं है? बाबा कहा करते थे कि जब सब रास्ते बंद हो जाएं तो भगवान को पुकारना चाहिए. पर लगता है, आज की वास्तविकता यह है कि जब कोई उपाय न दिखाई दे तो झूठ, बहानों व हेराफेरी का सहारा लेना चाहिए. शायद जनता जान गई है कि पुकारने से भगवान किस्सेकहानियों में ही प्रकट होते थे. आज उन के नाम से काम नहीं निकलता है.

हां, झूठ व बेईमानी से अकसर काम चल जाता है. उदाहरण सामने रहते ही हैं, कहीं ‘झूठे का मुंह काला’ नहीं दिखता और ‘सच्चे का बोलबाला’ भी सुनीसुनाई बात लगती है. फिर बाद की सोचने की फिक्र किसे है? अभी फिलहाल, इसी पल की मुसीबत किसी न किसी तरह टल जाए. कल किस ने देखा है? पकड़े भी गए तो कौन हरिश्चंद्र का जमाना है. कह देंगे, सब करते हैं, हमीं कौन अलग हैं. ‘सब चलता है’ का मुहावरा कितना चल पड़ा है आजकल.

विचारों में डूबी चली जा रही थी कि अचानक घर की याद आई. याद आया कि फूलमती नहीं आई और पतिदेव भी घर पर हैं. यानी खाना ढंग से बनाना पड़ेगा. सोचा, पनीर व अंडे वगैरह लेती चलूं. गाड़ी टी.टी. नगर की ओर मोड़ी. सुपर बाजार के सामने पार्क करने की जगह ढूंढ़ ही रही थी कि चौंक पड़ी. स्कूल यूनीफार्म पहने 5-6 लड़कों में यह अपना मोहित ही तो है न. हां, हां, वही था. उस के हाथ घुमा कर बोलने के अंदाज से पहले ही पहचान लिया था, अब तो और स्पष्ट दिखने लगा था.

अरे, ये सब तो रंगमहल से निकल रहे हैं. 3 बज चुके थे, शो खत्म हुआ होगा. कई दिन से जिद कर रहा था फिल्म देखने की. अभी परसों ही तो अपने पिता से करारी डांट खाई थी कि ये फिल्मों का चस्का छोड़ो, बोर्ड का इम्तिहान है, मेहनत करो. और यह जनाब स्कूल से खिसक, यहां शोभा बढ़ा रहे हैं. हम से कह रहा था कि 11 बजे से अतिरिक्त कक्षाएं हैं, गणित और विज्ञान की. मेरे देखतेदेखते सब लड़के हंसते खिलखिलाते टैंपो में सवार हो कर ओझल हो गए.

पहले से उदास मन और व्यथित हो उठा. बिना कार रोके मैं सीधे घर पहुंची. अमित बाहर अपने टामी के साथ गेंद उछालने में लगा था.

‘‘अमित, तुम्हारे पिताजी कहां हैं, बेटे?’’

‘‘मां, हरीश चाचा आए हैं, उन के साथ सोने के कमरे में टेलीविजन पर मैच देख रहे हैं. क्या आप को पता है कि आस्ट्रेलिया ने 100 रन बना लिए हैं और उन का एक भी विकेट नहीं गिरा. गए हम लोग तो. मैं होता तो मालूम है, क्या करता, एक…’’

‘‘अच्छा, अच्छा, जरा चुप कर अब. मेरा सिर दर्द कर रहा है,’’ मैं खीज कर बोली.

‘‘मां, एक मजेदार बात तो सुनती जाओ. खूब हंसोगी. हरीश चाचा कह रहे थे कि चाची उन्हें घर पर टेलीविजन नहीं देखने दे रही थीं, भंडार की सफाई को कह रही थीं, इसलिए चाचा बहाना बना कर आए हैं कि पिताजी की तबीयत खराब है, देखने जाना है. अब दोनों ब्रिज खेल रहे हैं व टेलीविजन भी देख रहे हैं. चाचा ने चाची को क्या बुद्धू बनाया. मजा आ गया.’’

‘‘सुनो, अमित, अपनी परियोजना का सारा सामान अपने कमरे में रखो चल कर मेज पर. मैं अभी कौफी पी कर जुटती हूं तुम्हारे साथ. और सुनो, ठहरो, पहले जरा पिताजी को बुला लाओ इधर.’’

अमित खुशीखुशी उछलता हुआ अंदर भागा. मैं साड़ी बदल मुंहहाथ धोने लगी.

‘‘क्यों भई, बड़ी देर कर दी आज. बहुत भूख लगी है. सब परांठे वगैरह खत्म कर दिए हैं, कुछ करो जल्दी से,’’ पत्ते हाथ में पकड़े साहब ने फरमान जारी किया.

‘‘सुनिए तो, संजीवजी से साफसाफ कह दो कि आशा कार नहीं दे सकती. ज्यादा जरूरत है तो किराए पर लेने का प्रबंध कर देते हैं. और हां, अपने इन मित्र महोदय से भी कह दो कि घर पर फोन कर के बता दें कि आप की तबीयत बिलकुल ठीक है व आप दोनों बैठे ताश खेल रहे हैं.

‘‘सुनो जी, हां, आज से यह बहानेबाजी व गोलमाल बंद. कम से कम इस घर में. और मोहित आए तो कह दीजिए कि बाहर जाना हो या फिल्म देखनी हो, तो हमें बता कर जाए, आगे मैं देखूंगी. आप कृपया इतना ही सहयोग दें तो बहुत है.’’

अचकचाए से ये कुछ कहने को हुए, पर मेरी मुखमुद्रा देख चुपचाप अंदर चले गए. मैं सोचने लगी कि खाना बनाऊं या अमित का हिमालय पर्वत. दोनों कार्य कुछ विशेष कठिन तो नहीं हैं. Hindi Story

Hindi Superstition Story : अशुभ

Hindi Superstition Story. मेरी नानी कहती हैं कि अगर सुबह दूध गिर जाए, तो बहुत अशुभ होता है. अम्मां खड़ीखड़ी पैर से ले कर सिर तक थरथर कांप रही थीं. मैं ने देखा कि उन के हाथ से सुबहसुबह आधा लिटर दूध गिर कर बहने लगा था.

दरअसल, अम्मां लो ब्लडप्रैशर की मरीज थीं. उन्हें चक्कर आना, दिल घबराना, पूरा जिस्म हिलना जैसी तमाम शिकायतें थीं. वे इतनी पतलीदुबली थीं कि  झटका खाते ही गिर जाएं.

महीनेभर से अम्मां की तबीयत ज्यादा खराब थी. कमजोरी के चलते उन के हाथ से दूध का डब्बा गिर गया था.

अम्मां को अपनी जानकारी के मुताबिक मैं ने लंबाचौड़ा फलसफा सुनाया कि दूध गिरना बुरा नहीं है, बुरे तो इनसान के खयालात होते हैं.

अम्मां थोड़ी शांत हुईं, लेकिन तभी पीछे से नानी ने 5 नंबर चप्पल से मेरी पीठ पर निशाना लगाया.

मैं ने पीछे पलट कर देखा. नानी खतरनाक शिकारी बिल्ली की तरह कड़े तेवर लिए मु झे घूर रही थीं.

‘‘नानी…’’ मैं कुछ कहने ही जा रहा था कि उन्होंने एक जोरदार तमाचा मेरे गाल पर रसीद कर दिया.

‘‘बेहया, तु झे पता नहीं है कि दूध गिरना कितना अशुभ होता है. हाय…हाय, अब क्या होगा? कलमुंही, तु झे कितना सम झाया करूं,’’ नानी ने अम्मां को घूरते हुए कहा.

मेरे पिता बड़ेबड़े शहरों में बने मकानों की पुताई करते थे. वे साल में 1-2 बार आ कर हमारे ऊपर प्यार की बरसात कर देते थे. फिर मु झे और अम्मां को अपनी चहेती दकियानूसी सास के पास छोड़ कर चले जाते थे.

मैं जहर का घूंट पी कर रह गया. नानी कह रही थीं, ‘‘ऐसे ही मियांजी की पोती के हाथ से दूध गिर गया था और मियांजी का एकलौता बेटा मर गया था.’’

मियांजी के परिवार के साथ हुआ वह हादसा मैं भी कहां भूला था. बेचारी बीना को कितनी कठोर सजा भुगतनी पड़ी थी. उस हादसे को गुजरे 4 महीने बीत चुके थे, मगर लगता था कि कल की ही बात हो.

मेरी नानी के इस पक्के घर के अलावा इस गांव में सिर्फ 12-13 पक्के घर और थे. 50-60 घर कच्ची मिट्टी के बने हुए थे, जिन में से एक घर मियांजी का भी था. वे अपने छोटे से परिवार के साथ हंसीखुशी से रहते थे. उन के परिवार में उन की बीवी, एक बेटा, बहू और पोती बीना थी.

मियांजी बुजुर्ग थे. उन की सू झबू झ के पूरे गांव में चर्चे होते थे. मैं भी उन की सम झदारी का कायल था.

एक दिन मैं किसी काम से मियांजी के घर गया था. मियांजी ने बड़ी इज्जत से मु झे आंगन में बैठाया और अपनी जवान पोती से कहा, ‘‘बीना, जल्दी से बाबू के लिए दूध ले कर आओ. यह हमारे यहां कभीकभार ही आता है.’’

मियांजी ने मेरा नाम बेहद अपनेपन से ले कर कहा, तो मैं बहुत खुश हो गया था.

फिर 2-3 मिनट बाद अंदर से कुछ गिरने की आवाज आई, तभी बीना की मां और दादी लपक कर अंदर गईं. थोड़ी देर बाद भीतर से रोने की आवाज भी आने लगी. मैं घबरा गया और तुरंत मियांजी के साथ अंदर गया.

‘‘बीना, यह तू ने क्या किया?’’ बीना की मां बेदर्दी से उसे पीट रही थीं. दादी उसे कोस रही थीं.

‘‘यह आप क्या कर रही हैं?’’ मैं ने बीना की मां से कहा. दर्द से बेहाल बेचारी बीना बुरी तरह रो रही थी.

मियांजी ने जल्दी से दूध लाने को क्या कहा कि बीना हड़बड़ा गई. इसी जल्दबाजी में बीना का पैर ऊंचीनीची जगह पर आ गया और दूध के साथ नीचे आ गिरी. उस के दाएं पैर में मोच आ गई थी.

मियांजी बिना कुछ कहे कमरे से निकल कर चले गए. उन्होंने अपनी बीवी को सम झाने की जरा भी कोशिश नहीं की. मु झे लगा कि इन औरतों से ज्यादा तो मियांजी अंधविश्वासी हैं.

मैं अपना सा मुंह ले कर घर लौट आया.

शाम को मैं ने अम्मां से कहा, ‘‘अम्मां, चाय के साथ पकौड़े भी बना दो. मु झे भूख लग रही है.’’

‘‘अम्मां… भूख,’’ मैं ने दोबारा लाड़ से अम्मां का ध्यान अपनी ओर खींचने की कोशिश की.

‘‘चुप रहो. 3 दिन तक रसोई में न कड़ाही चढ़ेगी, न सब्जी में किसी तरह का तड़का लगेगा,’’ अम्मां के बजाय नानी ने आ कर मु झे 8-10 साल के बच्चे की तरह लताड़ दिया.

‘‘क्यों नानी?’’ मैं ने पूछा.

‘‘किस दुनिया में रहता है. कुछ खबर है. मियांजी का एकलौता बेटा बस हादसे में मर गया.

‘‘अरे, बस हादसे का नाम है. उसे तो दूध गिरने के अशुभ ने खा लिया. बेचारे मियांजी कितने गरीब हैं. 2 हजार रुपए मौलवी को दे दिए थे इस अशुभ को उतरवाने के वास्ते, लेकिन दूध का घोर अशुभ उतरा ही नहीं,’’ नानी पिघला हुआ लोहा मेरे कानों में उड़ेल कर अम्मां को साथ लिए मियांजी के घर चली गईं.

