एक टीचर अपने ही स्टूडेंट से लड़ाने लगी इश्क, उजाड़ी अपनी शादीशुदा जिंदगी

दोपहर 3 बजे के करीब दिल्ली पुलिस के कंट्रोल रूम को सुब्रतो पार्क स्थित एयरफोर्स मैडिकल सेंटर से सूचना दी गई कि एक सैनिक की मौत हो गई है, इसलिए थाना पुलिस भेजी जाए. यह मैडिकल सेंटर दक्षिणपश्चिमी दिल्ली के थाना कैंट के अंतर्गत आता है, इसलिए पुलिस कंट्रोल रूम ने तत्काल यह जानकारी थाना कैंट को वायरलेस द्वारा दे दी. यह 10 अप्रैल, 2014 की बात है.

चूंकि उस दिन दिल्ली में लोकसभा चुनाव का मतदान चल रहा था. इसलिए दिल्ली पुलिस के ज्यादातर पुलिसकर्मी चुनाव ड्यूटी पर थे. पुलिस चौकी सुब्रतो पार्क के चौकीप्रभारी के.बी. झा की भी ड्यूटी क्षेत्र के पोलिंग बूथ पर लगी थी.

पुलिस कंट्रोल रूम द्वारा वायरलेस से जो संदेश प्रसारित किया गया था, उसे उन्होंने सुन लिया था. इस के अलावा थानाप्रभारी ने भी उन्हें वहां जाने का निर्देश दिया था. इसलिए चौकीप्रभारी के.बी. झा एयरफोर्स मैडिकल सेंटर की ओर रवाना हो गए. दूसरी ओर सूचना मिलने पर थाना कैंट से भी एएसआई देवेंद्र कांस्टेबल सचिन के साथ एयरफोर्स अस्पताल के लिए चल पड़े थे.

पुलिस के अस्पताल पहुंचने तक डाक्टरों ने लाश को सफेद कपड़े में बंधवा दिया था. चौकीप्रभारी ने जब वहां के डाक्टरों से मृतक और उस की लाश के बारे में पूछा तो उन्होंने सफेद कपड़ों में बंधी उस लाश को दिखाते हुए बताया कि यही एयरफोर्स के सार्जेंट रमेशचंद्र की लाश है.

चौकीप्रभारी के.बी. झा ने पूछा कि रमेशचंद्र की मौत कैसे हुई तो डाक्टर ने बताया कि करीब एक घंटे पहले इन्हें इन की पत्नी सुधा एंबुलेंस से ले कर आई थीं. अस्पताल आने पर सुधा ने बताया था कि इन्हें हार्टअटैक आया था, लेकिन जब इन की जांच की गई तो पता चला कि इन की मौत हो चुकी है.

मृतक रमेशचंद्र की पत्नी सुधा गुप्ता वहीं थी. चौकीप्रभारी के.बी. झा ने पूछा कि यह सब कैसे हुआ तो उस ने कहा, ‘‘सर, यह शराब के आदी थे. कल रात यानी 9 अप्रैल की रात 10 बजे के करीब जब यह घर आए तो काफी नशे में थे. यह इन की रोजाना की  आदत थी, इसलिए मैं कुछ नहीं बोली. खाना खाने के बाद जब यह सोने के लिए लेटे तो कहा कि सीने में दर्द हो रहा है. मैं ने सोचा कि दर्द गैस की वजह से हो रहा होगा, क्योंकि इन्हें गैस की शिकायत थी.

‘‘मैं ने इन्हें पानी पिलाया और वहीं पास में बैठ गई. काफी देर तक इन्हें हलकाहलका दर्द होता रहा. उस के बाद यह सो गए तो मैं ने सोचा कि शायद इन्हें आराम हो गया है. फिर मैं भी इन्हीं के बगल में सो गई.

‘‘सुबह 9 बजे जब यह सो कर उठे तो मैं ने इन से तबीयत के बारे में पूछा. इन्होंने बताया कि अब ठीक है. नहाधो कर इन्होंने नाश्ता किया और वोट डालने की तैयारी करने लगे. यह तैयार हो कर घर से निकलने लगे तो इन्हें चक्कर आ गया. उस समय मैं किचन में थी. दौड़ कर मैं ने इन्हें संभाला और इन्हें ले जा कर बैड पर लिटा दिया.

‘‘एक बजे के करीब इन के सीने में फिर से दर्द उठा और वह दर्द भी वैसा ही था, जैसा रात में हो रहा था. मैं ने इन्हें पानी पिलाया. लेकिन इस बार दर्द कम होने का नाम नहीं ले रहा था. उस समय क्वार्टर में मैं अकेली थी. मेरी समझ में नहीं आ रहा था कि क्या करूं? मैं कुछ करती, दर्द अचानक काफी तेज हो गया, फिर यह बेहोश हो गए.

‘‘मैं ने इन्हें हिलायाडुलाया, लेकिन इन का शरीर एकदम ढीला पड़ चुका था. इन के चेहरे पर पानी के छींटे मार कर होश में लाने की कोशिश की, लेकिन इन्हें होश नहीं आया. मैं घबरा गई, भाग कर पड़ोस में रहने वाले एयरफोर्स औफिसर एम.पी. यादव के यहां पहुंची. उन्हें पूरी बात बता कर मैं ने इन्हें अस्पताल ले चलने के लिए कहा. उन्होंने फोन कर के एयरफोर्स की एंबुलैंस बुलवाई और इन्हें यहां लाया गया. यहां आने पर डाक्टरों ने बताया कि इन की मौत हो चुकी है.’’

सुधा गुप्ता से बातचीत करते हुए चौकीप्रभारी के.बी. झा ने देखा कि इस स्थिति में जहां महिलाओं का रोरो कर बुरा हाल होता है और वे किसी से बात करने की स्थिति में नहीं होती हैं, वहीं इस के चेहरे पर लेशमात्र का भी दुख नजर नहीं आ रहा. वह बातचीत भी इस तरह से कर रही है, जैसे सब कुछ सामान्य हो. चूंकि उस समय उस के पति की लाश अस्पताल में रखी थी, इसलिए उन्होंने उस से ज्यादा पूछताछ करना ठीक नहीं समझा.

रमेशचंद्र की लाश सफेद कपड़े में लिपटी थी, इसलिए चौकीप्रभारी लाश को भी नहीं देख सके थे. उन्हें यह मामला संदिग्ध लग रहा था, इसलिए उन्होंने सारी जानकारी थानाप्रभारी सुरेश कुमार को दी तो वह भी अस्पताल पहुंच गए. उन्होंने भी सुधा गुप्ता और अस्पताल  के डाक्टरों से बात की. इस के बाद उन्होंने लाश को पोस्टमार्टम के लिए सफदरजंग अस्पताल भिजवा दिया.

सूचना पा कर सार्जेंट रमेशचंद्र के घर वाले भी इलाहाबाद से सफदरजंग अस्पताल पहुंच गए थे. पुलिस ने उन से भी पूछताछ की थी. लेकिन उन से कोई खास जानकारी नहीं मिली. पोस्टमामर्टम के बाद पुलिस ने लाश मृतक के भाई सुरेश शाहू को सौंप दी.

सुधा से बातचीत के बाद थानाप्रभारी को भी शक हो गया था, इसलिए उन्होंने चौकीप्रभारी के.बी. झा को एयरफोर्स कालोनी में जा कर गुप्त रूप से मामले की छानबीन करने को कहा था.

चौकीप्रभारी के.बी झा ने एयरफोर्स कालोनी जा कर अपने ढंग से सार्जेंट रमेशचंद्र की मौत के बारे में पता करना शुरू किया. इसी पता करने में उन्हें एयरफोर्स के एक अधिकारी ने बताया कि पूरी कालोनी में इस बात की चरचा है कि मृतक रमेशचंद्र की पत्नी सुधा गुप्ता का पड़ोस में ही रहने वाले 17 वर्षीय अमित से प्रेमसंबंध है. यह बात कहां तक सच है, वह कुछ कह नहीं सकते.

कालोनी में रहने वाले एयरफोर्स कर्मचारियों की पत्नियों ने अपना एक एसोसिएशन बना रखा था. उस एसोसिएशन में सुधा गुप्ता भी थी. चौकीप्रभारी सार्जेंट की मौत के बारे में पता करने के लिए जब एसोसिएशन की महिलाओं के पास पहुंचे तो उन्होंने सार्जेंट की मौत पर अपना संदेह जाहिर करते हुए उन से सुधा गुप्ता के आचरण के बारे में पूछा तो संयोग से वहां मौजूद सुधा गुप्ता बोल पड़ी, ‘‘सर, मेरे ही पति की मौत हुई है और आप मेरे ही ऊपर इस तरह का आरोप लगा कर मुझे बदनाम कर रहे हैं. यह अच्छी बात नहीं है.’’

‘‘मैडम, हमारी आप से कोई दुश्मनी नहीं है कि हम आप को बदनाम करेंगे. जिस तरह की बातें हमें सुनने को मिल रही हैं, हम उसी के आधार पर यह बात कर रहे हैं. बहरहाल पोस्टमार्टम की रिपोर्ट मिल जाए, उस के बाद हम आप से बात करेंगे.’’ चौकीप्रभारी ने कहा.

चौकीप्रभारी ने कालोनी में रहने वाले कुछ एयरफोर्स के अधिकारियों से सुधा गुप्ता और अमित पर नजर रखने को कहा था. उन्हें डर था कि कहीं दोनों भाग न जाएं.

4 मई, 2014 को सार्जेंट रमेशचंद्र की पोस्टमार्टम रिपोर्ट पुलिस को मिली. रिपोर्ट पढ़ कर पुलिस हैरान रह गई. सुधा गुप्ता ने बताया था कि उस के पति की मौत हार्टअटैक से हुई थी, जबकि पोस्टमार्टम के अनुसार उस की मौत गला दबाने से हुई थी. इस रिपोर्ट से पुलिस को समझते देर नहीं लगी कि यह सब सुधा और अमित ने ही साजिश रच कर किया होगा.

आगे की काररवाई करने से पहले चौकीप्रभारी ने सफदरजंग अस्पताल के उन डाक्टरों से बात की, जिन्होंने सार्जेंट रमेशचंद्र की लाश का पोस्टमार्टम किया था. डाक्टरों ने बताया था कि उस की मौत सांस की नली दबाने यानी गला घोंटने से हुई थी, उन्होंने यह भी बताया था कि उस की गले की हड्डी में फै्रक्चर भी था. ऐसा गला दबाने पर ही हुआ होगा.

डाक्टरों ने पुलिस को यह भी बताया था कि रमेशचंद्र की जेब से एक परची मिली थी, जो उन्होंने एयरपोर्ट अथौरिटी को पहली अप्रैल को लिखी थी. उस में लिखा था, ‘मेरा कुछ दिनों से पारिवारिक क्लेश चल रहा है. मुझे नहीं पता कि मैं कितने दिन और रहूंगा. अगर मेरे साथ कुछ हो जाता है तो मेरी संपत्ति का आधा हिस्सा गरीबों में बांट दिया जाए, बाकी मेरी बेटी के लालनपालन पर खर्च किया जाए.’

पोस्टमार्टम रिपोर्ट और डाक्टरों की बातचीत से साफ हो गया था कि रमेशचंद्र की मौत हार्टअटैक से नहीं, गला दबाने से हुई थी. यानी उस की हत्या की गई थी.

पोस्टमार्टम रिपोर्ट और उस परची के बारे में पुलिस उपायुक्त को भी अवगत कराया गया. उन के निर्देश पर 6 मई, 2014 को थाना दिल्ली कैंट में सार्जेंट रमेशचंद्र गुप्ता की हत्या का मामला दर्ज कर लिया गया.

इस के बाद इस मामले को सुलझाने के लिए डीसीपी सुमन गोयल ने एक पुलिस टीम बनाई, जिस में थानाप्रभारी सुरेश कुमार वर्मा, सुब्रतो पार्क चौकी के प्रभारी के.बी. झा, एसआई रामप्रताप, जी.आर. मीणा, एएसआई देवेंद्र, हेडकांस्टेबल अनिल, सचिन, महिला कांस्टेबल सुनीता, निर्मला आदि को शामिल किया गया.

चौकीप्रभारी के.बी. झा ने जब अस्पताल में सुधा गुप्ता से बात की थी, तभी उन्हें रमेशचंद्र की मौत पर शक हो गया था. लेकिन उस समय लाश कपड़े में बंधी हुई थी, इसलिए वह उसे देख नहीं पाए  थे. लेकिन पोस्टमार्टम रिपोर्ट और परची ने उन का संदेह सच में बदल दिया था.

उन्हें कालोनी वालों से सुधा गुप्ता और 17 वर्षीय अमित के संबंधों के बारे में पता चल गया था. अब उन्हें लग रहा था कि इन्हीं संबंधों की वजह से सुधा गुप्ता और अमित ने रमेशचंद्र को ठिकाने लगाया था. चूंकि सुधा गुप्ता तेजतर्रार और उच्चशिक्षित महिला थी इसलिए पुलिस पूरे सुबूतों के साथ ही अब उस से पूछताछ करना चाहती थी.

पुलिस को सुधा गुप्ता और अमित के मोबाइल नंबर मिल गए थे. पुलिस ने दोनों नंबरों की काल डिटेल्स निकलवाई. पता चला कि दोनों ने पिछले एक महीने में एकदूसरे को करीब डेढ़ हजार फोन किए थे. दोनों ने इतनी काल्स किसी अन्य नंबर पर नहीं की थीं. इस काल डिटेल्स ने पुलिस के शक को और मजबूत कर दिया था.

पुलिस को पर्याप्त सुबूत मिल गए तो सुधा को पूछताछ के लिए थाने बुलाने की तैयारी होने लगी. सुधा एयरफोर्स कालोनी के कवार्टर नंबर जी-28 में रहती थी. अमित भी वहीं पास में रहता था. पूछताछ के लिए बुलाने की खातिर पुलिस जब दोनों के क्वार्टरों पर पहुंची तो दोनों ही अपने क्वार्टरों से गायब मिले. इस से यही अंदाजा लगाया गया कि पुलिस की जांच सही दिशा में जा रही थी.

