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Hindi Story : नसीहत

Hindi Story. केसर खाने का डब्बा उठाए झोपड़ी से बाहर आ गया. आंगन में खड़ी पुरानी साइकिल को आगे धकेलते हुए वह थोड़ी दूर चला था. पता नहीं क्यों आज उस के कदम आगे नहीं बढ़ रहे थे. उस ने साइकिल को वहीं खड़ा किया और झोपड़ी के अंदर आ गया.

केसर कच्चे फर्श को बुहारती अपनी पत्नी चमेली को बांहों में भर कर चूमने लगा. वह हैरान था कि आज उसे घरवाली पर इतना प्यार क्यों आ रहा है?

‘‘अरेअरे, यह क्या पागलपन है? चलो, काम पर जाओ. शाम को घर का राशन भी लाना है,’’ इतना कह कर चमेली ने रोमांटिक हुए केसर को झोपड़ी से बाहर धकेल दिया.

‘‘चमेली, आज मुझे घर पर रहने दो. मेरा काम पर जाने का कतई मन नहीं हो रहा है. अच्छा, मैं आज के बाद कभी छुट्टी नहीं करूंगा,’’ केसर चमेली की साड़ी का पल्लू थाम कर गिड़गिड़ाया. आज उसे चमेली बेहद खूबसूरत लग रही थी.

‘‘मैं ने कह दिया न कि अब तुम काम पर जाओ. तुम्हारी भलाई इसी में है. दो पैसे कमाओ, जिस से घर चले,’’ कहते हुए चमेली गुस्से के मारे झुंझला उठी थी.

चमेली के खूबसूरत चेहरे पर बेरुखी के भाव गहरे हो गए थे. केसर जितना भी कमाता था, शराब में उड़ा देता था. घर में हमेशा तंगी रहती थी.

पति के साथ वह भी ईंटों के भट्ठे पर काम करती थी. आजकल भट्ठे पर काम नहीं था, सो चमेली घर में ही रहती थी.

गांव के पास के जंगल में पेड़ों की कटाई चल रही थी. केसर वहां काम पर जाता था.

जब ईंटों के भट्ठे पर काम शुरू हो जाएगा, तब चमेली भी केसर के साथ काम पर जाया करेगी.

चमेली की खरीखोटी सुन कर केसर मन मार कर खटारा साइकिल धकेलते हुए काम पर चला गया. चमेली भी अपने काम में लग गई.

तभी एक नौजवान झोपड़ी में आया. उस ने भी चमेली को बांहों में कस लिया. चमेली ने उसे भी दूर धकेला और मुंह फुला कर खड़ी हो गई.

‘‘अरे, बहुत नाराज हो मुझ  से?’’ उस आदमी ने बड़े प्यार से पूछा.

‘‘नाराज होने की तो बात है. 2 दिन की कह कर गए थे, पूरे 10 दिन लगा कर आए हो,’’ चमेली ने उस आदमी को उलाहना दिया.

‘‘मेरी जान, 10 दिन तो लगने थे. तेरे लिए पक्का मकान खरीद कर आया हूं. अब तू उस बंगले में मेरे साथ रहेगी,’’ बताते हुए उस नौजवान ने चमेली को अपनी बांहों में कस लिया. चमेली भी उस से लिपट गई, मानो उसी की घरवाली हो.

चमेली ने खुश होते हुए पूछा, ‘‘तुम सच कह रहे हो न?’’

‘‘हां…हां, मेरी जान. हम आज ही इस गांव से चले जाएंगे. कुछ रुपएगहने साथ ले चलना. सीधे रेलवे स्टेशन आ जाना. मैं वहीं पर मिलूंगा,’’ उस नौजवान ने समझाया, तो चमेली बोली, ‘‘तब तो मैं अपने मुन्ने को भी साथ ले चलूंगी.’’

‘‘तुम यह गलती क्यों कर रही हो? पहले अपनेआप को बसा लें, फिर मुन्ने की सोचेंगे. हां, गहनेरुपए जरूर लेती आना,’’ कहते हुए वह नौजवान चला गया.

दरअसल, वह नौजवान मोहन कई महीनों से जाल बुन रहा था. उसे यकीन हो गया था कि अगर वह खूबसूरत चमेली को 4-5 महीने अपने पास रख कर किसी कोठे वाली को बेचेगा, तो 25-50 हजार रुपए कमा ही लेगा.

वैसे, चमेली 10-12 हजार रुपए नकद और 10 हजार के गहने भी साथ ले आएगी. कुल मिला कर 70 हजार का फायदा होगा… साथ में जवानी के मजे भी.

मोहन मन ही मन हिसाब लगाता हुआ अपनी कामयाब योजना पर खुश हो रहा था.

चमेली ने संदूक से अपने जमा किए रुपए और गहने निकाले. 3-4 जोड़ी कपड़े भी निकाल कर गठरी में बांध लिए. आज उसे नशेड़ी पति केसर को छोड़ कर प्रेमी मोहन के साथ शहर जो जाना था.

दरअसल, सालभर पहले एक शाम केसर अपने साथ मोहन को लाया था. केसर के हाथ में शराब की बोतल थी और साथ में प्याजटमाटर के अलावा नमकीन का एक पैकेट था.

केसर चमेली को प्याज और टमाटर पकड़ाते हुए बोला, ‘अरे चमेली, मैं अपने ठेकेदार के चचेरे भाई मोहन को साथ लाया हूं. यह रात को हमारे साथ रहेगा. तू पहले सलाद काट दे, फिर हमारे लिए रोटी बना देना. हम जरा लालपरी का मजा लेते हैं.’

केसर शराब की बोतल उठाए झोपड़ी के अंदर चला गया. मोहन ने चमेली को देखा, तो ठगा सा रह गया.

चमेली का गदराया बदन, तीखे नैननक्श और बलखाती कमर देख कर पहली नजर में ही वह उस का दीवाना हो गया.

मोहन को प्यासी निगाहों से अपनी ओर ताकते देख कर चमेली भी रोमांचित हो उठी थी.

केसर के साथ बैठा मोहन बातें तो कर रहा था, मगर उस की निगाहें चमेली पर थीं. उस ने आधी से ज्यादा शराब केसर को पिला दी.

मोहन लड्डू लाया था. चमेली को लड्डू बहुत पसंद थे. उस ने खाना बनाया और अपने साथ मुन्ने को खिला कर झोपड़ी के अंदर ही एक कोने में घासफूस के बिस्तर पर चादर ओढ़ कर सो गई.

रात काफी गुजर चुकी थी. केसर इतनी ज्यादा शराब पी गया था कि उसे रोटी खाने का होश नहीं था.

मोहन ने खाना खाया और झोपड़ी का दरवाजा बंद किया.

झोपड़ी में उस के सोने के लिए बिस्तर का कोई बंदोबस्त नहीं था. वह चुपके से रोशनी बु?ा कर चमेली के पास सो गया. अंधेरे में नींद की खुमारी में चमेली पहचान नहीं पाई कि साथ सोया केसर है या कोई और.

उस रात का एहसास अजीब था. चमेली सुबह उठी, तो उजाले में देखा कि केसर कोने में बेसुध पड़ा था.

मोहन बाहर आंगन में टहल रहा था. चमेली को देख कर वह मुसकराया. चमेली भी हौले से मुसकरा दी. मोहन केसर से अच्छा मर्द था.

इस तरह दोनों में जिस्मानी संबंध बना, जो धीरेधीरे गहरे प्यार में तबदील हो गया.

उन दोनों के ताल्लुकात पर केसर का ध्यान तो नहीं गया, मगर आसपास के लोगों में चमेली की बदनामी होने लगी. तब मोहन ने गांव से शहर भाग चलने की सलाह दी.

चमेली ने शर्त रखी थी कि शहर में पक्का मकान ले कर दे. साथ ही, शादी करे. यह शर्त मोहन मान गया था.

चमेली भरी दोपहरी में मुन्ना के स्कूल से आने से पहले अपनी गठरी बगल में दबाए घर से निकल आई. वह शाम 5 बजे रेलवे स्टेशन पहुंच गई. वहां पर मोहन कहीं नजर नहीं आया.

चमेली की आंखें भीड़ में मोहन को तलाश रही थीं. कुछ देर इंतजार के बाद वह थक गई, तो भीड़ से दूर खड़ी हो कर हर आनेजाने वाले को देख रही थी, तभी एक बूढ़ी भिखारिन ने चमेली से पूछा, ‘‘बेटी, अपने घर वाले को ढूंढ़ रही हो?’’

‘‘हां माई…’’ चमेली ने जवाब दिया.

‘‘गांव से पहली बार आई हो?’’ बुढि़या ने हमदर्दी से पूछा.

‘‘हां,’’ चमेली ने जवाब दिया.

‘‘कौन सा गांव है तुम्हारा?’’ बुढि़या ने प्यार से पूछा.

‘‘धौलपुर,’’ चमेली ने बताया, तो बुढि़या के झुर्रियों वाले उदास चेहरे पर घायल सी मुसकान उभरी और जल्दी ही गायब हो गई.

‘‘घबराओ नहीं. जब तक तुम्हारा मर्द नहीं आ जाता, तुम मेरे पास बैठो. मैं भी कभी धौलपुर में रहती थी,’’ उस बुढि़या की आवाज में दर्द था.

‘‘पर मैं ने तुम्हें कभी गांव में नहीं देखा?’’

‘‘तू कैसे देखती बेटी? जब मैं तुम्हारी उम्र की गांव में ब्याह कर आई थी, उस समय तू पैदा भी नहीं हुई होगी. बड़ी दुखभरी कहानी है मेरी,’’ बुढि़या ने कराहते हुए बताया.

‘‘कैसा दुख माई? मुझे सुनाओ न,’’ चमेली ने अपनापन जताते हुए पूछा.

‘‘तू कहती है, तो सुन बेटी. शायद मेरी गलतियों की कहानी सुन कर कोई बहकने से बच जाए,’’ कहते हुए बुढि़या ने अपनी कहानी सुनानी शुरू कर दी, ‘‘आज से 25-30 साल पहले मेरी यानी मेवा की शादी गांव के ही एक छबीला नामक नौजवान के साथ हुई थी. छबीला जमींदार के खेतों में काम करता था. उस ने मुझे भी जमींदार की हवेली में काम पर लगा दिया.

‘‘उन्हीं दिनों शहर से एक पटवारी जमीनों के सिलसिले में गांव आता और जमींदार की हवेली में ठहरता था. उस की सेवा करने का जिम्मा मुझ पर रहता था. वह पटवारी ऐयाश था. उस ने बहलाफुसला कर मुझे अपने जाल में फांस लिया.

‘‘एक दिन मैं लोकलाज छोड़ कर पटवारी के साथ शहर आ गई.

‘‘पटवारी ने वादा किया था कि शादी कर के वह मुझे पत्नी बना कर रखेगा, मगर उस ने तो रखैल बना दिया.

‘‘जब मैं ने एतराज किया, तो मुझे एक कोठे वाली के पास बेच दिया.’’

अपनी आपबीती सुनाते हुए बुढि़या की आंखों से आंसू बहने लगे थे.

चमेली को लगा, कहीं न कहीं उस की कहानी भी बुढि़या से मिलतीजुलती है. कहीं मोहन भी पटवारी वाला खेल तो नहीं खेल रहा, वरना रुपएगहने साथ लाने को क्यों कहा?

तभी उसे एक जानीपहचानी आवाज सुनाई दी, ‘‘अरे चमेली, तू यहां बैठी क्या कर रही है? मैं तुझे  कब से खोज रहा हूं? ला, यह गठरी मुझे दे दे,’’ मोहन ने आते ही गठरी ले ली, तो चमेली चौंक उठी. उसे लगा कि मोहन उस की जवानी के साथसाथ उस के रुपएगहने भी चाहता है.

‘‘खबरदार, जो मेरी गठरी को हाथ लगाया. धोखेबाज कहीं के, हट मेरे रास्ते से,’’ दहाड़ते हुए चमेली ने अपनी गठरी छीन कर बगल में दबा ली.

‘‘चमेली, यह गठरी मुझे दे दे. मैं कोई चोर…’’ मोहन ने इतना ही कहा था कि चमेली ने 3-4 थप्पड़ उस के गाल पर जड़ दिए.

चमेली के अचानक बदले तेवर देख कर मोहन सकते में आ गया था.

यह देख कर भिखारिन बुढि़या के चेहरे पर संतोष के भाव तैर गए.

शाम का धुंधलका बढ़ने लगा था. चमेली के कदम वापस गांव की तरफ बढ़ रहे थे.  Hindi Story

Inter Caste Love Story : जाति की नाक

सुगिया के नशीले हुस्न में न जाने कितने नेताओं और चंदनधारियों ने गोता लगा कर खुद को खुश किया था, पर वही सुगिया जब छोटे से सुख की तलाश में भोला का दामन थाम बैठी, तो जाति के नाम पर सभी ने जैसे बवंडर सा खड़ा कर दिया. आखिर क्यों?

गांव के अगड़ों ने फरमान जारी कर दिया, ‘सुगिया को नंगा कर के गांव में घुमाया जाएगा और उसे भगाने वाले भोला की गरदन उतार ली जाएगी.

‘उन दोनों ने मिल कर हमारी इज्जत को धूल में मिला दिया है, अगर हमारी नाक ही नहीं रहेगी, तो हम सब यहां रह कर क्या करेंगे, फिर यह पैसा किस काम आएगा?’

