नौकरी की भेट चढ़ा मासूम

शाम के 8 बज गए थे. राजस्थान के कोटा नगर निगम में अपनी रोजमर्रा की ड्यूटी पर तैनात इमरान अंसारी के पास पत्नी अंजुम का फोन आया. अंजुम उस समय बुरी तरह हड़बड़ाई हुई थी. कांपतीलरजती हुई आवाज में उस ने बताया, ‘‘अबीर कहीं नहीं मिल रहा है.’’

डेढ़ वर्षीय अबीर इमरान का इकलौता बेटा था. बेहद खूबसूरत और चंचल अबीर पूरे परिवार का ही नहीं पूरे मोहल्ले का भी दुलारा था.

अंजुम ने अपनी सफाई देते हुए कहा, ‘‘मैं बावर्चीखाने में खाना बना रही थी, अबीर उस समय नीचे कमरे में खेल रहा था. खाना पक गया तो मेरी तवज्जो उस की तरफ गई, लेकिन वह कहीं नजर नहीं आया. अपनी छत की तरफ गई, लेकिन वहां भी नहीं दिखा.

‘‘मम्मी की छत की मुंडेर पर खड़े हो कर मैं ने चौतरफा आवाज लगाई. लेकिन कोई जवाब नहीं. आसपड़ोस में भी देख आई, लेकिन कोई नहीं बता सका कि अबीर कहां है. अबीर की तो कहीं किलकारी तक नहीं सुनाई दी. जब कोई नतीजा नहीं निकला तो आप को फोन किया.’’ इस के साथ ही अंजुम फूटफूट कर रोने लगी.

इमरान ने बीवी को तसल्ली देते हुए  कहा, ‘‘इस तरह घबराओ मत. वो तो पूरे मोहल्ले का लाडला है, जरूर कोई घुमाने ले गया होगा.’’ इमरान ने अपने छोटे भाई का नाम लेते हुए कहा, ‘‘तुम ने जीशान भाई से पूछा.’’

अंजुम बिलख पड़ी, ‘‘मैं ने तो सब से पूछ लिया. जब कोई नतीजा नहीं निकला, तब कहीं जा कर आप को फोन किया.’’

अब तो इमरान का भी माथा ठनकने लगा. भला उस मासूम बच्चे का कौन दुश्मन हो सकता है? अपनी घबराहट पर काबू पाते हुए उस ने बीवी अंजुम को तसल्ली देते हुए कहा, ‘‘तुम परेशान मत होओ. बस, मैं आधे घंटे में पहुंच रहा हूं.’’

यह बात 25 अप्रैल, 2022 की है. बेटे को ले कर अंजुम फूटफूट कर रोने लगी.

उस के रोने की आवाज सुन कर पड़ोसी इकट्ठा हो गए. औरतों ने अंजुम को दिलासा दिलाई, ‘‘घबराओ मत, बच्चा मिल जाएगा.’’

उधर इमरान औफिस से सीधा घर पहुंचने के बजाय मोहल्ले में बच्चे को तलाश करने लगा. तभी पत्नी का फोन आया, अबीर अम्मी वाले मकान की छत पर रखी पानी की टंकी में मिल गया है.

हतप्रभ इमरान लपकता हुआ घर पहुंचा. बेटे को अंजुम की गोद में बेहोश पड़ा देख कर इमरान फफक पड़ा. बिलखते हुए वह अपने छोटे भाइयों शाकिर और इफ्तखार के साथ बेसुध बच्चे को ले कर जे.के. लोन अस्पताल की तरफ दौड़ा. लेकिन डाक्टरों ने बच्चे को मृत घोषित कर दिया.

लाडले की मौत से घरपरिवार और बस्ती में कोहराम मच गया. दहाड़ मारती पत्नी को संभालना इमरान के लिए मुश्किल हो गया. आखिरकार आंसुओं का सैलाब बहाते हुए परिवार के लोगों ने रात में ही बच्चे को कब्रिस्तान में दफना दिया.

कब्रिस्तान से घर लौटने के बाद परिवार के लोग एकजुट हो कर बैठे तो इस बात पर चर्चा होने लगी कि नन्हा बच्चा कैसे इतनी ऊंचाई पर रखी टंकी तक पहुंचा? फिर अबीर को जिस टंकी से बरामद किया गया है, उस का ढक्कन तो बंद था. आखिर माजरा क्या है?

अंजुम बुरी तरह फफक पड़ी कि जरूर किसी ने हमारे बच्चे की हत्या की है. घुटने पर चलने वाला अबीर सीढि़यां कैसे चढ़ गया? पानी की टंकी का ढक्कन बंद था तो कैसे खोला?

बात सोलह आने सच थी. ऐसा कौन करेगा, कहते हुए सभी के मुंह खुले के खुले रह गए.

बेटे की रहस्यमय और दर्दनाक मौत से पगलाए हुए इमरान की रात को पलक तक नहीं झपकी. भोर का झुटपुटा होते ही वह रामपुरा कोतवाली पहुंच कर एसएचओ हंसराज मीणा के पावों में गिर कर बिलख पड़ा, ‘‘साहब, मेरे मासूम बच्चे को पता नहीं किस ने मार डाला.’’

एसएचओ मीणा ने उसे दिलासा देते हुए कहा, ‘‘पूरी बात डिटेल में बताओ, कैसे क्या हुआ?’’

इमरान ने सुबकते हुए पूरी घटना उन्हें बता दी, ‘‘साहब, बीती शाम को कोई साढ़े 5 बजे, जिस वक्त मेरी बीवी अंजुम खाना पका रही थी, नीचे कमरे में खेलता हुआ हमारा डेढ़ साल का बेटा अबीर पता नहीं कहां निकल गया. बाद में घंटों की भागदौड़ में तलाश किया तो वह मेरी अम्मा के मकान की छत पर रखी पानी से भरी टंकी में मिला.

‘‘उसे ले कर हम फौरन अस्पताल पहुंचे, लेकिन डाक्टरों ने मृत घोषित कर दिया. अब यह अहम सवाल सामने आ रहा है कि घुटने पर चलने वाला बच्चा सीढि़यां कैसे चढ़ा? टंकी का ढक्कन बंद था, कैसे उसे खोला? बाद में किस ने ढक्कन बंद किया? इस से तो यही लगता है कि बच्चे की हत्या की गई है.’’

इमरान की बात सुन कर एसएचओ मीणा भी सकते में आ गए. उन्होंने कहा कि बच्चे की ऐसी खौफनाक मौत की वजह रंजिश के अलावा कुछ नहीं हो सकती. बच्चे को जिस दर्दनाक तरीके से मारा गया है, उस के पीछे कोई अदावत ही हो सकती है. उन्होंने उस से पूछा कि तुम्हारी किसी से कोई रंजिश तो नहीं है?

‘‘नहीं साहब, मेरी या मेरे परिवार की किसी से कोई भी अदावत नहीं है. यह काम तो कोई बददिमाग आदमी ही कर सकता है.’’  इमरान बोला.

घटना इस कदर दहलाने वाली थी कि आग की तरह पूरे शहर में फैल गई. नतीजतन पूरा शहर कोतवाली की तरफ उमड़ पड़ा. एडिशनल एसपी प्रवीण चंद जैन ने लोगों को समझाबुझा कर विश्वास दिलाया, ‘‘आप निश्चिंत रहें. अपराधी जो भी होगा, जल्दी ही कानून की गिरफ्त में होगा.’’

उन के विश्वास दिलाने पर आहिस्ताआहिस्ता भीड़ छंटने लगी. उधर पुलिस आईजी रविदत्त गौड़ के निर्देश पर एडिशनल एसपी प्रवीण चंद जैन की अगुवाई में मामले की पड़ताल के लिए एसएचओ हंसराज मीणा समेत एक दरजन पुलिसकर्मियों को एक टीम में शामिल किया गया.

आईजी के निर्देश पर मजिस्टै्रट बोर्ड का गठन किया गया. बोर्ड ने इमरान तथा उस के परिवार की सहमति पर अबीर का शव कब्रिस्तान से निकाल कर उस का पोस्टमार्टम करवाया.

पोस्टमार्टम की रिपोर्ट चौंकाने वाली थी. रिपोर्ट में कहा गया था कि बच्चे को टंकी के पानी में जबरन डुबोए रखा गया था. नतीजतन बच्चे ने छटपटाते हुए दम तोड़ा था. रिपोर्ट पढ़ कर पुलिस इस नतीजे पर पहुंची कि बच्चा किसी साजिश का शिकार हुआ है.

मामले की पड़ताल को ले कर पुलिस ने 3 बातों पर अपना ध्यान केंद्रित किया. पहला— वारदात के दिन घरपरिवार में महिलाओं और बच्चों के अलावा कोई मर्द नहीं था. दूसरा— किसी बाहरी शख्स की घर में आवाजाही तो कतई नहीं थी. तीसरा— कुछ अरसा पहले अबीर की चाची सोबिया ने गुस्से में बच्चे को बुरी तरह खरोंच दिया था. इस पर परिवार में भूचाल आ गया था. पूरे परिवार ने उस की लानतमलामत करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.

अबीर भी इस घटना से इस कदर सहम गया था कि सोबिया के करीब जाने से भी डरता था. पुलिस को सुराग मिल गया था. लेकिन फिलहाल पुलिस घर वालों से पूछताछ करने से कतरा रही थी.

दरअसल, एक तरफ तो परिवार सदमे में था, दूसरी तरफ रमजान चल रहे थे. ऐसे में पुलिस के सामने दोहरी चुनौती खड़ी हो गई थी. किस से पूछताछ की जाए और सिलसिले की शुरुआत कैसे की जाए? जबकि दूसरी तरफ मीडिया का भी जबरदस्त दबाव था.

पुलिस ने मामले की तह तक पहुंचने के लिए बीच का रास्ता अपनाते हुए एक एएसआई और महिला पुलिसकर्मियों को सादा वेशभूषा में परिवार के लोगों की निगरानी में लगा दिया. पुलिस परिवार के हर सदस्य के तौरतरीकों पर नजर गड़ाए हुए थी.

इस दौरान अबीर की चाची सोबिया की गतिविधियों ने संदेह पैदा कर दिया. सोबिया घटना वाले दिन से लगातार सामने वाले मकान में रहने वाले 3 बच्चों से ज्यादा मिलजुल रही थी और घर में चल रही हलचल का ब्यौरा पूछ रही थी.

पुलिस ने बच्चों को बुला कर सोबिया से मिलने की वजह पूछी तो बच्चों के चेहरे फक पड़ गए. उन्होंने पलभर में सारा रहस्य उगल दिया. पुलिस के सामने सोबिया का चेहरा बेनकाब हो गया था. अफसरों ने जब सोबिया से सच उगलवाने के लिए पुलिसिया अंदाज अपनाया तो वह टूट गई और सब कुछ सच उगलने लगी.

सोबिया के मुंह से हत्याकांड का सच सुन कर पुलिस के पैरों तले से जैसे जमीन खिसक गई. डेढ़ वर्षीय मासूम बालक की निर्मम हत्या करने वाली एक महिला है और वह भी सगी चाची… यह सुन कर पुलिस अफसर भी हैरान रह गए. सोबिया द्वारा पुलिस को दिए गए बयान से कहानी इस प्रकार सामने आई—

राजस्थान के शहर कोटा के रामपुरा इलाके के आखिरी छोर पर लाडपुरा में एक मुसलिम बाहुल्य बस्ती है कर्बला. इसी बस्ती में शबाना मंजिल के पास इमरान अंसारी अपनी बीवी अंजुम और डेढ़ वर्षीय बेटे अबीर के साथ करीब 21 लोगों के कुनबे के बीच रहता था.

इमरान अंसारी कोटा नगर निगम में नौकरी करता था. उसे अपने अब्बू मुस्तकीम अहमद की मौत के बाद निगम में अनुकंपा के आधार पर नौकरी मिली थी. इमरान 9 भाइयों में सब से बड़ा था. उस से छोटे भाई का नाम जीशान अहमद था. पिता की विरासत में उस का भी बराबर का हक था.