दोनों कहीं दूर न चले जाएं, इसलिए पुलिस टीम सरगर्मी से उन की तलाश करने लगी. इधरउधर भागादौड़ी करने के बाद पता चला कि सुधा गुप्ता और अमित वसंत विहार के वसंत गांव में रह रहे हैं. आखिर पुलिस उन के ठिकाने पर पहुंच ही गई. सुधा को जरा भी उम्मीद नहीं थी कि पुलिस वहां पहुंच जाएगी, इसलिए पुलिस को देख कर वह हैरान रह गई.

सुधा ने वह फ्लैट किराए पर ले रखा था. पुलिस को देख कर मकान मालिक भी आ गया था. पूछताछ में मकान मालिक ने बताया कि फ्लैट किराए पर लेते समय सुधा ने अमित को अपना पति बताया था. इस तरह पुलिस को सुधा के खिलाफ एक और सुबूत मिल गया था. पुलिस सुधा और अमित को ले कर थाने आ गई.

थाने में आते ही थानाप्रभारी ने सुधा से पूछा, ‘‘सचसच बताओ, तुम ने अपने पति को क्यों मारा?’’

‘‘सर, मैं भला अपने पति को क्यों मारूंगी, उन की मौत तो हार्टअटैक से हुई थी.’’

‘‘तुम यह बात इतने दावे के साथ कैसे कह सकती हो? तुम्हें कैसे पता चला कि मौत हार्टअटैक से हुई थी?’’ थानाप्रभारी सुरेश कुमार वर्मा ने पूछा.

‘‘उन के सीने में जिस तरह से दर्द हुआ था, उस से मैं ने अंदाजा लगाया था कि उन्हें हार्टअटैक आया था.’’

‘‘हमारे पास जो पोस्टमार्टम रिपोर्ट है, उस में साफ लिखा है कि रमेशचंद्र की मौत गला दबाने से हुई थी.’’

‘‘यह कैसे हो सकता सर? मेरे सामने उन्हें हार्टअटैक आया था. सीने में दर्द से ही वह बेहोश हुए थे.’’ सुधा गुप्ता ने कहा.

थानाप्रभारी कुछ और पूछते, इस से पहले वहीं बैठे चौकीप्रभारी के.बी. झा बोले, ‘‘अच्छा, सुधा यह बताओ कि अमित से तुम्हारा क्या संबंध है?’’

‘‘अमित मेरा स्टूडेंट है. मैं उसे ट्यूशन पढ़ाती हूं.’’ सुधा ने कहा.

‘‘यह तो हमें भी पता है कि तुम उसे ट्यूशन पढ़ाती थी. लेकिन मैं उस संबंध के बारे में पूछ रहा हूं, जो सब की नजरों से छिपा रखा था. तुम पढ़ीलिखी और समझदार हो, फिर भी इस तरह का गलत काम कर रही थी. क्यों उस बच्चे की जिंदगी बरबाद कर रही हो?’’

‘‘सर, आप क्यों बिना मतलब हमें बदनाम कर रहे हैं?’’

‘‘हम बदनाम नहीं कर रहे हैं, बल्कि सही कह रहे हैं. तुम अपने फोन की काल डिटेल्स देखो.’’ चौकीप्रभारी ने उसे काल डिटेल्स दिखाते हुए कहा, ‘‘तुम दोनों ने पिछले एक महीने में डेढ़ हजार से ज्यादा फोन किए हैं. ऐसा कौन सा काम था, जो तुम उस से रातदिन बातें करती रहती थीं?

‘‘इस के अलावा वसंत गांव में तुम ने जो फ्लैट ले रखा था. तुम उस में उसे अपना पति बता कर रह रही थी. मेरे खयाल से तुम्हें अब पता चल गया होगा कि मुझे सब जानकारी मिल गई है. इसलिए अब तुम्हें सच्चाई बता देनी चाहिए, वरना तुम्हें पता ही है कि पुलिस चाहेगी तो सच्चाई उगलवा लेगी.’’

चौकीप्रभारी के इतना कहते ही सुधा रो पड़ी. हथेलियों से आंसू पोंछते हुए उस ने कहा, ‘‘सर, वह तो केवल नाम के पति थे. किसी भी औरत को सिर्फ पैसा ही नहीं चाहिए. पैसे के अलावा भी उस की तमाम जरूरतें होती हैं. इस बात को वह समझते ही नहीं थे, बल्कि इधर घर में काफी क्लेश करने लगे थे.’’

इस के बाद सुधा ने पति की हत्या के पीछे की जो कहानी पुलिस को सुनाई, वह कुछ इस प्रकार थी—

रमेशचंद्र मूलरूप से उत्तर प्रदेश के जिला इलाहाबाद के गांव लालबिहारा के रहने वाले थे. 19 साल पहले वह एयरफोर्स में सार्जेंट के रूप में भरती हुए थे. अनेक जगह नौकरी करने के बाद उन का तबादला दिल्ली हुआ तो उन्हें रहने के लिए सुब्रतो पार्क स्थित एयरफोर्स कालोनी में जी-28 नंबर का फ्लैट आवंटित हुआ.

दूसरी मंजिल पर स्थित इस फ्लैट में वह अकेले ही रहते थे. करीब 5 साल पहले उन की शादी गोरखपुर के सैनिक कुंज में रहने वाली सुधा गुप्ता से हुई थी. सुधा के पिता भी भारतीय वायु सेना में नौकरी करते थे. बीकौम पास सुधा की जब शादी हुई थी, तब वह 23 साल की थी, जबकि रमेशचंद्र 35 साल के थे. दोनों की उम्र में 12 साल का अंतर था.

शादी के बाद सुधा पति के साथ दिल्ली आ कर सरकारी क्वार्टर में रहने लगी थी. कुछ दिनों तक उन की गृहस्थी ठीकठाक चली. उसी बीच सुधा एक बेटी की मां बनी. शादी के बाद भी सुधा अपनी पढ़ाई जारी रखना चाहती थी. इस के लिए उस ने पति से बात की तो उस ने इजाजत दे दी. सुधा कानपुर यूनिवर्सिटी से पत्राचार द्वारा एमकौम करने लगी.

रमेशचंद्र रोज शराब पीते थे. एक तरह से वह शराब के आदी थे. शाम को घर लौटते तो शराब के नशे में धुत होते थे. सुधा ने उन्हें बहुत समझाया, लेकिन उन्होंने अपनी आदत नहीं बदली. रोजरोज एक ही बात कहने से रमेशचंद्र चिढ़ने लगा.

इस के अलावा सुधा की सब से बड़ी समस्या यह थी कि रमेशचंद्र उस की जरूरतों पर बिलकुल ध्यान नहीं देते थे. घर में हर तरह की सुखसुविधा थी, लेकिन रमेशचंद्र यह नहीं समझते थे कि सुखसुविधाओं के अलावा भी पत्नी की अन्य जरूरतें भी होती हैं.

रमेशचंद्र नशे में धुत आते और खाना खा कर सो जाते. पत्नी की भावनाओं पर वह बिलकुल ध्यान नहीं देते. सुधा कभी पहल करती, तब भी वह उसे संतुष्ट नहीं कर पाते थे. लिहाजा वह तड़प कर रह जाती थी.

सुधा की यह ऐसी समस्या थी, जिसे वह किसी से कह भी नहीं सकती थी. उस की और रमेशचंद्र की उम्र में जो 12 साल का अंतर था, उसे अब वह साफ महसूस कर रही थी. पति की इन उपेक्षाओं से वह चिड़चिड़ी सी हो गई थी.

पति के ड्यूटी पर चले जाने पर सुधा बेटी के साथ मन बहलाने की कोशिश करती. अब तक सुधा की एमकौम की पढ़ाई पूरी हो चुकी थी. खुद को व्यस्त रखने के लिए सुधा पास ही संकुल कोचिंग सेंटर में पढ़ाने जाने लगी. इस से उस का समय भी कट जाता था, साथ ही चार पैसे भी मिल रहे थे.

उसी कोचिंग सेंटर में अमित पढ़ने आता था. 11वीं में पढ़ने वाले अमित को सुधा कौमर्स पढ़ाती थी. अमित के पिता भी एयरफोर्स में थे. रहने के लिए उन्हें जो फ्लैट मिला था, वह सुधा के फ्लैट के करीब ही था. इसलिए सुधा अमित को अच्छी तरह से जानती थी.

अमित की उम्र 17 साल जरूर थी, लेकिन हष्टपुष्ट होने की वजह से वह अपनी उम्र से काफी बड़ा लगता था. वह थोड़ा मजाकिया स्वभाव का था, इसलिए उस की चुलबुली बातें सुधा को बहुत अच्छी लगती थीं.

पति से असंतुष्ट सुधा अमित में दिलचस्पी लेने लगी थी. उसे लगा कि जो ख्वाहिश उसे बेचैन किए है, वह अमित से पूरी हो सकती है. लिहाजा उम्र में 11 साल छोटे अमित को वह प्यार के जाल में फांसने की कोशिश करने लगी. अब वह पढ़ाई के बहाने अमित को अपने कमरे पर बुलाने लगी.

अमित भले ही नाबालिग था, लेकिन अपनी टीचर सुधा के हावभाव और बातों से उस के मन की बात को समझ गया था, इसलिए सुधा की पहल से वह खुद पर नियंत्रण नहीं रख पाया और एक दिन उस ने वही कर डाला, जो सुधा चाहती थी. यह करीब 6 महीने पहले की बात है.

एक बार उन्होंने सीमाएं लांघी तो यह रोज का नियम बन गया. रमेशचंद्र के ड्यूटी पर चले जाने के बाद सुधा अमित को अपने क्वार्टर पर पढ़ाने के बहाने बुला लेती. बेटी छोटी थी, वह खापी कर सो जाती. इस के बाद दोनों को किसी की चिंता नहीं रहती थी.

सुधा को जिस चीज की जरूरत थी, अब वह अमित से मिल रही थी. इसलिए उसे अब पति से कोई शिकायत नहीं रह गई थी. उस ने पति से लड़नाझगड़ना भी बंद कर दिया था. रमेशचंद्र यह नहीं जान पाए कि पत्नी में अचानक यह बदलाव कैसे आ गया.

उन्हें लगता था कि सुधा अब समझदार और जिम्मेदार हो गई है. बहरहाल घर की रोजरोज की किचकिच बंद होने से वह खुश थे. इस तरह अमित और सुधा को रमेशचंद्र से कोई दिक्कत नहीं हो रही थी.

सुधा अमित को इस कदर चाहने लगी कि वह उस से शादी करने के बारे में सोचने लगी. अमित भी इस के लिए तैयार था. लेकिन यह भी सच है कि यह खेल कितना भी छिपा कर खेला जाए, इस की भनक लग ही जाती है.

रमेशचंद्र की गैरमौजूदगी में अमित का रोजरोज उन के घर जाने से लोगों को शक होने लगा. सुधा और अमित को ले कर एयरफोर्स कालोनी में तरहतरह की चरचा होने लगी. जब इस बारे में रमेशचंद्र को पता चला तो उन्होंने सुधा को समझाया कि वह अमित को अपने घर न आने दे, क्योंकि उसे ले कर लोग उस पर शक कर रहे हैं.

‘‘लोग जो कहते हैं, तुम ने उस  पर विश्वास कर लिया.’’ सुधा तुनक कर बोली, ‘‘अगर वह मेरे पास पढ़ने आता है तो लोगों को न जाने क्यों तकलीफ होती है? लोगों से अपना घर तो संभलता नहीं, दूसरों के घरों में ताकझांक करते हैं. मेरे सामने कोई कहे तो मैं बताऊं.’’

‘‘मेरे खयाल से तुम अमित को पढ़ाना बंद कर दो, वैसे भी तुम्हें पैसों की क्या जरूरत है? हमारी एक ही तो बेटी है. जो मैं कमाता हूं, वह हमारे परिवार के लिए काफी है.’’ रमेशचंद्र ने कहा.

‘‘तुम चुप रहो,’’ सुधा गुस्से में बोली, ‘‘मैं किसी के कह देने से शांत हो कर घर में नहीं बैठ जाऊंगी. मैं ने पढ़ाई घर में बैठने के लिए नहीं की है. लोग कुछ भी कहें, मैं अमित को पढ़ाना बंद नहीं करूंगी.’’

सुधा को नाराज होते देख रमेशचंद्र चुप हो गए. क्योंकि उन्हें लगा कि बात बढ़ाने से बेकार ही झंझट होगा. बात जहां से शुरू हुई थी, वहीं की वहीं रह गई. पति के समझाने का सुधा पर कोई असर नहीं हुआ. वह अमित से पहले की ही तरह मिलतीजुलती रही.

कालोनी वालों की बातें सुन सुन कर रमेशचंद्र परेशान हो चुके थे. इन बातों से वह खुद को अपमानित महसूस करते थे. वह सुधा को समझाते थे. लेकिन वह रवैया बदलने को तैयार नहीं थी. वह जब भी उस से कुछ कहते, वह लड़ने को तैयार हो जाती.

सुधा और अमित ने शादी करने का फैसला कर लिया था. लेकिन रमेशचंद्र के रहते यह संभव नहीं था. इसलिए सुधा ने अमित के साथ मिल कर रमेशचंद्र को खत्म करने की योजना बना डाली.

10 अप्रैल, 2014 को साढे़ 10 बजे के करीब सुधा ने योजना के अनुसार, प्रेमी अमित को अपने क्वार्टर पर बुला लिया. उस समय रमेशचंद्र कमरे में ही थे. जैसे ही उन्होंने अमित को अपने क्वार्टर में देखा, भड़क उठे. अमित ने आगे बढ़ कर पूरी ताकत से सार्जेंट रमेशचंद्र की गरदन पर एक घूंसा मारा. उसी घूंसे में नशेड़ी रमेशचंद्र गिर पड़े.

वह गिर ही नहीं पड़े, बल्कि बेहोश हो गए. अमित को लगा इस का खेल खत्म हो गया है. लेकिन सुधा ने पति की नाक पर हाथ रख कर देखा तो सांस चल रही है. उस ने कहा, ‘‘अमित अभी इस की सांस चल रही है. इसे खत्म कर दो. अगर यह जिंदा रहा तो हम बेमौत मारे जाएंगे.’’

अमित झुका और रमेशचंद्र की गरदन पकड़ कर पूरी ताकत से दबा दी. थोड़ी देर में गरदन लुढ़क गई. यानी उस का खेल खत्म हो गया. दोनों ने रमेशचंद्र की लाश को उठा कर बैड पर रखा. सुधा ने पति की लाश को रजाई ओढ़ाते हुए कहा, ‘‘अमित, अब तुम जाओ, आगे का काम मैं कर लूंगी.’’