जाति की नाक बचाने के नाम पर राघो सिंह जैसे कंजूस आदमी ने भी अपनी ओर से जाति की कटी नाक फिर से जोड़ने के लिए ढाई हजार रुपए के दान का ऐलान कर दिया.

जाति की कटी नाक से शिवन सिंह की विधवा रेणुका को भी परेशानी थी. उस के पति की मौत 3 साल पहले हो गई थी. जब जवान थी, तब उस पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा था, लेकिन किसी जाति वाले ने उस की कोई मदद नहीं की थी. आखिर नाथूराम ने उसे अपने बच्चों को पढ़ानेलिखाने का काम दिया. इस तरह रेणुका को जीने के लिए एक रास्ता मिल गया.

वैसे, लोगों को शक था कि रेणुका नाथूराम के बच्चों की सिर्फ मास्टरनी ही नहीं थी, बल्कि उन दोनों के बीच एक नजदीकी संबंध भी था. हां, इस रिश्ते में कभी भी इतना खुलापन नहीं आया कि उस की बू किसी के बरदाश्त की हद लांघ जाती. फिर चोरी जब तक पकड़ी न जाए, चोरी कैसे कही जा सकती है.

तभी तो अब रेणुका कहती है, ‘‘उस बेशर्म को भागना ही था, तो किसी अपनी जाति वाले को ले कर भाग जाती. नाक कटा दी…’’

देवी मंदिर के बाबा युगल किशोर को इस घटना के पीछे घोर कलियुग का हाथ दिखता है. वे कहते हैं, ‘‘घोर कलियुग आ गया है… पहले भी ऐसा होता था, पर तब राजघरानों में छोटे कुल की लड़कियां आती थीं. अब तो सब उलटा हो गया…’’

सुगिया व भोला को गांव से गए हुए तकरीबन 15 दिन हो गए थे, पर अभी भी हर कहीं यही चर्चा होती.

एक तरफ ऊंची जाति के लोग बदला लेने की तैयारी में जुटे थे, वहीं पिछड़े एकदम खामोश थे.

कुछ ऐसे नौजवान जरूर थे, जिन्हें इस बात की खुशी थी कि भोला ने हिम्मत का काम किया है.

अगड़ों में भी 2-3 लोग ऐसे थे, जो इस सारी घटना पर एक अलग सोच रखते थे. उन की नजर में अपने जीवनसाथी को चुनना कोई गलत हरकत नहीं है, इसलिए इसे ज्यादा तूल नहीं देना चाहिए. फिर सुगिया ने तो यह कदम बेबसी की हालत में उठाया था.

सुगिया का जन्म तकरीबन 20 साल पहले हुआ था. जब वह मां के पेट में थी, तभी उस के पिता को किसी गंभीर बीमारी ने जकड़ लिया था. उस के जन्म के डेढ़ साल बाद वे मर गए थे.

तब सुगिया का इस दुनिया में उस की मां के अलावा और कोई न था. कहने को तो उस के 2-2 चाचा भी थे, पर सालों पहले बंटवारा हो चुका था. वैसे, सुगिया के पिता कुछ जमीन छोड़ गए थे.

पति की मौत के बाद सुगिया की मां ने वह जमीन अपने एक देवर के जिम्मे कर दी थी. उसी से उन दोनों मांबेटी का गुजारा चलता रहा.

कुछ समय बाद सुगिया के चाचा ने कुछ भी देने से इनकार कर दिया. सुगिया की मां ने अपनी बिरादरी के कई लोगों से इंसाफ की गुहार लगाई, पर कोई उस की मदद करने के लिए आगे नहीं आया. जमीन उस के हाथ से निकल गई.

आखिर में सुगिया की मां ने पेट की खातिर अपनी बिरादरी के ही भरत मुखिया के यहां काम करना शुरू किया. वह खुद ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, उस के पास पैसे भी नहीं थे, पर उस ने सुगिया को स्कूल भेजना शुरू किया. पहली, दूसरी, तीसरी…छठी जमात, वह लगातार आगे बढ़ती जा रही थी.

अचानक उन्हीं दिनों सुगिया पर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा. मुखिया की लड़की की शादी थी. उन का घर बिजली की रोशनी से जगमगा रहा था. ठीक समधी मिलन के समय जब लोग बाहर गए हुए थे, पता नहीं कैसे सुगिया की मां का हाथ बिजली के नंगे तार से छू गया और वह चल बसी.

सुगिया का स्कूल जाना बंद हो गया. 12 साल की लड़की का अपना कौन था, जिसे वह अपना कहती. वह दिनरात कोठरी में पड़ी रहती. कोई दूसरा होता तो मुखिया को लेने के देने पड़ जाते, पर यहां तो कोई सुगिया की खोजखबर लेने वाला नहीं था.

वैसे, मुखिया ने सुगिया की मां का अंतिम संस्कार करा दिया था और उसे 50 रुपए नकद व 10 किलो चावल भी दिए थे. साथ ही, उस ने यह संदेशा भी भिजवाया था कि अगर वह अपनी मां की जगह काम करना चाहती है, तो कर सकती है.

सुगिया जैसों का सत्कार हो या अनादर, उस से उन का क्या बनताबिगड़ता है. फिर रोटी का जुगाड़ हो जाने के बाद ही आदमी आदरअनादर की बात सोच पाता है. सुगिया को अगर मुखिया के यहां काम न मिलता, तो शायद उसे दरदर भटकना पड़ता.

मुखिया के यहां काम करतेकरते 2 साल बीत गए. अब सुगिया 14 साल की हो गई थी. उस का बदन गदराया हुआ था और आंखों में एक चमक आ गई थी. मैलेकुचैले कपड़ों में भी वह खूबसूरत लगने लगी थी. वह सुबहशाम मुखिया के घर जाती और काम कर के अपनी कोठरी में लौट आती.

एक दिन सुगिया शाम ढलने के बाद अपनी कोठरी में लौट रही थी, तो मुखिया के बेटे सतीश ने एक दोस्त के साथ उसे उठा लिया. वह चीखीचिल्लाई, पर किसी ने उस की आवाज न सुनी.

मुखिया के बेटे ने उस के हाथ में सौ रुपए का एक नोट पकड़ा दिया. वह चुप हो गई.

इस वारदात के बाद सुगिया ने मुखिया के घर काम करना छोड़ दिया. अब उस का धंधा ही बदल गया.

सुखिया अब मर्दों को जिस्मानी सुख देती, बदले में उसे कुछ पैसे मिल जाते. इस में उसे अजीब सी खुशी महसूस होती, क्योंकि जब वह मुखिया के यहां जूठे बरतन धोती थी, तो भरपेट खाना तक नहीं मिलता था. पीठ पीछे चाहे लोग जो कुछ भी कहते, पर उस के आगे आने पर तो उन्हें नाक ही रगड़नी पड़ती थी.

सुगिया ने कई लोगों की सेवा की. मुखिया के बेटे से ले कर खुद मुखिया तक की. कई चंदनधारी भी उस के तलवों में चंदन रगड़ कर अपने को खुश कर के लौटे और कई नेता भी बेहिचक उस के दरवाजे पर पहुंचे. उस ने सब के साथ एक सा बरताव किया. सब की हवस मिटाई. उस के यहां आने वालों में कोई जाति बंधन नहीं था.

भोला कई दिन से सुगिया को देखता आ रहा था. एक दिन सुगिया का इशारा पा कर वह निहाल हो उठा. फिर क्या था, वह बारबार सुखिया से जिस्मानी सुख पाने लगा. इस के लिए उसे सुगिया के यहां जाने की जरूरत न थी, क्योंकि वही उस के पास आ जाती थी.

सुगिया ने हर नौजवान के सामने इस नरक से अपने को उबार लेने की बात कही, पर किसी ने उसे कबूल न किया. एक भोला ही ऐसा था, जिस ने मर्दानगी दिखाई थी, ‘मैं तुम्हें जरूर अपनाऊंगा… चाहे इस के लिए मु झे जो भी मुसीबत उठानी पड़े.’

फिर एक रात दोनों गांव से भाग गए.

पता नहीं, गांव वालों की नाक इस में कैसे कट गई? उन्हें तो खुश होना चाहिए था कि अब सुगिया गांव की धंधे वाली नहीं, किसी की बीवी बन गई थी. पर उन सिरफिरों को कौन सम झाता?

-विपिन कुमार

Hindi Short Story : शब्द शूल

Hindi Short Story. ‘उल्लू का पट्ठा…’ पूरी क्लास में यह गाली ऐसे गूंजी, जैसे कोई धमाका हुआ हो. इस गाली को बोलने वाला कोई बड़ा बच्चा नहीं, बल्कि पहली जमात में पढ़ने वाला 6 साल का सोनू था.

बच्चों की कौपियां जांच रही टीचर यह सुन कर हैरान रह गईं. उन्होंने सख्त चेहरा बना कर सोनू को अपने पास बुलाया और प्यार से पूछा, ‘‘बेटा, आप ने यह गाली कहां से सीखी? कौन बोलता है ऐसे?’’

‘‘मेरे पापा,’’ सोनू ने कहा.

‘‘आप के पापा और कौनकौन सी गालियां देते हैं?’’

‘‘बेटी के… बहिन के… मां के…’’

यह सुन कर टीचर का मुंह हैरानी से खुला का खुला रह गया.

‘‘बेटे, आप के पापा ये गालियां कब देते हैं?’’

‘‘फोन पर और मम्मी से लड़ाई करते समय,’’ सोनू ने मासूमियत से कहा.

अगले हफ्ते ही स्कूल में टीचरों और मातापिता की मीटिंग थी. गाली देने वाले बच्चे सोनू के साथ उस की मां आई थीं. उन के बैठते ही टीचर ने सोनू के मुंह से निकली गालियों की लिस्ट उन के हाथ में थमा दी. साथ ही, टीचर ने उन्हें कई हिदायतें भी दे डालीं.

सोनू की मां पर जैसे घड़ों पानी पड़ गया. उन्होंने घर पहुंचने तक किसी तरह अपने पर काबू किया, लेकिन घर में घुसते ही उन की आंखों से आंसू बह चले.

सोनू के पापा ने जब यह देखा, तो वे चिल्लाए, ‘‘क्या हुआ? किस मां के… की इतनी हिम्मत…’’

सोनू की मां रोती रहीं.

‘‘अरे, किस ने क्या कह दिया? कुछ बताओगी भी या ऐसे ही रोती रहोगी.’’

वे फिर भी रोती रहीं.

‘‘अरे, कौन मिल गया था? कुछ बताओगी भी…’’ सोनू के पिता ने फिर दोहराया.

यह सुन कर सोनू की मां अचानक फट पड़ीं, ‘‘वही उल्लू की पट्ठी… बहिन… सोनू की टीचर… और कौन.’’

सोनू के पिता को गाल पर चांटा सा लगता महसूस हुआ.

‘‘क्या हुआ? ऐसा कैसे बोल रही हो?’’ सोनू के पिता ने पूछा.

‘‘नालायक… गधे की औलाद…’’

यह सब सुन कर अपनी मां के बगल में खड़ा सोनू हंसने लगा.

इस घटना के बाद सोनू के पिता ने कभी घर में गाली नहीं दी.  Hindi Short Story

Married Life Story : सुबह भी होगी

Married Life Story. सलमा ने एक कप चाय बनाई और कमरे में आ गई. यह उस का रोज का काम बन गया है कि स्कूल से आ कर सब से पहले वह चाय पीती है, फिर शाम के खाने की तैयारी करती है.

रास्ते में शायरा ने सलमा को बताया था कि रूबी अपना घर छोड़ कर आ गई है. उसे हैरानी हुई कि रूबी जैसी समझदार लड़की अपनी ससुराल क्यों छोड़ आई है?

सलमा सोचने लगी कि अगर अब्बू ने उसे पढ़ाया न होता, तो वह भी जाने कहांकहां ठोकरें खाती घूमती.

अब्बू की छोटी सी दुकान थी, जिस से बड़ी मुश्किल से घर का खर्च पूरा होता था. सलमा और सलीम पढ़ रहे थे.

रमजान चाचा हमेशा ईमान की बातें करते थे, पर बूढ़े मांबाप की जिम्मेदारी अब्बू के ही जिम्मे थी.

रमजान चाचा ने साफ कह दिया था, ‘मेरी बीवी इन्हें रखने के लिए राजी ही नहीं है, तो मैं क्या करूं?’

अब्बू की आमदनी कम थी, खर्च ज्यादा थे. यह तो अच्छा था कि उन के 2 ही बच्चे हुए, सलमा और सलीम. अब्बू की पूरी कोशिश थी कि उन के बच्चे पढ़ जाएं.

जब सलमा के दादादादी की दवा वगैरह में काफी पैसा खर्च हो जाता, तो खाने में ही कटौती होती थी. अम्मी एक रोटी दे कर कह देतीं कि अब रोटी न मांगना. सलमा तो समझदार थी, लेकिन सलीम कई बार और रोटी के लिए जिद करने लगता, तो अम्मी उसे पीट देतीं.

रमजान चाचा सलमा के अब्बू के हालात जानते थे, फिर भी कभी उन्होंने बूढ़े मांबाप की दवा ला कर नहीं दी.

‘मैं कुछ भी करूं, नाम तो बड़े का ही होगा,’ कह कर रमजान चाचा अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ा लेते थे.

सलमा को याद है कि जब दादी और दादा की मौत हुई थी, तो कफनदफन भी अब्बू ने ही किया था, जिस में अम्मी के पास जो 1-2 जेवर थे, वे भी बिक गए.