हालांकि सभी भाइयों ने अब्बू की मौत के बाद इमरान के लिए नौकरी की रजामंदी दे दी थी. लेकिन दिली तौर पर जीशान चाहता था कि पिता के करीब वो ज्यादा था. इसलिए अब्बू की नौकरी पाने का पहला हकदार वह था.

जीशान अहमद की बीवी सोबिया इस बात से खफा थी और गाहेबगाहे अपने शौहर को उकसाती रहती थी कि इस तरह खामोश रहने से तुम्हें कुछ हासिल नहीं होने वाला.

आखिर बीवी की ख्वाहिशों ने जोर मारा तो जीशान भी उखड़ गया. बिफरते हुए उस ने कह दिया, ‘‘भाईजान, वालिद की खिदमत जिस तरह मैं ने की, उस के मद्देनजर उन की नौकरी का हकदार मैं हुआ. आप तो नाजायज रूप से इस पर काबिज हो गए.’’

इमरान जानता था कि जीशान गलत नहीं है. लेकिन निगम की आरामपसंद नौकरी और अच्छीखासी पगार का लालच उस के दिलोदिमाग पर पूरी तरह हावी हो चुका था. ऐसे में नौकरी के हाथ से निकल जाने की सोच भी उस के लिए गमजदा करने वाली थी.

इमरान यह भी जानता था कि जीशान दिमागी तौर पर ज्यादा तेजतर्रार नहीं है. लेकिन जिस तरह वो बदसलूकी पर आमादा है, उस के पीछे पूरी तरह उस की बीवी सोबिया की भड़काऊ कोशिशें हैं.

इमरान समझदार था. उस ने तनिक ठंडे दिमाग से काम लिया. उस ने पूरी तरह दरियादिली दिखाते हुए कहा, ‘ठीक है भाई, महज नौकरी के लिए भाइयों की मोहब्बत में फर्क नहीं आना चाहिए. लेकिन रजामंदी के कागज पर दस्तखतों के बाद ही मुझे नौकरी मिली है. अब नौकरी तुम्हारे नाम करवाने के लिए फिर सब कुछ नए सिरे से लिखनापढ़ना होगा. पता नहीं इस काररवाई में कितना वक्त लग जाए? अफसर इस से खफा भी हो सकते हैं, नतीजतन घरेलू झगड़े के मद्देनजर नौकरी खटाई में भी पड़ सकती है. फिर तो दोनों भाई खाली हाथ रह जाएंगे.’’

इमरान ने थोड़ी समझाइश करते हुए कहा, ‘‘ऐसा है भाई, मैं तुम्हें माली इमदाद करता रहूंगा और नौकरी भी घर में ही बनी रहेगी.’’ जीशान मान गया, लेकिन इमरान अपने वादे पर खरा नहीं उतरा.

अपने शौहर जीशान अहमद की नौकरी हजम करना और आर्थिक मदद के वादे से मुकरना सोबिया के दिल में कील की तरह चुभ गया. रंजिश के कोढ़ में खुजली तब पैदा हुई जब नौकरी और ऊपरी आमदनी ने इमरान और उस की बीवी अंजुम के रहनसहन और बरताव में भी तब्दीली पैदा कर दी.

कहते हैं कि औरत ही औरत की सब से बड़ी दुश्मन होती है. इस कहावत को अंजुम के सोबिया के प्रति नफरत के बरताव ने भी रंजिश के शोलों को हवा दी. परिवार में किसी भी मसले पर इमरान और अंजुम को अहमियत दी जाती थी, यह सोबिया के लिए बरदाश्त से बाहर हो गया था. उसे लगता था कि परिवार में उस की कद्र नहीं है.

उस के 2 बेटों की अपेक्षा इमरान के बेटे अबीर को जिस तरह हर किसी का प्यारदुलार मिलता था, वह उस की आंखों की किरकिरी बन गया था.

खुंदक की वजह से वह यह नहीं समझ पाती थी कि अबीर जितना मासूम और खूबसूरत लगता है, उस की वजह से वो हर किसी का लाडला था. एक दिन तो अबीर खेलते हुए उस के दुपट्टे को खींचने लगा तो सोबिया इस कदर गुस्साई कि उस ने अबीर को बुरी तरह नोचते हुए खून भी निकाल दिया.

सोबिया के लिए यह फितूर बड़ा महंगा पड़ा. नतीजतन पूरे परिवार ने उस की जबरदस्त लानतमलामत कर दी. सरेआम बेइज्जती का यह कड़वा घूंट सोबिया को बरदाश्त नहीं हुआ. इस घटना ने रंजिश के शोलों को भड़काने में जबरदस्त हवा दी और वह बदला लेने पर आमादा हो गई.

वह बखूबी जानती थी कि मां की ममता ऐसी होती है कि वह अपनी औलाद को जिगर का टुकड़ा मानती है और लख्तेजिगर को ही खत्म कर दिया जाए तो औरत एक तरह से ताउम्र के लिए लहूलुहान हो जाती है.

सोबिया अंजुम को ऐसा ही सबक सिखाना चाहती थी. नतीजतन उस ने अबीर को ही अपना निशाना बनाया. अबीर की हत्या का शक उस पर न हो, इसलिए उस ने पड़ोस के 3 बच्चों को अपनी योजना में शामिल किया. तीनों बच्चों का उस की योजना में शामिल होना उन की मजबूरी थी.

दरअसल, तीनों बच्चे गलत सोहबत की वजह से सोबिया के जाल में फंसे हुए थे. बच्चों की करतूतों की राजदार सोबिया ने बच्चों को डराते हुए कहा कि अगर तुम ने मेरी बात नहीं मानी तो तुम्हारे वालिदैन के सामने तुम्हारा सारा कच्चा चिट्ठा खोल दूंगी. इस कारण बच्चे पूरी तरह से सोबिया की मुट्ठी में थे.

पहले सोबिया ने अबीर को नदी में फेंक आने की योजना बनाई, लेकिन बच्चे इस में जोखिम बता कर बिदक गए. उन का कहना था कि बच्चे को नदी तक ले जाने में वे किसी की भी निगाह में आ सकते हैं.

बाद में उस ने अबीर को पानी की टंकी में डालने की योजना बनाई. उस ने इस के लिए सोमवार 25 अप्रैल, 2022 का दिन चुना. उस समय परिवार का कोई मर्द घर पर नहीं होता. उस ने सोमवार को दोपहर से शाम के बीच का वक्त चुना.

शाम को तकरीबन साढ़े 5 बजे अंजुम जब सामने वाले बड़े मकान में बनी रसोई में खाना बना रही थी और अबीर नीचे मकान में खेल रहा था. उसी दौरान उन 3 बच्चों में से एक अबीर को ले कर दूसरी मंजिल पर गया. वहां से 2 बच्चे भी उस के साथ हो लिए.

उन्होंने छत पर जा कर 500 लीटर की पानी की टंकी का ढक्कन खोल दिया. फिर डेढ़ साल के अबीर को टंकी में डाल दिया. वारदात के समय सोबिया सामने वाली छत पर खड़ी हो कर इशारों से उन्हें गाइड कर रही थी.

अबीर को पानी की टंकी में डालने के बाद बच्चे घबरा गए. एक बार तो उन्होंने अबीर को बाहर निकाल लिया, लेकिन सोबिया ने सामने वाली छत से इशारों में उन बच्चों को धमकाया. जिस से बच्चे डर गए और अबीर को फिर से पानी की टंकी में डाल दिया.

इस के बाद बच्चे नीचे आ गए. साबिया ने सामने वाले मकान से बड़े मकान में आ कर टंकी का ढक्कन चैक किया. वह पूरी तरह से नहीं लगा था. सोबिया ढंग से टंकी का ढक्कन लगा कर चली गई.

इस बीच जब मां अंजुम को अबीर नजर नहीं आया तो उस ने परिवार की औरतों के साथ उसे तलाशना शुरू किया. छत की 2 टंकियों को चैक किया. अबीर शाम को साढ़े 5 बजे करीब गायब हुआ था. रात को साढ़े 7 बजे के आसपास पानी की टंकी में उस का शव मिला.

पुलिस ने आईपीसी की धारा 302, 120बी के तहत सोबिया को गिरफ्तार कर कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया और तीनों बच्चों को पुलिस ने बेकुसूर मान कर छोड़ दिया.

अपने संगीन अपराध के बावजूद सोबिया के चेहरे पर शर्मिंदगी तक नहीं दिख रही थी. उस ने इस तर्क के साथ जमानत पर बाहर आने की कोशिश की कि मुझे झूठा फंसाया गया है. लेकिन उस का यह घिसा हुआ तर्क नहीं चला. सोबिया अभी न्यायिक अभिरक्षा में है. पुलिस उस के खिलाफ कोर्ट में आरोप पत्र दाखिल कर चुकी है.

 

यह जीवन है: अदिति-अनुराग को कौनसी मुसीबत झेलनी पड़ी- भाग 3

देखतेदेखते 2 वर्ष बीत गए और अदिति अपनी टीचर की भूमिका में अच्छी तरह ढल गई थी. जब कभी वह सुबहसुबह दौड़ लगाती अपनी बस की तरफ तो सोसाइटी में चलतेफिरते लोग पूछ ही लेते ‘‘आप टीचर हैं क्या किसी स्कूल में?’’

पर अब अदिति मुसकरा कर बोलती, ‘‘जी, तभी तो सुबहसवेरे का सूर्य देखना का मु झे समय नहीं मिलता है.’’

स्कूल अब स्कूल नहीं है उस का दूसरा घर हो गया है. उस की परी भी उस के साथ ही स्कूल जाती है और आती है. औरों की तरह उसे परी की सुरक्षा की कोई चिंता नहीं रहती है. जब उस के पढ़ाई हुए विद्यार्थी उस से मिलने आते हैं तो वह गर्व से भर उठती है. वह टीचर ही तो है, जिंदगी से भरपूर क्योंकि हर वर्ष नए विद्यार्थियों के साथ उस की उम्र साल दर साल बढ़ती नहीं घटती जाती है.

उधर अनुराग भी बहुत खुश था, परी के जन्म के समय से ही उस की प्रोमोशन  लगभग निश्चित थी पर किसी न किसी कारण से वह टलती ही जा रही थी. आज उस के हाथ में प्रोमोशन लैटर था. पूरे 20 हजार की बढ़ोतरी और औफिस की तरफ से कार भी मिल गई. इधर अदिति के साथ परी के आनेजाने से डे केयर का खर्चा भी बच रहा था.

अनुराग ने मन ही मन निश्चिय कर लिया कि इस बार विवाह की वर्षगांठ पर वह और अदिति गोवा जाएंगे. वह सबकुछ पता कर चुका था, पूरे 60 हजार में पूरा पैकेज हो रहा था. अनुराग ने घर पहुंच कर ऐलान किया कि वे आज डिनर बाहर करेंगे और वह अदिति को उस की मनपसंद शौपिंग भी कराना चाहता है.

अदिति आज बहुत दिनों बाद खिलखिला रही थी और परी भी एकदम आसमान से उतरी हुई परी लग रही थी. अदिति की वर्षों से एक प्योर शिफौन साड़ी की तम्मना थी. जब दुकानदार ने साड़ी दिखानी शुरू कीं, तो अदिति मूल्य सुन कर बोली, ‘‘अनुराग कहीं और से लेते हैं.’’

तब अनुराग ने अपना प्रोमोशन लैटर दिखाया और बोला, ‘‘इतना तो मैं अब कर सकता हूं.’’

डिनर के समय अनुराग अदिति का हाथ पकड़ कर बोला, ‘‘अदिति बस 1-2 साल की तपस्या और है, फिर मैं अपनी कंपनी में डाइरैक्टर के ओहदे पर पहुंच जाऊंगा.’’