अमित चला गया तो सुधा पड़ोस में रहने वाले एम.पी. यादव के यहां पहुंची और पति को हार्टअटैक आने की बात कही. उन्होंने एंबुलैंस बुला कर रमेशचंद्र को अस्पताल पहुंचाया, जहां डाक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया.

सुधा ने सोचा था कि हार्टअटैक की बात बताने पर वह बच जाएगी. शुरू में उसे लगा था कि वह अपनी योजना में सफल हो गई है. पुलिस से बचने के लिए उस ने दक्षिणी दिल्ली के वसंत गांव में एक फ्लैट किराए पर ले लिया था. जिस में अमित के साथ रह रही थी. पति की हत्या के 10 दिनों बाद वह अमित के साथ अमृतसर भी घूमने गई थी. दोनों वहां 3 दिनों तक एक होटल में रुके थे.

थाना कैंट पुलिस को सुधा के हावभाव पर पहले ही शक हो गया था, लेकिन सुबूत के अभाव से उस समय पुलिस कोई काररवाई नहीं कर सकी थी. परंतु पोस्टमार्टम रिपोर्ट मिली तो पुलिस के हाथ एक बड़ा सुबूत लग गया. इस के बाद सुधा को पति की हत्या की बात स्वीकार करनी पड़ी.

सुधा से पूछताछ के बाद पुलिस ने अमित से भी पूछताछ की. उस ने भी वही सब बताया, जो सुधा ने बताया था. इस के बाद पुलिस ने रमेशचंद्र की हत्या के आरोप में सुधा को गिरफ्तार कर 9 मई, 2014 को पटियाला हाउस में महानगर दंडाधिकारी धीरज मित्तल की अदालत में पेश किया, जहां से उसे 2 दिनों के पुलिस रिमांड पर लिया गया.

जबकि नाबालिग अमित को दिल्ली गेट स्थित बाल सुधार गृह भेज दिया गया. 2 दिनों बाद 11 मई को पुन: सुधा को अदालत में पेश किया गया, जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

सुधा के साथ उस की ढाई साल की बेटी भी उस के साथ जेल चली गई, क्योंकि उस ने ससुराल वालों को बेटी सौंपने से मना कर दिया था. लिहाजा मां के गुनाह की वजह से बेटी भी जेल की चारदीवारी में कैद है. मामले की जांच थानाप्रभारी सुरेश कुमार वर्मा कर रहे थे.

—कथा पुलिस सूत्रों और जनचर्चा पर आधारित. अमित परिवर्तित नाम है.

बौलीवुड के बिग बी ‘अमिताभ बच्चन’ को लंबे पैरों की वजह से एक्ट्रैस नहीं बनना चाहती थी उनकी कोस्टार

बौलीवुड के बिग बी कहे जाने वाले एक्टर ‘अमिताभ बच्चन’ सभी न्यू स्टार्स के लिए एक मिसाल है. उन्होंने अपनी जिंदगी में कई उतार चढ़ाव देखें है. उन्होंने बौलीवुड में एक्शन, रोमांस, कौमेडी और ट्रैजेड़ी से जुड़ी कई फिल्में दी है और दे रहे है. आज अमिताभ अपना 82वां बर्थ डे सेलिब्रेट कर रहे है. वे अबतक हिंदी सिनेमा को 54साल दे चुके है. इसमें उनसे जुड़े कई ऐसे किसे है जिनसे लोग आज भी बेखबर है.

 

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अमिताभ बच्चन खुद बताते है कि वे अपनी लाइफ में कई बार गिरे है और उठे है. एक टाइम पर जब एक्ट्रैस उनकी लंबी टांगों की वजह से उनके साथ एक्टिंग करने से मना कर देते थे. तब वे 300 रुपए लेकर भी बहुत खुश रहा करते थे. उन्होंने अपने करियर की सबसे पहली फिल्म ‘भुवन शोम’ की थी. 1969 में एक एक्टर के तौर पर नहीं बल्कि नरेटर के तौर पर हिंदी सिनेमा में कदम रखा था. एक्टर खुश रहते थे कि 300 रुपए तो मिल जाते है.

काफी संघर्ष के बाद मल्टीस्टारर ‘सात हिंदुस्तानी’ उसी साल यानी 1969 में मिली. इसके लिए 5 हजार रुपए भी मिले। फिर 1971 में ‘रेशमा और शेरा’. इसमें एक छोटा सा रोल मिला था वो भी मूक बधिर युवक छोटू का. फिल्में मिल रही थीं लेकिन वो मुकाम नहीं जिसकी दरकार थी. तभी जिंदगी में ‘आनंद’ ने दस्तक दी और ‘बाबू मोशाय’, ‘आनंद बाबू’ के साथ सबके चहेते बन गए. इनकी ‘बक-बक’ सुनने के लिए लोग थिएटर्स में खिंचे चल आए.

उनके करियर में टर्निंग पौइंट साबित हुई ‘जंजीर’

काम मिलने लगा, हरिवंशराय बच्चन का ये बड़ा बेटा अब खुद को स्थापित करने लगा था. फिर आई एक फिल्म जो टर्निंग पौइंट साबित हुई और यह थी 1973 की ‘जंजीर. बौलीवुड को अपना एंग्री यंग मैन मिल चुका था. इसके बाद उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा. एक से बढ़कर एक ऐसी फिल्में की जिन्होंने इनकी काबिलियत को साबित किया. सौदागर, दीवार, शोले, लावारिस, चुपके – चुपके, नमक हलाल, नमक हराम, नास्तिक, कालिया, खुद्दार, शराबी, डौन जैसी फिल्मों के जरिए बौलीवुड इंडस्ट्री के मयार को ऊंचा रखा. हर जौनर की फिल्म की. हरेक किरदार निभाया.

एयरफोर्स में जाना जाते थे अमिताभ

वैसे, अपनी हाइट के कारण अमिताभ एक और सपना भी पूरा नहीं कर पाए थे और वो था देश की सेवा का. केबीसी में एक्टर ने बताया था कि दिल्ली में एक मिलिटरी औफिसर ने पिता जी से कहा था, ‘अपना यह बेटा मुझे दे दीजिएगा.’ कौलेज के बाद जब अमिताभ एयर फोर्स में भर्ती होने के लिए पहुंचे तो इंटरव्यू के दौरान छांट दिए गए. क्यों? क्योंकि टांगें लंबी थीं.

केबीसी के मंच पर अमिताभ बच्चन

अमिताभ ने वो सब कुछ हासिल किया जिसके वो हकदार थे. कमियों को ताकत बनाया और बन गए इंडियन फिल्म इंडस्ट्री के शहंशाह बन गए. अमिताभ ने अपने जीवन में हमेशा मूल्यों को महत्व दिया. मां-बाप से जो पाया, उस पर गर्व किया और खुशी से उसे सबसे शेयर भी किया. केबीसी के मंच पर कई ऐसे पल साझा किए हैं जो अनमोल हैं, जो रिश्तों की गहराई को बखूबी बयां करते हैं.

अमिताभ बच्चन की सुपरहिट फिल्में

नटवरलाल, लावारिस, सिलसिला, कालिया, सत्ते पे सत्ता, नमक हलाल, शक्ति, कुली, शराबी, मर्द, शहंशाह, अग्निपथ, खुदा गवाह, मोहब्बतें, बागबान, ब्लैक, वक्त, सरकार, चीनी कम, भूतनाथ, पा, पीकू जैसी शानदार फिल्में देने वाले बिग बी के करियर में एक दिलचस्प बात भी देखने को मिली.

देवर के प्यार में अंधी हुई भाभी ने लीं ननद की जान, बनीं हत्यारी

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले के गैनी गांव में छोटेलाल कश्यप अपने परिवार के साथ रहते थे. उन के परिवार में उन की पत्नी रामवती के अलावा 2 बेटे नरेश व तालेवर, 2 बेटियां सुनीता व विनीता थीं. छोटेलाल खेती किसानी का काम करते थे. इसी की आमदनी से उन्होंने बच्चों की परवरिश की. बच्चे शादी लायक हो गए तो उन्होंने बड़े बेटे नरेश का विवाह नन्ही देवी नाम की युवती से करा दिया.

कालांतर में नन्ही ने एक बेटे शिवम व एक बेटी सीमा को जन्म दिया. बाद में उन्होंने बड़ी बेटी सुनीता का भी विवाह कर दिया. अब 2 बच्चे शादी के लिए रह गए थे. छोटेलाल उन दोनों की शादी की भी तैयारी कर रहे थे.

इसी बीच दूसरे बेटे तालेवर ने ऐसा काम कर दिया, जिस से उन की गांव में बहुत बदनामी हुई. तालेवर ने सन 2014 में अपने ही पड़ोस में रहने वाली एक महिला के साथ रेप कर दिया था. जिस के आरोप में उस को जेल जाना पड़ा था.

उधर छोटेलाल की छोटी बेटी विनीता भी 20 साल की हो चुकी थी. यौवन की चमक से उस का रूपरंग दमकने लगा था. वह ज्यादा पढ़ीलिखी नहीं थी, पर उसे फिल्म देखना, फैशन के अनुसार कपड़े पहनना अच्छा लगता था. उस की सहेलियां भी उस के जैसे ही विचारों की थीं, इसलिए उन में जब भी बात होती तो फिल्मों की और उन में दिखाए जाने वाले रोमांस की ही होती थी. यह उम्र का तकाजा भी था.

विनीता के खयालों में भी एक अपने दीवाने की तसवीर थी, लेकिन यह तसवीर कुछ धुंधली सी थी. खयालों की तसवीर के दीवाने को उस की आंखें हरदम तलाशती थीं. वैसे उस के आगेपीछे चक्कर लगाने वाले युवक कम नहीं थे, लेकिन उन में से एक भी ऐसा न था, जो उस के खयालों की तसवीर में फिट बैठता हो.

बात करीब 2 साल पहले की है. विनीता अपने पिता के साथ एक रिश्तेदारी में बरेली के कस्बा आंवला गई, जो उस के यहां से करीब 13 किलोमीटर दूर था. वहां से वापसी में वह आंवला बसअड्डे पर खड़ी बस का इंतजार कर रही थी तभी एक नवयुवक जोकि वेंडर था, पानी की बोतल बेचते हुए उस के पास से गुजरा.

उस युवक को देख कर विनीता का दिल एकाएक तेजी से धड़कने लगा. निगाहें तो जैसे उस पर ही टिक कर रह गई थीं. उस के दिल से यही आवाज आई कि विनीता यही है तेरा दीवाना, जिसे तू तलाश रही थी. उस युवक को देखते ही उस के खयालों में बनी धुंधली तसवीर बिलकुल साफ हो गई.

वह उसे एकटक निहारती रही. उसे इस तरह निहारता देख कर वह युवक भी बारबार उसी पर नजर टिका देता. जब उन की निगाहें आपस में मिल जातीं तो दोनों के होंठों पर मुसकराहट तैरने लगती.

उसी समय बस आ गई और विनीता अपने पिता के साथ बस में बैठ गई. वह पिता के साथ बस में बैठ जरूर गई थी, पर पूरे रास्ते उस की आंखों के सामने उस युवक का चेहरा ही घूमता रहा. विनीता उस युवक के बारे में पता कर के उस से संपर्क करने का मन बना चुकी थी.

अगले ही दिन सहेली के यहां जाने का बहाना बना कर विनीता आंवला के लिए निकल गई. बसअड्डे पर खड़े हो कर उस की आंखें उसे तलाशने लगीं. कुछ ही देर में वह युवक विनीता को दिख गया. पर उस युवक ने विनीता को नहीं देखा था.

विनीता उस पर नजर रख कर उस का पीछा कर के उस के बारे में जानने की कोशिश में लग गई. कुछ देर में ही उस ने उस युवक के बारे में किसी से जानकारी हासिल कर उस का नाम व मोबाइल नंबर पता कर लिया. उस युवक का नाम हरि था और वह अपने परिवार के साथ आंवला में ही रहता था.

एक दिन हरि सुबह के समय अपनी छत पर बैठा था, तभी उस का मोबाइल बज उठा. हरि ने स्क्रीन पर बिना नंबर देखे ही काल रिसीव करते हुए हैलो बोला.

‘‘जी, आप कौन बोल रहे हैं?’’ दूसरी ओर से किसी युवती की मधुर आवाज सुनाई दी तो हरि चौंक पड़ा.

वह बोला, ‘‘आप कौन बोल रही हैं और आप को किस से बात करनी है?’’

‘‘मैं विनीता बोल रही हूं. मुझे अपनी दोस्त से बात करनी थी, लेकिन लगता है नंबर गलत डायल हो गया.’’

‘‘कोई बात नहीं, आप को अपनी दोस्त का नंबर सेव कर के रखना चाहिए. ऐसा होगा तो दोबारा गलती नहीं होगी.’’

‘‘आप पुलिस में हैं क्या?’’

‘‘जी नहीं, आम आदमी हूं.’’

‘‘किसी के लिए तो खास होंगे?’’

‘‘आप बहुत बातें करती हैं.’’

‘‘अच्छी या बुरी?’’

‘‘अच्छी.’’

‘‘क्या अच्छा है, मेरी बातों में?’’

अब हंसने की बारी थी हरि की. वह जोर से हंसा, फिर बोला, ‘‘माफ करना, मैं आप से नहीं जीत सकता.’’

‘‘और मैं माफ न करूं तो?’’

‘‘तो आप ही बताइए, मैं क्या करूं?’’ हरि ने हथियार डाल दिए.

‘‘अच्छा जाओ, माफ किया.’’

दरअसल विनीता को हरि का मोबाइल नंबर तो मिल गया था. लेकिन विनीता के पास खुद का मोबाइल नहीं था, इसलिए उस ने अपनी सहेली का मोबाइल फोन ले कर बात की थी. पहली ही बातचीत में दोनों काफी घुलमिल गए थे. दोनों के बीच कुछ ऐसी बातें हुईं कि दोनों एकदूसरे के प्रति अपनापन महसूस करने लगे.

फिर उन के बीच बराबर बातें होने लगीं.  विनीता ने हरि को बता दिया था कि उस दिन अनजाने में उस के पास काल नहीं लगी थी बल्कि उस ने खुद उस का नंबर हासिल कर के उसे काल की थी और उन की मुलाकात भी हो चुकी है.