दोनों बार रमजान चाचा ने 40 दिन पर होने वाली फातिहा और दावत बड़ी धूमधाम से की थी.

‘मेरे मांबाप थे, फातिहा तो मुझे करानी ही थी,’ रमजान चाचा बड़ी अकड़ से कहते थे.

किसी ने ताना कस दिया था, ‘जिए न दे कौरा, मरे बनावे चौरा.’

एक दिन रमजान चाचा ने अब्बू को समझाया था कि सलमा कुरान पढ़ ही चुकी है, अब उसे घर बैठा लो.

‘लड़की है, पढ़ लेगी तो बुरे वक्त में यह पढ़ाई उस के काम आएगी,’ अब्बू ने कहा था.

सलमा पढ़ती रही थी. उस की सहेलियां कुरान पढ़ कर घर बैठ गई थीं. जब उस ने हाईस्कूल का इम्तिहान पास किया था, तो अब्बू ने पूरे महल्ले में मिठाई बांटी थी.

‘सलमा की पढ़ाई बंद कर दो, अब उस की शादी के लिए सामान इकट्ठा करो,’ अम्मी ने कहा था.

‘यह पढ़ाई ही सलमा का दहेज है,’ अब्बू ने कहा था.

सलमा ने सिलाईकढ़ाई सीख ली थी. खाली समय में वह कढ़ाई करती थी. कढ़ाई से मिलने वाले पैसे उस की पढ़ाई के काम आ जाते.

इस बीच सलमा ने बीएड कर लिया था. बिरादरी में सवाल उठा था कि इस की शादी के लिए इतना पढ़ालिखा लड़का कहां मिलेगा?

सभी जानते हैं कि हर घर में ढेरों बच्चे होते हैं. जब तक छोटे रहते हैं, उन्हें मदरसे में भेजते रहते हैं, जहां वे अरबीउर्दू पढ़ने के नाम पर समय काटते हैं. उन में अच्छे घरों के बच्चे पढ़ कर बाप का काम संभाल लेते हैं.

ज्यादातर लड़के कुछ बड़े होते ही खराद, मोटरसाइकिल, वैल्डिंग वगैरह का काम सीखने लगते हैं. कुछ ही लड़के काम सीख पाते हैं, वरना ज्यादातर हैल्पर ही बन कर रह जाते हैं.

घर में इतने बच्चे होते हैं कि बाप उन्हें ठीक से पढ़ाने के बारे में सोच भी नहीं सकता. बड़े होने पर ज्यादातर के पास आमदनी का कोई नियमित साधन नहीं होता. जिन के पास खेती होती, वह बंट कर इतनी रह जाती कि उस से एक परिवार का गुजारा भी नहीं होता.

एक दिन लियाकत मियां अपने भाई शराफत का रिश्ता ले कर आए थे. अब्बू ने साफ बता दिया था कि उन के पास केवल लड़की है.

लियाकत मियां तैयार हो गए. अब्बू ने रिश्तेदारों से जानकारी की थी, तो पता चला था कि बड़े भाई लियाकत की शादी हो चुकी है और 3 बच्चे हैं. शराफत कुंआरा है और थोड़ाबहुत पढ़ा है. वैसे बचपन से दोनों भाई कारोबार में लगे रहे और आज उन का बहुत नाम है.

लियाकत मियां किसी भी कीमत पर शादी के लिए तैयार थे, तो अब्बू ने रिश्ता पक्का कर दिया था. जब लियाकत मंगनी की रस्म करने आए थे, तो इतने फलमिठाई, कपड़े और जेवर ले कर आए थे कि लोगों को भरोसा हो गया था कि रिश्ता बड़े घर से ही हुआ है.

सलमा के पड़ोसी उस की तकदीर से जलने लगे थे. लोग समझ  गए कि वह पढ़ीलिखी है, इसलिए गरीबी के बावजूद इतना अच्छा रिश्ता मिला.

सलमा की शादी भी धूमधाम से हुई थी. अब्बू ने दहेज भी थोड़ाबहुत दे ही दिया था. रिश्तेदारों ने भी काफी सामान दे दिया था. लियाकत मियां कुछ ले जाना नहीं चाहते थे. लोगों के कहने पर सामान रखवा लिया था. उसे तो यकीन ही नहीं हो रहा था कि वह झोपड़ी से महल में पहुंच जाएगी.

जब सलमा ससुराल पहुंची थी, तो उस ने देखा था कि वे लोग काफी अमीर थे. शराफत भी सीधेसादे थे. वह खुश थी. उसे नहीं मालूम था कि ये खुशियां चंद दिनों की हैं. उसे याद है, उस दिन शराफत एक डब्बा मिठाई ले आए थे. उन्होंने बच्चों को मिठाई दी थी.

‘यह क्या है?’ भाभी ने पूछा था.

‘कुछ नहीं, थोड़ी सी मिठाई लाया था,’ शराफत ने कहा था और कमरे में आ गए थे.

‘हमें क्या है, दोनों हाथों से लुटाओ. इन का क्या जाएगा. भीख तो हमारे बच्चे मांगेंगे,’ भाभी चिल्ला कर बोली थीं.

‘मैं ने क्या लुटा दिया?’ शराफत कमरे से बाहर आ कर बोले थे.

सलमा कुछ समझ नहीं पा रही थी कि यह क्या हो रहा है.

‘कुछ नहीं, अब बंटवारा होगा,’ भाभी ने तेज आवाज में कहा था.

शराफत अपने भाई लियाकत के पास गए थे, तो उन्होंने भी कह दिया था कि वे कुछ नहीं कह सकते.

सलमा यह तो समझ  गई थी कि लियाकत ही बंटवारा चाहते हैं, लेकिन क्यों, वह यह समझ  नहीं सकी थी.

शराफत ने सोचा कि भाभी किसी बात पर गुस्सा हैं. सुबह तक ठीक हो जाएगा. लेकिन सुबह जब शराफत ने दुकान की चाबी उठाई थी, तो भाभी ने कह दिया था, ‘तुम दुकान मत खोलो, अपना हिस्सा लो और यहां से जाओ.’

‘मैं कहां चला जाऊं?’ शराफत धीरे से बोले थे.

‘बेकार की बहस से क्या फायदा, अब बंटवारा तो होना ही है. कहां जाओगे, यह तुम जानो?’ लियाकत बोले थे.

शराफत चुप बैठे रहे. लियाकत ने दहेज में मिला सामान ला कर रख दिया.

‘क्या मेरा इतना ही हिस्सा है?’ शराफत ने पूछा था.

‘मांबाप से तो कुछ मिला नहीं, मैं ने बिजनैस किया, रातदिन मेहनत की…’ ‘मेहनत तो मैं ने भी की,’ शराफत बोले थे.

‘तुम्हें मैं पाल रहा था. खा रहे थे, तो काम भी कर रहे थे. इस में हिस्सा कैसा? तुम्हारी शादी कर दी, अब अपना सामान उठाओ, बीवी को लो और यहां से जाओ,’ लियाकत बोले.

‘हम लोग कहां जाएं?’ सलमा रोते हुए बोली थी.

‘कहीं भी जाओ, अपना सामान उठाओ, वरना सड़क पर फेंक दूंगा,’ लियाकत तेज आवाज में बोले थे.

शराफत के एक दोस्त ने अपने घर में एक कमरा दे दिया था. वहीं सामान उठा कर ले गए थे. रात में शराफत फूटफूट कर रोए थे.

‘मैं ने कारोबार के अलावा कुछ किया नहीं, मजदूरी कर नहीं पाऊंगा. बनिए की नौकरी में खर्च भी नहीं चलेगा,’ शराफत ने कहा था.

उस दिन दोनों भूखे ही सोए थे, क्योंकि शराफत की जेब में पैसे नहीं थे. बाजार में इस बंटवारे की चर्चा हुई, लेकिन किसी ने लियाकत से कुछ नहीं कहा था.

सलमा ने अपनी सोने की झुमकियां शराफत को दे कर कहा था, ‘इन्हें बेच कर खाना वगैरह खरीद लो, फिर सोचेंगे कि क्या करें.’

बहुत परेशानियों के बाद भी सलमा मायके नहीं गई थी. कुछ पड़ोसिनों ने उसे समझाया था कि वह शराफत को छोड़ दे. उस के साथ रहेगी, तो भूखी ही मरेगी. वह चुपचाप सुनती रही थी.

सलमा को पता चला था कि बालिका इंटर कालेज में टीचर की जगह खाली है. उस ने अर्जी दे दी. बीएड होने के चलते उसे नौकरी मिल गई थी. उस के बाद शराफत ने भी छोटामोटा कारोबार शुरू कर दिया था.

किसी के दरवाजा खटखटाने से सलमा की यादों का सिलसिला टूट गया. उस ने उठ कर दरवाजा खोला. सामने रूबी खड़ी थी.

‘‘तुम कब आईं?’’ सलमा ने पूछा.

‘‘कल रात ही आई थी,’’ रूबी ने अंदर आते हुए बताया.

‘‘सब ठीक तो है न?’’ वह बोली.

‘‘कुछ भी ठीक नहीं है. फिरोज का तो काम ही नहीं चलता. कोई कहां तक परेशानियां सहन करे. मैं ने तो अब्बू से कह दिया है कि मैं वहां मरने नहीं जाऊंगी,’’ रूबी बोली.

‘‘यह भी कोई बात हुई कि परेशानी आई तो घर छोड़ दिया. हर समस्या का हल होता है. तुम भी कुछ काम…’’

‘‘मैं वहां मजदूरी करने नहीं गई हूं,’’ रूबी तपाक से बोली.

‘‘यह भी कोई सोच है. फिरोज को छोड़ कर दूसरे से निकाह करोगी… वहां भी परेशानी आई तो…’’ सलमा बोली.

‘‘तुम्हारी तरह पढ़ीलिखी होती, तो मैं भी नौकरी कर लेती,’’ रूबी धीरे से बोली.

‘‘रास्ते तो और भी हैं. तुम सिलाई करो. तुम्हारी ही मेहनत सही, कम से कम चूल्हा तो जलेगा,’’ सलमा ने समझाया.

‘‘हां, आप ठीक कहती हैं. आप ने मुझे  रास्ता दिखा दिया, वरना मैं भटकती रहती,’’ रूबी धीरे से बोली.

‘‘तुम बैठो, मैं चाय बनाती हूं,’’ रसोई में जाते हुए सलमा बोली.

सलमा समझ गई कि रूबी जल्दी ही पति के पास चली जाएगी और धीरेधीरे उस की जिंदगी संवर जाएगी.  Married Life Story

-साबिर हुसैन

Short Story in Hindi : बिंदिया

Short Story in Hindi. ठाकुर वीर सिंह की हवेली दुलहन की तरह सजी थी. बिजली वाले रंगबिरंगे बल्ब लगा कर हवेली को जगमगा रहे थे. फूल वाले उसे फूलों से सजा रहे थे और हलवाई कई तरह के पकवान बना रहे थे, जिन की खुशबू चारों ओर फैल रही थी.

हवेली के अंदर सिर्फ एक ही नाम पुकारा जा रहा था, ‘बिंदिया… बिंदिया… बिंदिया…’

हलवाई बोल रहा था, ‘‘बिंदिया बहू, भोजन तैयार है…’’

माताजी पुकार रही थीं, ‘‘बेटी बिंदिया, भोग का समय हो रहा है.’’

तभी ऊपर से आवाज आई, ‘‘बिंदिया भाभी, दूल्हे का सूट कहां रखा है?’’

हवेली के छोटे ठाकुर शक्ति सिंह की शादी हो रही थी और बरात जाने की तैयारी चल रही थी, लेकिन बिंदिया को घड़ी भर की भी फुरसत नहीं थी. वह अपनी सूझबूझ  से सारे काम बखूबी निबटा रही थी.

इसी बीच नौकरानी ने कहा, ‘‘बीबीजी, आप को बाबूजी बुला रहे हैं.’’

बिंदिया ने रसोई में जा कर भोजन का थाल सजा कर भोग लगाया, फिर शक्ति सिंह का सूट अलमारी से निकाल कर सीधे बाबूजी के पास पहुंची और बोली, ‘‘आप ने मुझे बुलाया बाबूजी?’’

बाबूजी ने कहा, ‘‘मैं ने तुम्हें इसलिए बुलाया था कि देखना किसी भी काम में कोई कमी न रह जाए. शादी का सारा काम तुझे ही संभालना है.’’

बिंदिया ने हंसते हुए कहा, ‘‘बाबूजी, आप परेशान न हों. मैं सब संभाल लूंगी.’’

बिंदिया के जाने के बाद बाबूजी सोच में डूब गए और उन्हें 3 साल पुरानी घटना याद आने लगी…

एक बार जब ठाकुर वीर सिंह अपनी पत्नी के साथ शहर जा रहे थे, तो रास्ते में तेज रफ्तार से आते एक ट्रक ने उन की गाड़ी को पीछे से टक्कर मार दी थी. उस हादसे में उन की पत्नी की टांग में बहुत चोट आई थी. ज्यादा खून निकलने से वे बेहोश हो गई थीं.

जैसेतैसे उन्होंने अपनी पत्नी को अस्पताल पहुंचा दिया था, पर उन्हें यह चिंता हो रही थी कि इस अनजान शहर में कौन उन की मदद करेगा. उन की पत्नी को जिस ग्रुप का खून चढ़ाया जाना था, वह अस्पताल में मौजूद नहीं था.