दोनों शायद आज काफी समय बाद घोड़े बेच कर सोए थे. दोनों ने ही आज छुट्टी कर रखी थी. दोनों ही इन लमहों को जी भर कर जीना चाहते थे.

आज अदिति अनुराग से कुछ और भी बात करना चाहती थी. वह अब परी के लिए एक भाई या बहन लाना चाहती थी. इस से पहले कि वह अनुराग से इस बारे में बात करती, उस ने उस के मुंह पर हाथ रख कर कहा, ‘‘जानता हूं पर इस के लिए प्यार भी जरूरी है,’’ और फिर दोनों प्यार में सराबोर हो गए.’’

1 माह पश्चात अदिति के हाथ में अपनी प्रैगनैंसी रिपोर्ट थी जो पौजिटिव थी. वे बहुत खुश थे. उस ने तय कर लिया था, इस बार वे अपने बच्चे के साथ पूरा समय बिताएगी और जब दोनों ही बच्चे थोड़े सम झदार हो जाएंगे तभी अपने काम के बारे में सोचेगी. अनुराग भी उस की बात से सहमत था. अब अनुराग भी थोड़ा निश्चित हो गया था क्योंकि अब उस की अगले वर्ष प्रोमोशन तय थी.

रविवार की ऐसी ही कुनकुनी दोपहरी में दोनों पक्षियों की तरह गुटरगूं कर रहे थे. तभी फोन की घंटी बजी. उधर से अनुराग की मां घबराई सी बोल रही थीं, ‘‘अनुराग के ?झ को हार्ट अटैक आ गया है और उन्हें हौस्पिटल में एडमिट कर लिया गया है.’’

वहां पहुंच कर पता चला 20 लाख का पूरा खर्च है. अनुराग ने दफ्तर से अपनी तनख्वाह से एडवांस लिया, हिसाब लगाने पर उसे अनुमान हो गया था कि उस की पूरी तनख्वाह बस अब इन किस्तों में ही निकल जाएगी, फिर से कुछ वर्षों तक.

घर पहुंच कर जब उस ने अदिति को सारी बात से अवगत कराया तो वह बोली, ‘‘कोई बात नहीं अनुराग, मैं हूं न, हम मिल कर सब संभाल लेंगे.’’

हालांकि मन ही मन वह खुद भी परेशान थी. पर यह दोनों को ही सम झ आ गया था कि यही जीवन है, फिर चाहे हंस कर गुजारो या रो कर आप की मरजी है.

अनुराग अपनी मां के  साथ हौस्पिटल के गलियारे में चहलकदमी कर रहा था. अदिति को प्रसवपीड़ा शुरू हो गई थी. आधे घंटे पश्चात नर्स उन के बेटे को ले कर आई. उसे हाथों में ले कर अनुराग की आंखों में आंसू आ गए.

फिर से 3 माह पश्चात अदिति अपने युवराज को घर छोड़ कर स्कूल जा रही हैं, पर आज वह घबरा नहीं रही है क्योंकि अब अनुराग के मां और पापा उन के साथ ही रह रहे हैं. उधर अदिति के मांपापा ने बच्चों की देखभाल और घर की देखरेख के लिए कुछ समय के लिए अपनी नौकरानी उन के घर भेज दी. जिंदगी बहुत आसान नहीं थी पर मुश्किल भी नहीं थी.

इस बार विवाह की वर्षगांठ पर अनुराग फिर से अदिति को गोवा ले जाना चाहता था और उसे पूरी उम्मीद थी कि इस बार अदिति का वह सपना पूरा कर पाएगा. रास्तों पर चलते हुए वे जीवन के इस सफर को शायद हंसतेखिलखिलाते पूरा कर ही लेंगे.

क्या यही प्यार है

सुबह का आगाज होते ही ग्वालियर के निंबाजी की तंग गलियों में 20 जुलाई, 2022 को पुलिस सायरन की आवाज सुन कर लोग चौंक

गए. वे अपनेअपने घरों से निकल आए. देखते ही देखते घनी आबादी वाले इलाके में स्थित भंवर सिंह के घर के बाहर लोगों की भीड़ जुट गई. वहां कई पुलिसकर्मी भी मौजूद थे. भंवर सिंह की कुंवारी बेटी किरण की हत्या के बारे में सुन कर लोग सन्न रह गए थे. इस का उन्हें जरा भी विश्वास ही नहीं हो रहा था.

इस तरह की वारदात उन के इलाके में हुई, यह जान कर लोग आक्रोशित भी हो गए. हालांकि वे अपने गुस्से को दबाए हुए आपस में तरहतरह की बातें कर उस बारे में विस्तार से जानने की कोशिश कर रहे थे.

इस वारदात की सूचना पौ फटते ही जनकगंज थाने के एसएचओ आलोक परिहार को घर वालों ने ही दी थी. बिना देरी किए वह पुलिस टीम के साथ मौकाएवारदात पर पहुंच गए थे. पुलिस ने घटनास्थल और लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. पाया कि मृतका किरण की हत्या हरे रंग के गमछे से गला घोट कर की गई थी.

गला घोटे जाने का निशान गले पर साफ नजर आ रहा था. किरण की लाश बैठक में फर्श पर पड़ी थी और उस के गले में गमछे का फंदा भी कसा था. किरण की उम्र करीब 20-21 साल के आसपास थी. वहीं टेबल पर प्लेट में नमकीन, बिसकुट और चाय रखी थी.

इस से पुलिस ने अनुमान लगाया कि हत्यारे से मृतका के मधुर संबंध रहे होंगे. तभी उस की आवभगत हुई होगी. किरण का घर जिस गली में था, वह काफी संकरी थी. सभी के घर एकदूसरे से जुड़े हुए थे. यदि किरण मदद के लिए शोर मचाती तो घर में मौजूद उस की बड़ी बहन की बेटी सोनिया और पासपड़ोस में रहने वाले लोग अवश्य उस की मदद के लिए दौड़ पड़ते.

एसएचओ आलोक परिहार ने इस हत्या की गुत्थी सुलझाने के सिलसिले में कई बिंदुओं पर गौर किया. जैसे, घर का सारा कीमती सामान सुरक्षित था. अलमारियों में ताले जस के तस लगे थे. घर में लूटपाट का कहीं कोई निशान नजर नहीं आ रहा था.

इस से यह बात स्पष्ट था कि हत्या लूटपाट के लिए कतई नहीं की गई थी. इन्हीं वजहों से पुलिस का ध्यान करीबी लोगों पर गया. पुलिस ने मृतक के पड़ोसी के घर पर लगे सीसीटीवी कैमरे के फुटेज की जांच शुरू की.

सीसीटीवी फुटेज में एक युवक मुंह पर गमछा बांधे भंवर सिंह के घर में दाखिल होता दिखाई दिया. वही जब 15 मिनट बाद घर से वापस बाहर निकला, तब उस के मुंह पर गमछा नहीं बंधा था. उस का चेहरा स्पष्ट दिखाई दिया. एसएचओ परिहार ने इसे भंवर सिंह को दिखा कर उस युवक के बारे में पूछा. भंवर सिंह ने उसे पहचान लिया और उस का नाम मुकुल बताया.

लाश के गले से लिपटा गमछा वही था, जो मुकुल ले कर घर में घुसा था. इस के अलावा कोई और सबूत नहीं मिला. फोरैंसिक एक्सपर्ट ने भी घटनास्थल और लाश का बारीकी से निरीक्षण किया. प्रारंभिक जांच पूरी करने के बाद पुलिस ने लाश पोस्टमार्टम के लिए भिजवा दी.

उस वक्त एसएचओ ने किरण के परिजनों को दहाड़ मार कर रोते पाया. उन में एक बूढ़ी महिला और दूसरी लड़की की आंखों से आंसू थमने का नाम ही नहीं ले रहे थे. बूढ़ी महिला किरण की नानी और मृतका की हमउम्र युवती उस की मौसी की बेटी सोनिया थी. एसएचओ ने उन्हें ढांढस बंधाया और उन से किरण के जानने वालों के बारे में पूछा.

किरण की मौत के बारे में सब से पहले घर में मौजूद सोनिया सिहोते को पता चला था. उस ने पुलिस को बताया कि घटना के दिन वह और उस की मौसी किरण सिंघानिया अपने नाना के घर पर थी. रोज की तरह सुबह होने से पहले नानानानी 4 बजे अपनी ड्यूटी पर चले गए थे. वे नगरनिगम में काम करते हैं.

उसी दौरान सुबह साढ़े 5 बजे के करीब किसी ने डोरबैल बजाई थी. घंटी बजने की आवाज सुन जब उस ने खिड़की का एक पल्ला खोल कर बाहर झांका तो विकास मौसा के छोटे भाई मुकुल धौलपुरिया को घर के दरवाजे पर खड़ा पाया.

इस बारे में उस ने मौसी किरण को बताया. मौसी ने उन्हें भीतर बुला कर ड्राइंगरूम में बैठाने के लिए कहा. उस के बाद वह मुकुल मौसा के लिए चाय नाश्ता लेने किचन में चली गई. मौसी चायनाश्ता टेबल पर रख कर मुकुल मौसा से बातचीत करने लगी और वह किचन में साफसफाई करने चली गई गई.

थोड़ी देर बाद किचन की साफसफाई कर वह घर के बाहर आई. उस ने देखा कि मुकुल बाहर से ड्राइंगरूम की कुंडी लगा कर झूला चौक की तरफ तेज कदमों से चले जा रहे हैं.

फिर उस ने ड्राइंगरूम की कुंडी खोली. वहां का दृश्य देख कर वह डर गई. कमरे में उस की किरण मौसी जमीन पर बेहोश पड़ी थी. उस ने मौसी को पुकारा, हिलायाडुलाया. लेकिन उस ने कोई हरकत नहीं की.

उस ने देखा कि किरण मौसी के गले में वही हरे रंग का गमछा कसा हुआ था, जो उस ने सुबह के वक्त मुकुल के गले में लिपटा देखा था. सोनिया ने बताया कि तुरंत किरण मौसी को आटोरिक्शा से अस्पताल ले गई. डाक्टर ने नब्ज देखते ही उसे मृत बता दिया.

फिर तो वह और घबरा गई. उस ने तुरंत पुलिस को काल कर दी. सोनिया ने मौसी के मर जाने की सूचना नानानानी को भी फोन कर दे दी और उन्हें जल्द घर आने को कहा.

खबर सुन कर नानानानी उलटे पैर वापस घर आ गए. नानी किरण की हालत देख कर रोनेचिल्लाने लगी. नाना की आंखों में भी आंसू आ गए. उन के रोनेचिल्लाने की आवाज सुन कर पासपड़ोस के कुछ लोग वहां आ गए.

किरण के बारे में छोटी से छोटी जानकारी जुटा कर एसएचओ आलोक परिहार थाने लौट आए. उन्होंने मृतका की बड़ी बहन की बेटी सोनिया की तहरीर पर अज्ञात हत्यारे के खिलाफ आईपीसी की धारा 302 के तहत मामला दर्ज कर लिया.

इस मामले की जांच एसएचओ परिहार ने अपने हाथों में ले ली. भंवर सिंह और सोनिया से मिली जानकारी के आधार पर घटनास्थल की स्थिति से इतना तो स्पष्ट हो चुका था कि किरण की हत्या में किसी जानने वाले का ही हाथ है.

सोनिया से मिली जानकारी के मुताबिक मुकुल ही मामले का मुख्य दोषी था. परिहार ने देर किए बगैर उसे दबोच लिया. वह आसानी से मिल गया. फिर उसे सबूत के तौर सीसीटीवी फुटेज और बरामद गमछे को दिखा कर सख्ती से पूछताछ की गई.

उस ने जल्द ही अपना जुर्म कुबूल कर लिया. और फिर इस हत्याकांड की

जो कहानी सामने आई, वह काफी दिलचस्प थी.