जब हरि ने मुलाकात के बारे में पूछा तो विनीता ने आंवला बसअड्डे पर हुई मुलाकात का जिक्र कर दिया. हरि यह जान कर बहुत खुश हुआ क्योंकि उस दिन विनीता का खूबसूरत चेहरा आंखों के जरिए उस के दिल में उतर गया था.

इस के बाद दोनों एकदूसरे से रूबरू मिलने लगे. इसी बीच एक मुलाकात में दोनों ने अपने प्यार का इजहार भी कर दिया. दिनप्रतिदिन उन का प्यार प्रगाढ़ होता जा रहा था. विनीता तो दीवानगी की हद तक दिल की गहराइयों से हरि को चाहने लगी थी.

धीरेधीरे उन का प्यार परवान चढ़ने लगा. प्रेम दीवानों के प्यार की खुशबू जब जमाने को लगती है तो वह उन दीवानों पर तरहतरह की बंदिशें लगाने लगता है. यही विनीता के परिजनों ने किया. विनीता के घर वालों को पता चल गया कि वह जिस लड़के से मिलती है, वह बदमाश टाइप का है.

इसलिए उन्होंने विनीता पर प्रतिबंध लगाने शुरू कर दिए. लेकिन तमाम बंदिशों के बाद भी विनीता हरि से मिलने का मौका निकाल ही लेती थी.

धीरेधीरे दोनों के इश्क के चर्चे गांव में होने लगे. गांव के लोगों ने कई बार विनीता को हरि के साथ देखा. इस पर वह तरहतरह की बातें बनाने लगे. गांव वालों के बीच विनीता के इश्क के चर्चे होने लगे. इस से छोटेलाल की गांव में बदनामी हो रही थी.

घरपरिवार के सभी लोगों ने विनीता को खूब समझाया लेकिन प्यार में आकंठ डूबी विनीता पर इस का कोई असर नहीं हुआ. पूरा परिवार गांव में हो रही बदनामी से परेशान था. रोज घर में कलह होती लेकिन हो कुछ नहीं पाता था.

29 सितंबर की सुबह करीब 8 बजे विनीता अपनी भाभी नन्ही देवी के साथ दिशामैदान के लिए खेतों की तरफ गई थी. कुछ समय बाद नन्ही देवी घर लौटी तो विनीता उस के साथ नहीं थी. घर वालों ने उस से विनीता के बारे में पूछा तो उस ने बताया कि जब वह दिशामैदान के बाद बाजरे के खेत से बाहर निकली तो उसे विनीता नहीं दिखी.

उस ने सोचा कि विनीता शायद अकेली घर चली गई होगी. लेकिन यहां आ कर पता चला कि वह यहां पहुंची ही नहीं है. नन्ही ने कहा कि कहीं ऐसा तो नहीं कि विनीता अपनी किसी सहेली के यहां चली गई हो.

कुछ ही देर में गांव के एक किसान चंद्रपाल ने विनीता के घर पहुंच कर बताया कि रामानंद शर्मा के बाजरे के खेत में विनीता की लाश पड़ी है. उस समय छोटेलाल पत्नी के साथ डाक्टर के पास दवा लेने गए थे. छोटेलाल के धान के खेत के बराबर में ही रामानंद का बाजरे का खेत था.

यह खबर सुन कर सभी घर वाले लगभग दौड़ते हुए घटनास्थल पर पहुंचे. विनीता की लाश देख कर सब बिलखबिलख कर रोने लगे. इसी बीच वहां गांव के काफी लोग पहुंच गए थे. ग्रामप्रधान भी मौके पर थे. उन्होंने घटना की सूचना स्थानीय थाना अलीगंज को दे दी.

सूचना मिलते ही थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह पुलिस टीम के साथ घटनास्थल पर पहुंच गए. विनीता के पेट में गोली लगने के निशान थे. निशान देख कर ऐसा लग रहा था कि किसी ने काफी नजदीक से गोली मारी है. इस का मतलब था कि हत्यारे को विनीता काफी अच्छी तरह से जानती थी. इसी बीच रोतेबिलखते छोटेलाल और उन की पत्नी भी वहां पहुंच गए.

थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह ने नन्ही और बाकी घर वालों से आवश्यक पूछताछ की. फिर विनीता की लाश पोस्टमार्टम के लिए मोर्चरी भेज दी.

थाने वापस आ कर उन्होंने छोटेलाल कश्यप की लिखित तहरीर पर गांव के ही इंद्रपाल, हरपाल, उमाशंकर और धनपाल के खिलाफ भादंवि की धारा 302 के तहत मुकदमा दर्ज करा दिया. तहरीर में हत्या का कारण इन लोगों से रंजिश बताया गया था.

थानाप्रभारी सिंह ने केस की जांच शुरू की तो पता चला कि विनीता का भाई तालेवर अपने मकान के पीछे रहने वाली युवती से दुष्कर्म के मामले में 2014 से जेल में बंद है. पुलिस को पता चला कि जिस युवती ने रेप का आरोप लगाया था, छोटेलाल ने उस युवती के पिता को भी विनीता की हत्या में आरोपी बनाया गया था.

साथ ही विनीता के किसी हरि नाम के युवक से प्रेम संबंध की बात पता चली. बेटी की इस हरकत से घर वाले काफी परेशान थे. इस से पुलिस का शक विनीता के परिवार पर केंद्रित हो गया.

थानाप्रभारी ने सोचा कि कहीं एक तीर से दो शिकार करने की कोशिश तो नहीं की गई. विनीता से छुटकारा तो मिलता ही साथ ही तालेवर को जेल भेजने वाले को भी जेल की चारदीवारी में कैद कराने में सफल हो जाते.

पूरी घटना की जांच में यही निष्कर्ष निकला कि परिवार का ही कोई सदस्य इस घटना में शामिल है. लेकिन मांबाप तो थे नहीं, उन का बेटा नरेश गांव में नहीं था. बची बेटे की पत्नी नन्ही जो विनीता के साथ ही गई थी और अकेली वापस लौटी थी. नन्ही पर ही हत्या का शक गहराया. थानाप्रभारी ने गांव के लोगों से पूछताछ की तो ऐसे में एक व्यक्ति ऐसा मिल गया, जिस ने ऐसा कुछ बताया कि थानप्रभारी की आंखों में चमक आ गई.

इस के बाद 2 अक्तूबर को उन्होंने नन्ही देवी को घर से पूछताछ के लिए हिरासत में ले लिया. जब महिला आरक्षी की उपस्थिति में नन्ही से सख्ती से पूछताछ की गई तो वह टूट गई. उस ने विनीता की हत्या अपने नाबालिग बेटे शिवम के साथ मिल कर किए जाने की बात स्वीकार कर ली और पूरी कहानी बयान कर दी.

विनीता के हरि नाम के युवक से प्रेम संबंध की बात से घर का हर कोई नाराज था. समझाने के बावजूद भी विनीता नहीं मान रही थी. गांव में हो रही बदनामी से घर वालों का जीना मुहाल हो गया था.

नन्ही अपनी ननद विनीता की कारगुजारियों से कुछ ज्यादा ही खफा थी. वह अपने परिवार को बदनामी से बचाना चाहती थी. इसलिए उस ने विनीता की हत्या अपने नाबालिग बेटे शिवम से कराने का फैसला कर लिया.

इस हत्या में उस इंसान को भी फंसा कर  जेल भेजने की योजना बना ली, जिस की बेटी से दुष्कर्म के मामले में उस का देवर तालेवर जेल में बंद था. उस इंसान के जेल जाने पर उस से समझौते का दबाव बना कर वह देवर तालेवर को जेल से छुड़ा सकती थी. घर में एक .315 बोर का तमंचा पहले से ही रखा हुआ था. नन्ही ने शिवम के साथ मिल कर विनीता की हत्या की पूरी योजना बना ली.

29 सितंबर की सुबह 8 बजे नन्ही ने बेटे शिवम को तमंचा ले कर घर से पहले ही भेज दिया. फिर विनीता को साथ ले कर दिशामैदान के लिए खुद घर से निकल पड़ी. विनीता को ले कर नन्ही अपने धान के खेत के बराबर में बाजरे के खेत में पहुंची. शिवम वहां पहले से मौजूद था.

विनीता के वहां पहुंचने पर शिवम ने तमंचे से विनीता पर फायर कर दिया. गोली सीधे विनीता के पेट में जा कर लगी. विनीता जमीन पर गिर कर कुछ देर तड़पी, फिर शांत हो गई.

विनीता की लीला समाप्त करने के बाद शिवम ने अपने धान के खेत में तमंचा छिपाया और वहां से छिपते हुए निकल गया. नन्ही भी वहां से घर लौट गई. लेकिन पुलिस के शिकंजे से वह न अपने आप को बचा सकी और न ही अपने बेटे को.

थानाप्रभारी विशाल प्रताप सिंह ने नन्ही को मुकदमे में 120बी का अभियुक्त बना दिया. शिवम की निशानदेही पर हत्या में प्रयुक्त तमंचा भी पुलिस ने बरामद कर लिया.

आवश्यक लिखापढ़ी के बाद नन्ही को न्यायालय में पेश करने के बाद जेल भेज दिया गया, और शिवम को बाल सुधार गृह.

—कथा पुलिस सूत्रों पर आधारित. कथा में शिवम नाम परिवर्तित है.

– फोटो काल्पनिक है. घटना से संबंधित नहीं है.

करणवीर मेहरा ने सुनाई अपने बचपन की कहानी, दमदार है BB18 का ये कंटैस्टैंट

Bigg Boss 18 : बिग बौस 18(Bigg Boss18) सलमान खान(Salman khan) के रिएलिटी शो की शुरुआत हो चुकी है. शो में एक से बढ़कर एक कंटेस्टेंट नजर आ रहे है, लेकिन सबसे दमदार कंटेस्टेंट शो में करणवीर मेहरा (Karanveer Mehra)और विवियन डीसेना (vivian Desan)नजर आ रहे है. शो में सबसे समझदारी के काम लेते हुए दोनों कंटेस्टेंट दिख रहे है लेकिन दोनों में से एक की बात करें तो करणवीर तब सबकी नजरों में आ गए जब उन्होंने शो में अपने बचपन की कहानी सुनाई.

 

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शो में करणवीर मेहरा ने नेशनल टीवी के आगे सबको अपने बचपन की कहानी सुनाकर हैरानी में डाल दिया और चौंका दिया है. करणवीर मेहरा ने खुलासा किया है कि 10 साल की उम्र में पिता को खोने के बाद उनकी जिंदगी कितनी बदल गई थी.

बिग बौस 18 के बीते एपिसोड में करणवीर मेहरा अपने पिता का जिक्र करते नजर आए. इस दौरान करणवीर मेहरा ने बताया, ‘मेरी मां ने मुझे कभी किसी चीज की कमी महसूस नहीं होने दी. अभी वो मेरी बातें सुनकर रो रही होंगी. आज तक भी मैंने किसी भी बारे में मां से बात नहीं की है क्योंकि मैं एक स्ट्रिक्ट बौय की तरह पाला गया हूं. मैं रोया नहीं कभी भी… जब मेरे पिता का देहांत हुआ उस समय मैं 10 साल का था. उस समय भी मेरी आंख से एक भी आंसू नहीं निकला.’

आगे करणवीर मेहरा ने कहा, मेरी उम्र केवल 10 साल की थी. वो मेरे पिता को मुझसे दूर लेकर जा रहे थे. किसी ने मुझे कहा कि मुझे अपने पिता को आखिरी बार गुडबाय बोलना होगा. तब मैंने अपने पिता का चेहरा देखा. मैंने महसूस किया कि उनकी मूंछें दोबारा अब नहीं उगेंगी. उनका चेहरा देखकर मुझे रोना आ गया. वो आखिरी दिन था जब मेरी आंख में आंसू आए. उस दिन के बाद मैं कभी नहीं रोया. पिता के जाने क बाद मेरे कंधों पर पूरे परिवार की जिम्मेदारी आ गई थीं.

करणवीर मेहरा के करियर की शुरुआत कैसे हुई

करण वीर मेहरा का जन्म 28 दिसंबर को हुआ. करणवीर एक टीवी एक्टर है. उन्होंने साल 2005 में रीमिक्स के शो के साथ अपना करियर शुरू किया था. हाल में वह बरत सेनगुप्त के विपरीत, होट स्टूडियो की वेब श्रृंखला युगल औफ़ मिस्टेक्स में देखे जाते हैं. उन्हें सोनी एसएबी टीवी, बिवी और मेन में मुख्य भूमिका निभाते हुए भी देखा गया.

एक्टर की बौलीवुड फिल्में

करणवीर मेहरा ने बौलीवुड फिल्में जैसे रागिनी एमएमएस 2, मेरे पिता की मारुति, ब्लड मनी, बदामशियान और आमेन में दमदार एक्टिंग से अपना पहचान बनाई है.

शादी की पहली रात, क्या करें और क्या नहीं

शादी की पहली रात को सुहागरात कहा जाता है. सुहागरात सभी की जिंदगी का एक अहम हिस्सा मानी जाती है. इस रात को लेकर लोगों के मन में कई तरह के प्रश्न होते हैं. इस रात में महिलाओं व पुरुषों दोनों में ही समान उत्सुकता रहती है.

सामान्य तौर पर सुहागरात का मतलब नव दंपति का शारीरिक रूप से एक होना माना जाता है. लेकिन जिंदगी की इस खास रात को इतना ही समझ लेना गलत होगा. दरअसल शादी के बाद सुहागरात ही पति-पत्नी के नए जीवन की वह पहली रात होती है, जिसमें वह दोनों एक साथ होते हैं. शादी की पहली रात को लेकर पति व पत्नी दोनों के ही मन में उत्सुकता के साथ घबराहट भी बनी रहती है.

इस विषय पर लोगों की उत्सुकता और घबराहट को देखते हुए आज हम आप को सुहागरात के बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं. इसके साथ ही आपको यह भी बताएंगे कि सुहागरात क्यों मनाई जाती है और इसको मनाने का सही तरीका क्या है. इसके अलावा आपको यहां सुहागरात मनाने के टिप्स भी बताए जा रहे हैं.

सुहागरात क्या होती है

सुहागरात में क्या करना चाहिए, सुहागरात कैसे मनाएं, सुहागरात को मनाने का तरीका और टिप्स जानने से पहले आप सभी को यह समझना बेहद जरूरी है कि सुहागरात का सही अर्थ क्या है और यह क्यों मनाई जाती है.