तब नर्स ने उन्हें खून देने वालों की लिस्ट थमाते हुए एक पते की ओर इशारा करते हुए कहा था, ‘आप इस पते पर जाइए, आप का काम हो जाएगा.’

ठाकुर वीर सिंह उसी वक्त उस पते पर जा पहुंचे. उन्होंने उस छोटे से घर का दरवाजा खटखटाया.

जल्दी ही 20-21 साला एक लड़की ने दरवाजा खोल कर पूछा, ‘कहिए, आप को किस से मिलना है?’

तब ठाकुर साहब ने सारी घटना बताई, जिसे सुनते ही लड़की ने अस्पताल जा कर अपना खून दे दिया.

खून मिल जाने से ठाकुर वीर सिंह की पत्नी की जान तो बच गई, पर कमजोरी के चलते लड़की की हालत खराब हो गई.

जब वह लड़की ठीक हो गई, तब ठाकुर साहब ने उसे बुला कर रुपए देने की कोशिश की, तो उस ने कहा, ‘बाबूजी, आप मुझे  जो रुपए दे रहे हैं, इन के सहारे मैं समाज में कितने दिन इज्जत से जी सकूंगी.

‘आप तो जानते हैं कि जब एक जवान लड़की के सिर से उस के मांबाप का साया उठ जाता है, तो समाज के भूखे भेडि़ए उसे ललचाई नजरों से देखने लगते हैं और मौका पा कर उसे नोचने लगते हैं, इसलिए आप मुझे रुपए नहीं, बल्कि कोई काम दे दीजिए.’

पहली बार ठाकुर साहब ने उस लड़की को गौर से देखा. वह उन्हें सुंदर व सुशील लगी. उन्होंने मन ही मन उसे अपने बड़े बेटे अजीत सिंह की पत्नी बनाने का फैसला किया और कहा, ‘बेटी, क्या तुम हमारे साथ गांव चलोगी? जब तक मेरी पत्नी चलफिर नहीं सकती, तुम्हें उन की सेवा करनी पड़ेगी… जब तुम कहीं और जाना चाहोगी, मैं भेज दूंगा.’

ठाकुर साहब ने अपनी पत्नी को मन की बात बताई, तो वे भी राजी हो गईं.

बिंदिया की सेवा और मालिश से ठकुराइन की टांग 2 महीने में ही पूरी तरह ठीक हो गई. फिर जल्दी ही उन्होंने उसे अपनी बहू बना लिया.

ठाकुर साहब अपने छोटे बेटे की शादी भी एक गरीब परिवार में कर रहे थे, जिसे बिंदिया ने ही पसंद किया था और कहा था, ‘बाबूजी, आप ने जैसे मुझ  गरीब को अपनी बहू बनाया, उसी तरह इस लड़की को भी अपना लीजिए.

‘गरीब पैसे का नहीं, प्यार का भूखा होता है. उसे जो प्यार करता है, उस पर वह सबकुछ न्योछावर कर देता है…’

यही सोचतेसोचते ठाकुर साहब की आंखों से आंसू निकल पड़े.

तभी बिंदिया की आवाज आई, ‘‘बाबूजी, जल्दी से खाना खा लीजिए. बरात के जाने का वक्त हो रहा है.’’

यह सुन कर उन्होंने जल्दी से अपनी आंखें पोंछीं और बिंदिया का सपना पूरा करने चल पड़े.  Short Story in Hindi

– अनिल सोनी

Women Courage Story : बैसाखी

Women Courage Story. नगमा अपने नाम की तरह खूबसूरत थी. वह जब भी चौराहे के नल पर पानी भरने जाती, कल्लू और उस के गुरगे उस पर फब्तियां कसे बिना नहीं रहते थे.

कल्लू की बेहूदा हरकतों से नगमा का दिल गुस्से से भर जाता. उस का जी चाहता कि जूडोकराटे का इस्तेमाल कर के उन के होश ठिकाने लगा दे, लेकिन अपने पति आजाद का मासूम चेहरा याद आते ही उस का सारा गुस्सा काफूर हो जाता था.

6 महीने पुरानी बात थी. मुंबई में उत्तर भारतीयों पर हुए हमलों के बाद से दंगाइयों का मन सातवें आसमान पर था. वे बाहर से आए लोगों पर जोरजुल्म तो करते ही थे, औरतों और लड़कियों को भी परेशान करते थे.

इस तरह के दंगाइयों से शरीफ मराठी परिवार परेशान थे. नगमा भी मराठी थी. उस ने एक झारखंडी लड़के आजाद से शादी कर ली थी, जो दंगाइयों के हमले में अपाहिज हो गया था.

नगमा के पिता आफताब अली मुंबई में डाक्टर थे. उस की मां नादिरा बेगम लड़कियों के कालेज में प्रोफैसर थीं. दोनों के लाड़प्यार ने एकलौती बेटी को जिद्दी बना दिया था.

नगमा अपनी मोटरसाइकिल से पूरे मुंबई शहर में घूमा करती थी. उस ने जूडोकराटे की ट्रेनिंग भी ले रखी थी.

एक दिन नगमा अपने पिता के अस्पताल गई हुई थी. वह आजाद नाम के एक शख्स के बिस्तर के सामने खड़ी हो गई. 20 साला उस नौजवान के मासूम चेहरे पर दुख के भावों और कटे पैरों का दर्द महसूस कर नगमा का बदन भी सिहर उठा.

पूछताछ के बाद नगमा के पिता ने बताया कि आजाद गोरेगांव जाने के लिए बस का इंतजार कर रहा था, तभी दंगाइयों का दल वहां पहुंच गया. पहले उस के प्रदेश का नाम पूछा गया, उस के बाद उसे दौड़ादौड़ा कर पीटा गया.

दंगाइयों के कहर से आजाद के दोेनों पैरों की हड्डियां टूट गई थीं. मांस के अंदर सड़न पैदा हो गई थी. लिहाजा, उस की जिंदगी बचाने के लिए उस के दोनों पैरों को काट देना पड़ा.

आजाद की दास्तान सुन कर नगमा का मन भर आया और वह अस्पताल से चली गई.

ठीक होने के बाद आजाद गोरेगांव के अपने किराए के मकान में आ गया, जहां बिहारझारखंड से आए मजदूर रहते थे. वे सभी एक ऐक्सपोर्ट कंपनी में कपड़े सिलने का काम करते थे. आजाद भी यही काम करता था.

अपाहिज हो जाने के बाद आजाद दिनभर अपने कमरे में खोयाखोया सा पड़ा रहता. ऐसे में नगमा आ कर उस की सेवा करती. खानेपीने से ले कर दवादारू का इंतजाम करती.

धीरेधीरे दोनों के बीच इतना लगाव बढ़ गया कि एक दिन नगमा ने आजाद से कोर्ट मैरिज कर ली.

शादी कर लेने के बाद नगमा की जिंदगी में भूचाल आ गया. उस के पिता और मां ने उस का घर से निकलना बंद कर दिया.

‘जहां पूरा महाराष्ट्र उत्तर भारतीयों के खिलाफ है, वहां तुम ने एक ?ारखंडी लड़के से शादी कर ली…’ उस की मां नादिरा ने समझाते हुए कहा, ‘माना कि आजाद अपाहिज है. उसे हमदर्दी की जरूरत है. इस का मतलब यह नहीं कि तुम उस से प्यार करने लगो.’

‘आप का कहना है कि अपाहिज हमदर्दी तो पा सकता है, पर प्यार नहीं. मगर मैं ऐसा नहीं कर सकती. मैं आजाद से प्यार करती हूं और करती रहूंगी. हम दो जिस्म एक जान हैं. हमें कोई जुदा नहीं कर सकता,’ नगमा ने जोश में न जाने और क्याक्या कह दिया.

नादिरा अपनी एकलौती बेटी के इस दीवानेपन से काफी परेशान हो गईं. उन्हें सम?ा में नहीं आ रहा था कि नगमा को कैसे समझाएं?

उन्होंने फिर कोशिश की, ‘तू ने जज्बात में आ कर गलत फैसला कर लिया है, बाद में पछताएगी. अभी तुझे  मेरी बातें समझ  में नहीं आएंगी. लेकिन जरा सोचो, जो खुद दूसरे का मुहताज है, वह तुम्हें क्या दे पाएगा?’

‘मुझे  कुछ नहीं सुनना है,’ नगमा ने नाराज होते हुए कहा.

‘मेरी प्यारी नगमा, बात मान जा और इब्राहिम से शादी कर ले. तेरी जिंदगी संवर जाएगी,’ मां ने कहा.

‘ऐसा कभी नहीं होगा. मेरा आजाद तो जिस्मानी तौर पर अपाहिज है, लेकिन लगता है कि आप दिमागी रूप से अपाहिज हो गई हैं.’

‘जिस दिन तू ठोकरें खा कर इस दरवाजे पर आएगी, उस दिन मैं तु?ा से पूछूंगी…’ नगमा को वहीं छोड़ कर नादिरा कमरे में चली गईं.

उस दिन के बाद से नगमा गोरेगांव में आ गई और आजाद के साथ रहने लगी. किराए के मकान में पानी की सहूलियत नहीं थी. सभी किराएदार चौराहे के नल से पानी लाते थे.

नगमा का साथ पा कर आजाद का हौसला फौलाद बन गया था. वह रोजाना सामने के मैदान में जाता और अपनी बैसाखियों की मदद से हसीन मियां के स्कूटर को चलाने की कोशिश करता. एक दिन उस की मेहनत रंग लाई और वह स्कूटर चलाना सीख गया.

अब आजाद नगमा को स्कूटर के पीछे बैठा कर खूब घुमाता. वे दोनों दोगुनी मेहनत से कपड़ों की सिलाई करते और उन्हें ऐक्सपोर्ट कंपनी को पहुंचा देते. इस तरह उन्हें सिलाई के लिए और भी और्डर मिलने लगे थे.

चौराहे के नल पर कल्लू की हरकत से तमतमाई नगमा घर आ कर अपनी मशीन से कपड़े सिलने में मसरूफ हो गई कि तभी पड़ोस की नसीमा चाची आ कर बैठ गईं.

वे बोलीं, ‘‘अरी नगमा, दिनरात यों ही अपना बदन गलाती रहेगी या चाची को एक कप चाय भी पूछेगी.

‘‘इतनी बेखबर रहेगी, तो कोई चुपके से 2-4 कपड़े ले कर भाग जाएगा, फिर ढूंढ़ती रह जाओगी.’’

‘‘चाची, अभी मैं आप को चाय नहीं पिला सकती. रही बात कपड़े चुराने की, तो चोरी करने वाले को कौन रोक सकता है?’’

‘‘जैसे तू ने कल्लू का दिल चुरा लिया है. इस बात का महल्ले में कुछ ज्यादा ही शोर है.’’

‘‘क्या बोलती हैं आप चाची, जरा फिर से बोलो तो…’’ नगमा को जैसे उन की बातों पर यकीन न हुआ.

‘‘हां नगमा, वह तुम्हें बहुत चाहता है. कल मुझ  से कह रहा था कि नगमा जैसी हसीन और खूबसूरत कोई नहीं. वह तुम्हारे हुस्न पर मरता है.’’

‘‘चाची, मरने वाले यों ही मरते रहेंगे. जब आजाद और मैं खुश, तो दुनिया जलती रहे,’’ नगमा बोली.

‘‘अरी नगमा, तू आजाद को छोड़ दे तो ही अच्छा है.’’

यह सुन कर नगमा का खून खौल उठा, लेकिन अपने मन को शांत करते हुए उस ने जवाब दिया, ‘‘आप उस कल्लू की बात कर रही हो, जिसे पुलिस तलाश रही है. वह लूट, हत्या, डकैती और बम धमाके जैसे संगीन जुर्मों का आरोपी है. एक बार जेल चला जाएगा, तो कभी बाहर नहीं निकलेगा.

‘‘कल्लू जैसे लोग ही महाराष्ट्र को कंगाल बनाने में लगे हैं. बकबक करना बंद करो और यहां से जाओ, वरना धक्के मार कर घर से बाहर निकाल दूंगी.’’

‘‘कल की छोकरी, तू मुझे आंखें दिखाती है. कल्लू को मालूम पड़ेगा, तो वह तेरा मांस नोच कर खा जाएगा. बाप के घर से भागी छोकरी की इतनी मजाल. तेरे टुकड़े न करा दिए, तो मेरा नाम भी नसीमा नहीं,’’ इतना कह कर नसीमा चाची वहां से चली गईं.

नसीमा एक बदनाम औरत थी. उस का अपराधियों से संबंध था. उस ने भरी जवानी में अपने शौहर रहमान को मरवा डाला था. सुबूत की कमी से वह बच गई थी. महल्ले की औरतें उस से बातें करने में कतराती थीं.

आजाद के न आने से नगमा काफी परेशान थी. अचानक बाहर स्कूटर के रुकने की आवाज सुनाई दी. वह दौड़ती हुई बाहर निकल पड़ी. लहूलुहान आजाद को देखते ही उस का कलेजा मुंह को आ गया. वह उसे सहारा दे कर अंदर लाई.

‘‘तुम्हारी ऐसी बुरी हालत किस ने की? कहीं कल्लू और उस के गुंडे तो नहीं थे?’’ उस ने बेचैन होते हुए पूछा.

‘‘नहीं नगमा, वे लोग नहीं थे. मैं स्कूटर से गिर गया था. इसी से थोड़ी खरोंच आ गई है,’’ आजाद ने कहा.

