Award Night: भोजपुरी सिनेमा में ‘टीआरपी क्वीन’ के नाम से मशहूर हीरोइन संजना पांडेय ने बतौर लीड एक्ट्रेस कई दर्जन हिट फिल्में भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री को दी हैं. उन्होंने अपने फिल्म कैरियर की शुरुआत भोजपुरी के लोकप्रिय सिंगर समर सिंह के साथ ‘लाल चुनरिया वाली’ से की थी, जिस में उन के काम को खूब सराहा गया था. आज वे भोजपुरी की उन हीरोइनों में शुमार हैं, जिन की फिल्में सिनेमाघर के साथसाथ टीवी पर भी खूब देखी जाती हैं. उन की फिल्में टीवी पर टीआरपी के मामले में अव्वल रहती हैं. उन की ‘प्रीत का दामन’, ‘कलक्टर साहब’, ‘कारपोरेट बहू’, ‘कुंआरी कन्या’, ‘रानी बेटी राज करेगी’ जैसी फिल्मों ने टीआरपी के मामले में बड़े स्टारों को भी पीछे छोड़ दिया है. ‘रानी बेटी राज करेगी’ ने तो रिकौर्ड ही तोड़ दिया है.
7वें सरस सलिल भोजपुरी सिने अवार्ड्स शो के दौरान संजना पांडेय से हुई मुलाकात में उन के फिल्म कैरियर के कई अनछुए पहलुओं पर लंबी बातचीत हुई. पेश हैं, उसी के खास अंश :
आप के लिए बिना किसी गौडफादर के इंडस्ट्री में कदम रखना कितना चुनौती से भरा रहा?
मेरा मानना है कि इंडस्ट्री में आगे बढ़ने के लिए गौडफादर का होना कोई जरूरी नहीं है. मैं ने बिना गौडफादर के अपने टैलेंट के बलबूते अपना रास्ता तय किया. हां, यह रास्ता मुश्किल जरूर रहा, लेकिन टैलेंट ने कामयाबी भी दिलाई.
शुरुआती दिनों में सब से बड़ा रिजैक्शन कौन सा था और आप ने उस से क्या सीखा?
शुरुआत के दिनों में सब से बड़ा रिजैक्शन मेरे लिए यह था कि मैं ने अपने कैरियर की शुरुआत गायन से की थी. ऐसे में भोजपुरी की कई बड़ी फिल्में बड़े एक्टरों के साथ इसलिए हाथ से निकल जाती थीं कि वे मु?ो बतौर हीरोइन एक्सैप्ट नहीं कर रहे थे.
ऐसे में बड़ेबड़े हीरो के मना करने के चलते शुरुआती दौर की कई फिल्में मेरे हाथ से निकल गईं. लेकिन मैं ने भी ठान लिया था कि मु?ो गायिका के साथ ही बतौर हीरोइन भी अपनी जगह बनानी है.
आप की एक्टिंग जर्नी में ऐसा कौन सा मोड़ आया, जिस ने सबकुछ बदल दिया?
मेरे फिल्म सफर में मेरी दूसरी फिल्म ‘प्रीत का दामन’ ने सबकुछ बदल कर रख दिया था. जब यह फिल्म रिलीज हुई तो दर्शकों नें मेरे रोल को इतना पसंद किया कि मैं हिट क्या सुपरहिट हीरोइनों की लिस्ट में शामिल हो गई.
क्या थिएटर आर्टिस्ट्स फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादा मजबूत होते हैं?
थिएटर आर्टिस्ट्स फिल्म इंडस्ट्री में ज्यादा मजबूत होते हैं, क्योंकि मैं ने दिल्ली में रह कर
4 साल थिएटर के जरीए अभिनय सीखा है. थिएटर ने मेरे अंदर के कलाकार को और भी निखार कर बाहर लाने का काम किया है. जो भी कलाकार थिएटर बैकग्राउंड से फिल्म इंडस्ट्री में आते हैं, वे हर रोल में फिट बैठ जाते हैं.
किसी किरदार को ‘जीने’ के लिए आप क्या तैयारी करती हैं?