अब मु झे बीना की चिंता होने लगी. ये बेदर्द समाज बीना को कहां छोड़ने वाला था. मैं ने बीना को बचाने की खातिर एक फैसला ले लिया.

मैं ने उस बस हादसे की पूरी छानबीन कर डाली और मियांजी को सम झाने की हर मुमकिन कोशिश की कि नशे में धुत्त ड्राइवर तेज बस चला रहा था. मगर मेरे लाख सम झाने पर भी किसी ने मेरी बात नहीं मानी.

दूध गिरना अशुभ नहीं था, लेकिन बीना को 2 दिन तक खाना नहीं दिया गया, वह यकीनन अशुभ था.

अब मैं ने तय कर लिया था, यह घटना मैं दोबारा नहीं होने दूंगा. बीना 2 दिन तक भूख  झेल गई, मगर मेरी अम्मां इतनी बीमार थीं कि शाम तक ही मर जातीं और मेरे लिए यह सब से बड़ा अशुभ दिन होता.

तब मैं ने कड़े तेवर अपनाते हुए नानी से कहा, ‘‘खबरदार, जो मेरे बाप की मेहनत की कमाई किसी  झोलाछाप, पाखंडी मौलवी के आगे डाली. अगर आप ने मेरी बात नहीं मानी और मेरी अम्मां के साथ जुर्म किया या उन्हें किसी तरह परेशान किया, तो हम आप को इस उम्र में छोड़ कर चले जाएंगे. फिर शायद आप की जिंदगी का यह सब से बड़ा अशुभ दिन होगा.’’

मैं अम्मां को अपने साथ लिए कमरे में आ गया. उन्हें खाट पर लिटा कर चादर ओढ़ाई. जैसे ही मैं पलटा, हैरानी के कई  झटके खातेखाते बचा.

तावीज के बजाय नानी कसबे के अस्पताल की लेडी डाक्टर के साथ खड़ी थीं. कब्रिस्तान में धकेल देने वाली नानी अब सुखशांति के बौर्डर पर खड़ी लग रही थीं. मु झे लगा कि मौके पर दी गई धमकी अब निशाने पर जा लगी थी.

डाक्टर ने चैकअप कर के दवा लिखी और परची नानी के हाथ में थमा कर चली गईं.

मैं ने खुश हो कर नानी से कहा, ‘‘अच्छा हुआ, आप सुधर गईं, वरना…’’ इस से आगे मैं कुछ और कहता कि नानी ने फिर जोरदार थप्पड़ से मेरा गाल लाल कर दिया.

‘‘मु झे छोड़ कर मत जाना. मैं किसी को नहीं भड़काऊंगी,’’ इतना कह कर नानी रोने लगीं.

आग या पानी, मैं नानी को सम झ नहीं पाया. पहले गुस्सा, फिर रोना. खैर, मैं ने नानी को कंधे से थाम लिया, क्योंकि वे सुधर जो गई थीं.  Hindi Superstition Story

Hindi Story : उलटा दांव

Hindi Story. डाक्टर अशोक का अपना नर्सिंगहोम था. वे शहर के दिल की बीमारी के जानेमाने डाक्टर थे. वे 32 साल के हो गए थे, पर अभी तक उन्होंने शादी नहीं की थी और न ही वे इस बंधन में बंधना चाहते थे. वे काफी रंगीनमिजाज थे. उन के कई औरतों से नाजायज संबंध थे.

डाक्टर अशोक अपने नर्सिंगहोम में भी खूबसूरत जवान नर्सें रखते थे और किसी न किसी बहाने उन्हें अपने जाल में फांस कर उन से नाजायज संबंध बना लेते थे. जो भी लड़की उन के जाल में फंस जाती, तो उसे तभी उन के चंगुल से छुटकारा मिलता, जब खुद डाक्टर का मन उस से भर जाता था.

लतिका नई नर्स थी. उसे नर्सिंगहोम में आए हुए 4-5 दिन ही बीते थे कि डाक्टर अशोक ने उसे अपनी लच्छेदार बातों में फंसाना शुरू कर दिया.

दरअसल, लतिका ने इस से पहले किसी भी नर्सिंगहोम में काम नहीं किया था और न ही वह अपने काम के बारे में कुछ जानती थी. उसे तो डाक्टर साहब ने उस की गदराई जवानी और खूबसूरती के चलते अपने यहां अच्छी तनख्वाह पर रख लिया था. वह बहुत दिनों से टेस्ट बदलने की फिराक में थे. पुरानी नर्सें अब उन के लिए बासी हो गई थीं.

लतिका जब नर्स की सफेद स्कर्ट और शर्ट पहन कर आती, तो गजब की सैक्सी लगती थी.

एक हफ्ते बाद डाक्टर अशोक ने लतिका की नाइट ड्यूटी लगा दी. वह रात में उसे अपने चैंबर में बुला कर मीठीमीठी बातें करते थे. ऐसी बातें सुन कर लतिका शरमा जाती और केवल हां या नहीं में जवाब देती. डाक्टर अशोक उस की हिचक दूर करना चाहते थे. वे हर लड़की के साथ ऐसा ही करते थे.

एक दिन लतिका को ड्यूटीरूम में बैठेबैठे नींद आ रही थी. अचानक डाक्टर अशोक वहां आ पहुंचे. उसे ऊंघता देख कर उन्होंने कहा, ‘‘हैलो लतिका.’’

‘‘यस डाक्टर,’’ लतिका एकदम से आंखें मलती हुई हड़बड़ा कर उठ बैठी. उसे अपने ऊंघने पर शर्म आ रही थी कि डाक्टर अशोक क्या सोच रहे होंगे? पर वह कर भी क्या सकती थी? नींद पर किस का बस है? वैसे भी इस समय रात के 12 बज रहे थे.

लतिका को हैरानी हो रही थी कि इस समय डाक्टर साहब क्यों राउंड पर आए हैं? सब मरीजों की दवाएं तो वह पहले ही समय पर खिला चुकी थी. कोई गंभीर मरीज भी इस समय नर्सिंगहोम में भरती नहीं था.

‘‘लगता है, तुम्हें नींद आ रही है?’’ डाक्टर अशोक ने मुसकराते हुए पूछा.

‘‘सौरी सर,’’ लतिका ने किसी तरह कहा.

‘‘कोई बात नहीं… हो जाता है. रात की ड्यूटी करना बहुत मुश्किल काम है. आप ऐसा क्यों नहीं करतीं कि नींद और बोरियत से बचने के लिए कोई रोमांटिक मैगजीन या उपन्यास पढ़ा करें?’’

‘‘जी सर, पर रोमांटिक ही क्यों? जासूसी क्यों नहीं?’’ लतिका ने पूछा.

‘‘यह उम्र रोमांस करने की है. रोमांटिक उपन्यास पढ़ने से मन भी रोमांटिक होने लगता है. किसी को प्यार करने को जी चाहने लगता है,’’ डाक्टर अशोक ने कहा.

लतिका शरमाई सी खड़ी रह गई. वह कुछ कह न सकी.

‘‘क्या आप का कोई बौयफ्रैंड है?’’ डाक्टर अशोक ने अचानक पूछा.

‘‘नहीं सर, कोई नहीं है,’’ लतिका अचकचा कर बोली.

‘‘यह कैसे हो सकता है कि आप जैसी खूबसूरत और स्मार्ट लड़की का कोई बौयफ्रैंड न हो?’’

‘‘सच मानिए सर, कोई नहीं है,’’ अब लतिका भी मुसकराई.

‘‘तो कोई बात नहीं. अगर आप बुरा न मानें, तो मैं आप का बौयफ्रैंड बन जाऊं?’’ डाक्टर अशोक ने जाल फेंका.

‘‘आप भी सर, कैसी बातें कर रहे हैं?’’ लतिका ने शरमा कर कहा.

‘‘क्यों, क्या मैं आप को पसंद नहीं? आप खूबसूरत हैं, तो मैं भी हैंडसम हूं,’’ डाक्टर अशोक ने हंसते हुए कहा.

‘‘जी हां सर, इस में क्या शक है?’’ लतिका झेंपते हुए बोली. इस से पहले किसी ने भी उस से ऐसी रोमांटिक बातें नहीं की थीं. उस के दिल में एक अजीब सी गुदगुदी होने लगी. डाक्टर अशोक उसे बेहद जिंदादिल आदमी लगे.

‘‘कम औन माई डियर लतिका, हम लोग अपने इस नए संबंध को ऐंजौय करते हैं,’’ डाक्टर अशोक ने उस की तरफ हाथ बढ़ाते हुए कुछ रोमांटिक अंदाज में कहा.

‘‘मतलब?’’ पूछते हुए लतिका खुद में ही सिकुड़ गई.

‘‘अरे भई, अब तुम हमारी गर्लफ्रैंड हो. गर्लफ्रैंड को कौफी पिलाना चाहिए या नहीं?’’ डाक्टर अशोक का रोमांटिक मूड बरकरार था.

लतिका मुसकराई. वह सोच रही थी कि कितनी आसानी से डाक्टर ने उसे अपनी गर्लफ्रैंड बना लिया है. अब इस खुशी में कौफी पिलाना चाहते हैं. उसे क्या करना चाहिए? वैसे, इस समय कौफी पीने में हर्ज क्या है? वह कौफी पीने के लिए तैयार हो गई. इस के सिवा और कोई चारा भी नहीं था.

डाक्टर अशोक उसे अपने केबिन में ले गए. वहां कौफी बनाने का सारा इंतजाम था. उन्होंने केबिन में पहुंच कर वहां लगा टैलीविजन चालू कर दिया और लतिका को कुरसी पर बैठा कर खुद कौफी बनाने लगे.

‘‘लाइए सर, मैं कौफी बनाती हूं,’’ लतिका ने कहा.

‘‘नो माई डार्लिंग, आज तो तुम मेरे हाथ की बनी कौफी पी कर देखो,’’ डाक्टर अशोक ने बड़ी अदा से उसे टाल दिया.

लतिका उन की इस अदा पर मुसकराई और सोफे पर बैठी टैलीविजन पर फिल्म देखने लगी.

कुछ ही देर में डाक्टर अशोक ने इलैक्ट्रिक केतली में 2 कप कौफी तैयार कर ली.

‘‘यह लो डार्लिंग, बताओ कौफी कैसी बनी है?’’ एक कप कौफी और तले हुए काजू लतिका की तरफ बढ़ाते हुए डाक्टर अशोक ने पूछा.

लतिका को समझ  नहीं आ रहा था कि आज डाक्टर अशोक उस पर इतने मेहरबान क्यों हैं?

कौफी अच्छी बनी थी. लतिका ने कौफी पीते हुए डाक्टर अशोक की तारीफ की, तो वे मुसकराए. दोनों फिल्म देखते हुए कौफी पीने लगे. फिल्म बहुत रोमांटिक थी. हीरोहीरोइन के प्यार के संबंध दिखाए जा रहे थे. दोनों के दिलों में कुछकुछ होने लगा.

उस कौफी में ऐसा न जाने क्या मिला था कि लतिका अपने होशोहवास खोने लगी. शायद डाक्टर अशोक ने उस में कोई नशीली दवा मिला दी थी.

लतिका को नींद सी आने लगी. उसी समय डाक्टर अशोक ने उसे लपक कर अपनी बांहों में भर लिया. वह उन की बांहों में कसमसाने लगी, पर जल्दी ही अपने होश खो बैठी.

लतिका को जब होश आया, उस समय सुबह के 5 बज रहे थे. वह हड़बड़ा कर उठी. उस के कपड़े अस्तव्यस्त थे. अपनी ऐसी हालत देख कर वह हैरान रह गई.

डाक्टर अशोक ने उसे कहीं का नहीं छोड़ा था. उस की इज्जत तारतार कर के रख दी थी. अपनी ऐसी हालत देख कर उस की आंखों से आंसू निकल आए.