‘‘तुम्हारे कपड़े फटे हैं. स्कूटर पर भी निशान पड़े हुए हैं. तुम्हारे सिर से खून निकल रहा है. यह सब कैसे हो गया? आजाद, सचसच बताओ,’’ नगमा तड़पती हुई चीख पड़ी.

‘‘अरे भई, तुम मरहमपट्टी करने की जगह बहस क्यों कर रही हो?’’

‘‘ओह, तुम्हारी यह हालत देख कर मैं होश खो बैठी थी. अच्छा, मैं रिकशा बुलाती हूं… हम अस्पताल चलेंगे.’’

‘‘अरे, मामूली चोट है. यों ही ठीक हो जाएगी,’’ आजाद ने उसे समझाया.

‘‘नहींनहीं, तुम अस्पताल चलो.’’

एक हफ्ते बाद आजाद ठीक हो गया.

एक दिन अचानक चौराहे पर बम धमाके की आवाज आई. लोगों की चीखपुकार मच गई.

आजाद घर में नहीं था. नगमा अपने घर से बाहर निकली. कल्लू और उस के साथी हाथ में लाठीडंडे लिए उस की तरफ ही बढ़ रहे थे. वह उन से बचने का उपाय सोच रही थी कि सभी उस के पास आ गए.

कल्लू ने उस के बालों को पकड़ा और चीखते हुए बोला, ‘‘आज चौराहे पर तेरी ऐसी हालत करूंगा कि दुनिया देखेगी. ले चलो इसे.’’

कल्लू ने चौराहे के बीचोंबीच ला कर नगमा को पटक दिया. हिम्मत बटोर कर वह खड़ी हुई. वहां कोई मददगार नहीं था. सभी अपनेअपने घरों में छिपे हुए थे.

अपनी बेइज्जती का एहसास होते ही नगमा किसी गुस्साई नागिन की तरह खौफनाक हो उठी. अपने सामने दुश्मनों को खड़ा देख कर उस की मुट्ठियां भिंच गईं, भौंहें तन गईं.

नगमा ने अचानक हवा में छलांग लगाई और कल्लू के जबड़े पर जोरदार ठोकर मारी. दर्द से बिलबिलाया कल्लू नीचे गिर पड़ा.

अपने उस्ताद को पिटते देख कल्लू के गुरगे नगमा की ओर दौड़े. उन का वार काटते हुए उस ने जोरदार लात जमाई.

नगमा की कलाबाजी को देख कर वे दंग रह गए.

नगमा ने एक के बाद एक उन के दांवों को जब नाकाम करना शुरू किया, तो वे उस के आगे टिक नहीं पाए. इसी बीच किसी ने पुलिस को फोन कर दिया.

आजाद जैसे ही घर पहुंचा, महल्ले के सन्नाटे को देख कर उस की रूह कांप उठी. वह बेतहाशा घर के अंदर घुसा. उस ने कई बार नगमा को आवाज लगाई, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला.

आजाद पागलों की तरह नगमा को ढूंढ़ता हुआ बाहर निकल पड़ा. वह जैसे ही थोड़ी दूर गया, रास्ते में उसे तुफैल चाचा मिल गए.

उन को सुनाते हुए वह बोल पड़ा, ‘‘बुजदिलों के बीच रहने से अच्छा है गुंडों से लड़ कर शहीद होना. आप को मालूम है कि गुंडे नगमा को उठा कर ले गए हैं और यहां के लोग तमाशबीन बने देखते रहे.’’

‘‘अरे आजाद, तू नगमा की बात कर रहा है. वह तो शेरनी है, शेरनी. उस ने अकेले ही इस महल्ले की लाज रख ली है. हमें उस पर फख्र है,’’ तुफैल चाचा ने गर्मजोशी के साथ आजाद से कहा.

‘‘आखिर नगमा ने ऐसा क्या कर दिया है चाचा?’’ बच्चे की तरह उतावला होते हुए आजाद ने पूछा.

‘‘उस ने कल्लू और उस के गुंडों का कचूमर निकाल दिया है. सभी थाने में पड़े कराह रहे हैं.’’

‘‘नगमा ठीक तो है न चाचा? किसी ने उस के बारे में नहीं बताया?’’

‘‘बरखुरदार, तुम चिंता मत करो, नगमा सहीसलामत है. सुना है कि थाने में एसपी तक आ गए हैं.’’

‘‘ऐसा क्यों चाचा? क्या नगमा पर मारपीट करने का मुकदमा चलेगा?’’

‘‘नहीं रे पगले, कल्लू कई संगीन मामलों का अपराधी है. वह पुलिस की पकड़ से बाहर था. नगमा ने उसे पकड़वा कर हिम्मत का काम किया है. सरकार उसे इनाम देगी.’’

जब आजाद थाने पहुंचा, उस वक्त नगमा अपनी अम्मी से गले मिल कर रो रही थी. पास में खड़े उस के पिता एसपी से बातें कर रहे थे.

उन दोनों ने देखा कि आजाद भी आ गया है, तो वे उस की ओर लपके.

बैसाखी के सहारे खड़े आजाद से हाथ मिलाने के बाद एसपी ने कहा, ‘‘हमें नगमा की जांबाजी पर नाज है. उस से महल्ले और समाज की लड़कियों को सबक लेना चाहिए.’’

थोड़ी देर में नगमा और नादिरा भी वहां पहुंच गईं.

‘‘कैसी हो नगमा?’’ आजाद ने पूछा. ‘‘बिलकुल ठीक हूं… मेरी अम्मी से मिलो.’’

‘‘आप महान हैं, जो नगमा जैसी लड़की को अपनी कोख से जन्म दिया,’’ आजाद ने नादिरा को नमस्ते करते हुए कहा.

‘‘आप दोनों की सलामती ही मेरी सब से बड़ी दौलत है. बहरहाल, अब हम सब घर चलें.’’

‘‘मैं अपनी बैसाखी को छोड़ कर कैसे जा सकता हूं?’’ ‘‘बैसाखी तो आप के कंधे से टिकी है,’’ नादिरा ने कहा.

‘‘आप समझे नहीं. मेरी बैसाखी तो नगमा है. उस के बगैर तो चलने की मैं सोच भी नहीं सकता,’’ आजाद ने भरी आंखों से नगमा की ओर देखा.

अचानक नगमा उस के सीने से लग कर रो पड़ी.    Women Courage Story

-जनक देव जनक

Revenge story in hindi : आखिरी साधन

Revenge story in hindi. उस रात का मंजर याद आते ही सईदा के तनबदन में अंगारे भर गए. उस ने चादर से अपना शरीर लपेट कर बांहों से चेहरा छिपा लिया और दहाड़ें मार कर रो पड़ी.

उस समय जब सईदा के साथ ऐसा हादसा गुजरा, वह इमारत की आखिरी मंजिल के कमरे में थी, जहां से चिल्लाने की आवाज नीचे तक नहीं पहुंच सकती थी.

इलाहाबाद के एक डिगरी कालेज में सईदा और दिलशाद छात्र थे. दोनों का मिलनाजुलना बढ़ता रहा, जिस ने एक रोज इश्क का रूप ले लिया. सईदा दिलशाद की मुहब्बत में गिरफ्तार हो चुकी थी.

एक दिन दिलशाद ने कहा, ‘‘सईदा, हम लोग बैठेबैठे बोर हो चुके हैं. चलो, बाहर घूम लें. होटल में चल कर खाना खाएंगे, फिर लौट आएंगे.’’

‘‘दिलशाद, कुछ देर में रात हो जाएगी. बेहतर होगा कि हम लोग दूसरे दिन का प्रोग्राम बना लें,’’ सईदा बोली.

‘‘इस वक्त मन हो तो चलो, फालतू बातों से कोई फायदा नहीं.’’

‘‘जिद करते हो तो चलो, लेकिन मेरा ज्यादा समय मत खराब करना.’’

दोनों चल दिए. रात का खाना होटल में खाया. ज्यादा रात होने लगी, तो दिलशाद ने कहा, ‘‘सईदा, मुझे  अपने फ्लैट में कुछ जरूरी काम याद आ गया है. चलो, पहले उसे पूरा कर लूं, फिर तुम्हें घर तक छोड़ दूंगा.’’

‘‘मैं बाहर खड़ी रहूंगी. तुम अपना काम जल्द निबटा कर आ जाना,’’ सईदा ने कहा.

‘‘बाहर खड़ी रह कर क्या करोगी? कोई चोरउचक्का आ गया, तो नाहक परेशान करेगा. मुझे ज्यादा समय नहीं लगेगा,’’ वह हंस कर बोला.

दोनों लिफ्ट से दिलशाद के फ्लैट पर चले गए.

दिलशाद ने अपनी मुहब्बत का वास्ता दे कर सईदा को इतना मजबूर कर दिया कि उसे कुछ देर तक रुकना पड़ा.

बातोंबातों में वह उसे जिस्मानी संबंध बनाने को मजबूर करने लगा. तब सईदा को शक हुआ. उस ने इनकार करते हुए कहा, ‘‘शादी से पहले यह सब ठीक नहीं.’’

दिलशाद रूठ कर बोला, ‘‘तुम्हारे दिल में मेरे लिए सच्ची मुहब्बत नहीं है, इसलिए शादी का बहाना ढूंढ़ लिया. अगर तुम्हें एतराज है, तो चलो पहले तुम्हें घर छोड़ आऊं.’’

‘‘डार्लिंग, इस तरह नाराज मत हो.’’ ‘‘मैं तुम्हें मजबूर नहीं करता. कुछ देर रुको. कौफी पी कर चलेंगे.’’

दिलशाद ने गरमागरम कौफी ला कर सईदा को दी. कौफी पीने के बाद सईदा बेसुध हो गई.

जब सईदा होश में आई, तो उस ने अपने कपड़े ढीले पाए. वह दिलशाद की बांहों में पड़ी थी.

दिलशाद उसे बेतहाशा प्यार कर रहा था. सईदा भी सब भूल कर पूरे जोश के साथ दिलशाद से लिपट गई.

दिलशाद ने सिगरेट जलाई और कमरे से बाहर चला गया. उसी समय कमरे की बिजली चली गई. घुप अंधेरा छा गया. उस का चाहने वाला वापस लौट कर अंधेरे में फिर से उस के जिस्म से लिपट गया.

बैडरूम के अंधेरे में केवल उन की सांसों की गूंज थी. अचानक सईदा को उस अंधेरे में अजीब सा एहसास हुआ. उस के हाथ दिलशाद की कलाइयों पर थे. उसे यों लगा, जैसे ये दिलशाद की कलाइयां नहीं, किसी और की हों. उस के हाथ तेजी से दिलशाद के कंधों, गरदन और चेहरे पर दौड़ गए.

सईदा ने अंधेरे में आंखें फाड़ कर देखा, पर कुछ नजर नहीं आया, लेकिन उस के कांपते हाथ बहुतकुछ महसूस कर चुके थे. एक पल के लिए उस ने ऐसा महसूस किया, जैसे उस की धड़कन बंद हो जाएगी.

‘‘तुम कौन हो?’’ वह चीखी.

उस आदमी ने तेज सांस ली और कमरे का गेट खोल कर बाहर चला गया.

सईदा चीख कर बेहोश हो गई. होश में आने पर उस ने दिलशाद को कुरसी पर बैठे सिगरेट पीते देखा.

उस ने गुस्से में पूछा, ‘‘तुम्हारे अलावा दूसरा साया किस का था, जिस ने मुझ  पर घोर जुल्म किया?’’

दिलशाद ने कहा, ‘‘वह मेरा जिगरी दोस्त था. सईदा, जो कुछ हुआ, उसे भूल जाओ. शादी तो मैं तुम से ही करूंगा. वह मेरा दोस्त दुग्गल ईरानी शुरू से ही मेरी हर चीज में साझेदार था. वह अपनी माशूका का प्यार मुझे  दिलाता था. मैं ने अपनी माशूका का प्यार उसे दे कर सारा कर्ज चुका दिया. यकीन करो, फिर कभी तुम्हें ऐसी शिकायत का मौका नहीं दूंगा.’’

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब मेरी समझ  में अच्छी तरह आ गया. तुम लोग किसी लड़की से मुहब्बत न कर के फरेब करते रहे हो. मुझे भी भरोसे में ले कर तुम ने मेरे साथ अच्छा नहीं किया. इतना बड़ा गुनाह किया, जिस की जितनी भी सजा दी जाए, कम होगी.’’

‘‘तुम्हारी हर सजा मंजूर होगी. बस, रूठना बंद करो और आगे अपना वही प्यार लेतीदेती रहो.’’

‘‘शर्म नहीं आती ऐसी बातें जबान से निकालते हुए. क्या अब भी उम्मीद करते हो कि तुम मुझ से कभी प्यार पा सकोगे? लानत है, तुम्हारी जिंदगी पर…’’ वह चिल्लाई.

दिलशाद ने आगे बढ़ कर सईदा को अपनी बांहों में लेना चाहा, तो वह चीख पड़ी, ‘‘खबरदार, जो तुम ने मुझे  छूने की कोशिश की. तुम औरत को नहीं जानते. जब आग और शोला बन कर किसी पर गिरती है, तो उस पर कयामत आ जाती है, जिसे आदमी बरदाश्त नहीं कर सकता.