सुहागरात का मतलब होता है शादी की वह पहली रात जिसमें पति-पत्नी एक दूसरे को जानते और समझते हैं. हमारे समाज में इस विषय पर ज्यादा चर्चा नहीं की जाती है. इस पर चर्चा न हो पाने की वजह यह भी है कि सुहागरात को संभोग क्रिया से जोड़कर देखा जाता है. जबकि नव दंपति के बीच शारीरिक संबंध स्थापित होना इस रात का मात्र एक हिस्सा भर है. इसलिए इसको सिर्फ शारीरिक संबंध बनाने वाली रात समझना बेहद गलत है.

शादी के बाद नव दंपति के जीवन की यह पहली रात होती है. इस रात में ही वह दोनों एक दूसरे के व्यक्तित्व के बारे में जान पाते हैं. साथ ही इस रात वह अपनी शादीशुदा जिंदगी की भावी योजनाएं भी तैयार करते हैं.

सुहागरात की शुरुआत कैसे करें

शादी के बाद जब दुल्हन अपने ससुराल में प्रवेश करती है, तभी से उसकी शादी की पहली रात की तैयारियां शुरू हो जाती है. अपने पति के घर में पहुंचते ही नव वधु को कई रीति-रिवाजों से गुजरना होता है. हर लड़की के लिए यह यादगार पल होता है. दुनिया भर के सभी धर्मों में नई वधु के घर आने पर कई तरह के रीति रिवाजों को पूरा किया जाता है. आइए जानते हैं सुहागरात के कुछ रीति-रिवाजों के बारे में.

बहू का स्वागत :

जैसे ही नव वधु अपने नए घर यानि सुसराल के गेट पर पहुंचती हैं, तो उसके स्वागत के लिए घर की चौखट पर चावल का लोटा रखा जाता है. चावल के लोटे को अपने पैर से आगे गिराते हुए वधु घर में प्रवेश करती है.

खेलों का अयोजन करना :

शादी के बाद वधु अपने ससुराल वालों व रिश्तेदारों के साथ सहज हो सके, इसलिए कई तरह के रोचक खेल संपन्न किए जाते हैं. जिसमें एक बड़े और गहरे बर्तन में दूध व पानी मिलाया जाता है. इसके बाद इस पानी में अंगूठी डाल दी जाती है और जिसके बाद वर-वधु को यह अंगूठी ढुंढनी होती है. जो पहले अंगूठी को ढुंढता है उसको तोहफे दिए जाते हैं.

रिश्तेदारों से मेल-जोल बढ़ाना :

इसके अलावा भारत के कई क्षेत्रों में नववधु से सभी महिलाओं व करीबी रिश्तेदारों के सामने डांस करवाया जाता हैं, ताकि वह सभी लोगों से साथ परिवार की तरह ही घुलमिल सकें और खुद को नए परिवार में सहज महसूस करें.

वर-वधु के लिए कमरा सजाना :

इसके बाद रात होने से पहले वर व वधु के लिए एक कमरे को सजा दिया जाता है, ताकि वह अपनी जिंदगी की शुरुआत एक नए तरीके से कर सकें.

यहां तक सभी रीति-रिवाज खत्म हो जाते हैं. इसके बाद नव वर-वधु को सोने के लिए एक कमरे में भेज दिया जाता है.

पति पत्नी पहली रात को क्या करें

शादी की पहली रात को लेकर हर किसी के मन में उत्सुकता होती है. इस समय पति व पत्नी दोनों ही घबराएं होते हैं. वधु के ससुराल पहुंचने के बाद सभी रिवाजों को पूरा करने के पश्चात वर-वधु को सोने के लिए एक कमरे में भेज दिया जाता है.

अब सुहागरात के दौरान क्या करना चाहिए, उसको क्रमवार तरीके से बताया जा रहा है.

सुहागरात पर वधु को तोहफा दें :

नई वधु को अपने साथ सहज बनाने के लिए बातें करना और तोहफा देना जरूरी होता है. इस रात आप महिला साथी को जो भी तोहफा देंगे वह उनको जीवन भर याद रहेगा. इतना ही नहीं तोहफा से देने डर व घबराहट का माहौल सामान्य हो जाएगा और आप दोनों एक दूसरे से बातों की शुरूआत कर पाएंगे.

सुहागरात में एक दूसरे को जानें :

शादी की पहली रात वर-वधु दोनों को ही एक-दूसरे को जानना चाहिए. इस रात को लेकर सभी के मन में घबराहट और शंकाएं होती हैं. ऐसे में आप दोनों को प्रयास करते हुए माहौल को सहज और खुशनुमा बनाना होगा. इस दौरान आप एक दूसरे की पसंद और ना पंसद के बारे में जानें. इस रात आप अपनी आने वाली जिंदगी के कुछ जरूरी मुद्दों पर भी बात कर सकते हैं. सुहागरात में एक दूसरे से बात करके साथी को समझने में आसानी होती है. साथ ही इससे आप दोनों के बीच के रिश्ते में मजबूती आती है और आप एक दूसरे से भावनात्मक रूप से जुड़ पाते हैं.

शादी की पहली रात कैसे करें सेक्स :

जब आप दोनों साथी एक दूसरे के साथ सहज महसूस करने लगते हैं तो आप दोनों में से कोई भी शारीरिक क्रिया के लिए पहल कर सकता है. सुहागरात पर महिलाओं का ऐसा सोचना कि पुरुष ही पहल करें, एक गलत धारणा है. यह आप दोनों की यौन सहमति के आधार पर की जाने वाली क्रिया होती है. सेक्स करने से पहले आप इस विषय पर चर्चा कर सकते हैं. इस दौरान आपके मन में सुहागरात को लेकर कोई कल्पना हो तो उसको भी साथी के साथ शेयर करें.

सुहागरात में उतावलापन न दिखाएं :

सुहागरात को लेकर पुरुषों में इतनी उत्सुकता होती है कि वह कमरे में दुल्हन को पाकर उतावले हो जाते हैं. पुरुषों का ऐसा करना महिलाओं को असहज कर सकता है. उतावलेपन में आप अपने साथी को पूरी तरह से संतुष्ट नहीं कर पाते हैं. इसलिए जल्दबाजी न दिखाएं और सेक्स करते समय संयम से काम ले और धीरे-धीरे प्यार के साथ सेक्स करें. पहली बार सेक्स करते समय कई महिलाओं की योनि में अधिक दर्द होता है. इसके साथ ही योनि से रक्तस्त्राव भी होता है. ऐसे में आप दोनों ही घबराएं नहीं, यह एक सामान्य प्रक्रिया होती है. विशेषज्ञों का कहना है कि यह जरूरी नहीं है कि पहली बार सेक्स करते समय सभी महिलाओं की योनि से रक्त स्त्राव हो.

शादी की पहली रात सेक्स से पहले करें फोरप्ले :

सुहाग की पहली रात सेक्स करने से पहले आपको साथी के साथ थोड़ा समय फोरप्ले में बिताना चाहिए. महिलाओं को चरमसुख (और्गेज्म) तक पहुंचने में पुरुषों के मुकाबले ज्यादा समय लगता है. ऐसे में आप फोरप्ले की सहायता से महिला साथी को आसानी से ऑर्गेज्म तक पहुंचा सकते हैं. इसमें किस करना व उनको प्यार से सहलाना शामिल है. फोरप्ले का उद्देश्य महिला को सेक्स के लिए उत्तेजित करना होता है.

शादी की पहली रात सेक्स के दौरान सावधानी बरतें :

शादी की पहली रात सेक्स करते समय आप ऐसा कुछ न करें जिससे आपको यौन संचारित रोग (एसटीडी) होने का खतरा बना रहें. इस तरह के संक्रमण से बचने के लिए आपको सेक्स करते समय सावधानी बरतनी होगी. इसके लिए आप कंडोम का इस्तेमाल करें.

शादी की पहली रात क्या न करें

सुहागरात आपकी जिंदगी की अहम रात होती है. इस रात ऐसी कोई गलती न करें जिससे आपको सारी जिंदगी शर्मिंदगी महसूस हो. इस दौरान निम्न गलतियों को करने से बचें.

जबदस्ती न करें :

सुहागरात में अपनी महिला साथी के साथ सेक्स के लिए जबरदस्ती न करें. उनकी सहजता और सहमति हो तब ही सेक्स करना बेहतर होगा.

नशे से दूर रहें :

शादी की पहली रात खुद को जोशीला बनाने के लिए अधिकतर लोग शराब और धूम्रपान आदि नशा करते हैं. शादी के बाद आप दोनों ही इस नए रिश्ते की शुरुआत करते है ऐसे में नशा करना आपके रिश्ते पर खराब असर डाल सकता है. इसके साथ ही नशा करने से आपकी यह महत्वपूर्ण रात भी खराब हो सकती है. सुहागरात मनाने के तरीके में आपको नशे से दूर रहने की बात को हमेशा याद रखनी चाहिए.

शादी के खर्चों का हिसाब न लगाएं :

शादी के बाद सुहागरात आपकी जीवन की महत्वपूर्ण रात है, इसको शादी में हुए खर्चों को जोड़ने में बर्बाद न करें. सुहागरात टिप्स में यह एक उपयोगी टिप्स मानी जाती है, क्योंकि अक्सर देखा जाता है कि पुरुष व महिला को शादी के कामों के बाद इस रात ही फुर्सत के पल मिल पाते हैं और ऐसे में एकांत मिलते ही वह दोनों या कोई एक अपनी शादी के खर्चों को जोड़ना शुरू कर देता हैं. ऐसा करना बेहद ही गलत है.

घबराएं नहीं :

सुहागरात के दिन महिला व पुरुष दोनों ही घबराएं हुए होते हैं. इस घबराहट के कारण पुरुषों में कई बार नपुंसकता व शीघ्रपतन की समस्या हो जाती है. ऐसे में आप घबराकर किसी तरह की दवाईयों का सेवन न करें. पहली बार सेक्स करने और घबराहट के कारण पुरुषों में इस तरह की यौन समस्याएं उत्पन्न हो जाती हैं. बार-बार अभ्यास करने से आप सेक्स के लिए सहज हो जाएंगे. सेक्स में आपके सहज होने से इस तरह की यौन समस्याएं अपने आप ही ठीक हो जाएंगी. लेकिन समस्याएं लगातार हो रही है, तो आपको इसके लिए डौक्टर से मिलना होगा.

सेक्स, सपने और सच्चाई की अनोखी दुनिया

डा.पौम स्पर के अनुसार, सपनों की दुनिया आप के यथार्थ की दुनिया से एकदम अलग हो सकती है. सपने में आप औफिस में बौस के साथ सैक्स कर रहे हैं, जबकि आप उसे पसंद तक नहीं करते. डा. पौम स्पर का मानना है कि लोग अमूमन अपने पुराने साथी के साथ सैक्स के सपने देखते हैं, जबकि वे एक नए रिश्ते में बंध चुके होते हैं. यह एक आम बात है. इस में कुछ भी असामान्य नहीं है.

रवि फैंटेसी की दुनिया में जीता था. हमेशा उस के दिमाग में उथलपुथल मची रहती थी. वह काफी परेशान भी दिखता था. उस के दोस्तों ने जब उसे काफी कुरेदा, तो उस ने बताया कि उसे लगभग रोजाना ऐसा सपना आता है. ऐसे सपने देखना कोई बुरी बात नहीं है और न ही अप्राकृतिक है, लेकिन उस की परेशानी की वजह यह थी कि उसे सपने में केवल सैक्स की बातें आती थीं. आखिर क्यों? कहीं यह दिनभर फैंटेसी में रहने का नतीजा तो नहीं था?

असल में कई लोग सैक्स को ले कर काफी उतावले रहते हैं, लेकिन इसे मन में दबाए रखते हैं. इस कमी को पूरी करने के लिए वे सपनों में इस का अनुभव करते हैं. ऐसा नहीं कि सैक्सी सपनों पर केवल जवां दिलों का ही अधिकार है. मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि सभी उम्र के लोगों को सैक्सी सपने आते हैं. सैक्स से संबंधित सपने अकसर बढ़ती उम्र के साथ बढ़ जाते हैं, लेकिन इन का हमारी सैक्स लाइफ से कोई संबंध नहीं है.

मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि उम्र बढ़ने के साथसाथ रचनात्मक प्रवृत्ति वाले लोेगों को ऐसे सपने भी अधिक आते हैं. वाकई सपनों की दुनिया अजीब है, सोने के बाद हम किस दुनिया में चले जाते हैं हमें मालूम भी नहीं होता. यह दुनिया हमारे असल जीवन से कितनी भिन्न होती है और इस का हमारी जिंदगी से क्या रिश्ता है, कई बार यह सम झना मुश्किल हो जाता है.

आप जब सपने में किसी के साथ सैक्स कर रहे होते हैं और उत्तेजित हो कर जागते हैं, तब आप ने क्या कभी सोचा है कि यह एहसास कहां से आता है? क्या इन सपनों के माने कुछ और भी हो सकते हैं?

सैक्स से जुड़ा विचार भी यदि सपने में आए तो इस का भी एक अर्थ होता है. ऐसा कई लोगों के साथ होता है और काफी आम बात भी है, लेकिन यह एक ऐसा सपना है जो व्यक्ति को हैरत में डाल देता है. आप कोई डरावना या किसी की मृत्यु का सपना देखेंगे तो उसे कुछ समय बाद भुला देने में सफल हो जाएंगे, लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि सैक्स से जुड़ा सपना ऐसा होता है जिसे भुलाने का विचार काफी दूर होता है. काफी देर तक तो व्यक्ति यह नहीं सम झ पाता कि उसे ऐसा सपना आया क्यों?

लोग अमूमन अपने पुराने साथी के साथ सैक्स के सपने देखते हैं जबकि वे एक नए रिश्ते में बंध चुके होते हैं. यह एक आम बात है. इस में कुछ भी असामान्य नहीं है. जब कभी आप को मदभरी हसीनाओं की रंगीनियां ख्वाबों में सराबोर कर दें, तो जागने पर शर्मसार न हों, क्योंकि यह केवल आप के रंगीन सपनों की आवारगी का नतीजा नहीं है.