लतिका किसी तरह उठी. अपने कपड़े ठीक किए और केबिन से बाहर निकल कर मरीजों को सुबह की दवाएं देने लगी. उस ने मन ही मन फैसला कर लिया कि वह डाक्टर अशोक को उस की इस हरकत के लिए सबक सिखा कर ही रहेगी. वह ऐसी लड़की नहीं थी कि हालात से समझौता कर के घुटघुट कर जीने के लिए मजबूर हो जाए.

लतिका ने बहुत सोचसमझ  कर एक योजना बनाई और उस में एक और नर्स मुक्ता को भी शामिल कर लिया.

लतिका ने पता लगा लिया था कि इस नर्सिंगहोम में काम करने वाली मुक्ता भी डाक्टर अशोक के हाथों छली गई थी और उस से बदला लेने के लिए बेताब थी.

दूसरी ओर डाक्टर अशोक अपनी कामयाबी पर बहुत खुश थे. जब कई दिनों तक लतिका ने इस बारे में कोई शिकायत नहीं की, तो उन्होंने समझा  लिया कि वह चालू लड़की है और इस तरह के संबंधों से उसे कोई एतराज नहीं है.

एक दिन रात को राउंड लेते समय लतिका ने बड़ी अदा से मुसकराते हुए डाक्टर अशोक से कहा, ‘‘कौफी पिलाए तो बहुत दिन हो गए हैं डाक्टर साहब. अपनी गर्लफ्रैंड को क्या इतनी जल्दी भूल गए?’’

‘‘नहीं…नहीं… ऐसी कोई बात नहीं है डार्लिंग. मैं तो समझा था कि कहीं तुम उस दिन की बात का बुरा तो नहीं मान गई हो?’’ डाक्टर अशोक ने बड़ी बेताबी से कहा

‘‘बुरा तो मान गई थी डाक्टर. प्यार करने के लिए भला नशे की गोली देने की क्या जरूरत थी? खुद तो पूरा मजा ले लिया, मैं प्यासी की प्यासी ही रह गई,’’ आंखों में शरारत भर कर लतिका ने कहा.

‘‘ओह, तो आज जी भर कर प्यार कर लेना डार्लिंग. बंदा आप की सेवा में हाजिर है,’’ डाक्टर अशोक खुश होते हुए बोले.

रात को तकरीबन 12 बजे लतिका ने मुक्ता से गुपचुप कुछ सलाहमशवरा किया, फिर वह डाक्टर अशोक के केबिन में दाखिल हुई. वह बहुत बेसब्री से उसी का इंतजार कर रहे थे.

‘‘आओ डार्लिंग, बहुत देर लगा दी,’’ उसे देख कर वह मुसकराए.

‘‘इंतजार में ही तो मजा है. अब फिक्र मत करो. सारी रात ही अपनी है,’’ बड़ी अदा से आंखें मटकाते हुए लतिका बोली.

डाक्टर अशोक उसे अपनी बांहों में लेने को बेचैन हो उठे, लेकिन उस ने उन्हें झटक दिया.

‘‘जरा रुकिए, पहले एक कप कौफी हो जाए, तो जरा शरीर में ताजगी आए. थकान से मेरा अंगअंग टूट रहा है. आप मुझ से बहुत काम लेते हैं डाक्टर. आप बहुत जालिम हैं. पहले जरा मूड बनने दीजिए,’’ वह नखरे दिखाते हुए डाक्टर की बांहों में आने से बचते हुए बोली. फिर वह बड़ी अदा से अपने कूल्हे मटकाती हुई इलैक्ट्रिक केतली में कौफी बनाने चली गई.

उस की ऐसी अदाएं देख कर डाक्टर अशोक उसे पाने को बेचैन हो उठे थे. वे टैलीविजन में आती हुई रोमांटिक फिल्म देखने में मशगूल हो गए.

कौफी पीने के बाद डाक्टर अशोक को अपना सिर घूमता हुआ सा महसूस हुआ. अभी वे कुछ समझ  पाते कि बेहोश हो कर अपने केबिन में बिछे बैड पर ढह गए.

इस के 2 दिन बाद जब डाक्टर अशोक अपने केबिन में बैठे मरीज देख रहे थे, उसी समय लतिका उन के पास आई. उस ने उन्हें एक लिफाफा दे कर उसे देख लेने को कहा.

डाक्टर अशोक ने लिफाफा खोल कर देखा. उस में कुछ फोटो थे. उन फोटो को देख कर उन की सिट्टीपिट्टी गुम हो गई. उन फोटो में वे एकदम नंगे थे और लतिका भी साथ थी. ये फोटो उस रात को कौफी में नशे की गोलियां मिला कर मुक्ता की मदद से खींचे गए थे.

डाक्टर अशोक ने हड़बड़ाहट में सब को केबिन से बाहर निकाला. उन का चेहरा एकदम सफेद पड़ गया था.

‘‘आखिर तुम चाहती क्या हो?’’ डाक्टर ने सहमे अंदाज में लतिका से पूछा.

‘‘अपनी बेइज्जती का बदला लेना है,’’ लतिका ने कहा.

‘‘तुम जितनी चाहो, उतनी दौलत ले लो, लेकिन ये फोटो और इन के नैगेटिव मुझे दे दो,’’ डाक्टर अशोक ने उसे रुपयों का लालच देते हुए कहा.

‘‘डाक्टर अशोक, तुम ने क्या मुझे ऐसीवैसी लड़की समझ  रखा है? तुम ने क्या समझ  था कि तुम धोखे से मेरे जिस्म से खिलवाड़ कर लोगे और मैं चुप रह जाऊंगी या आंखों में आंसू भर कर तुम्हारे सामने गिड़गिड़ाऊंगी?

‘‘नहीं… मैं इतनी कमजोर नहीं हूं. केवल 10 साल की उम्र में मैं ने अपने पिता को खो दिया था. तब से मैं जिंदगी में आने वाली तमाम मुश्किलों का सामना अकेली कर रही हूं,’’ लतिका ने गुस्से से कहा.

‘‘तो तुम करोगी क्या? इस से तो तुम्हारी ही बदनामी होगी? इस से अच्छा है कि तुम रुपए ले लो, नहीं तो फिर तुम्हारे पल्ले कुछ नहीं पड़ेगा. मैं ने तुम जैसी लड़कियां बहुत देखी हैं,’’ एक बार फिर उसे झांसे में लेने की कोशिश करते हुए डाक्टर अशोक ने धमकाया.

‘‘नहीं, मैं तुम को इतनी आसानी से नहीं छोड़ूंगी. होने दो बदनामी. मैं तो लुट ही चुकी हूं. मैं अब अपनी बदनामी से डरने वाली नहीं हूं. लेकिन कल जब ये फोटो सभी अखबारों में छपेंगे, तो तुम कहीं के नहीं रहोगे डाक्टर.

‘‘लोग तुम्हारे नाम पर थूकेंगे. यह दौलत और शोहरत एक ही दिन में तुम से छिन जाएगी. बलात्कार करने के जुर्म में तुम्हें जेल अलग से होगी. मैं ही नहीं, कई दूसरी लड़कियां भी तुम्हारे खिलाफ बयान देंगी.’’

इतना सुनते ही डाक्टर अशोक घबरा गए. उन्हें अपने पैरों के नीचे से जमीन खिसकती नजर आई. उन की बोलती बंद हो गई.

वे गिड़गिड़ाते हुए बोले, ‘‘मुझे  माफ कर दो. मुझ  से बहुत बड़ी गलती हो गई है. प्लीज, ऐसा मत करो, नहीं तो मैं कहीं का नहीं रहूंगा. मेरी डाक्टरी की डिगरी तक छिन जाएगी.’’

‘‘मैं ऐसा ही करूंगी. मैं तुम्हें दरदर का भिखारी बना कर छोड़ूंगी, ताकि तुम किसी औरत की तरफ गलत निगाह से देखने की कभी हिम्मत भी न कर सको,’’ लतिका ने उन्हें धमकी दी. वह उन्हें गिड़गिड़ाता देख कर बहुत खुश थी. यही तो वह चाहती थी.

‘‘मैं तुम्हारे पैर पड़ता हूं. तुम जो भी कहोगी, मैं मानने को तैयार हूं, लेकिन मेरी बदनामी मत करो,’’ उस के पैरों पर झकते हुए डाक्टर अशोक बोले.

‘‘तुम ने मेरी इज्जत लूटी है, इसलिए अब मुझे  समाज में अपनी बीवी का दर्जा देना पड़ेगा. तुम्हें मंजूर है?’’ लतिका ने कहा.

कुछ देर तक डाक्टर अशोक सोचते रहे, फिर बोले, ‘‘ठीक है लतिका, मैं तुम से शादी करूंगा.’’

‘‘देखो, अपनी बात से मुकरना मत. तुम्हारी सारी बातें अब मेरे इस मोबाइल में टेप हो चुकी हैं,’’ अपना मोबाइल दिखाते हुए लतिका बोली.

डाक्टर अशोक अब पूरी तरह से अपनी हार मान चुके थे. अब उन के सामने लतिका को बीवी बनाने के अलावा कोई चारा नहीं बचा था.  Hindi Story

Story in Hindi : कहानी एक रात की

Story in Hindi. नए बौस की बीमारी की खबर सुन कर जयंत ने घर आए अपने पुराने बौस को पत्नी मंजुला के हवाले कर दिया और खुद अस्पताल चला गया. पति के प्यार को तरस रही मंजुला के सामने एक जवां मर्द और रात की तनहाई थी. क्या हुआ उस रात को?

तबादले के बाद जब जयंत रामपुर वाले नए दफ्तर में पहुंचा, तो उसे वहां का माहौल काफी अच्छा लगा. साथ काम करने वालों की मदद से उसे दफ्तर के पास ही एक अच्छा किराए का मकान भी मिल गया. उस की पत्नी मंजुला को भी वह मकान काफी पसंद आया.

शादी के 10 साल बाद भी जयंत और मंजुला के कोई औैलाद नहीं हुई थी.

मंजुला का गोरा, खूबसूरत और गदराया बदन भी जयंत को अपनी ओर खींच नहीं पाता था. जिंदगी की तमाम परेशानियों ने जयंत के अरमान कुचल डाले थे.

वक्त के थपेड़ों ने धीरेधीरे जयंत से उस की मर्दानगी भी छीन ली थी और तब मंजुला मन से ही नहीं तन से भी गरीब हो गई थी.

शाम के 7 बजे थे. जयंत दफ्तर से लौट आया था और बिस्तर पर लेट कर टैलीविजन पर क्रिकेट मैच देखने का मजा ले रहा था, तभी मंजुला चाय ले कर कमरे में आई और चाय की प्याली जयंत की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘आज आप ने लौटने में इतनी देर क्यों कर दी?’’

चाय की चुसकी लेता हुआ जयंत कुछ जवाब देता, इस के पहले ही दरवाजे की घंटी बज उठी.

जयंत ने दरवाजा खोला, तो अपने पुराने बौस वीरेंद्र को देख कर खुशी से बोल उठा, ‘‘सर, आप… आप को अपने घर में देख कर बेहद खुशी हुई. आइए, अंदर आइए.’’

वीरेंद्र ने सोफे पर बैठते हुए कहा, ‘‘हां जयंत, तुम्हारे जैसे ईमानदार और मेहनती सहयोगी के तबादले से मैं परेशान था और तुम से मिलना चाह रहा था. आज यहां मेरी एक बैठक थी. बैठक खत्म होते ही मैं सीधा तुम्हारे दफ्तर पहुंचा, वहां से तुम्हारे मकान का पता ले कर यहां आया हूं.’’

‘‘यह तो आप की मेहरबानी है सर. मेरे नए बौस विशालजी भी आप की वजह से मुझ बहुत चाहते हैं.’’

‘‘लेकिन जयंत, आज की बैठक में तुम्हारे बौस विशाल को नहीं देखा,’’ वीरेंद्र ने पूछा.