‘‘तुम इनसान नहीं हैवान हो, जिस के सीने में दिल नहीं है. अब तो तुम प्यार के काबिल नहीं रह गए. मेरी इज्जत का खजाना तुम दोनों ने मिल कर लूट लिया,’’ फिर वह लिफ्ट से उतर कर चली गई. कुछ दिनों तक वह कालेज नहीं गई.

एक रोज वह कैंटीन में उदास बैठी चाय पी रही थी. दिलशाद उस के पास आ कर बैठ गया. उस ने काफी मिन्नत की, माफी मांगी, ‘‘जो हुआ उसे भूल जाओ.’’

‘‘दिलशाद, तुम दोनों ने मेरे साथ जो किया, शायद उसी की वजह से मेरे बूढ़े बाप पर कहर टूट पड़ा. उन का इंतकाल हो गया. थोड़ी सी जमीन जो उन के पास थी, किसी दूसरे ने उन की बीमारी की हालत में लिखवा कर घर में चोरी करा दी,’’ सईदा मायूसी से बोली.

‘‘यह सब सुन कर मुझे  सदमा पहुंचा,’’ दिलशाद ने कहा.

‘‘अब तो मेरे गांव में भी कुछ नहीं बचा, इसलिए कालेज छोड़ कर इतनी दूर चली जाऊंगी, जहां से फिर यहां लौटना मुश्किल होगा,’’ सईदा मायूसी से बोली.

‘‘मैं पैसों का इंतजाम कर दूंगा. कालेज छोड़ने की जरूरत नहीं होगी,’’ दिलशाद ने दिलासा देते हुए कहा.

‘‘मुझे अब पढ़ना ही नहीं है. पैसों की जरूरत नहीं पड़ेगी. मुझे  इतना गरीब मत समझो कि भीख मांगनी पड़े,’’ सईदा बोली.

‘‘तुम ने तय कर लिया है, तो जोर नहीं दे सकता. केवल यही फरियाद करूंगा कि एक रोज मेरे गरीबखाने पर आखिरी डिनर ले कर ही जाना,’’ वह नाटकीय अंदाज में बोला.

‘‘शायद यह तुम्हारी दूसरी चाल होगी, ताकि तुम मेरे जिस्म से खिलवाड़ कर सको,’’ सईदा ने हिकारत से कहा.

‘‘मैं कान पकड़ कर वादा करता हूं, फिर वैसा नहीं होगा,’’ दिलशाद बोला.

‘‘ठीक है, अगर तुम ने फिर से वही बेहूदा हरकत करनी चाही, तो मैं तुम्हारे फ्लैट की आखिरी मंजिल से कूद पड़ूंगी और तुम्हें हत्या के इलजाम में जेल जाना पड़ेगा,’’ सईदा ने धमकी दी.

‘‘भरोसा रखो, ऐसी नौबत नहीं आएगी. वैसे, कब जा रही हो?’’ दिलशाद ने पूछा.

‘‘2 दिन बाद,’’ सईदा ने कहा.

‘‘तो कल शाम को मेरी दावत कबूल करो,’’ दिलशाद ने गुजारिश की.

‘‘एक शर्त पर. तुम अपने दोस्त दुग्गल ईरानी को भी दावत में बुलाओगे, जिसे मैं उस के अत्याचार करते समय नहीं देख पाई थी. अंधेरे में वह भाग गया था. वह मुझ से माफी मांग लेगा, तो मुझे जातेजाते सुकून मिलेगा.

‘‘किसी तीसरे को मत बुलाना, वरना मेरी चेतावनी याद रखना,’’ सईदा ने धमकी के अंदाज में कहा.

‘‘तुम जैसा चाहती हो, वैसा ही होगा. तुम कल रात 8-9 बजे के बीच आ जाना.’’

‘‘मेरी इज्जत तो लूट ही ली गई, अब किसी का डर नहीं,’’ सईदा ने कहा.

उसी प्रोग्राम के मुताबिक टेबल के एक ओर सईदा बैठी थी और दूसरी ओर दिलशाद और दुग्गल ईरानी बैठे थे. खाना टेबल पर सजा था. दुग्गल ईरानी ने हाथ जोड़ कर माफी मांगी और तीनों खाना खाने लगे.

‘‘तुम दोनों समझते हो कि किसी औरत की इज्जत लूट लेने के बाद माफीनामे से उस की वही रौनक फिर लौट आएगी, पर ऐसा नहीं है. औरत खिलौना नहीं है कि जब चाहा खेला और फेंक दिया.

‘‘मैं भी एक इज्जतदार औरत थी, जिसे तुम लोगों ने मिनटों में धोखा दे कर तबाह कर दिया,’’ हंसते हुए सईदा खाना खाने के साथसाथ कहती जा रही थी.

‘‘तुम लोग औरत को नहीं जानते, वह बड़ी नरम, कमजोर और बुजदिल भी कही जाती है, लेकिन जब वह इंतकाम लेने पर तुल जाती है, तो उस समय उस से खतरनाक और खौफनाक कोई चीज नहीं होती.’’

सईदा ने मुसकराते हुए कहा, ‘‘अब तुम लोगों ने माफी मांग ही ली है, तो बात खत्म हो गई. वैसे, हम लोग इस वक्त 8वीं मंजिल पर आखिरी डिनर ले रहे हैं. तुम लोग अगर मेरे साथ कोई ज्यादती करना चाहोगे, तो मेरी चीखपुकार नीचे तक नहीं पहुंचेगी.’’

‘‘क्या तुम ऐसी उम्मीद करती हो?’’ दिलशाद नाटकीय लहजे में बोला.

‘‘किसी का क्या भरोसा? पिछली बार भी तो भरोसे पर ही यहां मुझे लाया गया था. खैर, छोड़ो उन बातों को. मैं भी तुम लोगों के लिए अपने हाथ से बनाई खीर लाई हूं. इजाजत हो तो दूं. इस में कोई नशा नहीं, जो मुझे कौफी में दिया गया था.’’

सईदा ने 2 डब्बों के ढक्कन खोले. एक डब्बे की खीर उस ने दिलशाद के चेहरे पर फेंकी और दूसरे डब्बे की खीर बिना समय गंवाए दुग्गल ईरानी के चेहरे पर फेंक कर चिल्लाई, ‘‘हैवानो, देख लो तुम लोगों द्वारा बेइज्जत की गई औरत का इंतकाम. तुम दोनों दर्द से चिल्लाते रहोगे, पर कोई यहां तक जल्दी नहीं पहुंच सकेगा.

‘‘जब तक तुम दोनों नीचे पहुंचोगे, तुम्हारी आंखें जवाब दे चुकी होंगी. मुझे  तुम लोग कभी नहीं पा सकोगे.’’

अपनी बात पूरी कर के सईदा ने बाहर निकल कर दरवाजे की सिटकिनी बंद की और चली गई. दोनों डब्बों में खीर के बजाय तेजाब था.

दिलशाद और दुग्गल ईरानी कमरे में चिल्लातेछटपटाते और तड़पते रहे. एक रोज सईदा भी उन दोनों के जोरजुल्म से खूब छटपटाई थी.

दिलशाद और दुग्गल ईरानी से बदला लेने के लिए शायद सईदा के पास केवल यही एक आखिरी साधन बचा था. Revenge story in hindi

Story in Hindi : काई

Story in Hindi. मंजू ने राजन की गहरी आंखों में  झांका और लाज से अपनी आंखें बंद कर लीं. उस ने राजन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया… इस नाजायज रिश्ते का क्या नतीजा रहा?

एक दिन अचानक मौसम ने ऐसी करवट ली कि लोग अपने घरों की ओर भागने लगे. सां झ होतेहोते आसमान से ऐसा  झमा झम पानी गिरा कि चारों तरफ ऊधम मच गया. उसी तेज आंधीतूफान के बीच राजन भीगताकांपता हुआ किसी तरह मंजू के घर के सामने से गुजर ही रहा था, तभी अचानक ‘खट’ से दरवाजा खुला.

दरअसल, बनारस के पास एक छोटा सा कसबा है, वहीं राजन अपनी पत्नी सुनीता के साथ रहता था. राजन दिल का बहुत साफ और सीधा इनसान था. वह बरतनों का व्यापार करता था लेकिन माल लाने और पैसों की अदायगी के चक्कर में उसे अकसर हफ्तों शहर से बाहर गुजारने पड़ते थे.

ठीक उन के पड़ोस में मंजू का घर था. मंजू के पति भी दूर सूरत के कपड़ों की एक फैक्टरी में थे, जो सालभर में बस एक ही बार घर लौट पाते थे.

सुनीता की मां को लकवा मार गया था, जिस से वह भी अपने मायके लखनऊ आतीजाती रहती थी. अब दोनों ही अपनेअपने सूने घरों में अकेलेपन से घुट रहे थे. शुरुआत तो बस आतेजाते छोटीमोटी बातचीत से हुई थी. कभी छत पर कपड़े फैलाते हुए, तो कभी गली के मोड़ पर.

पर धीरेधीरे ये मुलाकातें गहरी होती चली गईं. दोनों के बीच एक ऐसा अनकहा सा रिश्ता जुड़ गया, जो इस दुनिया और समाज के नियमों के हिसाब से बिलकुल गलत था.

उस बरसात की शाम को मंजू ने चौखट पर आ कर घबराते हुए कहा, ‘‘अरे राजनजी, बाहर तो कयामत आ गई है. जल्दी से अंदर आ जाइए, नहीं तो पूरा भीग जाइएगा.’’

राजन ने कुछ सोचा नहीं और तुरंत बरामदे के अंदर आ गया. अपनी भीगी कमीज को  झटकते हुए वह बोला, ‘‘हां मंजूजी, मौसम अचानक ऐसा बिगड़ गया कि संभलने का मौका ही नहीं मिला. सोचा था कि किसी तरह भाग कर घर पहुंच जाएंगे, पर यह पानी तो थमने का नाम ही नहीं ले रहा.’’

थोड़ी देर बाद मंजू रसोई से गरमागरम चाय की 2 प्यालियां ले कर कमरे में आई. बाहर पानी बरस रहा था, पर कमरे के भीतर की खामोशी में एक अजीब सा खिंचाव और बेचैनी तैर रही थी.

मंजू ने चाय का कप आगे बढ़ाया, लेकिन उस की नजरें  झुकी हुई थीं. वह दबी आवाज में बोली, ‘‘राजनजी, यह अकेलापन भी बड़ी जालिम चीज है, इनसान को भीतरभीतर खोखला कर देता है. जब सूने घर में कोई बोलने वाला तक न हो, ता मन एकदम भारी हो जाता है.’’

राजन ने प्याली पकड़ते हुए धीरे से मंजू की कांपती उंगलियों को छू लिया. वह बेहद धीमे से बोला, ‘‘हम तुम्हारी तकलीफ अच्छी तरह सम झ रहे हैं मंजू. हमारा भी हाल कुछ अलग नहीं है. जब मन उदास होता है न, तो बस यही लगता है कि काश कोई ऐसा इनसान पास होता जिस से अपने दिल का सारा दर्द कह पाते.’’

मंजू ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उस की सांसें तेज हो गईं. उस धुंधली शाम, समाज के बनाए कायदेकानून और बदनामी के डर को पीछे छोड़ते हुए दोनों के कदम एकदूसरे की तरफ बढ़ गए.

बाहर सावन की बारिश अब और तेज हो चुकी थी, जैसे बादलों ने सारे बांध तोड़ दिए हों. कमरे के एक कोने में रखी डिबरी की धीमी रोशनी में दोनों एकदूसरे के बेहद पास बैठे थे.

राजन ने आगे बढ़ कर मंजू के चेहरे पर बिखरी भीगी लटों को धीरे से कान के पीछे समेटा और बोला, ‘‘मंजू, आज तुम्हारा यह रूप देख कर सचमुच हमारा जिया बेकाबू हो गया है. ऐसा लगता है जैसे यह सावन सिर्फ हम दोनों को मिलाने के वास्ते ही आया है.’’

मंजू ने शरमा कर अपना चेहरा दूसरी तरफ फेर लिया और धीमी आवाज में फुसफुसाई, ‘‘अरे राजनजी, ऐसा मत बोलिए. हम को बहुत लाज आती है. यह सब ठीक नहीं है, कोई देख लेगा तो सांपछछूंदर वाला हाल हो जाएगा.’’

राजन ने मंजू की ठुड्डी को धीरे से उठा कर अपनी तरफ किया. उस ने मंजू की आंखों में देखा और धीमे स्वर में कहा, ‘‘आज यहां कोई नहीं है मंजू. बस तुम हो, हम हैं और यह सुहाना मौसम है. सच बताओ, क्या तुम्हारे दिल में हमारे लिए कुछ नहीं है?’’

मंजू ने राजन की गहरी आंखों में  झांका और लाज से अपनी आंखें बंद कर लीं. उस ने राजन के कंधे पर अपना सिर टिका दिया और कांपती हुई आवाज में बोली, ‘‘हमारा मन बहुत कमजोर पड़ गया है राजन. जब तुम सामने आते हो न, तो हम अपनेआप को एकदम भूल जाते हैं.’’

राजन ने मंजू को अपनी बांहों में भर लिया. तभी हवा के एक  झोंके से कमरे में जल रही डिबरी की लौ बुझ गई. अंधेरे में दोनों के दिलों की गरमी और करीब आती सांसों ने उस सूनेपन को मिटा दिया था. यह सिलसिला कई हफ्तों तक चलता रहा. दोनों भूल गए कि वे काई की तरह एक ऐसी फिसलन भरी राह पर हैं, जहां से लौटना नामुमकिन है.