किरण जवानी की दहलीज पर खड़ी थी और मुकुल भी जवान हो चुका था. दोनों रिश्तेदार थे. उन के रिश्ते अगर काफी दूर के नहीं थे तो पास के भी नहीं थे. मुकुल किरण की बड़ी बहन का देवर था. इस कारण उस का बड़े भैया के साथ उन की सुसराल आनाजाना लगा रहता था.

इस लिहाज से किरण और मुकुल के बीच मजाक का रिश्ता था. किरण बड़े भाई की साली थी. इस लिहाज से वह उस की भी साली थी. दोनों हमउम्र थे. एक तरफ किरण की चढ़ती जवानी थी, दूसरी तरफ मुकुल का बांकपन और मदमस्ती की छेड़छाड़ वाली आदतें थीं.

फिर भी किरण ने न तो मुकुल को नजर भर कर देखा था और न ही मुकुल ने किरण को, जबकि उन के बीते सालों की जानपहचान थी.

बात बीते साल की है. एक दिन मुकुल जब भैया की ससुराल आया था, तब किरण घर में अकेली थी. किरण उसे अपने ड्राइंगरूम में बिठा कर खुद रसोई में चली गई. किंतु उस रोज मुकुल की नजर रसोई में जाती किरण की मदमस्त चाल पर पड़ी.

उस से रहा नहीं गया और बोल पड़ा, ‘‘हाय सैक्सी, तू चीज बड़ी है मस्तमस्त…’’

गाने की यह लाइन किरण के कानों तक पहुंची. वह पीछे मुड़ कर मुसकराई और फिर तेज कदमों से कमर मटकाती हुई चली गई. उस रोज मुकुल उसे देखता ही रह गया.

थोड़ी देर में किरण चाय और प्लेट में नमकीन बिसकुट ले कर आ गई. मुकुल के सामने के स्टूल पर रख कर फिर वापस जाने लगी. तभी मुकुल ने उस का हाथ पकड़ लिया और अपनी ओर खींचते हुए बैठने को कहा. लेकिन किरण पानी लाने के बहाने हाथ छुड़ा कर दोबारा किचन में चली गई.

उस रोज पहली बार मुकुल ने किरण की देह पर गहरी नजर डाली थी और उसे घर में अकेला पा कर छेड़ने के मूड में था. इस का असर किरण के मन पर भी हुआ, लेकिन उस के दिल की धड़कनें बढ़ गईं. उस ने शर्म और रिश्ते की मानमर्यादा को बनाए रखा.

किरण ने मुकुल से आने का कारण पूछा. बड़ी बहन का समाचार लिया और मुकुल के साथ ड्राइंगरूम में समय गुजारते हुए औपचारिक बातें कीं.

कुछ दिनों बाद ही मुकुल फिर किरण से मिला. इस बार उस की मुलाकात घर पर नहीं, भीड़भाड़ वाले बाजार में हुई. छूटते ही उस ने किरण की तारीफ में कहा, ‘‘आज तो तुम इस ड्रेस में और भी सैक्सी लग रही हो.’’

किरण केवल मुसकरा कर रह गई. सिर झुकाते हुए बोली, ‘‘बाजार में ऐसी बातें करना ठीक नहीं है.’’

‘‘तो चलें किसी एकांत जगह में?’’ मुकुल तपाक से बोला.

‘‘…अरे नहींनहीं. मुझे जल्द घर जाना है. अपना कुछ सामान खरीदने बाजार आई थी.’’ किरण बोली.

‘‘ऐसा करो, तुम अपना मोबाइल नंबर बताओ,’’ मुकुल ने कहा.

‘‘लिखो 97…’’

‘‘अरे! 9 नंबर ही हुए.’’ मुकुल बोला.

‘‘अंत में 7 नहीं डाला क्या?’’ किरण बोली.

‘‘अच्छाअच्छा… लो, 7 डाल दिया. अब काल करता हूं. मेरे नंबर को सेव कर लेना. रात को काल करूंगा.’’ मुकुल लगातार बोलता चला गया.

किरण के मोबाइल पर मुकुल की मिस्ड काल आ गई. किरण देखते हुए बोली, ‘‘हां, आ गया नंबर. तुम्हारे नंबर के अंत में भी 37 है…’’

‘‘अब तुम्हीं बताओ हमारेतुम्हारे बीच कितनी समानता है,’’ मुकुल के इस तर्क पर किरण ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी. चुपचाप वहां से चली गई.

किरण अपने परिवार, संस्कार और समाज के रीतिरिवाज में बंधी थी. उम्र 22 की हो चुकी थी. दिलदिमाग में उस के कई रंगीन सपने थे. उन में मनपसंद जीवनसाथी का भी था. लेकिन वह किस रूप में मिलने वाला था पता नहीं था.

दूसरी तरफ जब से मुकुल ने किरण की कमसिन जवानी को भरी नजर से देखा था, उसे पाने के लिए बेचैन हो गया था. उस का मन उस से हटता ही नहीं था. वह बड़े भाई की साली थी. उस से मिलनाजुलना आसानी से हो जाता था. किरण की खूबसूरती ने मुकुल का मन कुछ इस तरह मोह लिया था कि वह उसे पाने के लिए लालायित हो उठा था. एक दिन हसरत भरी नजरों से देखने पर किरण ने मुकुल का ध्यान तोड़ते हुए कहा, ‘‘ऐसे क्या देख रहे हो मुकुल, क्या कोई खास बात है?’’

मुकुल को लगा, जैसे उस की चोरी पकड़ी गई हो. वह झेंपते हुए बोला, ‘‘न..नहीं. यूं ही… कुछ भी तो नहीं…’’

‘‘कुछ बात तो जरूर है,’’ इस बार किरण ने उसे छेड़ा था.

‘‘बात तो है जरूर,’’ मुकुल बोला.

‘‘जरा मैं भी तो सुनूं,’’ किरण दोबारा मजाकिया अंदाज में बोली.

‘‘आज तुम बहुत सुंदर लग रही हो. बहुत सजीधजी हो. कहीं जाने वाली हो क्या?’’ मुकुल बोला.

‘‘कुछ दिन पहले मैं सैक्सी दिखती थी, आज सिर्फ सुंदर दिख रही हूं?’’ किरण बिंदास हो कर चहकती हुई बोल पड़ी.

‘‘ऐसी बात नहीं है, तुम बहुत सैक्सी हो. दिन पर दिन और सैक्सी होती जा रही हो.’’

‘‘सो तो हूं ही.’’ किरण थोड़ा शरमाई.

वैसे किरण दूसरी लड़कियों की तरह झिझकती नहीं थी. जिस से खुल जाती थी, तो बस पूछिए मत, उस से दिल खोल कर बातें करती थी. पिछले कुछ हफ्तों से किरण मुकुल के साथ काफी खुल गई थी.

उस ने बताया कि वह अपनी सहेली के बर्थडे में जा रही है. और फिर इठलाती हुई वहां से चली गई. मुकुल उसे तब तक टकटकी लगाए निहारता रहा, जब तक कि वह उस की नजरों से ओझल नहीं हो गई.

उस दिन मुकुल ने पहली बार किरण को इस तरह खुल कर बातें करते हुए देखा था.  किरण आंखों के रास्ते उस के दिल में उतर गई थी. किरण की बातें और अदाओं ने मुकुल के दिल में हचलच मचा रखी थी.

मुकुल घर पहुंचते ही सीधा अपनी भाभी के पास गया. भाभी यानी किरण की बड़ी बहन से अपने दिल की बात कह डाली. मुकुल ने बड़ी हिम्मत कर अपनी भाभी से किरण के साथ शादी की बात चलाई. उस ने कहा कि वह किरण को बहुत चाहता है. किरण भी उस से प्यार करती है. यह सुनते ही किरण की बड़ी बहन मुकुल पर बरस पड़ी.

तिलमिलाती हुई नाराजगी के साथ डांट लगाई, ‘‘कमाताधमाता एक धेला नहीं है और सपने देख रहा है मेरी छोटी बहन से शादी करने के. पहले कमाने की सोच, उस के बाद शादी करने की बात मुझ से करना. …और किरण को तो तुम भूल ही जाओ…’’

मुकुल बेरोजगार था. वह भाभी की बातों पर चुप रहा. उस समय उन से किरण को ले कर बहस करना सही नहीं समझा. दूसरी तरफ किरण के दिलोदिमाग में मुकुल रच बस गया था.

प्यार के अंकुर फूट चुके थे. प्यार की खुशबू उसे भी बेचैन किए जा रही थी, लेकिन वह भी परिवार की मर्यादाओं से बंधी हुई थी. दोनों मन ही मन एकदूसरे को चाहने लगे थे.

मुकुल की भाभी ने किरण को भी जबरदस्त डांट पिलाई. उसे डांटते हुए कहा कि बेरोजगार और दिन भर आवारागर्दी करते घूमने वाले मुकुल से शादी कर वह अपना जीवन क्यों बरबाद करना चाह रही है.

साथ ही उस ने किरण को हिदायत भी दी कि आइंदा मुकुल का नाम तक जुबां पर नहीं लाए. उस से दूर रहे. यहां तक कि उस के घर से बाहर जाने और मुकुल से मिलने तक पर नाना से कह कर पाबंदी लगवा दी.

किरण की बड़ी बहन नहीं चाहती थी कि उस की छोटी बहन की शादी उस के देवर से हो. किरण मन मसोस कर रह गई. किरण को तो परिजनों की पाबंदी से कोई खास फर्क नहीं पड़ा, उस ने अपने दिल को तसल्ली दे दी कि उसे परिवार वालों की पसंद के लड़के के साथ ही शादी करना पड़ेगी. किंतु मुकुल किरण को पाने के बेचैन रहने लगा.

किरण से मिलने की पाबंदी लगने के बाद मुकुल उस के घर चोरीछिपे जाने लगा. वह किरण के पास तभी जाता था, जब वह घर में अकेली होती. इस बारे में वे पहले मोबाइल से बातें कर लेते थे. इस के लिए सुबह 4 बजे का समय सब से सही था.

मुकुल 20 जुलाई, 2022 की सुबह किरण के घर तब गया था, जब उस के नाना और घर के दूसरे सदस्य नहीं हों. किंतु उसे इस का पता नहीं था, उस दिन उस की भतीजी सोनिया वहां आई हुई थी.

किरण मुकुल को ड्राइंग रूम में बैठा कर साथसाथ चाय पीने लगी. इसी दौरान मुकुल ने किरण से सैक्स करने की इच्छा जताई. किंतु किरण ने इंकार कर दिया. फिर मुकुल छेड़छाड़ करने लगा. उस के अंगों को छूने छेड़ने लगा. किरण उस का विरोध जताने लगी.

जबकि मुकुल के दिमाग पर सैक्स का फितूर सवार था. वह उस से हर हाल में सैक्स करना चाहता था. इसी क्रम में मुकुल ने उस से कहा कि वह एक न एक दिन तो उस से शादी करेगा ही.

इस पर जैसे ही किरण ने कहा, ‘‘कतई नहीं.’’

मुकुल सैक्स की जद में पागल जैसा हो गया. उस ने अपने गले का गमछा किरण के गले में डाल दिया. दोनों हाथों से गमछे को कसता रहा और उस से शादी करने की बात कुबूल करवाने की जिद करता रहा.

उस वक्त वह इस बात से एकदम अनजान था कि किरण की गला दबने से मौत हो चुकी है. वह अपना होशोहवास खो बैठा था.

किरण की सांस बंद होने पर वह घबरा गया और उसी घबराहट में गमछा लिए बगैर ही वहां से फरार हो गया. जाने से पहले उस ने ड्राइंगरूम के दरवाजे की बाहर से कुंडी लगा दी. मुकुल एक पल गंवाए बगैर वहां से निकल भागा. जबकि पुलिस उसी रोज मुकुल का नाम आते ही उसे पकड़ने का अपना जाल बिछा चुकी थी. पूरे शहर और वहां से बाहर जाने वाले रास्ते, रेलवे स्टेशन एवं बस अड्डे पर मुखबिरों को लगा दिया गया था.