‘‘दरअसल, वे कल से ही काफी बीमार हैं और छुट्टी पर हैं. बच्चे बाहर गए हुए हैं. घर में सिर्फ उन की पत्नी और नौकर दीपू ही हैं,’’ जयंत ने उत्तर दिया.

तभी मंजुला ट्रे में चायनाश्ता ले कर वहां आ पहुंची. ‘नमस्ते’ कह कर उस ने ट्रे वीरेंद्र के सामने मेज पर रख दी. फिर तीनों ने साथसाथ चाय पी.

बहुत देर तक दफ्तर की बातें होती रहीं. फिर जयंत ने वीरेंद्र से कपड़े बदलने और फ्रैश हो कर आराम करने को कहा. तभी फोन बजा. मंजुला ने फोन उठाया, ‘‘हैलो?’’

उधर से आवाज आई, ‘मैं विशाल की पत्नी माया बोल रही हूं. इन की तबीयत अचानक ज्यादा खराब हो गई है. डाक्टर ने इन्हें फौरन भरती करने को कहा है. इन्होंने जयंतजी को तुरंत बुला लेने को कहा है. जरा जयंतजी से बात करा दीजिए.’

मंजुला फोन जयंत की ओर बढ़ाते हुए बोली, ‘‘मायाजी का फोन है. वे बहुत घबराई हुई हैं… आप बात कर लें.’’

‘‘हैलो मैडम, मैं जयंत बोल रहा हूं. क्या बात है?’’

उधर से माया ने बताया, ‘आप यहां जल्दी चले आइए. इन की तबीयत बहुत खराब हो गई है. इन्हें तुरंत डाक्टर मिश्र के क्लिनिक में भरती कराना है. इन्होंने आप को जल्दी बुला लेने को कहा है. शायद आप को रात में क्लिनिक पर ही रुकना पड़े. मैं अकेली हूं. प्लीज, जल्दी आ जाइए.’

जयंत और मंजुला एकदूसरे को देखने लगे. उन की खामोशी देख वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘क्या बात है जयंत? तुम लोग चुप क्यों हो?’’

जयंत ने उन्हें माया से हुई बात बताई और जाने के लिए उन से इजाजत चाही.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘इस में हिचक कैसी? दुख की घड़ी में दूसरों की मदद करना तो हर इनसान का फर्ज है.’’

जयंत ने बिना एक पल गंवाए मंजुला की ओर मुड़ कर कहा, ‘‘मंजुला, मैं चलता हूं. तुम इन का ध्यान रखना. इन्हें यहां किसी चीज की दिक्कत नहीं हो.’’

रात में दरवाजा ठीक से बंद कर लेने की हिदायत दे कर जयंत विशाल के घर की ओर चल पड़ा. उस समय रात के 10 बज रहे थे.

जयंत कुछ ही देर में विशाल के घर पहुंच गया. उस के पहुंचते ही माया विशाल को ले कर कार से क्लिनिक की ओर चल पड़ी.

क्लिनिक पहुंचते ही डाक्टर ने विशाल को आईसीयू में भरती कर लिया और उन का बाकायदा इलाज शुरू कर दिया.

इस के बाद जयंत ने मोबाइल से घर का नंबर मिलाया. फोन की घंटी बजते ही वीरेंद्र ने फोन उठा कर ‘हैलो’ कहा.

वीरेंद्रजी की आवाज सुन कर जयंत ने कहा, ‘सर, विशालजी की हालत चिंताजनक है. उन्हें आईसीयू में भरती कर लिया गया है. मैं रात को घर नहीं आ सकूंगा.’

फोन पर हो रही बात सुन कर मंजुला भी वहां आ गई. वीरेंद्र ने फोन मंजुला को थमा दिया.

जयंत ने मंजुला से कहा, ‘मंजुला, मैं आज रात नहीं आ सकूंगा. तुम वीरेंद्रजी का ध्यान रखना. उन्हें कोई तकलीफ न हो.’

मंजुला सोच रही थी कि आज की रात एक पराए मर्द की मौजूदगी में अकेले गुजारनी होगी. उधर वीरेंद्र के दिल की धड़कन तो जयंत के न लौटने की खबर से बढ़ गई थी. दोनों खामोश एकदूसरे को अपलक देख रहे थे.

मंजुला ने खामोशी तोड़ते हुए पूछा, ‘‘खाना लगाऊं?’’

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘नहीं मंजुला, खाना तो रोज खाता हूं. आज कुछ पीने की इच्छा हो रही है… पिलाओगी?’’

वीरेंद्र की इस अजीब बात पर मंजुला एकाएक घबरा उठी. इस पर उन्होंने कहा, ‘‘घबराओ नहीं. बस, उधर रखा मेरा ब्रीफकेस उठा कर मुझे दे दो.’’

मंजुला ने जब ब्रीफकेस ला कर वीरेंद्र के सामने रख दिया, तो वे उसे खोलते हुए बड़े प्यार से बोले, ‘‘मैं पहली बार तुम्हारे घर आया हूं. जल्दबाजी में कुछ ले कर नहीं आया,’’ यह कहते हुए उन्होंने अपने ब्रीफकेस से सौसौ रुपए के 2 बंडल निकाले और मंजुला की ओर बढ़ाते हुए कहा, ‘‘बुरा मत मानना. इसे अपने पास रख लो और अपनी पसंद से अपने लिए सोने की चेन और कुछ अच्छी साडि़यां खरीद लेना.

‘‘देखो, यह पैसा मेरा नहीं है… यह तुम्हारा ही है. जयंत के जरीए मैं ने बहुत रुपए कमा लिए हैं, लेकिन उस ने कभी अपना हिस्सा नहीं लिया. अगर तुम भी इनकार कर दोगी, तो मेरा दिल टूट जाएगा और मुझे बहुत दुख होगा.’’

मंजुला का दिल ही नहीं, बदन भी कांप रहा था. उस ने एकसाथ 20 हजार रुपए कभी देखे भी नहीं थे. उस के अंदर उथलपुथल मची थी.

उस ने दूसरे ही पल सोचा, ‘इस 20 हजार रुपए पर उस का ही हक होगा, जिसे जयंत भी कभी जान नहीं सकेंगे. मन की कितनी दबी ख्वाहिशें एकसाथ पूरी हो सकती हैं,’ और उस ने रुपए थाम लिए और वीरेंद्र का चेहरा खुशी से दमक उठा.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मंजुला, मैं ने कहा था न कि आज कुछ खाने की नहीं, पीने की इच्छा है. क्या तुम मुझे  पिलाओगी?’’ इतना कह कर उन्होंने ब्रीफकेस से शराब की एक बोतल निकालते हुए उस से पैग तैयार कर देने को कहा और वह मना न कर सकी.

सोफे पर बैठ कर मंजुला वीरेंद्र के लिए पैग तैयार करने लगी.

मंजुला के चेहरे पर उठते हुए भावों को वीरेंद्र ने पढ़ने की कोशिश की, जिस में झिझक तो थी, लेकिन हामी भी दिख रही थी.

मंजुला से पैग ले कर वीरेंद्र ने उस के हाथों पर अपना हाथ रखते हुए कहा, ‘‘मंजुला, हालात ने हमें यह मौका दिया है. यहां मेरा अचानक आना, जयंत का रातभर के लिए बाहर जाना, यह मस्ती भरा आलम, सुहानी रात और हम दोनों का घर में रातभर के लिए अकेले होना, क्या यह सब सिर्फ इत्तिफाक भर है? ऐसा मौका जिंदगी में शायद ही कभी किसी को मिलता है.

‘‘आओ मंजुला, हम एकदूसरे को प्यार करें…’’ और इतना कह कर वीरेंद्र ने मंजुला को अपनी बांहों में भर लिया और उस के रसीले होंठों को चूम लिया.

इस के बाद तो वीरेंद्र के चुंबनों की बौछार ने मंजुला को मदहोश कर दिया.

वीरेंद्र ने मंजुला के जिस्म से कपड़े उतार कर नीचे फेंकने शुरू कर दिए और फिर देखते ही देखते वे दो जिस्म एक जान हो गए.

मंजुला मस्ती के इस आलम में इस कदर खो गई कि उसे अच्छेबुरे का एहसास नहीं रहा. फिर तूफान शांत हो गया. जब दोनों की आंखें खुलीं, तो दोनों मुसकरा रहे थे. उस समय रात के 2 बज रहे थे.

मंजुला ने कहा, ‘‘अब तो कुछ खा लीजिए, नहीं तो जयंत कहेंगे कि मैं ने उन के बौस की खातिरदारी नहीं की.’’

‘‘नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है. तुम ने तो मेरी ऐसी खातिरदारी की है कि मैं जिंदगीभर नहीं भूल सकूंगा,’’ वीरेंद्र ने कहा, पर मंजुला नहीं मानी और रसोई से खाना ले आई और दोनों ने एकसाथ खाना खाया.

मंजुला जब सोने के लिए दूसरे कमरे में जाने लगी, तो वीरेंद्र ने मंजुला को अपने साथ सोने को मजबूर कर दिया.

दोनों की आंखें तब खुलीं, जब सुबह के 7 बज गए. मंजुला ने उठ कर पहले अपने कपड़ों को ठीक किया और अपने कमरे की ओर जाने लगी, तभी वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मंजुला, अगर मुझ से कोई गलती हुई हो, तो मुझे माफ कर देना. हम शायद ही कभी इस तरह दोबारा मिल सकेंगे. हमें कभी इस के लिए अफसोस नहीं करना चाहिए.’’

मंजुला चुपचाप खड़ी वीरेंद्र की बातें सुन रही थी. उस के चेहरे पर भी कहीं अफसोस का भाव नहीं था.

वीरेंद्र ने कहा, ‘‘मुझे अभी 8 बजे की ट्रेन से लौटना है. क्या एक कप चाय पिला सकोगी?’’

‘‘क्यों नहीं,’’ कह कर मंजुला चाय बनाने चल पड़ी.

जैसे ही वह चाय ट्रे में ले कर गई, तभी दरवाजे की घंटी बज उठी. उस ने लपक कर दरवाजा खोला. सामने जयंत खड़ा था. उस की आंखें थकीथकी सी थीं और चेहरे पर उदासी थी.

तभी जयंत की नजर वीरेंद्र पर पड़ी, जो तैयार हो कर बैठे चाय पी रहे थे.

वीरेंद्र ने पूछा, ‘‘जयंत, तुम्हारे बौस का क्या हाल है? मैं तो एक जरूरी काम से अभी 8 बजे की गाड़ी से लौट रहा हूं, वरना क्लिनिक पर जा कर उन से जरूर मिलता.’’

जयंत ने जवाब दिया, ‘‘मैं अभीअभी अपने नए बौस को अंतिम यात्रा पर विदा कर के लौटा हूं और अपने पुराने बौस को ठीक से खातिरदारी किए बगैर विदा कर रहा हूं.

‘‘काश, ऐसी रात फिर कभी मुझे न देखनी पड़े. सचमुच यह रात मेरे लिए अंधेरा ले कर आई, जिस में मैं ने बहुतकुछ खोया है.’’

मंजुला चुपचाप खड़ी सूनी आंखों से उन दोनों को देख रही थी.  Story in Hindi

–पुरुषोत्तम

Hindi Fiction Story : बरतन

‘‘बे टा, मैं तुम से कितने दिनों से कह रहा हूं कि अंदर कोठरी में पीतल के टूटेफूटे पुराने बरतन पड़े हैं, उन्हें कपड़े में बांध कर शहर ले जा और बेच आ.’’

‘‘दादाजी, ये सारे बरतन टूटफूट जाएंगे. मेरा तो कहना है कि इन बरतनों को यहीं गांव के ही लाला को बेच दो और उस के बदले में घर का छोटामोटा सामान खरीद लो.’’

‘‘अरे बेटा, यह लाला इतने सारे बरतनों का कुछ भी पैसा नहीं देगा. वह ठग है, पूरा ठग. मेरी मान, इन्हें शहर ले जा और बेच आ. वहां अच्छे पैसे मिल जाएंगे.’’