एक रात, जब पूरा गांव गहरी नींद में सो रहा था, राजन मंजू के घर पर ही था. तभी अचानक मंजू की सास तीर्थयात्रा से लौट आईं, जिस से दोनों बेखबर थे. वे सीधे मेन दरवाजे की तरफ बढ़ीं. आंगन का भारी सा किवाड़ जोरजोर से खटखटाया गया.

मंजू की सास बाहर से चिल्लाईं, ‘‘अरे मंजू, किवाड़ खोलो बहुरिया. हम लौट आए.’’

सास की आवाज सुनते ही मंजू के चेहरे का रंग उड़ गया. डर के मारे उस के पैर थरथराने लगे. उस ने घबरा कर राजन का हाथ कस कर पकड़ लिया और कांपती आवाज में बोली, ‘‘राजन, अब क्या होगा? माताजी आ गईं. अगर वे तुम को यहां देख लेंगी, तो गजब हो जाएगा.’’

राजन ने अपनी गंभीरता बनाए रखी. उस ने मंजू का हाथ थाम कर हिम्मत बंधाई और बोला, ‘‘डरो मत मंजू. अब छिपनेछिपाने से कुछ नहीं होगा. आज नहीं तो कल, इस बात को सब के सामने आना ही था. किवाड़ खोलो, जो होगा हम देख लेंगे.’’

मंजू ने कांपते हाथों से सांकल खोली. सामने लालटेन लिए खड़ी उस की सास की नजर सीधे कमरे के भीतर खड़े राजन पर पड़ी.  झटके में सास के हाथ से लालटेन छूट कर जमीन पर गिर गई. तेल बिखर गया और गांव की उस खामोशी में एक नया तूफान खड़ा हो गया.

सास के सामने यह राज खुलने के बाद बात आग की तरह राजन की पत्नी सुनीता तक पहुंच गई.

सुनीता आपा खो बैठी और सीधे मंजू के घर आ धमकी, जहां राजन और मंजू दोनों मौजूद थे.

सुनीता रोते हुए गुस्से में चिल्लाई, ‘‘अरे राजन, यह क्या सुन रहे हैं हम? तुम हमारी पीठ पीछे यह पाप कर रहे थे? और तुम मंजू, तुम को तनिक भी लाजशरम नहीं आई?’’

राजन ने अपने अंदर छिपे डर को दबाया और बड़ी बेरुखी से बोला, ‘‘सुनीता, चिल्लाओ मत. जो सच है, वह तुम्हारे सामने है. अब हम मंजू के बिना नहीं रह सकते.’’

सुनीता ने अपने आंसू पोंछे और गुस्से में तमतमाते हुए बोली, ‘‘ऐसा कैसे नहीं रहोगे? हम यह गांव और समाज हिला के रख देंगे. कोर्टकचहरी जाएंगे, लेकिन तुम दोनों को जेल भिजवा के ही दम लेंगे,’’ इतना कह कर सुनीता पैर पटकती हुई अपने घर की तरफ चली गई.

सुनीता का यह रौद्र रूप देख कर राजन और मंजू के होश उड़ गए. बंद आंखों से भी उन्हें अपना आने वाला कल अब जेल की काल कोठरी में नजर आने लगा था.

मंजू ने थरथराते हुए राजन का हाथ पकड़ा और घबरा कर बोली, ‘‘राजन, अगर सुनीता पुलिस या पंचायत में गई, तो समाज हम दोनों को जीने लायक नहीं छोड़ेगी. इस तरह बदनाम हो कर घुटघुट के मरने से तो अच्छा है कि…’’

राजन की आंखों में एक अजीब सी हैवानियत उतर आई. उस ने बेहद धीमी और ठंडी आवाज में कहा, ‘‘क्यो न उसी को रास्ते से हटा दिया जाए? तुम ठीक कह रही हो मंजू. अब पानी सिर से ऊपर बह चुका है. उस को हमेशा के लिए चुप कराना ही पड़ेगा.’’

इस के बाद उन दोनों ने मिल कर एक खौफनाक साजिश रच डाली.

गांव की सरहद के पास एक पुराना, गहरा और सूखा कुआं था. अगली रात, राजन ने सुनीता के सामने माफी मांगने का ढोंग रचाया और उसे बहलाफुसला कर रात के सन्नाटे में गांव के बाहर मिलने के लिए मना लिया.

सुनीता सीधे दिल की थी, सो उस की बातों में आ कर वहां पहुंच गई. वहां चारों तरफ सन्नाटा देख कर सुनीता बोली, ‘‘राजन, तुम इस सूनी जगह पर क्यों बुलाए हो? चलो, अब घर चलें.’’

राजन अंधेरे के साए से बाहर निकला और पथराई आवाज में बोला, ‘‘घर अब तुम कभी नहीं जाओगी सुनीता.’’

इस से पहले कि सुनीता कुछ सम झ पाती या शोर मचाती, राजन और मंजू ने चीते की तरह  झपट कर उसे दबोच लिया.

सुनीता ने खुद को छुड़ाने की बहुत कोशिश की, हाथपैर मारे, लेकिन मंजू ने उस का मुंह कपड़े से कस कर दबा दिया था. दोनों ने मिल कर पूरी ताकत लगाई और सुनीता को उस गहरे सूखे कुएं में धकेल दिया.

उस स्याह अंधेरे कुएं से एक आखिरी चीख गूंजी… और फिर सबकुछ हमेशाहमेशा के लिए शांत हो गया.

सुनीता को रास्ते से हटाए एक हफ्ता बीत चुका था. पूरे गांव को यही लग रहा था कि सुनीता गुस्से में अपने मायके चली गई है, लेकिन राजन और मंजू के भीतर एक खौफनाक नरक की शुरुआत हो चुकी थी. जिस आलिंगन में कभी उन्हें सुकून मिलता था, अब वहां सिर्फ एकदूसरे के प्रति अविश्वास और घोर अपराधबोध की ‘काई’ जम चुकी थी.

राजन चौबीसों घंटे इसी बात से घबराता रहता कि कहीं मंजू कमजोर पड़ कर पुलिस के सामने सारा सच न उगल दे. उधर मंजू के मन में भी यह बात घर कर गई थी कि राजन खुद की चमड़ी बचाने के लिए उसे भी रास्ते से हटा सकता है.

इसी अविश्वास और खौफ के साए में, राजन ने मंजू को भी ठिकाने लगाने की एक खतरनाक साजिश रच डाली. वह बाजार से चूहों को मारने वाला एक बेहद तेज जहर खरीद लाया.

रात के सन्नाटे में जब राजन मंजू के घर पहुंचा, तो उस के चेहरे पर एक बनावटी और  झूठी मुसकान थी. वह बोला, ‘‘मंजू, हम लोग को आपस में लड़ना झगड़ना नहीं है. हम तुम्हारे साथ यहां से शहर भागने का पूरा इंतजाम कर लिए हैं. तुम बैठो, हम तुम्हारे लिए रसोई में चाय बना रहे हैं.’’

राजन रसोई में गया और छिप कर मंजू के प्याली में वह तेज जहर मिला दिया. जब वह बाहर आया, मजाक तो उस की धड़कनें तेज थीं. राजन ने प्याली मंजू की तरफ बढ़ाते हुए उतावली आवाज में कहा, ‘‘लो मंजू, गरमगरम चाय पी लो. सारी थकान एकदम गायब हो जाएगी.’’

मंजू ने चाय की प्याली को हाथ में लिया. उस ने पहले प्याली को देखा, फिर अपनी पैनी नजरों से राजन के चेहरे को पढ़ा. उस ने चाय को चुपचाप नीचे रख दिया और उस की आंखों में साफसाफ नफरत तैरने लगी.

मंजू अचानक ठहाका मार कर हंसी और बेहद तीखे लहजे में बोली, ‘‘क्या  राजन बाबू, तुम हम को बेवकूफ समझ रखे हो क्या? हम तुम्हारी नसनस से वाकिफ हैं. तुम्हारा यह कांपता हुआ हाथ और यह  झूठी ममता… हम को सब समझ में आ रहा है. तुम जिसे जहर देने आए न हो, वह पहले ही तुम्हारी खातिर तगड़ा इंतजाम कर चुकी है.’’

राजन का खून जम गया. वह हक्काबक्का हो कर हकलाने लगा, ‘‘क्या मतलब है तुम्हारा?’’

मंजू दो कदम पीछे हटी और तंज कसते हुए बोली, ‘‘मतलब यह कि जब तुम रसोई में चाय में जहर मिला रहे थे, हम यहां खिड़की से दारोगाजी को पहले ही इशारा कर दिए थे. वे लोग बाहर तुम्हारा ही इंतजार कर रहे हैं.’’

मंजू के मुंह से यह सुनते ही राजन के पैरों तले की जमीन खिसक गई. ठीक उसी पल, मेन दरवाजा एक  झटके में भरभरा कर टूट गया और पुलिस के भारी जूतों की आवाज से पूरा आंगन गूंज उठा.

लालटेन की पीली रोशनी में दारोगा और सिपाही चमचमाती हथकडि़यां लिए सामने खड़े थे.

राजन ने भागने के लिए पैर बढ़ाए, पर पुलिस ने उसे चारों तरफ से दबोच लिया.

मंजू भी सुबकते हुए घुटनों के बल जमीन पर बैठ गई. वह अच्छी तरह जानती थी कि राजन के साथसाथ जेल की वे काली सलाखें अब उस का भी इंतजार कर रही हैं.

एक नाजायज और फिसलन भरे रिश्ते की काई ने आखिरकार दोनों की जिंदगी को हमेशाहमेशा के लिए गहरे अंधकार में धकेल दिया था.  Story in Hindi

–राजेश प्रसाद

Comedy Story in Hindi : जागो ठेकेदार लगी है कतार

Comedy Story in Hindi. शनिवार की एक रात. रेलवे प्लेटफार्म पर गहमागहमी का माहौल. सैकड़ों लोग ट्रेनों से उतर रहे थे या फिर ट्रेन पकड़ने का इंतजार कर रहे थे. पर एक जगह नजारा कुछ और ही था. वहां लोग कतार लगाए खड़े थे. यह उन के लिए शनि की साढ़ेसाती का प्रकोप था या और कुछ, पता नहीं.

जिस काम के लिए वे सब कतार में खड़े थे, वह ऐसा कुदरती काम है जिसे नित्यक्रिया कहते हैं. मतलब, वे मुंबई सैंट्रल टर्मिनल पर बने एक शौचालय के बाहर खड़े थे.

वैसे, ‘आप कतार में हैं’ की आवाज तभी अच्छी लगती है जब आप सामान्य हालात में होते हैं या फिर कोई मीठी आवाज की औरत ऐसा बोलती है. शौचालय की कतार में खड़े हो कर किसी को यह सुनना अच्छा नहीं लगेगा.

हुआ यों कि शौचालय के मुलाजिम और ठेकेदार रेलवे की चादरें ‘चादर बिछाओ बलमा…’ गीत गाते हुए रेलवे के कंबल ओढ़ कर निद्रा देवी के आगोश में चले गए. इधर शौच के लिए जाने वाले लोग कतार में लगे अपने आगे के लोगों को गिनते रहे और अंकगणित के सवाल हल करते रहे कि अगर एक आदमी को शौच करने में तकरीबन 5 मिनट लगते हैं तो उन के आगे खड़े 7 लोगों को कितना समय लगेगा और उन के लिए वह सुनहरा वक्त कब आएगा जब वे खुद को एक बहुत बड़े तनाव से मुक्त कर सकेंगे.

वे बारबार अपनी जेब में रखा 2 का सिक्का छू कर तसल्ली कर रहे थे कि ऐन वक्त पर छुट्टे न होने के चलते उन्हें फिर से कतार में न लगना पड़े.

चाहे सदी के महानायक कहते रहें कि ‘अब इंडिया शौच करेगा तो दरवाजा बंद कर के’, पर शौचालय के अंदर जा कर कोई दरवाजा बंद कर के ही सो जाए तो इंडिया शौच कैसे करेगा? हांय? ऐसे में तो शौचालय तो शयनालय यानी सोने की जगह बन जाएगा.

बेचारे शौच के मारे मुसाफिरों का ‘तेरे द्वार खड़ा इक जोगी…’ गातेगाते गला बैठ गया. सिक्के को दबातेदबाते हाथ में छाले पड़ गए, पर दरवाजा अली बाबा के खजाने के दरवाजे की तरह खुलने का नाम ही नहीं ले रहा था.

उस दरवाजे को खोलने का ‘खुल जा सिमसिम’ टाइप कोडवर्ड क्या था, किसी को नहीं पता था. रेलवे के अफसरों से शिकायत करने पर शौच जाने वालों को कभी इस अफसर के पास तो कभी उस अफसर के पास भेजा जाता रहा.

अब सोचिए कि उन भुक्तभोगियों की क्या हालत हो रही होगी. ऐसे विकट हालात में 2-4 कदम चलना भी मुश्किल होता है और उन बेचारों को दरदर की ठोकरें खानी पड़ रही थीं.

अब भैया, कुछ इमर्जैंसी वाले काम ऐसे होते हैं जिन की जरूरत कभी भी पड़ सकती है और हलका होना भी उन में से एक है.

कहा भी गया है कि ग्राहक, मौत और शौच कभी भी आ सकता है. वैसे कहा सिर्फ ग्राहक और मौत के लिए गया है, पर अभी भी देश में विकास पर बहुत ज्यादा ध्यान दिया जा रहा है, इसलिए शौच को मौत के साथ जोड़ कर कहावत का विकास किया गया है.