मनोवैज्ञानिकों ने कुछ सपनों के कारण बताए हैं, जिन्हें जान कर आप हैरान हो जाएंगे. अगर आप सेम जैंडर के पार्टनर के साथ सैक्स का सपना देखते हैं, तो परेशान न हों. इस का यह मतलब नहीं है कि आप की बौडी या सोच में सैक्स को ले कर चेंज आ रहा है, बल्कि इस का मतलब है कि आप विश्वास से भरे व्यक्ति हैं और खुद को बहुत प्यार करते हैं. अगर आप सपने में खुद को सिर्फ एक नहीं बल्कि कई पार्टनर्स के साथ सैक्स करते हुए देखते हैं, तो यह आप की दबी हुई सैक्सुअल भावनाओं का प्रतीक है. इस का मतलब है कि आप का मन कुछ प्रयोग करने के लिए तड़प रहा है.

डा. पौम स्पर ने अपनी किताब ‘ड्रीम्स ऐंड सिंबल्स अंडरस्टैंडिंग यौर सबकौंशस डिजायर्स’ में लोगों के बिस्तर के रहस्यों का खुलासा किया है. उन के अनुसार, आप के सैक्स के सपने आप के साथी या जिसे आप बेपनाह चाहते हैं, उस से जुड़े नहीं होते हैं. जब आप सैक्स के सपने देखते हैं और उत्तेजना के साथ जागते हैं, तो इन सपनों के माने कुछ और भी हो सकते हैं. डा. पौम स्पर के अनुसार सपनों की दुनिया आप के यथार्थ की दुनिया से एकदम परे हो सकती है.

डा. पौम स्पर का मानना है कि लोग अमूमन अपने पुराने साथी के साथ सैक्स के सपने देखते हैं, जबकि वे एक नए रिश्ते में बंधे होते हैं. यह एक आम बात है. इस में कुछ भी असामान्य नहीं है.

कई बार आप खुद को किसी अजनबी के साथ बिस्तर पर देखते हैं. वह आप को अपना सा लगता है और खुशी देता है, लेकिन यह  सही नहीं है. दरअसल, इस का मतलब है कि आप को अब अपने भीतर कुछ मर्दाना क्वालिटीज लानी होंगी, जैसे, खुल कर अपनी बात रखना, स्टैंड लेना आदि. यदि आप खुद को किसी ऐसे व्यक्ति के साथ इंटिमेट होता देखें जिस से आप का रिश्ता ही कुछ और है, मसलन, आप की फ्रैंड का पति या कोई और, तो उस का यह कतई मतलब नहीं है कि आप उस की तरफ अट्रैक्ट हैं. आप सिर्फ यह जानने के लिए उतावले हैं कि वह बैड पर क्या चाहता है. साथ ही आप को भी लाइफ में किसी बेहतर इंसान की जरूरत है.

अगर आप सपने में अपनी पूर्व गर्लफ्रैंड या बौयफ्रैंड के साथ सैक्स करते हैं तो हो सकता है पुराने प्रेमी या प्रेमिका के साथ आप की सैक्स लाइफ बहुत अच्छी रही हो. हो सकता है कि आप अपने नए साथी की तुलना पुराने साथी से न करती हों, लेकिन आप का अचेतन मन ऐसा करता है. अगर आप सिंगल हैं तो इस का मतलब है कि आप सैक्स मिस कर रहे हैं.

यदि आप सपने में अपने किसी पसंदीदा स्टार के साथ सैक्स करते हैं तो इस का सीधा मतलब है कि आप अपने पार्टनर में और भी बहुत कुछ तलाश रहे हैं. आप स्टार का लुक और सक्सैस को अपने पार्टनर की खूबियों के साथ तोलते हैं.

अगर कोई सपने में अपने पति/पत्नी या प्रेमी के साथ सैक्स करता है, तो इस के अलगअलग मतलब होते हैं या तो आप का रिलेशन काफी बेहतर है या फिर आप को अपने पार्टनर से वह सब नहीं मिल रहा जो आप चाहते हैं. सैक्सोलौजिस्ट कहते हैं कि ऐसा सपना आने पर पार्टनर से बात कर के इस का कारण जानने की कोशिश करनी चाहिए.

यदि आप ने सपने में अपने ऐक्स के साथ काफी क्रेजी रात गुजारी है, तो आप अकेले नहीं हैं, ऐसा कई लोगों के साथ होता है. अगर रीयल लाइफ में आप ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं, तो इस में कोई बुराई भी नहीं है. इस का मतलब यह है कि आप की मौजूदा रिलेशनशिप नीरस हो गई है और आप को उस में कुछ ऐक्साइटमैंट लाने की जरूरत है.

मैंने सुना है कि शराब पीने से सैक्स क्षमता बढ़ जाती है ,क्या ये बात सच है ?

सवाल
मैं 32 वर्षीय पुरुष हूं. मैं ने सुना है कि मदिरापान से सैक्स क्षमता बढ़ जाती है. क्या यह बात सच है? क्या किसी हलकेफुलके नशे का कामोन्माद पर कोई असर पड़ता है?

जवाब

मदिरापान और यौन क्षमता के बीच के संबंध को न केवल समाज में, बल्कि पुराने चलचित्रों और नाटकों में भी तरह तरह से उकेरा गया है. शायद इसी के चलते समाज में यह धारणा भी बहुप्रचलित है कि मदिरा सेवन से यौन क्षमता बढ़ जाती है.

मदिरा थोड़ी लें या अधिक स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डालती है. मदिरा से प्रेम के सुर झंकृत होते हों, ऐसा ठीक नहीं मालूम होता. मदिरा लेने के बाद संवेदनशीलता भी किसी सीमा तक कम हो जाती है.

60 मिलीलीटर से अधिक मात्रा में ली गई मदिरा यौन क्षमता को पक्के तौर पर घटाती है. सचाई से नाता टूटने के कारण तरह तरह के भ्रम भी जन्म ले सकते हैं. लंबे समय तक निरंतर मदिरा सेवन करते रहने से पुंसत्वहीनता भी उत्पन्न हो जाती है.

हलकेफुलके नशे से आप का तात्पर्य क्या है, यह समझ पाना मुश्किल है. पर गांजा, चरस और कोकीन का लंबे समय तक बराबर सेवन यौन सामर्थ्य समाप्त कर सकता है. दूसरे नशों और कुछ दवाओं के सेवन पर भी यही समस्या आम देखी जाती है.

इसी प्रकार प्रशांतक दवाएं जैसे डायजेपाम, लोराजेपाम, सिडेटिव दवाएं, अल्सररोधी दवा रैनिटिडाइन और ब्लडप्रैशर घटाने के लिए दी जाने वाली कुछ उच्च रक्तचापरोधक दवाएं भी पुरुष यौन सामर्थ्य के आड़े आ सकती हैं.

सैक्स का सुख पाने के लिए किसी भी प्रकार के नशे पर निर्भर रहने के बजाय आपसी प्रेम होना अधिक माने रखता है.

हवेली : गीता के दम तोड़ते एहसास

‘साड्डा चिडि़यां दा चंबा वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’ यानी हे पिता, हम लड़कियों का अपने पिता के घर में रहना चिडि़यों के घोंसले में पल रहे नन्हे चूजों के समान होता है, जो जल्द ही बड़े हो कर उड़ जाते हैं. हे पिता, हमें तो बिछुड़ जाना है.

लोग कहते हैं कि हमारे लोकगीतों में जिंदगी के दुखदर्द की सचाई बयान होती है, मगर गीता के लिए इस लोकगीत का मतलब गलत साबित हुआ था. आसपास की सभी लड़कियां ससुराल जा कर अपनेअपने परिवार में रम गई थीं, मगर गीता ने यों ही सारी जिंदगी निकाल दी. इस तनहा जिंदगी का बोझ ढोतेढोते गीता के सारे एहसास मर चुके थे. कोई अरमान नहीं था. अपनी अधेड़ उम्र तक उसे अपने सपनों के राजकुमार का इंतजार रहा, मगर अब तो उस के बालों में पूरी सफेदी उतर चुकी थी. आसपड़ोस के लोगों के सहारे ही अब उस के दिन कट रहे थे.

एक वक्त था, जब इसी हवेली में गीता का हंसताखेलता भरापूरा परिवार था. अब तो यहां केवल गीता है और उस की पकी हुई गम से भरी जवानी व लगातार खंडहर होती जा रही यह पुरानी हवेली. गीता की कहानी इसी खस्ताहाल हवेली से शुरू होती है और उस का खात्मा भी यहीं होना तय है.

‘साड्डी लंबी उडारी वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’ यानी हमारी उड़ान बहुत लंबी है. ससुराल का घर बहुत दूर लगता है, चाहे वह कुछ कोस की दूरी पर ही क्यों न हो. हे पिता, हमें बिछुड़ जाना है.

गीता की शादी बहुत धूमधाम से हुई थी. बड़ेबड़े पंडाल लगाए गए थे. हजारों की तादाद में घराती और बराती इकट्ठा हुए थे. ऐसेऐसे पकवान बनाए गए थे, जो फाइवस्टार होटलों में भी कभी न बने हों. 10 किस्म के पुलाव थे, 5 किस्म के चिकन, बेहिसाब फलजूस, विलायती शराब की हजारों बोतलें पीपी कर लोग सारी रात झूमते रहे थे.

एक हफ्ते तक समारोह चलता रहा था. दनादन फोटो और वीडियो रीलें बनी थीं, जिन में गर्व से इतराते जवान दूल्हे और शरमाई दुलहन के साथ सभी रिश्तेदार खुशी से चिपक कर खड़े थे. गीता को तब पता नहीं था कि एक साल के अंदर ही उस की बदनामी होने वाली है.

‘कित्ती रोरो तैयारी वे… बाबुल, असां उड़ जाना…’ यानी शादी होने के बाद मैं ने बिलखबिलख कर ससुराल जाने की तैयारी कर ली है. हर किसी की आंखों में आंसू हैं. हे पिता, हमें बिछुड़ जाना है.

गीता का चेहरा शर्म से लाल सुर्ख हुआ जा रहा था और वह अंदर से इतनी ज्यादा खुश थी कि एक बहुत बड़े रईस परिवार से अब जुड़ गई थी. 2 महीने बाद उसे अपने पति के साथ लंदन जाना था. लड़के के परिवार वाले भी बेहद खुश दिख रहे थे. दूल्हा बड़ी शान से एक सजे हुए विशाल हाथी पर बैठ कर आया था. फूलों से लदी एक काली सुंदर चमचमाती लंबी लिमोजिन कार गीता की डोली ले जाने के लिए सजीसंवरी उस के पीछेपीछे आई थी.

लड़के का पिता अपने इलाके का बहुत बड़ा जमींदार था. उस ने भारी रोबदार लहजे में गीता के पिता से कहा था, ‘मेरे लिए कोई खास माने नहीं रखता कि तुम अपनी बेटी को दहेज में क्या देते हो. हमारे पास सबकुछ है. हमारी बरात का स्वागत कुछ ऐसे तरीके से कीजिएगा कि सदियों तक लोग याद रखें कि चौधरी धर्मदेव के बेटे की शादी में गए थे.’ लोग तो उस शानदार शादी को आसानी से भूल गए थे. आजकल तकरीबन सभी शादियां ऐसी ही सजधज से होती हैं. पर गीता को कुछ नहीं भूला था. उस के दूल्हे ने पहली रात को उसे हजारों सब्जबाग दिखाए थे.

शादी के बाद एक महीना कैसे बीता, पता ही नहीं चला. गीता के तो पैर जमीन पर नहीं पड़ते थे. वह पगलाई सी उस रस के लोभी भंवरे के साथ भारत के हर हिल स्टेशन पर घूमती रही, शादी को बिना रजिस्टर कराए. गीता के पति को एक दिन अचानक लंदन जाना पड़ा. कुछ महीनों बाद तक यह सारा माजरा गीता के परिवार वालों की समझ में नहीं आया. गीता तो कुछ ज्यादा ही हवा में थी कि विदेश जा कर यह कोर्स करेगी, वह काम करेगी.

कुछ दिनों तक गीता मायके में रही. ससुराल से कोई खोजखबर नहीं मिल पा रही थी. गीता का पति जो फोन नंबर उसे दे गया था, वह फर्जी था. लोगों को दो और दो जोड़ कर पांच बनाते देर नहीं लगती. अखबारों को भनक लगी, तो उन्होंने मिर्चमसाला लगा कर गीता के नाम पर बहुत कीचड़ उछाला. पत्रकारों को भी मौका मिल गया था अपनी भड़ास निकालने का. कहने लगे कि लालच के मारे ये

मिडिल क्लास लोग बिना कोई पूछताछ किए विदेशी दूल्हों के साथ अपनी लड़कियां बांध देते हैं. ये एनआरआई रईस 2-3 महीने जवान लड़की का जिस्मानी शोषण कर के फुर्र हो जाते हैं, फिर सारी उम्र ये लड़कियां विधवाओं से भी गईगुजरी जिंदगी बसर करती हैं. आने वाले समय में जिंदगी ने जो कड़वे अनुभव गीता को दिए थे, वे उस के लिए पलपल मौत की तरफ ले जाने वाले कदम थे. उस के मातापिता ने शादी में 25 लाख रुपए खर्च कर दिए थे और क्याकुछ नहीं दिया था. एक बड़ी कार भी उसे दहेज में दी थी.

खैर, 2-3 महीने बाद एक नया नाटक सामने आया. गीता के बैंक खाते में पति ने कुछ पैसे जमा किए. अब वह उसे हर महीने कुछ रुपए भेजने लगा था, ताकि पैसे के लिए ही सही गीता उस के खिलाफ कोई होहल्ला न करे. गीता के पिता ने कुछ रिश्तेदारों को साथ ले कर उस की ससुराल जा कर खोजबीन की.

पता चला कि लड़का तो लंदन में पहले से ही शादीशुदा है. यह बात उस ने अपने मांबाप से भी छिपाई थी. कुछ अरसा पहले उस ने अपनी मकान मालकिन से ही शादी कर ली थी, ताकि वहां का परमानैंट वीजा लग जाए. बाद में उस से पीछा छुड़वा कर वह गीता से शादी करने से 7 महीने पहले एक और रूसी गोरी मेम से कोर्ट में शादी रचा चुका था. गीता के साथ तो उस ने अपने मांबाप को खुश रखने के लिए शादी की थी, ताकि वह सारी उम्र उन की ही सेवा में लगी रहे.