‘‘अच्छा दादाजी, मुझे जब भी समय मिलेगा, बेच आऊंगा.’’

‘‘अरे बेटा, फिर वही बात. इन बरतनों को कल ही ले जा न. कल कोई खास काम है क्या?’’

‘‘अच्छा दादाजी, ठीक है.’’

अगले दिन सुबहसवेरे उन बरतनों को एक कपड़े में बांध कर मैं रेलवे स्टेशन पहुंच गया. स्टेशन तक के लिए मैं ने अपने छोटे भाई को भी अपने साथ ले लिया था.

टिकट खरीदने के बाद छोटा भाई बरतनों का गट्ठर गाड़ी में रख कर गांव लौट गया. डब्बे में काफी भीड़ थी, इसलिए मैं ने गट्ठर को वहीं दरवाजे के पास ही रख दिया. वैसे भी वहां से शहर की दूरी ज्यादा नहीं थी.

गाड़ी को स्टेशन से चले अभी 5 मिनट ही हुए थे कि एक टीटी टिकट चैक करने वहां आ गया. उस ने बालपैन को कान के ऊपरी हिस्से में टांग रखा था.

मैं ने कुरते की जेब से टिकट निकाल कर उसे दिखाया, तो वह आंखें तरेरते हुए बोला, ‘‘इन बरतनों का टिकट.’’

जब टीटी ने बरतनों की तरफ इशारा कर के मुझ  से बरतनों का टिकट मांगा, तो मेरे चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं.

मैं जैसेतैसे हिम्मत बटोर कर बोला, ‘‘बाबूजी, क्या बताएं, ये तो पीतल के पुराने बरतन हैं.

‘‘अब स्टील का जमाना है और पीतल के बरतनों में कलई भी तो करवानी होती है. आजकल कलई करने वाले भी नहीं रहे, जो गलीमहल्ले में जा कर फेरी लगाते हुए ‘कलई करवा लो’ की आवाजें लगाते थे, इसलिए दादाजी के कहने पर इन्हें शहर बेचने जा रहा हूं.

‘‘आजकल घर में जो लड़कियां ब्याह कर आ रही हैं, उन के नखरे कम नहीं हैं. वे स्टील के बरतनों को ही चूल्हे पर चढ़ाना पसंद करती हैं.’’

‘‘ठीक है, ठीक है. ज्यादा बातें बना कर मुझे बहकाने की कोशिश मत करो. जल्दी से इन का टिकट दिखाओ.’’

‘‘अब मुझे क्या पता है साहब, इन का भी टिकट खरीदना पड़ता है?’’ ‘‘अरे, इतना बड़ा गट्ठर है. जितनी जगह इस ने घेर रखी है, यहां 3 सवारियां खड़ी हो जातीं.’’

‘‘अरे बाबूजी, कितना टिकट लगता है यहां से? यही 10 रुपए. लो, 10 रुपए आप ही ले लो.’’

यह सुन कर टीटी बाबू का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. वह तिलमिला कर बोला, ‘‘टिकट तो 10 रुपए का ही है, पर बिना टिकट सफर करने पर जुर्माना भी लगता है.’’

‘‘साहब, इस गट्ठर में टूटेफूटे बरतन ही तो हैं?’’ ‘‘नहीं… नहीं, टिकट काटना पड़ेगा. उस के साथ जुर्माना भी लगेगा. निकालो, एक सौ 10 रुपए. जल्दी करो.’’

‘‘अरे बाबूजी, इतने के तो बरतन भी नहीं हैं?’’ ‘‘देखो, जल्दी करो. मेरा ज्यादा वक्त बरबाद न करो, नहीं तो अगले स्टेशन पर तुम्हें पुलिस के हवाले कर दूंगा.’’

इस बीच मेरे साथ खड़ी सवारी ने मेरे कान में फूंक मारी, ‘‘टीटी से अगर अपनी जान छुड़ानी है, तो 50 का नोट इस के मुंह पर दे मारो.’’

एक बार तो मन हुआ कि टीटी से कह दिया जाए कि मेरे पास देने के लिए कुछ भी नहीं है. हां, ये पुराने बरतन हैं, सो इन्हें ही ले जाओ. पर 50 रुपए के लिए तो इतने ढेर सारे बरतनों को छोड़ा भी नहीं जा सकता था.

मैं ने उन साथ खड़े भाई साहब का कहा मान कर 50 रुपए का एक नोट मुट्ठी में भींच उन की ओर बढ़ा दिया.

टीटी 50 का नोट देख कर ऐसे चिल्लाया, जैसे मैं ने उसे कोई गाली दे दी हो. मैं उस की नब्ज पकड़ चुका था. मैं ने तुरंत कहा, ‘‘ठीक है, आप मुझे अगले स्टेशन पर उतार कर पुलिस के हवाले कर देना.’’

टीटी को लगा कि 50 रुपए भी गए. वह तुरंत बोला, ‘‘अच्छा ठीक है, तू 50 रुपए ही निकाल.’’

सरकारी भूत से पीछा छुड़ा कर मैं अगले स्टेशन पर उतर गया और बरतनों का गट्ठर सिर पर उठा कर सीधे बसस्टैंड की ओर चल पड़ा. वहां पहुंच कर देखा, गले में एक छोटा सा बस्ता लटकाए एक कंडक्टर कई जगहों के नाम जोरजोर से बोल कर सवारियों को अपनी ओर बुला रहा था.

मैं ने उस के नजदीक जा कर पूछा, ‘‘कंडक्टर साहब, सर्राफा बाजार कौन सी बस जाएगी?’’

वह मेरी बाजू पकड़ कर एक बस के दरवाजे की ओर ले जाते हुए बोला, ‘‘हां… हां… भाई साहब, यही बस वहां जाएगी. चलो… चलो… जल्दी करो. कुछ ही देर में बस चलने वाली है.’’

मैं ने गट्ठर वहीं उतारा और कंडक्टर से बोला, ‘‘अरे कंडक्टर साहब, जरा इसे बस के ऊपर रखवा दो.’’

‘‘अरे… अरे, बस तो अभी जा रही है. इसे अंदर ही रख दो.’’

यह सुन कर मैं बहुत खुश हुआ. अगर इसे ऊपर चढ़ाया जाता, तो पूरे रास्ते यही खटका रहता कि कहीं कोई उतार न ले या फिर नीचे ही न गिर जाए. उसे वहीं मेरे नजदीक रख कर कंडक्टर ने मुझे  सभी मुसीबतों से नजात दिला दी.

बस जल्दी ही चल पड़ी. रास्ते में सवारियां चढ़उतर रही थीं, पर मेरा ध्यान बरतनों की ही तरफ था कि कहीं कोई सवारी उस पर पैर न रख दे.

आधे घंटे बाद मैं बस से सर्राफा बाजार पहुंचा. बस से उतर कर मैं बरतनों का गट्ठर सिर पर उठाए एक दुकान पर जा कर रुक गया.

दुकानदार पहले से खड़े ग्राहकों को निबटाने में लगा था. जैसे ही ग्राहकों से दुकान खाली हुई, तो उस का ध्यान मेरी ओर गया.

मैं ने गट्ठर की ओर इशारा करते हुए कहा, ‘‘पीतल के बरतन हैं. पुश्तैनी हैं. किसी म्यूजियम की शान भी बन सकते हैं. किसी विदेशी की नजर पड़ जाए, तो समझे कि आप के वारेन्यारे हो सकते हैं.

‘‘वह क्या है कि आजकल स्टील के बरतन आ गए हैं न, घर की बहुएं पीतल के बरतनों को पसंद नहीं करतीं. बस, इसलिए इन्हें बेचना पड़ रहा है.

‘‘गांव से चल कर शहर में बेचने आया हूं वह भी दादाजी के कहने से, वरना मैं तो वहीं गांव के लाला को देने के हक में था.’’ ‘‘ठीक है… ठीक है, गट्ठर खोल कर तो दिखाओ.’’

मैं ने अपना काम बनता देख कर खुशीखुशी गट्ठर खोल दिया. बरतन देखते ही वह आदमी अपनी गद्दी से उछल पड़ा और धीरे से बोला, ‘‘अरे, यह तो चोरी का सामान लगता है. अगर किसी पुलिस वाले की निगाह पड़ गई, तो तुम्हें तो बाद में दबोचेगा, पहले मुझे ले जाएगा और जेल में बंद कर देगा. जितने के बरतन नहीं, उस से ज्यादा पैसे देने पड़ जाएंगे.’’

‘‘पर लालाजी, ये तो हमारे पुश्तैनी बरतन हैं.’’   ‘‘भाई, मैं तो चोरी के बरतन नहीं खरीदता. ऐसा करो, इसे जल्दी से उठाओ और अगली दुकान पर ले जाओ.’’

उस का जवाब सुन कर मैं तिलमिला कर रह गया और अपना सा मुंह ले कर बाहर आ गया. मैं साथ वाली दुकान की ओर बढ़ गया और उस की गद्दी पर सांप की तरह कुंडली मार कर बैठे लालाजी से बरतन खरीदने की गुजारिश करने लगा.

बरतनों का गट्ठर उस की दुकान के भीतर रखा ही था कि वह भी इसे चोरी का सामान सम झने लगा.

उस लाला ने तो गट्ठर खुलने भी नहीं दिया और उठ कर मेरे सिर पर रखवाता हुआ बोला, ‘‘भैया, यहां चोरी का सामान नहीं बिकता. जितने का मुनाफा नहीं होगा, उस से ज्यादा पुलिस के डंडे खाने पड़ जाएंगे.’’

‘‘लालाजी, यह चोरी का सामान नहीं है. ये तो पुश्तैनी पीतल के बरतन हैं. आजकल घरों में स्टील के बरतनों का जमाना है, इसलिए इतने अच्छे बरतनों को बेचना पड़ रहा है.’’

वह तल्ख लहजे में मु झे समझाते हुए बोला, ‘‘अरे, सुना नहीं, मैं क्या कह रहा हूं. चल, जल्दी से दुकान खाली कर. कहीं पुलिस वाले ने देख लिया, तो डंडे खाने पड़ जाएंगे.’’

मैं बेइज्जती का कड़वा घूंट पी कर दुकान से बाहर आ गया और बसअड्डे की ओर मुड़ गया, ताकि जल्दी ही रेलवे स्टेशन पहुंच कर गांव को जाने वाली अगली गाड़ी पकड़ ली जाए.

मैं कुछ ही कदम चला था कि किसी ने पीछे से बरतनोें पर इतनी जोर से डंडा मारा कि बरतनों का गट्ठर हाथ से छूट गया और जोरदार आवाज करता हुआ सड़क के बीचोंबीच गिर गया.

मैं ने पीछे मुड़ कर देखा, तो एक सिपाही का डंडा हवा में लहरा रहा था. वह चिल्लाया, ‘‘क्यों बे, कहां से चोरी किए ये बरतन?’’

‘‘हवलदारजी, चोरी के नहीं हैं ये. पुश्तैनी बरतन हैं. इन्हें गांव से शहर बेचने आया हूं,’’ मैं ने हौसला बटोर कर जवाब दिया.

हवलदार मेरे पैरों की तरफ डंडा मारते हुए बोला, ‘‘चल बे, बड़ा आया पुश्तैनी बरतनों वाला. यहां जो भी आता है, ऐसा ही कहता है. चल, थाने चल. जब डंडे पड़ेंगे, तो अपनेआप बोलेगा कि कहां से चोरी किए हैं?’’

मैं हाथ जोड़ते हुए बड़ी नम्रता से बोला, ‘‘हवलदारजी, आप नाहक मु झे परेशान कर रहे हैं. ये मेरे दादादादी के समय के पीतल के बरतन हैं, जिन्हें मैं यहां बेचने आया हूं.’’

सिपाही अपना डंडा लहराते हुए बोला, ‘‘अरे सुना नहीं, उठा बरतन और चल थाने…’’ फिर धीरे से फुसफुसा कर बोला, ‘‘नहीं तो निकाल 2 सौ रुपए.’’