सब से पहले मैं फिल्म की स्क्रिप्ट में अपने किरदार को सम?ाने की कोशिश करती हूं और उस किरदार में ढलने की कोशिश करती हूं. मैं अपने किरदार को कई बार पढ़ती हूं, जिस से मैं खुद उस कैरेक्टर के साथ इंसाफ कर पाऊं.
आप ने कहा कि कामयाबी अंग प्रदर्शन से नहीं, टैलेंट से मिलती है. ऐसा कहने की क्या वजह है?
मेरा मानना है कि कामयाब होने के लिए अंग प्रदर्शन की कोई जरूरत नहीं है. आप पुरानी हिंदी फिल्मो को ले लीजिए. इन फिल्मों की हीरोइनों में रेखा को ले लीजिए या मेरे पसंदीदा एक्ट्रेस मीना कुमारी या नूतन, वैजयंती माला और साधना को ले लीजिए. इन्होंने कभी भी अंग प्रदर्शन नहीं किया, लेकिन कामयाबी ने इन के कदम चूमे. अगर आप में टैलेंट है तो आप को लोग सिरआंखों पर बैठा लेते हैं.
एक्टिंग या सिंगिंग, आप किसे अपने ज्यादा करीब मानती हैं?
एक्टिंग और सिंगिंग दोनों ही मेरे बहुत करीब हैं. चूंकि बचपन से गायन से जुड़ी रही, इसलिए यह कह सकती हूं कि सिंगिंग मेरे ज्यादा करीब है. लेकिन मेरे कैरियर में अभिनय और गायन दोनों माने रखते हैं, इसलिए मैं दोनों को बराबर के नजरिए से देखती हूं.
आप का कोई ऐसा गाना जो आप के दिल के बहुत करीब है?
अपने सभी गाने मु?ो पसंद हैं. मेरी एक फिल्म आई थी ‘सेनुर’, जिस में मैं ने खुद ही गाना गाया था. गाने के बोल थे ‘बेटीबेटी कहिके...’ यह गाना मेरे दिल के काफी करीब है.
लाइव परफौर्मैंस और स्टूडियो रिकौर्डिंग में आप को क्या फर्क महसूस होता है?
लाइव परफौर्मैंस के दौरान हम आडियंस से आमनेसामने कनैक्ट हो जाते हैं. आडियंस का जिस तरह का मूड होता है, उसी तरह से परफौर्म करना पड़ता है. स्टूडियो में हम बारबार रीटेक कर सकते हैं, लेकिन लाइव परफौर्मैंस के दौरान आडियंस को ध्यान में रखना पड़ता है.
आप की जिंदगी का सब से बड़ा मोटिवेशन क्या है?
मैं अपने पापा के खिलाफ जा कर इस इंडस्ट्री में आई थी, क्योंकि पापा चाहते थे कि मैं डाक्टर बनूं. लेकिन मैं जिद ठान कर इस इंडस्ट्री में आई. पापा की ‘मना’ ने मु?ो मोटिवेट किया और मेरी ‘हां’ ने मु?ो टूटने नहीं दिया. इसी मोटिवेशन के चलते कामयाबी मिली.
क्या आप सोशल मीडिया को जरूरी मानती हैं?
आज के दौर में सोशल मीडिया बहुत जरूरी है, क्योकि अपनी चीजों को देशदुनिया में पहुंचाने का यह बहुत बड़ा जरीया है. लेकिन कुछ लोगों को इस की बुरी लत लग जाती है. लोग दिनभर सोशल मीडिया में डूबे रहते हैं. ऐसे लोग अपना नुकसान कर बैठते हैं.
क्या आप किसी बड़ी हस्ती की बायोपिक में काम करना चाहेंगी?
मैं जब तक शारदा सिन्हाजी की बायोपिक नहीं कर लूंगी, तब तक मेरे अंदर का कलाकार अधूरा रहेगा.
महिलाओं के लिए इस इंडस्ट्री में क्याक्या बदलाव जरूरी हैं?
सैटेलाइट टीवी आने से महिलाओं को काफी आजादी मिली है. आज की भोजपुरी हीरोइनों का कैरियर हीरो की बदौलत नहीं, बल्कि हीरो का कैरियर हीरोइनों की बदौलत चल रहा है. आज की महिलाएं बहुत आजादी के साथ काम कर रही हैं.
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