इस मामले में गीता के घर वाले उस की ससुराल वालों को फंसा सकते थे, मगर यह इतना आसान नहीं था. गीता के मांबाप ने उस के ससुराल पक्ष पर सामाजिक दबाव बढ़ाना शुरू किया और अदालत का डर दिखाया, तो वे 5 लाख रुपए दे कर गीता से पीछा छुड़ाने का औफर ले कर आ गए. गीता की शादी भारत में रजिस्टर नहीं हुई थी और इंगलैंड में उस की कोई कानूनी मंजूरी नहीं थी, इसलिए गीता के घर वाले उस के पति का कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे, जिस ने गीता के साथ यह घिनौना मजाक किया था.

गीता के ससुराल वाले चाहते थे कि एक महीने तक उन के बेटे को जो गीता ने सैक्स सर्विस दी थी, उस का बिल 5 लाख रुपए बनता है. वह ले कर गीता दूसरी शादी करने को आजाद थी. वे बाकायदा तलाक दिलाने का वादा कर रहे थे. अब गीता का पति उन के हाथ आने वाला नहीं था.

तब गीता की ससुराल वालों ने उस के परिवार को एक दूसरी योजना बताई. गीता का देवर अभी कुंआरा ही था. उन्होंने सुझाया कि गीता चाहे तो उस के साथ शादी कर सकती है. ऐसा खासतौर पर तब किया जाता है, जब पति की मौत हो जाए. गीता की मरजी के बिना ही उस की जिंदगी को ले कर अजीबअजीब किस्म के करार किए जा रहे थे और वह हर बार मना कर देती. कोई उस के दिल के भीतर टटोल कर नहीं देख रहा था कि उसे क्या चाहिए.

फिर कुछ महीनों बाद गीता की ससुराल वालों का यह प्रस्ताव आया कि गीता के परिवार वाले 10 लाख रुपए का इंतजाम करें और गीता को उस के पति के पास लंदन भेज दें. शायद गीता के पति का मन अपनी विदेशी मेम से भर चुका था और वह गीता को बीवी बना कर रखने को तैयार हो गया था. गीता के सामने हर बार इतने अटपटे प्रस्ताव रखे जाते थे कि उस का खून खौल उठता था. शुरू में तो गीता को लगता था कि उस के परिवार वाले उस के लिए कितने चिंतित हैं और वे उस की पटरी से उतरी हुई गाड़ी को ठीक चढ़ा ही देंगे, मगर फिर उन की पिछड़ी सोच पर गीता को खीज भरी झुंझलाहट होने लगी थी.

गीता अपने दुखों का पक्का इलाज चाहती थी. समझौते वाली जिंदगी उसे पसंद नहीं थी. वह हाड़मांस की बनी एक औरत थी और इस तरह का कोई समझौता उस की खराब शादी को ठीक नहीं कर सकता था. अब गीता के मांबाप के पास इतना पैसा नहीं था कि वे उसे लंदन भेज सकें, ताकि गीता उस आदमी को पा सके. मगर पिछले 3 साल से वह भारत नहीं आया था और ऐसा कोई कानून नहीं था कि गीता के परिवार वाले उसे कोई कानूनी नोटिस भिजवा सकें.

गीता के मांबाप ने कोर्ट में केस दायर कर दिया था. वे अपने 25 लाख रुपए वापस चाहते थे, जो उन्होंने गीता की शादी में खर्च किए थे. गीता के लिए तो यह सब एक खौफनाक सपने की तरह था. वह पैसा नहीं चाहती थी. वह अपने बेवफा पति को भी वापस नहीं चाहती थी.

गीता क्या चाहती थी, यह उस की कच्ची समझ में तब नहीं आ रहा था. हर कोई अपनी लड़ाई लड़ने में मसरूफ था. किसी ने यह नहीं सोचा था कि गीता की उम्र निकलती जा रही है, उस के मांबाप बूढ़े होते जा रहे हैं. कोई सगा भाई भी नहीं है, जो बुढ़ापे में गीता की देखभाल करेगा.

अदालत के केस में फंसे गीता के पिता की सारी जमापूंजी खत्म हो गई. गीता की ससुराल वालों के पास खूब पैसा था. केस लटकता जा रहा था और एक दिन गीता के पिता ने तंग आ कर खेत में पेड़ से लटक कर जान दे दी. मां ने 3-4 साल तक गीता के साथ कचहरी की तारीखें भुगतीं, मगर एक दिन वे भी नहीं रहीं.

अब अपनी लड़ाई लड़ने को अकेली रह गई थी अधेड़ गीता. खेतों से जो पैदावार आती थी, वह इतनी ज्यादा नहीं थी कि लालची वकीलों को मोटी फीस दी जा सके. थकहार कर गीता ने कचहरी जाना ही छोड़ दिया. वह अपनी ससुराल वालों की दी गई हर पेशकश या समझौते को मना करती रही. एकएक कर के गीता के साथ के सभी लोग मरखप गए.

हवेली का रंगरूप बिगड़ता गया. अब इस कसबे में नए बाशिंदे आ कर बसने लगे थे. सरकार ने जब इस क्षेत्र को स्पैशल इकोनौमिक जोन बनाया, तो आसपास के खेतों में कारखाने खुलने लगे. उन में काम करने वालों के लिए गीता की हवेली सब से सस्ती जगह थी. गीता किराए के सहारे ही हवेली का थोड़ाबहुत रखरखाव कर रही थी. अपने बारे में तो उस ने कब से सोचना छोड़ दिया था.

ऐसा लग रहा था कि गीता और हवेली में एक प्रतियोगिता चल रही थी कि कौन पहले मिट्टी में मिलेगी.

संन्यास: क्या थी धनपत की दशा

क्या थी   ‘‘बस, समझ लो कि इस घर में यह मेरा आखिरी खाना था,’’ लंबी डकार ले कर धनपत ने पेट पर हाथ फेरते हुए कहा.

यह सुनते ही सुमति के हाथ बरतन समेटते अचानक रुक गए. उस ने गौर से अपने पति के चेहरे का मुआयना किया और पूछा, ‘‘क्या मतलब…?’’

‘‘कल से मैं संन्यास ले रहा हूं,’’ धनपत ने सहज भाव से कहा.

जोरदार धमाका हुआ. सुमति ने सारे बरतन सामने दीवार पर दे मारे और चिल्ला कर कहा, ‘‘तू फिर संन्यास लेगा?’’

चारों बच्चे चौके के दरवाजे पर आ खड़े हुए. 2-2 के झुंड में दाएंबाएं हो कर भीतर झांकने लगे, जैसे किसी बड़े मनोरंजक नाटक के तंबुओं को फाड़ कर बिना पैसे के देख कर मजे ले रहे हों.

सुमति उचक कर अलमारी के ऊपर चढ़ी और चीनी मिट्टी के बरतन से नीबू का अचार निकाल कर धनपत के मुंह में जबरन ठूंसने लगी और चिल्ला कर बोली, ‘‘ले खा चुपचाप.’’

‘‘क्या है?’’ धनपत ने ऐसे पूछा जैसे ये रोजमर्रा की बातें हों.

‘‘नीबू का अचार है. मुए, तेरी भांग का नशा उतार कर रहूंगी.’’

‘‘भांग नहीं, भंग,’’ झूमते हुए धनपत ने संशोधन किया.

‘‘तू आज फिर उन रमसंडों के डेरे पर गया था?’’ सुमति ने गरज कर पूछा.

‘‘रमसंडे नहीं, साधुमहात्मा,’’ धनपत ने अचार चबाते हुए कहा.

सुमति अपना माथा पकड़ कर चूल्हे के पास बैठ गई. महीने 2 महीने में संन्यासी होने का दौरा धनपत पर पड़ता था. जब भी शहर में साधुओं की टोली आती थी, धनपत दिनदिन भर उन्हीं के साथ बैठा रहता और मुफ्त की भांग और गांजा पीता रहता.

धनपत एक सेठ की दुकान पर मुनीमगीरी करता था. वह अब तक

8 बार नौकरी से निकाला जा चुका था और फिर वापस ले लिया गया था. सेठ धनपत की होशियारी और ईमानदारी की वजह से उसे वापस ले लिया करता था.

सुमति धनपत की इन हरकतों से परेशान थी. तनख्वाह में धनपत को मिले रुपए से घर का खर्च चलता नहीं था, लिहाजा वह 4 घरों में चौकाबरतन करने लगी थी. बड़ा बेटा शंकर अखबार बेच कर 15-20 रुपए रोज कमा लिया करता था, जिस से खुद उस की और छोटे भाईबहनों की पढ़ाई ठीकठाक चल

जाती थी.

धनपत पहले भी 2-3 बार घर से भाग चुका था. काशी, हरिद्वार और इलाहाबाद में साधुसंन्यासियों की संगत में रह कर फिर घर लौट आता. हर

बार जाने से पहले वह ऐसी ही बहकीबहकी बातें किया करता था.

अब भी सुमति को यही चिंता लगी थी. शहर में पिछले 4 दिनों से कुछ साधुओं ने रामलीला मैदान में डेरा जमा रखा था. जरूर उन लोगों ने ही इसे बरगलाया होगा, इसीलिए यह फिर संन्यास लेने की बात कह

रहा है.

हालांकि सुमति जानती थी कि जब अंटी के पैसे खत्म हो जाएंगे, तो धनपत चुपचाप घर लौट आएगा. मुनीमगीरी करेगा और फिर कसमें खाएगा कि अब संन्यास नहीं लेगा. फिर भी वह इस बात पर चिंतित थी कि बेहद सीधे स्वभाव वाले उस के पति को कुछ हो न जाए. जमाना खराब चल रहा है. जबजब ये बातें उस के दिमाग में आतीं, तबतब वह सिहर उठती. धनपत आखिर जैसा भी है, उस का पति है.

बाहर खड़े बच्चों ने मातापिता को चुपचाप कुछ सोचते हुए देखा, तो ‘शो’ जल्दी खत्म हो जाने की वजह से वे निराश हो कर अपने दड़बेनुमा कमरे की तरफ बढ़ चले.

इस बस्ती में छोटेछोटे घरों में कईकई लोग भेड़बकरियों की तरह ठुंसे रहते थे. धनपत के घर पर ही 6 लोग थे. कम आमदनी में शहर में परिवार पालना बहुत बड़ी समस्या थी. फिर धनपत तो भांग और गांजे का सेवन करता था. कर्जा चढ़ा था, सो अलग.

रात गहराती जा रही थी. साथ ही साथ सुमति की चिंता बढ़ती जा रही थी कि वह धनपत को कैसे रोके.

‘‘अच्छा, तो सुमति देवी, मुझे इजाजत दो. कहासुना माफ करना,’’ धनपत की आवाज से सुमति की सोच का सिलसिला टूटा.

सुमति ने एक पल उसे देखा, फिर भयंकर तेवर अपनाते हुए गरज कर बोली, ‘‘क्या कहा, माफ कर दूं? आज तू एक कदम भी घर से बाहर रख

कर देख. मैं उतारती हूं तेरे संन्यास

की सनक.’’

अगर और कोई वक्त होता, तो धनपत भी तूतूड़ाक करने लगता, लेकिन अभी वह भांग की तरंग में था, इसलिए दार्शनिकों के अंदाज में वह बोला, ‘‘आज मुझे मत रोको सुमति देवी. तुम नहीं जानती कि संन्यासी जीवन में कितनी शांति है.’’

सुमति गरज कर बोली, ‘‘इतना अचार चबाने के बाद भी तेरी भांग नहीं उतरी. बच्चे, घरगृहस्थी, कर्जा ये सब एक औरत के ऊपर छोड़ कर जाते हुए तुझे शर्म नहीं आती?’’

‘‘जिस आदमी के दिल में वैराग्य की भावना पैदा हो गई हो, उसे इन सब बातों से क्या मतलब…? और फिर बच्चे, घर वगैरह तो मोहमाया की बातें हैं. रही बात तुम्हारी, तो इतिहास गवाह है कि बुद्ध भी इसी तरह ज्ञान पाने के लिए घर से निकले थे,’’ धनपत ने तर्क दिए.

सुमति के पास इन बातों का कोई जवाब शायद नहीं था, पर फिर भी वह घायल शेरनी की तरह दहाड़ी, ‘‘तू जिन बुद्ध की बातें कह रहा है, वे राजामहाराजा थे. तेरे पास कौन सी जागीर है, जिस के सहारे तू हमें छोड़े

जा रहा है? और ये औलादें क्या

अकेले मैं ने पैदा की थीं? सीधे क्यों

नहीं बोलता कि जिम्मेदारियों से घबरा गया है और संन्यास के नाम पर बारबार घर से भाग जाता है,’’ कहतेकहते वह हांफने लगी.

‘‘कुछ भी हो, मैं ने संन्यास लेने का फैसला लिया है. अब संसार की कोई भी ताकत मुझे रोक नहीं सकती,’’ कुछ रुक कर धनपत अकड़ कर बोला.

पति की ये बातें सुनने के बाद सुमति का कलेजा मुंह तक आ गया. वह इस बात को समझ गई कि अब यह नहीं रुकने वाला है. वह चिल्लाचिल्ला कर रोने लगी और धनपत को पकड़ कर दरवाजे पर धकियाते हुए बोली, ‘‘जा भाग, लेले संन्यास, मांग भीख, लेकिन अब फिर कभी इस घर में अपने पैर

मत रखना.’’

सुबहसुबह सुमति की तेज आवाजें सुन कर उस के पड़ोस के लोग भी घरों से बाहर आ कर मुफ्त के मनोरंजन का मजा लेने लगे. हालांकि उन्हें मन ही मन सुमति से हमदर्दी थी.

सुमति अब भी चिल्ला रही थी, ‘‘मैं चला लूंगी गृहस्थी, पाल लूंगी बालबच्चों को. तू भाग यहां से…’’

तभी धनपत का बड़ा बेटा शंकर साइकिल से घर के पास आ कर रुका. वह अखबार बेच कर घर आया था. अपने घर के बाहर उस ने भीड़ और सुमति को चीखतेचिल्लाते देखा. माजरा उस की समझ में नहीं आया.

शंकर को देखते ही सुमति को कुछ राहत मिली. वह चीखचीख कर उस से कहने लगी, ‘‘देख बेटा, तेरा बाप बुजदिलों की तरह घर छोड़ कर जा रहा है, संन्यास ले रहा है, उसे रोक.’’

शंकर ने एक सरसरी निगाह पहले पड़ोसियों पर और फिर धनपत पर डाली. उस के बाद सुमति की बांह पकड़ घर के अंदर ले जाते हुए उस ने कहा, ‘‘इन्हें जाने दे मां. तू भीतर चल.’’