2 सौ रुपए का नाम सुनते ही मु झे ऐसा लगने लगा, जैसे मेरे नीचे की जमीन धंस रही है. मैं अपना सिर पकड़ कर वहीं बैठ गया.

मेरा गला सूख गया था, तभी मु झे सामने दुकान के बाहर रखे घड़ों में पानी नजर आया. मैं पानी पीने की गरज से उस ओर दौड़ पड़ा.

मु झे दौड़ता देख वह सिपाही भी मेरे पीछे भागा और कुरते को पीछे से पकड़ कर बोला, ‘‘अबे, भाग कर जाता कहां है? चोरी का माल है न, तभी तो भाग रहा है.

‘‘मैं तो देखते ही सम झ गया था कि यह चोरी का सामान है, पुलिस महकमे में यों ही बाल सफेद नहीं किए हैं. ‘‘अरे, हम तो चोर के चेहरे को देख कर ही ताड़ जाते हैं.

‘‘चल बेटा, थाने चल. आज तु झे हवालात की हवा नहीं खिलाई, तो मेरा नाम भी खजूरा सिंह नहीं.’’

जब वह बोल रहा था, उस की पूरी तोंद हिल रही थी. मैं ने मटके से पानी निकाला और गटागट पीने लगा. पानी पी कर मु झ में थोड़ी जान आई. मैं कुरता छुड़वाते हुए बोला, ‘‘हवलदारजी, भाग कौन रहा था? हमारा तो गला सूख रहा था. सामने घड़े देखे, सो दौड़ पड़ा पानी पीने. हां, अब सुनो, ये बरतन चोरी के नहीं हैं. चलना है, तो मेरे गांव चलो. वहां से सबकुछ सच पता चल जाएगा.’’

इस बार सिपाही थोड़ा सा नम्र हो कर बोला, ‘‘अरे, अगर 2 सौ नहीं हैं, तो सौ ही दे दे, वरना थाने में बंद कर दिया, तो जल्दी से जमानत भी नहीं होगी और पूरे घर के लोग शहर के चक्कर काटतेकाटते मर जाएंगे.’’

मैं भी अड़ गया और जोर से बोला, ‘‘क्यों दूं सौ रुपए. जा, ये बरतन ले जा और मुझे थाने में बंद कर दे. मैं तुम्हें फूटी कौड़ी भी नहीं दूंगा.’’

देखते ही देखते वहां कुछ लोग जमा हो गए. वैसे आजकल किस के पास इतना समय है कि दूसरे के पचड़े में पड़े. यह तो मेरी किस्मत ही कहिए, उन लोगों में से कुछ लोग आगे आ कर मेरी बात सुनने लगे. उन्हें देख कर सिपाही फिर चिल्लाया, ‘‘चोरी के बरतन हैं. बाजार में बेच रहा था, मैं ने पकड़ लिया. अब यह थाने भी नहीं चल रहा.’’

उस के इस तरह बोलते ही मैं भी बोल उठा, ‘‘ये सिपाहीजी सरासर  झूठ बोल रहे हैं. हम आज ही अपने रामपुरा गांव से आए हैं. ये बरतन हमारे पुश्तैनी हैं. दादाजी कहने लगे कि इन्हें शहर बेच आ. अब यह सिपाही इन्हें चोरी का बता कर जबरदस्ती पैसे ऐंठना चाहता है.’’

इस पर 2-3 लोग जो शुरू में रुके थे, वे सिपाही से बोले, ‘‘हम ने इन की भी बात सुनी है, उस से तो यही लगता है कि ये बिलकुल सच बोल रहे हैं. भाई, तुम क्यों एक शरीफ आदमी को तंग कर रहे हो?’’

बस फिर क्या था, जब सिपाही ने भीड़ को हमारी तरफ से बोलते हुए देखा, तो वह आगे खड़े 2-3 लोगों को डंडा दिखाते हुए कड़क आवाज में बोला, ‘‘कौन कह रहा है कि यह सच बोल रहा है?’’

जब कोई नहीं बोला, तो वह सम झ गया कि उस का तीर निशाने पर बैठा है. इस बार वह और भी ज्यादा उत्साहित हो कर जोर से बोला, ‘‘अरे, कौन इस चोर का पक्ष ले रहा था? जिसे जो भी कहना हो, थाने में चल कर कहना.’’

जब थाने की बात आई, तो वहां से सभी खिसकते नजर आए.

मु झे अकेला देख सिपाही अपनी मूंछों पर हाथ फेरते हुए बोला, ‘‘क्यों बे, चलता है या नहीं.’’ फिर हमें एक तरफ ले जा कर बोला, ‘‘अभी भी कह रहा हूं, 2 सौ नहीं हैं, चल सौ ही दे दे. अगर एक बार थाने ले गया, तो डंडा परेड तो जो होगी, सो होगी ही, कुछ भी खाने को तरस जाएगा और रात में मच्छर जो बुरा हाल करेंगे, सो अलग.’’

मेरी जेब में केवल सौ का ही नोट था. मु झे लगा कि अब मैं अजीब मुसीबत में फंस गया हूं.

मैं सोचने लगा कि अगर इसे सौ रुपए दे दिए, तो घर कैसे पहुंचूंगा. अभी मैं सोच ही रहा था कि उधर से एक आटोरिकशा आता हुआ दिखाई दिया.

उस के नजदीक आते ही सिपाही आटोरिकशे पर डंडा मारते हुए बोला, ‘‘अरे, किधर चला आ रहा है? देख नहीं रहा, बाजार में कितनी भीड़ है. तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई इस भीड़ भरे इलाके में घुसने की?’’

‘‘माईबाप, इस बाजार में आना मना है क्या? सवारी को उतारने के लिए तो जहन्नुम में भी जाना पड़ता है, यह तो भीड़ भरा बाजार है,’’ आटोरिकशे वाला बोला.

‘‘बहुत ज्यादा बकबक करता है, दिखा अपने कागज,’’ सिपाही बोला.

वह आटोरिकशे में से कागज निकाल कर दिखाता हुआ बोला, ‘‘लो हवलदार साहब, देख लो. मेरे सारे कागज पूरे हैं.’’

वह मूंछों पर हाथ फेर कर फरमान सुनाता हुआ बोला, ‘‘चल, थाने चल. वहीं जा कर ये कागज दिखाना.’’

वह इस बार थोड़ा गिड़गिड़ा कर हाथ जोड़ता हुआ बोला, ‘‘ऐसा न करो. कागज पूरे हैं, आप यहीं देख लो.’’

‘‘कहा न, थाने चल. वहीं देखेंगे. और हां, ये बरतनों का गट्ठर है न, इसे उठा कर अंदर रख ले,’’ कहते हुए वह मेरा हाथ पकड़ कर आटोरिकशे में बैठाते हुए बोला, ‘‘चल बेटा, थाने चल. वहां जब डंडे पड़ेंगे, तो अगलापिछला सब याद आ जाएगा.’’

यह सुन कर मु झे पसीना आ गया. कुछ ही देर चलने के बाद आटोरिकशा रुक गया था. आटोरिकशे वाले ने बरतनों का गट्ठर उतारा और मु झे उतरते हुए देखने लगा.

अभी सिपाही मेरा हाथ पकड़ कर उतर ही रहा था कि ड्राइवर ने आटोरिकशा चला दिया. सिपाही गिरतेगिरते बचा. जब तक वह कुछ सम झ पाता, आटोरिकशे वाला छूमंतर हो गया था.

सिपाही गुस्से में बोला, ‘‘चल बे, उठा गट्ठर. अभी आटेदाल का भाव बताता हूं.’’

मैं ने गट्ठर उठाया और उस के पीछेपीछे चल पड़ा.

खजूरा सिंह कुरसी पर पसरे एक हट्टेकट्टे वरदीधारी के सामने खड़ा हो गया. जैसे ही उस की निगाह खजूरा सिंह पर पड़ी, वह तुरंत बोला, ‘‘हां भई खजुरिए, लगता है, कोई बड़ा मुरगा हाथ लगा है?’’

इतना सुनते ही उस का चेहरा खिल गया. वह थोड़ा सा आगे आ कर उस के कान में फुसफुसाया. वह तुरंत गुस्से में बोला, ‘‘ओ शरीफया, जरा आ तो, खजूरा सिंह एक चोर पकड़ कर लाया है, उसे अंदर बंद कर दे.’’

‘‘आया हुजूर,’’ कह कर शरीफ भागता हुआ आया और एक कालकोठरी में लगे ताले को खोलने लगा.

ताला खुलते ही खजूरा सिंह ने मेरा हाथ पकड़ा और सीखचों के पीछे बंद कर दिया.

अभी कुछ ही देर हुई थी कि एक पुलिस वाला बाहर से ललकार कर बोला, ‘‘क्यों बे, कहां से चोरी किए ये बरतन? मैं तु झे 10 मिनट का समय दे रहा हूं. अगर नहीं बताया, तो तेरा ऐसा हाल करूंगा कि तेरा हुलिया देख कर कोई भी पहचान नहीं पाएगा.’’

इतना कह कर वह चला गया, किंतु मेरा हुलिया बिगाड़ गया. मैं बुरी तरह फंस चुका था. उधर घर वालों को तो यह पता भी न चल पाएगा कि मु झे किस तरह इन भेडि़यों ने दबोच लिया है.

मैं ने पुलिस की पिटाई के किस्से सुन रखे थे. किस तरह उलटा लटका कर मारते हैं कि कई बार आदमी मर ही जाता है.

मैं डर के मारे अपना सिर पकड़ कर वहीं फर्श पर बैठ गया था. अभी 10 मिनट भी नहीं हुए थे कि वही सिपाही ताला खोल कर अंदर आया और मेरी पीठ पर जोर से डंडा मारते हुए बोला, ‘‘हां बता, कहां से चोरी किए हैं ये बरतन?’’

‘‘साहब, मैं दादाजी के कहने से इन्हें शहर में बेचने आया था कि हवलदार साहब ने चोर सम झ कर मु झे यहां बंद कर दिया.’’

‘‘वाह बेटा वाह, क्या कहानी बनाई है,’’ इतना कह कर उस ने बीड़ी सुलगाई और उस का अगला सिरा जिस पर आग  झलक रही थी, मेरे हाथ पर रगड़ दिया. मेरी चीख निकल गई. फिर मेरे घुटनों पर वह डंडा मारते हुए बोला, ‘‘साले, नाटक करता है. अभी तो छुआ भी नहीं और चीखें मारने लगा.’’

इतना बोलतेबोलते उस ने एक जोरदार डंडा मेरे हाथ पर मारा.

मुझे लगा, मेरे हाथों की हड्डियां टूट गई हैं. अभी मैं इस चोट को सहला ही रहा था कि एक और डंडा मेरी पसलियों पर पड़ा. वह इतनी जोर से पड़ा था कि मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया. फिर मेरे मुंह को अपने हाथ से जोर से पकड़ कर  झटका देते हुए बोला, ‘‘सोच ले, अभी एक और मौका दे रहा हूं.’’

इतना कह कर वह चला गया.

उस के जाते ही मैं ने सोचा कि इस मार से बचने का एक ही रास्ता है कि इन पुलिस महोदय को अपने घर का पता दे देना चाहिए कि इसी घर से बरतन चोरी किए हैं औैर यह सचाई भी है.

अभी 5 मिनट ही बीते थे कि वह फिर आ धमका. जैसे ही उस ने डंडे पर अपनी पकड़ मजबूत की, मैं गिड़गिड़ाते हुए बोला, ‘‘हवलदार साहब, मु झे मत मारो, मैं बताता हूं.’’

इतना सुनना था कि हवलदार की आंखों में एक चमक उतर गई. वह मूंछों पर ताव देते हुए बोला, ‘‘शाबाश बेटा, बता, कहां हाथ मारा?’’