एसएचओ आलोक परिहार को मुखबिर से मिली सूचना के बाद मुकुल मुरैना रेलवे स्टेशन पर खड़ा मिल गया था. वहां वह ट्रेन के आने का इंतजार कर रहा था. पुलिस ने उसे तत्काल हिरासत में ले लिया. थाने ला कर उस से पूछताछ की गई. उस के द्वारा किरण की हत्या करने का जुर्म कुबूल करने के बाद पुलिस ने उसे न्यायालय में पेश कर दिया. वहां से उसे जेल भेज दिया गया.

गरम लोहा: बबीता ने क्यों ली पति व बच्चों के साथ कहीं न जाने की प्रतिज्ञा?

पति ना हो ऐसा

मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की वाटिका विहार कालोनी के रहने वाले राजेश और पुनीता की शादी के 2 दशक बीत चुके थे. वह इतना लंबा समय खट्टेमीठे अनुभवों के साथ गुजारते आए थे. राजेश की जब शादी हुई थी, तब उस की उम्र केवल 16 साल की थी. वह 16 साल की पुनीता को विदिशा से साल 2002 में ब्याह कर लाया था. दोनों ने कच्ची उम्र में दांपत्य जीवन की शुरुआत की.

राजेश आजीविका के लिए सूर्यवंशी गोविंदपुरा इंडस्ट्रियल एरिया स्थित एक फैक्ट्री में काम पर लग गया. जबकि पुनीता घरपरिवार को संभालने में लगी रही. किंतु हां, परिवार को कैसे खुश रखा जाए, घर की जरूरतें कैसे पूरी हों, परिवार के दूसरे सदस्यों के साथसाथ सामाजिक मानमर्यादा का किस तरह निर्वाह किया जाए? आदि बातों का वे काफी खयाल रखते थे.

एक तरह से उन्होंने अपना एक संतुलित परिवार बना लिया. वे 2 बच्चों के मातापिता बन गए. उन का बड़ा बेटा 14 साल का और छोटा 10 साल का हो चुका था. दोनों एक पब्लिक स्कूल में पढ़ते थे.

पुनीता एक कुशल गृहिणी की तरह घरपरिवार को संभाले हुए थी, लेकिन कुछ समय से घर के बढ़ते खर्च, बच्चों की अच्छी पढ़ाईलिखाई को ले कर परेशान रहने लगी थी. उसे मकान बनवाने की भी चिंता थी, लेकिन पति की आमदनी बहुत ही सीमित थी. इस के लिए उस ने अपने भाई मंगलेश से 2 लाख रुपए की मदद भी ली थी.

फिर भी सब कुछ ठीकठाक चल रहा था. कोरोना काल में उन की माली हालत बिगड़ गई थी और राजेश चाह कर भी अपने साले का कर्ज नहीं उतार पा रहा था. इसे ले कर आए दिन राजेश की पुनीता से तूतूमैंमैं होने लगी थी.

बात शुरू होती थी घर के खर्च से, जो मकान बनवाने और भाई से लिए कर्ज तक जा पहुंचती थी. जब भी पुनीता उसे भाई के कर्ज के पैसे देने की बात करती थी, तब राजेश गुस्सा हो जाता था. उलटे उस पर तरहतरह के आरोप लगाने लगता था.

एक दिन तो हद हो गई. राजेश ने अपने साले मंगलेश को फोन कर बताया कि उस की बहन के रंगढंग तब से ठीक नहीं हैं, जब से वह पास के अस्पताल में काम करने लगी है.

‘‘हैलो मंगलेश, सुन रहा है न तू?’’ राजेश तेज आवाज में मोबाइल को मुंह के पास ले जा कर बोल रहा था.

‘‘हांहां बोलो जीजा, तुम्हारी आवाज साफ आ रही है. बोलो न, क्या बता रहे थे… दीदी को क्या हो गया है?’’ मंगलेश बोला.

‘‘अरे मंगलेश, उसे कुछ हुआ नहीं है. उस के चालचलन बदल गए हैं. बेहया हो गई है. जब से वह अस्पताल में काम करने जाने लगी है, तब से उस के रंगढंग बहुत बदल गए हैं. जरा उसे समझा दियो, वरना बहुत बुरा हो जाएगा.’’ राजेश एक तरह से धमकी भरे अंदाज में बोला और फोन कट कर दिया.

मंगलेश अपने जीजा की बातों को आधाअधूरा ही समझ पाया था. फिर भी उस ने अपनी बहन पुनीता  से एक बार बात करना सही समझ कर उसे काल कर दी, ‘‘हैलो दीदी! कैसी है तू?’’

‘‘मैं ठीक हूं, तू कैसा है? घर में सब कुशल से है न?’’ पुनीता मायके का हालसमाचार लेने लगी.

‘‘अरे दीदी, जीजा का फोन आया था. बोल रहे थे तुम्हें क्या हो गया है? कोई परेशानी है क्या?’’ मंगलेश बोला.

‘‘अरे नहीं रे भाई! तू उन की बातों पर ध्यान मत दे. यह हमारे उन के बीच की बात है.’’ पुनीता ने भाई को समझाया.

‘‘बच्चे कैसे हैं? उन की पढ़ाई ठीक से चल रही है न! स्कूल तो खुल गए होंगे? उन से मिले बहुत दिन हो गए. राखी के दिन उन्हें भी ले कर आ जाना,’’ मंगलेश बोला.

उस रोज बात आईगई हो गई. न तो पुनीता ने अपने पति के साथ आए दिन होने वाली तकरार के बारे में कुछ बताया और न ही मंगलेश ने बहन की निजी जिंदगी में गहराई तक झांकने की कोशिश की.

लेकिन यह क्या? अगले दिन ही राजेश ने मंगलेश को फिर फोन कर वही बात दुहराई. कहने लगा अपनी बहन को संभाल ले वरना अनर्थ हो जाएगा. उस ने सीधेसीधे आरोप लगा दिया कि उस का अस्पताल के ही एक युवक के साथ टांका भिड़ गया है. उस के साथ घूमनेफिरने लगी है. जिस से पासपड़ोस में उस की बदनामी हो रही है. उसे बच्चों को ले कर चिंता हो रही है.

एक तरह से राजेश ने उस रोज अपनी पत्नी पुनीता पर बदचलन होने और एक युवक के साथ अवैध संबंध रखने का आरोप लगा दिया था.

बहन के बारे में यह सुन कर मंगलेश ने उस रोज फोन पर ही बहन को काफी डांट लगाई. उस ने यहां तक कह डाला कि वह अपने परिवार पर ध्यान दे, बच्चों का भविष्य बनाए. गलत रास्ता नहीं अपनाए. दोबारा जीजा की शिकायत आई, तब समझ लेना कि उस के मायके का दरवाजा हमेशा के लिए बंद हो गया है.

राजेश द्वारा पुनीता को ले कर शिकायतों का सिलसिला लगातार चलता रहा. जब भी मंगलेश के फोन आते तो वह बातचीत का सिलसिला ही पुनीता की शिकायतों से करता. उस पर बदचलनी का आरोप लगाता.

दूसरी तरफ साला मंगलेश हर बार उसे भरोसा देता कि एक दिन उस के पास आ कर वह उसे समझाएगा. लेकिन उस के लिए वह दिन नहीं आया. उसे अपनी बहन को उस बारे में आमनेसामने बैठ कर बातें करने का मौका ही नहीं मिला.

मंगलेश 14 सितंबर, 2022 की सुबह 7 बजे के करीब अपने काम पर जाने के लिए तैयार हो रहा था. तभी राजेश का फोन आया. मोबाइल चार्जिंग में लगा हुआ था. वह झुंझला गया. नहीं चाहते हुए भी मोबाइल हाथ में ले लिया.

काल देख कर चौंक गया. फोन राजेश का नहीं, बल्कि उस की बहन पुनीता का था. कुछ पल के लिए सोचने लगा कि सबेरेसबेरे पुनीता ने क्यों फोन किया होगा? इस से पहले तो उस ने कभी फोन नहीं किया. जब भी उस से बात की, तब उसी ने बहन को फोन किया था. जरूर कोई खास बात होगी. मंगलेश फोन रिसीव करते हुए बोला, ‘‘हैलो, हां पुनीता, बोलो क्या बात हो गई, इतनी सुबह फोन किया?’’

‘‘अ…अ अरे, मैं बोल रहा हूं, त…त…तेरा जीजा राजेश.’’ आवाज में थरथराहट थी.

मंगलेश किसी अनहोनी से आशंकित हो गया. घबरा कर पूछ बैठा, ‘‘क्या बात है जीजा, तुम परेशान लग रहे हो और मरी आवाज में क्यों बोल रहे हो? सब कुछ ठीक तो है न?’’

‘‘अरे नहीं रे मेरे भाई! कुछ भी ठीक नहीं है. तुम्हारी बहन की उस के प्रेमी ने घर आ कर हत्या कर दी है,’’ राजेश एक सांस में बोल गया.

‘‘हत्या कर दी है? पूनम की हत्या कर दी है? किस ने? कैसे?’’ मंगलेश चौंकते हुए कई सवाल कर बैठा.

‘‘अरे तू फोन पर ही सब कुछ पूछता रहेगा या फिर जल्दी से आएगा भी. हम ने पुलिस को भी फोन कर दिया है. पुलिस आती ही होगी…’’

‘‘चल, मैं भी आता हूं,’’ कहते हुए मंगलेश ने तुरंत फोन कट किया और राजेश के यहां जाने के लिए झटपट तैयार हो गया. जेब में कुछ पैसे भी रख लिए.

उस से कुछ समय पहले ही राजेश ने 100 नंबर पर पुलिस को हत्या की सूचना दे दी थी. कहा था कि उस की पत्नी के दोस्त आनंद ने बांके से हमला कर उस की पत्नी की हत्या कर दी है. यह सूचना पा कर कुछ समय में ही भोपाल के छोला मंदिर थाने की पुलिस मौके पर पहुंच गई थी.

पुलिस ने जांच शुरू की और राजेश के बयान लिए. राजेश ने पुलिस को बताया कि वह अपने बच्चों को स्कूल छोड़ने गया हुआ था. पत्नी घर में अकेली थी. जब वह वापस लौटा तो पत्नी के हाथपैर बंधे हुए थे और उस का गला कटा हुआ था.

मौके पर पहुंची पुलिस ने जांच शुरू की. राजेश पुलिस को गुमराह करता रहा. शक के आधार पर पुलिस ने उस से सख्ती से पूछताछ की तो उस ने जुर्म कुबूल कर लिया. आरोपी की पड़ोसन यासमीन ने पुलिस को बताया कि उसे सुबह करीब पौने 8 बजे राजेश के घर से झगड़े की आवाज आ रही थी. राजेश के घर पहुंची तो वह पुनीता को चारपाई पर पटक कर उस पर चाकू से वार कर रहा था.

पुलिस ने वारदात के बारे में पड़ोसियों के अलावा मृतका के भाई मंगलेश से भी पूछताछ की. साथ ही घटनास्थल पर बरामद हत्या के सामान में भी बड़ा फर्क नजर आया. भाई ने पुलिस को राजेश से कुछ दिनों से फोन पर हो रही बात के बारे में बताया, जबकि पड़ोसियों ने भी बताया कि राजेश का पत्नी से हमेशा झगड़ा होता रहता था.

मोहल्ले के लोग उन के झगड़े से परेशान रहते थे. कई बार उन्होंने झगड़े का कारण जानने की कोशिश की, लेकिन पतिपत्नी में से किसी ने कोई बड़ा कारण नहीं बताया. यहां तक कि उन के बच्चे भी पिता की मरजी के बगैर किसी से कुछ भी नहीं बोलते थे.