जब गाड़ी 24 घंटे चलाते हो, मुसाफिर 24 घंटे रेलवे स्टेशन पर आजा सकते हैं, तो शौचालय को कैसे बंद कर सकते हो?

यह कहां का नियम है कि रात के 12 बजे से सुबह के 5 बजे तक शौच नहीं कर सकते? अब लगता है कि शौच घोटाला भी कुछ दिनों में सामने आएगा. शौचालय के ठेकेदार लोग, आप अपनी रोजीरोटी पर खुद क्यों रोक लगा रहे हो?

जिस तरह ‘पैसे लो जूते दो’ की रट दुलहन के देवर लगाते हैं, उसी तरह एक शौच जाने वाले की यही गुजारिश है, ‘वाईफाई ले लो, पर शौचालय दे दो…’  Comedy Story in Hindi

Emotional Story in Hindi : भरोसा

शहर के उस हिस्से को नगरनिगम के नक्शे में शायद कोई नाम दिया गया था, लेकिन लोग उसे  झुग्गी बस्ती कहते थे. नामों की भी अपनी एक हैसियत होती है. कुछ नाम सुनते ही आदमी के सामने मकान, सड़क और बिजली के खंभे आ जाते हैं और कुछ नाम सुनते ही टिन, तिरपाल, कीचड़ और नालियां.

उसी बस्ती में सोनू रहता था. 11 साल का सोनू 5वीं क्लास में पढ़ता था. उस के पिता रामदीन पास की एक दुकान पर मजदूरी करते थे और मां सुशीला आसपास के घरों में बरतन मांजती थी. परिवार में सोनू के अलावा 8 साल की गुडि़या और 5 साल का मुन्ना थे.

घर इतना छोटा था कि उस में गरीबी को भी पैर सिकोड़ कर बैठना पड़ता था. बरसात में छत टपकती, गरमी में टिन तपता और सर्दी में हवा दीवारों के छेद गिनती हुई भीतर चली आती.

लेकिन सोनू के पास एक चीज थी, उस की किताब. वह किताब को ऐसे संभाल कर रखता जैसे कोई अमीर आदमी अपनी तिजोरी की चाबी रखता है.

बस्ती से कुछ दूर एक संस्था ने बच्चों के लिए मुफ्त पाठशाला खोल रखी थी. वहां न फीस थी, न यूनिफौर्म का झंझट, न जूतेमोजे का हिसाब. जिस के पास कौपी नहीं, उसे कौपी. जिस के पास पैंसिल नहीं, उसे पैंसिल.

सोनू रोज वहां जाता था. मैडम उस के अनुशासन के लिए उसे बहुत सराहती रहती थीं. वे पूछतीं, ‘‘सोनू, बताओ, बड़े हो कर क्या बनोगे?’’ ‘‘टीचर बनूंगा.’’

‘‘क्यों?’’ वे पूछतीं. ‘‘मैडम क्योंकि ऐसा बनने के लिए किसी की जातपांत नहीं पूछी जाती, उस की जेब नहीं देखी जाती.’’

50 साल की उषा मैडम टकटकी लगा कर उस बालक की ओर हैरानी से  देखती ही रह जातीं.

सोनू ने यह बात किस किताब से सीखी थी, यह उन्हें मालूम नहीं था. शायद जिंदगी सब से बड़ी किताब होती है और सब से महंगी भी.

पिछले महीने बस्ती पर बारिश ने ऐसी मार मारी थी कि गरीबों के घरों में पानी घुस आया था. जिन के घर पक्के थे, उन्होंने दरवाजे बंद कर लिए. जिन के घर प्लास्टिक और टिन के थे, वे अपने बच्चों को गोद में उठा कर पानी का रास्ता देखते रहे.

सुशीला का काम बंद हो गया था. रामदीन की दुकान भी कई दिनों तक बंद रही. घर में राशन कम था.

सोनू ने पहली बार सम झा कि भूख का भी कोई चेहरा होता है. छुटका भाई रात को पूछता, ‘‘भैया, कल हम को रोटी मिलेगी?’’

सोनू कहता, ‘‘क्यों नहीं मिलेगी… कल तो हलवा भी मिलेगा.’’

सोनू जानता था कि हलवा तो दूर, रोटी का भरोसा भी नहीं था, फिर भी छुटके के सामने उम्मीद बांधना जरूरी था.

एक दिन बहन गुडि़या ने पूछा, ‘‘भैया, तुम  झूठ बोलते हो?’’ सोनू हंसा, ‘‘नहीं.’’

‘‘फिर हलवा कहां है?’’

सोनू चुप हो गया. बाहर बारिश हो रही थी. उस ने खिड़की के नाम पर टंगे बोरे को देखा और बोला, ‘‘हलवा अभी रास्ते में है.’’

यह सुन कर गुडि़या भी खिलखिला कर हंस दी.

गरीबी में बच्चों की हंसी भी बड़ी चीज होती है. लेकिन उस महीने सोनू ने एक और चीज देखी थी. पिता जब सुबह 8 बजे दुकान पर जाते और पौने 12 बजे खाना खाने घर आते, तो घर का वातावरण बदल जाता.

दुकान का तनाव, कम मजदूरी, मालिक की डांट और जिंदगी की खी झ… सब मिल कर पिता के भीतर बारूद बन जाते.

और घर आते ही उस की चिनगारी मां पर गिरती, ‘‘पागल औरत दिनभर करती क्या हो? बच्चों के लिए कुछ बचा भी है? तुम्हारी वजह से घर की हालत ऐसी है.’’

सुशीला चुप रहती. गरीब औरतों के पास कई बार जवाब होते हैं, मगर जवाब देने की कीमत बहुत महंगी होती है.

सोनू सब देखता था. वह अपनी मां की तरफ देखता और फिर सिर  झुका लेता.

एक दिन उस ने देखा कि मां के हाथ कांप रहे थे.

‘‘मां, क्या हुआ?’’ ‘‘कुछ नहीं बेटा.’’

‘‘आप रोई थीं?’’ ‘‘नहीं…’’

‘‘आंखें लाल क्यों हैं?’’ मां ने उस के सिर पर हाथ रख दिया, ‘‘तू पढ़ाई कर.’’

सोनू सम झ गया.

मां ने फिर वही पुराना इलाज किया था. दुख को बेटे के सिर पर हाथ फेर कर छिपा देना.

अगले हफ्ते पाठशाला में हिंदी की कविता पढ़ाई जा रही थी. मैडम कविता सुना रही थीं और मतलब बता रही थीं, ‘‘बच्चो, कविता हमें बताती है कि मुश्किल समय में भी उम्मीद नहीं छोड़नी चाहिए…’’

तभी पीछे से सीट खिसकने की आवाज आई. सोनू उठ कर धीरेधीरे मैडम के पास आया.

‘‘क्या हुआ?’’ ‘‘मैडम…’’

‘‘हां बेटा?’’ ‘‘आप मेरे साथ औफिस में चलिए.’’

‘‘क्यों?’’ ‘‘मु झे घर पर फोन करना है.’’

मैडम मुसकराईं, ‘‘आज ही तो बहुत दिन बारिश के बाद स्कूल खुले हैं. आज ही घर की याद आ गई?’’

सोनू ने सिर  झुका लिया, ‘‘जी मैडम… मु झे मां का हाल पूछना है.’’ मैडम का चेहरा बदल गया, ‘‘मां को क्या हुआ?’’

‘‘पता नहीं.’’ ‘‘तो फोन क्यों?’’

सोनू ने धीमे स्वर में कहा, ‘‘क्योंकि बाबा घर आए होंगे.’’ ‘‘तो?’’

‘‘जब वे घर आते हैं न… मां पर गुस्सा करते हैं.’’ मैडम चुप हो गईं.

सोनू ने कहा, ‘‘गाली भी देते हैं… ताने भी… कभीकभी बहुत जोर से बोलते हैं.’’

‘‘तुम ने मु झे पहले क्यों नहीं बताया?’’ सोनू ने मासूमियत से कहा, ‘‘घर की बात स्कूल में थोड़े ही बताते हैं मैडम.’’

मैडम के पास इस बात का कोई जवाब नहीं था.

बड़ेबड़े समाजशास्त्री घरेलू हिंसा पर किताबें लिखते हैं. सरकारें योजनाएं बनाती हैं. भाषण होते हैं. पोस्टर छपते हैं, लेकिन एक 11 साल का बच्चा 2 वाक्यों में उस पूरे समाज का सच कह गया था, ‘‘घर की बात स्कूल में थोड़े ही बताते हैं.’’

मैडम ने फोन मिलाया. घंटी गई. सोनू की उंगलियां कांप रही थीं.

फोन उठा, ‘‘हैलो?’’ ‘‘मां…’’

उधर कुछ क्षण चुप्पी रही. ‘‘हां, बेटा.’’

‘‘आप ठीक हो?’’ ‘‘हां…’’

‘‘बाबा आए थे?’’ फिर चुप्पी.

हां बेटा.’’ ‘‘कुछ कहा?’’

मां ने जवाब नहीं दिया. सोनू सम झ गया.

उस ने भरे गले से कहा, ‘‘मां, मैं सीधा घर आ जाऊंगा… ठीक है न प्यारी मां…’’ इतना ही कह कर सोनू ने फोन काट दिया. उस की आंखों में समंदर था.

मैडम ने उसे वापस क्लास में बुला लिया.

मैडम जानती थी कि उस के आंसू केवल मां के लिए नहीं थे. वह उस घर के लिए थे जहां रोटी कम थी और डर ज्यादा. उस बचपन के लिए डर था जिस में खिलौनों की जगह जिम्मेदारियां थीं.

और उस समाज के लिए था जहां एक बच्चा स्कूल में कविता पढ़तेपढ़ते अचानक अपनी मां की हिफाजत के लिए फोन कर के उन की आवाज सुनना चाहे.

मैडम काफी अनुभवी थीं. उन्होंने एक संस्था के संचालकों से बात की.

सुशीला को फिर काम दिलाने की कोशिश हुई. राशन का इंतजाम हुआ. बच्चों की पढ़ाई नियमित हुई, लेकिन सब से बड़ी जरूरत थी सोनू को यह सम झाना कि वह अकेला नहीं है.

एक दिन मैडम ने उस से कहा, ‘‘बेटा, तुम्हें अपनी मां की चिंता करनी चाहिए, लेकिन तुम्हें अपने सुनहरे भविष्य की भी चिंता करनी चाहिए.’’

सोनू ने पूछा, ‘‘जी, वह कहां मिलता है मैडम?’’

मैडम चुप रह गईं. इस सवाल का जवाब किसी स्कूली किताब में नहीं था.

सोनू ने फिर पूछा, ‘‘क्या गरीब बच्चों का भविष्य भी होता है?’’

मैडम की आंखें भर आईं. उन्होंने कहा, ‘‘होना चाहिए.’’

सोनू की आंखों में सवाल उभरा, ‘‘तो फिर सुनहरा भविष्य हमें मिलता क्यों नहीं?’’

इस बार मैडम के पास कोई जवाब नहीं था.

अगले दिन हिंदी की क्लास में मैडम ने बच्चों से पूछा, ‘‘बताओ, सब से प्यारी आवाज कौन सी होती है?’’

सब ने अपनी रुचि से जवाब दिया, जैसे ‘कोयल’, ‘चिडि़या’, ‘छुट्टी की घंटी’, ‘शंख’, ‘बांसुरी’ आदिआदि.

मैडम ने सोनू की ओर देखा, ‘‘तुम बताओ?’’ सोनू चट से बोला, ‘‘मां की.’’

‘‘क्यों?’’ सोनू ने कहा, ‘‘क्योंकि जब घर में डर हो न मैडम, तब मां की आवाज सुन कर पता चलता है कि वे अभी हमारे साथ हैं.’’

कक्षा में सन्नाटा छा गया. मैडम ने उस की ओर देखा. सोनू फिर अपनी किताब में  झुक गया.

बाहर  झुग्गियों की ओर धुआं उठ रहा था. कहीं चूल्हा जल रहा था, कहीं रोटी सिंक रही थी और कहीं शायद आज भी कोई बच्चा भूख को बहला कर सो रहा था.

लेकिन उस दिन सोनू की आंखों में एक नया सपना था. वह टीचर ही बनना चाहता था, सिर्फ इसलिए नहीं कि उसे नौकरी चाहिए थी, बल्कि वह चाहता था कि उस की तरह कोई बच्चा कभी यह न पूछे, ‘‘क्या गरीब बच्चों का भी बचपन होता है?’’

सोनू चाहता था कि उस की मां जैसी औरतें डर कर चुप न रहें. वह चाहता था कि घर का मतलब केवल चारदीवारी न हो, सुरक्षा भी हो और  इसीलिए उस ने अपनी किताब खोली.

कविता की पहली लाइन पढ़ी, ‘‘चांदसितारों तक जाना है…’’

सोनू की आवाज में अब डर नहीं था. वह आवाज धीरेधीरे पूरी क्लास में फैल रही थी.

शायद कविता पहली बार किसी बच्चे की किताब से निकल कर उस की जिंदगी में उतर रही थी. और शायद यही पढ़ाईलिखाई का असली मतलब था. अभाव में भी आदमी को इतना मजबूत बना देना कि वह अपने हिस्से की रोशनी पहचान सके. Emotional Story in Hindi

–पूनम पांडे

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