मैं झट से बोला, ‘‘रामपुरा गांव में नोराता राम हैं, उन के घर से.’’ ‘‘क्यों बे, सच बोल रहा है, कहीं बेवकूफ तो नहीं बना रहा.’’ ‘‘नहीं हवलदारजी, मैं भला  झूठ क्यों बोलूंगा.’’

वह अपनी तसल्ली कर के बाहर निकल गया.

कुछ देर बाद एक सिपाही ने मेरा हाथ पकड़ा और बाहर निकाल कर गट्ठर के पास ले जा कर बोला, ‘‘चल  उठा बरतन और बाहर खड़ी जीप में रख.’’

बरतन रखने के बाद उसी पुलिस वाले ने मेरा हाथ पकड़ कर मु झे जीप में बैठा दिया. एक पुलिस वाला हाथ में बंदूक लिए मेरी बगल में बैठ गया.

जैसे ही पुलिसिया जीप गांव में गई, तो बच्चों का एक रेला उस के पीछे लग गया. मेरे बताए रास्ते से जैसे ही जीप मेरे घर के बाहर आ कर रुकी, तो पुलिसिया गाड़ी से भयभीत हमारे पिताजी, ताऊजी और दादाजी घर से बाहर निकल आए जैसे कोई भूचाल आ गया हो, क्योेंकि गांव में पुलिसिया जीप का आना एक डरावने सपने जैसा था. मैं जीप में से उतारा गया.

मु झे पुलिस वालों के साथ देख कर सभी के चेहरे पीले पड़ गए. वे सोचने लगे कि ये तो बरतन बेचने शहर गया था, पुलिस के हाथ कैसे पड़ गया.

उसी समय एक पुलिस वाला पीछे से उस बरतनों वाले गट्ठर को ले आया और खोल कर दादाजी की तरफ देख कर बोला, ‘‘ताऊ, ये तुम्हारे बरतन हैं?’’

‘‘अरे हां, इस में कोई शक की बात है,’’ दादाजी के इस बात की पुष्टि कर देने के बाद वह सिपाही मेरे गाल पर जोर से थप्पड़ मारता हुआ बोला, ‘‘साला, अब आया काबू में. अब जब थाने में कुटापा चढ़ेगा, तो बताएगा कि आज तक और कहांकहां डाका डाला.’’

यह देख कर दादाजी का चेहरा गुस्से से लाल हो गया. वे पुलिस वाले पर गरजे, ‘‘अरे, इसे थप्पड़ क्यों मार रहे हो? ये बरतन भी हमारे हैं और यह छोरा भी तो हमारा है. इसे हम ने ही तो शहर भेजा था कि इन बरतनों को शहर में बेच आ. ये तो बताओ, इसे पकड़ा क्यों है?’’

अब मेरा हौसला बढ़ चुका था. मैं तुरंत बोला, ‘‘दादाजी, जब मैं बरतन बेच रहा था लाला की दुकान पर, तो सिपाही ने मु झे पकड़ लिया और कहने लगा कि ये बरतन चोरी के हैं.

‘‘मैं ने लाख कहा कि ये हमारे घर के बरतन हैं, मैं इन्हें शहर बेचने आया हूं. पर यह तो मान ही नहीं रहा. जबरदस्ती मु झे थाने में बंद कर दिया. मु झ से बारबार पता पूछ रहे थे कि कहां से बरतन चोरी किए हैं. मैं ने तंग आ कर अपने घर का पता दे दिया.’’

‘‘बेटा, यह तो तू ने अच्छा किया,’’ फिर वह पुलिस वाले को डांटते हुए बोले, ‘‘अरे, जब इस ने सच बोल दिया था, तो इस पर भरोसा क्यों नहीं किया?’’

अभी वे बोल ही रहे थे कि अड़ोसपड़ोस के लोग भी वहां आ गए. वे सभी अपनीअपनी भाषा में सिपाहियों पर टूट पड़े. बस फिर क्या था, समय की नजाकत देख उन्होंने जीप स्टार्ट की और चुपचाप बैठ कर चोरों की तरह वहां से भाग खड़े हुए.

–डा. सुरेंद्र गुप्त

Railway Accident Story : परोपकार

Railway Accident Story. सुबह के 5 बजे थे. ठंडीठंडी हवा चल रही थी. बांस के जंगल से चिडि़यों के चहचहाने की आवाजें आ रही थीं.

ऐसे सुहावने मौसम में गौरव रेलवे लाइन के किनारेकिनारे टहल रहा था कि अचानक उस के कानों में किसी के कराहने की आवाज सुनाई दी. वह चौंक कर इधरउधर देखने लगा. उस दर्द भरी आवाज को सुन कर वह समझ नहीं पा रहा था कि यह आवाज कहां से आ रही है.

कुछ देर बाद गौरव ने देखा कि रेलवे लाइन के बीचोंबीच एक नौजवान तड़पते हुए करवटें बदल रहा था. शायद वह चलती गाड़ी से नीचे गिर गया था.

हिम्मत बांध कर गौरव उस के नजदीक पहुंचा. उस ने देखा कि 25 साल का एक नौजवान तकरीबन बेहोशी की हालत में आहें भर रहा था.

इसी बीच जब गौरव ने पीछे मुड़ कर देखा, तो उस की नजर आने वाली गाड़ी पर पड़ी. गाड़ी पूर्व केबिन पार कर चंद मिनटों में ही वहां से गुजरने वाली थी. थोड़ी ही देर में उस नौजवान की जिंदगी खत्म हो सकती थी.

गौरव ने उस घायल नौजवान को गोद में उठा कर लाइन के किनारे लिटा दिया. इतने में एक मालगाड़ी रेल की पटरी के सीने को चीरती हुई वहां से गुजर गई.

चूंकि वह नौजवान बहुत घायल था, इसलिए अब गौरव के सामने उस की जिंदगी बचाने का सवाल था.

तभी वहां से एक आदमी गुजरा. गौरव ने उस आदमी से कहा, ‘‘सुनो भाई, यह नौजवान मर रहा है… अगर चाहें, तो हम दोनों इसे बचा सकते हैं.’’

राहगीर बोला, ‘‘गाड़ी से गिरा हुआ आदमी आमतौर पर नहीं बचता. अगर रास्ते में कहीं मर गया, तो पुलिस के सामने बयान देतेदेते मेरी हालत पतली हो जाएगी. मैं आप से हाथ जोड़ता हूं कि मुझे इस लफड़े में न डालिए.’’

‘‘कुछ नहीं होगा भाई. तुम्हारी थोड़ी सी मदद से इसे नई जिंदगी मिल सकती है,’’ गौरव ने समझाने के लहजे में कहा.

पर उस राहगीर ने एक न सुनी. तब गौरव दौड़ादौड़ा पास ही बने रेलवे के पूर्व केबिन पर गया. उस ने केबिनमैन को वारदात के बारे में बताया, ‘‘एक नौजवान किसी ट्रेन से गिर कर बेहोशी की हालत में है. उस के सिर और मुंह पर चोटों के निशान हैं. अगर जल्दी से उसे अस्पताल न पहुंचाया गया, तो उस की मौत हो सकती है.’’

नौजवान की हालत के बारे में सुन कर केबिनमैन का दिल दया से भर उठा. उस ने फौरन स्टेशन मास्टर को फोन किया.

स्टेशन मास्टर ने पूछा, ‘‘तुम्हें इस घटना की जानकारी किस ने दी है?’’

‘‘पास खड़े एक आदमी ने…’’  ‘‘उस का नाम क्या है?’’ ‘‘गौरव.’’

‘‘उस से घटना की एक लिखित रिपोर्ट ले लो. मैं स्टेशन से जल्द ही स्ट्रेचर भिजवा रहा हूं.’’

20 मिनट बाद स्टेशन से स्ट्रेचर उठाए 2 आदमी आ गए. गौरव भी उस घायल नौजवान की मदद के लिए साथ हो लिया.

कुछ ही देर के बाद वे स्टेशन पर पहुंच गए. घायल नौजवान की जेब में दिल्ली से कटिहार तक का टिकट था. पैंट की जेब में 32 सौ रुपए थे. सभी कुछ स्टेशन में जमा हो गया था और उस नौजवान को रेलवे अस्पताल को सौंप दिया गया था.

3 घंटे बाद नौजवान को होश आया. जब उस ने अपना पताठिकाना बताया, तो 2 दिन बाद उस के घर वाले भी आ पहुंचे.

शाम को उस नौजवान ने बताया, ‘‘मैं दिल्ली की एक कंपनी में काम करता हूं. बहिन की शादी में शामिल होने के लिए अपने गांव जा रहा था. दिल्लीकटिहार एक्सप्रेस में बड़ी भीड़ थी. गरमी से बचने के लिए मैं दरवाजे पर हैंडल पकड़ कर बैठ गया. भोर की पुरवइया में झपकी आ गई. इसी वजह से मेरा यह हाल हुआ.

‘‘मेरे गिरने के बाद किसी ने गाड़ी की चेन भी नहीं खींची और रेलगाड़ी हवा से बातें करती हुई अपने मुकाम की ओर बढ़ती रही. आजकल आदमी के भीतर इनसानियत मरती जा रही है. वह दूसरों के दर्द में शरीक नहीं होना चाहता. वह बेकार में परेशानी नहीं उठाना चाहता. सोचता है, कौन मेरा अपना है. हर आदमी खुदगर्ज हो गया है.’’

घर लौटने के बाद गौरव की बीवी ने घबरा कर पूछा,  ‘‘तुम्हारे कुरते पर खून के धब्बे कैसे लग गए?’’

‘‘घबराओ नहीं… मुझे कुछ नहीं हुआ है.’’ ‘‘आखिर बताओ भी तो कि कुरते पर खून के धब्बे कहां से लगे?’’

‘‘एक नौजवान को बचाते हुए…’’ ‘‘तुम टहलने जाते हो या बेमतलब परेशानी मोल लेने?’’ बीवी ने तमक कर कहा.

‘‘कैसी बातें करती हो गार्गी. मैं ने एक जख्मी आदमी की जान बचाई है.   क्या दुनिया में आदमी की जिंदगी से भी बढ़ कर कोई चीज है?’’ गौरव ने समझाते हुए कहा.

‘‘आजकल आदर्श झाड़ने से काम नहीं चलता.’’ ‘‘क्यों बेकार की बातें करती हो… आखिर इनसानियत भी कोई चीज है या नहीं?’’

‘‘मैं तुम्हारी बात मानती हूं, पर आजकल परोपकार का जमाना नहीं है.’’ ‘‘गार्गी, तुम इतना जान लो कि जो परोपकार करना नहीं जानता, वह इनसान कहलाने का हकदार ही नहीं है.’’

15 दिनों बाद घायल नौजवान को अस्पताल से छुट्टी मिल गई. वह अब ठीक हो गया था. हां, पैर में गहरी चोट आने के चलते वह कुछ लंगड़ा कर चल रहा था. स्टेशन मास्टर ने खबर भिजवाई थी, ‘‘तुम्हारा रुपया मेरे दफ्तर में जमा है, आ कर ले जाओ.’’

शुक्रवार को वह नौजवान स्टेशन आया. गौरव को भी वहां बुलाया गया था. स्टेशन मास्टर ने उस नौजवान को 32 सौ रुपए सौंपते हुए कहा, ‘‘तुम इन्हीं शख्स की मेहरबानी से बचे हो, वरना कट कर मर गए होते त्रिभुवन.’’

वह नौजवान हाथों में रुपए लिए गौरव के पैरों पर गिर गया और आंखों में आंसू भर कर कहने लगा, ‘‘आप का परोपकार मैं कभी नहीं भूल पाऊंगा बाबूजी.’’    Railway Accident Story

–वेदप्रकाश पांडेय

Inspirational Story in Hindi : जीत

Inspirational Story in Hindi. अखबार में आई उस खबर को सपना ने 10 बार बड़ी लगन और चाव से पढ़ा. खबर का एकएक शब्द उसे जबानी याद हो गया था. वह खबर पढ़ कर खयालों में खो गई थी.