पति ने जिस आनंद नाम के व्यक्ति पर हत्या का आरोप लगाया, उसे पुनीता गुरुभाई मानती थी. उसे राखी बांधती थी. उस ने उस के भाग जाने का भी आरोप लगया. कई बातों से जब पुलिस को शक हुआ और उस के घर की तलाशी ली, तब उन्हें वाशरूम में उस के ही खून से सने कपड़े मिले. वह चाकू भी बरामद हो गया, जिस पर खून लगा था.

जबकि राजेश ने अपने बयान में कहा था कि हत्या बांके से की गई है. पुलिस को समझते देर नहीं लगी, क्योंकि शव के गले पर उस के रेतने के निशान साफ दिख रहे थे और वहीं से खून अधिक रिस रहा था. जिस चारपाई पर शव पड़ा था, उस के इधरउधर खिसकाने पर भी संदेह पैदा हो गया था.

पुलिस ने लाश को पोस्टमार्टम के लिए भेजने के बाद राजेश को थाने ला कर सख्ती से पूछताछ की. जल्द ही वह टूट गया और अपनी पत्नी के साथ प्रेम प्रसंग का आरोप लगाते हुए हत्या करने की बात कुबूल कर ली.

असल में पुनीता ने छोला के द्वारकाधाम निवासी आटोरिक्शा चालक आनंद को अपना गुरुभाई बना रखा था. वह अकसर उस के घर जाता था, जो राजेश को यह पसंद नहीं था. इस वजह से दोनों के बीच झगड़ा होता रहता था. इस झगड़े से पुनीता ऊब चुकी थी और उस ने इस की पुलिस में शिकायत भी दर्ज करने के लिए छोला पुलिस से संपर्क किया था.

चूंकि यह एक घरेलू मामला था, इसलिए पुलिस ने उन्हें महिला थाने रेफर कर दिया, जहां परिवार परामर्श केंद्र में उन की काउंसलिंग की जा रही थी. पुलिस ने इस मामले को ले कर राजेश और पुनीता के बीच समझौता करवा दिया था.

एसीपी ऋचा जैन ने दोनों को आपसी मतभेद से दूर रहने की हिदायत दी थी. पुलिस ने पुनीता का ही पक्ष लिया था और राजेश के खिलाफ काररवाई करने की भी चेतावनी दी थी.

राजेश गोविंदपुरा औद्योगिक क्षेत्र में एक फैक्ट्री में सिक्योरिटी गार्ड के रूप में काम करता है. पुलिस की चेतावनी के बावजूद राजेश पुनीता की शिकायतें अपने साले से करता रहता था. कोई भी दिन ऐसा नहीं बीतता था, जब उस की पुनीता से बकझक नहीं हो जाती थी.

मामले की जांच के दौरान एसीपी जैन ने पाया कि वारदात के एक दिन पहले 13 सितंबर को राजेश जब घर लौटा, तब पड़ोसियों से मालूम हुआ कि उस की पत्नी का भाई उस की गैरहाजिरी में घर पर आया था. वह करीब 4-5 घंटे रुका भी था.

यह सुनते ही राजेश का पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उस रोज तो वह किसी तरह से अपने गुस्से को काबू में किए रहा, लेकिन अगले रोज सुबह उठते ही उस ने खतरनाक योजना बना डाली.

सुबह वह बेटों को स्कूल छोड़ कर घर लौट आया. इसी बात को ले कर उस की उस से तीखी नोकझोंक हो गई. आते ही राजेश बीते दिन की बात पूछ बैठा. उस ने नाराजगी दिखते हुए गुस्से में कहा, ‘‘हरामजादी! मेरे पीछे गुलछर्रे उड़ाती है और मेरे खिलाफ ही पुलिस में शिकायत भी करती है.’’

इतना कहना था कि पुनीता भी गुस्से में आ गई. उस ने भी गालियां देनी शुरू कर दीं. उस ने पति को भिखारी कहा. भाई का पैसा लौटाने की बात करने लगी.

पुनीता के तेवर देखते हुए वह आगबबूला हो गया और चिकन काटने के लिए इस्तेमाल किए जाने वाले भारी चाकू से उस पर हमला कर दिया. उस ने चाकू से उस के चेहरे और गरदन पर वार किया जिस से उस की मौके पर ही मौत हो गई.

उस के बाद वह नहाया और खून सने कपड़े बाथरूम में छोड़ कर पुलिस कंट्रोल रूम को सूचना दे दी. उस के बाद उस ने पुनीता के मातापिता को भी फोन कर घटना की जानकारी दी.

इस वारदात का अपराध कुबूल करने के बाद पुलिस ने उसे हत्या के आरोप में गिरफ्तार कर लिया.

मांबाप के झगड़े के बारे में बच्चें ने पुलिस को बताया कि पापा उन्हें नानामामा से बात नहीं करने देते थे. इस बार रक्षाबंधन पर नाना के घर गए थे तो रुकने भी नहीं दिया था. उसी दिन वापस आ गए थे.

घटना के दिन के बारे में उन्होंने बताया कि वे उस दौरान स्कूल गए थे. उस रोज पापा गार्ड की वरदी में नहीं थे. दोनों को सुबह स्कूल बस में बैठा कर चले गए थे. औफिस भी नहीं गए थे. जबकि पहले वह वहीं से ही औफिस चले जाते थे.

राजेश से पूछताछ करने के बाद पुलिस ने उसे कोर्ट में पेश किया, जहां से उसे जेल भेज दिया गया.

यह जीवन है: अदिति-अनुराग को कौनसी मुसीबत झेलनी पड़ी- भाग 2

अदिति अगले दिन कक्षा में गई और पढ़ाने लगी. आधे से ज्यादा बच्चे उसे न सुन कर अपनी बातों में ही व्यस्त थे. एकदम उसे बहुत तेज गुस्सा आया और उस ने बच्चों को क्लास से बाहर खड़ा कर दिया. बाहर खड़े हो कर दोनों बच्चे फील्ड में चले गए और खेलने लगे. छुट्टी की घंटी बजी, तो उस ने बैग उठाया तभी चपरासी आ कर उसे सूचना दे गया कि उन्हें प्रिंसिपल ने बुलाया है.

अदिति भुनभुनाती हुई औफिस की तरफ लपकी. प्रिंसिपल ने उसे बैठाया और कहा, ‘‘अदिति तुम ने आज 2 बच्चों को क्लास से बाहर खड़ा कर दिया… तुम्हें मालूम है वे पूरा दिन फील्ड में खेल रहे थे. एक बच्चे को चोट भी लग गई है. कौन जिम्मेदार है इस का?’’

अदिति बोली, ‘‘मैडम, आप उन बच्चों को नहीं जानतीं कि वे कितने शैतान हैं.’’

प्रिंसिपल ठंडे स्वर में बोलीं, ‘‘अदिति बच्चे शैतान नहीं हैं, आप उन  को संभाल नहीं पाती हैं, यह कोई औफिस नहीं है… आप टीचर हैं, बच्चों की रोल मौडल, ऐसा व्यवहार इस स्कूल में मान्य नहीं है.’’

बस जा चुकी थी और वह बहुत देर तब उबेर की प्रतीक्षा में खड़ी रही. जब 4 बजे उस ने डे केयर में प्रवेश किया तो उस की संचालक ने व्यंग्य किया, ‘‘आजकल टीचर को भी लगता है कंपनी जितना ही काम रहता है.’’

अदिति बिना बोले परी को ले कर अपने घर चल पड़ी. वह जब शाम को उठी तो देखा अंधेरा घिर आया था. उस ने रसोई में देखा जूठे बरतनों का ढेर लगा था और अनुराग फोन पर अपनी मां से गप्पें मार रहा था.

उस ने चाय बनाई और लग गई काम पर. रात 10 बजे जब वह बैडरूम में घुसी तो थक कर चूर हो गई थी. उस ने अनुराग से बोला, ‘‘सुनो एक मेड रखनी होगी… मैं बहुत थक जाती हूं.’’

अनुराग बोला, ‘‘अदिति टीचर ही तो हो… करना क्या होता है तुम्हें, सुबह तो सब कामों में मैं भी तुम्हारी मदद करने की कोशिश करता हूं… पहले जब तुम कंपनी में थी तब बात अलग थी… रात हो जाती थी… अब तो सारा टाइम तुम्हारा है.’’

तभी मोबाइल की घंटी बजी. कल उसे 4 बच्चों को एक कंपीटिशन के लिए ले कर जाना था. अदिति इस से पहले कुछ और पूछती, मोबाइल बंद हो गया. बच्चों को ले कर जब वह प्रतियोगिता स्थल पर पहुंची तो पला चला कि उन्हें अभी 4 घंटे प्रतीक्षा करनी होगी. उन 4 घंटों में अदिति अपने विद्यार्थियों से बात करने लगी और कब 4 घंटे बीत गए, पता ही नहीं चला. उसे महसूस हुआ ये बच्चे जैसे घर पर अपनी हर बात मातापिता से बांटते हैं, वैसे ही स्कूल में अध्यापकों से बांटते हैं. पहली बार उसे लगा टीचर का कार्य बस पढ़ाने तक ही सीमित नहीं है.

आज फिर घर पहुंचने में देर हो गई क्योंकि सब विद्यार्थियों को घर पहुंचा कर ही वह अपने घर पहुंच सकी. डे केयर पहुंच कर देखा, परी बुखार से तप रही थी. वह बिना खाएपीए उसे डाक्टर के पास ले गई और अनुराग भी वहां ही आ गया. बस आज इतनी गनीमत थी कि अनुराग ने रात का खाना बना दिया.

रात खाने पर अनुराग बोला, ‘‘अदिति तुम 2-3 दिन की छुट्टी ले लो.’’

अदिति ने स्कूल में फोन किया तो पता चला कि कल उसी के विषय की परीक्षा है तो कल तो उसे जरूर आना पड़ेगा, परीक्षा के बाद भले ही चली जाए.

सुबह पति का फूला मुंह छोड़ कर वह स्कूल चली गई. परीक्षा समाप्त होते  ही वह विद्यार्थियों की परीक्षा कौपीज ले कर घर की तरफ भागी. घर पहुंच कर देखा तो परी सोई हुई थी और सासूमां आई हुई थीं, शायद अनुराग ने फोन कर के अपनी मां से उस की यशोगाथा गाई होगी.

उसे देखते ही सासूमां बोली, ‘‘बहू लगता है स्कूल की नौकरी तुम्हें अपनी परी से भी ज्यादा प्यारी है. मैं घर छोड़ कर आ गई हूं और देखा मां ही गायब.’’

अदिति किसकिस को सम झाए और क्या सम झाए जब वह खुद ही अभी सब सम झ रही है.

वह कैसे यह सम झाए उस की जिम्मेदारी अब बस परी की तरफ ही नहीं, अपने विद्यालय के हर 1 बच्चे की तरफ है. उस का काम बस स्कूल तक सीमित नहीं है. वह 24 घंटे का काम है जिस की कहीं कोई गणना नहीं होती. बहुत बार ऐसा भी हुआ कि अदिति को लगा कि वह नौकरी छोड़ कर परी की ही देखभाल करे पर हर माह कोई न कोई मोटा खर्च आ ही जाता.

अदिति की नौकरी का तीनचौथाई भाग तो घर के खर्च और डे केयर की फीस में ही खर्च हो जाता और एकचौथाई भाग से वह अपने कुछ शौक पूरे कर लेती. वहीं अनुराग का हाल और भी बेहाल था. उस की तनख्वाह का 80% तो घर और कार की किस्त में ही निकल जाता और बाकी का 20% उन अनदेखे खर्चों के लिए जमा कर लेता जो कभी भी आ जाते थे. उस के सारे शौक तो न जाने कहां खो गए थे.