यह बात सुन कर सुमति को

लगा मानो कोई पहाड़ टूट पड़ा हो. वह बोली, ‘‘क्या…? तू भी ऐसी बातें कह रहा है?’’

सुमति की बातों का कोई जवाब दिए बिना शंकर जबरदस्ती उसे घर में ले गया और भड़ाक से दरवाजा बंद कर लिया.

बाहर खड़े लोग अपनेअपने ढंग से सोचते रहे. धनपत रामलीला मैदान की तरफ चल पड़ा.

अंदर सुमति फूटफूट कर रो रही थी.

‘‘खाना दो मां,’’ शंकर ने ऐसे कहा, मानो उसे इन बातों से कुछ लेनादेना ही नहीं था.

‘‘खाना दूं? उधर तेरा बाप घर छोड़ कर चला गया और इधर तुझे भूख लगी है? रोका क्यों नहीं?’’ सुमति ने गुस्से में उबल कर कहा.

‘‘कुछ नहीं होगा. अब संन्यास का भूत हमेशा के लिए उन के सिर पर से उतर जाएगा. अभी थोड़ी देर में वे लौट आएंगे,’’ शंकर ने कहा.

सुमति ने हैरानी से बेटे की तरफ सवालिया नजर से देखा.

‘‘वे साधु, जिन के साथ बाबूजी जाने वाले हैं, अब हवालात में बंद हैं,’’ शंकर ने कहा.

‘‘क्या…? क्यों…?’’ रोतीसिसकती सुमति ने चौंक कर पूछा.

‘‘हां…’’ अपना सिर झुकाए शंकर ने बताया, ‘‘कल शाम को उन में से एक साधु एक लड़की को पकड़ कर जबरदस्ती करने लगा था. लड़की की चीखपुकार सुन कर वहां काफी लोग इकट्ठा हो गए थे. पुलिस के आने तक उन लोगों ने उस की धुनाई की. अब बाबूजी को सही बात पता चलेगी, तो शायद उन की आंखें खुल जाएंगी.’’

यह सुन कर सुमति आंसू पोंछ कर मन ही मन खुश हुई और पति के लौट आने की आस में चुपचाप बैठ गई.

सचमुच धनपत 2 घंटे बाद घर लौट आया. दूसरे दिन से वह मुनीमगीरी करने लगा. उस के बाद उस ने संन्यास की बात कभी नहीं कही. उलटे उसे ऐसी बातों से चिढ़ ही होने लगी थी.

हम बेवफा न थे : अख्तर के दिल की आवाज

‘‘अरे, आप लोग यहां क्या कर रहे हैं? सब लोग वहां आप दोनों के इंतजार में खड़े हैं,’’ हमशां ने अपने भैया और होने वाली भाभी को एक कोने में खड़े देख कर पूछा.

‘‘बस कुछ नहीं, ऐसे ही…’’ हमशां की होने वाली भाभी बोलीं.

‘‘पर भैया, आप तो ऐसे छिपने वाले नहीं थे…’’ हमशां ने हंसते हुए पूछा.

‘काश हमशां, तुम जान पातीं कि मैं आज कितना उदास हूं, मगर मैं चाह कर भी तुम्हें नहीं बता सकता,’ इतना सोच कर हमशां का भाई अख्तर लोगों के स्वागत के लिए दरवाजे पर आ कर खड़ा हो गया.

तभी अख्तर की नजर सामने से आती निदा पर पड़ी जो पहले कभी उसी की मंगेतर थी. वह उसे लाख भुलाने के बावजूद भी भूल नहीं पाया था.

‘‘हैलो अंकल, कैसे हैं आप?’’ निदा ने अख्तर के अब्बू से पूछा.

‘‘बेटी, मैं बिलकुल ठीक हूं,’’ अख्तर के अब्बू ने प्यार से जवाब दिया.

‘‘हैलो अख्तर, मंगनी मुबारक हो. और कितनी बार मंगनी करने की कसम खा रखी है?’’ निदा ने सवाल दागा.

‘‘यह तुम क्या कह रही हो? मैं तो कुछ नहीं जानता कि हमारी मंगनी क्यों टूटी. पता नहीं, तुम्हारे घर वालों को मुझ में क्या बुराई नजर आई,’’ अख्तर ने जवाब दिया.

‘‘बस मिस्टर अख्तर, आप जैसे लोग ही दुनिया को धोखा देते फिरते हैं और हमारे जैसे लोग धोखा खाते रहते हैं,’’ इतना कह कर निदा गुस्से में वहां से चली गई.

सामने स्टेज पर मंगनी की तैयारी पूरे जोरशोर से हो रही थी. सब लोग एकदूसरे से बातें करते नजर आ रहे थे. तभी निदा ने हमशां को देखा, जो उसी की तरफ दौड़ी चली आ रही थी.

‘‘निदा, आप आ गईं. मैं तो सोच रही थी कि आप भी उन लड़कियों जैसी होंगी, जो मंगनी टूटने के बाद रिश्ता तोड़ लेती हैं,’’ हमशां बोली.

‘‘हमशां, मैं उन में से नहीं हूं. यह सब तो हालात की वजह से हुआ है…’’ निदा उदास हो कर बोली, ‘‘क्या मैं जान सकती हूं कि वह लड़की कौन है जो तुम लोगों को पसंद आई है?’’

‘‘हां, क्यों नहीं. वह देखो, सामने स्टेज की तरफ सुनहरे रंग का लहंगा पहने हुए खड़ी है,’’ हमशां ने अपनी होने वाली भाभी की ओर इशारा करते हुए बताया.

‘‘अच्छा, तो यही वह लड़की है जो तुम लोगों की अगली शिकार है,’’ निदा ने कोसने वाले अंदाज में कहा.

‘‘आप ऐसा क्यों कह रही हैं. इस में भैया की कोई गलती नहीं है. वह तो आज भी नहीं जानते कि हम लोगों की तरफ से मंगनी तोड़ी गई?है,’’ हमशां ने धीमी आवाज में कहा.

‘‘मगर, तुम तो बता सकती थीं.

तुम ने क्यों नहीं बताया? आखिर तुम भी तो इसी घर की हो,’’ इतना कह कर निदा वहां से दूसरी तरफ खड़े लोगों की तरफ बढ़ने लगी.

निदा की बातें हमशां को बुरी तरह कचोट गईं.

‘‘प्लीज निदा, आप हम लोगों को गलत न समझें. बस, मम्मी चाहती थीं कि भैया की शादी उन की सहेली की बेटी से ही हो,’’ निदा को रोकते हुए हमशां ने सफाई पेश की.

‘‘और तुम लोग मान गए. एक लड़की की जिंदगी बरबाद कर के अपनी कामयाबी का जश्न मना रहे हो,’’ निदा गुस्से से बोली.

‘‘नहीं, ऐसी बात नहीं?है. मैं अच्छी तरह से जानती हूं कि मम्मी की कसम के आगे हम सब मजबूर थे वरना मंगनी कभी भी न टूटने देते,’’ कह कर हमशां ने उस का हाथ पकड़ लिया.

‘‘देखो हमशां, अब पुरानी बातों को भूल जाओ. पर अफसोस तो उम्रभर रहेगा कि इनसानों की पहचान करना आजकल के लोग भूल चुके हैं,’’ इतना कह कर निदा ने धीरे से अपना हाथ छुड़ाया और आगे बढ़ गई.

‘‘निदा, इन से मिलो. ये मेरी होने वाली बहू के मम्मीपापा हैं. यह इन की छोटी बेटी है, जो मैडिकल की पढ़ाई कर रही है,’’ अख्तर की अम्मी ने निदा को अपने नए रिश्तेदारों से मिलवाया.

निदा सोचने लगी कि लोग तो रिश्ता टूटने पर नफरत करते हैं, लेकिन मैं उन में से नहीं हूं. अमीरों के लिए दौलत ही सबकुछ है. मगर मैं दौलत की इज्जत नहीं करती, बल्कि इनसानों की इज्जत करना मुझे अपने घर वालों ने सिखाया है.

‘‘निदा, आप भैया को माफ कर दें, प्लीज,’’ हमशां उस के पास आ कर फिर मिन्नत भरे लहजे में बोली.

‘‘हमशां, कैसी बातें करती हो? अब जब मुझे पता चल गया है कि इस में तुम्हारे भैया की कोई गलती नहीं है तो माफी मांगने का सवाल ही नहीं उठता,’’ निदा ने हंस कर उस के गाल पर एक हलकी सी चपत लगाई.

कुछ देर ठहर कर निदा फिर बोली, ‘‘हमशां, तुम्हारी मम्मी ने मुझ से रिश्ता तोड़ कर बहुत बड़ी गलती की. काश, मैं भी अमीर घर से होती तो यह रिश्ता चंद सिक्कों के लिए न टूटता.’’

‘‘मुझे मालूम है कि आप नाराज हैं. मम्मी ने आप से मंगनी तो तोड़ दी, पर उन्हें भी हमेशा अफसोस रहेगा कि उन्होंने दौलत के लिए अपने बेटे की खुशियों का खून कर दिया,’’ हमशां ने संजीदगी से कहा.

‘‘बेटा, आप लोग यहां क्यों खड़े हैं? चलो, सब लोग इंतजार कर रहे हैं. निदा, तुम भी चलो,’’ अख्तर के अब्बू खुशी से चहकते हुए बोले.

‘‘मुझे यहां इतना प्यार मिलता है, फिर भी दिल में एक टीस सी उठती?है कि इन्होंने मुझे ठुकराया है. पर दिल में नफरत से कहीं ज्यादा मुहब्बत का असर है, जो चाह कर भी नहीं मिटा सकती,’ निदा सोच रही थी.

‘‘निदा, आप को बुरा नहीं लग रहा कि भैया किसी और से शादी कर रहे हैं?’’ हमशां ने मासूमियत से पूछा.

‘‘नहीं हमशां, मुझे क्यों बुरा लगने लगा. अगर आदमी का दिल साफ और पाक हो, तो वह एक अच्छा दोस्त भी तो बन सकता है,’’ निदा उमड़ते आंसुओं को रोकना चाहती थी, मगर कोशिश करने पर भी वह ऐसा कर नहीं सकी और आखिरकार उस की आंखें भर आईं.

‘‘भैया, आप निदा से वादा करें कि आप दोनों जिंदगी के किसी भी मोड़ पर दोस्ती का दामन नहीं छोड़ेंगे,’’ हमशां ने इतना कह कर निदा का हाथ अपने भैया के हाथ में थमा दिया और दोनों के अच्छे दोस्त बने रहने की दुआ करने लगी.

‘‘माफ कीजिएगा, अब हम एकदूसरे के दोस्त बन गए हैं और दोस्ती में कोई परदा नहीं, इसलिए आप मुझे बेवफा न समझें तो बेहतर होगा,’’ अख्तर ने कहा.

‘‘अच्छा, आप लोग मेरे बिना दोस्ती कैसे कर सकते हैं. मैं तीसरी दोस्त हूं,’’ अख्तर की मंगेतर निदा से बोली.

निदा उस लड़की को देखती रह गई और सोचने लगी कि कितनी अच्छी लड़की है. वैसे भी इस सब में इस की कोई गलती भी नहीं है.

‘‘आंटी, मैं हमशां को अपने भाई के लिए मांग रही हूं. प्लीज, इनकार न कीजिएगा,’’ निदा ने कहा.

‘‘तुम मुझ को शर्मिंदा तो नहीं कर रही हो?’’ अख्तर की अम्मी ने पलट कर पूछा.

‘‘नहीं आंटी, मैं एक दोस्त होने के नाते अपने दोस्त की बहन को अपने भाई के लिए मांग रही हूं,’’ इतना कह कर निदा ने हमशां को गले से लगा लिया.

‘‘निदा, आप हम से बदला लेना चाहती?हैं. आप भी मम्मी की तरह रिश्ता जोड़ कर फिर तोड़ लीजिएगा ताकि मैं भी दुनिया वालों की नजर में बदनाम हो जाऊं,’’ हमशां रोते हुए बोली.

‘‘अरी पगली, मैं तो तेरे भैया की दोस्त हूं, दुख और सुख में साथ देना दोस्तों का फर्ज होता है, न कि उन से बदला लेना,’’ निदा ने कहा.

‘‘नहीं, मुझे यह रिश्ता मंजूर नहीं है,’’ अख्तर की अम्मी ने जिद्दी लहजे में कहा.

तभी अख्तर के अब्बू आ गए.

‘‘क्या बात है? किस का रिश्ता नहीं होने देंगी आप?’’ उन्होंने पूछा.

‘‘अंकल, मैं हमशां को अपने भाई के लिए मांग रही हूं.’’

‘‘तो देर किस बात की है. ले जाओ. तुम्हारी अमानत है, तुम्हें सौंप देता हूं.’’

‘‘निदा, आप अब भी सोच लें, मुझे बरबाद होने से आप ही बचा सकती हैं,’’ हमशां ने रोते हुए कहा.

‘‘कैसी बहकीबहकी बातें कर रही हो. मैं तो तुम्हें दिल से कबूल कर रही हूं, जबान से नहीं, जो बदल जाऊंगी,’’ निदा खुशी से चहकी.

‘‘हमशां, निदा ठीक कह रही हैं. तुम खुशीखुशी मान जाओ. यह कोई जरूरी नहीं कि हम लोगों ने उस के साथ गलत बरताव किया तो वह भी ऐसी ही गलती दोहराए,’’ अख्तर हमशां को समझाते हुए कहने लगा.

‘‘अगर वह भी हमारे जैसी बन जाएगी, तब हम में और उस में क्या फर्क रहेगा,’’ इतना कह कर अख्तर ने हमशां का हाथ निदा के भाई के हाथों में दे दिया.

‘‘निदा, हम यह नहीं जानते कि कौन बेवफा था, लेकिन इतना जरूर जानते हैं कि हम बेवफा न थे,’’ अख्तर नजर झुकाए हुए बोला.

‘‘भैया, आप बेवफा न थे तो फिर कौन बेवफा था?’’ हमशां शिकायती लहजे में बोली. उस की नजर जब अपने भैया पर पड़ी तो देख कर दंग रह गई. उस का भाई रो रहा था.

‘‘भैया, मुझे माफ कर दीजिए. मैं ने आप को गलत समझा,’’ हमशां अख्तर के गले लग कर रोने लगी.

सच है कि इनसान को हालात के आगे झुकना पड़ता है. अपनों के लिए बेवफा भी बनना पड़ता है.

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