शहर की एक मशहूर कंपनी की तरफ से उस कंपीटिशन का आयोजन किया गया था. यह कंपनी औरतों और जवान लड़कियों के अंदरूनी कपड़े बनाती थी. हर साइज की ब्रा और पैंटी बनाने में वह कंपनी माहिर थी और उस का शहर में बड़ा नाम और रसूख था.

16 साल से 20 साल तक की 31 लड़कियां उस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं. विजेता को कंपनी की तरफ से एक महीने के लिए पैरिस की मुफ्त सैर और 5 लाख रुपए का नकद इनाम दिया जाने वाला था. हर खूबसूरत लड़की के लिए यह सुनहरा मौका था.

सपना शहर के जानेमाने उद्योगपति की एकलौती औलाद थी. वह जितनी खूबसूरत थी, उतनी ही घमंडी और जिद्दी भी. दुनिया का हर सपना पैसे की ताकत से पूरा हो सकता है, यह उस की सोच थी. वह हर हालत में इस शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ बन कर कंपीटिशन जीतने का मन ही मन फैसला कर चुकी थी.

सपना अपनी जिंदगी के 18 साल पार कर चुकी थी. कंपीटिशन के लिए केवल एक महीना बाकी था. इस एक महीने के अंदर उसे हर उस काम को अंजाम देना था, जो उस की जीत के लिए सहायक हो सके.

सपना जीजान से इस के लिए मेहनत कर रही थी. अपने दिमाग में उस ने इस बारे में कुछ योजनाएं और चालें सोची थीं. उन पर अमल कर के वह अपना रास्ता तय करना चाहती थी.

सब से पहले उस ने अपने खास आदमी लगा कर उस कंपीटिशन के लिए कौन और कितने ज्यूरी तय किए गए हैं, उन के बारे में मालूम करने का काम किया था. उसे मिली जानकारी के तहत 3 ज्यूरी बनाए गए थे. उन का फैसला अहम माना जाने वाला था.

60 साला मदनलाल पटेल भी ज्यूरी मेंबर था. वह शहर का माना हुआ बिल्डर था. अच्छी सेहत और रंगीनमिजाज उस के स्वभाव की खासीयत थी.

एक दिन मौका पा कर सपना उस से मिलने उस के दफ्तर पहुंची. उस समय शाम के 6 बज रहे थे और दफ्तर का स्टाफ जा चुका था.

मदनलाल अपने केबिन में कुछ खास फाइलें देख रहा था. सपना ने उसे मिलने का वही समय तय किया. सपना ने उसे अपनी पहचान और उस से मिलने की खास वजह साफ बताई थी.

सपना की खूबसूरती और हिम्मत देख कर मदनलाल प्रभावित हुआ था, मगर ऊपरी तौर पर बनावटी गंभीरता अपने चेहरे पर ला कर वह अपनी सधी, मगर शांत आवाज में कहने लगा, ‘‘सपना, कंपीटिशन के नियम मालूम हो जाने पर भी तुम ने मुझ से मिलने और मुझ पर अपना दबाव डालने की भूल की है. इस के लिए मेरी शिकायत पर तुम्हें कंपीटिशन से बाहर भी जाना पड़ सकता है.’’

‘‘पटेल साहब, कानून और नियम आदमी ही बनाता है और उसे तोड़ने वाला भी आदमी ही होता है. यह कानून तोड़ना आप के लिए फायदेमंद और बहुतकुछ देखने का मौका भी साबित होगा, यह मेरा दावा है.’’

‘‘मेरी समझ में यह बात नहीं बैठ रही है कि कानून तोड़ने के बाद मुझे क्या फायदा होने वाला है. अगर तुम इस बात को जरा सलीके से और साफसाफ कहोगी, तो मैं समझ सकता हूं.’’

‘‘पटेल साहब, आप को तो मालूम ही है कि कंपनी वालों ने यह कंपीटिशन अपना माल ज्यादा से ज्यादा लोगों को बेचने के लिए कराया है. कंपनी जो ब्रा और पैंटी बनाती है, वह कंपीटिशन में भाग लेने वाली लड़की के जिस्म पर कितनी जंचती है और उस का देखने वालों पर क्या असर पड़ता है, यह मैं आप को यहीं दिखा सकती हूं.’’

सपना की इस खुली दावत को नकारना मदनलाल जैसे रंगीनमिजाज आदमी के लिए बहुत मुश्किल था.

अपनी आवाज को काबू में करते हुए वह सपना की तरफ देख कर बड़ी सहज आवाज में बोला, ‘‘सपना, तुम्हारे इस खूबसूरत बदन पर कंपनी की ब्रा और पैंटी कैसी लगती है, यह मैं जरूर देखूंगा, मगर इस केबिन में नहीं.

‘‘साथ वाला केबिन मेरा आराम का कमरा है. वहां चल कर हम आराम से एकदूसरे की चाहत अच्छी तरह पूरी कर सकते हैं.’’

सपना ने हंसते हुए अपना रुख कमरे की तरफ किया. अगले ही पल में वे दोनों कमरे में थे. सपना ने बिना समय गंवाए बदन से अपने कपड़े उतारने शुरू कर दिए. मदनलाल उस के बदन को बडे़ चाव से देख रहा था. देखते ही देखते सपना पूरी तरह कपड़ों से बाहर थी. उस का संगमरमर जैसा बदन और उस की मादक अदाएं देख कर मदनलाल पूरी तरह से बेकाबू हुआ जा रहा था.

सपना ने अपनी बांहों का घेरा मदनलाल के बदन पर कसते हुए अपने होंठ उस के होंठों पर रखे थे. मदनलाल के बदन पर से भी देखते ही देखते एकएक कपड़ा दूर होता गया.

सपना मदनलाल के बदन के विभिन्न अंगों को अपने हाथ से सहलाती और होंठों से चूमती रही. उस की मादक हरकतों से वह पूरी तरह बहक गया था.

सपना के बदन को अपना बनाने के लिए वह मरा जा रहा था. सपना उस की बेकाबू हरकतों को देख कर मन ही मन मुसकराती रही.

देखते ही देखते वह दौर भी आया, जब मदनलाल के सब्र का पैमाना छलकने को हुआ. मगर सपना उस पर पूरी तरह हावी हो कर उस की हर हरकत को बड़ी चतुराई से नाकाम करती रही.

बेचारा मदनलाल कब निढाल हो कर लंबीलंबी सांसें भरने लगा, यह उसे भी पता नहीं लगा. आधे घंटे के बाद वह दोनों फ्रेश हो कर बाहर आए. मदनलाल उसे छोड़ने के लिए खुद उस की कार तक आया था. सपना एक बाजी जीत चुकी थी.

2 दिनों के बाद सपना दूसरे ज्यूरी मेंबर इंद्रजीत वर्मा के घर पर थी. रात के 8 बजे थे और इंद्रजीत रोज की तरह आज भी शराब में धुत्त बैठा था. बंगले में वह आज अकेला था. उस की बीवी और बच्चे किसी रिश्तेदार के यहां शादी में गए हुए थे.

सपना ने यह मौका अपने मिशन के लिए ठीक समझा था. इंद्रजीत को उस ने अपनी रसीली बातों और कामुक अदाओं से इस तरह जकड़ कर रख दिया कि बेचारा इंद्रजीत उस के जिस्म को चूमनेचाटने और मसलने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं कर सका. अपनी सांसों पर काबू रख पाना उस के लिए बड़ा मुश्किल काम था.

तीसरा ज्यूरी मेंबर अमरनाथ गुप्ता सपना की समझ से ज्यादा चालाक और शातिर खिलाड़ी साबित हुआ था, मगर सपना ने भी कच्ची गोलियां नहीं खेली थीं.

अमरनाथ गुप्ता की बीवी को मरे हुए 10 साल हो गए थे और वह अपनी रातें मनपसंद क्लबों में खूबसूरत औरतों के साथ गुजार कर अपना शौक पूरा करता था.

सपना की लाख कोशिशों के बावजूद वह उस पर इस तरह हावी हुआ था कि उसे अपनी इज्जत बचाना बड़ा मुश्किल लगने लगा था.

अमरनाथ पर आजमाया हुआ हर दांव सपना ने बड़ी चतुराई से नाकाम किया था. सपना के सामने एक पल वह भी आया, जिस समय खुद उसे महसूस होने लगा कि वह अपनी बाजी हारने वाली है, तब पूरी तरह सावधान हो कर उस ने अमरनाथ को अपने बदन से अलग कर दिया था. बेचारा अमरनाथ खुद ही निढाल हो गया था.

इस तरह सपना ने अपने रूप और मायाजाल से उन तीनों ज्यूरी मेंबरों को इस कदर अपना दीवाना बनाया था कि उन तीनों की नजरों में सपना ही इस शहर की एकमात्र ‘ब्यूटी क्वीन’ थी.

सपना के सिर पर ‘ब्यूटी क्वीन’

का ताज पहनाने के लिए वे तीनों बेताब हुए जा रहे थे. अब सपना का सपना सच होने में ज्यादा देर नहीं थी.

देखते ही देखते वह दिन भी आ गया, जिस का इंतजार सपना और दूसरी लड़कियों और ज्यूरी मेंबरों को था. कंपीटिशन का विरोध करने के लिए शहर के ‘नारी संगठन’ कार्यक्रम में अड़चनें पैदा न करें, इस के लिए संयोजक ने कंपीटिशन के उद्घाटन की जिम्मेदारी शहर के पुलिस कमिश्नर के हाथों में सौंपी थी. इस वजह से वहां पुलिस का पूरा बंदोबस्त था.

शहर के एक शानदार थिएटर में यह कंपीटिशन होने वाला था. लोग बेताबी से कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार कर रहे थे. पूरा हाल लोगों से भरा पड़ा था. कार्यक्रम की पूरी तैयारी हो चुकी थी. 10 खूबसूरत लड़कियां इस कंपीटिशन के लिए चुनी जानी थीं.

3 ज्यूरी मेंबर अपनी सीट पर बैठे थे. देखते ही देखते स्टेज का मखमली खूबसूरत परदा ऊपर गया. लोगों में खुशी की लहर दौड़ गई. कंपीटिशन के एंकर ने स्टेज संभाल लिया.

सब से पहले 10 लड़कियों ने अपना परिचय लोगों को दिया. दूसरे राउंड में अपने तन पर आकर्षक कपड़े पहन उन्होंने अपनी जवानी और खूबसूरती का जलवा दिखाया. उन के कपड़ों से उन की जवानी और उन के खूबसूरत जिस्म का हर एक अंग जगमगाती रोशनी में लोगों की नींद उड़ा रहा था. सब की आंखों में उन जवान लड़कियों के प्रति तारीफ और वासना तैरती नजर आ रही थी. उन की मादक अदाओं पर लोग तालियां और सीटियां बजा रहे थे और उन्हें उत्साहित कर रहे थे.

आखिरी राउंड शुरू हुआ. हर लड़की कंपनी द्वारा बनाई गई ब्रा और पैंटी पहन कर अपनी मस्तानी चाल से लोगों के दिलों में हलचल मचा रही थी. उन कपड़ों में हर लड़की सैक्सी लग रही थी… लोग रहरह कर अपनी जगह खड़े हो कर उन की तारीफ कर रहे थे.

आखिर में आयोजक द्वारा निकाले गए नामों का ऐलान होने की सूचना दी गई. इस का जोरशोर से स्वागत हुआ.

अगले 5 मिनट में आयोजक द्वारा निकाले गए नाम बताए गए. सपना शहर की ‘ब्यूटी क्वीन’ चुनी गई थी. उस के सिर पर ताज पहनाया गया और उसे 5 लाख रुपए का चैक और पैरिस घूमने का टिकट दिया गया. लोगों ने तालियां बजा कर उस का स्वगात किया.

सपना मन ही मन मुसकराती हुई लोगों का अभिनंदन स्वीकार करती बड़ी शान से स्टेज पर खड़ी रही थी.  Inspirational Story in Hindi

— माधव ना. रानडे

 

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