अदिति जानेअनजाने अनुराग को अपनी बड़ी बहन और बहनोई का उदाहरण देती रहती जो हर वर्ष विदेश भ्रमण करते हैं और उन के पास खाने वाली से ले कर बच्चों की देखभाल के लिए भी आया थी. उन के रिश्तों में प्यार की जगह अब चिड़चिड़ाहट ने ले ली थी. कभीकभी अदिति की भागदौड़ देख कर उस का मन भी भर जाता. ऐसा नहीं है अनुराग अदिति को आराम नहीं देना चाहता था पर क्या करे वह कितनी भी कोशिश कर ले, हर माह महंगाई बढ़ती ही जाती.

गरम लोहा: बबीता ने क्यों ली पति व बच्चों के साथ कहीं न जाने की प्रतिज्ञा?- भाग 3

बच्चे छोटे थे तो ठीक था. जो भी खरीद कर लाती थी खुशीखुशी पहन लेते थे. पर बड़े हो जाने पर पहनते वही हैं जो उन्हें पूरी तरह से पसंद हो. मगर शौपिंग के लिए साथ हरगिज नहीं जाएंगे. कई बार खीज कर कह बैठती कि तुम दोनों की जगह अगर 2 बेटियां होतीं मेरी तो वे मेरे साथ शौपिंग के लिए भी जातीं और घर के कामों में भी मेरा हाथ बंटातीं.

सब से अधिक असमंजस और परेशानी वाली स्थिति मेरे लिए तब बन जाती है जब कहीं जाने पर वहां पहुंच कर दूसरेतीसरे दिन पहनने के लिए कपड़े निकाल कर देती हूं और वे यह कह कर पहनने से इनकार कर देते कि यह तो अब टाइट होने लगा है या इस की तो चेन खराब है. तब मेरे पास अपना सिर पीटने के अलावा और कोई रास्ता नहीं बचता. कई बार तो इस वजह से नई जगह में मुझे टेलर और कपड़ों की दुकान तक के चक्कर लगाने पड़ गए थे.

मैं ने मन ही मन तय किया कि मुझे कुछ ऐसा करना चाहिए, जिस से इन्हें मेरी स्थिति का अंदाज लगे और ये अपनी जिम्मेदारियां समझने लगें. मैं ने मन ही मन प्लान बनाया और फिर उस पर अमल करना शुरू कर दिया.

मुझे पता था कि इकलौते साले और इकलौते मामा की शादी के लिए अपूर्व और बच्चे भी बहुत उत्साहित हैं, साथ ही उन्हें मेरे उत्साह का भी अंदाजा है, बस इसी बात को हथियार बना कर मैं अपने प्लान पर अमल करने में जुट गई.

आयूष की शादी 1 महीने के बाद होनी तय हुई थी, इसलिए मुझे तैयारी ज्यादा करनी थी और समय कम था.

मैं ने तय यह किया कि मैं अपूर्व के औफिस और बच्चों के स्कूल जाने के बाद बाजार जाऊंगी पर मैं शादी के लिए कोई तैयारी कर रही हूं, इस की भनक तीनों को नहीं लगने दूंगी. खरीदे सारे कपड़े और बाकी सारा सामान मैं लाने के बाद अलमारियों में रख देती. सब के सामने सामान्य रहने का नाटक करती. शादी के प्रति न ही सब के सामने अपनी खुशी और उत्साह को प्रकट करती और न ही शादी की कोई चर्चा उन के सामने करती.

10-15 दिन तो सभी अपनेअपने काम में मशगूल रहे. किसी ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया कि मैं शादी के मसले पर शांत बैठी हूं. फिर एक दिन डिनर पर अपूर्व ने जब शादी का जिक्र छेड़ा तो मेरी ठंडी प्रतिक्रिया ने सब को चौकन्ना कर दिया. मैं ने कनखियों से देखा कि तीनों की सवालियां नजरें एकदूसरे से टकराईं.

‘‘क्या बात है बबीता आयूष की शादी के नाम पर तुम इतनी चुपचाप बैठी हो… अभी तक तुम ने कोई तैयारी भी शुरू नहीं की… सब कुछ ठीक तो है न?’’

‘‘हां ठीक है,’’ मैं ने जानबूझ कर संक्षिप्त जवाब दिया पर यह जवाब उन के कान खड़े करने के लिए पर्याप्त था.

‘‘कोई परेशानी है?’’ मेरी खामोशी से अपूर्व विचलित नजर आए.

तीर निशाने पर लगता देख मैं अपने प्लान की कामयाबी के प्रति आश्वस्त होते हुए गंभीर मुद्रा बना कर बोली, ‘‘मैं नहीं जा रही शादी में.’’

‘‘क्यों? क्या हो गया?’’ तीनों बुरी तरह चौंके.

‘‘भूल गए मेरी भीष्म प्रतिज्ञा?’’ मैं ने ऋतिक की तरफ देखते हुए कहा.

‘‘अरे मम्मा, मामा की शादी हो जाने दो, फिर ले लेना प्रतिज्ञा,’’ नटखट ऋतिक अपनी शैतानी से बाज नहीं आ रहा था. पर मैं ने अपनी हंसी पर पूर्ण नियंत्रण रखा था.

‘‘मैं सीरियस हूं. मेरी बात को कौमेडी बनाने की जरूरत नहीं है,’’ कह कर मैं जल्दीजल्दी अपना खाना खत्म कर प्लेट सिंक में रख बैडरूम में चली गई.

‘‘पापा, लगता है मम्मा नाराज हैं हम लोगों से,’’ गौरव की फुसफुसाती आवाज सुनाई दी मुझे.

‘‘तुम लोग चिंता न करो, अगर वह नाराज होगी तो मैं संभाल लूंगा,’’ अपूर्व ने बच्चों से कहा.

दूसरे ही दिन दोपहर में औफिस से अपूर्व का फोन आया. मेरे हैलो बोलते ही कहने लगे, ‘‘बबीता, आज सोच रहा हूं शाम को घर जल्दी आ जाऊं. आयूष की शादी की शौपिंग कर लेते हैं. मेरी भी सारी पैंटशर्ट्स पुरानी हो गई हैं.

2-4 जोड़ी कपड़े नए ही ले लेता हूं और तुम भी अपने लिए नईनई साडि़यां ले लो. आखिर इकलौते भाई की शादी है, पुरानी साडि़यां थोड़े ही जंचेंगी तुम पर.’’

बड़ी मुश्किल से अपनी हंसी पर काबू रख पाई थी मैं अपूर्व से बात करते समय. सोचने लगी जब तक प्यार से मिन्नतें करती थी कि अपनेअपने कपड़ों की खरीदारी में तो कम से कम मेरा साथ दिया करो तुम सब तब तक किसी के ऊपर मेरी बात का असर नहीं हुआ पर जरा सी टेढ़ी हुई नहीं कि एक झटके में जिम्मेदारी का एहसास हो गया जनाब को.

उधर कालेज से आते ही गौरव ने कहा, ‘‘मम्मा, कल रात मैं ने नैट पर सर्च किया. औनलाइन बड़ी अच्छीअच्छी शर्ट्स मिल रही हैं. सोच रहा हूं मामा की शादी के लिए इस बार औनलाइन ही कपड़े मंगवा लूं. ख्वाहमख्वाह ही तुम्हें हम लोगों के कपड़ों के लिए बाजार के कई चक्कर लगाने पड़ते हैं.’’

मेरा तीर निशाने पर लगा था. अपूर्व और बच्चे दोनों ही अपनेअपने कपड़ों के इंतजाम में जुट गए तो मुझे भी लगा कि अपना रुख थोड़ा ढीला कर देना चाहिए.

एक दिन जब अपूर्व ने सूटकेस निकाल कर उस में कपड़े डालते हुए कपड़े पैक करने की पहल की तो मुझ से रहा नहीं गया. मैं हंसते हुए बोली, ‘‘अब बस रहने दो. यह सब काम तुम्हारे वश का नहीं है. तुम लोगों ने अपने कपड़े अपनी पसंद के खरीद लिए और यह तय कर लिया कि किस अवसर पर क्या पहनोगे यही मेरे लिए बहुत है. कहीं जाने की तैयारी के लिए इस से अधिक की अपेक्षा नहीं करती मैं तुम लोगों से.’’

‘सच लोहा जब गरम हो तब वार करने पर वस्तु को मनपसंद आकार दिया जा सकता है.

कहने को उसके पास सब कुछ है अच्छी नौकरी, दिल्ली जैसे शहर में अपना घर, एक लाइफ पार्टनर, लेकिन फिर भी वह अकेली है पास बैठे पति से बात करने के बजाय वह सोशल साइट्स पर ऐसा कोई ढूँढती रहती है जिससे अपनी फीलिंग्स शेयर कर सके.

इसे कहते हैं सच्चा प्यार

सम्मान: क्यों आसानी से नही मिलता सम्मान- भाग 1

यों तो इस तरह के पत्र आते रहते थे और मैं उन्हें अनदेखा करता रहता था, लेकिन इन पत्रों पर गौर करना तब से शुरू कर दिया जब से शहर के एक लेखक ने मित्रमंडली में बताया कि उसे अब तक देश की विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं से एक हजार सम्मान मिल चुके हैं. मित्र लोग वाहवाह कर उठे. एक दिन मुझ से पूछा, ‘‘तुम्हें कोई सम्मान नहीं मिला आज तक? तुम भी तो काफी समय से लिख रहे हो.’’ उस समय मैं ने स्वयं को अपमानित सा महसूस किया.

मेरे शहर के इस लेखक मित्र के बारे में अकसर अखबार में छपता रहता था कि शहर का गौरव बढ़ाने वाले लेखक को दिल्ली की एक प्रसिद्ध साहित्यिक संस्था से एक और पुरस्कार. मैं ने अपने लेखक मित्र से पूछा, ‘‘इन पुरस्कारों की क्या योग्यता होती है?’’

उस ने गर्व से कहा, ‘‘मेहनत, लगन और लेखन. इस में कोई भाईभतीजावाद नहीं चलता. जो अच्छा लेखक होता है उसे सम्मान मिलता ही है.’’

मैं ने कहा, ‘‘आप की आयु तो मुझ से बहुत कम है. आप ने शायद मेरे बाद ही लिखना शुरू किया है. अब तक कितना लिख चुके हो.’’

उन्होंने नाराज हो कर कहा, ‘‘ कितना लिखा है, यह जरूरी नहीं है और आयु का लेखन से लेनादेना नहीं है. मेरी 2 किताबें छप चुकी हैं. मैं ने 20 कविताएं और 10 के आसपास कहानियां लिखी हैं. लेकिन लेखन इतना शानदार है कि साहित्यिक संस्थाएं स्वयं को रोक नहीं पातीं मुझे सम्मान देने से.’’

मैंने कहा, ‘‘मुझे भी बताइए कहां से कैसे सम्मान मिलते हैं? क्या करना पड़ता है? पुस्तकें कैसे छपती हैं?’’

उन्होंने कहा, ‘‘आप बड़े स्वार्थी हैं. साहित्य सेवा का काम है. साहित्य से यह उम्मीद मत रखिए कि आप को कुछ मिले. आप को देना ही देना होता है. 2 पुस्तकें मैं ने स्वयं के खर्च पर छपवाई हैं. और सम्मान मिलते हैं योग्यता पर.’’

खैर, दोस्त ने अपना उत्तर दे दिया. मैं ने फिर वे पत्र निकाले जिन्हें मैं अनदेखा करता रहता था. जो पत्र बचे हुए थे, उन्हें पढ़ना शुरू किया. काफी तो मैं फाड़ चुका था, बेकार समझ कर. ठीक वैसे ही जैसे अकसर मोबाइल पर एसएमएस आते रहते हैं कि आप को 10 करोड़ मिलने वाले हैं कंपनी की ओर से. आप इनकम टैक्स और अन्य खर्च के लिए हमारी बैंक की शाखा में फलां नंबर के अकाउंट में 10 हजार रुपए डिपौजिट करवा दें.

बाद में समाचारपत्रों से खबर मिलती है कि इन्हें ठग लिया गया है. इन की रकम डूब चुकी है. बैंक अकाउंट से सारे रुपए निकाल कर इनाम का लालच देने वाले गायब हो चुके हैं. खाता बंद हो चुका है. पुलिस की विवेचना जारी है. ऐसे ठगों से जनता सावधान रहे.

पहले पत्र में लिखा था कि हमारी अंतर्राष्ट्रीय साहित्यिक संस्था ने आप को श्रेष्ठ लेखन का पुरस्कार देने का निर्णय लिया है. यदि आप इच्छुक हों तो कृपया अपना पासपोर्ट साइज कलर फोटो, संपूर्ण परिचयपत्र, साहित्यिक उपलब्धियां और 1,500 रुपए का एमओ या नीचे दिए बैंक खाते में राशि जमा करें. एक फौर्म भी संलग्न था. प्रविष्टि भेजने की अंतिम तारीख निकल चुकी थी. दूसरा पत्र भी इसी तरह था. बस, अंतर राशि की अधिकता और पुरस्कार श्रेष्ठ कविता पर था. साथ में पुस्तक की 2 प्रतियां भेजनी थीं. इस की भी अंतिम तिथि निकल चुकी थी.

सम्मान का लोभ हर लेखक को होता है, थोड़ा सा मुझे भी हुआ. मैं ने पत्र के अंत में दिए नंबरों पर बात करने की सोची. पहले को फोन किया, कहा, ‘‘महोदय, आप की संस्था अच्छा कार्य कर रही है. अंतिम तिथि निकल चुकी है. कुछ प्रश्न भी हैं मन में.’’

उन्होंने उधर से कहा, ‘‘आप भेज दीजिए. अंतिम तिथि की चिंता मत कीजिए. हम आप की प्रविष्टि को एडजस्ट कर लेंगे.’’

मैं ने दूसरा प्रश्न किया, ‘‘जनाब, साहित्यिक उपलब्धियों में क्या लिखूं? लिख तो पिछले 20 साल से रहा हूं लेकिन कोई उपलब्धि नहीं हुई. बस, कहानियां, लेख लिख कर अखबार में भेजता रहता हूं. फिर उसी अखबार, जिस में रचना छपी होती है, को खरीदता भी हूं क्योंकि समाचारपत्र वालों से पूछने पर यही उत्तर मिलता है, ‘हम छाप कर एहसान कर रहे हैं. आप 2 रुपए का अखबार नहीं खरीद सकते. हमारे पास और भी काम हैं.’

‘‘‘हम अखबार की प्रति नहीं भेज सकते. आप चाहें तो अपनी रचनाएं न भेजें. हमें कोई कमी नहीं है रचनाओं की. रोज 10-20 लेखकों की रचनाएं आती हैं और हां, भविष्य में रचनाएं छपवाना चाहें तो पहला नियम है कि अखबार की वार्षिक, आजीवन सदस्यता ग्रहण करें. साथ ही, समाचारपत्र में दिया साहित्य वाला कूपन भी चिपकाएं. आजकल नया नियम बना है लेखकों के लिए. आप लोगों को छाप रहे हैं तो अखबार को कुछ फायदा तो पहुंचे.’’’

उधर से साहित्यिक संस्था वाले ने अखबार वालों को कोसा. उन्हें व्यापारी बताया और खुद को लेखकों को प्रोत्साहन देने वाला सच्चा उपासक. ‘‘आप उपलब्धि में जो चाहे लिख कर भेज दीजिए. जैसे, पिछले कई वर्षों से लगातार लेखन कार्य. चाहे तो अखबार में छपी रचनाओं की फोटोकौपी भेज दीजिए. ज्यादा नहीं, दोचार.’’

मैं ने फिर पूछा, ‘‘श्रीमानजी, ये 1,500 रुपए किस बात के भेजने हैं?’’ उन्होंने समझाया. मैं ने समझने की कोशिश की. ‘‘देखिए सर, सम्मानपत्र छपवाने का खर्चा, संस्था के बैनरपोस्टर लगवाने का खर्चा और आप के लिए चायनाश्ता का इंतजाम भी करना होता है. आप को संस्था का स्मृतिचिह्न भी दिया जाएगा. शौल ओढ़ा कर माला पहनाई जाएगी. आप को जो सुंदर आमंत्रणपत्र भेजा है उस की छपवाई से ले कर डाक व्यय तक. फिर मुख्य अतिथि के रूप में बड़े अधिकारी, नेताओं को बुलाना पड़ता है. उन की खातिरदारी, सेवा में लगने वाला व्यय. बहुत खर्चा होता है साहब. जो हौल हम किराए पर लेते हैं उस का भी खर्चा.’’

इसे कहते हैं सच्चा प्यार: भाग 3

साहस रोजाना आरुषी को कालेज पहुंचाने और लेने जाने लगा. फिर भी वे लड़के आरुषी को परेशान कर ही रहे थे. आरुषी उन के ध्यान में तो थी, पर साहस ने उन के खिलाफ कालेज में शिकायत कर रखी थी, इसलिए वे ज्यादा कुछ कर नहीं पा रहे थे.

उस दिन आरुषी कालेज के गेट नंबर एक की ओर जा रही थी, तभी कैंटीन में काम करने वाला एक लड़का आरुषी को एक चिट्ठी दे गया. जिस में लिखा था कि आरुषी आज तुम गेट नंबर 2 की ओर आना. वहां बसस्टाप पर मैं तुम्हें मिलूंगा-साहस.

आरुषी गेट नंबर 2 के पास बने बसस्टाप पर खड़ी हो कर साहस का इंतजार करने लगी. तभी वे गुंडे मोटरसाइकिल से आ कर आरुषी को घेर कर उस के साथ छेड़छाड़ करने लगे.

गेट नंबर 2 की ओर कोई आताजाता नहीं था, इसलिए वहां सुनसान रहता था. इसीलिए उन गुंडों ने साहस के नाम से फरजी चिट्ठी लिख कर कैंटीन के लड़के को भेज कर आरुषी को धोखे से वहां बुलाया था.

रोज की तरह साहस गेट नंबर एक पर खड़े हो कर आरुषी का इंतजार कर रहा था. पर जब आरुषी को आने में देर होने लगी तो वह कालेज के अंदर जा कर आरुषी को खोजने लगा.

दूसरी ओर आरुषी को अपनी सुंदरता पर बड़ा घमंड है, कह कर वे लड़के आरुषी को डराधमका रहे थे. अंत में जो लड़का आरुषी को काफी समय से प्रपोज कर रहा था, उस ने आरुषी के चेहरे पर एसिड फेंकते हुए कहा, ‘‘अगर तू मेरी नहीं हुई तो मैं तुझे किसी और की भी नहीं होने दूंगा.’’

इस के बाद सभी गुंडे मोटरसाइकिल से भाग गए. आरुषी दर्द और जलन से जोरजोर चीखते हुए जमीन पर पड़ी तड़प रही थी. पर उन गुंडों के डर और धाक की वजह से कोई मदद के लिए आगे नहीं आ रहा था. साहस को आरुषी की चीख सुनाई दी तो वह गेट नंबर 2 की ओर भागा. आरुषी की हालत देख कर उस के पैरों तले जैसे जमीन खिसक गई.

आरुषी को उस ने अपनी गाड़ी से नजदीक के अस्पताल पहुंचाया, जहां तत्काल उस का इलाज शुरू किया गया. उस की आंखें तो बच गईं, पर उस का नाजुक कोमल चेहरा भयानक हो चुका था. मम्मीपापा की परी अब परी नहीं रही.

जितना हो सका, उतनी सर्जरी कर के आरुषी को घर लाया गया. अपने कमरे में लगे आईने में अपना चेहरा देख कर आरुषी जिंदा लाश बन गई. आईने के सामने घंटों बैठने वाली आरुषी अब आईने के सामने जाने से डरने लगी थी. अब वह सब से दूर भागने लगी थी.

आरुषीकी हालत देख कर साहस भी परेशान रहने लगा था. आरुषी पर एसिड अटैक करने वाले सभी के सभी लड़कों को साहस ने जेल भिजवा दिया था, साथ ही साथ आरुषी को भी संभाल रहा था.

आरव जो आरुषी को चिढ़ाने के लिए चुहिया कहता था, अब उसी तरह आरुषी चूहे की तरह कोने में छिप गई थी. जो लड़की हाथ पर दाल गिरने से मां से लिपट कर रोने लगी थी, अब वही असह्य पीड़ा सहते हुए मां के पास बैठी रोती रहती थी.

आरुषी और साहस की शादी की तारीख नजदीक आती जा रही थी. एक दिन साहस ने आरुषी के पास आ कर कहा, ‘‘आरुषी शादी की तारीख नजदीक आ गई है, चलो आज थोड़ी शौपिग कर आते हैं. अभी तक हम ने शादी की कोई तैयारी नहीं की है.’’

आरुषी जोरजोर से रोने लगी. उस ने साहस से शादी के लिए मना कर दिया और कहा कि वह किसी दूसरी सुंदर लड़की से शादी कर ले. इस के बाद वह साहस से दूर रहने लगी, जो साहस से सहन नहीं हो रहा था.

आरुषी के इस व्यवहार से दुखी हो कर एक दिन साहस ने कहा, ‘‘आरुषी, तुम मेरे साथ ऐसा व्यवहार क्यों कर रही हो? मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता. मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि तुम देखने में कैसी लगती हो. मैं ने तुम्हें पहली बार देखा था, तभी तुम्हारा भोलापन मुझे बहुत भा गया था. उसी समय तुम मेरे दिल में उतर गई थी. तुम अपनी ही कही बात भूल गई?

‘‘तुम ने ही तो कहा था कि अपना जीवनसाथी खूब प्यार करने वाला होना चाहिए. प्रेम करना आसान है, पर किसी का प्रेम पाना बहुत मुश्किल है. आरुषी, मैं सचमुच तुम्हें बहुत प्यार करता हूं. जितना तुम मुझे करती हो, उस से भी बहुत ज्यादा. इसी तरह का जीवनसाथी चाहती थीं न तुम?’’

‘‘साहस, तब की बात अलग थी. अब मैं तुम्हारे लायक नहीं रही.’’ आरुषी ने कहा.

‘‘ऐसा क्यों कहती हो आरुषी? अगर यही घटना मेरे साथ घटी होती तो..? तो क्या तुम मुझे छोड़ देती? अगर शादी के बाद ऐसा होता तो… जवाब दो?’’

‘‘साहस, तुम समझने की कोशिश करो. अब मैं पहले जैसी नहीं रही.’’ आरुषी ने साहस को समझाने की कोशिश की.

आरुषी के इस व्यवहार से नाराज हो कर साहस वहां से चला गया. उस के जाने के लगभग एक घंटे बाद आरुषी के यहां फोन आया. आरुषी सहित घर के सभी लोग तुरंत अस्पताल भागे. अस्पताल पहुंच कर पता चला कि साहस ने लोहे का सरिया गरम कर के अपना चेहरा उतना ही दाग लिया था, जितना आरुषी का जला था. आरुषी ने साहस के पास जा कर उस का हाथ पकड़ कर रोते हुए कहा, ‘‘साहस, तुम ने यह क्या किया?’’

‘‘अब तो हम दोनों एक जैसे हो गए हैं न? अब मैं तुम्हारे लायक हो गया न? अब तो तुम शादी के लिए मना नहीं करोगी न?’’ साहस ने कहा.

‘‘सौरी साहस, तुम सचमुच मुझे बहुत प्यार करते हो. मैं भी तुम्हें बहुत प्यार करती हूं, तुम से भी ज्यादा. मैं तुम्हें कभी नहीं छोड़ूंगी, कभी नहीं.’’

इस दृश्य को देख कर दोनों ही परिवारों के सभी लोगों की आंखें भर आईं. शायद इसे ही सच्चा प्यार कहते हैं. प्यार सुंदरता का मात्र आकर्षण नहीं होना चाहिए, प्यार तो एक दिल से दूसरे दिल तक पहुंचने का कठिन जरिया है.

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